


श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट डॉ. श्री शिवमुनि जी म.सा. के सान्निध्य में आत्म ध्यान धर्म यज्ञ का आयोजन शिवाचार्य आत्म ध्यान फाउण्डेशन, नाशिक (महाराष्ट्र), कुप्पकलां (पंजाब), जम्मू एवं अम्बाला में आयोजित हो रहा है, जिसका सीधा प्रसारण सूरत से किया जा रहा है। आत्म ध्यान धर्म यज्ञ आचार्य भगवन के आशीर्वाद से प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा., युवा मनीषी श्री शुभम मुनि जी म.सा. आदि संतवृदं एवं वीतराग साधिका निशा जी जैन के दिशा निर्देशन से यह शिविर संचालित हो रहा है। इस आत्म ध्यान धर्म यज्ञ में नाशिक ध्यान केन्द्र पर साधिका सुनीता जी जैन, कूप्पकलां में श्री राजपाल जैन, श्री अजय जैन, साधिका राजुल जी जैन, जम्मू में श्री रजत जैन, साधिका रिद्धिमा जी जैन आदि का प्रशिक्षक के रूप में विशेष सहयोग प्राप्त हो रहा है। इस धर्मयज्ञ में कुल 207 साधक भाग ले रहे हैं, जिसमें श्री सरस्वती विद्या केन्द्र नाशिक में 31 व आदिश्वर धाम कुप्पकलां में 48, जम्मू में 78, अम्बाला में 50 साधक सहभागी हैं।
आचार्य भगवन ने ध्यान का प्रयोग करवाते हुए फरमाया कि जड़ और जीव दो तत्व साथ में हैं। दोनों साथ हैं पर दोनों के गुण धर्म अलग-अलग हैं। निराकार तत्व है वह अमूर्त है जो दिखाई नहीं देता है शरीर चाहे स्त्री, पुरुष, बालक, वृद्ध का है सबमें समान आत्म तत्व स्थित रहता है। भगवान महावीर की साधना भेद विज्ञान की साधना थी जो विनय से शुरू होती है और भेद विज्ञान पर सम्पन्न होती है। साधक इस शरीर और आत्मा के तत्व को गहराई से जानने का प्रयत्न करे।
मनुष्य को जो शरीर मिला है वह उसके कर्म सिद्धांत के अनुसार मिला है। मानव जीवन एक रंगमंच की भांति है। मानव शरीर का सद्उपयोग करेंगे तो इस मानव शरीर की भी सार्थता सिद्ध होगी और जीव का भी कल्याण कर सकेंगे।
प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में फरमाया कि जो व्यक्ति राग-द्वेष को जीतने की कला सीख लेता है वह ज्ञानी है। संयमी पुरुष वह है जो मन, वचन काया का संयम कर आत्मा को आत्मा में स्थित कर लेता है। आत्मार्थी वह है जो आत्मा को महत्त्व देता है और वह किसी अंधे, अपंग व्यक्ति को देखता है तो वह चिंतन करता है कि किसी कर्म के कारण उसे यह फल मिला है।
प्रमुख मंत्री जी ने आगे फरमाया कि आत्म ध्यान शिविर में मन, वचन और काय गुप्ति की साधना सिखाई जाती है। मन का मौन करना सीख जाता है तो वह आत्मा के निकट पहुंच जाता है। व्यक्ति का उपयोग जीव में नहीं है तो वह प्रमाद में कर्म बंधन कर रहा है जिसका फल चार गति भ्रमण है।
ज्ञान पूर्वक भेद विज्ञान कर उपयोग जीव में रखकर अप्रमत होश में रहो। अप्रमत सातवां गुणस्थान है। दो घड़ी टिक जाओ तो केवल ज्ञान। एक घड़ी ठहर जाओ तो क्षायिक समकित।
मधुर गायक श्री निशांत मुनि जी म.सा. ने ‘‘जगो मेरे चेतन, खुद को न भूलो, कब तक पर में ही उलझे रहोगे’’ सुमधुर भजन की प्रस्तुति दी।
इस अवसर पर बारडोली, चैन्नई, पूना, जलगांव, औरंगाबाद, येवला आदि क्षेत्रों से गुरु दर्शन हेतु श्रद्धालु उपस्थित हुए।
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
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