ध्यान गुरु आचार्य सम्राट परम पूज्य शिवमुनि जी म.सा. ने चार दिवसीय ऑनलाइन आत्म ध्यान शिविर के तीसरे दिवस में शिविरार्थियों एवं धर्मसभा को संबोधित करते हुए फरमाया कि भगवान की साधना जिससे वे सिद्ध, बुद्ध मुक्त हो गये। उन्होंने साढ़े बारह वर्ष की साधना में एक मात्र अपने को जाना, अपने को पहचाना, अपने पर प्रीति की, अपने पर रूचि रखी। तुम्हें भी अगर सिद्ध, बुद्ध, मुक्त होना है तो संसार को छोड़ दो और अपने को जान लो, तुम भी तिर जाओगे।
देह में जीव है दोनों के गुण धर्म भिन्न हैं। दोनों की यात्रा भिन्न है। उदय कर्म के अधीन दोनों साथ है पर दोनों अलग है। जो दिख रहा है वह मैं नहीं हूं। देह को भूख है, प्यास है, वेदना-संवेदना है, देह का रंग-रूप, आकार है, जो पुरुष है, स्त्री है, जो सम्बन्धों के मध्य है वह मैं नहीं हूं, मैं आत्मा हूं।
अनादि की यात्रा में अनेकों देह परिवर्तित किये पर मैं आत्मा शाश्वत सत्य हूं, वही गुण, वही धर्म लेकर अनादि काल से यात्रा कर रहा हूं, अष्टगुणों की संपदा, आठ कर्म लेकर मैं अनादिकाल से संसार भ्रमण में भव परिवर्तन कर रहा हूं। कभी मनुष्य नहीं हुआ, कभी पशु नहीं हुआ, कभी देव नहीं हुआ, कभी नारकी नहीं हुआ यह देह धारण किये पर मैं आत्मा रहा। अज्ञान अवस्था में मैं स्वयं को मनुष्य, पुरुष, स्त्री, पशु, नारकी या देव जानने लगा पर मैं आत्मा था, आत्मा हूं, आत्मा ही रहूंगा।
इससे पूर्व श्रमण संघीय मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा ने अपने उद्बोधन में फरमाया कि हम अज्ञानी से ज्ञानी, मिथ्यात्वी से सम्यक्त्वी बनने का पुरुषार्थ कर रहे हैं। संसारी से सिद्ध बनने की यात्रा में हम आगे बढ़ रहे हैं। चार गति चैरासी लाख जीवायोनि का जो चक्र बना हुआ है इस यात्रा को वीतराग यात्रा बनाकर के सिद्धशिला की ओर जाने का पुरुषार्थ करें। हमने यात्रा तो बहुत की पर हमको यह नहीं पता था कि हमें जाना कहां है। जैसे एक व्यक्ति को पूर्व दिशा में जाना है और वह पश्चिम की दिशा में जा रहा है यानि विपरीत दिशा में जा रहा है जिससे उसे लक्ष्य तक पहुंचने की दूरी और बढ़ती जाती है, इसी तरह व्यक्ति की यात्रा सिद्धशिला की है और वह विपरीत दिशा अर्थात् संसार में जा रहा है।
इससे पूर्व श्री शमित मुनि जी म.सा. ने ‘‘कितने-कितने जन्म गंवाये’’ भजन की प्रस्तुति दी।
आज की धर्मसभा में चैन्नई, दिल्ली व स्थानीय श्रावक-श्राविका उपस्थित थे।
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
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