
आचार्य सम्राट डॉ. श्री शिवमुनि जी म.सा. ने फरमाया आत्मा का स्वरूप नित्य है। तीनों लोकांे, तीनों कालों में वह शुद्ध, शाश्वत, अखण्डित, अनंत ज्ञान, अनंत शक्ति, अनंत सुख देने वाला है। आत्म तत्व किसी भी योनी में चला जाए उसके स्वभाव में परिवर्तन नहीं आता। आत्मा जब स्वयं को भूलकर विभाव में चली जाती है तो चार गति चौरासी लाख जीवायोनि में भ्रमण करती है। इस भव भ्रमण को रोकने के लिए जड़ और जीव के भेद की कला जाननी आवश्यक है। आत्मा का स्वभाव बोलना नहीं है। आत्मा की अनुभूति में आने के लिए मन का मौन चाहिए। भगवान महावीर को अनेक उपसर्ग आए किंतु वे आत्मा में जीते थे। वे जड़-जीव के भेद के साथ जीते थे उन्होंने अनेक उपसर्गों को सहन किया और मुक्त हो गए।
उन्होंने फरमाया कि शहीद भगत सिंह, छत्रपति शिवाजी, महाराणा प्रताप आदि अनेक वीर यौद्धा हुए जिन्होने अपने शरीर को महत्त्व नहीं दिया। उन्होंन देश के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया और वे महान हो गये।
उन्होंने फरमाया कि आत्मा को जाननेे के लिए मन का मौन होना जरूरी है। मन के मौन द्वारा शून्य अवस्था में जाने से आत्मा के भीतर अनुभव आएगा। जब बोलने की इच्छा ही नहीं कि क्या बोलना? किससे बोलना। आत्मा की अनुभूति के लिए मन का मौन फिर निर्विचार हो जाओ, निर्विकल्प हो जाओ। जैसे महावीर दो वर्ष घर में रहे तो एक परम वैराग्य की स्थिति में रहे। पूर्ण मौन थे, ऐसा मौन हो जाए। आत्मा जो ग्रहण किये हुए गुणों को छोड़ता नहीं। आत्मा पुद्गल को ग्रहण नहीं करती है। आत्मा के आठ गुण है वे हमेशा रहेंगे।
शरीर को आत्मा समझने वाले व्यक्ति को भ्रम हो जाता है। जिस तरह वृक्ष के सुखे ठूंठ से अंधेरे में व्यक्ति को भ्रम हो जाता है कि यह भूत है, वह डर जाता है। अंधेरे में रस्सी को सांप समझने लगता है। भ्रम दूर करने हेतु भीतर का ज्ञान आवश्यक है।
प्रमुखमंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में संवर आश्रव व निर्जरा के बारे में फरमाया। उन्होंने फरमाया कि कला अनेक प्रकार की होती है कोई भी कला सीखने के लिए समय देना होता है इसी प्रकार आत्मा से परमात्मा बनने की एक कला है। जब आत्मा का स्वरूप अस्तित्व में अनुभव होता है तब संवर शुरू होता है। जिसको मुक्त होना है उसे कोई भी आश्रव नहीं लेना है। आश्रव को रोकने के लिए जड़ जीव का भेद करना चाहिए। आत्मा अपने स्वभाव में स्थित होती है वह अपने परिणाम को नहीं बिगाड़ती।
प्रवचन प्रभाकर श्री शमित मुनि जी म.सा. ‘‘आ गा ले प्रभु के गीत तेरे दिन बीते जाते हैं’’ भजन की प्रस्तुति दी।
ऑनलाईन के माध्यम से उपवास, एकासन, आयंबिल का तप करने वाले तपस्वियों ने प्रत्याख्यान लिये।
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
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