आत्मा का स्वभाव है ज्ञाता-दृष्टा भाव |

- आचार्य शिवमुनि

28 OCTOBER 2025

श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट डॉ. श्री शिवमुनि जी म.सा. के सान्निध्य में आत्म ध्यान धर्म यज्ञ का आयोजन शिवाचार्य आत्म ध्यान फाउण्डेशन, नाशिक (महाराष्ट्र), कुप्पकलां (पंजाब), जम्मू एवं अम्बाला में आयोजित हो रहा है, जिसका सीधा प्रसारण सूरत से किया जा रहा है। लाईव प्रसारण पर प्रसारित आत्म ध्यान धर्म यज्ञ के चतुर्थ दिवस पर आचार्य भगवन ने आत्म ध्यान के प्रयोग में साधकों को भीतर गहरे उतरे का संबोधन दिया। जिसमें फरमाया कि विचारों को गौण करते हुए आत्मा के स्वभाव ज्ञाता-दृष्टा अर्थात् जानना और देखना है। कोई भी विचार को महत्त्व न दें। विचार आए तो आते-जाते श्वांस या ‘सोह्म’ के उच्चारण का आलंबन लिया जा सकता है अथवा आत्मा के गुणों का चिंतन कर सकते हैं कि मैं आत्मा हूं अष्टगुणों से युक्त आत्मा हूं, जिसके द्वारा आत्मा में स्थित रह सकते हैं।

प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में फरमाया कि जो व्यक्ति अहंकार में कर्त्ता-भोक्ता भाव में देह को महत्त्व देता है वह विभिन्न व्याधियों से पीड़ित होता है। व्याधि तीन प्रकार की है आधि, व्याधि, उपधि। जिसमें आधि मन की, व्याधि शरीर की और उपधि परिग्रह की है। जो इन व्याधियों से पीड़ित होकर अपयश को प्राप्त करता है, जिसके कारण मानसिक दुःखी होता है। खेत, वस्तु, मकान के प्रति ममत्व रखता है वह व्यक्ति अज्ञानी होता है।

उन्होंने यह भी फरमाया कि देश में उपदेश देने वाले अनेक वक्ता मिल जाएंगे, किंतु उसमें जीने वाले बहुत कम है। भगवान ने साधु और श्रावक दोनों को तीर्थ बताया है, क्योंकि वे केवल उपदेश नहीं देते उसमें जीते हैं। साधु स्वयं तिरते हैं और दूसरों को भी तारने के निमित बनते हैं। साधु शत-प्रतिशत व्रत, नियम, मर्यादा का पालन करते हैं और श्रावक के व्रतों में आंशिक रूप से छूट रहती है, वे नियम, मर्यादा में जीने का पुरुषार्थ करते हैं।

युवा मनीषी श्री शुभम मुनि जी म.सा. ने ‘‘पायो जी पायो मैंने आत्म दर्शन पायो’’ सुमधुर भजन की प्रस्तुति दी।

मधुर गायक श्री निशांत मुनि जी म.सा. ने ‘‘अपनी कर पहचान जगत में अपना रूप निराला, ओ सुन मन मतवाला ’’सुमधुर भजन की प्रस्तुति देते हुए साधक जीवन की तीन कसौटी बताई जिसमें समता, सहिष्णुता और सजगता। समता जीवन तब आती है जब सबको समान दृष्टि से देखते हैं, जिसे आत्म ध्यान धर्म यज्ञ में बताया जाता है कि सब आत्मा समान है कर्म निर्जित कर लिये वे सिद्ध हो गए। दूसरा सहिष्णुता है, जीवन में आए हुए कष्टों को समता भाव से सहन करना। भगवान महावीर राजकुमार थे वे घर में रहकर साधना कर सकते थे। भगवान महावीर ने सभी सुख सुविधाओं, महल को त्याग कर जंगल में चले गए।

तीसरा है सजगता। हम अपने जीवन में देखें तो सजगता और प्रमाद। प्रमाद किया इसलिए संसार में है। जीवन में कर्म न बंध इसके प्रति सजग रहने का प्रयास करना चाहिए।

इस अवसर पर लंबे एकासन करने वाली श्रीमती श्वेता मेहता ने आज 70वें एकासन का प्रत्याख्यान लिया।

इस अवसर पर मुंबई, इन्दौर, अहमदनगर से श्रद्धालु गुरु दर्शन हेतु उपस्थित हुए

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