आत्मा का मन, बुद्धि, इन्द्रियों से कोई सम्बन्ध नहीं |

- आचार्य शिवमुनि

27 SEPTEMBER 2025

आचार्य सम्राट डॉ. श्री शिवमुनि जी म.सा. ने आज शुक्ल ध्यान का प्रयोग करवाते हुए जड़-जीव के भेद की विधि में फरमाया कि आत्मा सम्पन्न परिपूर्ण आठ गुणों से युक्त है। सब जीवों में समान आत्मा है। भेद से अभेद और अभेद से भेद ज्ञान को समझकर तुम मात्र आत्मा में लीन हो जाओ। ध्यान में विचार आए तो उसे रोंके नहीं विचार जैसे हैं वैसे ही चलने दें। आत्मा का मन, बुद्धि इन्द्रियों से कोई सम्बन्ध नहीं है, इस प्रकार आत्मा और शरीर का भेद जितना अधिक गहरा होगा उतना अधिक शुक्ल ध्यान होगा।

प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने श्री दशवैकालिक सूत्र के दसवें अध्ययन के अंतर्गत साधु के गुणों की चर्चा करते फरमाया कि जो साधु कर्मेन्द्रिय एवं ज्ञानेन्द्रिय से संयमित रहकर अध्यात्म में रत रहता है, वह निज आत्मा को समाधिस्थ करता है। आत्मा अपने स्वभाव में ही समाधिस्थ रहती है। जब आत्मा पर में जाती है तो वह असमाधि में रहती है। भगवान की वाणी का गुप्त रहस्य है कि सब जीवों में समान आत्मा के दर्शन करो।

महाराज जी ने क्रोध को शत्रु बताते हुए फरमाया कि जब एक दूसरे व्यक्ति पर क्रोध आए तो उस समय क्रिया-प्रतिक्रिया नहीं कर वहां भेद विज्ञान की साधना करें। विचार करें कि क्रोध किसे आ रहा है, जिसके ऊपर क्रोध आ रहा है वह भी आत्मा है और मैं भी आत्मा हूं। क्रोध करने वाला तो शरीर है। क्रोध के समय भेदज्ञान का उपयोग लगाकर क्रोध को क्षीण किया जा सकता है।

उन्होंने चण्डकौशिक सर्प का दृष्टांत देते हुए फरमाया कि चण्डकौशिक सर्प ने जब भगवान महावीर को डंक मारा तो भगवान महावीर ने कहा कि हे! चण्डकौशिक तू अपने को जान पिछले भव में क्या था जब उसे अपने पिछले भव का ज्ञान हो जाता है तो वह शांत हो जाता है, क्रोध के कारण उसे सर्प का भव मिला। चण्डकौशिक सर्प अंतःकरण में क्षमा का भाव रखते हुए उपशांत हो जाता है।

युवामनीषी श्री शुभम मुनि जी म.सा. ने ‘‘भगवान तुम्हारे चरणों में, हम जीवन सफल बना जाएं’’ सुमधुर भजन की प्रस्तुति दी।

इस अवसर पर मुंबई, शिरड़ी से गुरु भक्त दर्शन हेतु उपस्थित हुए।

इस अवसर पर कंचनबेन गन्ना ने 86 एकासन, श्वेता मेहता ने 39 एकासन, सारिका दक ने 17 एकासन का प्रत्याख्यान ग्रहण किया।

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