आत्मा का पोषण करना पौषधव्रत है |

27 SEPTEMBER 2024

श्रमण संघ के चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट डॉ. शिवमुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में ग्यारहवें व्रत पौषध के बारे में फरमाया कि शरीर से सम्बद्ध समस्त खटपटों से दूर रहकर एकमात्र आत्मा को पुष्ट करना, आत्म-चिन्तन, आत्मध्यान, आत्म-स्वरूपरमण, आत्म-निरीक्षण में ही सारा दिन और रात्रि व्यतीत करना, समस्त सांसारिक प्रवृत्तियों को छोड़कर चौबीसों घंटे धर्मजागरण, आत्मजागरण में रत रहकर आत्म-निर्माण करना ही वास्तव में पौषधव्रत है।

उन्होंने आगे फरमाया कि भगवान महावीर ने स्थानांगसूत्र में गृहस्थ श्रावक को भारवाहक श्रमिक की उपमा दी है और बताया है कि जैसे भारवाहक श्रमिक को थकान मिटाने के लिए चार विश्रान्ति स्थल होते हैं, जहाँ वह विश्रान्ति लेकर तरोताजा होकर पुनः अपने कार्य में द्विगुणित शक्ति से प्रवृत्त होता है, वैसे ही गृहस्थ श्रमणोपासक के सिर पर भी गृहस्थकर्तव्यों का बहुत बड़ा भार है, जिसे वह भी चार विश्रान्तिस्थलों पर उतार कर विश्राम पाता है, थकान उतारता है। भारवाहक की तरह गृहस्थ श्रावक भी गार्हस्थ्य-जीवन का भार वहन कर रहा है। वह चार स्थानों पर विश्रान्ति पाता है। पहला भारवाहक के कंधा बदलने की तरह श्रावक के लिए पहला विश्रान्ति स्थान तब होता है, जब वह यह भावना करे कि मैं अणुव्रत, गुणव्रत आदि व्रत अंगीकार करके पौषधोपवास करता हुआ विचरण करूं। दूसरा भारवाहक द्वारा कंधे पर रखे हुए भार को कुछ समय के लिए उतारने की तरह श्रावक के लिए दूसरा विश्रान्तिस्थान तब होता है, जब वह सावद्य-योग के त्याग और निरवद्ययोग के स्वीकार रूप सामायिक लेकर चित्त को समाधिभाव में प्रवृत्त करता है अथवा देशावकाशिक व्रत स्वीकार करके अपने पर आ पड़े भार को कुछ समय के लिए कम करता है। तीसरा भारवाहक द्वारा किसी सराय आदि में भार उतार कर रात्रि विश्राम की तरह श्रावक भी तब विश्रान्तिस्थान पाता है, जब वह अष्टमी, चतुर्दशी, पक्खी आदि पर्व के दिन एक दिनरात (अहोरात्रि) के लिए पौषधोपवास करता है। चौथा भारवाहक द्वारा निर्दिष्ट स्थान में पहुंचने पर विश्राम पाने के समान श्रावक जब अन्तसमय में समस्त सांसारिक कार्यों से निवृत्त होकर संल्लेखना, संथारा आदि करके शेष जीवन को समाधि प्राप्त करने में लगा देता है, तब चौथा विश्रान्ति-स्थान प्राप्त करता है।

उन्होंने फरमाया कि आत्मा के पोषक इस पौषधव्रत को स्वीकार किये हुए गृहस्थ साधक के सामने भी चाहे जितनी भौतिक विपत्तियाँ, कष्ट, संकट या शास्त्रीय भाषा में उपसर्ग क्यों न आएँ, वह उनसे विचलित नहीं होता। उसकी आत्म-शक्ति इतनी प्रबुद्ध एवं समृद्ध होती है कि वह मन-वचन-काया से कभी किसी पर द्वेष. दुर्भाव, आवेश या रोष नहीं करता, न किसी का अहित करता है।

इससे पूर्व श्रमण संघीय मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने तत्वार्थ सूत्र के माध्यम से फरमाया कि व्यक्ति के मन के अनुकूल शब्द आते हैं अच्छा लगता है उससे राग कर लेते हैं सुनने की इच्छा रखते हैं, राग कर लिया राग करते ही कर्मों का बंध होता है। ऐसे ही जब व्यक्ति की धारणा के विपरीत किसी ने कुछ बोल दिया और बुरा लग गया तो उस समय द्वेष की भावना आ जाती है। इस तरह शब्दों के निमित से राग-द्वेष के भाव उत्पन्न हो जाते हैं।
प्रवचन प्रभाकर श्री शमित मुनि जी म.सा. ने ‘‘आत्म शक्ति से ओत-प्रोत विद्या और ज्ञान से भर दो गुरुवर ऐसा वर दो’’ एवं श्री शाश्वत मुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन के साथ ‘‘तिरजा रे तिरजा रे’’ भजन की प्रस्तुति दी।

चिखली से 40 व्यक्तियों का संघ रूप में दर्शनार्थ उपस्थित हुए इसके अलावा पूना, दुर्ग (छत्तीसगढ़), चैन्नई आदि जगहों से श्रद्धालुगण उपस्थित हुए।

- आचार्य शिवमुनि

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