



आचार्य सम्राट डॉ. श्री शिवमुनि जी म.सा. ने समाधि तंत्र के अंतर्गत आज के उद्बोधन में फरमाया कि मैं शरीर हूं यह मानना मिथ्यात्व है। अनादिकाल से हम इस संसार में घूम रहे हैं। यदि व्यक्ति ने अपने शरीर को सबकुछ माना कि मैं मनुष्य हूं, मैं पिता हूं, मैं माता हूं, मैं गुरु हूं, मैं शिष्य हूं जब ये संबध बन जाते हैं वहां बंधन हो जाता है।
आचार्य भगवन ने आगे फरमाया कि इन्द्रियों के विषय अच्छे लगते हैं किंतु इससे चार गति चौरासी लाख जीवायोनि में भ्रमण करना पड़ता हैं। जड़ और जीव साथ में है पर दोनों अलग हैं दोनों का कोई संबंध या परस्पर तालमेल नहीं है, जिस तरह से तलवार और म्यान दोनों अलग है। किसी के साथ युद्ध करना है तो म्यान से तलवार निकालकर युद्ध करते हैं। कमल कीचड़ में पैदा होता है, कमल की डाल, पत्ते, फूल कीचड़ के पानी को छूता नहीं है ऐसे ही शरीर और आत्मा का संबंध है।
आचार्य भगवन ने फरमाया कि किसी भी तीर्थंकर ने शरीर को महत्त्व नहीं दिया। धन्ना, शालीभद्र, जंबू स्वामी को देखो उन्होंने शरीर को महत्व नहीं दिया। इस देह में आत्मा हैं आत्मा की उपस्थिति में इस शरीर का महत्त्व है। आत्मा निकल जाए तो फिर यह देह किसी काम की नहीं रहती, देह मुर्दा हो जाती है। आत्मा की साक्षी में देह जीवित है। हर वस्तु का अलग-अलग गुण होता है। जैसे नमक और मिश्री दोनों का रंग एक है पर गुण दोनों के अलग है। वैसे ही शरीर पुद्गल है और आत्मा अनंत सुख वाली है। सुख आत्मा में है ज्ञान, दर्शन, शक्ति सब आत्मा में है आत्मा अरूपी है उसका अनुभव कर सकते हैं।
आचार्य भगवन ने फरमाया कि आत्मा एक स्वतंत्र अस्तित्व है। पूरे ब्रह्माण्ड में अनंत आत्मा है उस अनंत आत्माओं में आपका अपना अस्तित्व है। यदि सिद्धालय जाओगे तो किसी को पकड़कर नहीं जा सकते। यह आत्मा ही सिद्धशिला जा सकती है। इसलिए आत्मा और शरीर का भेदविज्ञान करो।
प्रवचन के पश्चात् आचार्य भगवन ने आत्म ध्यान का प्रयोग करवाया।
प्रमुखमंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में अनुभाग बंध को विविध प्रकार के फल देने वाली शक्ति बताया। उन्होंने फरमाया कि पाक उदय कर्म है और विपाक विशेष जैसे कोई फल पकने के बाद उसका फल मिलता है ऐसे ही जब कर्म का फल पक जाता है तो वह अनुभाग में आता है। कर्मों के जैसे नाम होते हैं वैसे ही अनुभाग वाले फल होते हैं। प्रवचन प्रभाकर श्री शमित मुनि जी ने म.सा. ने ‘पाया नर तन पाया, क्या पाकर लाभ उठाया’’ भजन की प्रस्तुति दी।
श्रमण संघ अमृत महोत्सव के आयोजन हेतु आचार्य भगवन के आशीर्वाद एवं मार्गदर्शन हेतु श्री ऑल इण्डिया जैन कॉन्फ्रेन्स के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री अतुल जैन, कॉन्फ्रेन्स के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष एवं अरिहंत नगर श्रीसंघ के महामंत्री श्री जसवंत जैन, राष्ट्रीय युवा अध्यक्ष श्री विपुल जैन आदि गुरु चरणों में उपस्थित हुए। आज की सभा में दिल्ली, लुधियाना, कोटा, हैदराबाद, आदि क्षेत्रों से श्रद्धालु गुरु दर्शन हेतु उपस्थित हुए।
9 उपवास की तपस्या करने वाले श्री विपुल आंचलिया ने आज छह उपवास का प्रत्याख्यान लिया, तपस्वी आंचलिया का स्मृति चिन्ह द्वारा सम्मान किया गया। इसके अलावा ऑनलाईन के माध्यम से उपवास, एकासन, आयंबिल का तप करने वाले तपस्वियों ने प्रत्याख्यान लिये।
आत्म भवन में प्रतिदिन प्रातः 6.15 से 7.15 आत्म ध्यान, प्रातः 9.30 से 10.30 स्वाध्याय, ध्यान एवं मंगल पाठ का कार्यक्रम गतिमान है। आप सभी लाभ लेकर अपन जीवन को कृतार्थ करें।
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
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