आत्मीयता और स्नेह का पर्व-रक्षाबंधन |

19 AUGUST 2024

श्रमण संघ के चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट डाॅ. शिवमुनि जी म.सा. ने उपस्थित धर्मसभा को संबोधित करते हुए अपने उद्बोधन में फरमाया कि संसार एक सागर है, इस सागर में लहरें उठती है और विलीन हो जाती है ऐसे संसार सागर में मनुष्य जन्म लेता है और मृत्यु को प्राप्त कर लेता है। इस संसार सागर से पार होने के लिए यदि कोई द्वीप है तो वह धर्म है, आधार है तो धर्म है। वस्तु का अपना स्वभाव है, देह की पांचों इन्द्रियों का अलग-अलग स्वभाव है, जिस तरह से कान का स्वभाव सुनना, जीभ का स्वभाव स्वाद लेना, नासिका का स्वभाव सूंघना है इसी तरह आत्मा का स्वभाव है अपने में स्थित होना।

उन्होंने रक्षाबंधन के अवसर पर फरमाया कि भाई-बहन का निश्छल प्रेम तो समस्त मानव जाति में ही पाया जाता है, पर इसे राखी के धागों से दृढ़ीभूत करने की अद्भुत व गौरवशाली परम्परा भारत को छोड़ कर अन्य विश्व में उपलब्ध नहीं होती। न केवल राखी के ये धागे भाई-बहन के निश्छल प्रेम को ही दृढ़ करते हैं अपितु कोई भी स्त्री किसी भी अनजान पुरुष, फिर वह चाहे किसी भी धर्म, जाति या राष्ट्रीयता का हो, को राखी के धागे बांधकर अपना भाई बनाकर अपनी रक्षा का आश्वासन प्राप्त कर सकती है, इसीलिए इन धागों को राखी अर्थात रक्षाबंधन नाम दिया गया है। यह पर्व भाई-बहन के बीच पवित्र स्नेह का द्योतक भी है। रक्षाबंधन आत्मीयता और स्नेह के बंधन से रिश्तों को मजबूती प्रदान करने का पर्व है। यही कारण है कि इस अवसर पर न केवल बहन भाई को ही नहीं अन्य संबंधों में भी राखी बांधने का प्रचलन है।

उन्होंने स्वामी विवेकानन्द के प्रसंग का उल्लेख करते हुए फरमाया कि विश्व धर्म सम्मेलन शिकागो में स्वामी विवेकानन्द ने अन्तर्राष्ट्रीय मंच पर अपने उद्गार व्यक्त करने से पूर्व सभा को संबोधित करते हुए कहा- माई डियर ब्रदर एण्ड सिस्टर्स। भाई और बहन की महत्ता का प्रभाव दुनिया के अन्य देशों ने जाना।

उन्होंने अपने उद्बोधन में फरमाया कि कर्मवती और हुमायूं की यह ऐतिहासिक घटना सदैव याद रखनी चाहिए कि पवित्र रिश्ते मजहब के मोहताज नहीं होते। पवित्र रिश्तों का सम्मान करना सभी का नैतिक कर्तव्य है। पं. मदन मोहन मालवीय ने भी राखी के धागों का प्रयोग वर्तमान बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के निर्माण के लिए किया। रवीन्द्र नाथ ठाकुर ने राखी बांधकर हिन्दू-मुसलमानों में प्रेम संबंध की परम्परा चलाई।

रक्षाबंधन के शुभ पर्व पर बहनें अपने भाई से यह वचन चाहती हैं कि आने वाले दिनों में किसी बहन के तन से वस्त्र न खींचा जाए फिर कोई बहन दहेज के लिए जिंदा न जलाई जाए, फिर किसी बहन का अपहरण न हो और फिर किसी बहन के चेहरे पर तेजाब न फेंका जाय।

इससे पूर्व मधुर गायक श्री निशांत मुनि जी म.सा. ने फरमाया कि हम धर्म को उपरी तौर पर समझ रहे हैं धर्म को भीतर से समझने का प्रयास करें, धर्म के अनुरूप जीवन को बनाने का प्रयास करें, जिसने धर्म को स्वीकार किया उसका जीवन धर्म के अनुरूप रहता है और फिर धर्म उसकी रक्षा करता है।

श्री शाश्वत मुनि जी म.सा. ने ‘‘करुणा के सागर ऐसी दया कर जीवन की ज्योति उजागर हो जाए’’ भजन की प्रस्तुति दी।

इस अवसर पर बारडोली, सूरत, अहमदाबाद, जालंधर, केलिफोर्निया (अमेरिका) से श्रावकों ने प्रवचन श्रवण व गुरु दर्शन का लाभ लिया।

- आचार्य शिवमुनि

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