आचार्य भगवन ने आत्म ध्यान से किया भक्तों को लाभान्वित सत्य सबके लिए एक है |

- आचार्य शिवमुनि

30 JULY 2025

आचार्य भगवन उद्बोधन नहीं देकर आज की सभा को आत्म ध्यान के प्रयोग एवं दर्शन लाभ प्रदान कर श्रावक-श्राविकाओं को लाभान्वित किया।
आज का उद्बोधन श्रमण संघीय प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. एवं सहमंत्री श्री शुभम मुनि जी म.सा. का हुआ।

प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में फरमाया कि जिस तरह से मुर्गे के बच्चे से भय होता है वैसे ही साधु को स्त्री शरीर का खतरा रहना चाहिए वैसे ही साध्वी के लिए पुरुष शरीर से खतरे के भय से रहता है, इस तरह का भय ब्रह्मचर्य पालन में आवष्यक है। साथ ही स्त्रियों से साधु व पुरुषों से साध्वियों को मधुर भाषण नहीं करना चाहिए। मनोज्ञ इन्द्रियों के प्रति रागभाव नहीं रखना चाहिए। पुद्गल का यह शरीर अनित्य है बदल रहा है। आज मनोज्ञ है कल अमनोज्ञ हो सकता है। व्यक्ति वस्तु स्थान परिवर्तन उसका धर्म है उसमें बदलाव आ रहा है इसलिए शरीर के प्रति राग भाव नहीं होना चाहिए।

उन्होंने आगे फरमाया कि पंचम आरे में अहिंसा नाम से अनेक सम्प्रदाय खड़े हुए हैं। कोई भी पंथ हो सत्य सबके लिए एक ही है, सत्य है मैं आत्मा हूं। आत्मा था और रहूंगा, जिसकी आत्मा पर श्रद्धा नहीं है, जड़ अर्थात् पुदगल में साता ढूंढ रहे हैं, केवलियों की दृष्टि से जड़ को जड़ और जीव को जीव का स्थान दो। सोने को शुद्ध करनेे के लिए अग्नि में तपाया जाता है वैसे ही तपस्या के द्वारा बाहर के पुद्गल तपेंगे जिससे मोह में कर्म जो बांधे है वे क्षय होंगे। राग और वैराग्य राग से कार्मण शरीर बढ़ता है। मेरे पास मेरे अलावा कुछ नहीं मैं तो जीव आत्मा हूं, मेरा कोई नहीं है, कौन व्यक्ति मेरा, मैं आत्मा हूं, आकार में निराकार के दर्शन करो।

युवा मनीषी श्री शुभम मुनि जी म.सा. ने ‘‘वेला अमृत गया, आलसी सो रहा, बन अभागा साथी सारे जगे तु ना जागा’’ सुमधुर भजन की प्रस्तुति देते हुए फरमाया भजन की पंक्तियां कहती है कि अन्दर से जागरण हो? जब किसी व्यक्ति को पूछा जाता है कि धर्माराधना करते हो क्या, तो उनका उत्तर प्रायः यह रहता है कि महाराज! समय नहीं है? सामायिक, माला, जाप, संवर, प्रतिक्रमण का कहते हैं तो कहते हैं समय नहीं है, समय तो है किंतु समय का प्रबंधन नहीं है, रूचि नहीं है। यदि समयक का प्रबंधन और रूचि हो तो कुछ भी असंभव नहीं है। जो समय भेद ज्ञान में नहीं लग रहा है तो समझना चाहिए वह समय कर्म बंधन में जा रहा है। बंधन तो पुण्य का हो रहा है। धर्ममय अवस्था नहीं है, बध्ंान तो बंधन है। वर्तमान समय में अगर आ गए तो धर्ममय जीवन में आ गए।

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