


आत्मज्ञानी सद्गुरुदेव आचार्य सम्राट डॉ. शिवमुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में फरमाया कि धनमोह का परिणाम आपके जीवन में सर्वप्रथम आसक्ति के रूप में आता है। इस ममत्व का परिणाम कृपणता के रूप में आता है। कृपणता का परिणाम संग्रह और शोषण के रूप में आता है। आप अन्याय-अनीति करके दूसरों का शोषण करने लगते हैं और संग्रह करके रखना चाहते हैं। जो कुछ आपके पास है, आप देना नहीं चाहते। भाई भाई को देना नहीं चाहता। बहन को देना नहीं चाहता। दूसरों का हिस्सा भी ले लेना चाहता है। माता-पिता के पास जो कुछ है, चाहता है कि ये मरने से पहले-पहले मुझे संभाल दें। उनके पास से भी सब कुछ ले लेना चाहता है। आप सोचिएगा कि इस धन के कारण जब परिवार में इस प्रकार की संकीर्ण मनोवृत्ति बन जाती है, फिर इस मनोवृत्ति का प्रभाव बाहर क्या होगा? जहां आत्मीयता के सम्बन्ध हैं, वहां भी वह धन के कारण लिहाज़ नहीं करता। बाहर वह किसका लिहाज़ करेगा? इसी के कारण अनैतिकता आती है। शोषण आता है। किसी को कुछ देना नहीं चाहता।
उन्होंने आगे फरमाया कि मार्गदर्शन कोई गलत चीज़ नहीं है क्योंकि वृद्धों के पास अनुभव होता है। इस आधार पर वे दूसरे को अच्छा मार्गदर्शन दे सकते हैं और वे हित से देते हैं, किन्तु दूसरा हित समझे तो! दूसरा हित नहीं समझता। वह उसे हस्तक्षेप मानता है। फिर टकराव होता है। टकराव से कलह होता है। कलह से फिर वैमनस्य होता है, विघटन होता है। फिर दूरी हो जाती है। कभी-कभी पृथकता हो जाती है। ऐसी स्थिति न बने, अच्छा यह है कि निवृत्ति ग्रहण कर ली जाए।
‘श्रावक’ शब्द का विवेचन करते हुए अपने उद्बोधन में फरमाया कि श्रावक में तीन अक्षर हैं-श्र, व और क। ‘श्र’ का अर्थ है जो श्रवण करता है, ‘व’ का अर्थ है जो वपन करता है, ‘क’ का अर्थ है जो कर्मों का क्षय करता है। श्रावक के तीन भाव हैं। जो धर्मशास्त्रों को सुनाता है, वह श्रावक है। शास्त्र ने श्रावक के विषय में कहा कि श्रावक स्वसमय और परसमय का ज्ञाता होता है अर्थात् वह अपने धर्म का भी ज्ञाता है। दूसरे धर्मों को भी जानता है। व्यक्ति को ज्ञानी होना चाहिए। अपने धर्म को भी जानना चाहिए और दूसरे के धर्म को भी जानना चाहिए। अपने धर्म को जानकर उसमें दृढ़ता उत्पन्न करनी चाहिए। दूसरे के धर्म को जानकर उससे गुण ग्रहण करना चाहिए।
इससे पूर्व श्रमण संघीय प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में फरमाया कि बाहर के पुद्गलों से बचने के लिए मन, वचन, काया का गोपन करना चाहिए जिससे वे प्रभावित नहीं कर सकते और विवेक पूर्वक मन वचन, काया का गोपन करना संवर है। संवर का दूसरा कारण सम्यक रूप से प्रवृति करना। यतना पूर्वक प्रवृति करने से प्राणियों को कष्ट पहुंचाने से बच सकते हैं। संवर का तीसरा कारण धर्म है। धर्म जो धारण करने योग्य है वह धर्म है। दुर्गतियों से बचाकर सुगति सिद्धगति की ओर ले जाने वाली विधि धर्म है।
इससे पूर्व मधुर गायक निशांत मुनि जी म.सा. ने ‘‘एक बार तू मुख से बोल जरा अरिहंत प्रभु-अरिहंत प्रभु’’ भजन की प्रस्तुति दी।
आज की सभा में दिल्ली, बोधवड (जलगांव), धुलिया से श्रद्धालु गुरु दर्शन के लिए उपस्थित हुए। बोधवड से ‘‘संतों की माता’’ के नाम से उपमित एवं सेवाभावी मोहनबाई बरड़िया का शिवाचार्य आत्म ध्यान फाउण्डेशन के पदाधिकारियों ने शॉल, माला, स्मृति चिन्ह द्वारा सम्मान किया।
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
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