


प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने 20वें अध्ययन महानिर्ग्रंथीय का संक्षिप्त विवेचन करते हुए फरमाया कि मगध राजा श्रेणिक अपनी सेना और सेनापतियों के साथ प्रातः भ्रमण के लिए जाते हैं। भ्रमण के दौरान उनकी नजर एक ध्यानस्थ बैठे मुनि पर जाती है। राजा द्रव्य रूप में मुनि को देखता है और कहता है कि अभी तुम्हारा भोग भोगने का समय है, इस समय में तुम योगी कैसे हुए। शरीर के स्तर पर राजा अपने को नाथ मानता है उस समय आयु के अंतिम समय में सन्यास लिया जाता था। लेकिन मुनि निश्चय में जी रहे थे, मुनि आत्मार्थी थे। मुनि ने सीधा उत्तर दिया कि मैं अनाथ हूं। राजा श्रेणिक ने सोचा सामान्य बात कर रहा हैं।
उस पर राजा ने कहा कि मैं तुम्हारा नाथ बनता हूं। आओ तुम संसार के सुख भोग भोगो। मुनि ने राजा श्रेणिक से कहा कि राजन! तुम स्वयं अनाथ हो। निश्चय में आत्मा का कोई नाथ नहीं हैं। अनाथी मुनि अपना सारा वृतांत राजा श्रेणिक को बताते हैं कि मेरी आंखों में असहनीय वेदना हुई। मेरा सम्पूर्ण परिवार, सभी तरह के वैद्य, तांत्रिक कोई भी आंख की पीड़ा को शांत नहीं कर पाया। आत्मा की विभाव दशा के कारण व्याकुल हो रहा था। फिर आत्मा की शरण में जाने का संकल्प किया। अगर यह रोग शांत होता है तो जीव के लिए पूरा जीवन दे दूंगा। बचा हुआ समय अपने जीव के कल्याण के लिए लगाने का संकल्प किया। उसी समय रात में निद्रा आ गई और बाधक कर्म क्षय हो गए। जब सुबह उठे तो परिवार, रिश्तेदारों ने अपनी-अपनी बात रखी कि अमुक-अमुक कारण से वेदना शांत हुई है।
तब अनाथी मुनि ने कहा कि मेरे श्रमणत्व के संकल्प से यह वेदना शांत हुई है और वे मुनि बन जाते हैं। राजा श्रेणिक और अनाथी मुनि का संवाद चलता है। अनाथी मुनि की घटना से राजा श्रेणिक को धर्म का बोध होता है।
श्रमण संघीय प्रमुख मंत्री श्री जी ने कथानक के सार रूप में फरमाया कि अनन्त जन्मों के भारी से भारी कर्म व्यक्ति अपनी आत्मा में रहकर क्षय कर सकता है। अखण्ड शुक्ल ध्यान में यदि कोई बाधक है तो वह है व्यक्ति के द्वारा अपने भीतर एकत्रित किये हुए विचार हैं। अनाथी मुनि का रोग उनमें वैराग्य जगाने के लिए निमित बना, वैसे कभी-कभी घटना और प्रकृति भी निमित बनती है। आत्मा के कल्याण के लिए प्रभु रास्ता दिखा सकते हैं, किंतु उस रास्ते पर व्यक्ति को स्वयं चलना होगा तभी जीव का कल्याण होगा।
इससे पूर्व युवा मनीषी श्री शुभम मुनि जी एवं प्रवचन प्रभाकर श्री शमित मुनि जी ने चौबीसवें अध्ययन ‘प्रवचन माता’ की 27 गाथा एवं पच्चीसवें अध्ययन ‘यज्ञीय’ की 45 गाथा का मूल वांचन किया।
प्रवचन प्रभाकर श्री शमित मुनि जी ने श्री उत्तराध्ययन सूत्र के 20वें अध्ययन महानिर्ग्रंथीय का वर्णन करते हुए अनाथी मुनि एवं राज श्रेणिक के संवाद का रोचक विवेचन किया।
इस अवसर पर अहमदाबाद से दर्शन हेतु श्रद्धालु उपस्थित हुए।
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
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