



श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट डॉ. श्री शिवमुनि जी म.सा. ने बाहर से आए हुए श्रद्धालुओं को मंगल पाठ प्रदान करते हुए आत्म ध्यान का प्रयोग करवाया।
श्रमण संघीय प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने उद्बोधन में फरमाया कि अनादि से व्यक्ति जिस घर में रहने के लिए आया उस घर को उसने अपना मान लिया, उस पड़ाव को अपना मान लिया। मनुष्य चौबीस घंटे में निज आत्मा के लिए कितना समय देता है यह विचारणीय है। शरीर और आत्मा की भिन्नता को जानते हुए आत्मा का ध्यान करना चाहिए। व्यक्ति जब शरीर, मन, बुद्धि और विचार का ध्यान करता है वह आर्त्त-रौद्र ध्यान में चला जाता है। व्यक्ति अज्ञानता के कारण राग-द्वेष और कषायों में चला जाता है।
उन्होंने आगे फरमाया कि व्यक्ति को यह भान नहीं है कि मैं हूं कौन? मेरा अस्तित्व क्या है? उसे यह भान रहे कि शरीर मात्र एक यात्री है। जो एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाता है, रूकता है, फिर आगे बढ़ता जाता है वैसे ही यह शरीर मात्र एक पड़ाव है। जो इस पड़ाव अपना मान लेता है तो वह अज्ञान है।
उन्होंने द्रव्य लोक और भाव लोक का विवेचन करते हुए फरमाया कि द्रव्य लोक षट्द्रव्य से बना हुआ है, जिसमें धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय, आकाशास्तिकाय, काल, पुद्गलास्तिकाय और जीवास्तिकाय। काल को अस्तिकाय इसलिए नहीं कहा गया है क्योंकि उसकी काया नहीं है किंतु वह परिवर्तन में सहयोगी है। धर्मास्तिकाय आदि ये पांचों अजीव है। इनके बीच एक है जीवास्तिकाय। षद्द्रव्यों में केन्द्र बिन्दू दो तत्व ही हैं जीव और अजीव। अजीव सहयोगी साधन है जिसके माध्यम से जीव का ध्यान करना है। कोई भी कार्य की सिद्धि के लिए साधन और साध्य दोनों आवश्यक है।
इससे पूर्व मधुर गायक श्री निशांत मुनि जी म.सा. ‘‘हे देव कृपालु कृपा कर दो, भव सागर मैं तर जाऊं’’ सुमधुर भजन की प्रस्तुति दी।
आज की सभा में दुर्ग (छत्तीसगढ़), अहिल्या नगर (महाराष्ट्र), बैंगलोर, मुंबई, सवाई माधोपुर आदि क्षेत्रों से श्रद्धालु गुरु दर्शन हेतु उपस्थित हुए।
विशेष – 25 अक्टूबर 2025 से एक दिवसीय, चार दिवसीय एवं दस दिवसीय आत्म ध्यान धर्म यज्ञ का आयोजन नाशिक सेन्टर, आदीश्वर धाम कुप्पकलां (पंजाब) एवं जम्मू में अयोजित होगा।
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
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