Acharya Shiv Muniji

महापर्व पर्युषण के दिनों
में हम इतनी धर्म आराधना करे की धर्म अंग - संग बन जाये |
logo-jain1
आचार्य शिव मुनिजी
ध्यान गुरु श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर

श्रमण संघ के आचार्य डॉ.शिव मुनि (डी.लिटू) बचपन से ही जिज्ञासु थे। एक सम्पन्न वैश्य परिवार में जन्मे शिवकुमार (दीक्षा के पूर्व नाम) किशोर उम्र में ही यह सोचकर बैचेन रहने लगे थे कि मैं कौन हूँ ? कहाँ से आया हूँ ? जीवन क्या है? कब तक हूँ ? मृत्यु क्या है ? मुक्ति क्या है?

संयुक्त परिवार चाहता था कि वे शिक्षा पूरी करें, उनका विवाह हो और व्यापार व्यवसाय सम्भाले । शिवकुमार ने अंग्रेजी और दर्शनशास्त्र में पोस्ट ग्रेज्युएशन की डिग्री हासिल की। शिक्षा काल में ही उन्हें 54 दिवसीय स्टडी टूर के लिए अमेरिका, कनाडा, इंग्लैण्ड और कुवैत जाने का मौका मिला। सन्‌ 1972 में 30 वर्ष की उम्र में परिवार से दीक्षा लेने की अनुमति मिली तो वे हो गए शिवमुनि।
लीक से हटकर सोचने वाले शिवमुनि ने भारतीय धर्मों में (मुक्ति की अवधारणा-विशेष जैन धर्म सदर्भ में’ विषय पर पाँच वर्षों तक शोध किया। उन्हें पीचडी की उपाधि मिल गई। यह शोध करते हुए डॉ. शिवाचार्यजी इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि सभी धर्मों में कॉमन है ध्यान । ध्यान अनुभूति है जो किताबों से नहीं सिद्ध होता। यह जानकर डॉ. शिवाचार्यजी ने अपने चातुर्मास को भारत भ्रमण में बदल डाला। तीन दशक तक वे हर उस जगह पहुँचे जहाँ ध्यान पर शोध और शिविर हो रहे थे। विभिन्न विधाओं के गुरुओं के सानिध्य में उन्होंने ध्यान साधना की। नासिक में दो महीनें की एकांत साधना के दौरान डॉ. शिवाचार्यजी को भगवान महावीर की ध्यान साधना के सूत्र मिले। डॉ. शिवाचार्यजी ने ज्ञान के बिखरे मोतियों को पिरोया और ध्यानस्थ हुए तो “मैं कोन हूँ“ का जवाब मिलने लगा । डॉ. शिवाचार्यजी ने अपने इस खोज का नामकरण किया है-आत्म ध्यान।

अन्य ध्यान पद्धतियां कहती हैं-‘पहले ज्ञान, फिर ध्यान’। ध्यान योगी डॉ. शिवाचार्य कहते हैं कि ध्यान के बिना अर्जित ज्ञान मात्र शाब्दिक ज्ञान है, सूचना है। आज हमारा मस्तिष्क सूचनाओं का वैसा ही प्लेटफार्म बन गया है जैसे कम्प्यूटर | गूगल सर्च करो ओर दुनियाभर की शाब्दिक जानकारी प्राप्त कर लो, पर अनुभूति इसमें मिसिंग है। ऐसा ज्ञान शुष्क और मृत होता है। ध्यान योगी डॉ. शिवाचार्यजी ने आत्म ध्यान को ध्यात्मिक बना दिया है। पिछले तीन दशक में उन्होंने हजारों ध्यान शिविरों में लाखों लोगों को आत्म ध्यान करवाया है। डॉ. शिवाचार्यजी कहते हैं-जैसे संगीत की कोई परिभाषा नहीं होती, धर्म नहीं होता वैसे ही ध्यान भी भाषा और धर्म के हर बंधन से मुक्त है।