PARVACHANMALA DELHI 2009

PARVACHANMALA DELHI 2009

नई दिल्ली: जैन समाज के प्रमुख आचार्य श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

आचार्य श्री शिवमुनि जी महाराज का चातुर्मासिक प्रवेश 1 जुलाई

नई दिल्ली: जैन समाज के प्रमुख आचार्य श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज का अपने शिष्यवृंद सहित चातुर्मासिक प्रवेश बुधवार 1 जुलाई, 2009 को धर्म नगरी ऋषभ विहार, {निकट कड़कड़डूमा कोर्ट} दिल्ली में प्रातः 8.00 बजे होने जा रहा है । आचार्यश्रीजी प्रातः 7.30 बजे विवेक विहार जैन स्थानक से विहार कर राम मन्दिर, विवेकानंद महिला काॅलेज, योजना विहार यमुना स्पोर्टस काॅम्पलेक्स, सूरजमल विहार, बाहुबली एन्कलेव व किरण विहार के सामने से होते हुए ऋषभ विहार में प्रवेश करेंगे । 

श्रद्धेय आचार्य भगवंत भारतवर्ष का पैदल भ्रमण करते हुए लगभग पैंतीस हजार किलोमीटर की पैदल यात्रा के साथ 8 वर्ष बाद दिल्ली ऋषभ विहार चातुर्मास हेतु पहुंचे हैं । आचार्यश्रीजी ध्यान योग के अन्वेषक हैं । 38 वर्ष की संयम साधना में भगवान महावीर की ध्यान साधना की खोज करते हुए आपने उस आनंद, शांति, सुख के खजाने को प्राप्त किया उसको बाँटने के लिए चार माह आप ऋषभ विहार में रहेंगे । इस दौरान प्रतिदिन प्रवचन श्रृंखला के साथ समय-समय पर ध्यान योग साधना शिविरों का भी आयोजन होगा । यह चातुर्मास केवल ऋषभ विहार का ही नहीं समस्त दिल्ली वासियों का है । जो भी जीवन में सुख, शांति, आनंद पाना चाहें वे सभी यहां आकर लाभ उठा सकते हैं । 

जब से आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज का 29 मई, 2009 को भारत की राजधानी दिल्ली में मंगल प्रवेश हुआ है तभी से पूरी दिल्ली में एक हर्षोल्लास और मंगल का वातावरण चारों ओर फैला हुआ है । सब तरफ एक ही चर्चा है श्रद्धेय आचार्य भगवंत का यह वर्षावास आध्यात्मिक वर्षावास बनेगा । 

चातुर्मास कर्म-निर्जरा का कारण बनें

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

06 जुलाई, 2009: ऋषभ विहार, दिल्ली  युग पुरुष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- अरिहंत परमात्मा को नमन । चातुर्मास का प्रथम दिवस आप सबके लिए मंगलकारी हो । आपके भीतर मंगल की स्थापना   हो । ममकार की भावना हटे । कषाय भावना अहंकार द्वारा कर्म का बंधन होता है । जहाँ ममता की भावना समाप्त हो वहाँ मंगल प्रारंभ होता है । हमारे भीतर मंगल की स्थापना हो । जहां मंगल होता है वहां सुख शांति स्मृद्धि स्वतः होती है । चातुर्मास प्रतिवर्ष आते हैं और यों ही चार माह के 120 दिन बीत जाते हैं । इनसे जो लाभ उठा पाते हैं उनका जीवन सार्थक सिद्ध होता है ऐसे तो वर्ष की तीन चातुर्मास हैं ग्रीष्मकालीन, शीलकालीन और वर्षाकालीन जिसमें दो चातुर्मास स्थान-2 पर भ्रमण कर जिनधर्म के प्रचार प्रसार में व्यतीत होते हैं तो एक चातुर्मास आत्मशुद्धि हेते एक स्थान पर रहकर बिताया जाता है वो चातुर्मास है वर्षाकालीन चातुर्मास । चातुर्मास एक अवसर है आत्म-शुद्धि का । यदि भूमि उपजाऊ है बरसात हो रही है, बीज योग्य है तो वह वृक्ष का रुप अवश्य धारण करेगा । इस चातुर्मास के भीतर हम अधिक पुरुषार्थ भीतर की भूमि को उपजाऊ करते हुए आत्म साक्षात्कार के बीज वपन करने का करेंगे । इस चातुर्मास में कर्म ग्रन्थी तोड़ने का कार्य होगा । आत्मा के वास्तविकता की पहचान होगी । 

दो बातें हैं इच्छा और आवश्यकता । जहाँ इच्छा हो उसे छोड़ते चले जाना और जहां आवश्यकता हो उसकी पूर्ति करते चले जाना । हमने आज तक का जीवन इच्छा पूर्ति में लगाया परन्तु आज तक किसी की इच्छा पूरी नहीं हुई । सिकन्दर विश्व को जीतकर भी विजेता नहीं बन पाया । सांसारिक इच्छाओं को पूरी करने के लिए हम सारा जीवन लगा देते हैं । हम अपनी आवश्यकता को देखें । चातुर्मास में जो आवश्यक होगा वो सबकुछ आपको प्राप्त होगा । सत्गुरु का संग । अरिहंत की भक्ति, सिद्ध का स्मरण आपके जीवन का परिवर्तन करेगा । चातुर्मास में आप बहुत कुछ कर सकते हो प्रतिदिन सामायिक करें । शास्त्र श्रवण करें । प्रवचन में आएं । अपने जीवन से संबंधित ज्वलंत समस्याओं को प्रश्न द्वारा उजाकर करें । 

इस चातुर्मास में आप चाहें तो कई भवों की यात्रा या कई जन्मों के बंधन तोड़ सकते हो । ये तभी संभव होगा जब आपकी अटल श्रद्धा होगी । श्रद्धा जिनवाणी पर जिनवाणी को केवल शब्दों से नहीं गहराई से समझना । हम चातुर्मास में अपने जीवन को नियमित करें । एक नियम में बांधे । यहाँ पर प्रतिदिन प्रवचन भी होंगे तो साथ में आपके जीवन को रुपान्तरित करने के लिए ध्यान साधना शिविरों का आयोजन भी होगा । शास्त्र स्वाध्याय भी होगा तो आत्म-चिन्तन भी होगा । समस्त कार्यक्रमों में आप भाग लेकर कर्म ग्रन्थी तोड़ने का पूर्ण पुरुषार्थ करें । 

गुरु वो जो परमात्मा से मिलाए

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

07 जुलाई, 2009: ऋषभ विहार, दिल्ली  युग पुरुष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- आज का पावन दिवस गुरु पूर्णिमा का दिवस है । यह दिवस एक अन्तःकरण की पुकार लेकर आता है । गुरु चांद है, चांद इसलिए कि पूर्णिमा का चाँद सोलह कला सम्पूर्ण होता है । शिष्य अगर उस पूर्ण चांद को प्राप्त करना चाहे तो गुरु के पास बैठकर उनके ज्ञान को समझना आवश्यक होगा । गुरु एक दीया है जो हमारे भीतर के अन्तस को जागृत करता है । गुरु कुछ भी ना बोले तब भी जीवन रुपान्तरित हो जाता है, जैसे फूलों के पास जाने से सुगंध मिल जाती है झरने के पास जाओ तो हृदय झंकृत होता है आकाश को देखते ही शून्य अवस्था भीतर आ जाती है नदी की लहरों का संगीत हमें लयबद्ध कर देता है उसी प्रकार गुरु जीवन में एक रुपान्तरण घटित करता है । 

गौतम महावीर को मिले प्रकाण्ड पंडित थे अहंकारी थे दर्शन करते ही विनम्र हो गए और शिष्य बन गए । शिष्य ज्ञान लेना ना चाहे और गुरु भगवान बनकर भी आ जाए तब भी ज्ञान प्राप्ति नहीं हो सकती । गुरु द्रोणाचार्य और शिष्य एकलव्य का उदाहरण हमारे समक्ष   है । शिष्य चाहता था ज्ञान लेना परन्तु गुरु का नियम था वे केवल राजपरिवार को ही शिक्षित करते थे ऐसे में गुरु की प्रतिमा को साक्षी मानकर ज्ञान का वरण किया और गुरु ने अंगूठा दक्षिणा में मांगा तो वो भी दे दिया ।

श्रीमद् रायचन्द्र आत्म सिद्धि शास्त्र में गुरु के पांच लक्षण बताते हुए कहते हैं-

आत्म-ज्ञान समदर्शिता विचरे उदय प्रयोग  ।

अपूर्व वाणी परम् श्रुत सत्गुरु लक्षण योग ।।

गुरु वह है जो हमें आत्मा का ज्ञान कराये, यह गुरु का पहला लक्षण है । संसार का ज्ञान देने वाले गुरु बहुत मिल जाएंगंे परन्तु आत्म-ज्ञानी गुरु कोई-2 ही होते हैं । सतग्ुारु का दूसरा लक्षण है कि दुःख सुख लाभ हानि कष्ट पीड़ा में समत्व भाव में रहेगा । सत्गुरु का तीसरा लक्षण है जीवन में जो कुछ भी हो उसे वह सब अपने कर्मों का उदय मानकर चलने वाला होगा । भगवान की वाणी को स्वयं सुनकर दूसरों को सुनाता हुआ उस पर आचरण करेगा यह सद्गुरु का चैथा लक्षण है और पांचवा लक्षण है वह परम श्रुत का ज्ञाता होगा । परम् श्रुत है भगवान की सत्यमयी वाणी है जिसमें संसार का सबसे बड़ा सत्य आत्मा का ज्ञान भरा हुआ   है । गुरु और शिष्य दोनों का मिलन जीवन में सत्संग घटित करता है । सत्संग ऐसे हैं जैसे अंधे को आंख मिल जाए गूंगे को जबान मिल जाए, मुर्दा जीवित हो जाए । गहन अंधकार में सूर्य सा प्रकाश हो । 

हम स्वयं सत्गुरु बने ना बने परन्तु उनके चरण शरण में जाने का भाव भीतर रहे । गुरु का सत्संग, गुरु की दृष्टि हमारे भीतर आए, उनकी वाणी उनकी कृपा जीवन में नहीं है तो कुछ भी नहीं है । स्वामी विवेकानंद ने बहुत खोज के बाद रामकृष्ण परम्हंस को गुरु रुप में पाया और कहते हैं रामकृष्ण परमहंस ने स्वामी विवेकानंद को परमात्मा से मिला दिया । गुरु वो नहीं जो आपको सम्प्रदाय या परम्परा से बांधे । गुरु तो वो है जो आपको परमात्मा से मिलाए । 

धर्म हृदय से होता है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

08 जुलाई, 2009: ऋषभ विहार, दिल्ली  युग पुरुष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- प्रभु महावीर का धर्म शासन उनकी वाणी हमें उनसा बनाती है । प्रभु महावीर का धर्म मंगल स्वरुप है । देह के भीतर जो चेतना, प्राण, जीवंतता है वो भी मंगल-रुप है । हमारे भीतर हर प्राणी के प्रति मैत्री का भाव हो । धर्म मंगल है उत्कृष्ट है ऐसा धर्म जिसे देवता भी नमस्कार करते हैं वह धर्म अहिंसा, संयम, तप रुप है । एक ही सूत्र में भगवान महावीर स्वामी ने समस्त सार दे दिया । धर्म व्याख्या या चर्चा में नहीं । धर्म बुद्धि से नहीं किया जाता वह तो हृदय से होता है । महत्वपूर्ण है धर्म हृदय में आए । 

धर्म के तीन रुप हैं अहिंसा, संयम और तप । अहिंसा है तुम्हारी आत्मा । संयम है स्वयं को संयेाजित करना और तप है तुम्हारी इन्द्रियों का पूर्ण नियंत्रण । अपनी चेतना से प्रेम उसकी अनुभूति ही अहिंसा है । प्रभु महावीर ने अहिंसा को भी आत्मा कहा है । तुम्हारी आत्मा शाश्वत् है चार गति चैरासी लाख जीवयोनि भ्रमण में वह सदा से शाश्वत् रही है । चेतना गुणों से युक्त आत्मा का जीवन में बहुत बड़ा महŸव है । स्वयं को संयोजित करना संयम है । जहाँ समस्त यम सम हो जाते हैं वहां संयम घटित होता है । तप है इन्द्रियों का नियंत्रण । ऐसे अहिंसा, संयम, तप रुप धर्म को देवता नमस्कार करते हैं वह धर्म मंगल-रुप है जीवन में मंगल की अनुभूति कैसे हो आज समाज में आधि, व्याधि, दुःख, पीड़ा बैचेनी है उसका मूल कारण क्या है ं। धर्म कहां है और हम उसे कहां आरोपित कर रहे हैं । आज व्यक्ति एक दूसरे के दोष देखता है जहाँ दोष दर्शन होता है वहां आत्म दर्शन हो नहीं सकता । दोषारोपण एक गलत परम्परा है । धर्म में दोष है ही नहीं और जहां दोष है वहाँ धर्म नहीं । हमें धर्म की शरण मिली है हम धार्मिक होकर भी आधि व्याधि दुःख पीड़ा से पीडित हो तो हमारा धार्मिक होना सही नहीं है । 

हमारे जीवन मे ंधर्म तभी घटित होगा जब हम अहिंसा, संयम और तप का आचरण करेंगे । इस आचरण के द्वारा हमें आत्म अनुभूति होगी और उससे आत्म रमण और आत्म-चिन्तन के द्वारा हम धर्म को भीतर उतार पाएगे ।

बच्चे की शिक्षा गर्भ से प्रारंभ हो

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

09 जुलाई, 2009: ऋषभ विहार, दिल्ली युग पुरुष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- धर्म पर हमारा विश्वास हो और जीवन का लक्ष्य तय हो जाए तो जीवन में शांति, समता, आनंद स्वयं घटित हो जाता है । जब हम नमो अरिहंताणं कहते हैं तब हम अरिहंत परमात्मा को नमन करते हैं उस नमन की प्रक्रिया में हम परमात्मा से जुड़ जाते हैं । हमारे यहां मंगलपाठ में चार मंगल, चार उत्मम और चार ही शरण बतलाऐ हैं उसमें सर्वप्रथम अरिहंत मंगल है । अरिहंत की वाणी मंगल है । आज हम साक्षात् उनके दर्शन नहीं कर सकते परन्तु उन्हें भाव से वंदन नमन करें । उनकी वाणी में अनुरक्त रहे, जिनवाणी पर श्रद्धा करें जिनवाणी को भीतर से स्वीकार करें तो यह जीवन मंगलमय बनेगा । अहिंसा आत्मा है, संयम प्राण है तो तप शरीर है । ऐसे मांगलिक उत्कृष्ट धर्म का आधार और पात्रता क्या है ? जो जीवात्मा ऋजु है उनके शुद्ध हृदय में धर्म रहता है । जैसे घी से सिक्त अग्नि होती है वैसी आत्मा आत्म तेज से दिप्त होती है और उस आत्म तेज के द्वारा ही कर्म क्षय हो जाते  हैं । 

शुद्ध हृदय के लिए सरल उदाहरण है बच्चों सा होना । बच्चा सहज, सरल भोला-भाला होता है जीसस् से पूछा स्वर्ग का अधिकारी कौन है तो उन्होंने एक बच्चे की तरफ इशारा किया और उसे स्वर्ग का अधिकारी बताया । धर्म में हम स्थिर है और हमारी नींव मजबूत है तो हम कभी भी डांवाडोल नहीं होगें । छोटा बच्चा दर्पण होता है वह हंसता है तो हर अंग से हंसता है जैसा भीतर है वैसा ही बाहर है । बच्चा दो तीन साल का हो जाता है तो उसकी सहजता, सरलता समाप्त हो जाती है उसमें फिर अकड़ाहट आने लगती है । उसकी शुद्धता और पवित्रता को कायम रखने के लिए चार वर्ष की उम्र से पहले-पहले ही उसे संस्कारित करना होगा । आज के मनौवैज्ञानिक स्वीकार करते हैं कि एक बालक अस्सी प्रतिशत शिक्षा चार वर्ष की उम्र तक ग्रहण कर लेता है । जब बच्चा चार वर्ष तक 80 प्रतिशत संस्कार ले लेता है तब माँ उसकी शिक्षा का प्रारंभ कब से करे उत्तर में कहा जाता है कि बच्चा जब गर्भ में आए तभी से उसकी शिक्षा का प्रारंभ हो । 

भगवान कृष्ण की जननी तो देवकी थी परन्तु मां यशोदा थी । प्रभु महावीर तृशला नंदन कहलाए । राम को कौशल्या नंदन कहा गया । शास्त्र में पुत्र के लिए अंगज शब्द आता है । अंगज यानि अपना सर्वस्व । जिसे आप अपना सर्वस्व देते हो संस्कारों से पल्ल्वित पुष्पित करते हो वह बालक सचमुच अंगज होता है । अगर आपमें व्यसन है तो बच्चा व्यसनमुक्त नहीं हो सकता । आपमें कोई बुराई है तो उसकी झलक बच्चे में अवश्य दिखाई देगी । आज का बच्चा कल का भविष्य है । हम बच्चों से सीखें और उन्हें धर्म के उत्तम संस्कार प्रदान करें । 

बालक को दें गर्भ से संस्कार

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

10 जुलाई, 2009: ऋषभ विहार, दिल्लीयुग पुरुष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- मानव जीवन का लक्ष्य उसी में है कि उसके भीतर परमात्मा बनने का भाव   हो । जीवन तभी सार्थक सिद्ध होगा जब उसके भीतर परमात्मा को पाने की ललक होगी । जीवन में शुभ आए या अशुभ, पुण्य हो या पाप हर समय में निस्वार्थ-भाव से प्रार्थना करना और भगवान की शरण ग्रहण करना जीवन की एक सीढ़ी है । हर व्यक्ति इस सीढ़ी से अवश्य गुजरता है ।

नारी के लिए तपस्या है उसके बालक का जन्म होना । जब नारी एक बच्चे को जन्म देती है तब वह एक तपस्या से गुजरती है । नारी की 64 कलाओं में गर्भ संस्कार एक कला है । कल्प सूत्र में माता त्रिशला ने जब 14 स्पप्न देखे तो वह जागृत होकर धर्माराधना में लग गई और जहां राजा सिद्धार्थ विश्राम कर रहे थे उस कक्ष में जाकर राजा सिद्धार्थ को जाकर यह बताया कि मुझे ऐसे स्वप्न आए हैं इससे यह ध्वनित होता है कि माता तृशला और राजा सिद्धार्थ अलग-2 कक्ष में शयन करते थे । जब कोई जीव गर्भ में आता है तो माता पिता को शील का पालन करना चाहिए । मनोवैज्ञानिक तो यहां तक कहते हैं कि जब तक बच्चा दूध पीता हो तब तक शील का पालन आवश्यक है । जैसे बच्चा गर्भ में आएगा वैसे माताओं बहिनों के भीतर कुछ नई इच्छाएं प्रकट होगी जिन्हें दोहद कहा गया है जैसा दोहद होगा वैसे ही बालक के कर्म-संस्कार होते हैं । जैसे राणी चेलना को कोणिक के गर्भ में आने पर अपने पति के कलेजे का माँस खाने का दोहद उत्पन्न हुआ इस बात से ही रानी चेलना ने अन्दाज लगाया कि उसका भविष्य कैसा होगा ? कहते हैं अर्जुन सुभद्रा को चक्रव्यूह की रचना सुना रहे थे और सुभद्रा को नींद आ गई ऐसे समय में अभिमन्यु जो गर्भ में पल रहा था वह यह तो जान पाया कि चक्रव्यूह में प्रवेश कैसे करना है परन्तु यह नहीं जान पाया कि उससे बाहर कैसे निकलना है । 

जब बालक गर्भ में आए तो माता को सजग रहना चाहिए । अधिक मिर्च मसाले युक्त भोजन नहीं करना चाहिए । भीतर संतोंष की भावना रखनी चाहिए । सती मदालसा ने सात बच्चों को जन्म दिया और वह सती कहलाई । द्रोपदी पांच पतियों की पति होकर भी सती कहलाई । महात्मा गांधी की शादी हुई बच्चे हुए फिर भी वे महात्मा कहलाए । धर्म किसी परम्परा में नहीं धर्म तो धारण में है एक अंग्रेजी महिला गर्भवती थी और उसके बच्चे का जब जन्म हुआ तो वह काले रंग का था । गोरे अंग्रेज का बच्चा काला हो एक आश्चर्य चकित घटना है उससे पूछा गया तो उसने कहा कि मैं अपने घर में हफसी महिला का चित्र देखती थी उसके कारण बच्चे पर ऐसा प्रभाव पड़ा । जब बालक गर्भ में हो तो माताओं को टी0वी0 नहीं देखना चाहिए । धर्म कथा सुननी चाहिए । महान् पुरुष तीर्थंकरों के चित्र देखने चाहिए । द्वेष क्लेश आदि कषायों में नहीं जीना चाहिए । मंत्र आदि के उच्चारण द्वारा आसपास के वातावरण को शुद्ध बनाना चाहिए । ऐसे कई अनुभव है जिनमें गर्भवती माताओं ने ध्यानसाधना शिविर किया और उनकी संतान धार्मिक प्रवृत्ति की हुई । आप अपने बच्चे को ऐसे संस्कार दें कि वह धार्मिक हो उसकी शुरुआत गर्भ से ही   हो । ध्यान शिविरों में केवल ध्यान साधना ही नहीं जीवन निर्माण के उत्कृष्ट सूत्रों को प्रदान किया जाता है । 

जननी जने तो भक्तजन

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

11 जुलाई, 2009: ऋषभ विहार, दिल्ली युग पुरुष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- नारी की माता के रुप में एक महत्वपूर्ण भूमिका है । प्रसव वेदना से गुजरने के बाद नारी माँ बन जाती है । संसार में कई माताएं अपने बच्चों को जन्म देती है परन्तु वो माता विशेष होती है जो जन्म के साथ उसे जीवन जीने के सुखद सूत्र प्रदान करती है । कैसे हो आपके बच्चे का जीवन ? कैसे आपका बालक महान् बने । तीर्थंकर, चक्रवर्ती वासुदेव, प्रति वासुदेव, महान् संत एवं महान् पुरुषों का जन्म किसी सामान्य माता से नहीं होता, उनका जन्म विशेष माँ से होता है वह विशेष माता  बहुत प्रार्थना करने के बाद ऐसे पुत्र को प्राप्त करती है जिन्होंने अपनी कुक्षी से विश्व के महान् पुरुषों को जन्म दिया उन माताओं की तपस्या अभिनन्दनीय है । 

अष्टावक्र का नाम आपने सुना होगा । उनकी महागीता समूचे संसार में प्रसिद्ध है । वो जब गर्भ में आए तो उनके पिता वेद का उच्चारण कर रहे थे । पुत्र ने गर्भ से उच्चारण सुना तो उसे उच्चारण सही नहीं लगा तभी उसने अपने पिता को कहा कि सही उच्चारण कीजिए । पिता ने सोचा यह बच्चा अभी जन्मा ही नहीं है और मुझ ब्राह्मण को उपदेश देता है । क्रोधावेश में उन्होंने अपने पुत्र को आठ अंग से टेढ़ा होने का श्राप दिया । जब वे जन्में तो आठ अंग से टेढे थे इसलिए उनका नाम अष्टावक्र पड़ा । कहा भी है- माता अगर किसी पुत्र को जन्म दे तो वो पुत्र प्रह्लाद सा भक्त हो जिसने भगवद् भक्ति के लिए अपने पिता को ठुकरा दिया । वो भामाशाह सा दाता हो जिसने अपना समस्त भण्डार देश की रक्षा के लिए लगाया या महान् शूरवीर हो जो देश की रक्षा में सदैव आगे हो । गर्भवती माँ को प्रतिदिन महापुरुषों के चित्र देखने चाहिए । तीर्थंकर भगवंतों का चित्र देखकर कुछ समय ध्यान करना चाहिए । आजकल घरों में भगवान के चित्रों के स्थान पर कुत्ते, बिल्ली आदि हिंसक पशुओं के चित्र देखने को मिलते हैं जिससे आपकी भावनाएं हिंसक होती है उससे बच्चे पर प्रभाव पड़ता है । गर्भवती माँ को प्रतिदिन ध्यान अवश्य करना चाहिए । ध्यान से भीतर की उर्जा विकसित होती है । बच्चा धार्मिक एवं सुसंस्कारित होता है । 

गर्भवती माँ ध्यान के साथ-साथ स्तोत्र पाठ, मंत्र आदि का उच्चारण भी करें । उसकी तरंगों से अन्तर्मन तरंगित होता है । जो बहिनें सामान्य डिलेवरी चाहती है वे प्रतिदिन पन्द्रह मिनिट का कायोत्सर्ग करें । ये बातें शोध द्वारा प्रमाणित है । जो प्रतिदिन पन्द्रह मिनिट कायोत्सर्ग करती है उसको डिलेवरी के समय में प्रसव पीड़ा अधिक नहीं होती । जब बच्चे का जन्म हो उसी समय चांदी की शलाका या वृक्ष की डाली से उसकी जीभ पर ऊँ या स्वस्तिक रुप मंगल जिन्ह बनाया जाए जिससे उसकी भाषा में सरस्वती का वास हो । बच्चा जन्मते ही रोता क्यों है ? इस पर फ्रांस में शोध हुआ तो पाया गया कि बच्चा 9 माह मां से जुड़ा होता है जब वह अलग होता है तो वो पीड़ा सहन नहीं कर पाता ऐसे समय में जन्मते ही बालक को छाती से छिपकाना चाहिए या शारीरिक तापमान के स्तर पर पानी में उसे लिटाना चाहिए । जन्म के बाद चालीस दिन अंधेरे कमरे में घी के दीपक के साथ बच्चे की आंखें परिपक्व हो जाती है और उसकी आंखों लम्बी उम्र तक निरोगी होती है । यह मां के हाथ में है कि वह अपने बच्चें का लालन पालन किस प्रकार करें कि उसकी संतान सुसंस्कारित हो । माँ चाहे तो अपने बच्चे को महान् बना सकती है ।

आत्म: ध्यान साधना शिविर बेसिक 13 अप्रेल से प्रातः 5.30 से 8.30 बजे तक प्रारंभ होने जा रहा है जो भी भाई बहिन जीवन में आनंद, शांति, सुख प्राप्त करना चाहते हैं वे साधना शिविर में भाग ले सकते हैं । 

बच्चों में झलकते हैं माता पिता के संस्कार

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

12 जुलाई, 2009: ऋषभ विहार, दिल्ली  युग पुरुष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- अरिहंत परमात्मा के चरणों में प्रार्थना एक ललक हे परमात्मा जो आत्मा आपमें विद्यमान है वही आत्मा मेरे भीतर है । मुझमें और आपमें कोई अन्तर नहीं है अन्तर हमारी दृष्टि का हो सकता है । अन्तर परम्पराओं का हो सकता है परन्तु आत्मिक स्तर पर कोई अन्तर नहीं । अरिहंत की आभा उनका अनंत ज्ञान उनकी झलक हमारे भीतर साक्षात् हो जाए ।

परमात्मा की झलक देखते हुए एक गर्भवती माँ अपने बच्चे को उनसा बना सकती है । एक माँ ही वह शक्ति है जो अपने बालक को महानता की ओर ले जाती है । धर्म की शुरुआत आपके बच्चे से हो । भगवान के समवसरण में बाल मुनि अतिमुक्त कुमार कैसे मुक्ति हो प्राप्त हुए ? श्री अन्तकृतदशांग सूत्र में वर्णन आता है गौतम स्वामी एक बार गौचरी जा रहे थे और बालक अतिमुक्त बच्चों के साथ खेलता हुआ उन्हें देखता है देखकर प्रमुदित होता है और पास जाकर उनसे पूछता है कि आप कौन हैं आप क्या कर रहे हैं ? गौतम स्वामी उन्हें अपना तथा अपने धर्माचार्य धर्म गुरु भगवान महावीर का परिचय देते हैं और भिक्षा की बात से अवगत कराते हैं तब बालक अतिमुक्त कहता है मेरे साथ चलो मैं आपको भिक्षा दिलाता हूं कैसे संस्कार होंगे ? उस अतिमुक्त कुमार के जिसने बालवय में खेलना छोड़कर गौतम स्वामी को भिक्षा देना स्वीकार किया । एक परिचय में ही भगवान के दर्शन किए और सदा के लिए उनसा बनने का पुरुषार्थ किया । 

छत्रपति शिवाजी के शूरवीर बनने के पीछे माता जीजाबाई का पूर्ण आशीर्वाद था । जब शिवा छोटे थे तो माता यही संस्कार दिया करती थी कि शिवा तूने बड़े होकर इस भारत देश को मुगलों से आजाद करना है । महात्मा गांधी को जैनत्व के संस्कार माता पुतली बाई के द्वारा ही मिले । माता पुतली बाई ने जैन संत के पास उन्हें ले जाकर तीन नियम करवाए थे उन्हीं नियमों के आधार पर वो अहिंसा के पुजारी राष्ट्रपिता बने । आपके बच्चे में आपके संस्कार झलकते हैं रामायण में उल्लेख आता है श्रीराम प्रातःकाल उठकर माता पिता और गुरु के चरण स्पर्श करते थे । वो तीनों को बहुत आदर दिया करते थे । हम अपने बच्चों को ऐसे संस्कार दें । कई बच्चे बहुत विनीत होते हैं धर्म के मर्म को जानते हैं और कई बच्चे धर्म को स्वीकार ही नहीं करते । हम अपने बच्चों को धर्म के संस्कार प्रदान करें उन्हें अतिमुक्त कुमार सा बनाए । उनके भीतर छत्रपति शिवाजी सी शूरवीरता हो । उनके भीतर भगवान श्रीराम जैसी विनीतता हो । जो इन गुणों को भीतर अपनाता है वो निश्चित ही बड़ा होकर एक महान् व्यक्ति बनता है । हमने परमात्मा बनना है तो केवल परमात्मा से ही हम नाता जोड़े शेष समस्त नाते झूठे हैं । 

आत्म: ध्यान साधना शिविर दिनांक 13 जुलाई से शिवाचार्य समवसरण आचार्य शिव शक्ति धाम में प्रातः 5.30 से 8.30 बजे प्रारंभ होने जा रहा है जिसमें करीब 150 रजिस्ट्रेशन हो चुके हैं । दिनांक 6 जुलाई से विश्व शांति हेतु अष्ट दिवसीय महामंत्र नवकार का अखण्ड जाप जैन स्थानक ऋषभ विहार, दिल्ली में गतिमान है । आचार्य भगवंत के बाल संस्कार एवं धर्ममय जीवन के प्रभावशाली अनुभव-युक्त प्रवचन प्रातःकाल 8.15 से 9.30 बजे तक ऋषभ विहार में होते हैं तथा इन्हीं प्रवचनों का प्रसारण श्रद्धा चैनल द्वारा रात्रि 10.00 बजे प्रतिदिन प्रसारित हो रहा है आप सभी जिनवाणी की प्रभावना में लाभ उठाएं । 

आचरण से होता है जीवन निर्माण

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

13 जुलाई, 2009: ऋषभ विहार, दिल्ली युग पुरुष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- बाल संस्कार पर दिनों से चर्चा चल रही है । हम बच्चों को संस्कार देना चाहते हैं उन पर बोझ डालना या संस्कार थोपना नहीं चाहते । बच्चों को घड़ना नहीं है उनके भीतर संस्कार आरोपित करने हैं । जैसे एक वट-वृक्ष तभी अपना पूर्ण रुप धारण करता है जब वह उपजाऊ भूमि में स्वयं को मिटाता है । अंकुरित होने पर सूर्य की रोशनी, चन्द्रमा की चांदनी और प्रकृति के समस्त वातावरण के साथ रहता है तभी वह वट-वृक्ष बनता है । आपका बालक महान् बने इसकी जिम्मेदारी आप पर है । व्यक्ति ज्ञान से महान् हो सकता है परन्तु उससे भी अधिक महŸाा है चारित्र की । जिसका चारित्र महान् होगा वही वास्तव में महान् कहलाता है । कहते हैं पर्वत से एक बार गिर जाए तो एक जन्म ही खराब होगा परन्तु चारित्र से गिर गए तो जन्म-2 बेकार हो जाएंगे । 

चारित्र हमारा जीवन निर्माता है । जैसा हमारा चारित्र होगा वैसा ही चारित्र बच्चे का होगा । आप चाहते हो कि आपका बच्चा झूठ ना बोले तो उसके लिए सर्वप्रथम आपको झूठ बोलना छोड़ना पड़ेगा । आप चाहते हो आपके बच्चे में प्रामाणिकता बरकरार रहे इसके लिए सर्वप्रथम आपको प्रामाणिक होना  पड़ेगा । आपका कहना बच्चा नहीं मानता तो जो आप कह रहे हो उसमें पहले स्वयं जीओ । असभ्य-भाषा का बच्चों के सामने प्रयोग नहीं करे । अपने से बड़ों तथा छोटों को आदर सम्मान सहित बुलाएं । पुराने समय में बच्चे मिट्टी से खेलते थे या मिट्टी के खिलौनो से खेलते थे आजकल पक्की सड़के बन गई । खिलौनों ने अपना अलग अस्तित्व बना लिया इसलिए मिट्टी बहुत कम दिखाई देती । बच्चों को ऐसे ही खिलोने दे जो उनके चारित्र को उच्चतम शिखर पर ले जाएं । बच्चों के साथ दिन का कुछ समय अवश्य बिताएं उनसे बातचीत करें । उनके साथ खेलें हो सके तो भोजन अवश्य साथ करें इससे घर में प्रेम और आत्मीयता का वातावरण बनता है । 

जैसे बच्चों को ट्रेनिंग दोगे बच्चा वैसा ही होगा । एक अंग्रेजी महिला अपने बच्चे को जनरल बनाना चाहती थी वह दूध पीते बच्चे से लेकर अपने बच्चे को यही कहती थी- ’’जोनी यू आर दी जनरल’’ और समय आने पर उसका बालक जनरल बन गया । जैसा तुम बच्चे को संस्कार दोगे वैसा बनता चला जाता है । बचपन में विवेकानंद को मेहमानों द्वारा पूछा गया कि तुम बड़े होकर क्या बनोगे । कलकत्ता में घोड़ागाड़ी अधिक चलती थी उन्हें वह बहुत अधिक प्रिय थी तो उन्होंने कहा मैं इसका चालक बनूंगा । तत्काल ही उनकी मां उन्हें पूजा घर ले गई और वहाँ पर वो फोटो दिखाई जिसमें भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन के रथ के सारथी बने और विवेकानंद को यह संस्कार दिया कि तुम्हें घोड़ा घाड़ी चालक बनना तो कृष्ण की तरह बनना । कितने सुन्दर संस्कार थे माँ के । वो नरेन्द्र बड़ा होकर विवेकानंद बना जिसने भारत को एक नई दिशा दी । बच्चों को बचपन से यही संस्कार दें कि अरिहंत तुम्हारे पिता हैं, जिनवाणी तुम्हारी माता है और तुम्हें परमात्मा बनना है । ऐसे उच्च संस्कार बच्चों को अगर बचपन में मिल जाएंगे तो उनका जीवन स्वर्णिम बनेगा । 

आत्म: ध्यान साधना कोर्स का प्रारंभ आज प्रातःकाल हुआ जिसमें करीब 150 भाई बहिन उपस्थित थे । पंचकूला से आई वीतराग साधिका सुश्री निशा जैन ने साधकों को वीतराग सामायिक से परिचय कराया और जीवन जीने की कला के सूत्र प्रदान किए । इस अवसर पर श्रद्धेय आचार्य भगवंत ने साधकों को साधना के गूढ़तम रहस्यों से परिचित करवाया । 

समलैंगिकता आने वाली पीढ़ियों के लिए दुर्भाग्यपूर्ण: जैनाचार्य शिवमुनि

मर्यादित जीवन ही जीवन का आधार है

दिल्ली 13 जुलाई, 2009: ऋषभ विहार, दिल्ली में चातुर्मास हेतु विराजमान जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने सकल समाज के शिष्ट-मण्डल के समक्ष वर्तमान में समलैंगिकता पर टिप्पणी करते हुए कहा कि- मर्यादित जीवन एक स्वस्थ राष्ट्र का निर्माण करता है । मर्यादा ही मानवता को बाकी सभी प्राणियों से अलग एक सभ्य समाज के रुप में प्रतिपादित करती है । मर्यादाएं जीवन में लगाम की तरह काम करती है और जीवन को पतन मार्ग से हटाकर उत्थान की ओर अग्रसर करती है । 

भारतीय मर्यादित जीवन संस्कृति सदैव से ही सम्पूर्ण विश्व के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी रही है । इस जीवन पद्धति एवं संस्कारों के पीछे महापुरुषों एवं विभिन्न समाज सुधारकों का सदियों से महत्वपूर्ण योगदान रहा है और उनके असीम पुरुषार्थ से ही समाज विभिन्न कुप्रथाओं एवं कुरीतियों को मिटाने में समर्थ रहा है । एक बार किया गया मर्यादा का उल्लंघन जीवन में अनिश्चित पतन का कारण बनता है । 

हाल में समलैंगिकता को लेकर जो कुछ भी कहा गया है वह पूर्णतः अमर्यादित, अप्राकृतिक तथा अनैतिक है, जो समाज में व्यभिचार को बढ़ावा देने वाला है क्योंकि घोर पाप का अर्जन करते हुए भविष्य में आने वाली पीढ़ियों के अति अति दुर्भाग्यपूर्ण सिद्ध होगा । 

जागरुक समाज ने पूर्व में भी बहुविवाह, देवदासी प्रथा, दासी प्रथा और समाज में व्याप्त अनेक कुरीतियों एवं कुप्रथाओं का पुरजोर विरोध कर पुनः मिटाने में सफलता पाई है । आज सम्पूर्ण सभ्य समाज का यह कर्तव्य है कि जिसने जीवन मूल्यों, संस्कृति व अपने भविष्य की रक्षा करने के लिए इस घड़ी में एकजुटता से खड़ा हो और अपना विरोध प्रदर्शित करें ।

अभिभावक बच्चों को समय दें

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

14 जुलाई, 2009: ऋषभ विहार, दिल्ली  युग पुरुष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- प्रभु महावीर का धर्म अहिंसा, मैत्री, करुणा, आत्म निरीक्षण का धर्म है । यह हमारा सौभाग्य है कि हमें पंचमकाल में उनकी वाणी मिली । जैसे आप कोई एक कार्य करते हो तो उसके लिए सर्वप्रथम संकल्प लेते हो । संकल्प को लेकर उस कार्य की दिशा में आगे बढ़ते चले जाते हो । आज हम ऐसे ही गहरे संकल्प पर चर्चा करेंगे । वह संकल्प जो हमारी जिन्दगी में बहुत जरुरी है । 

हमारे बच्चों की शिक्षा कैसे हो ? हम अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा कैसे दें ? जयकृष्णा मूर्ति एक बहुत बड़े विचारक हुए हैं उन्होंने कहा- मानव का जीवन ताश के पत्ते की भांति है । ताश के पत्तों का खेल अन्श्चिितता का खेल है । ताश में कौन साथ बैठेगा, कितने खिलाड़ी होंगे, कौनसे पत्ते आएंगे कुछ पता नहीं होता । अगर कुशल खिलाड़ी हो और नाकाम पत्ते हो तब भी बाजी जीतता है । जीवन भी ताश के पŸाों की भांति है । हमें पता नहीं हमें कौनसे मां बाप मिलेंगे । कैसे संस्कार हमें मिलेंगे परन्तु जैसे भी संस्कार मिले उसमें हम कुशल बालक बने और अपने जीवन का निर्माण स्वयं करें । बच्चो की आजादी उनकी बर्बादी का कारण बनती जा रही है । हम जीवन को ऊँचा नीचा कर रहे हैं परन्तु हमारी शिक्षा प्रणाली कैसी हो । एक बालक जब स्कूल जाएं तो माता पिता से उसके मैत्रीपूर्ण संबंध हो । माता पिता स्वयं बालक को स्कूल से आने के बाद स्कूल में घटी हुई घटनाओं का विवरण पूछे । यह परिवार वालों की नैतिक जिम्मेदारी है । 

एक बार की घटना है एक बच्ची मेरे पास आई और रोने लगी । उसके परीक्षा का परिणाम आया था तो मैंने पूछा क्या कम नम्बर आए हैं उसने कहा नहीं तो फिर मैंने पूछा रोने का कारण क्या है उसने यह बताते हुए कहा कि- मैं परीक्षा में 85 प्रतिशत नम्बर लेकर आई हूँ परन्तु मेरे पिता मेरा कोई ख्याल नहीं करते । मैं बहुत खुश होकर उन्हें अपना रिजल्ट कार्ड दिखाने गई उन्होंने मुझे अटेंड नहीं किया और यह कहकर दूर भेज दिया कि अभी मेरे पास समय नहीं है । बच्ची पिता ने हौंसला नहीं बढ़ाया इसीलिए रो पड़ी । छोटी सी बात उसके जीवन में बहुत बड़ा कारण बन गई । आज माता पिता को चाहिए कि वे अपने बच्चों को पूर्ण समय दें । उनके साथ समय बांटकर सारी बातें करें । 10 मिनिट आपस में बैठकर ध्यान करें । कहते हैं भोजन और भजन साथ हो तो भगवान प्रसन्न होेते हैं । बच्चों को शिक्षित करने में माता पिता का बहुत बड़ा हाथ है । आजकल माता पिता बच्चों को पैसा दे रहे हैं परन्तु अपना समय नहीं दे पाते इसी कारण बच्चे गलत संगती में चले जाते हैं । बच्चों को पैसा नहीं अपना समय दें । बच्चों की समस्याओं का समाधान करें । आपके द्वारा कोई गलती हुई हो तो अपनी गलती तुरन्त स्वीकार करें । महात्मा गांधी ने राजा हरिश्चन्द्र के जीवन से सत्य को स्वीकारा था । हम छोटी-2 कहानियों के द्वारा बच्चों के जीवन को रुपान्तरित कर सकते हैं । शिक्षा का उद्देश्य यही है कि भीतर पूर्ण आनंद हो । सुख शांति का वातावरण हो । आप थोड़े समय में बहुत कुछ ग्रहण कर सकते हैं यह आप पर निर्भर करता है । 

अनमोल है ध्यान साधना

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

15 जुलाई, 2009: ऋषभ विहार, दिल्ली  युग पुरुष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- अरिहंतों की तथा सिद्धों की महिमा अपरम्पार है । हमारा लक्ष्य उनसा बनने का है, यही हमारा संकल्प है और इसी दिशा में साधना करने का हमारा पुरुषार्थ हो । ध्यान साधना टेंशन पीड़ा दुःख राहत की नहीं है यह तो जन्म-मरण के चक्रव्यूह से दूर होने की साधना है । चार गति में अनंतकाल से जीवात्मा भ्रमण कर रही है । यह बोध जिसको हो जाए वह इससे बाहर निकलने का पुरुषार्थ अवश्य करेगा । देह के भीतर है आत्मा, आत्मा के भीतर उसके आठ गुण है और चारों ओर आठ कर्म लगे हुए हैं । आत्मा के गुणों को प्रकट करने के लिए आठ कर्मों को हटाना होगा । आठ कर्मों को हटाने के लिए ध्यान और कायोत्सर्ग एक उŸाम साधन है । जन्म-जन्म से इकट्ठे किए गए संस्कार एक सामायिक-काल के ध्यान में नष्ट हो सकते हैं । हम अपने जीवन में वीतराग-सामायिक, ध्यान साधना, कायोत्सर्ग को महत्व दें । 

24 तीर्थंकर भगवंतों ने ध्यान साधना ही की । धन, पद, यश सब यहीं रह जाएगा साथ जाएगी तो केवल हमारे द्वारा की गई साधना । यह साधना आत्मा से परमात्मा बनने की साधना है । आज तक अनंत-भवों में हम कई बार तीर्थंकर परमात्मा के समवसरण में गए होंगे । कई बार उनकी वाणी सुनी होगी परन्तु उनसा बनने का पुरुषार्थ नहीं किया इसलिए भव-भ्रमण में घूम रहे हैं ।

अनंतज्ञान, केवलज्ञान किसी पुस्तक या ग्रन्थ में नहीं है वह किसी विश्वविद्यालय से भी प्राप्त नहीं हो सकता वह तो तुम्हारे अन्तर की अवस्था है । ज्ञान, दर्शन, मोह और अन्तराय ये चार कर्म जब क्षय होते हैं तब अनंतज्ञान प्रकट होता है । हमें पुरुषार्थ करना है अनंतज्ञान को प्राप्त करने का । आज तक संसार के लिए चिन्ता की अब धर्म के मार्ग पर आगे बढ़ो । हम हमेशा यह सोचते हैं कि मेरे बाद मेरे परिवार का क्या होगा ? मेरी धन सम्पत्ति पद प्रतिष्ठा का क्या होगा । आज तक अनेकों लोग अपनी गति बदल   चुके । इस जन्म को पूर्ण कर अगले जन्म में देह धारण कर चुके हैं हम उनसे यह प्रेरणा लें कि वो कुछ साथ नहीं ले जा पाएं । धन, पद, प्रतिष्ठा सब यहीं रह जाएगी साथ जाएगी तुम्हारे द्वारा की गई कर्म-निर्जरा साथ जाएगी तुम्हारी ध्यान साधना । अपने जीवन को ज्ञान के प्रकाश से भर दो । साधना से आलोकित कर दो ये साधना अनमोल है इसकी मूल्यता का ज्ञान तभी होगा जब तुम आत्म ध्यान साधना शिविरों से गुजरोगे ।

आज प्रातः आत्म: ध्यान साधना कोर्स बेसिक का समापन हुआ । इस कोर्स में करीब 150 भाई बहिनों ने सहभाग लिया । सभी ने वीतराग-सामायिक की साधना सीखी और अपने जीवन को साधना मार्ग पर आगे बढ़ाया । आत्म ध्यान साधना कोर्स एडवांस-ाा कल से शुरु होने जा रहा है जो भी भाई बहिन इसमें भाग लेना चाहे वे कल प्रातः 10.00 बजे श्री एस0एस0 जैन सभा ऋषभ, विहार, दिल्ली पहुंच कर लाभ उठा सकते हैं । 

आत्म दर्शन मिल गया तो सब मिल गया

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

16 जुलाई, 2009: ऋषभ विहार, दिल्ली युग पुरुष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- एक वृद्ध ऋषि से किसी ने पूछा कि सारे विश्व में बड़ा क्या है ? उन्होंने कहा आकाश, आकाश दूर-दूर तक नजर आता है लगता है मानो आकाश ने सारी धरती को घेर रखा हो । दूसरा प्रश्न पूछा श्रेष्ठ से श्रेष्ठत्म वस्तु क्या है उन्होंने कहा शील सदाचार सत्य का आचरण । शील यानि चेतन तत्व का अनुभव आचरण में आए जो सर्वोच्च सर्वश्रेष्ठ है वो हृदय के कण-कण में है वही हमारा स्वरुप है । स्वरुप को याद करने के लिए स्वरुप रमण और चिन्तन आवश्यक है । अरिहंत परमात्मा अनंत-ज्ञान के धारक है । ज्ञान जिसकी कोई सीमा नहीं है वो अनंत असीम है । जब सत्य ज्ञान प्रकट होता है तब मिथ्याज्ञान नष्ट होता है ऐसा ज्ञान पाने की हमारी पीड़ा और प्यास हो भीतर एक गहरी तड़फ पैदा हो जैसे आपका कोई अनुरागी किसी मेले में खो जाए तो उसको ढूढने के लिए कैसी पीड़ा होती है भीतर वैसी पीड़ा भीतर उठे । 

अरिहंत परमात्मा का प्रतिबिम्ब हमारे भीतर झलक उठे जो तीनों लोकों को एक साथ जानते देखते हैं परन्तु कोई प्रतिक्रया नहीं करते । जब तक आत्म-ज्ञान की मूल्यता का पता नहीं होगा तब तक उसे पाने की प्यास भीतर पैदा नहीं होगी । जब प्यास भीतर उठेगी तो आत्म-साक्षात्कार परमात्म-दर्शन अवश्य होगा । जो आज सुख लगता है वह भविष्य का दुःख है । जब तक आत्म-ज्ञान आत्म-दर्शन नही ंतब तक भीतर कुछ भी नहीं है अरिहंत परमात्मा जो सदैव आत्म-ज्ञान आत्म-दर्शन में रमण करते हैं नित्य परम आनंद में रहते हैं अनंत सुख का अक्षय भण्डार उनके पास है ये समस्त गुण हममें आए इसके लिए हमारा पुरुषार्थ हो । ऐसे गुणों को भीतर लाने के लिए ध्यान साधना शिविर द्वारा भेद-विज्ञान की साधना सीखनी होगी । 

सबसे सरल काल है उपदेश देना और सबसे कठिन ज्ञान है आत्म-दर्शन में रमण करना । वर्तमान में उपदेश देने वाले बहुत मिलेंगे परन्तु आत्म-ज्ञान आत्म-दर्शन देने वाले बहुत कम । घर के सगे संबंधी संसार में उलझाएंगे परन्तु मुक्ति का मार्ग देने वाला कोई-कोई होगा । एक आत्म-ज्ञान मिल जाए तो समझना सब कुछ मिल गया एक आत्म-ज्ञान लोकालोक से प्यारा है वह चेतन धन है उसी की चाहना रखो । पंचमकाल में आत्म-दृष्टि मिल गई तो समझना सब कुछ मिल गया । इसके गहरे अनुभव के लिए आप सभी ध्यान साधना शिविर में आएं ।

चार दिवसीय ध्यान साधना शिविर आज सं प्रारंभ हुआ जिसमें करीब 50 साधकों ने सहभाग लिया । यह साधना शिविर दिगम्बर जैन मन्दिर के बेसमेंट में चल रहा है । जो भी साधक आगे साधना करना चाहें वे सभी साधना शिविर में आकर आत्म-ज्ञान की झलक पा सकते हैं । 

जहाँ कर्भा व है वहाँ कर्म-बंधन है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

 

17 जुलाई, 2009: ऋषभ विहार, दिल्ली   युग पुरुष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- अरिहंत परमात्मा के गुणों का स्मरण जितने भाव और गहराई से होगा उतनी श्रद्धा पक्की होगी । जितना चिŸा गुणों में लीन होगा उतनी अधिक निर्जरा होगी । केवल गुण स्मरण करने मात्र से ही भक्त और भगवान एकाकार हो जाते हैं । तुम प्रार्थना की गहराई में डूबो तो वो समस्त गुण तुममें प्रकट होंगे । वास्तव में अरिहंतों में और हममें कोई अन्तर नहीं है जो गुण उनके भीतर है वो ही गुण हम सबमें है । उन्होंने उन गुणों को प्रकट कर लिया हमारे गुण अभी कर्म मैल से आच्छादित है । वर्तमान में ऐसे भी जीव है जो उन गुणों को प्रकट करने का पुरुषार्थ कर रहे हैं । नरक में रहते हुए भी भेद-ज्ञान की उत्कृष्ट साधना द्वारा महाराजा श्रेणिक का जीव कर्म-निर्जरा कर रहा है और आने वाले समय में आगामी चैबीसी में तीर्थंकर पद प्राप्त करेंगे । 

अरिहंत सिद्ध भगवान के गुणों से हमारा अन्र्तमन शिक्षित होता है । अरिहंतों का अनंत-ज्ञान असीम है उसकी कोई सीमा नहीं है उसे आदि से अंत तक कोई जान नहीं सकता । कोई उसकी व्याख्या नहीं कर सकता । हम प्रतिपल प्रतिक्षण कर्म-बंधन और कर्म-निर्जरा करते हैं । 27 प्रकार की क्रियाओं में करना, कराना अनुमोदना मन से, वचन से, काया से भूत भविष्य वर्तमान के द्वारा जब-2 भीतर कर्ता-भाव आता है तब-2 कर्म का बंध होता है चाहे वह कर्ताभाव धार्मिक प्रवृति को लेकर ही क्यों न आए । जहाँ कर्ताभाव है वहाँ कर्म-बंधन है । आत्मा का धर्म शरीर के धर्म से सर्वथा अलग है, आत्मा का स्वभाव है ज्ञाताद्रष्टा जानना और देखना, शरीर का स्वभाव है क्रिया प्रतिक्रिया । 

जब भीतर यह अटल विश्वास हो जाए कि मैं शरीर नहीं मैं आत्मा हूँ फिर चाहे कोई उपसर्ग आए मरणांतिक कष्ट आ जाए ऐसे समय में भीतर यह भान बना रहे कि मैं आत्मा हूँ तब जानना कि भीतर क्षायिक सम्यक्त्व प्रकट हो गया है । वास्तव में शरीर का जन्म तो माता पिता देते हैं आत्मा का कोई जन्म-मरण नहीं । जीवन की दिशा को मोड़ने वाले सत्गुरु साधना से हमें मुक्ति के मार्ग पर आगे बढ़ाते हैं  ऐसे परम् गुरु अरिहंत परमात्मा को हमारा नमन । उनके समक्ष एक ही प्रार्थना कि जो मार्ग आपने प्रदान किया जिस मार्ग पर चलकर लाखों भविजीव अपने जन्म-मरण की यात्रा पूर्ण कर गए उसी मार्ग पर चलकर मैं मुक्ति के सौपान को प्राप्त करुं और भीतर एक अटल विश्वास कि मैं सत्य ही हूूं ज्ञान दर्शन से युक्त हूँ उपयोग मेरा लक्षण है और मुझे अपने घर लौटना है । ऐसी भावना भीतर होगी तो हम निश्चित मुक्ति को प्राप्त करेंगे ।

सर्वोŸाम शिक्षा: सुख में वैराग्य दुःख में समाधि

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

18 जुलाई, 2009: ऋषभ विहार, दिल्ली  युग पुरुष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- शुद्धात्म दृष्टि हमें आत्मा के अनंतज्ञान अनंत सुख की ओर ले जाती है । जन्म मरण लाभ हानि सुख दुःख किसको है ? व्यक्ति कितना दुःखी है इस बात से कि मुझे मौत ना आए इसलिए वो लाखों उपाय भी करता है परन्तु जैसे ही आयुष्य कर्म पूरा होता है मौत दरवाजे पर दस्तक देती है । अरिहंत परमात्मा की सबसे ऊँची शिक्षा यही है कि हमारे भीतर सुख में वैराग्य आए और दुःख में समाधि आए । ज्ञानी व्यक्ति ही अपनी प्रज्ञा से युक्त होकर ऐसी बात कह सकता है ।

देखो सुख में वैराग्य किसको आया ? सुख में वैराग्य पाया जम्बू स्वामी ने आठ रानियां थी । धन सम्पत्ति सब कुछ था सारा कुछ होते हुए संसार को क्षण भंगुर जान त्याग दिया । ऐसा वैराग्य आया कि मुक्ति को सम्प्राप्त कर गए । तुमने भी आज तक कई बार ये सुना है कि मानव जीवन क्षण-भंगुर है पैसा सदाकाल टिकने वाला नहीं फिर भी तुम्हारी कुछ आसक्ति उसमें रहती है । भगवान महावीर के समय में 10 श्रावकों का जीवन देखो कितनी सम्पŸिा थी फिर भी आसक्ति नहीं थी उन्होंने अपनी सम्पत्ति के चार हिस्से किए एक हिस्सा व्यापार में लगाया, एक घर परिवार के लिए लगाया, एक सुरक्षित रखा तो एक धर्म के लिए लगाया । 

आज हमारे भीतर तनाव है हम अपने से दूर है क्योंकि मन हमें उलझाए रखता है । प्रकृŸिा हमें इतना कुछ देती है परन्तु हमारा प्रकृति की तरफ ध्यान ही नहीं है । सूरज, चाँद, तारे, फल, फूल, वृक्ष कितना सौन्दर्य बिखेर रहे हैं परन्तु हमारी देखने की आंखें ही नहीं है आज तक बाहर की खोज की अब भीतर में आ जाओ । यह जन्म, मरण, बंधन, मुक्ति सब शरीर का है मैं इससे अलग शुद्धात्मा हूँ यह अनुभव तभी आएगा जब आप साधना से गुजरेंगे तब आपको हर बात आसान लगेगी ये जीवात्मा सत्वगुण, रजोगुण, तमोगुण से न्यारी है । आत्मा का रुप, रस, गंध, वर्ण नहीं केवल उसका आभास किया जा सकता है । सारी सृष्टि के कण-2 में आत्मा विद्यमान है जो आत्म-ज्ञानी है वो सदैव आत्म-रमण में रहते हुए पाप-कर्म का बंध नहीं करते । धन्ना शालीभद्र की कहानी कई बार सुनी होगी कितना सुख था अपार सुख होते हुए भी वैराग्य पाया और मुक्ति की ओर अग्रसर हो गए । शालीभद्र के भीतर राजा श्रेणिक को देखकर केवल यह भाव आया था कि मैं अपना नाथ कैसे बनूं । आज पंचकला में कितनी घटनाएं हमारे समक्ष घटती है फिर भी वैराग्य नहीं आता । 

जब आत्म-दृष्टि नहीं होती तो व्यक्ति अधिक होता ळै । आत्मा को दुःख नहीं आता । दुःख तो केवल शरीर को आता है । आचार्य भगवंत श्री आत्माराम जी महाराज को केंसर का रोग था फिर भी समाधिस्थ थे । रमण महर्षि, रामकृष्ण परमहंस सबने जीवन के अन्तिम-काल में महान् पीड़ा का के पाया फिर भी चेहरे पर प्रसन्नता थी । यही साधना का सार है । शरीर को तपाना होगा, इसी से हम कर्म-निर्जरा कर सकते हैं । साधना का जगत अलग है वहाँ पर शरीर इन्द्रियां, मन किसी का कोई अस्तित्व नहीं है । वहाँ केवल वीतराग-दशा पाने का ही पुरुषार्थ होता है । आत्मा का परमात्मा से संबंध स्थापित होता है अब निर्णय आपका है । आपने संसार में रहना है या मोक्ष में जाना है जो आपको अच्छा लगे वैसा मार्ग अपनाओ ।

आत्मा में अनंत सुख है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

19 जुलाई, 2009: ऋषभ विहार, दिल्ली युग पुरुष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- अरिहंत परमात्मा करुणा मैत्री के मसीहा श्री सीमंधर स्वामी भगवान की अनंत कृपा भरत क्षेत्र में विशेषकर ऋषभ विहार में बरस रही है । आप सभी उस कृपा का लाभ उठाएं । तीर्थंकर भगवान सर्वप्रथम तत्व का उपदेश देते हैं । गणधर गौतम जब भगवान के समवसरण में दीक्षित हुए तो उन्होंने प्रभु से प्रश्न पूछा प्रभु तत्व क्या है ? भगवान ने फरमाया- जो उत्पन्न होता है, नाश होता है और ध्रुव रहता है वह तŸव है । भगवान के तीन शब्द सुनकर गणधर गौतम को चैदह पूर्वों का ज्ञान हो गया और वे भगवान के चरणों में समर्पित हो गए । भगवान ने अपनी देशना में जो कुछ कहा वो पूरी तरह गणधर ले नहीं पाए जो गणधरों ने लिया वो पूरी तरह आगे आचार्यों को दे नहीं पाए जो आचार्यों को दिया वो क्रमशः हम तक नहीं पहुंच पाया इसीलिए ये वीतराग साधना लुप्त हो गई । 

हम भाग्यशाली हैं हमें पंचमआरे में चतुर्थ आरे की साधना प्राप्त हुई है । साधना शिविर के अनुभव से जीवन बदलता है साधना के बिना जीवन नहीं बदलता । आपने कई बार सामायिक की है एक बार वीतराग सामायिक शुद्ध सामायिक करके देखें जीवन में इस साधना से ऊपर कुछ भी नहीं है इस साधना में प्रतिपल प्रतिक्षण कर्म-निर्जरा होती है । सत्य असत्य का अनुभव होता है अनंतज्ञान, अनंतदर्शन अनंत सुख अनंतशक्ति हमारे भीतर है । चार गति के हर जीव में ये अनंतसुख है परन्तु कर्म आवरण से ढ़के हुए हैं । ज्ञान हम बाहर ढूंढते हैं परन्तु आत्म-ज्ञान अनंतज्ञान हमारे भीतर है । 

सुख हम बाहर ढूढते हैं तीनों लोकों का सुख एक तरफ और आत्मिक सुख एक   तरफ । आत्मिक सुख का अनंतवा भाग तीनों लोकों के सुख के बराबर नहीं । आवश्यक नहीं है कि आप प्रतिदिन लम्बे-2 पाठ स्तोत्र जाप आदि करो । नमोकार मंत्र की माला करो आप उनके गुणों का स्मरण करते हुए उन गुणों को अपने भीतर अपना लो । आनंद में डुबकी लगा लो । आपने अभी इस साधना का केवल स्वाद चखा है इस साधना में जो पूरी तरह डुूब जाएगा वो अपने जन्मों-2 के संचित कर्मों को निर्जरित कर लेगा । सुख में वैराग्य और दुःख में समाधि इस साधना से आपके भीतर आएगी । समस्त नाते रिश्ते शरीर के हैं सारे संबंध श्वांस तक के हैं । शाश्वत् संबंध तो केवल एक है वो है आत्मा और परमात्मा का संबंध । यह संबंध धु्रव है । यह संबंध आपके भीतर साधना से घटित होगा । नदी अपना पानी सबको देती है वृक्ष अपना फल सबको देते हैं प्रकृति अपना सौंदर्य सबको लुटाती है ऐसे ही यह साधना जो हमें प्राप्त हुई है यह हम सबको देना चाहते हैं । वर्तमान समय में दुःख पीड़ा बैचेनी अशांति से बचने के लिए इस साधना से गुजरिए । जब आप इस साधना से गुजरोगे तो आपके भीतर सुख स्मृद्धि शांति का स्तोत्र प्रवाहित होगा । 

अपने को जानों

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

20 जुलाई, 2009: ऋषभ विहार, दिल्ली  युग पुरुष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- यह मानव का जीवन बड़े पुण्य से मिलता है और भी पुण्य होता है जब इस जतीवन में व्यक्ति अरिहंत की भक्ति, सिद्ध की स्तुति में अपनी श्वासें लगाता है ऐसा इंसान भाग्यशाली होता है । साधना शिविरों में हर पल हर घड़ी आत्म परमात्म मिलन सिखाया जाता है । दिन की साठ घड़ियां हैं उसमें अगर चार घड़ी धर्म में बिताई तो छप्पन घड़ी में तुम क्या करोगे । एक धार्मिक व्यक्ति प्रातःकाल और रात्रि में एक-एक सामायिक कर अपने जीवन को सफल मानता है परन्तु उसकी जिन्दगी की छप्पन घड़ियां व्यर्थ जा रही है साधना शिविर में उन छप्पन घड़ियों को कैसे सार्थक करना है । आत्म रमण आत्म चिन्तन भेद-ज्ञान में कैसे रहना है इसकी कला सिखाई जाती है यह कला बहुत गहरी है जिससे प्रतिपल कर्मनिर्जरा ही होती है । 

भगवान ने आत्मा के तीन भेद फरमाये-  बहिरात्मा, अन्तरात्मा और परमात्मा । जब व्यक्ति का मन बाहर दौड़ता है पांचों इन्द्रियाँ बाहर कार्य करती है तब जीवन बर्हिमुखी बनता है और सतत् कर्म-बंधन होते हुए संसार लम्बा हो जाता है । भगवान कहते हैं अन्र्तमुखी  बनो । अन्तरात्मा में आ जाओ । राग द्वेष को छोड़कर भीतर आ जाओ । जब आपको आत्म-दृष्टि प्राप्त होती है जब आप भीतर आते हो तब संसार का आकर्षण अच्छा नहीं  लगता । दृष्टि में आत्म-रमण या आत्म-चिन्तन ही चलता है । जब अन्र्तआत्मा का परमात्मा से संबंध बनता है तब वो जीवात्मा परमात्मा बन जाती है । मेरा अरिहंत से संबंध हो संसार के समस्त आकर्षण क्षणिक है जिसमें क्षणिक सुख का आभास होता है और उसके पीछे दुःख की लम्बी कतार है । 

हमारी शिक्षा हमें परम सुख की ओर ले जाए । हम ऐसी विद्या ग्रहण करें जो हमें मुक्ति दें । धन अर्जन की शिक्षा तो इस संसार की शिक्षा है जो अधूरी और पंगु है । पहले जमाने में बालक को गुरुकुल में शिक्षा हेतु भेजा जाता था जहां पर सर्वप्रथम ब्रह्म की शिक्षा, आत्मा का ज्ञान दिया जाता था । तुम कैसे जीवन में आनंद से रह सकते हो यह कला सिखाई जाती थी, वर्तमान में यह कला स्कूलों में नहीं सिखाई जाती । इस कला को आपने सीखना है तो साधना शिविर में अपना समय निकालो और हर परिस्थति में मुस्कुराते हुए जीवन जीना सीख जाओ । 

अपने को जानना आवश्यक है । अपने को जाने बिना सारा कुछ जान लिया तो जीवन व्यर्थ होगा । प्रतिक्रमण माला, अनुपूर्वी, व्रत, अनुष्ठान सबका अर्क यही है कि हम स्वयं को जाने । अपने भीतर आ जाए । जब स्वयं को जान लिया तो हर कर्म करते हुए हम निर्जरा कर सकते हैं । धर्म हमारे भीतर है आत्मा हमारे भीतर है । जब हम स्वयं को जानेंगे तो आत्मा को जान पाएंगे । आत्मिक आनंद भीतर आएगा तो परमात्मा से संबंध स्वयं स्थापित होगा । सारा कुछ तुम में समाया है । विपŸिा में सम्पŸिा दुःख में सुख, व्याधि में समाधि की कला भीतर आ गई तो जीवन सार्थक हो जाएगा और ऐसी कला सीखने के लिए ध्यान साधना शिविर एक सुन्दर माध्यम है । ध्यान साधना शिविर में आपने यह कला सीख ली तो आपका जीवन आनंद से भर जाएगा । 

बहिरात्मा से अंतरात्मा में आओ

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

21 जुलाई, 2009: ऋषभ विहार, दिल्ली  युग पुरुष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- आत्मा के तीन प्रकार पर हमारी चर्चा चल रही है । बहिरात्मा अन्तरात्मा और परमात्मा । उसमें भी परमात्मा के दो प्रकार हैं एक अरिहंत और दूसरे सिद्ध । अरिहंत परमात्मा के चार घनघाती कर्म क्षय हो गए सिद्ध परमात्मा के आठों ही कर्म क्षय हो गए । जिनेश्वर-देव का कथन है बहिरात्मा को छोड़कर अन्तरात्मा में आकर परमात्मा का ध्यान करो, वो परमात्मा एक है शुद्ध है सत्य है । परकीय भाव से हटकर खुद में आना ही अन्तरात्मा में प्रवेश है । 

हमारी आत्मा बाहर के संसार में घूमती है, बाहर के आकर्षण उसे अच्छे लगते हैं परन्तु जब अन्तरात्मा में प्रवेश हो जाता है तो बाहर जाना अच्छा नहीं लगता । पांच इन्द्रियों में आंख, कान, नाक, मुख इन सबका उपयोग बाहर की ओर होता है । बड़ी हैरानी की बात है आंख अपनी होकर भी स्वयं को नहीं देख पाती वह हमेशा बाहर के जगत को देखती रहती है उसे स्वयं को देखने के लिए दर्पण का सहारा लेना पड़ता है । बाहर के जगत को देखना आसान है अन्तर के जगत को देखना कठिन है । 

अन्तरात्मा में आने के लिए आचार्य कहते हैं संसार के यश, धन, दौलत सबसे हटकर सुख दुःख लाभ हानि बन्धु शत्रु सबमें समत्व-भाव आए । योग में, वियोग में, महल में हो या जंगल में हमारा ममŸव-भाव छूट जाए । सभी परस्थितियों में समता भीतर आए । लोग प्रश्न पूछते हैं क्या परमात्मा है ? स्वर्ग नरक आदि  है ? क्या सच में कर्म होता है ये सब प्रश्न बेकार के हैं । इन प्रश्नों का कोई मोल नहीं है इस संसार में केवल एक ही प्रश्न है मैं कौन हूं कहां से आया हूं कहाँ जाना है । प्रतिदिन अपने से पूछो मैं कौन हूं पति पत्नी गुरु-शिष्य परिवार धन सम्पत्ति क्या ये मेरे हैं । बुद्धि के स्तर पर तो तुम सब यही कहोगे कि ये मेेरे नहीं है परन्तु अनुभव के स्तर पर भीतर आत्मा का अनुभव हो जब व्यक्ति अन्तरात्मा में प्रवेश करता है तो आनंद, शांति की झलक भीतर से प्रकट होती है । आत्मा जिसका वर्ण, गंध, रस स्पर्श नहीं है जिसे किसी तर्क के द्वारा समझाया नहीं जा सकता फिर भी वो है । जब उसका अनुभव आ जाएगा तो प्रतिकूलता में ही आनंद होगा और यह अन्तरात्मा परमात्मा बन   जाएगी । 

आचार्य सम्राट् पूज्य श्री आनंद ऋषि जी महाराज का 110 वां जन्म-दिवस कल सभी सामायिक दिवस के रुप में मनाया जा रहा है ।    

फूलों का गुलदस्ता था आचार्य श्री आनंदऋषि जी म0 का जीवन

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

22 जुलाई, 2009: ऋषभ विहार, दिल्ली  युग पुरुष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- श्रमण संघीय द्वितीय पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री आनंद ऋषि जी महाराज समतायोगी एवं महान् गुणों से अलंकृत थे । महापुरुषों की जन्म-जयंती हमारे लिए पथ प्रदर्शन का काम करती है । उनके गुणों को जानना, समझना, हृदय की गहराई तक जाने का सीधा मार्ग है । उनका जीवन विनम्रता से भरा हुआ था । तेरह वर्ष की बाल उम्र में संयम लेकर जीवन की ऊँचाईयों को प्राप्त किया । आपश्रीजी के विचारों में उदारता, दृष्टि में कोमलता, व्यवहार में निर्मलता भरी हुई थी । आपका जीवन आकाश की भांति स्वच्छ निर्मल था । जीवन में कोई बनावट नहीं थी ।

 मेरा यह सौभाग्य रहा कि जब आचार्य श्री आनंद ऋषि जी महाराज आचार्य बनने के बाद उत्तर भारत में मंगलदेश पधारे तो उनके साथ विहार करने का सौभाग्य मुझे मिला । वैराग्यकाल में मैंने कई बार उनके दर्शन किए । उनका जीवन गुणों का गुलदस्ता था । जैसे एक गुलदस्ते में अनेकों फूल होते हैं उसी प्रकार उनके जीवन में अनेकों गुण भरे हुए   थे । अनेक गुण होते हुए भी संवेदनशीलता का गुण आपमें विशेष-रुप से अंकित था आपने अपने जीवन में गुरुदेव श्री रत्नऋषि जी महाराज के कठोर शासन में स्वयं को शासित   किया । उन्होंने कोमल पाद्पद्मों से भारतवर्ष का भ्रमण किया । जगह-जगह शिक्षा, स्वाध्याय, साधना की प्रेरणा दी । आप एक सफल प्रवचनकार थे । प्राकृत, संस्कृत आदि अनेक भाषाओं के जानकार थे ।  संघर्ष एवं कष्टों में भी यथानाम तथागुण सम्पन्न थे और हर क्षण हर परिस्थिति में समता और आनंद में निवास करते थे । 

किसी भी व्यक्ति को बड़ी शांति से सुनते, चिन्तन करते और थोड़े शब्दों में मधुर-भाषा में संतोषपूर्ण जवाब दते थे । सभी श्रद्धालु प्रत्युत्तर से गद्गद हो जाते थे । कोई निर्णय करते थे तो भविष्य की ओर दृष्टि करते अर्थात् दूर दृष्टि से चिन्तन करते थे । भीतर की कोमलता मैंने स्वयं अनुभव किया है । सभी दर्शनार्थियों के साथ आप छोटे बालकों का विशेष ध्यान रखते थे एक बार छात्रावास से कुछ विद्यार्थी उनके पास बैठे थे । उनका हालचाल पूछा, तुम क्या करते हो ? कोई दिक्कत तो नहीं है । काॅपी पेन्सिल पर्याप्त मात्रा में है । इस प्रकार जीवन की वास्तविक समस्याओं को पूछते थे और समाधान भी करते थे । बच्चों को धर्म शिक्षा प्राप्त हो इस हेतु उन्होंने धार्मिक परीक्षा बोर्ड की येाजना रखी, जहां से साधु-साध्वी अथवा कोई भी धर्म जिज्ञासु ज्ञान निःशुल्क प्राप्त करता था । ऐसे लाखों अध्ययनकर्ताओं ने धार्मिक संस्था का लाभ प्राप्त किया । 

आपके जीवन का एक-एक गुण संकट में विषमता में अशांति में सुलझन देता था । हम आपके जीवन से यह प्रेरणा ले आपकी भांति हमारे जीवन गुणों से परिपूर्ण हो । हमारे भीतर विनम्रता, सरलता, संवेदनशीलता आदि गुणों का आविर्भाव हो तो आज आपकी जन्म जयंती मनाना सार्थक होगा । 

इस अवसर पर सामायिक एवं आयंम्बिल दिवस में अनेकों भाई बहिनों ने सामायिक तथा आयम्बिल तप करके रसना पर विजय पाने का प्रयास किया ।

सत्य में जीने से कर्म-निर्जरा होती है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

23 जुलाई, 2009: ऋषभ विहार, दिल्ली  युग पुरुष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- हम अपने ईष्ट से क्या मांग करें । क्या प्रार्थना करें हे प्रभो ! आप दयालु हो, करुणा के सागर हो मेरे हृदय में प्राणी मात्र के प्रति मैत्री भर देना । हे प्रभो ! मैं संसार के आकर्षण में आकर्षित ना होकर परम् पिता परमात्मा का सदा ध्यान करुं । मौत आए तो यह भान रहे कि मौन शरीर की आई है आत्मा की नहीं । जन्म-मरण भिन्न-2 योनियों में भ्रमण सब कर्म-बंधन के कारण हो रहा है । परमात्मा मुझे सत्य का पथ मिले सत्य बोलना और सत्य का आचरण करना अच्छा है परन्तु उससे भी अधिक अच्छा है सत्य को जीवन में ढ़ालना । सत्य एक है ऋषियों मुनियों ने अपने-2 ढंग से उसकी व्याख्या की । भगवान फरमाते हैं सत्य ही भगवान है और सत्य है तुम्हारी आत्मा । आत्मा और परमात्मा के अलावा इस संसार में और कुछ भी नहीं है । इस संसार में एक ही द्वार है पहुँचने के लिए, एक ही रास्ता है चलने के लिए, एक ही मंजिल है प्राप्त करने के लिए वो तुम हो । स्वयं से स्वयं को पाना है ।

भगवान फरमाते हैं जो आत्मा है वह विज्ञान है । जो विज्ञान है वह आत्मा है । विज्ञान हर बात प्रयोगों के द्वारा शोध के द्वारा सिद्ध करता है । विज्ञान में ज्ञान है और आत्मा में ज्ञान है । आत्मा से आत्मा द्वारा आत्मा का उद्धार करो । हमारी आत्मा के ध्यान, समाधि, वैराग्य ये  मित्र है और क्रोध, मोह, लोभ, राग, द्वेष आदि कषाय शत्रु है । आत्मा का एक ही स्वभाव है केवल जानना और देखना । आत्मा कर्Ÿााभाव में नहीं रहती क्योंकि आत्मा कुछ करती ही नहीं । आत्मा के शुद्ध भावों को जानने वाला यह कभी नहीं कहता कि यह मेरा है मेरा में अहम् भाव है । वस्त्र, स्थान, आवश्यक सामग्री, शरीर की इन्द्रियां ये सब मेरी है परन्तु मैं नहीं । मैं केवल आत्मा हूँ जितना तुम स्व में रमण करोगे उतनी कर्म-निर्जरा होगी । मेरे में कर्म-बंधन है और मैं में कर्म-निर्जरा है । 

एक बार बाबा फरीद जंगल से गुजर रहे थे वहीं पर एक किसान गाय के गले में रस्सी डालकर उसे खींच रहा था । गाय नहीं जाना चाहती थी और किसान उसे खींच रहा था, बाबा फरीद ने शिष्यों से प्रश्न पूछा कि गाय ने किसान को बांधा है या किसान ने गाय को बांधा है । देखने में तो यही परिलक्षित हो रहा था कि किसान ने गाय को बांधा है इसीलिए शिष्यों ने यह जवाब दिया परन्तु वास्तव में गाय को खुला छोड़ दिया जाए तो किसान गाय के पीछे दौड़ेगा ना कि गाय किसान के पीछे इसीलिए सही यही है कि गाय ने किसान को बांधा है । आप प्रतिदिन आभूषण पहनते हैं आप गहराई में जाकर सोचिए आभूषणों ने तुमको पहना है या तुमने आभूषणों को पहना है जब एक आभूषण गुम हो जाए तो आभूषण को कोई चिन्ता नहीं होती परन्तु पहनने वाले को बहुत चिन्ता होती है । इसका निष्कर्ष भी यही निकलता है कि आभूषणों ने तुमको पहना है । 

आत्मा में आने के लिए शत्रुओं को परास्त करना होगा । आत्मा पर विजय पानी होगी । जिस प्रकार गाय ने किसान को बांधा है और आभूषणों ने तुम्हें पहना है जब तुम्हें यह भान हो जाएगा तब स्वतः ही किसान गाय को छोड़ देगा और आभूषणों को तुम छोड़ दोगे उसी प्रकार शत्रु परास्त हो जाएंगे । भारत अकेला देश है जिसने सिद्ध, बुद्ध भगवत् पुरुषों को नमन किया क्योंकि उन समस्त महान् पुरुषों ने अपनी आत्मा पर विजय पाई । कहते हैं भगवान महावीर को केवलज्ञान हुआ तो स्वयं इन्द्र ने नमन किया । नमन इसलिए किया क्योंकि इन्द्र भी स्वयं अप्सराओं, धन, परिग्रह में उलझे हुए थे । बुद्ध को बोधि प्राप्त हुई तो ब्रह्मा, विष्णु, महेश उन्हें नमन करने आए । हम स्वयं को जाने । सदियों सदियों से हमने शरीर से प्यार किया और कर्म-बंधन किया । एक बार अपनी आत्मा से प्यार करो । आत्म-रमण, आत्म-चिन्तन करो तो आत्मा पर विजय होगी और तुमसे कोई भी अजेय नहीं रहेगा ।

कर्म-निर्जरा का उŸाम मार्ग है आत्म-रमण

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

24 जुलाई, 2009: ऋषभ विहार, दिल्ली  युग पुरुष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- प्रभु महावीर के चरणों में नमन । श्रद्धा समर्पण का भाव । जब आप किसी को नमस्कार करते हैं, हाथ जोड़ते हैं तो आप उसके साथ जुड़ जाते हैं । हमारे भीतर नमन का भाव, पवित्रता का भाव हमें उनसे जोड़ देता है । नमन हमारा आधार है । अपने हृदय को नमन से भर दो । आप नमन के द्वारा विराट चेतना से जुड़ जाते हैं । नमन का भाव ही यही है कि हम उन जैसे बने । प्रार्थना में भावों का अधिक महŸव है जितने पवित्र भाव होंगे उतनी प्रार्थना निर्मल होगी और भावों से अधिक कर्म-निर्जरा होती है । 

आप जब परमात्मा को नमन करते हो तो आप आत्मा के द्वारा परमात्मा से जुड़ जाते हो । जब-2 आप स्व में होते हो तब-2 कर्म-निर्जरा होती है । जब आप पर में रहते हो तब कर्म-बंधन होता है । कर्म-निर्जरा के बहुत से मार्ग है प्रार्थना, सेवा, सत्संग, दान, तप आदि सभी से कर्म-निर्जरा होती है परन्तु सबसे उत्तम मार्ग है प्रतिपल प्रतिक्षण स्वयं की आत्मा में रहना आत्म-चिन्तन, आत्म-रमण करना । ये मानव हजारों वर्षों से युद्ध करता आ रहा है दूसरों को मारता आ रहा है परन्तु भगवान फरमाते हैं हे मानव तू स्वयं से युद्ध कर भीतर काम, क्रोध, मद, लोभ रुपी जो शत्रु है उनका ेपरास्त कर दो । जब हमारे हृदय में अटूट श्रद्धा आती है तो वो श्रद्धा हमें परमात्मा की तरफ ले जाती है । 

जीवन में बहुत आनंद, सुख, शांति है परन्तु हमें उसका अनुभव करने का समय नहीं है । हम देखते बाहर हैं जरा भीतर की तरफ झांको परमात्मा ने जो दिया है उसमें सुखी रहो तुम कैसे सुखी रह सकते हो यह तुम पर निर्भर करता है । भावना इतनी ही है कि हम आत्मा के द्वारा उस परम् तत्व से जुड़े । आत्मा हमारी अनंत सुख का भण्डार है वही हमारी मित्र है और वही हमें सन्मार्ग पर ले जाने वाली है । हम आत्म-रमण में आत्म-चिन्तन में अपने कर्मों की निर्जरा करते हुए मुक्ति के मार्ग पर आगे बढ़ें । 

अन्तर के भावों का प्रकटीकरण है प्रार्थना

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

25 जुलाई, 2009: ऋषभ विहार, दिल्ली युग पुरुष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- अरिहंत परमात्मा के चरणों में नमन । जिसको आप पूज्य मानते हैं उनके श्रीचरणों में एक प्यास, पीड़ा को जन्म दो । आप नवकार मंत्र पढ़ते हो, लोगस्स का पाठ पढते हो भक्तामर आदि अनेक स्तोत्र मंत्र पढ़ते हो ये सब परमात्मा के सामने की गई प्रार्थना है । ये समस्त प्रार्थनाएं किसी के द्वारा बनाई गई है । प्रार्थना में शब्द छंद का महŸव नहीं प्रार्थना में भावों का महत्व है । प्रार्थना में परमात्मा अपने समक्ष जानकर भावों को उद्घाटित करना होता है । प्रार्थना को समझना है तो एक छोटे बच्चे को समझ लो जैसे छोटा बच्चा कुछ ना जानता हुआ भी सबकुछ जानता है । भोला-भाला सरलता की प्रतिमूर्ति है । भीतर बाहर स्वच्छ है कोई छल कपट नहीं । प्रार्थना भी ऐसी ही होनी चाहिए, सरल हृदय से भीतर के समस्त भावों को अपने आराध्य के समक्ष प्रकट कर दो फिर उसमें कोई कपट नहीं होना चाहिए । 

प्रकृति का कण-कण आपके भावों से प्रभावित होता है । पेड़ के पास कुल्हाड़ी लेकर जाओ तो वो सहम जाते हैं और उनके पास मैत्री के भाव से मंगल कामना करो तो वे लहराते हैं । आप प्यार से छोटे बच्चे को अपने पास बुलाओ तो वो झट से आपके पास आ जाएगा । जब छोटा बच्चा प्यार से बुलाने पर आपके पास आ सकता है पेड़ के पास मंगलभाव भरने से लहरा सकता है तो सर्वज्ञ सर्वदर्शी परमात्मा क्या आपके भावों को नहीं समझेगा । प्रार्थना जब भी करो अन्तरहृदय की गहराई से करो । डूब जाओ अपने भीतर । जब तुम प्रार्थना करो तो तुम्हारा रौंया-रौंया खून का कतरा-कतरा प्रवाहित हो । मान लो अगर वो प्रभावित नहीं है तो प्रार्थना उपर से हो रही है । एक स्नान बाहर का है जो आप प्रतिदिन करते हो । एक स्नान भीतर का है जो प्रार्थना के द्वारा घटित होता है जिसमें परमात्मा से गुप्तगु होती है जब तक आप भीगोगे नहीं तब तक अन्तर की प्रार्थना नहीं होगी । कहा भी है- 

रोई उस बुत के कदर दो आंखे मेरी,

कि पुतलियां नहा धोकर ब्रह्मन हो गई । 

ऐसी हो हमारी प्रार्थना भीतर से हल्के हो जाते हो भीतर के भाव उसके समक्ष प्रकट होते हैं तो प्रार्थना घटित हो जाती है । प्रार्थना में शब्द संयोजन की आवश्यकता नहीं है । प्रार्थना मे तीन प्रकार के भाव होते हैं जब आप किसी आराध्य के पास दुःख में रो लेते हो तो यह पहला भाव है । दूसरा है कृतज्ञता, आनंद और अहोभाव जिसमें तुम अपने गुनाह कबूलते हो ध्यान साधना शिविर में आलोचना के बाद ऐसा ही प्रयोग होता है जिसमें हर साधक कृतज्ञता और अहोभाव में भीतर से खाली हो जाता है । तीसरा है शून्य का भाव इसे समझाया नहीं जा सकता, इसे शब्दों में भी कहा नहीं जा सकता । आज तक कोई अपने अनुभव को पूरी तरह नहीं कह पाया शून्य भाव प्रार्थना का सबसे उत्तम भाव है । वर्तमान में लोग धन, परिवार, बच्चों के लिए रोते हैं और कर्म-बंधन कर लेते हैं तुम रोओ परमात्मा के लिए जैसे चंदनबाला रोई थी । राजुल और मदनरेखा ने अन्तर स्नान किया था । छोटे मोटे से क्या प्यार करना है प्यार परमात्मा से करो जो तुम्हें सही रास्ते पर ले जाएगा । छोटा-मोटा धन एकत्रित करने में कितनी उम्र लगा दी अब परम्धन ले लो फिर किसी धन की आवश्यकता ही नहीं रहेगी । 

प्रार्थना अनुभव का विषय है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

26 जुलाई, 2009: ऋषभ विहार, दिल्ली  युग पुरुष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- परमात्मा को मिलने की प्यास है प्रार्थना । परमात्मा को हृदय में बसाने की आस है प्रार्थना । परमात्मा की अनुभूति है प्रार्थना । प्रार्थना शब्द बहुत गहरा, अनूठा और विलक्षण है । कोई भी अनुष्ठान करो, धर्म कार्य करो तो उसकी शुरुआत प्रार्थना से होती है । प्रार्थना को ठीक से समझ ले तो परमात्मा हमसे दूर नहीं । समग्र अस्तित्व से उठे हुए अहोभाव का नाम है प्रार्थना । बच्चा जब भूख लगती है तो पूरी शरीर के कण-कण से रोता है केवल दूध पीने के लिए जब दूध मिलता है तो शान्त हो जाता है ऐसे आप हृदय के कण-कण से प्रार्थना कर लो । प्रार्थना में हंसना, रोना, शून्य की स्थिति आदि अलग-2 अवस्थाएं हैं । शून्य की स्थिति वह स्थिति है जहां ना कोई शब्द है ना कोई दीप, ना कोई ज्योति केवल खालीपन । यह प्रार्थना की उच्च स्थिति है । जिसमें अपनी आत्मा और परमात्मा का मिलन होता है । आत्मा में अनंत शक्ति, अनंत सुख एवं अनंतज्ञान है यह आपको साधना से अनुभव में आएगा । अध्यात्म, आत्मा, परमात्मा की बात मुख से कही नहीं जा सकती यह बात अनुभव की है । कहा भी है- भीखा बात आगम की, कहन सुनन की नाही ।

जो जाने सो कहे नहीं, कहे सो जाने नाही ।  

जो बात अनुभव की है वह कहने और सुनने से समझी नहीं जा सकती जो कहता है वो जानता नहीं और जो जानता नहीं वो कहता नहीं । तुम्हें प्यास लगी हो मैं पानी की लम्बी-चैड़ी व्याख्या करता चला जाऊँ । पानी के सरोवर, नदी, कुएं के पास लेकर जाउं परन्तु पानी ना पिलाऊं तो तुम्हारी प्यास नहीं बुझेगी । प्यास तभी बुझ सकती है जब तुम पानी को पी लोगे फिर तुम्हें पानी का अनुभव हो जाएगा । 

हमारे भीतर एक शाश्वत तत्व है वह सदा से एकसा है । संसार की शेष सभी चीजें बदलती है परन्तु वह नहीं बदलता वह है हमारी आत्मा । उसका अनुभव हमें आ जाए तो परमात्मा से फिर हम दूर नहीं होंगे । जब व्यक्ति दुःख में होता है तब सिमरन करता है और सुख में सिमरन नहीं करता, अगर व्यक्ति सुख में सिमरन करने लग जाए तो उसे दुःख आएगा ही नहीं । सिमरन, भक्ति, प्रार्थना सभी एक ही है । इनके लिए किसी स्थान की आवश्यकता नहीं । बाह्य किसी चीजों की आवश्यकता नहीं भीतर भाव उठ जावे तो हम प्रार्थना की गहराई में प्रवेश कर सकते हैं । हम भक्ति प्रार्थना करते हो और मन चहु दिशाओं में घूमता हो तो वो प्रार्थना प्रार्थना नहीं कहलाती । आप माला कर रहे हो मुख से नाम उच्चारण चल रहा है हाथों से मनके फिर रहे हैं और मन दसों दिशाओं में फिर रहा है यह सिमरन सिमरन नहीं हो सकता । सच्चा सिमरन तो वही है जब आप मन, वचन, काया की एकता से परमात्म भक्ति में तल्लीन हो जाओ ।

मन का मुण्डन कर आत्म स्थिति पाएं

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

27 जुलाई, 2009: ऋषभ विहार, दिल्ली  युग पुरुष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- स्थानांग सूत्र में भगवान महावीर स्वामी ने दस प्रकार के मुण्डन बतलाए हैं । पांच इन्द्रियों का मुण्डन, चार कषायों का मुण्डन और दसवा सिर का मुण्डन । मुण्डन यानि उन स्थितियों परिस्थतियों का त्याग कर स्वयं के भीतर आना । जैसे सुनना अच्छा लगता है जो सुनना प्रिय लगे उस सुनने का त्याग करे यह श्रोतेन्द्रिय का मुंडन है । जो देखना अच्छा लगे वो नहीं देखना यह चक्षु इन्द्रिय का मुण्डन है । सुवास सुगंध और दुर्गंध की प्रति जो भेद रेखा है उससे हटकर स्वयं में आना यह घ्राणेन्द्रिय का मुण्डन है । रसप्रणीत भोजन करना जो रस अच्छा लगे उसे स्वीकार करना और जो बुरा लगे उसका त्याग करना यह रसनेन्द्रिय के वशीभूत होना है इससे हटकर रस परित्याग करना रसनेन्द्रिय का मुण्डन है । जो स्पर्श अच्छा लगे उसको स्वीकार करना और रुक्ष स्पर्श को अच्छा नहीं मानना यह स्पर्शेन्द्रिय के वशीभूत होना है इससे हटकर हर परिस्थिति में समता रखना और जैसा भी स्पर्श मिले उसे स्वीकार करना यह स्पशेन्द्रिय का मुण्डन है । चारों कषायों क्रोध, मान, माया, लोभ इनको त्यागकर अपने आत्म स्वरुप में आना कषायों का मुण्डन है । 

अनेक उदाहरण है जिनमें हाथी हथिनी का स्पर्श पाकर खुश होता है और अगर उस स्पर्श को वो त्याग दे तो वो स्पर्शेन्द्रिय का मुण्डन कर लेता है । हमारे अनेक महान् मुनियों ने पांच इन्द्रियों का, चार कषायांे का मुण्डन कर आत्म-स्थिति को पाया । आत्म साधना से बढ़कर और कोई साधना है ही नहीं यह सर्वोच्च साधना है । साधु-मुनिराज संवत्सरी से पूर्व सिर का लोच करते हैं वह लोच का कार्यक्रम आज हमारा सम्पन्न हुआ । सातों मुनियों के सिर का लोच हुआ । यह दसवा मुण्डन है । हमें इन दसों मुण्डनों के द्वारा स्वयं को मुण्डित कर अपने भीतर आत्म-तत्व तक जाना है । कहा भी है - मुण्ड मुण्डाना बहुत सरल है, मन मुण्डन आसान नहीं ।

हम मन मुण्डन को आसान बनाएं और अपने आत्म-स्वरुप में रमण करें । अपने भीतर   आएं । प्रतिपल प्रतिक्षण आत्म-चिन्तन, आत्म-रमण करते हुए पाँच इन्द्रियां, चारों कषायों का त्याग कर आत्मा के चारों ओर लगे कर्म मैल को हटाते हुए मुक्ति को प्राप्त करें यही मंगल कामना ।

भगवान पाश्र्वनाथ का जीवन क्षमा से भरपूर था

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

28 जुलाई, 2009: ऋषभ विहार, दिल्ली  युग पुरुष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- जैसे हम सभी जीवन का निर्वाह करने के लिए जीवन को महाजीवन बनाने के लिए आत्मा से परमात्मा बनने की लिए शरीर का उपयोग करते हैं, उसका भरण’-पोषण करते हैं उसकी हर दैनिक क्रिया सहज-रुप में करते हैं ऐसे हमारी जो श्वासें प्रतिदिन सहज जा रही है उन्हें बंदगी में लगा   लें । जब श्वासें बंदगी में लगेगी तो प्रभु की शरण भी हमें प्राप्त होगी । 

आज भगवान पाश्र्वनाथ का निर्वाण कल्याणक है । तीर्थंकर भगवंतों के पांच कल्याणक मनाए जाते हैं । च्यवन कल्याणक, जन्म कल्याणक, दीक्षा कल्याणक, केवलज्ञान कल्याणक और मोक्ष कल्याणक । कल्याणक के दिन बहुत शुभ हाते हैं इन दिनों में जो भी साधना करो उसका अधिक फल प्राप्त होता है । भगवान पाश्र्वनाथ तो सिद्ध बुद्ध मुक्त हो गए आज भी उनके शासन के रक्षक देवी देवता हैं जो हमें साधना की ओर अग्रसर करते हैं । हम उन्हें नमन करें । लोग पूछते हैं कि शासनदेवी देवताओं को नमन क्यों करें ? उनको नमन इसलिए करना क्योंकि वो मुक्ति में सहायक  है । वो हमें मोक्ष-मार्ग की ओर ले जाते हैं । हम जो भी साधना कर रहे हैं उसमें उनका सही दिशा-निर्देशन होता है । भाव से किया गया एक वंदन पता नहीं हमारे कितने कर्मों की निर्जरा कर देता है । महाराजा श्रेणिक ने भगवान महावीर के समोवसरण में बहुत से मुनियों को भाव सहित वंदन किया तो नीच गौत्र का कर्म-क्षय करते हुए तीर्थंकर गौत्र का बंधन किया । आगामी चैबीसी में महाराजा श्रेणिक का जीव प्रथम तीर्थंकर होगा । आप कोई भी आराधना करो उसमें सबसे पहले वंदना करना आवश्यक है । वंदन भी उच्च भावों से हो । रेवती माँ ने सिंह अणगार को आहार बहराया था इतनी भावना से बहराया की तीर्थंकर गौत्र का बंधन कर लिया इसीलिए मैं हमेशा करता हूं कि रसोई तुम्हारी मुक्ति का द्वार है ।

भगवान पाश्र्वनाथ और कमठ का वैर दस भव का वैर रहा । हर भव में कमठ क्रोध करता रहा ओर भगवान उसे क्षमा करते रहे । वाराणसी में भगवान का जन्म हुआ । पाश्र्व कुमार के रुप में एक दिन वो कमठ का पंचाग्नि तप देखने गए वहां उन्होंने अपने अवधि ज्ञान द्वारा लक्कड़ में जल रहे नाग नागिन के जोड़े को देखा भीतर से करुणा से अभिभूत होकर कमठ को ताड़ना दी और लक्कड़ में जल रहे नाग नागिन का वर्णन सुनाया इस पर कमठ माना नहीं तो पाश्र्व कुमार ने अपने सैनिकों को आदेश दे वह लक्कड़ चिरवाया और उसमें से वो नाग नागिन का जोड़ा निकल आया । जीवन के अन्तिम क्षणांे में नवकार मंत्र सुनाया तो वो ही नाग नागिन शुद्ध-भावों की प्राप्ति कर देवलोक में शासनदेव धरणेन्द्र एवं शासनमाता पद्यावती के नाम से विख्यात हुए । 

भगवान पाश्र्वनाथ और कमठ के जीवन से हमें एक प्रेरणा मिलती है जहां कमठ ने क्रोध किया वहीं भगवान ने मैत्री, क्षमा की और इससे भगवान ऊपर उठते गए और कमठ नीचे गिरता गया । आप भी जीवन में जब-2 क्रोध आए तो प्रायश्चित प्रतिक्रमण आलोचना कर लेना । आचार्य भद्रबाहु ने भगवान पाश्र्वनाथ की भक्ति कर ‘उवसग्गहरं स्तोत्र’ की जो रचना की है वो भी प्रभावशाली है । भक्तामबर घण्टाकर्ण उवसग्गहरं आदि स्तोत्र भयंकर कष्ट में स्मरण करने से कष्ट निवारण होता है । आप सभी स्तोत्र पाठ का तभी सहारा ले जब आप उस कष्ट को सहन ना कर सके । आज के दिवस पर हम सभी यही प्रार्थना करें कि जैसे भगवान पाश्र्वनाथ का निर्वाण कल्याणक हुआ वैसे हमारा निर्वाण कल्याणक कब होगा । कब हम चार गति चैरासी लाख जीवयोनी से बाहर निकल पंचमगति सिद्धालय को प्राप्त करेंगे एक प्यास भीतर रहे । 

भक्ति और प्रार्थना में भाव आवश्यक है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

29 जुलाई, 2009: ऋषभ विहार, दिल्ली युग पुरुष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- अरिहंत परमात्मा की भक्ति, प्रार्थना, ध्यान में ऐसा संबंध बने कि परमात्मा और आपमें कोई दूरी ना रहे । परमात्मा की शरण में जाने के बाद उनसा होने का हमारा पुरुषार्थ रहे । जब हम भगवान की शरण में जाएंगे तो वो हमें भव पार क्यों नहीं करेंगे । भगवान के समक्ष एक प्रार्थना प्रभो ! मैं अबोध बालक हूं आप सर्वज्ञ सर्वदर्शी हो आप मुझे मुक्ति की ओर अग्रसर करो । प्रार्थना के भावों में डूब जाओ । नम्मोत्थुंण का पाठ, लोगस्स का पाठ प्रार्थना और भक्ति का पाठ है । भगवान अपने ज्ञान के प्रकाश में तीनों लोकों को जानने की शक्ति रखते हैं वह शक्ति हमारे भीतर भी है परन्तु आवश्यकता है उसको अहसास करने की । जब तक हम शरीर और शरीर से जुड़े संबंधों में अटके रहेंगे तब तक हमें उस शक्ति का आभास नहीं होगा । जब मैं आत्मा हूं, सत्य हूँ यह ज्ञान भीतर अनुभव में आएगा तब वो शक्ति भीतर प्रकट हो जाएगी । जिसको तुम सर्वोपरि मानते हो उसमें विलीन हो जाओ ।

प्रकृति को देखकर कभी तुम्हारे भाव मौन हुए हैं । आँखों में आंसु आए हैं, कंठ में संगीत उभरा हो और तुम खाली हो गए हो जब ऐसी परिस्थिति घटित होती है तब भीतर से प्रार्थना और भक्ति का जन्म होता है और तभी विराट सŸाा का भीतर प्रवेश होता है ऐसे समय में जो होता है उसे होने दें । कल्पवृक्ष की छांव और बैंकुंठ प्राप्त करने से क्या होगा । अगर तुम्हारे भीतर परमात्मा की भक्ति के भाव ही नहीं होंगे और परमात्मा पास में हो तो फिर बैकुण्ठ और कल्पवृक्ष की छांव क्या करनी है । भक्ति और प्रार्थना में भाव आवश्यक है । चाहे एक शब्द पढ़ों परन्तु गहरे में उतर जाओ वहाँ हमारी कोई माँग ना हो । जहाँ मांग होती है वहाँ सीमित मिलता है और जहां मांग नहीं होती वहाँ असीम की प्राप्ति होती है ।

भक्ति मन, वचन, काया से एकाकार होकर होती है फिर चाहे पहाड़ हो या पनघट असली पूजा तो विश्वासी मन की है । तुम्हारी श्रद्धा जहाँ होगी वहीं तुम जाओगे । वहीं पर तुम्हारी प्रार्थना और भक्ति घटित होगी । प्रार्थना ऐसे करना जैसे मन, वचन, काया एक हो जाए । भीतर निर्मलता प्रकट हो जाए । जैसे भक्ति की थी नरेन्द्र ने । एक बालक जिसके पिता अन्तिम समय में कोई राशि छोड़कर नहीं गए । माता और पुत्र दोनों का भरण-पोषण बहुत मुश्किल से होता था । माँ आस पास पड़ोसियों के यहां जाकर काम करती थी । उसमें इतना ही धन प्राप्त होता था कि कोई एक व्यक्ति अपने पेट को भर सके जब ऐसी स्थिति का रामकृष्ण परमहंस को पता चला तो उन्होंने विवेकानंद को प्रेरणा दी कि इतनी विपत्ति में तूं काली माँ से क्यों नहीं कुछ माँगता । एक दिन उन्होंने उसे माँग करने के लिए मन्दिर में भेजा परन्तु कहते हैं जब नरेन्द्र मन्दिर में प्रविष्ट हुए माता को देखा स्तुति और भक्ति करते हुए स्वयं का भान भूल गए आंखों में आंसू आ गए और कुछ मांग ही नहीं पाए । हमारी भक्ति ऐसी हो जहां पर कोई मांग ना हो । जहां पर केवल गहराई हो ।

आत्म-ज्ञान प्राप्ति हमारा लक्ष्य हो

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

30 जुलाई, 2009: ऋषभ विहार, दिल्ली  युग पुरुष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- प्रभु की भक्ति के लिए जरुरी है हमारे दिल में प्राणी मात्र के लिए करुणा व मैत्री का भाव हो । भगवान ने जीव मात्र के लिए मंगल की कामना की । अरिहंत परमात्मा की सबके लिए मंगल कामना रहती है वो मंगल भावना भाते हैं कि नरक के नेरिये अपना आयुष्य पूर्ण कर मनुष्य भव धारण करें यहां पर साधना करते हुए कर्म-निर्जरा कर मुक्ति की ओर अग्रसर हो । ऐसे ही तीर्यंच के जीव जो प्रतिपल भोजन में आसक्त है वो अपनी आहार संज्ञा त्यागकर मानव योनी को धारण करें यहाँ पर साधना कर मुक्ति की ओर अग्रसर हो । देवता जो परिग्रह में आसक्त है वे भी अपने परिग्रह का मोह छोड़कर देव आयु पूर्ण कर मनुष्य भव में जन्म लेकर साधना करते हुए मुक्ति की ओर अग्रसर हो । प्रत्येक मानव जो वर्तमान में भोगासक्त है वह अपनी विषय आसक्ति को त्यागकर साधना आराधना करते हुए मुक्ति की ओर अग्रसर हो । हम अपने हर श्वांस का उपयोग करें । भगवान ने अपनी प्रत्येक श्वांस का उपयोग केवल संसार सागर पार करने के लिए किया । उन्होंने संदेश भी दिया तो मुक्ति का संदेश दिया ।

हम भी प्रार्थना करें प्रभो जैसा आपका स्वरुप है वैसा मेरा स्वरुप हो । प्रभु महावीर की साधना ध्यान और कायोत्सर्ग की साधना है । प्रार्थना और भक्ति तुम्हें ध्यान की ओर ले जाते हैं । सत्संग केवल समय पास करने के लिए नहीं है वह तो सत्य का संग करने के लिए है । आत्म ज्ञान प्राप्त करने के लिए सत्संग अति आवश्यक है । पहले आत्म-ज्ञान प्राप्त कर लो फिर संसार के सभी कार्य करते रहना । इस चातुर्मास में अपना एक लक्ष्य बनाओं कि मैंने आत्म ज्ञान प्राप्त करना है । प्रार्थना करने से आपका उपादान तैयार होगा फिर आप साधक बन जाओगे । साधक बनने के बाद सत्गुरु का मिलन होगा फिर साधना मिलेगी और साधक साधना करते हुए एक दिन आत्मज्ञान को उपलब्ध हो जाएगा । साधक बनना कठिन है प्रार्थना करते हुए आप साधक बनते हो फिर आपकी गति महाजीवन की ओर होगी । साधना के लिए समर्पण और भक्ति आवश्यक है । कहा भी है-

चरण दास यों कहत है, सुनियो संत सुजान ।

भक्ति मूल अधिनता, नरक मूल अभिमान ।।

भक्ति करनी है तो किसी के अधीन होकर करनी होगी । और ऐसे समय में आप सभी अपने आत्मा की शरण लजें । आत्तम तत्व के प्रति समर्पित हो जाएं । जीसस ने भी कहा है- परमात्मा उनको मिलता है जो विनम्र होते हैं तथा सदा अन्तिम रहने को तेयार रहते हैं । भक्ति और प्रार्थना तभी आती है जब अधीनता, विनम्रता भीतर आती है । जितना विनम्र होगे उतनी प्रभुता प्राप्त होगी । वासुदेव श्रीकृष्ण ने महाराज युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में अतिथियों के पाद-प्रक्षालन का कार्य किया वो विनम्र बनें और सबके चहेते बन गये । कहने का तात्पर्य केवल इतना है कार्य कोई छोटा बड़ा नहीं होता जहां अहंकार है वहां विनम्रता आ नहीं सकती । प्रार्थना में अहंकार ना हो । प्रार्थना शान्त चित्त से होे । प्रार्थना कृतज्ञता भरे भावों से हो ।

भारतीय संस्कृति में जीवन यापन करें

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

31 जुलाई, 2009: ऋषभ विहार, दिल्ली  युग पुरुष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि-

पो फटी ते चिड़िया चहकिया पय चार चैफेरे शोर भया,

उठ मुसाफिर सुतिया होय तेरे गठड़ी नू ले चोर गया । 

इस पंजाबी के भजन में एक गहरी वास्तवितकता है पता नहीं जीवन की डोर कब टूट   जाए । शेरशाह सूरी ने अपनी सुरक्षा के लिए एक दोहरा किला बनवाया । किला अभी पूरा बना नहीं था और वो चल बसे । राजपुरा की घटना है वहां पर एक जैन भाई अपने लिए कोठी बनवा रहा था प्रतिदिन दर्शन करने आता था कोठी अभी बनी नहीं और बनाने वाला चला गया । हम शिमोगा भद्रावती में थे एक भाई प्रवचन सुनकर दुकान पर गया, सौदा कर रहा था पिंजरा टूट गया और पंछी चला गया । कहने का तात्पर्य केवल इतना ही है पता नहीं अन्तिम श्वासें कब और कहां पर आ जाए । जो मेरा है वह सब टूटने वाला है एक न एक दिन वह बिखर जाएगा । 

संत बाह्यबल को छोड़कर आन्तरिक बल पर विश्वास करते हैं । इस बाह्य बल की रिद्धि सिद्धि के लिए हमने संसार सागर में अनेक बार डुबकियां लगाई चोरासी के फैरे में हम कई बार घूम चुके हैं । अनंत जन्म हमने धारण किए । हर गति हर योनि में जन्म लिया और किसी गति योनि में कोई साथ नहीं गया । ये कोठी बंगले धन सम्पत्ति पद प्रतिष्ठा कुछ भी साथ जाने वाला नहीं इस चातुर्मास में एक संकल्प कर लो मेरा असली घर सिद्धालय है और मैंने उसे प्राप्त करना है मैं अवश्य सिद्धालय जाऊँंगा ।

मैं आत्मा हूं मैं सत्य हूँ मैं में अहंकार नहीं है । आमतोैर पर सभी साधु-साध्वीवृंद या फिर श्रावक लोग मैं को अहंकार समझते हैं परन्तु यह अहंकार नहीं आपका शाश्वत सत्य है कि मैं आत्मा हूँ मैं हूँ जब इसका अनुभव हो जाए तो मुक्ति दूर नहीं रहती उसके अनुभव के लिए प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में उठकर साधना वीतराग-सामायिक करो । प्रातःकाल भोर का समय होता है परन्तु आजकल हमारी संस्कृति बदल गई । रात को देर तक जागते हैं और प्रातःकाल 10.00 बजे उठते हैं ना प्रार्थना, न सत्संग, ना ध्यान ना घर परिवार की चिन्ता बच्चों की तो कोई खबर ही नहीं, भाग्यशाली होते हैं वे लोग जो प्रातःकाल उठते हैं । साधना आराधना करते हैं ।

प्रातःकाल का समय अमृतवेला होती है शान्त समय में साधना में अधिक मन लगता है प्रातःकाल ही साधना कर लो तो सारा दिन अच्छा बीतता है हम अमेरिका की संस्कृति को भारत में ले आएं । इस संस्कृति को छोड़कर अपनी संस्कृति में आओ । सूरज निकलेने से पहले उठ   जाओ । प्रार्थना आत्मा का संगीत हैं तुम प्रार्थना करो और जीवन में आनंद शांति ना आए । ऐसा हो ही नहीं सकता । उठो जागो अब तुम्हें जागना होगा । सवेरा हो गया है अपनी आंखें खोलो । प्रातःकाल के भजन के साथ दिन की शुरुआत करो । माता-पिता गुरु को नमस्कार करो, उनका आशीर्वाद प्राप्त कर संसार के कार्य करो । जिस घर में भोजन और भजन इकट्ठा होता है जहाँ पर बड़ो का आदर और छोटो को प्यार मिलता है वहां सर्वदा खुशी रहती है । हम सभी अपने जीवन में खुशियों का सवेरा लेकर आएं । जो प्रातःकाल उठेगा वो सब कुछ पा जाएगा और जो सोया रह जाएगा वो बहुत कुछ खो देगा । 

प्रकृति में परमात्मा समाया है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

1 अगस्त, 2009: ऋषभ विहार, दिल्ली  युग पुरुष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- यह जीवन क्षण भंगुर है । कुशा के अग्र भाग पर पड़ी ओ की बूंद के समान चंचल है । धूप छाया की भांति अस्थिर है, इन्द्र धनुष के समान मिटने वाला है यदि वास्तविकता जान लो तो परमात्म पद पाया जा सकता है । अधिकतर लोग निस्सार में सार मानते हैं परन्तु सार है नहीं । मानव जीवन पानी का बुलबुला और रेत की दीवार की भांति है जो कभी टिकने वाले नहीं । इस जीवन को हम सर्वोत्तम रुप कैसे दे सकते हैं ? 

हम प्रकृति के पास रहते हुए भी उसका मूल्य नहीं जानते । अभागे होते हैं वे लोग जो प्रकृति के सौंदर्य को निहार नहीं पाते । शहरों की भागदौड़ में रहते हुए वो प्राकृतिक सौंदर्य भूल ही गए हैं । प्रकृति में परमात्मा समाया हुआ है । ब्रह्म मुहूर्त में उठकर उगते हुए सूरज को देखो रात्रि काल में पूर्णमासी का पूर्ण चन्द्रमा देखो । नदी, पहाड़, फल, फूल सभी प्रकृति के अनमोल रत्न हैं । जितना सुख प्रकृति में है उतना सुख कहीं हो नहीं सकता परन्तु आदमी संसार में इतना उलझ गया है कि वो प्रकृति का आनंद नहीं ले पाता । खिलते हुए फूल के पास जाकर आप खड़े रहो तो उसकी भीनी महक आपके नासापुटों में प्रवेश करेगी । नदी के पास जाओ तो उसकी मधुर झंकार आपको झंकृत करेगी । प्रातःकाल का सूर्य उदय देखोगे तो ऐसा प्रतीत होगा मानो सूर्य आपके भीतर प्रवेश कर गया है । 

पूर्णमासी का पूर्ण चाँद देखते हुए यह कल्पना करो कि सिद्ध भगवान पूर्णमासी के पूर्ण चाँद है और मैं दीये पर जगमगाती हुई ज्योति के समान हूँ । बस अपनी ज्योति को उस पूर्णमासी के पूर्ण चांद से मिला दो तो आप सिद्ध भगवंतों से जुड़ जाओगे । सिद्ध भगवंतों का स्वरुप भी पूर्णमासी के पूर्ण चन्द्रमा की भांति ही है वैसे तो सिद्धों का कोई रंग-रुप नहीं है परन्तु समझाने के लिए पूर्णमासी के पूर्ण चन्द्रमा का आलम्बन लिया जाता है । प्रकृति के साथ जब आप एकाकार होते हो तो आपके भीतर के कई प्रश्न जागृत होते हैं । एक बालक जिसका नाम जगजीवन था उसके भीतर भी प्रकृति को देखते-2 एक प्रश्न उठा कि मैं कौन हूँ ? मैं किसलिए भोजन कर रहा हूँ ? मैं श्वांस क्यों ले रहा हूं ये मित्र संबंधी किसके हैं क्या ये शाश्वत हैं ? जब उसके भीतर ये प्रश्न उत्पन्न हुए तो भीतर एक तड़फ, प्यास जागृत हुई । एक दिन सत्य का ज्ञान हुआ और सत्य जीवन में आया तो सारी भेद रेखाएं मिट गई । भेद-भाव मानव में हैं प्रकृति में कोई भेद-भाव नहीं । जीवन में पाप-पुण्य सुख-दुख जन्म-मरण इसके पार भी कुछ है, जो इसके पार है वह शाश्वत् तत्व है, वही तुम्हारा सत्य है । इस सत्य को समझो और प्रकृति से एकाकार हो जाओ । 

समता ही सामायिक है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

04 अगस्त, 2009: ऋषभ विहार, दिल्ली  युग पुरुष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- ये मानव का जीवन क्षण-भंगुर है । मानव यह जानता, समझता और चिन्तन करता है फिर भी नहीं जागता । प्रतिपल धर्म की आराधना करो, करुणा दया का भाव भावित करो । आप प्रतिदिन सामायिक करते हो इसका रहस्य क्या है ? क्या वह सामायिक भाव से हो रही है । आप सामायिक करेमी भंते के पाठ से लेते हो । करेमि भंते के पाठ के एक-एक शब्द का गहराई से चिन्तन करो । आपकी सामायिक तीन प्रकार की सामायिक है- श्रुत सामायिक, दर्शन सामायिक और चारित्र सामायिक । इन तीनों सामायिक से जब व्यक्ति गुजरता है तब आत्म-परमात्म मिलन होता है जैन दर्शन में मैं कौन हूं ? से मैं वह हूँ यानि कोऽहं से सोऽहं की यात्रा हुई है । यह संसार धन, माया सब झूंठा है क्योंकि यह साथ नहीं जाने वाला है साथ जाएगी आपकी धर्म-आराधना । हर श्वांस के साथ सोऽहं का अनुभव । जब-2 आप श्वांस के साथ सोऽहं ध्वनि का आलम्बन लेते हो तब-2 परमात्मा की ऊर्जा आपमें प्रवेश करती है । जब-2 आप सोऽहं करें तब अंग’-2 में उस ऊर्जा का अनुभव करें यह श्रुत सामायिक है । आपने सुना, सुनकर सामायिक में प्रवेश किया और सामायिक में समता का भाव लाया । 

आचार्य अमित गति परमात्मा से प्रार्थना करते हैं हे प्रभो ! सुख, दुःख आए, आधि, व्याधि  शत्रु, मित्र, योग, वियोग, भवन वन में रहूं हर समय मेरे भीतर समता का प्रवाह प्रवाहित हो यही सच्ची सामायिक है । भीतर भावनाएं तरंगित हो, समता भीतर आए तभी सामायिक होती है । जब जीवन में सामायिक होगी तो आपके व्यवहार में सरलता, प्रेम, करुणा झलकेगी । त्रस और स्थावर जीवों के प्रति मैत्री-भाव आएगा । 

रमण महर्षि की समस्त साधना मैं कौन हूं की थी । सारी उम्र वो स्वयं से एक ही प्रश्न करते रहे मैं कौन हूं ? कहते हैं एक बार पाल बर्टन {विदेशी व्यक्ति} अनेक प्रश्न लेकर उनके समक्ष उपस्थित हुआ । रमण महर्षि ने एक ही प्रश्न पूछा क्या तुम जानते हो कि तुम कौन हो ? अगर तुम जानते हो तो फिर समस्त प्रश्नों के समाधान हो जाएंगे । कहते हैं रमण महर्षि के एक प्रश्न पूछने मात्र से ही उस व्यक्ति के शेष समस्त प्रश्न उस एक प्रश्न में विलीन हो गए और वह भी कोहम की खोज में लग गया । 

अरिहंत परमात्मा की अनंत कृपा हैं उन्होनंे हमें रास्ता बता दिया और यह भी बताया कि कोऽहं का समाधन सोऽहं है । अब अनुभव करना तुम्हारे हाथ में है । घर में दीया हो और तुम आंखें बंद कर लो तो तुम्हें उसका प्रकाश प्राप्त नहीं होगा । घर में कल्पवृक्ष हो और तुम्हारी इच्छाएं पूर्ण ना हो तो वो कल्पवृक्ष क्या कर सकता है । तुम जागो अपने निज-रुप को जानो । जो निज-रुप को जानता है उसकी विजय होती । दर्शन सामायिक है भीतर का दृष्टा भाव केवल मैं जानने वाला और देखने वाला हो बस उसी भाव में आपका रमण   हो । ज्ञान और दर्शन को समझकर उसको आचरण में लाना ही चारित्र सामायिक है । आप सभी अपनी आत्मा का अहसास कर उसको अपने अनुभव में लाएं, आत्म-अनुभव करें । यदि आपने साधना शिविर में शुद्ध सामायिक का लाभ लिया होगा तो आपके जीवन में रुपान्तरण हुआ होगा जिन्होंने अभी तक लाभ नहीं लिया वो समय की मूल्यता पहचानकर लाभ उठाएं स्वयं अनुभव करें और जीवन में समता की धारा प्रवाहित करें ।

रक्षा-बंधन पर ले रक्षा का संकल्प

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

05 अगस्त, 2009: ऋषभ विहार, दिल्ली युग पुरुष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- आज का यह पावन दिवस रक्षाबंधन का दिवस है । रक्षा-बंधन का त्यौहार भारत की संस्कृति में एक विशेष महŸव रखता है । आध्यात्मिक और सामाजिक दृष्टि से भी इसका महत्व है । भारत ही एक ऐसा देश है जहां पर हर माह में दो या तीन पर्व आते हैं इसीलिए इसे पर्वों का देश भी कहा गया है । पर्व दो प्रकार के हैं बाहरी और भीतर के । रक्षाबंधन आदि पर्व बाहरी पर्व हैं तो पर्व पर्युषण सम्वत्सरी आदि भीतरी पर्व है । 

रक्षा-बंधन के त्यौहार पर तिलक लगाना, राखी बांधना या उपहार लेना यहाँ तक ही यह पर्व सीमित नहीं है इस पर्व का विशाल रुप है इसकी समग्रता भारत के इतिहासों के स्वर्ण पृष्ठ बन चुकी है । इतिहास में जिक्र आता है राजा पुरु की पत्नी ने सिकन्दर से यह वचन लिया था कि युद्ध में अगर मेरे पति हार जाएं तो आप उन्हें प्राण दण्ड नहीं दोगे । सिकन्दर ने इस वचन को निभाकर बहन की रक्षा की । मुगलकाल की भी एक घटना आती है राजस्थान में रानी कर्मावती पर बहादुरशाह जफर ने युद्ध के लिए कदम बढ़ाएं उस समय में रानी कर्मावती ने हुमायु को भाई बनाकर 21 रत्नों से जड़ी मखमल के कपड़े पर बनाई गई राखी को डब्बे में बंद कर पीपल के पŸो पर पत्र लिखकर भेजा कि मैं जानती हूँ मुगलों में रक्षा-बंधन पर्व नहीं मनाया जाता परन्तु भाई बहिन का पवित्र रिस्ता वहां पर भी स्वीकार है । मैं आज से अपको अपना भाई मानती हूं आप मेरी रक्षा करे हमारे राज्य पर बहादुरशाह जफर ने युद्ध के लिए कदम बढ़ाएं हैं । पत्र मिलते ही हुमायुं ने रानी कर्मावती को बहन रुप में स्वीकार कर अपनी सेना को उस ओर रवाना कर दिया । 

महाकवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने हिन्दु मुस्लिम एकता के लिए मुसलमान भाईयों को राखी बांधकर आपस में प्रेम प्यार से रहने की रीत बनाई । कहते हैं एक बार देव और दानव युद्ध में दानवों का पलड़ा भारी हो गया और देवता हारने लग गए तब इन्द्र भी अपने आपको निसहाय जानने लग गया ऐसी स्थिति में इन्द्राणी ने इन्द्र की कलाई पर राखी बांधकर विजय का आशीर्वाद प्रदान किया । ऐसे समय में दानव हार गए और देवताओं की विजय हुई । जरुरी नहीं कि बहिन भाई को राखी बांधे पत्नी भी पति को राखी बांधकर रक्षा कर सकती है । पुरुष के साथ नारी होती है तो जीत में अधिक यश प्राप्त होता है । 

पंडित मदन मोहन मालवीय ने रक्षा-बंधन का उपयोग बनारस विश्वविद्यालय बनाने हेतु किया, उन्होंने काशी नरेश को राखी भेजकर विश्व विद्यालय हेतु जमीन माँगी ऐसे अवसर पर कांशी नरेश ने धन व पन्द्रह गांव देकर रक्षा-बंधन का सम्मान बढ़ाया । ऐसी अनेकों घटनाएं इतिहास के स्वर्ण पृष्ठों पर अंकित है । आज का दिन बहुत पवित्र दिन है । वर्तमान में भारतवासी इस पवित्र त्यौहार की पवित्रता बनाए रखे । अपने जीवन में उज्ज्वलतम चारित्र का सृजन करें । रक्षा-बंधन के दिन गरीबों, असहायों की रक्षा कर इस त्यौहार को मनाएं । अपनी बहिनों से तो हर कोई राखी बंधवाएगा आज उनसे राखी बंधवाएं जिनका कोई भाई नहीं है या उनको राखी बांधे जिनकी कोई बहिन नहीं है । इस प्रकार इस पर्व की पवित्रता के साथ रक्षा का संकल्प लें ।

महान् फलदाता है नवकार महामंत्र

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

06 अगस्त, 2009: ऋषभ विहार, दिल्ली युग पुरुष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- जैन धर्म में महामंत्र नवकार सर्वोपरि, सर्वोच्च है । नवकार महामंत्र का सर्वोत्तम स्थान है । हरेक परम्परा में अपना-अपना एक मंत्र होता है । वह परम्परा उस मंत्र का आसरा लेकर समस्त कार्यों का श्रीगणेश करती है । इसी प्रकार जैन धर्म में नवकार महामंत्र को विशेष प्रतिष्ठा प्रदान की गई है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से यह मंत्र विलक्षण है, इसका अर्थ, इसकी ध्वनि इसके प्रभाव बहुत ही उŸाम है । यह ऐसा मंत्र है जिसमें किसी का नाम नहीं । इस मंत्र की शुरुआत ‘नमो’ से होती है जिसको नमन करना है उसको आप अंग-अंग में बसा लें । ‘नमो’ का मतलब ही यह है कि मैं उसको अपना सर्वस्व प्रदान करता हूँ । पुजारी और मन्दिर अलग-2 नहीं हो सकता । भक्त और भगवान अलग-2 नहीं हो सकता । मन्दिर से पुजारी की और भगवान से भक्त की महŸाा है । इसी प्रकार नमन से नमोक्कार महामंत्र की महत्ता है । इसके नौ पद है ।

जब आप ‘नमो अरिहंताणं’ कहते हैं तो इस भाव से कहें कि आप अरिहंत पद को प्राप्त हो जाएं । जाप से पूर्व आप अपने हृदय को टटोलो देखो क्या आपका हृदय स्वच्छ है । जब एक बहिन भोजन बनाती है तो जिसमें भोजन बनाना हो उस बर्तन की स्वच्छता पर उसका प्रथम ध्यान होता है । उसी प्रकार आप नवकार मंत्र पढ़े तो हृदय स्वच्छ होना चाहिए । हृदय स्वच्छ होगा तो वह मंत्र अधिक फल देगा । बरगद का छोटा सा बीज आपने देखा होगा उचित भूमि, खाद, पानी मिलने पर एक दिन वह वट-वृक्ष का रुप धारण कर लेता है । अगर हम उŸाम भावों से नमस्कार महामंत्र का स्मरण करेंगे तो क्या उसका हमें फल प्राप्त नहीं होगा । नवकार महामंत्र चैदह पूर्वों का सार है । इसमें समस्त ग्रन्थ, पंथ ग्यारह अंग बारह उपांग समा जाते हैं । जब आप अरिहंत बोलो तो आप अरिहंतों से जुड़ जाओ ऐसे सिमरन करो कि उनके हो जाओ फिर आपको अरिहंत परमात्मा श्री सीमंधर स्वामी भगवान याद आए । उनका समोवसरण उन्होंने जिन कषाय’-रुपी शत्रुओं को जीता उनको जीतने में आपका पुरुषार्थ हो । 

नमस्कार महामंत्र के नव पद और 68 अक्षरों पर कितनी ही सिद्धियां हुई है । यह मंत्र परम प्रभावशाली है । आवश्यकता है मंत्र को उस स्थिति तक जाकर मनन करने की । नवकार मंत्र पढ़ने से पूर्व भीतर मंगल का भाव हो । जैसा भाव होगा वैसा ही प्रभाव दिखाई देगा । इस भाव से पढ़ो कि अगला भव आपका महाविदेह क्षेत्र में हो और वहां से सर्वकर्म क्षय कर आप मुक्ति को प्राप्त करो। एक नवकार मंत्र भाव से पढने पर अनंत कर्म क्षय होते हैं । भावों का बड़ा महŸव है । रशिया और अमेरिका में यह प्रयोग हुआ है मंगलभाव से अगर आप एक पौधे को पानी देते हो तो वह पौधा शीघ्र ही फल फूलकर उŸाम फल प्रदान करता है और दुर्भावना से पानी दिया जाए तो बीज पल्लवित पुष्पित नहीं होते अगर हो भी जाए तो उनका विकास पूरी तरह नहीं हो पाता । फल फूल अच्छे नहीं लगते यह भावों का प्रभाव है । एक भाव का प्रभाव अगर फूल पर पड़ सकता है तो आपके अन्र्तमानस पर भावों का प्रभाव क्यों नहीं पड़ेगा । आप भीतर के मंगलभावों से नमस्कार महामंत्र का स्मरण करें तो अवश्य ही भीतर मंगल घटित होगा ।

आज चमत्कारी बाबा श्री प्रेमसुख जी महाराज का पुण्य स्मृति दिवस है । मैंने महाराजश्री के दर्शन किए हैं । बनारस नगरी में जन्म लेकर आपने जप तप सेवा के साथ जैन धर्म की ऊँचाईयों को पाया । आप फक्कड़ संत थे । अपने गुरु श्री भागमल जी महाराज की आपने बहुत सेवा की । आपके शिष्य रत्न उपाध्याय श्री रवीन्द्र मुनि जी महाराज, सलाहकार श्री रमणीक मुनि जी महाराज, उप प्रवर्Ÿाक श्री उपेन्द्र मुनि जी महाराज तीनों ही वर्तमान में श्रमण संघ के चहुमुखी विकास में अपना योगदान दे रहे हैं । आपके पुण्य स्मृति दिवस पर यही मंगल भावना करते हैं कि आप जहां पर भी आप बिराजमान हैं वहीं से अपनी शुभ दृष्टि संघ पर बनाए रखे और आपकी कृपा से श्रमण संघ दिनोंदिन उन्नति को प्राप्त हो ।

मंत्र छोटा पर प्रभाव बड़ा

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

07 अगस्त, 2009: ऋषभ विहार, दिल्ली युग पुरुष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- महामंत्र नवकार की साधना आराधना जाप की शुरुआत कैसे करें ? कोई भी कार्य करने से पूर्व हृदय के आंगन को मंगलभाव से भरना चाहिए । मंगल का भाव नहीं होगा तो मंत्र की गहराई नहीं होगी । मंत्र छोटा होता है परन्तु उसका प्रभाव बड़ा होता है । लोकमान्य तिलक ने कहा था स्वतंत्रता मेरा जन्म सिद्ध अधिकार है । सुभाष चन्द्र बोस ने कहा तुम मुझे खून दो मैं तुम्हे ंआजादी दूंगा । कार्लमाक्र्स ने दुनियां भर के मजदूरों को इकट्ठे होने की प्रेरणा दी । लाल बहादुर शास्त्री ने जय जवान जय किसान का नारा दिया । इन छोटे-2 वाक्यों का व्यापक प्रभाव भारत भर में दिखाई दिया । जब छोटे वाक्य प्रभावशाली हो सकते हैं तो मंत्र प्रभावशाली क्यों नहीं होगा । 

मंत्र शब्द से ही मंत्री बना है । हर राजा के एक मंत्री होता है और राजा मंत्री से सलाह लेता है । राजकाज में मंत्री की अहम् भूमिका होती है । मंत्री अभय कुमार और मंत्री चाणक्य का अधिक प्रभाव था । जब मंत्री का प्रभाव हो सकता है तो मंत्र का प्रभाव अवश्य होता है । जब आप मंत्रोच्चारण करते हो तो आपके चारों ओर मंगल का वातावरण निर्मित होता है । नमस्कार महामंत्र का शुद्ध भावों से जाप करने पर कई हजार वर्षों की नरक आयु का बंधन कट जाता है । नवकार मंत्र विपŸिा में सहायक है । इसमें तीनों लोकों के देवी-देवता चैसठ इन्द्र सभी शरणभूत होते हैं । 

नवकार मंत्र का जाप तीन प्रकार से किया जाता है । पहला है भाष्य जाप जिसमें उच्चारण सहित नमस्कार महामंत्र का पठन किया जाता है फिर है उपांशु जाप जिसमें भीतर उच्चारण चलता रहे परन्तु होठ बंद हो और तीसरा है मानस जाप जिसमें न होंठ चलते हो न बोलना पड़ता है भीतर की गहराई से जाप होता है । ऐसा जाप आपको शून्य अवस्था तक ले जाता है । महाकवि तुलसीदास ने रामचरित्र मानस की रचना की जिसमें राम चरित्र का वर्णन किया गया । राम चरित्र इतना शब्द काफी था फिर मानस शब्द क्यों जोड़ा गया इसका समाधान यही है मानस यानि हृदय की हर धड़कन में जो बस जाए । नवकार मंत्र हमारी रक्षा करता है हम इस मंत्र को शुद्ध हृदय के साथ उच्चारण करे तो हर आधि व्याधि उपाधि से बच सकते है ।

वर्तमान में स्वाइन फलू की चर्चा चल रही है । इस रोग को घातक रोग बताया जा रहा है और इसका अभी कोई उपाय भी नहीं है । यह रोग क्यों होता है ? इसके कारणों पर विचार किया जाए तो पता चलता है कि जो व्यक्ति मांसाहार का सेवन करते हैं उससे यह रोग फैलता है और यह संक्रामक रोग है । सम्पूर्ण भारत में इसके जांच केन्द्र भी बहुत कम हैं । वास्तव में हमने प्रकृति से छेड़छाड़ की । धर्म को छोड़ दिया । पाश्चात्य संस्कृति को ग्रहण किया इससे बीमारी फैल रही है । हम धर्म से अधर्म की ओर आ गए । भीतर की सहनशीलता या रोग प्रतिरोधात्मक क्षमता कम हो गई जिससे रोग शरीर पर हावी हो रहे हैं । शरीर का एक रोग आ जाए तो कितनी चिन्ता होती है । आत्मा पर कर्म रोग लगा हुआ है इसकी चिन्ता करो । ध्यान साधना कायोत्सर्ग द्वारा इसका इलाज कर लो और कर्म रोग से छुटकारा पा मुक्ति के परम पद पर अग्रसर हो जाओ ।

नमस्कार महामंत्र तुम्हारे हृदय के द्वार खोल देता है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

08 अगस्त, 2009: ऋषभ विहार, दिल्ली  युग पुरुष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- एक भक्त के हृदय में अपने आराध्य ईष्ट के प्रति एक भाव होता है वह हर श्वांस में उसका सिमरन करता है । उसका सिमरन भावों के साथ जुड़ा हुआ है । भाव का जीवन में बहुत बड़ा मूल्य है । आप कोई भी कार्य करो वो कार्य भाव से किया जाए तो उसमें अधिक सफलता मिलती है । भावयुक्त सामायिक में द्रव्य सामायिक से असंख्यात गुणा अधिक निर्जरा होती है । मंत्र का भावों के साथ गहरा संबंध है । जैसा भाव होगा मंत्र वैसे ही अपनी शक्ति दिखलाएगा । मंत्र आपके आभामण्डल को बदल देता है । 

हर श्वांस में अरिहंत की याद, सिद्ध का स्मरण, सत्गुरु का संग हो यह तभी होगा जब आपके भीतर गहर प्यास होगी । अभी तो हमारी प्यास संसार को पाने की है । धन दौलत ऐश्वर्य प्राप्त करने में दिन-रात जुटे हुए हैं । सोने, चांदी, हीरे, जवाहरात सब माटी है और माटी में ही मिल जाने हैं साथ जाएगा तो केवल धर्म जाएगा । धर्म हम ऐसे करे जैसे वो हमारे अंग-2 में बस जाए । धर्म अस्थी, मांस, मज्जा, रक्त के हर कण में आ जाए तभी व्यक्ति धार्मिक कहलाने का अधिकारी है । 

किसी अतिथि को घर बुलाना हो तो कितनी तैयारी करनी पड़ती है घर को सजाते हो, खाना बनाते हो हर प्रकार से आतिथ्य सत्कार की पूर्व तैयारी करने के बाद अतिथि को बुलाते हो जब परमात्मा को भीतर बुलाना हो तो कितनी तैयारी की आवश्यकता है । एक सामान्य अतिथि घर में आए तो आप जी-जान से जुट जाते हो परमात्मा को बुलाने के लिए पूरी तैयारी कर लो । हृदय को स्वच्छ बना लो और तन, मन से उसके आतिथ्य सत्कार में लग जाओ । नमस्कार महामंत्र परमात्मा को भीतर बुलाने का एक माध्यम है । प्रतिदिन प्रातःकाल उठते ही नमस्कार महामंत्र का स्मरण करना चाहिए फिर भोजन से पूर्व और सोने से पूर्व भी अवश्य नमस्कार महामंत्र का स्मरण करना चाहिए इससे आपके दोष दूर होते हैं और मंगल भावना भीतर प्रवाहित होती है ।

माता मरुदेवी को हाथी के होदे पर बैठे-2 केवलज्ञान हो गया । इलायची कुमार को रस्सी पर नाचते केवलज्ञान की प्राप्ति हुई इनमें भाव प्रमुख थे भावों की श्रेणी बढ़ी और केवलज्ञान मिल गया । तुम भी केवलज्ञान प्राप्ति का पुरुषार्थ करो अन्यथा काल की करालगति सब पर आने वाली  है । नवकार महामंत्र की एक माला तुम्हें असीम से अनंत की ओर ले जाती है । तुम भावपूर्वक माला जाप करके देखो तुम्हारा मंगल ही होगा । 

नवकार महामंत्र अमृत का कलश है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

09 अगस्त, 2009: ऋषभ विहार, दिल्ली  युग पुरुष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- धर्म सुनने से अच्छा लगता है परन्तु वह आचरण में आए तो उसकी अच्छाई और बढ़ जाती है । आपके समक्ष विष और अमृत का प्याला रखा जाए और आपको यह ज्ञात हो जाए कि यह विष का प्याला है और यह अमृत का प्याला तो आप विष को त्यागकर अमृत स्वीकार करेंगे । दूध और चूने के घोल में से दूध को स्वीकार करेंगे । इसी प्रकार एक संसार का मार्ग है और एक मोक्ष का मार्ग है । मनुष्य जानता है चिन्तन करता है पर विषयों से विरक्त नहीं होता । इसका मूल कारण क्या  है ? कभी इसका गहराई में जाकर चिन्तन करो । गुलाब का फूल कांटों में खिलता है फिर भी सुगंध देता है । कमल कीचड़ में खिलकर अपनी सौंदर्यता प्रदान करता है । चंदन के वृक्ष पर सदा सांप और नाग लिपटे रहते हैं ऐसी परिस्थिति में वो भी सुगंध प्रदान करता है, इसी प्रकार आत्मा में अनंत सुख, अनंत शांति है परन्तु बाहर में विषय विकार लगे हुए हैं । जब ये विषय विकार दूर हो जाएंगे, कर्म के ऊपर के आवरण हटेंगे तभी वो अनंत सुख, अनंत शांति प्रकट होगी ।

व्यक्ति जरा सा दुःख आ जाए तो लाखों रुपये लगा देता है । जीवन में विपदा आ जाए तो धर्म छोड़कर विपदा के निवारण में लग जाता है । भगवान की वाणी ये कहती है कि जो सुख दुःख दोनों में सिमरन करता है उसे कभी दुःख आ ही नहीं सकता । अरिहंत परमात्मा जिन्होंने अपना सब कुछ त्याग दिया उनसे हम फिर संसार मांगेंगे तो वो कैसे हमें संसार देंगे । हमारी एक ही प्रार्थना हो कि हे प्रभो ! मेरे हृदय में आपकी सुवास आ जाए । मेरी हर धड़कन में आपका माधुर्य हो । मेरे अन्तःकरण में आपके नाम का जप चले । आपका ज्ञान, आचरण, पवित्रता मेरे भीतर आए ऐसे भाव रखने से हम परमात्मा के उन समस्त गुणों को प्राप्त कर लेते हैं । नवकार मंत्र को केवल बोलना नहीं है या पाठ तक सीमित नहीं रखना उसे अपने जीवन का अंग-संग बना लो । नवकार महामंत्र आपके आचरण में आ जाए जिसे आप दिल से चाहते हैं जिससे आपका विशेष अनुराग है उसको आप याद करो यह आवश्यक नहीं क्योंकि जब भी उसकी याद आएगी, उसकी छवि आपके भीतर होगी । इसी प्रकार जब नवकार मंत्र भीतर की हर धड़कन में बस जाएगा तब माला पाठ की आवश्यकता नहीं रहेगी । 

नवकार महामंत्र अमृत का कलश है इसकी साधना करके अनेकों जीव अमरत्व को प्राप्त कर गए । जितनी श्रद्धा निष्ठा आप रखोगे उतने ही प्रभाव आपको दिखाई देंगे । रशिया की महिला नेरिया माईक्लोफ श्रद्धा से ध्यान साधना कर 6 फुट तक की वस्तुओं को हिला देती है । घड़ी को गतिमान कर देती है, सुई को आगे पीछे कर लेती है केवल श्रद्धा के द्वारा । श्रद्धा का बहुत बड़ा मूल्य है । श्रद्धा जीवन में आ जाए तो मान लो जीवन सद्राह पर लग जाएगा परन्तु वो श्रद्धा सच्ची श्रद्धा हो इसीलिए श्रद्धा को परम् दुर्लभ बताया गया है । हमारे भीतर साधना और आराधना के प्रति श्रद्धा हो तो चाहे आप एक नवकार महामंत्र पढ़ो, इतना भक्ति से पढ़ो कि आप उसमें डूब जाओ । श्री ज्ञाताधर्मकथांग सूत्र में एक उदाहरण आता है पुण्डरिक और कुण्डरिक का । पुण्डरिक ने संयम ग्रहण कर हजार वर्ष तपस्या की और किसी रोग के आ जाने के कारण वह संयम से गिरने लगा उसे भोग प्रिय हो गए ऐसे समय में पुण्डरिक के स्थान पर कुण्डरीक ने दीक्षा ली और पुण्डरीक राजसी भोग भोगने लगा कहते हैं जिसने हजार वर्ष का संयम पाला उसका तीन या सात दिन वह राजसी वैभव और भोगोपभोग कृषकाय शरीर के द्वारा भोग नहीं सका उसकी मृत्यु हुई और उसे सातवी नरक की यात्रा करनी पड़ी वही पर कुण्डरिक जिसने इतने वर्ष राजसी वैभव भोगे थे सात दिन का संयम पालकर ऊँचे देवलोक को प्राप्त किया और एक वर्ष के बाद वो सिद्ध बुद्ध मुक्त हो गए । कहने का तात्पर्य केवल इतना है कि जितनी श्रद्धा होगी उतनी मुक्ति करीब होगी । हम सभी श्रद्धा भावना से धर्म मार्ग पर आगे बढ़ें और अपने जीवन को धर्ममय बनाएं ।

कर्म क्षय का अचूक रामबाण है नमन

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

10 अगस्त, 2009: ऋषभ विहार, दिल्ली  युग पुरुष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि-  मानव की सांसे बही जा रही है । हृदय की धड़कन दीये की ज्योति से भी कम है । आपने दीपक को जलते हुए देखा होगा बाती प्रतिपल नई जलती है । पहली ज्योति बुझ जाती है और दूसरी प्रज्जवलित होती है सामान्य देखने पर तो ऐसा लगता है कि एक ही बाती जल रही है परन्तु ध्यान से देखने पर उपरोक्त अनुभव होता है ऐसे ही हमारा जीवन है प्रतिक्षण जन्म हो रहा है और प्रतिक्षण मृत्यु हो रही है सांस आता है तो जन्म और श्वांस जाता है तो मृत्यु । इसके भीतर जो अमर है वह है हमारा शुद्ध चैतन्य । इसको समझने के लिए अरिहंत शरण आवश्यक है । 

जीवन में आपने जो पाना है उसकी परम सत्ता की शरण में जाना आवश्यक है । नमन आधार है नमन मुक्ति का द्वार है । कर्मक्षय का अचूक रामबाण है नमन । कहना आसान है परन्तु झुकना कठिन है । हम भीतर के अहम् को गलाकर अर्हम् बन सकते हैं । आवश्यकता है भीतर का अहंकार विलीन हो जाए । कैसे उस अहंकार को विलीन करें । नमस्कार भीतर की गहराई से कैसे हो । हम नमन तो करते हैं परन्तु शारीरिक क्रियाएं करते हैं भाव उनके साथ जुड़ते नहीं इसी कारण कर्मों की श्रृंखलाएं टूटती नहीं । राजा श्रेणिक ने महाप्रभु महावीर के समवसरण में समस्त मुनिवृंदों के वंदन का भाव भीतर लाया और निर्जरा प्रारंभ कर ली । इतने कर्म-क्षय किए कि 6 नरकों के बंधन काट डाले और उच्च गति के बंधन में तीर्थंकर गौत्र का बंधन किया । 

महाकवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर परमात्मा को पाने के लिए जगह-2 भटके । वे स्वयं कहते हैं मैं तारों के पास गया तो तारे मुझसे दूर हो गए, चांद के पास गया तो वो भी दूर हो गया, सूरज के पास गया तो जैसा मैं आगे बढ़ता वो और दूर हो जाते । मेरी प्यास बढ़ती गई और परमात्मा बहुत दूर था । परमात्मा को पाने के लिए मैंने सुना था कि अपने को मिटाना पड़ेगा । जब ये विचार भीतर आया तो मुझे परमात्मा का द्वार दिखाई दिया । द्वार के साथ लगा हुआ सांकल दिखाई   दिया । अपने को मिटाना होगा यह सोचकर मैं द्वार तक जा पहुँचा । जैसे ही सांकल को हाथ लगाने लगा मन में भाव आया कि जब स्वयं को मिटा दूंगा तो भीतर क्या रह जाएगा और ऐसा सोचते-2 स्वयं को खाने का डर भीतर आ गया और वापस मैं नीचे आ गया । 

परमात्मा तभी मिलता है जब अपने को समाप्त करते हैं । अपने को शून्य कर लेते हैं तब अरिहंत परमात्मा प्रकट होते हैं । जब हमारा नमन होता है तो वह हमें ग्राहकता की ओर ले जाता है । अरिहंत जिनके समस्त शत्रु समाप्त हो गए जो प्रतिपल प्रतिक्षण आत्मा और शरीर की भिन्नता का अनुभव करते हैं उनको नमन करने का अर्थ यही है कि हम उन जैसे हो जाएं । उन जैसे होने के लिए स्वयं को मिटाना पड़ेगा । सिकन्दर जैसे विश्व विजंेता बनना चाहते थे । धन सम्पत्ति इकठ्ठी की परन्तु साथ कुछ नहीं ले जा पाए । हम अपने अहंकार को उस परम सत्ता के चरणों में विलीन कर दें तभी हमें परम सत्य का साक्षात्कार होगा और हमारा जीवन महाजीवन की ओर अग्रसर होगा । 

अरिहंत मोक्ष मार्ग का नेता है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

11 अगस्त, 2009: ऋषभ विहार, दिल्ली  युग पुरुष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- नमो अरिहंताणं कहते ही अरिहंत परमात्मा के श्रीचरणों में आपका भाव भरा नमन हो । अरिहंत शब्द कहते ही भीतर एक रोमांच आ जाए । नमस्कार महामंत्र आपके आभामण्डल को बदल देता है । नमो का एक अर्थ होता है निमंत्रण देना । जब आप नमो अरिहंताणं कहते हैं तो अरिहंत परमात्मा को भीतर आने का निमंत्रण देते हैं अरिहंत वो जिन्होंने स्वयं को जीत लिया । भगवान की वाणी यही कहती है कि करोड़ों को जीतने की अपेक्षा अपने को जीतो । एक व्यक्ति करोड़ों गायों का दान दे और एक आत्म विजय पाए तो उसमें सर्वश्रेष्ठ आत्मविजयी होगा । हमारी श्वासें आत्म-स्मरण में लगे । अरिहंत परमात्मा ने अपनी हर श्वांस को आत्म-अनुभव में लगा लिया जो दुःख सुख के स्वामी हैं जो आनंद और शांति के सागर हैं ऐसे अरिहंत परमात्मा के श्रीचरणों में हम नमन क्यों करते हैं । नमस्कार महामंत्र पढ़ने से क्या लाभ मिलता है आप कहेंगे आज तक बहुत मालाएं फेरी अभी परन्तु अभी तक कुछ नहीं हुआ ।

जो आत्म-विजेता है वो संसार विजेता स्वयं हो जाते हैं । जिन्होंने संसार को त्याग दिया उनसे हम संसार कैसे मांग सकते हैं । अरिहंत वो हैं जिन्होंने अपनी कर्म मैल को दूर कर लिया । अरिहंत परमात्मा हमारे मार्गदर्शक हैं सिद्ध भगवान तो वर्तमान में सिद्ध बुद्ध मुक्त हो गए । वर्तमान में स्वयं तिरने वाले और औरों को तारने वाले अरिहंत परमात्मा ही हैं । आपका चिŸा रुग्ण है मन उदास है तो आप स्वर लहरी के साथ नमस्कार महामंत्र का उच्चारण करें आपको बहुत हल्का लगेगा । जब आपको कुछ अच्छा ना लगे तब आप प्रार्थना कीर्तिन भक्ति में अरिहंत परमात्मा को अपने सामने पाएं । आपकी दृष्टि सम्यक् होगी तो नमन उन तक अवश्य पहुंचेगा ।

जो मोक्ष मार्ग के नेता हैं जिन्होंने पर्वतों के समान कर्म श्रृंखलाएं तोड़ डाली जो विश्व के समस्त तत्वों को जानते और देखते हैं ऐसे लब्धिमान गुणों से युक्त अरहिंत परमात्मा को मैं नमस्कार करता हूं । संसार में नेता तो कई हैं राजनेता हैं, फिल्म अभिनेता है, धर्मनेता हैं परन्तु मोक्षमार्ग के नेता तो अरिहंत ही हैं । उनका संबंध केवल मुक्ति का है । नेता जो आवाज देता है बाकी समस्त प्राणी उसी पथ पर आगे बढ़ते हैं । लोकमान्य तिलक, सुभाषचन्द्र बोस आदि स्वतंत्रता सैनानियों ने एक आवाज दी थी जिसके बल पर हमारा ये भारत देश आजाद हुआ । ऐसे अरिहंत परमात्मा जो अनंत गुणों के स्वामी हैं गुणों के सागर हैं उनको आप प्रतिदिन नमस्कार करें । नमन में अनंत शक्ति है जिन्होंने स्वयं को जीत लिया उनको नमस्कार करने पर हम भी स्वयं पर विजय पा सकेंगे । जिनका कुछ करना शेष ही नहीं रहा जो केवल ज्ञाताद्रष्टा भाव में रहते हैं उनको नमन करने से हमें भी ज्ञाताद्रष्टा भाव प्राप्त होगा । जिनमें अनंत करुणा, मैत्री समाई है उनको नमन करने से वो अनंत करुणा मैत्री हमारे भीतर प्रवाहित होगी । नमन हमारी संस्कृति है हम कभी भी अपनी संस्कृति को ना भूले ।

आत्म साधना धु्रव की साधना है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

12 अगस्त, 2009: ऋषभ विहार, दिल्ली  युग पुरुष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- अरिहंत परमात्मा तीनों लोकों को अपने ज्ञान से प्रकाशित कर रहे हैं जिन्होंने चार तीर्थ की स्थापना की है । तीर्थ वो जो स्व में रमण करें । जो धु्रव की साधना करें मेरे भीतर प्यास थी कि धु्रव की साधना कैसे मिले । भगवान महावीर कौनसी साधना करते थे उसी साधना को पाने के लिए डबल एम0ए0, पी0एच0डी0डी0 लिट् की । उत्तर भारत से दक्षिण भारत की यात्राएं की फिर प्रभु की अनंत कृपा से ये साधना मुझे प्राप्त हुई । ध्यान शिविर में उसी साधना को आप सबको दिया जाता है । यह साधना मोक्ष की चाबी है । जितना चाहो उतना पा लो । जिनकी रुचि धु्रव में है वो ही इस साधना को कर सकते हैं । धु्रव यानि आत्मा । तीनों लोकों का सुख एक तरफ और उससे भी अनंतगुणा सुख आत्मा में है श्वासें बहुत कम है समय थोड़ा है । इस समय को धर्म साधना और आराधना में लगा लो, जब धु्रव में रमण करोगे तो मैत्री झलकती है । 

हमारी आत्मा नर्तक है । जब कोई नृत्य करता है तो नृत्य और नर्तन साथ-2 होता  है । कवि और कविता अलग हो सकती है चित्र और चित्रकार अलग हो सकते हैं मूर्ति और मूर्तिकार अलग होते हैं परन्तु नृत्य और नर्तन तो एक साथ ही होता है । भक्ति के भाव आ जाए तो नाच लेना जैसे मीरा नाची थी कृष्ण की याद में । उसने राजघराने की लाज को छोड़ दिया था । लोगस्स के पाठ में कीर्तन शब्द आता है, यह कीर्तन शब्द नर्तन, वंदन, महिमा का समानार्थक है । जब भक्ति अन्तर से फूटती है तो कीर्तन स्वयं हो जाता है । अरिहंत परमात्मा सर्वशक्तिमान है उन्होंने हमें भेद-विज्ञान का मार्ग दिया । मोक्ष का सीधा मार्ग दिया । हम इस मार्ग पर चलते हुए गहराई से आत्मानुभव करें और सेवा और साधना के द्वारा आगे बढ़ें ।

कल समाचार मिले कि उपप्रवर्तिनी संयम सुमेरु महासाध्वी श्री सावित्री जी महाराज इस नश्वर देह को त्यागकर देवलोकगामी हो गई । वो महासाध्वी श्री चंदा जी महाराज की वाटिका का एक फूल थी जिसने अपने सम्पूर्ण जीवन में संयम की समस्त मर्यादाओं का पालन किया । साधना आराधना में कभी भी प्रमाद नहीं किया । जीवन के अन्तिम क्षण तक स्वाध्याय, धर्माराधना में हमेशा आगे रही । जीवन में अनेक उपसर्ग आए परन्तु वीरों की भांति संयम मार्ग में आगे बढ़ी ऐसी महान्साध्वी आज हम सबके बीच नहीं रही उनकी आत्मा जहां पर भी है उनके लिए मंगल कामना करते हैं । उनके अधूरे कार्यों को पूर्ण करना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजली होगी । 

संसार की नकल से होता है कर्मबंधन

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

13 अगस्त, 2009: ऋषभ विहार, दिल्ली  युग पुरुष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- सत्संग, प्रार्थना, सामायिक, आराधना, स्वाध्याय का केवल इतना ही अर्थ है कि हम क्या है ? क्या कर रहे हैं ? एक प्रश्न भीतर से उठे कि मैं कौन हूँ । मैं जो कर रहा हूँ क्या ठीक कर रहा हूँ । माँ बच्चे पर क्रोध करती हैं, गुरु शिष्य पर क्रोध करता है यह अज्ञान माया, मोह जो कुछ भी तुम कर रहे हो वह गलत है । भीतर अज्ञान है और बाहर से धर्म करते हो यह तो ऐसे बात हो गई जैसे भीतर गंदगी है और बाहर सोने चांदी का वर्क चढ़ा दिया । संसार की नकल करके कर्म-बंधन करोगे । भोजन, मकान, कपड़े, सौंदर्य विभूषा जो कुछ बाजार में नया आता है वो तुम्हें लेने की इच्छा होती है और इसी इच्छा के स्वरुप तुम कर्म-बंधन करते चले जाते हो । इस संसार में केवल कर्म का ही बंधन है क्योंकि वहाँ ऋजुता, सरलता नहीं है और ना ही मन, वचन, काया की एकता  है । हम एकरुपता में जीएं । 

अरिहंत मन, वचन, काया से एकरुपता में जीते हैं तभी तो नमस्कार महामंत्र के प्रथम पद पर पूजे जाते हैं । जब भी नमस्कार मंत्र पढ़ो भीतर से तल्लीन होकर पढ़ो । ऐसा करने से एक आभा-मण्डल निर्मित होता है फिर तुम पाप कर ही नहीं सकते । जिसको पाना हो उसकी धारणा कर लो । जब धारणा हो जाएगी तो वैसा ही ध्यान होगा और ध्यान से ही समाधि आएगी । जैसी दृष्टि होगी सृष्टि वैसी ही लगेगी । तुम उदास हो तो संसार उदासीन लगेगा । तुम रोमांचित हर्षित हो तो सारा संसार हर्षित रोमांचित लगेगा । नर्तक और नृत्य की दृष्टि ही संसार है । जैसे नर्तक और नृत्य अलग नहीं हो सकते वैसे संसार और कर्म बंधन अलग नहीं हो सकते । काॅलेज में कुछ प्रोफेसर दोपहर की छुट्टी के समय में अपने टिफिन खोलकर खाना खा रहे थे । एक ने अपना टिफिन खोला और बोला फिर वही खाना ऐसा एक नहीं कई दिनों तक हुआ तो साथियों ने कहा- भाई घर में समाचार दे दिया करो जो खाना हो वो ही मिल जाया करेगा तो प्रोफेसर ने कहा- खाना बनाने वाला कोई और नहीं मैं ही हूँ । इस प्रकार हम अपने लिए ही आंसू बहाए जा रहे हैं । 

जो आंसू अपने लिए बहाते हैं फिर चाहे वो बीमारी, चोरी, नुकसान या बेटे के लिए बहे वो कर्म-बंधन के कारण हैं और दूसरे के लिए बहे हुए आंसू कर्म-निर्जरा करते हैं जैसे शबरी रोई थी राम के लिए, द्रौपदी रोई थी कृष्ण के लिए, चंदना रोई थी महावीर के लिए । तुम्हारा दिया हुआ धन, दान तुम्हारी पूंजी है । भगवान कहते हैं अकेले खाना पापी का लक्षण है और बांटकर खाना पुण्यवान का लक्षण है । जैसा मिले उसमें संतोष कर लो । अहंकार का भाव छोड़ दो । भीतर महामंत्र नवकार का स्मरण कर लो । महामंत्र नमोक्कार का जाप स्वास्थ्य लाभ के लिए भी अच्छा  है । नींद ना आती हो तो नाभी पर ध्यान केन्द्रित करके नमस्कार महामंत्र का जाप करें इससे तुम शीघ्र ही नींद में चले जाओगे और पूरा विश्राम हो जाएगा । 

जन्माष्टमी पर गौरक्षा का संकल्प लें

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

14 अगस्त, 2009: ऋषभ विहार, दिल्ली युग पुरुष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- जन्माष्टमी का पावन दिवस आज हमें वासुदेव श्रीकृष्ण की याद दिला रहा है । रामनवमी आती है राम की याद आती है । दशमी तिथि आते ही विजयादशमी याद आती है । तृतीया हमें भगवान ऋषभदेव के पारणा महोतसव अक्षय तृतीया की याद दिलाती है और दीपावली प्रभु महावीर के निर्वाण की हमें याद दिलाती है । महापुरुषों के नाम के साथ ये तिथियां भी अमर हो गई । 

कृष्ण का जन्म कैसे हुआ बचपन, जवानी और अन्तिम अवस्था में उन्होंने जीवन को आनंद और उल्लास से जीया । कारागार में जन्म हुआ, गोकुल में पले कभी माखनचोर कहलाए तो कभी गोपियों के प्रेमी कहलाए । कभी राजनीतिज्ञ बने तो कभी शांति रक्षक बने । ऐसा बालक जिसके जन्म से पहले ही मौत का वारंट निकल चुका था देवकी के कारागार में पहले ही यह घोषणा हो चुकी थी कि जैसे ही पुत्र का जन्म होगा उसे कंस के हवाले कर दिया जाए । अमावस की काली रात में वो देवकी का दीपक बनकर आए । कहते हैं उनके जन्म लेते ही कारागार के ताले स्वयं टूट गए, पहरेदार सो गए और उन्हें रातोंरात गोकुल पहुंचाया गया । ऐसा बच्चा जिसे मां का प्यार और दुलार भी नहीं मिल पाया- जाकों राखें साईयां मार सके ना कोई । गौकुल में नंद और यशोदा के घर बाल लीलाएं की । सांदिपनी के आश्रम में शिक्षा प्राप्त की । कंस का घातकर सबको अभय दिलाया । उनका व्यक्तितत्व बहुआयामी है । कभी मुरली के साथ गाते हुए नजर आते हैं तो कभी काम्बली ओढ़े गायों को चराते नजर आते हैं । कृष्ण ने स्वयं कहा कि मेरे आगे गाय हो, पीछे गाय हो, अगल और बगल में गाय हो बस मैं गायों के बीच रहूं ।  

प्रेम भक्ति के रुप में राधा और मीरां का प्रसंग हमारे समक्ष आता है । कृष्ण कहते हैं ये प्रेम वासना से भरा नहीं । आत्म परमात्म मिलन का प्रेम है । पूर्णमासी के चन्द्रमा के साथ रासलीला करते हैं तो कभी गोवर्धन की रक्षा हेतु उसी की पूजा की जाती है । गीता के अठारह अध्याय आत्म-ज्ञान से भरे हुए हैं उन्होंने कहा- अपनी आत्मा का अपनी आत्मा से उद्धार करो । आत्मा अजर अमर अविनाशी है । कृष्ण ने अर्जुन को कुरुक्षेत्र में गीता का उपदेश दिया । प्रमाद छोड़कर धर्म की ओर पुरुषार्थ करने का संदेश दिया । गुरुकुल में पढ़ने के समय सुदामा से मित्रता की और जीवनभर उसके सच्चे मित्र बनकर रहे । जब सुदामा उनसे मिलने द्वारका आया तो कहते हैं उस फटे हाल व्यक्ति को स्वयं गले लगाया, आंसुओं से पांव धोए और बदले में सब कुछ दे दिया । युधिष्ठिर के राजसुययज्ञ में आने वाले अतिथियों के स्वयं पांव धोए । उनका समग्र जीवन ज्ञान भक्ति और कर्म का संयोग है । आज उनके जन्म अष्टमी के अवसर पर हम सभी गौ-रक्षा का संकल्प लें और जीव दया में आगे बढ़ें ।

आत्मा को कर्ममुक्त करना सच्ची आजादी है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

15 अगस्त, 2009: ऋषभ विहार, दिल्ली युग पुरुष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- आज पन्द्रह अगस्त का दिवस भारत का स्वतंत्रता दिवस है । भारत स्वतंत्रता की 63 वीं वर्षगाठ मना रहा है । सदियों बाद भारत को स्वतंत्रता मिली उसमें बहुत कुछ खोना पड़ा । अनेकों घर बर्बाद हुए । किसी के माता पिता नहीं रहे तो किसी की संतान चली गई। अनेकों के सुहाग उजड़ गए । इस भारत देश को स्वतंत्रता दिलाने में सुभाषचन्द्र बोस, महात्मा गांधी, बालगंगाधर तिलक, लाल बहादुर शास्त्री आदि अनेक स्वतंत्रता सेनानियों का हाथ है । हजारों के बलिदान पर हमारा भारतदेश आजाद हुआ । 

युनान का एक सौदागर भारत आया । जंगल में पेड़ के नीचे विश्राम कर रहा था उस पेड़ पर एक तोता बैठा हुआ था उसे वह तोता बहुत अच्छा लगा । उसने जाल बिछाया दाना डाला और तोते को पिंजरे में कैद करके युनान ले गया । संयोग की बात उस सोदागर को वापस भारत आना था तो उसने पिंजरे में कैद तोते से पूछा कि मैं भारत जा रहा हूं कुछ संदेशा देना है तो दे दो तो तोते ने कहा जिस पेड़ पर तुमने मुझे देखा था उसी पेड़ पर मेरा एक दोस्त रहता है उसे संदेश देना कि उसका दोस्त युनान में तुम्हारे घर रह रहा है और तुम्हें याद करता है । जब सौदागर भारत आया तो उसने उस तोते के दोस्त को तोते का पैगाम दिया । पैगाम सुनने की देर थी कि दोस्त तोता बेहोश होकर गिर गया । वो सौदागर वापस युनान आया और उस तोते को सारा हाल सुनाया । जैसे ही तोते ने दोस्त तोते की हालत सुनी तो वो स्वयं भी बेहोश होकर गिर गया । युनान का सौदागर कुछ समझ ना पाया एक का दोस्त अपनी जान कुर्बान कर रहा है । शाम का समय था तो सौदागर ने पिंजरे का दरवाजा खोल दिया और सोचा कि इस तोते का अंतिम संस्कार प्रातःकाल ही करुंगा । रात्रि में घटना घटी वो तोता होश में आकर पिंजरे से बाहर उड़ गया । प्रातःकाल सौदागर देखता है कि तोता नहीं है इतने में तोते की आवाज आई कि सौदागर जो सुख स्वतंत्रता में है वो बंधन में नहीं मेरे दोस्त ने मेरे लिए वो एक उपाय भेजा था जिस उपाय को लेकर तुम आए हो ओर उसी उपाय से मैने बेहोश होकर आजादी पाई । स्वतंत्रता में कितना सुख होता है यह आज मुझे पता चल रहा है ।

भारत ने भी ऐसे ही आजादी पाई । यहां पर कभी मुसलमानों ने लूट की तो कभी अंग्रेज ने हमारा बहुत सा धन, पैसा लेकर वो अपने-अपने देश में चले गए परन्तु आज भी भारत देश समृद्ध है । भारत संत धरा है । जहाँ पर अनेकों संत विचरण करते हैं भारत देश हमारी मातृभूमि है जहां पर ब्रह्म सत्यं जगत मिथ्या’’ और सत्यं वद धर्म चर जैसे उपदेश दिए जाते थे इस धर्म से ओतप्रोत देश को संविधान में धर्म निपरेक्ष कह दिया यह हमारी सबसे बड़ी भूल है । कहना तो चाहिए था सम्प्रदाय निरपेक्ष परन्तु कह दिया धर्मनिरपेक्ष वर्तमान में सम्प्रदायवादी अपने-2 सप्रदाय में भारत देश की जनता पर अपनी-2 छाप छोड़ना चाहते हैं इसीलिए आज मैं यह कहता हूं कि हमारा भारतदेश सम्प्रदाय निपरेक्ष हो । जिस भारत को सोने की चिड़िया कहा जाता है और जिसे आजादी मिली क्या वो आजादी हमें मिल पाई है । क्या आज मेरी मन, वचन, काया, नौकर और आत्मा मालिक है क्या मैं आत्मा आजाद हूं ये प्रश्न चिन्तनीय है । आज जागने का दिन है । क्या हम मन और इन्द्रियों के गुलाम नहीं हो गए अगर आत्मा को कर्म की बेड़ियों से आजाद नहीं किया तो संसार चक्र में हम उलझते ही रहेंगे । एक बार आत्म धर्म में आ जाओ और कर्म की बेड़ियों से मुकत हो जाओ यही सच्ची स्वतंत्रता है । स्वतंत्र होने का सच्चा मार्ग आत्म-ध्यान है । 

धर्म की ओर संक्रमण करें

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

16 अगस्त, 2009: ऋषभ विहार, दिल्ली  युग पुरुष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- अनंत उपकारी करुणा के सागर अरिहंत परमात्मा श्री सीमंधर स्वामी की कृपा हम सब पर बरस रही है । वो तिर गए एवं औरों को तार रहे हैं । उनकी अनंत कृपा से ही हम सभी साधना के मार्ग पर आगे बढ़ रहे हैं । आज चार दिवसीय साधना शिविर का समापन दिवस है उन सभी साधकों से पूछो कितना आनंद उन्होंने इस साधना शिविर में पाया है । आत्मा के अष्टगुणों का अनुभव उन्हें प्राप्त हुआ है । आत्मा में अनंत ज्ञान है अनंतदर्शन अनंत-सुख अनंतशांति है । उसी का अनुभव करने के लिए साधक दूर-दूर से साधना शिविर में आए । ये सभी धन्यवाद के पात्र हैं । 

आज हम महान्साध्वी श्री पवन कुमारी जी महाराज का पंचम पुण्य स्मृति दिवस मना रहे हैं आपका जीवन बहुआयामी था कठोरता और कोमलता का संगम था । आपने अपनी अन्य दो बहिनों के साथ दीक्षित होकर जिनधर्म की उंचाईयों को छुआ । आप अनुशासनप्रिय थे और समाज सुधार में विशेष विश्वास रखते थे । आठ वर्ष पूर्व दिल्ली चातुर्मास में आपसे मिलन हुआ । आपका स्नेह वात्सल्य कभी भूल नहीं पाता । आपने देश के भविष्य के निर्माण के लिए दो स्कूलों का भी निर्माण किया जहां पर धार्मिक, नैतिक संस्कार की शिक्षा दी जाती है । आपका जीवन एक ऐतिहासिक दस्तावेज है । जीवन के अन्तिम समय में कैंसर की पीड़ा होने पर भी शांति के साथ उस पीड़ा को सहन किया और समाधिपूर्वक देह त्यागकर देवलोक में जा बिराजे । आपने अपने शिष्य परिवार में महासाध्वी तपस्विनी श्री प्रमिला जी महाराज, महासाध्वी श्री जितेन्द्रा जी महाराज, महासाध्वी श्री सूर्या जी महाराज जैसे अनेक सुमन प्रदान किए । 

आज संक्रांति का भी पावन अवसर है । आज भाद्रपद का महिना, सिंह की संक्रांति, भादो कृष्णा दशमी, मृगशिरा नक्षत्र, रविवार का दिवस और 15 मुहूर्ति संक्रांति है । आप सभी संसार से धर्म की ओर संक्रमण करं और मुक्ति के पथ पर अग्रसर हो । संक्रांति के इस पावन अवसर पर जीवदया करें और अरिहंत परमात्मा की शरण ग्रहण कर उनसा होने का संकल्प करें । कल से पर्युषण प्रारंभ होने जा रहे हैं आप सभी तप जप आराधना साधना का संकल्प लें । प्रतिदिन आप कल्पसूत्र, अन्तकृतदशांग सूत्र सुनेंगे साथ ही प्रतिक्रमण करें और साधना आराधना में कर्म-निर्जरा कर मुक्ति-मार्ग की ओर आगे बढ़ें ।

आत्म दीवाली का पर्व है पर्युषण

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

17 अगस्त, 2009: ऋषभ विहार, दिल्ली  युग पुरुष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- महापर्व पर्युषण का प्रथम दिवस आपके लिए मंगलकारी हो । आपकी हर श्वांस में आत्म परमात्म मिलन हो । संसार के संबंध छूटे और मुक्ति की ओर अग्रसर हों यही हार्दिक मंगल कामना । भरत क्षेत्र में रहते हुए भी हमारा लक्ष्य सिद्धालय का है जैसे जिस घर में आप रहते हैं उस घर पर आपका अधिकार होता है फिर चाहे आप रात्रि में ही उस घर में आए तब भी उस अधिकार से ही घर में प्रवेश होता है उसी प्रकार सिद्धालय हमारा अधिकार है । ये जीवन असंस्कृत है पता नहीं कब सांसों का धागा टूट जाए । कब जीवन का कपड़ा फट जाए तो जोड़ना पड़ता है । शरीर पर रोग आए तो उसे ठीक करने के लिए दवाई देनी पड़ती है परन्तु आत्मा पर तो अनंत कर्मों की मैल लगी हुई है इस पर्याधिराज पर्युषण में इस मैल को धो डालो । विश्व मंगल की कामना का यह पर्व है । ये दिन हमारी आत्म-शुद्धि के दिन हैं इन दिनों में हम अपना लक्ष्य तय करें ।

जीवन में सत्य का चुनाव करें ये पर्व आत्म दीवाली का पर्व है जिसमें तप त्याग क ेदीपक सजाकर आत्म-रोशनी से जीवन को जगमगाना है । इस पर्व में एक चुनाव कर लेना कि आपको कौनसी राह चाहिए सत्य की या असत्य की आंसू चाहिए या आनंद चाहिए । धूल चाहिए या अमृत चाहिए । मृत्यु चाहिए या परम् निर्वाण चाहिए, आधि व्याधि उपाधि चाहिए या सुख शांति समृद्धि चाहिए । स्वयं जागो और सबको जगाओ इतना पुरुषार्थ करो कि चार घनघाती कर्म क्षय हो जाए । चार क्षय ना कर सको तो एक मोहनीय कर्म को ही क्षय कर लो तुम निश्चित मोक्ष जाओगे परन्तु इतनी प्यास होनी आवश्यक है उस प्यास के साथ पुरुषार्थ हो । 

प्रतिदिन सूत्र श्रवण करो उसकी गहराई में प्रवेश करो हम महावीर के अनुयायी है उनके शासन में हमारा जन्म हुआ है । महापर्व पर्युषण पर हम उनकी ध्यान साधना जप तप को अपनाएं जिनवाणी पर श्रद्धा करें । वीर प्रभु की वाणी एक रणभेरी है उसे सुनकर अन्तर्मन को रोमांचित कर लो आत्म परीक्षण करो । एक बार तीन मकोड़ों को बहुत भूख लगी और भोजन की तलाश में निकल पड़े । चलते-2 एक नीम के पेड़ के पास पहुंचे । पहला मकोड़ा बहुत थक गया था इसलिए नीचे तने में ही भोजन ढूंढने लगा उसे भोजन तो नहीं मिल पाया परन्तु दांत टूट गए और पेट नहीं भर पाया । दूसरा मकोड़ा टहनी तक गया और पत्तों को खाने लगा परन्तु पŸो कड़वे लगे और थूंक दिया तीसरा मकोड़ नींम की पकी हुई निम्बोली तक पहुंच गया उसमें मीठा रस था और उसका रसास्वादन कर उसने अपनी तृप्ति की । जब तीनों वापस मिले तो पहला बड़ा निराश था दूसरा दुःखी था और तीसरा प्रसन्न था । तीसरा इसलिए प्रसन्न था क्योंकि उसने पूरा पुरुषार्थ किया । हम भी पूर्ण पुरुषार्थ करें और उस धर्म की मिठास को अपने जीवन में घोल ले । 

आज प्रातःकाल विश्व शांति एवं मंगल की कामना हेतु अष्टदिवसीय महामंत्र नवकार का अखण्ड पाठ प्रारंभ हुआ । दोपहर में कल्पसूत्र की वांचना होगी । दान, शील, तप, भावना की आराधना के साथ प्रतिक्रमण, संवर, उपवास, पौषध आदि करे कर्म-निर्जरा की ओर अग्रसर हों । 

आत्म-शुद्धि का पर्व पर्युषण

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

18 अगस्त, 2009: ऋषभ विहार, दिल्ली  युग पुरुष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- महापर्व पर्युषण का दूसरा दिवस आप सबके लिए मंगलकारी हो । आपके भीतर ज्ञान दर्शन की ज्योति  जगे । ज्ञान वो नहीं जो किसी स्कूल या किसी विश्वविद्यालय में मिलता है या किसी गुरु से प्राप्त किया जाता है ज्ञान वो जो तुम आत्मा में है पर्युषण पर्व उस ज्ञान में डूबने का अवसर है । पर्युषण शब्द का अर्थ यही है कि हम आत्मा के चारों ओर लगी कर्म ग्रन्थियों को तप त्याग की अग्नि में जलाकर आत्मा को कुन्दन बनाएं । हर श्वांस में आत्मा परमात्मा का मिलन हो, कर्म-निर्जरा हो यह तभी होगा जब हम प्रभु महावीर की साधना में श्रद्धा से आगे बढ़ेंगे ।

श्रद्धा परम् दुर्लभ है । तत्व के अर्थ में श्रद्धा जब होती है तब सम्यक् दर्शन प्रकट होता है, अब प्रश्न उपस्थित होता है कि तत्व क्या है तो भगवान फरमाते हैं तत्व एक ही है आत्मा और परमात्मा बाकी सब झूठ है, धारणा परम्परा संस्कार सब मिथ्या है । साथ जाएगी तो यह श्रद्धा साथ जाएगी । आत्म-ज्ञान साथ जाएगा । आप देखो बचपन में बच्चे की मैमोरी तेज होती है और बुढ़ापे में ज्ञान भूल जाता है आत्मज्ञान भुलाने वाली चीज नहीं   है । सिद्धालय मेरा अधिकार है । मैं अनंतज्ञान, अनंतदर्शन, सुख, शक्ति, क्षायिक सम्यक्त्व आदि गुणों से भरपूर हूं । यह मानव का जीवन हमें मिला पांच इन्द्रियां मिली उत्तम कुल मिला इस जीवन में कर्म-निर्जरा कर लो । देह की आसक्ति को हटाओ । कामना, वासना, धारणा की आहुति दे दो । गुरुओं को बाद में याद करना पहले अरिहंतों को नमन करो । सिद्ध बनने की ललक भीतर रखो और गुरु उसे मानना जो उनसा बनाने का मार्ग दिखाये ।

भगवान महावीर का सूत्र है व्यक्ति ज्ञान से जानता है, दर्शन से श्रद्धा करता है चारित्र से उसे ग्रहण करता है और तप से परिशुद्ध करता है । ज्ञान तो कम्प्यूटर के पास भी है परन्तु वो श्रद्धा नहीं कर सकता, वो ग्रहण नहीं कर सकता । ज्ञान बुद्धि का नहीं ज्ञान भीतर का, सहजज्ञान जिसके लिए अधिक पुरुषार्थ करने की आवश्यकता नहीं । सहजो कवि कहते हैं:-

 आया जगत में क्या किया, तन पाला की पेट ।

 सहजो दिन धंधे गया, रैन गई सुख लेय ।। 

दिन तो धंधे में बिता दिया और रात्री सोने में व्यतीत कर दी । जगत मंें आकर क्या किया ? केवल पेट की ही पूर्ति की उसी का भरण-पोषण किया । शरीर को केवल चार रोटी और एक लंगोटी की आवश्यकता है और उसके लिए हम कितना कुछ करते हैं । अगर हम शरीर की परवाह ना करते हुए इतना समय आत्मा को दे तो कल्याण निश्चित होगा । आत्म-ज्ञानी बनना कठिन है । श्रद्धा और ज्ञान मिल गया तो सब मिल गया अगर ये ना मिला तो फिर सारे संसार की दौलत मिल जाए तो उसका कोई अस्तित्व नहीं है । जीवन श्रद्धा से शुरु होता है तुम 33 करोड़ देवी-देवताओं पर श्रद्धा कर लो और स्वयं पर श्रद्धा ना करो तो फिर वो श्रद्धा श्रद्धा नहीं    कहलाएगी । कबीर कहते हैं- नैनन में प्रीतम बसे, निद्रा को नहीं  ठौर । आठ पहर चैसठ घड़ी मेरे कोऊ न   ओर । परमात्मा मेरे आखों में रहता है और मुझे निद्रा नहीं  आती । आठ पहर चैसठ घड़ी में उनका ही स्रण करता हूं इसलिए संसार का कोई भी संबंध मेरा नहीं  । दादू भी यही कहते हैं काहे को दुःख दीजिए, घट-घट आत्म राम । दादू सब संतोसिए है ये साधु का काम । साधु का काम यही है कि हम घट-2 में बसने वाले परमात्मा का साक्षात्कार करें संतोष भावना जीवन में लाए । आत्मा के प्रति श्रद्धा रखे । जिसका वर्ण नहीं गंध नहीं रस नहीं, स्पर्श नहीं पर फिर भी वो है उसी के प्रति श्रद्धा ही सच्ची श्रद्धा है । माली बीज बोता है तो श्रद्धा से ही वृक्ष का रुप धारण करता है । प्यास लगती है तो पानी मिलता है । भूख लगती है तो भोजन मिलता है इसी प्रकार आत्मा परमात्मा पर श्रद्धा होगी तो ही सिद्धालय मिलेगा । विचार और आचरण एक ही यात्रा के दीपक है विचार पहला कदम है और आचरण अन्तिम कदम है अगर विचार ही नहीं होता तो आचरण कैसे होगा । आत्म दर्शन का विचार उत्पन्न करो और फिर उसी आचरण पर आगे बढ़ जाओ । जिसे नहीं देखा उस पर श्रद्धा करो और उसी के आचरण में आगे बढ़ों । पर्युषण के पावन दिनों में हम सभी प्रतिष्ठान बंद रखे । रात्रि भोजन का त्याग करें । हरि सब्जी का त्याग करे सात दिन धर्माराधना करें । प्रातःकाल अंतकृतदशांग सूत्र का श्रवण करें, शाम को 3.00 से   4.00 बजे तक कल्पसूत्र का श्रवण करें । नमस्कार महामंत्र के अखण्ड पाठ में भी अपना योगदान दें । सूर्यास्त के साथ प्रतिक्रमण करें और कर्म-निर्जरा के मार्ग पर अग्रसर हो । 

 पर्वाधिराज पर्युषण के पावन दिनों में प्रातः अंतकृतदशांग सूत्र का वांचन 8.00 से 9.00 बजे तक युवा मनीषी श्री शुभम् मुनि जी महाराज के द्वारा हो रहा है और सायंकाल 3.00 से 4.00 बजे तक कल्पसूत्र का वांचन उप प्रवर्तिनी महासाध्वी डाॅ0 सरिता जी महाराज कर रहे हैं । सूर्यास्त के साथ प्रतिक्रमण भाई बहिनों का अलग-2 हो रहा है । विश्व शांति हेतु महामंत्र नवकार का अखण्ड पाठ चल रहा है आप सभी धर्म कार्यों में लाभ लेकर जिनशासन की प्रभावना करें । प्रतिदिन प्रवचन के बाद धर्मप्रिय सुश्रावकों के द्वारा प्रभावना भी बांटी जा रही है ।

 जिन धर्म पर हमारी अगाध श्रद्धा हो

 जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

19 अगस्त, 2009: ऋषभ विहार, दिल्ली  युग पुरुष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- महापर्व पर्युषण का तीसरा दिवस आप सबके लिए मंगलकारी हो । जीवन में धर्म की गंगा बहे, तप की ज्योति जले, आप सत्य के मार्ग पर अग्रसर हो यह अचूक अवसर है । आप सभी अंतकृतदशांग सूत्र में वर्णित 90 आत्माओं का वर्णन श्री शुभम् मुनि जी महाराज से श्रवण कर रहे हैं । यह वर्णन सुनकर आपका मन धर्म की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित हो । अधिक से अधिक तपस्या करें । कम से कम एक घर में अठाई तप अवश्य हो । जिसकी जैसी क्षमता है वैसा तप करें । तपस्या नहीं कर सकते तो सामायिक, प्रतिक्रमण करें । रात्रि भोजन का त्याग, कंदमूल का त्याग करें ये समस्त व्रत प्रत्याख्यान साधना अपने लिए है किसी दूसरे के लिए नहीं । तपस्या आप करो और मेरा नाम हो ऐसा मैं नहीं चाहता क्योंकि भगवान की वाणी है गुरु की करणी गुरु के साथ जाएगी और शिष्य की करणी शिष्य के साथ । इतना कुछ करते हुए आपके मन में धर्म की प्रति अगाध श्रद्धा हो । 

आचार्य श्री धर्मदास जी महाराज एक नगर में चातुमासार्थ बिराज रहे थे । प्रतिदिन श्रद्धालु प्रवचन सुनने आते थे एक श्रावक प्रायः पहले आकर सामायिक लेकर प्रवचन सुना करता था एक दिन वो प्रवचन में देर से आया और पीछे ही सामायिक में बैठ गया । प्रवचन सभा सम्पन्न होने के बाद आचार्यश्रीजी ने उससे पूछा भाई आज देरी से आए तो श्रावक ने कहा महाराज घर में मेहमान आया था उसे विदा करने में देर हो गई । साथी श्रावक ने पूछ लिया कि कौन मेहमान था तो वो श्रावक कहने लगा- कल रात्रि में मेरे बड़े बेटे का देहान्त हो गया । प्रातःकाल उसका क्रिया कर्म करने में समय लग गया इसलिए मैं प्रवचन सभा में देरी से आया हूँ और मेरा प्रतिदिन सामायिक करने का नियम है इसीलिए मैं सामायिक लेकर पीछे ही बैठ गया यह है धर्म के प्रति अटूट श्रद्धा ।   

सारे बल छूट जाए पर धर्म की श्रद्धा ना छूटे जैसे सुभद्रा का जैन धर्म पर अटूट विश्वास था उसके पिता जिनदŸा का यह भाव था कि इसकी शादी जो जैन धर्म पर अटूट विश्वास रखता हो उसी से की जाए । बुद्धदास ने जैन धर्म पर अटूट श्रद्धा का नाटक रचकर सुभ्रदा के साथ विवाह कर लिया । विवाह की पहली रात्रि में ही सुभद्रा को परिवार वाले जिनधर्म विश्वासी नहीं हैं ऐसा जानकर वो स्वयं के कर्म अन्तराय समझकर वहां पर रहने लगी । धर्म के नाम पर घर में झगड़ा होता था पतिदेव, सास और ननद रोज टोकती थी कि धर्म कर्म कुछ नहीं होता । ऐसे समय में एक दिन जिनकल्पी मुनि आहार हेतु आए । सुभद्रा ने आहार दान दिया और बाद में देखा कि उनकी आंख से पानी बह रहा है तो पता चला की आंख में तिनका चला गया है । सुभद्रा ने अपनी जिह्वा से वो तिनका निकाला ऐसा कार्य करते हुए उसकी सास ने उसे देख लिया और शोर मचा दिया कि सुभद्रा कलंकिनी है उसने मुनि को भी नहीं छोड़ा ऐसे समय में सुभद्रा संकट जानकर तेले तप की आराधना में तल्लीन हुई । देव आसन डोलायमान हुआ ज्ञात हुआ कि सुभद्रा पर धर्म का संकट आया है । देवता ने अपनी शक्ति के द्वारा चंपा के द्वार बंद कर दिये और आकाशवाणी की कि जो पतिव्रता नारी कच्चे सूत से छलनी बांधकर कुंए से पानी निकालकर द्वार पर डालेगी तभी द्वार खुलेंगे । सभी ने आजमाया परन्तु कुएं से छलनी में से पानी निकालना असंभव बात और उससे भी असंभव बात कच्चे सूत से छलनी बांधना । ऐसे समय में सुभद्रा ने वहां जाकर कच्चे सूत से छलनी बांध कुएं से पानी निकाला तो सभी आश्चर्यचकित हुए उसने पहले द्वार पर छीटा मारा तो द्वार खुल गया ऐसे करते क्रमश तीन द्वार खुले और सभी पतिव्रता सुभद्रा की जयकार करने लगे । जब चैथे द्वार पर छींटा मारने गई तो देव ने रोकते हुए कहा कि यह द्वार कोई और पतिव्रता नारी खोलेगी इस प्रकार सुभद्रा ने धर्म के लिए मान अपमान को सहन किया और अटूट श्रद्धा के साथ धर्म को जीवन में अपनाया । धर्म तुम्हारे रग-रग में हो । श्वांस जाए पर धर्म ना जाए । धर्म रग-रग में आ गया तो मानव जीवन सफल हो गया ।

आचार्य उमास्वाती ने प्रशमरति ग्रंथ में एक घटना दी है कि एक संत जिसे प्रतिक्रमण तो क्या नवकार मंत्र भी याद नहीं होता था बुद्धि मंद थी परन्तु सरल था । गुरु ने उसकी सरलता, ऋजुता और निकट भविता देखकर उसे दीक्षा दी और एक ही उपदेश दिया वत्स केवल तुम इतना पाठ याद करो ‘मा रुष मा तुष’ यानि ना राग करना ना द्वेष करना । उस शिष्य को इतना भी याद ना रहा वो मा रुष मा तुष के स्थान पर मासतुस बोलने लग गया और भीतर यह भाव आया कि जैसे उड़द का छिलका और उडद अलग होते हैं वैसे आत्मा के उपर के कर्मबंधनों को अलग करना है और कहते है मासतुस रटते-2 उसे केवलज्ञान हो गया । यह है धर्म के प्रति अटूट  श्रद्धा । जैसे अरिहंत परमात्मा श्री सीमंधर स्वामी हमें हर श्वांस में आत्म-रमण करने के लिए कहते हैं । हम इन दिनों में अधिक से अधिक आत्म-रमण आत्म-चिन्तन करें । श्रद्धा सेवा समर्पण का भाव रखें । जो करेगा उसका मंगल ही होगा ।

मोक्ष एक ऐसा जन्म जहाँ मृत्यु नहीं

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

 

20 अगस्त, 2009: ऋषभ विहार, दिल्ली युग पुरुष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- महापर्व पर्युषण का चैथा दिवस आप सबके लिए मंगलकारी हो । आप सभी दान शील तप भाव की आराधना कर मुक्ति की ओर अग्रसर   हो । आप सभी अंतकृतदशांग सूत्र के माध्यम से गजसुकुमाल का वर्णन सुन रहे थे । उनके भीतर एक भाव आया कि मुझे दीक्षा लेनी है ऐसा भाव तभी आता है जब व्यक्ति की जन्मों-2 की साधना होती है । जहां गजसुकुमाल को निर्मोही बतलाया है वहीं पर देवकी माँ ममता की प्रतिमूर्ति है । देवकी माँ ने दीक्षा की आज्ञा तो दी परन्तु एक वचन भी लिया कि ऐसे संयम का पालन करना कि फिर कभी दूसरी माँ ना बनानी पड़े । गजसुकुमाल ने अपने माँ का वचन निभाया और दीक्षा लेते ही 99 लाख भव पूर्व का वैर जागृत हुआ सोमिल ब्राह्मण ने धधकते अंगारे सिर पर रखे और गजसुकुमाल मुनि ने उस वेदना को सम्मानपूर्वक सहन कर मोक्ष लक्ष्मी का वरन किया ।

जो जैसा कर्म करता है उसे वैसा फल भोगना पड़ता है । यह जग कर्मों की खेती है । आज धन, पद, रुप पैसा, बंगला, गाड़ी, गुरु, धर्म आदि मिला, ये सब हमारा पूर्वभव का पुण्य है । इस भव में आत्मा के निजगुणों का चिन्तन कर मुक्ति की तरफ प्रयाण करें । कोई कष्ट आए तो उसे उदय कर्म जानकर स्वीकार करें । भावना भवनाशिनी होती है एक भावना हमेशा भावित करना कि मुझे मोक्ष चाहिए । 99 लाख भव पूर्व एक राजा की दो रानियां उसमें जिस रानी का पुत्र था राजा उससे प्रेम करता था और जिस रानी का पुत्र नहीं था उससे अधिक प्रेम नहीं करता था जिसके पुत्र नहीं था उसके भीतर ईष्र्या भावना जागी और उसने उड़द की गरम-गरम रोटी पुत्र के सिर पर बांध दी कितनी वेदना हुई होगी उस पुत्र को और वो काल के गाल में समा गया । रानी ने जब रोटी बांधी तो भाव यह रखा न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी । जब पुत्र ही नहीं रहेगा तो दोनों से राजा समान प्रेम करेगा । ईष्र्यावश किया गया द्वेष रानी को गजसुकुमाल के भव में मिट्टी की पाल बंधाकर सिर पर धधकते अंगारों को रखकर स्वीकार करना पड़ा और वही बच्चा जिसके सिर पर गरम रोटी रखी बांधी थी वह कालान्तर में सोमिल ब्राह्मण बना और वैर का बदला   चुकाया । कैसे कष्ट सहन किया होगा उस वीर ने । भेद-ज्ञान की अपूर्व साधना को अपने जीवन में उतारकर मुक्ति को प्राप्त किया ।

एक ऐसा जन्म है जहाँ कभी मृत्यु नहीं होती वो है मोक्ष और ऐसे अनंत जन्म हैं जहाँ बार-बार मौत आती है वो है संसार । संसार के घर को मिटाकर मोक्ष में घर बनाना है । साधु-साध्वी श्रावक-श्राविका-रुप चार तीर्थों में कोई भी पहले मोक्ष जा सकता है प्रभु महावीर की परम कल्याणकारी वाणी है कि इस संसार में जिसके साथ भी संबंध बनाते हो वो संबंध या संबंधी कर्म-निर्जरा के समय सहयोग नहीं देते । अत्यन्त अनादिकाल से जो दुःख और दुःख के कारण हमारे साथ लगे हुए हैं उन्हें दूर करने का एक ही उपाय है हम मोह को क्षय करें और अज्ञान से दूर हो । राग और द्वेष पर विजय प्राप्त करें । आज तक धन, दौलत, पुत्र को अपनाया परन्तु यह तो विनाशी है अब अविनाशी परमात्मा को अपनाओ । नवकार मंत्र के पांच पदों में दो ही पद सार्थक है वो है साधु और सिद्ध । साधु का मतलब वेश परिवर्तन नहीं, साधु का मतलब अन्तर परिवर्तन   है । साधु सरल और ऋजु हो अंदर बाहर एक हो और साधु का लक्ष्य केवल सिद्धालय हो । आप इस क्षण में मोक्ष सुख में रमण कर सकते हैं अगर आप इस क्षण में समता में हैं तो मोक्ष में हैं । ममता में हैं तो संसार में हैं, वीतरागता में हैं तो मुक्ति है और राग-द्वेष में संसार है । निर्लोभता में मोक्ष है लोभ में संसार है इसी प्रकार हम सभी अपने जीवन को मुक्ति की ओर अग्रसर करें । राग-द्वेष-रुपी कर्म बीजों को जलाकर वीतरागता के परम् सुख को प्राप्त करें ।

आत्म-ज्ञान आत्म-पीठ में मिलता है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

21 अगस्त, 2009: ऋषभ विहार, दिल्ली युग पुरुष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- महापर्व पर्युषण का पाँचवा दिवस आप सबके लिए मंगलकारी हो ।  आपके भीतर ज्ञान की धारा  बहे । आत्म-ज्ञान, आत्म-दर्शन, आत्म-आचरण और आत्म-तप का संगम स्थापित हो । आज हम ज्ञान पर चर्चा करेंगे । भगवान का संदेश है पहले ज्ञान फिर दया । चाणक्य ने भी कहा ज्ञान के बिना सुख नहीं । ज्ञान मानव का सार  है । वो ज्ञान है आत्म-ज्ञान । प्रभु महावीर का ज्ञान संसार का नहीं है भीतर का ज्ञान है । व्यवहार से ज्ञानी होने के दस लक्षण है जो क्रमशः इस प्रकार है ज्ञानी क्रोधी नहीं होता, उसका संसार के प्रति उदासीन भाव होता है । वह अपनी इन्द्रियों को जीतने वाला होता है उसके भीतर क्षमा होती है, प्राणी मात्र के प्रति दया करुणा मैत्री का भाव होता है । उसके भीतर बाहर शांति झलकती है । वो सबको प्रिय लगता है । वो संतोषी निर्लोभी होता है । वो सबको देने वाला होता है। भय और शोक का हरण करने वाला होता है इस प्रकार व्यवहार से ज्ञानी के दस लक्षण है ।

आत्म-ज्ञानी का केवल एक ही लक्षण है कि वह सदा ज्ञाताद्रष्टा भाव में रहता है । हर जीव को अपने समान समझता है । जो किसी भी प्राणी की मनसा वाचा कर्मणा हिंसा नहीं करता । ज्ञानी के भीतर करुणा और मैत्री झलकती है । आत्म-ज्ञान किसी विद्यापीठ में नहीं मिलता वह तो आत्म-पीठ में मिलता है । ज्ञान का शिक्षण नहीं होता उसका उद्भवन होता है । जैसे बीज बाते हो तो उसका अंकुर फूटता है उसी प्रकार ज्ञान भी आत्मा का एक गुण है जो भीतर से प्रस्फुटित होता है । बीज को वृक्ष बनने के लिए स्वयं के खोल तोड़नी होती है उसी प्रकार ज्ञान के प्रकटीकरण के लिए अहंकार की बाधा हटानी होती है तभी आत्म-ज्ञान प्रकट होता है । बच्चा गर्भ में होता है तब भी उसके भीतर अनंतज्ञान है परन्तु उपर अज्ञान और मोह का आवरण लगा हुआ है । ज्ञान हमारा स्वभाव है, ज्ञान हमारी चेतना है आवश्यकता है उस स्वभाव और चेतना को जानने की । 

रुस की एक कहावत है- एक मां अपने बच्चे को बुद्धिमान बनाने के लिए 25 वर्ष लगाती है और कोई स्त्री उसके जीवन में आती है तो उसको पांच मिनिट में बुद्धू बना देती है । गर्भ संस्करण से लेकर उच्च शिक्षा तक मां यह समझती है कि बेटा मेरा है परन्तु दिन प्रतिदिन वह दूर होता जा रहा है और एक दिन ऐसा आता है कि वो स्वयं को अलग समझने लगता है । हम समझे जीवन में हमें पाना क्या है । व्यवहारिक ज्ञान पाना है या आत्म-ज्ञान, व्यवहारिक ज्ञान पाना है तो संसार में बहुत सी पाठशालाएं हैं परन्तु आत्म-ज्ञान पाने के लिए ध्यान की पाठशाला में प्रवेश करना होगा । शरीर की आसक्ति तोड़नी होगी, आत्म-भावों में रमण करना होगा तभी आत्म-ज्ञान प्राप्त होगा । 

श्री अंतकृतदशांग सूत्र के वांचन में आज वासुदेव श्रीकृष्ण के दो प्रश्नों का समाधान करते हुए भगवान अरिष्ठनेमी ने उन्हें द्वारिका विनाश और उनके आगामी चैबीसी में बारहवे तीर्थंकर बनने की घटना स्पष्ट की । सूत्र का वांचन करते हुए श्री शुभम् मुनि जी महाराज ने बताया कि जब महाराज श्रीकृष्ण गजसुकुमाल मुनि के दीक्षा के बाद दूसरे दिन भगवान की चरण वंदना के लिए जाते हैं तो गजसुकुमाल की मुक्ति का वर्णन सुनकर कुछ आश्चर्य चकित होते हैं और फिर वो प्रश्न पूछते हैं कि हे भगवन द्वारिका नगरी का विनाश कैसे होगा तो भगवान शराब, अग्नि और द्वैपायन ऋषि का क्रोध ऐसे तीन कारण बतलाते हैं । कालान्तर में द्वैपायन ऋषि अग्नि कुमार देव के रुप में द्वारिका पर आग बरसाते हैं और इस प्रकार द्वारिका का नाश होता है और उसमें केवल कृष्ण और बलराम ही बचते हैं । अंत में जरा कुमार का बाण लगने से कौशाम्र वन में श्रीकृष्ण के देह त्यागने का वर्णन भगवान ने बतलाया तो श्रीकृष्ण ने श्रमण दीक्षा अंगीकार करने की भावना प्रकट की तो भगवान ने फरमाया कि वासुदेव निदानकृत होने से श्रमण दीक्षा अंगीकार नहीं कर सकते । इस प्रकार का रोचक वर्णन आज अंतकृतदशांकसूत्र में हुआ ।

मानव जीवन की नींव है आचार

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

22 अगस्त, 2009: ऋषभ विहार, दिल्ली  युग पुरुष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- महापर्व पर्युषण का छटा दिवस आप सबके लिए मंगलकारी हो । आपके जीवन में समता शांति समृद्धि का वैभव बढ़े । हम सभी अनादिकाल से चैरासी लाख जीवयोनि में चक्कर काट रहे हैं । ये चक्कर कट जाए और ऐसी भाव-दशा आए कि हम मोक्ष पाएं । जन्मों-2 से शरीर की रखवाली की उसे खिलाया पिलाया पर इस शरीर ने धोखा ही दिया है । आने वाले दुःख को सुख में बदलना चाहा परन्तु उसे समता से सहन नहीं किया अगर समता से सहन करते तो कर्मनिर्जरा होती । दुःख को समता से सहन करना ही सच्चा आचार है । 

मानव जीवन की नींव है आचार । आचार को प्रथम धर्म बतलाया है । आचार एक वृक्ष की भांति है और पद मान प्रतिष्ठा छाया की भांति । सत्य आचरण में आएगा तो छाया अपने आप आएगी । दिन रात बीतते जा रहे हैं हम वास्तविक धरातल पर देखें क्या मानव जीवन में हम सम्यक् आचरण कर रहे हैं । एक बार एक चर्च के पादरी को स्वप्न आया कि मैं मरकर कीड़ा हो गया हूँ । कीड़ा बनने के बाद पास से पत्नी गुजरती है मैं उसे बुलाता हूँ पर वो मेरी बात समझती नहीं । माँ गुजरती है वो भी मेरी वेदना को नहीं समझती मुझे असह्य वेदना है कि मैं पूर्व जन्म में मानव था और इस जन्म में कीड़ा बना हूँ । कहाँ मानव का शरीर इन्द्रियां, कहां कीड़े का शरीर और   इन्द्रियाँ । स्वप्न पूरा होने पर पादरी सकपकाया और उसे मानव जीवन की कीमत समझ आई । हमें मानव जीवन धर्म श्रद्धा प्रार्थना भक्ति साधना आराधना के लिए मिला परन्तु यहाँ आकर हमने धर्म आराधना छोड़ दी और धन आराधना प्रारंभ कर दी फलस्वरुप मुक्ति ना पा सके । 

आचरण है तो सार है । समस्त सूत्रों का सार आचार है । ज्ञान से जानो दर्शन से देखो और चारित्र से उस पर आचरण करो । दर्शन की भट्टी में ज्ञान की रोटी पकती है जब वह रोटी खाई जाती है तो खून, मांस, मज्जा बलवीर्य बनता है और फिर चारित्र आचरण में आता है । समभाव का अहसास ही चारित्र है । अर्जुन मुनि ने समभाव के साथ आत्म-पुष्टि करते हुए शरीर को आने वाले कष्टों को समभावपूर्वक सहन किया और मुक्ति के द्वार प्रशस्त किए । श्रीमद् राजचन्द्र व्यापारी थे परन्तु भेदज्ञानी थे । आचार्य श्री आत्माराम जी महाराज फरमाते हैं व्यक्ति जबान का पक्का और लंगोट का सच्चा होना चाहिए ं। जो व्यक्ति आचरण में सही होता है उस पर कोई आपत्ति नहीं आती । सदाचार जीवन का स्तंभ है । जो साधना में धर्म में लीन रहता है उसका आचरण उत्तम होता है, आचरण का जीवन में बहुत बड़ा मूल्य है । हम सभी अपने जीवन में सम्यक् आचरण लाए । महापर्व सम्वत्सरी नजदीक आ रहा है आप सभी ये संकल्प ले कि सम्वत्सरी के दिन अपने प्रतिष्ठान बंद रखेंगे, उस दिन अधिकाधिक धर्माराधना हो । तपस्या केवल निर्जरा के लिए   हो । तपस्या पर लेनदेन बंद हो । 

अंतकृतदशांग सूत्र में पद्मावती रानी का वैराग्य, दीक्षा और मुक्ति के वर्णन के साथ अर्जुन मालाकार का वर्णन और अनेक गाथापतियों का मुक्तिगमन का वर्णन आज युवा मनीषी श्री शुभम मुनि जी महाराज द्वारा सुनाया गया । अर्जुनमाली जो मुदगरपाणी यक्ष के वशीभूत होकर प्रतिदिन 6 पुरुष और एक स्त्री की हत्या करता था सेठ सुदर्शन का सत्संग पाकर भगवान के समोवसरण में पहुंचा । केवल 6 माह की श्रमण दीक्षा पालन कर अपने समस्त कर्मों को समता के साथ सहन करते हुए मुक्ति के द्वार खोले । इससे हमें यह शिक्षा प्राप्त होती है कि हम क्षमाभाव को धारण करें जीवन को समता के साथ जीएं । प्रस्तुत सूत्र में उन 90 महान् आत्माओं का वर्णन है जिन्होंने अन्तिम समय में अपना चरम लक्ष्य प्राप्त किया ।  

जैसा भाव वैसी प्रतीति

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

23 अगस्त, 2009: ऋषभ विहार, दिल्ली  युग पुरुष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- महापर्व पर्युषण का सातवा दिवस आप सबके लिए मंगलकारी हो । अरिहंत परमात्मा की अनंत कृपा हम पर बरस रही है । हम उनके श्रीचरणों में नमन, वंदन करते हैं उन्होंने अपनी आत्मा के चारों ओर लगे कर्म मैल को उतार लिया । हम अपने कर्म मैल को उतारें । कर्म बंधनों से कैसे दूर होंगे, कैसे सिद्धालय में स्थान मिलेगा इस पर चिन्तन करें ? यह तभी होगा जब हमारे भीतर जागरण का भाव होगा । हर कार्य के साथ जैसा भाव होता है वैसी ही प्रतीति होती है । जीवन में दुःख, पीड़ा रोग है तो समझना मन रोगी है । मन स्वस्थ होता तो जीवन में दुःख की प्रतीति ना होती । ये जीवन हमें मिला, ये परमात्मा की अनूठी भेंट है । तुम अपनी विचार-धारा बदलो तो जीवन बदल जाएगा । कहा भी है- सब जग ईश्वर रुप है, भला बुरा ना कोय ।

     जाकी जैसी भावना, तैसा ही फल होय ।।

कोई किसी को सुख दुःख नहीं देता हर घट में उस परमात्मा का निवास है कोई भला बुरा है ही नहीं । जो कुछ हमें मिल रहा है वो सब हमारे ही कर्म है । तुम्हारी जैसी भावना होगी वैसा ही फल मिलेगा । अनंतकाल से संसार चला आ रहा है । हम कर्मों के बंधन बांधे जा रहे हैं साथ में निर्जरा भी हो रही है इस जीव ने हर योनि में जन्म लिया हर जीव के साथ संबंध बनाया जहाँ जन्म है वहाँ मरण अवश्य है एक समय आएगा श्वासें टूटेगी और देह आत्मा सदा के लिए जुदा हो  जाएंगे । हमारी चाहना मोक्ष की हो जितनी उत्कृष्ट भावना से तप त्याग होगा उतना ही मोक्ष नजदीक होगा । 

भावना मन के विचार है । जैसे विचार होंगे वैसे ही भावना बनेगी । आज तक हमने हर एक को अपना संबंधी बनाया आज ये सोचो मैं अकेला हूं अकेला आया हूं अकेला ही जाना है । एक बार एक शिष्य ने गुरु से प्रश्न पूछा कि पहाड़ पर किसका शासन है तो गुरु ने बताया लोहे की हथौड़ी का, धीरे-2 लोहे के हथोड़ी पूरे पहाड़ को तोड़ देती है लोहे पर अग्नि का शासन है अग्नि पर पानी का शासन है, पानी पर वायु का शासन है क्योंकि ये एक दूसरे को अपने गुण धर्म से अलग करते हैं वायु पर प्रकाश का शासन है, प्रकाश की गति 186000 मील प्रति सैकेण्ड है उससे भी अधिक गति बिजली की है बिजली की गति 288000 मील प्रति सैकेण्ड है और उससे भी अधिक गति मन की है । मन एक सैकेण्ड में 8265120 मील और उस पर चिŸा और आत्मा का शासन है । एक दूसरे को जीतना कठिन है इससे अच्छा है स्वयं की आत्मा पर विजय प्राप्त कर लो । मन मर जाए तो आत्म-साक्षात्कार होगा फिर परमात्मा मिलन होगा । यदि मोक्ष जाना है तो मन को साधना होगा, मन को साधने के लिए ध्यान परम आवश्यक है । मन दसों दिशाओं में घूमता रहता है । हम ‘‘मनसा वाचा कर्मणा’’ एक हो किसी को दुःख ना दें । मन से भी कर्म का बंधन ना करें । 

कल सम्वत्सरी महापर्व पर्वो का सिरमौर दिवस है । कल के दिन सभी अपनी दुकाने बंद रखें अधिक से अधिक पौषध उपवास आलोचना प्रतिक्रमण आत्म निरीक्षण करें । कल आत्म धन कमाना है जितने भाव शुद्ध होंगे उतनी ही निर्जरा होगी और उतना ही हम मोक्ष की ओर करीब  होंगे ।

श्री अंतकृतदशांग सूत्र में आज बाल मुनि अतिमुक्त कुमार का वर्णन श्री शुभम् मुनि जी महाराज ने सभी के समक्ष रखा । बाल मुनि ने गौतम स्वामी का सत्संग पाकर अपने जीवन की नैय्या को आगे बढ़ाया और मुक्ति के परम लक्ष्य को पा गए । बाल्यकाल में ही संयम अंगीकार कर भगवान के शासन में सबसे छोटी आयु वाले मुनि कहलाए । आप यह जानते थे कि जो जन्मा है उसकी मृत्यु अवश्य होगी परन्तु यह नहीं जानते थे कि मृत्यु किस दशा में होगी और जीव मरकर किस गति में जाएगा । इसी बात से वैराग्य प्राप्त कर आपने दीक्षा ली और गुणरत्न संवत्सर की आराधना कर मुक्ति का परम् धन पाया ।

सम्वत्सरी पर्व आत्मा की वषगाँठ है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

24 अगस्त, 2009: ऋषभ विहार, दिल्ली  युग पुरुष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- महापर्व सम्वत्सरी का पावन दिवस हम सबके लिए एक विशेष प्रेरणा लेकर आया है । आज का दिवस आलोचना, प्रतिक्रमण, आत्म-निरीक्षण, आत्म-परीक्षण का दिन है । आलोचना से हमारे भवों-भवों के संचित कर्म क्षय होते हैं । जैसे काँटा चुभने पर सारी शरीर में वेदना होती है परन्तु कांटा निकल जाए तो शरीर निःशल्य और सुख को प्राप्त होता है उसी प्रकार आलोचना से मन में कोई शल्य नहीं रहता । आलोचना यानि अपने दोषों को प्रकट कर देना । आलोचना भीतर के ऋजु-भाव को उत्पन्न करती है । आलोचना से मन के समस्त विकार बाहर निकल जाते हैं । 

भगवान महावीर फरमाते हैं शिष्य को गुरु से कोई भी बात छुपानी नहीं चाहिए । बच्चे की भांति सरल होकर समस्त बातें कह देनी चाहिए । जैसा पाप किया है वैसा ही बताना चाहिए । आप देखो हम सबने इतना जीवन पाया परन्तु क्या दो क्षण भी सुख के बीते हैं । मन घुलने वाले बहुत मिले पर क्या मन के मीत मिले हैं हम सभी अपने भीतर को शुद्ध और पवित्र करें । वर्षावास के 50 वें दिवस पर आज सम्वत्सरी पर्व आत्मा की वर्षगांठ है । आज के दिन सबसे मैत्री, वात्सल्य, आत्मीयता का संबंध जोड़कर खुशी मनायें । आत्मा के गुणों का मिष्ठान तप जप पौषध रुपी उत्तम भोजन से आत्मा को परिपुष्ट करे । हम सभी आज के दिन शांति को जीवन में धारण करें । जब-2 भीतर क्रोध आए तो देखें ये क्रोध किसको आया है । इस प्रकार चिन्तन करते हुए आत्म-भावों में स्थित हो ।

आप सभी ने श्रीअंतकृतदशांग सूत्र के माध्यम से काली महाकाली रानियों का वर्णन सुना । उनके अभूतपूर्व तप को सुनकर बड़ा आश्चर्य होता है जो रानियां मखमल पर चलने वाली थी उन्होंने अपने शरीर को तपस्या से इतना कृष कर लिया कि सूखकर कांटा बन गई और शरीर का पूरा सार उन्होंने तप में लगा दिया ।

आज के दिन प्रतिक्रमण का भी विशेष महत्व है । प्रतिक्रमण यानि किए हुए अतिक्रमण से पीछे हटना । जिन्दगी में जाने अनजाने बहुत से पाप हो जाते हैं उन समस्त पापों से पीछे हटना ही प्रतिक्रमण है । हम सभी आज के दिन इस जीवन में जाने अनजाने जितने भी पाप हुए हैं उन सबको स्मृति पटल पर लाते हुए उस अतिक्रमण का प्रतिक्रमण करंेगे और प्रतिक्रमण के साथ-साथ समस्त जीवों से अपना मैत्रीभाव स्थापित करेंगे । 

आज के दिन क्षमा का भी विशेष महत्व है । जिनके साथ आपका प्रेम, प्यार है । आप उनसे तो क्षमायाचना करेंगे ही परन्तु आज उनसे भी क्षमा-याचना करें जिनके साथ आपके मन में जरा सभी मन-मुटाव है । मन की ग्रन्थियों को खोल दें । पाश्चात्य संस्कृति के संत सेंट आॅफ आॅसिस का नाम आपने सुना होगा । उम्र के अन्तिम पड़ाव पर आपने शरीर साथ ना देते हुए भी अपने समस्त शिष्यों के समक्ष अपनी जीवन भर की गलतियों के लिए क्षमा-याचना की । तत्पश्चात् जिस गधे पर बैठकर वो एक गांव यात्रा से दूसरे गांव यात्रा करते थे उस गधे के पास जाकर क्षमा-याचना करते हुए बोले कि कभी तुझ पर अपना हक समझकर अधिक काम लिया हो तुझे उचित भोजन ना दिया हो तो मुझे क्षमा करना । अंत में जिस लकड़ी का सहारा लेकर चलते थे उस लकड़ी से भी क्षमा-याचना करते हुए कहते हैं कि जिन्दगी पर मैंने तुझे पटका, तेरे साथ अच्छा सलूक ना किया उसके लिए मैं क्षमा-याचना करता हूँ और क्षमा-याचना के इन भावों से अश्रुपूरित आंखों से बरबस रोने लगे ऐसी उत्तम क्षमा थी उस संत की । उत्तम क्षमा धारण करने में भगवान महावीर, गजसुकुमाल, खन्दक मुनि आदि अनेक मुनियों का वर्णन आता है आप सभी ने क्षमाभाव धारण कर अपनी जन्म मरण की परम्परा को छोटा किया । आज के दिवस हम सभी चतुर्विध श्रीसंघ से क्षमा-याचना कर अपनी जन्म-मरण की परम्परा को छोटा करें ।

सम्वत्सरी के पावन दिवस पर श्रमण संघीय मंत्री श्री शिरीष मुनि जी महाराज ने आचार्य भगवंत सहित चतुर्विध श्रीसंघ से क्षमा-याचना करते हुए कल्पसूत्र की पट्टावली एवं पर्युषण कल्प का वांचन किया । श्री शुभम् मुनि जी महाराज ने अंतकृतदशांग सूत्र में काली आदि रानियों के तप पर रौचक वर्णन प्रस्तुत किया तथा सम्वत्सरी पर्व पर सभी से क्षमायाचना की । उप प्रवर्तिनी महासाध्वी डाॅ0 सरिता जी महाराज ने क्षमा को भीतर अपनाते हुए जीवन में ऊँचाईयों की ओर आगे बढ़ने की प्रेरणा दी । वीतराग साधिका सुश्री निशा जैन ने भाव आलोचना करवाते हुए जिन्दगी भर के समस्त पापों, कषायों को अपने आराध्य के श्रीचरणों में खुली किताब की भांति रखने को कहा । आपने करीब 55 मिनिट भाव-आलोचना की साधना करवाई । श्रीसंघ के महामंत्री श्री संजय जैन एवं चातुर्मास संयोजक श्री राजीव जैन ने इस अवसर पर आचार्य भगवंत उपस्थित मुनिवृंद साध्वीवृंद के साथ सम्पूर्ण श्रीसंघ की ओर से क्षमा-याचना   की । 

तपस्या की लड़ी में अनेक भाई बहिनों ने आज पौषध, उपवास, अठाई, ग्यारह आदि की तपस्या की । दोपहर में 3.00 से 4.00 आलोचना एवं सम्वत्सरी महापर्व पर भजनों की प्रस्तुति हुई । सूर्यास्त के साथ भाई एवं बहिनों का अलग-2 प्रतिक्रमण बहुत ही सुचारु रुप से सम्पन्न हुआ जिसमें सैकड़ों की संख्या में श्रद्धालु उपस्थित थे । 

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

26 अगस्त, 2009: ऋषभ विहार, दिल्ली युग पुरुष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- भगवान महावीर का ध्यान शरीर पर नहीं आत्मा पर था । शरीर पर आसक्ति टूटती है तब आत्मा का ध्यान स्वतः आता है । आत्मा नर्तक है । नर्तक का अर्थ है जो तुम करते हो उसके तुम जिम्मेदार । आज मुझे दुःख मिल रहा है तो जरुर मैंने दुःख दिया होगा, किसी को पीड़ा पहुँचाई होगी । किसी के पास धन नहीं इसका अर्थ तुमने धन नहीं दिया होगा । आज तुम्हें सुख मिल रहा है इसका अर्थ है तुमने किसी को सुख दिया होगा ।

इमर्सन ने कहा है- लोग प्रार्थना करते हैं उसमें यही शिकायत करते हैं कि दो और दो चार क्यों होते हैं अर्थात् जीवन में इतना दुःख क्यों है ? नवकार मंत्र का दूसरा पद है ‘णमो सिद्धाणं’अर्थात् नमस्कार हो सिद्धो को । सिद्ध अर्थात् जिन्होंने जीवन को सफल कर लिया । जीवन के लक्ष्य को सम्पूर्ण-रुप से प्राप्त किया है । परम शांति को उपलब्ध कर लिया है वह सिद्ध । ‘णमो सिद्धाणं’ करने से सिद्धों का ज्ञाता-द्रष्टा भाव आता है । आप भी परम शांति को उपलब्ध हो जाते हैं । ‘णमो सिद्धाणं’ का मंत्र करके भौतिक वस्तुएं धन, पद, आदि तुच्छ चीजें मत मांगना । भौतिक चीजें मांगने का अर्थ है हीरे के बदले मिट्टी को मांगना । मनुष्य संसार की सब चीज है को जानता है परन्तु मोह का पर्दा इतना पक्का है कि मनुष्य जानकर भी अनजान बनता है ।

जिनके समस्त कार्य सिद्ध हो गए वे सिद्ध

आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

27 अगस्त, 2009: ऋषभ विहार, दिल्ली  युग पुरुष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- संसार में जीव अनादिकाल से भ्रमण कर रहा है । भव भ्रमण को समाप्त करने के लिए भगवान ने अपने भीतर की सम्पदा को पहचानने का उपदेश दिया । भीतर की सम्पदा को जानने का एक माध्यम है नवकार महामंत्र । विश्व में नवकार मंत्र जैसा कोई मंत्र नहीं । हमारा लक्ष्य सिद्धालय है, सिद्धालय यानि जहां अनंत सिद्ध निवास करते हैं । सिद्ध कौन जिनके समस्त कार्य सिद्ध हो गए जिन्हें कुछ करना अब शेष नहीं है वह सिद्ध हैं । 

जब-जब नमो सिद्धाणं बोलो तो भीतर भाव आए कि आपने जैसे आठ कर्म क्षय किए वैसे मैं भी सिद्धत्व की प्राप्ति के लिए अष्टकर्म क्षय का पराक्रम करुं । अन्तरात्मा रंग-मंच है । पांच इन्द्रियां छटा मन सब इस रंगमंच के पात्र हैं । भीतर सब कुछ है जब भीतर झांकोगे तो सब कुछ प्राप्त होगा । सिनेमा घर में फिल्म देखते हो बड़ी सी स्क्रीन पर हलचल दिखाई देती है परन्तु उस स्क्रीन के पीछे कुछ भी नहीं है । प्रोजेक्टर से जो प्रकाश स्क्रीन पर पड़ता है उसी का क्रियान्वयन ही फिल्म है । वो सब झूठ होते हुए भी उसे हम सच मानते हैं फिर फिल्म देखकर भावना में बहते हैं वह भी झूठ है क्योंकि फिल्म सत्य है नहीं और हम उसे सत्य मानकर क्रिया प्रतिक्रिया करते हैं वस्तुतः सत्य हमारे भीतर है । भीतर आनंद शांति सुख है । भीतर देखो तो सब दिखता है ।

जब आप आत्म-रमण करते हैं तो भीतर का अनंत आनंद प्रकट होता है । तब कोई रिश्ता, संबंध नहीं रहता तब हम केवल अकेले आत्म-परमात्म मिलन में होते हैं । आत्मा में अनंत सम्पदा है सिद्ध परमात्मा यानि समस्त कर्मों से रहित शुद्ध आत्मा । उनकी महिमा अपरम्पार है उन्होंने अपने आठों गुण प्रकट कर लिए । उनका निवास स्थान सिद्धालय है । ईंट गारे का घर तो केवल इस शरीर का है । भीतर की आत्मा जब शुद्ध बुद्ध होगी तो सिद्धालय में जा विलीन होगी । 14 पूर्व 32 सूत्र सभी का एक ही सार है कि कर्म पिंजरे से बलवान शत्रु को हटाना है और आत्मा पर विजय प्राप्त करनी है ।

सिद्ध बनने के लिए एक फक्कड़ फकीर बनना होगा । फकीर के पास कुछ नहीं होता फिर भी वो शहंशाहों के शहंशाह होते हैं । चैसठ इन्द्र चरणों में वंदन करते हैं जिसने त्यागा है उसने सब कुछ पाया है । संत अब्राहिम, आनंदघन आचार्य श्री आत्माराम जी महाराज आदि फक्कड़ संत इसी श्रेणी में आते हैं । हमें उनसा बनने का पुरुषार्थ करना है । 

हमारा संकल्प हमें सिद्धत्व तक पहुंचाता है

आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

28 अगस्त, 2009: ऋषभ विहार, दिल्ली युग पुरुष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- अनंत उपकारी अरिहंत परमात्मा को नमन । नमन से ग्राहकता भीतर आती है । हे परमात्मा सब कुछ तुम्हारा है मेरा कुछ भी नहीं मैं केवल अजर अमर अविनाशी शुद्ध आत्मा हूं जिस प्रकार आपने अपने समस्त कर्मों का क्षय कर लिया उसी प्रकार मुझे भी मेरे समस्त कर्मों का क्षय करना है । संसार में दुःख ही दुःख है जन्म जरा मृत्यु आदि व्याधि उपाधि इन सबसे छुटकारा पाने के लिए हम सिद्ध भगवान की शरण में जाएं । सिद्ध जो अपने समस्त कर्मों से मुक्त हो स्वयं के स्वरुप को प्राप्त कर गए । 

एक अंधा व्यक्ति रास्ता पार करने के लिए किसी आंख वाले का सहारा लेता है यानि किसी आंख वाले व्यक्ति की शरण में जाता है तभी वह रास्ता पार कर सकता है । बात छोटी सी है परन्तु जरा सोचो क्या मोक्ष हमने आपने देखा है ? कर्मों की निर्जरा का अनुभव आपको है अगर ऐसा नहीं है तो आप सभी सिद्ध परमात्मा की शरण ले । हम शरण तो लेते हैं सिद्ध परमात्मा की, अरिहंत परमात्मा की परन्तु उनकी वाणी पर श्रद्धा नहीं करते । उन्होंने जो बताया उसका अनुसरण नहीं करते उनके द्वारा दिखाए गए मार्ग पर हम चलते नहीं इसीलिए संसार सागर में परिभ्रमण हो रहा  है । जब तक शरीर की आसक्ति नहीं टूटेगी, जब तक आत्म-गुणों में रमण नहीं होगा तब तक मुक्ति प्राप्त होने वाली नहीं है । एक सेवादार मालिक की शरण में जाकर जैसा मालिक कहता है वैसा करता है फिर वो अपनी बुद्धि नहीं लगाता ना ही तर्क वितर्क करता है हमें अरिहंत परमात्मा की शरण में जाकर उनके मार्ग का अनुसरण करना चाहिए । जीवन में जो भी करें शत प्रतिशत  करें । जिन मार्ग में 99 प्रतिशत किया गया कार्य सफलता नहीं देता शत् प्रतिशत कार्य ही सफलता देता है । आप जब सिद्धत्व का संकल्प भीतर लेते हो तो वैसी परिणति होने लग जाती है । संकल्प हमें सिद्धत्व तक पहुंचाता है आवश्यकता है हमारा संकल्प पक्का हो । हमारा चिŸा डांवाडोल होगा तो हम कुछ नहीं कर पाएंगे । 

जिन्दगी में परमात्मा से जुड़ने का सबसे आसान तरीका है ध्यान साधना । भेद-विज्ञान द्वारा अनेकों कर्मों की निर्जरा होती है आवश्यकता है श्रद्धा और विश्वास की । समस्त तीर्थंकर भगवंतों, सिद्ध भगवंतों ने शरीर की आसक्ति तोड़ी, आत्म-गुणों में रमण किया, भेद-विज्ञान का उत्कृष्ट तप किया और मुक्ति ओर अग्रसर हो गए । हम अपने शरीर के ममत्व को छोड़े । शरीर को सजाना नहीं उसको जगाना है । मुक्ति की ओर अग्रसर करना है । जब तक घर परिवार से मोह नहीं टूटेगा तब तक श्रद्धा-रुपी आंख होते हुए भी हम भव-सागर में भ्रमण करते रहेंगे । अरिहंत परमात्मा द्वारा प्ररुपित मार्ग पर बिना किसी शंका से निर्विघ्न-रुप से आगे बढ़े अवश्य ही हम सभी मोक्ष लक्ष्मी को प्राप्त करेंगे ।

संकल्प की पूर्णता हमारे भीतर भावों पर निर्भर है

आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

29 अगस्त, 2009: ऋषभ विहार, दिल्ली  युग पुरुष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- जो कुछ भी करो एक संकल्प, गहन प्यास, पूर्णता से करो । अरिहंत परमात्मा सर्वोपरि है उन्होंने हमें ज्ञान, ध्यान, साधना प्रदान की । वो मोक्षगामी जीवों के सहायक हैं । सिद्ध परमात्मा तीनों लोकों में सर्वोपरि है उन्होंने अपने समस्त कर्म क्षय कर लिए सब कार्य साध लिए । अनादि के अवागमन को हटाने का संकल्प भीतर लिया और उस संकल्प को पूर्ण कर सिद्धशिला में स्वयं को स्थापित कर लिया इसीलिए आप सिद्ध कहलाए । 

जब संकल्प भीतर होता है तो कार्य स्वतः हो जाते हैं । आवश्यकता है हमारा संकल्प सुदृढ़ हो आधे मन से कोई कार्य नहीं होता । आधा मन आधे मन को काट देता है और कार्य जहाँ का वहीं रह जाता है । नमस्कार महामंत्र के कई उदाहरण आपने सुने हैं वो सब संकल्प के बल से ही पूर्ण हुए हैं । सेठ सुदर्शन की शूली का सिंहासन बना । केवल नवकार मंत्र की शरण और संकल्प से सोमा, सुभद्रा, सीता, द्रौपदी आदि सभी ने संकल्प से ही अपने समस्त कार्य परिणत किए । संकल्प करने के बाद मन डांवाडोल नहीं होना चाहिए । अगर मन डांवाडोल हो गया तो संकल्प पूरा नहीं होगा । 

रुस के दार्शनिका चार्लुस र्कािर्बन ने अपनी वसीहत में लिखा था कि मेरी मृत्यु के बाद मुझे वहीं दफनाया जाए जिस वृक्ष के नीचे मेरा जन्म हुआ है । उनका गाँव छोटा सा द्वीप था जिसे प्रिंस द्वीप कहते थे । आयु के अन्तिम समय में अन्तिम श्वांस उनकी टेक्सास में छूटी । वहाँ से प्रिसद्वीप दो हजार मील दूर था जहां पर उन्होंने अपनी आयुष्य पूर्ण की वहां उन्हें कोई नहीं जानता था वहां के लोगों ने एक छोटे से ताबूत में उनकी देह को रखकर उसे एक वृक्ष के नीचे गाड दिया परन्तु संकल्प तो संकल्प होता है कहते हैं जिन्दगी के अन्तिम समय तक वो यही कहते रहे कि मुझे वहीं दफनाना जहाँ पर मेरा जन्म हुआ है । उनकी अन्तर चेतना उस बात के लिए सजग थी और अदृश्य शक्ति ने उनका संकल्प पूरा किया । कहते हैं जब दफनाया गया उसके बाद बहुत बड़ा तूफान आया और बहुत से पेड़ टूट गए । उन टूटने वाले पेड़ों में वह पेड़ भी था जिसके नीचे उन्हें दफनाया था पेड़ के टूटने से वो ताबूत जमीन से बाहर आ गया थोड़ी देर में बरसात शुरु हो गई और वह ताबूत बहता-2 दो मील दूर समूद्र में चला गया । वहाँ से बहता-बहता वो ताबूत उसी प्रिंसद्वीप पर आकर रुका वहां के लोगों ने ताबूत को खोलकर देखा उस चारलूस कार्बिन के समस्त अंग तो गल गए थे परन्तु चेहरा अभी सही सलामत था चेहरे को देखने मात्र से ही वो लोग उसे पहचान गए और उसकी अन्तिम इच्छा उन्होंने पूर्ण की । 

संकल्प की पूर्णता हमारे भीतर भावों पर निर्भर है जैसी भावना होगी वैसा ही संकल्प क्रियान्वित होगा । हम अपने जीवन में मोक्ष जाने का संकल्प लें । समस्त सिद्धों ने सिद्धगति को प्राप्त करने का संकल्प लिया और सिद्ध बुद्ध मुक्त हो गए । जब चारलुस कार्बिन का संकल्प पूर्ण हो सकता है तो हमारा संकल्प क्यों नहीं पूरा होगा । जब अनंत सिद्ध मुक्ति पा सकते हैं तो हम मोक्ष क्यों नहीं जाएंगे । भीतर एक प्यास और एक संकल्प को जन्म दो ये भावना भावित करो कि अगला भव मेरा महाविदेह क्षेत्र का हो और वहीं से अरिहंत परमात्मा की शरण प्राप्त कर मैं सिद्ध गति में जाऊँ ।

कर्म मुक्ति का उपाय भेद-ज्ञान

आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

30 अगस्त, 2009: ऋषभ विहार, दिल्ली  युग पुरुष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- अरिहंतवाणी का एक ही लक्ष्य है कि तुम आत्मज्ञानी बनो । कितना जप तप अनुष्ठान करो उससे पुण्य उपार्जन होगा, स्वर्ग मिलेगा परन्तु मोक्ष नहीं मोक्ष के चार रास्ते हैं सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान,  सम्यक् चारित्र और सम्यक् तप । ज्ञान हर जीव में है वो आत्म-ज्ञान कर्ममैल से ढका हुआ है । जहां हर जीव में आत्म-तत्व विद्यमान है वहाँ हर जीव में सम्यक् ज्ञान आदि आठों गुण विद्यमान है, ऐसे कोई माता पिता नहीं जिन्होंने आत्मा को जन्म दिया हो । आत्मा अजर अमर अविनाशी है इसका कोई वर्ण, गंध, रस, स्पर्श नहीं है इसे शस्त्र काट नहीं सकते, पानी गला नहीं सकता, अग्नि जला नहीं सकती, वायु उड़ा नहीं सकता । आत्मा का कोई कुछ भी बिगाड़ नहीं सकता क्योंकि वह शाश्वत् है ।

हमने आज तक शाश्वत् को भूलकर शरीर का ध्यान रखा । धर्म बड़ा है या शरीर बड़ा है । धर्म बड़ा है क्योंकि धर्म साथ जाता है । यह सब जानते हुए भी हम शरीर का ध्यान रखते हैं । शरीर के लिए अंधाध्ुांध व्यय करते हैं, झूठ बोलते हैं आदि समस्त विकार भीतर लेकर आते हैं जिससे आत्मा पर कर्ममैल बढ़ता जाता है । मोह की वृद्धि होती है और हम जन्म मरण के चक्र में भटकते रहते हैं, इसीलिए महान् पुरुषों ने हमें कर्म मुक्ति का उपाय भेद-ज्ञान बताया । भेद-ज्ञान एक साबुन है जो कर्ममैल को धो देता है इसके लिए आवश्यक है समता-रुपी पानी और स्वयं आत्मा ही स्वयं के ऊपर लगे कर्ममैल को धो डाले । आत्मा पर आठ कर्म है तो आठ गुण भी है । वो आठ गुण हर जीवात्मा में विद्यमान है जैसे मिश्री कहीं पर भी हो उसकी मिठास उसी प्रकार रहती है उसी प्रकार आत्मा छोटे गति में हो या बड़े गति में उसके आठ गुण उसमें विद्यमान रहते हैं । 

ये मन जैसा चिन्तन करता है वैसी ही परिणति होती है । धन तुम अकेले कमाते हो परन्तु उसका भोग सभी परिवारवाले करते हैं । धन कमाते समय जो कर्म-बंधन हुआ उसका भुगतान करने के लिए परिवार वाले सहयोग नहीं देते उस समय स्वयं को ही कर्मफल भोगना पड़ता है । इसीलिए हम शरीर के प्रति अधिक आसक्त होकर कर्म-ब्ंाधन ना करे । जहाँ राग है वहां बंधन है । मोह हमें बांधता है । मोह को तोड़ना होगा । आसक्ति को छोड़ना होगा । वीतरागभाव में रमण करना होगा ऐसा करने पर आत्मा परमात्मा का अहसास होगा । कर्मों के बंधन शिथिल होंगे और मुक्ति की ओर हम सभी अग्रसर होंगे । 

जीवन में आचरण आ गया तो परिवर्तन निश्चित है

आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

31 अगस्त, 2009: ऋषभ विहार, दिल्ली युग पुरुष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- मानव का जीवन अनमोल जीवन है । मानव शरीर को मुक्ति का द्वार बताया है । मानव के सामने संसार का मार्ग है तो तप त्याग का भी मार्ग है । धर्म की शरण है तो विषय वासना की ओर भ्रमण भी है । यह मानव जीवन एक सुन्दर अवसर है इस अवसर का हम मुक्ति के लिए उपयोग करें । हम सभी मोह कर्म से बंधे हैं जरा सोचो जिस घर में आप रहते हो वो घर किसी कारणवश आपका ना रहे । भूख लगी हो और भोजन पास में ना हो, प्यास लगी हो पर दूर-दूर तक पानी दिखाई ना दे, पहनने के लिए वस्त्र ना हो । कोई सगा संबंधी आसपास ना हो ऐसी स्थिति में कैसी होगी तुम्हारी दशा । उस समय में सहानुभूति देने वाला कोई नहीं होगा । अनुभव करो तब तुम्हारे भीतर कैसे विचार होंगे । यह सत्य है कि एक दिन यह सब छोड़ना पड़ेगा । आज होकर के छोड़ दो एक बार प्रयोग करके देखो, चिन्तन करके देखो अगर चिन्तन में सरलता आ गई तो ये सब छोड़ना दुःखदायी नहीं होगा । जिनको शरीर व आत्मा की भिन्नता का अहसास होता है जिन्हें आत्म-दृष्टि है जो संसार की नश्वरता को जानते हैं उन्हें ऐसी स्थिति में भी सुख का अनुभव होगा । आत्मा के भीतर अनंत सुख आनंद और शांति है आवश्यकता है हम उसका अनुभव करें । 

आत्मा के अनंत आनंद को बताने के लिए नवकार मंत्र में तीन गुरु पद बतलाए हैं दो देव पदों की चर्चा आप सबके समक्ष हो चुकी है । देव पदों में अरिहंत और सिद्ध हमारा लक्ष्य है । गुरु पदों में आचार्य, उपाध्याय और साधु आते हैं । आचार्य कौन ? जिन्होंने आत्म तत्व को जाना उसका साक्षात्कार किया, उसे आचरण में लाया और औरों को भी उस मार्ग की ओर बढ़ने की प्रेरणा दी । जीवन में आचरण का बहुत महत्व है । जानना ही काफी नहीं उसके साथ आचरण करना भी आवश्यक है । लोभ सबका नाश करता है यह सब आपने जाना है परन्तु क्या कभी आचरण किया । देखो मेरे जीवन में लोभ कहां-2 है । क्या मैं सुख से प्रभावित और दुःख को नजरअंदाज तो नहीं करता । सुख दुःख दोनों एक सिक्के के पहलू है । ये आएंगे और जाएंगे परन्तु वहाँ पर हमारी आत्म-दृष्टि होगी, आचरण होगा तो हम कर्म बंधन नहीं करेंगे । आचार्य हमें ज्ञान के साथ आचरण भी देते हैं । जीवन में आचरण आ गया तो परिवर्तन निश्चित है । हम अपने जीवन को कैसे सुन्दर बनाएं यह एक अवसर है जहाँ पर जौहरी की आँख से हम महापुरुषों को जाने । उनको पहचाने । उनकी आत्म-दृष्टि को भीतर उतारे और इस अनंत गुणधारक आत्मा का साक्षात्कार करें । 

जहां कषाय की उपशांति होगी वहाँ संवर और निर्जरा होगी । दीया जलता है पर ज्योति ऊपर की ओर जाती है उसी प्रकार हमारी आत्म-ज्योति इस संसार भव भ्रमण से ऊध्र्वगामी हो । हम अपने शरीर के भान को भूलकर आत्म-स्वरुप में आएं और अधिक से अधिक कर्म निर्जरा करें ।

महापुरुषों का धरा पर अवतरण एक अनमोल संयोग है

आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

01 सितम्बर, 2009: ऋषभ विहार, दिल्ली  युग पुरुष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- आज का यह पावन दिवस श्रमण संघीय प्रथम पट्टधर जैन धर्म दिवाकर आगम पुरुष पूज्य आचार्य सम्राट् श्री आत्माराम जी महाराज एवं पंजाब प्रवर्Ÿाक पूज्य श्री शुक्लचन्द जी महाराज का जन्म-दिवस हम सभी मना रहे हैं । महापुरुषों का धरा पर अवतरण एक अनमोल संयोग है । धरा पर रहते हुए जन-जीवन को धर्म-देशना से लाभान्वित करना और उन्हें धर्म मार्ग की ओर अग्रसर करना धार्मिकता का सूचक है । 

श्रद्धेय आचार्य भगवंत का जीवन केवल स्थानकवासी समाज का ही नहीं अपितु सम्पूर्ण जैन जगत के लिए वरदान था । जो भी आपके श्रीचरणों में आया आपका हो गया । आपके व्यक्तित्व को शब्दों में बांधा नहीं जा सकता । जिस प्रकार सागर को गागर में, फूल की सुगंध को, सूर्य के प्रकाश को बांधा नहीं जा सकता उसी प्रकार महापुरुषों के जीवन चरित्र को शब्दों में समेटा नहीं जा सकता । आपका जीवन असीम था । बचपन में ही माता, पिता, दादी का वियोग हो गया । जैन बन्धु के सहयोग से आप लुधियाना आचार्य श्री मोती राम जी महाराज के श्रीचरणों में पहुंचे । छोटे से गांव बनूड़ में वृक्ष के नीचे संयम ग्रहण किया और जैन समाज में आपने अपने गुरु के साथ अपना नाम भी अमर कर लिया । 

राहों में जिस स्थान पर आपका जन्म हुआ वहाँ पर आज भी स्मरणिय स्थल बना हुआ है । बनूड़ में जिस वृक्ष के नीचे आपकी दीक्षा हुई उस वृक्ष को या उस स्थान को हमारा जैन समाज समेटकर न रख सका नहीं तो आज भी वह पावन स्थली हमारे लिए प्रेरणादायी होती । सिक्ख धर्म के अनुयायियों को देखो जहां पर गुरु ने दातुन की, विश्राम किया, भोजन किया या कोई भी कार्य किया वहाँ पर गुरुद्वारा बन   गया । हम सिक्ख कौम से गुरु समर्पण की शिक्षा लें । जो गुरु ने कह दिया उसी मार्ग पर वे आगे बढ़ते हैं । आज हम आचार्य भगवंत का जन्म-दिवस मना रहे हैं । इस दिवस पर कुछ ग्रहण करें । जीवन में समता को लेकर आएं । आचार्यश्रीजी का जीवन कितनी विकट परिस्थितियों में बीता । प्लेग की भयंकर बीमारी हुई । कुल्हे की हड्डी टूट गई । केंसर जैसा प्राणघातक रोग हुआ । आंखों की रोशनी चली गई फिर भी उन्होंने अपना पुरुषार्थ नहीं छोड़ा । कहते हैं आगमों की टीका का लेखन कार्य चन्द्रमा की रोशनी में किया । आज उनकी टीका के मुकाबले इस संसार में कोई टीका नहीं है । हमने उनके समस्त आगमों का पुनः प्रकाशन करवाया । आप सभी उनके आगमों को अपने घर में रखें । प्रतिदिन स्वाध्याय करें । आचार्यश्रीजी का जीवन ध्यान और स्वाध्याय का संगम था । आपके जीवन में साधना सर्वोत्तम थी । साधना के बल पर ही आप विदेशों की बातें भी बता देते थे । आपकी समता, सहनशीलता, देह में रहते हुए देहातीत अवस्था हमें कल्याण की ओर ले जाती है । आचारांग सूत्र में आचार्यश्रीजी ने स्पष्ट शब्दों में सोऽहं की साधना का उल्लेख दिया है और इसी साधना द्वारा अवधिज्ञान की प्राप्ति का वर्णन भी किया है । 

पंजाब प्रवर्Ÿाक पूज्य श्री शुक्लचंद जी महाराज यथानाम तथा गुण सम्पन्न थे । आपका जीवन विमल, निर्मल था । आप शुक्ल ज्योति से परिपूर्ण थे । आपको शिव-शंकर के नाम से भी पुकारा जाता  था । जैन समाज में अपनी लेखनी के द्वारा शुक्ल जैन रामायण जैसे कई कालजयी ग्रन्थों की रचना की । आप आशुप्रज्ञ कवि थे । संतों को संयम में दृढ़ रहने की सतत् प्रेरणा देते थे । पावन जन्म-दिवस पर हमारी हार्दिक भावना है कि हम सब उन महापुरुषों के बताए हुए मार्ग पर अग्रसर होकर मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करें । 

इस अवसर पर विद्वान संत श्री श्रीयश मुनि जी महाराज, महासाध्वी डाॅ0 शिवा जी महाराज आदि ने भी अपने श्रद्धा-सुमन अर्पित किए । आत्म-शुक्ल जनम जयंती सामूहिक सामायिक एवं एकासन दिवस के रुप में मनाई गई । इस अवसर पर तपस्वी भाई बहिनों का स्वागत सम्मान श्रीसंघ की ओर से किया   गया ।   

जिससे तŸव का बोध हो वह ज्ञान है

आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

02 सितम्बर, 2009: ऋषभ विहार, दिल्ली युग पुरुष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- प्रभु महावीर का एक ही लक्ष्य था कि मुझे मोक्ष चाहिए उस मार्ग में जितनी भी बाधाएं आई उन सबको सहन किया तथा क्षत्रिय का संकल्प धारण कर उसकी पूर्ति के लिए साधना मार्ग पर जुट गए । हमने चार गति चैरासी लाख जीवयोनी में भ्रमण करते हुए अनेक संकल्प संसार के लिए किए । हम संसार में कर्म के कारण उलझे हैं । अज्ञान दशा के कारण कर्म का बंधन हो रहा है । हमने यह मिथ्या भ्रम पाल रखा है कि मैं शरीर हूँ और इसी कारण कर्म का बंधन होता जा रहा है । जीव को शरीर समझा और शरीर को जीव । सारी उम्र शरीर के साथ रहे इस शरीर पर बीमारी आई, बुढ़ापा आया उसे भी सहन किया परन्तु स्वयं के स्वभाव को नहीं जाना । जो सदैव  आपके साथ रहती है उस चेतना का अनुभव नहीं किया इसीलिए संसार में भटक रहे है । आत्म-ज्ञान, आत्म-दर्शन हमारे भीतर है । आत्मा का निजगुण केवल जानना और देखना है । अरिहंत, सिद्ध इस निजगुण में रमण करते हैं । आचार्य इस निजगुण को जानकर, समझकर उसे स्वयं आचरण में लाते हैं और औरों को आचरण में लाने की प्रेरणा देते हैं । 

नवकार महामंत्र के चैथे पद पर श्री उपाध्याय जी महाराज आत्मा के निजगुण को जानते हैं औरों को उसके बारे में बताते हैं परन्तु अभी उसका अहसास नहीं किया । भीतर की प्रज्ञा जागरुक नहीं हुई । आप उपाध्याय है उप यानि समीप, अध्याय यानि अध्ययन करना । आप ज्ञान और आचरण के साथ दूसरों को सही समझ देते हैं । भगवान महावीर ने ज्ञान की तीन कसौटियाँ बताई है । पहली है- जिससे तŸव का बोध हो वह ज्ञान । दूसरी है- जिससे चिŸा शांत हो वह ज्ञान । तीसरी है- जिससे आत्मा-शुद्ध हो वह ज्ञान । तŸव क्या है ? पूरे ब्रह्माण्ड में दो ही तŸव है जीव और अजीव । जब सम्यक् दर्शन भीतर आती है तब जीव का अहसास होता है । धर्म क्रिया में नहीं धर्म तो ज्ञाता-द्रष्टा-भाव में है । जब हम ज्ञाता-द्रष्टा-भाव में होते हैं तब कोई कर्म-बंधन नहीं होता । 24 तीर्थंंकर भगवंतों में तीन चक्रवर्ती भी हुए हैं भगवान शांतिनाथ, भगवान कुंथुनाथ और भगवान अर्हनाथ । चक्रवर्ती को 6 खण्ड पर विजय पाने के लिए कितने शुद्ध करने पड़ते हैं । इतने युद्ध करने के बाद 6 खण्ड पर शासन करते हुए संयम को ग्रहण कर तीर्थंकर बनकर मोक्ष प्राप्त किया । 6 खण्ड विजय के युद्ध में कितने जीवों की हिंसा हुई होगी फिर भी वे मोक्ष गए । भीतर सम्यक् दर्शन था इसलिए ऐसा हुआ ।

मोक्ष तुम्हारे चित्त की स्थिति है । आत्म-दृष्टि है तो पापकर्म नहीं लगेगा । आत्म-दृष्टि नहीं है तो पापकर्म का बंधन होगा । हमारे भीतर विवेक चाहिए । भीतर विवेक होगा तो आत्म-दृष्टि आएगी और फिर कर्म-बंधन नहीं होगा । जब आत्म-दृष्टि आएगी तब चित्त स्वयं ही शांत होगा और आत्मा के चारों ओर लगे अष्ट-कर्म क्षय होते चले जाएंगे । आठ कर्मों में हमें केवल चार कर्म क्षय करने का पुरुषार्थ करना है । चार में भी केवल एक मोहनीय कर्म ही क्षय करना है । वो क्षय हो गया तो हम आत्म-ज्ञान को उपलब्ध हो जाएंगे । ज्ञान तो हमारे भीतर है बस उसका अहसास करना है, उसके अहसास के लिए साधना की आवश्यकता है जो साधना करेगा उसे आत्म-ज्ञान का अहसास अवश्य होगा ।

उपाध्याय शास्त्रों के गूढ़ रहस्यों का उद्घाटन करते हैं

आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

03 सितम्बर, 2009: ऋषभ विहार, दिल्ली  युग पुरुष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- परमात्मा के समक्ष पवित्र भाव से की गई प्रार्थना, एक शुद्ध संकल्प, हमें हृदय के द्वारा परमात्मा से मिला देता है । जो वीतरागी हैं उनके भीतर करुणा मैत्री का प्रवाह बरस रहा है उनसे केवल सिद्धत्व की मांग करना, संसार की मांग नहीं करना । अगर संसार में सुख होता तो सभी तीर्थंकर राजपाठ ठुकराकर संयम क्यों ग्रहण करते । चक्रवर्ती अपनी रिद्धि सिद्धि छोड़कर संयमित जीवन क्यों जीते । संसार में सुख नहीं केवल सुखाभास है । सुख तो भीतर है । बाहर जो सुख प्रतीत हो रहा है वह सुखाभास है । अभी जैसे भाव होंगे वैसे ही फल आगे मिलेंगे । जैसे भाव वर्तमान में भावित करोगे वैसे ही अगले जन्म के बीज आरोपित होंगे फिर वृक्ष बनेगा और फिर फल आएंगे इसलिए जैसे फल खाने हो वैसे ही भाव भावित करना । 

ज्ञान तुम्हारे पास है अनंतज्ञान तुम्हारे भीतर है । अनंत सुख तुम्हारे भीतर है आवश्यकता है उस ज्ञान और सुख को जानने की । कोई शिक्षक, प्रिंसिपल, वाईस चांसलर ज्ञान नहीं दे सकता । वो तो केवल पुस्तकों को बताने वाले हैं । उपाध्याय वो होते हैं जो भीतर का अध्ययन करवाते हैं । उपाध्याय जो स्वयं का अध्ययन करते हैं । शास्त्र को पढ़ने पढ़ाने वाले भी उपाध्याय होते हैं परन्तु केवल उनको पढ़कर शब्दों में अटकना नहीं, वाद विवाद में उलझना नहीं उपाध्याय शास्त्रों के द्वारा गूढ़ रहस्यों का उद्घाटन करते हैं । शास्त्र में तो केवल संकेत मात्र है उसकी सही विधि गुरुगम्य है जो गुरु साधना से गुजरता है वही उन शास्त्रों के अन्तर के भावों को जान सकता है । परमात्मा हर स्थान पर है धर्म किसी परम्परा सम्प्रदाय में नहीं, शुद्ध धर्म आपके भीतर है । जैसे दिन में भोजन, विश्राम आदि कार्य आवश्यक है उसी प्रकार धर्म भी जरुरी है । मन, वचन, काया से आत्म परमात्मा भाव में  जीना । कर्म रोग को आत्मा से ध्यान साधना द्वारा दूर करना यही सच्ची साधना है । 

जो तीनों लोकों में सत्य है वो तुम्हारे भीतर है वही सत्य तत्व है उसी की रुचि अपने भीतर लेकर आओ । प्रभु महावीर ने तत्व के बोध को प्राप्त करने वाले व्यक्ति को ज्ञानी बताया । चिŸा उपशान्त करने वाले व्यक्ति को ज्ञानी बताया । चिŸा अनेकों है मन में एक विचार आए तो वह हमें कहां से कहां ले जाता है । सत्य ज्ञान वही है जो  निरोध करें । विचारों में ना भटकें ऐसा उपाय हम सबको करना होगा ।

आत्म-ज्ञानी श्रेय प्रदाता होता है

आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

04 सितम्बर, 2009: ऋषभ विहार, दिल्ली युग पुरुष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- नमस्कार महामंत्र में उपाध्याय पद की चर्चा चल रही है । उपाध्याय वो जो हमें स्वयं का अध्ययन करवाएं । शास्त्रांे में उपाध्याय के लिए ज्ञान प्रदाता शब्द भी आता है । ज्ञान की तीन कसौटियों पर हम सभी चर्चा कर चुके हैं । जिनशासन में ज्ञान उसे कहा जाता है जिससे तत्व का बोध हो । जिससे चित्त का निरोध हो और जिससे आत्मा की विशुद्धि   हो । 

आत्मज्ञानी व्यक्ति के लक्षणों में ज्ञान के लिए तीन बातें और भी बतलाई है जिससे राग दूर हो जिससे श्रेय की प्राप्ति हो और जिससे मैत्री प्रवाहित हो । ज्ञानी वही है जो अपने भीतर की राग ग्रन्थियों को कम करता चला जाए । जीवन में राग बढ़ रहा है तो समझना हम ज्ञान से दूर हो रहे हैं । राग को दूर करने का सरल उपाय यही है कि हम सभी हर जीवात्मा को अपने समान जाने । हर एक जीव के भीतर वो ही आत्मा है जो मेरे भीतर है । अन्तर तो केवल बाहर दिखने वाले पुद्गलों का है और ये पुद्गल मिटने वाले हैं । 

ज्ञानी के लिए श्रेय की प्राप्ति बतलाई । संसार में दो मार्ग है श्रेय का मार्ग और प्रेय का मार्ग । श्रेय का मार्ग हमें कल्याण की ओर ले जाता है प्रेय का मार्ग हमें संसार की ओर ले जाता है । जीवन में जब श्रेय आएगा तो हम मुक्ति के निकट होंगे और हमारा राग स्वतः दूर होगा फिर आत्मा की विशुद्धि होगी, चित्त में उपशांति होगी । जहाँ प्रेय होगा वहां कर्मों का बंधन होगा और हम संसार चक्र में घूमते रहेंगे । जिससे मैत्री करुणा भीतर बढे उसे भी आत्म-ज्ञान का लक्षण बतलाया है । 

जीवन में हर प्राणी के प्रति मैत्री का भाव आएगा वही व्यक्ति करुणावान होगा और वही मुक्ति के मार्ग पर आगे बढ़ने वाला होगा । हम आत्मज्ञान को भली भांति समझते हुए उसे अपने भीतर उतारने का यत्न करें । स्वयं के समीप रहकर स्वयं का अध्ययन करें तभी मानव जीवन की सफलता है । 

सत्य की शिक्षा दें वही सच्चा शिक्षक

आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

05 सितम्बर, 2009: ऋषभ विहार, दिल्ली  युग पुरुष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- आज का ये मंगल पावन दिवस श्रमणी सूर्या उप प्रवर्तिनी महासाध्वी डाॅ0 सरिता जी महाराज का 58 वां जन्म-दिवस हम सभी मना रहे हैं और आज शिक्षक दिवस भी है और हमारी चर्चा नमो उवज्जासाणं के साथ ज्ञान पर चल रही है । डाॅ0 राधाकृष्णन बहुत बड़े राजनेता थे । आपने अपने जीवन में सादगी को अपनाया । मैंने डी0ए0वी0 काॅलेज जालंधर में एफ0ए0सी0 नाॅन मेडीकल के समय में आपको देखा था । आपकी स्पीच हमारे काॅलेज में हुई थी मुझे आज भी याद है दर्शन शास्त्र में आपकी गहरी पेठ थी । मैंने जब एम0ए0 दर्शन शास्त्र किया तब भी आप द्वारा लिखित पुस्तकों का अध्ययन किया । डाॅ0 राधाकृष्णन गरीब घर में जन्में और जिन्दगी में पुरोहित बनने की भावना थी । माता पिता चाहते थे कि पुरोहित बन जाएगा तो हम सुख से जीवन यापन करेंगे । परन्तु उस महापुरुष ने अपने नाम के साथ अपने माता पिता के नाम को रोशन कर सदा-सदा के लिए अपने को अमर कर लिया । आज भी उनकी याद में हर स्कूल, काॅलेज में शिक्षक दिवस मनाया जाता है । आज के दिन शिक्षकों का आदर किया जाता है । सच्चा शिक्षक वही है जो हमें सत्य की शिक्षा दे, हमें सत्य की ओर लेकर जाएं बाकी तो सब सूचना प्रदान करने वाले हैं । उपाध्याय का मतलब ही यह होता है कि जो ज्ञान के भण्डार की गहराई प्रदान करें । 

आज श्रमणी सूर्या उपप्रवर्तिनी महासाध्वी डाॅ0 सरिता जी महाराज का 58 वां जन्म दिवस हम सभी मना रहे हैं । महासाध्वीजी का और मेरा निकट का संबंध रहा है । जब मेरी दीक्षा नहीं हुई थी तब जब-2 आप मलौट आए तो आपकी सेवा का अवसर मिला । उस समय में मेरंी गहन प्यास थी भगवान महावीर की साधना को प्राप्त करने की और उसी प्यास को लेकर मैं हर साधु साध्वी को प्रश्न करता था । आपकी रुचि जप तप स्वाध्याय में अधिक है । उसके साथ आप वर्तमान में ध्यान साधना की ओर भी अग्रसर हो रही हैं । आपके जीवन की कर्मठता, अप्रमत्ता हमें एक संदेश देती है । मैं चाहता हूँ आपका जीवन एक तालाब ना बनकर सरिता बने । तालाब का पानी को कुछ लोगों को ही सहायता देता है परन्तु सरिता का जल हर व्यक्ति की पिपासा को शांत करता है । आपके भीतर समस्त सद्गुण सदा प्रवाहित हो । श्रमण संघ के प्रति आपका समर्पण ऐसा ही बढ़ता चला जाए और भगवान महावीर की वाणी है जिस श्रद्धा से आपने संयम अंगीकार किया है उस श्रद्धा और भावना से आप धर्म मार्ग पर अग्रसर हों । अपने जीवन में साधना को महŸव देते हुए अपनी भव परम्परा को क्षय कर मुक्ति की ओर अग्रसर हो यही हार्दिक मंगल भावना । मैं इस अवसर पर श्रमण संघ की ओर से आपको महाश्रमणी के पद से अलंकृत करता हुआ आदर की चादर प्रदान करता हूँ । समस्त श्रावक वर्ग से एक प्रेरणा है कि आज के दिवस महासाध्वीजी के 58वें जन्म दविस पर कम से कम 58 गायों को अभयदान दें । 

जिनवचनों को अनुभव के द्वारा भीतर उतारो

आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

07 सितम्बर, 2009: ऋषभ विहार, दिल्ली  युग पुरुष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- यह मानव जीवन हम सबको मिला । अनमोल श्वासें मिली । पत्नी, बच्चे, धन, दौलत जो कुछ चाहा वो सब कुछ प्राप्त किया । शरीर भी पांचों इन्द्रियों से परिपूर्ण मिला । ये शरीर जब तक श्वासें हैं तब तक बड़ा उपयोगी है । श्वांस टूट जाने पर इसकी कोई कीमत नहीं । बाद में तो ये मिट्टी का मिट्टी में समा जाना है फिर उस मिट्टी को देखकर इसका अनुमान नहीं लगाया जा सकता कि ये मिट्टी राजा की है या रंक की । चोर, संयासी, पुरुष, स्त्री, धनवान, निर्धन सबकी मिट्टी एक समान होनी है । थोड़ी सी जिन्दगी पर हमारा कितना बड़ा अहंकार है । क्या तुम जानते हो कि वास्तव में तुम कौन हो ? पशु-पक्षी, नारकी, देव ये तो जान ही नहीं सकते क्योंकि इनके पास वैसा शरीर नहीं और शरीर होने के बाद भी वैसी बुद्धि विकसित नहीं है । केवल मानव जान सकता है कि मैं कौन हूँ । कभी एकान्त में बैठकर अपने आप से पूछो कि मैं कौन हूँ, क्या धन पद रिश्ते मेरे हैं । भगवान महावीर स्वामी को 27 जन्म और साढ़े बारह वर्ष लगे इसको जानने में फिर अन्तर अनुभूति हुई कि मैं आत्मा हूँ उसके बाद उन्होंने उस अनुभूति को सबमें बांटा । 

प्रभु ने जो कहा वह शाश्वत् है, अटल सत्य है यह मार्ग सनातन है । अनंत तीर्थंकरों की वाणी एक ही है आवश्यकता है हमारी श्रद्धा की । जो व्यक्ति जिनवचनों में अणुरक्त होता है जिनवचनों को सम्पूर्ण भावों से स्वीकार करता है वो अपनी भव-परम्परा को कम कर लेता है, इसीलिए भगवान की वाणी पर विश्वास रखो कि मैं आत्मा हूं पर केवल विश्वास रखना ही काफी नहीं है आप सभी इसकी अनुभूति भी करे । जिस देह पर हम सभी आसक्त हो रहे हैं वो मल मूत्र से भरा हुआ एक पिंजरा है जो एक दिन टूट जाना है । इस शरीर में जो 9 द्वार है वो बाहर केवल मलमूत्र ही फैंकते हैं परन्तु उन 9 द्वारों का भीतर की ओर उपयोग किया जाए तो हमें सिद्धियां प्राप्त हो सकती है । भीतर की आंख हमारी खुल सकती है । वास्तव में सच्चा ज्ञान तो भीतर ही है बाहर का ज्ञान ज्ञान नहीं केवल सूचना है । किसी की बातों पर विश्वास करने से पहले स्वयं प्रयोग से गुजरना और स्वयं का अनुभव होना आवश्यक है । अगर स्वयं का अनुभव हो गया तो फिर उस बात पर पूर्णतः विश्वास हो जाएगा । 

राजा जनक एक बार विश्राम कर रहे थे । विश्राम में स्वप्न देखा कि मेरे राज्य में बहुत अकाल पड़ गया है । खाने के लिए अन्न नहीं, पीने के लिए पानी नहीं । अन्न और पानी की खोज में वो जंगल में पहुंच गए । दूर-दूर तक कहीं कोई पानी या खाने की वस्तु दिखाई नहीं दे रही । इतने में आकाश मार्ग से एक चीज मांस का टुकड़ा लेकर जा रही थी दूसरी चील उस पर झपटी और वो टुकड़ा नीचे गिर गया । राजा जनक की आंखों खुली तो देखा मैं राजमहल में हूं और सब कुछ ठीक है तो सोचने लग गए कि क्या सच है ? प्रातःकाल होने पर अपने गुरु अष्टावक्र के पास पहुंचे और उन्हें सारा वृतांत सुनाया और पूछा कि क्या सच है ?तो अष्टावक्र कहते हैं ना ये सच है और ना वो सच है । जो स्वप्न देख रहा था वो दृष्टा सच है । इसीलिए कहा जाता है कि आत्म-द्रष्टा बनो, स्वयं को जानो, स्वयं को देखाो, स्वयं को समझो ।

जीवन एक खोज है

आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

08 सितम्बर, 2009: ऋषभ विहार, दिल्ली  पुरुष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- ये जीवन, श्वासें नदी के पानी की भांति बही जा रही है । ये जीवन एक खोज है उससे महाखोज की प्राप्ति हो सकती है । जिन्दगी में हम क्या कर रहे हैं श्वांस लेना, चलना, उठना, बैठना, खाना, धन, दोस्त, पद, परिवार वृद्धि, तर्क, वितर्क क्या इसी का नाम जिन्दगी है । अभी तक के इस जीवन में हमने यही कुछ किया है । इस जीवन में आप क्या करना चाहते हैं और क्या कर रहे हैं इन दो बातों का अपने आंखों के सामने विश्लेषण करो । हम चाहते हैं प्रकाश को और अंधकार जीवन में बढ़ता जा रहा है । बसंत की चाह में जीवन में पतझड़ आ रहा है । सुख आनंद के लिए यत्न कर रहे हैं परन्तु दुःख ही मिल रहा है । क्या हमारा मार्ग सही है । अगर मार्ग सही नहीं है तो फिर उसे सही करना होगा । 

जीवन एक खोज है यहां पर हर कोई खोज कर रहा है । कोई संसार की खोज कर रहा है तो कोई मोक्ष की । जन्म लेने के बाद जिसे खोजना था उसकी खोज की नहीं और जिसे नहीं खोजना चाहिए था उसी में उलझते चले गए । ये मानव जीवन मोक्ष की प्राप्ति के लिए मिला परन्तु उसकी खोज की नहीं । संसार की होड में अपने आपको संलग्न करते रहे । रेत को रगड़ने से तेल की प्राप्ति नहीं होती । सही मार्ग पर जाना है तो सही दिशा भी पकड़नी होगी । मार्ग तो सही चाहते हैं परन्तु दिशा सही नहीं है तो क्या होगा ? निराशा के अलावा हाथ कुछ नहीं लगेगा । 

जीवन की खोज में अपने को जीतना है जिसने स्वयं को जीतकर उसका साक्षात्कार कर लिया उसने सब कुछ पा लिया । जिसने अपने को जीता वह आनंद में है और जो अभी भी दूसरों पर शासन करके आनंद मना रहा है वो इस समय में भी दुःखी है और आगे भी दुःखी होगा । सिकन्दर विश्व विजेता बनना चाहता था और फिर आनंदित, सुखी जीवन की कल्पना कर रहा था उसके गुरु ने उसे प्रारंभ में सुख से जीवन जीने की बात कही तो उसने उस बात को स्वीकार नहीं किया फलश्रुति यह हुई कि वह अपनी कर्ममैल को बढ़ाता हुआ दुःखपूर्वक मौत मरा । वस्तुतः सुख बाहर नहीं सुख हमारे भीतर है, ज्ञान हमारे भीतर है हम इस चमन को देखें जिस चमन के हम फूल हैं । फूल और पत्तियों को देखने से कोई लाभ नहीं होगा । चमन को देखते हुए उसके भीतर के अनंत आनंद का अनुभव करें । हर श्वांस के साथ अपने आप से जुड़े तो हमारी जीवन की खोज सार्थक सिद्ध होगी । 

जीवन का अविस्मरणीय आत्म साधना

आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

09 सितम्बर, 2009: ऋषभ विहार, दिल्ली युग पुरुष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- आनंद हमारा स्वभाव है, शांति हमारे भीतर है, ज्ञान हम स्वयं है । ध्यान साधना में हम श्वासों का सही उपयोग करते हैं । हर श्वांस पर ज्ञातादृष्टा-भाव से समभावपूर्वक ध्यान करते हैं जिससे आने वाली हर श्वांस सफल होती है । हर श्वांस में स्वयं के करीब आएं । जब व्यक्ति हर श्वांस में स्वयं के करीब आएगा तो कर्मों की ग्रन्थियां स्वतः टूटती चली जाएगी और एक दिन अपना घर सिद्धालय उसे प्राप्त होगा ।

हमारी आत्मा जीवन का सार है हम अत्यधिक ध्यान नहीं देते वह कहीं जाने वाली नहीं है वह अगोचर है उसके ऊपर जो कर्म-मल लगा है उसे मिटाने का पुरुषार्थ करें । हर श्वांस में मैं और मेरा परमात्मा का ध्यान रहे । परमात्मा के पास जाने का आधार नाम स्मरण है । अपने स्वरुप का चिन्तन मैं कौन हूँ ? कहाँ से आया हूँ ? और हर श्वांस में सिद्धों को नमन यही जीवन का सार है । ये श्वासें हमें भी मिली और प्रभु महावीर, गणधर गौतम, चंदनबाला आदि को भी मिली, उन्होंने अपने श्वासों का सदुपयोग किया । हम भी अपने जीवन में श्वासों का सदुपयोग करें । हर श्वांस का मूल्य हीरे जवाहरात से बढ़कर है । हम हर श्वांस का उपयोग करते हैं तो उस श्वांस में असंख्यात कर्मों की निर्जरा होती है । 

आज आत्म ध्यान साधना कोर्स बेसिक एवं एडवांस-ा जो कि पिछले तीन दिनों से चल रहा था उसका समापन हुआ । जिसमें करीब 80 साधकों ने ध्यान साधना के द्वारा सच्ची शांति, आनंद, ज्ञान का अनुभव अपने भीतर किया । इस साधना शिविर से उन्होंने वीतराग सामायिक का प्रशिक्षण प्राप्त किया । साधकों ने अपने अनुभव बताते हुए कहा कि ये साधना अपने आपमें अनूठी है । शरीर और आत्मा का भेद करने से कोई समस्या रहती ही नहीं । साधना करने से शरीर बहुत हल्का हुआ । तनाव दूर हुए और भीतर एक अविस्मरणीय पल का उद्घाटित हुआ । 

इस अवसर पर सिद्धयोग के प्रमुख श्री नारायण काका विशेष-रुप से नासिक से   पहुंचे । उन्होंने अपने अनुभवों को बांटते हुए जन-मानस को साधना से जुड़ने की प्रेरणा प्रदान की । आचार्यश्रीजी के बाह्य व्यक्तित्व से प्रभावित होकर अभिभूत हुए । 

अनुभव-ज्ञान ही सच्चा ज्ञान है

आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

10 सितम्बर, 2009: ऋषभ विहार, दिल्ली  युग पुरुष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- प्रभु ने फरमाया तीनों लोंको में यदि कोई ग्रहण करने योग्य है, यदि कोई जानने योग्य है तो वो तुम हो । तुम अजर, अमर, शाश्वत हो जिसने सत्य तŸव को जान लिया उसने सब कुछ जान लिया । उस एक तत्व को कैसे जाने ? जीवन के भवन में उस तत्व का प्रवेश जन्म से है । उस तत्व को अनुभव से जाना जा सकता है । अनुभव ज्ञान नहीं है, ज्ञान के साथ जो सीख पैदा होती है वो ज्ञान है जैसे एक छोटा बालक आग की लाल लपटों को देखकर उसकी तरफ आकर्षित होता है । अग्नि में हाथ डालता है फलतः उसे अग्नि का आभास होता है फिर वह जान जाता है कि इसमें हाथ नहीं डालना चाहिए । यह उसका अनुभव उससे उसे सीख मिली और वही उसका ज्ञान बन गया । 

आदमी समझता है मैं ज्ञानी हूँ । जब ऐसी समझ भीतर आ जाए तो जानना कि तुम कुछ सीख नहीं सकते क्योंकि ज्ञान प्राप्ति के लिए प्रथम आवश्यक है विनम्रता । विनम्रता भीतर आएगी तो ज्ञान भीतर आएगा । जब व्यक्ति स्वयं को अज्ञानी मानना प्रारंभ करता है तब ज्ञान की शुरुआत होती है जब ज्ञान का अनुभव होता है तो ध्यान भीतर प्रवेश करता है । सागर का अनुभव एक बूंद के द्वारा हो जाता है । एक बूंद से पता चल जाता है कि सागर का जल कैसा है ? बहनें खाना बनाती है तो थोड़ा सा चख लेती है उस चखने से उन्हें पता चल जाता है कि खाना कैसे बना है ।

भगवान महावीर फरमाते हैं कि तुम सुनो, सुनकर कल्याण मार्ग और पाप मार्ग को जानो फिर उन दोनों में से तुम्हें जो ठीक लगे उसे स्वीकार कर लो । हम जानते हैं कि पाप मार्ग हमें नीच गति की ओर ले जाता है परन्तु जानकर भी हम पाप किए जा रहे हैं । हम अपने जीवन को देखें । हम जानते हैं कि कषाय करने से कर्मबंध होता है परन्तु अभी तक कषाय छूटे नहीं । अनुभव बड़ा होता है अनुभव से हम कुछ सीख लें । लाओत्से ने वृक्ष से गिरते पत्ते को देखकर मानव जीवन के ढ़लान की सीख प्राप्त की । तुम भी कुछ ऐसी सीख भीतर लो प्यास पैसा करो प्यास है तो पानी की कीमत है भूख है तो भोजन का मूल्य है। विनय है तो ज्ञान की कीमत है । इस जगत के समस्त ग्रन्थों में यही बात बताई है कि हृदय में नाम स्मरण होना चाहिए, मन में दयाभाव होना चाहिए और तन सेवा में समर्पित होना चाहिए ऐसा करने से हमें अनुभव ज्ञान प्राप्त होगा और हम परमात्म मार्ग पर अग्रसर होंगे ।

जो जाग गया वह मुनि है

आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

11 सितम्बर, 2009: ऋषभ विहार, दिल्ली  युग पुरुष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- हमारे जीवन में संतत्व कैसे आए । हमारा जीवन समता और शांति से परिपूर्ण केसे हो ? हम कैसे संतुलित जीवन जीएं । नवकार महामंत्र में चैदह पूर्वों का सार समाया है, नमो लोए सव्व साहूणं में समस्त साधुओं को नमस्कार किया गया है । पंच परमेष्ठी नमस्कार मंत्र किसी धर्म सम्प्रदाय में बंधा हुआ नहीं है यह मंत्र शाश्वत है और सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय है । एक जीवन प्रभु महावीर, बुद्ध, राम को मिला और एक जीवन हमको । उन्होंने संकल्प के द्वारा शिवत्व को प्राप्त कर लिया । हमारा संकल्प कमजोर है इसलिए हम वहाँ तक नहीं पहुंचा पा रहे हैं जहाँ तक हमें पहुंचना चाहिए । 

लोक के समस्त साधुओं को नमस्कार करते हुए भगवान ने मुनि की परिभाषा में बताया कि जो जाग गया वह मुनि है । जो अप्रमŸा है वह मुनि है, मुनि केवल साधु वेश से नहीं  होता । आप सामायिक स्वाध्याय में हो और प्रमाद में हो तो फिर वो सामायिक स्वाध्याय आपकी कर्म-निर्जरा का कारण नहीं बन सकता । एक व्यक्ति अप्रमत्त जीवन जीता है परन्तु मुनिवेश नहीं है फिर भी वह मुनि है । जो गुरु अपने भक्तों को बांधे वह गुरु हो नहीं सकता क्योंकि गुरु किसी धर्म सम्प्रदाय में नहीं बंधता और धर्म सम्प्रदाय तो शरीर के होते हैं जब हम शरीर है ही नहीं फिर केसा धर्म और सम्प्रदाय । हम संतत्व की पूजा करें ना कि पंथ की ओर आगे बढ़ें । हर जीवात्मा में सत्य को देखें । हम वर्तमान में अपना सांसारिक परिचय देते हैं परनतु भगवान ने कभी सांसारिक परिचय नहीं दिया । उन्होंने कभी नहीं कहा कि मैं राजा सिद्धार्थ और माता त्रिशला का पुत्र हूं आज के किसी व्यक्ति को उसका नाम ना पूछो या उसका परिचय ना जानो तो बड़ा अटपटा सा लगता है वर्तमान में जो परिचय बिढ़ाने की परम्परा चली है वह मुक्ति की ओर नहीं ले जाएगी । 

संत ऐसा हो जिसके भीतर कोई ग्रन्थी ना हो जो हमेशा शांत मन वाला सत्य में जीवन जीने वाला और सत्य के बल पर आगे बढ़ने वाला हो । यह हम सभी जानते हैं कि घर, परिवार, परिजन कोई साथ नहीं देगा । जो मेरा तेरा करता है वह संत नहीं है । जो वैर की गांठ को बांधता या बढ़ाता है वह संत नहीं हो सकता । संत के लिए कहा है- लेना एक ना देना दो, ऐसा नाम संत का हो । इसका तात्पर्य यही है कि संत केवल एक लेता है और वह है परमात्मा का नाम और दो चीजें संत कभी नहीं देता वो है श्राप और वर । जो श्राप या वर देता है वो संत हो नहीं सकता । जो तुम्हें संसार दे वो संत हो नहीं सकता । हमने स्वयं ने संसार त्याग दिया तो हम तुम्हें संसार कैसे दे सकते हैं । संत समूचे विश्व को अपना परिवार जाने । खुले दिल से हर व्यक्ति का स्वागत करे और हर परिस्थिति में समभाव में जीए यही संतत्व का सार है ।

मुनि वेश से नहीं साधना से होता है

आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

 

12 सितम्बर, 2009: ऋषभ विहार, दिल्ली  युग पुरुष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- भारत की संस्कृति में संत का विशेष महŸव है । संत वेशभूषा परमपरा में रहते हुए भी उससे ऊपर है । प्रभु महावीर ने मुनि की परिभाषा करते हुए कहा मुनि जो मौन हो गया, शांति और समता जिसके भीतर आ गई । मुनि जो हर क्षण सामायिक की साधना में जीता है । सामायिक की साधना श्रावक की भी होती है और मुनि की भी होती है । श्रावक दो घड़ी के लिए सामायिक करता है और मुनि की जीवन भर की सामायिक है । सामायिक की साधना आत्म-दृष्टि की साधना है जिसमें समस्त पापकार्यों का त्याग तीनों योगों और तीनों करणों का त्याग कर आत्म-भाव में स्थित होना होता है । प्रभु महावीर ने हमें सामायिक साधना के द्वारा शुद्ध धर्म की परिभाषा दी है । 

हम जैसे लोग परम्पराओं में बंधकर शुद्ध धर्म में भेद-रेखा खींचते हैं । ये संसार का चक्र अनादिकाल से चल रहा है इस भव भ्रमण का मूल कारण मोह है जिसे बुद्ध ने अज्ञान कहा । वेदान्तियों ने माया कहा । हम इस मोह-माया से दूर हो शुद्ध धर्म में स्थापित हो  जाए । साधु वही है जो शरीर और आत्मा की भिन्नता का पुरुषार्थ कर रहा है । ईशु ने कहा- बिस्तर पर एक व्यक्ति मरा हुआ है और एक व्यक्ति जागता हुआ है जो सोता है वो मरा है जो जागा है वह जागृत है । यदि मौत ना होती तो धर्म ना होता । स्वर्ग नरक का भय ना होता और कोई भी धर्माचरण करता ही नहीं । केवल मौज मजे की जिन्दगी जीते परन्तु भगवान की वाणी सत्य है ये जीवात्मा 84 लाख जीवयोनी में अनादिकाल से भ्रमण कर रही है । इस भव भ्रमण को हटाना है तो आत्म चिन्तन में लगना होगा । आत्मा का कोई रंग, रुप, आकार नहीं है उसे केवल तीर्थंकर की वाणी से श्रद्धा से ही जाना जा सकता है । 

मुनि वेश से नहीं साधना से होता है । जिसने वेश धारण नहीं किया परन्तु साधना मुनियों से भी ऊँची है वो घर में रहते हुए भी मुनि है । भीतर एक जागरुकता बनी रहे हे परमात्मा कैसी भी स्थिति हो मेरी समता कभी डांवाडोल ना हो । भीतर आत्म-दृष्टि बनी   रहे । इस जगत के जीव मात्र के लिए मेरे भीतर मैत्री भावना प्रवाहित हो । गुणियों के प्रति प्रमोद भावना हो । दीन दुखियों के प्रति करुणा भावना हो । वर्तमान में कितने जीव भूखे हैं पशु पक्षी सूर्योदय से लेकर रात्रि तक केवल भोजन की तलाश में ही हजारों मील यात्रा करते हैं । बरसात, सर्दी, धूप में कैसे जीवन यापन करते हैं । ऐसे में उन समस्त जीवों के लिए करुणा भावना हो और इन भावनाओं को भावित करते हुए भीतर आत्म रमण हो कि मैं शुद्ध, बुद्ध, आत्मा हूं । सुख, दुःख, वैर, मित्रता, भवन, जंगल, योग, वियोग सबमें मेरा समत्व भाव बना रहे, यही प्रभु महावीर की सच्ची साधना है ।  

आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

13 सितम्बर, 2009: ऋषभ विहार, दिल्ली  युग पुरुष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- मानव जीवन मिलने के बाद आत्म-ज्ञान होना आत्म-दृष्टि होना और जीवन का लक्ष्य तय होना आवश्यक है उसके लिए जरूरी है स्वयं की पहचान । जब व्यक्ति को स्वयं की पहचान हो जाएगी फिर वह संसार में परिभ्रमण ना करता हुआ मुक्ति की ओर अग्रसर होगा । हमारा लक्ष्य है मोक्ष प्राप्त करना । मोक्ष प्राप्ति के लिए मिथ्यात्व से सम्यक्त्व में आना जरुरी है । मिथ्यातव से सम्यक्त्व में आना ही आत्म-ज्ञान आत्म-दृष्टि है । 

मिथ्यात्व है मैं और मेरे का भाव । जहां-जहां में बड़ा मैं अच्छा मैं उंचे पद वाला, मैं अमीर ऐसी भावना आएगी वहां हम मिथ्यात्व में और कर्म-बंधन में है । जहां हम मन, वचन, काया से जुड़ेंगे वहां कर्म-बंधन होगा । इस संसार में जो कुछ मेरा है उसे मेरा समझना, उस पर अपना अधिकार जताना कर्म-बंधन है और यही मिथ्यादृष्टि है । इससे विपरीत हमें सम्यक् दृष्टि में आना है । सम्यक् दृष्टि यानि स्व में जीना । स्व है हमारी आत्मा । उसमें रमण करना । मन, वचन, काया से पार शुद्धात्मा की साधना करना । विचार, संस्कार, धारणा और परम्परा के पार केवल एक आत्म-भाव में जीवन यापन करना यही सम्यक्त्व है, यही सत्य दृष्टि है । अरिहंत हमारे पिता हैं जिनवाणी हमारी माता है और हम शुद्धात्मा हैं इसके अलावा हमारा कोई भी परिचय ना हो और इस आत्म-प्रतीती को पाने के लिए मोक्ष की साधना के लिए साधना शिविरों से शुद्ध सामायिक से गुजरना आवश्यक है, जब ऐसा होगा तो जीवन सुन्दर होगा और हम मुक्ति की ओर आगे बढ़ेंगे ।

आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

14 सितम्बर, 2009: ऋषभ विहार, दिल्ली युग पुरुष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- अरिहंत परमात्मा को नमन । अरिहंत परमात्मा करुणा के सागर है, संसार सागर से पार ले जाने वाले हैं स्वयं तिर गए औरों को तारने वाले परमात्मा कब हम इस संसार सागर से पार हो जाएंगें । कब हम तिर जाएंगे । हमारा पहला आधार आप हो । हमारी आप पर पूर्ण श्रद्धा है । अरिहंत वाणी पर श्रद्धा होना बहुत आवश्यक है । जो भी संसार सागर में भ्रमण कर रहे हैं अगर वो पार जाना चाहते हैं तो श्रद्धा से ही पार हो सकते हैं । बिना श्रद्धा के जीवन में कुछ भी नहीं होता श्रद्धा परम दुर्लभ है । अगर कोई व्यक्ति कहे कि मैं अरिहंत पर कैसे श्रद्धा करूं । मैंने तो उनको देखा ही नहीं है हमने तो हवा को भी नहीं देखा है परन्तु उसका अहसास और अनुभव हमारे पास है इसलिए हम उस पर श्रद्धा करते हैं, इसी प्रकार अरिहंतवाणी हमारे पास है इसलिए उन पर श्रद्धा करनी परमावश्यक है । 

जो अरिहंत द्वारा प्ररुपित मार्ग पर चलते हैं और उनके द्वारा प्ररुपित धर्म को ही जीवन में धारण करते हैं वे ही उनके अनुयायी और सच्चे साधक है, जब जीवन में राग द्वेष क्षय हो जाता है क्रोध, मान, माया लोभ हट जाते हैं तब वीतरागता जीवन में आती है और ऐसे समय में व्यक्ति तीन गुप्ति की साधना की ओर आगे बढ़ता है । सच्चा साधु वही है जो अपने कषाय क्षय करे, व्यवहार से पांच समिति का पालन करें और तीन गुप्ति में जीवन गोपन करें । साधु की साधना का तुम्हारे पास कोई मापदण्ड नहीं समझने सीखने की ग्राहकता होनी चाहिए । सीखने की नम्रता होनी चाहिए । कई साधु विनम्र होते हैं वेा वो बहुत थोड़े समय में ही ज्ञान अर्जित कर लेते हैं और कई साधु अहंकारी होने से ज्ञान का प्राप्त नहीं कर पाते । 

आचार्य श्री आनंद ऋषि जी महाराज में यह विनम्रता का गुण विद्यमान था । आपने अनेकों भाषाएं सीखी परन्तु विनम्रता के साथ सीखी कहते हैं एक बार कोई फारसी भाषा सिखाने आया तो आप पट्टे से उतरकर जमीन पर बैठ गए और उसे गु रु के समान आदर देकर उससे शिक्षा ग्रहण की । गुरु वह है जिसके भीतर का दीया जल गया है । गुरु तो पूनम का चांद है जिसकी रोशनी में यह जहान् रोशन हो रहा है । जरुरी नहीं कि गुरु अधिक क्रियाकाण्डी हो, तुम्हारी बात श्रवण करने वाला हो । गुरु के पास बैठकर हृदय करुणा से भर जाए, चिŸा द्रवित हो जाए तो समझना सब कुछ मिल गया । गुरु अधिक क्रियाकाण्डी होगा, परम्परा धारणा में उलझने वाला होगा ऐसा नहीं हो सकता । हमारा धन, हमारी कमाई हमारी उंची करनी है । हमारी साधना ही हमारी पूंजी है जिसे कोई चुरा नहीं सकता । सच्चे संत की यही निशानी है जो हमेशा साधना में डूबा होगा, जिसके भीतर कोई शिकायत भाव नहीं होगा, जिसकी आंखों में अमिट प्रेम होगा, जिसके हृदय में असीम आनंद होगा । संत की परिभाषा करते हुए कहा है सोया-सोया मन, बुझी-2 आंखें यानि मन साधना द्वारा सुप्त हो जाए ओर आंखों अंतर को ही देखना चाहे उनमें अहंकार ना हो बस हम साधना में डूबे ।

आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

15 सितम्बर, 2009: ऋषभ विहार, दिल्ली युग पुरुष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- अरिहंत परमात्मा हमें संसार सागर से पार ले जाने वाले हैं । उनकी भक्ति और गुणानुवाद से संसार सागर से पार होने की पात्रता आती है । उनके प्रति विनय, भक्ति, आस्था उनके द्वारा प्ररुपित मार्ग पर हमें चलाती है । जिनके जीवन में उनसा आचरण आ गया तो उसका मोक्ष निश्चित है । हमारी चर्चा चल रही है साधु के जीवन पर साधु मन, वचन, काया से मौन हो, त्रिगुप्ति की साधना करने वाला हो, साधु वह है जो हमेशा बांटकर खाए व साधना में मन को लगाए । साधु हमेशा भोजन बांटकर खाता है ।साधु जब भी गौचरी लेकर आए तो सर्वप्रथम संघ के आचार्य को या अपने बड़े गुरु को उसे दिखाकर उनको आहार ग्रहण करने की प्रार्थना करें । उसके बाद सहयोगी साथियों को बांटकर फिर स्वयं खाए । सबसे पहले गुरु उसके बाद वृद्ध रोगी तपस्वी और बाल इन सबको दिखाकर फिर खाएं । 

साधु के जीवन में प्राणी मात्र के प्रति मैत्री और करुणा की भावना हो । साधु सबको प्रेम और करुणा बांटता है जिसकी आंखों में प्रेम है वह साधु है जो भीतर है वही बाहर निकलेगा । रोओगे तो अकेले रोओगे, हंसोगे तो विश्व हसेगा । जब तुम गाली देते हो तो पहले स्वयं को जलना पड़ता है फिर दूसरों को जलाते हो परन्तु जब किसी से मैत्री करते हो तो स्वयं के भीतर भी आनंद झलकता है और औरों के भीतर भी आनंद प्रवाहित होता है । 

शिरड़ी के सांई बाबा साधुता की मिशाल थे सबका मालिक एक, सबको एक समान जानते थे । मुस्लिम को राम-राम और हिन्दु को अल्लाह मालिक कहना प्राणी मात्र को एक छाया के तले जाने जैसा था । श्रद्धा और सबूरी उनके दो मंत्र थे । जिनके द्वारा उन्होंने अपना सारा जीवन यापन किया । श्रद्धा करो परमात्मा पर और हर कार्य सब्र से करो । सच्चे साधु का संतत्व यही है कि वो अपना जीवन सब्र से यापन करें । सांईबाबा को किसी भक्त ने भोजन का आमंत्रण दिया सांई आए नहीं थोड़ी देर बाद एक वृद्ध भोजन मांगने आया तो उस भक्त ने उसे लाठी मारकर भगा दिया । सायंकाल में जब वो भक्त सांईबाबा के पास पहुंचा और शिकायत करने लगा कि आज मेरी विनती होने पर भी आप मेरे यहां भोजन करने क्यों नहीं आए ? तो बाबा ने कहा मैं तो आया था तूने मुझे लाठी मारकर भगा दिया देख तेरे लाठी के निशान अभी भी पीठ पर लगे हुए हैं । ऐसे फक्कड़ संत थे जिनके भीतर जीव मात्र के प्रति करुणा थी । साधु वही है जो प्रेम और मैत्री से भरा हुआ है । संत किसी को समप्रदाय में नहीं बांधता । महावीर का साधु दीवारे खड़ी नहीं करता महावीर का साधन आपस में प्रेम करता है, ध्यान साधना के द्वारा ध्र्मा को जीवन मंे लेकर आता है । धर्म भीतर होगा तो भीतर ऋजुता, सरलआ आएगी यही साधु के लक्षण हैं फिर अरिहंत परमात्मा का साक्षात्कार होगा । जब अरिहंत का साक्षात्कार होगा तो सर्वप्रथम मिथ्यात्व दूर होगा । उसके बाद अज्ञान दूर होगा भीतर समता, सम्यक्दर्शन आएगा फिर तुम आत्मा के अस्तित्व को स्वीकार करोगे । जन्म-2 से हम मिथ्यात्व में भटक रहे हैं जब अज्ञान दूर होगा तो सम्यक् दृष्टि आएगी फिर हम आत्म-दृष्टा बन जाएंगे एसी दृष्टि में धन नाहोने पर भी भीतर की समृद्धि से आप तृप्ति हो जाओगे भीतर की दरिद्रता समाप्त हो जाएगी समृद्धि में वृद्धि होगी, शत्रुता दूर होगी । प्राणी मात्र के लिए मंगल की कामना आएगी । कोई गाली दे तो उसके लिए मंगल की कामना करोगे तुम्हारे भीतर मैत्री प्रगाढ़ होगी । भेद-भाव दिल से हट जाएगा । विकार भाव दूर हो जाएगा, यही धर्मवान सच्चे साधक के लक्षण हैं । 

आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

16, सितम्बर, 2009: ऋषभ विहार, दिल्ली  युग पुरुष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- अरिहंत परमात्मा को नमन । वास्तव में हम जो जीवन जी रहे हैं वह केवल समयपूर्ति के लिए जी रहे हैं एक जीना शरीर के लिए और एक जीना आत्मा के लिए । आत्म-ज्ञान प्राप्ति के लिए जीना ही सच्चा जीवन-यापन करना है ऐसा जीवन अनंतकाल की कर्म-श्रृंखलाओं को तोड़ डालता है । दरिद्रता समाप्त होती है समृद्धि में वृद्धि होती है । गरीबी जिसके पास जो नहीं है उसे देखती है । अमीरी गरीब से छीनकर स्वयं का पेट भरती है । अमीर वो जो महसूस करे कि मेरे पास सब कुछ है भगवान महावीर के पास कुछ भी नहीं था फिर भी वे अमीरों के अमीर थे । दीक्षा उपरान्त देवाधिदेव इन्द्र द्वारा देवदूष्य वस्त्र प्रदान किया गया परमात्मा ने आधा वस्त्र भिखारी को दे दिया और आधा कहीं झाड़ियों में अटक गया सो उसे भी छोड़ दिया । कुछ ना हेो हुए भी समृद्ध थे वो ।

दरिद्र वह है जिसे अभी भी बहुत कुछ प्राप्त करना है । भारत के संत अमीर थे क्योंकि उनके पास कोई विशाल सम्पत्ति नहीं थी, उनके भीतर तृप्ति थी । उनके भीतर संतोष का भाव था जहां संतोष का भाव था वहीं पर वे अमीरी की ओर बढ़ते चले गए । जहाँ कुछ पाने की चाहना रहती है वहाँ गरीबी आ जाती है जिसे कुछ चाहिए ही नहंी वह अमीरों का अमीर है । मिल गया तो सदा तृप्त रहता है और ना मिला तो उससे अधिक आनंदित रहता है । अमीरी और गरीबी हमारी आत्म-दृष्टि पर निर्भय है जहां अपेक्षा है वहां दुःख है । जहां उपेक्षा है वहां सुख है । दरिद्रता मांगना है और समपूर्णता केवल ग्रहण करना है । अरिहंत भक्ति से समस्त क्लेश दूर हो जाते हैं । मैं मेरा हट जाता है फिर भीतर समृद्धि आती है और वही समृद्धि हमें मुक्ति की ओर ले जाती है ।

हमारा जीवन बहुत छोटा है जिसमें बहुत से दुःख वैर विरोध की गांठे लगी हुई है इन गांठों को दूर भागना है तो क्षमाभाव जीवन में लाना होगा । समस्या का समाधान मैत्री से ही हो सकता है इससे ही व्यक्तित्व निखरता है । समाज में ऐस जीवो कोई मिले तो ऐसे मिलो जैसे वर्षों से जानते हो और कोई चला जाए तो उसे ऐसे भूल जाओ जैसे कभी देखा ही ना हो । जब मिलो प्यार से मुस्कुराकर मिलो । आत्म-भावों में रमण करो । आत्म-गुणों को याद रखो ।

आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

17 सितम्बर, 2009: ऋषभ विहार, दिल्ली  युग पुरुष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- अरिहंत परमात्मा को नमन । पंचमकाल में कोई सहारा है, गति है प्रगति है मैत्री है तो वो सब कुछ अरिहंत परमात्मा है । उनका ही हमें आधार है वो ही प्रथम मंगल प्रथम उत्तम ओर प्रथम शरण है उनकी शरण उत्तम शरण है । इस संसार में पाने योग्य कुछ भी नहीं है । कैसी भी परिस्थति हो समता आ जाए तो मान लो सामायिक हो गई । मंगल का अर्थ यही है कि हम हर परिस्थति को स्वीकार करें । हमारा ममकार अहंकार गल जाए ।   चित्त में शांति, समता प्रवाहित हो । सामायिक का अर्थ यही है कि समता में जीना । जब समता भीतर आ गई तो मान लो मंगल भीतर आ गया फिर कल्याण निश्चित है । सामायिक में समता है तो वहां पर कोई संबंध नहीं है क्योंकि शरीर के सब संबंध टूटने वाले हैं बिछुड़ने वाले हैं । 

अरिहंत परमात्मा का रुप कल्याण-रुप है जो मैत्री करुणा से गुजरता है उसका मंगल ही मंगल होता है । हमें उस मंगल को पाना है तो समय मात्र का भी प्रमाद मत करो जाओ इस संसार में सब चले गए केवलज्ञानी तीर्थंकर भगवान प्राणी मात्र के लिए मंगल की कामना करते हैं और हर समय में अप्रमत्त जीवन यापन करने की प्रेरणा देते हैं । जब नवकार मंत्र पढ़ों तो भीतर डूब जाओ । जब भीतर डूबोगे तो आंखों अंतर-यात्रा करेगी । तुम्हारे पास सब कुछ है आत्म-ज्ञान है आत्म-दृष्टि है कोई किसी को मोा दे नहीं सकता और बिना पुरुषार्थ के मोक्ष मिल नहीं एसकता, गुरु कहे कि मैं साधनाक रूं और मेरे समस्त शिष्य मोक्ष चले जाए ये संभव न होगा क्योंकि भगवान महावीर गणधर गौतम को मोक्ष दे नहीं सके । दुनियां की कोई शक्ति तुम्हें कुछ दे नहीं सकती, तुमसे कुछ छीन नहीं सकती । तुम स्वयं देखो जो कुछ तुम्हारे पास है वो तुम्हारा अपना कर्म फल है । उसके अलावा और कुछ तुम्हें इस जन्म में मिल ही नहीं सकता ।

जीवन टूट जाए, श्वांस छूट जाए तब भी अरिहंत परमात्मा और उनकी वाणी पर श्रद्धा रखते हुए और किसी चाहना में उलझना मत । जीसस ने कहा था- पहले तुम प्रभु का राज्य प्राप्त कर लो बाकी सब कुछ अपने आप मिलेगा । सम्यक् दृष्टि, आत्म-ज्ञान आत्म-दर्शन ले लो बाकी सब स्वयं मिल जाएगा । हम जो कुछ कहते हैं उसके लिए पांच दिन हमें दे दो । अनुभव करो पांच दिन में अनुभव ना आया तो कभी हमारे पास मत आना और अनुभव आ गया तो फिर सदा आत्म-ज्ञान आत्म-दृष्टि में जीवन यापन करना । यह शुद्ध अध्यात्म विधि है इसे सीख लो बाकी सब कुछ यहीं छूट जाएगा । 

आज श्रावक समिति के अधिवेशन में पुरानी समस्त कार्यवाही की पुष्टि करते हुए आगे आने वाले वर्ष के लिए नये नेतृत्व और नये कार्यकारियों को जोड़ने पर विशेष चर्चा हुई । इस श्रावक समिति को छोटे स्तर से प्रारंभ कर राष्ट्रीय स्तर तक किस प्रकार लाया जाए इस पर विचार मंथन हुआ । आचार्यश्रीजी ने हर कार्यकर्ता को प्रभु महावीर की साधना से जुड़ने की प्रेरणा दी और एकजुट होकर ‘परस्परोपग्रहो जीवानाम्’ के आधार पर शिक्षा, सेवा, चिकित्सा के क्षेत्र में कार्य करने की प्रेरणा दी । 

आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज 

18 सितम्बर, 2009: ऋषभ विहार, दिल्ली युग पुरुष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- अनंत उपकारी क्षमा करुणा मैत्री के मसीहा अरिहंत परमात्मा को नमन । 18 सितम्बर का पावन दिवस भारत के हर प्रान्त से आए धर्मानुरागी श्रेष्ठा बन्धुगण प्रभु महावीर के तीर्थ ऋषभ विहार धर्म नगरी में इस साधु साध्वी श्रावक श्राविका रुपी चतुर्विध श्रीसंघ को नमन । प्रभु महावीर का तीर्थ मंगल का रुप है । प्रभु महावीर ने छोटे बड़े पद प्रतिष्ठा को महतव नहीं दिया । हम महावीर के अनुयायी हैं परन्तु हमारा कार्य उनसा नहीं है । महावीर ने तप, ध्यान किया । आज महावीर हमारे बीच नहीं पर उनकी वाणी हमारे बीच है उनकी साधना हमारे पास है । हमारा आपसे धर्म का नाता है आज के इस पावन दिवस पर मेरा एक विनम्र अनुरोध है तुम सब सच्चे धर्म से जुड़ जाओ । पद, प्रतिष्ठा, मान, सम्मान ये सब ध्र्मा के आगे कुछ नहीं है चक्रवर्ति भी र्ध के आगे झूकते हैं हमारे श्वासों की क्या कीमत है भाई बहिन बन्धु सब छूट जाएंगे वीतरागता होगी तो वो ही हमें बचा सकती है । हम वीतरागता से जुड़े फूल चैबीस घण्टे सुगंध देता है कभी अपनी सुगंध स्वयं नहीं लेता वृक्ष अपने फल कभी स्वयं नहीं खाते । नदी अपना पानी स्वयं कभी नहीं पीती । जब प्रकृति इतना कुछ दे सकती है तो मानव कुछ देता क्यों नहीं । केवल लेने की कामना क्यों रखता है । हम समाज का काम करते हैं और पद की चाह भी रखते हैं इतनी उम्र बीत गई अभी भी कुछ चाहना बाकी है तो फिर ये समझ लो कि भगवान भी समक्ष आ गए तो कल्याण नहीं हो सकता । इस चाहना को छोड़ो । मेरी इतनी उम्र बीत गई जो पाना था वो दो चार वर्ष पूर्व मिला । भगवान महावीर की साधना की प्यास से ही जिनदीक्षा अंगीकार की थी, उसे पाने के लिए उत्तर से दक्षिण तक की यात्राएं की । हर धर्म गुरु हर बड़े संत के पास में गया परन्तु पूर्ण तृप्ति नहीं हो पाई आज जीवन के अंतिम पड़ाव में मुझे सच्ची साधना मिली है । इतनी उम्र बीत गई, इतने चातुर्मास हो गए। इतनी पद प्रतिष्ठा मिल गई ये सब मुझे मोक्ष दिलाने वाले नहीं है । हृदय के कुछ उद्गार हैं हम क्या बोले हमारा आचरण जन-मानस को प्रभावित करें । आप सब सौभाग्यशाली हो आपने प्रातःकाल की मंगल बेला में प्रभु महावीर की ध्यान साधना में डुबकी लगाने का पुरुषार्थ किया । सुबह निशाजी ने आपको ध्यान साधना सिखाई तुम ध्यान में डूबो ध्यान के उपर कुछ नहीं है । ध्यान वो राम-बाण है जो तुम्हारे कर्म-रोग से तुम्हें छुटकारा दिला सकती है । हम महावीर के हैं मैं भी आपके समान ही हूं आप सब मेरा आदर करते हो मैं भी आपका आदर करता हूँ । जीवन का लक्ष्य तय होना चाहिए । मेरे जीवन का लक्ष्य तय हो चुका है । उतर से दक्षिण तक की यात्राएं करने का अब कोई मानस नहीं । जो साधना मिली है उसमें डूबने का ही मानस है । सम्मेलन की चर्चाएं पिछले कुछ समय से चल रही है मेरी भावना सम्मेलन की है आप जो भी निर्णय लेना चाहते हैं वो सब पदाधिकारी मुनिराजों से मिलकर निर्णय लेकर मुझे बता दे अभीमैं दिल्ली में हूं यथोचित समय पर सम्मेलन हो जाना चािहए परन्तु सम्मेलन से पूर्व अनुशासन अति आवश्यक है ।  

साधना से अनुशासन आता है । प्रभुू महावीर के चैदह हजार साधु थे । अनुशासन डण्डे से नहीं प्रेम से होता है । संघ कभी डंडे से नहीं चलता । प्रभु महावीर के वचन है- हे देवाणुप्रिय तुम्हें जैसा सुख हो वैसा करो परन्तु धर्म मार्ग में प्रमाद मत करो । आत्म-दृष्टि, आत्म-ज्ञान का चिन्तन भीतर आ जाए । एक बार पांच दिन के लिए तुम गहरे साधना शिविर मंे डुबकी लगा लो तो फिर तुम्हें धन, पद, प्रतिष्ठा की कोई चिन्ता नहीं होगी । ये साधना ऐसी साधना है जो तुम्हारी जन्मों-2 की कर्म-ग्रंथी तोड़ देगी । मेरी यह मंगल कामना है कि तुम इसके बाद महाविदेह क्षेत्र में सीमंधर स्वामी प्रभु के श्रीचरणों में जन्म धारण कर वहीं से मोक्ष मंजिल की ओर अग्रसर हो जाओ । 

आज के इस पावन दिवस पर शिक्षा, सेवा और साधना की त्रिवेणी पर बहुत सी चर्चा हो चुकी है । भगवान महावीर युनिर्विसटी की संकल्पना जो पिछले वर्ष आपके समक्ष रखी थी उसका कार्य प्रारंभ है । सेवा के कार्य में श्रावक समिति सैदव अग्रणी रहती है । प्रभ्ुा महावीर की साधना से जन-जन जुड़ रहा है श्रमण संघ के लिए यह हर्ष का विषय है कि श्री विशाल मुनि जी महाराज ने मुख्य धारा में अपना समर्पण व्यक्त किया । 

इस पावन दिवस पर उपाध्याय श्री रवीन्द्र मुनि जी महाराज, राष्ट्र संत श्री कमल मुनि जी महाराज कमलेश, उपप्रवर्तक डाॅ0 राजेन्द्र मुनि जी म0, विद्वान संत श्री सुयोग ऋषि जी महाराज, श्री ऋषभ मुनि जी महाराज एवं दूर दूर से महासाध्वियां पधारें । आप सभी के प्रति हार्दिक कृतात्ज्ञ का भाव । श्री कमल मुनि जी महाराज ने जीव दया की भावनारखी है इनके भीतर करुणा, मैत्री है इसी भावना को देखते हुए मैं आज के इस पावन अवसर पर इन्हें ‘‘अहिंसा दिवाकर’’ के पद से अलंकृत करता हूं । आने वाले समय में दो अक्टॅबर को उपाध्याय श्री पुष्कर मुनि जी महाराज का जन्म शताब्दी वर्ष आ रहा ह । उपाध्याश्रीजी नवकार मंत्र के आराधक थे उस दिन हर जगह नवकार मंत्र की आराधना हो । श्रमण संघ के लिए उन्होंने अपने शिष्य देवेन्द्राचार्य को सौंपा, उनके शासनकाल में श्रमण संघ ने खूब अभिवृद्धि की शताब्दी वर्ष में उनके खूब गुणगान हो, ऐसी हार्दिक मंगल भावना है ।

इस पावन अवसर पर विराजित संत वृंद महासाध्वीवृंद सभी ने अपनी हार्दिक भावनाएं प्रकट की । श्रीसंघ की ओर से 138 गायों का अभयदान हुआ । इस अवसर पर स्थानीय महिला मण्डल की ओर से आचार्यश्रीजी के जीवन पर एक नाटिका प्रस्तुत की गई । 

विद्वान संत श्री श्रीयश मुनि जी महाराज की प्रेरणा से आचार्यश्रीजी के जीवन पर आधारित ‘‘शिवाचार्य प्रदर्शिनी’’ का उद्घाटन श्री बाबूलाल जी रांका, बैंगलोर निवासी ने   किया । इस अवसर पर भारत भर से श्रद्धालु उपसित थे । 

इस अवसर पर आगामी चातुर्मास एवं क्षेत्र स्पर्शना की विनती की कड़ी में बैंगलोर, मद्रास, पूना, अहमदनगर, सूरत, उदयपुर, इंदौर एवं दिल्ली के कई श्रीसंघों ने विनती प्रस्तुत की ।   

आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

19 सितम्बर, 2009: ऋषभ विहार, दिल्ली युग पुरुष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- अरिहंत परमात्मा को नमन । जीवन में कर्तव्य का क्या महत्व है । हम चाहते हैं हमें कोई दुःख ना दे । शांति समता में जीवन जीएं । हम व्यक्ति स्थान को नहीं देखते, हम केवल अपनी अनुभूति को देखते हैं । वीतराग-वाणी पूरे जीवन को बदल सकती है । काश ! हम उस एक सूत्र की गहराई तक पहुंचे । हमारे शरीर में आंख सबसे छोटी है पर उसका महŸव सबसे अधिक है । हजारों सूरज है पर क्या लाभ जब एक आंख ना हो । जिसके पास आंख नहीं है उसके पास ये सारी दुनियाँ अंधेरा ही है । जिसके पास आंखें हैं उसको सब कुछ दिखाई देता है । इसी प्रकार जिसके पास दृष्टि है उसके पास सब कुछ है जिसके पास दृष्टि नहीं उसके पास कुछ भी नहीं । 

दर्शन से भ्रष्ट व्यक्ति भ्रस्ट कहलाता है । जो चारित्र से भ्रष्ट होता है उसका निर्वाण तो हो सकता है पर दर्शन से भ्रष्ट व्यक्ति का निर्माण नहीं हो सकता । सामायिक, माला, प्रतिक्रमण, जप, तप, ध्यान का मूल दर्शन है । दर्शन का अर्थ है देखना । देखना यानि आंख से देखना भीतर की दृष्टि से देखना । दर्शनावरणीय कर्म से दृष्टि धूमिल हो गई है जब वो कर्म हट जाएगा तो सम्यक् दृष्टि आत्मदृष्टि उतपन्न होगी । वर्तमान में हमारी दृष्टि, विचार धारणा परम्परा संसार में है । घर परिवार में कपड़ों पर, गहनों पर या अन्य वस्तुओं पर हमारी दृष्टि जाती है । हमारी दृष्टि पर में है स्व में नहीं । भगवान महावीर तीस वर्ष तक घर में रहे परन्तु कमलवत् रहे । कहा भी है- एक दिन भी जी मगर अटल विश्वास बनकर जी 

कल न बन तू जिन्दगी का आज बनकर जी

मत पुजारी बन स्वयं भगवान बनकर जी 

एक दिन भी जी मगर तू ताज बनकर जी ।

अटल विश्वास की मैं आत्मा हूँ कितना भी क्रोध, मोह, माया, लोभ आए भीतर जाकर देखो, कषाय को अलग कर दो और भीतर स्थित हो जाओ । अपने गुरु के समक्ष अपने दोषों को प्रकट कर दो । अमीर कौन है जिसकी दृष्टि है पर है । भिखारी कौन है जिसकी दृष्टि नहीं पर है । जिसके पास चीज है और वह सोचता है कि ये मेरे पास है तो वह अमीर है परन्तु जिसके पास जिस चीज का अभाव है और वो उसकी दृष्टि नहीं पर है तो वो भिखारी है । 

जीवन परिवर्तन के लिए एक छोटी सी घटना भी महतवपूर्ण होती है । संत एकनाथ छोटी अवस्था में मंदिर के पुजारी थे । मंदिर में झाड़ू करने के बाद साम को हिसाब किताब कर रहे थे तो एक पाई नहीं मिली । तीन दिन बाद जब वो पाई का हिसाब मिल गया तो बहुत खुशी हुई । एक पाई के हिसाब के लिए तीन दिन बाद आनंद आया तो जब आत्मा का हिसाब किताब होगा तो कितना आनंद आएगा । जब सारे कर्म हट जाएंगे और समय आते ही एकदम भाव भीतर उत्पन्न होंगे आत्म-दृष्टि हो जाएगी और मोक्ष का रास्ता निकट होगा ।

भगवान महावीर को मोक्ष मिल गया हमें मोक्ष कैसे मिले इसकी प्यास जीवन में होनी आवश्यक है । भगवान की वाणी सत्य है पर से स्व की ओर है । सबकी आत्मा समान है । स्वयं को विकसित करने के लिए स्वयं पराक्रम करना होगा । अपने जीवन को देखो । प्रकृति से सीखो, सूरज जगाता है, पवन हिलाता है । हम वीतरागताम ें जीवन जीएं । एक वीतरागता की आपको तिराएगी जहां रोग मोह वासना है उसे हटाओ और जहां सुख शांति आनंद है वहां पर वास करो, यही जीवन जीने की कला । हमारा जीवन आत्म-दृष्टि से भरपूर हो । हमारा प्यास, श्रद्धा स्नेह हमेशा बना रहे ।

आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

20 सितम्बर, 2009: ऋषभ विहार, दिल्ली युग पुरुष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- हमारे भीतर जब तक प्रार्थना, अर्चना, भक्ति में एकरुपता नहीं होती तब तक वो भक्ति सफल नहीं होती । अनुष्ठान की पूर्णाहुति एकनिष्ठता में है । मनसा वाचा कर्मणा’ हम एक हो जाए । प्रभो ! मेरे भीतर ऐसे बस जाओ जैसे फूलों में सुगंध होती है अब यह कहना मुश्किल है कि फूल अलग है और सुगंध अलग है । जहां फूल होगा वहां सुगंध अवश्य   होगी । जिस प्रकार फूल खिलने के बाद उसकी सुगंध चहंु ओर फैलती है फूल डाली पर 24 घंटे सुगंध देता है और डाली से अलग होने के बाद भी सूखने के बाद भी काम आता है इससे हमें शिक्षा मिलती है कि हम मिटने पर भी किसी के काम आए । यदि हम अपने केन्द्र में है तो हमें परमात्मा से कोई अलग नहीं कर सकता । हम अपने से जुड़े अरिहंत के ध्यान से जुड़ें । जब आप सामायिक में होते हो तब आप स्व में होते हो । शास्त्र पठन में स्वयं का ही पठन होता है । ऐसे समय में स्व पर की यात्रा होती है वहाँ पर मन, वचन, काया की केवल उपस्थिति है । शुद्ध सामायिक में हम स्व के सुख की अनुभूति में जीते हैं और स्व श्रेय की यात्रा करते हैं । सच्चा ज्ञान यही है कि हम स्व में आए । मेहंदी के पŸाों को देखो गिसने के बाद भी सुगंध देता है एवं स्वयं मिटने के बाद भी रंग प्रदान करता है । ऐसे ही हमारा समर्पण होगा, दृष्टि सम्यक् होगी, आराधना सही होगी तो समता आएगी और उससे जीवन में परिवर्तन होगा । जहाँ दृष्टि मिथ्या है वहां की गई हर आराधना और उसका फल मिथ्या ही होगा । दुःख सुख में समता होगी तो जीवन परिवर्तित होगा जैसे फूल में खुशबू है मेहंदी में रंग है ऐसे ही इस जड़ शरीर में चेतन आत्मा समाई है वो किसी को नजर नहीं आती । जब हम उसका अनुभव करते हैं तो कर्म-निर्जरा करते हैं और मुक्ति के मार्ग पर अग्रसर होते हैं, आवश्यकता है हम अपनी आत्मा के अनुभूति में जीवन जीएं और वीतरागता को प्राप्त करें ।

आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

21 सितम्बर, 2009: ऋषभ विहार, दिल्ली  युग पुरुष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- अरिहंत परमात्मा को नमन । अरिहंत की वाणी, उनकी साधना भीतर आ गई तो भव-भ्रमण छूट सकता है । एक व्यक्ति के पास दृष्टि नहीं है तो उसके पास अनुभव भी नहीं होगा फिर ज्ञान और चारित्र सम्यक् होना संभाव्य नहंी है । धर्म का मूल है दर्शन । धर्म का मूल क्रिया या आचरण नहीं है दृष्टि महत्वपूर्ण है अहिंसा, सामायिक आदि सब क्रिया नहीं दृष्टि है । सामायिक, तप, अनुष्ठान करके सिद्धि प्राप्त कर सकते हो पर धर्म आपको निर्वाण नहीं दे सकता । भव परम्परा तो आत्म-ज्ञान से ही टूटेगी । दृष्टि भावना पर है तो वहाँ पर सम्यक्त्व घटित होता है । एक व्यक्ति फूल को देखता है तो उसे कांटे भी नजर आते हैं और एक व्यक्ति कांटों मंें भी फूल को देख सकता है यहां दृष्टि दो है एक कांटों में फूल देख रहा है और एक फूलों में कांटे देख रहा है सम्यक् दृष्टि उसकी है जिसने कांटों में फूल देखा है । कांटों के बीच फूल खिलना महत्वपूर्ण बात है । हमें करना क्या है ? यह सोचना महत्वपूर्ण है जब हमें पता चल गया कि करना क्या है तब वैसा ही ज्ञान दर्शन आचरण होगा । 

सम्यक्त्व के पांच लक्षण है उसमें पहला लक्षण है सम । कितनी भी बाधाएं आए । कषाय की मंदता हो क्रोध आदि का ज्वार तेजी से नहीं आए अज्ञान से दूर होने की भावना  हो । व्यक्ति समता से जुड़ा रहेगा तो शरीर में आधि व्याधि उपाधि नहीं आएगी । जो कुछ मुझे मिला है उसमें किसी का दोष नहीं मेरा ही कर्मोंदय है ऐसी भावना वाला व्यक्ति सम होगा । हम क्रिया प्रतिक्रिया में उलझ जाते हैं । सम्यक् दृष्टि जीवन में सुख दुःख छाया की भांति होता है । राम को वनवास जाना पड़ा कृष्ण को दुःख भोगना पड़ा हरिशचन्द्र को राजपाठ त्यागकर शमशान में नौकरी करनी पड़ी । इन सब महात्माओं ने ऐसी परिस्थिति में भी समता में जीवन जीया । यही सम्यक् दृष्टि व्यक्ति का पहला लक्षण है । 

दूसरा लक्षण है संवेग । वेग यानि चलना प्रवाह एक है उद्वेग् और एक है संवेग । उद्वेग यानि उलटी दिशा में चलना संवेग यानि सही दिशा में चलना । जीवन में उद्देग आएगा तो दुःख पीड़ा बैचेनी वेदना जागती है और संवेग आएगा तो आत्म-दृष्टि उपलब्ध होगी । ये भव-भीती होगी कि कर्म बोझ बढ़ रहा है जब-2 उद्वेग आएगा तब संसार की ओर गमन होगा । संवेग में जीवन में सुख समृद्धि समता की वृद्धि होगी । 

सम्यक् दृष्टि का तीसरा लक्षण है निर्वेद यानि अनासक्त भाव में जीवन जीना । किसी से कोई चिपकाव नहीं हो समस्त वेदों से पार निर्वेद भाव जहां पर स्त्रीलिंग पुरुषलिंग नपुसकलिंग किसी वेद की कोई चाहना, कामना या बुरा भाव नहीं है यहां पर आसक्ति घटती है और वैराग्य की उत्पत्ति होती है । सम्यक् दृष्टि का चैथा लक्षण है अुनकम्पा । अनुकम्पा यानि करुणा । मेरे कारण किसी को दुःख ना हो मैं अपना हर कार्य विवेकपूर्वक करुं ऐसी हर प्राणी के प्रति करुणा का भाव भीतर आए ओर पंाचवा लक्षण है आस्था । आस्था यानि द्रढ़ विश्वास एक अटूट संकल्प । संकल्प आत्मा के प्रति आत्मा के अष्ट गुणों को प्रकट करना ओर अष्ट कर्म की मजबूत कर्म श्रृंखलाओं को साधना के द्वारा तोड़ना । शरीर में आदि व्याधि है तो आत्मा में अनंत दर्शन अनंत सुख अनंत शक्ति है । जब ऐसी परिस्थिति आएगी तो श्रद्धा से ही जीवन की दृष्टि बदलेगी । जीवन में शरीर का नहीं भावों, चेतना का मूल्य है । दृष्टि सकारात्मक होगी तो सब सही और उत्तम होगा ओर दृष्टि नकारात्मक होगी तो पीड़ा ही होगी ।

आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

22 सितम्बर, 2009: ऋषभ विहार, दिल्ली युग पुरुष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि-  जीवन में श्रद्धा का होना आवश्यक है । ज्ीवन में जो मिलीा है सब मेरा ही कर्म है अपने जीवन को सुन्दर एवं सुखद हम स्वयं ही बना सकते हैं । जो सार है उसे देखो वो सदा हमारे साथ है । ये शरीर श्वांस टूटने के बाद साथ नहीं रहेगा । धन, परिवार, धर्म, गुरु कोई भी साथ जाने वाला नहीं है जो साथ जाएगा वो स्वयं तुम हो । तुम स्वयं को जानो, यही सम्यक् दर्शन है । सम्यक् दर्शन पर हमारी लगातार चर्चा चल रही है । सम्यक् दर्शन के पांच लक्षण पर हम सबने श्रवण किया । अब आठ अंग की चर्चा आपके सामने चलेगी । 

सम्यक् दर्शन के आठ अंग सम्यक्त्व को पुष्ट करते हैं पहला अंग है निःशंका । धर्म का मार्ग वीतरागता का मार्ग है । इस मार्ग में शंका और संदेह होगा तो हम अग्रसर नहीं हो सकते । शंका कब आती है जब सामायिक आदि अनुष्ठान करने का फल मिलेगा या नहीं ऐसी भावना भीतर आती है क्या आत्मा परमात्मा है विनाश है आदि बातें जब भीतर उठती है तो शंका उत्पन्न होती है । जो अनुष्ठान है सामायिक माला आदि है उनसे संसार का कोई संबंध नहीं । धर्म का मार्ग ओर संसार का मार्ग अलग-2 है । धर्म का मार्ग सत्य का मार्ग है आसान है जिस पर हम साहस से आगे बढ़ सकते हैं । प्रभु महावीर का मार्ग सिंह का मार्ग है, जहाँ पर केवल पुरुषार्थ और पराक्रम को ही महŸव दिया गया है । जब चिŸा डांवाडोल हो गया तो धर्म भीतर नहीं आ सकता । तुम्हें स्वयं के बारे में सोचना जरुरी है । स्वयं के लिए स्वयं के सत्य के लिए साधना व संघर्ष करना आवश्यक है । 

तीनों लोकों में आत्मा सत्य है उसे पांच इन्द्रियांे और मन द्वारा जाना नहीं जा    सकता, तर्क से ही जाना नहीं जा सकता । श्रद्धा और विश्वास से ही उसे जाना जा सकता है कुछ कार्य श्रद्धा और विश्वास से ही संभव होते हैं । जीवन में सत्य क्या है इसका पता लग जाए तो हम कभी भी संसार में उलझेंगे नहीं क्योंकि यह असलियत है कि धन कभी साथ नहीं देता जहां धन संग्रह होता है वहां लोभ बढ़ता है और फिर सत्य की रुचि कम होती है । कपिल केवली ने लोभ द्वारा ही लाभ को प्राप्त करते-करते मुक्ति को प्राप्त कर लिया । जीवन के सत्य की समझ आ गई । असली नकली की पहचान हो गई तो जीवन में हर कार्य संभव है । हम जिन्दगी का अस्तित्व जानकर जाग जाएं और अस्तित्व को प्राप्त कर लें ।

आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

23 सितम्बर, 2009: ऋषभ विहार, दिल्ली युग पुरुष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि-    

आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

27 सितम्बर, 2009: ऋषभ विहार, दिल्ली युग पुरुष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- अरिहंत अनंत गुणों के सागर है । ये संसार जिसको आपने सत्य माना जिस शरीर की आपने रखवाली की सर्दी में गर्म वस्त्र और गर्मी में हवा ठण्डक खाई । खाने पीने की हर आवश्यकता को पूर्ण किया । हीरे माणक मोती की आवश्यकता पूर्ण की । आयुष्य कर्म के साथ ये सब कुछ जाने वाला है ये कुछ भी स्थिर नहीं है । सर्दी, गर्मी, भूख, प्यास, आभूषण, वस्त्र, पात्र सब कुछ छूट जाएंगे साथ बचेगा आपका धर्म । 

9 योजन लम्बी, बारह योजन चैड़ी अल्कापुरी को मात देने वाली द्वारिका नगरी भी शाश्वत् नहीं रह पाई । कृष्ण जो त्रिखण्डाधिपति थे जिन्हिोंने अपने जीवनकाल में अपने कई संबंधियों को जिनदीक्षा दिलवाई उनको भी अंत समय में पानी नसीब नहीं हुआ । कोसाम्र वन में जरा कुमार के बाण से उनकी मृतयु हुई जो स्वर्णपुरी द्वारिका के अधिपति थे उन्हें भी काल के गाल में समाना पड़ा तब हम तो बहुत छोटे हैं जब तक आपको यह बात समझ नहीं आएगी तब तक कुछ भी प्राप्त नहीं कर पाओगे । आपको समझ में आ गया तब सही सुख मिल जाएगा । शरीर को कितनी सुख सुविधा वो वो सुख कभी कायम रहने वाला नहीं है, आज तक कितना टन भोजन इस पेट में जा चुका है फिर भी इसकी तृप्ति नहीं हुई । हजारों लाखों लीटर पानी हम पी चुके हैं फिर भी प्यास नहीं बुझी । भूख और प्यास वहीं की वहीं  है ।

अरिहंतवाणी तुम्हारे पास है तुम उस वाणी पर श्रद्धा कर अपने भीतर सोचो कि हमें क्या करना हैं । क्या शरीर के लिए जीना है या आत्मा के शाश्वत् सत्य को भीतर स्वीकार करना है । आपने शरीर के लिए इतना कुछ किया स्वयं के लिए क्या किया । हजारों शास्त्र पढ़ी जब आत्म-दृष्टि ही नहीं थी तब ये सब बेकार है । ये मानकर चलो आत्मा ही सत्य है शेष सब असत्य है मिथ्या है । संसार को बढ़ाने की आकांखा आपको आत्म-दृष्टि से दूर ले जाती है । हृदय शरीर बुद्धि मन इन्द्रियाँ साथ दे ना दे आत्म-दृष्टि का बीज वपन कर लो फिर उसको पल्ल्वित पुष्पित करते रहना । सारी दुनियां स्वार्थी है कोई किसी के लिए कार्य करने वाला नहीं । पत्नी बच्चे अपने स्वार्थ में उलझे हुए हैं और गुरु शिष्य अपने स्वार्थ में उलझे हुए हैं इन सबके बीच रहते हुए तुम भी अपना स्वार्थ पूरा कर लो । आत्मा को रोटी कपड़ा मकान नहीं चाहिए उसे तो केवल सही दिशा, सत्य का मार्ग चाहिए । जब तुम ध्यान सामायिक करोगे तो स्वयं में आ जाओगे । सरलता, क्षमा, मैत्री में जीवन यापन होगा । धर्म चाहत को पूरा करने में नहीं है ।धर्म चाहत के पार स्वभाव में जीने में हैं । धर्म इच्छापूर्ति में नहीं आत्म-पुष्टि में है । हरेक जीव में आत्मा का दर्शन हर स्थिति में स्व में रमण और अधिक से अधिक समय अपने भीतर डूबो मुक्ति की प्यास, पीड़ा तड़फ पैदा करो वही तुम्हें मोक्ष की ओर ले जाएगी । 

धर्म नगरी में ध्यान योगी पधारे, स्वागत के देखे अजब नजारे

श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर, युग पुरुष, ध्यान योगी, आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज का आचार्य-रुप में ग्यारहवें चातुर्मास का और मुनि-रुप में 37 वें चातुर्मास का भव्य प्रवेश आज धर्म नगरी, ऋषभ विहार, दिल्ली में हुआ । श्रद्धेय आचार्य भगवंत पूर्वी दिल्ली के उपनगरों विवेक विहार से विहार कर राम मन्दिर, विवेकानंद महिला काॅलेज, योजना विहार, यमुना स्पोर्टस काॅम्पलेक्स, सूरजमल विहार मार्केट, बाहुबली एन्कलेव एवं किरण विहार के सामने से होते हुए प्रातः 9.00 बजे धर्म नगरी, ऋषभ विहार, दिल्ली पधारे । श्रद्धेय आचार्य भगवंत की चातुर्मासिक प्रवेश शोभा-यात्रा विवेक विहार से प्रारंभ हुई जिसमें क्रमबद्ध रुप से जैन ध्वज, मंगल कलश लिए सौभाग्यवती बहिनें व बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाएं जयकारों के साथ गंगन गुजायमान कर रहे थे । शोभा-यात्रा कां योजना विहार, सूरजमल विहार, दिगम्बर जैन मन्दिर, बाहुबली एन्कलेव, दिगम्बर जैन मन्दिर व ऋषभ विहार दिगम्बर जैन मन्दिर के परिसर में आचार्यश्रीजी का स्वागत किया गया । उसके बाद श्रद्धेय आचार्य भगवंत पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज, उपाध्याय श्री रवीन्द्र मुनि जी महाराज, राष्ट्र संत श्री कमल मुनि जी म0 ‘कमलेश’ आदि संतवृंद के साथ भव्य प्रवेश हुआ । पूज्य श्रीी का स्वागत श्रमणी सूर्या महासाध्वी श्री सरिता जी महाराज, समता साधिका महासाध्वी श्री ममता जी महाराज, विदुषी महासाध्वी श्री रश्मि जी महाराज, विदुषी महासाध्वी श्री राधा जी महाराज आदि महासाध्वियों ने किया । शोभा-यात्रा में ‘शिव भक्ति धारा’ की धुन पर सभी भक्ति-रस में सराबोर हो रहे  थे ।  

श्रद्धेय आचार्य भगवंत प्रातः 9.00 बजे ऋषभ विहार जैन स्थानक में प्रविष्ट हुए । उसके बाद ‘आचार्य शिव शक्ति धाम’ स्थित शिवाचार्य समवसरण में स्वागत अभिनन्दन समारोह प्रारंभ   हुआ । समारोह का मंगलाचरण उपाध्याय श्री रवीन्द्र मुनि जी महाराज ने किया । तत्पश्चात् महिला मण्डल ऋषभ विहार द्वारा स्वागत गीत प्रस्तुत हुआ । महासाध्वी श्री ममता जी महाराज, महासाध्वी श्री शशिप्रभा जी महाराज, महासाध्वी श्री प्रेक्षा जी महाराज, महासाध्वी श्री रश्मि जी महाराज, श्रमणी सूर्या महासाध्वी डॅ0 सरिता जी महाराज ने आचार्यश्रीजी के स्वागत अभिनन्दन पर अपनी भावाभिव्यक्ति प्रदान   की ।   

धर्म नगरी ऋषभ विहार श्रीसंघ की ओर से अध्यक्ष श्री अशोक जैन ‘जयचंदा’ ने अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा कि- यह मेरे लिए स्वर्णिम अवसर है कि श्रद्धेय आचार्य भगवंत का चातुर्मास हेतु पदार्पण हुआ । आपका आना जीवन में एक सुखद संदेश लेकर आया है । महामंत्री श्री संजय जैन, संयोजक श्री देवेन्द्र जैन, श्री राजीव जैन ने आचार्यश्रीजी को जिन-धर्म का तारणहार जहाज बतलाया । इस अवसर पर गणमान्य अतिथियों में श्रावक समिति के चेयरमैन श्री सुमतिलाल जी कर्नावट ने अपनी भावनाएं व्यक्त करते हुए कहा कि- आचार्यश्रीजी का जीवन एक अद्भुत संयोग है जहाँ विनम्रता भी है तो विद्वत्ता भी है । एक स्थान पर ये दो बातें दुर्लभता से दिखाई देती है इनके जीवन में कोमलता भी है तो ये अनुशास्ता भी है । आज श्रमण-संघ ऐसे आचार्य को पाकर गौरवान्वित है जो अपनी साधना आराधना में स्वयं को लीन रखते हैं सरलमना है, आचार्यश्रीजी के भीतर शिक्षा और साधना को लेकर एक सुन्दर संकल्प है । इस संकल्प का उद्घाटन पिछले वर्ष मालेर कोटला में आचार्यश्रीजी के 67 वें जन्म-दिवस पर हुआ । इस अवसर पर भगवान महावीर युनिवर्सिटी की संकल्पना भीतर आई और आज वह अपना पूर्ण-रुप ले रही है । इस युनिवर्सिटी में जहाँ बाहर की शिक्षा पढ़ाई जाएगी वहीं पर आध्यात्मिक शिक्षा एवं नैतिक शिक्षा के साथ ध्यान-योग साधना का प्रयोगात्मक अध्ययन भी करवाया जाएगा । बहुत शीघ्र ही ये कार्य प्रारंभ होने जा रहा है । सीटी ब्यूटीफूल चण्डीगढ़ के पास पंचकूला स्थित जैनेन्द गुरुकुल में ये भगवान महावीर युनिवर्सिटी अपना पूर्ण-रुप लेगी यहाँ पर करीब साढ़े तेरह एकड़ जमीन युनिवर्सिटी हेतु प्राप्त हुई है कुछ ही दिनों में हरियाणा सरकार के शिक्षा विभाग में युनिवर्सिटी की रिपोर्ट प्रस्तुत की जाएगी और साथ-ही-साथ समस्त कार्य प्रारंभ होंगे । इस युनिवर्सिटी के लिए आप सभी पूर्णतः समर्पित हो आचार्यश्रीजी के ईशारों पर अपने आपको ढ़ाले और उनके स्वप्न को पूर्ण करें । इस अवसर पर ऋषभ विहार श्रीसंघ को हार्दिक बधाई देते हुए श्री सुमतिलाल जी कर्नावट ने आचार्यश्रीजी के आध्यात्मिक चातुर्मास की हार्दिक मंगलकामनाएं प्रस्तुत की तथा कहा कि इस चातुर्मास में सभी धर्म साधना आराधना से जुड़कर आचार्यश्रीजी के वीजन को समझे । 

अवसर पर समाजरत्न श्री हीरालाल जी जैन ने धर्म नगरी ऋषभ विहार वालों को भाग्यशाली बताया क्योंकि यह स्थान वही स्थान है जहां पर आज से आठ वर्ष पूर्व पूज्य आचार्य श्री शिवमुनि जी महाराज का भव्य चादर महोत्सव सम्पन्न हुआ था तभी से ऋषभ विहार, दिल्ली वालों के भीतर एक प्यास थी कि आचार्यश्रीजी का एक चातुर्मास हमें प्राप्त हो । ऋषभ विहार श्रीसंघ के युवा कार्यकर्ताओं को आचार्यश्रीजी के चातुर्मास में सम्पूर्ण लाभ लेने की प्रेरणा दी तथा इस चातुर्मास में युनिवर्सिटी की संकल्पना को पूर्ण मूर्त रुप देने का संकल्प सबके समक्ष रखा । 

इस अवसर पर दिल्ली के महापौर डाॅ0 कंवरसेन ने कहा कि- दिल्ली का प्रथम नागरिक होने के नाते मैं आचार्यश्रीजी का दिल्ली आगमन पर हार्दिक स्वागत करता हूं आपका दिल्ली आना हमारे लिए एक शुभ संदेश है । जैन धर्म में शाकाहार को विशेष महŸाा प्रदान की गई है और मैं सदैव शाकाहार का प्रबल समर्थक हूं । आपके चातुर्मास में समय-समय पर आपके विचारों और आपकी साधना से अवगत होने का लाभ मिलता रहेगा । आपने दिल्ली आकर हम पर बहुत उपकार किए हैं मैं समय-समय पर दर्शन लाभ लेता रहूंगा । राष्ट्र संत श्री कमल मुनि जी महाराज की प्रेरणा से टी0वी0 चैनल पर मांसाहार एवं अण्डे के विज्ञापनों को रोकने का मेरा यथासंभव प्रयास रहेगा । 

इस अवसर पर श्रमण संघीय मंत्री श्री शिरीष मुनि जी महाराज ने ऋषभ विहार चातुर्मास प्रवेश पर अपनी मंगल-भावनाएं प्रस्तुत करते हुए कहा कि- ऋषभ विहार श्रीसंघ भाग्यशाली है अनेक श्रीसंघों की विनति होते हुए भी इनको चातुर्मास का लाभ मिला । चातुर्मास का पूर्ण लाभ उठाएं । समय-समय पर ध्यान साधना शिविरों में आप भाग लें । शिविरों के द्वारा मानसिक शांति एवं आध्यात्मिक आनंद को प्राप्त करें । आचार्यश्रीजी का नजदीक से सान्निध्य पाने के लिए साधना शिविर एक सुन्दर माध्यम है । प्रतिदिन आचायर्यश्रीजी के दर्शन समय-समय पर ही होंगे । इसके अलावा आचार्यश्रीजी साधना में रहते हैं आप सभी उनकी साधना में सहयोगी बने । जो भी भवि जीव कर्म श्रृखलाओं को तोड़कर मुक्ति की ओर अग्रसर होंगे वे अपने जीवन में साधना शिविरों के द्वारा शाश्वत् सत्य को प्राप्त कर लेंगे । 

इस अवसर पर राष्ट्र संत श्री कमल मुनि जी म0 ‘कमलेश’ ने आचार्यश्रीजी के चातुर्मास की मंगल कामना करते हुए उपाध्याय श्री मूलचंद जी महाराज, प्रवर्तक श्री रमेश मुनि जी महाराज, महाराष्ट्र प्रवर्तक श्री कुन्दन ऋषि जी महाराज, प्रवर्तक श्री रुपचंद जी म0 रजत आदि की ओर से मंगल कामनाएं प्रस्तुत की और कहा कि इस चातुर्मास में जन-जन जैन धर्म से जुड़े । आपके द्वारा सारी दिल्ली में शांति स्थापित हो। राजनेता, धर्मनेता एवं समस्त जन-समुदाय आपका आशीर्वाद प्राप्त करें ऐसा उपक्रम ऋषभ विहार श्रीसंघ करें । ऋषभ विहार श्रीसंघ को हार्दिक साधुवाद । 

इस अवसर पर उपाध्याय श्री रवीन्द्र मुनि जी महाराज ने आचार्यश्रीजी के स्वागत अभिनन्दन पर अपनी भावनाएं अभिव्यक्त करते हुए कहा कि हम सभी प्रस्तुत वर्षावास में पूर्ण लाभ उठाएं । कोई भी भाई बहिन इस समय में आचार्यश्रीजी के प्रवचन, साधना एवं वीतराग सामायिक से अछूता ना रहे । आचार्यश्रीजी के भीतर 21 वीं सदी का एक वीजन है । वर्षावास में आप सभी लाभान्वित हो । आचार्यश्रीजी की दृष्टि को समझते हुए अपने जीवन में रुपान्तरण घटित करें । अनुशासन की विशेष प्रेरणा देते हुए मैं यह कहना चाहूँगा कि हम सभी अनुशासित हों, स्वयं पर अनुशासन करें । जीवन में परिवर्तन महसूस करें । आचार्यश्रीजी का चातुर्मास केवल ऋषभ विहार का ही नहीं समस्त दिल्ली वासियों का है और विशेषकर पूर्वी दिल्ली निवासी जिसे यमुना पार भी कहा जाता है समस्त क्षेत्रवासी समय-समय पर दर्शन, प्रवचन का लाभ लें ध्यान साधना शिविरों में भाग लें ।

श्रद्धेय आचार्य भगवंत पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपनी मंगलमयवाणी की शुरुआत अरिहंत परमात्मा से की । महाविदेह क्षेत्र में विराजमान अरिहंत परमात्मा श्री सीमंधर स्वामी भगवान की अनंत कृपा भरत क्षेत्र पर है आप स्वयं तिर गए औरों को तार रहे हैं ये शासन धर्म संघ प्रभु महावीर का है परन्तु वे वर्तमान में सिद्ध बुद्ध मुक्त हो गए । अरिहंत परमात्मा महाविदेह क्षेत्र में सदेह विचरण करते हैं जिनको आस्था है वो सभी इस चातुर्मास में भगवान की साधना, आराधना से जुड़ेंगे । प्रभु महावीर की दृष्टि आत्म-दृष्टि है । भगवान महावीर के आगे एक विशेषण लगाया जाता है वह है श्रमण । श्रमण यानि श्रम करो । भगवान फरमाते हैं हे निर्मल ज्योति वाले पुरुष तू पराक्रम कर । बच्चा जन्म लेते ही श्रम करने लग जाता है और अन्तिम श्वांस तक श्रम करता है । 

श्रम संसारी करता है और गृहत्यागी भी करता है परन्तु दोनों के श्रम में अन्तर है एक श्रम है बाहर का जो हमें कर्म-आश्रव की ओर ले जाता है एक श्रम है भीतर का जो हमें कर्ममुक्ति की ओर ले जाता   है । भगवान महावीर स्वामी ने साढ़े बारह वर्ष घर परिवार छोड़कर अंतर का श्रम किया और केवलज्ञान केवलदर्शन को प्राप्त किया । मैं चाहता हूँ हम सभी अब तक की उम्र में बाहर का श्रम बहुत कर चुके हैं अब भीतर का श्रम करें । भीतर का श्रम है कर्म-बंधनों को तोड़ना और उसका सरल उपाय है ध्यान साधना प्रस्तुत वर्षावास में केवल बातें ही नहीं उसका प्रयोगात्मक अभ्यास करवाने के लिए चातुर्मास के प्रत्येक माह में आत्म: ध्यान साधना शिविरों का आयोजन होगा इसमें युवाशक्ति, महिला शक्ति के साथ-साथ सभी भाग लें । जब से दिल्ली आए हैं पांच ध्यान साधना शिविर हो चुके हैं जिसने भी साधना की उसने कुछ न कुछ पाया है । भगवान के जीवन में ऋजुता और सरलता साधना से घटित हुई उन्होंने सभी को प्रेम से गले लगाया, हम भी साधना के द्वारा अपने जीवन का उध्र्वारोहण करे । ऋषभ विहार चातुर्मास का प्रबंधन युवा शक्ति के हाथ में है जिसमें श्री अशोक जी जयचंदा, श्री संजय जैन, श्री देवेन्द्र जैन, श्री राजीव जैन, श्री राकेश जैन, श्री प्रमोद जैन, श्री अशोक जैन, श्री प्रवीण जैन, श्री आदिश्वर जैन आदि सभी हार्दिक साधुवाद के पात्र हैं । इन्होंने बहुत मेहनत और लगन से चातुर्मासिक प्रवेश को मंगल बनाया है । इसी प्रकार सम्पूर्ण वर्षावास में आप सभी आगे बढ़ते रहे ।

श्रमण संघ सम्मेलन को लेकर कई बार समाज के वरिष्ठ व्यक्ति विनती करते हैं मैं एक बात इस अवसर पर कहना चाहता हूँ सम्मेलन संघ उत्थान के लिए हो । हम अनुशासित हों । भगवान महावीर की वाणी केवल उपदेश तक ना रहकर आचरण तक जीवन में आए । भीतर मैत्री, करुणा का स्रोत प्रवाहित   हो । धर्म किसी परम्परा सम्प्रदाय में नहीं धर्म तो स्वतंत्र है । सम्मेलन में जैन धर्म विश्व धर्म कैसे बनें इस पर चिन्तन हो । आज संघ के कुछ पदाधिकारी संत केवल पद को लेकर सम्मेलन करना चाहते हैं परन्तु पद किसी का शाश्वत् नहीं रह पाया । हम पद के पीछे ना लगकर अपने जीवन में संघ की महिमा और गरिमा को बढ़ाएं । श्रमण संघ की एकता और संगठन के लिए हम कार्य करें । दबाव नीति से कार्य कभी सफल नहीं होता । अनुशासन से ही कार्य संभव होते हैं । त्याग में आनंद है और राग में बंधन है इस बात को सदैव याद रखें । जो त्याग करता है वो सब कुछ पा लेता है । 

इस अवसर पर श्री जे0डी0 जैन पूर्व अध्यक्ष जैन कांफ्रेंस ने अपनी मंगल भावनाएं ऋषभ विहार चातुर्मास हेतु प्रेषित की । श्री विनय जैन देवबन्दी, श्रीमती प्रवीण जैन, श्रीमती नीलम सिंघवी आदि ने भजन के द्वारा समारोह में भक्ति का वातावरण निर्मित किया । इस अवसर पर दिल्ली जैन महासंघ के प्रधान श्री आनंद प्रकाश जी जैन, दिल्ली श्रावक समिति के प्रधान श्री मुन्नालाल जी जैन, जीव दया के अध्यक्ष श्री आर0डी0 जैन, जैन कांफ्रेंस के अध्यक्ष श्री कांतीलाल जी जैन, जैनरत्न लाला नेमनाथ जी जैन, पंजाब महासभा अध्यक्ष श्री राकेश जैन, आदि महानुभव उपस्थित थे । इस अवसर पर भारतवर्ष के विभिन्न अंचलों से श्रावक-श्राविकाएं उपस्थित  थे । 

श्रद्धा चैनल पर आचार्यश्रीजी के प्रवचन का प्रसारण 6 जुलाई, 2009 से प्रातः 9.05 बजे होगा । श्रद्धा चैनल डी0टी0एच0 सेवा पर उपलब्ध दूरदर्शन चैनल नं0ः 15, डिश टी0वी. चैनल नं0 1280, बिग टीवी चैनल नं0ः 652, सन टीवी चैनल नं0ः 703 पर उपलब्ध है । चातुर्मास में 6 जुलाई से प्रवचन प्रारंभ होंगे । प्रवचन प्रातः 8.15 से 9.30 बजे तक प्रतिदिन होंगे । 

चातुर्मास में आत्म -ध्यान साधना शिविरों की श्रृंखला में प्रथम शिविर 13 से 15 जुलाई, प्रातः 5.30 से 8.30 बजे तक होगा एवं 16 से 19 जुलाई तक चार दिवसीय गंभीर आत्म ध्यान कोर्स होगा । जिसने भी लाभ लेना हो वे सभी सम्पर्क कर रजिस्ट्रेशन कर सकते हैं । इसी प्रकार पूरे चातुर्मास में समय-समय पर आत्म ध्यान साधना शिविरों का आयोजन होगा । 

-महामंत्री संजय जैन

श्री एस0एस0 जैन सभा

धर्म नगरी, ऋषभ विहार, दिल्ली

च्ीण्: 011-22373121, 98110-49108, 98110-42280,  93501-11542

शिव भक्ति धारा सीडी का लोकार्पण

श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज के आठ वर्ष बाद दिल्ली पदार्पण पर धर्म नगरी ऋषभ विहार वालों की हार्दिक भावना और अन्तर्राष्ट्र ख्याति प्राप्त श्री विनय देवबन्दी 

के संयोजन से ‘शिव भक्ति धारा’ सीडी तैयार हुई जिसका लोकार्पण 31 मई, 2009 को आचार्यश्रीजी के दिल्ली प्रवेश अभिनन्दन समारोह के अवसर पर किया गया । इस सीडी में आचार्यश्रीजी के प्रति अपनी भावनाएं अभिव्यक्त करते हुए ऋषभ विहार पहुंचने की प्रेरणा दिल्ली चैमासे पर भजन, आचार्यश्रीजी के दिल्ली आगमन पर स्वागत एवं आनंद के नजारे, युवाओं को आह्वान एवं शिवाचार्य की मंगल वाणी पर सुन्दर भजन बनाए गए हैं । इस सीडी में दिल्ली से लेकर दिल्ली तक की आठ वर्ष की यात्रा का सुन्दर विवरण दिया गया है । सीडी0 को स्वरबद्ध किया है श्री विशु जैन एवं भावना शर्मा ने । सीडी की प्रस्तावना सीए राजीव जैन द्वारा प्रस्तुत है और इसकी सेवा की है श्रद्धाशील भाई श्री रमेश जी जैन कागजी एवं धर्मशीला श्रीमती सुनीता जी जैन ने । जो भी इस सीडी को प्राप्त करना चाहें ऋषभ विहार श्रीसंघ से प्राप्त कर सकते हैं:- श्री एस0एस0 जैन सभा ऋषभ विहार {कड़कड़डूमा कोर्ट}, दिल्ली फोन: 011-22373121

मुनि वेश से नहीं साधना से होता है

आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

12 सितम्बर, 2009: ऋषभ विहार, दिल्ली युग पुरुष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- भारत की संस्कृति में संत का विशेष महŸव है । संत वेशभूषा परमपरा में रहते हुए भी उससे ऊपर है । प्रभु महावीर ने मुनि की परिभाषा करते हुए कहा मुनि जो मौन हो गया, शांति और समता जिसके भीतर आ गई । मुनि जो हर क्षण सामायिक की साधना में जीता है । सामायिक की साधना श्रावक की भी होती है और मुनि की भी होती है । श्रावक दो घड़ी के लिए सामायिक करता है और मुनि की जीवन भर की सामायिक है । सामायिक की साधना आत्म-दृष्टि की साधना है जिसमें समस्त पापकार्यों का त्याग तीनों योगों और तीनों करणों का त्याग कर आत्म-भाव में स्थित होना होता है । प्रभु महावीर ने हमें सामायिक साधना के द्वारा शुद्ध धर्म की परिभाषा दी है । 

हम जैसे लोग परम्पराओं में बंधकर शुद्ध धर्म में भेद-रेखा खींचते हैं । ये संसार का चक्र अनादिकाल से चल रहा है इस भव भ्रमण का मूल कारण मोह है जिसे बुद्ध ने अज्ञान कहा । वेदान्तियों ने माया कहा । हम इस मोह-माया से दूर हो शुद्ध धर्म में स्थापित हो जाए । साधु वही है जो शरीर और आत्मा की भिन्नता का पुरुषार्थ कर रहा है । ईशु ने कहा- बिस्तर पर एक व्यक्ति मरा हुआ है और एक व्यक्ति जागता हुआ है जो सोता है वो मरा है जो जागा है वह जागृत है । यदि मौत ना होती तो धर्म ना होता । स्वर्ग नरक का भय ना होता और कोई भी धर्माचरण करता ही नहीं । केवल मौज मजे की जिन्दगी जीते परन्तु भगवान की वाणी सत्य है ये जीवात्मा 84 लाख जीवयोनी में अनादिकाल से भ्रमण कर रही है । इस भव भ्रमण को हटाना है तो आत्म चिन्तन में लगना होगा । आत्मा का कोई रंग, रुप, आकार नहीं है उसे केवल तीर्थंकर की वाणी से श्रद्धा से ही जाना जा सकता है । 

मुनि वेश से नहीं साधना से होता है । जिसने वेश धारण नहीं किया परन्तु साधना मुनियों से भी ऊँची है वो घर में रहते हुए भी मुनि है । भीतर एक जागरुकता बनी रहे हे परमात्मा कैसी भी स्थिति हो मेरी समता कभी डांवाडोल ना हो । भीतर आत्म-दृष्टि बनी रहे । इस जगत के जीव मात्र के लिए मेरे भीतर मैत्री भावना प्रवाहित हो । गुणियों के प्रति प्रमोद भावना हो । दीन दुखियों के प्रति करुणा भावना हो । वर्तमान में कितने जीव भूखे हैं पशु पक्षी सूर्योदय से लेकर रात्रि तक केवल भोजन की तलाश में ही हजारों मील यात्रा करते हैं । बरसात, सर्दी, धूप में कैसे जीवन यापन करते हैं । ऐसे में उन समस्त जीवों के लिए करुणा भावना हो और इन भावनाओं को भावित करते हुए भीतर आत्म रमण हो कि मैं शुद्ध, बुद्ध, आत्मा हूं । सुख, दुःख, वैर, मित्रता, भवन, जंगल, योग, वियोग सबमें मेरा समत्व भाव बना रहे, यही प्रभु महावीर की सच्ची साधना है ।  

सत्य की शिक्षा दें वही सच्चा शिक्षक

आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

05 सितम्बर, 2009: ऋषभ विहार, दिल्ली युग पुरुष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- आज का ये मंगल पावन दिवस श्रमणी सूर्या उप प्रवर्तिनी महासाध्वी डाॅ0 सरिता जी महाराज का 58 वां जन्म-दिवस हम सभी मना रहे हैं और आज शिक्षक दिवस भी है और हमारी चर्चा नमो उवज्जासाणं के साथ ज्ञान पर चल रही है । डाॅ0 राधाकृष्णन बहुत बड़े राजनेता थे । आपने अपने जीवन में सादगी को अपनाया । मैंने डी0ए0वी0 काॅलेज जालंधर में एफ0ए0सी0 नाॅन मेडीकल के समय में आपको देखा था । आपकी स्पीच हमारे काॅलेज में हुई थी मुझे आज भी याद है दर्शन शास्त्र में आपकी गहरी पेठ थी । मैंने जब एम0ए0 दर्शन शास्त्र किया तब भी आप द्वारा लिखित पुस्तकों का अध्ययन किया । डाॅ0 राधाकृष्णन गरीब घर में जन्में और जिन्दगी में पुरोहित बनने की भावना थी । माता पिता चाहते थे कि पुरोहित बन जाएगा तो हम सुख से जीवन यापन करेंगे । परन्तु उस महापुरुष ने अपने नाम के साथ अपने माता पिता के नाम को रोशन कर सदा-सदा के लिए अपने को अमर कर लिया । आज भी उनकी याद में हर स्कूल, काॅलेज में शिक्षक दिवस मनाया जाता है । आज के दिन शिक्षकों का आदर किया जाता है । सच्चा शिक्षक वही है जो हमें सत्य की शिक्षा दे, हमें सत्य की ओर लेकर जाएं बाकी तो सब सूचना प्रदान करने वाले हैं । उपाध्याय का मतलब ही यह होता है कि जो ज्ञान के भण्डार की गहराई प्रदान करें । 

आज श्रमणी सूर्या उपप्रवर्तिनी महासाध्वी डाॅ0 सरिता जी महाराज का 58 वां जन्म दिवस हम सभी मना रहे हैं । महासाध्वीजी का और मेरा निकट का संबंध रहा है । जब मेरी दीक्षा नहीं हुई थी तब जब-2 आप मलौट आए तो आपकी सेवा का अवसर मिला । उस समय में मेरंी गहन प्यास थी भगवान महावीर की साधना को प्राप्त करने की और उसी प्यास को लेकर मैं हर साधु साध्वी को प्रश्न करता था । आपकी रुचि जप तप स्वाध्याय में अधिक है । उसके साथ आप वर्तमान में ध्यान साधना की ओर भी अग्रसर हो रही हैं । आपके जीवन की कर्मठता, अप्रमत्ता हमें एक संदेश देती है । मैं चाहता हूँ आपका जीवन एक तालाब ना बनकर सरिता बने । तालाब का पानी को कुछ लोगों को ही सहायता देता है परन्तु सरिता का जल हर व्यक्ति की पिपासा को शांत करता है । आपके भीतर समस्त सद्गुण सदा प्रवाहित हो । श्रमण संघ के प्रति आपका समर्पण ऐसा ही बढ़ता चला जाए और भगवान महावीर की वाणी है जिस श्रद्धा से आपने संयम अंगीकार किया है उस श्रद्धा और भावना से आप धर्म मार्ग पर अग्रसर हों । अपने जीवन में साधना को महŸव देते हुए अपनी भव परम्परा को क्षय कर मुक्ति की ओर अग्रसर हो यही हार्दिक मंगल भावना । मैं इस अवसर पर श्रमण संघ की ओर से आपको महाश्रमणी के पद से अलंकृत करता हुआ आदर की चादर प्रदान करता हूँ । समस्त श्रावक वर्ग से एक प्रेरणा है कि आज के दिवस महासाध्वीजी के 58वें जन्म दविस पर कम से कम 58 गायों को अभयदान दें । 

जिनवचनों को अनुभव के द्वारा भीतर उतारो

आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

07 सितम्बर, 2009: ऋषभ विहार, दिल्ली युग पुरुष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- यह मानव जीवन हम सबको मिला । अनमोल श्वासें मिली । पत्नी, बच्चे, धन, दौलत जो कुछ चाहा वो सब कुछ प्राप्त किया । शरीर भी पांचों इन्द्रियों से परिपूर्ण मिला । ये शरीर जब तक श्वासें हैं तब तक बड़ा उपयोगी है । श्वांस टूट जाने पर इसकी कोई कीमत नहीं । बाद में तो ये मिट्टी का मिट्टी में समा जाना है फिर उस मिट्टी को देखकर इसका अनुमान नहीं लगाया जा सकता कि ये मिट्टी राजा की है या रंक की । चोर, संयासी, पुरुष, स्त्री, धनवान, निर्धन सबकी मिट्टी एक समान होनी है । थोड़ी सी जिन्दगी पर हमारा कितना बड़ा अहंकार है । क्या तुम जानते हो कि वास्तव में तुम कौन हो ? पशु-पक्षी, नारकी, देव ये तो जान ही नहीं सकते क्योंकि इनके पास वैसा शरीर नहीं और शरीर होने के बाद भी वैसी बुद्धि विकसित नहीं है । केवल मानव जान सकता है कि मैं कौन हूँ । कभी एकान्त में बैठकर अपने आप से पूछो कि मैं कौन हूँ, क्या धन पद रिश्ते मेरे हैं । भगवान महावीर स्वामी को 27 जन्म और साढ़े बारह वर्ष लगे इसको जानने में फिर अन्तर अनुभूति हुई कि मैं आत्मा हूँ उसके बाद उन्होंने उस अनुभूति को सबमें बांटा । 

प्रभु ने जो कहा वह शाश्वत् है, अटल सत्य है यह मार्ग सनातन है । अनंत तीर्थंकरों की वाणी एक ही है आवश्यकता है हमारी श्रद्धा की । जो व्यक्ति जिनवचनों में अणुरक्त होता है जिनवचनों को सम्पूर्ण भावों से स्वीकार करता है वो अपनी भव-परम्परा को कम कर लेता है, इसीलिए भगवान की वाणी पर विश्वास रखो कि मैं आत्मा हूं पर केवल विश्वास रखना ही काफी नहीं है आप सभी इसकी अनुभूति भी करे । जिस देह पर हम सभी आसक्त हो रहे हैं वो मल मूत्र से भरा हुआ एक पिंजरा है जो एक दिन टूट जाना है । इस शरीर में जो 9 द्वार है वो बाहर केवल मलमूत्र ही फैंकते हैं परन्तु उन 9 द्वारों का भीतर की ओर उपयोग किया जाए तो हमें सिद्धियां प्राप्त हो सकती है । भीतर की आंख हमारी खुल सकती है । वास्तव में सच्चा ज्ञान तो भीतर ही है बाहर का ज्ञान ज्ञान नहीं केवल सूचना है । किसी की बातों पर विश्वास करने से पहले स्वयं प्रयोग से गुजरना और स्वयं का अनुभव होना आवश्यक है । अगर स्वयं का अनुभव हो गया तो फिर उस बात पर पूर्णतः विश्वास हो जाएगा । 

राजा जनक एक बार विश्राम कर रहे थे । विश्राम में स्वप्न देखा कि मेरे राज्य में बहुत अकाल पड़ गया है । खाने के लिए अन्न नहीं, पीने के लिए पानी नहीं । अन्न और पानी की खोज में वो जंगल में पहुंच गए । दूर-दूर तक कहीं कोई पानी या खाने की वस्तु दिखाई नहीं दे रही । इतने में आकाश मार्ग से एक चीज मांस का टुकड़ा लेकर जा रही थी दूसरी चील उस पर झपटी और वो टुकड़ा नीचे गिर गया । राजा जनक की आंखों खुली तो देखा मैं राजमहल में हूं और सब कुछ ठीक है तो सोचने लग गए कि क्या सच है ? प्रातःकाल होने पर अपने गुरु अष्टावक्र के पास पहुंचे और उन्हें सारा वृतांत सुनाया और पूछा कि क्या सच है ?तो अष्टावक्र कहते हैं ना ये सच है और ना वो सच है । जो स्वप्न देख रहा था वो दृष्टा सच है । इसीलिए कहा जाता है कि आत्म-द्रष्टा बनो, स्वयं को जानो, स्वयं को देखाो, स्वयं को समझो ।

जीवन एक खोज है

आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

08 सितम्बर, 2009: ऋषभ विहार, दिल्ली युग पुरुष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- ये जीवन, श्वासें नदी के पानी की भांति बही जा रही है । ये जीवन एक खोज है उससे महाखोज की प्राप्ति हो सकती है । जिन्दगी में हम क्या कर रहे हैं श्वांस लेना, चलना, उठना, बैठना, खाना, धन, दोस्त, पद, परिवार वृद्धि, तर्क, वितर्क क्या इसी का नाम जिन्दगी है । अभी तक के इस जीवन में हमने यही कुछ किया है । इस जीवन में आप क्या करना चाहते हैं और क्या कर रहे हैं इन दो बातों का अपने आंखों के सामने विश्लेषण करो । हम चाहते हैं प्रकाश को और अंधकार जीवन में बढ़ता जा रहा है । बसंत की चाह में जीवन में पतझड़ आ रहा है । सुख आनंद के लिए यत्न कर रहे हैं परन्तु दुःख ही मिल रहा है । क्या हमारा मार्ग सही है । अगर मार्ग सही नहीं है तो फिर उसे सही करना होगा । 

जीवन एक खोज है यहां पर हर कोई खोज कर रहा है । कोई संसार की खोज कर रहा है तो कोई मोक्ष की । जन्म लेने के बाद जिसे खोजना था उसकी खोज की नहीं और जिसे नहीं खोजना चाहिए था उसी में उलझते चले गए । ये मानव जीवन मोक्ष की प्राप्ति के लिए मिला परन्तु उसकी खोज की नहीं । संसार की होड में अपने आपको संलग्न करते रहे । रेत को रगड़ने से तेल की प्राप्ति नहीं होती । सही मार्ग पर जाना है तो सही दिशा भी पकड़नी होगी । मार्ग तो सही चाहते हैं परन्तु दिशा सही नहीं है तो क्या होगा ? निराशा के अलावा हाथ कुछ नहीं लगेगा । 

जीवन की खोज में अपने को जीतना है जिसने स्वयं को जीतकर उसका साक्षात्कार कर लिया उसने सब कुछ पा लिया । जिसने अपने को जीता वह आनंद में है और जो अभी भी दूसरों पर शासन करके आनंद मना रहा है वो इस समय में भी दुःखी है और आगे भी दुःखी होगा । सिकन्दर विश्व विजेता बनना चाहता था और फिर आनंदित, सुखी जीवन की कल्पना कर रहा था उसके गुरु ने उसे प्रारंभ में सुख से जीवन जीने की बात कही तो उसने उस बात को स्वीकार नहीं किया फलश्रुति यह हुई कि वह अपनी कर्ममैल को बढ़ाता हुआ दुःखपूर्वक मौत मरा । वस्तुतः सुख बाहर नहीं सुख हमारे भीतर है, ज्ञान हमारे भीतर है हम इस चमन को देखें जिस चमन के हम फूल हैं । फूल और पत्तियों को देखने से कोई लाभ नहीं होगा । चमन को देखते हुए उसके भीतर के अनंत आनंद का अनुभव करें । हर श्वांस के साथ अपने आप से जुड़े तो हमारी जीवन की खोज सार्थक सिद्ध होगी । 

जीवन का अविस्मरणीय आत्म साधना

आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

09 सितम्बर, 2009: ऋषभ विहार, दिल्ली  युग पुरुष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- आनंद हमारा स्वभाव है, शांति हमारे भीतर है, ज्ञान हम स्वयं है । ध्यान साधना में हम श्वासों का सही उपयोग करते हैं । हर श्वांस पर ज्ञातादृष्टा-भाव से समभावपूर्वक ध्यान करते हैं जिससे आने वाली हर श्वांस सफल होती है । हर श्वांस में स्वयं के करीब आएं । जब व्यक्ति हर श्वांस में स्वयं के करीब आएगा तो कर्मों की ग्रन्थियां स्वतः टूटती चली जाएगी और एक दिन अपना घर सिद्धालय उसे प्राप्त होगा ।

हमारी आत्मा जीवन का सार है हम अत्यधिक ध्यान नहीं देते वह कहीं जाने वाली नहीं है वह अगोचर है उसके ऊपर जो कर्म-मल लगा है उसे मिटाने का पुरुषार्थ करें । हर श्वांस में मैं और मेरा परमात्मा का ध्यान रहे । परमात्मा के पास जाने का आधार नाम स्मरण है । अपने स्वरुप का चिन्तन मैं कौन हूँ ? कहाँ से आया हूँ ? और हर श्वांस में सिद्धों को नमन यही जीवन का सार है । ये श्वासें हमें भी मिली और प्रभु महावीर, गणधर गौतम, चंदनबाला आदि को भी मिली, उन्होंने अपने श्वासों का सदुपयोग किया । हम भी अपने जीवन में श्वासों का सदुपयोग करें । हर श्वांस का मूल्य हीरे जवाहरात से बढ़कर है । हम हर श्वांस का उपयोग करते हैं तो उस श्वांस में असंख्यात कर्मों की निर्जरा होती है । 

आज आत्म ध्यान साधना कोर्स बेसिक एवं एडवांस-ा जो कि पिछले तीन दिनों से चल रहा था उसका समापन हुआ । जिसमें करीब 80 साधकों ने ध्यान साधना के द्वारा सच्ची शांति, आनंद, ज्ञान का अनुभव अपने भीतर किया । इस साधना शिविर से उन्होंने वीतराग सामायिक का प्रशिक्षण प्राप्त किया । साधकों ने अपने अनुभव बताते हुए कहा कि ये साधना अपने आपमें अनूठी है । शरीर और आत्मा का भेद करने से कोई समस्या रहती ही नहीं । साधना करने से शरीर बहुत हल्का हुआ । तनाव दूर हुए और भीतर एक अविस्मरणीय पल का उद्घाटित हुआ । 

इस अवसर पर सिद्धयोग के प्रमुख श्री नारायण काका विशेष-रुप से नासिक से   पहुंचे । उन्होंने अपने अनुभवों को बांटते हुए जन-मानस को साधना से जुड़ने की प्रेरणा प्रदान की । आचार्यश्रीजी के बाह्य व्यक्तित्व से प्रभावित होकर अभिभूत हुए । 

अनुभव-ज्ञान ही सच्चा ज्ञान है

आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

10 सितम्बर, 2009: ऋषभ विहार, दिल्ली युग पुरुष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- प्रभु ने फरमाया तीनों लोंको में यदि कोई ग्रहण करने योग्य है, यदि कोई जानने योग्य है तो वो तुम हो । तुम अजर, अमर, शाश्वत हो जिसने सत्य तŸव को जान लिया उसने सब कुछ जान लिया । उस एक तत्व को कैसे जाने ? जीवन के भवन में उस तत्व का प्रवेश जन्म से है । उस तत्व को अनुभव से जाना जा सकता है । अनुभव ज्ञान नहीं है, ज्ञान के साथ जो सीख पैदा होती है वो ज्ञान है जैसे एक छोटा बालक आग की लाल लपटों को देखकर उसकी तरफ आकर्षित होता है । अग्नि में हाथ डालता है फलतः उसे अग्नि का आभास होता है फिर वह जान जाता है कि इसमें हाथ नहीं डालना चाहिए । यह उसका अनुभव उससे उसे सीख मिली और वही उसका ज्ञान बन गया । 

आदमी समझता है मैं ज्ञानी हूँ । जब ऐसी समझ भीतर आ जाए तो जानना कि तुम कुछ सीख नहीं सकते क्योंकि ज्ञान प्राप्ति के लिए प्रथम आवश्यक है विनम्रता । विनम्रता भीतर आएगी तो ज्ञान भीतर आएगा । जब व्यक्ति स्वयं को अज्ञानी मानना प्रारंभ करता है तब ज्ञान की शुरुआत होती है जब ज्ञान का अनुभव होता है तो ध्यान भीतर प्रवेश करता है । सागर का अनुभव एक बूंद के द्वारा हो जाता है । एक बूंद से पता चल जाता है कि सागर का जल कैसा है ? बहनें खाना बनाती है तो थोड़ा सा चख लेती है उस चखने से उन्हें पता चल जाता है कि खाना कैसे बना है ।

भगवान महावीर फरमाते हैं कि तुम सुनो, सुनकर कल्याण मार्ग और पाप मार्ग को जानो फिर उन दोनों में से तुम्हें जो ठीक लगे उसे स्वीकार कर लो । हम जानते हैं कि पाप मार्ग हमें नीच गति की ओर ले जाता है परन्तु जानकर भी हम पाप किए जा रहे हैं । हम अपने जीवन को देखें । हम जानते हैं कि कषाय करने से कर्मबंध होता है परन्तु अभी तक कषाय छूटे नहीं । अनुभव बड़ा होता है अनुभव से हम कुछ सीख लें । लाओत्से ने वृक्ष से गिरते पत्ते को देखकर मानव जीवन के ढ़लान की सीख प्राप्त की । तुम भी कुछ ऐसी सीख भीतर लो प्यास पैसा करो प्यास है तो पानी की कीमत है भूख है तो भोजन का मूल्य है। विनय है तो ज्ञान की कीमत है । इस जगत के समस्त ग्रन्थों में यही बात बताई है कि हृदय में नाम स्मरण होना चाहिए, मन में दयाभाव होना चाहिए और तन सेवा में समर्पित होना चाहिए ऐसा करने से हमें अनुभव ज्ञान प्राप्त होगा और हम परमात्म मार्ग पर अग्रसर होंगे ।

जो जाग गया वह मुनि है

आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

11 सितम्बर, 2009: ऋषभ विहार, दिल्ली युग पुरुष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- हमारे जीवन में संतत्व कैसे आए । हमारा जीवन समता और शांति से परिपूर्ण केसे हो ? हम कैसे संतुलित जीवन जीएं । नवकार महामंत्र में चैदह पूर्वों का सार समाया है, नमो लोए सव्व साहूणं में समस्त साधुओं को नमस्कार किया गया है । पंच परमेष्ठी नमस्कार मंत्र किसी धर्म सम्प्रदाय में बंधा हुआ नहीं है यह मंत्र शाश्वत है और सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय है । एक जीवन प्रभु महावीर, बुद्ध, राम को मिला और एक जीवन हमको । उन्होंने संकल्प के द्वारा शिवत्व को प्राप्त कर लिया । हमारा संकल्प कमजोर है इसलिए हम वहाँ तक नहीं पहुंचा पा रहे हैं जहाँ तक हमें पहुंचना चाहिए । 

लोक के समस्त साधुओं को नमस्कार करते हुए भगवान ने मुनि की परिभाषा में बताया कि जो जाग गया वह मुनि है । जो अप्रमŸा है वह मुनि है, मुनि केवल साधु वेश से नहीं  होता । आप सामायिक स्वाध्याय में हो और प्रमाद में हो तो फिर वो सामायिक स्वाध्याय आपकी कर्म-निर्जरा का कारण नहीं बन सकता । एक व्यक्ति अप्रमत्त जीवन जीता है परन्तु मुनिवेश नहीं है फिर भी वह मुनि है । जो गुरु अपने भक्तों को बांधे वह गुरु हो नहीं सकता क्योंकि गुरु किसी धर्म सम्प्रदाय में नहीं बंधता और धर्म सम्प्रदाय तो शरीर के होते हैं जब हम शरीर है ही नहीं फिर केसा धर्म और सम्प्रदाय । हम संतत्व की पूजा करें ना कि पंथ की ओर आगे बढ़ें । हर जीवात्मा में सत्य को देखें । हम वर्तमान में अपना सांसारिक परिचय देते हैं परनतु भगवान ने कभी सांसारिक परिचय नहीं दिया । उन्होंने कभी नहीं कहा कि मैं राजा सिद्धार्थ और माता त्रिशला का पुत्र हूं आज के किसी व्यक्ति को उसका नाम ना पूछो या उसका परिचय ना जानो तो बड़ा अटपटा सा लगता है वर्तमान में जो परिचय बिढ़ाने की परम्परा चली है वह मुक्ति की ओर नहीं ले जाएगी । 

संत ऐसा हो जिसके भीतर कोई ग्रन्थी ना हो जो हमेशा शांत मन वाला सत्य में जीवन जीने वाला और सत्य के बल पर आगे बढ़ने वाला हो । यह हम सभी जानते हैं कि घर, परिवार, परिजन कोई साथ नहीं देगा । जो मेरा तेरा करता है वह संत नहीं है । जो वैर की गांठ को बांधता या बढ़ाता है वह संत नहीं हो सकता । संत के लिए कहा है- लेना एक ना देना दो, ऐसा नाम संत का हो । इसका तात्पर्य यही है कि संत केवल एक लेता है और वह है परमात्मा का नाम और दो चीजें संत कभी नहीं देता वो है श्राप और वर । जो श्राप या वर देता है वो संत हो नहीं सकता । जो तुम्हें संसार दे वो संत हो नहीं सकता । हमने स्वयं ने संसार त्याग दिया तो हम तुम्हें संसार कैसे दे सकते हैं । संत समूचे विश्व को अपना परिवार जाने । खुले दिल से हर व्यक्ति का स्वागत करे और हर परिस्थिति में समभाव में जीए यही संतत्व का सार है । 

मुनि वेश से नहीं साधना से होता है

आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

12 सितम्बर, 2009: ऋषभ विहार, दिल्ली  युग पुरुष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- भारत की संस्कृति में संत का विशेष महŸव है । संत वेशभूषा परमपरा में रहते हुए भी उससे ऊपर है । प्रभु महावीर ने मुनि की परिभाषा करते हुए कहा मुनि जो मौन हो गया, शांति और समता जिसके भीतर आ गई । मुनि जो हर क्षण सामायिक की साधना में जीता है । सामायिक की साधना श्रावक की भी होती है और मुनि की भी होती है । श्रावक दो घड़ी के लिए सामायिक करता है और मुनि की जीवन भर की सामायिक है । सामायिक की साधना आत्म-दृष्टि की साधना है जिसमें समस्त पापकार्यों का त्याग तीनों योगों और तीनों करणों का त्याग कर आत्म-भाव में स्थित होना होता है । प्रभु महावीर ने हमें सामायिक साधना के द्वारा शुद्ध धर्म की परिभाषा दी है । 

हम जैसे लोग परम्पराओं में बंधकर शुद्ध धर्म में भेद-रेखा खींचते हैं । ये संसार का चक्र अनादिकाल से चल रहा है इस भव भ्रमण का मूल कारण मोह है जिसे बुद्ध ने अज्ञान कहा । वेदान्तियों ने माया कहा । हम इस मोह-माया से दूर हो शुद्ध धर्म में स्थापित हो  जाए । साधु वही है जो शरीर और आत्मा की भिन्नता का पुरुषार्थ कर रहा है । ईशु ने कहा- बिस्तर पर एक व्यक्ति मरा हुआ है और एक व्यक्ति जागता हुआ है जो सोता है वो मरा है जो जागा है वह जागृत है । यदि मौत ना होती तो धर्म ना होता । स्वर्ग नरक का भय ना होता और कोई भी धर्माचरण करता ही नहीं । केवल मौज मजे की जिन्दगी जीते परन्तु भगवान की वाणी सत्य है ये जीवात्मा 84 लाख जीवयोनी में अनादिकाल से भ्रमण कर रही है । इस भव भ्रमण को हटाना है तो आत्म चिन्तन में लगना होगा । आत्मा का कोई रंग, रुप, आकार नहीं है उसे केवल तीर्थंकर की वाणी से श्रद्धा से ही जाना जा सकता है । 

मुनि वेश से नहीं साधना से होता है । जिसने वेश धारण नहीं किया परन्तु साधना मुनियों से भी ऊँची है वो घर में रहते हुए भी मुनि है । भीतर एक जागरुकता बनी रहे हे परमात्मा कैसी भी स्थिति हो मेरी समता कभी डांवाडोल ना हो । भीतर आत्म-दृष्टि बनी   रहे । इस जगत के जीव मात्र के लिए मेरे भीतर मैत्री भावना प्रवाहित हो । गुणियों के प्रति प्रमोद भावना हो । दीन दुखियों के प्रति करुणा भावना हो । वर्तमान में कितने जीव भूखे हैं पशु पक्षी सूर्योदय से लेकर रात्रि तक केवल भोजन की तलाश में ही हजारों मील यात्रा करते हैं । बरसात, सर्दी, धूप में कैसे जीवन यापन करते हैं । ऐसे में उन समस्त जीवों के लिए करुणा भावना हो और इन भावनाओं को भावित करते हुए भीतर आत्म रमण हो कि मैं शुद्ध, बुद्ध, आत्मा हूं । सुख, दुःख, वैर, मित्रता, भवन, जंगल, योग, वियोग सबमें मेरा समत्व भाव बना रहे, यही प्रभु महावीर की सच्ची साधना है ।