Paravachanmala M-KOTLA 2008

शिवाचार्यश्रीजी का मंगलमय चातुर्मास प्रवेश हर्षोल्लास के वातावरण में सम्पन्न चातुर्मास आध्यात्मिकता से परिपूर्ण है: शिवाचार्यश्रीजी साधु सम्मेलन की प्रक्रिया प्रारंभ


आज प्रातः 9.15 बजे श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज अपने समस्त शिष्य मण्डली एवं स्थानीय श्रीसंघ के साथ जैन बाग से शोभा-यात्रा के रुप में बर्तन बाजार, कूलर चैक होते हुए एस0एस0 जैन सभा, मोती बाजार, मालेर कोटला पधारे । स्थानक भवन में प्रवेश कर उसी शोभा-यात्रा के रुप में सदर बाजार, छोटा चैक, चैधरियां मोहल्ला, भावड़ा मोहल्ला होेते हुए लाल बाजार स्थित एस0एस0 जैन माॅडल सीनीयर सैकेण्डरी स्कूल पधारे जहाँ पर आचार्य भगवंत का अभिनन्दन समारोह हुआ । शोभा-यात्रा में स्थान-2 पर अनेक श्रद्धालुभक्तगणों ने अपनी भक्ति का परिचय देते हुए प्रभावनाओं के स्टाॅल लगाये । आगे बच्चे अपने हाथों में जैन धर्म के जयकारों के बोर्ड लेकर चल रहे थे । पीछे बहिनें मंगल कलश धारण किए शोभा-यात्रा की शोभा बढ़ा रही थी । श्रद्धेय आचार्य भगवंत के साथ-साथ समस्त श्रीसंघ हर्षोल्लास के वातावरण में गगनभेदी जयकारों के साथ आगे बढ़ रहे थे ।

इस अवसर पर  देवलोक में विराजित समस्त पवित्र आत्माएं हर्षित हो बरसात की धीमी’-धीमी बूंदे बरसाकर प्रवेश से पूर्व मंगल अभिषेक किया । शोभा-यात्रा जब एस0एस0 जैन सीनीयर सैकेण्डरी स्कूल पहुंची तो उसने भव्य अभिनन्दन समारोह का रुप धारण कर लिया । श्रद्धेय आचार्य भगवंत का आचार्य रुप में यह द्वितीय चातुर्मास एवं मुनिरुप में तृतीय चातुर्मास है । स्थानीय श्रीसंघ चातुर्मास को लेकर आनंदित  है । अभिनन्दन समारोह में युवा मनीषी श्री शुभम् मुनि जी महाराज के मंगलाचरण से प्रारंभ हुआ तत्पश्चात् स्वागताध्यक्ष दानवीर सेठ श्री दीपक जी जैन का स्वागत एस0एस0 जैन सभा के प्रधान श्री रतनलाल जी जैन ने किया और उसके पश्चात् मुख्य अतिथि श्रीमान् कांतीलाल जी जैन अध्यक्ष जैन कांफ्रेंय, समारोह अध्यक्ष दानवीर सेठ श्री विश्व जी जैन, विशिष्ठ अतिथि समाज सेवक श्री कुलभूषण कुमार जैन, ध्वजारोहणकर्ता श्रीमती विनय सुरेश जी जैन लुधियाना एवं समारोह गौरव समाज रत्न श्री हीरालाल जी जैन, श्री नेमीचंद जी चैपड़ा प्रमुख मार्गदर्शक जैन कांफ्रेंस, श्री पारसमल जी छाजेड़ महामंत्री जैन कांफ्रेंस, श्री केसरीमल जी बुरड़ अध्यक्ष- जीवन प्रकाश योजना, श्री शेरसिंह जी जैन मंत्री जैन कांफ्रेंस आदि का स्वागत स्वागताध्यक्ष द्वारा सम्पन्न हुआ । साथ ही ध्वजारोहण की रस्म श्रीमती विनय सुरेश जी जैन के साथ समस्त महानुभावों ने की । तत्पश्चात् एस0एस0 जैन माॅडल सीनीयर सेैकेण्डरी स्कूल की बालिकाओं ने स्वागत-गीत प्रस्तुत किया ।

इस अवसर पर समाजरत्न श्री हीरालाल जी जैन ने अपनी भावनाएं अभिव्यक्त करते हुए कहा कि- आज का यह मंगल दिवस मंगल कलश का रुप धारण करेगा । उन्होंने श्रमण संघ का समग्र इतिहास प्रस्तुत करते हुए आचार्य श्री शिवमुनि जी महाराज के जीवन पर प्रकाश डाला । साथ ही श्रमण संघ की वर्तमान स्थितियों पर अपनी भावनाएं अभिव्यक्त करते हुए अपना समर्पण चतुर्थ पट्टधर के प्रति समर्पित किया । इस अवसर पर उन्होंने जैन कांफ्रेंस के आए हुए महानुभावों को साधु सम्मेलन की समग्र कार्यवाही भी सुनाई एवं उनके साथ श्रमण संघ की एकता एवं साधु सम्मेलन में पूर्ण सहयोग देने का वचन दिया ।

इस अवसर पर श्री नेमीचंद जी चैपड़ा ने अपनी भावनाएं अभिव्क्त करते हुए कहा कि- आज तक मेरी इस उम्र में मैंने अनेकों संतों एवं आचार्यों की सेवाएं की परन्तु ऐसे सरलता से परिपूर्ण आचार्य के दशर््ंान आचार्य के रुप में पहली बार किए । आचार्य श्री शिवमुनि जी महाराज सरलता की प्रतिमूर्ति है इन्होंने अपना सब कुछ त्यागकर पिछले वर्ष क्षमा-याचना के शुभ-अवसर पर समस्त श्रीसंघ एवं चतुर्विघ संघ से क्षमा-याचना करते हुए श्रमण संघ में जो एकता का बिगुल बजाया यह युगों-युगों तक याद रहेगा । आपने हमें जो भी शिक्षाएं दी है एवं जो भी आपका मार्गदर्शन समय-समय पर प्राप्त होगा उसे हम यथावत लागू करने का पूरा पुरुषार्थ करेंगे ।

श्रमण संघीय मंत्री श्री शिरीष मुनि जी महाराज ने अपनी भावाभिव्यक्ति में कहा कि- आचार्य भगवंत का मालेर कोटला चातुर्मास कोई नया नहीं है । यह चातुर्मास उनका तीसरा चातुर्मास है । मुनि रुप में दीक्षा ग्रहण करने के बाद प्रथम चातुर्मास का सौभाग्य इसी मालेर कोटला श्रीसंघ को प्राप्त हुआ था । उसके बाद सन् 2003 में और सन् 2008 का चातुर्मास भी आपको प्राप्त हुआ है । चातुर्मास में अनेकों रचनात्मक कार्यक्रम होंगे । ऐसे महान् पुरुषों का दर्शन होना बहुत बड़ी बात है और आपके शुभ पुण्यों से इनका वर्षावास आपको प्राप्त हुआ है । इस चातुर्मास में आप सभी इनकी साधना से जुड़ें और इनसे अपने जीवन में कुछ सद्गुण अपनाएं ।

श्रद्धेय आचार्य भगवंत ने चातुर्मास मंगल प्रवेश पर अपनी भावनाएं अभिव्यक्त करते हुए कहा कि- यह चातुर्मास प्रवेश सबके लिए पूरे श्रीसंघ, पूरे मालेर कोटला शहर, पूरे पंजाब प्रान्त, भारतवर्ष एवं समस्त विश्व के लिए मंगलकारी हो । चातुर्मास अनेकों होते हैं और चले जाते हैं । यह चातुर्मास एक विशेषता को लेकर आया है । आप चातुर्मास में अध्यात्म की गहराईयों में प्रवेश करें । अध्यात्म वह रत्न है जो धन देकर खरीदा नहीं जा सकता । अध्यात्म वह परम धन है जो हमें मोक्ष की ओर ले जाता है । वर्तमान तीर्थकर अरिहंत परमात्मा श्री सीमंधर स्वामी भगवान् को नमन । उनकी कृपा से आज यह मंगलमयी चातुर्मास प्रवेश सम्पन्न हुआ । प्रभो ! आपको नमस्कार करते  हो । आप अरिहंत हो, भगवंत को धर्म की आदि करने वाले हो तीर्थ की स्थापना करने वाले हो । आप स्वयं सम्बुद्ध, पुरुषों में उŸाम एवं अनेक उपमाओं से उपमित हो पर मेरी श्रद्धा आपको उन सभी उपमाओं से और ऊपर देखती है । आप शरणागतों को शरण देने वाले   हो । मोक्ष का मार्ग बताने वाले हो । मोक्ष का मार्ग बहुत सरल है, संसार का मार्ग बहुत कठिन है । धर्म हमें मुक्ति देता है । धर्म प्रदर्शन नहीं अन्तर्यात्रा है । हम धर्म एवं साधर्मी का सम्मान करें । चातुर्मास में किसी की निन्दा नहीं करेंगे । कोई साधु, कोई श्रावक किसी की निन्दा नहीं करेगा । निन्दा, अधोगति प्रदान करती  है ।

इस चातुर्मास में आप संसार सागर से पार जाने की तैयारी कर लो । प्रत्येक जीव का आदर   करो । सम्मान अपमान को समभाव से स्वीकार करो । प्रभु की आज्ञा ही हमारे लिए धर्म है और उनकी आज्ञा ही तप है । क्या है उनकी आज्ञा ? इस बात को हम इस चातुर्मास में जानेंगे । तीन बातें दुर्लभ है अरिहंत की वाणी, सिद्ध का स्मरण और साधु का संग । आपको तीनों बातें इस चातुर्मास में प्राप्त होगी । बस आपने उस दुर्लभता को जानकर अपने लक्ष्य को तय करना है । आपका लक्ष्य घर, परिवार, कपड़ा, मकान, पैसा नहीं है । आपका लक्ष्य पंचमगति सिद्धालय को प्राप्त करना है । इस चातुर्मास में साधना को अधिक महत्व देना है । ध्यान साधना शिविर आज से पांच वर्ष पूर्व भी आपने किए थे परन्तु वर्तमान में साधना शिविरों में शुद्ध वीतराग सामायिक का प्रशिक्षण प्रापत कर लो । यह सामायिक ऐसी है जिसे राजा श्रेणिक भी नहीं खरीद सका ।  इस चातुर्मास में भरपूर निर्जरा हो । चातुर्मास में हर पल हर क्षण का उपयोग हो । कैसे आप प्रतिपल प्रतिक्षण आनंद शांति कृतज्ञता सम्पन्नता समृद्धि में रह सकते हो इसका प्रशिक्षण आपको प्रस्तुत चातुर्मास में   मिलेगा ।

इस अवसर पर आचार्यश्रीजी ने श्रमण संघ की वर्तमान गतिविधियों एवं साधु सम्मेलन पर अपने विचार रखते हुए फरमाया कि- श्रमण संघ में एकता, अखण्डता और संगठन की आवश्यकता है । आज सब पदों के पीछे दौड़ रहे हैं । मैं कहता हूं योग्यता के अनुसार पदों का चयन हो । पद लेने पर उस पद की जिम्मेदारी को समझा जाए । यह धर्म शासन बहुत मंगलकारी है । इस धर्म शासन की सेवा करना भी उतना ही मंगेलकारी है । हम पद लेने पर धर्मशासन की सेवा से पीछे ना रहे । सम्मेलन यानि   सम्ममिलन । आपस में मिलकर अपने मन की बात कहें । अपनी कठिनाइ्रयों को सबके समक्ष रखें एवं हमारा श्रमण संघ किस प्रकार और उन्नति को प्राप्त कर सकता है इस पर विचार विमर्श हों । संघ में सुधार हो, धर्म का वातावरण हो । समाज की सेवा हो ।

सम्मेलन के लिए मेरी तरफ से कोई इन्कार नहीं है योग्य स्थान एवं योग्य समय के साथ सम्मेलन ले लिया जाएगा इस हेतु महामंत्री श्री सौभाग्य मुनि जी महाराज को पत्र प्रदान कर चुके  हैं । श्रमण संघ की एकता, अखण्डता और अनुशासन के लिए यदि पद त्याग करना पड़ा तो मैं पद त्याग करने के लिए तैयार हूँ । हम कार्य करें पद तो स्वयं आ जाता है कार्य करने के लिए आगे रहो इस पावन अवसर पर मैं अपनी मातृ संस्था जैन कांफ्रेंस को नही भूल सकता । इन्होंने बहुत बड़ी कुर्बानी की है । स्थान-2 पर जाकर समस्त संतवृंदों को एकता के लिए आगे बढ़ाया । हमारे पास भी कई बार आए । इनके मन में श्रमण संघ की एकता को लेकर एक पीड़ा थी जो पूर्ण हुई । हम सभी प्रेम से कार्य करें । विचारों को शुद्ध करें तो समस्त बाधाएं स्वतः ही दूर हो जाती है । धर्म के लिए जो कुछ करोगे वह सब मंगलकारी ही होगा ।

इस अवसर पर आचार्यश्रीजी ने जैन धर्म एवं श्रमण संघ के विश्व भर में जहां जहां पर भी चातुर्मास हो रहे हैं उन सभी चातुर्मास के लिए हार्दिक मंगल कामना की है कि सभी चातुर्मासों में वीतरागता का वातावरण हो । वीतराग धर्म की आराधना हो और हम सभी प्रभ्ुा महावीर की शिक्षाओं पर आगें बढ़ते हुए उनको जीवन में उतारें । प्रधान श्री रतनलाल जी जैन, महामंत्री श्री सुदर्शन जी जैन, मंत्री श्री प्रमोद जी जैन एवं समस्त जैन सभा के पदाधिकारीगणों को हार्दिक बधाई देना नहीं भूलूंगा । इनकी मेहनत की रंग लाई । प्रस्तुत चातुर्मास में ये सभी धर्म की ओर आगे बढ़ें और समस्त समाज को धर्म से जोड़ें यही इनके प्रति हार्दिक मंगल कामना । समारोह का समापन आचार्यश्रीजी के मंगलपाठ एवं मंगलमैत्री से हुआ ।

समस्त कार्यक्रम का संचालन स्थानीय श्रीसंघ के महामंत्री श्री सुदर्शन जी जैन ने बड़ी ही कुशलतापूर्वक किया । बाहर गांव से आए हुए सभी विशिष्ठ गणमान्यजनों का स्थानीय श्रीसंघ द्वारा हार्दिक स्वागत एवं अभिनन्दन हुआ । इस अवसर पर समस्त भारतवर्ष से हजारों की संख्या में श्रद्धालु उपस्थित   थे । दानवीर सुश्रावकों ने इस अवसर पर श्रीसंघ को विपुल मात्रा में दान राशि प्रदान की ।

आचार्यश्रीजी के दैनिक प्रवचन एस0एस0 जैन सभा, मोती बाजर, मालेर कोटला में दिनांक 17 जुलाई, 2008 से प्रारंभ होंगे एवं सभी प्रवचनों का प्रसारण ‘‘श्रद्धा’’ चैनल पर रात्रि 9.40 से 10.00 बजे तक होगा । आप सभी धर्म प्रभावना का लाभ लें । चातुर्मास प्रारंभ 17 जुलाई, 2008 से हो रहा है एवं ध्यान शिविरों की श्रृंखला 4 अगस्त, 2008 से प्रारंभ होगी । जो भी आनंद, शांति, ज्ञान प्राप्त करना चाहते हैं वो प्रवचन एवं ध्यान साधना का पूर्ण लाभ उठाएं ।

भारतीय योग संस्थान {पंजि0} द्वारा आचार्य भगवंत के पधारने की सूचना से हर्ष की लहर

मालेर कोटला 13 जुलाई, 2008: श्री हनुमान मन्दिर परिसर में सम्पन्न भारतीय योग संस्थान {पंजि0}, शाखा मालेर कोटला का एक योग शिविर आयोजित हुआ उसमें साधक साधिकाओं ने भाग   लिया । इस शिविर में डाॅ0 सतीश कपूर ने श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज के मालेर कोटला चातुर्मास की सूचना शिविरार्थियों को दी और आशा व्यक्त की कि चातुर्मास से जन-जन को लाभ होगा और योग का कार्य भी आगे बढ़ेगा । इस शिविर में डाॅ0 व समाज के विभिन्न वर्गों के शिविरार्थियों ने भाग लिया । सूचना को सुनकर सभी साधकों में खुशी की लहर दौड़ गई और सभी ने प्रण किया कि वे हर प्रकार से इस चातुर्मास को सफल बनाने में अपना योगदान देंगे । यह सूचना श्री सुरेन्द्र अग्रवाल लोहा बाजार, मालेर कोटला ने दी ।

संसार से अध्यात्म का संक्रमण करें
जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेर कोटला 16 जुलाई, 2008 {} युग पुरुष, राष्ट्र संत, जैन धर्म दिवाकर श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने संक्रांति के पावन अवसर पर अपनी मंगलमयवाणी में फरमाया कि- अरिहंत परमात्मा श्री सीमंधर स्वामी भगवान को नमन । अरिहंत परमात्मा वर्तमान में महाविदेह क्षेत्र में भरत क्षेत्र से सबसे नजदीक हैं । महाविदेह क्षेत्र भरत क्षेत्र के इशान कोण में  है । सर्वप्रथम प्रभु को हृदय की अनंत गहराई से वंदन । आज संक्रांति है । संक्रांति संक्रमण का संदेश देती है । संक्रमण यानि आगे बढ़ना । सूर्य एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करता है जब उसका संक्रमण होता है तब संक्रांति आती है । आज कर्क की संक्रांति, सावन का महीना, मूल नक्षत्र, आषाढ शुक्ला त्रयोदशी, तीस मुहूर्ती संक्रांति है । आप सभी खूब धर्म-ध्यान करें । प्रभु स्मरण और मूक प्राणियों की सेवा करें ।  

सूर्य प्रकाश, ज्ञान, शान्ति का संदेश देता  है । आज के पावन अवसर पर क्या संक्रमण करेंगे   आप । संसार से अध्यात्म का संक्रमण करें । धर्म क्रियाकाण्ड में नहीं । मन्दिर, मस्जिद, गुरुद्वारों में नहीं । हमारे हर कर्म में धर्म बने ऐसा विवेक और ऐसी जागरुकता भीतर ले आओ । हरपल हर क्षण कर्म निर्जरा में बिताओ । हमारा हर कार्य धर्म से जुड़ जाए । शिकायतभाव को छोड़ देना । आज तक बहुत सी शिकायतें की । आज से हम क्या कर सकते हैं यह सोचो । वर्षावास में किसी की निन्दा नहीं करना । निन्दा अधोगति की ओर ले जाती है । प्रभु महावीर का चतुर्विध श्रीसंघ मंगलकारी है । यहाँ पर निन्दा जैसा कुछ है ही नहीं । चातुर्मास में धर्म की ओर संक्रमित हो । रात्रि भोजन का त्याग, जमीकंद का त्याग, इच्छानुसार तप, साधना, सामायिक पोषध आदि की आराधना करें । चातुर्मास परलोक की पूंजी है । चातुर्मास में पाप पुण्य नहीं केवल निर्जरा ही निर्जरा करना । भगवान महावीर की वाणी है हे ! निर्मल ज्योति वाले पुरुष तूं पराक्रम कर, धर्म में पुरुषार्थ कर अपनी डिक्शनरी से कोशिश शब्द हटा देना । कोशिश शब्द एक बहुत राजनीतिक शब्द है । हो गया तो मैंने किया नहीं हुआ तो कोशिश की थी पर ना हो सका । हम कोशिश की जगह पुरुषार्थ करें । पुरुष वही है जो पुरुषार्थ करता है । पुरुषार्थ धर्म, साधना, आराधना का । प्रभु ने हमें अवसर दिया धर्म साधना करने का । हर कार्य करने के बाद आनंद, उल्लास का भाव भीतर आवे और भीतर से एक कृतज्ञता उठे तो समझना हम धर्मात्मा हैं ।

चातुर्मास में हम आत्म-दृष्टि को प्राप्त करेंगे । यह शरीर जो हमारा मालिक बना हुआ है, यह वास्तव में हमारा सेवक है । इसे सेवक-रुप में स्वीकार कर स्वयं मालिक बनो । मानव का शरीर परमात्म प्राप्ति के लिए मिला । बस दो कार्य जीवन में आ जाए तो जीवन सफल हो जाएगा । एक श्रम और दूसरा प्रार्थना । माँ अपने बच्चे को श्रम और प्रार्थना से ही बड़ा करती है । माँ की प्रार्थना अपने बच्चे के लिए हमेशा परमात्मा के चरणों में होती है । हम भी परमात्मा स्वरुप बनने के लिए अपनी प्रार्थना अरिहंत परमात्मा के चरणों में रखें । इस चातुर्मास में शरीर के स्तर पर स्वस्थता, मानसिक स्तर पर आनंद और आत्मिक स्तर पर आत्म-दृष्टि प्राप्त करने का हम सबका पूर्ण पुरुषार्थ हो । संक्रांति पर हम यही संदेश ले कि हम अध्यात्म की ओर संक्रमण करें ।

इस अवसर पर आचार्यश्रीजी ने श्रीसंघ के प्रधान श्री रतनलाल जी जैन एवं पूरे श्रीसंघ तथा मालेर कोटला शहर को तृतीया चातुर्मास की हार्दिक बधाई दी । स्थानीय श्रीसंघ एवं भक्तजनों की सेवा भक्ति, धर्म आराधना की मुक्तकंठ से प्रशंसा की ।

विश्वशांती हेतु 17 से 24 जुलाई, 2008 तक चैबीस घण्टे महामंत्र नवकार का अखण्ड पाठ एस0एस0 जैन सभा, मोती बाजार, मालेर कोटला में होगा । आचार्यश्रीजी के प्रतिदिन प्रवचन प्रातः 8.15 से 9.30 बजे तक होंगे एवं सभी प्रवचनों का प्रसारण श्रद्धा चैनल पर रात्रि 9.40 से 10.00 बजे तक होगा । आज के पावन अवसर पर अनेक श्रद्धालुजनों ने संक्रांति श्रवण कर जीवन को धर्ममय बनाया ।

गुरु को अपने दुर्गुणों की दक्षिणा दें
जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेर कोटला 17 जुलाई, 2008 {} युग पुरुष, राष्ट्र संत, जैन धर्म दिवाकर श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर अपनी मंगलमयवाणी में फरमाया कि- आज गुरुपूर्णिमा का पावन दिवस है गुरु शब्द बहुत महत्वपूर्ण शब्द है । गुरु कोई शिक्षक, अध्यापक, प्रोफेसर नहीं । गुरु वो है जो हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाता है । सत्य की राह दिखाता है । जीवन को सुख शांति समृद्धि और आनंद से भर देता है । गुरु एक अनूठा और गहरा शब्द है । आज तक इस शब्द की परिपूर्ण व्याख्या कोई नहीं कर पाया । गुरु छोटा शब्द होते हुए भी इसमें अनंत समाया है । एक महिमा, रोशनी इस शब्द के भीतर है । गुरु वह सूरज है जो अपनी लाखों करोड़ों किरणों से भवों-भवों के अंधकार को दूर कर देता है । कहते हैं सदियों बाद किसी गुरु का इस धरा पर अवतरण होता है । कहा भी है-
सत्गुरु की महिमा अनंत, अनंत कियो उपकार ।
लोचन अनंत उघाड़िया, अनंत दिखावन हार ।
गुरु के प्रति एक गहरी श्रद्धा ही हमें परमात्मा से मिलाती है । गुरु जीवन की दशा बदल देते हैं । आज गुरु पूर्णिमा के अवसर पर आप गुरु-चरणों में क्या समर्पित करोगे गुरु को क्या दक्षिणा दोगे । गुरु आपसे कोई पैसा, पद, प्रतिष्ठा नहीं मांगता वह तो आपकी खोट चाहता है । आपके भीतर जो दुर्गुण, दुव्र्यसन भरे हैं उन्हें गुरु पूर्णिमा पर गुरु दक्षिण में दे  दो । अपना क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, वासना, राग, द्वेष, दुर्भावना सब गुरु दक्षिणा में समर्पित कर दो । लोहे को सोना करने वाले बहुत से मिलेंगे परन्तु लोहे से पारस बनाने वाले बहुत थोड़े ही होते हैं । सत्गुरु पारस स्पर्श के समान है जिसके पास जाने मात्र से उसके दर्शन मात्र से ही कल्याण हो जाता है । एक प्रार्थना अपने गुरु के चरणों में जो हमें इस देह से परमात्मा तक पहुंचा दे ।

आज वर्षाकालीन चातुर्मास का प्रथम दिवस आप सबके लिए मंगलकारी हो, शुभ हो । चातुर्मास तीर्थंकरों की परम्परा है । भगवान महावीर एवं वर्तमान में महाविदेह क्षेत्र में अरिहंत परमात्मा श्री सीमंधर स्वामी भगवान भी चातुर्मास करते हैं वर्ष भर में तीन चातुर्मास आते हैं एक शीतकालीन चातुर्मास, एक ग्रीष्म कालीन चातुर्मास एवं एक वर्षाकालीन चातुर्मास । इस वर्षाकालीन चातुर्मास का एक विशेष महत्व है । वर्षा ना हो तो अन्न पैदा नहीं हो सकता । चारों तरफ हरियाली नहीं छा सकती । भारत एक कृषि प्रधान देश है । इस देश में भूमि की रक्षा और पर्यावरण के संतुलन हेतु वर्षा का आना आवश्यक है । वर्षाकाल में हम सभी धर्म से जुड़ने का संकल्प लें । संकल्प से क्रियान्विती होती है और कार्य स्वतः ही सम्पन्न हो जाता  है । चातुर्मास में हम सभी सेवा और साधना के क्षेत्र में आगे बढ़ाए । अपने कषायों को कम कर तप के क्षेत्र में आगे बढ़ें । अपने हाथ से अतिथियों की सेवा करें । ध्यान रहे अपने द्वार से कोई भी खाली ना  जाए । सेवा और साधना जीवन का अंग-संग बन जाए । बस एक सेवा का दीपक जलाओ । सारा जग स्वतः ही प्रकाशित हो उठेगा । इस चातुर्मास में कल्पवृक्ष की छांव में बैठकर इच्छित फल को प्राप्त कर लेना । इस अमृतवाणी की गंगा में डूबकर स्वयं को अमृतमय बना लेना ।

गुरु आत्म स्वरुप का बोध कराता है
जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेर कोटला 18 जुलाई, 2008 युग पुरुष, राष्ट्र संत, जैन धर्म दिवाकर श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- जीवन में आत्मा से परमात्मा जीव से शिव बनाने वाला अगर कोई सत्गुरु मिल जाए जो यह जन्म सफल हो जाता है । सत्गुरु एक प्रकाश है जैसे सूर्य उसकी पहली किरण धरती पर पड़ते ही अंधकार गायब हो जाता है ऐसे ही आत्म-ज्ञानी कोई सत्गुरु अगर जीवन में मिलता है तो व्यक्ति अंधकार से प्रकाश की ओर चला जाता है ।

गुरु एक प्रताप है रोशनी है महिमा है चमत्कार है । गुरु कुछ नहीं करता बस सान्निध्य प्राप्त होते ही स्वयं सब कुछ घटित हो जाता है । जैसे सूर्य धरती पर अंधकार को भगाने के लिए कुछ नहीं करता उसके आते ही अंधकार स्वयं भाग जाता है उसी प्रकार सत्गुरु के जीवन में आने से व्यक्ति जन्मों-जन्मों की तमस जन्मों-जन्मों के कर्म-बंधनों से मुक्त होकर मुक्ति की ओर बढ़ता है ।

पश्चिम ने वैज्ञानिक शब्द दिया भारत ने गुरु शब्द दिया । गुरु का अर्थ होता है ‘‘गु’’ यानि अंधकार ‘‘रु’’ यानि प्रकाश । अगर कोई सत्गुरु जीवन में मिले तो उसका सान्निध्य प्राप्त करने से चूकना मत । यह एक अपूर्व अवसर है क्योंकि अवसर बार-बार नहीं मिलता । श्रीमद रायचन्द्र सत्गुरु की महिमा बताते हुए कहते हैं:-

जे स्वरुप समज्या बिना, पाम्यो दुःख अनंत ।
समझाव्यो ते पद नमो, श्री सद्गुरु भगवंत ।।
    
सत्गुरु आत्म स्वरुप का बोध कराता है । जब तक व्यक्ति अपने स्वरुप का बोध प्राप्त नहीं करता तब तक वह दुःख पाता है और जब अपने स्वरुप को समझाने वाला सद्गुरु मिलता है तो उसके चरणों में समिर्पत हो जाना, झुक जाना, उसके चरणों को पकड़ लेना ताकि जन्मों-जन्मों का दुःख अंधकर समाप्त हो   जाए ।

सत्गुरु के लक्षण बताते हुए आचार्यश्रीजी ने आगे फरमाया- कि वो आत्मज्ञान से परिपूर्ण सभी को समदृष्टि से देखने वाला और उसकी वाणी में एक अपूर्व ओज और परमश्रुत अर्थात् भगवान की वाणी को बताने वाला सत्गुरु कहा गया है । ऐसा सत्गुरु शरीर, प्रतिष्ठा, पद को महŸव नहीं देता । उसकी दृष्टि में आत्मा का ही महŸव है । वह स्वयं आत्म-ज्ञानी होता है और दूसरों को उस ओर लेकर जाता है।

जीवन में भ्रांति ही सबसे बड़ा रोग है
जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेर कोटला 19 जुलाई, 2008  जैन धर्म दिवाकर  आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- जीवन जीने के दो तरीके हैं एक जीवन राममय जीने का है दूसरा काममय जीने का है । राम का अर्थ दशरथ का पुत्र नहीं एक शुद्ध आत्मा, परमात्मा भगवान् अरिहंत कुछ भी कहो । राम शब्द बड़ा प्यारा है । राम-राम जपते अनेक व्यक्ति ज्ञान को उपलब्ध हो गए । उन्होंने राम-राम इस प्रकार जपा कि उनके भीतर का क्रोध, अहंकार, ममŸव, राग- द्वेष सब समाप्त हो गए । इन सबको समाप्त कर वो स्वयं राम हो गए । राम का नाम किस प्रकार लेना चाहिए यह शिक्षा सत्गुरु देता  है । सत्गुरु एक ओैषधि है और सत्गुरु एक वैद्य है । ज्ञानीजन फरमाते हैं-  

आत्म भ्रान्ति सम रोग नहीं, सत्गुरु वैद समान ।
गुरु आज्ञा समपत्य नहीं, औषध ध्यान विज्ञान ।।

इस जीवन में भ्रांति ही सबसे बड़ा रोग है । सत्गुरु-रुपी वैद इस भ्रांति का इलाज करता है । हम यह मान बैठे हैं कि यह शरीर आत्मा है जो भी किया मैंने किया जो करता हूं मैं करता हूँ इस बात की भ्रांति हमें हो गई है । यही रोग हमें संसार में भटका रहा है । इस रोग से सत्गुरु मुक्त कराता है । जिस प्रकार एक दवा अनेक रोगों में भिन्न-भिन्न तरीकों से ली जाती है ओर उसका भिन्न-भिन्न परिणाम होता है इसी तरह सत्गुरु बताता है राम का नाम किस तरह लेना है, कब लेना है कैसे लेना हैं । उसके द्वारा बताए गए ध्यान, विज्ञान का जब साधक अनुसरण करता है, उस पर चलता है गुरु की आज्ञा का पालन करता है तब वो व्यक्ति भ्रांति से मुक्त हो जाता है । दास मलुका का बड़ा सुन्दर है ।

मलुका सोईपीर है, जो जाने पर पीर ।
जो पर पीर ना जानिए, सो काफिर बेपीर ।

कितना सुन्दर वाक्य है कि जो पर की पीड़ा को जानता है वही सच्चा पीर है और जो पीड़ा को नहीं जानता है वो व्यक्ति पीर कहलाने के योग्य नहीं । पीड़ा क्या है ? इस संसार में भ्रमण क्या है ? यह वही व्यक्ति जान सकता है जिसने आत्म-ज्ञान को पाया है । संसार भ्रमण सबसे बड़ी पीड़ा है । इस पीड़ा से मुक्त कराने वाला ही सच्चा पीर कहलाता है ।

प्रार्थना होगी तो समर्पण होगा
जैनाचार्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेर कोटला 20 जुलाई  जैन धर्म दिवाकर  आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन को आरंभ करने से पूर्व एक प्रभु भजन जिसके शब्द थे- तुम मेरे जीवन के धन और प्राणाधार हो........से शुरुआत की और वहाँ उपस्थित श्रद्धालुओं को भाव-विभोर कर दिया । उन्होंने कहा- एक प्रार्थना, एक भाव परमात्मा के चरणों में इस तरह का हो कि मेरा जो कुछ है वो तूं है । जीवन में दो दृष्टि है एक कर्म-दृष्टि और दूसरी समर्पण की दृष्टि । दोनों दृष्टि सत्य है । जैसा हम करते हैं वैसा हमें मिलता है । यह कर्म-दृष्टि । समर्पण में व्यक्ति का अहंकार समाप्त हो जाता है । जहाँ प्रेम है वहाँ बोझ नहीं । जिस व्यक्ति से प्रेम हो जाता है उसे हम अपना सब कुछ लुटा देते   हैं । उसके पास बैठने में, उसकी बात सुनने में घण्टों उसके सान्निध्य में रहने से मन में तृप्ति होती है क्योंकि प्रेम समर्पण सिखाता है ।

मानव जीवन को पाकर अहंकार मत करना ।  यह जीवन प्रभु से प्रेम करने के लिए मिला है । जब प्रेम होगा तब प्रार्थना का जन्म होगा । प्रार्थना होगी तो समर्पण होगा । समर्पण होगा तो अहंकार स्वयं समाप्त हो जाएगा । प्रार्थना में शब्द का महŸव नहीं भाव का महŸव है । भाव से भक्ति पैदा होती है । भक्ति से प्रेम होता है और प्रेम से प्रार्थना होती है । किसी व्यक्ति को प्यास लगी है वह प्यासा है तो वहाँ पर पानी को पानी कहते हैं या जल कहते है नील, आव कहते हैं इस चीज का महŸव नहीं । महŸव है उसकी प्यास किस प्रकार समाप्त हो । वृक्ष पर जितने ज्यादा फल लगते है वह उतना ज्यादा झुकता है और जितना-2 प्रेम हृदय में आएगा उतना ही वह हृदय विनम्र होता चला जाएगा ।

प्रार्थना कहीं पर भी करें मन्दिर, मस्जिद, स्थानक, गुरुद्वारे में करें इसका कोई महŸव नहीं बस मन में भाव उठा और प्रार्थना कहीं भी कर दी । एक छोटा बालक जो बोलना नहीं जानता, जो चलना नहीं जानता जिसे माता, पिता पड़ौसी, दादा-दादी किसी की भी पहचान नहीं वो बालक भाव को पहचानता है । उसे कोई व्यक्ति किस भाव से बुलाता है वो बालक उसकी ओर आकर्षित होता है । अगर एक बालक आपके मनोभावों को जानता, समझता है तो क्या परमात्मा आपके मनोभावों को नहीं समझेगा ? उसके प्रति प्रेम, श्रद्धा और भाव से प्रार्थना करें । वही प्रार्थना मोक्ष-मार्ग की ओर हमें लेकर जाती है । प्रार्थना कैसे होनी चाहिए, किस प्रकार करनी चाहिए इन बातों पर आचार्य भगवंत आगे और विस्तार से प्रकाश डालेंगे यह सूचना श्रमण संघीय मंत्री श्री शिरीष मुनि जी महाराज ने दी ।

परमात्मा को बुद्धि से नहीं हृदय से जानो
जैनाचार्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेर कोटला 21 जुलाई जैन धर्म दिवाकर  आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- जिसे तुम परमात्मा मानते हो वो अनंत दया का सागर है । अनंत करुणावान है । यह बात हमने आज तक बुद्धि से जानी है और जब कभी हमें कष्ट आता है तो हम उस परमात्मा को कोसने लग जाते हैं । किसी व्यक्ति का जवान बेटा मर गया तो वो व्यक्ति परमात्मा को कोसने लग जाता है । सोचो जरा जो परमात्मा करुणावान, दयावान है वो तुम्हें कष्ट क्यों देगा । जो कुछ भी है वो तुम्हारे कर्मों का फल है । कभी ऐसा कर्म किया होगा जो आज भोगना पड़ रहा है । परमात्मा दयालु है यह बात हृदय से जानो । जब ये बात हृदय से जानी जाएगी तब परमात्मा के प्रति मन में अश्रद्धा उत्पन्न नहीं होगी । प्रभु से प्रार्थना करें कि प्रभो ! मेरे हृदय में प्रेम भर दो । घृणा का कोई स्थान ना रहे । जब घृणा निकल जाएगी तो परमात्मा स्वयं हृदय में वास करेगा । कबीर का एक सुन्दर वचन है:-
 

यह संसार सकल है मैला, राम कहे ते सुचा
क्हत कबीर नाम नहीं छोड़ो, गिरत पड़त चढ़ी ऊँचा ।।


इस संसार में दुःख है जो हृदय संसार में रचा पचा है वो मैला है । जिसके हृदय में राम है वही व्यक्ति सूच्चा अर्थात् स्वच्छ है । कबीर कहते हैं कि कितना ही दुःख आ जाए कितने ही कष्ट आ जाए नाम नहीं छोड़ना । व्यक्ति गिरते पड़ते ही चलना सीखता है । जब नाम का सहारा रहेगा तो वो व्यक्ति स्वयं ऊँचा उठ जाएगा ।

प्रार्थना अन्तःकरण का स्नान है । जैसे वर्षाऋतु में धरती की कठोरता, उसका रुखापन समाप्त हो जाता है उसके ऊपर वर्षा के छीटें पड़ते ही एक सुगंध उठती है चारों तरफ हरा-भरा हो जाता है इसी तरह व्यक्ति का हृदय कितना ही रुखा, कितना ही कठोर क्यों न हो प्रभु की प्रार्थना के छीटें पड़ते ही उसका अंर्तहृदय भीग जाता है ।

रोई उस बुत के आगे, इस कदर दो आंखे मेरी ।
कि पुतलियां दोनों, नहा-धोकर भ्रमण हो गई ।।


उस परमात्मा की भक्ति में अगर आंखों से आंसू भी बहे वो आंसू कर्ममल को धो देते हैं । उन आंसुओं में प्रभु का प्रसाद है । आंसू भी व्यक्ति तीन तरह से बहाता है । पहली तरह के आंसू- दुःख और पीड़ा में बहाए जाते हैं । दूसरी तरह के आंसू खुशियों में बहाए जाते हैं, तीसरी तरह के आंसू आनंद के आंसू हैं जो प्रभु भक्ति, उसकी प्रार्थना, उसके मिलन में बहते हैं । तीसरी तरह के आंसू सबसे श्रेष्ठ है । भक्ति में बह जाना जो भी हो उसे रोकना मत । भक्ति की थी चंदना ने जो प्रभु महावीर आए । भक्ति की थी प्रह्लाद ने जो भगवान् स्वयं आए । मीरा ने भक्ति की तो परमात्मा को पा लिया फिर हम क्यों नहीं पा सके । बस भक्ति करें, अपने अंर्तहृदय को भिगो डाले । परमात्मा अवश्य मिलेंगे ।

अरिहंत की भक्ति करने से भीतर समृद्धि का भाव प्रकट होता है
जैनाचार्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेर कोटला 22 जुलाई  जैन धर्म दिवाकर  आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने प्रभु भक्ति भजन के द्वारा आज के प्रवचन का आरंभ करते हुए फरमाया कि- अरिहंत की भक्ति करने से भीतर समृद्धि का भाव प्रकट होता है । भीतर सम्पूर्णता का अहसास होता है । ये पांच इन्द्रियाँ यह सुन्दर काया श्वांस, धर्म आदि संस्कार हमें अपने पूर्वकृत कर्मों के द्वारा प्राप्त हुए हैं यह सत्य है परन्तु व्यक्ति बुद्धि के स्तर पर जीता है वो कहता है कि यह सब मेरा है । जहाँ पर ऐसा भाव आता है वहाँ पर बंधन होता   है । हम दुकान चलाते हैं लोगों को रोजगार देते हैं मैंने इतना सुन्दर मकान बनाया, मेरे जैसा बुद्धिमान कोई नहीं इस प्रकार के भाव अहंकार की ओर ले जाते हैं । अगर हम यह सब प्रभु कृपा मान लें कि हे प्रभो ! यह सब तेरी कृपा से प्राप्त हुआ है तो मन का अहंकार समाप्त हो जाता है भीतर विनम्रता आती है और जब अहंकार को समाप्त कर विनम्र भाव से प्रभु भक्ति करते हैं सब कुछ उसके चरणों में समर्पित कर देते हैं मन वचन काया की एकरुपता से उस परमात्मा को याद करते हैं दुःख से घबराते नहीं सुख में फूलते नहीं मन में समभाव रखते हैं तो वो प्रार्थना कर्मक्षय का एक महान् साधन बन जाती   है ।   

भीखा बात अगम की, कहन सुनन की नाही ।
जो जाने सो कहे नहीं, कहे सो जाने नाहीं ।।

भीखा एक संत हुए वो कहते हैं कि रहस्य की बात अर्थात् सत्य की बात कहने और सुनने की नहीं जहाँ पर सत्य कहा और सुना जाता है वहाँ सत्य सत्य नहीं रहता । उसका स्वरुप बदल जाता है । यह बात अनुभव की है । जब हम कहना और सुनना छोड़कर इसे अनुभव कर लेते हैं उस रहस्य की प्रतीति हमें हो जाती है तब शब्द मौन हो जाते हैं । परमात्मा शब्दों से रिझाया नहीं जा सकता । परमात्मा को आपके शब्दों का कोई मूल्य नहीं । उसके पास आपके भाव पहुँचते हैं । सब कुछ परमात्मा का है यह मात्र शब्द नहीं भीतर का भाव होना चाहिए तब व्यक्ति अहंकार जनित कर्मों से बच सकता है । प्रार्थना शब्दों की डोर से बेशक बंधी हुई हो शब्दों का सहारा तो लेना ही पड़ता है परन्तु वो शब्द हमें भीतर गहराई में ले जाते हैं । शब्दों की मार्मिकता, शब्दों की सुन्दरता उसमें व्याकरण का कोई महŸव नहीं, महŸव है उसके भीतर भाव क्या है । शब्द कम ज्यादा हो सकते हैं मगर भाव पूर्ण हो तो परमात्मा भीतर ही प्रकट हो जाता है ।

आचार्यश्रीजी के चातुर्मासिक मंगलमय प्रवचनों का प्रसारण ‘‘श्रद्धा’’ चैनल पर रात्रि 9.40 से 10.00 बजे तक शुरु हो चुके हैं । यह सूचना एस0एस0 जैन सभा के महामंत्री श्री सुदर्शन जी जैन ने दी । चातुर्मास में बाहर से सिरसा, सरदूलगढ़, राजपुरा {आम्बे वाले}, आदि अनेक स्थानों से दर्शनार्थी लाभ ले रहे हैं । महामंत्र नवकार का जाप बड़े सुन्दर ढंग से एस0एस0 जैन सभा, मोती बाजार, मालेर कोटला में चल रहा है । श्री सुदर्शन जैन ने सभी को प्रेरणा दी कि ज्यादा से ज्यादा प्रवचनों में तप और जप में लाभ लें ।

मोक्ष का सुख संसार के सभी सुखों से बढ़कर है

जैनाचार्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेर कोटला 23 जुलाई  जैन धर्म दिवाकर  आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने प्रभु भक्ति भजन के द्वारा आज के प्रवचन का आरंभ करते हुए फरमाया कि- परमात्मा को प्राप्त करने के दो मार्ग हैं ध्यान और भक्ति । जैन धर्म में ध्यान के साथ भक्ति को भी पूरा महŸव दिया गया है । जैन धर्म का मूल मंत्र नवकार महामंत्र भक्ति की जिन्दा उदाहरण है । भक्ति एक सरल मार्ग है । नवकार मंत्र में अरिहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय व साधु के गुणों को नमन किया गया है । जब जीवन में नमन घटित होता है तो जीवन अहंकार शून्य हो जाता है । इसी प्रकार जैन धर्म में 24 तीर्थंकरों की स्तुति की गई है इस स्तुति का नाम लोगस्स है । इस लोगस्स के पाठ में तीर्थंकर परमात्मा का कीर्तन करते हुए उन्हें तीन लोग का स्वामी कहा गया है और मात्र कीर्तन करने से नमन, अर्चना व स्तुति का भाव प्रकट हो जाता है । ये पाठ भी कषाय में डूबी आत्मा के कर्म हल्के करने में सहायक है ।

प्रार्थना कोई शब्दों का जाल नहीं भीतर के भाव चरणों में समर्पित हों इसलिए प्रार्थना घटित होती है । भगवान महावीर ने धर्म के लिए कोई आयु नहीं बताई क्योंकि श्वांस का काई भरोसा नहीं । शरीर क्षण-भंगुर है । कब अस्वस्थ हो जाए इसका पता नहीं । जब तक शरीर स्वस्थ है तभी तक धर्म हो सकता है । प्रार्थना युवा मन की अभिव्यक्ति है । कई लोग समय की दुहाई देते हैं कि धर्म के लिए समय नहीं है पर मैं कहता हूँ कि चैबीस घण्टे में दो घण्टे शुद्ध भाव से धर्म कर लिया जाए तो आत्म-कल्याण निश्चित है ।

प्रार्थना के संदर्भ में जैन धर्म में आचार्य मानतुंग द्वारा रचित भक्ताम्बर-स्तोत्र का वर्णन करना आवश्यक है । उन्हें विक्रमादित्य राजा ने दरबार में बुलाकर चमत्कार दिखाने को   कहा । आचार्य मानतुंग ने कहा- राजन् आत्मा से बढ़कर कोई चमत्कार नहीं । पर राजा ने नहीं माना । राजा ने आचार्य मानतुंग को 48 तालों वाली कोठड़ी में जंजीरों से बाँधकर कैद कर दिया । आचार्य मानतुंग ने भगवान ऋषभदेव की स्तुति आरंभ की । उनके अन्दर से एक-एक श्लोक घटित होता गया और हर श्लोक के बाद एक ताला खुलता गया इस प्रकार उन्होंने 48 श्लोकों के बाद सभी ताले खुल गए और आचार्य मानतुंग अपनी भक्ति के कारण बाहर आ गए । आज जैन धर्म की सभी परम्पराओं में भक्ताम्बर-स्तोत्र को सर्वमान्य भक्ति-सूत्र के रुप में प्रतिष्ठित किया गया है ।

मनुष्य मोक्ष का अधिकारी है मोक्ष में अनंत सुख है । संसार में चक्रवर्ती के भौतिक सुख से ज्यादा कोई सुख नहीं है पर चक्रवर्ती के सुख के सामने त्यागी तीर्थंकर भगवान् का सुख अनंत गुणा है । उनके चरणों में स्वर्ग के 64 इन्द्र अपने देव परिवार समेत उनके समवसरण में पधारते हैं । उन्हें 34 अतिशय और अष्ठप्रतिहार्यों का सुख प्राप्त है । जो तीन लोक में किसी भी जीव को प्राप्त नहीं है । वह अपने मंगलमय वाणी द्वारा स्वयं तिरते हैं और औरों को तिराते हैं इसीलिए उन्हें पुरुषों में उŸाम कहा गया है । स्वर्ग और मोक्ष एक समान नहीं है बल्कि उसमें बहुत अन्तर है ।

अरिहंत प्रभु के नाम स्मरण से जीवन आनंदमय बनता है
जैनाचार्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेर कोटला 24 जुलाई  जैन धर्म दिवाकर  आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने प्रभु भक्ति भजन के द्वारा आज के प्रवचन का आरंभ करते हुए फरमाया कि- मानव जीवन की उपलब्धि इस बात में निहित है कि जीवन के संघर्ष में प्रभु का नाम सतत् चलता रहे तो जीवन आनंदमय बन जाता है । जैसे किसी मनुष्य को सर्दी लग रही हो तो अग्नि की गर्मी से उसकी सर्दी दूर हो जाती है कोई भूखा व्यक्ति भेाजन करने के बाद भूखा कैसे रह सकता है यह बातें कदापि संभव नहीं है । हर श्वांस में अरिहंत, राम का स्मरण करते रहो तो जीवन अरिहंतमय, राममय बन जाता है । जैसे संत बाल्मिकी का जीवन राम का नाम लेने से परिवर्तित हुआ ।

मन प्रतिपल प्रतिक्षण बदलता रहता है । जीवन में श्वांस का बहुत महŸव है । हर मनुष्य श्वांस लेता है पर श्वांस का महŸव नहीं जानता । जैन धर्म में जब हम कायोत्सर्ग करते हैं तो श्वांस पर ध्यान लगाते हैं । श्वांस को आते जाते देखने से क्रोध, मोह शान्त हो जाता है फिर क्रोध को शान्त करने के लिए किसी मंत्र, यंत्र व तंत्र की साधना की जरुरत नहीं है । श्वांस की साधना की विधि बड़ी गहरी है । भगवान बुद्ध ने इसे आनापान सती कहा है ।

मनुष्य ही साधना कर सकता है । मनुष्य के मन में कषाय उत्पन्न होते रहते हैं और इस साधना से सभी कषाय यानि क्रोध, मान, माया, लोभ शान्त हो जाते हैं । साधना करना प्रवचन से अधिक लाभ है । साधना का अर्थ है जीवन पद्धति । साधना करनी हो तो हमें किसी भी प्रकार का बहाना नहीं करना चाहिए । जैसे- कोई मनुष्य कहे कि मेरे पास साधना करने के लिए समय नहीं है या हमें दुकान आदि धंधा करना है ये सारी बातें मन की चालाकियां हैं । इन बातों में हमें उलझना नहीं चाहिए इसीलिए हम ध्यान पद्धति पर जोर देते हैं और ध्यान शिविरों के माध्यम से जीव को समाधि में जीने की कला सिखाते हैं ।

संसार में दुःख ही दुःख है । बड़े-2 महत्वाकांक्षी सिकन्दर, चंगेजखां, हिटलर, नादिरशाह आदि इस दुनियां को जीतना चाहते थे उन्होंने भयंकर नरसंहार किए और अन्तिम समय खाली चले गए । अब उनका नाम कोई श्रद्धा से नहीं लेता । हमें मन, वचन, काया की एकरुपता से प्रभु का स्मरण करना चाहिए । प्रार्थना, भक्ति की ऊँचाईयों को छूना हो तो अहंकार छोड़कर विनम्र बनो । संसार में आत्मा के निर्मल-भावों का मूल्य है अहंकार का कोई मूल्य नहीं । निर्मल भावों से प्रभु का आचरण करने से आपको प्रभु की प्राप्ति अवश्य होगी ।

आत्म: ध्यान साधना शिविर ‘‘बेसिक’’ 4 से 8 अगस्त, 2008 को प्रातः 5.30 से 8.30 बजे तक एवं शाम को 3.00 से 5.00 बजे तक एस0एस0 जैन सभा, मोती बाजार, मालेर कोटला में सम्पन्न होने जा रहा है जिसमें आप सभी सादर आमंत्रित हैं । आचार्यश्रीजी के दर्शनार्थ भारतवर्ष से दर्शनार्थियों का आवागमन निरन्तर जारी है ।

प्रार्थना के द्वारा साधक परमात्मा से जुड़ता है
जैनाचार्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेर कोटला 25 जुलाई जैन धर्म दिवाकर  आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने प्रभु भक्ति भजन के द्वारा आज के प्रवचन का आरंभ करते हुए फरमाया कि- जीवन के दो मार्ग है एक है संघर्ष का मार्ग और दूसरा है समर्पण का मार्ग । अक्सर मानव पहला मार्ग अपनाता है । संघर्ष में तनाव, बेचैनी व डिप्रेशन का जन्म होता है । ये दुःख को बढ़ाता है । समर्पण में व्यक्ति आनंद में रहता है परन्तु समर्पण का मार्ग बहुत ही कठिन है । समर्पण का मार्ग ऐसा है जैसे बच्चा बचपन में ही माँ के प्रति समर्पित होता     है । माँ अपने खाने पीने सोने का ध्यान न रखते हुए बच्चे का पूर्ण-रुप से ध्यान रखती है । जब बच्चा संघर्ष करने लगता है तब माँ उसका ध्यान रखना भी छोड़ देती है ।

जीवन में समर्पण से विनय उत्पन्न होती है । जैन धर्म में विनय को धर्म का मूल कहा गया है और चाहे साधु हो चाहे श्रावक प्रत्येक को विनय धर्म पर चलने के लिए भगवान महावीर ने उŸाराध्ययन सूत्र के प्रथम अध्ययन में चलने का उपदेश दिया है । समर्पण में स्वीकारभाव आ जाए तो आनंद प्रगट होता है संघर्ष में अस्वीकार भावना से परेशानियाँ सताने लगती है, यह प्रकृति का नियम है ।

विनय से ही प्रार्थना का जन्म होता है । विनय और प्रार्थना पर्यायवाची शब्द है । एक सिक्के के दो पहलू है । प्रार्थना समर्पण की एक कला है । प्रार्थना के द्वारा साधक परमात्मा से जुड़ता है । हर धर्म में प्रार्थना का अपना महŸव है । ल्यूं टाॅल्सटाय ने एक कथा के माध्यम से समर्पण और विनय का महŸव बताया   है । कथा का सार इस प्रकार है- एक पादरी जो चर्च का अध्यक्ष था तीन अनपढ सन्यासियों को मिलने झील के पार जाता है और उन्हें चर्च द्वारा निर्मित शुद्ध प्रार्थना बताता है । पर वे तीनों सन्यासी जो कि भाषा-ज्ञान से अनभिज्ञ हैं वे कहते हैं कि हम तो परमात्मा को हमारे द्वारा निर्मित प्रार्थना से ही याद करते हैं ये लम्बी प्रार्थना हमारे बस का रोग नहीं । पादरी लम्बी प्रार्थना देकर जब जाने लगता है तो देखता है कि तीनों सन्यासी नदी के पानी के ऊपर चलते हुए उसके पास आ रहे हैं तब पादरी को पता चलता है कि सच्ची प्रार्थना इन अनपढ़ सन्यासियों के पास है ना कि हमारे द्वारा निर्मित प्रार्थना ।

ऐसी ही संक्षिप्त प्रार्थना है जिससे आपका परमात्मा से सीधा सम्पर्क प्राप्त हो सकता है वह है ‘‘मैं और मेरा परमात्मा’’ । संसार में मानव अनंतकाल से कर्मवश के वशीभूत भटक रहा है । संसार का इतिहास भी इतना ही पुराना है जितना मानव आत्मा का इतिहास । इसमें एक ही नई बात है वह है प्रार्थना द्वारा परमात्मा को पाना । जब तक अरिहंत परमात्मा पर पूर्ण श्रद्धा नहीं हो पाती तब तक मनुष्य को सुख का खजाना मिलना असंभव है ।

आत्म: ध्यान साधना शिविर ‘‘बेसिक’’ 4 से 8 अगस्त, 2008 को प्रातः 5.30 से 8.30 बजे तक एवं शाम को 3.00 से 5.00 बजे तक एस0एस0 जैन सभा, मोती बाजार, मालेर कोटला में सम्पन्न होने जा रहा है जिसमें आप सभी सादर आमंत्रित हैं । आचार्यश्रीजी के दर्शनार्थ भारतवर्ष से दर्शनार्थियों का आवागमन निरन्तर जारी है ।

मानव देह परमात्मा का मन्दिर है
जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेर कोटला 27 जुलाई  जैन धर्म दिवाकर  आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने प्रभु भक्ति भजन के द्वारा आज के प्रवचन का आरंभ करते हुए फरमाया कि- शासन प्रभु महावीर की वाणी जीवन को आनंदित करती है । प्रभु महावीर ने फरमाया है- जीवन अशाश्वत् है वह मिटने और परिवर्तन होने वाला है । जीवन में यह महत्वपूर्ण नहीं है कि पुरुष है या स्त्री छोटा है या बड़ा धनी है या निर्धन है तो अस्थिर है । मोक्ष स्थिर है । सिद्धालय चले जाओ तो वापस लोटकर नहीं आत ेवहां का सुख अनंत है । संसार के काम भोग क्षण-भंगुर है । किंपाक फल दिखने में सुन्दर होता है पर भीतर जहर होता है । फल खाने के बाद काँच की चुंड़ियाँ के समान है पहनोगे नहीं तो टूटने को तैयार रहती है । इन चुड़ियों को हम सुन्दर समझते हैं पर वास्तव में ये नजर का धोख है जो कार्य के दौरान टूटनी शुरु हो जाती है ।  

मानव देह को परमात्मा का मन्दिर कहा गया है । मानव शरीर में श्वांस का बहुत महŸवपूर्ण स्थान है । श्वांस का कायोत्सर्ग में प्रयोग किया जाता है जो जैन साधक के जीवन का अभिन्न अंग है । दिन के चैबीस घण्टे में कम से कम दो घण्टे स्वयं के लिए निकालो । धर्म श्रवण वीतराग प्रभु का करो । श्रवण श्रद्धापूर्वक करना परमावश्यक है ।

भगवान महावीर ने उत्तराध्ययन सूत्र में श्रद्धा को परम् दुर्लभ अंग माना है । प्रभु की वाणी गणधर गौतम ने सुनी श्रद्धापूर्वक सुनी थी तो वे केवलज्ञान को उपलब्ध हो गए । वही मंखली पुत्र गौशालक ने संदेह से सुनी और वे मिथ्यात्व में फंस गया । अन्तिम समय तक उसी मिथ्यात्व में फंसा रहा । जीवन की अन्तिम बेला में उसको जब सम्यक्त्व का उदय हुआ तो उसने अपने कर्म की निन्दा, आलोचना करते हुए स्वर्ग को प्राप्त कर लिया । अगर वह उसी समय भगवान की वाणी मान लेता तो निश्चय ही वह मोक्ष प्राप्त करता । इसीलिए मैं कहता हूं कि अश्रद्धा अज्ञान का कारण है । श्रद्धा ही सम्यक्त्व है ।

ध्यान शुद्ध सामायिक का लाभ अनुभव से ही प्राप्त हो सकता है । ध्यान आत्मा का विषय है आत्मा को आज तक कोई देखने सुनने समझने का दावा नहीं कर सका है जिन्होंने आत्मानुभव किया है वे आत्मा के बारे में बताने के विषय में असमर्थ पाते हैं । मोक्ष में परम सुख है । उसे प्राप्त करने का सरलतम साधन ध्यान है । जीव जब कर्मों से पूर्णतः मुक्त हो जाते हैं तभी उसे मोक्ष प्राप्त होगा । परम सुख का अंशतः अनुभव ध्यान माध्यम से होता है ।

रविवार के प्रवचन के पश्चात् स्थानीय शिवाचार्य जन सेवा कल्याण समिति द्वारा जैन स्थानक, मोती बाजार के समक्ष लंगर लगाया गया । इस अवसर पर शिवाचार्यश्रीजी ने कहा कि- अगर भूखे को खाना मिल जाए तो इससे बड़ा उपकार निश्चिततौर पर कोई और नहीं हो सकता । उन्होंने इस लंगर में तन, मन, धन से सेवा करने वालों को साधुवाद दिया । इस मौके पर समिति के प्रमुख कार्यकर्ता तीर्थ जैन, संजय जैन, रितु जैन आदि ने लंगर में अपना सहयोग प्रदान किया ।

भौतिक साधन जीवन को आनंदित नहीं कर सकते
जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेर कोटला 28 जुलाई  जैन धर्म दिवाकर  आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने प्रभु भक्ति भजन के द्वारा आज के प्रवचन का आरंभ करते हुए फरमाया कि- सदगुरु के चरणों में नमन करने से जीवन अहोभागी बनता है । श्रद्धा व समर्पण से साधक का अहंकार विलीन हो जाता है । खाते-पीते उठते-बैठते भक्त अरिहंत परमात्मा के ध्यान में तल्लीन रहता है । भौतिक सुख की आकांक्षा उसकी समाप्त हो जाती  है । मन की इच्छा पर भी वह नियंत्रण रखता है । मानव जब तृप्त होता है फिर उसकी आत्मा का दीया जलता है । मानव तृप्ति की ओर जब उन्मुख होता है तब धर्म की ओर अग्रसर होता है । प्रार्थना में साधक का जीवन फूल की भांति तृप्ति को प्राप्त करता है । फूल में तृप्तता का गुण है पर बनावटी फूलों में ये तृप्तता नहीं पाई जाती । प्रकृति को मानव दुःख देता है व प्रकृति मानव को आनंदित करती है ।

भौतिक साधन मनुष्य को कभी आनंदित नहीं कर सकते । मनुष्य संसार के पीछे वास्तव में आनंद को ढूंढता है । जितना-जितना वह भौतिक साधनों में फंसता है उतना-2 वह दुःख उठाता है । स्वयं श्रमण भगवान महावीर ने फरमाया है कि- आत्मा ही परमात्मा   है, इसलिए मैं कहता हूँ कि आप आत्मा के महŸव को पहचानों । आत्मा का महŸव प्रार्थना के माध्यम से सरलता से पहचाना जा सकता है क्योंकि प्रार्थना में समाधि घटित होती है इसलिए आप आत्मा के महŸव को पहचानो । रुपक की परिभाषा में कहूँ तो हर आत्मा की चार पत्नियाँ है । सबसे छोटी पत्नी है मनुष्य का शरीर जो अन्तिम समय मनुष्य का साथ छोड़ देता है । तीसरी पत्नी है मनुष्य की धन सम्पत्ति है जो जीवन में साथ देती है मृत्यु के बाद नहीं । दूसरी पत्नी है मित्र, रिश्तेदार व परिजन है जिनका साथ श्मशान घाट तक का है वो भी साथ छोड़ देती है और पहली पत्नी मनुष्य की आत्मा है जो उसका साथ किसी जन्म में भी नहीं छोड़ती सौ मनुष्य इसी आत्मा के स्वरुप को भगवान महावीर ने उŸाराध्ययन-सूत्र में आत्मा के महŸव को स्वीकारते हुए यहाँ तक फरमाया है कि आत्मा ही कर्म का कर्Ÿाा और भोक्ता है ।

आत्मा ही स्वर्ग की कामधेनू गाय और नन्दनवन है । अपनी आत्मा ही बेतरणी नदी और कूटशामली वृक्ष है । आत्मा ही कर्म करता है और आत्मा ही कर्म का भोक्ता है । सो हमें अपनी आत्मा की पत्नी का पूर्ण ध्यान रखते हुए उसे धर्म-ध्यान व शुक्ल-ध्यान की ओर लगाना चाहिए ताकि जन्म-मरण की परम्परा समाप्त हो और जीवात्मा का परम् लक्ष्य निर्वाण की उपलब्धि हो ।

नमन जोड़ता है अहंकार तोड़ता है
जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेर कोटला 31 जुलाई जैन धर्म दिवाकर, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर,  आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- भक्ति के तीन अंग है प्यास, प्रार्थना और प्रतीक्षा । प्रथम अंग प्यास है । भीतर प्यास होगी तभी इच्छित वस्तु की प्राप्ति होगी । प्यास से ही पानी मिलता है । पानी की प्यास ना हो और पानी सामने आ जाए तो उसका मूल्य नहीं होता । इसी तरह एक भक्ति की प्यास होगी तो परमात्मा भीतर आएगा । अरिहंत परमात्मा जो सर्वेसर्वा है जो धर्म का ज्ञान देते हैं हमारी भक्ति उनके चरणों में हो । सम्यक्त्व का पाठ कहता है अरिहंत मेरे देव हैं सुसाधु मेरे गुरु है जिनप्ररुपित धर्म मेरा धर्म है और ऐसी सम्यक्त्व को मैं स्वीकार करता हूँ । सम्यक्त्व यानि सत्य का दर्शन । जो हमें अपने सत्य का ज्ञान कराये वह सम्यक् दर्शन है ।

अरिहंत परमात्मा हमारे देव हैं । एक अतिथि को आप जितना सम्मान देते हो उससे अधिक सम्मान अपने देव के प्रति हो । घर पर एक अतिथि आए तो आप उस अतिथि को मीठे वचन और बढ़िया भोजन और आतिथ्य सत्कार से अपना बना लेते हो परन्तु अगर मीठे वचन ना हो तो बढ़िया भोजन और आतिथ्य सत्कार काम नहीं आता । एक ही कार्य है जिसे तीन तरह से किया जा सकता है पुण्य, पाप और निर्जरा से ।

नमोत्थुणं पर हम चिन्तन कर रहे हैं । नमोत्थुणं में नमन, प्रार्थना है । गुरु को वंदन तिक्खुतो के पाठ से किया जाता है परन्तु अरिहंतों को वंदन नमोत्थुणं से किया जाता  है । नमोत्थुणं एक चित्त की दशा है, हृदय का भाव है । अगर भाव शुद्ध होगा तो भावनाएं स्वतः ही शुद्धता की ओर आ जाएगी ।

परमात्मा के अधीन होना, समर्पण में आना, नमन के भावों में आना ही सच्ची प्रार्थना   है । अगर भीतर समर्पण आएगा तो मंजिल स्वतः प्राप्त हो जाएगी । अहंकार से भरी प्रार्थना हमें मंजिल प्राप्त नहीं करवा सकती । नमन जोड़ता है, अहंकार तोड़ता है । नमोत्थुणं में नमन है अरिहंतों को जिन्होंने चार कर्म क्षय किए । जिन्हें तीनों लोकों का ज्ञान है । जो एश्वर्य से पूर्ण है । जिन्होंने धर्म की आदि की है । इस चैबीसी की शुरुवात में प्रथम तीर्थंकर श्री ऋषभदेव भगवान ने गृहस्थ जीवन में रहते हुए जन-मानस को धर्म और नीति का ज्ञान दिया और धर्म की स्थापना की । हम उस धर्म से जुड़े । माता पिता गुरु और धर्म का हम पर अनंत उपकार है, उस उपकार को भक्ति, आनंद और भीतर की कृतज्ञता से उतारें ।

हमारी प्रार्थना
जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेर कोटला 1 अगस्त जैन धर्म दिवाकर, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर,  आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- नमन में श्रद्धा भक्ति प्रार्थना और झुकना है । एक झुकना भीतर से और एक बाहर से । महाराजा श्रेणिक का कथानक प्रसिद्ध है उन्होंने प्रभु महावीर के समवसरण में भगवान के साथ समस्त मुनियों को वंदन की इच्छा व्यक्त की और वंदन करते हुए, भीतर से झुकते हुए नरक के बंधन काट दिए । वंदन से नीच गौत्र कर्मक्षय होता है और उच्च गोत्र का बंधन होता है । जब कार्य निष्काम होता है तब परिणाम उत्तम होता है ।

प्रार्थना भक्ति नमन में कोई कामना ना हो । प्रभु चरणों में जाकर भी कोई मांग व्यक्त की तो फिर जाना व्यर्थ है । मांग रखनी ही है तो एक मांग रखो प्रभो ! मुझे अपने जैसा बना लो । मेरा व्यक्तित्व अपना ना रहकर आप में मिल जाएं । भगवान केवलज्ञानी हैं वे तीनों लोकों को साक्षात् देखते हैं हमारी भावनाएं अवश्य स्वीकार कर लेंगे ।

‘‘नमोत्थुणं’’ के पाठ में हमने अरिहंतों को वंदन किया । तीर्थंकर वो जिन्होंने तीर्थ की स्थापना की । तीर्थ चार प्रकार का है साधु, साध्वी, श्रावक और श्राविका । तीर्थ वही है जो हमें तिरायें, भव पार लगाएं । तीर्थ वंदन के योग्य हैं । श्रावक भी वंदनीय है और साधु भी वंदनीय है । श्रावक कौन ? जो वीतरागवाणी सुनकर अपना जीवन बदल दे वह श्रावक है । प्रभु महावीर के समय हजारों श्रावकों में आनंद आदि दस श्रावकों का वर्णन उपासक दशांग सूत्र में आता है जिन्होंने अपने जीवन को संयमित कर धर्म को धारण किया । धर्म कोई दिया नहीं जाता वह तो भीतर से आता है । जगाना उसे पड़ता है जो अभी तक जागा नहीं है । सोए को जगाया जाता है परन्तु जो जागा हुआ है उसे कैसे जगाएंगे । जागो धर्म की ओर आगे बढ़ो । श्रीकृष्ण ने भी गीता ने कहा है- पार्थ ! उठो जागो । कर्Ÿाव्य के लिए हमेशा तैयार रहो । भगवान के समवसरण में राजा महाराजा जब वंदन करने जाते थे तब अपने आभूषण राजशी ठाट-बाट अलग रख मन, वचन, काया से सर्वस्व समर्पण करते   थे ।

हम सब धर्म पर जागे । प्रभु की तीर्थ में हम तिरें । यह तीर्थ वंदनीय है । यहां किसी की निन्दा ना हो । निन्दा अनंत कर्मों का बंधन है । समस्त तीर्थंकर स्वयंबुद्ध होते हैं । गर्भ में ही उन्हें तीन ज्ञान प्राप्त होते हैं । दीक्षा के बाद चैथा ज्ञान होता है और जब पूर्ण ज्ञान केवलज्ञान भीतर प्रकट होता है तब वे अपने धर्मोपदेश से जनजीवन को धर्म-मार्ग पर अग्रसर करते हैं । वर्धमान को महावीर बनने में 27 जन्म लगे और दीक्षा के बाद भी साढ़े बारह वर्ष तक तपस्या करनी पड़ी । हम ऐसे प्रभु का गुणगान करें, उनकी भक्ति करें । श्रद्धा से नमन करें ।    

आनंद प्रदाता थे आचार्य श्री आनंद ऋषि जी महाराज
109 वा जन्म-दिवस धूमधाम के साथ मनाया गया
जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेर कोटला 2 अगस्त  जैन धर्म दिवाकर, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर,  आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- श्रमण संघीय द्वितीय पट्टधर राष्ट्र संत आचार्य सम्राट् पूज्य श्री आनंद ऋषि जी महाराज का 109 वाँ जन्म दिवस हम सभी श्रद्धा भक्ति और उल्लास के साथ मना रहे हैं । आचार्य शब्द बहुत गहरा शब्द है । इसे जानना और इसमें जीना बहुत आवश्यक है । जानते कई हैं पर जीता कोई-कोई है । जिस प्रकार भोजन बनाना और खाना महŸवपूर्ण है उतना ही महत्वपूर्ण है भोजन का पचना । पढ़ना लिखना जरुरी है पर उससे जरुरी है उस पढ़ाई का जीवन में आचरण करना ।

मुक्ति के लिए ज्ञान जरुरी है पर वह ज्ञान विनय, कृतज्ञता, सम्पन्नता से परिपूर्ण हो, वह ज्ञान भीतर हो, वह ज्ञान आत्म-ज्ञान हो । आचार्य श्री आनंद ऋषि जी महाराज नया ज्ञान पढ़ने, सीखने के लिए हमेशा तैयार रहते थे उसी का परिणाम है कि उन्होंने अपने जीवन में चैदह भाषाओं पर अधिकार प्राप्त किया । उनका निर्मल जीवन उज्ज्वल मुखमण्डल सूर्य की भांति चमकता रहता था । 75 वर्ष तक निरन्तर धर्म की गंगा प्रवाहित की । तेरह वर्ष की उम्र में आपने जिनदीक्षा अंगीकार की । आप एक महान् सफल प्रवचनकार थे । ज्ञान, तप और स्वाध्याय की त्रिवेणी आपके जीवन में प्रवाहित होती थी । आप मृदुभाषी थे परन्तु सार की बात कहते थे ।

एक बार अहमदनगर में छोटे बच्चे दर्शनार्थ उपस्थित हुए । बहुत भारी भीड़  आचार्यश्रीजी के दर्शनों के लिए आई हुई थी उस समय में आपने बच्चों को महŸव दिया, उनको पास बुलाया और उनसे पढ़ाई के बारे में पूछा । आप थोड़े ही शब्दों में जन-मानस को संतुष्ट कर देते थे । आपने अपने जीवन में धर्म को महŸव दिया । धर्म वो जो भीतर से प्रकट हो । आप सम्प्रदाय में रहते हुए भी धर्म को प्रमुखता देते थे । सम्प्रदाय सुरक्षा का कवच है और धर्म हमारा अंग है । प्रभु महावीर सबके हैं यही उपदेश आपका रहता था । आपने अपने जीवन में श्रमण-संघ को जो ऊँचाईयाँ प्रदान की वो युगों-युगों तक याद   रहेगी । आपने शिक्षा के क्षेत्र में भी बहुत कार्य किया । स्थान-2 पर पुस्तकालय एवं परीक्षा बोर्ड की स्थापना की । आप आयम्बिल तप में विशेष श्रद्धा रखते थे जीवन में पाँच तिथियों को हमेशा आयम्बिल करते रहें । आपकी महानता को पूरे महाराष्ट्र और भारत ने ही नहीं विश्व ने स्वीकारा और आपकी स्मृति में भारत सरकार ने एक डाक टिकिट जारी किया । अनेकों राजनेता आपसे परामर्श लेते रहे । आज आपके पावन जन्म दिवस पर हम आयम्बिल दिवस पर श्रद्धा सुमन अर्पित कर रहे हैं । ऐसे आचार्यदेव का पावन आशीर्वाद हमें प्राप्त होता रहे और हम धर्म मार्ग में निरन्तर उन्नति करते रहें ।

इस अवसर पर श्रमण संघीय मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म0, युवा मनीषी श्री शुभम् मुनि जी म0, श्री अशोक ओसवाल, श्री अश्विनी जैन, महामंत्री श्री सुदर्शन जैन ने आचार्यश्रीजी को श्रद्धा सुमन अर्पित किए । युवाओं के द्वारा अनेकों सामायिकों का अनुष्ठान हुआ एवं बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने आयम्बिल तप कर श्रद्धा सुमन अर्पित किए ।

हम सब कर्म-बंधन तोड़ने का पराक्रम करें
जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेर कोटला 3 अगस्त जैन धर्म दिवाकर, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर,  आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- अरिहंतों में अनंत गुण हैं उन गुणों की व्याख्या हम नमोत्थुणं के माध्यम से कर रहे    हैं । अरिहंत परमात्मा को पुरुषों में सिंह के समान की उपमा से उपमित किया गया है ।  प्रभो ! आप सिंह के समान पराक्रमी हो परन्तु सिंह की उपमा आपसे कैसे करुं । सिंह तो हिंसक प्राणी है उसकी गर्जना से समस्त प्राणी भयभीत होते हैं । जहाँ आप विचरते हैं वहाँ सर्वत्र अभय होता है । सिंह तो भोजन के लिए पराक्रम करता है । आपने जन्म-2 के कर्म बंधन को तोड़ने का पराक्रम किया । आपने अपनी शुद्ध चेतना को प्राप्त किया है । आपका पराक्रम ही सच्चा पराक्रम है ।

एक भक्त भगवान के दर पर प्रार्थना करता है प्रभो ! मेरे हृदय में आपका प्यार सम्मिलित हो  जाए । कण-कण में आपका प्यार व्याप्त हो जाए । प्रभु से किया गया प्यार हमें वीतरागता की ओर ले जाता है । प्रभु प्यार में धन, पद, यश प्राप्ति की आकांक्षा छूट जाती है । प्रेम ही करना है तो परमात्मा से करो । शेष सभी प्रेम झूठे हैं । शरीर नश्वर है, माटी का है । पांच तत्वों से बना है और उसमें ही विलीन होना है । संसार से किया गया प्रेम संसार की ओर ले जाएगा और प्रभु से किया गया प्रेम प्रभु की ओर ले जाएगा । प्रभु महावीर ने सिद्धों को नमस्कार कर उनसे अपने तार जोड़े तो स्वयं सिद्ध बन गए ।

जिस प्रकार लोहा और अग्नि, दूध और पानी अलग-2 होते हुए भी एक प्रतिभाषित होते हैं उसी प्रकार आत्मा और शरीर अलग-2 होता हुआ भी एक लगता है । वास्तव में आत्मा और शरीर भिन्न नहीं है । जिस प्रकार हवा और शब्द दिखाई नहीं देते उसी प्रकार आत्मा भी देखने का विषय नहीं है वह तो अनुभूति का विषय है । आत्मा पर मोहनीय कर्म का आवरण है । मन, बुद्धि, धारणा, संस्कार के अलग-2 विषय है । आत्म-दृष्टि से समस्त आवरण छिन्न-भिन्न होती हैं । जब आत्म-दृष्टि भीतर आती है तब स्ज्ञमृद्धि, आनंद, शांति, ज्ञान भीतर आता है । हमारी दो आँखें प्रतिपल परमात्मा को देखती रहे, एक आंख में परमात्मदृष्टि हो और एक आँख में श्रद्धा हो ।

    
इस अवसर पर महान् कवि श्री चंदन मुनि जी महाराज का प्रथम पुण्य स्मृति दिवस गुणानुवाद से सम्पन्न हुआ । श्रमण संघीय मंत्री श्री शिरीष मुनि जी महाराज एवं आचार्यश्रीजी ने आपके गुणों की व्याख्या करते हुए आपको श्रमण संघ की महान् विभूति बतलाया ।

आचार्य श्री आनंद ऋषि जी महाराज की 109 वीं जन्म जयंती एवं कवि सम्राट् श्री चंदन मुनि जी म0 ‘‘पंजाबी’’ के प्रथम पुण्य स्मृति दिवस पर लाला श्री श्रीराम जैन के सुपुत्र श्री सोहनलाल जैन द्वारा खीर का लंगर लगाया गया । श्री संजय जैन, श्री तीर्थ जैन की सेवाएं सराहनीय रही ।

परमात्मा की नौकरी सबसे बड़ी है
जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेर कोटला 4 अगस्त जैन धर्म दिवाकर, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर,  आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- अरिहंत परमात्मा की स्तुति, उनकी भक्ति भवसागर से पार लगाने वाली है । नमोत्थुणं में प्रभु को पुण्डरीक कमल की उपमा दी गई है । कमल खिलता और और मुरझा जाता है पर आप कभी मुरझाते नही । कमल की सुगंध कुछ देर के लिए होती है पर आपकी धर्म सुवास हर पल, हर क्षण सुगंधित करती है । प्रभु सर्वोच्च सत्ता है । उनके चरणों में स्वयं को समर्पित करना । उनके चरणों में हाजरी लगाना । वो हम सबके मालिक हैं ।

एक सेठ के यहां नौकरी करते हैं तो मालिक के अनुसार रहना पड़ता है । चंद रुपयों के लिए उसका हर प्रकार से कहना मानना पड़ता है परन्तु परमात्मा के यहाँ की गई नौकरी बहुत बड़ा फल प्रदान करती है । वह फल अदृश्य होता है । लाखों करोड़ों लोग आज भी अपने मालिक की गुलामी करते हैं, वे अपनी इच्छा से कुछ नहीं कर पाते परन्तु परमात्मा का भक्त हर इच्छा से अपना कार्य करता है । जैसा भाव होगा वैसी ही दशा होगी । भाव और दशा से जीवन रुपान्तरण होता है । प्रभु महावीर का मार्ग समर्पण और साहस का मार्ग है । यहाँ पर श्वासों का मूल्य है ये श्वासें बहुत मूल्यवान है । जब श्वांस रुकेगी तब आप श्वांस का मूल्य जान पाओगे । अपनी सारी जिन्दगी धन, पद, प्रतिष्ठा देकर भी एक श्वांस खरीदी नहीं जा सकती इसीलिए प्रभु महावीर ने जन-मानस को प्रेरणा देते हुए हर श्वांस का उपयोग करने के लिए कहा ।

जो धर्म करना है उसे आज और अभी करो पता नहीं कल श्वांस आए या न आए । जीवन का सार सेवा, साधना और भक्ति में है इनमें जो श्वासें बीतेगे वे हमेशा सफल होगी । जब आप प्रभु के हो जाते हो तो प्रभु भी आपके हो जाते हैं, इस प्रकार प्रभु का राज्य आपका राज्य बन जाता है और आप मालिक बन जाते हो । नौकरी ही करनी है तो वो परमात्मा की करो जो कुछ फल प्रदान तो करेगी । प्रभु के गुलाम बनना एक सार्थक अवस्था है । एक बार प्रभु की नौकरी कर गुलाम बन जाइऐ शेष कार्य स्वयं परमात्मा ही कर देगा । परमात्मा की नौकरी सबसे बड़ी सबसे ऊँची है । हम उनकी नौकरी में स्वयं को तन, मन, धन से समर्पित कर दें ।
आत्म ध्यान साधना कोर्स प्रारंभ

आत्म ध्यान प्रणेता आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज के सान्निध्य में आज आत्म ध्यान साधना शिविर का प्रातःकाल की मंगलबेला में आगाज हुआ । 75 साधकों ने आत्म ध्यान की कला सीखते हुए आचार्यश्रीजी से ध्यान और साधना का मार्गदर्शन प्राप्त किया । साधना शिविर करने वालों ने स्थूल से सूक्ष्म की यात्रा प्रारंभ करते हुए प्राणायाम एवं आसनों का भी प्रशिक्षण प्राप्त किया । श्रमण संघीय मंत्री श्री शिरीष मुनि जी महाराज एवं युवा मनीषी श्री शुभम् मुनि जी महाराज ने साधना शिविर में साधकों को प्रार्थना, ध्यान साधना का प्रशिक्षण प्रदान किया ।  

का सदुपयोग ही मानव जीवन की श्रेष्ठता है
जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेर कोटला 5 अगस्त  जैन धर्म दिवाकर, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर,  आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- भुलाकर के चंदन जगत के झमेले, सदा स्वरुप अपना विचारा करो तुम... ये पंक्तियाँ कुछ संदेश प्रदान करती है । यह संसार एक झमेला है । पानी का बुलबुला है । एक रेत की दीवार है जो कभी शाश्वत् नहीं रह सकती । रेत की दीवार पर कभी महल टिक नहीं   सकता । संसार एक पुल, एक सागर है जहाँ पर प्राणी रह नहीं सकता । जन्म-मरण प्राणी अनंतकाल से कर रहा है । यदि आप संसार को अपना मानो तो हाथ कुछ नहीं आएगा । प्रत्येक व्यक्ति शरीर को महŸव देता है । स्त्री अपने सौंदर्य का और पुरुष अपनी वीरता का अभिमान करते हैं परन्तु ये सौंदर्य और वीरता केवल इस शरीर तक है और ये शरीर एक दिन श्मशान की राख बनेगा ।

मानव जीवन को श्रेष्ठ इसीलिए कहा गया है क्योंकि उसके पास श्वांस है । श्वांस का वो सदुपयोग कर सकता है । अरिहंत परमात्मा श्री सीमंधर स्वमी भगवान की शरण में जो भी कोई आता है वे उसे अपने जैसा बना लेते हैं । नमोत्थुणं में स्तुति करते हुए मैं गंध हस्ती की उपमा प्रदान की गई परन्तु हाथी जब चलता है तो अनेकों छोटे जीव काल के ग्रास बन जाते हैं । हाथी हर समय मदमस्त होता है । हाथी जब चिंघाड़ता है तो छोटे-छोटे प्राणी उस चिंघाड़ से घबराते हैं । प्रभु मेरी श्रद्धा कहती है कि जब आप चलते हो तब आप सबको अभयदान प्रदान करते हो । आपकी मंगल देशना से हर भवि जीव मुक्ति की यात्रा प्रारंभ करता है और उस यात्रा का अंत आपके ही श्रीचरणों में करता है । मैं गंध हस्ती के समान आपकी तुलना कैसे करूँ । जब आप चलते हो तब देवगण आपकी राह में स्वर्ण कमलों की रचना करते हैं । धन्य है आपका जीवन आप तीनों लोकों में उŸाम हो । आपने स्वयं को जीतकर तीनों लोकों का स्वामीत्व प्राप्त किया । धन्य है आपके मुक्ति पर बढ़ते कदमों को ।

हमारी आत्मा जीवन का सार है जिसे हम अत्यधिक ध्यान नहीं देते वह कहीं जाने वाली नहीं है वह अगोचर है इसके ऊपर जो कर्म-मल लगा है उसे मिटाने का पुरुषार्थ करें । हर श्वांस में मैं और मेरा परमात्मा का ध्यान रहे । परमात्मा के पास जाने का आधार नाम स्मरण है । अपने स्वरुप का चिन्तन मैं कौन हूँ कहाँ से आया हूँ ओर हर श्वांस में सिद्धों को नमन यही जीवन का सार है । ये श्वासें हमें भी मिली और प्रभु महावीर, गणधर गौतम, गौशाल, चंदनबाला आदि को भी मिली, उन्होंने अपने जीवन का श्वासों का सदुपयोग किया । हम भी अपने जीवन में श्वासों का सदुपयोग करें । हर श्वांस का मूल्य हीरे जवाहरात से बढ़कर है । हम हर श्वांस का उपयोग करते हैं तो उस श्वांस में असंख्यात कर्मों की निर्जरा होती है ।

सबसे बड़ी उलझन मैं ठीक हूँ
जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेर कोटला 6 अगस्त जैन धर्म दिवाकर, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर,  आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- संत का संतत्व समता में समाहित होता है । निग्रन्थ ऋजुदर्शी हो यह प्रभु महावीर की वाणी है । निग्रन्थ यानि जहां कोई गांठ नहीं । रस्सी पर गांठ लग जाए तो रस्सी उलझ जाती है यह एक सामान्य बात है । ऐसे ही अगर हमारे हृदय में एक गांठ क्रोध, मोह, लोभ, वासना, अहंकार की हो तो वह हमारे भव परिवर्तन बढ़ा देती है । मैं ठीक हूँ यह सबसे बड़ी उलझन है, हम अपने आपको सर्वश्रेष्ठ जानते हैं और दूसरों को नीचा परन्तु संत सबको स्वीकार करता है । जब हम किसी को बाँधते हैं तो कितने कर्मों का बंधन होता है ?

संत के विचार, उसका आचरण बहुत ऊँचा है । प्रभु ने किसको बांधा नहीं, न किसी से राग किया, न किसी से द्वेष । भीतर की गांठ खोलो । अगर आपका किसी से मनमुटाव हो जाए तो प्रथम उससे क्षमा-याचना करो फिर भोजन ग्रहण करो । एक ज्वलन्त उदाहरण भगवान पाश्र्वनाथ और कमठ का हमारे समक्ष है । प्रभु हर समय क्षमा करते गए और कमठ हर समय अहंकार करता गया फलस्वरुप वह नीचे गिरता चला गया और प्रभु ऊपर उठते चले गए । साधु को ऋजु और सरल होना चाहिए । सरलता में मुक्ति है । क्रोध दूसरों को जलाता है और अपने को भी जलाता है । ईष्र्या तो केवल स्वयं को जलाती है ।

संत का पहला गुण है ऋजुता । पता नहीं श्वासें कब थम जाएं । अच्छा है समय मात्र का प्रमाद किए बिना धर्म में मन को लगाएं । आज हम संकीर्णताओं में जी रहे हैं । संकीर्णताओं से ऊपर उठकर भगवान की भक्ति करो । अरिहंत, सिद्ध, गुरु, माता, पिता सब वंदनीय है । वंदन से वीतरागता, पवित्रता, शुद्धता आती है । जैसी श्रद्धा भीतर होगी वैसा ही भाव आएगा । अपनी दो आंखों में से एक आंख में श्रद्धा और दूसरी आंख में समर्पण भर   लो । श्रद्धा और समर्पण से मुक्ति करीब होती है । भक्ति की आंखों से भगवान को देखो । भक्ति एक चरम सीमा है मुक्ति की । हम भगवान जैसे हो जाएं यही हमारी भक्ति है ।

अस्तित्व से जुड़ो यही प्रार्थना है
जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेर कोटला 7 अगस्त न धर्म दिवाकर, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर,  आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- एक प्यास परमात्मा के प्रति इस जीवन में एक अटल श्रद्धा उस परम सŸाा के प्रति   प्रभो ! मैं दीया हूँ तुम सूरज हो, मैं बूंद हूं तुम सागर हो । मैं फूल हूँ आप वृक्ष हो । हमेशा स्वयं को छोटा जानना । जितना झुकोगे उतना समर्पण भीतर आ जाएगा । फूल ने स्वयं को समर्पित कर दिया परमात्मा के चरणों में । स्वयं को फूल बनाओ । हृदय में प्रेम की सुगंध भरो । तप की ज्योति से जीवन को आलोकित करो ।

अस्तित्व से जुड़ो यही प्रार्थना है । परमात्मा के पास समर्पण से जाओ । भक्ति-भाव और हृदय से उनके प्रति समर्पित हो जाओ । रामायण में हनुमान की भक्ति की प्रशंसा की गई है । हनुमान के लिए राम सर्वोपरि थे । वो स्वयं को सेवक और राम को स्वामी मानते  थे । हनुमान का जन्म जंगल में हुआ । उन्हें पिता का प्यार नहीं मिला । उनके जन्म के समय मां को अनेकों विपदाएं सहनी पड़ी । कहते हैं बचपन में हनुमान ऊपर से गिरा तो शिला चूर-चूर हो गई पर उन्हें कुछ नहीं हुआ । ऐसा था उनका बल । पूरी रामायण में हनुमान की भक्ति का एक सुन्दर वर्णन किया गया है । आज हनुमान के मन्दिर अधिक है राम के मन्दिर से । हनुमान की पूजा भी राम से अधिक होती है । हनुमान को भक्ति का पद मिला । एक बार राम दरबार में सबकी कार्य हेतु ड्यूटी लगी । सबने अपने-अपने कार्य बांट लिए पर हनुमान को कोई कार्य नहीं मिला । उस समय हनुमान ने अपने बुद्धिबल से राम को उबासी आने पर चुटकी बजाने का कार्य लिया । कितना समर्पण था राम के प्रति । हर पल सेवा की भावना थी तभी ऐसा कार्य स्वीकार किया ।

जिसे याद करो उसके साथ हृदय से जुड़ जाओ । हर समय प्रभु की याद भीतर आए प्रभु को कोई उपमा स्पर्शित नहीं कर सकती वे स्पर्शातीत है । एक बीज कालान्तर में वृक्ष का रुप धारण कर लेता है । प्रभु आकाश के समान ऐसे ही विशाल हैं वे लोक में उŸाम हैं । पुरुषों में उŸाम हैं ऐसे महापुरुषों की हम भक्ति करें । प्रभु मेरी यही भक्ति है कि मैं हर श्वांस में आपके गुणों का स्मरण करूं । आप अनंत गुणों के धर्ता हैं । मैं आपसा बनने का पुरुषार्थ करुं, यही मेरी भावना है ।

मनुष्य स्वयं का नाथ है
जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेर कोटला 8 अगस्त  जैन धर्म दिवाकर, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर,  आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- राजी है हम उसी में जिसमें तेरी रजा है . . .ये पंक्तियाँ परमात्मा के प्रति समर्पण का भाव दिखलाती है । अगर मानव के भीतर एक समर्पण परमात्मा की आज्ञा और उसके हुक्म की पालना आ जाए तो उसके भीतर के दुःख भी सुख में परिवर्तित हो जाते हैं । कर्म छंटते चले जाते हैं । जन्म और मौत के बीच जीवन की रेखा है । चक्रवर्ती, तीर्थंकर, इन्द्र भी उस जीवन को बढ़ा नहीं सकते यानि अपनी आयु बढ़ा नहीं सकते तो हम कैसे बढ़ा सकते हैं ? किसी की मौत पर दो आंसू बहाने की बजाय हम कुछ नहीं कर सकते । अच्छा है मौत आने से पहली ही हम जाग जाएं । एक अतिथि के आने की तैयारी करते हैं उस मौत की आने की तैयारी भी कर लो । श्वांस का पता नहीं उसकी कीमत का भी पता नहीं । हमारे हाथ में कुछ भी नहीं है पत्नी भोजन लेकर आती है और पति चल बसता है । प्रवचन सुनते-2 भी राम नाम सत हो जाता है । पिछले दिनों ही नयनादेवी दर्शनार्थ गए कई लोग काल के ग्रास बन गए । पता नहीं मौत कब आकर घेर ले । मनुष्य चैराहे पर खड़ा है, श्वांस आ रही है और जा रही है इसका उपयोग सोऽम् में लगा दो । जीवन आधे से ज्यादा बीत गया । किसी शायर ने कहा है-

उम्रे दराज मांगकर लाए थे चार दिन ।
दो आरजू में कट गए दो इंतजार में ।।

दो दिन इंतजार में कट जाते हैं और दो आरजू में कट जाते हैं । धर्म, सत्संग, सेवा नहीं की तो कुछ काम नहीं आएगा । कहा भी है- आग लगा दो उस कुएं को जो ठण्डक नहीं देता, राख कर दो उस पैसे को जो राहत नहीं देता । वो पैसा पैसा ही क्या जो शांति, आनंद और सुख नहीं देगा, उसे कमाने से लाग क्या है ? भगवान की वाणी हमें जगा रही है, हम उस वाणी के प्रति कृतज्ञ बनें । भीतर के अहंकार को छोड़ दे । जीवन में समर्पण का भाव आएगा तो समता बढ़ती चली जाएगी । भगवान से मांगना हो तो समभाव मांगना । यह जीवन चला जा रहा है ।

अरिहंत परमात्मा लोक के नाथ हैं । अनाथी मुनि और राजा श्रेणिक का वर्णन श्री उत्तराध्ययन सूत्र में आता है । राजा श्रेणिक मुनि को देखकर कहता है कि हे मुनि इतनी सुन्दर काया तुम्हारी । मैं तुम्हारा नाथ बनता हूं चलों संसार के भोग करो तब अनाथी मुनि ने कहा राजन् ! तुम क्या मेरे नाथ बनोगे तुम स्वयं अनाथ हो । नाथ वह नहीं जिसके पास हाथी घोड़े राजबल हो । नाथ वह है जिसके आन्तरिक शत्रु नहीं है । जिसके कषाय टूट गए हैं ऐसे अरिहंत भगवान के गुणों को भीतर बसाएं । अरिहंत भक्ति भीतर आ गई तो मोक्ष दूर नहीं ।

आत्म: ध्यान साधना कोर्स बेसिक का आज समापन हुआ जिसमें सुबह के शिविर में 60 एवं शाम के शिविर में 30 साधकों ने जीवन जीने की कला सीखी । दो दिवसीय साधना शिविर में जयपुर, सिरसा, हनुमानगढ़, पटियाला, नालागढ़, जोधपुर आदि अनेक शहरों से भाई बहिन लाभ ले रहे हैं । कल से आत्म: समाधि कोर्स प्रारंभ होगा । जो भी समाधि शान्ति अपनाना चाहते हैं वे अवश्य भाग लेवें ।
 
हीरे जवाहरात से बढ़कर है मानव जीवन
जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेरकोटला 9 अगस्त  जैन धर्म दिवाकर, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर,  आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- ये मानव जीवन चंद श्वासें हृदय की धड़कन रक्त का प्रवाह जब मौत आएगी सब थम जाएगा । यदि जीवन में कुछ मूल्यवान है तो वो है हमारी श्वासें । श्वांस आती है और जाती है । दिन में कितनी ही श्वासें हम ले लेते हैं पर हमें उनका ज्ञान नहीं होता । जब प्राण कंठ में आते हैं तब श्वांस का मूल्य हमें पता चलता है । अध्यात्म-दृष्टि से हर श्वांस हीरे जवाहरात से बढ़कर है । हीरे जवाहरात का मूल्य तो तुम चुका दोगे पर श्वासों का मूल्य चुका नहीं  पाओगे । हीरे जवाहरात तो पत्थर के तुकड़े हैं जिन्हें यही छोड़कर जाना है परन्तु हर श्वांस जो धर्म में बीतेगे वो साथ जाएगी । सब यहीं रह जाएगा इसीलिए हर बार कहा जाता है हर श्वांस में स्मरण हो, समाधि, ध्यान, जागरुकता हो ।
 
जीवन की घड़ियों को वृथा मत खोना इनके भीतर परमात्म स्मरण कर लेना । ऊँकार का उच्चारण पंचपरमेष्ठी का वाचक है । सभी धर्मों ने ऊँकार को स्वीकारा है । सभी मंत्रों के आगे ऊँ शब्द का प्रयोग किया जाता है । आचारांग सूत्र में ऊँ शब्द को पंचपरमेष्ठी का वाचक बतलाया है । मन अशांत हो भीतर बेचैनी हो तो प्रातःकाल की मंगलबेला, शान्त वातावरण में 11, 21 या 51 बार ऊँकार का उच्चारण श्वांस के साथ मन को शान्त किया जा सकता है । ऊँ में पूर्ण प्राणायाम हो जाता है ।

नमोत्थुणं में अरिहंत परमात्मा को लोक में उŸाम कहा गया है । उत्तम उत्तम ही होता है उसके गुणों का आरपार नहीं होता । अधोलोक, ऊध्र्वलोक और मध्य लोक तीनों लोकों में जो उŸाम हैं ऐसे अरिहंत भगवान हैं वे लोक के नाथ हैं वे सभी प्राणियों का हित चाहने वाले लोक के हितकारी हैं । लोक में दीपक के समान है । दीया तो हवा से बुझ जाता है । दीये में तेल और बाती की आवश्यकता होती है परन्तु आपके भीतर जो ज्ञान का दीया है उसे किसी की आवश्यकता नहीं । आप लोक में ज्ञान का प्रकाश देने वाले हो । आप सब जानते और देखते हुए भी कुछ प्रतिक्रिया नहीं करते । आप समस्त जीवों को अभयदान देने वाले   हो । दानों में श्रेष्ठ है अभयदान । आप भीतर की आँख प्रदान करने वाले हो । आप धर्म का मार्ग देने वाले हो । आप धर्म की शरण देने वाले हो । जो भी आपकी शरण में आता है उसे आप पार करते हो । चाहे फिर वो लुटेरा, डाकू या हत्यारा ही क्यों न हो ? मेरी श्रद्धा आपको इन सबसे ऊपर जानती है । धन्य है प्रभो ! आप सबको तार रहे हो । इस प्रकार अरिहंत भक्ति कर जीवन को सुगंधित कर लो । ये श्वासें अनमोल है, इन्हें भक्ति में लगायें ।

आत्म- ध्यान साधना बेसिक कोर्स में 110 साधकों ने भाग लिया

मालेरकोटला 9 अगस्त  श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज के आशीर्वाद एवं श्रमण संघीय मंत्री श्री शिरीष मुनि जी महाराज के सान्निध्य में वीतराग साधिका सुश्री निशा जैन के सहयोग से आत्म: ध्यान साधना कोर्स ‘‘बेसिक’’ 4 से 8 अगस्त तक सम्पन्न हुआ । इस पर जैनाचार्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने बताया कि- आत्म-ध्यान आत्मशुद्धि की साधना है । यह भेद-ज्ञान की साधना है। भेद से अभेद की साधना है और संक्षिप्त में शुद्ध वीतराग सामायिक की साधना है । इस साधना शिविर में 110 साधकों ने भाग लिया जिनमें पटियाला, जयपुर, जोधपुर, चण्डीगढ़, हनुमानगढ़, सिरसा, मालेर कोटला सेे ध्यान साधकों ने भाग लिया ।


मोक्षगामिनी विद्या सीखो
जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेरकोटला 10 अगस्त  जैन धर्म दिवाकर, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर,  आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- आत्म-दृष्टि जीव को तीनों लोकों का राज्य मिल जाए तो वह संतुष्ट नहीं होगा परन्तु अरिहंत प्रभु की कृपा का एक कण मिल जाए तो वह संतुष्ट हो जाता है । भीतर आत्म-दृष्टि आ जाए तो व्यक्ति संतुष्ट हो जाता है । कई उदाहरण हमारे समक्ष है जो भरा पूरा परिवार छोड़कर आत्म-दृष्टि पाने हेतु तीर्थंकर भगवंतों के चरणों में दीक्षित हो सिद्ध, बुद्ध, मुक्त हुए । अन्तिम श्री जम्बू स्वामी जी जिनकी 99 करोड़ की सम्पत्ति थी, आठ पत्नियां जिन्हें भोगोपभोग का आमंत्रण दे रही थी ऐसे समय में जम्बू स्वामी ने धर्म की शरण लेकर स्वयं को धर्म के साथ जोड़ा । जब पत्नियों के साथ विरक्ति का वार्तालाप चल रहा था उस समय प्रभव चोर अपनी मण्डली के साथ चोरी करने हेतु वहाँ उपस्थित हुआ । उसके पास दो विद्याएं थी । एक ताला खोलने की और दूसरी गहरी नींद सुलाने की । जब वो चोरी करने घर में घुसा तब उसके पांव जमीन से चिपक गए । उसने जम्बू से प्रार्थना की कि मुझे यह विद्या सिखा दे मैं तुझे अपनी दोनों विद्याएं दे दूंगा परन्तु जम्बू ने कहा यह विद्या तो संसार की है मैं तुझे मोक्षगामिनी विद्या देता हूं जिससे तूं मुक्त हो अनंत सुख को प्राप्त करेगा ।

मोक्षगामिनी विद्या हमें मुक्ति की ओर ले जाती है । यह विद्या किसी स्कूल या काॅलेज में प्राप्त नहीं होगी । यह विद्या तो आत्म-दृष्टि प्राप्त गुरु के पास ही होगी इसीलिए शास्त्रों में कई स्थान पर विधि गुरुगम्य लिखी होती है । हम मुक्ति की विद्या सीखे । मोक्षगामिनी विद्या हमें मुक्ति प्रदान कर शाश्वत् सुख देगी । आत्म-बल भीतर हो तो और किसी बल की आवश्यकता नहीं होती । भगवान् के सामने पृथ्वी, धन, पद, प्रतिष्ठा की मांग ना होकर उनकी कृपा की एक कण की मांग हो । प्रभु सुख आए, दुःख आए मुझे केवल आपके श्रीचरणों का ध्यान रहे । यश और अपयश हमें अपने कर्मों से ही प्राप्त होते हैं । अगर पुण्य किया होगा तो सुख प्राप्त होगा और पाप किया होगा तो दुःख मिलेगा । हम धर्म पर अपनी श्रद्धा को अडिग बनाएं । शालीभद्र ने पूर्व भव में खीर का दान देकर जो भावना भाई थी उसी के फलस्वरुप उसे शालीभद्र के भव में महान् रिद्धि प्राप्त हुई ।

आत्म-दृष्टि भीतर आ जाए तो फिर सारा जगत आत्मा जैसा ही प्रतिभाषित होता है । आत्म-दृष्टि भीतर आ गई तो फिर कोई चाहना नहीं रहती । न धन, न पद, न प्रतिष्ठा, बस केवल परमात्मा की भक्ति और उनकी कृपा की ही इच्छा होती है । यश, अपयश आते हैं और चले जाते हैं । पुण्य और पाप हमारे कर्मों से ही हमें मिलते हैं । इन सबसे दूर होकर हम सभी वीतराग-धारा में आएं । शाश्वत् तत्व को पहचाने । हमारी आत्मा शाश्वत् है । इन दो आंखों में दिव्य-दृष्टि भर लेना जिससे हर आत्मा में परमात्म-दर्शन होगा । मनोरंजन करते-2 जीवन बीत गया, अब आत्म-रंजन करें । आत्मवत् सर्वभुतेषु की भावना से सभी जीवों को अपने समान जाने तभी जीवन सार्थक होगा ।

शरीर श्मशान की राख है
जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेरकोटला 11 अगस्त  जैन धर्म दिवाकर, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर,  आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- मानव जीवन की तीन अवस्थाएं बचपन, जवानी और बुढ़ापा । दिन की भी तीन अवस्थाएं हैं । प्रातःकाल, मध्याह्न और सायंकाल । प्रातः का सूरज चारों ओर अपनी आभा, लालिमा बिखेरता है । सूरज की पहली किरण आते ही सारे जगत के प्राणी अपने कारोबार में लग जाते हैं । बाल सूर्य बहुत अच्छा लगता है । ध्यान के लिए उत्तम समय होता है प्रातःकाल का । बाल सूर्य को तीन चार मिनिट निहारों और उसकी ऊर्जा को भीतर ग्रहण करो तो लगता है कि सूरज आज्ञा-चक्र को आकर्षित कर रहा है । ध्यान में मन ना लगता हो तो प्रातःकाल का सूरज तीन-चार मिनिट देखें और आंखें बंद करके बैठ जाएं मन लगने लग जाएगा ।

जिस प्रकार सूबह का सूरज प्यारा लगता है उसी तरह बचपन भी बहुत प्यारा होता   है । बचपन जहाँ पर माँ की गोद में बच्चा अठखेलियां करता है । दोपहर के सूरज को ये आंखें देख नहीं सकती । धरती तप जाती है, सूरज तेज हो जाता है उसी प्रकार मानव जवानी की अवस्था में मदमस्त हो जाता है । सूरज शाम को पश्चिम में अस्ताचल की ओर बढ़ जाता है उसी प्रकार जीवन का अस्ताचल बुढ़ापा है जहाँ केवल पुरानी यादें और सपने  हैं । ना भोजन बना सकते हैं ना भोजन पच सकता है । जीवन के सार को समझ लो । यह जीवन हमेशा ऐसा रहने वाला नहीं है ।

यह शरीर शमशान की राख बनेगा । यह अवश्य है कि मौत आएगी । किसी की अर्थी ले जाते हो तो लगता है कि उसकी मौत हुई है पर यह सोचो कभी हमारी भी मौत होगी । मौत कभी भी आ सकती है । मौत अवश्य है । जीवन के सार को समझो । जम्बू ने जीवन के सार को समझा । जब वह गर्भ में आया तो मां ने जम्बू वृक्ष को देखा । जन्म होने पर नाम जम्बू कुमार रखा गया । जम्बू कुमार करोड़ों की सम्पत्ति, कामिनी का संयोग, बलशाली शरीर होने के बाद भी संसार को क्षणिक मानकर संसार के स्वामी बने । संसार का सुख थोड़ा है ओर दुःख की लम्बी कतार है । यह धन काम नहीं आता । माता पिता ने जम्बू कुमार की शादी की । आठ पत्नियां थी । शादी के आठ दिन बाद आप संयमी बनें । अपने साथ और 511 लोगों को जिन-दीक्षा की प्रेरणा दी । प्रभव चोर को मुक्ति का धन दिया । मानव और पशु में यही अन्तर है कि मानव धर्म कर सकता है । संसार में कोई काम नहीं आने वाला है । मानव जीवन की तीनों अवस्थाएं सब पर आने वाली है । जो अपने निज स्वभाव में आएगा वो इससे पार स्वयं के स्वरुप को प्राप्त कर लेगा जिस प्रकार अन्तिम केवली जम्बू स्वामी ने प्राप्त किया और सिद्ध, बुद्ध, मुक्त बने ।
 
विनम्रता भगवान बना देती है
जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेरकोटला 12 अगस्त  जैन धर्म दिवाकर, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर,  आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- परमात्म स्मरण की घड़ी भीतर आ जाए दो समय प्रभु का स्मरण हमारे जीवन में आ जाए तो यह जीवन नंदनवन बन जाएगा । सुबह शाम जिसको प्रभु का ध्यान होगा वही भाग्यशाली इंसान होगा एक अहसास करो परमात्मा तुम्हारे भीतर ही है । हम उसे अपने भीतर देखे । मन्दिर, मस्जिद गुरुद्वारों में कितने माथे रगड़ लो । जिस परमात्म-तत्व की अनुभूति भीतर होनी है वह बाहर नहीं मिलेगा । जिसने हृदय में तुझे देखा उसी ने तुझे पाया है । हृदय में परमात्मा को देखो ।

जो पैसा अपनी दस अंगुलियों से कमाया जाता है वो पैसा ही टिकता है वो ही पैसा अमृत बनता है । गांव का गरीब अपनी मेहनत से जो रुखी सूखी रोटी खाता है वही उसके लिए अमृत है । एक जमीदार दूसरों के पैसों से मेवा मिष्ठान खाता है वह अमृत नहीं कहला सकता । आजीविका में न्याय नीति से कमाया गया धन सार्थक होगा । अगर पैसे को प्रमुखता दी तो वह पैसा तुम्हें चूंसेगा । हमारी आजीविका का हम पर प्रभाव पड़ता है । आजीविका शुद्ध हो, सादा भोजन हो तभी नाम स्मरण हो सकता है । जब भीतर प्रेम और करुणा होती है तब प्रार्थना भीतर से फूटती है । ध्यान साधना भीतर आती है तुम्हारी विनम्रता तुम्हें ऊँचा उठाती है । विनम्रता भगवान बना देती है और अहंकार नीचे गिराता है ।

शरीर के लिए इतना कुछ ना करो कि तुम्हें उस पर अटककर रहना पड़े । शरीर मूल्यवान है पर उससे अधिक मूल्यवान है तुम्हारी आत्मा । शरीर और आत्मा दो पार्टनर है उन्हें बराबर का हिस्सा दो । आनंद तुम्हारे भीतर है उसे भीतर टटोलो । जो मिला उसका अहसास करो । ये आंखें प्रभु दर्शन के लिए मिली । ये कान प्रभु का संगीत सुनने के लिए मिले । वाणी प्रभु भक्ति करने के लिए मिली । हाथ सेवा करने के लिए मिले और पांव प्रभु तक पहुंचने के लिए   मिले । अगर हम इनका सदुपयोग नहीं करेंगे तो जीवन व्यर्थ होगा । परमात्मा बोधि देने वाले हैं । वे धर्म देने वाले हैं । वे धर्मोपदेशक है । वे धर्म के सारथी और धर्म के नायक हैं । अर्जुन के लिए कृष्ण सारथी बने और उसे अपने जीवन की जंग में विजयी बनाया । हम अपनी जीवन नैय्या को प्रभु चरणों में समर्पित करें तो हमारा मंगल ही मंगल होगा ।

जिन खोजा तिन पाईंया
जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेरकोटला 13 अगस्त  जैन धर्म दिवाकर, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर,  आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- एक पश्चिम के दार्शनिक ने कहा है कि यदि तुम मोती पाना चाहते हो तो समुद्र के भीतर गहरे-गहरे जाना होगा । कंकर पत्थर तो समुद्र के किनारे पर ही बहुत सारे मिल जाएंगे । गहरे उतरने का जो पुरुषार्थ करता है उसे मोती मिलते हैं । वीतराग-वाणी भी यही कहती  है । एक खोज बाहर की है एक खोज भीतर की है । बाहर की खोज अनेक बार  की । हाथ कुछ भी न आया । ये हीरे जवाहरात यहीं के यहीं पड़े रह जाएंगे । ये पत्थर के टुकड़े साथ न जाएंगे । सोना ऐसा है जो कभी सोने नहीं देता । ये माया और आकर्षण है । हम अगर सच्चा सोना पाना चाहते हैं तो भीतर खोजो । खोजते-2 भीतर चले जाओ । इधर-उधर भटकने की आवश्यकता नहीं है ।

भगवान महावीर का जीवन साढ़े बारह वर्ष तक कुछ ऐसा ही था उन्होंने अपने भीतर खोजा । सबने उनकी परीक्षा ली और वे हर परीक्षा में खरे उतरे । वे इतने सुन्दर थे कि स्त्रियां आकर्षित होती थी । देवताओं ने परीक्षा ली । एक रात्रि में 20 उपसर्ग दिए । उनके संकल्प की परीक्षा हुई और वे मुक्ति की ओर अग्रसर हुए । गोदुह आसन में ऋजुबालिका नदी के तट पर केवलज्ञान को प्राप्त कर अपने मार्ग को प्रशस्त किया ।

जो खोजते हैं उन्हें मिलता है । जो खोजेंगे नहीं उन्हें प्राप्त नहीं होगा । परमात्मा मन्दिर मस्जिद गुरुद्वारों में नहीं बल्कि हमारे भीतर है । हम अपने भीतर उनको खोजे । परमात्मा का गुण स्मरण करें । प्रभो ! आपने चारों गतियों पर विजय पाई । चक्रवर्ती तो छः खण्ड पर विजय पाता है पर आपने तो स्वयं पर विजय प्राप्त कर सिद्धालय को पाया है ।  चक्रवर्ती दीक्षा ले तो मुक्ति प्राप्त करता है ओर संसार के काम भोगों में अटका रहे तो नरक का बंधन करता है । इतिहास हमारे सामने है बारह चक्रवर्तियों में से दो नरक में गए और दस चक्रवर्ती मुक्ति को प्राप्त कर गए ।

प्रभु आप शरणदाता हो । धर्म शरण से ही मुक्ति मिल सकती है । जब संकट आए तब प्रभु नाम को छोड़ना मत । आप उत्तम शरण हो । आप अप्रतिहत ज्ञान के धर्ता हो । आपकी वाणी की झंकार से अनेकों भवि जीव मुक्ति की ओर पहुंच गए । हर अनुष्ठान के पीछे अरिहंत स्मरण और वंदन आवश्यक है इससे हृदय पवित्र होता है । सुबह उठो तो प्रभु को वंदना करो । रात्रि में सोओ तो भगवान को वदंन करो । वंदन में शब्द के साथ भावों की गहराई, भक्ति हो । भक्ति से असंख्यात कर्मों की निर्जरा होती है ।
 
निर्भार हो भक्ति करें
जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेरकोटला 14 अगस्त  जैन धर्म दिवाकर, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर,  आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- संसार सागर से पार उतारने के लिए एक सत्गुरु आवश्यक है । सत्गुरु वो जो सत्य का मार्ग दिखाए । कहा भी है- सत्गुरु की महिमा अनंत, अनंत किया उपकार ।
लोचन अनंत उघाड़िया, अनंत दिखावन हार ।।
सत्गुरु की महिमा बहुत अनंत है । जिन्होंने सत्य का मार्ग दिया अनंत उपकार किए । गुरु तो बहुत है परन्तु सत्य का मार्ग दिखाने वाले गुरु कोई-2 ही होते हैं । जिस मार्ग में आनंद, शांति, स्मृद्धि है ऐसे मार्ग प्रदाता के चरणों में तुम अपना जीवन भी दे दो तो कम है । भरत क्षेत्र में मुक्ति नहीं है परन्तु कर्म-निर्जरा तो कर सकते हैं । हम अरिहंत भक्ति कर रहे हैं । भक्ति और नमन से व्यक्ति हल्का होता है । लघुता से प्रभुता मिलती है । उनके गुणों को भीतर उतारना होगा ।

फूल हल्का होता है । उसकी सुगंधी, गरिमा और मूल्य अपना ही होता है । मन्दिर में सभी फूल लेकर जाते हैं कोई पत्थर लेकर नहीं जाता । फूल में भार नहीं है वह निर्भार है इसीलिए प्रभु चरणों में समर्पित होता है । आप किसी को गिफ्ट देते हो तो फूलों का गुलदस्ता देते हो कोई फूल सुबह खिलता है शाम को मुरझा जाता है । परमात्मा की भक्ति भी फूल जैसी होनी चाहिए जो स्वयं मिटकर परमात्मा की भक्ति करता है । निर्भार कैसे हो ? केसे भक्ति और गुणकीर्तन भीतर आए इसलिए अरिहंत परमात्मा जो सर्वज्ञ, सर्वदर्शी है, सर्वगुण सम्पन्न है, अनंत सुख और ऐश्वर्य के स्वामी हैं उनकी नमोत्थुणं से हम भक्ति कर रहे हैं प्रभो ! संसार सागर में डूब रहे प्राणियों के लिए आधारभूत है । प्रभु छद्मस्थ नहीं है वे पूर्ण वीतरागी हैं । स्वयं जिन हैं और सब जानते हैं स्वयं तिर रहे हैं औरो को तार रहे हैं । स्वयं बुद्ध हैं ओरो को बोधि का मार्ग दे रहे हैं । स्वयं मुक्त है ओरो को मुक्ति का मार्ग दे रहे हैं । आयुष्य कर्म पूर्ण होने पर प्रभु सिद्धगति में बिराजेंगे ।

जिज्ञासा, मुमुक्षा भीतर मुक्ति की प्यास होना आवश्यक है । मुक्ति का मार्ग वही दे सकता है जो स्वयं मुक्त हो गया है । प्रभु शिव कल्याण स्वरुप है । उनके जीवन में कोई बाधा नहीं है । उनका पुनरागमन नहीं होगा । उनका संसार भ्रमण नहीं है । ऐसे समस्त जिनभगवंतों को मैं नमस्कार करता हूं जिन्होंने सात प्रकार के भयों को जीत लिया है । याद रखों मुट्ठी बांधकर आए थे खाली हाथ जाना   होगा । जैसे कर्म किए हैं वैसा फल मिलेगा इसलिए अरिहंत की भक्ति, उनके प्रति कृतज्ञता के भाव भीतर आएगे तो यह जीवन महाजीवन की ओर आगे बढ़ेगा । प्रभु ने समस्त भयों को जीतकर स्वयं निर्भय हुए और औरों को भी निभर्य बना रहे हैं । हम भी समस्त भयों से मुक्त हो जिन बने, जिन बनने के लिए साधना, आराधना का मार्ग अपनाएं ।

भीतर से आजाद होना ही सच्ची स्वतंत्रता है
जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेरकोटला 15 अगस्त जैन धर्म दिवाकर, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर,  आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- आज 15 अगस्त भारत की आजादी का दिन है । सैकड़ों वर्षों तक गुलामी में रहे भारत को आज ही के दिन आजादी मिली थी । कभी इस भारत पर मुसलमानों ने राज्य किया तो कभी अंग्रेजों ने । नादिरशाह जैसे राजा हीरे जवाहरात की गाड़ियां भरकर ले गए । जब हम गुलामी में थे तब बहुत कष्ट सहे और जब स्वतंत्र हुए तब एक अनोखी मुस्कान, उल्लास और उमंग भीतर था । देश आजाद हुआ इसके पीछे बहुत सी कुर्बानियां देनी पड़ी जिसमें बापू गांधी का नाम शीर्ष पर लिया जाता है । बापू गांधी ने स्वयं का ध्यान ना देते हुए इस राष्ट का ध्यान दिया । उन्होंने कहा कि जब तक मेरी भारत माता अंग्रेजों की जंजीरों में जकड़ी रहेगी तब तक मैं शान्त नहीं बैठूंगा । उन्होंने भारत की स्वतंत्रता के लिए बहुत कुर्बानी दी ।

जब गांधी की विचारों रुपी आंधी ने विदेशी शासन को समाप्त कर दिया तब समता और शांति का प्रतीक अशोक चक्र से सुशोभित तिरंगा लहराया गया तो भारतीयों का हृदय खिल उठा । उनके कण-कण में हर्ष था । नवचेतना नवजागृति थी । आबालवृद्ध सभी प्रसन्न थे । आज वही 15 अगस्त है परन्तु क्या वो प्रसन्नता, क्या वो आजादी हमारे भीतर है । गांधीजी ने भगवान महावीर की अहिंसा, अनेकान्त और अपरिग्रह को जीवन में उतारा । वे जीवन भर उन्हीं शिक्षाओं के सहारे भारत को आजाद कराया । देश के गरीबों के शरीरों पर वस्त्र न देखकर उन्होंने आजीवन लाठी और लंगोटी के सहारे जीवन यापन किया ।

कहा भी है- एक आह् जो दिल से पुकारी जाएगी ।
मत समझो कि वो खाली जाएगी ।

आज जगह-2 पर आजादी का जश्न मनाया जा रहा है परन्तु क्या हम मन से आजाद हुए हैं । देश की आर्थिक समस्या सुलझी है । मंहगाई प्रतिदिन बढ़ती जा रही है । क्या हमारा मन, शरीर, विचार, धाराणाएं और आत्मा स्वतंत्र हुई है । क्या हम अपने स्वामी बने हैं । अगर हम अपने ही गुलाम है तो भारत की आजादी का हमें क्या फायदा हुआ । अपने दुःख में तो हर कोई रो लेता है दूसरों के दुःख में रोयें और सुख में हसे । दूसरों के काम आए यही जिन्दगी है । आज विश्व को फिर से उस बापू की शिक्षाओं की आवश्यकता है । संस्कृति की चकाचैंध में विश्व पाश्चात्य की ओर झुकता जा रहा है । हम फिर से उसी प्रकार स्वतंत्र हो जिस प्रकार आज से 62 वर्ष पूर्व हुए थे । यह भारत सोने की चिड़िया कहलाता था । भारत से चरित्र निर्माण की शिक्षा ली जाती थी जिस भारत में राम, कृष्ण, बुद्ध महावीर जैसे महान मुनिराज पैदा हुए जहां पर सर्वधर्म का समन्वय है आज भी उस सर्वधर्म के समन्वय को भीतर   अपनाएं । अहिंसक तरीकें से समस्त समस्याओं का समाधान करें । कड़ी मेहनत सफलता की निशानी है । मेहनत से ही कामयाबी मिलती है । हम स्वतंत्रता दिवस पर भीतर से स्वतंत्र होने का संकल्प लें ।

रक्षा बंधन की ऐतिहासिकता और पवित्रता
जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेर कोटला 16 अगस्त { निखिलेश जैन} जैन धर्म दिवाकर श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने आध्यात्मिक संस्कृति का संरक्षण एवं संवर्धन पर रक्षा बंधन की संस्कृति पर अपने मौलिक विचार प्रकट किए । इस अवसर पर आज के प्रवचन में आचार्यश्रीजी ने फरमाया कि:-  आज का यह पावन दिवस राखी का त्यौहार भाई बहिन के बंधन का पवित्र त्यौहार माना जाता है । भारतवर्ष पर्वो का देश है । हर महीने कोई न कोई त्यौहार अवश्य होता है । कई बार महीने में दो त्यौहार भी आ जाते हैं । त्यौहार हमारी संस्कृति को उद्घाटित करता है । रक्षा-बन्धन लौकिक त्यौहार है त्यौहार हमारे जीवन में कुछ संदेश देते हैं ।

हर पर्व कुछ शिक्षा देता है । इसी प्रकार रक्षा-बन्धन का पर्व हमें बहिन की रक्षा करने की शिक्षा देता है । वर्तमान में जनसंख्या घटाने के उद्देश्य से जो भ्रूण हत्या का दौर चल रहा है रक्षाबंधन के पावन अवसर पर उस भु्रण हत्या के पाप को न करने का संकल्प लें । शुरूआत में हर पर्व शुद्धता के साथ मनाया जाता था । परन्तु कालान्तर से वह पर्व पवित्रता से हट जाता है । रक्षा-बन्धन का पर्व भाई बहिन का पवित्र पर्व है । भाई बहिन की पवित्रता को रक्षा-सूत्र में बांधा गया है । यह राखी का पर्व पहले बहुत सादगी के साथ मनाया जाता था, परन्तु वर्तमान समय में यह एक महंगा पर्व बनता जा रहा है । बहिनें भाई के प्रेम को कम और उपहार को ज्यादा महत्व देने लगी है जो एक सामाजिक बुराई है और रक्षाबंधन की भावना के विरुद्ध है इसलिए हमें राखी के बंधन को पैसे के बंधन में नहीं बांधना चाहिए । आवश्यक नहीं था कि रक्षा-बन्धन के दिन ही बहिन भाई की कलाई पर रक्षा-सूत्र बांधे । जैन धर्म में विष्णु कुमार मुनि एवं बलि की घटना विश्व प्रसिद्ध है । यह घटना हस्तिनापुर की है । जहाँ राजा पद्म जैन मुनियों से घृणा करता था । उनके मंत्री बलि ने जब महाराज को यह बात कही तो मुनि ने बलि के पास जाकर ढाई पग धरती मांगी और अपना विराट् रुप कर एक पैर में पृथ्वी, दूसरे पैर में देवलोक एवं तीसरे पैर को रखने का स्थान मांगा तो राजा ने अपना सिर आगे कर वहाँ पैर रखने की प्रार्थना की । इस तरह पांच सौ मुनियों की रक्षा कर जिनशासन की प्रभावना की । इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं तो किसी भी समय बहिन ने भाई को रक्षा-सूत्र बांधकर रक्षा के लिए प्रेरित किया ।

मेवाड़ की महारानी कर्मवती जिसने साम्प्रदायिकता से ऊपर उठकर हुमायु को रेशम के चार धागों में 21 रत्न जड़कर एक रत्न की पेटी में बंद कर रक्षा-सूत्र भेजा और अपनी रक्षा के लिए प्रेरित किया । इसी प्रकार पंडित मदन मोहन मालवीय ने काशी नरेश को राखी बांधकर बनारस हिन्दु विश्वविद्यालय के लिए पन्द्रह गांव जितनी जमीन प्राप्त की । इसी प्रकार चन्द्रशेखर आजाद ने एक बहिन की रक्षा धन के द्वारा   की । आजकल यह त्यौहार एक लेन-देन का कार्य बन चुका है । वर्तमान में रक्षा-बंधन के पर्व पर बहिन भाई से रक्षा के लिए कामना करने की बजाय कुछ चाह रखती है । यह त्यौहार पवित्रता से हटकर अब एक आडम्बर में आ चुका है । हम आज के दिन इस आडम्बर को हटायें । इस त्यौहार की पवित्रता को बनाये रखे । ऐसी अनेक बहिनें हैं जो आज रक्षा-सूत्र बांधने के लिए तैयार रहती हैं । हम उनकी रक्षा के लिए, उनकी खुशी के लिए रक्षा सूत्र बांधकर रक्षाबंधन का पवित्र त्यौहार बनायें । आज के दिन हम अच्छे कार्य करें । किसी की आवश्यकता की पूर्ति कर दें तो वास्तव में यह पर्व आडम्बर रहित होकर पवित्रता की ओर अग्रसर होगा । संक्रांति के मंगल अवसर पर आचार्यश्रीजी ने अपने पावन मुखारबिन्द से संक्रांति का नाम सुनाया और समस्त संघ को धर्म-ध्यान करने की विशेष प्रेरणा प्रदान की ।

महात्मा बनने में माँ का महान् योगदान है
जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेरकोटला 17 अगस्त  जैन धर्म दिवाकर, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर,  आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- इस मानव जीवन को यदि हम सफल बनाना चाहे तो अरिहंत प्रभु की भक्ति, उनके गुणों का सतत् स्मरण उन जैसा बनने की इच्छा रखना अति आवश्यक है और यही धर्म है । विश्व में धर्म पर सैंकड़ों ग्रन्थ लिखे हुए हैं । अनेक धर्मानुयायी हैं पर मैं पूछता हूं कि धर्म की शुरुआत कहाँ से है । क्या धर्म की शुरुआत मक्का, मदीना, मन्दिर, मस्जिद, ननकाना, कैलाश पर्वत, हिमालय, गिरिजाघर या स्थानक से है ? कहां से है ? धर्म जीवन का अंग-संग है ।

आपके भीतर जहाँ से धर्म का बीज वपन हुआ वहीं से धर्म की शुरुआत है । धर्म की शुरुआत हमारे घर से है जहां बचपन में हम खेले । जहां सर्वप्रथम बड़ों से धर्म को श्रवण किया । माँ जैसा चाहे वैसा अपने बच्चे को बना सकती है । संस्कार देने के लिए मां का बहुत बड़ा योगदान है । आज हम माता पिता का बच्चे के प्रति क्या कर्तव्य है इस पर चर्चा करेंगे । आपने एक छोटा बच्चा देखा होगा हंसता, मुस्कुराता, खिलखिलाता चेहरा । उसका नैसर्गिक भोलापन और निर्दोष निगाहें हमें उसकी ओर आक्रर्षित करती हैं । उसे देखकर आपको उस जैसा बनने की इच्छा होती है । छोटे बच्चे को पता नही ंहोता कि कौन मां है, कौन बाप है उसे जो भी मुस्कुराकर बुला लेता है वह उसके पास हंसकर चला जाता है ।

कुछ बड़ा होने पर बच्चा सरलता भूल जाता है और उसके भीतर कृत्रिमता आ जाती  है । एक मनोवैज्ञानिक के पास फ्रांस की महिला गई और उसने उस मनोवैज्ञानिक को कहा कि मेरा एक बच्चा है उसे मैं अच्छे संस्कार देना चाहती हूं बताइए क्या किया जाए ? डाॅक्टर ने बच्चे की उम्र पूछी । महिला ने कहा 6 वर्ष । डाॅक्टर ने कहा अब हम कुछ नहीं कर सकते, संस्कार केवल 4 वर्ष तक ही दिए जा सकते हैं । आज के वैज्ञानिक भी यह सिद्ध करते हैं कि 4 वर्ष की उम्र तक बच्चा जीवन की 60 प्रतिशत शिक्षा प्राप्त कर लेता है । एक बीज भूमि में डाला जाए और उसे पानी नहीं दिया जाए, खाद नहीं मिले तो वह बड़ा नहीं हो सकता । इसी प्रकार बच्चे को संस्कार नहीं दिए जाए तो वह संस्कारित नहीं हो सकता ।

माँ को माँ बनना एक बहुत बड़ी समस्या है एक डाॅक्टर, आर्किटेक्ट, इंजीनियर है आपने उससे कुछ काम लेना है तो आप देखते हो कि वह डिग्री होल्डर है, क्या उसके पास अनुभव है उसी प्रकार एक बच्चे को आत्मा से महात्मा बनाने के लिए मां को महान् तपस्या करनी होती है । मां के दो रुप है एक जननी और माँ । भगवान कृष्ण को जन्म देवकी ने दिया और संस्कार यशोदा ने दिए । करोड़ों माताएं बच्चों को जन्म देती है परन्तु संस्कार कोई-कोई माँ दे पाती है । गर्भ में आत्मा का अवतरण मां के लिए गौरव की बात है । आपको जैसा बेटा चाहिए वैसे संस्कार अगर आप गर्भ से देते हो तो वैसा प्रतिफल मिलता   है । एक माँ अपने बच्चे को महात्मा भी बना सकती है और परमात्मा भी बना सकती है आवश्यकता है संस्कारों की क्योंकि माँ प्रथम गुरु है, पिता का दूसरा नम्बर है और गुरु का तीसरा । भारत भूमि पर ऐसी महान् आत्माओं ने जन्म लिया जो मां के नाम से पहचानी कई जैसे राम को कौशल्यानंदन कहा गया, कृष्ण को देवीकीनंदन एवं प्रभु महावीर को त्रिशलानंदन कहा गया ।

बच्चे की शिक्षा गर्भ से प्रारंभ होती है
जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेरकोटला 18 अगस्त  जैन धर्म दिवाकर, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर,  आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- एक छोटा सा भोला-भाला बच्चा जिसका मुस्कुराता हुआ चेहरा, निर्दोष आंखें हमें उसकी ओर आकर्षित करता है । जब हम उसे संस्कार देते हैं तब उसकी सात्विकता, सहजता, पवित्रता को छीन लेते हैं । बच्चे की शिक्षा का प्रारंभ गर्भ से है । सनातन परम्परा में गर्भ संस्कार किया जाता है । माँ बनना मासक्षमण से भी बड़ी समस्या है । हम बच्चे को गर्भ में किस प्रकार आमंत्रण दे रहे हैं । माता पिता की जैसी भावना होगी बच्चा वैसा ही होगा । गर्भ में जीव के आगमन पर हम क्या करते हैं ? यह भी बहुत मायने रखता है । जिस प्रकार जम्बू कुमार के गर्भ में आने पर माता ने अपने कक्ष का त्याग कर पति के कक्ष में जाकर स्वप्न सुनाया और धर्म आराधना की उस समय में शास्त्र में ऐसा वर्णन आता है कि जब बच्चा गर्भ में होता था तब माता पिता अलग-2 कक्ष में शयन करते थे ।

त्रिशला माँ ने प्रभु महावीर के च्यवन कल्याणक पर चैदह स्वप्न देखें । राजा सिद्धार्थ से उनका फल पूछा, फल सुनकर माता हर्षित हुई । जब स्वप्न अच्छा आए तो उठकर धर्म आराधना करनी चाहिए । प्रभु भक्ति औार प्रभु का स्मरण करना चाहिए । सति मदालसा ने सात बच्चों को जन्म दिया और हर बच्चे को गर्भ में संस्कार दिया कि तूं शुद्ध, बुद्ध, अमर अमर अविनाशी है । कहते हैं केवल गर्भ संस्कार से ही सति के छहों पुत्र सन्यासी बने । सातवा पुत्र राजा ने मांगा और उसे भी एक ताबीज बनाकर दिया और कहा कि जब विपत्ति आए तब इसे खोलना । एक समय जब विपत्ति का प्रसंग आया तब सप्तम पुत्र ने ताबीज खोला तो उसमें भी शुद्ध, बुद्ध, चैतन्य होने की बात लिखी थी । वह पढ़कर सप्तम पुत्र भी संन्यासी बना । धन्य है ऐसी माता जिन्होंने सात पुत्रों को जन्म दिया फिर भी सती कहलाई । जैसी मां होगा पैसा बच्चा होगा ।

सुभद्रा के गर्भ में ही वीर अभिमन्यु ने चक्रव्यूह में प्रवेश की शिक्षा प्राप्त की थी । जब वह चक्रव्यूह का प्रसंग श्रवण कर रही थी तो उसे नींद आ गई जब माता को नींद आई तो बालक भी सो गया । कहते हैं चक्रव्यूह से बाहर आने की शिक्षा नहीं ले सका । जब मां सोती है तो बच्चा सोता है । मां जागती है तो बच्चा जागता है । जैसे कार्य मां करेगी बच्चा वैसे ही संस्कारों से संस्कारित होगा । ऐसे कई ज्वलंत उदाहरण भी हमारे सामने हैं । दिल्ली में एक गर्भवती महिला ध्यान साधना शिविर में बैठी वह साधना शिविर में साधना से एकमेक हो गई और कहते हैं तब उसने बच्चे को जन्म दिया तो वह बच्चा हसा । आज भी उस बच्चे को ध्यान साधना अच्छी लगती है । शास्त्रों में वर्णन आता है मां गर्भवती हो तो तपस्या ना करें । जब तक बालक स्तनपान करें तब तक बच्चे का पालन पोषण करना ही मां की तपस्या है । भारत की संस्कृति एक बहुत उच्च संस्कृति है । यहां पर मां की मेहनत और पिता के संसकार बच्चे के काम आता है । पुराने समय में माताएं चक्की पीसती थी, पानी भरती थी, खेती करती थी तो बच्चे आसानी से जन्म लेते थे । आज की माताएं बच्चे के जन्म से पूर्व ही विश्राम लेती है तो जन्म के समय माँ को और बच्चे को दोनों को कठिनाईयां होती है । यह हम पर निर्भर करता है कि हम बच्चे को कैसे संस्कार दें । जैसे संस्कार देंगे बच्चा वैसा ही होगा ।
 
गर्भ में छिपा है बालक का भविष्य
जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेर कोटला 19 अगस्त जैन धर्म दिवाकर, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर,  आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- स्त्रियांे की 64 कलाओं में एक कला है गर्भ संस्कार की । बच्चे को जन्म से पहले 9 माह गर्भ में धारण करना फिर उसे संस्कार प्रदान करना यही गर्भ संस्कार कहलाता है । बच्चे का भविष्य गर्भ में ही निश्चित हो जाता है । फ्रांस में एक प्रयोग किया गया कि बच्चा जन्मते समय रोता क्यों है ? और बच्चा नहीं रोता तो माँ बाप रुलाते क्यों है ? गर्भ में बच्चा मां की नाभी से जुड़ा होता है जब उसका जन्म होता है तब वह नाभी केन्द्र से अलग हो जाता है । उसे घबराहट होती है और वह रोने लगता है । गर्भ में जैसा मां करती है वैसा ही बच्चा करता है । मां श्वांस लेती है बच्चा श्वांस लेता है । मां खाना खाती है बच्चा खाना खाता   है । जब जन्म के समय बच्चे को नाभी से अलग किया जाता है तब उसके भीतर घबराहट होती है, उसे एक झटका लगता है ऐसे समय में बच्चे को मां की छाती से लगा दो । बच्चा रोएगा नहीं, उसे घबराहट नहीं होगी । जन्म के बाद बच्चे को एक टब में शरीर के तापमान का पानी लेकर उसमें लिटा दो तब बच्चा स्वस्थता अनुभव करेगा ।

आजकल आमतौर पर देखने को मिलता है कि कम उम्र में ही बच्चों को चश्मे लग जाते हैं ऐसा क्यों होता है ? आजकल जन्म अस्पतालों में होता है जहां पर 200-500 वोल्ट की लाईट्स होती है जिसका प्रभाव बच्चे की आंखों पर पड़ता है, उसकी कच्ची आंखें उसे सहन नहीं कर पाती इसलिए बच्चे की आंखें कमजोरी होती है । पुराने समय में बच्चों का जन्म घर में होता था मां को एक अंधेरे कमरे में चालीस दिन तक घी के दीपक की रोशनी में रखा जाता था । इससे बच्चा उस प्रकाश को धीरे-2 सहन करता था और उसकी कच्ची आंखें पक जाती थी ।

आप चाहते हो कि आपका बच्चा विविध भाषाएं सीखे तो जन्म के समय चांदी की शलाका से उसकी जिह्वा पर केसर से ऊँ या अर्हम् लिखा जाए, इससे बहुत गहरा असर उसके भीतर होता है । बच्चे को ऐसा प्रयोग प्रथम दूध पिलाने से पूर्व किया जाना चाहिए । बच्चे को जो शिक्षा एक मां दे सकती है वह एक अध्यापक भी नहीं दे सकता । छोटे बच्चों को शिक्षा देने का एक उत्तम तरीका है चित्र । विभिन्न चित्र दिखाकर उन्हें संस्कारित किया जा सकता है । पुराने समय में बच्चे मिट्टी के खिलौनो के साथ खेलते थे । मिट्टी से उन्हें सत्व प्रदान होता था । आज के बच्चे प्लास्टिक के खिलौने से खेलते हैं ओर वे खिलौने भी बन्दूक जैसे होते हैं जिससे खेल में ही गलत संस्कार पड़ जाते हैं ।

एक अमेरिकन महिला ने अपने छोटे बच्चे को बचपन में ही दूध पिलाते, भोजन कराते समय संस्कार दिया कि तुम जनरल हो और कहते हैं कि वह अमेरिका में सबसे कम उम्र का जनरल  बना । आज की माता बच्चे को राम कृष्ण और महावीर बनाना पसंद नहीं करती उसे धर्म के संस्कार नहीं देती । तुम कुछ भी करो बच्चे को धर्म के संस्कार दो जैसे नरेन्द्र की मां ने धर्म के संस्कार प्रदान किए थे । एक बार नरेन्द्र के घर कुछ मेहमान आए और उन्होंने उसे पूछा कि तुम क्या बनोगे । कलकत्ता में घोड़ा गाड़ी चलती थी तो बालक नंे कहा मैं घोड़ा गाड़ी चालक बनूंगा ।  ऐसा सुनने पर माँ क्रोधित नहीं हुई उसे पूजा घर में ले गई जहाँ पर भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन का रथ हांक रहे ऐसा चित्र दिखाया और उसे शिक्षा प्रदान की कि तुम्हें घोड़ा गाड़ी चालक बनना है तो कृष्ण की भांति बनना । कहते हैं मां के संस्कार ही उसे स्वामी विवेकानंद बना गए । ये छोटी-2 बातें ही जीवन निर्माण में बहुत सहयोगी हैं ।

कठोर तपस्या है बच्चे को संस्कारित करना
जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेर कोटला 20 अगस्त  जैन धर्म दिवाकर, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर,  आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- ऊँचाई पर चढ़ना कठिन है पर उससे अधिक कठिन है उस पर बने रहना । बच्चे को जन्म देना एक तपस्या है परन्तु उससे भी कठोर तपस्या है उसे संस्कारित करना । बचपन जीवन का महŸवपूर्ण अंग है । बचपन में बच्चा हमें देखकर सीखता है जैसा हम आचरण करते हैं वैसा ही बच्चा करता है इसीलिए हमारा आचरण धर्मयुक्त हो जिसमें कोई विकृति ना हो । बचपन में हम बच्चों को आदेश देते हैं कि बच्चों झूंठ नहीं बोलना चाहिए । बच्चों को आदेश देने से पूर्व जरा अपने भीतर झांकिए कि क्या हम उस प्रतिज्ञा का पालन कर रहे हैं । अगर हमारे आचरण में वह प्रतिज्ञा है तो बच्चे पर उसका पूर्ण असर होगा ।

बच्चे को संस्कारित करने में माँ का अधिक हाथ है । एक बच्चा रसोईघर में जूता लेकर जाता था ओर खाना भी ढंग से नहीं खाता था ऐसे समय में माँ ने बच्चे को कहने से पूर्व स्वयं उसका आचरण किया और फिर बच्चा भी वैसा करने लगा । हमारे घर में अशांति का कारण है पाश्चात्य संस्कृति का आचरण । पहले घर की रसोई कच्ची होती थी जहां नीचे बैठकर खाना खाया जाता था अब रसोई भी स्टेंडिंग हो गई और खाना भी स्टेंडिंग । आपका रसोईघर, बेडरुम और जहाँ पर धर्म आराधना करते हैं वह कमरा शुद्ध होना चाहिए इससे पूरे घर में शांति का वातावरण होगा ।

आज जो बच्चा है वह कल का भविष्य है कल वह घर का मालिक बनने वाला है इसीलिए बच्चे को सम्यक् शिक्षा दे । शिक्षा सम्यक् ही होती है । आजकल स्कूल कोई बच्चा जाना नहीं चाहता और छुट्टी हर बच्चे को प्रिय होती है इसका मतलब है कि बच्चे तनाव में शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं वह शिक्षा मन से नहीं ग्रहण कर रहे हैं उन्हें शिक्षा थौंपी जा रही है । शिक्षा में आनंद, सत्य और प्रेम होना चाहिए । जिन्दगी का लक्ष्य केवल धन कमाना, परिवार का पालन पोषण करना ही नहीं बच्चे को सुसंस्कारित करना भी होना चाहिए । बचपन का समय अनमोल है इस समय में माता-पिता पूर्ण उपयोग के साथ बच्चे को संस्कारित करें ।

एक राजा के तीन बेटे थे । राजा बूढ़ा हो गया उसे अपना उत्तराधिकारी बनाना था इस हेतु उसने तीनों बेटों की परीक्षा ली । तीनों को एक-एक रुपया दिया और कहा कि इस एक रुपये से बड़ा कक्ष भर दो । जो बड़े कक्ष को भर देगा वह राज्य का मालिक होगा । तीनों रुपया लेकर बाजार गए । एक ने देखा आज पिता की बुद्धि को क्या हुआ है एक रुपये से कहीं कमरा भरा जाता है । सामने कूड़े की गाड़ी नजर आई एक रुपया गाड़ी वाले को दे सारा रुपया कक्ष में डलवा दिया । दूसरे ने एक रुपये से अपना कक्ष सूखी घास से भर दिया दिया । तीसरा समझदार था उसने जाना कि जरुर बात में कोई रहस्य होगा उसने एक दीया, अगरबत्ती और सारंगी से कक्ष को भर दिया । कक्ष में प्रकाश सुगंधि और संगीत था । यह कहानी एक रुपक है हमारे भीतर प्रेम का प्रकाश आए । सत्य की सुगंध आए और आनंद का संगीत बजे । जब ऐसा होगा तब बच्चे को सम्यक् शिक्षा स्वतः मिल जाएगी और वह बच्चा प्रेम, सत्य और आनंद से भर जाएगा ।

शिक्षा वही जो हर परिस्थिति में सुख निकाले
जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेर कोटला 21 अगस्त  जैन धर्म दिवाकर, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर,  आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- मानव जीवन का सार दो पंक्तियों में है- ये झूठा तेरा मेरा है, तू प्रभु का है प्रभु तेरा   है ।
प्रभु बोलत ही तर जाएगा, मत भूल मनुष पछताएगा

संसार में धन, पद, यश केवल श्वांस तक है । ये सब कुछ तेरा मेरा झूठा है । सत्य केवल एक ही है कि मैं प्रभु का हूं और प्रभु मेरे हैं । श्वांस टूटेगी सब बिखर जाएगा इसीलिए जब तक श्वासें हैं तब तक प्रभु नाम स्मरण से ही मुक्ति होगी । मानव जीवन का सार इसी में है कि ये आत्मा परमात्मा बने । जो दिखाई दे रहा है वो धोखा है और जो सत्य है वह दिखाई नहीं देता । सारा जीवन व्यतीत हो रहा है जिसे तुम अपना समझ रहे हो वो रेत की दीवार है जो किसी भी समय ढह सकती है । रेत की दीवार ढह जाए इससे पूर्व जीवन में प्रेम का प्रकाश, सत्य की सुगंध और आनंद का संगीत उतार लो जीवन सफल हो जाएगा ।

शांति, आनंद, सुख, समृद्धि हमारे भीतर ही है । एक संत किसी गाँव में गए । फक्कड़ संत थे । कुछ युवकों ने संत को देखा और घर में फटे पुराने जितने जूते पड़े थे उनकी एक माला बनाकर उस संत के गले में डाल दी । माला पहनाने के बाद युवक हसने लगे और संत नाचने लगा । युवक हैरान हुए संत कहता है जूतों को तुम देखो मैं तो माला को देख रहा हूँ । अगर ऐसा भाव हमारे भीतर आ जाए तो हमें दुःख में भी सुख की प्राप्ति होगी । दुःख सबको आते हैं । दुःख आते ही हमारी दृष्टि सम हो जाए तो वह दुःख सुख में परिवर्तित होगा । दुःख राम को आए चैदह वर्ष का वनवास झेलना पड़ा । अभी कृष्ण का जन्म नहीं हुआ और सिर पर नंगी तलवार लटक रही थी । कृष्ण की द्वारिका को आग लग गई । वो वहाँ से बाहर निकले पर अपनी द्वारिका नगरी को बचा नहीं पाए यह कोई कम दुःख नहीं   था । राजा हरिशचन्द्र को सत्यवादिता के कारण अपना राज्य देना पड़ा और एक चांडाल के घर नौकरी करनी पड़ी । प्रभु महावीर को देव दानव और त्रियंच के द्वारा अनेक उपसर्ग सहने पड़े । उन्होंने दुःख में सुखी कैसे होना यह कला सीख ली थी ।

शिक्षा वही जो हर परिस्थिति में सुख निकाले । शिक्षा वह नहीं है जो एक स्कूल, काॅलेज में मिलती है । पुराने समय में गुरुकुल हुआ करते थे जहाँ पर गुरु के आश्रम में ऊँच नीच मध्यम कुल के बच्चे एक साथ विद्याध्ययन करते थे । सुदामा और श्रीकृष्ण ने संदीपनी ऋषि के आश्रम में शिक्षा प्राप्त की । भगवान राम ने गुरु वशिष्ट से गुरुकुल से ही शिक्षा प्राप्त की और मर्यादा पुरुषोंŸाम कहलाए । बच्चे का भविष्य तुम्हारे हाथ में है उसे हर परिस्थिति में रहना सिखाओ । कभी वो हट से रोए तो उसे रोने दो उसका हठ पुरा ना करो इससे उसकी क्षमता बढ़ेगी । कभी भूखे रहने और बेस्वाद भोजन करने की भी आदत   लगाओ । कभी नंगे पैर चलने की भी आदत लगाओ जिससे आपके बच्चे को एकसी आदत नहीं लगेगी और वह हर परिस्थिति में सुख से रह पाएगा । निर्णय आपके हाथ में है कि अपने बच्चे का विकास हम कैसे करें ?

आचार्य श्री शिवमुनि जी महाराज के सान्निध्य में
शरीर संतुलन शिविर का भव्य आयोजन

मालेर कोटला 21 अगस्त, 2008 एस0एस0 जैन सभा, मोती बाजार, मालेर कोटला में आज गुजरात से पहुचे डाॅ0 धर्मेन्द्र भाई कनोजिया ने जैन सभा के भव्य प्रांगण में आचार्य श्री शिवमुनि जी महाराज के सान्निध्य में शरीर संतुलन शिविर का आयोजन प्रारंभ हुआ । मंत्री मुनि श्री शिरीष मुनि जी महाराज ने डाॅ0 कनोजिया का परिचय और उनके द्वारा किए कार्यों का परिचय दिया । डाॅ0 धर्मेन्द्र भाई कनोजिया ने आचार्यश्रीजी का आभार प्रकट करते हुए अपने भाषण में कहा कि शरीर की सारी विकृतियां शरीर के असंतुलन के कारण है । हम लोग ना तो ठीक सोने के तरीके जानते हैं ना बैठने के तरीके जानते हैं और ना ही खड़े होने के तरीके जानते हैं । यह असंतुलन ही सभी बीमारियों को निमंत्रण देता है । यह शिविर दिनांक 21 से 24 अगस्त तक जैन सभा, मोती बाजार, मालेर कोटला में प्रारंभ हो चुका है । इस शिविर में भाग लेने के लिए पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, जम्मू कश्मीर, दिल्ली आदि क्षेत्रों से शिविरार्थी पहुंचे हैं । डाॅ0 धर्मेन्द्र भाई कनोजिया का सम्मान जैन सभा के प्रधान श्री रतनलाल जैन एवं महामंत्री श्री सुदर्शन कुमार जैन ने किया ।

शिक्षा वही वास्तविक है जो आनंद और समृद्धि का जीवन प्रदान करें
जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेर कोटला 22 अगस्त {         } जैन धर्म दिवाकर, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर,  आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- आज की शिक्षा प्रणाली महत्वकांक्षा सिखाती है । एक विद्यार्थी दूसरे विद्यार्थी से आगे बढ़े इस प्रकार के भाव प्रकट करवाती है परन्तु इस प्रकार की शिक्षा प्रणाली विद्यार्थियों को अशांतिपूर्वक जीवन व्यतीत करने को मजबूर करती है । शिक्षा वही वास्तविक है जो आनंद और समृद्धि को जीवन में उजागर करती है ।

एक शिष्य का गुरु के प्रति समर्पण-भाव आ जाने के पश्चात् जीवन में मानव सही दिशा की ओर प्रगति के पथ पर प्रशस्त होता है । भारत की संस्कृति कहती है गुरु के प्रति शिष्य विनम्र बनकर रहे । श्रमण भगवान महावीर ने अपनी अन्तिम देशना उŸाराध्ययन-सूत्र के प्रथम अध्ययन में विनय की महिमा और महŸव का वर्णन बहुत सुन्दर ढंग से किया है । भगवान महावीर ने फरमाया है कि- विनयवान और अभिनयवान के क्या लक्षण है ? विनयवान अपनी विनय से कैसे अपने जीवन का चरम लक्ष्य प्राप्त करता है और अभिनयवान किस प्रकार अभिनय के कारण शिक्षा से वंचित तो रहता ही है साथ में अपने जीवन में मिथ्यात्व को भी प्राप्त करता है । शिष्य का गुरु के प्रति समर्पित रहना ही इस अध्ययन का सार है ।

आज के बच्चे छोटी-छोटी बातों से प्रभावित होकर जीवन को बर्बाद करते हैं । बच्चों को ऐसे संस्कार दो ताकि उनका जीवन क्रोध रहित हो जाए । उन्हीं उस प्रकार की नैतिक कहानियाँ सुनाओं जिससे वे प्रेरणा ले सकें । जैन धर्म में के आगमों में कहानियों का महान् संग्रह है । हमें बालकों को ऐसी कहानियां सुनानी चाहिए जो जीवन की धारा बदल दे । शिक्षा से पूर्व पारिवारिक शिक्षा महत्वपूर्ण है । माता पिता को इसका बोध नहीं है उसका बोध आ जाए तो बच्चों का जीवन निर्माण उचित ढंग से हो सकता है । प्रभु महावीर ने क्रोध को जीतने के लिए शांति का मार्ग प्रदान किया है । महापुरुषों की कहानियां सुनाने से बच्चे बात को रुचिकर ढंग से सुनते हैं और शिक्षा को भी सुन्दर ढंग से ग्रहण करते हैं ।

बच्चे तनावरहित होकर शिक्षा ग्रहण करें उसके लिए जरुरी है कि बच्चों को कुछ समय के लिए प्रार्थना, ध्यान में लगाया जाए और उन्हें संतों के दर्शनों के माध्यम से भी नैतिक बनाया जा सकता है । कई बार बच्चे अपने माता पिता की बात ना मानकर गुरुजनों की बात को सहजता से स्वीकार कर लेते हैं । बच्चों की सरलता निर्दोषता की सुरक्षा अभिभावकों का मुख्य कर्Ÿाव्य है । बच्चे को वातावरण ऐसा दो कि बच्चा आत्म-विकास में सहायक हो । उनकी रुचि, योग्यता प्रगट हो जिससे भविष्य में उनके व्यक्तित्व को चार चाँद लगे । बच्चों को सात्विक भोजन करने की प्रेरणा दो और अन्तिम केवली जम्बू कुमार, अतिमुक्त कुमार आदि की कहानियाँ सुनाकर उन्हें नैतिक जीवन जीवन की प्रेरणा दो । इन सभी बातों का ध्यान रखने से शिक्षा आनंददायक हो सकती है और बच्चे का व्यक्तित्व और देश का विकास ऐसी शिक्षा से ही हो सकता है ।

आधुनिक शिक्षा प्रणाली विकृत व नैतिकता से दूर है
जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेर कोटला 23 अगस्त  जैन धर्म दिवाकर, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर,  आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- जीवन ताश के पŸो की भांति है । ताश खेलते समय खिलाड़ियों को पŸाो का पता नहीं चलता वैसे ही जन्म का भी हमें पता नहीं । जाति का भी हमें पता नहीं है । कौन माता पिता होंगे इसका भी पता नहीं पर जीवन की प्राप्ति के बाद उसे कुशल व्यक्ति ही आनंद से जीता है अकुशल व्यक्ति दुःख से जीता  है ।

आज की शिक्षा प्रणाली बड़ी विकृत है । प्राचीन समय में गुरुकुल प्राणाली का वर्णन मिलता है इसमें छोटी आयु में ही बच्चा गुरु के सान्निध्य में रहकर हर प्रकार की शिक्षा का अध्ययन ही नहीं करता बल्कि उसका जीवन संस्कारित भी होता था । वह संसार से एक तरह से कटा होता था । गुरुकुल का जीवन अपना ही महŸवपूर्ण जीवन था । ज्ञाता धर्मकथांग सूत्र में गुरुकुल के अध्यक्ष के लिए कुलाचार्य का उल्लेख आया है । मगध सम्राट् राजा श्रेणिक का पुत्र मेघ कुमार गुरुकुल में भगवान ऋषभदेव द्वारा परणित 72 कलाएं सीखने कुलाचार्य के पास जाता है । प्राचीन गुरुकुल व्यवस्था ऐसी थी कि उसमें शस्त्र विद्या और शास्त्र विद्या दोनों का समावेश था । यह जीवन की कला थी । किसी भी शिष्य को यह अधिकार नहीं था कि वह गुरु की शिकायत लेकर राजा के पास जाए । राजा ऐसी शिकायत सुनता भी नहीं  था । कोई गलती से व्यक्ति ऐसी शिकायत लेकर आ भी जाता था तो उसे राजदरबार से वापिस होना पड़ता था ।

हमारे मस्तिष्क के दो भाग है । पहला है दाया भाग एवं दूसरा है बाया भाग । आज की शिक्षा प्रणाली में जो सिखाया जाता है उसमें बाया भाग ज्यादा सक्रिय रहता है । बाये भाग का कार्य तर्क, भौतिकता व वितर्क होता है । दाया भाग के निष्क्र्रिय होने की वजह से अशांति में वृद्धि होती  है । आज की शिक्षा एक अर्थ में आधा विकास की शिक्षा है । जब तक मष्तिस्क के दोनों भाग विकसित ना हो तब तक शिक्षा का उद्देश्य सम्पूर्ण नहीं हो पाता ।

हमें अपने बच्चों को नैतिक बनाने के लिए साधु संतों के दर्शनार्थ लाना चाहिए । जो बच्चा कोई बात घर में नहीं समझता है साधु के कहने पर वह शीघ्र ही समझ लेता है । जैन आगमों में अनेकों कथाएं हैं जो बच्चे को नैतिक शिक्षा प्रदान करती हैं । पर्युषण पर्व में पढ़े जाने वाले अन्तकृतदशांग सूत्र में अतिमुक्त कुमार की एक मर्मस्पर्शी कथा का वर्णन मिलता  है । अतिमुक्त कुमार बचपन से ही धर्म के संस्कार में रंगा हुआ था । एक बा रवह अपने सार्थियों के साथ महल के उपवन में सोने की गेंद से खेल रहा था । अचानक ही उसने भगवान महावीर के प्रधान शिष्य इन्द्रभूति गौतम को देखा तो वह खेल छोड़कर उनके साथ हो लिया और उनके आने का उद्देश्य पूछा फिर उसने चैदह हजार साधुओं के प्रमुख इन्द्रभूति गौतम की अंगुली पकड़ ली और उन्हें घर ले गया उस समय अतिमुक्त कुमार की आयु मात्र 9 वर्ष थी । माता ने इन्द्रभूति गौतम के पधारने पर उनका स्वागत किया और उन्हें भिक्षा देकर विदा किया । अतिमुक्त कुमार ने गौतम से उनके गुरु का नाम पूछा और उनके दर्शन करने की इच्छा व्यक्त की । अतिमुक्त कुमार भगवान महावीर के समवसरण के पहले उपदेश से प्रभावित होकर दीक्षित हो गए और छोटी सी आयु में ही केवलज्ञान प्राप्त करके मोक्षरुपी लक्ष्मी के स्वामी हुए । तो इस प्रकार अभय कुमार आदि की कहानियां ऐसी है जिन्हें सुनने से बाल-बुद्धि विकसित होती है । हमें ये कहानियाँ गुरुओं के माध्यम से या स्वयं खाली समय में सुनानी चाहिए ताकि बच्चों में नैतिकता के संस्कार पनपें और दिमाग पर जो बोझ आधुनिक शिक्षा ने डाल रखा है उसका प्रभाव कुछ कम हो । आज का विद्यार्थी स्कूल के बाद ट्यूशन पर चला जाता है और उसका सारा समय स्कूली शिक्षा में समाप्त हो जाता है, उसे धर्म आदि व समाज के क्षेत्र से जुड़ने का समय ही नहीं मिल पाता है । आज की शिक्षा प्रणाली  ऐसी होनी चाहिए जिससे व्यक्ति धर्म व समाज से जुड़े और उसकी सेवा करें ।

कृष्ण का जीवन फूलों का गुलदस्ता है
जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेर कोटला 24 अगस्त  जैन धर्म दिवाकर, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर,  आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- आज का यह पावन दिवस श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के नाम से पूरे देश में ही नहीं विश्व में जन्मोत्सव रुप में मनाया जा रहा है । कृष्ण के नाम के साथ अष्टमी हमेशा के लिए अमर हो गई । प्रभु महावीर के जन्म से त्रयोदशी, राम के जन्म से नवमी और बुद्ध के जन्म से पूर्णिमा जिस प्रकार अमर हुई थी उसी प्रकार अष्टमी कृष्ण के जन्म से अमर हुई । कुछ तिथियां महापुरुषों के नाम से अंकित  हो जाती है । हजारों वर्ष हो गए श्रीकृष्ण को हुए परन्तु आज भी कृष्ण जन्माष्टमी पर अनेक संकीर्तन एवं शोभा-यात्रा आदि प्रसंगों के साथ जन्मोत्सव पूरे विश्व में हर्ष और उल्लास के साथ मनाया जाता  है ।

श्रीकृष्ण का बाल सुलभ चेहरा, उनकी बाल क्रियाएं, उनका मदमस्त जीवन सबको तरोताजगी का संदेश देता है । श्रीकृष्ण कर्मयोगी थे । उन्होंने गीता का नवनीत प्रदान कर हर जीव को आत्म-दृष्टि की बात कही । अर्जुन युद्ध नहीं करना चाहते थे । युद्ध के मैदान में चारों ओर जब संबंधी दिखाई देने लगे तब उनके भीतर विचार आया कि मैं कैसे बाण उठाउं तब श्रीकृष्ण ने संदेश दिया तुम ज्ञाता बन जाओ । तुम होते कौन हो मारने वाले तुम दृष्टा हो । यह शरीर नाशवान है आत्मा अमर है । श्रीकृष्ण का अमर संदेश है । उन्होंने श्रीमद् भगवद् गीता में आत्मा से आत्मा के उद्धार की बात कही । कर्ताभाव छोड़ने की और साक्षीभाव में स्थित होने की साधना उन्होंने जन-मानस को प्रदान की ।

कृष्ण का जीवन फूलों का गुलदस्ता है । उनके जीवन को जहां से झांको वहीं पर कर्मज्ञान और भक्ति का त्रिवेणी संगम प्राप्त होता है । उनका प्रेरणादायी व्यक्तित्व हमेशा प्रेरणा प्रदान करता रहता है । कितनी प्रतिकूल परिस्थितियां थी जन्म से पहले ही मृत्यु की घोषण हो गई । अंधेरी कोठड़ी में जन्म लिया । माता पिता के हाथों पावों में बेड़ियां थी पहरेदार नंगी तलवार लिए हुए   थे । जब श्रीकृष्ण का जन्म हुआ तब सबको नींद आ गई वसुदेव के बंधन टूट गए और वो अपने बालक को यमुनापार गौकुल में पहुंचा आए । यमुना ने भी परीक्षा ली कहते हैं- कृष्ण के अंगुष्ट का स्पर्श करते ही यमुना ने रास्ता दिया । कृष्ण की जन्म की मां देवकी थी परनतु पले यशोदा के  हाथों । उन्होंने अंधकार में प्रकाश की किरण प्रदान की । प्रतिकूलता में संघर्ष करना सीखा । एक दार्शनिक ने भी कहा है कि जीवन एक ज्ञान का प्याला है तुम इसे अन्तिम घूंट तक पीते रहना ।

कृष्ण ने देवराज इन्द्र को भी चुनौती दी जहां हजारों मन दूध यमुना में बहाया जाता था वहंीं पर जनमानस को गौवर्धन पूजा की प्रेरणा दी और कहा कि जिसके लिए तुम हजारों मन दूध बहाते हो वह वर्षा नहीं देता अगर तुम गौवर्धन की रक्षा करोगे तो वह तुम्हें औषधियां और गायों के चरने के लिए घास प्रदान करेगा । कृष्ण अर्जुन के सारथी भी बने । कृष्ण की मित्रता भी जगत विख्यात है । जब सुदामा फटे हाल कृष्ण से मिलने जाते हैं और पहरेदारों के द्वारा उसे रोका जाता है तब श्रीकृष्ण अपने गवाक्ष से वह सारा दृश्य देखते हैं और पहरेदारों को कहते हैं कि इन्हें अन्दर आने दो  सुदामा को गले लगाकर अश्रुओं से ही पाद-प्रक्षालन करते हैं । उनका अनूठा प्यार था ऐसी मित्रता हम कृष्ण से सीखें । कृष्ण के जीवन से आज हम यह शिक्षा प्राप्त करें अपने जीवन से बुराई को छोड़ दे । आज अकेले नहीं बांटकर खाएं । सेवा-यज्ञ में यथाशक्ति सहयोग दें । श्रीकृष्ण ने अपने जीवन में गायों की सेवा की । हम भी आज गौसेवा का ध्यान रखते हुए मूकप्राणियों की सेवा करें ।

क्रोध प्रीती का नाश करता है
जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेर कोटला 25 अगस्त जैन धर्म दिवाकर, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर,  आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- यह विचारणीय विषय है कि बच्चों का भविष्य कैसा हो ? बच्चों को अक्षरज्ञान देने से पूर्व जीवन का ज्ञान देना परम आवश्यक है । जीवन में सुख दुःख बसंत पतझड़ आता है । हर हाल में बच्चे कैसे मुस्कुराते रहें यह सोच का विषय है । कई बार बिजली जाने से या हवा कम होने से बच्चे गर्मी महसूस करते हैं । उस गर्मी के क्षण में वह आनंद का झौंका जो उन्हें ठण्डक प्रदान करे ये भी शोध का विषय है । हमें हर अंधकार में प्रकाश को ढूंढ़ना चाहिए । अक्सर बच्चे बात-बात पर क्रोधित हो जाते हैं । क्रोध विनय आदि सभी गुणों को नष्ट करने वाला  है । श्रमण भगवान महावीर ने क्रोध को प्रीती का नाश करने वाला बताया है । शास्त्रों में ऐसा उल्लेख है कि एक व्यक्ति अगर क्रोध को शीघ्रता से नहीं छोड़ता और उसकी गांठ बांधे रखता है तो उसका सम्यक् दर्शन तक नष्ट हो जाता है और वह धर्मविहीन हो जाता है ।

क्रोध क्षणिक पागलपन है उसमें व्यक्ति को कोई होश नहीं रहता । क्रोध में व्यक्ति को पशुपन सवार हो जाता है । मात्र 10 मिनिट के क्रोध में व्यक्ति क्या से क्या कर डालता है उसका भान उसे स्वयं में नहीं रहता । शेक्सपीयर ने करुणा को बहुत महŸव दिया है । जो करुणा बहाता है और लेता है क्रोध आने पर सभी को क्षमा करता है वह सचमुच महान् व्यक्ति है । अगर आप अपने बच्चों को क्रोध से मुक्त रखो तो वह जीवन मंे हर प्रकार के सुख दुःख झेलने की क्षमता भी रखेंगे । उनमें विवेक आएगा, विवेक से बुद्धि का विकास होगा ।

करुणा के बाद जीवन में आपसी प्रेम का बहुत महत्व है । बच्चों को मिल जुलकर रहने की शिक्षा देना जरुरी है । प्रेम मन की विशुद्ध अवस्था का नाम है । जहाँ स्वार्थ नहीं, किसी किस्म का अहंकार नहीं वहाँ प्रेम स्वयं घटित होता है । ये बात जानने की है कि प्रेम और राग में बहुत अन्तर है । प्रेम जहाँ करुणा को जन्म देता है वहाँ राग को भगवान महावीर ने कर्म का बीज कहा है । कर्मबंधन में राग व द्वेष दोनों ही बीज माने गए हैं । प्रेम की सुगंध से भीतर में आनंद का झरना बहे यही जीवन का लक्ष्य होना चाहिए । जीवन में सब कुछ क्षण भंगुर है । श्वांस का कोई भरोसा नहीं ।

हमें परिवार में इकट्ठे बैठकर भोजन व भजन करने की आदत डालनी चाहिए इससे परस्पर भोजन करने से सभी प्रकार का मैल दूर हो जाता है और किसी प्रकार का झगड़ा भी हो तो भोजन की टेबल पर इकट्ठे बैठने से शान्त हो जाता है । प्राचीनकाल में इकट्ठे भोजन व भजन करने की परम्परा भारतीय संस्कृति का अंग रही है । माँ की गोदी ही बच्चे के लिए संस्कार का प्रथम विद्यालय है इसीलिए माता पिता का प्रथम कर्Ÿाव्य है कि बच्चों को धर्म के संस्कार के लिए गुरुजनों के पास भेजें और स्वयं बच्चों को लेकर गुरुजनों के पास आएं तो उनके जीवन की शुरुआत में संस्कार पल्लवित होंगे ।

वीतराग धर्म प्रेम में जीना सिखाता है
जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेर कोटला 26 अगस्त जैन धर्म दिवाकर, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर,  आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- जो भी हम चाहते हैं उसका परिणाम हमें धीरे-2 प्राप्त होता है । कहा भी है-
माली सींचे सौ घड़ा, ऋतु आए फल होए ।

कोई भी कार्य हम करें उसका फल समयानुसार ही प्राप्त होता है । शिला पर धीरे-2 पानी गिरता है तो उसमें भी छेद हो जाता है । हम निराश ना हो, फल की इच्छा ना करें । हर कार्य का एक समय होता है । धीरे-2 चलने पर मंजिल हमेशा प्राप्त होती है । बच्चों को यही शिक्षा दें कि हर कार्य का समय होता है ओर समयानुसार ही उसका फल हमें प्राप्त होता है । बच्चों के भीतर प्रेम की सुगंध, सत्य की ज्योति और आनंद का झरना प्रवाहित करें । कोई भी कार्य करना हो उसे प्रेमपूर्वक करें । प्रेम बिना जीवन सुन्दर नहीं हो सकता । प्रेम में रुखा भोजन भी स्वादिष्ट प्रतीत होता है ।

वर्तमान में ऐसा देखने में आता है कि प्रेम लुप्त होता जा रहा है और मोह की जागृति हो रही है । प्रेम और मोह में बहुत अन्तर है । एक मां का बेटा और नौकर दोनों में जो अन्तर है वो ही अन्तर प्रेम और मोह में है । मां का बेटे पर मोह होता है प्रेम सब पर एक समान होता है । मोह किसी एक पर होता है । प्रेम में बटवारा नहीं है, मोह में बटवारा है । मोह में व्यक्ति की दृष्टि संकुचित होती है । क्रोध, लोभ, मोह, वासना अंधापन मोह में आ जाता है । प्रेम में कोई परदा नही है । मोह में परदा होता है ।

मोहनदास करमचंद गांधी बचपन में अपने पिता के पास बैठे पांव दबा रहे थे । अचानक उनकी आंख से आंसू गिरे और वो अपने पिता से कहने लगे पिताजी ! मैंने आपकी जेब से पैसे चुराए, चोरी की, बीड़ी पी तथा मांस भी खाया । पिता ने बच्चे को डांटा नहीं उसे प्रेमपूर्वक समझाया । चोरी के बदले दान देने के लिए कहा । जिस मुख से बीड़ी पी उसी मुख से सभी बच्चों को मिठाई खिलाने के लिए कहा और जीवन भर शाकाहारी रहने की प्रतिज्ञा दी । इसी प्रतिज्ञा के बल पर उनकी मां पुतली बाई ने जैन मुनि से उन्हें आशीर्वाद दिलाया उसी की बदौलत वो महात्मा बने । उनकी पत्नी थी, बच्चे थे फिर भी उनका प्रेम देशवासियों के प्रति था ।

प्रेम सब पर एक समान किया जाता है । प्रेम फैलता है, मोह सिकुड़ता है । प्रेम कोई संबंध नहीं, प्रेम चित्त की दशा है, हृदय की पुकार है । आज परिवार, समाज, धर्म बट रहा है तो केवल मोह के कारण । हम मोह के स्थान पर प्रेम का आचरण करें । संकीर्णता से बाहर निकले । पैसा, बंगला साथ नहीं जाएगा साथ जाएगा आपका प्रेम । प्रेम जीवन में आ गया तो संसार अपना होगा । वीतराग धर्म हमें प्रेममय जीवन सिखाता है । प्रेम देते चलो आनंद शांति भीतर आती चली जाएगी । प्रेम से व्यक्ति सर्वस्व प्राप्त कर लेता है । हम सभी मोह को त्यागकर प्रेम की ओर अग्रसर हों ।
 
बच्चों को दे प्रेममय जीवन जीने की शिक्षा
एस0डी0एम0 साहब ने आचार्यश्रीजी के दर्शन किए
जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेर कोटला 27 अगस्त  जैन धर्म दिवाकर, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर,  आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- हमें मानव का जीवन मिला । जीवन जीने के सभी साधन मिले । जीवन को किस कला से जीयें कि जीवन आनंददायक हो । दो व्यक्ति गन्ना चूस रहे थे । पहले ने गन्ना चूसकर सार ग्रहण किया और निस्सार को वहीं छोड़ दिया । दूसरे ने निस्सार से एक पंखा बनाया और गर्मी से राहत पाई । हमारा जीवन भी ऐसा ही हो । हम निस्सार से सार को ग्रहण करें । विद्या वही होती है जो बंधनमुक्त हो । शिक्षा वह है जो हमारे हृदय के पात्र को भर दे । जो हमें आनंद और भीतर का ज्ञान प्रदान करें । सच्चा खजाना है हमारी शुद्धात्मा और इसके साथ की गई प्रार्थना ध्यान और सामायिक ।

वीतरागवाणी कहती है शिकायत ना करो । तुम किसी को बदल नहीं सकते । अनेकों प्रयत्न करने पर भी हर माँ अपने बालक को प्रथम नम्बर में उत्तीर्ण नहीं कर सकती । स्कूल में एक ही बच्चे को प्रथम आना है । बच्चा प्रथम आने के भान में सत्य, आनंद, सुख सब कुछ भूल जाता है । माँ और बच्चे को एक ही धुन होती है कि मैं प्रथम आऊँ । हम यह कर सकते हैं कि बच्चे की जिसमें रुचि हो उसमें उसे आगे बढ़ाएं । आज की शिक्षा थौंपी जाती  है । पुराने समय में शिक्षा स्वेच्छा से ग्रहण की जाती थी । हम अपने बच्चों को प्रेम की शिक्षा दें । बच्चे की गलतियों को प्रेम से सुधारें । जो बच्चा अपनी पुस्तकों का, अपने कपड़ों का, अपने जूतों का आदर नहीं करता उसे उनका आदर करना सिखाएं ।

एक बहुत बड़ा दार्शनिक पहाड़ पर संत दर्शनार्थ गया । वहाँ जाकर उसने दरवाजे को जोर से खोला । जूतों को जोर से पटककर एक ओर रख दिया और फिर संत से ज्ञान की प्रार्थना की । संत ने कहा- पहले दरवाजे और जूते से क्षमायाचना करो फिर ज्ञान की दीक्षा लेना । जब क्षमा मांगी गई तब उसके भीतर सरलता, समता, सहृदयता आई और वह ज्ञान का अधिकारी हो गया । अपने बच्चों को क्षमा मांगना सिखाओं । सजीव निर्जीव दोनों प्रकार की वस्तुओं से प्रेम करना सिखाओं । बच्चे अपने माता पिता को प्रणाम करें । घर के नौकर के साथ अच्छा व्यवहार  करें । प्रेममय व्यवहार से ही हृदय विशाल बनता है । बचपन की शिक्षा प्रणाली सुन्दर होगी तो पचपन तक वह शिक्षा साथ देगी ।

आज के इस अवसर पर मालेर कोटला के एस0डी0एम0 ने आचार्यश्रीजी के दर्शन लाभ प्राप्त कर जिनवाणी का श्रवण किया । आचार्यश्रीजी ने एस0डी0एम0 साहब से पर्वाधिराज के पावन अवसर पर मूक प्राणियों की हत्या पर रोक लगाने के लिए कहा । इस अवसर पर एस0डी0एम0 ने कहा कि मैं भाग्यशाली हूं कि मुझे आपके दर्शनों का सौभाग्य प्राप्त हुआ । सभी धर्मों में अच्छे कार्यों को सराहा जाता है । आपने जो मेरी ड्यूटी लगाई मैं उसे पालन करने का पूरा ध्यान रखूंगा । इस अवसर पर एस0डी0एम0 साहब का स्वागत अभिनन्दन जैन सभा के पदाधिकारियों द्वारा हुआ । आज की धर्म सभा में समाना श्रीसंघ एवं पूना से दर्शनार्थी भाई बहिन उपस्थित हुए ।

महापर्व पर्युषण: विश्व कल्याण का पर्व है
जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेर कोटला 28 अगस्त  जैन धर्म दिवाकर, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर,  आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- पर्वाधिराज पर्युषण का प्रथम दिवस आप सबके लिए मंगलकारी हो । पर्युषण कर्ममल धोने, क्षमा, आत्म आलोचना का महान् पर्व है । वर्ष भर में सात दिवस पर्वाधिराज पर्युषण के एवं आठवें दिवस महापर्व सम्वत्सरी मनाया जाता है । तीर्थंकर भगवंतों से यह परम्परा चली आ रही है । वर्षा के 50 दिन पूर्ण होने पर प्रभु महावीर ने स्वयं पर्वाधिराज पर्युषण की आराधना की । यह पावन दिवस शास्त्र श्रवण, स्वाध्याय एवं अपने जीवन का लेखा जोखा करने के दिवस हैं । व्यक्ति शरीर सुख एवं इन्द्रिय भोग के लिए पुरुषार्थ करता है । इन सात दिनों में धर्म का जो पुरुषार्थ किया जाएगा वह पुरुषार्थ ही सफल होगा । अंतकृतदशांग सूत्र में उन महान् आत्माओं का जीवन है जिन्होंने उसी जन्म में अपने जीवन के लक्ष्य को सिद्ध कर  लिया । श्रद्धा समर्पण से श्रवण किया गया शास्त्र कर्मों की निर्जरा करेगा । वे लोग भाग्यशाली होते हैं जो शास्त्र सुनते हैं तप जप में पुरुषार्थ करते हैं ।

महापर्व एक संदेश लेकर आया है । श्रावक श्राविका अपने कर्तव्य को समझे । आत्म जागरण की प्यास भीतर हो । जैसी लगन अपनी दुकान और फेक्ट्री के लिए होती है वैसी ही लगन धर्म के लिए हो । अपनी आत्म ज्योति को शुद्ध कर लो । भगवान ने कहा- हे निर्मल ज्योति वाले पुरुष तूं पराक्रम कर । धर्म में रस आ जाए तो आनंद ही आनंद है । इस शरीर को कितना भी सुन्दर बना लो । ये केश, नाखुन, दांत जो अधिक सुन्दर लगते हैं वो माटी है और एक दिन माटी में समाने   हैं । अपने शरीर को बिना चमड़ी के आप देख नहीं सकते इसीलिए कहा जाता है कि शरीर का उपयोग धर्म में करो । शरीर जाएगा परन्तु उस शरीर से की गई तपस्या, आलोचना, प्रतिक्रमण, प्रायश्चित, ध्यान साथ जाएगा । आत्मा पर जो कर्म बंधन बढ़ रहा है उसे आत्म-जागरण द्वारा दूर करो । सत्कर्म करने हैं या दुष्कर्म । आंसु बहाने हैं या आनंद प्राप्त करना है । दुःख पाना है या सुख यह सब तुम पर निर्भर करता है । चुनाव तुम्हारा है । एक बार चुनाव हो गया फिर उस चुनाव को भोगना ही होगा । महान् संत दादू कहते हैं-     काहे को दुःख दीजिए, घर-घर आत्मराम ।
            दादू सब संतोसिए, ये साधु का काम ।।
जीवन में संतोष आ जाए तो आनंद का झरना प्रवाहित होता है । प्रकृति में जो कुछ मिला है वह सब अपने कर्मफलानुसार ही मिला है । जो आज कर्म करते हो उससे भविष्य का निर्धारण होता है । जन्म लिया परन्तु तन की ओर अधिक ध्यान दिया, भोजन किया, सोएं सोचो क्या यही जीवन  है । दिन धंधे में व्यतीत किया । तन को भी पाला और पेट को भी पाला ऐसा जीवन तो वृक्ष, पशु-पक्षी, नदी, पत्थर, पहाड़, चन्द्रमा और सूरज भी व्यतीत कर रहे हैं । अपनी जिन्दगी को संवारों, आलस को त्यागों, हर श्वांस हीरे जवाहरात से बढ़कर है, उसका उपयोग करो । शक्ति सबके पास है उसका सदुपयोग करना हमारे हाथ में है । ये सात दिन धर्म के सार हैं । इन सात दिनों में इतना सत्कर्म और धर्म कर लो कि कर्मों की ग्रन्थियां टूटने लग जाए और अपना घर सिद्धालय नजदीक हो जाए ।

महापर्व के पावन दिवसों में प्रातःकाल की मंगल बेला में विश्व शांति हेतु महामंत्र नवकार का अखण्ड जाप प्रारंभ हुआ । श्रीमद् अंतकृतदशांग सूत्र का वांचन एवं प्रवचन प्रातः 8.15 से 10.00 बजे तक, श्रीमद् कल्पसूत्र का वांचन दोपहर 3.00 से 4.00 बजे तक एवं प्रतिदिन प्रतिक्रमण सूर्यास्त के साथ होगा । सभी धर्म कार्यों में अग्रसर होकर जीवन को सफल बनाएं ।   

भेद-ज्ञान से बढ़ती है समता
जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेर कोटला 29 अगस्त जैन धर्म दिवाकर, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर,  आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- महापर्व पर्युषण का दूसरा दिवस आपके जीवन में समता आए, शान्ति आए ये पर्व नहीं पर्वाधिराज है, जीवन के दोषों को दूर करने का अवसर है । जीवन के सत्य को जानने का अवसर है । प्रभु महावीर श्री अन्तकृतदशांग सूत्र के माध्यम से आप सभी सुन रहे हैं उन महान् पुरुषों ने उसी जीवन के सार को पाया । प्रभु का उपदेश प्राणी मात्र के लिए कल्याणकारी है । धर्म वही है जहाँ विनय है ।

प्रभु महावीर फरमाते हैं कि अत्यन्त अनादिकाल में सभी दुःखों से और उनके मूल कारणों से मुक्ति का उपाय जिनवाणी है । प्रभु वाणी सबको मंगल का संदेश देती है । सम्पूर्ण ज्ञान के प्रकाश से, अज्ञान और मोह के परिहार से, राग द्वेष के पूर्ण क्षय से जीव एकान्त सुखरुप मोक्ष को प्राप्त करता है । क्या आपको मोक्ष चाहिए भीतर मुक्ति की जिज्ञासा है । हमारा लक्ष्य संसार का है । यह संसार अनादिकाल से चला आ रहा है । संसार में जो सुख प्रतिभासित होता है वह सुख नहीं एक दुःख की लम्बी कतार है । गणधर गौतम प्रभु महावीर के अंतेवासी शिष्य थे । भगवान के रहते-2 उन्हें मोक्ष ना हो सकता उसमें बाधा थी केवल राग की । गुरु के प्रति उनका मोह उन्हें मुक्ति ना दे सका । भगवान ने उन्हें भी मुक्ति का मार्ग बताया । भेद-ज्ञान की साधना प्रदान की । वो साधना करते थे परन्तु भीतर सूक्ष्म मोह था । कवि बनारसीदास कहते हैं:- भेद ज्ञान साबुन भयो, समता रस भर नीर ।
                        अन्तर धोबी आत्मा, धोवे निज गुण चीर ।।
आप वस्त्र धोते हो साबुन और पानी का इस्तेमाल करते हो । मैल स्वतः धीरे-2 उतर जाती है । भेद-ज्ञान की साबुन समता का पानी धोने वाली आत्मा और धोना भी आत्मा को ही है । भेद-ज्ञान द्वारा आत्मा और शरीर की भिन्नता का अनुभव कर शुद्ध चेतना के चारों ओर लगे हुए कर्मों को धोना । आत्मा को धोने के लिए साबुन और पानी को कहीं से खरीदने की आवश्यकता नहीं । जब भेद-ज्ञान भीतर आएगा तब कर्म स्वतः कटते चले जाएंगे । खाते, पीते, सोते, उठते, बैठते, चलते, फिरते केवल एक ही भाव मैं शरीर नहीं शुद्धात्मा हूं, मैं और मेरा परमात्मा । रिश्ते नाते सब शरीर के हैं । ऐसे भेद-विज्ञान से अनंत कर्मों की निर्जरा होती   है । ज्ञाता द्रष्टा भाव से कर्म बंधन टूटता है । आत्मा के सुख का वर्णन करते हुए कहा गया है कि समस्त देवलोकों का सुख और समस्त चक्रवृतियों के सुख को अगर मिलाया जाए तो भी मुक्ति का सुख उन सब सुख के अनंतवे भाग के बराबर भी नहीं है यानि मोक्ष का सुख अपार है । हम पर्युषण में उस मुक्ति के सुख को प्राप्त करें । अध्यात्म में प्रवेश करें सारी सम्पदा मुक्ति में है । हर कार्य करते हुए परमात्मा का ध्यान रहे । भीतर एक जिज्ञासा और प्यास धर्म को भीतर उतारने की हो । इन पावन दिवसों में अधिकाधिक सामायिक, प्रतिक्रमण, स्वाध्याय, शास्त्र श्रवण दान शील तप भावना में सभी अग्रसर हो यही हार्दिक मंगल कामना ।

सम्यग्दर्शन से मोक्ष निश्चित है
जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

30 अगस्त, 2008: मालेर कोटला: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने ने महापर्व पर्युषण के तीसरे दिन प्रवचन करते हुए फरमाया कि आपके भीतर धर्माराधना का मूल सम्यग्दर्शन आये । वह सम्यग्दर्शन बीज से वृक्ष का रूप धारण करे, यही मेरी हार्दिक भावना । सम्यग्दर्शन अनुभव का दर्शन है । सम्यग्दर्शन से मोक्ष निश्चित है । प्रभु महावीर को नयसार के भव में मुनियों को आहार बहराते हुए सम्यग्दर्शन की प्राप्ति हुई । जो दर्शन से भ्रष्ट हो जाते हैं वे सचमुच भ्रष्ट ही कहे जायेंगे । वीतराग धर्म का आधार सम्यग्दर्शन है । ज्ञान दर्शन चारित्र से मोक्ष की प्राप्ति होती है । कितना ज्ञान होने पर दर्शन नहीं तो ज्ञान अज्ञान बन जाता है । दर्शन एक आंख है । तुम धन, पद, प्रतिष्ठा कमा लो और कहो कि यह मेरे कारण हुआ है तो यह मिथ्यादर्शन है । कर्Ÿााभाव भीतर आये तो कर्म-बंधन होते हैं । मेरा यानि आत्मा का स्वभाव केवल जानना और देखना है । तुम जो धन कमाते हो उसमें सबका हिस्सा है ।

भगवान महावीर के दस श्रावकों के पास करोड़ों की सम्पŸिा थी फिर भी उनकी उसमें आसक्ति नहीं थी । वे मूलधन रखते थे परन्तु ब्याज को दान में लगा देते थे । मुस्लिम संस्कृति में दसवां हिस्सा धर्म के लिए अर्पित किया जाता है । हमारे यहाँ व्रत ग्रहण की परम्परा है । व्रत ग्रहण के बाद किया गया कार्य निर्जरा से परिपूर्ण होगा । हम प्रभु महावीर के श्रावक बनें

एक ओर सम्यग्दर्शन का लाभ और दूसरी ओर तीन लोकों का राज्य मिले तो त्रैलोक्य राज्य को छोड़कर सम्यग्दर्शन अपना लेना । सम्यग्दर्शन आने पर अनेकों परीक्षाएं होती हैं । प्रभु महावीर के समय कामदेव श्रावक की भी परीक्षा हुई । देवता तलवार लेकर आया और बोला कि कह दे कि महावीर का धर्म झूठा है तो तू बच जाएगा अन्यथा तेरी मौत निश्चित है । उस समय कामदेव श्रावक डरे नहीं, परीक्षा में सफल रहे । हम कर्Ÿााभाव को छोड़ दें । कर्Ÿााभाव से मिथ्या-दर्शन की पुष्टि होती है । मुझे अवसर है चातुर्मास में लाभ लेने का, ऐसी भावना रखना । स्वयं को निमिŸा मात्र समझना । सेवा के भाव से निर्जरा होगी । सम्यग्दर्शन पुष्ट होगा । छोटे व्यक्ति से कभी हम घृणा ना करें । शरीर को महŸव ना देते हुए आत्मा को महत्व दें । संसार की सभी आत्माएं समान हैं ऐसी दृष्टि भीतर आ गई तो जीवन सुगंधित बन जाएगा ।

आचार्य ऊमास्वाती ने प्रशमरति ग्रन्थ लिखा है कि एक शिष्य मन्दबुद्धि है । उसे कुछ भी याद नहीं होता । गुरू ने उसे एक मंत्र दिया- मारूषमातु यानि किसी से राग ना करो । किसी से द्वेष ना करो । शिष्य विनीत भाव से मंत्र का जाप करता ह ै। जाप करते हुए वह असली मंत्र को भूल गया और मासतुस कहने लगा । कहते-2 भीतर भाव उठा कि मासतुस यानि उड़द अलग और उसका छिलका अलग । मेरी आत्मा कर्म बन्ध से काली हो गई है । कर्मक्षय से निर्मल होगी । केवल इस मन्त्र का भाव सहित उच्चारण करने से उसे केवल ज्ञान की प्रापित हो गई । श्रद्धा और समर्पण का भाव भीतर रखो । जो कुछ तुम्हारे पास है उसे स्वीकारते चले जाओ । जीवन में सम्यग्दर्शन दृष्टि होने पर कुछ रह नहीं जाता । सम्यग्दर्शन में समता के तराजू पर स्वयं को तौलते रहना । हमारी दृष्टि निर्मल होगी तो हमें कोई दुःख नहीं दे  सकता । हम महापर्व पर चिŸा शुद्धि करें । सम्यग्दर्शन की प्राप्ति हेतु ध्यान शिविरों का लाभ लें ।

सच्ची श्रद्धा जन्म मरण समाप्त कर देती है
जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

31 अगस्त, 2008: मालेर कोटला: जैन धर्म दिवाकर श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि:- महापर्व पयुर्षण का चोथा दिवस आप सबके लिए मंगलकारी हो । आप सबके भीतर प्रभु का दर्शन वपन होकर विश्व में शान्ती फैले । प्रभु महावीर से गणधर गौतम ने पूछा प्रभो ! मैं कौनसा धर्म ग्रन्थ पढूं । संसार के सभी गुरू अपने ग्रन्थ को सर्वश्रेष्ठ मानते हैं । मैं कौनसे गुरू को मानूं । हर धार्मिक व्यक्ति अपने गुरू को श्रेष्ठ मानता है । किस स्थान पर जाकर धर्माराधना करूं क्योंकि सभी स्थान अपने आपमें अच्छे हैं । सभी दुकानदार अपने माल को बढ़िया ही बताते हैं । भगवान ने उत्तर दिया- वे वीतरागी थे सबकुछ जानते थे उन्होंने कहा- गौतम किसी धर्म ग्रन्थ को पढ़ने से पहले किसी गुरू के पास जाने से पहले किसी गुरू को मानने से पहले या किसी स्थान पर आराधना करने से पहले स्वयं के हृदय को टटोल । हृदय स्वच्छ और निर्मल होगा तो सब कुछ अच्छा लगेगा यह है वीतराग भाव दशा। कोई गुरू कहता है मेरी बात मानो तो वह गुरू नहीं हो सकता । जो कहे मेरी क्रिया उंची और उसकी क्रिया नीची तो वह भी गुरू नहीं हो सकता क्योंकि हम सब तीर्थंकरों के बताए हुए मार्ग पर चल रहे हैं और तीर्थंकरों ने कभी स्वयं को ऊँचा-नीचा नहीं    बताया । किसी ग्रन्थ को पढ़ने से पूर्व अपने हृदय को देखो । अपने शरीर को सजाने से पहले हृदय विकारों को दूर करो ।

भगवान महावीर ने इस सूत्र में गहरा विज्ञान भरा है । यह सूत्र साधना का आधार है । ज्ञान से जाना जा सकता है । दर्शन से श्रद्धा उत्पन्न होती है चारित्र से इन्द्रिय निरोध होता है और तप से शुद्धि होती है । प्रभु ने पहले स्वयं अनुभव किया फिर हमें बताया । जब अनुभव होता है तब श्रद्धा पैदा होती   है । जो भगवान महावीर को अनु    भव हुआ वह हमें नहीं हुआ । श्रद्धा कहती है त्याग करो और जीवन भोग की तरफ जा रहा है तो यह कैसे संभव है । आत्म-दर्शन से ज्ञान उत्पन्न होगा । ज्ञान से श्रद्धा होगी । ज्ञान और दर्शन युगपथ है । दोनों का चुनाव करना पड़े तो दोनों को चुनना क्योंकि श्रद्धा मूल्यवान है और ज्ञान श्रद्धा से ही भीतर उतारा जाता है । ज्ञान ना हो , शास्त्र ना पढ़ो तो भी मुक्ति मिल सकती है । मुक्ति के लिए तो केवल श्रद्धा चाहिए । दर्शन के बिना श्रद्धा पंगु है । जीवन भी श्रद्धा से चलता है । श्रद्धा और विश्वास में बहुत बड़ा अन्तर है । जिसको जाना नहीं, देखा नहीं उस पर श्रद्धा की जाती है । माली बीज बोता है और मन में श्रद्धा है कि वृक्ष बनेगा तो वह वृक्ष बनता है ।

माँ को कभी अपने बेटे पर श्रद्धा नहीं होती विश्वास होता    है । जब बेटा गर्भ में होता है तो वह नहीं जानती की वह कैसा है । विश्वास रखती है वह सब ठीक होता है । भरोसा हो तो सब संभव है । विश्वास उधार है और श्रद्धा नगद है । जिस दिन अनुभव होगा कि परमात्मा भीतर है तब श्रद्धा आएगी । अभी तो आप सब मेरी बातों पर विश्वास करते हो एक फूल पूरा भीतर से खिलता है तो वह श्रद्धा है । एक मां गर्भ की पीड़ा से बच्चे को जन्म देती है तो वह श्रद्धा है और गोद लिया हुआ बच्चा विश्वास है । जिस मां ने जन्म दिया है उसने अपना एक अंग समाज को समर्पित किया है । एक मां बच्चे को दूध पिलाती है और एक नर्स दूध पिलाती है इसमें बहुत अन्तर है । मां दूध के साथ जीवन का विज्ञान देती है । तुम मोक्ष के करीब जाओ । एक शबद से व्यक्ति तर जाता है । जब बच्चे का जन्म होता है तब मां का भी जन्म होता है । श्रद्धा है जीवन के अंग-2 का अनुभव । जब श्रद्धा होगी तब जन्म का नहीं जीवन का मूल्य होता   है ।

पर्वाधिराज का आधा हिस्सा बीतने जा रहा है । दान, शील, तप भावना ज्ञान दर्शन चारित्र तप इनको अपनाओ । एक मुट्ठी अन्न की प्रतिदिन दान दो । विश्व के सभी जीवों के प्रति मैत्री का भाव जगाओ । कृतज्ञता का भाव जगाओ । जैसी भावना होगी वैसा सुख मिलेगा और हम मुक्ति के करीब   होंगे ।


शास्त्र श्रवण फिर आचरण तभी जीवन निर्मल बनेगा
जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

1 सितम्बर, 2008: मालेर कोटला: जैन धर्म दिवाकर, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने प्रवचन में फरमाया कि- महापर्व पर्युषण का पांचवा दिवस आत्म जागृति का संदेश लेकर आया है । प्रभु ने कहा- ज्ञान एक ही है । अनंत आत्माओं में एक ही ज्ञान है । पशु पक्षी पौधे पहाड़ मानव नरक देव सभी में एक ही आत्मा है । हम सुन तो लेते हैं पर समझते नहीं । प्रभु ने पहले ज्ञान की बात कही फिर आचरण की बात कही । ज्ञाना अग्नि से सारे कर्म नष्ट हो जाते हैं । जो एक को जानता है वह सबको जानता है । ज्ञान के दस लक्षण है अक्रोध, वैराग्य, जितेन्द्रिय, क्षमा, दया, शान्ति सर्वप्रिय निर्लोभी दाता और भयशोकहर्ता जो ज्ञानी व्यक्ति होगा उसके आगे क्रोध टिकेगा नहीं । उसके जीवन में क्लेश नहीं होगा । आपके जीवन में क्रोध है तो समझना आप ज्ञानी नहीं हो । वैराग्य में संसार की रूचि नहीं होगी तुम इन्द्रियों को जीतोगे ज्ञानी होने का सार है कि वह किसी को दुःख नहीं  देता । मन, वचन, काया से वह सबके लिए मंगल भावना भावित करता है । प्रभु महावीर का ज्ञान किसी विश्वविद्यालय या विद्यापीठ में नहीं मिला । यह कोई वस्तु नहीं जो बाहर से भीतर की ओर आए । ज्ञान तो वह धारा है जो भीतर से बाहर प्रवाहित होती है ।

21 वंीं सदी में हम कम्प्यूटर को बहुत बड़ा साधन मानते हैं यह साधन अवश्य है परन्तु साध्य   नहीं । यह सूचना दे सकता है परन्तु इसमें ज्ञान नहीं, ध्यान भी नहीं । जब केवलज्ञान प्रकट होगा तो चार कर्म क्षय हो जाएंगे । मति, श्रुत, अवधि मनःपर्यव ज्ञान इनका भी कोई मूल्य ना होगा । बीज अंकुरित करने पर पल्ल्व फूटता है तो बीज का कोई महŸा नहीं होती । हम भीतर धर्म बीज को पल्लवित करे । हमारा अहंकार उसमें बाधा ना बने । जब मैं कुछ भी नहीं यह भाव होगा तब ज्ञान की शुरूआत होगी । ज्ञान आत्मा का स्वभाव है । ज्ञान लेकर आप पैदा हुए परन्तु जैसे उम्र बढ़ती गई अहंकार बढ़ता गया और हम उससे दूर होते चले गए । दो प्रकार के व्यक्ति हैं एक ज्ञानी और मुमुक्षु । ज्ञानी केवल जानता है । मुमुक्षु मुमुक्षा भाव से हर ज्ञान को अपने भीतर उतारता है । ज्ञान से जीवन रूपान्तरित होता है । दुनिया की सभी किताबें कंठस्थ कर लो पर परिवर्तननहीं हुआ तो तुम ज्ञानी नहीं हो सकते । भगवान की वाणी है शास्त्र श्रद्धा से सुनते हुए केवलज्ञान तक हो सकता है । एक शब्द भीतर गहरा उतरे तो जीवन रूपान्तरित हो जाएं । शास्त्र श्रवण फिर आचरण तभी जीवन निर्मल बनेगा । आप कुछ भी सुनो जिज्ञासा मत रखना, मुमुक्षु रखना ।

मानव समूचे संसार की दौलत पा ले और स्वयं को खो दे तो उसने कुछ नहीं पाया और उसने स्वयं को पा लिया तो सब कुछ पा लिया । हम कहते हैं क्रोध जहर है, लोभ पाप है पर हमारा जीवन क्रोध, लोभ की तरफ जा रहा है तो वह हमारा ज्ञान नहीं है । मानव जीवन का अवसर मिला है हम साधना करें, ज्ञान को प्राप्त करें भेद-ज्ञान करें । भेद-ज्ञान के साबुन से समता के जल से अपनी आत्मा को स्वयं के द्वारा धो डालो । आप कुछ भी करते हो तो वह कौन कर रहा है शरीर । सब कुछ शरीर करता है । आत्मा तो केवल जानती और देखती है । तुम कितना भी तप जप करो सब कुछ अरिहंतों के चरणों में समर्पित कर देना । प्रतिपल भेद-विज्ञान होगा तो आत्मा निर्मल होगी । अहंकार टूटेगा और हम आत्म-ज्ञान की ओर बढ़ जाएंगे । शरीर केा अपना मत मानो । मानोगे तो मोहनीय कर्म का बंध होगा । ज्ञानी बनकर जीओ । संसार में ऐसे रहो जैसे किसी के साथ ना दोस्ती, ना वैर । भेद -ज्ञान करते-2 एक क्षण ऐसा आएगा कि स्वतः ही भेद-ज्ञान होता चला जाएगा । पशु नारकी आदि भेद-ज्ञान को नहीं जानते और वे कर भी नहीं सकते । देव जानते हैं परन्तु कर नहीं सकते । प्रभु की वाणी का एक ही सार है कि तुम आत्म-ज्ञानी बनो । सारा संसार मिथ्या-ज्ञान से भरा है । आप ज्ञान को प्राप्त करो । अपने लक्ष्य की ओर आगे बढ़ोगे तो लक्ष्य अवश्य प्राप्त होगा ।

ज्ञान, श्रद्धा और आचरण से मुक्ति होती है
जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

02 सितम्बर, 2008: मालेर कोटला: जैन धर्म दिवाकर, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर, आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- महापर्व का छटा दिन आपके जीवन में आचरण लेकर आए । हमने ज्ञान और दर्शन की चर्चा की । अब हम आचरण की चर्चा करेंगे । आचार्य भद्रबाहु ने सभी शास्त्रों का सार आचार बताया है । प्रभु ने आचारांग सूत्र में आचरण की बात कही है । ज्ञान, श्रद्धा और आचरण से ही मुक्ति होगी । ज्ञान और आचरण मुक्ति के लिए आवश्यक है । चारित्र परम धर्म है । आनंद ने भगवान बुद्ध से चार प्रश्न पूछे थे बुढ़ापे में काम आने वाली चीज कौनसी है । मन को वश में कैसे करें । मानव का असली रत्न कौनसा है ? और ऐसी कौनसी वस्तु है जिसे चोर चुरा नहीं सकते । भगवान बुद्ध ने आनंद को उत्तर दिया बुढ़ापे में काम आने वाली वस्तु है शील यानि सदाचरण । गांधी ने अपना संदेश अपने जीवन को बताया । श्रद्धा करो तो मन वश में होगा । हिल स्टेशन में मन वश में नहीं होता । प्रभु की वाणी पर श्रद्धा होगी तो सारा जीवन आनंदित होगा । मानव का असली रत्न हीरा, पन्ना, माणक मोती नहीं है क्योंकि सूई के अग्र भाग जितना रत्न भी साथ नहीं ले जाओगे । प्रज्ञा ही मानव का असली रत्न है । जो ज्ञान आपके अनुभव से उतरे वह आपका असली रत्न है । ज्ञान आपका अनुभव बन जाए । धर्म को प्रज्ञा से उतारो । पुण्य ऐसी वस्तु है जिसे चोर चुरा नहीं सकते । संघ की सेवा, गरीबों की सेवा करो जिससे पुण्य होगा । पुण्य के बाद निर्जरा होगी । श्रावक व्रत को ग्रहण  करो । तप, दान करो । जब व्यक्ति व्रत अंगीकार कर लेता है तो हर कार्य निर्जरा से पूर्ण होता है । साधु प्रतिपल प्रतिक्षण हर श्वांस में निर्जरा करते हैं । यह शरीर मोक्ष का द्वार है । यह देह मन्दिर है । जब आप प्रार्थना, सामायिक करो तब भाव से करो । हर कार्य करते हुए अपने अन्तिम लक्ष्य को अपने समक्ष रखना और श्रद्धा को साथ जोड़कर रखना । श्रद्धा परम् दुर्लभ है । अरिहंतों की वाणी, सिद्धों का स्मरण और गुरू का संग इन पर की गई श्रद्धा मुक्ति की ओर ले जाती है ।

गुरू वह जो मोक्ष की ओर ले जाए । तुम निर्णय करो गुरू किसे मानना । जो मन को शान्ति दे वह गुरू । भगवान महावीर, भगवान बुद्ध कभी बोलते नहीं थे । उनके सम्पर्क में आने से हर प्रश्न का समाधान हो गया । अरिहंत भगवान श्री सीमंधर स्वामी जी धर्म देशना देते हैं तो लोगों को केवलज्ञान हो जाता है यह सब श्रद्धा से ही संभव है । गधे पर चंदन लाद दो तो वह उसे भार ही लगता है वह उसकी सुगंधी नहीं ले सकता । जो हाथ से निकल जाए वह सोना है इसीलिए दोनों हाथों से दान देना । आज भारत को उंचा स्थान क्यों दिया जाता है । भारत के पास कुछ भी नहीं है पर भारत मां ने ऐसे महान् सपूतों को जन्म दिया जिनसे यह भारत भी महान् हो गया । महात्मा गांधी के समक्ष अंग्रेज भी झुके थे गालमेल कान्फ्रेन्स में । विवेकानंद ने विदेशी संस्कृति को दर्जी की संस्कृति बताया तो सभी विदेशी लज्जित हो गए थे । लक्ष्मण की पत्नी उर्मिला थी फिर भी वे यति कहलाए । उनके जीवन का आचरण कैसा था । वे सीता को मां समझते थे । आचार्य श्री आत्माराम जी महाराज कहा करते थे- जो लंगोट का सच्चा और जबान का पक्का है वह कभी जीवन में हार नहीं सकता । सेवा को उन्होंने जीवन में बहुत महत्व दिया । सेवा हमारे जीवन की नींव है और साधना जीवन का फल । अष्टावक्र कभी पाठशाला में पढ़े नहीं थे । राजा जनक ने भी ज्ञान प्राप्ति के लिए अष्टावक्र को अपना गुरू बनाया । जनक ने मुक्ति की कामना की तो अष्टावक्र ने कहा- हे तात! मुक्ति चाहते हो तो विषयों के विष को तजकर सत्य के अमृत को पीओ । धर्म अधर्म सुख दुःख मन के हैं । तूं सदा से मुक्त है । तू कुछ करने वाला है । ऐसा नहीं क्योंकि जो तूं चाहता है वह तूं नहीं कर सकता जो कुछ करता है वह तेरा शरीर करता है । चैतन्य में विश्राम कर सबका साक्षी हो जा मुक्ति हमारा स्वभाव है । तुम मुक्त हो ही । शरीर को आत्मा से अलग कर लो ऐसी महान् आराधना जो अरिहंतों की मूल साधना है इसे हम पर्वाधिराज के पावन दिनों में अपनाएंगे तो अवश्य ही कर्म निर्जरा की ओर अग्रसर होंगे ।

सदाचरण सर्वश्रेष्ठ है
जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

03 सितम्बर, 2008 मालेर कोटला: विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने शिवाचार्य समवसरण में धर्मसभा को सम्बोधित करते हुए फरमाया कि- महापर्व पर्युषण का सातवा दिवस आप सभी के लिए मंगलकारी हो । आपके जीवन में आचरण आये । हमने ज्ञान दर्शन की चर्चा की । अब चारित्र की चर्चा करेंगे । चारित्र यानि आचरण। आचार्य भद्रबाहु ने सभी शास्त्रां का सार आयारो बताया है । आयारो यानि आचारांग सूत्र. । प्रभु ने आचारांग सूत्र में आचरण योग्य सभी बातें बताई है । अकेले ज्ञान से और अकेली क्रिया से कभी मोक्ष प्राप्त नहीं हो सकता । ज्ञान और क्रिया का मेल मुक्ति तक पहुंचा देता है । चरित्र यानि आचरण परम धर्म है ।

आनंद श्रावक ने भगवान बुद्ध से चार बातें पूछी । बुढ़ापे में काम आने वाली चीज कौनसी है ? मन को वश में कैसे करें । मानव का असली रतन क्या है ? और ऐसी कौनसी वस्तु है जो चोर चुरा नहीं सकते । भगवान बुद्ध ने उत्तर दिया- बुढ़ापे में काम आने वाली चीज है शील । शील यानि सदाचार का जीवन । सत्य का  आचरण । एक बार महात्मा गांधीजी से उनके जीवन के संदेश के बारे में पूछा गया । उन्होंने बताया मेरा आचरण ही मेरा संदेश है । मन को श्रद्धा के द्वारा वश में करो । श्रद्धा होगी तो मन वश में होगा । प्रभु की वाणी पर श्रद्धा करोगे तो सारा जीवन आनन्दित होगा । मानव का असली रतन हीरा, पन्ना, माणक मोती नहीं है क्योंकि मृत्यु के बाद सूई का अग्र भाग भी साथ नहीं ले जा सकते । इसलिए प्रज्ञा ही मानव का असली रतन है । प्रज्ञा यानि वह ज्ञान जो आपके अनुभव से उतरे । यही असली रतन है । ज्ञान आपका अनुभव बन जाए । धर्म को प्रज्ञा से  उतारो । पुण्य ऐसी वस्तु है जिसे चोर चुरा नहीं सकते । संघ की सेवा, गरीबों की सेवा को चुरा नहीं सकते चोर । पुण्य ऐसा करो जो निर्जरा का कारण बने । श्रावक व्रत को ग्रहण करो । वैसे तो आप तप दान पुण्य के कार्य अधिक करते हो । व्रत ग्रहण करने के बाद जो कार्य करोगे वह निर्जरा से पूर्ण होगा । साधु प्रतिपल-प्रतिक्षण हर श्वांस में निर्जरा कर सकते हैं । यह शरीर मोक्ष का द्वार है । यह देह मन्दिर है । जब आप प्रार्थना करो तो उसे पूरे भाव से   करो । श्रद्धा रखो मन टिक जाएगा । श्रद्धा परम् दुल्लहा । श्रद्धा परम दुर्लभ है । अरिहंत की वाणी, सिद्ध भगवान एवं गुस्रू पर पूर्ण श्रद्धा रखो । श्रद्धा हमें मुक्ति तक ले जाएगी । गुरू वह है जो हमें मोक्ष तक ले जाए । गुरू वह है जो मन को शान्ति प्रदान करे । महावीर और बुद्ध बोलते नहीं थे । उनके सम्पर्क में आने मात्र से हर व्यक्ति के शंका का समाधान हो जाता था । अरिहंत प्रभु की देशना सुनते-सुनते अनेकों व्यक्तियों को केवलज्ञान हो जाता है । यह केवल श्रद्धा की बात है । गधे के ऊपर चन्दन लाद दे तो उसे भार ही लगता है। वह उसकी सुगंध नहीं ले सकता । पर्वाधिराज के दिनों में अधिक से अधिक दान, शील, तप भावना की आराधना करें । जो हाथ से निकल जाए वही सोना है ।

आज भारत को इतना ऊँचा स्थान क्यों दिया जाता है । भारत के पास कुछ भी नहीं है । पर इस भारत मां ने अनेकों महापुरूषों को जन्म दिया । गांधी, विनोबा, शास्त्री, बुद्ध, राम, महावीर जैसे महापुरूषों को सबके समक्ष उपस्थित  किया । गांधीजी के समक्ष अंग्रेज झुके थे । उनके आचरण को लेकर विवेकानन्द ने कहा- मेरे देश की संस्कृति ऋषि-मुनियों की है और विदेशी संस्कृति दर्जी की संस्कृति है । लक्ष्मण की पत्नी उर्मिला थी फिर भी वे यति कहलाये क्योंकि उनका आचरण श्रेष्ठ था । लक्ष्मण सीता को माँ की उपमा देते हैं, यह रामायण का आदर्श है

अष्टावक्र आठ अंगों से टेढ़े-मेढ़े थे । उनको बचपन से ही ज्ञान प्राप्त था । वे पाठशाला में पढ़े नहीं परन्तु राजा जनक जैसे महान् राजा को उन्होंने उपदेश दिया था । एक बार की घटना है- राजा जनक के दरबार में वाद-विवाद चल रहा था । वहां पर अष्टावक्र के पिता विवाद में हार रहे थे । तब अष्टावक्र वहां पहुंचा तो उसे देखकर सभी सभासद हंसने लगे । राजा जनक भी हंसा तो अष्टावक्र भी   हंसा । राजा को यह बात समझ में नहीं आई । उन्होंने अष्टावक्र से पूछा ? तुम क्यों हंसे । तो तुरन्त अष्टावक्र बोला:-

समझ करके मैं आया था, सभा है समझदारों की ।
मगर गल्ती मेरी निकली, सभा है ये चमारों की ।।

राजा जनक तुम मेरे शरीर को देखकर हंस रहे हो क्योंकि मैं आठ जगहों से टेढ़ा मेढ़ा हूँ । और मैं इसलिए हंसा कि तुम सभी विद्वान मेरे शरीर को देखकर हंसे । मुझग लगा कि आप सभी लोग वि,ान हो पर आप सभ्ज्ञी चमार निकले । तब राजा जनक अष्टावक्र से प्रभावित हुए और जीवन के तीन मूलभूत प्रश्न उनसे पूछे । 1- ज्ञान कैसे हो ?  2- वैराग्य कैसे हो ?  3- मुक्ति कैसे मिले ? तब अष्टावक्र ने कहा- हे तात ! अगर मुक्ति चाहते हो तो विषयों के विष को तजकर सत्य के अमृत को पीओ । धर्म-अधर्म मन के हैं । सुख दुःख मन का है । तूं सदा से मुक्त है । जो तूं करता है, वह तूं नहीं तेरा शरीर करता है । तूं चैतन्य में विश्राम कर । सबका साक्षी हो जा । मुक्ति हमारा स्वभाव है । तूं मुक्त हो ही । शरीर को आत्मा से अलग कर लो । प्रभु ने ऐसी महान् साधना हमें प्रदान की है । सम्वत्सरी के पावन दिवसों में

जगत में शाश्वतता को ढूढें
जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

06 सितम्बर, 2008 मालेर कोटला: विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने शिवाचार्य समवसरण में धर्मसभा को सम्बोधित करते हुए फरमाया कि- हम सभी ने श्रद्धा और भाव से महापर्व पर्युषण एवं सम्वत्सरी की आराधना की । मंगलमैत्री की भावना भावित की । हृदय की गहराई से अनुष्ठान किया । गहराई से किया गया अनुष्ठान आनंद, तृप्ति, समता, सम्पन्नता प्रदान करता है । आनंद लाना नहीं पड़ता वह भीतर से प्रकट होता है । आया ही था ख्याल की आंसू छलक पड़े । आंसू किसी की याद में कितने करीब थे । हम चकाचैंध में उस परम शक्ति को भूल जाते हैं जिसने हमें यहाँ तक पहुंचाया । अपने प्रिय को याद करते हैं तो साथ ही आंसू आंखों में आ जाते हैं यानि वो हमारे कितने करीब है इसी तरह हमारे करीब परमात्मा आ जाए तब दान, शील, तप भावना सब भावों पर ही आधारित है । धर्म अन्तर दर्शन है वह प्रदर्शन नही ।

भोग और संसार का सूत्र है मैं शरीर हूँ कुछ खाऊंगा नहीं तो काम कैसे चलेगा । वीतरागता का सूत्र है मैं शरीर नहीं हूँ । मैं केवल ऊर्जा मात्र चैतन्य स्वरुप हूँ । मैंने अपने चेतन को निखारना है । निखारने के लिए कुछ करना जरुरी है । जीवन में तप, ध्यान, साधना को प्रमुखता दें । जब साधना प्रमुख होगी तो आप आगे बढ़ते चले जाओगे । मन चंचल है मन का कहना नहीं मानना । एक मन्दिर में पताका लहरा रही थी दो भिक्षु उधर से निकले । एक ने कहा- पताका स्वयं हिल रही है दूसरे ने कहा पताका हवा से हिल रही । दोनों आपस में इतनी सी बात पर लड़ पड़े । मन भी बन्दर की तरह उछलता है । लम्बी प्रक्रिया प्रारंभ हो जाती है । जब वो अपने झगड़े का समाधान करने के लिए पुजारी के पास गए तो पुजारी ने कहा तुम्हारा मन हिल रहा है इसलिए पताका हिल रही है ।

यह जगत मात्र एक संयोग है । आप अपनी दखलअंदाजी हटा लो । दखलता से राग द्वेष बढ़ते हैं । जगत प्रकृति की रचना है । इसमें केवल शाश्वत्ता को ढूढो । मन सम्यक् दिशा में लग जाए तो केवलज्ञान प्राप्त करा सकता है । मन से ही बंधन और मुक्ति प्रापत होती है । हम अपने मन, भावना को समझे । राजा प्रसन्नचंद राजर्षि ने मन द्वारा ही सातवी नरक का बंधन किया था और मन से ही मुक्ति को प्राप्त कर गए । कल से आत्म ध्यान साधना कोर्स प्रारंभ हो रहा है । जो इच्छुक साधक जीवन जीने की कला सीखना चाहते हैं वे साधना शिविर में सहभाग लें ।
 
जीवन के मूल्य को जानो और सार को प्राप्त करो
जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

07 सितम्बर, 2008 मालेर कोटला: विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने शिवाचार्य समवसरण में धर्मसभा को सम्बोधित करते हुए फरमाया कि- हमारा जीवन श्वांस प्रश्वांस पर टिका है । आपके चाहने से श्वांस आती जाती नहीं वह तो अपनी स्वाभाविक गति से ही आती है । लाख प्रयत्न करने पर भी वह बढ़ती नहीं । यह जीवन वर्ष, घण्ट,े मिनिट पर नहीं बल्कि आपकी श्वासों पर आधारित है । एक योगी और एक भोगी की श्वांस में अन्तर है । भोगी व्यक्ति क्रोध आने पर एक मिनिट में चालीस से अधिक बार श्वांस लेता है । वासना आने पर एक मिनिट में 60 से अधिक बार श्वांस लेता है । योगी व्यक्ति एक मिनिट में तीन बार श्वांस लेता है और परम् योगी एक बार श्वांस लेता है और एक बार छोड़ता है । जिसकी श्वांस अटक गई, जो जन्म मौत के बीच में है उसे पूछो श्वांस का क्या मूल्य है । जीवन के मूल्य को जानो और सार को प्राप्त करो ।

कोई भी कार्य करते हो उसके साथ आपका हृदय जुड़ा हो । चिŸा की चेतना जुड़ी  हो । भगवान फरमाते हैं कि यह संसार दुःख की धर्मशाला है । जन्म का दुःख, बुढ़ापे का दुःख, मरण का दुःख सारा संसार दुखमय है फिर भी व्यक्ति संसार में आसक्त होता है । विषयों से विरक्त नहीं होता । विषय विष के समान है और प्रभु वाणी अमृत के समान है । कुछ भव्यात्माएं ही प्रभुवाणी के संकेतों को समझ पाती है । ऐसे भव्यात्माओं की पूर्वभव की साधना ही उन्हें मुक्ति तक पहुंचाती है । माता मरुदेवी ने कोई माला, तप, पाठ आराधना नहीं की । पुत्र के मोह में रहते हुए भी पुत्र से पूर्व मुक्ति के द्वारा खोले । पुत्र दर्शन को जाते-2 आत्म-दर्शन हो गया और मुक्ति प्राप्त कर ली ।

व्यक्ति का जीवन महापुरुष के संग में आकर स्वतः ही बदल जाता है । हम श्वांस के मूल्य को जाने । श्वांस का क्षण मात्र भी दुरुपयोग ना करें । श्वांस का सही उपयोग ही जीवन का सही दिशा में गमन है । जो श्वासें वर्तमान में संसार के लिए बह रही है उन श्वासों को मुक्ति की ओर आगे बढ़ाओ ।

ध्यान साधना में हम श्वासों का सही उपयोग करते हैं । हर श्वांस पर ज्ञातादृष्टा-भाव से समभावपूर्वक ध्यान करते हैं जिससे आने वाली हर श्वांस सफल होती है । भगवान समय मात्र का प्रमाद दूर करने की प्रेरणा करते हैं । इसका मतलब यही है कि हम हर श्वांस में धर्म करें । हर श्वांस में स्वयं के करीब आएं । जब व्यक्ति हर श्वांस में स्वयं के करीब आएगा तो कर्मों की ग्रन्थियां स्वतः टूटती चली जाएगी और एक दिन अपना घर सिद्धालय उसे प्राप्त होगा ।

भार रहित होकर जीवन जीएं
जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

08 सितम्बर, 2008 मालेर कोटला: विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने शिवाचार्य समवसरण में धर्मसभा को सम्बोधित करते हुए फरमाया कि- एक प्रार्थना अरिहंत परमात्मा से हे प्रभो ! मेरे हृदय के पात्र को प्रेम, करुणा और मैत्री से भर दो । संसार में ये तीनों ही सार है । भगवान महावीर ने संसार को मैत्री प्रदान की । ईसा ने प्रेम दिया, बुद्ध ने करुणा दी, मोहम्मद ने भाईचारा दिया । अगर ये भाव भीतर है तो हम सफल है । कुछ भी करते हैं उसके पीछे महत्व है हृदय के विचारों का । एक व्यक्ति भोजन करता हुआ दुःखी हो रहा है ओर एक उपवास में भी आनंद से भर जाता है ।

एक संन्यासी हिमालय की यात्रा कर रहा था । पहाड़ की चढ़ाई चढ़ रहा था । गर्मी का मौसम पसीना-पसीना हो रहा था । पहाड़ी पर एक छोटी बालिका पीठ पर एक बच्चे को उठाये जा रही थी । सन्यासी पसीने से तरबतर हो गया । वो बालिका बड़े मजे से जा रही थी । आखिर संनायी ने बालिका से कहा कि- बेटी रास्ता कठिन है । स्थान दुर्गम है तुम इतना वजन उठाए कैसे जा रही हो । बालिका ने सन्यासी को कहा- यह वजन नहीं मेरा छोटा भाई है । वैसे तो तराजू में तोलने पर भाई का वजन होगा परन्तु उस बालिका को उसका वजन नहीं लगा । यह कहानी एक संदेश देती है अगर हम कोई कार्य कार्य भार समझकर करते हैं तो जीवन दुःखी होता है । हर कार्य के पीछे प्रभु कृपा और कृतज्ञता का भाव भीतर होना चाहिए । अगर ऐसा भाव होगा तो जीवन सुन्दर होगा । दृष्टि बदलती है तो सृष्टि स्वतः बदल जाती है ।

भगवान महावीर के एक श्रावक नन्दन मणियार पौषधशाला में पौषध कर रहे   थे । रात्रि में बहुत गर्मी लगी । दृष्टि बदल गई । मन में संकल्प आया कि यहां एक बावड़ी होनी चाहिए, अगले ही दिन पौषध पूर्ण होने पर आर्कीटेक्ट बुलाने पर एक बड़ी बावड़ी, बगीचा, पानी का झरना मनोरंजन का स्थान और औषधालय बनाया । उस बगीचे में वह आसक्त हो गया । लोग आते जाते मनोरंजन, नृत्य, बातचीत सैर करते और सभी प्रशंसा करते कि नन्दन मनिहार ने कितना सुन्दर स्थान बनाया है । जो कार्य मैंने किया उसकी लोग अत्यधिक प्रशंसा करते हैं । ऐसा सोचकर वह बगीचे में अत्यधिक आसक्त हो गया । कहते हैं मृत्यु के अनन्तर उसे उसी बगीचे में मेंढ़क रुप में जन्म लेना पड़ा । संयोग से भगवान महावीर उस नगर में पधारे । लोग आपस में बातचीत कर दर्शनार्थ जा रहे थे । जब उसने लोगों की बातचीत सुनी तो जाति स्मरण ज्ञान द्वारा अपना पिछला भव जाना । आसक्ति का प्रायश्चित किया और वह भी भगवान के दर्शनार्थ बावड़ी से निकलकर जा रहा था । रास्ते में राजा की सवारी से मेंढ़क के शरीर पर घोड़े का पांव गिरा और मृत्यु हो गई । मरकर देवलोक गया । इस घटना से एक शिक्षा मिलती है कि हम विचारों को शुद्ध और पवित्र रखें । किसी भी समय मन को विह्हल ना होने दें । संसार में सुख दुःख सब अपने कर्मों से ही मिलते हैं । हम सभी उदयकर्म को जान समभाव से स्वीकार कर धर्म-ध्यान में जीवन बितायें तभी जीवन महान् होगा ।

धैर्य से मिलती है सफलता
जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

09 सितम्बर, 2008 मालेर कोटला: विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने शिवाचार्य समवसरण में धर्मसभा को सम्बोधित करते हुए फरमाया कि- यह मानव जीवन प्रभु बंदगी के लिए मिला । इस जीवन में हम फल की चाहना ना करते हुए कर्म करते चले जाए । एक-एक ईंट जोड़कर दीवार बनती है फिर छत डलती है तभी मकान बनता है । माली बीज बोता है पौधा अंकुरित होता है तभी फल फूल लगते हैं । एक वृक्ष को सम्पूर्ण होने के लिए कितनी कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है । जीवन के सार को पाने के लिए प्रतीक्षा और धैर्य की आवश्यकता है । तुम कार्य करते चले जाओ सफलता स्वयं मिलेगी ।

भगवान महावीर से गौतम ने पूछा- तत्व क्या है ? प्रभु महावीर ने कहा- जो उत्पन्न होता है, जो नष्ट होता है और जो स्थिर रहता है वही तŸव है । इस त्रिपदी से ही समस्त  गणधरों को चैदह पूर्व का ज्ञान हो गया । कितनी शुद्ध और पवित्र आत्मा थी उनकी, उन्हें ज्ञान पुस्तक पढ़ने से नहीं भगवान के सान्निध्य से हुआ । ज्ञान भीतर से होता है । दीयासलाई को अग्नि का स्पर्श काफी है । स्पर्श मात्र से ही वह प्रकाशित होती है । मानव के पास सब कुछ है परन्तु सीखने की नम्रता, जिज्ञासा और प्यास आवश्यक है ।

तीर्थंकरों में अनंत ज्ञान, अनंत दर्शन और अनंत सुख होता है फिर भी उनमें अहंकार नहीं होता, वो शान्त होते हैं । क्रोध, मान, माया, लोभ, राग, द्वेष रहित होते  हैं । ये छहों आत्मिक गुणों का घात करते हैं । आज की शिक्षा माता पिता गुरु का आदर नहीं करती । पुराने समय में गुरुकुल में माता, पिता और गुरु का आदर सिखाया जाता था । शिक्षा सरलता से प्राप्त होती थी । हर व्यक्ति का अपना व्यक्तित्व है । हरेक का अपना-2 दिमाग है । दो व्यक्ति का दिमाग एक जैसा नहीं हो   सकता । शिक्षा चार दीवारी में बंद नहीं है । आज हमारे पास जरा सी विद्वŸाा, धन, पद आ जाए तो अहंकार आ जाता है और जब तक अहंकार है तब तक शिक्षा भीतर प्रवेश नहीं करती ।

अमेरिका के राष्ट्रपति अब्राहिम लिंकन प्रसिद्ध वैज्ञानिक थामस एलवा एडीशन और एलबर्ट आईंसटाईन जैसी महान् प्रतिभाओं ने शिक्षा को जीवन में उतारा । उनके जीवन में नम्रता थी । एक धीरज था उसी के सहारे उन्होंने शिक्षा की ऊँचाई पाई । हम धैर्य और सफलता की चाह से कर्म करते चले जाएं, सफलता स्वतः प्राप्त होगी ।

विराट की कामना करो
जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

10 सितम्बर, 2008 मालेर कोटला: विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने शिवाचार्य समवसरण में धर्मसभा को सम्बोधित करते हुए फरमाया कि- जीवन में कुछ पाना है तो विराट की कामना करना । क्षूद्र की कामना कभी मत करना । क्षुद्र है संसार की समस्त सुविधाएं । विराट है तुम्हारी चेतना । कोठी, बंगला, गाड़ी ये सब तो हर जन्म में प्राप्त करते आए हैं । इस जन्म में विराट् की कामना करो । तुम्हारी शुद्ध चेतना का सहज अनुभव तुम्हें प्राप्त हो । विराट तक पहुंचे या ना पहुंचे परन्तु वहां की यात्रा प्रारंभ हो । सत्य की प्यास, आनंद की झलक को जानना समझना जरुरी है । वो सत्य कैसे मिले इसकी खोज करनी है । शरीर, धन, यौवन, पत्नी, बच्चे सभी सुख सुविधाएं बहुत बार मिली है । शरीर कुछ समय बाद जवाब दे जाएगा । संबंध सब नश्वर हैं मिटने वाले हैं । शरीर में एक तत्व शाश्वत् है वह है तुम्हारी शुद्ध आत्मा ।

एक बार एक शिष्य ने गुरु से पूछा कि आपने कितने व्यक्तियों को मुक्ति प्रदान की तब गुरु ने शिष्य को कहा तुम्हारे प्रश्न का उत्तर तो मैं दूंगा परन्तु पहले तुम एक कार्य करो इस ग्राम में जाओ और हर व्यक्ति से पूछकर आना कि वो क्या चाहते हैं ? साथ ही उनकी चाहना कागज पर पैन से लिखते चले जाना । शिष्य ग्राम में गया । हर व्यक्ति से पूछता है कोई कहता है धन चाहिए कोई जमीन, खेती, वर्षा, सेहत, बेटी, बेटा, स्वास्थ्य सुख चाहता है परन्तु मुक्ति कोई नही ंचाहता । शिष्य सबके पास घूमा और वापिस गुरु के पास आया । शिष्य के भीतर यह ख्याल था कि मुक्ति की कामना कोई अवश्य करेगा परन्तु मुक्ति की कामना किसी ने नहीं की । गुरु ने कहा जब कोई चाह ही नहीं रखेगा तो उसे राह कैसे मिलेगी । जहां चाह है वहीं राह है ।

मैं परमात्मा से मिलना चाहता हूं ऐसी भीतर इच्छा उत्पन्न होगी तभी शाश्वत् सुख की ओर हम आगे बढ़ पाएंगे । यदि जीवन में धर्म साधना होगी तो दुःख से घबराहट नहीं होगी । और दुःख से घबराहट हो रही है तो मानना भीतर वीतराग-भाव नहीं है । जीवन में उपसर्गों को कंठहार समझना । हर परिस्थिति में शरीर और आत्मा की भिन्नता का अहसास हो । भीतर का चेतन मन जग जाए । ध्यान साधना की धरा पर जीवन का अंग संग अवतीर्ण हो जाए तो शाश्वतता मिल सकती है । हम विराट को पाने के लिए पूरा जीवन लग जाए तब भी कम है । बस विराट की ओर आगे बढ़ें और उसे प्राप्ति का पुरुषार्थ करे । उसके लिए प्राण भी देने पड़ जाए तो कम है । मरना तो है ही है तृप्त होकर मरेंगे तो भीतर शांति होगी ।

विचार का उद्गम स्थान है चित्त: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

11 सितम्बर, 2008 मालेर कोटला: विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने शिवाचार्य समवसरण में धर्मसभा को सम्बोधित करते हुए फरमाया कि-एक समय की बात है । एक बहुत बड़े पर्वत के पास कुछ व्यक्ति इकट्ठे हुए और चर्चा करने लगे कि इस पर कौन शासन कर सकता है । इस पर्वत पर कौन विजय प्राप्त कर सकता है । इस पर्वत का मालिक कौन है ? एक व्यक्ति ने उत्तर दिया, लोहे की छोटी सी हथोड़ी इस पर्वत को तोड़ सकती है । इस पर्वत का मालिक या शासक वही कहलाएगी । लोहे से शक्तिशाली कौन है ? अग्नि लोहे से अधिक शक्तिशाली है क्योंकि अग्नि में लोहा पिघलता है । लोहे पर अग्नि का शासन चलता है । अग्नि पर पानी का शासन चलता है । पानी पर वायु का शासन चलता है, वायु जिधर जाये पानी को बहा देती है । समुद्री जहाज वायु के आधार पर ही चलते है । वायु को देखा नहीं जा सकता । उसे तो केवल अनुभव ही किया जा सकता है ।

वायु पर विचार का शासन चलता है । एक क्षण में विचार द्वारा ब्रह्माण्ड का चक्कर लगाया जा सकता है । विचार की गति तेज है । विचार स्थूल से सूक्ष्म, सूक्ष्म से सूक्ष्मतर और सूक्ष्मतर से सूक्ष्मतम चले जाये तो शक्ति बढ़ जाती है । विचार उद्गम स्थान है चित्त का । मन से ही विचार उत्पन्न होते हैं, जब तक मन में संकल्प विकल्प है तब तक समाधि प्राप्त नहीं हो सकती । जब मन शान्त हो जाएगा तब यह चित्त समाधिस्थ हो जाएगा । एतदर्थ मन को शान्त करो ।

प्रकाश की गति एक सैकेण्ड में एक लाख छियासठ हजार है । बिजली की इससे अधिक है । मन की गति एक सैकेण्ड में बाईस लाख पैंसठ हजार एक सौ बीस मिल तक पहुंॅचती है । मन, विचार दिखते नहीं हैं । इन्हें अनुभव किया जा सकता   है । सारा जगत मन पर आधारित है । इस मन ने ही इतनी कल्पनाएॅं की थी, जब चाॅंद, तारे, सूरज संसार की प्रत्येक वस्तुएॅं बनी । ये सारी वस्तुएॅं मूल्यवान है तुम्हारे लिए । वीतरागी महापुरूष के लिए धन, पद, यश मूल्यवान नहीं है । चाहे वह प्रभु महावीर ही क्यों न हो । वे महापुरूष समस्त संकल्प विकल्प को जीत चुके हैं ।

अरिहंत, सिद्ध, परमात्मा ने परमात्म तत्व को प्राप्त किया है । परमात्म तत्व से आनंद को प्राप्त किया है । वे समस्त संकल्प विकल्प से मुक्त हो गये हैं और उनका परमात्म-तत्व आनंद रूप है । आनंद, सुख और दुःख के पार है । बिना व्यक्ति, वस्तु और परिस्थिति के जो आए वही आनन्द है । आत्मा की शुद्ध दशा भी आनंद स्वरूप  है । मन में जो चिन्तन हुआ, धारा बही, तुमने साथ दिया और विचार बन   गया । मन को समझो, जानो, चिन्तन करो, विचार को देखो । मन और विचार ही हमें बुद्धिमान से बुद्धु तक पहुंॅचाते हैं, इसलिए मन पर विजय प्राप्त करो । विचारो ंसे ऊपर उठ जाओ ।

हम ज्ञानी बनें: आचार्य शिवमुनि
जालंधर 17 जुलाई, 2005:  विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने मीठा बाजार स्थित जैन उपारूर में अपने मंगलमय प्रवचन में ज्ञान हमारा स्वभाव है और उसकी तैयारी के लिए हमें कुछ नहीं करना पड़ता है वह स्वतः होता है । हम ज्ञानी कैसे बनें इस विषय पर प्रकाश डालते हुए फरमाया कि- गुरू चरणों में बैठकर जो संकल्प धारण किया जाता है उस संकल्प से पीछे नहीं हटना । जालंधर शहर पंजाब का बहुत बड़ा शहर है । औद्योगिक, ऐतिहासिक और धार्मिक क्षेत्र में इसका बहुत बड़ा नाम है । प्रभु महावीर का पवित्र समवसरण जहां पर मैत्री, ज्ञान और प्रेम की धारा बहती हो । हम सम्प्रदायों में न पड़कर मोती चुगने की चेष्टा करें । हंस प्रायः मोती चुगा करते हैं । श्रद्धा आत्मा का निज गुण है । शरीर रहे न रहे श्रद्धा रहती है । श्रद्धा इस भव भी है, पर भव भी है और तदुुभय भव भी है । श्रावक धर्म के पालन से तीसरे भव में व्यक्ति अपनी लक्ष्य प्राप्ति कर सकता   है । हमारा लक्ष्य केवल सिद्धगति की प्राप्ति है । जहां कुछ मिले वहां से प्राप्त करते जाओ पर लक्ष्य केवल एक हो ।

सद्गुरू के दर्शन से ही बहुत कुछ मिल जाता है । सत्गुरू एक ऐसा गुरू है जो सत्य का ज्ञान देते हैं । सत्मार्ग पर लगाते हैं । सुकरात ने एक नारा दिया था कि ज्ञान ही सद्गुण है जिसने इस सद्गुण को आत्मसात कर लिया उसने सब कुछ प्राप्त कर लिया । जिसने अपने अज्ञान को जान लिया वही तो ज्ञानी है । कोई शास्त्र और पोथी पढ़ने से ज्ञानी नहीं बनता । ज्ञान तो भीतर का स्वभाव, लक्षण   है । ज्ञान को भीतर उतारने की आवश्यकता नहीं होती वह तो स्वतः ही भीतर आ जाता है । हम चाहते हैं प्रभु महावीर की साधना तुम्हारे भीतर आए । प्रभु की समस्त साधना का एक सार यह है कि हम ज्ञानी   बनें । हमारा हर कार्य ज्ञान के साथ हो । हम हृदय के स्तर पर रहें । सुबह के समय जल्दी उठें । प्रभु की भक्ति करें । प्रभु तुम्हें तिरा देंगे । धर्म प्रतिपल प्रतिक्षण होता है और वही हमारी साधना है । साधना के लिए श्रद्धा, प्रेम का भाव आवश्यक है । हम श्रद्धाभाव को भीतर लेकर आयें ।

 हमारा लक्ष्य सिद्ध पद प्राप्त करना है  
 जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

14 सितम्बर, 2008 मालेरकोटलाः {             } विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने विचार प्रकट करते हुए कहा कि- सत्गुरू की शरण इसलिए कि सद्गुरू हमें संसार के कीचड़ से उभारकर कमल की तरह निर्लेप बनाता  है । सत्गुरू एक ऐसी कसौटी है जो आपको कर्म-बंधन से मुक्त करने के लिए अरिहंत की शरण में जाना सिखाते हैं । अरिहंत की शरण में किस प्रकार जाना चाहिए यह सिखाते हैं । हमारा लक्ष्य सिद्ध पद प्राप्त करना है । मानव की देह दुर्लभता से मिलती है और इसी देह से हम मुक्ति प्राप्त कर सकते हैं । धर्म, ध्यान और साधना भी इस मानव भव में ही हो सकती है । अनेकों लोग है जो जन्म लेते हैं, संसार व्यतीत करते हैं और चले जाते हैं परन्तु कुछ पुरूष ऐसे होते हैं जो अपने जीवन को जीते हुए अनेक शिक्षाएं हमारे लिए छोड़कर जाते हैं उन्हें महापुरूष कहा जाता है ।

महापुरूष हमेशा स्मरणीय होते हैं । अरिहंत भगवन्, तीर्थंकर हमारे आदर्श रूप हैं । संसार में हम किस प्रकार जीयें । संसार से पार होने के लिए सरल मार्ग है जिनवचनों में अनुरक्त होना । अनुरक्त किस प्रकार होना चाहिए इस विषय पर प्रभु फरमाते हैं कि जिस प्रकार हमारी देह में हड्डी, मज्जा, मांस, रक्त है उसी प्रकार जिनवचनों में अनुरक्त हो   जाओ । इतने घुल जाओ कि तुम्हारी धड़कन में जिन-वचन बैठ जायें ।

ज्ञानी पुरूष कहते हैं कि यह संसार एक माया है । हम उस माया में बंधते चले जा रहे हैं । जिन-वचनों में जुड़ना यानि उस पर श्रद्धा रखना । धर्म का मूल है विनय । जीवन जीना है तो इस विनय-रूपी सूत्र को जीवन में उतार लो । परम् विनय करो जिस प्रकार वृक्ष एक व्यक्ति को सब कुछ दे देता है- अपने फल, फूल, पत्त्ेा, टहनियां, जड़ सारा शरीर उसे दे देता है फिर भी मानव उसके प्रति विनय नहीं करता । वृक्षों पर फल आएंगे तो वे स्वतः झुक जाएंगें ।

संक्रांति पर प्रभु प्राप्ति का संकल्प लें
जैनाचार्य श्री शिवमुनि जी महाराज

16 सितम्बर, 2008 मालेरकोटलाः  विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने विचार प्रकट करते हुए कहा कि- विश्व आगे बढ़ रहा है । प्रतिदिन तरक्की कर रहा है । कम्प्यूटर युग आ गया है, हम इस युग के साथ चलो । साधना को जीवन में उतारे । आज का यह पावन दिवस संक्रांति का दिवस है । संक्रांति यानि संक्रमण करना । जीवन में आगे बढ़ना । एक माह में सूरज एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करता है । सूरज निकलता है तो सभी जागते हैं । पशु पक्षी चहकते हैं । प्रकृति खुश दिखाई देती है । हर तरफ एक नई आशा, एक नई किरण होती है । प्रत्येक व्यक्ति अपने कार्यों में लग जाते हैं और आगे बढ़ते चले जाते हैं । हम भी आगे बढ़ें ।

हमने वीतराग मार्ग पर आगे बढ़ना है । प्रभु की वाणी को जीवन में उतारना है । प्रभु की वाणी, उनका आचरण, उनका सिमरन दिन रात हर श्वांस में होता   रहे । अगर एक श्वांस भी सिमरन नहीं करती तो वह श्वांस व्यर्थ हो जाती है । प्रभु चरणों में कुछ समर्पित करना है तो अपने हृदय को समर्पित करो । मन्दिरों में अनेकों फूल चढ़ाये जाते हैं क्या वह फूल आपका है । वह फूल जिसने एक पौधे से जन्म लिया और अपना बचपन, अपनी जवानी उस पौधे के साथ बितायी । उसे आप तोड़कर प्रभु चरणों में समर्पित करते हो तो क्या यह समर्पण हुआ । अगर समर्पित ही करना है तो स्वयं फूल जैसे बन जाओ । हल्के हो जाओ, कोमल हो जाओ । अपने हृदय को फूल सा बनाकर चरणों में समर्पित कर दो । जीवन को कैसे निर्मल बनायें । इसकी खोज में अनेकों संतों ने अपना जीवन लगा दिया । मन की बातों को छोड़कर परमात्म प्राप्ति में लगाओ । मन प्रतिपल, प्रतिक्षण विचारों में बह रहा है । वह कभी नरक में, देवता में तो मानव भव में विचरण कर रहा है ।

शिवाचार्यजी के सान्निध्य में अखिल भारतीय श्रावक सम्मेलन सम्पन्न

17 सितम्बर, 2008: मालेर कोटला   श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज के के पावन सान्निध्य में अखिल भारतवर्षीय श्वे0 स्था0 जैन श्रावक सम्मेलन सम्पन्न हुआ सम्पन्न हुआ । प्रभु महावीर ने उपासकदशांग सूत्र में दस श्रावकों का वर्णन बतलाया है । उनके पास अपार संपत्ति सुख वैभव था फिर भी उनका पुण्य जागृत था तो उन्होंने श्रावक धर्म को ग्रहण किया । अपनी पत्नी को भी सूचना दी तो पत्नी ने भी श्रावक-धर्म की आराधना की । प्रभु महावीर ने स्थानांग सूत्र में चार प्रकार के श्रावक बतलाये हैं । प्रथम जो माता पिता के समान हो । ऐसे श्रावक जो साधु को इज्जत दे । माता पिता की तरह साधु पर वात्सल्य भावना रखें । ऐसे श्रावक साधु के जीवन को उॅंचा उठाते हैं । आप ऐसे श्रावक बनो । प्रत्येक साधु को उतना ही प्यार दो जितना आप अपने बेटे को देते हो । साधु छदमस्थ है । गलती हो सकती है इसीलिए प्रभु महावीर ने आलोचना और प्रायश्चित की बात कही है । दूसरे प्रकार के श्रावक भाई की तरह होते हैं जो कभी उग्रता धारण करते हैं तो कभी वात्सल्य धारण करते हैं । बेटा कुपुत्र होगा फिर भी माता के भीतर वात्सल्य और प्रीति का भाव उत्पन्न होता है । तीसरे प्रकार के श्रावक मित्र के समान होते हैं जो साधु को अपना मित्र समझते हुए उससे सारी बात प्यार से करते हैं और चैथे प्रकार के श्रावक सौत के समान होते हैं जो छिद्रान्वेषी होते हैं । छोटी-2 का प्रचार प्रसार करके धर्म की हानि करते हैं । इन चारों श्रावकों में से आप जो श्रावक बनना चाहो बन सकते हो, बस धर्म की प्रभावना करो । धर्म में जीवन व्यतीत करो ।

प्रभु महावीर ने और भी चार प्रकार के श्रावक बतलाये हैं । पहले दर्पण के समान जो जैसा है वैसे बतलाते हैं । दूसरे ध्वजा की पताका के समान, जिनका चित्त अस्थिर है । तीसरे सूखे वृक्ष के समान और चैथे कदाग्रही होते हैं । हम प्रभु महावीर की वाणी को भीतर उतारें । इस सम्मेलन के द्वारा सबको संस्कार मिले । छोटे बच्चों में संस्कारों का वर्णन हो । हम सेवा को अपनायें और धर्मों में सेवा को जितना महत्व है उतना महत्व हम भी सेवा को दें और साधना के क्षेत्र में आगे बढ़ें । आज के इस श्रावक सम्मेलन पर हम संस्कार, सेवा और साधना त्रिसूत्रीय कार्यक्रम को लेकर आगे बढ़ें ।

अरिहंत प्रभु की वीतरागवाणी संसार सागर को पार उतारने वाली, जन-कल्याणीवाणी है  । यह वाणी हमें विष से अमृत की ओर ले जाती है । अमृत तुल्य संजीवनी वाणी है प्रभु महावीर की । प्रभु महावीर की वाणी का श्रवण करके जन्मों-2 के वैर-भाव दूर होते हैं । आपने एक सूत्र देखा, सुना होगा ‘परस्परोपग्रहो जीवानाम्’ यह निरपेक्ष सूत्र है । जिस प्रकार श्रावक का परिवार होता है उसी प्रकार साधु का गण होता है । गृहस्थ धन सम्पत्ति में परस्पर सहयोग करते हैं वही पर साधु धर्म सम्पत्ति को आपस में बांटते हैं । इस सूत्र का मतलब है सभी जीव आपस में मिले हुए हैं । माता पुत्र का, पिता पुत्री का आपस में बहुत बड़ा सहयोग है ।

प्रभु के तीर्थ में सभी आपस में सहयोग करते हैं । श्रावक साधु को सहयोग करता है । साधु श्रावक को सहयोग करता है । दोनों धर्म की ओर सहयोग करे तो कर्म-निर्जरा होकर संसार छोटा होता है और कर्म-मेल धुल जाते हैं । चार स्तंभ हैं एक टूट जाए तो तीनों टिकते नहीं । हाथ की पांच ऊगुलियां है सबका अपना-अपना सहयोग है । अगर एक अंगुली नां हो तो हमें कार्य करना मुश्किल हो जाता है । इस संसार में परस्पर सहयोग के बिना कुछ भी कार्य संभव नहीं है । परस्पर कार्य करने के लिए प्रभु महावीर ने दो प्रकार के धर्म बतलाये । अणगार धर्म साधु का और आगार धर्म श्रावक का । जितनी श्रावक की भूमिका प्रभु ने अपनी वाणी में फरमाई है उतनी किसी धर्म-ग्रन्थों या धर्म-शास्त्रों में उपलब्ध नहीं होती । श्रावक-धर्म बहुत सुन्दर है । अगर इस धर्म का पालन अच्छी तरह हो तो श्रावक तीन भव में मोक्ष प्राप्त कर सकता है । श्रावक सच में श्रावक   बनें ।
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संगठन के बिना जीवन अधूरा है । स्थानीय श्रीसंघ एक संगठन बनाता है तो धर्म संघ की सेवा और प्रभावना होती है । इस निमित्त से वह व्यक्ति या वह संघ कर्म-निर्जरा का कारण बन जाता है । बाहर से आए हुए सभी श्रीसंघों के प्रति आज के दिन मैं अनुग्रह व्यक्त करता हूं । सभी श्रीसंघ सभी का सहयोग आगे लेकर बढ़ें । आज हमें धर्म के मार्ग को आगे बढ़ाना है । प्रभु महावीर की वाणी को घर-घर
पहुंचाना है । श्रावकांे को अपनी मर्यादा में रहना चाहिए । साधु पर टीका टिप्पणी करने की आवश्यकता नहीं । श्रावक बारह व्रतों को ग्रहण करें । अणुव्रत बहुत महत्वपूर्ण है । प्रभु ने साधु के लिए आत्म-साधना की सर्वोच्च महत्ता  बतलाई । पांच महाव्रत, पांच समिति और तीन गुप्ति की सुन्दर साधना फरमाई वहीं श्रावक के लिए बारह व्रत सूक्ष्म रूप से ग्रहण करें तो पांच व्रत, तीन मनोरथ, चैदह नियम अवश्य ग्रहण करने चाहिए । श्रावक धर्म सहजता से स्वीकार किया जा सकता है । तीन मनोरथों में प्रार्थना समाई हुई  है । प्रभु ! वह दिन धन्य होगा जब मैं सभी प्रकार के आरंभ समारंभ से मुक्त होउंगा । प्रभु ! वह दिन धन्य होगा जब मैं श्रमण धर्म को स्वीकार करूंगा । प्रभु ! वह दिन धन्य होगा जब में संलेखना युक्त पंडित मरण को प्राप्त होगा । प्रतिदिन मनोरथों का चिन्तन करो तो हमारी भावना एक दिन अवश्य पूरी होगी ।

श्रावक सम्मेलन में पूरे भारतवर्ष के विभिन्न अंचलोें से अनेक श्रावक संघ पहुंचे जिसमें सिकन्द्राबाद, महाराष्ट्र- पूना, जलगांव, अहमदनगर, औरंगाबाद, नासिक, एदलाबाद, मीरजगांव । राजस्थान - उदयपुर, नाथद्वारा, जयपुर, जोधपुर, ब्यावर, कोटा, हनुमानगढ़, श्रीगंगानगर, केसरीसिंहपुर । मध्य प्रदेश- इन्दौर, रतलाम, नीमच । दिल्ली, उत्तर प्रदेश- बड़ौत, मुज्जफनगर । हरियाणा - अम्बाला कैंट, राणियां, हिसार, सिरसा, चण्डीगढ़, । पंजाब - रोपड़, फरीदकोट, राजपुरा, पटियाला, होशियारपुर, लुधियाना, फगवाड़ा, भटिण्डा ।

श्रावक सम्मेलन की अध्यक्षता मुम्बई से पहुंचे श्री सुमतिलाल जी कर्नावट ने की । समाज के सभी संघों, प्रमुख सुश्रावकों ने अपने-अपने विचार रखें । ढ़ाई वर्ष मंें जो भी हुआ उस घटना के लिए सभी ने खेद जताया । तीन बातों की प्रमुखता से चर्चा हुई उसमें प्रथम बात यह थी कि आचार्य सम्राट् पूज्य श्री आत्माराम जी महाराज जो श्रमण संघ के प्राण थे उनकी गद्दी पर विराजित चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज के प्रति सभी संघ अपनी पूर्ण निष्ठा व्यक्त करते हैं । कान्फ्रेन्स मातृ संस्था है और रहेगी । तीसरी बात सभी श्रीसंघ, साधु साध्वी श्रावक श्राविका रूप चतुर्विध संघ आपके चरणों में समर्पित हैं । सभी को श्रमण संघ की एवं श्रावक वर्ग की जानकारी प्राप्त हो इसके लिए एक मासिक पत्रिका तैयार हो और श्रावक संघ का राष्ट्रीय संगठन बनें ।

इस अवसर पर आचार्य भगवंत ने कहा कि श्रावक पिता तुल्य होते हैं । वे अपने लक्ष्य को समझे । हम एक लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रहे हैं । आपने मेरे प्रति जो निष्ठा भावना व्यक्त की वह सुन्दर है । देश भर से आए प्रमुख श्रावकों के प्रति मेरी हार्दिक संवेदना और कृतज्ञता है । आज के दिवस पर आपने मंथन, चिन्तन किया । विश्वास रखा । मैं कोई अनुशास्ता नहीं बनना चाहता । केवल एक भाव है कि आचार्य भगवंत पूज्य श्री आत्माराम जी ने जिस प्रकार श्रमण संघ को सींचा है । आचार्य सम्राट् पूज्य श्री आनंद ऋषि जी महाराज ने उसमें आनंद का रस बहाया है और साहित्य कला के द्वारा जिसे सृजित किया है आचार्य सम्राट् पूज्य श्री देवेन्द्र मुनि जी महाराज ने मैं उनकी बातों को लेकर आगे बढूं । हमारे जीवन में सत्य होना चाहिए । घर बार छोड़कर केवल हम साधना पथ के लिए आगे आए हैं । हम सत्य को स्वीकार करें । इस अवसर पर सभी श्रावकों का संगठन जो साधना, सेवा और संस्कार त्रिस्तरीय कार्यक्रम करेगा उसकी घोषणा कल आचार्य भगवंत के पावन मुखारबिन्द से जन्म दिवस के शुभ अवसर पर कराई जाएगी ।

इस अवसर पर जैन रत्न लाला श्री नेमनाथ जी जैन, श्री सुमति लाल जी कर्नावट, समाजरत्न श्री हीरालाल जी जैन, श्री नृपराज जी जैन, श्री हुकमचंद जी जैन, श्री कचरदास जी पोरवाल, श्री गजराजसिंह जी झामड़, श्री मांगीलाल जी जैन, श्री औकारसिंह जी सिरोया, डाॅ0 कैलाश जैन, श्री बहादुरचंद जी जैन, श्री मोहनलाल जी जैन, श्री निर्मल पोखरणा, श्री विमल जी जैन ‘अंशु’, आदि ने अपनी भावनाएं अभिव्यक्त
करते हुए संगठन के लिए एक आवाज उठाई ।

समभाव महापुरूषों की वाणी एवं जीवन का सार है
जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज
    

मालेर कोटला 22 सितम्बर, 2008: युग पुरूष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- प्रभु महावीर की मैत्री, क्षमा, करूणा जीवन का मूल्यवान सूत्र है । वीतरागता का भाव धारण करने से क्षमा, मैत्री स्वतः आ जाती है । महात्मा गांधी की अहिंसा को लोग जल्दी समझ नहीं पाये । उनकी निन्दा और प्रशंसा भी होती रही परन्तु जीत महात्मा गांधी की हुई । दीये का प्रकाश अंधकार को मिटा देता है परन्तु सूरज की रोशनी के समक्ष क्षुद्र है । तीनों लोकों को केवलज्ञानी अरिहंत प्रकाशमान करते हैं ।

वीतरागता का जीवन में समावेश होना मुश्किल है । वीतरागता का अभिप्राय है सुख दुःख प्रशंसा निन्दा दोनों अनुकूल एवं प्रतिकूल परिस्थिति में सम रहना । संघ, परिवार के प्रति आप अपनी ओर से अथक प्रयास करते हैं । कार्य करते हुए विनम्रता का भाव रखें तो वीतराग का भाव अधिक पुष्ट होता हैं । वीतरागता आये इसके लिए वीतराग पुरूष की गुणस्थिति परमावश्यक है । ध्यान शिविरों में योग, प्राणायाम शुद्ध आहार वीतरागता के सहयोगी है । ध्यान साधना से हृदय निर्मल होता है । परिवार को चलाते हुए धर्म का सम्बल, ज्ञान और आचरण को जिन्दगी में प्रमुख स्थान दो । बीज डालते हुए मानव विशाल वृक्ष की कल्पना नहीं करता । बच्चे बीज स्वरूप है उन्हें पवित्र वातावरण एवं धर्म शिक्षा दो जिससे जीवन में हर मोड़ पर वह  प्रसन्नचित रह सके । वीतरागता धर्म की चर्चा धर्म श्रवण करने से नहीं बल्कि धर्माचरण करने से फलित होती है ।

शरीर, पद, प्रतिष्ठा इस जीवन में प्राप्त है । बुद्धिमान मानव चिन्तन मनन करके समझ लेता है कि जीवन की सुख साधन शाश्वत् नहीं है इसलिए मानव जीवन की दुर्लभता को जानते हुए समय का सदुपयोग धर्ममय जीवन आत्मानूभूति की ओर रूचि के हेतु ध्यान करना ही श्रेयस्कर है । धन-दौलत सम्मान के शिखर पर पहुंचकर भी मानव को संतुष्टी प्राप्त नहीं होती है क्योंकि इच्छाएं बढ़ती जाती है । वीतरागकता और ध्यान की ऊँचाई पर पहुंचकर अक्षय आनंद का अक्षय-कोष प्राप्त किया जाता रहा है ।

विनम्रता से हमें जीवन की राह मिलती है । अरिहंत परमात्मा एवं सिद्ध प्रभु महावीर के प्रति विनम्रता एवं उनके ज्ञान को अपने अन्तर की आंखों से देखो । जब किसी व्यक्ति को हम आत्मीयता से निहारते हैं तो हमारे भीतर आत्मीयता भर जाती है । संसार में दो दृष्टियां विद्यमान है- एक है कर्मदृष्टि और दूसरी हीै आत्म-दृष्टि । जहां क्रोध, वासना, अहंकार, मोह की अधिकता है वह कर्म-दृष्टि है । जहाँ पर सब कुछ हम परमात्म के या गुरू के चरणों में छोड़ देते हैं और भीतर से कहते हैं प्रभु ! मैंने कुछ भी नहीं किया । प्रभु सब आपकी कृपा है ये है आत्म-दृष्टि । जैसे गंगा का जल गंदी नाली में गया तो गंदा हो गया और गंदी नाली का जल गंगा में गया तो पवित्र हो गया । ऐसे ही हमारी दृष्टि का महत्व है । कर्मों का मूल कारण है कर्म दृष्टि । इसलिए आत्म-दृष्टि अपनाइए और मुक्ति पाइए ।

संत मिलन नदी नांव संजोग की भांति है
जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

 लुधियाना: 23 अप्रैल, 2008: युग पुरुष, राष्ट्र संत, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज से आत्मिक मिलन हेतु आचार्य श्री यशोभद्र सूरीश्वर जी महाराज आज शिवपुरी जैन स्थानक में पधारे । बहुत ही सौहार्दपूर्ण वातावरण में मंगल मिलन सम्पन्न हुआ । इस अवसर पर शिवपुरी श्रीसंघ के महामत्री डाॅ0 मुलखराज जी ने आचार्यश्री का स्वागत एवं अभिनन्दन किया । आचार्य श्री यशोभद्र सूरीश्वर जी महाराज ने अपनी भावनाएं अभिव्यक्त करते हुए कहा कि- गुरु महिमा से हमारे अनेकों ग्रन्थ भरे पड़े हैं । गुरु जो अज्ञान अंधकार को दूर करता है । जब परमात्मा की अनुपस्थिति है तब गुरु ही हमारे परमात्मा है । संत सान्निध्य बहुत दुर्लभ होता है । सत्संग करने हेतु माया और अभिमान का त्याग करना होता है । एक सामान्य साधु का मिलना भी हमारे समस्त कार्यों की विजयश्री प्राप्त करवाता है तो आचार्यश्रीजी का मिलना उससे भी अधिक बढ़ चढ़कर है । आपसे हमारा यह मिलन प्रथम मिलन है । गच्छाधिपति आचार्यश्री नित्यानंद सूरीश्वर जी महाराज से आपके बारे में सुना । आज भी आपके स्मृत पटल पर उनके साथ मिलन की यादें ताजा है । संतों का मिलना कोई छोटी घटना नहीं है । आपके भीतर माधुर्य और संगीत का प्रेम बसा हुआ   है । आप सहजता, सरलता की प्रतिमूर्ति हैं । श्रमण संघ में आप एक मात्र गच्छाधिपति आचार्य हैं । आपकी एकता की भावना और सहृदयता हमें आपकी ओर आकर्षित करती है ।

इस अवसर पर आचार्यश्री शिव मुनि जी महाराज ने अपने मंगलभाव फरमाते हुए कहा कि- संत मिलन एकता, करुणा और मैत्री का संदेश देता है । हमारा नवकार मंत्र एक है । हमारे तीर्थंकर एक हैं, हमारे आगम एक हैं । सारी मनुष्य जाती एक है । सहयोग से ही हम सभी अपने अन्तिम लक्ष्य को प्राप्त कर जाएंगे । मन्दिर ध्यान प्रतीक है और पुस्तक ज्ञान की प्रतीक है । मन्दिर की प्रतिमा हमें ध्यान की ओर आकर्षित करती है । भगवान महावीर ने ‘‘जीवो मंगलम्’’ कहकर प्रत्येक जीव को मंगल स्वरुप माना है । हर आत्मा में परमात्मा विद्यमान है आवश्यकता है उसके दर्शन करने की । महत्व दृष्टि का है । दृष्टि जीवन में हो तो हर तरफ परमात्मा ही नजर आता है । हम हर जीव में परमात्म दर्शन करें । तीनों लोकों में हर आत्मा में परमात्मा छिपा हुआ है । आत्मा अनंत गुणों की खान है । अवगुण किसी के भीतर नहीं है । अगर अवगुण है भी तो वे शरीर के हैं । हम गुणों का आदर करें । इस अवसर पर आचार्यश्रीजी ने अपना साहित्य आचार्य श्री यशोभद्रसूरीश्वर जी महाराज को प्रदान किया ।

आज पूज्य गुरुदेव श्री ज्ञान मुनि जी महाराज का स्मृति दिवस है । हमसे विदा लिए आपको पांच वर्ष हो गए । आपकी ज्ञान साधना, सेवा साधना आज भी इस धरा पर आपका संदेश देती है । आपने अपने जीवन में जो सुन्दर कार्य किए आज ऐसे कार्य कर पाना असंभव है । आपने स्थान-2 पर सिलाई स्कूल, अस्पताल आदि की स्थापना की । आपने आचार्य हेमचन्द्र के व्याकरण पर प्राकृत व्याकरण नामक एक महान् ग्रन्थ लिखा । आपने जैन जिज्ञासुओं को हमारे समाधान नामक पुस्तक प्रदान की । आज वह 21वीं सदी के समस्त मुमुक्षुओं के लिए एक शास्त्र है जिसका पुनर्ःमुद्रण अभी हुआ है और उस पुस्तक का नाम ‘‘जैन ज्ञान प्रकाश’’ रखा गया है । मैं आप सभी को प्रेरणा दूंगा कि आप सभी उसका स्वाध्याय कर उसके अनमोल सूत्र अपने जीवन में अपनाएं ।