1 Acharyaji janmotsav 15 sep

शिवाचार्यजी के सान्निध्य में अखिल भारतीय श्रावक सम्मेलन सम्पन्न



17 सितम्बर, 2008: मालेर कोटला श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज के के पावन सान्निध्य में अखिल भारतवर्षीय श्वे0 स्था0 जैन श्रावक सम्मेलन सम्पन्न हुआ सम्पन्न हुआ । प्रभु महावीर ने उपासकदशांग सूत्र में दस श्रावकों का वर्णन बतलाया है । उनके पास अपार संपत्ति सुख वैभव था फिर भी उनका पुण्य जागृत था तो उन्होंने श्रावक धर्म को ग्रहण किया । अपनी पत्नी को भी सूचना दी तो पत्नी ने भी श्रावक-धर्म की आराधना की । प्रभु महावीर ने स्थानांग सूत्र में चार प्रकार के श्रावक बतलाये हैं । प्रथम जो माता पिता के समान हो । ऐसे श्रावक जो साधु को इज्जत दे । माता पिता की तरह साधु पर वात्सल्य भावना रखें । ऐसे श्रावक साधु के जीवन को उॅंचा उठाते हैं । आप ऐसे श्रावक बनो । प्रत्येक साधु को उतना ही प्यार दो जितना आप अपने बेटे को देते हो । साधु छदमस्थ है । गलती हो सकती है इसीलिए प्रभु महावीर ने आलोचना और प्रायश्चित की बात कही है । दूसरे प्रकार के श्रावक भाई की तरह होते हैं जो कभी उग्रता धारण करते हैं तो कभी वात्सल्य धारण करते हैं । बेटा कुपुत्र होगा फिर भी माता के भीतर वात्सल्य और प्रीति का भाव उत्पन्न होता है । तीसरे प्रकार के श्रावक मित्र के समान होते हैं जो साधु को अपना मित्र समझते हुए उससे सारी बात प्यार से करते हैं और चैथे प्रकार के श्रावक सौत के समान होते हैं जो छिद्रान्वेषी होते हैं । छोटी-2 का प्रचार प्रसार करके धर्म की हानि करते हैं । इन चारों श्रावकों में से आप जो श्रावक बनना चाहो बन सकते हो, बस धर्म की प्रभावना करो । धर्म में जीवन व्यतीत करो ।

प्रभु महावीर ने और भी चार प्रकार के श्रावक बतलाये हैं । पहले दर्पण के समान जो जैसा है वैसे बतलाते हैं । दूसरे ध्वजा की पताका के समान, जिनका चित्त अस्थिर है । तीसरे सूखे वृक्ष के समान और चैथे कदाग्रही होते हैं । हम प्रभु महावीर की वाणी को भीतर उतारें । इस सम्मेलन के द्वारा सबको संस्कार मिले । छोटे बच्चों में संस्कारों का वर्णन हो । हम सेवा को अपनायें और धर्मों में सेवा को जितना महत्व है उतना महत्व हम भी सेवा को दें और साधना के क्षेत्र में आगे बढ़ें । आज के इस श्रावक सम्मेलन पर हम संस्कार, सेवा और साधना त्रिसूत्रीय कार्यक्रम को लेकर आगे बढ़ें ।

अरिहंत प्रभु की वीतरागवाणी संसार सागर को पार उतारने वाली, जन-कल्याणीवाणी है। यह वाणी हमें विष से अमृत की ओर ले जाती है । अमृत तुल्य संजीवनी वाणी है प्रभु महावीर की । प्रभु महावीर की वाणी का श्रवण करके जन्मों-2 के वैर-भाव दूर होते हैं । आपने एक सूत्र देखा, सुना होगा ‘परस्परोपग्रहो जीवानाम्’ यह निरपेक्ष सूत्र है । जिस प्रकार श्रावक का परिवार होता है उसी प्रकार साधु का गण होता है । गृहस्थ धन सम्पत्ति में परस्पर सहयोग करते हैं वही पर साधु धर्म सम्पत्ति को आपस में बांटते हैं । इस सूत्र का मतलब है सभी जीव आपस में मिले हुए हैं । माता पुत्र का, पिता पुत्री का आपस में बहुत बड़ा सहयोग है ।

प्रभु के तीर्थ में सभी आपस में सहयोग करते हैं । श्रावक साधु को सहयोग करता है । साधु श्रावक को सहयोग करता है । दोनों धर्म की ओर सहयोग करे तो कर्म-निर्जरा होकर संसार छोटा होता है और कर्म-मेल धुल जाते हैं । चार स्तंभ हैं एक टूट जाए तो तीनों टिकते नहीं । हाथ की पांच ऊगुलियां है सबका अपना-अपना सहयोग है । अगर एक अंगुली नां हो तो हमें कार्य करना मुश्किल हो जाता है । इस संसार में परस्पर सहयोग के बिना कुछ भी कार्य संभव नहीं है । परस्पर कार्य करने के लिए प्रभु महावीर ने दो प्रकार के धर्म बतलाये । अणगार धर्म साधु का और आगार धर्म श्रावक का । जितनी श्रावक की भूमिका प्रभु ने अपनी वाणी में फरमाई है उतनी किसी धर्म-ग्रन्थों या धर्म-शास्त्रों में उपलब्ध नहीं होती । श्रावक-धर्म बहुत सुन्दर है । अगर इस धर्म का पालन अच्छी तरह हो तो श्रावक तीन भव में मोक्ष प्राप्त कर सकता है । श्रावक सच में श्रावक बनें ।
संगठन के बिना जीवन अधूरा है । स्थानीय श्रीसंघ एक संगठन बनाता है तो धर्म संघ की सेवा और प्रभावना होती है । इस निमित्त से वह व्यक्ति या वह संघ कर्म-निर्जरा का कारण बन जाता है । बाहर से आए हुए सभी श्रीसंघों के प्रति आज के दिन मैं अनुग्रह व्यक्त करता हूं । सभी श्रीसंघ सभी का सहयोग आगे लेकर बढ़ें । आज हमें धर्म के मार्ग को आगे बढ़ाना है । प्रभु महावीर की वाणी को घर-घर
पहुंचाना है । श्रावकांे को अपनी मर्यादा में रहना चाहिए । साधु पर टीका टिप्पणी करने की आवश्यकता नहीं । श्रावक बारह व्रतों को ग्रहण करें । अणुव्रत बहुत महत्वपूर्ण है । प्रभु ने साधु के लिए आत्म-साधना की सर्वोच्च महत्ता  बतलाई । पांच महाव्रत, पांच समिति और तीन गुप्ति की सुन्दर साधना फरमाई वहीं श्रावक के लिए बारह व्रत सूक्ष्म रूप से ग्रहण करें तो पांच व्रत, तीन मनोरथ, चैदह नियम अवश्य ग्रहण करने चाहिए । श्रावक धर्म सहजता से स्वीकार किया जा सकता है । तीन मनोरथों में प्रार्थना समाई हुई  है । प्रभु ! वह दिन धन्य होगा जब मैं सभी प्रकार के आरंभ समारंभ से मुक्त होउंगा । प्रभु ! वह दिन धन्य होगा जब मैं श्रमण धर्म को स्वीकार करूंगा । प्रभु ! वह दिन धन्य होगा जब में संलेखना युक्त पंडित मरण को प्राप्त होगा । प्रतिदिन मनोरथों का चिन्तन करो तो हमारी भावना एक दिन अवश्य पूरी होगी ।

श्रावक सम्मेलन की अध्यक्षता मुम्बई से पहुंचे श्री सुमतिलाल जी कर्नावट ने की । समाज के सभी संघों, प्रमुख सुश्रावकों ने अपने-अपने विचार रखें । ढ़ाई वर्ष मंें जो भी हुआ उस घटना के लिए सभी ने खेद जताया । तीन बातों की प्रमुखता से चर्चा हुई उसमें प्रथम बात यह थी कि आचार्य सम्राट् पूज्य श्री आत्माराम जी महाराज जो श्रमण संघ के प्राण थे उनकी गद्दी पर विराजित चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज के प्रति सभी संघ अपनी पूर्ण निष्ठा व्यक्त करते हैं । कान्फ्रेन्स मातृ संस्था है और रहेगी । तीसरी बात सभी श्रीसंघ, साधु साध्वी श्रावक श्राविका रूप चतुर्विध संघ आपके चरणों में समर्पित हैं । सभी को श्रमण संघ की एवं श्रावक वर्ग की जानकारी प्राप्त हो इसके लिए एक मासिक पत्रिका तैयार हो और श्रावक संघ का राष्ट्रीय संगठन बनें ।

इस अवसर पर आचार्य भगवंत ने कहा कि श्रावक पिता तुल्य होते हैं । वे अपने लक्ष्य को समझे । हम एक लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रहे हैं । आपने मेरे प्रति जो निष्ठा भावना व्यक्त की वह सुन्दर है । देश भर से आए प्रमुख श्रावकों के प्रति मेरी हार्दिक संवेदना और कृतज्ञता है । आज के दिवस पर आपने मंथन, चिन्तन किया । विश्वास रखा । मैं कोई अनुशास्ता नहीं बनना चाहता । केवल एक भाव है कि आचार्य भगवंत पूज्य श्री आत्माराम जी ने जिस प्रकार श्रमण संघ को सींचा है । आचार्य सम्राट् पूज्य श्री आनंद ऋषि जी महाराज ने उसमें आनंद का रस बहाया है और साहित्य कला के द्वारा जिसे सृजित किया है आचार्य सम्राट् पूज्य श्री देवेन्द्र मुनि जी महाराज ने मैं उनकी बातों को लेकर आगे बढूं । हमारे जीवन में सत्य होना चाहिए । घर बार छोड़कर केवल हम साधना पथ के लिए आगे आए हैं । हम सत्य को स्वीकार करें । इस अवसर पर सभी श्रावकों का संगठन जो साधना, सेवा और संस्कार त्रिस्तरीय कार्यक्रम करेगा उसकी घोषणा कल आचार्य भगवंत के पावन मुखारबिन्द से जन्म दिवस के शुभ अवसर पर कराई जाएगी ।

आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

18 सितम्बर, 2009: ऋषभ विहार, दिल्ली युग पुरुष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- अनंत उपकारी क्षमा करुणा मैत्री के मसीहा अरिहंत परमात्मा को नमन । 18 सितम्बर का पावन दिवस भारत के हर प्रान्त से आए धर्मानुरागी श्रेष्ठा बन्धुगण प्रभु महावीर के तीर्थ ऋषभ विहार धर्म नगरी में इस साधु साध्वी श्रावक श्राविका रुपी चतुर्विध श्रीसंघ को नमन । प्रभु महावीर का तीर्थ मंगल का रुप है । प्रभु महावीर ने छोटे बड़े पद प्रतिष्ठा को महतव नहीं दिया । हम महावीर के अनुयायी हैं परन्तु हमारा कार्य उनसा नहीं है । महावीर ने तप, ध्यान किया । आज महावीर हमारे बीच नहीं पर उनकी वाणी हमारे बीच है उनकी साधना हमारे पास है । हमारा आपसे धर्म का नाता है आज के इस पावन दिवस पर मेरा एक विनम्र अनुरोध है तुम सब सच्चे धर्म से जुड़ जाओ । पद, प्रतिष्ठा, मान, सम्मान ये सब ध्र्मा के आगे कुछ नहीं है चक्रवर्ति भी र्ध के आगे झूकते हैं हमारे श्वासों की क्या कीमत है भाई बहिन बन्धु सब छूट जाएंगे वीतरागता होगी तो वो ही हमें बचा सकती है । हम वीतरागता से जुड़े फूल चैबीस घण्टे सुगंध देता है कभी अपनी सुगंध स्वयं नहीं लेता वृक्ष अपने फल कभी स्वयं नहीं खाते । नदी अपना पानी स्वयं कभी नहीं पीती । जब प्रकृति इतना कुछ दे सकती है तो मानव कुछ देता क्यों नहीं । केवल लेने की कामना क्यों रखता है । हम समाज का काम करते हैं और पद की चाह भी रखते हैं इतनी उम्र बीत गई अभी भी कुछ चाहना बाकी है तो फिर ये समझ लो कि भगवान भी समक्ष आ गए तो कल्याण नहीं हो सकता । इस चाहना को छोड़ो । मेरी इतनी उम्र बीत गई जो पाना था वो दो चार वर्ष पूर्व मिला । भगवान महावीर की साधना की प्यास से ही जिनदीक्षा अंगीकार की थी, उसे पाने के लिए उत्तर से दक्षिण तक की यात्राएं की । हर धर्म गुरु हर बड़े संत के पास में गया परन्तु पूर्ण तृप्ति नहीं हो पाई आज जीवन के अंतिम पड़ाव में मुझे सच्ची साधना मिली है । इतनी उम्र बीत गई, इतने चातुर्मास हो गए। इतनी पद प्रतिष्ठा मिल गई ये सब मुझे मोक्ष दिलाने वाले नहीं है । हृदय के कुछ उद्गार हैं हम क्या बोले हमारा आचरण जन-मानस को प्रभावित करें । आप सब सौभाग्यशाली हो आपने प्रातःकाल की मंगल बेला में प्रभु महावीर की ध्यान साधना में डुबकी लगाने का पुरुषार्थ किया । सुबह निशाजी ने आपको ध्यान साधना सिखाई तुम ध्यान में डूबो ध्यान के उपर कुछ नहीं है । ध्यान वो राम-बाण है जो तुम्हारे कर्म-रोग से तुम्हें छुटकारा दिला सकती है । हम महावीर के हैं मैं भी आपके समान ही हूं आप सब मेरा आदर करते हो मैं भी आपका आदर करता हूँ । जीवन का लक्ष्य तय होना चाहिए । मेरे जीवन का लक्ष्य तय हो चुका है । उतर से दक्षिण तक की यात्राएं करने का अब कोई मानस नहीं । जो साधना मिली है उसमें डूबने का ही मानस है । सम्मेलन की चर्चाएं पिछले कुछ समय से चल रही है मेरी भावना सम्मेलन की है आप जो भी निर्णय लेना चाहते हैं वो सब पदाधिकारी मुनिराजों से मिलकर निर्णय लेकर मुझे बता दे अभीमैं दिल्ली में हूं यथोचित समय पर सम्मेलन हो जाना चािहए परन्तु सम्मेलन से पूर्व अनुशासन अति आवश्यक है ।  
साधना से अनुशासन आता है । प्रभु महावीर के चैदह हजार साधु थे । अनुशासन डण्डे से नहीं प्रेम से होता है । संघ कभी डंडे से नहीं चलता । प्रभु महावीर के वचन है- हे देवाणुप्रिय तुम्हें जैसा सुख हो वैसा करो परन्तु धर्म मार्ग में प्रमाद मत करो । आत्म-दृष्टि, आत्म-ज्ञान का चिन्तन भीतर आ जाए । एक बार पांच दिन के लिए तुम गहरे साधना शिविर मंे डुबकी लगा लो तो फिर तुम्हें धन, पद, प्रतिष्ठा की कोई चिन्ता नहीं होगी । ये साधना ऐसी साधना है जो तुम्हारी जन्मों-2 की कर्म-ग्रंथी तोड़ देगी । मेरी यह मंगल कामना है कि तुम इसके बाद महाविदेह क्षेत्र में सीमंधर स्वामी प्रभु के श्रीचरणों में जन्म धारण कर वहीं से मोक्ष मंजिल की ओर अग्रसर हो जाओ ।

धर्म में राजनीति नहीं, राजनीति में धर्म को अंगीकार करें
जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज मालेर कोटला 18 सितम्बर, 2003: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने जन्म दिवस के अवसर पर अपनी पावनवाणी मुखरित करते हुए कहा कि- हमारा धर्म संघ मालेर कोटला का यह पावन प्रवचन प्रांगण आत्म दरबार में आए भारत के विभिन्न अॅंचलों से विशिष्ट व्यक्तियों ने जन्म-दिवस के पावन अवसर पर मुझे बधाईयाॅं दी । आप सभी इतनी देर तक शान्ति और समता से बैठे रहे । राणियाॅं हमारा जन्म हुआ । मलोट हमारा शिक्षण हुआ । आज भी वह धरती की याद करते ही सारी स्मृतियाॅं स्मरण पटल पर उभर आती है ।

जिनशासन का मूल विनय है । धर्म का मूल सहजता और सरलता है । हम सभी सहज और सरल बने । महावीर का यह संदेश है । महावीर ने दान सरलता को महत्व  दिया । अपने हृदय को हम सरल बनायें । अन्र्तमन में चित्त की शुद्धि करें । धर्म में राजनीति नहीं, राजनीति में धर्म को अंगीकार करें । प्रभु महावीर 24 तीर्थंकरों की परम्परा, उनका शासन हमें यही सिखाता है । आप सबका प्यार और निष्ठा बनी हुई है । पूना सम्मेलन में आप सभी के सहयोग से आचार्य सम्राट् पूज्य श्री आनंद ऋषि जी म0 ने सभी के सहयोग से इस पद पर बिठाया । आज में उन सबके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करता हूॅं । धार्मिक होने का लक्षण यही है कि हम कृतज्ञता ज्ञापित करें । प्रस्ताव तभी पारित होगें जब हम उसे अपने शहरों में कार्यान्वित करेंगे । निन्दा, प्रशंसा एक ही सिक्के के दो पहलू है । प्रभु महावीर के शासन में दोनों ही बाते बनी रही । हम अनुशासित होकर ओर निष्ठाबद्ध होकर कार्य करें । आपका समर्पण और निष्ठा से ही सब कार्य होगा ।

अरिहंत की वाणी, सिद्ध का स्मरण, साधु का संघ जीवन के लिए परमावश्यक है । श्रमण संघ के साथ ऋषि परम्परा और दिवाकर परम्परा पूर्ण-रूपेण साथ दे रही है । यह सब कुछ धर्मसंघ शासन का ही है । हर संघर्ष हमें कुछ सिखाता है । हम समर्पण को भीतर लायें ।

आचार्यश्रीजी ने जन्म दिन के पावन अवसर पर श्रावक सम्मेलन के सार रूप में कुछ प्रस्ताव पारित किये एवं आचार्यश्रीजी ने आज विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान की शुरूआत की जिसमें हर व्यक्ति ग्यारह सूत्रों को लेकर आगे बढ़ें । मालेर कोटला शहर को भी में हार्दिक साधुवाद देता हूॅं । यहाॅं पर पधारे सभी महानुभावों को भी हार्दिक साधुवाद देता हूॅं । गुण दृष्टि ग्रहण करें ।  जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज
    
अम्बाला शहर 23 सितम्बर, 2007: राष्ट्र संत, युग पुरूष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज की 66 वीं जन्म-जयन्ती का कार्यक्रम भव्य समारोह पूर्वक पी0के0आर0 जैन स्कूल, अम्बाला शहर में मनाया गया आचार्यश्रीजी ने अपने मंगलमय उद्बोधन मंें फरमाया कि- संगठन आज के युग की मूल शक्ति है । एकता की भावना का उद्घोष हमारी अंतर्हृदय की सद्भावना है । सम्मेलन में हृदय के पवित्र भावना एवं भविष्य की संघ प्रगति की रूपरेखा आवश्यक है । क्षमा प्रभु महावीर की अमूल्य देन है । किसी के प्रति मनमुटाव हो उसको हृदय की निर्मलता से क्षमा याचना मांगना करना प्रभु महावीर का अनमोल सूत्र है । सभी धर्मों के तलस्पर्शी अध्ययन के बाद यह अर्क निकलता है कि मूलरूप से सभी धर्मों का भाव एक समान है । शब्दों में विभिन्नता हो सकती है । सिक्ख समाज के प्रति धर्म समन्वय का ऐतिहासिक उदाहरण टोडरमल जैन ने अपनी धन-दौलत को गुरू गोबिन्दसिंह जी के बेटों के संस्कार हेतु जमीन खरीदकर अर्पित की थी । सभी धर्म भावों एवं संगठन शक्ति को महत्व प्रदान करें । श्रावक संघ संत समाज अपने कर्तव्य के प्रति सचेत हो । ध्यान साधना को जीवन का अंग बनाये । संगठन के लिए व्यर्थ की चर्चाओं में हस्तक्षेप न करते हुए सकारात्मक भावना की अभिवृद्धि करें ।

इस अवसर पर साध्वी सुधा मण्डल की ओर से आपश्रीजी को ‘‘हरियाणा केसरी’’ की उपाधि का सम्मान दिया गया । श्री सुरजीतसिंह जी रखड़ा को जैन सभा की ओर से ‘उद्योग शिरोमणि’ का अवार्ड देकर सम्मानित किया गया । एस0एस0 जैन सभा के प्रधान श्री प्रेमराज जी जैन एवं उनकी कार्यकारिणी के सदस्यों की सेवाएं सुन्दर रही । महामंत्री श्री गुलशन जी जैन ने सभा का सुन्दर संचालन किया ।
 
चण्डीगढ़: 26 सितम्बर, 2004: जैन धर्म दिवाकर, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर, आचार्य सम्राट् पूज्य श्री षिवमुनि जी महाराज ने आत्म शुक्ल जन्म जयंती पर अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- श्रमण संघ प्रथम पट्टधर, महान् योगीराज, स्वाध्याय ध्यान के अध्यात्म-योगी ऐसे महान् आचार्य जिन्होंने श्रमण संघ को सींचा, पल्लवित पुष्पित किया । जो करूणा मंगलमैत्री के मसीहा थे । संयम साधना के धनी थे, उनका आज जन्म दिन मनाया जा रहा है साथ ही पूर्णिमा के चन्द्र के समान शुक्ल जिनका आचरण ही शुक्ल था ऐसे प्रवर्तक श्री शुक्लचन्द्र जी महाराज इन दो महान् विभूतियों के नाम स्मरण से ही सब कार्य सिद्ध होते हैं, आत्माराम जो आत्मा में राम बसे हैं और राम में आत्मा बसी हुई है इतना गहरा संयोजन था उनका । आचार्यश्रीजी हमेशा आत्मा में लीन रहते थे । बाल्यकाल में ही माता पिता का साया उठ गया । दादीजी भी देवलोक गमन कर गई और पुण्य कर्म की प्रबलता से गुरू चरणो में खींचे चले आ गये । अपना जीवन गुरू-चरणों समर्पित कर दिया । आचार्यश्री मोतीराम जी महाराज से शिक्षा प्राप्त की एवं महान् संत शालीग्राम जी महाराज से दीक्षा प्राप्त की । आचार्यश्रीजी प्रतिपल प्रतिक्षण स्वाध्याय में लीन रहते थे । वे हमेशा स्वयं में शान्त रहते थे । जीवन में सुखी होने का सही उपाय है स्वयं में शान्त होना । उनकी योग साधना से मन स्तब्ध होता था, उन्होंने संघ को सींचा, पल्लवित पुष्पित किया । संघ संगठन में अपनी आयु बिताई । आचार्यश्रीजी संस्कृत, प्राकृत के प्रकाण्ड विद्वान थे । उनकी शिक्षाएं आज भी उनके द्वारा टीकाकृत आगम एवं लिखित पुस्तको में उपलब्ध है । सर्वप्रथम आचार्य श्री अमोलक ऋषि जी महाराज ने आगमों का प्राकृत से हिन्दी में अनुवाद किया उसके अनन्तर आचार्य श्री घासीलाल जी महाराज एवं आचार्य श्री आत्माराम जी महाराज ने टीकाएं लिखी । युवाचार्य श्री मधुकर मुनि जी महाराज ने भी उन बत्तीस आगमों को जन-जन के समक्ष प्रस्तुत किया । अनेक राजनेता आचार्यश्रीजी के चरणों में स्वयं आते थे, उनसे मार्ग-दर्शन प्राप्त करते थे । भारत के प्रधानमंत्री पं0 जवाहरलाल नेहरू, सरदार प्रतापसिंह कैरो, भीमसिंह जी सच्चर आदि उनके जीवन से बहुत प्रभावित थे । आचार्यश्रीजी ने कहा जिसका कोई नहीं उसे तुम बनो । अगर धर्म शास्त्र नहीं सुना है तो सुनो और सुना है तो उसका चिन्तन मनन करो । पूर्वकृत कर्मों की निर्जरा करते हुए नये कर्मों का बंध मत करो । पूर्वकृत कर्मों का नाश दया, करूणा, मैत्री के द्वारा होगा और करूणा मैत्री ध्यान से प्रस्फुटित होगी । आचार्यश्रीजी का शिक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण चिन्तन था । उन्होंने देवकी देवी और डाॅ0 मुलखराज जैसे विद्वानों को शिक्षा के क्षेत्र में आगे बढ़ाया । आज भी देवकी देवी के नाम से अनेक संस्थाएं लुधियाना में कार्यरत है । उन्होंने सेवा का अनुपम संदेश दिया । दीक्षा लेने के अनन्तर वे हमेशा शास्त्र स्वाध्याय एवं सेवा में लीन रहते थे । अपने जीवन को व्यतीत करते हुए अनेक उपसर्ग उनके समक्ष आए, उनकी आंखें चली गई, केंसर जैसा भयानक रोग हो गया, हड्डी टूट गयी ऐसे अनेक कष्ट आए फिर भी उन्होंने समताभाव से सहन किया । जीवन में अगर कष्ट आ जाये तो समता शान्ति से सहन कर लेना कर्मों की निर्जर होगी । उन्होंने कहा- धर्म-शासन तो शास्वत है । समय बदलता रहता है । उनकी दी हुई शिक्षाओं को ही हम आगे लेकर चल रहे हैं । आचार्य श्री आत्माराम जी महाराज, आचार्य श्री आनंद ऋषि जी महाराज, आचार्य श्री देवेन्द्र मुनि जी महाराज ने जिस प्रकार संघ को आगे बढ़ाया उसी प्रकार हम संघ को आगे बढ़ा रहे हैं । संगठन के साथ निष्ठा, अनुशासन आवश्यक है । धर्म के नाम पर राजनीति नहीं करनी चाहिए । धर्मनीति में आगे बढ़ते हुए आचार्यश्रीजी की शिक्षाओं को भीतर उतारे ।

प्रवर्तक श्री शुक्लचंद जी महाराज ने अपने साहित्य द्वारा ‘शुक्ल रामायण’ द्वारा जन-जन में अपनी भवनाओं को प्रसारित किया । उन्हें शिव शंकर कहा जाता था । हम उनके चरण चिन्हों पर चलने के लिए कृत-संकल्प हैं । आज के दिन हम संकल्प लें उनके द्वारा प्रदत्त शास्त्र अथवा साहित्य का स्वाध्याय प्रतिदिन करें एवं आगम के द्वारा प्राप्त ध्यान साधना को जीवन में उतारें । मैं भी आज जनजन के लिए यही मंगल कामना करूंगा कि उनके द्वारा प्रदत्त, आगम, साहित्य एवं ध्यान साधना को जीवन में उतारकर सभी के मंगल एवं कल्याण की कामना करें ।

 

शिवाचार्यजी के सान्निध्य में अखिल भारतीय श्रावक सम्मेलन सम्पन्न

17 सितम्बर, 2005: जालंधर श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज के जीवनोपयोगी एवं सारगर्भित प्रवचन प्रतिदिन शिवाचार्य सत्संग स्थल, लक्ष्मी पैलेस, गाजी गुल्ला रोड़ पर चल रहे हैं । आज के अपनेे मंगलमय प्रवचन में उन्होंने फरमाया कि- श्रावकों का वर्णन करते हुए प्रभु महावीर ने उपासकदशांग सूत्र में दस श्रावकों का वर्णन बतलाया है । उनके पास अपार संपत्ति सुख वैभव था फिर भी उनका पुण्य जागृत था तो उन्होंने श्रावक धर्म को ग्रहण किया । अपनी पत्नी को भी सूचना दी तो पत्नी ने भी श्रावक-धर्म की आराधना की । प्रभु महावीर ने स्थानांग सूत्र में चार प्रकार के श्रावक बतलाये हैं । प्रथम जो माता पिता के समान हो । ऐसे श्रावक जो साधु को इज्जत दे । माता पिता की तरह साधु पर वात्सल्य भावना रखें । ऐसे श्रावक साधु के जीवन को उॅंचा उठाते हैं । आप ऐसे श्रावक बनो । प्रत्येक साधु को उतना ही प्यार दो जितना आप अपने बेटे को देते हो । साधु छदमस्थ है । गलती हो सकती है इसीलिए प्रभु महावीर ने आलोचना और प्रायश्चित की बात कही है । दूसरे प्रकार के श्रावक भाई की तरह होते हैं जो कभी उग्रता धारण करते हैं तो कभी वात्सल्य धारण करते हैं । बेटा कुपुत्र होगा फिर भी माता के भीतर वात्सल्य और प्रीति का भाव उत्पन्न होता है । तीसरे प्रकार के श्रावक मित्र के समान होते हैं जो साधु को अपना मित्र समझते हुए उससे सारी बात प्यार से करते हैं और चैथे प्रकार के श्रावक सौत के समान होते हैं जो छिद्रान्वेषी होते हैं । छोटी-2 का प्रचार प्रसार करके धर्म की हानि करते हैं । इन चारों श्रावकों में से आप जो श्रावक बनना चाहो बन सकते हो, बस धर्म की प्रभावना करो । धर्म में जीवन व्यतीत करो ।

प्रभु महावीर ने और भी चार प्रकार के श्रावक बतलाये हैं । पहले दर्पण के समान जो जैसा है वैसे बतलाते हैं । दूसरे ध्वजा की पताका के समान, जिनका चित्त अस्थिर है । तीसरे सूखे वृक्ष के समान और चैथे कदाग्रही होते हैं । हम प्रभु महावीर की वाणी को भीतर उतारें । इस सम्मेलन के द्वारा सबको संस्कार मिले । छोटे बच्चों में संस्कारों का वर्णन हो । हम सेवा को अपनायें और धर्मों में सेवा को जितना महत्व है उतना महत्व हम भी सेवा को दें और साधना के क्षेत्र में आगे बढ़ें । आज के इस श्रावक सम्मेलन पर हम संस्कार, सेवा और साधना त्रिसूत्रीय कार्यक्रम को लेकर आगे बढ़ें ।

अरिहंत प्रभु की वीतरागवाणी संसार सागर को पार उतारने वाली, जन-कल्याणीवाणी है  । यह वाणी हमें विष से अमृत की ओर ले जाती है । अमृत तुल्य संजीवनी वाणी है प्रभु महावीर की । प्रभु महावीर की वाणी का श्रवण करके जन्मों-2 के वैर-भाव दूर होते हैं । आपने एक सूत्र देखा, सुना होगा ‘परस्परोपग्रहो जीवानाम्’ यह निरपेक्ष सूत्र है । जिस प्रकार श्रावक का परिवार होता है उसी प्रकार साधु का गण होता है । गृहस्थ धन सम्पत्ति में परस्पर सहयोग करते हैं वही पर साधु धर्म सम्पत्ति को आपस में बांटते हैं । इस सूत्र का मतलब है सभी जीव आपस में मिले हुए हैं । माता पुत्र का, पिता पुत्री का आपस में बहुत बड़ा सहयोग   है ।

प्रभु के तीर्थ में सभी आपस में सहयोग करते हैं । श्रावक साधु को सहयोग करता है । साधु श्रावक को सहयोग करता है । दोनों धर्म की ओर सहयोग करे तो कर्म-निर्जरा होकर संसार छोटा होता है और कर्म-मेल धुल जाते हैं । चार स्तंभ हैं एक टूट जाए तो तीनों टिकते नहीं । हाथ की पांच ऊगुलियां है सबका अपना-अपना सहयोग है । अगर एक अंगुली नां हो तो हमें कार्य करना मुश्किल हो जाता है । इस संसार में परस्पर सहयोग के बिना कुछ भी कार्य संभव नहीं है । परस्पर कार्य करने के लिए प्रभु महावीर ने दो प्रकार के धर्म बतलाये । अणगार धर्म साधु का और आगार धर्म श्रावक का । जितनी श्रावक की भूमिका प्रभु ने अपनी वाणी में फरमाई है उतनी किसी धर्म-ग्रन्थों या धर्म-शास्त्रों में उपलब्ध नहीं होती । श्रावक-धर्म बहुत सुन्दर है । अगर इस धर्म का पालन अच्छी तरह हो तो श्रावक तीन भव में मोक्ष प्राप्त कर सकता है । श्रावक सच में श्रावक बनें ।

संगठन के बिना जीवन अधूरा है । स्थानीय श्रीसंघ एक संगठन बनाता है तो धर्म संघ की सेवा और प्रभावना होती है । इस निमित्त से वह व्यक्ति या वह संघ कर्म-निर्जरा का कारण बन जाता है । बाहर से आए हुए सभी श्रीसंघों के प्रति आज के दिन मैं अनुग्रह व्यक्त करता हूं । सभी श्रीसंघ सभी का सहयोग आगे लेकर बढ़ें । आज हमें धर्म के मार्ग को आगे बढ़ाना है । प्रभु महावीर की वाणी को घर-घर पहुंचाना है । श्रावकांे को अपनी मर्यादा में रहना चाहिए । साधु पर टीका टिप्पणी करने की आवश्यकता नहीं । श्रावक बारह व्रतों को ग्रहण करें । अणुव्रत बहुत महत्वपूर्ण है । प्रभु ने साधु के लिए आत्म-साधना की सर्वोच्च महत्ता  बतलाई । पांच महाव्रत, पांच समिति और तीन गुप्ति की सुन्दर साधना फरमाई वहीं श्रावक के लिए बारह व्रत सूक्ष्म रूप से ग्रहण करें तो पांच व्रत, तीन मनोरथ, चैदह नियम अवश्य ग्रहण करने चाहिए । श्रावक धर्म सहजता से स्वीकार किया जा सकता है । तीन मनोरथों में प्रार्थना समाई हुई  है । प्रभु ! वह दिन धन्य होगा जब मैं सभी प्रकार के आरंभ समारंभ से मुक्त होउंगा । प्रभु ! वह दिन धन्य होगा जब मैं श्रमण धर्म को स्वीकार करूंगा । प्रभु ! वह दिन धन्य होगा जब में संलेखना युक्त पंडित मरण को प्राप्त होगा । प्रतिदिन मनोरथों का चिन्तन करो तो हमारी भावना एक दिन अवश्य पूरी होगी ।

श्रावक सम्मेलन की अध्यक्षता मुम्बई से पहुंचे श्री सुमतिलाल जी कर्नावट ने की । इस अवसर पर सार रूप में जो चर्चाएं हुई उन्हें लुधियाना से पहुंचे समाजरत्न श्री हीरालाल जी जैन ने आचार्यश्रीजी के समक्ष रखा जो इस प्रकार है:- समाज के सभी संघों, प्रमुख सुश्रावकों ने अपने-अपने विचार रखें । ढ़ाई वर्ष मंें जो भी हुआ उस घटना के लिए सभी ने खेद जताया । तीन बातों की प्रमुखता से चर्चा हुई उसमें प्रथम बात यह थी कि आचार्य सम्राट् पूज्य श्री आत्माराम जी महाराज जो श्रमण संघ के प्राण थे उनकी गद्दी पर विराजित चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज के प्रति सभी संघ अपनी पूर्ण निष्ठा व्यक्त करते हैं । कान्फ्रेन्स मातृ संस्था है और रहेगी । तीसरी बात सभी श्रीसंघ, साधु साध्वी श्रावक श्राविका रूप चतुर्विध संघ आपके चरणों में समर्पित हैं । सभी को श्रमण संघ की एवं श्रावक वर्ग की जानकारी प्राप्त हो इसके लिए एक मासिक पत्रिका तैयार हो और श्रावक संघ का राष्ट्रीय संगठन बनें ।

इस अवसर पर आचार्य भगवंत ने कहा कि श्रावक पिता तुल्य होते हैं । वे अपने लक्ष्य को समझे । हम एक लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रहे हैं । आपने मेरे प्रति जो निष्ठा भावना व्यक्त की वह सुन्दर है । देश भर से आए प्रमुख श्रावकों के प्रति मेरी हार्दिक संवेदना और कृतज्ञता है । आज के दिवस पर आपने मंथन, चिन्तन किया । विश्वास रखा । मैं कोई अनुशास्ता नहीं बनना चाहता । केवल एक भाव है कि आचार्य भगवंत पूज्य श्री आत्माराम जी ने जिस प्रकार श्रमण संघ को सींचा है । आचार्य सम्राट् पूज्य श्री आनंद ऋषि जी महाराज ने उसमें आनंद का रस बहाया है और साहित्य कला के द्वारा जिसे सृजित किया है आचार्य सम्राट् पूज्य श्री देवेन्द्र मुनि जी महाराज ने मैं उनकी बातों को लेकर आगे बढूं । हमारे जीवन में सत्य होना चाहिए । घर बार छोड़कर केवल हम साधना पथ के लिए आगे आए हैं । हम सत्य को स्वीकार करें । इस अवसर पर सभी श्रावकों का संगठन जो साधना, सेवा और संस्कार त्रिस्तरीय कार्यक्रम करेगा उसकी घोषणा कल आचार्य भगवंत के पावन मुखारबिन्द से जन्म दिवस के शुभ अवसर पर कराई जाएगी ।

शिवाचार्यजी जन्म जयंती हर्षोल्लास  के साथ सम्पन्न

18 सितम्बर, 2005: जालंधर { दैनिक जागरण }  श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज के जीवनोपयोगी एवं सारगर्भित प्रवचन प्रतिदिन शिवाचार्य सत्संग स्थल, लक्ष्मी पैलेस, गाजी गुल्ला रोड़ पर चल रहे हैं । आज के अपनेे मंगलमय प्रवचन में उन्होंने फरमाया कि- अरिहंत प्रभु को अनंत-अनंत नमन । शासनपति प्रभु महावीर को नमन । शासनदेव, शासन माता को नमन । यह धर्म सभा, धर्म तीर्थ शासनपति प्रभु महावीर का है । हमारा परम सौभाग्य है कि हमें प्रभु के तीर्थ का अंग बनने को मिला । तीर्थ में साधु साध्वी श्रावक श्राविका चारों ही आते हैं और आज चारों तीर्थ यहां पर उपस्थित  है । जालंधर से ही नहीं पूरे भारत भर से सभी संघ यहां पर आए । अब तक आपने बहुत कुछ सुना । चर्चाएं हुई । मैं उन चर्चाओं को दोहराना नहीं चाहूंगा ।

आज का दिवस अध्यात्म युग पुरूष आचार्य सम्राट् श्री आत्माराम जी महाराज जिनका खून का हर कतरा धर्म संघ के लिए अर्पित था । उनके ऋण मुक्त नहीं हो सकते । उन्होंने समाज को सारा जीवन अर्पित किया । जीवन ही नहीं अपनी दोनों आंखे ही दे दी । पूरे शासनकाल में स्वाध्याय, शास्त्र लेखन द्वारा उन्होंने एक ज्ञान का सागर बहाया । आज मैं अन्तःकरण से स्मरण करता हूॅं । वंदन करता हूॅं । कृतज्ञता ज्ञापित करता हूं वे जहां पर भी उपस्थित हो हमें अपना आशीष देते रहें । धर्मशासन को आगे बढ़ाने में बल दंे । ऐसी महान विभूति पूरे भारत में ही नहीं समस्त विश्व में भी दृष्टिगोचर नहीं होगी । जिनके स्मृति पटल पर प्रभु महावीर का हर वचन अंकित था । उन्हें चलता फिरता शास्त्र पुस्तकालय कहा गया है । आज हम उनके शास्त्रों का स्वाध्याय करें यही उनके प्रति कृतज्ञता होगी । मैं आज आप सबसे अनुरोध करूंगा । आप अपने घर में लाईब्रेरी बनायें । आचार्यश्रीजी के सभी शास्त्र रखें और कम से कम 15 मिनिट प्रतिदिन स्वाध्याय करें । हमारे समादरणीय साधु साध्वीवृंद एक घण्टा स्वाध्याय करें । उनके एक सूत्र ने मेरा जीवन बदल दिया । उस शास्त्र के एक शब्द से कृपा निर्झरित हुई । यह हमारा नेैतिक कतव्य है कि हम स्वाध्याय अवश्य करें । आचार्यश्रीजी के समस्त शास्त्र 20 के करीब छप चुके हैं । आपको अगर आवश्यकता है तो आप वहां से मंगवा सकते हैं । कोई विद्वान बच्चा हो या जवान हो हर कोई पढ़कर सब बात समझ सकता है । आज के इस पावन दिवस पर मैं पूज्य गुरूदेव श्री ज्ञानमुनि जी महाराज को स्मरण करता हूँ । उनकी कृपा से ही शास्त्र स्वाध्याय जाप पाठ एवं प्रभु की साधना प्राप्ति मिली, सहयेाग मिला ।

 आज के इस पावन दिवस पर पंजाब प्रवर्तक पूज्य श्री शुक्लचंद जी महाराज का भी स्मरण हो आता है । यथानाम तथागुण सम्पन्न थें प्रवर्तकश्री । उनके जीवन की अनेकों घटनाएं हैं जिनका उल्लेख यहां पर किया जा सकता है । उन्होंने हलाहल पीकर सब समाज को शान्ति और समता का दान दिया । पंजाब परम्परा में उनका भी प्रमुख स्थान रहा है । जालंधर क्षेत्र पूज्य प्रवर्तकश्रीजी से अछूता नहीं रहा यहां पर उन्होंने अनेक वर्षावास बिताएं । प्रत्येक व्यक्ति उनसे अभिभूत है । महासाध्वी उपप्रवर्तिनी श्री संतोष कुमारी जी म0 का भी जन्म दिवस आज मनाया जा रहा है । मैं उनको भी हार्दिक बधाई प्रेषित करता हूूं कि वे निर्भीकवक्ता से आगे बढ़ें । संघ की गौरवमयी परम्परा को आगे बढ़ायें । ’अखिल भारतीय वर्धमान स्थानकवासी श्रमण संघीय श्रावका समिति’ का गठन भी हुआ है । मैं सभी श्रावकों को कहूंगा कि वे सभी प्रभु महावीर के श्रावक बनें । कम से कम 5 अणुव्रत ग्रहण करें । श्रमण संघ के प्रति निष्ठावान हों और धर्म के प्रचार प्रसार को आगे बढ़ायें इससे समस्त श्रीसंघ को लाभ होगा ।

श्रमण संघ में अनेक तपस्वी, ज्ञानी, ध्यानी, स्वाध्यायी संत और श्रावक हैं । हमने घर छोड़ा है तो प्रभु महावीर की साधना के प्रलोभन से छोड़ा है । हम प्रभु महावीर की साधना को भीतर उतारें । हृदय में सबके प्रति प्यार बनाये रखें । सभी प्राणियों के मंगल की भावना भीतर रखें । प्रभु ने फरमाया - ‘समय मात्र का भी प्रमाद मत करो और जो तुम्हें श्रेयस्कर लगे उस कार्य को करने में विलम्ब मत करो । हम प्रभु महावीर की वाणी को भीतर उतारें यही हमारे लिए सबसे बड़ी बात होगी ।