नवकार महामंत्रा हमें समर्पण की प्रेरणा देता है

23 जुलाई 2014: प्रशांत विहार, दिल्ली आत्मज्ञानी सद्गुरुदेव, युगप्रधन, आचार्य सम्राट पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज 

 

23 जुलाई 2014: प्रशांत विहार, दिल्ली आत्मज्ञानी सद्गुरुदेव, युगप्रधन, आचार्य सम्राट पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन फरमाया कि - जीवन जीने के दो ढंग है। जीवन को हम संघर्ष से भी जी सकते है और समपर्ण से भी। हम पूरा जीवन संघर्ष करते रहते है और अंत में तनाव मिलता है। समर्पण से जीवन जियो तो जीवन में शांति संभव है। समर्पण यानि झुकना अपने आपको समर्पित कर देना। जैन धर्म का महामंत्रा नवकार हमें समर्पण की प्रेरणा देता है। महामंत्रा नवकार की शुरूआत नमो से होती है। और उसका पहला पद है अरिहंत। तीनों लोकों में विराट सत्ता है अरिहंत। चक्रवर्ती, चैसठ इन्द्र, राजा एवं सामान्यजन अरिहंत को नमन करते है।

चैतन्य को समझने के लिए परम चैतन्य को नमस्कार किया जाता है। सत्य को समझने के लिए परम सत्य को नमस्कार किया जाता है। आप नमस्कार मंत्रा पढ़ते हो तब भीतर क्या घटित होता है? आप वर्षो से नवकार महामंत्रा पढ़ रहे हो आपको उसको पठन् से क्या मिला? जैसे दूध् पीने से ताकत मिलती है, मिश्री खाने से मुख मीठा होता है, वैसे ही नवकार महामंत्रा के जप से उस विराट सत्ता के समक्ष अपनी लघुता का अहसास होता है। हमारे भीतर अहिरंत जैसा बनने का भाव पैदा होता है। नवकार महामंत्रा पढ़ने से हम उनके साथ जुड़ जाते है। परमात्मा परमतत्त्व को प्राप्त कर गये है। वे पूर्ण बन गये हैं। मुझे भी पूर्ण बनना है। वे खिल गये हैं। मुझे खिलना है। उनके भीतर केवलज्ञान प्रकट हो गया है। उनमें तीनों लोकों को जानने व देखने की क्षमता विद्यमान है। वो क्षमता हमारे भीतर भी विद्यमान है। जैसे बीज में वृक्ष, अण्डे में पक्षी बनने का सामर्थ है। ऐसे ही आत्मा में  परमात्मा बनने का सामर्थ है।

नवकार महामंत्रा द्वारा अहम् को गलाकर अर्हम बनना है। एक मेहमान को घर बुलाना हो तो कितनी तैयारी करनी पडती है। परमात्मा को भीतर बुलाना है तो अन्तकरण को शुद्ध एवं पवित्रा करो। चंदनबाला, भीलनी एवं विधुर पत्नी जैसे भाव पैदा करो। परमात्मा अवश्य भीतर आयेगें। अरिहंत को नमन् करने से पूर्व उनसे जुड़ो। उनका परिचय प्राप्त करो। पिफर कोई भेद नही रहेगा। आप परमात्माय हो जाआगे। बेटा पिता से जुड़ता है तो उनकी सम्पत्ति का मालिक बन जाता है। हमे भी परमात्मा की सम्पत्ति का मालिक बनना है।