भक्ति से समृद्धी की प्राप्ति

12 अगस्त 2014: प्रशांत विहार, दिल्ली आत्मज्ञानी सद्गुरुदेव, युगप्रधन

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12 अगस्त 2014: प्रशांत विहार, दिल्ली आत्मज्ञानी सद्गुरुदेव, युगप्रधन, आचार्य सम्राट पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन फरमाया कि - संसार में त्रास्त, दुखित एवं पीड़ित मानव के लिए एक ही उपाय है - भगवान का नाम स्मरण। भगवान के नाम में असीम शक्ति है। आवश्यकता है केवल श्रद्धा की। श्रद्धा के बिना लाखों जन्म भी बीत जाये कुछ नहीं प्राप्त होगा।

श्रद्धा साधना की शुरुआत है। श्रद्धा के बिना जीवन अधुरा है। यदि हमने अपने रूटीन लाइफ में डाक्टर की दवा पर विश्वास नहीं किया तो वह दवा भी नहीं लगती। कई बार हमारे जीवन में कोई संकट आता है तो हम हर प्रकार के मंत्रा, स्तोत्रा का पाठ करते हैं। यह सोचकर कि कोई न कोई मंत्रा तो असर करेगा ही। यह श्रद्धा की कमी है। यदि श्रद्धा है तो एक नवकार मंत्रा ही बहुत है।

लोगस्स पाठ में चैबीसों तीर्थंकरों की स्तुति द्वारा भक्ति की वर्षा की गई है। जैन समाज में इस पाठ का बहुत अधिक महत्व है। इसके प्रत्येक शब्द में भक्ति का अखण्ड स्रोतः छिपा हुआ है। अगर कोई भक्त पद-पद पर भक्तिभाव से भरे हुए अर्थ का रसास्वादन करता है तो वह अवश्य ही आनन्दविभोर हुए बिना नहीं रहता। भक्त की भक्ति, भक्त को भगवान से जोड़ देती है। भक्ति में विनय है और भक्ति से अहंकार टूटता है। साध्क की शुरुआत प्रभु भक्ति से होती है। भक्ति में तन्मयता आने पर सद्गुरु का संयोग होता है। सद्गुरु के संयोग से सम्यक् ज्ञान, ध्यान और साध्ना की प्राप्ति होती है। उस पर चलकर व्यक्ति साधक बनता है। वह साधक एक दिन भक्ति का वरण करता है।

देहली पर रखा हुआ दीपक अन्दर और बाहर दोनों ओर प्रकाश पैफलाता है। भगवान का नाम स्मरण करने से अन्दर और बाहर दोनों जगत प्रकाशित होते हैं। वह हमें बाह्य जगत में रहने के लिए विवेक का प्रकाश देते हैं ताकि हम लोग बिना किसी बाध के यात्रा तय कर सकें। अन्तर जगत में भी प्रकाश होता है जिससे हम अहिंसा, सत्य आदि के पथ पर चलकर परलोक को भी सुन्दर बना सकते हैं। मनुष्य जैसी श्रद्धा करता है, जैसा संकल्प करता है वैसा ही बन जाता है। वीरों के नाम से वीरता के भाव पैदा होते हैं, कायरों के नाम से भीरुता के भाव। जिस वस्तु का हम नाम लेते हैं हमारा मन तत्क्षण उसी आकार का हो जाता है। साधु का नाम लेने से हमें साधु का ध्यान हो आता है। ठीक उसी प्रकार पवित्रा पुरुषों का नाम लेने से सब विषयों से हमारा ध्यान हट जायेगा और हमारी बुद्धी महापुरुषों के समान हो जायेगी।

भगवान ऋषभदेव का नाम लेने से हमें मानव सभ्यता के आदिकाल का ध्यान आता है। किस प्रकार ऋषभदेव ने वनवासी, निष्क्रिय अबोध् मानवों को सर्वप्रथम मानव सभ्यता का पाठ पढ़ाया। मनुष्य को रहन-सहन सिखाया। व्यक्तिवादी से हटाकर समाजवादी बनाया। परस्पर प्रेम और स्नेह का आदर्श स्थापित किया। अहिंसा और सत्य आदि का उपदेश देकर लोक-परलोक दोनों को उज्ज्वल बनाया।

भगवान नेमीनाथ का नाम हमें दया की चरम भूमिका पर पहुंचा देता है। पशु-पक्षियों की रक्षा के निमित्त वे किस प्रकार विवाह को ठुकरा देते हैं। राजमती जैसी पत्नी को बिना स्वीकार किए स्वर्ण-सिंहासन को लात मारकर भिक्षु बन जाते हैं। जरा कल्पना कीजिए आपका हृदय दया, त्याग और वैराग्य के सुन्दर भावों से गद्गद् हो उठेगा।

भगवान पाश्वनाथ हमें गंगा तट पर कमठ जैसे मिथ्या कर्मकाण्डी को बोध् देते हैं एवं धधकती हुई अग्नि में से नाग-नागिन को बचाते हुए नजर आते हैं और कमठ का उपद्रव सहन करते हैं परन्तु विरोधी पर जरा भी क्षोभ नहीं आता। कितनी बड़ी क्षमा है।

भगवान महावीर के जीवन की झांकी देखिए वे बारह वर्ष की कठोर एकान्त साध्ना करते हैं। भीषण एवं लोमहर्षक उपसर्गों को सहन करते हैं। पशुमेध् और नरमेध् जैसे मिथ्या विश्वासों पर कठोर प्रहार करते हैं। अछूत एवं दलितों के प्रति कितनी ममता, कितनी आत्मीयता है। गरीब ब्राह्मण को अपने शरीर पर के एक मात्रा वस्त्रा को दान देते हैं। चन्दना के हाथों उदड़ के उबले दाने भोजनार्थ लेते हैं। गौतम जैसे प्रिय शिष्य को भी भूल के अपराध् में दण्ड देते हैं। इस प्रकार दिव्य रूप की कल्पना करेंगे तो धन्य-धन्य हो जायेंगे। महात्मा के नाम स्मरण स्तुति से आत्मा परमात्मा बनने का मार्ग मिलता है। लोगस्स में अनन्त शक्ति है। लोगस्स मांगलिक है, कल्याणकारी है।