सुख अपने भीतर खोजो

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13 अगस्त 2014: प्रशांत विहार, दिल्ली आत्मज्ञानी सद्गुरुदेव, युगप्रधन, आचार्य सम्राट पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि - महामंत्रा नवकार में किसी व्यक्ति का नाम नही है। किसी धर्म का नाम नहीं। किसी सम्प्रदाय का नाम नही। अरिहंत वो व्यक्ति, वो आत्मा जिन्होंने अपने को जीत लिया, अपने को पहचान लिया। जो स्वयं का मालिक हो गया। भगवान ने 15 प्रकार के सिकहे हैं। जिनमें गृहस्थ भी सिद्ध हो सकता है। स्त्री, पुरुष, नपुंसक आदि किसी भी धर्म संप्रदाय का व्यक्ति सिहो सकता है। सिद्ध यानि अपने स्थान को प्राप्त करना। अपना स्थान यानि मोक्ष। अपने स्थान को भी वही व्यक्ति प्राप्त कर सकता है, जिसमें सरलता है, जिसके हृदय में पवित्राता है, शुद्धता है। सुख तुम्हारे भीतर है परन्तु सुख हम कहाँ ढूढ़ते है। सुख हम संबंधें में, परिवार में, क्लबों में, बाहर घूमने में ढूंढ़ते है।

भगवान कहते है कि - बाहर सुख ढूंढ़ना वैसे है जैसे कि पानी बिलोकर मक्खन को प्राप्त करना। पर पदार्थो से सुख प्राप्त नही हो सकता। जिन्होंने ने भी पद पाया, दुःख पाया, जिन्होंने भी परिवार पाया उन्होंने आखिर में दुःख पाया। सिकन्दर, तैमूरलिंग, नादिरशाह, चंगेज खां ये सभी विश्व विजेता बनने निकले थें परन्तु इन्होंने आखिर में दुःख ही पाया। सुख तुम्हारी आत्मा में है। हम देवलोक गये तो देवलोक में सुख माना। हीरे-जवाहरात में सुख माना। देवलोक में बडे़-बडे़ देवालय, हीरे जवाहरात, सुंदर-सुन्दर अप्सराएं इतना सुख मिला परन्तु हम वहाँ से भी खाली लौट आये। राजा, महाराजा, सेठ, साहुकार सभी यही करते रहे है। इस देह से अमृत पाया जा सकता है। इस देह से सिद्ध गति को प्राप्त किया जा सकता है। इस देह से अरिहंत पद को प्राप्त किया जा सकता है। परन्तु जिस प्रकार मकड़ी अपना जाल बनाती है और खुद ही उसमें फंस जाती है। उसी प्रकार सांसारिक जीव भी पूरा जीवन धन कमाने में, पद, प्रतिष्ठा पाने में, परिवार बढ़ाने में, संबंध् बनाने में व्यतीत कर देता है परन्तु आखिर में पछताता है।

क्या थी प्रभु महावीर की सामायिक, क्या थी प्रभु महावीर की समता, कैसा था प्रभु महावीर का मौन, कैसी थी प्रभु महावीर की करुणा, कैसा था प्रभु महावीर का तप, कैसी थी प्रभु महावीर की क्षमा, कैसी थी प्रभु महावीर की साधना। जो प्रभु महावीर ने किया वही करो। प्रभु महावीर कभी नही कहते है दुकान खोलो, परिवार बढ़ाओं। प्रभु महावीर कहते है ‘समयं गोयम मा पमायए’। प्रभु महावीर गौतम को भी अपने से मोह छोडने को कहते है। प्रभु महावीर का तीर्थ वंदनीय है, निंदनीय नही। अरिहंत की स्तुति से, महावीर जयंती बनाने से, महावीर के जय-जयकार लगाने से अब तक मोक्ष नही हुआ। ये चातुर्मास अरिहंत बनने की साधना का पथ है। जो कुछ आप को मिला है। अपने कर्मों से मिला है। किसी को दोष मत देना। मैंने किया-मैंने किया कर्ताभाव का पोषण किया। कर्ता भाव से जुडे़ तो शरीर से जुडे़, शरीर से जुड़ गये तो पुण्य का बंधन। तुम निमित्त हो बाकी सब संयोग है। जो कुछ भी कार्य करो। दान करो, प्रवचन करो, सामायिक करो। सब करते हुए केवल यही सोचो मुझे अवसर मिला। महावीर की सारी साधना का सार दृष्टा भाव है। गीता में कृष्ण कहते है कर्ता मत बन। साक्षी हो जा। सामायिक करो तो दृष्टा भाव, महामंत्रा का जाप करो तो दृष्टा भाव।

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