PARVACHANMALA Prashant Vihar, Delhi -2014

शिवाचार्यश्री जी का चातुर्मास हेतु प्रशांत विहार में मंगलमय पदार्पण चातुर्मास में हो दृष्टि परिवर्तन: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

 

श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टध्र, आत्मज्ञानी सद्गुरुदेव युगप्रधन आचार्य सम्राट पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने दिनांक 7 जुलाई 2014 को प्रातःकाल की मंगल बेला में 7.05 बजे जैन स्थानक उत्तरी पीतमपुरा में श्र(ालुओं को मंगल पाठ प्रदान कर चातुर्मास प्रवेश हेतु प्रस्थान किया। शोभायात्रा की शुरुआत में जैन ध्र्म-ध्वज, प्रशांत विहार श्रीसंघ का बैनर, ओपन कार में मंगल प्रवेश अभिनन्दन समारोह के गणमान्य अतिथि, मंगल कलश लिए बहनें, चंदन बाला महिला मंडल, श्राविका समिति दिल्ली प्रदेश एवं समग्र भारत के विभिन्न आंचलों से आये श्रावक-श्राविकायें, युवक-युवतियां भगवान महावीर के जयनादों के साथ मंगल प्रवेश की शोभा बढ़ा रहे थे। शोभायात्रा में अनेक स्थानों पर श्रावक-श्राविकाओं के जलपान की व्यवस्था थी। शोभायात्रा को सुन्दर रूप देने में श्री रजनीश जैन, युवाध्यक्ष, दिल्ली प्रदेश जैन काॅन्प्रफेन्स, श्री सौरभ जैन, श्री सु नील जैन का विशेष योगदान रहा।

श्र(ेय आचार्य सम्राट पूज्य श्री शिवमुनि जी म.सा., उपाध्याय श्री रवीन्द्र मुनि जी म.सा., सलाहकार श्री तारक ट्टषि जी म.सा., श्रमण संघीय मंत्राी श्री शिरीष मुनि जी म.सा., हेमकुल दिवाकर श्री ट्टषभ मुनि जी, उपप्रवर्तिनी महासाध्वी श्री सरिता जी म.सा., उपप्रवर्तिनी महासाध्वी श्री सुशील कुमारी जी ‘बेबी’ म.सा., उपप्रवर्तिनी महासाध्वी श्री सुषमा जी म.सा., महासाध्वी श्री शशिप्रभा जी म.सा., महासाध्वी यशाश्री जी म.सा., महासाध्वी श्री रश्मि जी म.सा., महासाध्वी श्री शिवा जी म.सा., महासाध्वी श्री मनीषा जी म.सा., महासाध्वी वैभवश्री जी म.सा., महासाध्वी श्री मनोरमा जी म.सा., महासाध्वी श्री सूर्या जी म.सा., महासाध्वी श्री प्रज्ञा जी म.सा. आदि 50 से 55 साध्ु-साध्वीवृंद शिवाचार्य श्री जी के मंगल प्रवेश में शामिल थे।

प्रातः 8.15 बजे श्र(ेय आचार्य भगवन् ने चतुर्विध् श्रीसंघ की साक्षी में जैन स्थानक में मंगल चातुर्मास प्रवेश किया। प्रवेश के साथ ही शोभायात्रा अभिनंदन समारोह में परिवर्तित हो गई। सभा का मंगलाचरण उपाध्याय श्री रवीन्द्र मुनि जी ने किया। क्षेत्रा शु(ि के लिए 21 नवकार महामंत्रा का सामुहिक सस्वर जाप किया गया। 

शिवाचार्य उद्बोध्न:- 

इस अवसर पर आचार्यश्री जी ने अपनी अमृतवाणी में पफरमाया कि - महाविदेह क्षेत्रा से भरत क्षेत्रा में अपनी वाणी बरसाने वाले अरिहंत परमात्मा श्री सीमंध्र स्वामी एवं सि(गति को प्राप्त शासनपति प्रभु महावीर स्वामी की असीम कृपा से आज का चातुर्मास प्रवेश भारत की राजधनी दिल्ली प्रान्त के प्रशंात विहार क्षेत्रा में हुआ है। यह प्रवेश आपके लिए, हमारे लिए, हम सबके लिए मंगलकारी हो। चातुर्मास का प्रवेश एक तीर्थ की आराध्ना का समय है। तीर्थ वंदनीय है।

आचार्यश्री जी ने कह आप सबने मेरा स्वागत किया, मैं आप सब का स्वागत अभिनन्दन करता हूं। प्रभु महावीर की साध्ना उनका तप, उनका ध्यान मंगल रूप है। हम सभी उसे अपनाएं। प्रभु महावीर ने आत्मा को महत्व दिया, हम सभी शरीर को महत्व देते हैं। तीन बातें दुर्लभ है - अरिहंत की वाणी, सि( का स्मरण और सद्गुरु का संग। अरिहंत की वाणी आपको ध्यान-साध्ना शिविरों के माध्यम से प्राप्त होगी। हम सभी प्रतिदिन सि( का स्मरण करेंगे और अरिहंत तथा सि( से मिलने के लिए सद्गुरु एक माध्यम होता है। इसे पाने हेतु हमें पुरुषार्थ करना है। प्रभु महावीर श्रमण हैं। श्रम दो प्रकार का है। संसार का, सि(गति का। हमें मुक्ति के लिए श्रम करना है। भगवान महावीर को श्रमण कहा, किसलिए? भगवान महावीर ने अपनी साध्ना काल में साढ़े बारह वर्ष कठोर श्रम किया और पूर्णतः कर्म निर्जरा करके केवलज्ञान प्राप्त किया। आज से हमारा श्रम केवल कर्म निर्जरा का होगा। चातुर्मास में हमारा लक्ष्य है, हम भरपूर श्रम करें, किसी का मन न दुखाएं। हम किसी ध्र्म गुरु की निंदा नहीं करेंगे। किसी को कष्ट न दें, प्रभु के पथ पर अग्रसर हो।

चातुर्मास में अध्यात्म की गहराई में प्रवेश करें। अध्यात्म वह रत्न है जो ध्न देकर नहीं खरीदा जा सकता। अध्यात्म वह परमध्न है जो हमें शांति, समृ(ि, आनंद की ओर ले जाता है। ध्र्म प्रदर्शन नहीं। ध्र्म अन्तर्यात्रा है। तीर्थंकर भगवान उस अन्तर्यात्रा के अनुसंधन हैं। तिरने योग्य को तारना इनका नियम है और पार उतारना इनका ध्र्म है।

चातुर्मास के भीतर, सेवा, सत्संग, स्वाध्याय के साथ-साथ साध्ना को भी महत्व दें। ध्यान शिविर में शु( वीतराग साध्ना की सामायिक होगी। चातुर्मास में रात्रि भोजन, जमीकंद, कुशील सेवन आदि का त्याग करें। इस चातुर्मास में दृष्टि परिवर्तन होगा। बस आपने भगवान महावीर की करुणा, तप, दान, मैत्राी, साध्ना को आत्मसात् करने का पुरुषार्थ करना है। इस चातुर्मास में आखों से प्रभु दर्शन, कानों से जिनवाणी श्रवण, हाथों से सेवा, पैरों से ध्र्मस्थान में आना तथा मन से सबके लिए मंगलकामना करनी है।

बृहद् साध्ु सम्मेलन की चर्चा कापफी समय से चल रही है। सन् 2015 में साध्ु सम्मेलन कराने हेतु श्रमण संघीय पदाध्किारी सन्तों को पत्रा एवं विज्ञप्तियां प्रेषित की है। आगे आने वाले उचित समय पर साध्ु सम्मलेन के स्थान एवं दिन की घोषणा होगी। आप सभी साध्ु सम्मेलन के लिए सकारात्मक रूप से जागृत हो। आज के इस अवसर पर जैन काॅन्प्रफेंस, श्रावक समिति, दिल्ली महासंघ एवं दूर दराज से आये सभी श्र(ालुओं के लिए मैं हार्दिक मंगलकामना करता हूँ। 

इस अवसर पर बहन श्रीमती कमलेश जैन, श्राविका समिति - दिल्ली प्रदेश, चंदनबाला महिला मंडल - अशोक विहार, श्रीमती प्रवीन जैन - लुध्यिाना, श्रीमती रूचिरा सुराना - मुंबई, डाॅ सुदेश जैन - पंजाबी बाग, श्री महेन्द्र पगारिया - राष्ट्रीय युवा अध्यक्ष जैन काॅन्प्रफेंस, श्री रमेश भण्डारी - राष्ट्रीय महामंत्राी जैन काॅप्रफेंस, श्री महेन्द्र जैन - महामंत्राी अशोक विहार श्रीसंघ, श्री अशोक जैन - प्रधन राणा प्रताप बाग, श्री विनय जैन देवबंदी, श्री शिखरचन्द जैन - कोषाध्यक्ष, प्रशांत विहार, श्री जितेन्द्र जैन - महामंत्राी प्रशंात विहार आदि ने शिवाचार्य श्री जी के मंगल प्रवेश पर अपनी भावनायें अभिव्यक्त की। 

इस अवसर पर महासाध्वी श्री शिवप्रज्ञा जी, महासाध्वी मनीषा जी, महासाध्वी रूपिका जी, महासाध्वी प्रज्ञा जी, महासाध्वी सूर्या जी, महासाध्वी रश्मि जी, महासाध्वी अंजलि जी, महसाध्वी संगीतश्री जी, उप प्रवर्तिनी डाॅ श्री सरिता जी म.सा, मध्ुर गायक श्री निशांत मुनि जी, युवा मनीषी श्री शुभम् मुनि जी, उप प्रर्वतक श्री आशीष मुनि जी, मध्ुर वक्ता डाॅ. सुयोग ट्टषि जी, श्रमण संघीय मंत्राी श्री शिरीष मुनि जी संघरत्न उपाध्याय श्री रवीन्द्र मुनि जी आदि ने चातुर्मास प्रवेश पर अपनी मंगल भावनायें शुभकामनाएं प्रदान की।

अभिनन्दन समारोह में राजकीय अतिथि स्थायी समिति की डिप्टी चेयरपर्सन श्रीमती रेखा गुप्ता, रोहिणी जोन के चेयरमेन श्री ताराचंद बंसल, निर्माण समिति के चेयरमेन श्री प्रवेश वाही, लाॅ समिति की चेयरपर्सन डाॅ. नीलम गोयल उपस्थित थी। इन सभी नेे आचार्य भगवन्त का अभिनंदन किया।

समारोह की अध्यक्षता सुश्रावक श्री जितेन्द्रनाथ रवीन्द्रनाथ जैन ने की। जैन कान्प्रेंफस के राष्ट्रीय प्रमुख मार्गदर्शक श्री आनन्द प्रकाश जैन समारोह के गौरव अतिथि थे। स्वागताध्यक्ष श्री खजांची लाल सुशील कुमार जैन बड़ौदा वाले थे। जैन काॅन्प्रेंफस दिल्ली के अध्यक्ष श्री अतुल जैन, युवारत्न श्री रजनीश जैन, श्रावक समिति के समस्त पदाध्किारी सहित अनेक गणमान्य भक्तजन समारोह मंे उपस्थित थे। एस. एस. जैन सभा प्रशांत विहार की ओर से चेयरमेन श्री मोहन लाल जैन, प्रधन श्री जगदीश प्रसाद जैन, महामंत्राी श्री जितेन्द्र जैन, कोषाध्यक्ष श्री शिखर चन्द जैन ने सभी का स्वागत अभिनन्दन किया। कार्यक्रम का संचालन श्री जितेन्द्र जैन ने बहुत ही सुन्दर ढंग से किया। आचार्य भगवन् के मंगल प्रवेश को भव्य रूप देने के लिए उपाध्यक्ष श्री कैलाश जैन, मंत्राी श्री रामभगत जैन, कार्यकारिणी सदस्य श्री सुरेश जैन, श्री सुशील जैन, श्री नरेन्द्र जैन, श्री रवीन्द्र जैन सी.ए. का विशेष योगदान रहा।

नवकार महामंत्रा हमें समर्पण की प्रेरणा देता है: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

23 जुलाई 2014: प्रशांत विहार, दिल्ली; आत्मज्ञानी सद्गुरुदेव, युगप्रधन, आचार्य सम्राट पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन मंे पफरमाया कि - जीवन जीने के दो ढंग है। जीवन को हम संघर्ष से भी जी सकते है और समपर्ण से भी। हम पूरा जीवन संघर्ष करते रहते है और अंत में तनाव मिलता है। समर्पण से जीवन जियो तो जीवन में शांति संभव है। समर्पण यानि झुकना अपने आपको समर्पित कर देना। जैन ध्र्म का महामंत्रा नवकार हमें समर्पण की प्रेरणा देता है। महामंत्रा नवकार की शुरूआत नमो से होती है। और उसका पहला पद है अरिहंत। तीनों लोकों में विराट सत्ता है अरिहंत। चक्रवर्ती, चैसठ इन्द्र, राजा एवं सामान्यजन अरिहंत को नमन करते है। 

चैतन्य को समझने के लिए परम चैतन्य को नमस्कार किया जाता है। सत्य को समझने के लिए परम सत्य को नमस्कार किया जाता है। आप नमस्कार मंत्रा पढ़ते हो तब भीतर क्या घटित होता है? आप वर्षो से नवकार महामंत्रा पढ़ रहे हो आपको उसको पठन् से क्या मिला? जैसे दूध् पीने से ताकत मिलती है, मिश्री खाने से मुख मीठा होता है, वैसे ही नवकार महामंत्रा के जप से उस विराट सत्ता के समक्ष अपनी लघुता का अहसास होता है। हमारे भीतर अहिरंत जैसा बनने का भाव पैदा होता है। नवकार महामंत्रा पढ़ने से हम उनके साथ जुड़ जाते है। परमात्मा परमतत्त्व को प्राप्त कर गये है। वे पूर्ण बन गये हैं। मुझे भी पूर्ण बनना है। वे खिल गये हैं। मुझे खिलना है। उनके भीतर केवलज्ञान प्रकट हो गया है। उनमें तीनों लोकों को जानने व देखने की क्षमता विद्यमान है। वो क्षमता हमारे भीतर भी विद्यमान है। जैसे बीज में वृक्ष, अण्डे में पक्षी बनने का सामर्थ है। ऐसे ही आत्मा में  परमात्मा बनने का सामर्थ है। 

नवकार महामंत्रा द्वारा अहम् को गलाकर अर्हम बनना है। एक मेहमान को घर बुलाना हो तो कितनी तैयारी करनी पडती है। परमात्मा को भीतर बुलाना है तो अन्तकरण को शु( एवं पवित्रा करो। चंदनबाला, भीलनी एवं विध्ुर की पत्नी जैसे भाव पैदा करो। परमात्मा अवश्य भीतर आयेगें। अरिहंत को नमन् करने से पूर्व उनसे जुड़ो। उनका परिचय प्राप्त करो। पिफर कोई भेद नही रहेगा। आप परमात्माय हो जाआगे। बेटा पिता से जुड़ता है तो उनकी सम्पत्ति का मालिक बन जाता है। हमे भी परमात्मा की सम्पत्ति का मालिक बनना है।

आचार्य सम्राट के मंगलमय प्रवचन जैन स्थानक ए-ब्लाॅक प्रशांत विहार में प्रातः 08.15 बजे से 09.30 तक प्रतिदिन हो रहे है। दोपहर में 04.00 बजे से 05.00 बजे तक सामुहिक स्वाध्याय होता है।

दिनांक 27 जुलाई को श्रमण संघ के द्वितीय पट्टध्र आचार्य सम्राट पूज्य श्री आनंद ट्टषि म.सा. का 115 वां जन्मोत्सव सामुहिक आयम्बिल दिवस के रूप में मना रहे है। इस अवसर पर सामायिक की पंचरंगी एवं लोगस्स का सामुहिक जाप होगा। 

श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टध्र आचार्य सम्राट पूज्य श्री शिवमुनि जी म.सा. के जीवनोपयोगी अमृतमय प्रवचन पारस चैनल पर प्रतिदिन प्रातः 8.05 से 8.25 बजे तक प्रसारित हो रहे हैं। पारस चैनल - डिश टी.वी-571, टाटा स्काई-188, एयरटेल-696, वीडियोकाॅन-681, डेन-874 पर उपलब्ध् है। आप सभी कार्यक्रमों में अवश्य सहभागी बनें। यह जानकारी एस.एस. जैन सभा, प्रशांत विहार के महामंत्राी श्री जितेन्द्र जैन ने दी। 

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प्रवचन प्रातः 8ः05 से 8ः25 पारस चैनल पर 

 

आचार्य श्री आनंद ट्टषि जी संघ संगठन के सजग प्रहरी थे

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

27 जुलाई 2014: प्रशांत विहार, दिल्ली; आत्मज्ञानी सद्गुरुदेव, युगप्रधन, आचार्य सम्राट पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन मंे पफरमाया कि - आज हम सभी श्रमण संघ के द्वितीय पटट्ध्र आचार्य सम्राट पूज्य श्री आनंद ट्टषि जी म.सा. का जन्मोत्सव मना रहे हैं। उस महान विभूति को हम क्या अर्पित कर सकते है? उनका नाम आनंद ट्टषि था। जैसा नाम वैसी वाणी,  उनको सुनने में आनंद, उनके पास बैठने में आनंद का स्रोत बहता था। अनुकूल प्रतिकूल अवस्था में भी उनका जीवन आनंदमय था। आज उनके जन्मोत्सव पर अपनी समस्त शिकायतों को खत्म कर दे। ट्टषि का अर्थ होता है जो प्रकृति के नियमानुसार रहता है। उन्होंने अपने जीवन में अपने नाम को सार्थक किया। हमें भी उनके नाम को अपने जीवन में लेकर आना है।

महापुरुष का जीवन हमें प्रेरणा देता हैं। आचार्य श्री जी आचार्य बनने के बाद जब पंजाब पधरे। तो मैंने उनके साथ विहार किया। उन्हें गोचरी आदि दिलवाई। वें हर परिस्थिति में समभाव में रहते थे। गुण-ग्राहकता, सरलता उनके गुण थे। वे कुशलवक्ता थे। उन्होंने सम्पूर्ण भारतवर्ष का भ्रमण किया। वे शांत एवं संवेदनशील थे। दूसरों के दुःख को देखकर उनका हृदय द्रवित हो जाता है। मैंने संत बनने के बाद पूना के अन्दर उनके चरणों को साÂिध्य पाया। उनके हाथों का कोमल स्पर्श आज भी उनकी स्मृति को जीवंत कर देता है। मैंने युवाचार्य बनने के बाद ईगतपुरी में ध्यान साध्ना की तो मेरा बहुत विरोध् हुआ। मैं ध्यान के बाद अचार्य श्री के चरणों में पहुँचा तो आचार्य श्री जी से वार्तालाप किया। उस समय आचार्य श्री जी ने पफरमाया कि मैं ध्यान का विरोध् नहीं करता। आचार्य श्री जी ने 30 वर्ष तक श्रमण संघ के संगठन का पूर्ण ध्यान रखा। आचार्य श्री जी संघ संगठन के सजग प्रहरी थे। उनके चिंतन में चेतना और व्यवहार में कुशलता थी। वें अपने जीवन में विद्या और तप को महत्व देते थे। आयंबिल तप उन्हें प्रिय था। ऐसे महापुरुष का जन्मोत्सव हम सामूहिक आयंबिल दिवस तथा सामायिक की पंचरंगी के माध्यम से मनाना रहे हैं। आज आचार्य श्री जी का गुणगान करना तभी सार्थक होगा जब हम उनके गुण को अपने जीवन में आत्मसात् करेंगे। 

इस अवसर पर श्रमण संघीय मंत्राी श्री शिरीष मुनि जी, युवा मनीषी श्री शुभम् मुनि जी, मध्ुर गायक श्री निशांत मुनि जी, महासाध्वी श्री मनोरमा जी, महासाध्वी श्री यशा जी, महासाध्वी डाॅ. शिवा जी, महासाध्वी प्रज्ञा जी, महासाध्वी सिमरन जी आदि ने अपनी भावनाएं अभिव्यक्त की। श्री संघ के महामंत्राी श्री जितेन्द्र जैन ने इस अवसर पर उस महान आचार्य को अपनी भावांजली प्रस्तुत की। 

इस अवसर पर सामूहिक आयंबिल एवं सामूहिक सामायिक की पंचरंगी तथा सस्वर सामूहिक लोगस्स का जाप किया गया। दिल्ली के अनंेक क्षेत्रों से दर्शनार्थी उपस्थित हुए। विशेषकर जैन काॅन्प्रफेंस की दिल्ली शाखा के सदस्य उपस्थित हुए। 

आचार्य सम्राट के मंगलमय प्रवचन जैन स्थानक ए-ब्लाॅक प्रशांत विहार में प्रातः 08.15 बजे से 09.30 तक प्रतिदिन हो रहे है। दोपहर में 04.00 बजे से 05.00 बजे तक सामुहिक स्वाध्याय होता है। 

श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टध्र आचार्य सम्राट पूज्य श्री शिवमुनि जी म.सा. के जीवनोपयोगी अमृतमय प्रवचन पारस चैनल पर प्रतिदिन प्रातः 8.05 से 8.25 बजे तक प्रसारित हो रहे हैं। पारस चैनल - डिश टी.वी-571, टाटा स्काई-188, एयरटेल-696, वीडियोकाॅन-681, डेन-874 पर उपलब्ध् है। आप सभी कार्यक्रमों में अवश्य सहभागी बनें। यह जानकारी एस.एस. जैन सभा, प्रशांत विहार के महामंत्राी श्री जितेन्द्र जैन ने दी। 

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अरिहंत मोक्ष मार्ग के नेता है: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

29 जुलाई 2014: प्रशांत विहार, दिल्ली; आत्मज्ञानी सद्गुरुदेव, युगप्रधन, आचार्य सम्राट पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन मंे पफरमाया कि - नमो अरिहंताण पर चर्चा चल रही है। अरिहंत वो है जिन्होंने अपने शत्राुओं को जीत लिया। अरिहंत मोक्ष मार्ग के नेता है। उन्होंने अपने घनघाती कर्मों को भेद लिया है। वे विश्व के समस्त तत्त्वों को जानने वाले ज्ञाता है। ऐसे उत्तम गुणों के धरक अरिहंत को मैं नमन् करता हूँ। 

अरिहंत वो है जिन्होंने अपने आप को जीता। संसार में ऐसे बहुत से लोग हैं, जो दूसरों को व दुनिया को जीतने में लगे है। सिकन्दर विश्व विजेता बनना चाहता था। अपनी विजय यात्रा में वह डायोजनीज से मिला। वह एक नंगा पफकीर समुद्र के किनारे रेत पर मस्ती में लेटा हुआ था। डायोनीज ने सिकन्दर से प्रश्न किया कि तुम क्या करना चाहते हो। तब सिकन्दर ने कहा कि मैं विश्व को जीतना चाहता हँू और उसके बाद आनंदपूर्वक रहूँगा। डायोजनीज ने कहा इतना करने की क्या आवश्यकता है। अभी आनंद में आ जाओं। वस्तुतः दूसरों को जीतने वाला स्वयं हारा हुआ होता हैं। सिकन्दर का विश्व विजय का स्वप्न अध्ुरा रहा गया और उसकी मृत्यु हो गई। संयोग से डायोजनीज भी मर गया। दोनों स्वर्ग की ओर जा रहे थे। तो सिकन्दर ने कहा आज पिफर सम्राट से भिखारी की मुलाकात हो गई। डायोजनीज ने कहा सिकन्दर तुम सत्य कहते हो। परन्तु यह जान लो कि सम्राट कौन है? और भिखारी कौन है। डायोजनीज के पास कुछ भी नही था। पिफर भी वह सम्राटों का सम्राट था। और सिकन्दर के पास सब कुछ होकर भी वह भिखारी था।

आज के मानव की दौड़ सिकन्दर की तरह हो गई है। वह अपने अंहकार को लेकर बैठा हुआ है। जब तक वह अपना अंहकार नही छोडे़गा। तब तक अरिहंत तत्त्व को प्राप्त नही कर पायेगा। तृष्णाएं कभी शांत नही होती। अमेरिका का ध्नाढ़य व्यक्ति एन्ड्रयू कारनेगी दस मिलियन डाॅलर का मालिक होने पर भी संतोषी नही था। उसके भीतर सौ मिलियन डाॅलर एकत्रित करने की इच्छा थी। याद रखों ध्न कभी भी साथ नही देगा। ध्न का कमाना, संभालना, उपभोग करना और त्याग करना यह सब कठिन है। आप जो ध्न की दौड़ में दिन-रात दौड़ रहे हो। उसे यही छोड़कर जाना है। स्वयं को जीतों। अपने शत्राुओं को जीतो और मोक्ष मार्ग की ओर अग्रसर हो जाओ। 

आचार्य सम्राट के मंगलमय प्रवचन जैन स्थानक ए-ब्लाॅक प्रशांत विहार में प्रातः 08.15 बजे से 09.30 तक प्रतिदिन हो रहे है। दोपहर में 04.00 बजे से 05.00 बजे तक सामुहिक स्वाध्याय होता है।

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बेटियों से प्रभु महावीर के तीर्थ की पूर्णाहूति होती हैं

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

जैन काॅन्प्रफेंस युवा शाखा दिल्ली प्रदेश के द्वारा प्रशांत विहार में हुआ बेटी बचाओ अभियान का आगाज 

09 अगस्त 2014: प्रशांत विहार, दिल्ली ; द्ध श्री आॅल इंडिया श्वे. स्था. जैन काॅन्प्रफेंस युवा शाखा दिल्ली प्रदेश के द्वारा आज बेटी बचाओ अभियान का आगाज प्रशांत विहार में हुआ। इस अवसर पर आचार्य भगवन् की साक्षी में सैकड़ों की संख्या में भाई-बहनों ने बेटी बचाने की शपथ लेते हुए शपथ पत्रा पर हस्ताक्षर किये। 

बेटी बचाओ अभियान के जागरूकता रैली की शुरूआत आचार्य भगवंत के आशीर्वाद से एवं श्रमण संघीय मंत्राी श्री शिरीष मुनि जी के मंगल पाठ द्वारा सुबह ठीक आठ बजे महाराजा अग्रसेन भवन से हुई। जिसमें जैन युवा काॅन्प्रफेंस के समस्त कार्यकर्ता और सैकड़ों स्कूली बच्चों ने प्रशांत विहार के समस्त ब्लाॅकों से गुजरते हुए गली-गली और चैराहों पर बेटी बचाओ के नारों से आकाश को गुंजायमान किया। रैली नौ बजे प्रशांत विहार स्थानक में पहुँचकर सभा के रूप में परिवर्तित हो गई।

इस अवसर पर आत्मज्ञानी सद्गुरुदेव, युगप्रधन, आचार्य सम्राट पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन मंे पफरमाया कि - कन्या भ्रुण हत्या महापाप है। ऐसा करना कलंक के समान है। सबको जीने का अध्किार हैं। आचार्य भगवन् ने अपने प्रवचन में बेटी बचाओ आंदोलन का शंखनाद करते हुए कहा कि इस अभियान की संसार को अत्यंत आवश्यकता है। हम सब मानते है कि बेटी के बिना संसार अध्ुरा है। बेटी संसार की जन्मदात्राी है। भगवान को जन्म देने वाली बेटी है। रत्नकुक्षी कहलाने वाली बेटी है। पफूलों को मसलने पर पफल प्राप्त नही होते। और कली को कुचल दोगे तो पफल, पफूल, महक कहाँ से प्राप्त होगी। गर्भ में बेटी की हत्या प्रकृति के विरू( है। आज के वैज्ञानिक युग में गर्भ में बेटा है या बेटी अल्ट्रासाउन्ड मशीन के द्वारा पहले ही जान लिया जाता है। आजकल बेटियों की गर्भ में ही हत्या की जाती है। इस वीभत्स कार्य में कोई भी पीछे नही है। चाहे वह जैन है या अजैन। गर्भ में पल रही वह बच्ची पंचेन्द्रिय जीव है और याद रखना जो भी पंचेन्द्रिय जीव की हत्या करता है उसे नरक में जाना पडेगा। लोग सोचते हैं कि लड़का ही कुल का दीपक है। पढ़ाई में लड़कियाँ लड़कों से आगे है। लड़का तो एक ही कुल के दीपक को रोशन करता है और लड़किया दोनों कुलों को रोशन करती है। अब वह जमाना गया जब लड़कियाँ घर की चार दीवारों में कैद रहती थी। आज के युग में लड़कियाँ पढ़ाई में टाॅप कर रही है। बिजनेस में अपना परचम लहरा रही है। हर जगह लड़कियाँ लड़कों से कंध्े से कंध मिलाकर सपफलता के नये आयाम स्थापित कर रही है। 

बेटियाँ रक्षक है। जिसका ज्वलंत उदाहरण सावित्राी है जिसने सत्यवान् को यमदूत से बचाया। प्रभु महावीर के तीर्थ की पूर्णाहूति बेटियों से ही होती हैं। बेटी है तो श्राविका और साध्वी हैं। बेटी से माँ, बहन, पत्नी आदि है। बेटी ही संसार की जन्मदात्राी है। जो आज गर्भ में बेटी की हत्या कर रही है। उन्हें यह सोचना चाहिए कि कभी वह भी एक लड़की थी। बेटी नही होगी तो संसार नहीं होगा। क्योंकि आजकल युवकों के मुकाबले लड़कियाँ कम हैं। गर्भपात महापाप है इस पास से बचों। सभी जैन बंध्ुओं को बेटी बचाने के लिए आगे आना है। युवा शाखा के इस क्रियात्मक कार्य के लिए मैं हार्दिक साध्ुवाद देता हूँ। 

आचार्य भगवन् से पूर्व श्रमण संघीय मंत्राी श्री शिरीष मुनि जी, युवा मनीषी श्री शुभभ् मुनि जी, महासाध्वी डाॅ. शिवा जी महाराज आदि ने बेटी बचाओं अभियान को संबोध्ति किया। इस अवसर पर जैन काॅन्प्रफेंस की युवा शाखा की ओर से श्री गौतम जैन ने मंच संचालन करते हुए बेटी बचाओ अभियान की विस्तृत जानकारी दी। इस अवसर पर जैन काॅन्प्रफेंस युवा शाखा के अध्यक्ष श्री महेन्द्र पगारिया, जैन काॅन्प्रफेंस युवा शाखा दिल्ली के अध्यक्ष श्री रजनीश जैन, प्रशांत विहार जैन सभा के महामंत्राी श्री जितेन्द्र जैन ने भी इस अभियान को संबोध्ति किया।

इस अवसर पर बेटी बचाओ अभियान के बैनर का लोकार्पण आचार्य भगवन के चरणों में युवा शाखा द्वारा किया गया। 

इस अवसर पर विधयक देवेन्द्र यादव, जैन काॅन्प्रफेंस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष श्री सुभाष ओसवाल, जैन काॅन्प्रफेंस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष श्री शेर सिंह जैन, जैन काॅन्प्रफेंस युवा शाखा के अध्यक्ष श्री महेन्द्र पगारिया, जैन काॅन्प्रफेंस युवा शाखा दिल्ली के अध्यक्ष श्री रजनीश जैन, सौरभ जैन, श्री जगदीश जैन, जितेन्द्र जैन, अजय जैन, जसवंत जैन, एल.सी. जैन, दिनेश सुराना, सुशील जैन, श्रीमती कौशल जैन आदि गणमान्यजन उपस्थित थे। सभा का संचालन जितेन्द्र जैन व गौतम जैन ने किया। 

आचार्य सम्राट के मंगलमय प्रवचन जैन स्थानक ए-ब्लाॅक प्रशांत विहार में प्रातः 08.15 बजे से 09.30 तक प्रतिदिन हो रहे है। दोपहर में 04.00 बजे से 05.00 बजे तक सामुहिक स्वाध्याय होता है।

श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टध्र आचार्य सम्राट पूज्य श्री शिवमुनि जी म.सा. के जीवनोपयोगी अमृतमय प्रवचन पारस चैनल पर प्रतिदिन प्रातः 8.05 से 8.25 बजे तक प्रसारित हो रहे हैं। पारस चैनल - डिश टी.वी-571, टाटा स्काई-188, एयरटेल-696, वीडियोकाॅन-681, डेन-874 पर उपलब्ध् है। आप सभी कार्यक्रमों में अवश्य सहभागी बनें। यह जानकारी एस.एस. जैन सभा, प्रशांत विहार के महामंत्राी श्री जितेन्द्र जैन ने दी। 

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विनयवान परमपद को प्राप्त करता है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

11 अगस्त 2014: प्रशांत विहार, दिल्ली; आत्मज्ञानी सद्गुरुदेव, युगप्रधन, आचार्य सम्राट पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन मंे पफरमाया कि - विनय ध्र्म का मूल है। विनय माता-पिता, गुरु और उस स्वामी के प्रति जिसने आपको मुसीबत में साथ दिया हो। भगवान पफरमाते है। उनका कर्जा चुकाया नही जा सकता। उनका कर्जा हम तभी चुका सकते है। जब हम उन्हें ध्र्म में लगाये। ध्र्म कौन सा? वीतराग ध्र्म। जिससे प्राणी मात्रा का कल्याण हो ऐसा ध्र्म। जो भगवान ने अपने ज्ञान में देखा है और हमें बताया है।  

एक व्यक्ति को दिया हुआ आत्म-ज्ञान सबसे बड़ा ध्र्म है उससे से बढ़कर और कोई ध्र्म नही है। अब तक जितने भी सि( हुए हैं। इसी मार्ग से मोक्ष को प्राप्त हुए है। सबसे ऊँचा दान है ध्र्म का दान। सबसे ऊँचा रस है ध्र्म का रस। तीर्थंकर भगवान हमें क्या देते है - ध्र्म देते है। ध्र्म में रुचि आ जाये तो चक्रवर्ती से ज्यादा आप सुखी हो। नमो का उल्टा मौन होता है। वही विनम्र होता है। भक्तामर स्तोत्रा में आचार्य मानतुंग ने भगवान ट्टषभदेव की स्तुति करते हुए कहा है हे प्रभु! मैं अल्प ज्ञान वाला हूँ, मैं विद्वानों की सभा में हंसी का पात्रा हूँ, किन्तु आपकी भक्ति मुझे आपकी स्तुति करने के लिए प्रेरित कर रही हैै। जैसे बंसत ट्टतु में आम की मंजरियां आते ही कोयल कूके बिना नही रहती वैसे ही आपके गुणों का वर्णन कैसे न कहुँ। मैं जानता हूँ, मैं आपका वर्णन नही कर सकता। 

प्रभु! आपके नाखुन इतने पवित्रा हैं कि जब इन्द्र आपके चरणों में झुकते है तो उनके मुकटों की मणियों की माला चमकने लग जाती है। जब तुम ध्र्ममय हो जाओगें तो चमत्कार घटित होने लगते है। चमत्कार में मत पड़ना। ध्र्ममय हो जाना। जो सि(बु( और मुक्त हुए हैं उनको नमन। भगवान को अपने भीतर लाओ। उनके सत्य और असत्य को नमन करो। उनका सत्य है आत्मा और असत्य है शरीर। सारा संसार असत्य है। जो तुम्हारे पास रहने वाला है वो सत्य आत्मा है। आसतिफ सबसे बड़ा बंध्न है। शरीर को तपाओं मक्खन तपता है तो घी बनता है। अहंकार करोगे तो दुःखी रहोगे कभी जीवन में सुखी नही हो सकते। 

आचार्य सम्राट के मंगलमय प्रवचन जैन स्थानक ए-ब्लाॅक प्रशांत विहार में प्रातः 08.15 बजे से 09.30 तक प्रतिदिन हो रहे है। दोपहर में 04.00 बजे से 05.00 बजे तक सामुहिक स्वाध्याय होता है।

श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टध्र आचार्य सम्राट पूज्य श्री शिवमुनि जी म.सा. के जीवनोपयोगी अमृतमय प्रवचन पारस चैनल पर प्रतिदिन प्रातः 8.05 से 8.25 बजे तक प्रसारित हो रहे हैं। पारस चैनल - डिश टी.वी-571, टाटा स्काई-188 एयरटेल-696, वीडियोकाॅन-681, डेन-874 पर उपलब्ध् है। आप सभी कार्यक्रमों में अवश्य सहभागी बनें। यह जानकारी एस.एस. जैन सभा, प्रशांत विहार के महामंत्राी श्री जितेन्द्र जैन ने दी। 

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भक्ति से समृ(ि की प्राप्ति: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

12 अगस्त 2014: प्रशांत विहार, दिल्ली; आत्मज्ञानी सद्गुरुदेव, युगप्रधन, आचार्य सम्राट पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन मंे पफरमाया कि - संसार में त्रास्त, दुखित एवं पीड़ित मानव के लिए एक ही उपाय है - भगवान का नाम स्मरण। भगवान के नाम में असीम शक्ति है। आवश्यकता है केवल श्र(ा की। श्र(ा के बिना लाखों जन्म भी बीत जायंे कुछ नहीं प्राप्त होगा।

श्र(ा साध्ना की शुरुआत है। श्र(ा के बिना जीवन अध्ूरा है। यदि हमने अपने रूटीन लाइपफ में डाक्टर की दवा पर विश्वास नहीं किया तो वह दवा भी नहीं लगती। कई बार हमारे जीवन में कोई संकट आता है तो हम हर प्रकार के मंत्रा, स्तोत्रा का पाठ करते हैं। यह सोचकर कि कोई न कोई मंत्रा तो असर करेगा ही। यह श्र(ा की कमी है। यदि श्र(ा है तो एक नवकार मंत्रा ही बहुत है।

लोगस्स पाठ में चैबीसों तीर्थंकरों की स्तुति द्वारा भक्ति की वर्षा की गई है। जैन समाज में इस पाठ का बहुत अध्कि महत्व है। इसके प्रत्येक शब्द में भक्ति का अखण्ड ड्डोत छिपा हुआ है। अगर कोई भक्त पद-पद पर भक्तिभाव से भरे हुए अर्थ का रसास्वादन करता है तो वह अवश्य ही आनन्दविभोर हुए बिना नहीं रहता। भक्त की भक्ति, भक्त को भगवान से जोड़ देती है। भक्ति में विनय है और भक्ति से अहंकार टूटता है। साध्क की शुरुआत प्रभु भक्ति से होती है। भक्ति में तन्मयता आने पर सद्गुरु का संयोग होता है। सद्गुरु के संयोग से सम्यक् ज्ञान, ध्यान और साध्ना की प्राप्ति होती है। उस पर चलकर व्यक्ति साध्क बनता है। वह साध्क एक दिन भक्ति का वरण करता है। 

देहली पर रखा हुआ दीपक अन्दर और बाहर दोनों ओर प्रकाश पैफलाता है। भगवान का नाम स्मरण करने से अन्दर और बाहर दोनों जगत प्रकाशित होते हैं। वह हमें बाह्य जगत में रहने के लिए विवेक का प्रकाश देते हैं ताकि हम लोग बिना किसी बाध के यात्रा तय कर सकें। अन्तर जगत में भी प्रकाश होता है जिससे हम अहिंसा, सत्य आदि के पथ पर चलकर परलोक को भी सुन्दर बना सकते हैं। मनुष्य जैसी श्र(ा करता है, जैसा संकल्प करता है वैसा ही बन जाता है। वीरों के नाम से वीरता के भाव पैदा होते हैं, कायरों के नाम से भीरुता के भाव। जिस वस्तु का हम नाम लेते हैं हमारा मन तत्क्षण उसी आकार का हो जाता है। साध्ु का नाम लेने से हमें साध्ु का ध्यान हो आता है। ठीक उसी प्रकार पवित्रा पुरुषों का नाम लेने से सब विषयों से हमारा ध्यान हट जायेगा और हमारी बु(ि महापुरुषों के समान हो जायेगी।

भगवान ट्टषभदेव का नाम लेने से हमें मानव सभ्यता के आदिकाल का ध्यान आता है। किस प्रकार ट्टषभदेव ने वनवासी, निष्क्रिय अबोध् मानवों को सर्वप्रथम मानव सभ्यता का पाठ पढ़ाया। मनुष्य को रहन-सहन सिखाया। व्यक्तिवादी से हटाकर समाजवादी बनाया। परस्पर प्रेम और स्नेह का आदर्श स्थापित किया। अहिंसा और सत्य आदि का उपदेश देकर लोक-परलोक दोनों को उज्ज्वल बनाया।

भगवान नेमीनाथ का नाम हमें दया की चरम भूमिका पर पहुंचा देता है। पशु-पक्षियों की रक्षा के निमित्त वे किस प्रकार विवाह को ठुकरा देते हैं। राजमती जैसी पत्नी को बिना स्वीकार किए स्वर्ण-सिंहासन को लात मारकर भिक्षु बन जाते हैं। जरा कल्पना कीजिए आपका हृदय दया, त्याग और वैराग्य के सुन्दर भावों से गद्गद् हो उठेगा।

भगवान पाश्र्वनाथ हमें गंगा तट पर कमठ जैसे मिथ्या कर्मकाण्डी को बोध् देते हैं एवं ध्ध्कती हुई अग्नि में से नाग-नागिन को बचाते हुए नजर आते हैं और कमठ का उपद्रव सहन करते हैं परन्तु विरोध्ी पर जरा भी क्षोभ नहीं आता। कितनी बड़ी क्षमा है।

भगवान महावीर के जीवन की झांकी देखिए वे बारह वर्ष की कठोर एकान्त साध्ना करते हैं। भीषण एवं लोमहर्षक उपसर्गों को सहन करते हैं। पशुमेध् और नरमेध् जैसे मिथ्या विश्वासों पर कठोर प्रहार करते हैं। अछूत एवं दलितों के प्रति कितनी ममता, कितनी आत्मीयता है। गरीब ब्राह्मण को अपने शरीर पर के एक मात्रा वस्त्रा को दान देते हैं। चन्दना के हाथों उदड़ के उबले दाने भोजनार्थ लेते हैं। गौतम जैसे प्रिय शिष्य को भी भूल के अपराध् में दण्ड देते हैं। इस प्रकार दिव्य रूप की कल्पना करेंगे तो ध्न्य-ध्न्य हो जायेंगे। महात्मा के नाम स्मरण स्तुति से आत्मा परमात्मा बनने का मार्ग मिलता है। लोगस्स में अनन्त शक्ति है। लोगस्स मांगलिक है, कल्याणकारी है।

आचार्य सम्राट के मंगलमय प्रवचन जैन स्थानक ए-ब्लाॅक प्रशांत विहार में प्रातः 08.15 बजे से 09.30 तक प्रतिदिन हो रहे है। दोपहर में 04.00 बजे से 05.00 बजे तक सामुहिक स्वाध्याय होता है।

श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टध्र आचार्य सम्राट पूज्य श्री शिवमुनि जी म.सा. के जीवनोपयोगी अमृतमय प्रवचन पारस चैनल पर प्रतिदिन प्रातः 8.05 से 8.25 बजे तक प्रसारित हो रहे हैं। पारस चैनल - डिश टी.वी-571, टाटा स्काई-188, एयरटेल-696, वीडियोकाॅन-681, डेन-874 पर उपलब्ध् है। आप सभी कार्यक्रमों में अवश्य सहभागी बनें। यह जानकारी एस.एस. जैन सभा, प्रशांत विहार के महामंत्राी श्री जितेन्द्र जैन ने दी। 

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सुख अपने भीतर खोजो: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

13 अगस्त 2014: प्रशांत विहार, दिल्ली; आत्मज्ञानी सद्गुरुदेव, युगप्रधन, आचार्य सम्राट पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन मंे पफरमाया कि - महामंत्रा नवकार में किसी व्यक्ति का नाम नही है। किसी ध्र्म का नाम नहीं। किसी सम्प्रदाय का नाम नही। अरिहंत वो व्यक्ति, वो आत्मा जिन्होंने अपने को जीत लिया, अपने को पहचान लिया। जो स्वयं का मालिक हो गया। भगवान ने 15 प्रकार के सि( कहे हैं। जिनमें गृहस्थ भी सि( हो सकता है। स्त्राी, पुरुष, नपुंसक आदि किसी भी ध्र्म संप्रदाय का व्यक्ति सि( हो सकता है। सि( यानि अपने स्थान को प्राप्त करना। अपना स्थान यानि मोक्ष। अपने स्थान को भी वही व्यक्ति प्राप्त कर सकता है, जिसमें सरलता है, जिसके हृदय में पवित्राता है, शु(ता है। सुख तुम्हारे भीतर है परन्तु सुख हम कहाँ ढूढ़ते है। सुख हम संबंधें में, परिवार में, क्लबों में, बाहर घूमने में ढूंढ़ते है। 

भगवान कहते है कि - बाहर सुख ढूंढ़ना वैसे है जैसे कि पानी बिलोकर मक्खन को प्राप्त करना। पर पदार्थो से सुख प्राप्त नही हो सकता। जिन्होंने ने भी पद पाया, दुःख पाया, जिन्होंने भी परिवार पाया उन्होंने आखिर में दुःख पाया। सिकन्दर, तैमूरलिंग, नादिरशाह, चंगेज खां ये सभी विश्व विजेता बनने निकले थें परन्तु इन्होंने आखिर में दुःख ही पाया। सुख तुम्हारी आत्मा में है। हम देवलोक गये तो देवलोक में सुख माना। हीरे-जवाहरात में सुख माना। देवलोक में बडे़-बडे़ देवालय, हीरे जवाहरात, सुंदर-संुदर अप्सराएं इतना सुख मिला परन्तु हम वहाँ से भी खाली लौट आये। राजा, महाराजा, सेठ, साहुकार सभी यही करते रहे है। इस देह से अमृत पाया जा सकता है। इस देह से सि( गति को प्राप्त किया जा सकता है। इस देह से अरिहंत पद को प्राप्त किया जा सकता है। परन्तु जिस प्रकार मकड़ी अपना जाल बनाती है और खुद ही उसमें पफंस जाती है। उसी प्रकार संासारिक जीव भी पूरा जीवन ध्न कमाने में, पद, प्रतिष्ठा पाने में, परिवार बढ़ाने में, संबंध् बनाने में व्यतीत कर देता है परन्तु आखिर में पछताता है। 

क्या थी प्रभु महावीर की सामायिक, क्या थी प्रभु महावीर की समता, कैसा था प्रभु महावीर का मौन, कैसी थी प्रभु महावीर की करुणा, कैसा था प्रभु महावीर का तप, कैसी थी प्रभु महावीर की क्षमा, कैसी थी प्रभु महावीर की साध्ना। जो प्रभु महावीर ने किया वही करो। प्रभु महावीर कभी नही कहते है दुकान खोलो, परिवार बढ़ाओं। प्रभु महावीर कहते है ‘समयं गोयम मा पमायए’। प्रभु महावीर गौतम को भी अपने से मोह छोडने को कहते है। प्रभु महावीर का तीर्थ वंदनीय है, निंदनीय नही। अरिहंत की स्तुति से, महावीर जयंती बनाने से, महावीर के जय-जयकार लगाने से अब तक मोक्ष नही हुआ। ये चातुर्मास अरिहंत बनने की साध्ना का पथ है। जो कुछ आप को मिला है। अपने कर्मों से मिला है। किसी को दोष मत देना। मैंने किया-मैंने किया कर्ताभाव का पोषण किया। कर्ता भाव से जुडे़ तो शरीर से जुडे़, शरीर से जुड़ गये तो पुण्य का बंध्न। तुम निमित्त हो बाकी सब संयोग है। जो कुछ भी कार्य करो। दान करो, प्रवचन करो, सामायिक करो। सब करते हुए केवल यही सोचो मुझे अवसर मिला। महावीर की सारी साध्ना का सार दृष्टा भाव है। गीता में कृष्ण कहते है कर्ता मत बन। साक्षी हो जा। सामायिक करो तो दृष्टा भाव, महामंत्रा का जाप करो तो दृष्टा भाव। 

आचार्य सम्राट के मंगलमय प्रवचन जैन स्थानक ए-ब्लाॅक प्रशांत विहार में प्रातः 08.15 बजे से 09.30 तक प्रतिदिन हो रहे है। दोपहर में 04.00 बजे से 05.00 बजे तक सामुहिक स्वाध्याय होता है।

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व्यवहार ध्र्म का पालन करते-करते निश्चय ध्र्म में आओ

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

14 अगस्त 2014: प्रशांत विहार, दिल्ली; आत्मज्ञानी सद्गुरुदेव, युगप्रधन, आचार्य सम्राट पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन मंे पफरमाया कि - नवकार महामंत्रा में आचार्य तीसरा पद है। पांच पदों में वह ठीक मध्य में स्थित है। अरिहंत और सि( उसके उस पार होते है। साध्ु और उपाध्याय उसके इस पार होते है। इस पार और उस पार के मध्य में आचार्य सेतु के समान है। आचार्य जो अरिहंतो से, उनकी वाणी से, उनके ज्ञान से, उनकी दृष्टि से, उनकी साध्ना से सम्पदा ग्रहण कर लेता है।

आचार्य वह है जिसका आचरण श्रेष्ठ है। जैसे नदी के पास जाते है तो कितनी भी प्यास हो ध्ीरे-ध्ीरे प्यास कम हो जाती है। कितने भी थके हो परन्तु वृक्ष के पास बैठने से थकावट दूर हो जाती है। वैसे ही आचार्य के पास बैठने से उनके पास जाने से हमारे भीतर में शीतलता, शान्ति आ जाती है। नदी ने, वृक्ष ने हमें क्या दिया। हमें सब कुछ दे दिया। वर्तमान समय में मनुष्य के पास सब कुछ है। पिफर भी दुःखी क्यों है? क्यों सघर्ष में जी रहा है? क्यों तनाव में जी रहा है? क्यों बीमार है? क्योंकि व्यक्ति अहंकार में जी रहा है।

मैंने किया, मैं कर रहा हूँ, मैं करने वाला हूँ। कर्म बंध्न का मूल कारण है - अहंकार। क्या कभी आपने अहंकार का प्रतिक्रमण किया? क्या कभी आपने जन्म से लेकर अब तक हुए कर्म बंध्नों का प्रतिक्रमण किया? अगर आपका कमाया ध्न न्याय, नीति से नहीं आ रहा है तो वो आपको दुर्गति में लेकर जा रहा है। ध्र्म दो प्रकार हैं - व्यवहार और निश्चय। भगवान ट्टषभदेव ने हमें व्यवहार का ज्ञान दिया। उन्होंने असि, मसि और कृषि का ज्ञान दिया। हम परम सौभाग्यशाली है हमें निश्चय में भगवान महावीर की साध्ना मिली। अरिहंत की वाणी में भी पंचम काल में साध्ना मिल गई। आत्म-दृष्टि मिली। म्यान हो और तलवार न हो तो यु( कैसे करोगे? शरीर को देखो आत्मा को न देखो तो मुक्ति कैसे प्राप्त करोगे?

संबंध् बनते और बिगड़ते हैं। मित्रा बदल जाते हैं। मकान बदल जाते हैं। खानपान रहन, सहन सब बदल जाता है। परन्तु आत्मा वैसे ही रहती है। व्यवहार ध्र्म का पालन करते-करते निश्चय ध्र्म में आओ। इस शरीर के साथ इतनी आसक्ति क्यों? साध्ना के लिए सब छोड़ना होगा। प्रकृति ने हमें सब कुछ दिया है। हमें एक दूसरे से जोड़ा है। 

आचार्य सम्राट के मंगलमय प्रवचन जैन स्थानक ए-ब्लाॅक प्रशांत विहार में प्रातः 08.15 बजे से 09.30 तक प्रतिदिन हो रहे है। दोपहर में 04.00 बजे से 05.00 बजे तक सामुहिक स्वाध्याय होता है।

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शरीर से आत्मा को मुक्त करना है - स्वतंत्राता

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

15 अगस्त 2014: प्रशांत विहार, दिल्ली; आत्मज्ञानी सद्गुरुदेव, युगप्रधन, आचार्य सम्राट पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन मंे पफरमाया कि - संकल्प हो हमारा इंसान हम बनेगे। इंसान बन गये तो भगवान भी बनेगें। ऐसी रूचि, ऐसी प्रतीति हमारे रग-रग में हो। सबसे बड़ा प्रश्न है। मैं कौन हूँ ? इस प्रश्न का समाधन किये बिना चक्रवर्ती की रि(ि-सि(ि प्राप्त कर लो। श्मशान की राख हो। इस प्रश्न का समाधन महावीर की वाणी से, अरिहंत की कृपा से नही मिलेगा, इस प्रश्न का समाधन तुम्हारे भीतर मिलेगा। महावीर के इशारे को हमने कब समझा? भगवान महावीर कहते है क्रोध् जहर है। क्या हमने क्रोध् करना छोड़ दिया? महावीर कहते है लोभ पाप। क्या हमारे भीतर संग्रह की भावना नही आती? निंदा मत करो। निंदा करना पीठ का मांस खाने के बराबर है। क्या हमने निंदा करना छोड़ दिया। अकेले हो जाओ पिफर देखो। महावीर की कृपा, अरिहंतो की वाणी आपके भीतर प्रस्पफुटित होगी।

आज का ये पावन दिवस स्वतंत्राता दिवस है। महात्मा गांध्ी ने संकल्प किया जब तक इस देश को अंग्रेजों की दासता से मुक्त नही कर लेता तब तक चैन से नही बैठूगा। 15 अगस्त 1947 उस दिन हम परतंत्राता की बेडियों से मुक्त हुए थे। इस स्वतंत्राता के लिए महात्मा गांध्ी, लाला लाजपत राय, मंगल पांडे, झांसी की रानी लक्ष्मीबाई, तात्या टोपे, नाना साहेब, रामप्रसाद बिस्मिल, अशपफाक, चन्द्रशेखर आजाद, भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव आदि ने अपने प्राणों को भारत माता को समर्पित किया। यह स्वतंत्राता हमें सत्य और अहिंसा के सि(ान्त के आधर पर मिली थी।

एक पक्षी भी पिंजरे में नही रहना चाहता। वो भी स्वतंत्रा होना चाहता है। तुम्हारा पिंजरा कौन सा है? ये शरीर तुम्हारा पिंजरा है। पक्षी है इसमें आत्मा। वो उड़ना चाहता है, वो मुक्त होना चाहता है। अरिहंत परमात्मा भी आपको इस पिंजरे से मुक्त करने का रास्ता दिखा रहे है। ये साध्ना तुम्हारे जन्मों-जन्मों के बंध्नों से मुक्त करने की साध्ना है। तुम जागो। तुम गुलाम हो अपनी इन्द्रियों के। अपने मन के। अपने विचारों के। अपनी परम्पराओं के। अपने सि(ांतों के। भगवान कहते है वही व्यक्ति अपने दिन-रात सपफल कर लेता है। जो ध्र्म के रास्ते पर चलता है। सत्य के रास्ते पर चलता है। हमारे भारत देश में पहले निर्णय होता है योजनाएं बनती है। और जब कार्य करने का समय आता है। तब तक सरकारें बदल जाती है। 

आचार्य सम्राट के मंगलमय प्रवचन जैन स्थानक ए-ब्लाॅक प्रशांत विहार में प्रातः 08.15 बजे से 09.30 तक प्रतिदिन हो रहे है। दोपहर में 04.00 बजे से 05.00 बजे तक सामुहिक स्वाध्याय होता है।

श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टध्र आचार्य सम्राट पूज्य श्री शिवमुनि जी म.सा. के जीवनोपयोगी अमृतमय प्रवचन पारस चैनल पर प्रतिदिन प्रातः 8.05 से 8.25 बजे तक प्रसारित हो रहे हैं। पारस चैनल - डिश टी.वी-571, टाटा स्काई-188 एयरटेल-696, वीडियोकाॅन-681, डेन-874 पर उपलब्ध् है। आप सभी कार्यक्रमों में अवश्य सहभागी बनें। यह जानकारी एस.एस. जैन सभा, प्रशांत विहार के महामंत्राी श्री जितेन्द्र जैन ने दी। 

प्रवचन प्रातः 8ः05 से 8ः25 पारस चैनल पर

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तुम अपने से जुड़ो यही जिनवाणी का सार है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

16 अगस्त 2014: प्रशांत विहार, दिल्ली; आत्मज्ञानी सद्गुरुदेव, युगप्रधन, आचार्य सम्राट पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन मंे पफरमाया कि - समस्त जिनवाणी का सार है कि तुम अपने से जुड़ जाओ। तीर्थंकरों की वाणी का सार यही है तुम स्वयं को पहचानों, तुम स्वयं को जानो। जब तुम गर्भ में आये थे तब से वो तुम्हारे साथ है। जब तुम नरक में गये तब भी वो तुम्हारे साथ था। जब तुम तिर्यंच गति में गये तब भी वो तुम्हारे साथ था। जब तुम देवगति में गये तब भी वो तुम्हारे साथ था। वो तुम्हारा मित्रा है, तुम्हारा गुरु है जिसको हम भूल गये है। हम संबंधें को याद रखते है परन्तु स्वयं को भूल जाते है। 

उसे अंतःकरण से स्वीकार कर लोगे तो तर जाओगे। पर संबंध्, संग्रह किया हुआ ध्न, तुम्हारा बेटा, तुम्हारी बेटी, तुम्हारी पत्नी, तुम्हारी परम्परायें सब यही तक है, सब श्मशान तक ही साथ देगें। हमने अब तक किसको प्यार किया? किसका पोषण किया? हमने अब तक अपनी धरणाओं का पोषण किया। आत्मा को कोई माँ जन्म नही देती। आत्मा का कोई पिता पोषण नही करता। आत्मा का मन नही। आत्मा ने अब तक एक दाना नही खाया, अब तक एक घंूट पानी भी नही पिया। तुम अकेले हो जाओ। सुख एकत्व में है, सुख निज आत्मा में है। सुख संबंधें में होता तो क्यों भगवान महावीर राजपाट छोड़ते। केवल एक संबंध् बनाओ अरिहंत परमात्मा से। 

हमें जन्मों-जन्मों में भगवान महावीर की वाणी मिली, अरिहंतो की वाणी मिली परन्तु हमने उनकी वाणी पर श्र(ा नही की। आज खान-पान, रहन-सहन, आचार-विचार आदि सब गलत हो गया है। जिस प्रकार सूरज की रोशनी सबके लिए है, चंद्रमा की शीतलता सबके लिए है। गाय का दूध् सबके लिए है। वृक्ष की छाया, वृक्ष के पफल सबके लिए है। उसी प्रकार जो तुम्हे ध्न मिला है वह भी सबके लिए है। सारे संबंध् ध्न से बिगड़ते है। भाई की भाई से नही बनती, बेटे की बाप से नही बनती। संस्थाओं में झगडे़ इन सबका कारण ध्न है। 

मन की नही सुने मन तो हमें अधेगति की ओर ले जाता है अपने को स्वयं से जोड़ लो। भगवान नही कहते तुम मेरी पूजा करो, मेरे मंदिर बनाओ। भगवान कहते है तुम ही परमात्मा हो। स्वयं से जुड़ने का एक ही तरीका है अपनी समस्त धरणाओं को बदलो, अपनी दृष्टि को परिवर्तित कर लो। अब तक तुमने परिवार को अपना माना, ध्न को अपना माना, अपने को कर्ता माना लिया। ये मेरापन ही दुःख का कारण है। घर में रहो पर घर को अपना मत मानो। परिवार कहाँ तक मेरा है? परिवार चलाने के लिए है। सबको ध्र्म मिले, सबको साध्ना मिले, सहयोग सबका चाहिये, पर भीतर में एकत्व का पोषण करो। अंहकार सबसे बड़ा शत्राु है सब कार्य करते हुए मुझे अवसर मिला है ये सोच। जहाँ आसक्ति है ध्ीरे-ध्ीरे उसे कम करो। कोई किसी को दुःख नही देता। कोई किसी को सुख नही देता। अब तक हमने असत्य को पकड़ रखा है, इस लिए हम दुःखी होते है। सुख खोजना है तो भीतर खोजो। सब तीर्थंकर जंगलो में गये, साध्ना की, अपने को तपाया। प्रतिकूलता में सुख, अनुकूलता में दुःख। ध्र्म क्या है? स्वयं को स्वयं में स्थित करना ही ध्र्म है, सामायिक है। एक बार यदि भीतर में आनंद आ गया तो आप बाहर की समस्त खोजो को छोड़ दंेगे। 

आचार्य सम्राट के मंगलमय प्रवचन जैन स्थानक ए-ब्लाॅक प्रशांत विहार में प्रातः 08.15 बजे से 09.30 तक प्रतिदिन हो रहे है। चार दिवसीय गम्भीर आत्म-ध्यान साध्ना शिविर 15 अगस्त से 18 अगस्त से सुचारू रूप से चल रहा है जिसमें देश के विभिन्न राज्यों से आये हुए लगभग 175 साध्क-साध्किायें आत्मा की अनुभूति का रसपान कर रहे हैं। 

श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टध्र आचार्य सम्राट पूज्य श्री शिवमुनि जी म.सा. के जीवनोपयोगी अमृतमय प्रवचन पारस चैनल पर प्रतिदिन प्रातः 8.05 से 8.25 बजे तक प्रसारित हो रहे हैं। पारस चैनल - डिश टी.वी-571, टाटा स्काई-188 एयरटेल-696, वीडियोकाॅन-681, डेन-874 पर उपलब्ध् है। आप सभी कार्यक्रमों में अवश्य सहभागी बनें। यह जानकारी एस.एस. जैन सभा, प्रशांत विहार के महामंत्राी श्री जितेन्द्र जैन ने दी। 

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जो स्थान हृदय का है, संघ व्यवस्था में वही स्थान आचार्य का

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

17 अगस्त 2014: प्रशांत विहार, दिल्ली; आत्मज्ञानी सद्गुरुदेव, युगप्रधन, आचार्य सम्राट पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन मंे पफरमाया कि - हम अपने आपको अरिहंत परमात्मा के चरणों में समर्पित कर दे। भगवान महावीर के पुरुषार्थ को नमन करे। अरिहंत बनने के लिए आवश्यक है स्वरूप का बोध् प्राप्त करना। सारा संसार दो तत्त्वों के आधर पर अवस्थित है - जीव और अजीव। आत्मरूचि हुई तो आत्मज्ञान होगा। आत्मज्ञान होगा तो केवलज्ञान होगा। अरिहंत परमात्मा ने केवलज्ञान प्राप्त कर लिया और हमें भी मुक्ति का मार्ग बता रहे हंै। हमें भी मुक्ति के लिए पुरुषार्थ करना होगा। हमें अपने मोहनीय कर्म को तोड़ना होगा।

नवकार मंत्रा में तीसरा पद आचार्य का है। मनुष्य देह में जो स्थान हृदय का है, संघ व्यवस्था में वही स्थान आचार्य का होता है। हृदय शरीर के छोटे से छोटे हिस्से में रक्त पहुँचाता है। आचार्य भी ठीक ऐसा ही करते है। वे संघस्थ सभी छोटे-बडे़, ज्ञानी, ध्यानी, त्यागी, वैरागी, रोगी, निरोगी सभी मुनियों को पितृ भाव विकास का पथ आलोकित करते है।

आचार्य को गोपाल कहा है। संघ को गौव्रज कहा है यानि गायों का समूह, समूह में शत्तफ, असत्तफ, बांझ, मरखनी, अंध्ी, लंगडी, दूधरू, हरिया सभी तरह की गायंे होती है। तभी वह व्रज कहलाता है। गोपाल वात्सल्य, प्रीति, सेतु का प्रतिनिध् िहोता है। वह सब तरह की गायों को निभा लेता है। 

संघ में भी नाना प्रकार के व्यक्तित्व होते है। सबके भिन्न-भिन्न स्वभाव, भिन्न-भिन्न मान्यतायें। आचार्य गोपाल की तरह सब का निर्वाह करता है। उसके प्रीति की वर्षा से सभी का हृदय गदगद् हुआ रहता है।

जिसका आचरण बोलता है। जिसके व्यक्तित्व से सब प्रभावित होते है। जिसके वचन में जिनवाणी का सार है। जो विभिन्न प्रयोगों के द्वारा संघ का संचालन करता है। जो ज्ञान की कसौटी पर उतरता है जो छत्तीस गुणों से युक्त होता है। उसे आचार्य कहते है। आचार्य के पास संग्रह होता है। जिसको जो आवश्यकता होती है उसको वो देता है। जैन आचार्य परम्परा में आचार्य सुध्र्मा स्वामी, आचार्य जम्बू स्वामी, आचार्य प्रभव, आचार्य कुंदकुंद, आचार्य पूज्यपाद, आचार्य आत्माराम जी म.सा. आदि का त्यागमय, वैराग्यमय आत्मा को अभिभूत करने वाला वर्णन मिलता है। 

आचार्य सम्राट के मंगलमय प्रवचन जैन स्थानक ए-ब्लाॅक प्रशांत विहार में प्रातः 08.15 बजे से 09.30 तक प्रतिदिन हो रहे है। चार दिवसीय गम्भीर आत्म-ध्यान साध्ना शिविर 15 अगस्त से 18 अगस्त से सुचारू रूप से चल रहा है जिसमें देश के विभिन्न राज्यों से आये हुए लगभग 175 साध्क-साध्किायें आत्मा की अनुभूति का रसपान कर रहे हैं। 

श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टध्र आचार्य सम्राट पूज्य श्री शिवमुनि जी म.सा. के जीवनोपयोगी अमृतमय प्रवचन पारस चैनल पर प्रतिदिन प्रातः 8.05 से 8.25 बजे तक प्रसारित हो रहे हैं। पारस चैनल - डिश टी.वी-571, टाटा स्काई-188, एयरटेल-696, वीडियोकाॅन-681, डेन-874 पर उपलब्ध् है। आप सभी कार्यक्रमों में अवश्य सहभागी बनें। यह जानकारी एस.एस. जैन सभा, प्रशांत विहार के महामंत्राी श्री जितेन्द्र जैन ने दी। 

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जीवन जीने का तरीका सिखाते है - कृष्ण

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

17 अगस्त 2014: प्रशांत विहार, दिल्ली; आत्मज्ञानी सद्गुरुदेव, युगप्रधन, आचार्य सम्राट पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन मंे पफरमाया कि - आज कर्मयोगी श्री कृष्ण जन्मदिवस कृष्ण जीवन उत्सव मानते है। कृष्ण कहते है अगर जीवन को काम माने तो वह बोझ हो जाता है। अगर जीवन एक काम है तो उसे हम ढोएंगे और उसे किसी तरह निपटा देंगे। कृष्ण जीवन को काम की तरह नही उत्सव की तरह लेते है। असल में जीवन आनंद का एक उत्सव है, काम नही। कृष्ण जीवन को देखते है महोत्सव की तरह, एक क्रीड़ा की तरह। जैसे की पफूल देखते हैं, पक्षी देखते है, बादल देखते है, जैसा कि मनुष्य को छोड़कर सारा जगत देखता है, उत्सव की तरह। कोई पूछे इन पफूलों से कि खिलते किसलिए है, काम क्या है? बेकाम खिले हुए है तारों से कोई पूछे कि चमकते किसलिए है। हवाओं से कोई पूछे बहती क्यों हो? काम क्या है? मनुष्य को छोड़कर जगत में काम कही भी नही है उत्सव चल रहा है।

 कृष्ण का जन्म अंध्ेरी रात में होता है। हम सभी का जन्म अंध्ेरे में ही होता है। असल में जगत की कोई भी चीज उजाले में नही जन्मती, एक बीज भी पफूटता है तो जमीन के अंध्रे में जन्मता है। एक कविता जन्मती है तो मन के बहुत अचेतन अंध्कार में जन्मती है। एक चित्रा का जन्म होता है तो मन की बहुत अतल गहराइयों में जहाँ जगत की कोई रोशनी नही पहुँचती है वहाँ होता है। समाध् िका जन्म होता है, ध्यान का जन्म होता है गहन अंध्कार में गहन अंध्कार का अर्थ है जहाँ बु(ि का प्रकाश जरा भी नही पहुँचता। 

कृष्ण का जीवन, कृष्ण का व्यक्तित्व हमें जीना सिखाता है। कृष्ण के हाथ में बांसुरी है। जीवन को खूबसुरत बनाने में संगीत और कला का महत्वपूर्ण योगदान है। भगवान श्री कृष्ण को बांसुरी बहुत पंसद थी क्योंकि बांसुरी में दो गुण है। बांसुरी में गांठ नही है। अपने मन में किसी तरह की गांठ मत रखों, बदले की भावना मत रखो। बांसुरी जब भी बजती है, मध्ुर ही बजती है। जब भी बोलो मीठा ही बोलो। कृष्ण हमेशा कमजोर का साथ देते है। चाहे गरीब सखा सुदामा हो या षडयंत्रा का शिकार पांडव। श्री कृष्ण ने हमेशा उन्हें मुसीबत से उबारा। श्री कृष्ण अन्याय का विरोध् करते है। श्री कृष्ण की शांतिप्रियता वीर की शांतिप्रियता है। कृष्ण मातृशक्ति का आदर करते है, चाहे वह श्री कृष्ण की पालनहार यशोदा हो या जन्म देने वाली देवकी माँ हो, चाहे कंुती हो, रुकमणी हो, द्रोपदी हो, हमारे भीतर नारी के प्रति सम्मान का भाव होना चाहिये। कृष्ण के जीवन में अहंकार नही है। कृष्ण शक्तिशाली होते हुए भी न तो युध्ष्ठििर का दूत बनने में संकोच ना अर्जुन का सारथी बनने में संकोच न राजसूय यज्ञ में अतिथि के चरणों को धेने में संकोच करते है। 

कृष्ण के जीवन से हम सीखें छोटा से छोटा कार्य भी छोटा नही होता। हमें अपने कत्र्तव्य का पालन करना चाहिये। दुःख में भी हम मुस्कुराये। मित्रा आर्थिक दृष्टि से कमजारे हो तो उसको सहयोग करे। अन्याय का साथ न दे, नारी का सम्मान करे, सबसे प्रेम करे। 

आचार्य सम्राट के मंगलमय प्रवचन जैन स्थानक ए-ब्लाॅक प्रशांत विहार में प्रातः 08.15 बजे से 09.30 तक प्रतिदिन हो रहे है। चार दिवसीय गम्भीर आत्म-ध्यान साध्ना शिविर 15 अगस्त से 18 अगस्त का आज समापन हो गया जिसमें देश के विभिन्न राज्यों से आये हुए लगभग 175 साध्क-साध्किाओं ने आत्मा की अनुभूति का रसपान किया। 

श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टध्र आचार्य सम्राट पूज्य श्री शिवमुनि जी म.सा. के जीवनोपयोगी अमृतमय प्रवचन पारस चैनल पर प्रतिदिन प्रातः 8.05 से 8.25 बजे तक प्रसारित हो रहे हैं। पारस चैनल - डिश टी.वी-571, टाटा स्काई-188, एयरटेल-696, वीडियोकाॅन-681, डेन-874 पर उपलब्ध् है। आप सभी कार्यक्रमों में अवश्य सहभागी बनें। यह जानकारी एस.एस. जैन सभा, प्रशांत विहार के महामंत्राी श्री जितेन्द्र जैन ने दी। 

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आध्यात्मिक पर्व है - पर्यूषण: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

23 अगस्त 2014: प्रशांत विहार, दिल्ली; आत्मज्ञानी सद्गुरुदेव, युगप्रधन, आचार्य सम्राट पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन मंे पफरमाया कि - महापर्व पर्यूषण के आठ दिनांे में हम इतनी ध्र्म आराध्ना करे कि ध्र्म हमारे अंग-संग में बस जाये, हम ध्र्ममय हो जाये। भारत देश पर्वों का देश है हर महीने में दो पर्व आ ही जाते है। पर्व दो प्रकार के होते हंै - एक लौकिक और एक अलौकिक। पर्यूषण पर्व अलौकिक पर्व है,  आध्यात्मिक पर्व है, पर्व का अर्थ है जो हमें आनंद दे, उत्साह दे, एक उमंग दे। इन आठ दिनों में आप जो भी करो चाहे सामायिक करो, चाहे नवकार महामंत्रा का जाप करो, चाहे पौषध् करो, चाहे उपवास करो, चाहे रात्रि भोजन का त्याग करो, चाहे अंतकृतदशांग सूत्रा का वांचन करो, हर कार्य करते हुए आनंद। मुझे अवसर मिला ध्र्म को समझने का, अपने को जानने का। पर्यूषण का अर्थ है अपने आपको चारों ओर से झोक देना, अपने कर्मोे की आहुति देना। 

आत्मा के चारों ओर अनंत जन्मों से कर्म ही लगे है इन आठ दिनांे में आप पुरुषार्थ करे आपकी आत्मा तप के द्वारा, जप के द्वारा शु( हो जाये। अंतकृतदशांग सूत्रा में 90 महान आत्माओं का वर्णन है जिन्होंने एक ही भव में अपने भवों का अंत कर दिया। इन 90 महान आत्माओं में आठ वर्ष का बालक भी है और श्री कृष्ण की रानियां भी है उनके पुत्रा भी है। इन आठ दिनांे में हम अपने संबंधें को भी भूल जाये। अपने पद, प्रतिष्ठा को भी भूल जायें। हीरे-जवाहरात कोठी, बंगला, दुकान सबको भूल जाये। ये सब हमें अनंत जन्मों में मिले है। केवल ध्र्म आराध्ना को महत्व दे। इन आराध्नाओं में पहली आवश्यकता है भाव शु(ि की उसके बाद मन शु(ि भी आवश्यक है। भीतर में उपवास करने की भावना हो पर रसोई में बने पकवानों पर नजर चली जाए तो मन बेईमान हो जाता है। मन चालाक है, मन ही हमें बंध्न की ओर ले जाता है और मन ही हमें मुक्ति की ओर ले जाता है। मन अशु( है, कलुषित है तो परमात्मा का साक्षात्कार भी नही हो सकता। इसलिए मन को शु( रखना। अपनी भावनाओं को शु( रखना।

पर्व पर्यूषण में आत्म दृष्टि को परिपक्व करते हुए आत्मध्न की कमाई करना। महापर्व पर्यूषण में सामायिक, प्रतिक्रमण, तप, ध्यान, रात्रि भोजन का त्याग, हरी सब्जी का त्याग, जमीकंद का त्याग, नवकार महामंत्रा का जाप इन सबमें बढ़कर हिस्सा ले। शरीर की आसक्ति को त्यागो। जीवन असंस्कृत वह टूटेगा, बिछडे़गा, बिखरेगा। जैसे रस्सी टूट जाती है तो पिफर जुड़ती नही, अगर जुड़ती है तो गांठ पड़ जाती है। वैसे ही जीवन कब टूटेगा हम नही जानते जैसे डाल से पत्ता टूट जाता है पिफर नही जुड़ता वैसे ही ये जीवन भी समाप्त हो जाता है। हमने जिस शरीर को पाला पोसा उसी शरीर के बाल, दांत, नांखून टूटने पर अच्छे नहीं लगते। शरीर की कीमत केवल आत्मा है तभी तक है। इसलिए आत्मध्न कमाओ। साध्ु और श्रावक के भी कुछ कत्र्तव्य है साध्ु का कर्तव्य है कि वह तप करे, शास्त्रा वांचन करे, लोच करे, ध्यान करे और श्रावक का कर्तव्य है वह दान, शील, तप, भावना की आराध्ना करे। 

प्रातःकाल ठीक 8ः00 बजे श्री अन्तकृतदशांग सूत्रा का वांचन श्री शुभम मुनि जी द्वारा किया गया। दोपहर में 3 से 4 बजे तक श्री कल्पसूत्रा का वांचन महासाध्वी डाॅ. श्री शिवा जी म.सा. द्वारा किया जायेगा। सूर्योदय की प्रथम किरण के साथ विश्व शांति हेतु नवकार महामंत्रा का अखण्ड जाप प्रारम्भ हुआ। आचार्य सम्राट के मंगलमय प्रवचन जैन स्थानक ए-ब्लाॅक प्रशांत विहार में प्रातः 08.15 बजे से 09.30 तक प्रतिदिन हो रहे है। 

श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टध्र आचार्य सम्राट पूज्य श्री शिवमुनि जी म.सा. के जीवनोपयोगी अमृतमय प्रवचन पारस चैनल पर प्रतिदिन प्रातः 8.05 से 8.25 बजे तक प्रसारित हो रहे हैं। पारस चैनल - डिश टी.वी-571, टाटा स्काई-188, एयरटेल-696, वीडियोकाॅन-681, डेन-874 पर उपलब्ध् है। आप सभी कार्यक्रमों में अवश्य सहभागी बनें। यह जानकारी एस.एस. जैन सभा, प्रशांत विहार के महामंत्राी श्री जितेन्द्र जैन ने दी। 

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आत्म जागृति का पर्व है - पर्यूषण: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

24 अगस्त 2014: प्रशांत विहार, दिल्ली; आत्मज्ञानी सद्गुरुदेव, युगप्रधन, आचार्य सम्राट पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन मंे पफरमाया कि - महापर्व पर्यूषण आत्म जागृति का पर्व है। महापर्व पर्यूषण जन जागृति का पर्व है। अहिंसा, संय, तप की आराध्ना का पर्व है। सबमें आत्मा का वास है। सबका जीवन संतोषमय हो। सांई बाबा कहते है सबका मालिक एक है और उनके दो ही संदेश - श्र(ा और सबूरी। देने से क्या होता है? देने से आने वाले संकट दूर होते हैं। संत दादू कहते है ये संसार पंसारी की दुकान है। सभी यहाँ दावा करते है मैं हजारों वर्षो तक जीऊँगा परन्तु एक पल का भी भरोसा नही। इस संसार से जब आप विदा होगे तो एक सुई भी आपके साथ नही जायेगी। दो गज कपफन का टुकड़ा तेरा लिबास होगा। शरीर का ध्र्म मरना, विध्वंस होना है। आत्मा में अनंत सुख, अनंत शांति, अनंत समृ(ि है, शरीर को आप जितना तपाओंगे जितना सार ग्रहण करोंगें ध्यान, स्वाध्याय, तप, दान करोंगे। यही साथ जायेगा। 

एक भिखारी जीवन भर भीख मांगता है। ठण्डी, बांसी, रूखी-सूखी जैसी भी रोटियां मिल जाती उसे खा लेता। एक दिन उसकी मौत हो जाती है। गांव के लोगों ने जहां पर वह बैठता था उसकी खुदाई की। पुराने वस्त्रा, पात्रा उठाकर पेंफक दिए। आश्चर्य हुआ नीचे स्वर्ण मुद्राओं से भरा कलश मिला। जिन्दगी भर भीख मांगता रहा अन्तिम में खाली हाथ लौटा।

यही हमारी हालत है। प्रत्येक मानव के भीतर अपार सम्पदा है किन्तु उसका उसे पता नहीं। मानव जिसके लिए हाथ पसार रहा है, वह उसके पास है लेकिन अन्दर की चाबी खो गई है और अगर अन्दर की चाबी भी है परन्तु उसे वह खोलना नहीं जानता। अन्तकृतदशांग सूत्रा के अनुसार जिन लोगों ने उस खजाने को खोला है वे मालामाल हो गए हैं। आपको भी मालामाल होना है तो संसार के दलदल से अपने को निकाल लीजिए।

 एक हाथी राजा को और प्रजा को बहुत प्रिय था। हाथी ने अनेक यु(ों में भाग लिया था। एक बार सरोवर में पानी पीने के लिए गया। वह हाथी वृ( हो गया था। विशालकाय कीचड़ में पंफस गया। महावत ने उसे दलदल से निकालने की खूब कोशिश की किन्तु सब प्रयास व्यर्थ हो गए। राजा ने पुराने महावत से पूछा, उसने उपाय बताया कि राजन ! यदि यु( के नगाड़े बजाए जायं तो शायद यह निकल जायेगा। वैसा ही किया गया, यु(भेरी बजने लगी। निराश हाथी में उत्साह का और स्पूफर्ति का संचार हो गया और वह अतिशीघ्र ही उस दलदल से बाहर निकल गया।

यु( की भेरी भगवान की जिनवाणी है। जिनवाणी में इतनी शक्ति है तुम जो चाहों कर सकते हो। भगवान कहते है ‘पुरिसा परमचक्खु विपरिकम्मा’ हे निर्मल ज्योति वाले पुरुष तू पुरुषार्थ कर जिनवाणी संदेश देती है बार-बार सुनों, बार चिंतन करो। अंतकृतदशांग सूत्रा सुनकर आपके भीतर ये भाव आये कि मैं भी गजसुकुमाल की तरह बन जाऊँ, मैं अर्जुनमाली की तरह बन जाऊँ, मैं अतिमुक्त कुमार की तरह बन जाऊँ, मैं भी श्री कृष्ण की तरह बन जाऊँ। काली, सुकाली आदि रानियों की तरह बन जाऊँ, मैं अरिष्टनेमि भगवान की तरह बन जाऊँ, मैं भगवान महावीर की तरह बन जाऊँ। अपने जीवन में अरिहंतो की साध्ना को महत्व दो। तुम भी अरिहंत बन सकते हो, तुम भी महावीर बन सकते हो। बुढ़ापे में ध्र्म नही हो सकता। जब तक शरीर में व्याध्यिाँ नही घेर लेती। जब तक शरीर में प्राण है तब तक ही आप ध्र्म की आराध्ना कर सकते हो। 

पर्यूषण पर्व में श्रावक के चार कत्र्तव्य वो पौषध् करे, पौषध् यानि स्वयं के निकट आना। ब्रह्मचर्य का पालन करना। कोई मनुष्य एक करोड़ स्वर्ण मुद्राओं का दान देता है अथवा सोने का जिन मंदिर बनवा देता है उसका भी उतना पुण्य नही है। जितना शु( मन से ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करने वाले को होता है। आरंभ-संमारभ का त्याग करना। पर्यूषण पर्व में ऐसा कोई कार्य नही करना जिसमें अध्कि जीव हिंसा होती हो। विशेष तप करना, एकासना, आयंबिल, उपवास, तेला, अठाई आदि करना। संत तुलसीदास कहते है इस संसार में पांच रत्न है जो सार है, संत की संगति, हरि भजन, दया, दान, उपकार। इस अवसर पर श्रमण संघीय मंत्राी श्री शिरीष मुनि जी, महासाध्वी डाॅ. श्री शिवा जी म.सा., महासाध्वी वैभवश्री जी, महासाध्वी प्रज्ञा जी ने अपने भाव अभिव्यक्त किये। श्रमण संघ विकास पफण्ड की प्रेरणा दी गई। यह पफण्ड साध्ु-साध्वी जी के स्वास्थ्य, शिक्षा, सेवा हेतु पिछले चार वर्षो से कार्यरत है। आप सभी इस पफण्ड से जुड़कर सेवा का लाभ ले।  

प्रतिदिन प्रातःकाल 8ः00 बजे श्री अन्तकृतदशांग सूत्रा का वांचन श्री शुभम मुनि जी द्वारा किया जा रहा है तथा नवकार महामंत्रा का अखंड जाप बहुत सुन्दर ढंग से चल रहा है। दोपहर में 3 से 4 बजे तक श्री कल्पसूत्रा का वांचन महासाध्वी डाॅ. श्री शिवा जी म.सा. द्वारा किया जा रहा है। सायं 4.00 बजे से 5.30 बजे तक स्वाध्याय चल रहा है। सूर्यास्त के बाद प्रतिक्रमण होता है। 

श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टध्र आचार्य सम्राट पूज्य श्री शिवमुनि जी म.सा. के जीवनोपयोगी अमृतमय प्रवचन पारस चैनल पर प्रतिदिन प्रातः 8.05 से 8.25 बजे तक प्रसारित हो रहे हैं। पारस चैनल - डिश टी.वी-571, टाटा स्काई-188, एयरटेल-696, वीडियोकाॅन-681, डेन-874 पर उपलब्ध् है। आप सभी कार्यक्रमों में अवश्य सहभागी बनें। यह जानकारी एस.एस. जैन सभा, प्रशांत विहार के महामंत्राी श्री जितेन्द्र जैन ने दी।

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जितना कामनाओं को बढाओगे उतना ही दुःखी होना पडे़गा

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

26 अगस्त 2014: प्रशांत विहार, दिल्ली; आत्मज्ञानी सद्गुरुदेव, युगप्रधन, आचार्य सम्राट पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन मंे पफरमाया कि - प्रभु महावीर की वाणी हमें अनंत अनादिकाल के सभी दुःखों और उनके मूल कारणों से मुक्ति का उपाय बता रही है। हमें क्या करना है? केवल उसे पूरे मन से सुनना है। वह वाणी कल्याण रूप एवं मोक्ष पथ दिखाने वाली है। सम्पूर्ण ज्ञान के प्रकाश से, अज्ञान और मोह के सम्पूर्ण त्याग से तथा राग-द्वेष के एकांत सुख रूप मोक्ष को यह जीव प्राप्त करता है। अज्ञान है संबंधें को अपना मानना, इस शरीर को अपना  मानना। हर क्रिया को कर्ता भाव से करना।

ज्ञान है मैं आत्मा हूँ। जब तुम इस संसार में आये थे तब तुम क्या साथ लाये थे। ये संबंध्, पद, लाखों-करोड़ों की सम्पत्ति, जब तुम यहाँ से जाओगें तो सब यही छोड़ जाओगें। कभी सोचना क्यों महावीर ने दीक्षा ली? क्यांे अपने परिवार को छोड़ा? क्यों चक्रवर्ती अपनी सारी सम्पत्ति छोड़कर दीक्षा अंगीकार करता है? अगर सुख संबंधें में होता, पद में होता ध्न, सम्पत्ति मंे होता तो चक्रवर्ती अपना राजपाट छोड़कर दीक्षा अंगीकार नही करते। सुख तुम्हारे भीतर है, सुख तुम्हारे आत्मा में है। हम सोचे कैसे गजसुकुमाल ने, अर्जुनमाली ने, श्रेणिक की रानियों ने, कृष्ण की रानियों ने अपने अंतिम लक्ष्य सि(ालय को प्राप्त किया। हमारे भीतर भी शास्त्रा श्रवण करने के बाद ये भाव आये कैसे मैं मेरे अंतिम लक्ष्य को प्राप्त करूँ। मोक्ष का मार्ग आसान नही है इन्द्रियों के विषयों को तोड़ना होगा। शरीर की सुकुमालता को छोड़ना होगा। इसके लिए शरीर को आतापना दो कायोत्सर्ग करो। आयंबिल, उपवास आदि रसनेन्द्रिय पर विजय प्राप्त करो। आयंबिल तप का बड़ा महत्व है। जब भी आपके जीवन में संकट आये आयंबिल तप करना, श्र(ा से करना आपकी सारी बीमारियां ठीक हो जायेगी, शुगर, बी.पी. हार्ट आदि की समस्यायें सब ठीक हो जायेगी।

स्वाद कहाँ होता है जीभ के अग्रभाग पर। सबसे कठिन है रसनेन्द्रिय का त्याग। जब आप तप करोगे तो आपको कष्ट भी आयेगें परन्तु संकल्प शक्ति को डावाडोल मत होने देना। संकट किसके जीवन में नही आते भगवान का शरणा रखो। पुराने कर्म उदय में आते है। जिसके जीवन में संकट नही वो जीवन ही क्या? संकल्प क्या करना है? मैं निश्चित मोक्ष जाऊँगा। मानव जीवन अनमोल जीवन है। इसी से आप मोक्ष प्राप्त कर सकते हो। कितना कुछ एकत्रित किया सब कुछ छोडना पडे़गा। जितना कामनाओं को बढाओगे उतना ही दुःखी होना पडे़गा। सुखी होने का केवल एकमात्रा मार्ग है रागद्वेष का छेदन-भेदन कर दो। कर्म के दो बीज है राग और द्वेष। जन्मों-जन्मों से हम रागद्वेष के कारण ही संसार में भटक रहे है। मोह से जन्म-मरण बढ़ते है, दुःख पैदा होता है संसार में दुःख के साथ सुख लगा हुआ है। हानि के साथ लाभ है। अभी तक हमनें सुख की खोज बाहर की और दुःख ही पाया। राग की अग्नि जन्मों जन्म बढ़ाती है द्वेष के समान ग्रह नही। द्वेष भीतर आये तो तरह-तरह के विचार में मन में आ जाते है। हम स्वयं भी दुःखी होते है दूसरों को भी दुःखी करते है। मोह के समान जाल नही और तृष्णा के समान नदी नही। 

प्रतिदिन प्रातःकाल 8ः00 बजे श्री अन्तकृतदशांग सूत्रा का वांचन श्री शुभम मुनि जी द्वारा किया जा रहा है। आज दोपहर में 3 से 4 बजे तक महासाध्वी डाॅ. श्री शिवा जी म.सा. द्वारा श्री कल्पसूत्रा के वांचन में भगवान महावीर का जन्म कल्याणक मनाया गया इस अवसर पर बच्चों द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रम भी पेश किये गये। सायं 4.00 बजे से 5.30 बजे तक स्वाध्याय चल रहा है। सूर्यास्त के बाद प्रतिक्रमण होता है। यह जानकारी एस.एस. जैन सभा, प्रशांत विहार के महामंत्राी श्री जितेन्द्र जैन ने दी।

 

देह को गौण कर आत्मा को प्राथमिकता दो

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

27 अगस्त 2014: प्रशांत विहार, दिल्ली; आत्मज्ञानी सद्गुरुदेव, युगप्रधन, आचार्य सम्राट पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन मंे पफरमाया कि - जिनवाणी हमें मोक्ष की ओर ले जाती है। आपके जीवन में अमृत की धरा बहे। जैसे तीर्थंकरों के पंचकल्याणक होते हैं वैसे आपके भी पंचकल्याणक हो, एक-एक श्वांस का उपयोग कर लो। समय बहुत मूल्यवान है। ये पर्यूषण पर्व का अवसर अपने को जानने का, अपने भीतर उतरने का है। आत्मरमण करने, आत्मचिंतन करने से जन्मों-जन्म के कर्म दूर हो जायेगे। चिंतन शुभ भी करना और शु( भी करना। आत्म-स्वरूप रमण से बड़ा कोई तप नही, कोई साध्ना नही। आत्मा में केवलज्ञान है, आत्मा में जाति स्मरण ज्ञान है, आत्मा में परमात्मा है। 

पफूल और पत्थर में किसकी पूजा होनी चाहिये? पूफल में सुगंध् है, सौन्दर्य है परन्तु पफूल मुरझा जाता है। पत्थर ने चोटें खाई है इसलिए पत्थर की पूजा होनी चाहिये। पफूल चोट खाता तो बिखर जाता। देह को गौण कर आत्मा को प्राथमिकता दो। हम इस संसार में क्यों भटक रहे है? क्योंकि अब तक हमने हमारी दृष्टि को परिवर्तित नही किया। दृष्टि को हमने बार्हिमुख किया। अब अन्र्तमुखी हो जाओ। हमारी रूचि अब तक खाने मे, पीने में, सोने में, घूमने में, नये वस्त्रा पहनने में रही, हमनें अपने शु( स्वरूप का चिंतन नहीं किया। 

 जो हमने कर्म किये है उसका भुगतान हमें करना ही होगा। भगवान महावीर को भी अपने कर्मों का भुगतान करना पड़ा। कानों में कीले ठोके गये, संगम देव ने एक रात्रि में बीस उपसर्ग दिये। महावीर जैसा संकल्प, गजसुकुमाल जैसा संकल्प अपने भीतर लाओ। उनके जैसी प्यास अपने भीतर लाओ। आपके भीतर जब तक मोक्ष जाने की प्यास जन्म नही लेगी तब तक आप अनादिकाल तक संसार चक्र में ऐसे ही भटकते रहोगे। मोक्ष जाने के लिए सब छोड़ना होगा ये ध्न, सम्पत्ति, देह की सुकुमालता। ये ध्न पकड़ोगे तो परम ध्न नही मिलेगा। देह मंदिर है तपोवन है तुम्हारा अंतस्थल आर्य हम मूल है शायद तुम्हे मालूम न हो। प्रवचन को सुनकर अपने भीतर परिवर्तन लाना, जीवन में उतारना, अपने भावों को शु( रखना, आपके भाव शु( रहे तो आप उध्र्वारोहन करोगे। अशु( रहे तो आप अधोरोहन करोगे। 

शालीभद्र ने पूर्व जन्म में खीर का दान शु( भाव से दिया था। अपूर्व सम्पत्ति का मालिक बना। दान देने के बाद भीतर में उल्लास का भाव, रोमांचित होना, पुलकित होना मुझे अवसर मिला दान देने का। पाप का कमाया ध्न पाप में जाता है और पुण्य का कमाया ध्न पुण्य में जाता है। घर क्यों नही छूटता? आसक्ति के कारण नहीं छूटता। एक आत्मा एक अरिंहत परमात्मा बाकी सब निस्सार है। श्रावक के तीन मनोरथ है - वह दिन ध्न्य होगा जब मैं आरंभ-संभारभ का त्याग करूँगा। बारह अणुव्रत अंगीकार करूँगा। वह दिन ध्न्य होगा जब मैं पंच महाव्रत धरण करके एकल विहारी बनूँगा। वह दिन ध्न्य होगा जब मैं अन्तिम समय संलेखना को धरण करूँगा। 

प्रतिदिन प्रातःकाल 8ः00 बजे श्री अन्तकृतदशांग सूत्रा का वांचन श्री शुभम मुनि जी द्वारा किया जा रहा है तथा नवकार महामंत्रा का अखंड जाप बहुत सुन्दर ढंग से चल रहा है। दोपहर में 3 से 4 बजे तक श्री कल्पसूत्रा का वांचन महासाध्वी डाॅ. श्री शिवा जी म.सा. द्वारा किया जा रहा है। सायं 4.00 बजे से 5.30 बजे तक स्वाध्याय चल रहा है। सूर्यास्त के बाद प्रतिक्रमण होता है।

 

जीव और अजीव का बोध् ही सबसे बड़ा ध्र्म है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

29 अगस्त 2014: प्रशांत विहार, दिल्ली; आत्मज्ञानी सद्गुरुदेव, युगप्रधन, आचार्य सम्राट पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन मंे पफरमाया कि - जिन्होंने सांसारिक कार्य को छोड़कर इस महापर्व पर्युषण की आराध्ना में तप, जप, प्रवचन श्रवण को महत्व दिया है उन्होंने अपने भव-भव के कर्मो का निर्जरित कर दिया है। ये आठ दिवस अवसर है अपने जीवन को देखने का। हमने क्या पाया है? और क्या खोया है? हमने शरीर को महत्व दिया है या आत्मा को। आप अन्तकृतदशांग सूत्रा में श्रवण कर रहे हो सुदर्शन श्रावक का वर्णन। जो जीव और अजीव का ज्ञाता था। जिसे निग्र्रंथ प्रवचन पर अटल श्र(ा थी। जीव, अजीव का ज्ञाता का अर्थ है - जिसे शरीर और आत्मा दोनों भिÂ है इसका बोध् हो गया है। जिसने आत्मसात् कर लिया है - मैं शरीर नही मैं आत्मा हूँ। आत्मा जिसे कोई माँ जन्म नही दे सकती, कोई पिता पालन नही कर सकता। जिसे भूख नही, प्यास नही। कब तक इस संसार सागर में कोल्हू के बैल की तरह घूमते रहोगे? अनन्तकाल बीत गया चैरासी के चक्कर में घूमते हुए अब इससे बाहर निकलो। इस संसार में जिन्होंने त्यागा है, जिन्होंने छोड़ा है उन्होंने पाया है।

 तीर्थंकरों के जीवन को देखो, अन्तकृतदशांग सूत्रा में जिन नब्बे महान् आत्माओं का वर्णन है उन सबने त्याग किया और शाश्वत सुख मोक्ष को प्राप्त किया। महावीर स्वामी यदि राज सिंहासन न छोड़ते तो महावीर न बनते। राम वनवास न जाते तो राम को कोई नहीं जानता। चक्रवर्ती अगर अपनी ध्न सम्पत्ति त्यागकर दीक्षा न ले तो नरक में जाता है। हमारे सामने कई ऐसे उदाहरण है रावण, हिटलर, निजाम हैदराबाद इन सबने बाहर की सम्पत्ति को महत्व दिया संसार को और बढ़ा दिया।

इन पर्युषण पर्व के दिनों में जिन्होंने अपनी दुकान नही छोड़ी, जिन्होंने रात्रि भोजन नहीं छोड़ा वो अवसर चूक गये क्योंकि यह समय न जाने दुबारा पिफर मिले या न मिले। ये अवसर कर्म काटने का, देह की सुकुमालता को छोड़ने का, साध्ना में लगाने का और अपनी आत्मा को मुक्त करने का था। नारी दुर्बलता के कारण, आकांक्षा के कारण दुःखी है। इतिहास में अनेक नारियों के उदाहरण है जैसे कि चंदनबाला, मीरा, राजुल, सीता जिन्होंने एक उच्च आदर्श स्थापित किया है। सुदर्शन सेठ को राजा ने पफाँसी की सजा सुना दी परन्तु ध्र्म पर, आत्मा पर अटल विश्वास की। शरीर मरेगा, शरीर टूटेगा। असली हकीकत को कोई नही मिटा सकता कोई तुम्हारी निंदा करे तुम्हारे कर्म कटते है जो कार्य करता है उसकी निंदा होती है जब भी सत्य के पथ पर चलोगे तुम्हारी निंदा होगी। जिस वृक्ष पर पफूल, पफल लगते है लोग उसी पर पत्थर मारते है। सब कार्य करो शरीर, आत्मा अलग है इसका भेद करते जाओ जीव और अजीव का बोध् ही सबसे बड़ा ध्र्म है। संसार के आकर्षण कम करो। ध्र्म के मार्ग पर आगे बढो।

 पारस, पारस को पैदा नहीं कर सका। एक पूफल खिलता है दूसरा पूफल पैदा नहीं कर सकता। एक ऐसा पुष्प है, एक ऐसा पारस है - मनुष्य। जो स्वयं खिलता है तो दूसरों को वैसा ही पारस, कुन्दन बना देता है। जब तक राग है, आसक्ति है, सि(ि नहीं मिल सकती। नुष्य को सुन्दर जीवन मिला, परिवार, पत्नी, बच्चे, प्रतिष्ठा मिली पिफर भी बेचैन हैं, दुःखी है, उसे कोई ऐसा सूत्रा मिले, आधर मिले। वह है - सम्यक् दर्शन। भगवान महावीर से गणध्र गौतम ने प्रश्न किया - भगवन् ! कौन सा ध्र्म, कौन सा गुरु सच्चा ? गौतम कहीं जाने से पहले अपने मन को शु( करो। यह दुनिया वैसे ही हो जाती है जैसे तुम देखना चाहते हो। दिनांक 30 अगस्त को महापर्व संवत्सरी की आराध्ना की जायेगी। इस अवसर पर आप सभी आपने प्रतिष्ठान बंद रखें अध्कि से अध्कि पौषध् करें। संवत्सरी का प्रतिक्रमण करे। तुम्हें आदमी में शैतान मिल सकता है, तुम्हें आदमी में भगवान भी मिल सकता है। पिफर तुम जिसके साथ रहना चाहो उसको खोजो।

प्रतिदिन प्रातःकाल 8ः00 बजे श्री अन्तकृतदशांग सूत्रा का वांचन श्री शुभम मुनि जी द्वारा किया जा रहा है तथा नवकार महामंत्रा का अखंड जाप बहुत सुन्दर ढंग से चल रहा है। दोपहर में 3 से 4 बजे तक श्री कल्पसूत्रा का वांचन महासाध्वी डाॅ. श्री शिवा जी म.सा. द्वारा किया जा रहा है। सायं 4.00 बजे से 5.30 बजे तक स्वाध्याय चल रहा है। सूर्यास्त के बाद प्रतिक्रमण होता है।

 

दृष्टि परिवर्तन से जीवन परिवर्तन होता है।

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

29 अगस्त 2014: प्रशांत विहार, दिल्ली; आत्मज्ञानी सद्गुरुदेव, युगप्रधन, आचार्य सम्राट पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन मंे पफरमाया कि - जीवन क्या है? जो हम जी रहे है उसे जीवन कहे या जो सत्य है उसमें जीना जीवन है। परमात्मा ने हमें ये मनुष्य का जीवन देकर एक अवसर दिया है हम इससे परमात्मा बन सके। जीवन जीना हमारे  हाथ में है। दो प्रकार के ध्र्म है एक शरीर का ध्र्म एक आत्मा का ध्र्म। शरीर में मुख्यता आत्मा की है। यदि आप शरीर को सब कुछ मानकर जी रहे है। आपके जीवन मंे मुख्यता खाना, पीना, सोना, उठना, बैठना तो आप अन्ततः दुःख को ही प्राप्त करोगे। जीवन में दुःख आता है ऐसा कोई व्यक्ति नही जिसके जीवन में दुःख ही दुःख है और ऐसा कोई कोई व्यक्ति नही जिसके जीवन में सुख ही सुख है। जीवन अनार के दाने के समान है जैसे अनार का दाना खट्टा, मीठा होता है वैसे ही जीवन में सुख और दुःख है, निंदा और प्रशंसा है। 

संसार का कोई व्यक्ति आपको दुःखी नही कर सकता और कोई व्यकित ऐसा नही जो आपको सुखी कर सके। तुम संसार के सभी कार्य करते हुए एक सन्यासी की तरह जीवन व्यतीत कर सकते हो। संत कबीर गृहस्थ थे पत्नी थी, बच्चे थे, जुलाहे का काम करते थे। वे पिफर भी संत कहलाये। कबीर कहते है हे परमात्मा! मुझे केवल इतना ही देना जिससे की मैं अपने परिवार का पालन पोषण कर सकुँ और अगर कोई मेहमान आये तो वो भी मेरे घर से खाली न जाये। कितना ध्न चाहिये तुम्हे उतना रखो बाकि त्याग दो। कमल कीचड़ मे रहता है पिफर भी कीचड़ से बाहर ही रहता है इसी प्रकार ये संसार भी एक कीचड़ है जिसमें कमल रूपी जीव आत्मा रहता है। प्रेम में राग भाव है, आसक्ति का भाव है तो आपका भव भ्रमण बढ़ रहा है। पे्रम में वैराग्य का भाव है तो आप संसार सीमित कर रहे है।

 मिथ्या दृष्टि और सम्यक् दृष्टि दोनों के स्वप्न समान हैं, बस थोड़ा सा ही अन्तर रह जाता है और वह अन्तर यही है कि सम्यक् दृष्टि गंदगी के कुण्ड में पड़कर भी अमृत के कुण्ड का आनन्द लेता है जबकि मिथ्या दृष्टि अमृत कुण्ड में रहकर भी गंदगी का अनुभव करता है। यह सब अपनी-2 दृष्टि का खेल है। दृष्टि के आधर पर ही तो मनुष्य अपने जीवन की सृष्टि का निर्माण करता है। विचार से ही तो आचार बनता है। सम्यक् दृष्टि और मिथ्या दृष्टि के जीवन में बाह्य दृष्टि से किसी प्रकार का अन्तर नहीं होता, वह अन्तर होता है केवल आन्तरिक दृष्टि का। सम्यक् दृष्टि संसार के प्रत्येक पदार्थ को विवेक और वैराग्य की तुला पर तोलता है, उसके बाद उसे ग्रहण करता है। इसके विपरीत मिथ्या दृष्टि संसार के भोग्य पदार्थों को भोगवाद की तुला पर ही तोलता रहता है। सम्यक् दृष्टि भी भोजन करता है केवल शरीर की पूर्ति के लिए जबकि मिथ्या दृष्टि भोजन करता है केवल स्वाद के लिए। सम्यक् दृष्टि कहता है कि जीवन में सुख आये तब भी ठीक और दुःख आये तब भी ठीक। उन दोनों में समत्व योग की साध्ना करना ही मेरे जीवन का उद्देश्य है। इसके विपरीत मिथ्या दृष्टि संसार के क्षणिक सुखों में सुखी और दुःखों में दुःखी रहता है। जीवन का परिवर्तन केवल गृहस्थ बनने या केवल साध्ु बनने से नहीं आता। वह परिवर्तन आता है दृष्टि ;आत्मदृृष्टिद्ध के परिवर्तन से। संसार के पदार्थों की ममता को छोड़ना सबसे मुख्य प्रश्न है। जो भी हो रहा है, मेरे कारण हो रहा है, इससे ही मैं की भ्रान्ति पैदा होती है। जो हो रहा है वह व्यवस्थित हो रहा है - मैं सिपर्फ दृष्टा मात्रा हूं। ऐसी समझ प्रगाढ़ हो जाए, ऐसी ज्योति जले, अकम्प, निधर््ूम तो साक्षी का जन्म होता है। 

किस पर विश्वास किया जाय, किस पर श्र(ा की जाय ? सबकुछ छोड़कर केवल एक पर ही विश्वास करो। वह एक क्या है? वह एक है आत्मा, चेतन और जीव। अनन्त काल में हमने ‘पर’ पर ही विश्वास किया है। ‘स्व’ पर हमारा विश्वास नहीं जम सका। अनन्त काल से हमने देह और देह के भोगों पर ही विश्वास किया है। कुछ आगे बढ़े तो अपने परिजन और परिवार पर विश्वास किया है। कुछ और आगे बढ़े तो समाज, राष्ट्र और विश्व पर विश्वास कर लिया। इस प्रकार का विश्वास एक बार नहीं अनन्त-2 बार किया गया है। विश्व, राष्ट्र, समाज, व्यक्ति और व्यक्ति के शरीर इन्द्रिय और मन पर तो विश्वास किया परन्तु इन सबके मूल केन्द्र आत्मा पर अभी तक श्र(ा और विश्वास नहीं किया गया। याद रखिए आत्मा की सत्ता से ही इन सबकी सत्ता है। 

 

आत्मा के अस्तित्व पर ही इन सबका अस्तित्व है। शिवरहित शरीर शव कहलाता है। शव की इन्द्रियां होते हुए भी वे अपना काम नहीं कर पाती।

दिनांक 30 अगस्त को महापर्व संवत्सरी की आराध्ना की जायेगी। इस अवसर पर आप सभी आपने प्रतिष्ठान बंद रखें अध्कि से अध्कि पौषध् करें। संवत्सरी का प्रतिक्रमण करे।

प्रतिदिन प्रातःकाल 8ः00 बजे श्री अन्तकृतदशांग सूत्रा का वांचन श्री शुभम मुनि जी द्वारा किया जा रहा है तथा नवकार महामंत्रा का अखंड जाप बहुत सुन्दर ढंग से चल रहा है। दोपहर में 3 से 4 बजे तक श्री कल्पसूत्रा का वांचन महासाध्वी डाॅ. श्री शिवा जी म.सा. द्वारा किया जा रहा है। सायं 4.00 बजे से 5.30 बजे तक स्वाध्याय चल रहा है। सूर्यास्त के बाद प्रतिक्रमण होता हे। 

 

विश्व कल्याण का पर्व है - सम्वत्सरी

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

30 अगस्त 2014: प्रशांत विहार, दिल्ली; आत्मज्ञानी सद्गुरुदेव, युगप्रधन, आचार्य सम्राट पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन मंे पफरमाया कि - पर्व दो प्रकार के होते हैं - लौकिक और अलौकिक। जो हमें इन्द्रियांे के साथ जोड़े, संसार के दुःख और सुख के साथ जोड़े वे लौकिक पर्व है। जैसे - जन्मदिन मनाना, शादी के पर्व, गृह प्रवेश। जो हमें इन्द्रिय जगत से परे ले जाये, भीतर के सुख, भीतर की शान्ति और अन्तर की समाध् िके साथ जोड़े, यह अलौकिक पर्व है। सम्वत्सरी एक लोकोत्तर पर्व या अलौकिक महापर्व है। यह पर्व मानव को आत्म निरीक्षण, आत्म चिन्तन तथा स्व-स्वरूप रमण की प्रेरणा करता है। संवत्सर नाम वर्ष का है। वर्ष के अनन्तर मनाए जाने वाले पर्व को सांवत्सर पर्व कहते हैं। जैन संसार में यह पर्व संवत्सरी पर्व के नाम से प्रसि( एवं प्रचलित है। तीर्थंकर परमात्मा भी इसे मनाते है।

मानव गलती का पुतला है। कोई भी त्राुटि हो प्रतिदिन क्षमापना लेनी चाहिए। ऐसा नहीं तो 15 दिनों के अनन्तर अपने अन्तःकरण को शु( कर ले। यदि 15 दिनों में नहीं तो 4 मास के अनन्तर अपने जीवन की पड़ताल करे, यदि यह भी नहीं तो एक वर्ष के अनन्तर अपने जीवन खाते को अवश्य ही देख लेना चाहिए। मैं समस्त जीवों को क्षमा करता हूं। सब जीव भी मुझे क्षमा करें। सबके प्रति मैत्राी भाव है। मेरा किसी के साथ वैर, विरोध् नहीं है।

काल का प्रवाह अनादिकाल से चला आ रहा है, न इसके सिरे का पता चलता है, न इसके छोर का। उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी काल के स्वरूप को घड़ी के अंकों द्वारा अच्छी तरह समझा जा सकेगा। घड़ी को उल्टा कर देखिए उस 12 का अंक नीचे की ओर, छः का अंक उफपर की ओर रखिए। 12 के अंक से 6 के अंक तक घड़ी का आध चक्र होता है। 6 के अंक से लेकर 12 के अंक तक शेष का आध चक्र बनता है। दोनों मिलकर घड़ी का पूरा चक्र होता है। इसी तरह उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी ऐसे दोनों काल भाग मिलकर एक पूर्ण काल चक्र होता है।

उत्सर्पिणी काल उत्तरोत्तर उन्नति और अवसर्पिणी काल अवनति का समय होता हैं। उन्नति करता हुआ कालचक्र का आध उत्सर्पिणी भाग जहां समाप्त होता है वहीं से अधेगति करता हुआ कालचक्र का दूसरा अवसर्पिणी काल चालू हो जाता है। आरे के आरम्भ में विविध् स्वभाव के मेघ विविध् वर्षायें करते हैं। 5 सप्ताह वर्षा के 2 सप्ताह खाली, पानी, दूध्, घी, अमृत के समान वर्षा ध्ीरे-2 पृथ्वी विभिन्न वनस्पतियों से हरी-भरी हो जाती है। पृथ्वी तल को देखकर बिलों के निवासी मानव प्रमुदित हो उठते हैं और सब मिलकर एक प्रतिज्ञा करते हैं। आज से हममें से कोई मांस का आहार नहीं करेगा, प्रकृति माता ने जब हमें उदरपूर्ति की सब सामग्री दे डाली है तब व्यर्थ में बेचारे पशुओं का जीवन ध्न क्यों लूटा जाये। उत्सर्पिणी कालीन द्वितीय आरे के लोगों ने मांसाहार न करने की जिस दिन प्रतिज्ञा की थी वह भाद्रपद शुक्ला पंचमी का ही दिन था। तभी से संवत्सरी का रूप धरण हुआ।

सात दिन तैयारी के हैं आठवां दिन एक नया जन्म है। यह जन्म है विश्व मैत्राी का, निःस्वार्थ, प्रेम और दान का। पहले तो हम अन्तःकरण को शु( करें। कैसे हम शु( करें ? मैत्राीभाव के द्वारा। ? वर्ष भर की समीक्षा करें, किसी के प्रति वैर विरोध् रह गया हो तो दूर करें। इतिहास में कई ऐसे उदाहरण है जो हमें क्षमा, शांति का संदेश देते है। भगवान महावीर को संगम देव छः महीने तक कष्ट देता है परन्तु भगवान महावीर के भीतर संगम के प्रति करुणा का, क्षमा का भाव था। गणध्र गौतम आनंद श्रावक से क्षमा मांगने जाते है। द्रोपदी अपने पांच पुत्रों के वध् के बाद भी अश्वत्थामा को क्षमा दान देती है, राजा प्रदेशी घोर नास्तिक था परन्तु केशी कुमार श्रमण द्वारा प्रतिबोध् पाने के बाद आत्मा पर विश्वास करता है उसकी रानी सूर्यकांता इस परिवर्तन से सहमत नही होती और राजा को खाने में, पीनें में पहनने के कपडों में जहर दे देती है। राजा प्रदेशी जान जाता है पिफर भी भीतर में क्षमा का भाव है। सुकरात, न्यूटन, संत तुकाराम कई ऐसे क्षमा के उदाहरण हैं। 

देश में मांस का निर्यात बढ़ गया है बेजुबान पशुओं की, गाय, भंैस आदि की निर्मम हत्यायें की जा रही है जो गायें हमारे लिए पूज्यनीय है जिसका हम दूध् हम पीतें है उनको चारा भी नही खिलाया जाता है। काला ध्न बैंक में जमा है। रेशम की साड़ी बनाने में कई लाखों-करोड़ो जीवों का हृास होता है रेशम की किसी भी वस्तु का प्रयोग नही करेगे। आज से हम संकल्प करे किसी भी जीव को कष्ट नहीं देगें चमडे़ से निर्मित वस्तुओं में भी जीव हिंसा होती है ऐसी किसी भी वस्तु का अपने जीवन में कभी भी उपयोग नही करेगे।

 

विनय से पात्राता आती है। 

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

02 सितम्बर 2014: प्रशांत विहार, दिल्ली; आत्मज्ञानी सद्गुरुदेव, युगप्रधन, आचार्य सम्राट पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन मंे पफरमाया कि - हम वंदन क्यों करते है? नमन क्यों करते है? परमात्मा हमें कुछ भी नही देता, परमात्मा हमें हाथ पकड़कर मोक्ष नही देता। विनय करने से, वदंन करने से हमारे भीतर पात्राता आती है विनय आपकी पात्राता है यदि आप अपने को पात्रा बना सके तो ज्ञान का अमृत भरने में समय नहीं लगता। अमृत के निर्झर को निरंतर झर रहे सब ओर अमृत वर्षण निरन्तर चल रहा है पर जो पात्रा है वही उसे ग्रहण करने के योग्य होता है। अहंकारी सदा रिक्त रह जाता है क्योंकि अहंकारी व्यक्ति पहले से ही भरा हुआ है अहंकार अपने आप में मोक्ष पथ पर सबसे बड़ी बाध है अहंकारी को भरने के लिए किसी के पास कोई उपाय नही है। अहंकारी कहता है मैं सब कुछ जानता हूँ विनयवान कहता है मैं कुछ नहीं जानता।

 जैसे वृक्ष हमें कुछ भी नही देता परन्तु उसके पास जाने से पफूल, पफल, छाया आदि सब मिल जाता है वैसे ही गुरु हमें कुछ भी नहीं देता परन्तु उसके पास बैठने से सुख, शांति, समृ(ि अपने आप मिलने लग जाती है समृ(ि का अर्थ है मेरे पास बहुत कुछ है जो मेरे पास है वो ले लो। संसार में समृ( लोग थे महावीर, बु(, कृष्ण, जीसस्, राम आदि और दरिद्र लोग थे हिटलर, सिकन्दर, चंगेज खां, नादिरशाह आदि। जो समृ( थे उनके पास सब कुछ था राजपाट, हीरे जवाहरात पिफर भी उन्होंने इनका सबका त्याग करके अपने भीतर जो शु( आत्मतत्व है उसको प्रकट करके अपने आपको इस संसार चक्र से मुक्त कर लिया और परमात्म बने गये। 

जो दरिद्र थे उनके पास भी पर्याप्त ध्न था पिफर भी पूरा जीवन विश्व को जीतने में और ध्न की आकांक्षा में अपने संसार चक्र और बढ़ा लिया। हमारे पास अगर कोई वस्तु खत्म हो गई है तो ऐसा नही कहना कि खत्म हो गई है इससे व्यक्ति की दरिद्रता प्रेषित होती है खत्म हो गई है तो ऐसा कहना अभी है और ले आना। पंडित रविशंकर जी की दादी कहा करती थी है अभी और ले आना। बच्चों को संस्कार, मां-बाॅप आदि के द्वारा ही प्राप्त होते है तप से भी अध्कि सेवा का महत्व है हमारे जैन आगमों में कहा है गुरु रुग्ण है और शिष्य अगर तपस्या कर रहा है तो आवश्यकता लगे तो शिष्य गुरु की सेवा के लिए अपने तप को त्यागकर गुरु की सेवा करे। 

महाराष्ट्र प्रवर्तिनी श्री प्रभाकंवर जी म. सा. 88 वर्ष की उम्र में इस औदारिक शरीर को सागारी संथारा ग्रहण करने के उपरांत देवलोकगामी हो गये उन्होंने 14 साल की आयु में जैन भागवती दीक्षा अंगीकार की। 74 वर्ष का दीक्षा पर्याय रहा। उनका जीवन जप, तप, स्वाध्याय, मौन, ध्यान से परिपूर्ण रहा। दीर्घ संयमकाल में उन्होंने विभिन्न क्षेत्रों में विचरण कर जिनशासन की महत्ती प्रभावना की। घोर तपस्वी श्री गणेशीलाल जी म.सा. की विशेष कृपा उन पर रही, संप्रदाय में संतों की कमी होने पर उन्होंने स्वयं वैरागियों को तैयार कर गुरु परंपरा को आगे बढ़ाने अथक् पुरुषार्थ किया। 

 

 

 

एक आत्मा पर श्र(ा करो।

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

03 सितम्बर 2014: प्रशांत विहार, दिल्ली; आत्मज्ञानी सद्गुरुदेव, युगप्रधन, आचार्य सम्राट पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन मंे पफरमाया कि - नमन हमारे जीवन हमें झुकना सिखाता है। नमन से हमारा अहंकार दूर होता है जो हम पाना चाहते है वो हमें मिल जाता है नमन से पात्राता तैयार होती है पात्राता तैयार होने से हमारे भीतर श्र(ा आती है श्र(ा से कुछ भी डाला जाये तो भीतर में उतर जाता है। पात्रा में कुछ भी डालने से पहले पात्रा का सापफ होना भी जरूरी है यदि भोजन अच्छा हो और पात्रा शु( न हो तो भोजन अशु( हो जाता है। हम जब परमात्मा को भीतर बुलाते है तो हृदय का पात्रा कैसा होना चाहिये? शु( होना चाहिये। हमारे भीतर शु(ता ;च्नतपजलद्ध नही है तो परमात्मा हमारे लाख प्रयत्न करने पर भी हृदय में नही आयेगे। कुछ भी अनुष्ठान करो चाहे तप करो, जप करो, प्रार्थना करो, नमन करो परन्तु अगर हृदय में श्र(ा नही है तो आप का किया हुआ ध्र्म आपको देवलोक की यात्रा करा सकता है परन्तु मोक्ष नही दे सकता। 33 करोड़ देवी-देवता है किस पर श्र(ा करोगे? भगवान ने कहा है कि एक आत्मा पर श्र(ा करो। हमें श्र(ा होती है परिवार पर, मित्रों पर पर आत्मा पर, स्व पर श्र(ा नही होती। श्र(ा पत्थरों को भी हिला देती है। भगवान ने जो कहा उस पर अटल श्र(ा, अटल विश्वास भगवान की वाणी शाश्वत सत्य है। मैं नही चल पा रहा हूँ भगवान ने कहा रात्रि भोजन का त्याग, सप्तकुव्यसन का त्याग, रात्रि में शादी नही करना, पफूल नही लगाना, छः काय के जीवों की रक्षा करना। छःकाय के जीवों में वही आत्मा है, शारीरिक दृष्टि से कोई भी छोटा, बड़ा हो सकता है परन्तु आत्मिक दृष्टि से सब एक समान है। भगवान की वाणी सबके लिए एक समान है गौतम के लिए भी वही वाणी है और गौशालक के लिए वही वाणी है। अर्जुनमाली, चंडकौशिक पात्रा बन गये भगवान के शब्द ने उनके जीवन को परिवर्तित कर दिया। 

नमन तीन प्रकार का है दूर से नमन करना, पास में आकर तिक्खुत्तो के पाठ से वंदन करना और इच्छामि खमासमणो के पाठ से वंदन करना। अगर पात्रा तैयार है तो सद्गुरु आपके पास आ जायेगा या आप सद्गुरु के पास चले जाओगे सद्गुरु आपको शक्ति देता है शासनदेव, शासनमाता दृश्य व अदृश्य रूप में हमारी सहायता करते है प्रत्येक तीर्थंकर के शासनदेव और शासनमाता होते हैं वो हमें या तो स्वप्न में दर्शन देकर या किसी के माध्यम से या प्रत्यक्ष रूप में सांकेतिक भाषा में भविष्य में होने वाले घटनाक्रमों से परिचित करा देते है। 

पंजाबी में कहावत है सो ताये चाचे एक पीऊ अरिहंत परमात्मा हमारे पिता से भी बढ़कर है उन्हें अपने कण-कण रोये-रोये में बिठा लो भला कैसी भी परिस्थतियां आये चाहे रोग आये, रोग किसको आता है? शरीर को आता है तप कौन करता है? दान कौन लेता है? ये सब शरीर करता है। मंदिर में जाओ तो मंदिर में भी शु( आत्मा के दर्शन करना महावीर को हमने परंपरा में बांध् दिया थोडे़ लोग है जो जानते है इस जीवन में हमें परमात्मा का साक्षात्कार करना है इसके लिए अपने भीतर मिलन की प्यास पैदा करो। भगवान महावीर साढे़ बारह वर्ष तक मौन रहे उन्होंने कोई मंदिर नही बनवाया। उन्होंने किसी की भी स्तुति नही की। 

माया महा ठगनी है सब ठगे जाते है माया का अर्थ है जिसमें तुम्हारा मन लग गया तुम्हारा मन पर पदार्थो में लग गया माया को छोड़ सरलता में आ जाओ। आत्मा को विचार नही, संस्कार नही, धरणा नहीं आत्मा ज्ञाता दृष्टा है 

 

चारगति चैरासी लाख योनियों में भटकने का मूल कारण - अज्ञान

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

04 सितम्बर 2014: प्रशांत विहार, दिल्ली; आत्मज्ञानी सद्गुरुदेव, युगप्रधन, आचार्य सम्राट पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन मंे पफरमाया कि - चारगति चैरासी लाख योनियों में भटकने का मूल कारण क्या है? राजा, रंक और देश का प्रतिष्ठित व्यक्ति, दार्शनिक, शास्त्राज्ञ, वैज्ञानिक मनुष्य ने सब कुछ जाना है, पहचाना है। जब से माँ के गर्भ में आया तब से चलना सीखा, बोला सीखा, पढ़ना सीखा, देश, विदेश में अपनी ख्याति बना ली पिफर भी अनादिकाल से क्यों भटक रहा है? मनुष्य जानता है क्रोध् जहर है पिफर भी क्रोध् क्यों आता है लोभ सबसे बड़ा पाप है पिफर भी क्यों सग्रह करता है मनुष्य जानता है माया नही करनी चाहिये माया हमें अधेगति में ले जाती है पिफर भी माया क्यों करता है? क्यों निंदा करता है? सब कुछ व्यक्ति व्यक्तित्त्व विकास के लिए करता है तत्वज्ञान भी प्राप्त कर लेता है पिफर भी उसके कषाय नही छूटते है। थोडे़ से लोग है जो समझमते है कि इस भवयात्रा को कम करना है खत्म करना है ये सब हमें या तो प्रभु की वाणी से जाति स्मरण ज्ञान से या पूर्व जन्मों के संस्कार से जान सकता है। 

महावीर कोई नाम नही, महावीर कोई व्यक्ति नही, ट्टषभदेव से लेकर महावीर तक चैबीस तीर्थंकर हुये है ऐसी अनंत चैबीसिया हो गई। महावीर के नाम से मंदिर बना लेने से संप्रदाय खडा करने से वीतरागता हमारे भीतर नही आती। कोई भी तीर्थंकर अब तक इस सृष्टि का निर्माण किसने किया है, कब किया है? नही जान पाये है। परन्तु अंत कैसे किया जा सकता है? ये बता सकते है अलग-अलग मान्यतायें है कोई कहता है इस सृष्टि को ब्रह्मा ने बनाया है, विष्णु इस सृष्टि की रक्षा करते है, महेश इस सृष्टि का संहार करते है। कोई कहता है इस सृष्टि को सात दिन में बनाया है परन्तु अरिहंत परमात्मा कहते है जो पात्रा होगा वो इस संसार चक्र से बाहर निकल जाता है। 

हम सभी ध्रती को और ध्र्म को संप्रदाय में बांट सकते है परन्तु आकाश को नही बांट सकते। सि(शिला में अलग-अलग स्थान नही है वहाँ महावीर की आत्मा और ट्टषभदेव भगवान की आत्मा एक ज्योति में समाकर एकाकार हो रही है। महावीर की समता, साध्ना, ध्यान, दृष्टि, करुणा आदर्श को ग्रहण करना। तुम समर्थ हो, तुम्हारे पास शक्ति है आत्मबल है इससे तुम वीतरागता को प्राप्त कर सकते हो। वीतरागता अलग-अलग नही हो सकती। हिन्दु, मुस्लिम, सिख, ईसाई, बु(, जैन सबमें वीतरागता एक जैसी है पानी कोई भी पीये पानी सबके लिए एक जैसा ही है। कट्टर आत्मवादी, कट्टर वीतरागी बन जाओ महावीर के श्रावक का क्या अर्थ है? बारह व्रतों अणुव्रतो को अंगीकार करे। जैन आगम, उपासकदशांग सूत्रा में दस श्रावकों का वर्णन आता है जो भगवान की वाणी श्रवण करते है बारह व्रत अंगीकार करते है, घर में आकर अपनी ध्र्मपत्नी को भी शु( वीतराग ध्र्म को स्वीकार करने के लिए कहते है घर में रहते है, खेती करते है, सब कुछ करते है परन्तु एकत्त्व भावना का चिंतन करते है। अंतिम समय में सब कुछ अपने पुत्रा को सौंपकर एक महीने का संथारा, संलेखना धरण करते है। आयु पूर्ण कर महाविदेह क्षेत्रा में जायेगे और वहाँ से सि(-बु( मुक्त अवस्था को प्राप्त करेंगे। कोई भी व्यक्ति ध्न और पद बड़ा नही होता व्यक्ति बड़ा होता है आत्म-पद, आत्म-ध्न, आत्म-चिंतन, आत्म-रमण करने से किसी के मत बनो, महावीर के भी मत बनो, आत्मवादी बन जाओ। अरिहंत परमात्मा की शरण ग्रहण कर लो। अनादिकाल से मिथ्यात्व व अज्ञान के कारण इस संसार में जीवन-मरण के चक्र में भटक रहे है। मिथ्यात्व है तभी क्रोध्, मान, माया, लोभ, राग, द्वेष है। मिथ्यात्व के कारण ही विभाव दशा आता है, पर का आकर्षण होता है, मिथ्यात्व का तोड़ना है, मिथ्यात्व के टूटने से जन्म-जन्मों के कर्म क्षय हो जाता है। मिथ्यात्व यानि जो असत्य है उसे अपना मान लेना या सत्य को नही जानना। मिथ्यात्व कहाँ भारी है ध्न में, शरीर में, संबंध् बनाने में, पद-प्रतिष्ठा बढ़ाने में तुम भगवान हो, अपने आप में सम्पन्न हो, परिपूर्ण हो, तुम में मोक्ष प्राप्त करने का अध्किार है, पुरुषार्थ तुम्हें करना है। हमने अब तक क्रिया में ध्र्म मान लिया। ध्र्ममय हो जाने में ध्र्म है जब समता में होते हो प्राणी मात्रा के प्रति मैत्राी का भाव, करुणा का भाव आता है।

 

ज्ञान वह जो आपको मुक्त करे

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

11 सितम्बर 2014: प्रशांत विहार, दिल्ली; आत्मज्ञानी सद्गुरुदेव, युगप्रधन, आचार्य सम्राट पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन मंे पफरमाया कि - भगवान महावीर ने सबसे अध्कि महत्व ज्ञान को दिया। ज्ञान वो नहीं जो आपको पुस्तकों से प्राप्त हो, ज्ञान वो नहीं जो आपको विश्वविद्यालय से प्राप्त हो, ज्ञान वो नही जो आपको तीर्थस्थल, मंदिर, मस्जिद, चर्च, गिरजाघर, गुरुद्वारे से प्राप्त हो, असली ज्ञान वह है जो आपको मुक्त करंे। ज्ञानी के दस लक्षण हैं अक्रोध्। ज्ञानी कभी क्रोध् करता भी है तो पानी की लकीर की तरह पत्थर की लकीर की तरह नही। जो हमें नरक तिर्यंच आदि योनि में ले जायें। वैराग्य विशेष रूप से आपका राग समाप्त करना। आसक्ति की भावना है तो आप ज्ञानी नहीं हैै। जितेन्द्रिय अब तक हमने इन आंखों से कितने दृश्य देख लिए, कानों से मध्ुर संगीत सुन लिए, नाक से सुगंध् भी ले ली। जिह्ना से कितने स्वाद लिये, कितने ही शरीरों का स्पर्श कर लिया परन्तु हमें मिला क्या? क्षमा, दया, शांति, निर्लोभ, दाता वह लेगा नही देगा। वह सर्वप्रिय होगा वो सबको प्रिय होगा। भय व शोक का हरता होगा हम इन गुणों में से है कम से कम एक गुण को भी अपने जीवन में विकसित कर लेंगे तो आप ज्ञानी हो जायेगे। 

जीव अनादि से भटक रहा है उसका कारण क्या है? हमारा संबंध् किससे है? पुदगल् की संगति से हमारा संबंध् है और हम इस पुदगल् के कारण ही अनादि से भटक रहे है। पुदगल् की संगति का अर्थ है जो शरीर संबंध्, ध्न, पद, कोठी, बंगला आदि को मुख्यता देना। आत्मा से संबंध् जीवन का विकास है। ज्ञानी जिसका संबंध् अपने चैतन्य से होगा। स्वरूप में नही आये तो वैसे ही थकते रहोगे जो पूर्व जन्म में संबंध् थे। क्या हमें पता है क्या थे हम।   एक ध्नी सेठ था उसे एक ही पुत्रा था। पुत्रा और उसकी मां एक बार एक सन्त का प्रवचन सुनने गए। वहां पुत्रा अध्यात्म से अत्यध्कि प्रभावित हुआ। घर आकर उसने मां से कहा कि मां ! मैं दीक्षा लेना चाहता हूं। तो मां ने कहा कि तुम्हें दीक्षा नहीं लेनी है। बालक एक-दो महीने तक लगातार जिद करता रहा कि मां मुझे दीक्षा लेनी है, लेकिन मां सर्वदा इन्कार कर देती थी। एक बार मां खाना परोस रही थी तो बालक ने कहा कि मां मुझे दीक्षा लेनी है। मां को क्रोध् आ गया, उसने कह दिया कि जा दपफा हो जा, ले ले दीक्षा। बालक का इतना सुनना था कि उसने जाकर दीक्षा ले ली। मां को बहुत दुःख हुआ। एक ही लड़का था, उसने भी दीक्षा ले ली। पुत्रा वियोग में उसने आत्महत्या कर ली। मां का पुनर्जन्म हुआ एक शेरनी के रूप में। वह उसी जंगल में रहती थी जहां उसका पुत्रा संत साध्ना कर रहा था। एक दिन उस शेरनी ने उस संत को देखा और क्षुध-पूर्ति के लिए उसे मार डाला और उसकी छाती चीरकर रक्तपान करने लगी। यह मां का अज्ञान। वह मां नहीं जानती थी कि जिसका वह रक्तपान कर रही है वह उसी का पुत्रा है।

 

 

मानव जन्म से सद्बोध् िप्राप्त करो

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

12 सितम्बर 2014: प्रशांत विहार, दिल्ली; आत्मज्ञानी सद्गुरुदेव, युगप्रधन, आचार्य सम्राट पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन मंे पफरमाया कि - सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चारित्रा इन तीनोें से मोक्ष को पाया जा सकता है। आत्म-दृष्टि होगी तो आत्म-ज्ञान आयेगा और उससे आत्म-रमण होगा। हमने चारित्रा को क्रिया मान लिया। उंची क्रिया, नीची क्रिया में पफंस गये। मोक्ष जाना है तो आत्म-रमण, आत्म-चिंतन ज्ञानी होने का आवश्यक लक्षण है। सुख, दुःख, राग, द्वेष कर्म के बीज है, जिससे भव भ्रमण बढ़ता है ध्र्म का बीज, ज्ञान का बीज, करुणा व मैत्राी का बीज से कर्म की निर्जरा है। दृष्टि दो प्रकार की हैं एक सत्य दृष्टि, दूसरी असत्य की दृष्टि। एक है आत्मा को देखना, एक शरीर को देखना। कोई भी काम करो अगर आप हर कार्य पर ज्ञाता दृष्टा है तो आप कर्म की निर्जरा कर रहे है। सुख दृष्टि में बगुला दृष्टि को छोड़कर हंस वृत्ति को ग्रहण करो। आत्मा शब्द बोलना नही, समझना नहीं उसमें रमण करना। आत्मरमण में रहते हो तो आत्म-दृष्टि पक्की होती हैं दुःख आता है तब भी मैं आत्मा हूँ का चिंतन करो हम अब तक मिथ्यात्व के कारण बाहर सुख ढूंढ रहे है बार-बार मैं आत्मा हूँ का चिंतन करोगे तो सब मैं वही आत्मा है जो मेरे में है तो आप किसी के लिए बुरा नही सोचोगे। आप क्रोध् नही कर पाओगे, आप अंहकार नही कर पाओगे, आप माया नही कर पाओगे। आप रागी और द्वेषी में भी आत्मा का चिंतन करोगे तो मोक्ष को पाओगे। 

आत्म-ज्ञान आपको स्वयं के बोध् से प्राप्त होगा, जातिस्मरण ज्ञान से या गुरु की कृपा से प्राप्त होगा। भोजन करने बैठे, भोजन में आसक्त नही हुए आपको सम्मान मिला तो उसमें आसक्त तो नही हुए ध्न, पद, प्रतिष्ठा, रूप मिल गया अहंकार तो नही आया। बेटे का जन्म होता है तो मोह का जन्म होता है शादी करते हो तो मोह का विस्तार होता है आत्मरण करोगे तो घर में संघर्ष हो नही सकता इस चातुर्मास में आपको सम्यक्त्व का बीज तो मिल गया है परन्तु बार-बार आत्म-रमण, आत्म-चिंतन नही करोगे तो सम्यक्त्व का बीज नष्ट हो जायेगा। सम्यक्त्व का बीज नष्ट हो गया तो पिफर अनादि के चक्र में भ्रमण चलता रहेगा। 

भगवान ट्टषभदेव ने अपने 98 पुत्रों को कहा कि - समझों प्रतिबोध् प्राप्त करो, समझते क्यों नही हो, ऐसा राज्य तुम्हें अतीतकाल में अनंत बार प्राप्त हो चुका हैं। तुम किस राज्य को प्राप्त करने के लिए इस जन्म को व्यर्थ कर रहे हो। ये मनुष्य का जन्म तुम्हें बड़ी कठिनता से प्राप्त हुआ है। इस जन्म में भी तुमने बोध् िको प्राप्त नही किया तो अगले जन्म में तुम्हें सद्बोध् िप्राप्त होना दुर्लभ है क्योंकि बीतीं हुई रातें लौटकर नहीं आती। गया हुआ जीवन पुनः मिलना सुलभ नही है।  

 

 

 

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

13 सितम्बर 2014: प्रशांत विहार, दिल्ली; आत्मज्ञानी सद्गुरुदेव, युगप्रधन, आचार्य सम्राट पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन मंे पफरमाया कि - भगवान महावीर ने हमें ध्र्म दिया, ज्ञान दिया, आचरण दिया, उन्होंने स्वयं सर्वप्रथम जिया उसके बाद हमें उस राह पर जीने का मार्ग बताया। उन्होने स्वयं खोज की। मैं कौन हूँ, कहाँ से आया हूँ और कहाँ जाना है। और हमें बताया मैं आत्मा हूँ अनादिकाल से भटक रहा हूँ और मोक्ष जाना है अपना लक्ष्य चुनो। आपका लक्ष्य क्या है? अगर आपको मोक्ष, केवल-ज्ञान आत्मा की साध्ना मिल रही हो और दूसरी ओर सुविध के साध्न मित्रा, परिवार, ध्न, मिल रहा हो तो आप किसका चुनाव करोगे। अन्तर्मन से इस प्रश्न का समाधन खोजों अब तक आपने अपना लक्ष्य नहीं चुना तो संसार में यों ही भटकते रहोगे। ध्न जितना आवश्यक है उतना मिल ही जाता है परन्तु आकांक्षा बढ़ती ही जाती है। 

जल्दी मोक्ष जाने के 23 बोल है सर्वप्रथम है तुम्हारे भीतर मोक्ष की अभिलाषा। हम दो प्रकार से संसार में रह सकते है - आत्मदृष्टि और मिथ्या दृष्टि। आत्मदृष्टि और मिथ्या दृष्टि दोनों में अंतर है दोनों दुकान में जाते है एक खेल समझता है और दूसरा बोझ। मिथ्या दृष्टि ग्राहक आया तो खुश होता है नही आया तो दुःखी होता है आत्मदृष्टि वाला ग्राहक में भी परमात्मा देखता है। बहनें खाना बनाती है अगर वे आत्मदृष्टि से बनाती है तो स्वयं के भी कर्म निर्जरित करती है और सामने वाले व्यक्ति के भाव में भी बदलाव आता है। भगवान महावीर के 1 लाख 59 हजार श्रावक और गौशालक के ग्यारह लाख अनुयायी थे। भगवान महावीर ने किसी की भी मनोकामना पूर्ण नही की। उन्होंने शु( वीतराग ध्र्म का उपदेश दिया साध्ु के पांच महाव्रत और श्रावक के 12 अणुव्रत बताये है श्रावक तीन भव में मोक्ष जा सकता है। आप ध्र्म में है तो ध्र्म ही आपको बता देता है क्या करना है और क्या नही करना है। 

संलेखना संथारा आत्मा की उच्चतम अवस्था है। शिष्य का कत्र्तव्य है कि गुरु को आखिरी समय में समाध् िमरण हो। इसके लिए संथारा कराये अपने मोह में न पफंसाये। इससे महान कर्म की निर्जरा होती है संलेखना जो देता है उसका भी आखिरी समय में संलेखना संथारा आता है। मोह कम करो, आसक्ति कम करो आप ध्न न कमा पाये तो कोई बात नही, आप पद न पा सके तो कोई बात नही इसका क्या भरोसा आज है कल नही। आयुष्य का क्या भरोसा पल भर का नही अरिहंत की वाणी पर श्र(ा कर लो वो स्वयं तर गये और हमें भी तार रहे है स्वयं बोध् िको प्राप्त कर चुके है और हमें भी बोध् िप्राप्त का मार्ग बता रहे है तुम भी अरिहंत परमात्मा की तरह तिणाणं तारयाणं बना