PRAVACHANMALA- JAMUTAVI - 2006

जहां अहंकार है वहां धर्म नहीं जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

30 जून, 2006: त्रिकुटा नगर, जम्मू: जैन धर्म दिवाकर, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- जैन धर्म में नवकार मंत्र सर्वश्रेष्ठ है । पहला शब्द ‘नमो’ यानि नमन । नमन किसको । जो अरिहंत हैं । सिद्ध हैं, पूज्य हैं उन्हें नमन । अरिहंत प्रभु कैसे हैं । जिनका राग द्वेष समाप्त हो गया । जिनके अंग-2 में करूणा मैत्री प्रवाहित हो रही है, जिनके चित्त में निर्मलता, सरलता है । जो जन्म-मरण के चक्र से अन्त की ओर जा रहे हैं । जिनके कदम मुक्ति की ओर बढ़ गये ऐसे हैं अरिहंत भगवान और नमन इसलिए करना कि उनको नमन करने से हमें भी मुक्ति मिले । कोई कार्य शुरू करो तो एक नमन का भाव भीतर होना आवश्यक है । अगर नमन का भाव नहीं होगा तो कार्य में सफलता नहीं मिलेगी । तुम छोटा कार्य करो और भीतर नमन का भाव है तो वह कार्य बड़ा बन जाएगा । भीतर के भावों का महत्व है । 

अरिहंत प्रभु के पास ऐसे अनेकों लोग आए जिन्होंने प्रभु को नमन किया और मुक्ति की ओर अग्रसर हो गए और ऐसे भी अनेकों लोग आए जो उनको समझ ही नहीं पाए । भगवान महावीर के समय में गौशालक गौतम से पूर्व प्रभु महावीर के समक्ष उपस्थित हुआ परन्तु वह अन्त तक कुछ भी नहीं पा   सका । गौतम आया तो अहंकार से था परन्तु प्रभु को देखते ही पूरी तरह समर्पित हो गया, झुक गया । झुका तो अरिहंत और सिद्ध बन गया । नमन से हमें मुक्ति मिल सकती है । अरिहंत शब्द बड़ा गहरा है । यह शब्द भीतर आ जाए और अहंकार पिघल जाए तो मानो सब कुछ हो गया । महाविदेह क्षेत्र में अभी भी वर्तमान में 20 विहरमान भगवंत बिराजमान हैं जिसमें प्रथम श्री सिमंधर स्वामी भगवान की अनंन्य कृपा एवं ऋणाबंध इस भरत क्षेत्र से है । हम उन्हें याद करें, उनकी भक्ति करें । जहां अहंकार है वहां धर्म नहीं हो सकता । नमन करोगे तो अहंकार कम होता चला जाएगा । मीरा ने कृष्ण को नमन किया था मीरा इतनी झुक गई कि कृष्ण ने उसे अपने भीतर समाहित कर लिया । नमन से अपने जीवन की शुरूआत करो । नमन नहीं तो मुक्ति नहीं हो सकती । 

प्राचीन समय में बाहुबली का उदाहरण आप सबके समक्ष है । एक अहंकार के कारण बाहुबली एक वर्ष तक खड़े रहकर कठोर तपस्या करते हैं अन्न जल भी ग्रहण नहीं किया । पक्षियों ने शरीर पर घोसले बना लिए फिर भी परवाह नहीं की । जब उनकी दोनों बहिनों ने उपदेश के दो वचन कहे तो भीतर एक भाव उठा । पांव आगे बढ़ा और पांव उठते ही केवलज्ञान की प्राप्ति हो गई । अभी बाहुबली ने अपने 98 भाईयों को वंदन नहीं किया था । केवल भीतर भाव लाया था तो वे केवलज्ञान की ओर बढ़ गये । हमारी आत्मा में अनंत शक्ति है । हम लघुता में आकर प्रभुता को अपने भीतर समाहित करें । नानक ने भी कहा है:-

नानक नन्हें हो रहो, जैसे नन्हीं दूब ।

बड़ा घास जल जाएगा, दूब खूब की खूब ।

हम छोटे बनकर रहें । विनम्र हो जाएं । घर के आंगन में लगी छोटी दूब हमेशा बच जाती है, उसे तूफान, दावानल कुछ कर नहीं सकते । बड़ा घास या बड़े पेड़ हमेशा गिर जाते हैं । दावानल में जल जाते हैं परन्तु दूब हमेशा वैसी ही वैस्ी रहती है । हम उससे प्रेरणा लें । छोटे बनकर रहें और अपने लक्ष्य की ओर आगे बढ़ते रहें । 

त्रिकुटा नगर का यह स्थान श्रद्धेय पंजाब केसरी श्री विमल मुनि जी महाराज की कृपा से प्राप्त हुआ है । इस स्थान में मन्दिर और स्थानक दोनों बनने जा रहे हैं । मन्दिर और स्थानक अलग-2 नहीं है, यह एक ही है । अगर हम महावीर को जानते, समझते हैं तो हमें मन्दिर और स्थानक में भेद नहीं डालना चाहिए । स्थानक के लिए सभी अपना योगदान दे रहे हैं । मैं चाहूंगा कि आप सब और इसमें बढ़ चढ़कर हिस्सा लें, इसमें और अधिक योगदान दें । हर व्यक्ति के पास जो कुछ है वो उसे लगा दे । तन से, मन से, धन से हम कार्यों में जुट जाएं । वर्षावास हेतु नगर प्रवेश भी हो चुका है । अब आप सबकी जिम्मेदारी अधिक बढ़ गई है । आप सब अपनी जिम्मेदारियों को अच्छी तरह निभायेंगे यही हार्दिक मंगल कामना । 

श्रद्धेय आचार्य भगवंत यहां से विहार कर 1 -2 जुलाई को गांधी नगर बिराजेंगे । गांधी नगर में रेाटरी क्लब में प्रवचन होगा । 3 से 6 जुलाई तक जैन नगर स्थित जैन स्थानक में प्रवचन होंगे । प्रवचन का समय प्रातः 8.15 से 9.30 बजे तक का होगा एवं शाम को श्रद्धेय आचार्य भगवंत के दर्शन 4.00 से 5.30 बजे तक होंगे । आप सभी पूरा लाभ उठायें । 7 जुलाई, 2006 को श्रद्धेय आचार्य भगवंत ज्यूल चैक से रानी पार्क स्थित श्री नेमचंद मैमोरियल हाॅल में वर्षावास हेतु प्रवेश करेंगे । शोभा-यात्रा प्रातः 7.00 बजे से ज्यूल चैक से प्रारंभ होगी । 

 

हर श्वांस में अरिहंत स्मरण चलता रहे

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

राष्ट्र संत, जैन धर्म दिवाकर, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि-  हमें यह मानव का जीवन मिला, इसका अर्थ यही है एक श्वांस आई तो जन्म और श्वांस गई तो मृत्यु । देह श्वांस नहीं लेती । अगर देह श्वांस लेती होती तो मरणोपरान्त भी श्वांस आता । देह तो मिट्टी में मिल जाती है । श्वांस हमारी चित्त की चेतना ग्रहण करती है । जहां तुमने जैसा कर्म किया, जैसा चाहा वैसा मिलेगा । यह मत सोचो कि आज कोई नरक, तिर्यंच, देव योनि में है या फिर मनुष्य योनी में है तो उसे परमात्मा ने वहां भेज दिया । कोई परमात्मा तुम्हें नरक में धकेलने वाला नहीं है । जो जीव ने चाहा वह हो गया । इस जन्म में नहीं तो पिछले अनंतों जन्मों में कोई प्रार्थना कामना की होगी उसका फल आज मिल रहा है । आती जाती श्वांस के साथ हमारा कर्म बंधन हो रहा है । चाहे तुम सोते, खाते रहो, गुस्सा करो फिर भी श्वांस का आना जाना चला रहता है । कुदरत का कमाल है जितने कम श्वांस लोगे उतनी बड़ी उम्र होगी । जितने ज्यादा श्वांस लोगे उतनी कम उम्र होगी । कभी आपनें कुत्ते को देखा होगा वह हांफता ही रहता है । अनेकों श्वांस पल भर में बिता देता है और मगरमच्छ को देखो वह एक स्थान पर पड़ा हुआ धीमे से श्वांस को ले रहा है और छोड़ रहा है । क्रोध, अहंकार, वासना में अधिक श्वांस आती जाती है । 

श्वांस अनमोल है । कितने श्वासें हमने आज तक की जिन्दगी में व्यर्थ कर दी । एक मिनिट में सामान्य व्यक्ति 15 से 20 श्वांस लेता है । 24 घण्टे में व्यक्ति ने 28800 श्वासें ली अब हिसाब लगाओ कितनी श्वासें भक्ति में बीती और कितनी व्यर्थ हुई । इस जन्म में अनकों श्वासें छूट गई  है । नानक ने भी कहा है -

जो सुख को चाहे सदा, शरण राम की लेह ।

कह नानक सुन रे मना, दुर्लभ मानुष देह ।।

गुरूनानक एक उच्चकोटि के संत हुए हैं । उन्होंने कहा कि अगर सुख को प्राप्त करना है तो राम की शरण ग्रहण करो क्योंकि यह मानव देह बहुत दुर्लभ है । यह श्वांस हमें भक्ति के लिए मिले थे । कितने दिन रात बीत गये । आयुष्य कर्म कितना है क्या पता ? सारे व्यवहारिक कार्य करते हुए एक सुश्रावक को चाहिए कि दिन में दो सामायिक अवश्य करें । दो सामायिक से तुम्हारे 24 घण्टे सार्थक हो सकते हैं । यदि आप प्रभु महावीर के श्रावक हैं तो इस बात को भीतर उतार लेना जो अच्छा लगे उसे अपना लेना । हमने शरीर को अधिक महत्व   दिया । एक लंगोटी और चार रोटी में यह शरीर स्वस्थ रहते हुए धर्माचरण कर सकता है परन्तु हमने इस पेट के लिए इतना कुछ कर दिया कि अब हम कुछ कर ही नहीं सकते । एक नवकार मंत्र का पहला पद भीतर उतार लो श्वांस को ऐसे लो कि हर श्वांस में नमो अरिहंताणं रहे । जैसा कदम उठाओगे वैसा ही होगा । जमीन को शुद्ध और उपजाउ नहीं किया गया और बीज डाल दिया तो अंकुर उत्पन्न नहीं होगा । इसलिए सर्वप्रथम जमीन को शुद्ध करो । आत्मा की जमीन है शरीर । हम उसे शुद्ध करे और फिर धर्म का बीज डाले । एक दिन मुक्ति का फल अवश्य मिलेगा । नानक कहते हैं कि हरि भजन के बिना यह जीवन व्यर्थ हैं । वे लोग अज्ञानी मुर्ख हैं जो जीवन को बेकार कर रहे हैं । अरिहंत और राम नाम को लेने से क्या होता है ? हम उनके जैसे हो जाते हैं । सत्य जान लो । हरि का भजन करोगे तो हरि जैसे हो जाओगे । हर श्वांस में अरिहंत को पुकारोगे तो अरिहंतमय हो  जाओगे । चलते, सोते, उठते, बैठते अरिहंत स्मरण भीतर चलता रहे । हम उस प्रीति में बहते रहे । अरिहंत की कृपा से हमें यह जीवन मिला । हम उनके नाम स्मरण से शुद्धता की ओर आगे बढ़ें यही हार्दिक मंगल कामना । 

श्रद्धेय आचार्य भगवंत का गांधी नगर पदार्पण पर स्थानीय महावीर जैन सोसायटी द्वारा हार्दिक अभिनन्दन किया गया । इस अवसर पर संघ के कार्यकर्ताओं ने अपनी भावनएं व्यक्त की । श्री श्रेयांस जैन ने श्रद्धेय आचार्यश्रीजी के उपदेश को पद्ययुक्त बनाकर सबके समक्ष रखा । महासाध्वी श्री लक्ष्मी जी महाराज, श्रमण संघीय मंत्री श्री शिरीष मुनि जी महाराज ने गद्य एवं पद्य के द्वारा अपनी भावनाएं व्यक्त  की ।

 

सबसे मूल्यवान शक्ति श्वांस है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

राष्ट संत, युग पुरुष, जैन धर्म दिवाकर, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- यह मानव का जीवन हमें नाम धन कमाने के लिए मिला । ध्यान साधना और समाधि के लिए मिला । चैबीस घण्टे में हम कितनी श्वासों का उपयोग अपने लिए करते हैं इसकी चर्चा कल हमने की थी । बीता हुआ एक भी श्वांस वापिस नहीं आने वाला । आप सोचोगे कि कल साधना कर लूंगा परन्तु ऐसा होना संभव नहीं है । सिकन्दर ने पूरी कोशिश की बारह घण्टे श्वांस चलने के लिए पूरा राज्य देने को तैयार हो गया पर श्वांस नहीं मिली । देवों के अधिपति इन्द्र भगवान के श्रीचरणों में उपस्थित होकर उन्हें प्रार्थना करते हैं कि हे प्रभो ! एक महान् ग्रह इस भूलोक पर आ रहा है आप दो घड़ी के लिए अपना आयुष्य बढ़ा लीजिए । भगवान भी अपना आयुष्य कर्म नहीं बढ़ा पाए तो हम और आप इन श्वासों को नहीं बढ़ा सकते । जितना आयुष्य कर्म मिला है उतना ही हमें भोगना है इसलिए हम श्वांस का सही उपयोग करें । 

सबसे मूल्यवान शक्ति श्वांस है । श्वांस समता में बीतेगी तो उध्र्वगमन होगा और श्वांस ममता में बीतेगी तो अधोगमन होगा । चुनाव तुम्हारा है श्वांस का किस प्रकार उपयोग करना है । बस कहना यही है कि इस क्षण का उपयोग कर लो । विचार, धारणा रक्त की हर बूंद परिवर्तनशील है । सारा जगत परिवर्तनशील है । अगर नित्य है तो वह एक है और वह तुम हो । तुम अजर अमर अविनाशी हो । यह नाम शरीर मिट जाएगा और आत्मा अमरत्व की ओर आगे बढ़ेगी । भगवान बुद्ध की समस्त साधना श्वांस की साधना है । विपश्यना आनापानसति ये सब श्वांस के ही प्रयोग हैं । भगवान ने भी कहा- जो क्षण को जानता है वह पंडित, साधक और ज्ञानी है । श्वांस का उपयोग दो प्रकार से हो सकता है । अगर हर श्वांस को अहंकार और वासना में ले जाओेगे तो कर्मबंधन होगा और समता साधना में बिताओगे तो कर्म-निर्जरा होगी । पानी गटर में जाएगा तो गंदा होगा, नदी में बहेगा तो पीने योग्य होगा । तुम्हें जो श्रेयस्कर लगे उसे स्वीकार कर लो । एक दृढ़ निश्चय कर लो । अखण्ड जागृति को भीतर ले आओ कि हमें उस परमात्मा तक पहुंचना है, यही वीतरागवाणी है । 

मतभेद ना डालो । मतभेद डालना जहर के समान है । किसी के प्रति किसी के मन में शंका उत्पन्न करना जहर पिलाने के समान है । हम अमर होना चाहते हैं और जहर पी रहे हैं तो यह संभव  नहीं । यह वाणी प्रभु महावीर की वाणी है । कृष्ण ने भी गीता में यही कहा है । ऋषि मुनियों ने भी यही कहा कि आत्मा अजर अमर है । आत्मा में शक्ति है और आज तक आत्मा ने अनंत शरीर धारण किए हैं । एक श्लोक है:-

साधु जीवन कठिन है, ऊंचा पेड़ खजूर । 

चढ़े तो चाखे प्रेमरस, गिरे तो चकनाचूर ।।

पैदल चलना आसान है । गाड़ी में चलना उससे अधिक मुश्किल और हवाई जहाज में चलना उससे भी अधिक मुश्किल है । इसी प्रकार ऊंचे पहाड़ पर गतिमान होना कठिन है परन्तु प्रेमरस उन्हें ही मिलता है जो ऊँचे पहाड़ पर चढ़ जाते हैं । जीवन में प्रेम, ध्यान, योग अमृत की ओर ले जाता है । इस जीवन में प्रतिश्वांस में संभल जाना यह श्वांस ही हमें उपर उठाएगी । अनंत तीर्थंकरों की वाणी है कि एक मेरी  आत्मा शाश्वत् है और हमें उस आत्मतत्व को प्राप्त करना है और उसके लिए हमें कुछ होमवर्क करना होगा । ध्यान और समाधि की अनंत गहराईयों में जाना होगा । मौन को प्राप्त करना होगा । हम आज से संकल्प लें । हम किसी की निन्दा विकथा में आगे ना आएं । हरेक के गुणों को ग्रहण करे । निन्दा विकथा से अनंत कर्मों का बंधन होता है और गुणग्रहण से हम मुक्ति की ओर आगे बढ़ सकते हैं । ध्यान साधना को जीवन में अपनाएं जिससे हम मुक्ति के अधिक करीब पहुंच पाएंगे । 

संकल्प से हर कार्य पूर्ण होते हैं

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

राष्ट्र संत, युग पुरुष, जैन धर्म दिवाकर, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- सारे जहां के मालिक तेरा ही आसरा है । राजी है हम उसी में जिसमें तेरी रजा है । बस ये दो पंक्तियां जीवन में आ जाए तो कोई दुःख निराशा पीड़ा बैचेनी नहीं होगी । सारे जहां के मालिक कौन है ? हमारे अरिहंत प्रभु जिनका नाम आप दिन में कई बार लेते हो । नवकार मंत्र का प्रथम पद अरिहंतों को नमन है । आज तक के जीवन में अनेकों बार लोगस्स, नमोत्थुणं, भक्ताम्बर आदि पाठों का उच्चारण किया होगा परन्तु कभी इनकी गहराई में नहीं गये । इनका अर्थ क्या कहता है । इनमें कौनसे भाव छिपे है यह जानना अत्यन्त आवश्यक है । सभी पाठों में एक भक्ति का भाव छिपा हुआ है । हमें आज तक जो कुछ भी मिला अरिहंतों की कृपा से मिला । उनकी कृपा न होती तो कुछ भी संभव नहीं   था । जो जैसा है उसे वैसा स्वीकार कर लो । सर्दी, गर्मी को भी स्वीकार करो । गर्मी ना हो तो फसल कैसे पकेगी । पसीना नहीं आएगा तो अनंत रोग शरीर में ही रह जाएंगे । एक बीज को पकने के लिए भी ऊष्णता की आवश्यकता है । बीज पूरे समर्पण में जीवन जीता  है । तुम भी उसी की तरह अपना जीवन बना लो । कोई तुमको गाली दे तो तुम निराश मत हो जाना । जो हमेशा सम्मान चाहता है वह प्रभु महावीर का श्रावक या साधक नहीं हो सकता । प्रशंसा में कभी फूलना मत । निन्दा और प्रशंसा एक ही सिक्के के दो पहलू है उन्हें सहजता से स्वीकार कर लो । हम शरीर के लिए आज तक जितना कुछ करते आए हैं कुछ हम स्वयं के लिए अपनी आत्मा के लिए करे । भगवान महावीर ने दीक्षा लेते ही एक संकल्प किया था कि जब तक केवलज्ञान नहीं होगा तब तक मैं मौन रहूंगा और उसी का फल है साढ़े बारह साल की साधना के बाद प्रभु को नदी के किनारे केवलज्ञान हो गया । भगवान बुद्ध ने भी अटूट संकल्प किया था । जब तक बोधि नहीं मिलेगी तब तक इस वृक्ष के नीचे ही बैठा रहूंगा और उसी दिन उन्हें बोधि प्राप्त हो गई । हम जो संकल्प करते हैं वह अवश्य पूर्ण होता है । हम चित्त की समाधि में रहे, ध्यान की धारा में बहे । जब प्रभु अनेक कठिनाईयों के बावजूद सिद्धगति को प्राप्त हो गए तो हम नहीं कर सकते । इस जीवन में कुछ करना है । एक-एक श्वांस को भक्ति और ज्ञान में बिताना है । संकल्प के बिना जीवन अधूरा है । संकल्प करो वह अवश्य पूरा होगा । इस जन्म में नहीं तो अगले जन्म मंें । कभी न कभी वह अवश्य पूर्ण होगा और इस शरीर का उपयोग समाधि के भीतर कर   लो । भीतर जल रही आग को बुझाना सीख लो । साधना में अनुकूल प्रतिकूल परिस्थितियां आएगी । सब ओर से परीक्षाएं होगी । हर बात को स्वीकार करते हुए साधना में गतिशील होना है ।

अहिंसा और विश्व शान्ति के लिए भीतरी समृद्धि की आवश्यकता है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

राष्ट्र संत, युग पुरुषा, जैन धर्म दिवाकर, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- जब-2 भी भारत को संतों की आवश्यकता हुई तब सभी धर्मों के संतों ने एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है । नानक के साथ बाला और मर्दाना दो सेवक साथी रहते थे । कहते हैं एक मुस्लिम था और एक सिक्ख था परन्तु नानक ने कभी भेदभाव नहीं किया । नानक ने तराजू तोलते हुए परमात्मा को अपने भीतर समाहित कर लिया । मानव जीवन में प्रार्थना और भक्ति आवश्यक है । आज आतंकवाद क्यों है ? इसका मूल कारण है कि हमें परमात्मा का डर नहीं  है । हमें मिलकर कार्य करना होगा । इकट्ठे होकर कार्य करने से अधिक शक्ति पैदा होती है । आज हमें पटेल और शास्त्री की जरूरत है । आज के नेता उन महान् नेताओं की तरह नहीं हैं । आज के नेता वोट के भूखे   हैं । हमें नेताओं को बदलने की आवश्यकता नहीं, हम लोगों के दिलों को बदलें । हम स्वयं सोचे, विचारे क्या आतंक से शान्ति संभव है । अगर संभव नहीं तो फिर एक विचार क्रान्ति पैदा करें । प्रार्थना और मंगल मैत्री द्वारा जन-जन के मंगल को बदलें । महापुरूष सबके लिए कार्य करते हैं । आज हमारा भोजन और पानी शुद्ध नहीं है । बच्चों को खिलोनो के रूप में हिंसक शस्त्र दिए जा रहे हैं । आज शाकाहार का प्रचार प्रसार नहीं है, इन्हीं कुछ कारणों के द्वारा आतंकवाद बढ़ता जा रहा है । आतंकवादी शराब नशा और मांसाहार का सेवन कर रहे हैं । जो लोग मांस खाते हैं उनका चित्त निर्मल कैसे होगा । कपड़े पर अगर एक रक्त की बूंद गिर जाए तो कपड़ा शुद्ध नहीं कहलाता है । जिस शरीर में मांस के टुकड़े जा रहे हैं क्या वह शरीर शुद्ध होगा । मैं आप सबसे वातावरण को शान्त बनाने की अपील करूंगा । समाज तभी समृद्ध होगा जब भीतर बाहर की समृद्धि आएगी । व्यक्ति के भीतर क्रोध है तो वह उस क्रोध को दूर कर दे । आज उनका नाम लिया जाता है जिन्होंने शान्ति स्थापित की । 

आज के इस तनाव, हिंसा, संतप्त भरे वातावरण में शान्ति की अति आवश्यकता है । जैन नगर के जैन स्थानक के प्रांगण में यह सेमिनार सिक्ख समाज और जैन समाज का होने जा रहा  है । आज छठे गुरू हरगोविन्दसिंह जी के जन्म-दिवस पर इकट्ठे होकर भारत और विश्व को एक संदेश हमें देना है । सिक्ख और जैन धर्म के संतों की देश के प्रति बहुत कुर्बानी रही है । गुरू गोबिन्दसिंह जी के महान् लाडले सुपुत्र सरहिन्द में चिनाये गये, उस समय मुगल सम्राट् ने उनके अन्तिम संस्कार के लिए जगह नहीं दी थी उस समय जैन भाई टोडरमल ने जगह देने की इच्छा व्यक्त की तो सम्राट् ने कहा था कि सोने की असर्फियां खड़ी कर दो जितनी जगह असर्फियों से भर दोगे उतनी जगह तुम्हारी होगी, इस तरह टोडरमल के बलिदान से सिक्ख समुदाय के होनहार सुपुत्रों का अन्तिम संस्कार हुआ था । 

आज हम प्रभु की अहिंसा को अपनाएं । हिंसा से हिंसा बंद नहीं हो सकती । हिंसा को बंद करने के लिए अहिंसा अनेकान्त और अपरिग्रह की अत्यन्त आवश्यकता है । मन्दिर, मस्जिद, गुरूद्वारे में जाओ चाहे ना जाओ पर गरीब की आह को समझो । जब अच्छा कार्य करना होता है तो उसमें समय लगता है, हम प्रयास करें । प्रयास से हर कार्य संभव है । शान्ति तभी मिल सकती है जब हम सब ओर शान्ति का प्रयास करेंगे । 

विश्व शान्ति और अहिंसा के इस सेमिनार को सम्बोधित करते हुए मंत्री श्री शिरीषमुनि जी महाराज ने कहा कि- अपनी ओर से किसी को कष्ट न देना यही अहिंसा है । आज जो कश्मीर की दशा हो रही है उसके लिए आवश्यक है कि हम सुख शान्ति का वातवरण फैलाएं । प्रेक्टिकल मार्ग को अपनाएं । श्रद्धेय आचार्य भगवंत ध्यान समाधि द्वारा व्यक्ति के भीतर के आतंक को दूर करते   हैं । हम पहले व्यक्ति को बदले, स्वयं को बदलें तभी सुख शान्ति का वातावरण और प्रेम का वातावरण निर्मित होगा । 

इस अवसर पर आए मुख्य अतिथि श्री अशोक शर्मा एम0एल0सी0 ने कहा कि- आचार्य श्री शिवमुनि जी महाराज इस राज्य में आए हैं यह हमारा सौभाग्य है । आज गुरू हरगोबिन्दसिंह जी का जन्म-दिवस है, मैं सभी भाईयों को उनके जन्म दिवस की बधाई देता हूं । जम्मू प्रदेश में पिछले बारह-तेरह सालों में साठ हजार से अधिक लोग हिंसा का शिकार हुए हैं । धरती लहू-लुहान हुई  है । किसी समय इस जम्मू की धरती को जन्नत कहा जाता था । आज वह जन्नत एक आतंक का रूप धारण कर रही हैं ऐसे सेमिनार सुन्दर रूप धारण करेंगे । छोटी-2 बातों से भी अहिंसा फैलती है । आंतकवाद को मिटाने के लिए इन गुरूओं के अनमोल वचन हमें शान्ति और अहिंसा की ओर ले जाएंगे । हम समय-समय पर ऐसे सेमिनार करते रहे और गुरूओं के वचनों पर आगे बढ़ते रहें । 

इस अवसर पर बेबी निताशा ने अहिंसा क्या है ? उस पर प्रकाश डाला । श्री प्रमोद जैन ने अहिंसा और शान्ति को अपनाने के लिए कुछ सूत्र प्रदान किए । उन्होंने कहा कि संत जो कहते हैं उसे सुनो और अमल करो । जो कुछ भी सुनाई दे रहा है वही सही गलत कुछ नहीं है । तुम पात्र खाली रखो तो सब कुछ भीतर समाहित हो जाएगा । आज के व्यक्ति को समय के मैनेजमेन्ट को समझना होगा और उसके अनुरूप ही कार्य करना होगा । 

सरदार श्री अजीतसिंह ने कहा- आज धर्म के नाम पर व्यक्ति इन्सानियत को भूल चुका है । धर्म एक पवित्र कर्म और मालिक की बंदगी है । हम सब धर्म से जुड़ें तो अहिंसा पूरे विश्व में फैलेगी । श्री हरगोबिन्द जी के पावन जन्म पर इन्होंने सबको मुबारकबाद प्रदान की । 

श्रीमती मणि जैन ने- अहिंसा पर अपने विचार प्रस्तुत करते हुए कहा कि जीवन जीने की सही राह धर्म है । हर धर्म प्रेम करूणा और मैत्री कोे उजागर करता है । हिंसा से बचने के लिए विचार बदलिये । अशान्तमय वातावरण का जड़मूल हिंसा है और उसे बदलने के लिए आचार्यश्रीजी का ध्यान योग कारगर सिद्ध होगा । 

सरदार श्री हरनामसिंह ने कहा- जीव हिंसा बहुत बड़ी बात है । किसी का खून भी मत बहाओ । परमात्मा को हम सत्य के द्वारा मिल सकते हैं । आज के व्यक्ति को धर्मग्रन्थ पढ़ने की आवश्यकता है । सरदार श्री भजनसिंह ने भारत माता की पुकार कविता द्वारा पेश की और कविता से ही अहिंसा का मूल्य बताया । श्री श्रेयांस जी जैन ने कविता द्वारा अपने विचार अहिंसा पर व्यक्त किए । 

श्रीमती नरेश जैन ने वर्तमान की युग के लिए गुरू हरगोबिन्दजी के शान्ति और शस्त्र दोनों सूत्रों को अपनाने की बात कही । डाॅक्टर राजेन्द्रसिंह जी ने महापुरूषों के विचारों को सुनकर उन्हें अपने भीतर उतारने की आवश्यकता पर बल दिया और कहा कि गुरूओं के विचार जन-जन तक पहुंचाना ही अहिंसा के लिए सुन्दर उपाय है । 

बाहर से आए सभी श्रद्धालुओं का एस0एस0 जैन सभा जैन नगर की ओर से मंत्री श्री श्रेयांस जी ने हार्दिक स्वागत एवं अभिनन्दन किया । 

स्वीकार में सुख है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

राष्ट्र संत, युग पुरुष, जैन धर्म दिवाकर, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि-  प्रभु की प्रार्थना, अरिहंत की स्तुति जब हम करते हैं तो हम उस परम तत्व तक पहुंच जाते हैं, जीवन महाजीवन बन जाता है । जीवात्मा परमात्मा बन जाता है, कंकर शंकर बन जाता है । हम इस धरा पर प्रभु की प्रार्थना, अर्चना करने के लिए आए परन्तु हमारे पास समय ही नहीं है प्रभु भजन करने का । आशा और निराशा के बीच हमारा जीवन चलता जा रहा है, शरीर गल गया, केस सफेद हो गए, मुख पीला पड़ गया, आंखों से देखा नहीं जाता, हाथ पांव दुबले हो गए, लकड़ी का सहारा आ गया फिर भी हमारी आशा नहीं छूटी, यह जीवन धन, पद, यश, प्रतिष्ठा में अटका हुआ है, जितना हम इंकार करते चले जा रहे हैं उतना हमारा दुःख बढ़ता चला जा रहा है, जितना हम स्वीकार करते हैं उतना सुख आ रहा है । 

स्वीकार में सुख है, इन्कार में दुःख है । जीवन में जो भी स्थिति है उसे स्वीकार करते चले जाओ, जीवन नन्दनवन बन जाएगा । अगर सुख से जीवन जीना है तो श्रावक के बारह व्रत ग्रहण करो । किसी भी प्राणी की हिंसा ना करो । प्रत्येक प्राणी के प्रति मंगल की कामना करो, झूंठ ना बोलो । मालिक के बिना किसी चीज को ग्रहण ना करो, परमात्म-तत्व में रमण करो । आवश्यकता से अधिक चीजों का संग्रह न करो ये पांव अणुव्रत हमें जीवन की सही राह दिखाते हैं । पांच अणुव्रत जीवन में आ गए तो सात व्रत जीवन में स्वतः ही आ जाएंगें । 

सिद्धार्थ जो शुद्धोधन का पुत्र था जिसे महात्मा बुद्ध का पद प्राप्त हुआ । कहते हैं जब सिद्धार्थ का जन्म हुआ था तब उस समय उन्हें मृत्यु से बचाने के लिए अनेक उपाय किये जाते थे । वो जिस वाटिका में भ्रमण करता था वहां के मुर्झाए हुए फूल भी निकाल दिये जाते थे, परन्तु प्रत्येक बात से व्यक्ति को रोका नहीं जाता, जैसे हमने कर्म किए हैं वैसा फल तो आता ही है इस अनुसार उन्होंने एक बार किसी शव को शमशान घाट ले जाते हुए देखा और देखते ही भीतर वैराग्य भावना उपस्थित हो गई और वे सन्यास आश्रम की ओर मुड़ गए । उन्होंने अपने जीवन की सभी आशाएं समाप्त कर दी । स्वीकारता में आ गए और जीवन में सुख ही सुख प्राप्त किया । आत्म: ध्यान साधना कोर्स बेसिक एवं ट्रेनिंग कोर्स सुन्दर ढंग से चल रहा है जिसमें बड़ी संख्या में भाग ले रहे हैं।

 

हर्षोल्लास के वातावरण में हुआ मंगल प्रवेश

शिवाचार्यश्रीजी ने सबको मंगल संदेश प्रदान किया

7 जुलाई, 2006: जम्मू: जैन धर्म दिवाकर, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- जम्मू के जैन स्थानक में चातुर्मास का मंगल प्रवेश का यह शुभ दिन आप सबके लिए मंगलकारी हो । आप सबकी तैयारी कई दिनों से यहां पर हो रही है और कई लोग ऐसे भी हैं जो उसमें गल्तियां निकालने के लिए अग्रसर हैं । लाख उल्लू मिलकर कह दें कि सूरज नहीं है तो क्या सूरज को छिपाया जा सकता है । सोने और हीरे को तराशने और पीटने पर ही उसकी सुन्दरता परिलक्षित होती है । इस चातुर्मास में हम कुछ सीखेंगे, कुछ बातें लकीर से हटकर होंगी । जब से जम्मू राज्य में प्रवेश हुआ है सब तरफ खुशियां छाई हुई है । हर तरफ कुछ न कुछ आयोजन हो रहे हैं । आप सबने मेरा स्वागत किया । मैं आप सबका दिल से स्वागत करता हूँ । यह सारा सम्मान धर्म का है । संत को नम्र होना चाहिए । संत के भीतर अहंकार की आवश्यकता नहीं है । उसके भीतर एक तृप्ति और आनंद हो जो हमारी निन्दा करता है उसे हम समता से सहन करेंगे तो कर्म-निर्जरा की ओर अग्रसर हो जाएंगे । हमें हर समय परिवर्तन अच्छा लगता है । दिन होता है तो रात की याद आती है । हमें इस परिवर्तन से आगे बढ़ना है । बहुत समय एशोआराम में खो चुके हैं अब कुछ समय साधना में बिताना है । बचपन, जवानी, बुढ़ापा सब चला जाएगा । प्रशंसा भी यहीं पर रह जाएगी । 

अब हम अनुशासित हो जाएं । धर्म सभा में अनुशासन आवश्यक है । अनुशासन के बिना जीवन अधूरा है । धर्म सभा में अनुशासन ना हो तो वह धर्मसभा नहीं कहलाती । जैन समाज एक समृद्ध समाज  है । हम घर में ही होते तो कुछ रिश्तेदार और परिचित से ही सम्पर्क होता पर आज सारा समाज हमें प्यार दे रहा है । संत और समाज का एक जोड़ा है । दोनों एक दूसरे के पूरक  हैं । साधु समाज के बिना कुछ नहीं कर सकता । यह वर्षावास केवल भरत क्षेत्र में ही नहीं महाविदेह क्षेत्र में भी होता है । परम तारक अरिहंत परमात्मा श्री सीमंधर स्वामी भगवान भी वहां पर वर्षावास कर रहे है ं। उनका वर्षावास बीस जून को ही प्रारंभ हो गया है । उनकी हम पर अनंत कृपा है, उस कृपा को केवल महसूस ही किया जा सकता है । आप सब हमें यहां लेकर आए यह जिम्मेदारी केवल जम्मू की ही नहीं अपितु अखिल भारतवर्ष की है । जो व्यक्ति इसमें पुण्य कमाएंगे वे अपना धर्म कमा लेंगे । इस चातुर्मास में कुछ लोग ऐसे भी होंगे जो मोक्ष की टिकिट ले जाएंगे । इस धरा पर अनंत बार जन्म मरण किया है फिर भोगों में मत जाना । आज एक लक्ष्य बना लो सिद्धगति में जाने का । 

चातर्मास में क्या करना है ? चातुर्मास में तपस्या, प्रवचन, प्रश्नोत्तर आदि तो होंगे ही इसके साथ-साथ चित्त की शुद्धि कैसे हो । हम कैसे अधिक से अधिक निर्जरा की ओर बढ़े, कैसे शुद्ध सामायिक को अपनाएं । कहते तो अनेकों बार है कि सब कुछ हमारे कर्मों का फल है पर हम कैसे इसे समता से स्वीकार करें । इसे प्रेक्टिकल रूप से सीखना है । यह सृष्टि व्यवस्थित चल रही है । कार्य और कारण के बिना कुछ नहीं होता । बीमार हो तो समझो कष्ट शरीर को आया है, आत्मा तो अनंत शक्तिवान है यह मेरी वाणी नहीं वीतरागवाणी है । अरिहंतप्रभु कहते हैं एक कदम में धर्म और निर्जरा है । हमें काम करना है आगे आना है । सबसे अधिक महत्व इस चातुर्मास में वीरागवाणी, शुद्ध सामायिक को देना है । व्यवहार धर्म से उठकर निश्चय धर्म में जीवन स्थापित करना है । अनादिकाल से हम परिवार के लिए कार्य कर रहे हैं अब हम समाज के लिए आगे आए स्वयं को देखे । हम अपने सत्य को जाने । जहां सुख है वहां दुःख अवश्य होगा इसलिए अरिहंत शरण स्वीकार करो । हम इस वर्षावास में व्यर्थ की चर्चा नहीं करेग । पीछे क्या हुआ इसे भूल जाओ, अब क्या करना है उसे देखो । प्रभु महावीर को भी केवलज्ञान प्राप्ति के लिए साढ़े बाहर वर्ष साधना में बिताने पड़े । हम भी साधना को अपनाएंगे । एक शिविर करने से साधना भीतर नहीं आएगी उसे बार-बार भीतर लाना है प्रभु महावीर आरैर अनंत तीर्थकरों की साधना भेदविज्ञान की साधना है । सोऽहं की साधना है । 

इस वर्षावास में ध्यान की अनंत गहराईयों तक जाना है उसके लिए आवश्यकता है समय की और वह आपको निकालना ही होगा । इस वर्षावास में पुण्य पाप की चर्चा नहीं होगी, हमें पुण्य पाप को काटना है और निर्जरा को महत्व देना है । जैसा दृष्टिकोण होगा वैसा ही सब कुछ बनता चला जाएगा । चातुर्मास में और श्रद्धालुओं को अधिक से अधिक बुलाना है । भगवान महावीर के समय देवगण समवसरण की रचना करते थे वर्तमान में श्रीसंघ वर्षावास का आयोजन करता है । आपने भी ऐसा ही कार्य किया है । अब हम भगवान के मूल उपदेश पर चले, उनकी आज्ञा को धर्म मानते हुए उन्हीं की आज्ञा में तप करें । एक घण्टा मौन और सामायिक का प्रयोग आवश्यक है । आपने अभी तक शरीर के स्तर पर पूर्ण तैयारी की है अब आत्म्कि स्तर पर तैयारी होगी । अगर सामायिक करने के बाद क्रोध और निन्दा, मान, अपमान हो रहा है तो सामायिक अभी हुई ही नहीं । भगवान महावीर ने कहा- सब जीव एक समान है सबके लिए मंगल कामना करो तो निन्दा, मान अपमान किसका करना । अहरंत की वाणी सिद्ध का स्मरण साधु का संघ जीनो परम् दुर्लभ है । यह संसार एक किराये का घर है, यहां पर रहते हुए मोक्ष जाने का संकल्प करो । अभी तक हम परफेक्ट नहीं हुए हैं परफेक्ट वेही हेंै जो सिद्ध बुद्ध और मुक्त हो गए । जिन्दगी में प्रयास करते रहो घबराना नहीं ध्यान करोगे तो कठिनाईयां आएगी फिर सब कुछ ठीक हो जाएगा । 

दीक्षा लेने के बाद प्रथम बार जम्मू वर्षावास हेतु आना हुआ । आज प्रातः इन्द्रदेवों के द्वारा अभिषेक स्वरूप वर्षा की कुछ बूंदे भी गिरे यह बहुत उत्तम माना जाता है । प्रकृति के साथ रहो । जो हो रहा है उसे सहजता से स्वीकार करो । विदुषी महासाध्वी श्री लक्ष्मी जी महाराज ने भी अपना बहुत श्रम किया है । इनका भी इस वर्षावास में एक योगदान रहेगा । जैन सभा के विशेष आग्रह पर ये यहां पर आए, गुरू आज्ञा का पालन किया । उप प्रवर्तिनी महासाध्वी श्री कौशल्या जी महाराज की कृपा उनका वरदहस्त इन पर बना हुआ है वो संयम सुखेरू महासाध्वीजी हैं उनका सहयोग हमे ंसमय-समय पर मिलता रहा है । आप सबको प्रस्तुत वर्षावास के लिए हार्दिक मंगल कामना देता हूं । 

इस अवसर पर श्रमण संघीय मंत्री श्री शिरीष मुनि जी महाराज ने भी वर्षावास की भूमिका बताते हुए श्रद्धेय आचार्य भगवंत के वर्षावास के लिए हार्दिक मंगल कामना की और सभी श्रद्धालुओं के लिए एक सुनहरा अवसर बताया । इस वर्षावास में होने वाले साधना शिविरों के बारे में जानकारी दी । महासाध्वी श्री लक्ष्मी जी महाराज ने श्रद्धेय आचार्य भगवंत की कृपा को महसूस करने के लिए प्रेरणा दी और साथ ही जप,तप, सामायिक समयबद्धता के लिए कुछ बातें श्रीसंघ के समक्ष रखी । 

जम्मू राज्य के आई0ए0एस0 श्री प्रमोद जैन ने आचार्यश्रीजी के वर्षावास को जम्मू का ही नहीं अपितु पूरे जम्मू कश्मीर का वर्षावास बताया और अपनी तरफ से सभी कार्यों में सहयोग देने की भावना व्यक्त की । श्रीमती कलावती जैन अध्यक्षा- श्रावक समिति ने आचार्यश्रीजी का स्वागत और अभिनन्दन किया । श्रीमती वीना जैन ने भजन के द्वारा अपनी भावनाएं व्यक्त की । आत्मानंद जैन सभा के मंत्री श्री विनोद जैन ने अपनी भाव व्यक्त करते हुए कहा कि आज अपार खुशी है, जैसे गुरू वल्लभ को देखा था वैसे ही शिवाचार्यश्रीजी को देख रहा हूं उतने ही अनुशासित और साधनामय जीवन है इनका । इनके जम्मू पधारने पर हार्दिक स्वागतम् । जैन युवक संघ के मंत्री श्री संदीप जैन ने प्रस्तुत वर्षावास को युवाओं के लिए एक सुन्दर अवसर बतलाया और कहा कि- युवाओं की तरफ से आपको जो सेवा होगी हम देने के लिए तैयार है । जैन तरूणी मण्डल ने प्रस्तुत वर्षावास को आध्यात्मिक महाकुंभ की संज्ञा देते हुए भजन द्वारा अपनी भावनाएं व्यक्त की । पंजाब महासभा के प्रधान श्री राकेश जैन ने जम्मूश्रीसंघ को बधाई देते हुए आचार्यश्रीजी का इस धरा पर पधारने पर हार्दिक स्वागत किया । श्रमण संस्कृति मंच की सदस्याओं ने हार्दिक स्वागत वंदन अभिनन्दन करते हुए भजन द्वारा अपनी यात्राएं अभिव्यक्त की । विश्व हिन्दू परिषद के प्रदेश अध्यक्ष श्री रमाकान्त दुबे ने प्रस्तुत वर्षावास हिन्दू समाज के लिए एक सुन्दर समायोजन बतलाया और हिंसा, उग्रवाद को समाप्त करने के लिए सुन्दर प्रयास होगा । श्री सुनील जैन महामंत्री श्रावक समिति ने स्वागत एवं अभिनन्दन किया । 

श्री सुमतिलाल जी कर्नावट चेयरमेन श्रावक समिति ने आचार्यश्रीजी के जम्मू पदार्पण पर आचार्यश्रीजी का हार्दिक स्वागत एवं अभिनन्दन करते हुए जन-जन को प्रस्तुत वर्षावास का पूरा लाभ उठाने की प्रेरणा प्रदान की । श्री मोहनलाल जी जैन महामंत्री मंगलदेश ने मंगलदेश महासभा की ओर से शिवाचार्यश्रीजी का स्वागत एवं अभिनन्दन किया । श्री नृपराज जी जैन, श्री प्रेम जी जैन ‘तृषित’, श्री रमण जैन महामंत्री जैन सभा आदि सभी श्रद्धालुओं ने इस अवसर पर अपनी शुभ-कामनाएं प्रस्तुत की । 

प्रस्तुत वर्षावास की शुभमंगल कामनाओं के लिए पूरे भारतवर्ष से अनेकों समाचार प्राप्त हुए जिसमें गच्छाधिपति पट्टधर आचार्य श्री नित्यानंद सूरीश्वर जी महाराज, भेले बाबा श्री रतन मुनि जी महाराज, उपाध्याय श्री रवीन्द्र मुनि जी महाराज, सलाहकार श्री रमणीक मुनि जी महाराज, महासाध्वी उपप्रवर्तिनी श्री कौशल्या जी महाराज, महासाध्वी श्री नन्दिनी जी महारासज, महासाध्वी उप प्रवर्तिनी श्री सावित्री जी म0, महासाध्वी श्री उमेश जी म0‘ शिमला’, महासाध्वी श्री सुलक्षण जी महाराज आदि अनेकानेक साधु साध्वीवृंद ने शुभकामनाएं प्रेषित की है । 

इससे पूर्व आज बिलोह घुम्मट्, जम्मू पहुंचने पर आचार्यश्रीजी का हार्दिक स्वागत/ अभिनन्दन जैन समाज, व्यापारिक संगठनों एवं अन्य समाजों की ओर से किया गया और इसके पश्चात् शोभायात्रा के रूप में शहर के मुख्य बाजारों रघुनाथ बाजार, सिटी चैक, पुरानी मण्डी, जैन बाजार होते हुए आचार्यश्रीजी नेकचंद मैमोरियल हाॅल, रानी पार्क, जम्मू चातुर्मास हेतु पधारे । शोभा-यात्रा का संचालन मंत्री श्री जिनेन्द्र जैन ‘पिंकी’ ने किया । 

 

हर्षोल्लास के वातावरण में हुआ मंगल प्रवेश

शिवाचार्यश्रीजी ने सबको मंगल संदेश प्रदान किया

7 जुलाई, 2006: जम्मू: जैन धर्म दिवाकर, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- जम्मू के जैन स्थानक में चातुर्मास का मंगल प्रवेश का यह शुभ दिन आप सबके लिए मंगलकारी हो । आप सबकी तैयारी कई दिनों से यहां पर हो रही है और कई लोग ऐसे भी हैं जो उसमें गल्तियां निकालने के लिए अग्रसर हैं । लाख उल्लू मिलकर कह दें कि सूरज नहीं है तो क्या सूरज को छिपाया जा सकता  है । सोने और हीरे को तराशने और पीटने पर ही उसकी सुन्दरता परिलक्षित होती है । इस चातुर्मास में हम कुछ सीखेंगे, कुछ बातें लकीर से हटकर होंगी । जब से जम्मू राज्य में प्रवेश हुआ है सब तरफ खुशियां छाई हुई है । हर तरफ कुछ न कुछ आयोजन हो रहे हैं । आप सबने मेरा स्वागत किया । मैं आप सबका दिल से स्वागत करता हूँ । यह सारा सम्मान धर्म का है । संत को नम्र होना चाहिए । संत के भीतर अहंकार की आवश्यकता नहीं है । उसके भीतर एक तृप्ति और आनंद हो जो हमारी निन्दा करता है उसे हम समता से सहन करेंगे तो कर्म-निर्जरा की ओर अग्रसर हो जाएंगे । हमें हर समय परिवर्तन अच्छा लगता है । दिन होता है तो रात की याद आती है । हमें इस परिवर्तन से आगे बढ़ना है । बहुत समय एशोआराम में खो चुके हैं अब कुछ समय साधना में बिताना है । बचपन, जवानी, बुढ़ापा सब चला जाएगा । प्रशंसा भी यहीं पर रह जाएगी । 

अब हम अनुशासित हो जाएं । धर्म सभा में अनुशासन आवश्यक है । अनुशासन के बिना जीवन अधूरा है । धर्म सभा में अनुशासन ना हो तो वह धर्मसभा नहीं कहलाती । जैन समाज एक समृद्ध समाज  है । हम घर में ही होते तो कुछ रिश्तेदार और परिचित से ही सम्पर्क होता पर आज सारा समाज हमें प्यार दे रहा है । संत और समाज का एक जोड़ा है । दोनों एक दूसरे के पूरक  हैं । साधु समाज के बिना कुछ नहीं कर सकता । यह वर्षावास केवल भरत क्षेत्र में ही नहीं महाविदेह क्षेत्र में भी होता है । परम तारक अरिहंत परमात्मा श्री सीमंधर स्वामी भगवान भी वहां पर वर्षावास कर रहे है ं। उनका वर्षावास बीस जून को ही प्रारंभ हो गया है । उनकी हम पर अनंत कृपा है, उस कृपा को केवल महसूस ही किया जा सकता है । आप सब हमें यहां लेकर आए यह जिम्मेदारी केवल जम्मू की ही नहीं अपितु अखिल भारतवर्ष की है । जो व्यक्ति इसमें पुण्य कमाएंगे वे अपना धर्म कमा लेंगे । इस चातुर्मास में कुछ लोग ऐसे भी होंगे जो मोक्ष की टिकिट ले जाएंगे । इस धरा पर अनंत बार जन्म मरण किया है फिर भोगों में मत जाना । आज एक लक्ष्य बना लो 

सिद्धगति में जाने का । 

इस वर्षावास में ध्यान की अनंत गहराईयों तक जाना है उसके लिए आवश्यकता है समय की और वह आपको निकालना ही होगा । अरिहंत की वाणी, सिद्ध का स्मरण, साधु का संघ तीनो परम् दुर्लभ है । यह संसार एक किराये का घर है, यहां पर रहते हुए मोक्ष जाने का संकल्प करो । अभी तक हम परफेक्ट नहीं हुए हैं परफेक्ट वेही हेंै जो सिद्ध बुद्ध और मुक्त हो गए । जिन्दगी में प्रयास करते रहो घबराना नहीं ध्यान करोगे तो कठिनाईयां आएगी फिर सब कुछ ठीक हो जाएगा । 

दीक्षा लेने के बाद प्रथम बार जम्मू वर्षावास हेतु आना हुआ । आज प्रातः इन्द्रदेवों के द्वारा अभिषेक स्वरूप वर्षा की कुछ बूंदे भी गिरे यह बहुत उत्तम माना जाता है । प्रकृति के साथ रहो । जो हो रहा है उसे सहजता से स्वीकार करो । विदुषी महासाध्वी श्री लक्ष्मी जी महाराज ने भी अपना बहुत श्रम किया है । इनका भी इस वर्षावास में अच्छा योगदान रहेगा । जैन सभा के विशेष आग्रह पर ये यहां पर आए, गुरू आज्ञा का पालन किया । 

इस अवसर पर श्रमण संघीय मंत्री श्री शिरीष मुनि जी महाराज ने भी वर्षावास की भूमिका बताते हुए श्रद्धेय आचार्य भगवंत के वर्षावास के लिए हार्दिक मंगल कामना की और सभी श्रद्धालुओं के लिए एक सुनहरा अवसर बताया । इस वर्षावास में होने वाले साधना शिविरों के बारे में जानकारी दी । महासाध्वी श्री लक्ष्मी जी महाराज ने श्रद्धेय आचार्य भगवंत की कृपा को महसूस करने के लिए प्रेरणा दी और साथ ही जप,तप, सामायिक समयबद्धता के लिए कुछ बातें श्रीसंघ के समक्ष रखी ।

श्री प्रमोद जैन, डिविजनल कमिश्नर जम्मू ने आचार्यश्रीजी के वर्षावास को जम्मू का ही नहीं अपितु पूरे जम्मू कश्मीर का वर्षावास बताया और अपनी तरफ से सभी कार्यों में सहयोग देने की भावना व्यक्त   की । श्रीमती कलावती जैन अध्यक्षा- श्रावक समिति ने आचार्यश्रीजी का स्वागत और अभिनन्दन किया । श्रीमती वीना जैन ने भजन के द्वारा अपनी भावनाएं व्यक्त की । आत्मानंद जैन सभा के मंत्री श्री विनोद जैन ने अपने भाव व्यक्त करते हुए कहा कि आज अपार खुशी है, जैसे गुरू वल्लभ को देखा था वैसे ही शिवाचार्यश्रीजी को देख रहा हूं उतने ही अनुशासित और साधनामय जीवन है इनका । इनके जम्मू पधारने पर हार्दिक स्वागतम् । जैन युवक संघ के मंत्री श्री संदीप जैन ने प्रस्तुत वर्षावास को युवाओं के लिए एक सुन्दर अवसर बतलाया और कहा कि- युवाओं की तरफ से आपको जो सेवा होगी हम देने के लिए तैयार हैं । जैन तरूणी मण्डल ने प्रस्तुत वर्षावास को आध्यात्मिक महाकुंभ की संज्ञा देते हुए भजन द्वारा अपनी भावनाएं व्यक्त की । पंजाब महासभा के प्रधान श्री राकेश जैन ने जम्मू श्रीसंघ को बधाई देते हुए आचार्यश्रीजी का इस धरा पर पधारने पर हार्दिक स्वागत किया । श्रमण संस्कृति मंच की सदस्याओं ने हार्दिक स्वागत वंदन अभिनन्दन करते हुए भजन द्वारा अपनी भावनाएं अभिव्यक्त की । विश्व हिन्दू परिषद के प्रदेश अध्यक्ष श्री रमाकान्त दूबे ने प्रस्तुत वर्षावास को हिन्दू समाज के लिए एक सुन्दर समायोजन बतलाया और हिंसा, उग्रवाद को समाप्त करने के लिए सुन्दर प्रयास हो इस तरह की भावना व्यक्त की । श्री सुनील जैन महामंत्री श्रावक समिति ने स्वागत एवं अभिनन्दन किया । 

श्री सुमतिलाल जी कर्नावट चेयरमैन श्रावक समिति ने आचार्यश्रीजी के जम्मू पदार्पण पर आचार्यश्रीजी का हार्दिक स्वागत एवं अभिनन्दन करते हुए जन-जन को प्रस्तुत वर्षावास का पूरा लाभ उठाने की प्रेरणा प्रदान की । श्री मोहनलाल जी जैन महामंत्री मंगलदेश ने मंगलदेश महासभा की ओर से शिवाचार्यश्रीजी का स्वागत एवं अभिनन्दन किया । श्री नृपराज जी जैन-कोषाध्यक्ष श्रावक समिति, श्री प्रेम जी जैन ‘तृषित’, श्री राजकुमार जी जैन प्रधान जैन सभा, जम्मू आदि सभी श्रद्धालुओं ने इस अवसर पर अपनी शुभ-कामनाएं प्रस्तुत की । सभा का सुन्दर संचालन श्री रमण जैन महामंत्री जैन सभा, जम्मू ने   किया ।

शोभायात्रा शहर के मुख्य बाजारों रघुनाथ बाजार, सिटी चैक, पुरानी मण्डी, जैन बाजार होते हुए नेकचंद मैमोरियल हाॅल, रानी पार्क, जम्मू पहुंची जहां आचार्यश्रीजी चातुर्मास हेतु चार माह के लिए बिराजमान रहेंगे । शोभा-यात्रा का संचालन मंत्री श्री जिनेन्द्र जैन ‘पिंकी’, डाॅ0 धीरज जैन, श्री सुशील जैन, श्री रवीन्द्र जैन आदि ने किया । 

 

कल्याण वाणी को सुनना ही वीतरागवाणी है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

9 जुलाई, 2006: जम्मू: जैन धर्म दिवाकर, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज का चातुर्मास कल से प्रारंभ हो रहा है । विश्व शान्ति के लिए अष्ट दिवसीय महामंत्र का जाप होगा । पूरे प्रदेश के कष्ट निवारण के लिए आयम्बिल की तपस्या और धर्म-चक्र जिसमें 42 भाई बहिन दो दिन के उपवास के उपापस करेंगे । और ध्यान योग साधना प्रतिदिन प्रातः 5.30 से 6.30 बजे से प्रारंभ हो चुकी है जिसमें सभी भाई बहिन भाग ले सकते हैं । आचार्यश्रीजी ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- प्रभुजी दया करो, मन में आन बसो । यह प्रार्थना, यह भाव ऐसी प्यास और हृदय का खुलापन होगा तो सचमुच प्रभुजी भीतर आ जाएंगे । किसी धारणा और परम्परा में मत रहना । अरिहंत प्रभु की कृपा को भीतर लाने के लिए खाली हृदय की आवश्यकता है । जो हम कहेंगे वो आप स्वीकार करेंगे, यही धर्म का नाता है । भाषण और प्रवचन में अन्तर है । भाषण एक व्यक्ति बोलता है और अनेकों उसे सुनते चले जाते हैं प्रवचन एक व्यक्ति कर रहा है और आप उसे तन्मयता से भीतर उतारो । कुछ समझ ना आए तो पूछो यह प्रवचन है । हम यहां धर्मकथा करने आए हैं । स्वाध्याय का पांचवा अंग है   धर्म-कथा । वाचना, पृच्छना, परावर्तना, अनुप्रेक्षा और धर्म-कथा । पहले पढ़ो, जो समझ ना आए उसे पूछो फिर बार-बार उसको दोहराते चले जाओ फिर हर शब्द पर अनुप्रेक्षा यानि विशेष-रूप से देखते हुए उसे भीतर उतारो और फिर उस अनुभव को जन-जन को बांटो । 

प्रवचन एक जीवन प्रशिक्षण है । आप इस प्रवचन हाॅल में बहुत निर्जरा कर सकते हो । हम यहां पर एक भाव से जुड़े हैं जो कुछ में कहूंगा उसे आप अनुभव करेंगे । हमारा अनुभव ही सच्ची पूंजी है । अरिहंत प्रभु की अनंत कृपा से जो कुछ अनुभव आज तक हुआ है उसे बोटने का अवसर है । जो अनुभव करेगा वह पा जाएगा । जितनी कृपा है उतनी विनम्र बन जाओ । यहां तो प्रेम की बात होगी । चित्त को निर्मल करने का एक सुन्दर अवसर है । यहां सिद्धान्तशाला और प्रयोगात्मक स्तर पर दोनों कार्य होंगे । इन दोनों का आपस में एक सम्पर्क   है । भगवान साढ़े बारह वर्ष तक कुछ भी नहीं बोले । महात्मा गांधी बोलते हुए हमेशा कम बोलते थे । हमने आज तक अनेकों बाते सुनी है छोटों का आदर करना प्रत्येक आत्मा को शुद्ध रूप से देखना अब हम इसका अनुभव करेंगे प्रतिक्षण में निर्जरा हो सकती है अगर वह क्षण तुम्हारा प्यार, मैत्री और करूणा में बीत रहा है ।

प्रवचन श्रद्धा और भक्ति से सुने हमें शास्त्र सुनने की आदत हो गई है । शास्त्र में जो बातें कही है उसे प्रयोगात्मक स्तर पर उतारने के लिए प्रवचन है । यहां पर हर वचन शास्त्र के अनुसार ही होगा परन्तु उसमें एक नया रूप होगा । अनेकों बार सुना है सहजता और सरलता में प्रभुता मिलती है परन्तु हम जीवन को सहज कैसे बनायें । हम यहां पर जो कुछ करेंगे उसे चैबीस घण्टे में देखना है क्या अनुभव हुआ है भीतर । तुम सब कुछ करते हुए ध्यान करते हो । यहां पर जो भी वाणी को सुनेगा उसे भीतर उतारेगा । अरिहंत-वाणी भी यही कहती है सुनकर के कल्याण के मार्ग को जानो, सुनकरके अकल्याण के मार्ग को जानो । दोनों को जानने के बाद जो श्रेष्ठ लगे उसे अंगीकार करो । अब प्रवचन उपस्थित होता है किसको सुनना । वीतराग-वाणी को सुनना । तीर्थंकर प्रभु जिन्होंने तीर्थं की स्थापना की उनके जो वचचन है उनकेा सुनना है । गुलाब का फूल सुन्दर है तो उसकी हर पंखुड़ी, डाली, कांटे पूरा पौधा सुन्दर है उसी तरह तीर्थंकर प्रभु का हर वचन मंगलस्वरूप है । हम यहां पर किसी की निन्दा नहीं करेंगे । निन्दा करने से अनंत जन्म बढ़ जाते हैं । आज तक किसी की निन्दा की है तो उसका प्रायश्चित कर लो । निन्दा करनी है तो आत्म-निन्दा करो । प्रभु महावीर के समय में गौशालक, संगमदेव, जमाली, चण्डकौशिक आदि सभी ने उनको कष्ट पहुंचाये, उनकी निन्दा की पर प्रभु महावीर ने उसे समता से स्वीकार किया तो कर्म-निर्जरा हो गई । 

साधु वही है जो अपनी काया को साधे और श्रावक वही है जो श्रद्धापूर्वक वचनों को सुने । रोहिणिया चोर ने भगवान का एक वचन सुना था तो वह संसार सागर से पार हो गया । सुनना कान से है, देखना आंख से है । कान और आंख में केवल चार अंगुल का अन्तर है । कान हमेशा सुनता है और आंखे हमेशा देखती रहती है । आंख एक टार्च लाईट की भांति है जो हमेशा सीधी तरफ देखती है और कान एक दीये के समान है जो हर तरफ की बात को सुनता है । सुनने के बाद उसे गहरे उतार लेना । अगर भीतर उतार लोगे तो वह अनुभव बन  जाएगा । 

स्वयं को देखने का अवसर है चातुर्मास

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

10 जुलाई, 2006: जम्मू: विश्व शान्ति और सर्वधर्म महासंघ के मुख्य संरक्षक शिवाचार्यश्रीजी ने आज प्रातःकाल जम्मू काश्मीर राज्य के साथ-साथ विश्व शान्ति की मंगल कामना के लिए नमस्कार महामंत्र के अखण्ड जाप की शुरूआत करवाई । जैन धर्म दिवाकर, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- अरिहंत प्रभु के चरणों में कोटि-कोटि नमन । सीमंधर स्वामी भगवान, महावीर स्वामी को नमन । नमन इसलिए कि उन्होंने मंगल का संदेश  दिया । प्रभु का मूल संदेश ‘जीवो मंगलम्’ है । उन्होंने कहा प्रत्येक जीव मंगल स्वरूप है । आज चातुर्मास का प्रथम दिवस सबके लिए मंगलकारी  हो । आपके भीतर चैतन्य की ज्योति प्रज्ज्वलित हो । आपके अन्दर रहे शुद्धात्मा भगवान को नमन । प्रभु की आज्ञा में धर्म है और उनकी आज्ञा में ही तप है । उनकी पहली आज्ञा है प्रत्येक जीव मंगलस्वरूप है । तो हमें किसी के अवगुण देखने का अधिकार नहीं है । जिस प्रकार दूध में मक्खन, तिल में तेल, मिट्टी में सोना छिपा हुआ है उसी तरह हर आत्मा में परमात्मा विद्यमान है इसलिए हर जीव मंगल स्वरूप है । 

यह चातुर्मास आपके जम्मू का ही नहीं जैन स्थानक का ही नहीं अपितु आपके हृदय का प्रवेश है । धर्म का प्रवेश है । आपके भीतर साधना समृद्धि आए यही मेरी मंगल कामना । नवकार मंत्र का अखण्ड जाप प्रातःकाल की मंगल बेला में प्रारंभ हो गया है । ध्यान साधना, प्रवचन, स्वाध्याय आदि सभी कार्यक्रम विधिवत रूप से प्रारंभ हो गए हैं । धर्म का प्रारंभ कहा से होता हैै? भगवान ने फरमाया धर्म मंगल व उत्कृष्ट है । जो इस धर्म का आश्रय लेता है उसे देवता भी नमन करते हैं । अगर भगवान का यह वचन हमारे जीवन में आ जाए तो हमें कहीं जाने की आवश्यकता नहीं । किसी तीर्थ में सम्मेद शिखर, शंखेश्वर, मक्का, मदीना घूमने की आवश्यकता नहीं । धर्म का प्रारंभ मन्दिर, स्थानक या प्रार्थना सभा से नहीं होता बल्कि आपके घर से होता है । वह घर जहां पर आप मां के गर्भ से बाहर आए । धर्म की शुरूआत मां के गर्भ से होती है । गर्भ संस्कार कैसे धारण किए जन्म लेते समय कैसे संस्कार मिले वह स्थान जहां हमारी परवरिश की, जहां हम रोये, हंसे वहां धर्म की शुरूआत होती है । मां की अधिक जिम्मेंदारी है संस्कार देने की । 

तुम्हारी रसोई मोक्ष कारण बन सकती है आवश्यकता है दृष्टि की । रसोई नरक का द्वार नहीं है । अगर रसोई नरक का द्वार होगा तो स्वर्ग का द्वार क्या होगा । क्या खाओगे, कैसे यह शरीर आगे बढ़ेगा । प्रभु आदिनाथ ने असी, मसि और कृषि का उपदेश तब दिया जब कल्पवृक्ष समाप्त हो गए थे । हर व्यक्ति ने भोजन के लिए त्राहि-त्राहि मचाई थी । तुम्हारे हाथ कल्पवृक्ष हैं, तुम्हारे पांव रसातल हैं, तुम्हारा मस्तिष्क अमृतसम है । बहनें भोजन बनाते समय शुद्ध भावना रखें तो रसोई मुक्ति का द्वार सिद्ध होगा । रसोई में पाप कर्म भी हो सकते हैं और संवर की साधना भी हो सकती है । दुकान में धर्म भी है तो कर्म-ब्ंाधन भी है । आवश्यकता है दृष्टि को बदलने   की । दृष्टि को बदला तो जीवन बदल जाएगा । बस आपने अपने जीवन को बदलना है । 

बच्चों को संस्कार, युवाओं को साधना और नारी को घर को स्वर्ग बनाने की कला यहां पर सीखनी है । शारदा मां ना होती तो रामकृष्ण भी ना होते । अगर ये दोनो ंना होते तो विवेकानंद जैसी महान् आत्माएं क्या इस धरा पर जन्म लेती । जितना काम करोगे उतनी जिम्मेदारी आती जाएगी । जो काम शुद्ध भाव से करोगे वह निर्जरा का कारण बन जाएगा । चातुर्मास एक अवसर है स्वयं को देखने का । हमारा जीवन कोल्हू के बैल की तरह हो गया है । सुबह उठत्ेा ही चाय पीकर दुकान में गए, अखबार पढ़ा, खाना खाया फिर शाम को लौटे थोड़ी देर मनोरंजन के साधन अपनाएं फिर सो गए । जीवन को हमने कितना सीमित बना दिया है । चातुर्मास जीवन में आनंद और उल्लास लेकर आता है । चातुर्मास में चित्त की चेतना की शुद्धि करनी है और एक शुभ संकल्प भीतर रखना है, शरीर, मन और वचन से कोई ऐसा कार्य ना हो जिससे किसी के दिल को ठेस पहुंचे । जीवन में प्यार और मुस्कराहट आवश्यक है । जरा सा तनाव आपके भीतरी जीवन को संकुचित कर देता है, इसलिए हमें चाहिए कि हम तनावमुक्त जीवन जीएं, साधना को भीतर अपनाएं । 

 

गुरू पूर्णिमा हमें गुरू से परम गुरू की ओर ले जाती है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

11 जुलाई, 2006: जम्मू: विश्व शान्ति और सर्वधर्म महासंघ के मुख्य संरक्षक श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने आज जम्मू काश्मीर राज्य के साथ-साथ विश्व शान्ति की मंगल कामना के साथ गुरू पूर्णिमा के अवसर पर गुरू के महत्व पर प्रकाश डालते हुए अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- चातुर्मास का दूसरा दिवस प्यार और मैत्री का संदेश लेकर हमारे समक्ष उपस्थित है । जीवन में मैत्री की भावना हमारे लिए एक फाउण्डेशन है और आपके लिए आगे बढ़ने का अवसर है । आज गुरू पूर्णिमा का दिवस जिसे गुरू पूजा या व्यास पूर्णिमा भी कहते हैं हर श्रद्धालु अपने इष्ट, अपने गुरू को स्मरण कर उनके चरण शरण में स्वयं को समर्पित करता है । गुरू शब्द का एक गहरा अर्थ है जिसने गुरू को जान लिया उसने सब कुछ जान लिया । गुरू का एक अर्थ भारी होता है । गुरू शब्द में दो अक्षर हैं ‘गु’ और ‘रू’ । गु शब्द अंधकार का प्रतीक और रू शब्द प्रकाश का प्रतीक है । इसका अर्थ हुआ गुरू हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाते हैं जो आपके जीवन से माया, मोह, अंधकार को दूर कर दे वही गुरू है । यदि गुरू आपको कहता है कि मेरे पास आओ, मेरी परम्परा में आओ तो वह गुरू नहीं हो सकता क्योंकि गुरू किसी को बांधता नहीं जिस प्रकार फूल सबको सुगंध देता है उसी तरह गुरू सबको ज्ञान देता है, अपने अनुभव बांटता है । 

हम आपको कोई परम्परा में बांधने नहीं आए । प्यार किसी को बांधता नहीं । प्रभु महावीर ने किसी को बांधा नहीं । प्रभु महावीर के समय में गौशालक के ग्यारह लाख श्रावक थे । गौशालक हमेशा कहता था कि मैं तीर्थंकर हूं, मेरे पास आओ । भगवान महावीर भगवान होते हुए भी कभी यह नहीं कहते थे कि मेरे पास आओ । माता की करूणा, पिता की विशालता और गुरू का आकाशसम स्वभाव तुम्हें मुक्ति की ओर ले जाएगा । गुरू के ज्ञान को बांधा नहीं जा सकता । गुरू के ज्ञान को भीतर उतारना है । आज के दिन लोग अपने गुरूओं के पास जाते हैं या अन्य दिन लोग मन्दिरों में जाते हैं पूजा करते हैं भगवान के चरणों में फूल चढ़ाते हैं और घर आ जाते हैं वह फूल एक अनमोल संदेश देता है उसने अनेकों परिषह सहन किये हैं । सर्दी गर्मी को स्वीकारा है और वह भगवान के चरणों में गिरा है । फूल कहता है कि मेरा कण-कण सुगन्धित है अगर तुम गुरू चरणों में झुक रहे हो तो तुम्हारा भी कण-कण सुगंधित होना   चाहिए । 

अरिहंत प्रभु की श्वांस सुगंधित होती है । वे हरेक को धर्म से जोड़ते हैं वृक्ष को पत्थर मारो फिर भी वह फल देता है । पशु पक्षियों को मारा, बांधा जाता है फिर भी वे दूध और जीवनोपयोगी वस्तुएं प्रदान करते हैं, इस तरह गुरू तुम्हें किसी सम्प्रदाय में ना बांधते हुए अपने ज्ञान को देता है । गुरू के ज्ञान का एक सूत्र भीतर उतार लो तो जीवन मुक्ति की ओर अग्रसर हो जाएगा । गुरू को ब्रह्मा, विष्णु, महेश की उपमा दी है । गुरू को साक्षात् परब्रह्म कहा है । वो ब्रह्म जिसके उपर कोई भी नहीं है । एक जन्म माता पिता ने दिया । उस समय शरीर का जन्म हुआ । एक जन्म गुरू देता है जब आप गुरू के चरणों में जाते हो या गुरू आपके पास चलकर आता है उस समय आपकी आत्मा का जन्म होता है । व्यक्ति सारा संसार भटक रहा है उसका मूल कारण केवल अज्ञान है । बरसों का अंधकार भीतर भरा हुआ है आवश्यकता है गुरू-रूपी एक दीये की । दीया जहां भी जाता है प्रकाश कर देता है । गुरू को पथ प्रदर्शक कहा है । महात्मा गांधी जब विदेश गये थे तो उनकी मां पुतली बाई ने विदेश को विलासिता की नगरी बताते हुए जैन मुनि से तीन नियम करवाये थे । वे नियम उन्हें महात्मा तक ले गये । गुरू के चरणों में बैठकर जो संकल्प किये जाते है। वे अवश्य पूर्ण होते हैं आवश्यकता है हमारी उस पर पूर्ण श्रद्धा हो । गुरू चरणों में की हुई हर प्रतिज्ञा तुम्हें संसार सागर से पार करती है । शरीर से तप, साधना, सेवा करो तो वह मूल्यवान है नहीं तो वह भी एक मिट्टी की रचना है । शरीर को सजाने के लिए आज तक अनेकों पैसे खर्च किये अब आत्मा की सजावट करो । विवेकानंद जब अमेरिका गये थे तो एक सन्यासी वेशभूषा में गये थे और वहां जाकर उनका व्यक्तित्व निखरा था । प्रत्येक व्यक्ति भगवान महावीर की मूलभूत सिद्धान्त पर चले । कम से कम दो सामायिक प्रतिदिन करे । सामायिक में आत्म-तत्व का चिन्तन करे ।  

पूज्य जैनाचार्य डाॅ0 श्री शिवमुनि जी महाराज विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के अन्तर्गत पूरे देश भर में पद-यात्रा करते हुए इस वर्ष जम्मू एण्ड कश्मीर में मंगलमैत्री शान्ति एवं प्रेमपूर्ण वातावरण का लक्ष्य लेकर पधारे हैं । आपका जीवन ध्यान योग साधना से परिपूर्ण है । आपके प्रवचन प्रभु महावीर की अहिंसा, मोहम्मद का भाईचारा, राम की मर्यादा, कृष्ण का कर्मयोग, ईसा का प्रेम और देश भक्ति से परिपूर्ण होते   है । आप मानव मात्र को जीवन जीने की कला सिखा रहे हैं । विश्व शान्ति एवं सर्वधर्म समभाव महासंघ के मुख्य संरक्षक के नाते आपने त्रिसूत्रीय कार्यक्रम हाथ में लिया है जिसमें 1- अहिंसा, शान्ति एवं शाकाहार का प्रचार, 2- नशामुक्ति, 3- भ्रूण हत्या का निषेध । 

जम्मू प्रदेश में आपश्रीजी शैक्षणिक संस्थाओं, व्यापार मण्डल, सेन्ट्रल जेल आदि में अपने आत्म: ध्यान योग’ के कार्यक्रमों के द्वारा हृदय परिवर्तन का अभियान चला रहे हैं । आपका मानना है कि व्यक्ति को परिवर्तन करने के लिए उसे ज्ञान देने की आवश्यकता है और ध्यान के प्रशिक्षण से उसके जीवन में तनाव से मुक्ति, अशान्ति से शान्ति की ओर प्रवेश, हिंसा, आतंक, क्रोध, अहंकार, लोभ आदि विकारों से मुक्त किया जा सकता है । लोभी व्यक्ति देश के लिये अनेकों बार घातक बन जाता है । अतः इस चातुर्मास के इस महायज्ञ में हमने ऐसे हजारों लोगों को ज्ञान और ध्यान का बोध देना है जिससे उनका हृदय परिवर्तन हो, उनके जीवन में आनंद, शान्ति, सुख समृद्धि की प्राप्ति हो । 

आपका मानना है कि व्यक्ति बदलेगा तो परिवार बदलेगा, परिवार बदलेगा तो समाज बदलेगा, समाज बदलेगा तो शहर बदलेंगे, शहर बदलेंगे तो देश बदलेगा । देश बदलेंगे तो विश्व में परिवर्तन आ सकता है ं। आपने अपने जीवनकाल में पिछले पैतीस वर्षों में करीब 35 हजार किलोमीटर की पद-यात्रा  की । लाखों लोगों से जन-सम्पर्क कर अहिंसा, नैतिक उत्थान की शिक्षा एवं सर्वधर्म समभाव के क्षेत्र कार्य कर मानव धर्म का उत्थान किया है । आपके निर्देशन में 800 से अधिक साधु-साध्वीवृंद पूरे देश में धर्मिक कार्यक्रम चला हरे हैं । आप उन सभी के प्रमुख आचार्य हैं, आपके संघ का नाम ‘श्रमण संघ’ है । अनेक प्रकार की जप, तप की साधना करके इस विश्व शान्ति के महायज्ञ में ध्यान के द्वारा मंगलमैत्री का वातावरण निर्मित किया । इस वर्ष आपकी तपस्या के परमाणु इस जम्मू शहर में फैल रहे हैं और हम चाहते हैं कि आपके तप और ध्यान से इस पूरे जम्मू और कश्मीर में सुख शान्ति और समृद्धि का वातावरण निर्मित हो । लोग निर्भय होकर अपना जीवन जीयें । व्यक्ति, व्यक्ति से प्रेम करे । घृणा और नफरत से दूर हो जाए । 

पूरे चार माह यहां पर प्रतिदिन प्रातःकाल 5.50 से 6.30 बजे योग और ध्यान की क्लास चल रही  है । प्रतिदिन 7.45 से 9.15 तक प्रवचन और प्रत्येक रविवार विविध प्रकार के समय-समय पर अहिंसा, शान्ति, जीवन जीने की कला के सेमिनार आयोजित होंगे । सर्वधर्म समभाव का वातावरण निर्मित किया जाएगा । इस हेतु हमारे यहां की एस0एस0 जैन सभा के कार्यकर्Ÿाा, युवक मण्डल, स्त्री सभा, तरूणी मण्डल, श्रमण संस्कृति मण्डल और विभिन्न उपनगरों के श्रावक संघ जिसमें त्रिकुटा नगर, जैन नगर, गांधी नगर आदि सामूहिक रूप से कार्यक्रम कर रहे हैं । विश्व शान्ति के लिए यहां पर नियमित महामंत्र का जाप और विविध प्रकार की तपस्याएं आयोजित की जा रही हैं । साथ ही आत्म: ध्यान साधना के विविध कोर्सेज आयोजित किये जा रहे हैं । समस्त जम्मू के धर्मप्रेमियों को सादर आमंत्रण है । इस जीवन जीने की कला के यज्ञ में लाभ लेकर अपने जीवन को पवित्र बनाएं । 

विश्व शान्ति व मानव मंगल मैत्री अभियान के अन्तर्गत पूरे देश भर में पद यात्रा करते हुए इस वर्ष जम्मू व कश्मीर में मंगल मैत्री, शान्ति एवं सौहार्दपूर्ण वातावरण का लक्ष्य लेकर आया हूं । प्रभु महावीर की अहिंसा, पैगम्बर मोहम्मद का भाईचारा, भगवान राम की मर्यादा, श्रीकृष्ण का कर्मयोग व ईसा मसीह का प्रेम और देश भक्ति मानव मात्र को जीवन जीने का कला सिखा रहे हैं । 

 

  विश्व शान्ति एवं सर्वधर्म समभाव महासंघ के मुख्य संरक्षक के नाते हमने त्रिसूत्रीय कार्यक्रम हाथ में लिया है जिसमें:-

1- अहिंसा, शान्ति एवं शाकाहार का प्रचार ।

2- नशा मुक्ति अभियान ।

3- भ्रूण हत्या का निषेध । 

जम्मू प्रदेश में शैक्षणिक संस्थाओं, विभिन्न व्यापार संगठन व अन्य स्वयं सेवी संस्थाओं आदि के माध्यम से आत्म: ध्यान योग के कार्यक्रमों के द्वारा हृदय परिवर्तन का अभियान चलाना है । मेरा मानना है कि व्यक्ति में परिवर्तन करने के लिए उसे ज्ञान देने की आवश्यकता है और ध्यान के प्रशिक्षण से उसके जीवन में तनाव से मुक्ति, अशान्ति से शान्ति की ओर प्रवेश, हिंसा, आतंक, क्रोध, अहंकार, लोभ आदि विकारों से मुक्त किया जा सकता   है । लोभी व्यक्ति देश के लिए अनेकों बार घातक बन जाता है । अतः इस चातुर्मास के महायज्ञ में हमने ऐसे हजारों लोगों विशेषकर युवा वर्ग को ज्ञान और ध्यान का बोध देना है जिससे उनका हृदय परिवर्तित हो और उनके जीवन में आनंद, शान्ति, सुख व समृद्धि की प्राप्ति हो । 

मेरा यह भी मानना है कि व्यक्ति बदलेगा तो परिवार बदलेगा, परिवार बदलेगा तो समाज बदलेगा, समाज बदलेगा तो शहर बदलेगा, शहर बदलेगें तो देश बदलेगा । इस प्रकार विश्व में परिवर्तन आ सकता है । अनेक प्रकार की जप, तप की साधना करके इस विश्व शान्ति के महायज्ञ में ध्यान के द्वारा मंगल मैत्री का वातावरण निर्मित किया जाए ताकि शान्ति और भाईचारे के परमाणु पूरे राज्य में फैलें जिससे जम्मू कश्मीर राज्य में सुख, शान्ति, समृद्धि का वातावरण निर्मित हो । लोग निर्भय होकर जीवन जीएं । व्यक्ति, व्यक्ति से प्रेम करें । घृणा और नफरत से दूर हो जाएं । इसी मिशन को लेकर मैंने इस राज्य में चातुर्मास करने का निर्णय किया है । 

 

मोक्ष लक्ष्मी के लिए सत्गुरू की नितान्त आवश्यकता है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

12 जुलाई, 2006: जम्मू: विश्व शान्ति और सर्वधर्म महासंघ के मुख्य संरक्षक श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने आज जम्मू काश्मीर राज्य के साथ-साथ विश्व शान्ति की मंगल कामना करते हुए अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- करो प्यार सत्गुरू से, जीवन सफल बना लो । यह तन ना फिर मिलेगा, कुछ नाम धन कमा लो ।। एक संसार का धन, एक परमार्थ का धन । एक संसार का वैभव, एक तीर्थंकर का वैभव । तुम इसमें से जो चाहो ले सकते हो । कहीं सुख शान्ति वैभव मिलता है पर वह सुख नहीं, सुख का आभास है । आनंद की प्राप्ति के लिए क्या करें । इस प्रश्न का उत्तर यही होगा कि एक सत्गुरू मिल जाए काफी है । कहा भी है- गुरू प्रताप साध की संगत - सज्जन का संग मिल जाए बहुत है, गुरू शब्द बहुत सुन्दर है । गुरू है तो सत्संग है । गुरू एक रोशनी है सूरज के समान है उनके सामने आते ही दिल का अंधकार मिट जाता है । उनके अंग-2 से रोशनी झरती है । जिसके पास बैठने से भीतर का दीया प्रज्ज्वलित हो वह गुरू है । गुरू की झलक दिखाई दे तो चित्त का रूपान्तरण हो जाता है । सत्गुरू की तलाश के लिए अभीप्सा    चाहिए । गुरू क्या करता है सत्संग से क्या होता है ? परम सुख और परम दुःख दोनों की प्राप्ति भी हो सकती   है । परम दुःख यानि बहुत कुछ गंवाया पर प्राप्ति नहीं हुई । परमसुख यानि बहुत कुछ पाया । यदि जीवन में गुरू का अंश नहीं तो जिन्दगी मुर्दा है । गुरू के पास बैठो और अपना अस्तित्व अलग बनाओ तो समझना अभी गुरू के पास बैठना ही नहीं आया । पतंगा दीये के पास जाकर सर्वस्व समर्पित कर देता है । शिष्य गुरू के पास आकर मिट जाए तो वह सही में शिष्य कहलाएगा । तुम संवेदनशील बनो । हृदय के स्तर पर जीओ । स्वयं को भूल जाओ । गुरू की मौजूदगी जीवन को बदल देती है । सत्गुरू हमें अनंत की ओर ले जाता है । असीम से ससीम की ओर मोड़ता है और कहा भी है- 

आत्म भ्रान्ति सम रोग नहीं, सत्गुरू वैद्य सुजान, 

गुरू आज्ञा सम पथ्य नहीं, औषध विचार ध्यान । 

इस संसार में अनेक रोग हैं केंसर, डायबिटिज, पैरेलिसिस जैसी घातक बीमारियां शरीर पर अटेक कर रही हैं । एक रोग ने हमें जन्मों-2 से घेरा हुआ है । अध्यात्म-दृष्टि में वह रोग आत्म भ्रान्ति का रोग है । मन में संशय का आना ही आत्म-भ्रान्ति है और इसी कारण जन्मों-2 से हम संसार बढ़ाते जा रहे हैं । सत्गुरू एक डाॅक्टर है जो हमें आत्म-दृष्टि देता हैं । गुरू ने जो कहा वह पथ्य हो जाता है और उनका दिया ध्यान औषध है । गुरू वह है जो जानता है कि शिष्य किस प्रकार आत्म रमण कर सकता है । मोक्ष की कुंजी गुरू प्रदान करता है । राजा जनक ने अष्टावक्र को अपना गुरू बनाया और उससे तीन प्रश्न किये थे । ज्ञान कैसे हो ? वैराग्य कैसे हो ? मुक्ति कैसे मिले ? गुरू से क्या पूछना है यह राजा जनक से सीखो । वैराग्य का मतलब यह नहीं कि नीरस हो जाओ । संसार को निस्सार जानो यही वैराग्य है । आत्म-ज्ञान कैसे हो और ज्ञान के बाद मुक्ति कैसे मिले यह भी एक मूलभूत प्रश्न है । एक बात निश्चित है कि धन, पद, दौलत यही रह जाएगी, काम आएगा तो ज्ञान गर्भित वैराग्य । आत्म ज्ञान यानि आत्मभावों मे ंरमण । चित्त की चैतन्यता को जानना । मैं शरीर नहीं हूं इसका अनुभव के स्तर पर ज्ञान होना । संसार में कठिन से कठिन कार्य है तो वह है आत्म-रमण और चित्त का निरोध । सत्गुरू की कृपा से ये दोनों कार्य सहज में ही हो जाते हैं, आवश्यकता है कुछ दिन सान्निध्य में रहने की और गुरू के निर्देशों का पालन करने की । अपने जीवन को सत्य के मार्ग पर आगे बढ़ाओ । जिसके भीतर आत्म-ज्ञान हो, आत्म-दृष्टि हो वह सत्गुरू होता है । सत्गुरू को जानने का यह एक सर्वोत्कृष्ट लक्षण है । जो सुख दुःख आया उसे सहजता से स्वीकार कर लो । सत्गुरू के पांच लक्षण बतलाये हैं ं- आत्मज्ञानी हो, 2- समतायोगी, 3- कर्म के अनुसार स्वयं को ढालने वाला, 4- अपूर्व वाणी प्रदान करने वाला हो और 5- परमश्रुत का ज्ञाता हो । 

सत्गुरू के पास वर्षोे से रह रहे परन्तु जीवन नहीं बदलता इसके लिए उदाहरण देते हुए समझाया है कि जिस प्रकार कड़छी दाल और सब्जी के साथ रहते हुए भी उनका स्वाद नही ंजान पाती उसी प्रकार वह शिष्य है जो जीवन भर साथ रहते हुए भी गुरू द्वारा प्रदत्त धर्म को नहीं जान पाता । शिष्य जिह्वा बन जाए तो धर्म-रूपी स्वाद उसे मिल जाएगा । हमारा जीवन कैसे बदले ? कैसे सत्संग हमें प्राप्त हो ? सत्संग में आकर तर्क करोगे तो कुछ नहीं मिलने वाला । मुमुक्षु भाव से आकर प्रश्न पूछोगे तो सब कुछ प्राप्त हो जाएगा । कभी प्रश्न पूछने की इच्छा हो तो पूछना कि मेरा कल्याण कैसे हो । हम अपने जीवन का रूपान्तरण कैसे करें । जीवन में जैसे माता पिता की जरूरत है उससे कहीं अनंत गुणा सत्गुरू की जरूरत है हम उस सत्गुरू को समझें, जानें और उसके सान्निध्य में रहते हुए मुक्ति की ओर अग्रसर हों । 

हमारा जीवन अनमोल धन है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

राष्ट्र संत, युग पुरुषा, विश्व शान्ति और सर्वधर्म महासंघ के मुख्य संरक्षक श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने आज जम्मू काश्मीर राज्य के साथ-साथ विश्व शान्ति की मंगल कामना करते हुए अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- सत्संग का मार्ग मोक्ष का मार्ग एकदम आसान नहीं है उसके लिए सद्प्रयास आवश्यक है । हमारा जीवन अनमोल धन है इसे यों ही लुटाया जा रहा है । इस मन को निन्दा में अधिक रस आता है । सब जगह किसी तीसरे व्यक्ति की बात करना हर व्यक्ति का स्वभाव बन गया है । तभी प्रभु ने कहा- प्रतिपल प्रतिक्षण होश में जीना, जागरूकता में जीना । संसार एक सागर है सागर में लहरें उठती हैं और विलीन हो जाती है । सागर बहुत लम्बा चैड़ा है अनेकों अनेक नदियां उसमें आकर मिलती हैं । सागर में हिंसक जीव भी हैं और मोती भी है । बहुमूल्य रत्न वहां पर छिपे हुए हैं । जो डुबकी लगाता है उसे रत्न प्राप्त हो जाते हैं । गौताखोर हमेशा गहराई में जाकर मोती प्राप्त करता है । 

शान्त सागर हमारी शुद्धात्मा है । मन के विचार जो भीतर उठते हैं उन्हें लहरों की संज्ञा प्रदान की गई   है । लहरें उंची उंची उठती चली जाती हैं । कभी समुद्रतल दिखाई नहीं देता उसी भांति मन के विचार, कल्पनाएं, इच्छा एवं बुद्धि के घरा उठती चली जाती है । विचार तुम नहीं हो क्योंकि लहरें सागर नहीं हैं । हमने लहरों को सागर मान लिया और उसी में उलझ गये । भीतर उठने वाले विचारों को शान्त होने दो । व्यक्ति धन, पद, प्रतिष्ठा, भाईचारा छोड़ सकता है पर विचार नहीं छुटते । संसार में जन्म और मरण लहरों का उठना और विलीन होना है और उस जन्म और मरण के लिए आधार है धर्म । धर्म एक डुबते हुए प्राणी के लिए आधारभूत, शरण है । धर्म बहुत तरह से किया जा सकता है । अनेकांे मार्ग है माता पिता बचपन में बच्चे को जो संस्कार देते हैं वे बच्चे के मूलभूत संस्कार बन जाते हैं, इसलिए चाहिए कि बच्चे को बचपन में ही धर्म के संस्कार दिए जाएं । सती मदालसा के सात बेटे थे । उसने अपने बच्चों को गर्भ से ही संस्कारित किया था । 6 बेटों को सन्यासी बनवाया । वह अपने बेटों को बचपन से ही कहती थी कि तुम एक शुद्ध चैतन्य हो तुम्हारा जन्म संसार सागर में डूबते हुए प्राणियों के लिए हुआ है इसलिए उसे घर में रहते हुए भी सती बतलाया । सीता की शादी हुई थी फिर भी उसके भीतर की सात्विकता उसके सतीत्व तक ले गई । इसी प्रकार लक्षमण को यति और गांधी को महात्मा कहा गया । ये विशेषण तभी लगते हैं जब हम वैसा कार्य करते हैं  ।

हम घर में रहते हुए धर्म का पालन कर सकते हैं और घर में रहते हुए भी मोक्ष प्राप्ति हो सकती  है । भगवान फरमाते हैं कि व्यक्ति घर में रहते हुए धर्म का पालन करें । शुद्ध भाव से जीवन जीएं तो वह कर्म-निर्जरा करते हुए आगे आने वाले तीन भवों तक मुक्ति प्राप्त कर सकता है । अनपढ़ व्यक्ति भी परमात्मा को पा सकता   है । संत, कबीर, रैदास, शारदा मां आदि सभी अनपढ़ों ने परमात्मा को पा लिया  था । परमात्म प्राप्ति के लिए आवश्यक है विनय । भीतर झुकने की भावना होगी तो परमात्मा स्वतः तुम्हारे भीतर प्रतिष्ठित हो जाएंगे । कहा भी है:- हर दरवाजा रामद्वारा, सबको शीश झुकाता चल । कोई भी आए झुक जाओ । झुकना आ गया तो समझो प्रार्थना आ गई । प्रार्थना आ गई तो समझना परमात्मा के पांव तुम्हारी ओर मुड़ गए हैं और वह तुम्हारे भीतर आने के लिए तत्पर है । 

नवकार महामंत्र का अखण्ड जाप चल रहा है । सोमवार के बाद 19 जुलाई से घर-घर में नवकार महामंत्र का बारह घण्टे का जाप विश्व शान्ति के लिए होगा । इसी कड़ी में व्यक्ति का जीवन बदले इसलिए आत्म: ध्यान साधना कोर्स ‘बेसिक’ 17 से 21 जुलाई, 2006 तक प्रातः 5.15 से 7.15 बजे तक एवं शाम को 3.00 से 5.00 बजे तक आयोजित किया जा रहा है जो भाई बहिन आनंद शांति सुख प्राप्त करना चाहते हैं वे अवश्य साधना शिविर में भाग लें ।  

 

धर्म भीतर होगा तो सब तरफ शान्ति होगी

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

14 जुलाई, 2006: जम्मू: विश्व शान्ति और सर्वधर्म महासंघ के मुख्य संरक्षक श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने आज जम्मू काश्मीर राज्य के साथ-साथ विश्व शान्ति की मंगल कामना करते हुए अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- इस संसार में दो प्रकार के लोग हैं । एक प्रकार के वे हैं जिनको कितना भी धन मिल जाए, सुख सुविधा के साधन मिल जाएं फिर भी दुःखी रहते हैं । दूसरे प्रकार के लोग वे हैं उनके पास कुछ भी नहीं हैं । दो टाईम का भोजन भी प्राप्त नहीं हो फिर भी वे आनंदित हैं । प्रभु के आशीर्वाद से सुख शांति में जीवन व्यतीत कर रहे हैं । प्रभु ने जीवन दे दिया इतना ही बहुत है । यदि आप धर्मात्मा होना चाहते हैं तो आपके जीवन में शिकायत नहीं । यदि जीवन में कांटे भी आ जाएं तो आप उसे परम प्रसाद मानकर ग्रहण करोगे । ऐसी भावना मानकर चलोगे तो यह जीवन आगे बढ़ता चला जाएगा । प्रभु का धर्म सबके लिए मंगल देता है । दुःख मिल रहा है तो वह भी मंगलस्व्रूप है । सुख मिल रहा है तो वह भी मंगलस्वरूप है ।

हमें थोड़ी सी बीमारी आ जाए तो हम जीवन को कोसते हैं । आचार्य श्री आत्मराम जी महाराज के जीवन को देखो । छोटी सी उम्र में दीक्षा ली । बहुत अध्ययन किया । संस्कृत, प्राकृत के प्रकाण्ड पंडित बने फिर भी उनके जीवन में विरोध हुआ । अनेकों महारोगों ने उन्हें घेर लिया । कैंसर हो गया, डाॅक्टर ने जहर दे दिया फिर भी उन्होंने अपने जीवन को कोसा नहीं । हमारे जीवन में जब भी कष्ट आए तब समझना महापुरूषों का वरदान मिला है । प्रभु ! तूने तो बहुत कुछ दिया है मेरा पात्र ही छोटा है ऐसी प्रार्थना भीतर रखना । जीवन में समाधान चाहिए तो वह हमारे भीतर है । प्रभु ने कहा धर्म मंगल, उत्कृष्ट है । धर्म करते समय उसके बदले में कुछ मत मांगना । मांगने से नहीं मिलताा । धर्म सुख शांति देता है और उसके लिए तपना आवश्यक है । बैठे-2 माला करने से हो सकता है आपकी भावनाएं पूर्ण हो परन्तु तपना आवश्यक है । सम्मान, अपमान, दुःख जो कुछ मिले उसे समता से स्वीकार करना तब भीतर की स्मृद्धि आएगी और तभी मंगल होगा । 

धर्म कैसा मंगल है ? आस पास सभी जीवों में मंगल रूप देखो । यह मंगल पहले भी था और आज भी है, इस सृष्टि का हर कण मंगल है । प्रतिपल प्रतिक्षण आने वाली प्रत्येक श्वांस में मंगल की कामना करो तो आपका मंगल ही होगा । सोते, जागते कोई भी कार्य करो भीतर में सबके प्रति मंगल की कामना हो । कोई कार्य के साथ मंगल के भाव होंगे तो वह मंगल ही होगा और अमंगल के भाव होंगे तो निश्चित है कि अमंगल होगा । धर्म सुख, शान्ति, मोक्ष देता है परन्तु हम संसार में उलझे हुए हैं । दुःख बढ़ता जा रहा है । तुम धर्म करते रहो पर यह कभी मत पूछना कि क्या मिलेगा । कुछ मिलने वाला होगा तो वह भी छूट जाएगा । धर्म करते जाओ स्वतः ही कुछ न कुछ प्राप्ति होती रहेगी । कहा भी है- भीखा बात आगम की, कहनन सुनन की नाहीं ।

जो जाने सो कहे नहीं, कहे सो जाने नाहीं ।।

रहस्य की बात को वही जानता है जो कहता नहीं है । जिसने अनुभव किया वह उसे शत् प्रतिशत बयान नहीं कर सकता । प्रभु महावीर ने धर्म को जितना जाना वो उसे बता नहीं पाये । उनसे गणधरों ने ग्रहण किया वे उसे सत प्रतिशत लिख नहीं पाये । उसे आचार्यों को जितना मिला वे अपने शिष्यों को सारा दे नहीं पाये । आज ऐसी ही कड़ी चली आ रही है। जानने और समझने की बात है । हम अनुभव में जीवन को व्यतीत करें । अनुभव से परिवार सुखी होगा और चारों ओर सुख शान्ति फैलेगी । 

नवकार महामंत्र का अखण्ड जाप चल रहा है । सोमवार के बाद 19 जुलाई से घर-घर में नवकार महामंत्र का बारह घण्टे का जाप विश्व शान्ति के लिए होगा । इसी कड़ी में व्यक्ति का जीवन बदले इसलिए आत्म: ध्यान साधना कोर्स ‘बेसिक’ 17 से 21 जुलाई, 2006 तक प्रातः 5.15 से 7.15 बजे तक एवं शाम को 3.00 से 5.00 बजे तक आयोजित किया जा रहा है जो भाई बहिन आनंद शांति सुख प्राप्त करना चाहते हैं वे अवश्य साधना शिविर में भाग लें ।  

 

घर की शन्ति हेतु बच्चे को संस्कारित करें

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

15 जुलाई, 2006: जम्मू: विश्व शान्ति और सर्वधर्म महासंघ के मुख्य संरक्षक श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने आज जम्मू काश्मीर राज्य के साथ-साथ विश्व शान्ति की मंगल कामना करते हुए अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- आप सभी चाहते हैं हमारे घर में समृद्धि, शान्ति आए । बड़े बड़ों का कहना मानें । हमारा घर स्वर्ग बन जाए । व्यक्ति से घर, घर से समाज, समाज से देश, देश से विश्व सुन्दर होता है । हमें अपने घर को स्वर्ग बनाने से पूर्व स्वयं को सुन्दर बनाना होगा । कैसे घर में शान्ति, समृद्धि आए । समृद्धि केवल पैसे से संभव नहीं है । तुम्हारे घर में टी0वी0, फ्रिज आदि सुख सुविधा के साधन आ जाएंगे तो शान्ति हो जाएगी यह संभव नहीं । 

एक छोटा सा बालक घर में जन्म लेता है और सभी व्यक्तियों का मन मोह लेता है ं। वह बच्चा घर में शान्ति लेकर आया है । उसकी सरलता को देखकर सारा तनाव दूर हो जाता है । एक बालक उसको हम कैसे संस्कार दे । माता पिता उसे कैसे संस्कारित करें । बच्चा जल्दी बिगड़ जाता है, माता पिता की उपेक्षा के कारण । धन, पद, प्रतिष्ठा देने से बच्चे आपकी बात नहीं   मानते । वे अधिक मनमर्जी करने लग जाते हैं । आज की इस सदी में देखिये बच्चे कितने बिगड़ गए हैं । छोटे बच्चों को संस्कारित नहीं किया जाता । मां बाप स्वयं ही बच्चों को झूंठ बोलना सिखाते हैं । हम चर्चा करेंगे कि बच्चे को कैसे निर्मल शुद्ध सात्विक और धार्मिक बनाना है । प्रभु महावीर ने शिक्षा की विस्तार से चर्चा उत्तराध्ययन सूत्र के अन्दर की है । छोटा बच्चा जो भोला और निर्दोष है उसका भोलापन, निर्दोषता हमारे पास नहीं है । माता पिता के संस्कारों से उसकी निर्दोषता चली जाती है । पांच वर्ष की उम्र में बच्चा 60 प्रतिशत तक की शिक्षा प्राप्त कर लेता है । एक डाॅक्टर बनने के लिए पच्चीस वर्ष लग जाते हैं । एक वकील को वकील बनने के लिए और एक आर्किटेक्ट को आर्किटेक्ट बनने के लिए जीवन का एक चैथाई हिस्सा ंगवाना पड़ता है । एक बच्चे को ट्रेनिंग देने के लिए आप कितना हिस्सा जीवन का गंवा रहे हैं । 

भारत की संस्कृति में मां का स्थान सर्वोपरि है फिर पिता एवं गुरू का । गुरू का स्थान अन्तिम  है । जननी जन्म देती है और मां जीवन देती है । दो शब्दों में बहुत अन्तर है । प्रभु महावीर का नाम त्रिशला नन्दन है, मां का नाम पहले लिया गया फिर पुत्र को पुकारा गया । कृष्ण को जन्म देवकी ने दिया परन्तु उसका पालन यशोदा ने किया । मां धरती के समान होती है और पिता आकाश के समान होता है । माता पिता बच्चे को धन देते है, बच्चे को धन नहीं धर्म दो । आप धर्म करोगे तो बच्चा भी धर्म करेगा । धार्मिक भावनाएं भीतर होगी तो समृद्धि भीतर से जन्म लेगी । बच्चा जब गर्भ में आता है माता तभी से उसे संस्कारित करें । शास्त्रों में वर्णन आता है जब प्रभु महावीर त्रिशला मां के गर्भ में आए तो माता का जीवन बदल गया था । कुछ सोचो अपने बच्चों को संस्कारित करो । आज के युग में आवश्यकता है कि हम अपने बच्चों को सही राह पर लगाएं ।

नवकार महामंत्र का अखण्ड जाप चल रहा है । सोमवार के बाद 18 जुलाई से घर-घर में नवकार महामंत्र का बारह घण्टे का जाप विश्व शान्ति के लिए होगा । इसी कड़ी में व्यक्ति का जीवन बदले इसलिए आत्म: ध्यान साधना कोर्स ‘बेसिक’ 17 से 21 जुलाई, 2006 तक प्रातः 5.15 से 7.15 बजे तक एवं शाम को 3.00 से 5.00 बजे तक आयोजित किया जा रहा है जो भाई बहिन आनंद शांति सुख प्राप्त करना चाहते हैं वे अवश्य साधना शिविर में भाग लें ।  

 

शुद्ध सामायिक हमें परमात्मा से जोड़ती है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

16 जुलाई, 2006: जम्मू: विश्व शान्ति और सर्वधर्म महासंघ के मुख्य संरक्षक श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने आज जम्मू काश्मीर राज्य के साथ-साथ विश्व शान्ति की मंगल कामना करते हुए सामायिक का व्यवहारिक, आगमिक और आध्यात्मिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए फरमाया कि:- सामायिक हमारी आत्मा का स्वभाव है । सामायिक हमें परमात्मा से जोड़ती है । सामायिक हमें समभाव की ओर ले जाती है । सामायिक हमारा लक्षय  है । सामायिक हमारा नित्य कर्म है । प्रभु महावीर का संदेश,उद्घोष, उन्होंने एक ही पुकार दी कि तुम आत्म-ज्ञानी बनो । आत्मा की सामायिक इसका ध्यान और चिन्तन करो । संसार में रहते हुए आत्मा की ओर मुड़ा जा सकता है । गणधर गौतम ने प्रभु से पूछा था, हे प्रभो ! सामायिक क्या है ? उसका क्या अर्थ है । भगवान ने फरमाया हे गौतम ! आत्मा ही सामायिक है और आत्मा ही सामायिक का अर्थ है । तीर्थंकर हमेशा सार सूत्र में अपना उपदेश देते हैं ।

गीता में श्रीकृष्ण, उपनिषद् में महान् ऋषियों ने और आगमों में तीर्थंकरों ने एक ही बात कही- मेरी आत्मा शुद्ध, बुद्ध, निरंजन, निराकार है । वह अजर- अमर अविनाशी है । उसे कोई काट नहीं   सकता । अग्नि जला नहीं सकती, पानी गला नहीं सकता । वह अजर, अमर है । सामायिक दो प्रकार की है, द्रव्य सामायिक और भाव सामायिक । आप जो वर्तमान में सामायिक कर रहे हो वह द्रव्य सामायिक है । उपकरण के साथ बैठना, मुखवस्त्रिका लगाना, सामायिक के नौ पाठ पढ़ना और फिर सामायिक में धर्म-ध्यान, माला, स्वाध्याय आदि करना यह सब द्रव्य सामायिक में आता है । भाव सामायिक है आत्म-चिन्तन करना । आप आत्मा की ओर मुड़ जाओ, निर्जरा कर लो । आपके भीतर एक प्रतिज्ञा है कि मुझे समभाव में जीवन जीना है । आपके भीतर मैत्री भाव आए । सामायिक आपके अहंकार को तोड़ती है । अगर एक व्यक्ति सामायिक करेगा तो व्यक्ति से परिवार, परिवार से शहर देश राष्ट्र और विश्व में शान्ति फैलेगी । कई लोग सामायिक करते हैं पर गहराई नहीं आती । उसके लिए आवश्यक है ध्यान में सामायिक करना । 

प्रभु महावीर की सामायिक सच्चा ध्यान है । सामायिक को ध्यान के बिना नहीं किया जा सकता । प्रभु की साधना सामायिक, समता और मौन की साधना है । सामायिक की प्रतिज्ञा का पाठ ही हमें उसके अर्थों तक ले जाता है । पाठ में कहा गया है कि मैं शरीर की सभी आकांक्षाओं को तोड़ता हूं । समताभाव में आता हूं । मैं न राग करूंगा न द्वेष करूंगा । लाभ अलाभ की इच्छा नहीं रखते हुए केवल समभाव में जीवन जीऊंगा । ध्यान और सामायिक के बीच भेद रेखा खींचना कठिन है । प्रभु ने आत्मा को ही सामायिक कहा फिर शरीर का महत्व नहीं रहा । प्रभु ने सामायिक को आत्मा से जोड़ा है । सामायिक में सारी पकड़ को छोड़ दो । अरिहंतों, सिद्धों, अपने गुरूओं को नमन करो फिर आलोचना सूत्र द्वारा किसी प्रकार की विराधना हुई हो तो उससे स्वयं को अलग कर लो और आत्म-भावों में स्थिर हो जाओ फिर एक आसन में स्थिर हो जाना । वाणी से मौन हो जाना और ध्यान में चले जाना । ध्यान में यह चिन्तन बना रहे कि मेरा शरीर अलग है और आत्मा अलग है । ध्यान से अनंत कर्मों की निर्जरा होती है । जो-जो निकाचित कर्म बांधे हैं वे तो भोगने ही पड़ेंगे परन्तु सामान्य कर्म सहजता से ही निर्जरित हो जाते हैं । 24 घण्टे में दो घण्टे सामायिक के लिए निकालो । प्रभु ने श्रावक की सामायिक दो घड़ी की बताई और साधु की सामायिक जीवन पर्यन्त की बतलाई । सामायिक के तीन भेद हैं शुद्ध सामायिक, दर्शन सामायिक और चारित्र सामायिक । शुद्ध सामायिक में कोहम् से सोहम् की ओर जाना है । दर्शन सामायिक में दर्शन और सम्यक्त्व का पोषण करना है, चारित्र सामायिक में आचरण शुद्ध करना है । सामायिक में आत्मा की पिक्चर होती है । सामायिक में हमें आत्म दर्शन करना है । हम सब आत्मा की ओर मुड़ें । दुनियां में धन कमाना है तो बहुत कुछ करना पड़ता है और प्रभु को पाना है तो कुछ नहीं करना पड़ता । हम उसे अपने भीतर उतारें । 

आज कर्क की संक्रान्ति है । सूर्य मिथुन राशि से कर्क राशि में प्रवेश हुआ है । आज उत्तरा भाद्रपद नक्षत्र है । श्रावण सुदी एकम् 16 जुलाई रविवार का दिन । आप सभी खूब धर्म ध्यान करे । आपके भीतर शुद्ध सामायिक आए यही हार्दिक मंगल कामना । 

आज जैन युवक संघ द्वारा पूरे जम्मू कश्मीर क्षेत्र के लिए शान्ति हेतु सामायिक दिवस मनाया गया इस अवसर पर सभी श्रद्धालुओं ने अधिक से अधिक संख्या में सामायिक में भाग लेकर सामायिक की शुद्ध विधि को सीखा । इस अवसर पर श्री विमल जैन ‘अंशु’, जालंधर निवासी एवं श्री कीमतीलाल जैन, लुधियाना ने ध्यान साधना पर प्रकाश डाला । इस अवसर पर जालंधर, लुधियाना, समाना, पंचकूला, परवाणु आदि स्थानों से भाई बहिन उपस्थित थे । 

 

बच्चे को संस्कारित करना माँ का अहम् कर्Ÿाव्य है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

17 जुलाई, 2006: जम्मू: विश्व शान्ति और सर्वधर्म महासंघ के मुख्य संरक्षक श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने आज जम्मू काश्मीर राज्य के साथ-साथ विश्व शान्ति की मंगल कामना करते हुए बाल संस्कार पर अपने भाव व्यक्त करते हुए फरमाया कि- अरिहंत प्रभु की परम उपकारी वाणी कल्याणकारी है । जानना दो प्रकार से होता है एक भीतर से और एक बाहर से । बाहर सृष्टि को जानना और भीतर अपनी आत्मा को जानना । संसार को जानना और धर्म को जानना । जानने के अनन्तर व्यकित दर्शन से श्रद्धा करता है । ज्ञान और दर्शन युगपथ है । जानना, देखना सिद्धों का स्वभाव है । अरिहंत सिद्ध कभी प्रतिक्रिया नहीं करते वे हर श्वांस में केवल जानते और देखते   हैं । जानना और देखना बुरा नहीं है उस पर प्रतिक्रया करना बुरा है । आज का जगत छोटी सी छोटी बात पर भी प्रतिक्रिया करने लग जाता   है । प्रतिक्रिया में कर्म-बंधन है और कर्म-बंधन में संसार भ्रमण है इसलिए हम कर्म-बंधन ना करते हुए मुक्ति की ओर अग्रसर हो जाएं । मुक्ति की ओर अग्रसर होने के लिए आचरण आवश्यक है । भगवान ने फरमाया चारित्र से कर्म आश्रय का निरोध होता   है । चारित्र यानि संयम ग्रहण करना ही नहीं संयममय जीवन जीना है । किसी को कष्ट ना पहुंचे ऐसा व्यवहार करना है । 

हमारे यहां प्रभु ऋषभदेव ने काल की शुरूआत में पुरूषों के लिए 72 कलाएं और स्.ित्रयों के लिए 64 कलाएं बताई । सर्वप्रथम कला का प्रशिक्षण उन्होंने दिया । स्त्रियों की 64 कलाओं में एक कला है मां कैसे बनना ? मां की जिम्मेदारी है कि वह अपने बालक को तेजस्वी, शुरवीर, दानवीर बनायें । मां ने राम को भी जन्मा है और रावण को भी । मां ने कृष्ण को भी जन्मा है और कंस को भी । अपने बच्चे को भाग्यशाली बनाती है मां । जिस प्रकार एक छोटा सा बीज वृक्ष यात्रा में अग्रसर होता है । जमीन में गिरता है । गर्मी सर्दी सहन करता है फिर धरती मां अपनी गोद में ले लेती है और धीरे-2 वह अंकुर का रूप लेकर खाद पानी प्राप्त कर एक दिन वृक्ष का रूप धारण करता है । हजारों फल, फूल, पत्तियां उस पर लगती है इसी भांति छोटे बच्चे का जीवन है । अगर उसको बचपन से ही शिक्षा एवं संस्कार दिया जाए तो वह भी वृक्ष की भांति महान् व्यक्ति बन सकता है । छोटे बच्चे के भीतर सब कुछ छिपा हुआ है । 

छोटे बच्चे को मां कैसे संस्कार देती है यह अत्यन्त आवश्यक है । मां उसे क्या बनाएगी यह उस पर ही निर्भर करता है । मां ने उसे संत बनाना है या डाॅक्टर, अच्छा इन्सान बनाना है यह सब कुछ उस पर ही निर्भर   है । मां जैसा संस्कार देगी बच्चा वैसा ही बनेगा । स्वामी विवेकानंद का जीवन आप सबके समक्ष है । बचपन में वे नरेन्द्र के नाम से जाने जाते थे । नरेन्द्र से विवेकानंद कैसे बने । उस समय में डाॅक्टर, इंजीनियर का युग नहीं था, उस समय में घोड़ा गाड़ी चलती    थी । उनके घर में मेहमान आए और मेहमानों ने उनसे पूछा कि तुम क्या बनोगे, नरेन्द्र ने जवाब दिया कि मैं एक घोड़ा गाड़ी चालक बनूंगा । माता ने उसे डांटा नहीं । मां उसे अन्दर ले गई और महाभारत का सुन्दर दृश्य दिखाया जहां पर श्रीकृष्ण अर्जुन का रथ हांक रहे थे । माता ने उसे कहा बच्चे अगर रथवान ही बनना है तो श्रीकृष्ण की भांति बनना । इस नरेन्द्र के उपर एक छाप पड़ गई और उसने श्रीकृष्ण की भांति रथवान बनने का संकल्प भीतर ग्रहण किया । बच्चा क्या बनेगा यह तुम पर ही नहीं अपितु तुम्हारे घर के वातावरण पर भी निर्भर करेगा । बच्चा जहां पर जाता है वहां का वातावरण भी उसके अनुकूल होना चाहिए । एक बालक अगर दीक्षा लेना चाहे तो उसे वैसा वातावरण आवश्यक है । मां अपने बच्चे को सुन्दर संस्कार दें । महापुरूषों का जीवन परिचय सुनाएं और उसे तेजस्वी बालक बनाए यही हार्दिक मंगल भावना । 

आज प्रातःकाल आत्म: साधना कोर्स बेसिक की शुरूआत हुई जिसमें बड़ी संख्या में साधकों ने भाग लिया । आज के दिवस उन्होंने साधना शिविर का परिचय प्राप्त करते हुए साधना शिविर में की जाने वाली प्रेक्टिकल साधना की शुरूआत की । 

 

बच्चे का जन्म माता के लिए एक तपस्या है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

18 जुलाई, 2006: जम्मू: विश्व शान्ति और सर्वधर्म महासंघ के मुख्य संरक्षक श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने आज जम्मू काश्मीर राज्य के साथ-साथ विश्व शान्ति की मंगल कामना करते हुए बाल संस्कार पर अपने भाव व्यक्त करते हुए फरमाया कि- प्रभु की वाणी जिनशासन में सर्वोपरि है । प्रभु ने फरमाया- जो तुम अपने लिए चाहते हो वह दूसरों के लिए   चाहो । जो अपने लिए नहीं चाहते वो दूसरों के लिए भी मत चाहो । यही बात जीसस ने भी कही है । हम गहराई से सोचें क्या हम ऐसा ही करते हैं । एक पिता अपने लिए एवं अपने बेटे के लिए कुछ चाहता है । हम नहीं चाहते कि हमारी कोई निन्दा करे । परन्तु हम निन्दा करने से कभी पीछे नहीं हटते । अगर यह बात जीवन में आ जाए तो जीवन स्वर्ग बन   जाए । 

चर्चा चल रही थी बाल संस्कार की । एक माता बच्चे को जन्म देती है उसकी साधना बहुत गहरी होती  है । शास्त्रों में गर्भ संस्कार जन्म संस्कार, शिक्षा संस्कार इस तरह नौ प्रकार के संस्कार बताएं हैं । आज हम गर्भ संस्कार की चर्चा करेंगे । प्रत्येक स्त्री के गर्भ में महान् आत्मा का अवतरण हो सकता है । उसके लिए विशेष तैयारी की आवश्यकता है । जिस प्रकार केसर को तैयार करना हो तो विशेष क्यारी की आवश्यकता होती है । महान् आत्मा के अवतरण के लिए धार्मिकता की आवश्यकता है । भगवान महावीर या तीर्थंकर भगवान जब गर्भ में आते हैं तो माता को चैदह स्वप्न आते हैं । जम्बू स्वामी जब मां के गर्भ में आए तो मां को स्वप्न आया कि एक हरा भरा जम्बू का वृक्ष उसके भीतर प्रवेश कर रहा है ।  जीव जैसा होगा वैसा ही स्वप्न आएगा । जब माता त्रिशला ने चैदह स्वप्न देखे तो वह हर्षित हुई । उठकर सिद्धार्थ राजा के पास गई और उन्हें स्वप्न सुनाएं । तुम्हें अच्छा स्वप्न आए तो उठकर धर्माचरण करना । स्वप्न उसे सुनाना जो उसका जानकार हो । ऐसा कोई गुरू जिस पर आपकी श्रद्धा, आस्था हो या फिर भगवान की प्रतिमा के समक्ष या गाय के कान में । गाय सरल जीव है इसलिए उसको जो सुनाओगे वह सरलता से पूर्ण होगा । 

जैसा स्वप्न होगा वैसे ही बच्चे के संस्कार होंगे । गर्भ में जब एक बच्चा आए तो गर्भ से लेकर दूध पीते बच्चे तक माता पिता को शील का पालन करना चाहिए । भारत की संस्कृति रही है कि राजा और रानी अलग-2 कक्ष में शयन करते थे । माता को गर्भ में आए बच्चे के लिए मंगल कामना करनी चाहिए । उसे महापुरूषों का चित्र देखना चाहिए । मां जैसा कार्य करेगी वैसा प्रभाव बच्चे पर होगा । हमारे घरों में आज महापुरूषों के चित्र ना रहकर पशु पक्षियों के तरह-2 के फिल्म अभिनेताओं के चित्र आ गए । माता अगर महापुरूषों के गुणों को याद करेगी तो वही गुण बच्चे के भीतर प्रस्थापित होंगे । मां झगड़ा करेगी, रोयेगी, चिल्लाएगी तो बच्चा भी वैसा ही होगा । 

तीन बातें गर्भ संस्कार के लिए आवश्यक है । माता इन तीन बातों पर अमल करे तो बच्चा अवश्य ही धार्मिक होगा, अच्छे संस्कारवान होगा । पहली बात माता प्रतिदिन आधे घण्टे तक महापुरूष के चित्र का त्राटक करते हुए ध्यान करे । दूसरी बात माता लोगस्स का पाठ या भक्ताम्बर का जाप या भगवान की स्तुति प्रतिदिन करती रहे इससे भीतर तरंगों का प्रवेश होगा जिससे जीन्स बदलते चले जाएंगे । लोगस्स का पाठ दर्शन शुद्धि देता है उससे सम्यक्त्व विशुद्धि होती है इसलिए गर्भवती मां को आवश्यक है कि वह प्रतिदिन 27 बार लोगस्स का पाठ करे । तीसरी बात गर्भवती माताएं तनाव मुक्त जीवन जीएं । आजकल माताएं तनाव में होती हैं । उन्होंने काम करना छोड़ दिया है ऐसी स्थिति में तनाव उन्हें अवश्य जकड़ लेता है । उन्हें चाहिए कि शान्ति एवं समृद्धि में रहते हुए धर्म को भीतर उतारें । जितना आसानी से हो सके उतना कार्य करें । तनाव मुक्त जीवन से बच्चा भी तनाव मुक्त होगा । 

 

जीवन में धर्म आना जरूरी है 

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

19 जुलाई, 2006: जम्मू: विश्व शान्ति और सर्वधर्म महासंघ के मुख्य संरक्षक श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने आज जम्मू काश्मीर राज्य के साथ-साथ विश्व शान्ति की मंगल कामना करते हुए अपने प्रवचन में फरमाया कि-  प्रभु महावीर की परम् कल्याणकारीवाणी कहते हैं कि संसार कैसा  है ? यह संसार अध्रुव अशाश्वत दुःखों से भरा हुआ है । हमें ऐसा कौनसा कर्म करना है जिससे हम संसार में भ्रमण ना करें । इस संसार में जन्म, दुःख, बुढ़ापा का दुःख है मरण का दुःख है रोगों का दुःख है । फिर मानव विषयों से विरक्त क्यों नहीं होता ? धर्म जीवन में आ गया तो सब कुछ आ गया । धर्म रत्ती भर भी दुःख नहीं देता धर्म से प्रतिपल प्रतिक्षण जागरूकता आती है ।

मानव धन कमाता है । उसका सारा ध्यान शरीर पर होता है । आज हमारा व्यवहार गलत हो गया है । लोग अनेकों पैसे खर्च करते हैं और रात को शादियां करवाते हैं । शादी में खाने के लिए अनेक प्रकार की आईटमें दी जाती हैं । चार घण्टे के कार्यक्रम में कितना दिखावा होता है क्या आपने सोचा इसमें कितनी जीव हिंसा होती  है । व्यक्ति दिन में भी शादी करवा सकता है । अनेक प्रकार की चीजों की जगह कुछ चीजें नियमित संख्या में दी जा सकती है । हम शादियों में जाते है और विरोधाभाष की चीजें खाते हैं जिससे हमें रोगोत्पत्ति होती है । यह देह एक मन्दिर है जिसमें हम कूड़ा करकट डाले जा रहे हैं । तुम अपनी इच्छा के अनुसार कुछ नहीं करते अर्थात् जैसा देखते हो वैसा करते हो । विज्ञापन के आधार पर तुम्हारा जीवन चलता है । विज्ञापन कोका कोला का आया तो पीने का मन करता है । क्या कभी सोचा उसके अन्दर कितने घातक तत्व है । 

प्रकृति ने हमें सब कुछ दिया है । प्रकृति के कण-कण में सभी तरह के स्वाद समाये हुए हैं फिर भी हम चीजों को स्वादिष्ट बनाने के लिए घी, नमक, मिर्च मसालों का प्रयोग करते हैं । यह करना उचित नहीं है । तुम्हारे शरीर का ढ़ांचा पैंतीस साल तक बनता है उस समय जो खाओगे पच जाएगा । खाने के बाद पेय पदार्थ पीने की आवश्यकता नहीं । छाछ पीओ जिससे सारा खाना पच जाएगा । हमारा धर्म कितना वैज्ञानिक है । तुम इस मानव जीवन का लाभ उठा लेना । जो गलत संस्कार है वे दूर कर देना । क्लबों में जाना, मांसाहारी चीजों का उपयोग करना आवश्यक नहीं है । हम इससे बाहर निकलें और सात्विक जीवन जीएं ।

आचार्यश्री ने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने बेटे-बेटियों की शादी दिन में करवानी चाहिए । शादियों में अधिक आडम्बर ना हो अधिक जीव हिंसा न हो ऐसा काम न करें । उपासक दशांक सूत्र में श्रावकों का वर्णन आता है कितने धर्मवान थे वे । आप अपने बेटे के शादी उससे करवाना जो धर्मवान, शीलवान हो । मेरा आपसे नम्र अनुरोध है इससे तुम एक आदर्श बनोगे तुम्हारा नाम होगा । 

सिक्खों में शादी दिन में होती है और रविवार को होती है । उनमें कोई मुहूर्त नहीं देखा जाता । हम भी इस प्रकार का प्रयास करें । श्रीसंघ विशिष्ट संगठन इसके लिए एक प्रस्ताव पारित करे जिसमें सादगीपूर्वक शादी एवं सात्विक भोजन और धर्माचरण को महत्व दिया जाए । आज अनेकों लड़कियां ऐसी हैं जो गरीब हैं उनकी शादी नहीं हो पाती क्योंकि वे इतना आडम्बर नहीं कर सकते हम उनको सहयोग दें, यही हार्दिक मंगल भावना । 

 

बाल संस्कार से बच्चे का भविष्य उज्ज्वल होता है 

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

20 जुलाई, 2006: जम्मू: विश्व शान्ति और सर्वधर्म महासंघ के मुख्य संरक्षक श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने आज जम्मू काश्मीर राज्य के साथ-साथ विश्व शान्ति की मंगल कामना करते हुए अपने प्रवचन में फरमाया कि- अरिहंत प्रभु को नमन । नमन इसलिए कि उन्होंने त्रिलोक में ज्ञान प्रकाश किया । लोगस्स का पाठ बहुत महत्वपूर्ण है । सूरज तो एक ही क्षेत्र को प्रकाशित करता है परन्तु तीर्थंकर भगवान सम्पूर्ण लोक को प्रकाशित करते हैं । तीर्थंकर धर्म तीर्थ की स्थापना करते हैं । तीर्थ चार प्रकार के हैं साधु साध्वी श्रावक श्राविका । ऐसे अरिहंतों का मैं कीर्तन  करूंगा । कीर्तन कुछ अलग नहीं । उसमें भक्ति, प्रार्थना, नमन सब आ गया । अपने बच्चों को तीर्थंकरों के बारे में समझाओ । उनके गुणों को बताओ । तीर्थंकर प्रभु चन्द्रमा से अधिक निर्मल, सूर्य से अधिक प्रकाशमान और सागर से अधिक गम्भीर हैं । प्रभु मुझे सिद्धगति का शरणा देना ऐसी भावना रखना । परमात्मा कितना करूणावान है । तुम बच्चों को जैसा बताओगे वैसा ही बच्चों पर असर होगा । 

धर्म का शरणा रखना । भोजन अपने बच्चों के साथ करो तो और अधिक प्रसन्नता मिलेगी । भारत की संस्कृति में मां को प्रथम गुरू के रूप में नवाजा गया है । यह केवल भारत की संस्कृति में ही नहीं अपितु पूरे विश्व में प्रथम गुरू है । सभी बच्चे जन्म के वक्त रोते हैं । हंसते क्यों नहीं ? यह एक मूलभूत प्रश्न है । फ्रांस में प्रयोग हुआ । बच्चा जन्मते वक्त हंसे कैसे ? बच्चा मां के साथ जुड़ा हुआ होता है । बच्चा नाभि से जुड़ा है । नाभि केन्द्र बहुत महत्वपूर्ण है । नाभि केन्द्र आपके नर्वस सिस्टम का सेन्ट्रल है । कभी भूख नहीं लगती । कभी नींद नहंी आती ऐसी स्थिति में नाभि केन्द्र पर ध्यान करें । फ्रान्स में जब बच्चे का जन्म होता है तो उसे माँ के पेट से लिपटाया जाता है और थोड़े अन्तराल के बाद नाभि से अलग किया जाता है । जब उसे मां के पेट से लिपटाते हैं तो वह हंसता है फिर जितना गर्भ का टेम्परेचर होता है उतने टेम्परेचर के पानी में उसे लैटाया जाता है जिससे वह हर्षित होता है । बच्चे को जन्म के बाद पेट के बल लेटाओ तो वह धीरे-धीरे चलना जल्दी सीख जाता है । औरंगाबाद में एक प्रतिष्ठित व्यापारी की बेटी के बच्चे के साथ यह प्रयोग हुआ तो वह बच्चा कुछ ही मिनिटों में 6 ईंच आगे तक चल गया । 

छोटे बच्चों की आंखे कमजोर क्यों होती हैं ? आप सभी कहते हैं कि टी0वी0 देखने से आंखे कमजोर हो जाती हैं परन्तु ऐसा नहीं है । यह भी कारण हो सकता है पर इसके साथ एक कारण और है जब बच्चे का जन्म होता है तब वहां पर अंधेरा ना होकर बड़े-2 वाॅल्ट के टूयब लाईट बल्ब जलाये जाते हैं जिससे बच्चे की आंखों पर असर पड़ता है । घर में जब बच्चों का जन्म होता था तो 41 दिनों तक बच्चे को अंधेरे कमरे में रखा जाता था । जन्म भी अंधेरे कमरे में होता था और उस कमरे में एक घी का दीया जलाया जाता था । घी का एक अलग महत्व है उसकी सुगंध हमें उल्लासित करती है । बच्चा जब 41 दिन उस घी के दीये के प्रकाश में रहता है तो उसकी आंखे पक जाती हैं फिर उसे घर के बाहर जाने में कोई कठिनाई नहीं आती । 

भारतीय संस्कृति में एक और परम्परा रही है । बच्चे के जन्म के बाद एक वृक्ष की कोमल डाली से अथवा चांदी की बारीक शलाका से बच्चे की जिह्वा पर ऊँकार लिखा जाता था जिससे उसके शरीर में ऊर्जा का संचार होता था और वह ज्ञान प्राप्त करने में और एक्टिविटी में अग्रसर होता था वह ऊँकार केसर से लिखा जाता था । छोटे बच्चों को धर्म की शिक्षा दो । गुरू और अरिहंत का महत्ब बताओ । जब बच्चा सोता है तो उसे लोगस्स का पाठ, भक्ताम्बर का पाठ या अरिहंत स्तुति सुनाओ जिससे उस स्तुति की तरंगे उसके भीतर प्रवेश कर उसके भीतर ऊर्जा का संचार करेगी । बच्चे को आदर से बुलाओ उसकी हर बात का जवाब प्यार से दो बच्चे बहुत संसेटिव होते हैं तुम एक गुणा मुस्कुराओगे तो वे दस गुना मुस्कराओगे । बच्चे को संस्कारवान बनाने में माता का तो कर्तव्य है साथ ही परिवारजनों का भी बहुत बड़ा कर्तव्य है । आप जैसी भाषा बोलते हो बच्चा वैसी ही भाषा बोलता है इसलिए हम अपने भीतर थोड़ी कोमलता रखें, आदरास्पद भाषा का प्रयोग करें । बच्चे का पूरा ध्यान रखने से उसका भविष्य उज्ज्वल हो सकता है ।

 

नमन ममकार तो तोड़ता है 

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

21 जुलाई, 2006: जम्मू: विश्व शान्ति और सर्वधर्म महासंघ के मुख्य संरक्षक श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने आज जम्मू काश्मीर राज्य के साथ-साथ विश्व शान्ति की मंगल कामना करते हुए फरमाया कि- प्रभु महावीर को नमन । वीतराग आत्मा को नमन । जैन धर्म मे ंनमन सर्वोपरि है । नमन सिखाता है झुकना । झुकना हाथ पांव से नहीं पूरे शरीर, हृदय, दिल से झुकना है । नमन में सब कुछ समाया हुआ है । अरिहंत को नमन करते हैं तो उनकी याद आती है । प्रभु सिमंधर स्वामी की याद आती है जो वर्तमान में महाविदेह क्षेत्र में विराजमान हैं । प्रभु का शरीर स्वर्णमय कान्ती से युक्त   है । उनके शरीर की ऊंचाई पांच सौ धनुष है । अपने दोनों हाथों को फैला दो तो दोनों हाथों के बीच की दूरी एक धनुष कहलाती है । प्रभु जहां विराजमान हैं उस अशोक वृक्ष को नमन । प्रभु के समवसरण में विराजमान, पशु पक्षी, देवी देवता, मानव, साधु साध्वी सबको नमन । प्रभु का तीर्थं कल्पवृक्ष के समान है । उनकी भक्ति करते हुए आप भावित हो जाओ । 

हम नमन तो करते हैं पर झुकते नहीं । आपका अहंकार, ममकार बीच में आता है । ममकार यानि यह   मेरा है । सारे संबंध मिथ्या हैं । इस शरीर को कितना खिलाओ फिर भी यह साथ नहीं देता । फिर भी हम इस शरीर के पीछे लगे हुए हैं । ममकार से अभिप्राय यह है कि सब कुछ मेरा है । जब पंछी उड़ जाएगा, पिंजरा टूट जाएगा तो कुछ भी नहीं रहने वाला । नमन ममकार का तोड़ता है । अहंकार से क्रोध, दुव्र्यसन, कषाय भीतर आते हैं । तुम एक नवकार मंत्र पढ़ो । नमन कहते-2 तुम्हे ंप्रभु की याद आ जाए । उनके समवसरण की याद आए । प्रभु के समवसरण में हर समय कम से कम एक करोड़ देव उपस्थित रहते हैं । अरिहंत प्रभु जब चलते हैं तो देवगण उनके मार्ग में कमल के फूलों की रचना करते हैं । उनकी श्वांस अति सुन्दर है । उनका आहार, निहार दृष्टिगोचर नहीं होता । उन्हें पसीना नहीं आता । वे सम्यक् दर्शन, ज्ञान, चारित्र से सम्पन्न व्यक्तित्व के धनी हैं । हम खाने की एक चीज को स्मरण करते हैं तो उसका स्वाद मुंह पर आ जाता है । भगवान को याद करते हैं क्या उनके गुण कभी भीतर आते हैं । हमारे भीतर उनके प्रति एक भाव, समर्पण आए । वंदन कीर्तन नमन हो जाए । 

नमन कहते ही मन, वचन, काया से अलग हो जाओ । लोगस्स का पाठ नमन का पाठ है । सिद्ध स्तुति अरिहंत स्तुति समायी हुई है । एक सामायिक में एक लोगस्स का पाठ ही पढ़ो । एक नवक्कार मंत्र पढ़ो । एक नमोत्थुणं पढ़ो और उनके गुणों में डूब जाओ । पूरा नम्मोत्थुणं अरिहंतों के गुणों से भरा हुआ है । उनके एक-एक शब्द में गहरा भाव छिपा हुआ है । अरिहंत की भक्ति, सिद्ध का स्मरण, साधु का संग बहुत महत्वपूर्ण है । अरिहंत प्रभु जिन भगवान जिन्होंने सारे भयों को जीत लिया । भक्ति में अपार भक्ति है । भक्ति तब होती है जब शरीर, मन, वचन एक हो जाते हैं । आपके भीतर जो अहंकार है वो डुबोता है । चैरासी के चक्कर में लाता है । भक्ति में ऐसे डूबो कि कुछ पता ही नहीं चले । भीतर का अहंकार समूल नष्ट हो जाए । 

 

हम स्वयं को अन्तरात्मा की ओर ले आएं 

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

22 जुलाई, 2006: जम्मू: विश्व शान्ति और सर्वधर्म महासंघ के मुख्य संरक्षक श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने आज जम्मू काश्मीर राज्य के साथ-साथ विश्व शान्ति की मंगल कामना करते हुए फरमाया कि- अरिहंत प्रभु की वाणी आत्म सूत्र में प्रभु ने फरमाया कि आत्मा तीन प्रकार की होती है । बर्हिरात्मा, अन्तर्रात्मा और परमात्मा । परमात्मा के दो भेद हैं अरिहंत और सिद्ध । जिनेश्वर भगवान का कथन है मन, वचन को छोड़कर अन्तर्रात्मा का ध्यान करना चाहिए । जीवात्मा दो स्थिति में रहती है बर्हिआत्मा के साथ या फिर परमात्मा के साथ । बर्हिआत्मा बाहर के जगत का रस लेने की ओर अग्रसर रहती है । पांच इन्द्रियां और छठें मन के द्वारा वह संसार की ओर गमन करती है यह चक्र निरन्तर चलता रहता है । कभी ध्वनि सुनना अच्छा लगता है, कभी सुगंध लेना अच्छा लगता है कभी रस और स्पर्श की ओर आकर्षित होते हैं हम । इसके विपरीत मन, वचन, काया को भीतर की ओर ले जाओ । धर्म साधना द्वारा उसी दिशा की ओर हम आप सबको ले जा रहे हैं । आपका कण-कण भीतर की ओर अनुगमन करें । 

निरन्तर जिस प्रकार का ध्यान करोगे चारों ओर वही आभामण्डल बनेगा । जैसे किसी पहाड़ी पर आवाज देने पर वही आवाज हमें वापिस मिलती है उसी प्रकार हम जो ध्यान में उच्चारण करते हैं वहीं उच्चारण हमारा वलय बन जाता है । हम बाहर के आकर्षण को छोड़ें और अन्तर में प्रवेश करें । अन्तर में प्रवेश करते-2 परमात्म मिलन होगा इसके लिए निरन्तरता आवश्यक है । आप अन्तर्रात्मा में आरोहण कर परमात्मा का ध्यान करते हुए अरिहंत, सिद्ध और हमारी शुद्धात्मा की ओर अग्रसर हो सकते हो । यह संसार स्थिर नहीं है । सब कुछ प्रतिपल प्रतिक्षण बदल रहा है परन्तु परमात्मा का ध्यान आपको स्थिरता की ओर ले जाएगा । इसमें रूचि बढ़ती जाएगी तो आन्तरिक सुख बढ़ता जाएगा । जो आपको सुखी और आनंदित करें वही शिक्षा है । अंधेरी रात में एक जुगनु भी बहुत काम देता है । ऊंचाई पर पहुंचना कठिन है पर उससे कठिन है वहां बने रहना । जीवन में जितना उंचा उठना है उसका आधार उतना ही मजबूत चाहिए और जीवन का आधार है बचपन । 

बचपन जहां आप मां की गोद में खेले, पिता की अंगुली पकड़कर चले । सहपाठियों के साथ सारा दिन बिताया वह था बचपन । आप अपने बच्चों को जैसी शिक्षा दोगे बच्चे वैसा ही करेंगे । आप बच्चों को कहते हो पर असर नहीं होता तब आप स्वयं उस बात का अनुगमन करो । बच्चे स्वयं वैसा करने लग जाएंगे । बच्चे को आप सब कुछ सिखाते हो पर ऐसा नहीं सिखाते कि हम क्रोध पर नियंत्रण करें, निन्दा से कैसे बचें यह सिखाने के लिए महापुरूषों के जीवन चरित्र सुनाएं । यह जीवन क्षण भंगुर है ऐसा हरपल अनुभव करो । बचपन, जवानी, बुढ़ापा, दुःख, संकट सबके जीवन में आते हैं । दुःख में कैसे मुस्कुराना इसकी शिक्षा अपने बच्चों को दो । दुनियंा के समस्त सुख और तीनों लोगों का राज्य एक तरफ है और आत्मा का सुख एक तरफ है हमें आत्मिक सुख की ओर धीरे-2 पुरूषार्थ करना है और एक दिन उस सुख में डूब जाना है ।

 

भ्रूण हत्या महापाप है 

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

23 जुलाई, 2006: जम्मू: विश्व शान्ति और सर्वधर्म महासंघ के मुख्य संरक्षक श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने भ्रूण हत्या पर रोक लगाने हेतु अपना प्रेरक प्रवचन देते हुए कहा कि भ्रूण हत्या जघन्य है । गर्भ में आए किसी भी जीव को मारना जघन्य अपराध है । उसमें भी वही परमात्मा विराजमान है चाहे लड़की हो या लड़का । हम गर्भ में आए हुए किसी भी जीव की हत्या नहीं करेंगे । यह दृढ़ संकल्प बैठे हजारों लोगों को करवाया और कहा कि पूरे देश भर में सभी धर्म गुरू एक साथ मिलकर यह मुहिम चलाएं कि भ्रूण हत्या न करेंगे न करवाएंगे तथा साथ ही विवाह शादियों में सादगी लाने हेतु पूरे समाज को आह्वान किया और इससे प्रभावित होकर समाज ने एक मीटिंग लेकर निर्णय लिया कि हम विवाह में भोजन के अन्तर्गत 21 आईटम से ज्यादा नहीं बनाएंगे और साथ में यह भी प्रेरणा दी कि जहां तक हो सकेगा दिन में शादियां करवाने का प्रयास रहेगा और इसमें जो भी पहल करेगा उसको सम्मानित किया जाएगा । तथा साथ ही शादी में फूलों के प्रदर्शन पर रोक लगाने के लिए आचार्यश्री ने प्रेरणा दी और कहा कि आवश्यक हो तो आर्टीफिशल फूल लगाएं एवं फूलों में होने वाली हिंसा से अपने आपको बचाएं । 

आचार्यश्रीजी ने आज की शिक्षा पर अपना विशेष प्रवचन देते हुए कहा कि आज की शिक्षा पंगु है । वह विद्यार्थियों को तनाव दे रही है सिर्फ लेफ्ट ब्रेन को विकसित कर रही है । आज पूरे देश में चाहे वह राजनेता है, चाहे वह शिक्षक है, चाहे वह बड़ा अफसर है सभी के मन में तनाव है इसका मूल कारण है कि वर्तमान की जो शिक्षा प्रणाली है उसने जीवन में आंनंद, सुख, शांति नहीं दी । आज की शिक्षा केवल रोटी, कपड़ा, मकान को कैसे प्राप्त करना इतना ही सिखा रही है । इस शिक्षा पर अंग्रेजों का प्रभाव है । उन्होंने क्लर्क और नौकरीपेशा लोग तैयार करने के लिए सिर्फ बुद्धि का विकास करने की पद्धति सिखाई लेकिन भारत की पुरातन शिक्षा पद्धति बहुत समृद्ध है । इस शिक्षा पद्धति में हमारे राईट ब्रेन को विकसित करने के लिए भक्ति, संगीत, ध्यान, मौन का भी प्रशिक्षण देना चाहिए जिससे व्यक्ति का हृदय विकसित होता है । उसके जीवन में आनंद, प्रेम, शांति, सुख समृद्धि की प्राप्ति होती है । जय कृष्ण मूर्ति के अनुसार यह जीवन ताश के पत्ते के जैसा है । हमें नहीं पता कि ताश के खेल में कौनसे पत्ते मिलेंगे साथ में कौन खिलाड़ी मिलेंगे । लेकिन अच्छा खिलाड़ी बाजी को जीत लेता है उसी प्रकार जीवन जीने की कला सीखने वाला व्यक्ति चाहे कैसे भी साथी मिले, चाहे कैसा भी भाग्य मिले फिर भी वह अपने जीवन की बाजी जीत लेता है । प्रभु महावीर, बुद्ध, राम, कृष्ण, नानक, शास्त्री गांधी आदि को भी यही समाज, यही जीवन मिला लेकिन उनहोंने धर्म के माध्यम से अपने जीवन को महाजीवन बना दिया, उन्होंने कोई शिकायत नहीं की । 

आचार्यश्रीजी ने आत्म: ध्यान साधना शिविरों के अनुभव सुनाने वाले साधकों को विशेष आशीर्वाद प्रदान किया । आज के अवसर पर डिफेन्स के सेक्रेटरी श्री रमणदीपसिंह एवं डिवीजनल कमीशन श्री प्रमोद जैन आचार्यश्रीजी के दर्शनार्थ पहुंचे । उन्होंने सत्संग का लाभ लिया । उनका सत्कार जैन सभा की ओर से किया   गया । आत्म: ध्यान साधना शिविर के साधकों में श्री अशोक जैन, गुणीन्द्र जैन रिद्धिमा जैन, श्री श्रेयांस जैन ने अपने-अपने अनुभव सुनाएं और कहा कि जैसे गाड़ी खराब होने पर हम सर्विस में भेजते हैं वैसे ही जीवन की गाड़ी को अच्छी तरह चलाना है तो हमें ध्यान साधना से गुजरना होगा । श्री गुणीन्द्र जैन ने कहा कि हम पच्चीस सालों से जीवन में योग का अभ्यास कर रहे थे लेकिन सिर्फ आसनों का एक्सरसाईज करते जा रहे थे पहली बार हमने आसन से उपर ध्यान के द्वारा आत्म शुद्धि की प्रक्रिसा सीखी । श्री श्रेयांस जैन ने अपने विचार रखते हुए कहा कि आचार्यश्रीजी ने ध्यान पर विशेष जोर देकर हमें अपने लक्ष्य को तय कर दिया । हमे ंनव जीवन दिया और सम्यक् ज्ञान दर्शन चारित्र की साधना को दर्पणवत् अनुभव करवा दिया । हमारा घर सिद्धालय है यह बात हमारे भीतर इतनी पक्की बैठ गई कि हमें 24 घण्टे हमारा लक्ष्य याद रह रहा है । आचार्यश्रीजी ने वास्तव में गुरू होने का दायित्व निभाया है और पूरे समाज को उन्होंने प्रेरणा दी कि सभी इस साधना शिविर को करके लाभ उठाएं । डिफेन्स सेकेट्री श्री रमणदीपसिंह ने कहा कि भगवान महावीर योद्धाओं के योद्धा थे । उन्होंने कोई शस्त्र नहीं उठाया किन्तु उन्होंने अपने आपको जीता इसीलिए उनको हमने महावीर कहा । उन्होंने जैन समाज के प्रति अपनी कृतज्ञता ज्ञापित की और यह सारा श्रेय डिविजनल कमीश्नर श्री प्रमोद जैन को दिया । आगामी आत्म: ध्यान कोर्स ‘बेसिक’ दि0 2 से 6 अगस्त, 2006 को विशेष रूप से आयोजित किया जा रहा है । आज एडवांस-ा कोर्स का समापन हुआ और कल प्रातःकाल से आत्म: समाधि कोर्स की शुरूआत हो रही है । आज के दिवस पर बाल संस्कार दिवस के रूप में जैन युवक संघ के द्वारा मनाया गया और बालकों को पारितोषिक भी प्रदान किया गया । 

 

अहंकार वातावरण को दूषित करता है 

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

24 जुलाई, 2006: जम्मू: विश्व शान्ति और सर्वधर्म महासंघ के मुख्य संरक्षक श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि:- अहंकार सारे वातावरण को दूषित करता   है । क्षमा के द्वारा वातावरण में प्रेम भर जाता है । खोटा तोल खोटा माप करने से मनुष्य से व्यक्ति जानवर बन जाता है । अतः पाप से डरो । दुकान में भी धर्म को साथ  रखो । किसी को धोखा मत दो । किसी को देना है तो मधुर मुस्कान दो । आलोचना, प्रतिक्रमण, पूजा, भक्ति, सामायिक, प्रार्थना आदि अनुष्ठान से पहले हृदय को खाली कर लो । हमने अपने हृदय में क्या संचित करके रखा है क्रोध, अहंकार, निन्दा, चिन्ताएं इनको हम इकट्ठा करके ऊपर से हम अहंकार करते हैं और जिसे हम सम्पत्ति मानकर साथ लेकर चल रहे हैं वह सम्पत्ति नहीं विपत्ति है । वह हमारे जीवन में आधि, व्याधि, उपाधि लाने वाली है । साधना में प्रवेश करने के पहले तैयारी करो । सीधा सामायिक के पाठ पढ़ने मात्र से चित्त समाधि में नहीं आता इसके लिए पहले भक्ति करो और भक्ति में अरिहंत प्रभु के चरणों में, अपने इष्ट के चरणों में सब कुछ समर्पित कर दो । प्रभु को इन विनाशी वस्तुओं की कोई आवश्यकता नहीं है । प्रभु के चरणों में विनम्र हो जाओ और स्वीकार करो कि मैं क्षमा के योग्य भी नहीं हूं, मैंने इतने कर्म किए हैं मैं अज्ञानी हूं फिर भी मेरी अरदास है कि आप मुझे अपने चरणों में स्थान दें, ऐसे पवित्र भाव से नमन करो । इसमें समय की कोई सीमा नहीं । चाहे कितना समय लग जाए । आपका हृदय पसीज   जाए । भीतर से आंसू आ जाए । भक्ति में गद्गद हो जाओ । सब कुछ छोड़ देंगे तो आप खाली हो जाएंगे । आपके ध्यान के लिए भूमिका तैयार हो जाएगी और आप ध्यान में प्रवेश करने के योग्य बन  जाएंगे । कोई भी अनुष्ठान करो उसका अहंकार मत करो क्योंकि जिससे तुम कर रहे हो, मन, बुद्धि, जिह्वा ये सब शरीर के हैं और शरीर यहां पर छूट जाएगा फिर तुम क्यों दावा करते हो कि मैने यह किया, मैंने वो किया ? बहुत अच्छे संत दादू हुए हैं उन्होंने कहा- 

दादू दावा दूर कर, बिन दावे दिन काट ।

कहते सौदा कर गये, पंसारी की हाट ।।

अर्थात् हम अहंकार न करें । किसी बात का दावा न करें । यह संसार पंसारी की दुकान के समान है । अनेक सौदागर आते हैं और चले जाते हैं । अगर तुम विद्वान भी हो तो उसका दावा छोड़ दो । अगर तुम संगीतकार, ज्ञानी, योगी हो तो उसका भी दावा छोड़ दो । समर्पण में आ जाओ । इसी प्रकार संत कबीर ने भी कहा-

                        खड़ा कबीरा चैंक में, लिए लुटकिया हाथ ।

जो घर फूंके आपणा, चले हमारे साथ ।।

यहां घर फूकने का अर्थ कबीर कहते हैं अपनी ममत्व का त्याग करके तुम हमारे साथ चलो । घर बिल्डिंग में नहीं है ममत्व में है । गृहस्थ धर्म में रहते हुए हर कार्य करते हुए नमन और कृतज्ञता का भाव रखो । जो कुछ तुम्हें मिला है वह प्रसाद रूप में है । हम अपनी बुद्धि से अपनी अहंकार से कुछ भी नहीं कर सकते । प्रकृति का अनुग्रह मानें । सूर्य, चन्द्रमा, हवा, प्रकृति की जो देन है उसे हम पैसे से नहीं बना सकते । अतः कृतज्ञता में जीवन जीओ और कृतज्ञता में जीवन जीते हुए भेद-विज्ञान की साधना करो । वीतराग-मार्ग भेद-विज्ञान की साधना बतायी है । भेद-विज्ञान अर्थात् शरीर अलग है और आत्मा अलग   है । शरीर के किसी भी कर्म को अपना कर्म मत मानो । जो यहां पर छूटने वाला है वो आपका नहीं है । जो हमेशा साथ रहने वाला है वह आप हो और आप शुद्ध आत्मा हो । सृष्टि के कण-कण में वही शुद्धात्मा विराजमान है । हर जीव में शुद्धात्मा के दर्शन करो और शरीर के कार्यों पर अहंकार मत करो । सब समर्पित करते चले जाओ । शरीर का अपना धर्म है । आत्मा का अपना धर्म है, यही वीतराग मार्ग है । आज यहां पर आत्म: समाधि कोर्स की शुरूआत हुई जिसमें साधकों ने आचार्यश्रीजी से समाधि हेतु मंत्र प्राप्त किया । यह शिविर तीन दिन चलेगा प्रतिदिन 5.15 से 7.15 । आगामी आत्म: ध्यान साधना शिविर एडवांस-ाा चार दिवसीय आवास एवं निवास के साथ दिनांक 27 से 30 जुलाई, 2006 से शुरू हो रहा है जिसमें देश भर से विशेष साधक आत्म ध्यान हेतु पहुंच रहे हैं । अनेक भाई बहिनों ने तपस्या का संकल्प किया और प्रतिदिन विश्व शान्ति हेतु महामंत्र का जाप घर-घर में चल रहा है और धर्म एवं शान्ति की तरंगे पूरे प्रदेश में फैल रही है । सभी श्रद्धालु श्री नेकचंद मैमोरियल हाॅल, रानी पार्क में सत्संग हेतु सादर आमंत्रित है । प्रतिदिन सत्संग प्रातः 7.45 से 9.15 बजे तक हो रहा है । 

 

पानी बचाओ और शाकाहारी बनो 

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

25 जुलाई, 2006: जम्मू: विश्व शान्ति और सर्वधर्म महासंघ के मुख्य संरक्षक श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में विवेक की शिक्षा देते हुए कहा कि पानी को बचाओ । व्यर्थ में पानी को मत बहने दो । अगर पानी का हमने विवेक से उपयेाग नहीं किया तो आने वाले समय में पानी के लिए झगड़े होंगे । पूर्व में भी पानी के लिए झगड़े होते थे अतः पानी को कम से कर्म खर्च करो । जहां एक ग्लास पानी से काम चल सकता है वहां एक बाल्टी मत खराब  करो । जहां एक बाल्टी पानी से काम चल सकता हो वहां सैकड़ों लीटर पानी मत खर्च करो । आचार्यश्री ने कहा कि विदेशी संस्कृति के बहाव में हम अपनी मूल संस्कृति को न खोयें । आज पाश्चात्य संस्कृति की होड में हम अपने मूल संस्कारों को भूलते जा रहे हैं । 

आचार्यश्री ने कहा कि मैं दीक्षा से पूर्व विदेश गया तो वहां पर एक अमेरिकन फैमिली के आठ साल के बच्चे ने मुझसे पूछा कि मिस्टर जैन अगर आप जंगल में अकेले हो, खाने को कुछ भी नहीं है मीट के अलावा तो आप मरना पसन्द करोगे या मीट खओगे तब आचार्यश्री ने कहा कि मैं मर जाऊँगा पर मीट नहीं खाऊंगा । वह परिवार बहुत प्रभावित हुआ और जब तक विदेश रहे पूरे शाकाहारी खाने की व्यवस्था की । उन्होंने कहा कि मैं अमेरिका भी गया तो सामायिक, अनुष्ठान करता था । अतः नियमित अनुष्ठान एवं मूल संस्कृति को सुरक्षित रखना चािहए । लोग क्या कहेंगे इस चक्कर में हमने अपनी मूल संस्कृति को नहीं खोना चाहिए । आचार्यश्री ने कहा जिन्होंने साधना सीखी है वे समय आते पर भोजन छोड़ दंे किन्तु साधना नहीं छोड़ें । बच्चों को संस्कार दो वे अरिहंत प्रभु की भक्ति करें । रोम-रेाम से भक्ति करें निश्चित रूप से वे मुक्ति की ओर बढ़ेगे । 

धर्म का मूल विनय है और मोक्ष उसका अन्तिम फल है । सभी तीर्थंकरों ने विनय को प्रमुखता  दी । अहंकार का त्याग और पूर्ण समर्पण का भाव । जब भी आप तप, साधना, भक्ति, अनुष्ठान करो उसे अपने इष्ट के चरणों में समर्पित कर दो तो अहंकार नहीं आएगा और हमेशा कृतज्ञता के भाव रहेंगे । प्रभु हमें आज का दिवस मिला, यह श्वासें मिली, यह जीवन मिला, इसका प्रयोग मैं सेवा, भक्ति और आत्म-निरीक्षण में लगा सकूं । चाहे तुम तप करो, चाहे दान करो । अगर विनय है तो मोक्ष निश्चित है । भगवान महावीर के पास गौतम भी थे और गौशालक भी थे । गौतम विनय के द्वारा मोक्ष को प्राप्त कर लिए और गौशालक अविनीत हो गए और इसके कारण वे अनंतकाल तक भटके । अन्तिम समय में उन्होंने अपनी गलती को स्वीकार किया, आलोचना की । अपने लाखों शिष्यों के सामने कहा कि महावीर तीर्थंकर हैं और मैं गलत था, अहंकार में आकर मैंने भगवान महावीर की अवहेलना की तो अंत मे घूमने के पश्चात् वह मुक्ति को प्राप्त करेगा । समवायांग सूत्र में भगवान ने कहा- आत्मा ही ज्ञान, दर्शन, चारित्र है । जब तुम ज्ञान की गहराई में जाओ तो बाहर की सारी बातें छोड़कर सिर्फ आत्म-भाव में रमण करो । भेद-ज्ञान की साधना करो तुम निश्चित रूप से मुक्ति को प्राप्त करोगे । 

कल आचार्य श्री आनंद ऋषि जी महाराज की जन्म जयंती विशाल सामूहिक आयम्बिल दिवस एवं सामायिक दिवस के रूप में मनाया जा रहा है । ज्यादा से ज्यादा भाई बहिन उनकी गुणगान सभा में उपस्थित होवें । 

 

आनन्द के सागर थे आचार्य श्री आनंद ऋषि जी म0 

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

26 जुलाई, 2006: जम्मू: विश्व शान्ति और सर्वधर्म महासंघ के मुख्य संरक्षक श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि:- श्रमण संघ के द्वितीय पट्टधर आचार्य श्री आनंद ऋषि जी महाराज जिनके मुख मण्डल पर आनंद था । जिनकी चाल, हर कर्म में भीतर से ऊपर तक आनंद ही आनंद था, ऐसे दिव्य महापुरूष की दिव्य जयंती मनाने का सुअवसर जम्मू श्रीसंघ को प्राप्त हुआ है । आपने उनके दर्शन जम्मू वर्षावास में किए । मैं भी उस समय एक माह के लिए जम्मू में आया था । मैंने जम्मू विश्वविद्यालय से संस्कृत में एम0ए0 करने का मन बनाया था परन्तु गुरूदेव का अल्पकाल जम्मू में रहना और एम0ए0 की पढ़ाई अधिक समय की होने की वजह से मैंने एम0ए0 ना करते हुए एक माह श्रद्धेय आचार्य भगवंत एवं गुरूदेव श्री ज्ञान मुनि जी महाराज के चरणों में बिताया उस समय मैंने उनके प्रवचन, प्रार्थना, मीठी वाणी सुनी थी । 

आचार्यश्रीजी का जन्म कहां हुआ माता पिता कौन थे यह आप सबने बताया । यह कोई नई बात नहीं । व्यक्ति का जन्म होता है तो उसे कोई स्थान ही ग्रहण करना होता है । उसे अपनी मर्जी के माता पिता तो नहीं मिलते परन्तु जो भवितव्यता होती है उस अनुसार स्थान मिलता है । महापुरूष का जीवन बचपन में ही सब कुछ सिखा देता है । बचपन में आचार्यश्रीजी के माता पिता का साया चला गया । उनका जीवन संसार से उब गया था । एक संत का जीवन कैसे सतत् योग में घटित होता है । आचार्य बनना कोई बड़ी बात नहीं । आचार्य महाप्रज्ञ जी से हमारा मिलन लुधियाना में हुआ था उस समय चर्चा चली थी उनकी बात मुझे याद आ गई, उन्होंने कहा जीवन में आचार्य पद पाना बड़ी बात नहीं । जिन्होंने जीवन में बड़ा अध्ययन किया जिनकी 90 वर्ष की उम्र है उन्होंने दो घण्टे की चली चर्चा में इस बात पर महत्व दिया कि साधु बनना कठिन है । साधु वह जिसके जीवन में विनय, सरलता है । साधु के जीवन में इसका ही महत्व है । धर्म का मूल विनय है साधु जीवन का आधार विनय एव ंसरलता है यही गुण मैंने श्रद्धेय आचार्य श्री आनंद ऋषि जी महाराज के जीवन में देखे । उनकी भाषा में माधुर्य था । पूना में जब मैं उनके चरणों में गया मस्तक झुकाया तो उनकी माधुर्य भरी वाणी बरसी । शिवमुनि जी आपने बहुत कृपा की । महापुरूष के दो शब्द जीवन को बदल देते हैं । महापुरूषों की महानता सर्वत्र कृपा बरसाती है । 

दिल्ली के आस पास एक छोटे गांव में सर्वप्रथम मैंने उनके दर्शन किए थे । उनकी आंखें बड़ी-2 हिरण के   समान । उनके जीवन के ऐसे अनेक संस्मरण मैं सुनाना चाहूंगा जो आपने कभी न सुने होंगे । उन्होंने अपने जीवन में कभी गाड़ी का उपयोग नहीं किया । महानता में व्यक्ति कितना गुणग्राही होता है इस पर विचार करना आवश्यक है । शान्ति और समृद्धि से व्यक्ति में आनंद आता है । तुम्हारे पास करोड़ों रूपये है और लाख का नुकसान हो जाए तो तुम घबरा जाते हो । तीर्थंकर महावीर भीतर से समृद्ध थे । आचार्य श्री आनंद ऋषि जी महाराज का जीवन समृद्ध था । उनके जीवन में धर्मनीति थी । आचार्यश्रीजी जब पंजाब में आए तब मेरी दीक्षा नहीं हुई थी । मैं उनके पास पहुंचा मेरी दीक्षा लेने की भावना थी । मैंने कहा आचार्यश्रीजी कृपा करो संसार पक्ष से दीक्षा की आज्ञा मिल जाए तो आचार्यश्रीजी ने कहा सहज पके सो मीठा होए’ इतनी मीठी वाणी थी । वे सभी भाषाओं के ज्ञाता थे । कोई पंडित वहां उनसे बात करने आता या उनको सीखने की इच्छा होती तो वे स्वयं नीचे बैठकर ज्ञान लेते । हम ऐसे महापुरूष से विनम्रता, झुकना, सरलता सीखें । हम उनके जीवन से प्रेरणा लें । 

आचार्य श्री आनंद ऋषि जी महाराज की 107 वीं जन्म जयंती पर भव्य आयम्बिल दिवस के रूप में आयोजन हुआ जिसमें अनेक भाई बहिनों ने आयम्बिल की तपस्या का लाभ लिया । इस अवसर पर श्रमण संघीय मंत्री श्री शिरीष मुनि जी महाराज ने श्रद्धेय आचार्य भगवंत के संदर्भ में अपने संस्मरण सुनाते हुए कहा कि वे बहुत ही ऋजु स्वभाव के थे । बड़ी से बड़ी समस्या का समाधान कुछ पलों में ही कर देते    थे । कई बार मैंने उनके चरणों में बैठकर उनका आशीर्वाद प्राप्त किया  है । उनका आशीर्वाद इस संघ पर बना रहे और हम सब उनके आशीर्वाद से वीतरागता की ओर बढ़ते रहे । महासाध्वी श्री प्रणिधि जी महाराज ने भी अपनी भावनाएं श्रीचरणों में व्यक्त की ।संघ के मंत्री श्री रमण जैन, स्त्री सभा की मंत्री कलावती जी, श्रमण संस्कृति मण्डल एवं पाठशाला के बच्चों द्वारा श्रद्धेय आचार्यश्रीजी का गुणानुवाद किया गया । 

 

शिक्षित व्यक्ति को क्रोध त्यागना चाहिए 

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

27 जुलाई, 2006: जम्मू: विश्व शान्ति और सर्वधर्म महासंघ के मुख्य संरक्षक श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि:- अरिहंत परमात्मा को नमन । प्रभु की अनंत कृपा, उनका ज्ञान हमें दिशा प्रदान कर रहा है । भगवान महावीर ने उत्तराध्ययन सूत्र के अन्दर फरमाया । ज्ञान की उपलब्धि कैसे हो ? किन कारणों से हम शिक्षा को प्राप्त नहीं कर सकते । ऐसे पांच कारण है जिनसे हमें शिक्षा की उपलब्धि नहीं होती । विद्यार्थी गुणग्राही, विनीत हो, अपने जीवन को उच्च स्थिति पर लेकर जाना चाहे । उच्च शिक्षा प्राप्त करना चाहे तो उसे उन पांच कारणों का निषेध करना होगा । झूठ, क्रोध, प्रमाद, रोग और आलस ये पांच कारण शिक्षा की ओर आगे नहीं बढ़ने देते । व्यक्ति कितना भी बड़ा हो जाए उसे विनीत, नम्र होना चाहिए । क्रोध का अंश उसके जीवन में होगा तो वह कुछ भी प्रान्त नहीं कर पाएगा ।

कितना बड़ा ज्ञानी हो छोटा सा क्रोध सब मिटा देता है । चण्डकौशिक का उदाहरण बहुत बार सुना है । चण्डकौशिक पूर्व भव में साधु थे, साधुता पर अहंकार किया, क्रोध आया तो पशुयोनि में जन्म मिला । ऐसा सर्प जिसकी फंुकार से खेत जल जाते, नदियां सूख जाती, कोई व्यक्ति वहां से गुजरने का साहस नहीं करता । प्रभ्ुा महावीर उसे तारने के लिए उसके पास गए, उपदेश दिया तो चण्डकौशिक का जीवन संवरमय हो गया । वह सुधर गया और अनंतों भव क्षय कर लिए । सुदर्शन सेठ भगवान महावीर के ग्राम में पदार्पण में दर्शन करने जाता है परन्तु मुद्गर-पाणीयक्ष से प्रभावित अर्जुन मालाकार के आतंक के कारण वह दर्शन नहीं कर पाता । सुदर्शन सेठ ऐसी स्थिति में भी घर से निकला और भगवान के दर्शन करने चल पड़ा । रास्ते में उसे अर्जुन मिलता है तो वे भेद-ज्ञान की स्थिति में आ जाते हैं । उनका संकट टल जाता है ।

सारी दुनियां अहंकार और क्रोध में उलझ रही है । कितने युद्ध केवल अहंकार के कारण हो रहे हैं । एक अहंकार और क्रोध जीवन से निकल जाए तो जीवन सुन्दर बन जाएगा । एक डाॅक्टर बनने के लिए पच्चीस वर्ष लग जाते है। पच्चीस साल में वह केवल शारीरिक बीमारी ही ठीक कर सकता है । कर्म-रोग को दूर करने के लिए भेद-विज्ञान की ट्रेनिंग आवश्यक है और भेद-विज्ञानी बनने के लिए सारी उम्र लग जाए तो भी कम समझना क्योंकि एक क्षण का भेद-विज्ञान अनंतों कर्मों की निर्जरा कर देता है और तुम्हें मोक्ष के नजदीक पहुंचाता है । इस शरीर से जितना तप, ध्यान, संवर हो जाए उतना ही अच्छा है क्योंकि यह शरीर एक नांव, दिशा, सीढ़ी है, मोक्ष का मार्ग है । हम शरीर के लिए कितना कुछ कर रहे  हैं । आतमा को तो कुछ भी नहीं चाहिए । आत्मा को तो केवल जानना और देखना है, यही ध्यान हम शिविरों के माध्यम से सिखा रहे हैं । 

आज हमने अपने बेटे को संसार में उलझा दिया । आज से तुम उसे शिक्षा दो कि जिनवाणी हम सबकी माँ है और अरिहंत परमात्मा हम सबके पिता हैं । माँ बेटे को हर प्रकार से शिक्षित करती है,उसी तरह जिनवाणी का एक वचन कान में पड़ जाए तो हो सकता है हमारे जीवन का कल्याण हो   जाए । जिनवाणी से दूसरा जन्म होता है । हम हर समय कृतज्ञता में जीवन जीएं । 

 

रात्रि भोजन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है 

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

28 जुलाई, 2006: जम्मू: जैन धर्म दिवाकर, योगीराज, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि:- तप केवल आत्म-शुद्धि के लिए हो । तप के बदले में व्यवहारिक लेन-देन न करे । तप करके दान दें परन्तु लेने की अपेक्षा न रखें । चातुर्मासकाल में जीवन में त्याग और मर्यादाओं को अपनाएं । शील का पालन  करें । रात्रि भोजन का त्याग करे । रात्रि भोजन स्वास्थ्य के लिए भी हानिकारक है और अहिंसा के दृष्टिकोण से भी हितकर नहीं है । रात्रि भोजन करने से शरीर में अपचन होता है और वर्षाकाल में रात्रि में सूक्ष्मजीवों की उत्पत्ति हो जाती है उनकी हिंसा के भी हम निमित्त बनते हैं । जीवन को मर्यादा मंे लाओ । प्रतिदिन दो सामायिक   करो । फास्ट फूड न खाओ । संसार में दुःख है, धर्म में सुख है, त्याग में सुख है, शील में सुख है । शुद्धात्मा के ध्यान में सुख है । 

प्रभु महावीर ने कहा- अहंकार, क्रोध, प्रमाद, आलस्य से भरा व्यक्ति ज्ञान को प्राप्त नहीं कर  सकता । ज्ञान को प्राप्त करने के लिए इस अहंकार को छोड़ना   होगा । आज जीवन में संघर्ष, तनाव क्यों है ? परिवारों में कलह क्यों है ? एक देश दूसरे देश से क्यों टकरा रहा है, उसका मूल कारण है अहंकार, क्रोध । हर साधना करने के पहले अरिहंत के चरणों में पार्थना करो । अरिहंत प्रभु ने हमें अनंत ज्ञान, अनंत सुख दिया । अरिहंत ने किसी को सही और किसी को गलत नहीं बताया । अरिहंत की दृष्टि में भक्ति करने वाली चंदनबाला का भी वही स्थान है तो निन्दा करने वाले गौशालक का भी वही स्थान   है । अरिहंत ने कहा किसी की निन्दा नहीं करनी । हम जीवन भर इस शरीर के संबंधों में उलझे रहते   हैं । शरीर से ऊपर उठकर शुद्धात्मा दृष्टि में हम आ जाएं । कोई भी साधना करने से पहले अरिहंत के चरणों में प्रार्थना करो और पूर्ण करने पर अरिहंत के चरणों में कृतज्ञता का भाव रखो कि प्रभु आपकी कृपा से मुझे कुछ देर शान्ति, आनंद, समता, सुख में रहने का अवसर मिला । 

इस दुनियां में हिटलर जैसे लाखों लोगों को मरवाने वाले भी समाप्त हो गए । आज उनका कोई नाम लेने वाला नहीं   है । हम अपने जीवन का एक लक्ष्य तय करें तो हमारा लक्ष्य सिद्धालय पंचगति को प्राप्त करना है अर्थात् सभी कर्म को स्वीकार करते हुए क्षय कर देना । वीतराग-भाव की साधना करना । इस जगत में न कुछ अच्छा न कुछ बुरा, इस मानसिक स्थिति में जीना इसकी प्रयोगात्मक ट्रेनिंग हम ध्यान साधना शिविरों में करवा रहे   हैं । आप अगर गृहस्थ श्रावक हो तो मर्यादा में आ जाओ । ध्यान करो, सामायिक करो और मुक्ति की ओर आ जाओ यही जीवन का सार है । सारे कर्म शरीर करता है किन्तु भ्रान्तिवश मैंने किया इस भाव से करने से गलत मान्यता से सारे कर्म आत्मा के साथ जुड़ जाते हैं । शरीर तो यहीं छूट जाता है किन्तु जीव आत्मा चार गति में भटकती है । अतः इस चातुर्मास में आप और हम सभी पंचमगति मुक्ति की आराधना करते हुए वीतराग मार्ग में आगे बढ़ें । 

 

नमन और भक्ति से राष्ट्र का कायाकल्प हो सकता है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

29 जुलाई, 2006: जम्मू: जैन धर्म दिवाकर, योगीराज, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि:- व्यक्ति में अगर नमन और भक्ति आ जाए तो देश का नक्शा ही बदल जाएगा । व्यक्ति के अभिमान, प्रमाद, आलस्य, रोग ये सब शरीर, मन, बुद्धि के हैं । जितना हमें दुःख मिला उससे अनंत गुणा दुःख प्रभु महावीर के जीवन में माया लेकिन उन्होंने साधना नहीं छोड़ी । हम एक शुद्ध सामायिक नहीं कर पाते । प्रभु महावीर के साढ़े बारह वर्ष की साधना में कितना ध्यान, तप और कायोत्सर्ग था । उनके भीतर में कितनी करूणा, प्रेम और प्राणी मात्र के कल्याण की भावना थी । जो तीर्थंकर पद को प्राप्त करते हैं वे प्राणी मात्र का कल्याण करते हैं । हम सामान्य-रूप से रसिया, जापान आदि जगह जाते हैं तो उसके लिए कितनी तैयारी करते हैं । वीजा लेते हैं लेकिन हमें मोक्ष को प्राप्त करना है, पंचमगति को प्राप्त करना है तो हमें कितनी तैयारी करनी होगी । हमारा जीवन खाने, पीने, देखने, घूमने में जा रहा है । हम इस समय का उपयोग इस शरीर का उपयोग नमन, भक्ति और वीतराग-मार्ग के लिए करें । 

जब साठ वर्ष के ऊपर के हो जाओ तो तीन घण्टे से ज्यादा मत सोओ । अपने शरीर का उपयोग आत्म-साक्षात्कार और परमात्मा की ओर करो । दीया चाहे मिट्टी का हो सोने का हो, उसकी ज्योेत हमेशा आकाश की ओर जाती है, उसी प्रकार यह शरीर कैसा भी है लेकिन इसके भीतर जो आत्म-ज्योति है वह परमात्मा की ओर जाती है । आलस्य का त्याग करो । परमात्मा का ध्यान करो । आप शुद्ध, बुद्ध, निरंजन, निराकार हो । सिर्फ खाने, पीने और चाय नास्ते के लिए साधना को मत छोड़ों, सौ काम को छोड ़कर सत्संग करो, हजार काम को छोड़कर सामायिक ध्यान करो । लाख काम को छोड़कर परमात्मा के दर्शन करो । क्या हमारा जीवन ऐसा ही है । सोमवार को हमारा जन्म हुआ । मंगलवार को हम बड़े हुए । बुधवार को शादी हुई । गुरूवार को बच्चे हुए । शुक्रवार को रोगी बन गए । शनिवार को बूढ़े हो गए और रविवार को मौत हो गई । हम अपने जीवन को ऐसे ही व्यर्थ न खोएं । एक भी क्षण हमारा प्रमाद में न जाए । हर क्षण हम जागरूक रहें । 

हमारी आजीविका शुद्ध होनी चाहिए ं। पिता की सम्पत्ति पर हमारी नजर नहीं होनी चाहिए । पूर्णिया श्रावक की तरह खुद श्रम करके सामायिक करें । कोई भी पन्द्रह कर्मादान के धंधे न करें जिसमें त्रस जीवों की सीधी हिंसा होती हो । जैसे- कोयले बनाना, जंगल कटवाना, कोलु या ईंटों के भट्टे लगाना आदि महाआरंभ के कार्य मत करो जिसमें परिणाम स्वरूप तुम्हारी दुर्गति हो जाएगी । किसी भी गरीब आदमी को हीन भावों से मत देखो, उपेक्षा मत करो उसमें भी वही शुद्धात्मा है । चाहे वह तुम्हारे घर में नौकर है, उसके साथ भी समान व्यवहार करो यही महावीर का समभाव है । उसे भी उतना ही प्यार दो जितना तुम अपने बच्चे को देते हो ऐसा समभाव पूरे विश्व में फैले, सबके जीवन में नमन, भक्ति आए । शुद्धात्मा की दृष्टि मिले । साधना के साथ-2 सेवा की भावना आए । झाडू लगाते हुए भी यह भाव करो कि यहां पर सामायिक करें किसी जीव की हिंसा न हो । जीवन में विनीत बनो ं आपके जीवन में प्रकाश, सुगंध आए और जीवन संगीतमय हो जाए । आत्मज्योति परमात्मज्योति की ओर बढ़े, यह संदेश आचार्यश्रीजी ने आज जन-मानस को प्रदान किया । आज के दिवस पर दिल्ली, सिरसा, महाराष्ट्र आदि अनेक नगरों से श्रद्धालुगण सत्संग सुनने हेतु पहुंचे । कल रविवार आचार्यश्रीजी का विशेष प्रवचन, सत्संग होगा । 

 

आत्मा की यात्रा सिद्धालय की यात्रा है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

30 जुलाई, 2006: जम्मू: जैन धर्म दिवाकर, योगीराज, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि:- जीवन का लक्ष्य परमात्म प्राप्ति है । कितना धन, पद, प्रतिष्ठा एकत्रित कर लो उसका कुछ भी अर्थ नहीं । आज मानव के पास धन, पद, यश है पर कुछ कमी है । इतना कुछ मिलने के बाद भी उसे कुछ खाली महसूस हो रहा है । मानव अभी तक तृप्त और आनंदित नहीं हुआ । धन, पद, यश से शान्ति नहीं मिल सकती । शान्ति के लिए एक अवसर है ध्यान साधना का । जिस प्रकार माली अवसर देता है बीज को वृक्ष बनने का । एक बीज वृक्ष बनता है, हजारों मानव उसकी छाया प्राप्त करते हैं उसी तरह हम भी भीतर से विकसित हों इस हेतु साधना शिविर में आगे आएं । 

प्रभु ने फरमाया - शिक्षा प्राप्त करने में हमारा अहंकार बाधक है । शिक्षित व्यक्ति को अभिमान, क्रोध, प्रमाद, रोग, आलस्य इनको छोड़ना होगा । अगर हमने आत्मा से परमात्मा को पाना है तो इन सबको छोड़कर अरिहंतों की विधि को अपनाना होगा । प्रभु ने चार तीर्थ बतलाए, साधु-साध्वी-श्रावक-श्राविका जिसमें श्रावक को प्रतिदिन दो सामायिक करने को कहा और साधु की जीवन पर्यन्त की सामायिक की विधि बतलाई । भगवान ने इतना संकेत कर दिया इतना ही काफी है । यह संसार झूंठा है, मोह वासना से भरा है । भगवान की वाणी कहती है एक ही शास्वत आत्मा है वह ज्ञान दर्शन से युक्त है, बाकी सब बाहर के संयोग है । कहा भी है:-

थोथा पंडित, थोथी वाणी, थोथी हरि बिन सभी कहानी ।’

परमात्मा को अपने पास बुलाओं । परमात्मा के बिना मानव मुर्दा है । तुम ही आत्मा और परमात्मा हो । गिरिजा, मन्दिर, मस्जिद सब कुछ तुम्हारे भीतर ही है । कस्तूरी मृग की नाभी में होती है परन्तु वह उसे पाने के लिए वन-वन भटकता है । उसे ज्ञान नहीं है परन्तु खुशबू से वह सराबोर हो जाता है । अरिहंत परमात्मा का ध्यान, ज्ञान तुम्हारे पास है । परमात्मा तुम्हारे द्वार आकर तुम्हें साधना देना चाहे और तुम कहो मैं व्यस्त हूं तो परमात्मा कुछ नहीं कर सकता । हम शरीर के संबंधों में उलझे हैं । हमें शरीर से आत्म-तत्व तक जाना है । प्रभु महावीर को भी यही शरीर प्राप्त हुआ । उन्होंने इस शरीर के द्वारा पंचमगति को प्राप्त किया । हम इस शरीर के द्वारा संसार में उलझ रहे हैं । हम भगवान की अनंत करूणा का अनुभव करें । आत्म भाव में रमण करें । शरीर की यात्रा श्मशान की यात्रा है और आत्मा की यात्रा सिद्धालय की यात्रा है । हम इस शरीर का उपयेाग, प्रार्थना, ध्यान, साधना, सामायिक के लिए करे । 

ध्यान साधना करने के लिए सर्वप्रथम अभिमान को छोड़ना होगा । बड़े-2 चक्रवती, राजा, महाराजा, बाहुबली जैसों को अपना अहंकार छोड़ना पड़ा तभी उन्हें मुक्ति प्राप्त हुई । निश्चय नय में अभिमान तुम्हारा है ही नहीं, अभिमान तो शरीर का है । रोग, आलस शरीर को आता है । रोग में भी शरीर को साधो । भेद-विज्ञान   करो । रोये बिना तो मां भी बच्चे को दूध नहीं पिलाती । भगवान को साढ़े बाहर वर्ष तक कठिन साधना करनी  पड़ी । जितने कष्ट उनको आए उतने कष्ट तो हमें किसी को भी नहीं आए । भगवान कहते हैं लोग पत्थर मारे तो तुम मुस्कुराओं, गाली को स्वीकार करो । अगर ऐसा होगा तो तुम मोक्ष के नजदीक पहुंच जाओगे । गांधी ने किसका क्या बिगाड़ा तो जो उसे अन्तिम समय तीन गोलियां मिली । इन्दिरा गांधी ने जन कलयाण की भावना अपनाई उसे भी अन्तिम समय सोलह गोलियां खानी पड़ी । सुकरात को विष का प्याला पीना पड़ा । प्रभु के कानों में कीले ठोके गये । तुम अपमान और तिरस्कार का स्वागत करो । प्रशंसा के गीत किसी के काम नहीं आएंगे । भगवन् की साधना को जन-जन तक फैलाओ । अवगुण मत देखो । हम प्रार्थना, साधना, वीतरागता के भावों को भीतर लाए । अनंत तीर्थंकरों ने ध्यान, मौन ओर कायोत्सर्ग की साधना की और उसी के द्वारा उन्हें मुक्ति प्राप्त  हुई । साधु को किसी की निन्दा नहीं करनी चाहिए । मोक्ष शरीर के पार की स्थिति है । आप मोक्ष का टिकिट रिजर्व करा लो और उसे रिजर्व करने के लिए आवश्यक है साधना से गुजरना । जीसस ने भी कहा है पहले प्रभु का राज्य प्राप्त कर लो फिर सब कुछ स्वयं ही मिल जाएगा । हम अपने जीवन को निर्मल, शुद्ध, वीतरागता से परिपूर्ण करे और अपनी आत्मा का ध्यान करते हुए परमात्मा की ओर अग्रसर हों । 

आज शिवाचार्य समवसरण में नासिक, मुम्बई, उदयपुर, दिल्ली, बड़ौत, पंचकूला, चण्डीगढ़ आदि स्थानो ंसे भाई बहिन श्रद्धेय भगवंत की अमृतवाणी श्रवण करने हेतु पहुंचे । इस अवसर पर चार दिवसीय साधना शिविर के अनुभव कुछ शिविरार्थियेां ने जन-जन के समक्ष रखे । आज के दिन आचार्य भगवंत के जो प्रतिदिन प्रवचन होते हैं उनकी आॅडियों और विडियों कैसेट्स का विमोचन किया गया ।

 

आध्यात्मिक साधना है केश-लोचन

श्रमण संघीय मंत्री श्री शिरीष मुनि जी महाराज

31 जुलाई, 2006: जम्मू: जैन धर्म दिवाकर, योगीराज, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज के सुशिष्य श्रमण संघीय मंत्री श्री शिरीष मुनि जी महाराज ने फरमाया कि- भगवान महावीर ने दस प्रकार के मुण्डन बताएं हैं । पांच इन्द्रियों का मुण्डन । चार कषाय का मुण्डन और दसवां सिर मुण्डन । मुण्डन अर्थात् अपने इन्द्रिय, मन और शरीर पर विजय प्राप्त करके आत्मा में स्थिर होना । जैसे इन्द्र सुख का अनुभव करता है उसी प्रकार मनुष्य को शारीरिक सुखों के अनुभव के लिए प्रकृति ने पांच इन्द्रियां दी है । कान से श्रवण करना, आंख से देखना, नाक से सूंघना, जिह्वा से भोजन करना और स्पर्श से अनुकूल प्रतिकूल स्पर्श का अनुभव करना । इन पांचों इन्द्रियों के अनुकूल विषय मिलने पर व्यक्ति को सुख अनुभव होता है । प्रतिकूल होने पर दुःख महसूस होता    है । अगर दोनों में व्यक्ति समभाव में रहता है तो वो पांच इन्द्रियों का मुण्डन कर लेता है । 

इसी प्रकार क्रोध, मान, माया, लोभ में अगर वह समभाव रखता है, आवश्यकता पूरी न होने पर भी शान्त रहता है, अपमान मिलने पर भी स्वाभाविक स्थिति से बाहर नहीं जाता । किसी कपटभाव से छलने पर भी उसके साथ सरलभाव में रहता  है । बहुत लाभ हो या हानि हो फिर भी समभाव में रहता है तो उसने चार कषायों का मुण्डन कर लिया और अन्तिम मुण्डन है सिर का मुण्डन । 

भगवान से पूछा गया कि जो लोच की परम्परा है इसका कोई आध्यात्मिक संबंध है या परम्परा मात्र है । भगवान ने फरमाया लोच का संबंध अध्यात्म से जुड़ा हुआ है । शरीर अलग है, आत्मा अलग है, इस भेद-ज्ञान की अनुभूति के साथ जो लोच करवाते हैं वे महान् कर्मों की निर्जरा करते हैं । और जो परम्परा मानकर मजबूरी में भी लोच करते हैं वे भी महान् पुण्य का उपार्जन करते हैं । अतः मन और शरीर से पार जाने की साधना है केश-लोंचन । 

आज चातुर्मास के अध्यात्मिक पर्व पर्युषण की तैयारी के रूप में आचार्यश्रीजी एवं समस्त मुनिराजों का केश-लोंचन हुआ और आचार्यश्रीजी ने सभी को ध्यान साधना का अनुभव ज्ञान देते हुए साधना   करवाई । कल एडवांस-ाा का चार दिवसीय ध्यान शिविर समापन हुआ जिसमें 27 साधकों ने सिद्धालय की मुक्ति की रिजर्वेशन करवाई और मुक्ति की साधना का अनुभव ज्ञान प्राप्त किया । इस शिविर में साधक बुद्धि से ऊपर हृदय तक पहुंचते हैं और हर धर्म क्रिया आत्मा को लक्ष्य करके बनती है । आत्म-विकास की गुण श्रेणी में साधक आगे बढ़ता है । आगामी ध्यान साधना कोर्स ‘बेसिक’ दिनांक 2 से 6 अगस्त, 2006 तक होने जा रहा है जिसमें करीब 150 से अधिक भाई बहिनों ने अपनी रजिस्ट्रेशन करवाई है । जम्मू में ध्यान साधना का अभूतपूर्व उत्साह बना हुआ है ।    

 

सुख आत्मा का स्वभाव है

श्रमण संघीय मंत्री श्री शिरीष मुनि जी महाराज

1 अगस्त, 2006: जम्मू: जैन धर्म दिवाकर, योगीराज, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज के सुशिष्य श्रमण संघीय मंत्री श्री शिरीष मुनि जी महाराज ने फरमाया कि- भगवान महावीर ने वीतराग धर्म में नौ तत्व का वर्णन किया है । जीव का स्वरूप, अजीव का स्वरूप, पुण्य, पाप, कर्म आने का मार्ग, आश्रव, कर्म को रोकने का मार्ग संवर, कर्म को क्षीण करने के लिए निर्जरा और कर्म-बंधन की प्रक्रिया को बंध और कर्म से मुक्ति प्राप्त करने को मोक्ष बताया । 

जीव तत्व पर प्रकाश डालते हुए मुनिश्री ने कहा कि सबसे बड़ा जगत में असत्य है । अजीव को जीव मानना और जीव को अजीव मानना । जीव का लक्षण है सुख, दुःख का अनुभव, जानना और देखना और अजीव का लक्षण है जिसे सुख दुःख का अनुभव नहीं होता, जो निर्जीव है, वो अजीव है । शरीर अजीव है लेकिन उसे जीव मानना असत्य है और जीव को अजीव मानना असत्य है । एक साधक आत्म-चिन्तन करे । आत्मा के गुणों का चिन्तन करे तो उसके जीवन में शुद्धात्मा का लक्ष्य तय होता है । आत्मा का लक्षण है अनंतज्ञान, अनंत दर्शन, अनंत सुख, अनंत शक्ति आदि गुणों का ध्यान, चिन्तन करे तो मनुष्य शरीर से पार अपनी आत्मा के भीतर रहे हुए अनंत सुख का अनुभव कर सकता    है । सुख वह है जो हमेशा बढ़ता ही रहे, घटने का नाम न ले । सुख आत्मा का स्वभाव है और वह हमारे भीतर ही रहता है । जब हम ध्यान के द्वारा मन, वचन, काया से पार जाते हैं तो अन्तरंग सुख का अनुभव करते हैं और वो दिन प्रतिदिन बढ़ता ही चला जाता है । आत्म ध्यान को वीतराग मार्ग में शुक्ल ध्यान कहा है । 

आचार्यश्रीजी के सान्निध्य में यहां पर आत्म ध्यान के प्रयोग हो रहे हैं । आज आचार्यश्रीजी ने प्रवचन के पश्चात् सभी सत्संगी भाई बहिनों को आत्म ध्यान करवाया और आत्म अनुभूति कराई । 2 अगस्त, 2006 को यहां पर आत्म: विकास कोर्स ‘बेसिक’ शुरू हो रहा है । जनता में अपूर्व उत्साह है । करीब 150 से अधिक आत्म-ज्ञान के जिज्ञासु साधक बेसिक कोर्स में प्रवेश कर रहे हैं जिसकी क्लास प्रातः 5.15 से 7.15 एवं दोपहर 3.00 से 5.00 बजे शुरू हो रही है । 

 

आत्मगुणों का चिन्तन करें

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

2 अगस्त, 2006: जम्मू: जैन धर्म दिवाकर, योगीराज, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने फरमाया कि- जीवन में भक्ति, ध्यान, समर्पण का बहुत महत्व है । जो लोग सत्संग का सहारा, नाम का सहारा लेते हैं । सत्संग की रीत सीख जाते हैं । धर्म से प्रीत करते हैं । श्रद्धा भाव से जीवन जीते हैं तो उनका जीवन काम, क्रोध, मद, लोभ से ऊपर उठ जाता है । आज सारा जीवन मनुष्य का काम, क्रोध, मोह, लोभ में बीत रहा है, ऐसे समय में जिन-वचन पर जो लोग अनुरक्त रहते हैं वे अपने संसार को छोटा कर देते हैं । राम ने भी मर्यादाओं का पालन करते हुए परिस्थितियों को स्वीकार कर मोक्ष को प्राप्त कर लिया । राम ने किसी को दोषी न बताते हुए वनवास की घटना को सहजभाव से स्वीकार किया और उसे संतों की सेवा का अवसर माना तो मुक्ति हो गई । आज भी हम राम की मर्यादाओं को स्मरण करते हैं । राम को भगवान के रूप में मानते हैं । 

जीवन में दो प्रकार के लोग होते हैं । एक आत्मा को मानने वाले । एक संसार को मानने वाले । आत्मा को मानने वाले परमात्मा बन जाते हैं । संसार को मानने वाले धन, पद, प्रतिष्ठा में उलझकर रह जाते हैं । चक्रवृती राजा अगर आत्मलक्षी हो ओर संयम ग्रहण करे तो मोक्ष को प्राप्त करता है और वही चक्रव्रर्Ÿाी राजा काम, वासना, भोग में अटका हो तो वह नरक में चला जाता है । अतः जीवन में संयम, सत्संग को महत्व दें । जो भी लोग धर्म के मार्ग पर चलते हैं उनके जीवन में कष्ट आता है । लोग उनका उपहास करते है, इतिहास इसका साक्षी है लेकिन जो लोग स्वीकार कर लेते हैं, नाम का सहारा ले लेते हैं वे लोग मुक्ति के नजदीक पहुंच जाते हैं । ‘तत्वं असि सोऽहं’ का साक्षात्कार कर लेते हैं । मैं वही तत्व हूँ जो परमात्मा, सृष्टि के कण-कण में है । मैं वही हूँ जो सभी जीवों में है । यह अनुभव है ‘सोऽहं’ की साधना का और सोऽहं की साधना तक पहुंचने के लिए भक्ति की जीवन में अति आवश्यकता है । भक्ति में कोई मांग नहीं, समर्पण है, आराधना है । 

इसके पूर्व श्रमण संघीय मंत्री श्री शिरीष मुनि जी महाराज ने उपासक दशांग पर जीव तत्व पर प्रकाश डालते हुए जीवन में सद्गुणों के चिन्तन पर महŸव दिया । एक है गुणदृष्टि और एक है दोषदृष्टि । हम जीवन में गुणों की व्याख्या करें । गुणों को महत्व दें । जिसको हम महत्व देते हैं वही हमारे जीवन में बढ़ता है । हम आत्म गुणों का चिन्तन करें । 

आज यहां पर आत्म: विकास कोर्स ‘बेसिक’ की शुरूआत हुई । बड़े ही उत्साहपूर्वक वातावरण में आत्म-साधना की ओर सभी साधक आगे बढ़ रहे हैं । 

 

निष्काम भक्ति मोक्ष देती है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

3 अगस्त, 2006: जम्मू: जैन धर्म दिवाकर, योगीराज, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने भक्ताम्बर स्तोत्र का महत्व बताते हुए कहा कि नकार में क्लेश, संसार   है । स्वीकार में धर्म/ मोक्ष है । मानतुंग आचार्य ने विपरीत परिस्थिति को स्वीकार कर लिया, अन्तध्र्यान में लीन हो गए । उपसर्ग की चोट से आत्मगिरी से भक्ति की गंगोत्री फूटी और काव्य का जन्म हुआ और यह काव्य कालजयी बन गया । वृक्ष की जितनी जड़ंे गहरी होती हैं उतना ही वृक्ष फलता है । भक्ति में जितनी गहराई होगी उतना ही परमात्मा के निकट भक्त होता है । भक्ताम्बर स्तोत्र की हर लाईन में चैदह है । हर श्लोक में 56 अक्षर हैं और पूरे 48 श्लोक में 2688 अक्षर हैं । चैबीस अवतार और चैबीस तीर्थंकर होने के कारण इसके 48 श्लोक हैं । 

आचार्य मानतुंग को राजा भोज की सभा में बुलाया गया और उन्हें चमत्कार दिखाने के लिए कहा गया तब आचार्य मानतुंग ने कहा कि जैन धर्म चमत्कार में विश्वास नहीं करता वह भक्ति और ध्यान में विश्वास करता है । राजा ने अपनी बात न मानने पर क्रोधित होकर आचार्य मानतुंग को कारागार में बंद कर दिया और 48 ताले लगवा दिये । आचार्य ने एक बार भी राजा से प्रार्थना नहीं की कि मुझे क्यों बंद किया जा रहा है बल्कि आचार्य ने उपसर्ग आया जानकर उस परिस्थिति को स्वीकार किया और सिद्ध भगवान को नमस्कार कर ध्यान में लीन हो गए । मन, वचन, काया की एकाग्रता से ध्यानस्थ होने पर भक्ति रूप में भक्ताम्बर की रचना हुई । इस भक्ताम्बर स्तोत्र में बाह्य और आभ्यन्तर रूप से अध्यात्म छिपा हुआ है, जैसे तिल में तेल, दूध में मक्खन, बीज में वृक्ष, बचपन में बुढ़ापा समाया है । आचार्यश्रीजी ने कहा कि अहंकारी व्यक्ति को भक्ति का आनंद नहीं आ सकता । विनम्र व्यक्ति की भक्ति फलित होती है । भक्ति के बदले में शक्ति की माँग नहीं । क्या है भक्ति ? श्रद्धा की पराकाष्ठा है भक्ति । शरीर के अंग-2 में रोयें-2 से परमात्मा की पुकार हो तो अपने आप शक्ति प्रकट होती है । केवल शक्ति के लिए की हुई भक्ति में चमत्कार, बंधन है । भक्ति निष्काम होनी चाहिए । भक्ति के बदले में कुछ भी नहीं चाहिए । जो कुछ अपना सब कुछ प्रभु के चरणों में छोड़ दंे । शरीर के पार चले जाना ही धर्म है । भक्ति हमें शरीर से पार आत्मा से परमात्मा तक पहुँचा देती है । 

आज न्यू एरा एन्वारमेन्टल हाई स्कूल के विद्यार्थी आचार्य भगवंत की सेवा में पहुंचे । स्कूल के फाउण्डेशन डे पर आचार्यश्रीजी ने बच्चों को अहिंसा, सत्य, शाकाहार, व्यसन मुक्ति और नैतिक शिक्षा का ज्ञान दिया । इस अवसर पर सभी बच्चों ने जीवन भर शाकाहारी रहने का संकल्प किया । 100 से अधिक बालकों ने मांसाहार का त्याग किया । बच्चों को ध्यान, योग एवं प्रार्थना के बारे में अनुभव ज्ञान दिया गया । इस अवसर पर स्कूल का स्टाॅफ एवं प्रींसिपल प्रभा जैन आदि उपस्थित थे । आचार्यश्रीजी के दर्शनार्थ इन्दौर श्रीसंघ उपस्थित हुआ, उन्होंने आचार्यश्रीजी के आगामी चातुर्मास की विनती रखी । आज बैंगलोर, जयपुर, मुम्बई, ठाणा आदि क्षेत्रों से भी दर्शनार्थी भाई-बहिन उपस्थित हुए । 

 

भक्ति का शुद्ध रूप है प्रेम

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

4 अगस्त, 2006: जम्मू: जैन धर्म दिवाकर, योगीराज, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने भक्ताम्बर पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भक्ति से परिपूर्ण श्रद्धा की पराकाष्ठा, विनययुक्त स्तोत्र है भक्ताम्बर । जीवन में कितनी भी विपरीत परिस्थिति आ जाएं धर्म के मार्ग को न छोड़ंे । धर्म के मार्ग पर चलने वाले की परीक्षा होती है, उसे कसौटी पर कसा जाता है । धार्मिक व्यक्ति उस क्षण को मौन के द्वारा स्वीकार कर लेता है । अपने तप और भक्ति के बदले में कोई मांग नहीं करता । हमारे जीवन में बड़े से बड़ा कष्ट आ जाए तो समझो परीक्षा हो रही है । अगर आप सत्य पर चल रहे हैं तो सारी दुनियंा एक तरफ हो और आप एक तरफ हों तो चिन्ता ना करें उस मार्ग पर चलते रहें, आत्म-ज्ञान का मार्ग अकेले चलने का है । प्रभु महावीर, बुद्ध, नानक, कृष्ण, गांधी सभी अकेले चले थे । लोगों ने उनका बहुत विरोध किया लेकिन वे अपने मार्ग पर अडिग रहे । हमारी 90 प्रतिशत जिन्दगी लोग क्या कहेंगे इस पर चलती है लेकिन धर्म के मार्ग पर चलने वाला अपने स्वयं के भीतर की आवाज को सुनता है । 

सम्यक् प्रकार से श्रद्धा रखने वाला व्यक्ति भक्ति के द्वारा समर्पण भाव से कर्म-निर्जरा कर लेता   है । सत्य से भरी श्रद्धा मन, वचन, काया से एकरूपता हो जैसा भीतर है वैसा बाहर है जैसा बाहर है वैसा भीतर है तो वह अपने भीतर के कर्मों की सभी प्रकृतियों को तोड़ लेता है। प्रार्थना और भक्ति में मांग मत रखो । शक्ति वही है तुम उसका उपयोग किसमें करते   हो । एक पत्थर से ठोकर भी खाई जा सकती है, बिल्डिंग भी बनाई जा सकती है, किसी का सिर भी फोड़ा जा सकता है और उसकी प्रतिमा बनाकर पूजा भी की जा सकती है । इसी प्रकार काव्य में प्रेम, भक्ति, शक्ति, मोक्ष है । आचार्यश्री ने प्रेम की व्याख्या करते हुए कहा कि प्रेम गलत नहीं है । भगवान ने प्राणी मात्र से प्रेम करने को कहा । प्यार में स्वार्थ, मोह, राग है । राग बन जाता है जब वह किसी व्यक्ति विशेष पर होता है । प्रेम हृदय की करूणा से होता है । भीतर से भाव उठते हैं कि प्रभु सबको ज्ञान दे, सबका मंगल हो, सबका कल्याण  हो । अत‘ः प्रेम विस्तार सिखाता है। अरिसटोटल ने कहा- स्वयं से प्रेम करो और जो स्वयं को प्रेम करता है वह सबको प्रेम करता है। भगवान महावीर ने इसी बात को ‘मित्ती में सव्व भूएसु, वैरं मज्जं न् केणई’ कहा है ।

अतः सभी प्राणियो ंसे मैत्री रखो । किसी से वैर मत रखो । यही बात शैक्सपीयर ने कही है- प्रेम आंखों से नहीं हृदय से किया जाता है। प्रेम में शारीरिक आलम्बन की आवश्यकता नहीं होती । आज पिक्चरों में जो प्यार दिखाया जा रहा है वह वासना है, प्रेम नहीं । गांधीजी भी कहते थे कि- प्रेम में शरीर के आलम्बन की आवश्यकता नहीं । अंत में भक्ति की व्याख्या करते हुए आचार्यश्री ने कहा कि शुद्ध प्रेम भक्ति है और आचार्य मानतुंग ने उस भक्ति की पराकाष्ठा से भक्ताम्बर स्तोत्र की रचना की । वह स्तोत्र कालजयी बन गया । भक्ति के बदले में किसी प्रकार की मांग न रखो और मन, वचन, काया की एकरूपता से भक्ति करते चले जाएं तो आपको अवश्य मुक्ति दिला देगी । 

आचार्यश्रीजी के प्रवचन में आज देश के कोने-2 से श्रद्धालु पहुंचे । आत्म: ध्यान समाधि कोर्स दिनांक 7-8-9 अगस्त, 2006 तक रहेगा । दिनांक 6 अगस्त, 2006 को मित्रता दिवस पर आचार्यश्रीजी का विशेष आध्यात्मिक प्रवचन होगा । 

 

होश आने पर क्रोध करूणा में बदल जाता है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

5 अगस्त, 2006: जम्मू: जैन धर्म दिवाकर, योगीराज, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने भक्तामर स्तोत्र की प्रथम गाथा का महत्व बताते हुए कहा कि- आचार्य मानतुंग ने सम्यक् प्रणम्य की बात कही । इसी बात को नानक और कबीर ने श्रुति कहा । बुद्ध ने सम्यक् स्मृति कहा और प्रभु महावीर ने इसे सम्यक् दर्शन कहा । सम्यक् दर्शन धर्म की नींव है इसी पर मुक्ति का महल खड़ा है । आचार्य मानतुंग ने भगवान की भक्ति करते हुए कहा कि- आपको किया हुआ नमस्कार पाप रूपी अंधकार को नाश करने वाला है । भगवान के सौन्दर्य का वणर््न करते हुए कहा कि देवताओं के द्वारा झुके हुए मुकुटों की आभा आपके नाखुन से और बढ़ गई है अर्थात् देवताओं के मुकुट से भी अति सुन्दर है भगवान के नाखुन तो उनका सौन्दर्य कितना होगा । 

भक्ति भावों से आती है । भक्ति में शब्दों का महत्व नहीं, स्थान का महत्व नहीं । भक्ति में हृदय की पवित्रता, सुन्दरता है । भक्ति में नमन, विश्वास, अर्चना, विनय है । कर्मभूमि के प्रारंभ में भगवान आदिनाथ ने भूख प्यास और क्लेश से पीड़ित जनता को शान्ति, सुख और समृद्धि से जीने के लिए जीवन जीने की कला सिखाई । कृषि के लिए हल और मसि के लिए कलम और क्लेश को मिटाने के लिए तलवार दी अर्थात् असि, मसि, कृषि की शिक्षा दी और जनता को उपदेश दिया कि आपस के क्लेश मिटाकर तुम अपनी शक्ति को कर्म में लगाओ और उनके पाप के प्रसार से रोका और धर्म की ओर मोड़ा । हमें अपना आत्म निरीक्षण करते हुए देखना है कि हम किसके पुजारी है, भगवान के या धनवान के । धनवान की पुजारी होने पर आपके जीवन में अहंकार आएगा, युद्ध होगा और मरकर जीव नरक में   जाएगा । भगवान के पुजारी होने पर आपके भीतर में निष्काम भक्ति आएगी, हृदय में प्रेम आएगा और उसके परिणाम स्वरूप निर्जरा होगी और आप मोक्ष को प्राप्त करेंगे । 

मित्र वही है जो तुम्हारे अहंकार को चोट पहुंचाए, निर्जरा की ओर ले जाए । अगर आपको क्रोध में होश जा जाए तो क्रोध करूणा में बदल जाता है । मान पर होश आ जाए तो वह नमन में बदल जाता   है । जैसे बाहुबली को होश आ गया तो वे नमन में आ गए और उन्हें उसी समय केवलज्ञान हो गया । माया करने से जीव पशुयोनी में जाता है और माया करते हुए होश आ जाए तो माया सरलता में बदल जाती है और सरलता जीव को मोक्ष ले जाती है ।  लोभ करते हुए होश आ जाए तो संतोष में बदल जाता है । मुख्य है होश । अरिहंत शब्द का उच्चारण, भक्ति करते हुए हम होशपूर्वक करें । मन, वचन, काया की एकाग्रता से करें तो अकेला अरिहंत शब्द ही आपको अनंत कर्मो की निर्जरा कर वीतरागता से भर देगा ।

आज आचार्यश्रीजी के दरबार में देश के कोने-2 से अनेक भक्तगण पहुंचे । कल रविवार को शुद्ध सामायिक दिवस के रूप में मनाया जा रहा है । प्रातः 7.40 से 8.30 बजे तक शुद्ध सामायिक की साधना होगी साथ ही महासाध्वी श्री चन्दा जी महाराज का स्मृति दिवस मनाया जाएगा । 7 जुलाई, 2006 से आत्म: समाधि कोर्स की शुरूआत होगी । सभी इच्छुक साधक सादर आमंत्रित है । 

 

कोल्डड्रींक्स और जंकफूड का त्याग करें

शरीर से पार आत्मा का ध्यान करें

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

6 अगस्त, 2006: जम्मू: जैन धर्म दिवाकर, योगीराज, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- पेप्सी, कोका-कोला की आयी रिपोर्ट के आधार पर ये सभी पेय पदार्थ पीने योग्य नहीं है । ये सभी बाथरूम क्लिन करने के केमिकल्स विज्ञापनों के माध्यम से मनुष्य के भीतर डाले जा रहे हैं । इन सबका बहिष्कार करें और इन सबके साथ भारतीय संस्कृति की बनी हुई दूध, छाछ, जूस आदि लेकर अपने स्वास्थ्य को सुन्दर बनाएं । साथ ही आचार्यश्रीजी ने कहा कि जंकफूड का त्याग करें जो आने वाले समय में आपके स्वास्थ्य को हानि करने वाला है उससे बचें जिससे आपका शरीर स्वस्थ रहेगा और शरीर स्वस्थ रहेगा तो आप आत्म ध्यान की साधना सहज कर पाएंगे । 

आचार्यश्रीजी ने आगे कहा कि- कुशा के अग्र भाग पर रखा हुआ ओस का बिन्दु लगता है मोती किन्तु हवा के झोंके के साथ वह समाप्त हो जाता है । उसी प्रकार मनुष्य का जीवन भी अस्थिर है । किसी भी क्षण वह समाप्त हो सकता है । देवताओं की असंख्यात वर्ष की आयुष्य के सामने मनुष्य का जीवन क्षणिक   है । हमें सब कुछ लाभ मिला किन्तु धर्म का लाभ नहीं मिला । धन, पत्नी, परिवार, पद, प्रतिष्ठा, महल सभी हम सुरक्षा की दृष्टि से बनाते हैं किन्तु वे ही हमारे भक्षक बन जाते हैं । अतः शरीर की यात्रा से पार आत्मा की साधना करे । 

जैन दर्शन में पच्चीस बोल के अन्तर्गत मिथ्यात्व की चर्चा आती है । जीव को अजीव समझे या माने तो मिथ्यात्व ।  अजीव को जीव समझे तो मिथ्यात्व । मिथ्यात्व अर्थात्  अंधकार । गलत, झूठ दिखाई देता है पर वह है नहीं । मिथ्यात्व संसार में घुमाता है । मिथ्या-दर्शन अर्थात्   अंधकार । सम्यक् दर्शन अर्थात् प्रकाश । क्या है जीव ? क्या है   अजीव ? जीव अर्थात् आत्मा । अजीव अर्थात् शरीर । जीवन के साठ वर्षों में हमने जीव को महत्व दिया है या अजीव को । नाम, मान, पद, प्रतिष्ठा, संस्कार ये सारी यात्रा अजीव, शरीर की है । आत्मा की यात्रा हमने कितनी की आत्म निरीक्षण करें । आत्मा अनंत सूर्य के समान प्रकाशमान है । सम्पूर्ण लोक को प्रकाशित करती है किन्तु हमारा ध्यान उस तरफ नहीं है । 

समस्त तीर्थंकरों की साधना भेद-ज्ञान की है । भेद ज्ञान अर्थात् आत्मा और शरीर में भेद करने और समस्त आत्माओं को अपने समान समझंे । आज भेद के कारण हर शरीर अलग-2 है । धनवान, गरीब, ऊँचा-नीचा, अच्छा, बुरा सब हम शरीर की दृष्टि से देखते हैं और उसके कारण राग और द्वेष होता है । आत्म-दृष्टि से देखते हैं वही आत्मा हमारे भीतर है जो अरिहंत, सिद्ध, परमात्मा, साधु, डाकू, अहिंसक, हिसंक में है वही नरक के जीवों में है । यह भेद से अभेद की साधना है । आत्म-दृष्टि से सभी आत्माएं समान हैं और कर्म-दृष्टि से मिथ्या-दृष्टि से सबमें भेद है ।  अतः ध्यान के द्वारा हम सभी आत्म-साक्षात्कार को जानें ।   

आज यहां पर ‘आत्म: विकास कोर्स ‘बेसिक’ का समापन हुआ जिसमें अनेक भाई बहिनों ने आत्मा और परमात्मा के स्वरूप का बोध किया । भेद-ज्ञान की साधना सीखी । शरीर में स्फूर्ति, कार्य में उत्साह, संबंधों से पार समदृष्टि का विकास आदि दृष्टिकोण पाया और वे सभी साधक अब बढ़ रहें हैं आत्म ध्यान, आत्मज्ञान की ओर । अनेक भाई-बहिनों ने अपने अनुभव बताते हुए कहा कि योग-साधना के अभ्यास तो हम वर्षों से कर रहे हैं लेकिन बड़े ही सुन्दर ढंग से शरीर को स्वस्थ रखने के साथ आहार की शुद्धि, मन की शुद्धि और आत्म-ध्यान का अनुभव अपने आप में अनुपम रहा । आगामी समाधि कोर्स शिविर 7 से 9 अगस्त, 2006 तक हो रहा है । इस हेतु अनेक भाई बहिन अग्रिम रजिस्ट्रेशन करवाकर लाभ ले रहे हैं । 

 

भक्तामर स्तोत्र जीवन में आए संकट को दूर करता है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

7 अगस्त, 2006: जम्मू: विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता, जैन धर्म दिवाकर, योगीराज, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने भक्तामर स्तोत्र पर प्रकाश डालते हुए कहा कि- जीवन में भक्ति का बड़ा महत्व है । जिसमें हमारी उत्सुकता होती है हम उसी को देखते हैं । जीवन में हम धन को महत्व देते हैं किसी के दिल को महŸव नहीं देते । हम धन, पद, परिवार, प्रतिष्ठा में उलझते हुए रहते हैं हम इनको छोड़कर अगर आत्मा की शरण में आ जाएं तो जीवन सफल हो जाएगा । चंदनबाला पर जीवन में कठिन उपसर्ग आए पर उसने कभी किसी को उपालंभ नहीं दिया और भक्ति, निष्ठा में दृढ़ रही । ऐसी भक्ति हमारे बीच आ जाए तो प्रभु महावीर हमारे से दूर नहीं । एक बार अगर आत्म मिलन की प्यास जग जाए तो फिर यह अनित्य जगत, रिश्ते नाते सभी गौण हो जाते हैं । हमने अपने जीवन में महत्व किसको दिया  है ? ये देखना है । पैसे को महत्व दिया है या भक्ति को महत्व दिया है । हम व्यक्ति के बाहर के रंग रूप को महत्व न देकर परमात्मा की ओर लक्ष्य करें तो परमात्मा हमें किसी न किसी रूप में दर्शन देता है । 

आचार्य मानतुंग भक्ति में डूबे हुए हैं और उस भक्ति में डूबकर जो भी आराधना करता है उसकी परीक्षा होती है लेकिन उसके संकट दूर हो जाते हैं । ऐसी ही घटना भक्तामर स्तोत्र के प्रथम और द्वितीय श्लोक पर आधारित है । एक बार एक चोर पकड़ा गया । पकड़ने पर उसे सजा मिल रही थी । उसने अपने बचाव के लिए एक जिनभक्त नगर सेठ का नाम दे दिया कि मैंने अपना सारा धन इस सेठ के घर में रखा है । नगर सेठ ने विनयपूर्वक राजा को सारी बात बताई और नगर सेठ बारह व्रतधारी प्रमाणिक और धार्मिक श्रावक था लेकिन चोर ने अपनी बात इस ढंग से रखी कि राजा को नगर सेठ के विनयपूर्ण कही बात पर विश्वास नहीं हुआ । अंततः राजा ने कुपित होकर हेमदत्त सेठ को जंगल में अंधकूप में उलटा लटकाने का आदेश दे दिया । हेमदत्त ने किसी पर भी आरोप प्रत्यारोप न करते हुए सोचा कि आज मेरे धर्म के ऊपर उपसर्ग आया है वह शान्त, मौन हो गया । अन्न, जल का त्याग करके अंधकूप में पड़ा हुआ भक्तामर स्तोत्र की पहली दूसरी गाथा का भक्ति-भाव से पाठ करने लगा । 

उस मंत्र के प्रभाव से शासनदेवी माता चक्रेश्वरी प्रकट हो गयी और उसने सेठ को कहा बोलो सेठ क्या हुकुम है । तुम चाहो तो चोर और राजा दोनों को सजा देकर समाप्त कर दूं । तब सेठ ने कहा- माता ! मुझे कुछ नहीं चाहिए धर्म पर लगा हुआ कलंक दूर हो जाए और किसी को सजा देने की आवश्यकता नहीं है । सेठ चाहता तो उन्हें कठोर से कठोर सजा दिला सकता था किन्तु उन्हें क्षमा करके अपनी समभाव से भक्ति करता रहा । परिणाम स्वरूप आकाश में घोषणा हुई सेठ निर्दोष है । राजा ने सेठ से क्षमा मांगी और उन्हें सम्मान के साथ विदा किया । सेठ कर्म-सिद्धान्त को मानने वाला था उसने कहा मेरा ही कोई कर्म उदय में आया है वह क्षय हो जाएगा और उसने शान्तभाव से सारी घटना को स्वीकार किया । यह है भक्तामर स्तोत्र की महिमा  भक्तिभाव से पढने से आए हुए उपसर्ग परीषह सहज समाप्त हो जाते हैं ।आज आचार्यश्रीजी के सान्निध्य में आत्म: समाधि कोर्स की शुरूआत हुई जिसमें प्रातःकाल 75 साधकों ने समाधि का ज्ञान प्राप्त किया और अपनी आत्म-शुद्धि की प्रक्रिया में एक विशेष साधना प्रारंभ  की । सभी साधक बड़े प्रसन्न मुद्रा में वीतराग-मार्ग पर आगे बढ़ रहे हैं । शाम को भी एक बेच शुरू हो रही है । आगे भी एडवांस-ा 10 से 12 अगस्त, 2006 को होने जा रहा है । इस आत्म-ज्ञान के यज्ञ में सभी मुमुक्षु सादर आमंत्रित है । 

 

लघुता से भगवान की प्राप्ति होती है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

8 अगस्त, 2006: जम्मू: विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता, जैन धर्म दिवाकर, योगीराज, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने भक्तामर स्तोत्र पर प्रकाश डालते हुए कहा कि- आचार्य मानतुंग भक्तामर की दूसरी गाथा में जैन धर्म के आदि तीर्थंकर भगवान आदिनाथ जी की स्तुति करते हुए कहते हैं- समस्त शास्त्रों के तŸवज्ञान से उत्पन्न होने वाली निपुण बुद्धि द्वारा अतीव चतुर बने हुए देवेन्द्रों ने तीन लोक के चिŸा को हरण करनेवाले अनेक प्रकार के गंभीर एवं विशाल स्तोत्रों से जिनकी स्तुति की है, आश्चर्य है उन प्रथम श्री ऋषभदेव प्रभु की मैं स्तुति करना आरंभ करता हूँ ।

आचार्य मानतुंग इतने ज्ञानवान होते हुए भी अपने को आश्चर्य अर्थात् छोटा कहते हैं । महान् व्यक्ति ज्ञानी पुरूष की यही महानता होती है । वह अपने को छोटा समझता है । स्तुति करने हेतु लघुता एवं मन का पवित्र होना आवश्यक है । उसके लिए बाहर की साज-सज्जा गहने इत्यादि पहनने का कोई अर्थ नहीं है । प्रार्थना, स्तुति हृदय की भीतर की प्रक्रिया है इसलिए तैयारी अन्तर-हृदय की चाहिए । बुद्ध के समय की नगरवधु जब धर्म-मार्ग पर चलने लगी तब उसे नगर के लोग बुलाने लगे, बाहर का श्रृंगार करने को कहने लगे । परन्तु उसने कहा यह साधन व्यर्थ के हैं ।

जिनकी स्तुति समस्त शास्त्रों को जानने वाले जगत् और जैन दर्शन के जो बारह अंग शास्त्र हैं उनके ज्ञान से उत्पन्न बुद्धि वाले जो देवों के राजा इन्द्र हैं वह श्री ऋषभदेव जी जो कि तीनों लोक अधोलोक, मध्यलोक और स्वर्गलोक के सभी के चिŸा को हरण करने वाले हैं उनकी विशाल स्तोत्रों से स्तुति भक्ति प्रार्थना की गई है । 

आत्मा और परमात्मा को पाने के लिए भीतर की प्यास और संकल्प होना चाहिए । अगर आपकी प्यास है, संकल्प है तो आप दूर दिखने वाले, कठिन लगने वाले आत्म स्वरूप को सरलता से जान सकते हैं और प्यास नहीं है तो सरल कार्य भी कठिन हो जाता है । जैसे प्यास है तो पानी दूर क्यों न हो आप उसे खोज निकालते हैं परन्तु प्यास नहीं है तो कुंआ आपके पास में भी हो आपका ध्यान तक नहीं जाता है । 

प्यास है तो पानी मिल सकता है,

बीमार है तो औषधि मिल सकती है ।

भूख है तो भोजन भी मिल सकता है-

तो स्तुति प्रार्थना करने से भगवान क्यों नहीं आ सकते ।

 

रक्षाबंधन प्रेम, रक्षा का प्रतीक

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

9 अगस्त, 2006: जम्मू: विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता, जैन धर्म दिवाकर, योगीराज, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने आज रक्षाबंधन के पावन दिवस पर रक्षाबंधन का अर्थ, इतिहास, विभिन्न राज्यों में रक्षाबंधन की क्या-क्या परम्पराएं हैं और आज के युग में क्या परम्पराएं चल रही है इस पर विस्तृत रूप से प्रकाश डाला । 

भारतवर्ष में पर्वों का महत्व अधिक है । महीनों में कम से कम दो पर्व तो अवश्य आ जाते  हैं । पर्वों को जानकर उसे देश की संस्कृति को लोगों को, विचारों को जाना जा सकता है । रक्षा-बन्धन का त्यौहार केवल भारतवर्ष में ही मनाया जाता है । रक्षा-बन्धन का पर्व भाई और बहिन के प्रेम को बढ़ाता है । उत्सव दो प्रकार से मनाया जाता है । एक बाह्य रूप से जिसे साहित्यिक भाषा में लौकिक पर्व कहा जाता है और आन्तरिक रूप से जिसे कि लोकोŸार पर्व कहा गया है । रक्षा-बंधन का संबंध दोनों पर्वों से है । भाई, बहिन, माता, पिता, गुरू आदि पारिवारिक सगे संबंधीयों को उच्च स्थान प्रदान किया गया है । भाई-बहिन का त्यौहार पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है और गुरू का सत्कार सम्मान पूजा करने के लिए गुरू पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है । 

ऐतिहासिक दृष्टि से तो रक्षा-बन्धन त्यौहार बहुत पुराना है । परन्तु इस बन्धन का त्यौहार केवल भाई-बहिन का त्यौहार ही नहीं है, बहन केवल अपने सगे भाई को नहीं किसी भी व्यक्ति को भाई बनाया जा सकता है । इसका वास्तविक उदाहरण इतिहास की घटनाओं में अंकित है । एक समय बहादुर शाह ने रानी कर्मवती के राज्य को निर्बल समझकर आक्रमण कर दिया । रानी ने उस आक्रमण का सामना किया परन्तु पर्याप्त सैनिक, शस्त्र न होने से हारने की नौबत आ गई परन्तु रानी ने प्रजाजन कि हानि न हो इसलिए 21 रत्नों से जड़ित एक बहुमूल्य धागा पेटी में बांधा और हुमायु को भेजा । उसमें रानी कर्मवती ने सम्राट् हुमायुं को संदेश में भाई बनाया । सम्राट् हुमायु ने संदेश पढ़ा और गद्गद् हो गया और तुरन्त रानी कर्मवती को बहन स्वीकार कर युुद्ध में सहयोग हेतु सेना भेज दी । राखी के महŸव को केवल हिन्दु धर्म में ही नहीं है बल्कि मुस्लिम एवं अन्य धर्मों ने भी स्वीकार किया है । 

नोबल पुरस्कार के सर्वोच्च सम्मान से रवीन्द्रनाथ ठाकुर को नवाजा गया है । उन्होंने भारत में चल रहे हिन्दु और मुस्लिम के वैमनस्य को दूर करने हेतु रक्षा-बन्धन का उपयोग किया । मदनमोहन मालवीय का एक सपना था कि सभी विद्याध्ययन करें । उसके लिए एक संस्था की आवश्यकता महसूस कर रहे थे परन्तु उन्हें जगह प्राप्त नहीं हो रही थी तब उन्होंने वहां के राजा को रक्षा-बन्धन के दिन राखी बांधी और उस धागे के प्रभाव से वाराणसी में पढ़ने के लिए विशाल संस्थान बनाया । इसी प्रकार अन्य घटनाओं में सुल्ताना डाकु की घटना प्रसंग मिलता है । घटना इस प्रकार है । सुलताना डाकु के नाम को सुनकर गांव के लोग भयभीत हो जाया करते थे । वह गांव के लोगों को लुटता था । हर बार की तरह वह गांव को लुट रहा था । लुटते हुए एक घर में गया और घर को लूटने लगा । उस दिन रक्षा-बन्धन का पावन पर्व था । जैसे ही वह लुटकर जाने लगा उस घर में रहने वाली लड़की ने उस सुल्ताना डाकु को राखी   बांधी । उसने उस दिन से उस गांव को लुटना ही बन्द कर दिया । 

आज के समय में चकाचैंध में व्यक्ति रक्षा-बन्धन आदि पर्वों के अर्थ को भूलता जा रहा है । बहन पैसे के लिए भाई के हाथ पर राखी बांधती है परन्तु जो प्रेम, प्यार, रक्षा उस धागे में होनी चाहिए वह उसमें रह नहीं पा रही है । इस पर्व के दिन हम पर्व की वास्तविकता को जानकर उस अनुसार चलें ।

 

संकल्प शक्ति देता है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

10 अगस्त, 2006: जम्मू: विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता, जैन धर्म दिवाकर, योगीराज, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- आचार्य मानतुंग ने आदिनाथ भगवान की स्तुति भक्तामर स्तोत्र के माध्यम से उनके मुख से सहज मुखरित हुई है । प्रभु के विषय में गुण-स्तुति प्रारंभ करने से पूर्व वह फरमाते हैं कि महान् ज्ञानी देवेन्द्र आपकी स्तुति करते हैं, मैं तो अज्ञानी हूँ परन्तु जिनशासन प्रभावना हेतु आपकी स्तुति प्रारंभ करता  हूँ । महापुरूषों के कार्य सफलता का मुख्य कारण उनमें अटूट प्यास और संकल्प होता है इसलिए वह अपने लक्ष्य को प्राप्त करते हैं । 

संकल्प एक बार ही करना चाहिए उसे बार-बार परिवर्तित नहीं करना चाहिए । संकल्प आपको जीवन जीने की शक्ति देता है । आपने जो संकल्प किया है उस रास्ते में अनेक कांटे, दुःख, उपसर्ग आते हैं परन्तु संकल्प उन सब उपसर्गो को सहन करने की क्षमता प्रदान करता है जिसमें सहन करने की क्षमता है वही अपने जीवन लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है । दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू है । उनका आपस में बहुत गहरा संबंध है । 

संकल्प और प्यास कैसे होनी चाहिए इस विषय में एक उदाहरण प्रस्तुत है । एक व्यक्ति संत के पास परमात्मा को पाने के लिए पहुँचा और संत से परमात्मा को पाने का मार्ग पूछने लगा । संत उस व्यक्ति को नदी के किनारे ले गए और उसके सिर को बार-बार पानी में डुबोने लगे । वह व्यक्ति संत के इस कृत्य को देखकर घबराया और लगा कि मरने ही वाला है । परन्तु उसी समय संत ने अपने उस कृत्य को त्याग दिया । बाहर आते ही वह व्यक्ति झल्लाया । संत ने उसे शान्त करते हुए पूछा कि जब मैं तुम्हारे सिर को डुबो रहा था तब तुम्हारे मन में क्या परमात्मा को पाने की चाह थी, उसने कहा नहीं मुझे तो बस लग रहा था कि केवल एक श्वांस प्राप्त होगी । संत ने कहा- तुम परमात्मा को पाना चाहते हो तो इतनी ही प्यास होनी आवश्यक है तभी तुम्हें परमात्मा मिल सकता है । 

संकल्प के पांच सूत्र है जो संकल्प के सहायक अंग ही है जिसके द्वारा संकल्प और दृढ़ होता है । पहला है श्रद्धा यानि रूचि या लगन । संकल्प के प्रति आपको लगन होनी चाहिए जैसे- व्यवहार में भी विश्वास के बगैर नहीं चलता है वैसे संकल्प में श्रद्धा के बगैर कार्य पूरा नहीं हो सकता । दूसरा सूत्र है प्रयास । जो आपने संकल्प किया है उसके लिए प्रयास करना जरूरी है । तीसरा है स्मृति । जो आपने संकल्प किया है उसको निरन्तर याद रखना भी बहुत आवश्यक है । चैथा है एकाग्रता । संकल्प के अलावा दूसरी बातों की ओर आपका ध्यान न हो और अपने मन को चंचल नहीं होने देना, यही एकाग्रता  है । पांचवा और अन्तिम सूत्र है विवेक । 

जिन्दगी का भरोसा नहीं है कब क्या हो जाए । जीवन में दुःख ही दुःख है । संत कबीर भी इस विषय में कहते हैं:-

भक्ति भजन हरिनाम, दूजा दुःख अपार ।

मनसा, वाचा, कर्मणा, कबीरा सुमिरण सार ।।

आज आत्म: विकास कोर्स ‘एडवांस-ा’ की शुरूआत हुई जिसमें लगभग 40 साधक भाग लेकर जीवन जीने की कला का प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं । आगामी आत्म: विकास कोर्स ‘एडवांस-ाा’ 13 से 16 अगस्त, 2006 तक चलेगा । 

 

भक्ति हृदय से करें

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

11 अगस्त, 2006: जम्मू: विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता, जैन धर्म दिवाकर, योगीराज, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- आचार्य मानतुंग भक्तामर स्तोत्र के द्वारा भगवान ऋषभदेव की स्तुति कर रहे हैं । भक्तामर में 48 गाथा हैं, उन गाथाओं में प्रथम गाथा और दूसरी गाथा का संक्षिप्त वर्णन और तीसरी गाथा का विस्तृत वर्णन करते हुए कहा कि प्रथम गाथा में प्रभु की सुन्दरता का अद्भुत वर्णन किया गया है जिसमें कहा गया है कि प्रभु के नाखुन इतने सुन्दर है कि देवेन्द्र के मुकुटमणि से भी सुन्दर है । दूसरे में स्वयं देवेन्द्र उनकी प्रशंसा करते हैं और अब तीसरी गाथा में स्वयं प्रशंसा करते हुए कहते हैं कि मैं बुद्धिविहीन, देवों से अर्चित है चरण की पाद-पीठिका ऐसे है जिनेन्द्र देव, आपकी स्तुति करने के लिए उद्यत होता हूँ, यह मेरी बालचेष्टा है क्योंकि जल में पड़े हुए चन्द्रमा के प्रतिबिम्ब को बालक के सिवाय पकड़ने की अन्य कौन चेष्टा  कर सकता है । उसी प्रकार आपके अगम्य गुणों का वर्णन करने का प्रयास बाललीला के समान है । 

बुद्धि और भक्ति का कोई संबंध नहीं है । भक्ति में बुद्धि नहीं हृदय काम आता है । अगर आप बुद्धि से भक्ति करना चाहे तो सफल नहीं हो सकते, यह आचार्य मानतुंग जानते थे इसीलिए उन्होंने आदि प्रभु श्री ऋषभदेव भगवान की स्तुति में अपनी बुद्धि को अलग कर  दिया । धर्म में हृदय की सरलता बहुत जरूरी है क्योंकि बुद्धि में विकल्प चलते रहते हैं और वह आपको भक्ति के मार्ग से प्रार्थना से डाँवाडोल करते हैं । 

आचार्य की भक्ति से प्रसन्न हो देवता उन्हें निवेदन करते हैं कि अगर आपकी आज्ञा हो तो हम इन कारागृह के तालों को तोड़ या खोल देते हैं । आचार्य प्रत्युŸार में कहते हैं कि इन तालों को तो तोड़ा जा सकता है । कारागृह से आप मुक्ति दिला सकते हैं परन्तु ये तो सब निरर्थक है क्योंकि असली कारागृह तो यह जन्म-मरण-रूपी भव-भ्रमण है और मूल-रूप से आठ कर्म बंधनों को तोड़ना है । जन्म-मरण रूपी कारागृह को देवों द्वारा तोड़ा नहीं जा सकता क्योंकि वे स्वयं भी कारागृह में बंधे हुए हैं । उन तालों को तोड़ने के लिए स्वयं का पुरूषार्थ, स्वयं का सामथ्र्य चाहिए तभी वे ताले टूट सकते हैं । 

हम जब भक्ति करते हैं तो जो आपको चाहिए संसार को बढ़ाने वाले साधन इत्यादि की हम कामना करते हैं । कामना आपको सांसारिक चीजों को मांगने की प्रेरणा देती है और वासना देह आकर्षण को बढ़ाती है । आचार्य मानतुंग भक्ति करते हुए किसी भी प्रकार की कामना नहीं करते । उनके भीतर किसी भी प्रकार की चाह नहीं है । इसीलिए उन्होंने कारागृह को भक्ति के द्वारा मन्दिर बना लिया परन्तु हम मन्दिर में काम, वासना, चाहरूपी अर्जी दाखिल कर देते हैं और मन्दिर को दफ्तर बना देते हैं । भक्ति को पवित्र रखे क्योंकि चाह-रूपी धुलि से भक्ति अशुद्ध हो जाती है। 

 

जीवन में धर्म-रूपी दीये को प्रज्ज्वलित करो

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

12 अगस्त, 2006: जम्मू: विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता, जैन धर्म दिवाकर, योगीराज, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- आचार्य मानतुंग द्वारा रचित भक्तामर स्तोत्र की विराट् व्याख्या करते हुए भक्तामर की चैथी गाथा के विषय में बताते हुए फरमाते है । हे गुण सिन्धु ! देवों के गुरू बृहस्पति के समान बुद्धि वाले भी आपके चन्द्रमा के सदृश कांति वाले उज्ज्वल गुणों को कहने में समर्थ नहीं है तो अन्य कौन समर्थ है ? जैसे प्रलयकाल के प्रचण्ड पवन से उछलते हुए मगरमच्छों से युक्त समुद्र को दो भुजाओं से तैरने के लिए कौन पुरूष समर्थ हो सकता है ? अर्थात् कोई भी नहीं । आचार्य मानतुंग आदिनाथ प्रभु की प्रशंसा कर रहे हैं और आप संसार को पार करने का मार्ग बता रहे हैं । 

संसार जन्म मरण का मूल है । संसार मगरमच्छ के सदृश जैसे कोई व्यक्ति आचानक समुद्र में गिर जाता है मगरमच्छ के सामने आ जाता है तो वह व्यक्ति कैसे बच सकता है । वैसे ही मनुष्य जब संसार रूपी मगरमच्छ के चक्कर में यानि विषय वासना में लिप्त हो जाता है तो वह उस चक्रव्यूह से निकल नहीं सकता । संसार से पार होने के लिए वीतरागियों का सान्निध्य जरूरी है उसीसे हम मोक्ष को पा सकते हैं । धर्म, देव, गुरू का जैनदर्शन में गुणों से सम्बन्ध जो राग-द्वेष से दूर वही धर्म, देव और गुरू है । 

आचार्य मानतुंग संसार सागर से पार होने के लिए धर्म दीये का प्रारूप बतला रहे हैं । जैसे दीये को चलाने के लिए तेल, बाती, चिमनी आदि साधन जब प्राप्त होते हैं तभी दीया जलता है, उसकी ज्योति प्रज्ज्वलित होती है । वैसे ही धर्मरूपी दीये को जलाना है तो श्रद्धारूपी तेल, भक्ति रूपी बाती, पुरूषार्थ रूपी चिमनी और समर्पण रूपी ज्योति प्रज्ज्वलित हो जाती है । जब समर्पण आ जाता है तो उसके जीवन में दो बातें अवश्य आ जाती है जिससे कि दुःखों से बचने का साधन संयम बाहरी वस्तुओं के प्रति अनासक्ति, त्याग और आत्मा केे ऊपर श्रद्धा और एकाग्रता अर्थात् ध्यान आता है । 

क्रोध, मान, माया, लोभ आदि कषायों से तो जीवन बर्बादी की ओर जा रहा है । उस कुमति को चेतनरूपी राजा से हटाकर सुमति को आत्मा से जोड़ना है तभी हम पार हो सकते हैं । आज 12 अगस्त, 2006 से से बाल संस्कार शिविर प्रारंभ हुआ जिसमें 60 बालकों ने भाग लिया । कल 13 से 16 अगस्त, 2006 तक आत्म: विकास कोर्स ‘एडवांस-ाा’ शुरू हो रहा   है । इच्छुक साधक भाग लेकर जीवन जीने कला का प्रशिक्षण प्राप्त करें । 

 

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

13 अगस्त, 2006: जम्मू: विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता, जैन धर्म दिवाकर, योगीराज, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- भारतीय दर्शन और पाश्चात्य दर्शन में आत्मा के विषय में स्वीकारोक्तिपूर्वक विचार ग्रन्थों के माध्यम से प्राप्त होते हैं । चार्वाक ने केवल आत्मा के अस्तित्व को स्वीकार नहीं किया ह ै। बौद्ध दर्शन ‘अप्प दीवो भव’ के उद्घोष से, उपनिषद में ‘ब्रह्म सत्य जगत् मिथ्या’ के सूत्र से जैन दर्शन ‘अप्पा सो परमप्पा’ के सिद्धान्त से भारतीय दर्शन में आत्मा को माना  है । पाश्चात्य दर्शन के प्रसिद्ध दार्शनिक जीसस ने कहा है, मनुष्य सारे संसार को जीत ले, सम्पूर्ण धन दौलत को पा ले परन्तु अगर स्वयं को नहीं जाना, मन को नहीं जीता तो सब निरर्थक है । 

खोज हुई है एक विज्ञान और दूसरी धर्म की । विज्ञान ने बहुत खोजे की, चन्द्रमा तक पहुंचा है परनतु विज्ञान ने आखिरी निष्पत्ति मौन है । आइस्टिन से पूछा कि अगर तुम्हें नया जन्म मिला तो तुम क्या बनना चाहोगे, उसने कहा मैं प्लंबर तक बनना चाहूंगा परन्तु पुनः वैज्ञानिक नहीं बनना चाहूंगा । परन्तु जिन्होंने धर्म की खोज की है वह मरने के पश्चात् धार्मिक ही बनना चाहेंगे । धर्म की खोज किसी भी परिस्थिति में हो सकती, उसका प्रत्यक्ष उदाहरण है- कबीर का जीवन, रैदास का जीवन, दादू का जीवन क्या यह अपने जीवन में अमीर थे, यहां तक कि उनका जन्म कौनसी जाति में हुआ, उनके मां-बात कौन थे ये भी पता नहीं है । 

आज का मानव तनाव से भरा हुआ है । विज्ञान इतनी सुविधा दे रहा है फिर भी व्यक्ति घबराया हुआ है, बीमार है । रोग प्रतिरोधक क्षमता निरन्तर कम होती जा रही है । धनिक, नेता, शिक्ष्क, विद्यार्थी सभी मानसिक शारीरिक रूप से परेशान है कारण क्या यही खोजना जरूरी है । जब हम सोचते हैं तो देखते हैं दो-तीन कारण नजर आते हैं । एक है अहंकार । हम जब बाकी लोगों को गौण दृष्टि से देखते हैं और केवल अपने आपको महत्व देते हैं सभी अच्छा कार्यों की जिम्मेदारी स्वयं अपने ऊपर लेते हैं अहंकार की शुरूआत वही से प्रारंभ हो जाती है । दूसरा कारण है हम दुःख से दूर हो इसलिए शान्ति की खेाज बाहर कर रहे हैं । भौतिक साधनों में हमें क्षणिक सुख अवश्य लगता परन्तु वह आपको अक्षय सुख नहंी देता है । 

सुख और शान्ति को प्राप्त करना है तो हमे ंखेाज भीतर करनी चाहिये क्योंकि बीमारी अगर आंखों की है तो दवाई भी आंखों से सम्बोधित ही होगी । तनाव, अशान्ति, बेचैनी ये सभी मन की ही बीमारियां है । मन बाहर नहीं भीतर है । मन को नियंत्रित कर जब हम आत्म स्वरूप को जानेंगे । आत्म-स्वरूप को महत्व देंगे तभी आनंद को प्राप्त कर सकते हैं । आनंद को प्राप्त करने की एक ही विधि ध्यान और योग है । 

विश्व में बढ़ रहे आतंकवाद के बारे में भी अपने विचार आचार्यश्रीजी ने प्रकट किये और कहा कि आज आतंकवाद बढ़ रहा है । बहुत से निर्दोष व्यक्ति मौत के हवाले हो रहे हैं । हिंसा के द्वारा अपनी मांगों को पूरा करना चाहते हैं जो कि सरसर गलत है । अगर समस्या को निपटाना है तो प्रभु महावीर ने एक ही मार्ग बताया अहिंसा को अपनाने से ही समस्या को हल किया जा सकता   है । 

आज के कार्यक्रम में जम्मू काश्मीर राज्य के मंत्री श्री गुलचैनसिंह चाढ़क, चेम्बर आफ कामर्स के अध्यक्ष श्री राम सहाय, पूर्व विधायक व भा0ज0पा0 की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य श्री अशोक खजूरिया और प्रमुख समाज सेवी राज दलुजा प्रमुख रूप से उपस्थित थे । 

 

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

13 अगस्त, 2006: जम्मू: अहंकार, महत्वकांक्षा व भौतिकता आज के युग में तनाव के मुख्य कारण बन रहे हैं । ये उद्गर जैनाचार्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने प्रवचन में किये । 

आज यहां चातुर्मास के 34 वें दिन धार्मिक, राजनैतिक व व्यापारिक संगठनों के प्रतिनिधियों और अधिकारी वर्ग को सम्बोधित करते हुए जैनाचार्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने फरमाया कि- आज का मानव तनाव से भरा हुआ है । विज्ञान इतनी सुविधा दे रहा है फिर भी व्यक्ति घबराया हुआ है, बीमार है । रोग प्रतिरोधक क्षमता निरन्तर कम होती जा रही है । धनिक, नेता, शिक्ष्क, विद्यार्थी सभी मानसिक शारीरिक रूप से परेशान है कारण क्या यही खोजना जरूरी है । जब हम सोचते हैं तो देखते हैं दो-तीन कारण नजर आते हैं । एक है अहंकार । हम जब बाकी लोगों को गौण दृष्टि से देखते हैं और केवल अपने आपको महत्व देते हैं सभी अच्छा कार्यों की जिम्मेदारी स्वयं अपने ऊपर लेते हैं अहंकार की शुरूआत वही से प्रारंभ हो जाती है । दूसरा कारण है हम दुःख से दूर हो इसलिए शान्ति की खेाज बाहर कर रहे हैं । भौतिक साधनों में हमें क्षणिक सुख अवश्य लगता परन्तु वह आपको अक्षय सुख नहंी देता है । 

सुख और शान्ति को प्राप्त करना है तो हमे ंखेाज भीतर करनी चाहिये क्योंकि बीमारी अगर आंखों की है तो दवाई भी आंखों से सम्बोधित ही होगी । तनाव, अशान्ति, बेचैनी ये सभी मन की ही बीमारियां    है । मन बाहर नहीं भीतर है । मन को नियंत्रित कर जब हम आत्म स्वरूप को जानेंगे । आत्म-स्वरूप को महत्व देंगे तभी आनंद को प्राप्त कर सकते हैं । आनंद को प्राप्त करने की एक ही विधि ध्यान और योग  है । 

विश्व में बढ़ रहे आतंकवाद के बारे में भी अपने विचार आचार्यश्रीजी ने प्रकट किये और कहा कि आज आतंकवाद बढ़ रहा है । बहुत से निर्दोष व्यक्ति मौत के हवाले हो रहे हैं । हिंसा के द्वारा अपनी मांगों को पूरा करना चाहते हैं जो कि सरसर गलत है । अगर समस्या को निपटाना है तो प्रभु महावीर ने एक ही मार्ग बताया अहिंसा को अपनाने से ही समस्या को हल किया जा सकता   है । 

आज के कार्यक्रम में जम्मू काश्मीर राज्य के मंत्री श्री गुलचैनसिंह चाढ़क, चेम्बर आफ कामर्स के अध्यक्ष श्री राम सहाय, पूर्व विधायक व भा0ज0पा0 की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य श्री अशोक खजूरिया और प्रमुख समाज सेवी राज दलुजा, श्री आर0के0 कौल- जनरल मैनेजर दूरसंचार, श्री आलोकपुरी-एस0एस0पी0 सी0आई0डी0, श्री प्रेम गुप्ता - पूर्व पुलिस अधीक्षक, श्री अजय खजुरिया- डायरेक्टर टूरीजम, श्री विनोद शर्मा- म्यूनिसपल कमिश्वरन, श्री सुदेश गुप्ता - रिटायर्ड जज, श्री जफर खान- कारपोरेटर, श्री रमाकान्त दुबे- अध्यक्ष विश्व हिन्दु परीषद, श्री मोहनसिंह चैहान- प्रमुख समाज सेवक आदि प्रमुख रूप से उपस्थित थे । 

प्रचार विभाग

 

मन में समता भाव आने से मोक्ष मिलता है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

14 अगस्त, 2006: जम्मू: विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता, जैन धर्म दिवाकर, योगीराज, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- मन में समता का भाव रखने से मोक्ष मिलता है । जीवन में आने वाली चुनौतियों को स्वीकार करना चाहिए । मनुष्य में अनेक तरह की विषमताएं पाई जाती हैं । स्वभाव से सम्बन्धित कोई क्रोधी है तो कोई शान्त है । कोई मधुर वचन बोलने वाला है तो कोई कटु वचन बोलने वाला है । इसी कद, रूप आदि तरह की अनेक विषमताएं अक्सर हर मानव मात्र के आस पास दृष्टिगोचर होती है । 

एक रूपक के माध्यम से आचार्यश्रीजी ने समझाया । एक राजा की दो रानियां हैं । एक रानी का नाम है कुमति जिसका आचरण नाम के अनुरूप है वह ममता से भरी हुई है । बुद्धि भ्रष्ट है तो उसका द्वार नरक है और दूसरी का नाम सुमति है । वह भी यथानाम तथा गुण सम्पन्न समता उसके पास में है और सुशील है तो वह मोक्ष में जाने की अधिकारी है वह जरूरी मोक्ष जाएगी । 

भक्तामर पर चल रहे प्रवचन में आचार्यश्रीजी ने कहा जो ज्ञानी हैं उनकी तरह न होते हुए भी मैं भक्ति के वशीभूत होकर आपकी स्तुति के लिए उद्यत हुआ हूँ । जैसे एक हिरणी अपने बच्चे को सिंह के चंगुल में फंसे हुए उसका सिंह जितनी शक्ति के न होने पर भी सिंह का सामना करती है ऐसे उद्गार आचार्य मानतुंग प्रभु ऋषभदेव की स्तुति में प्रकट कर रहे  हैं । 

भक्तामर की इस गाथा का प्रभाव व्यक्ति के जीवन में आता है । अगर व्यक्ति इसका निरन्तर स्मरण करता रहे । एक व्यक्ति रास्ते से जा रहा था । रास्ते से ही एक संत का आना  हुआ । उस धार्मिक व्यक्ति ने संत को आते हुए देखकर वंदन किया और संत को अपने घर आहार पानी हेतु ले गया । संत अपना आहार इत्यादि लेकर जारहे थे कि उस व्यक्ति ने अपनी समस्या रखी । संत ने तब उसको संस्कृत भाषा में रचित भक्तामर स्तोत्र की पांचवी गाथा का विधि सहित अनुष्ठान करने को कहा । समय अपनी गति से आगे बढ़ने  लगा । 

एक बार वह व्यक्ति अपना सामान इत्यादि लेकर जहाज से प्रस्थान कर रहा था कि रास्ते में समुद्री तूफान आया । वह व्यक्ति भविष्य को सोचकर चिन्तित होने लगा । अचानक उसे संत द्वारा दिया गया मंत्र याद आया । उसने उसका जाप किया । तभी वहां पर एक देव ने प्रकट होकर उसे देवाधिष्ठित मणि दी और तथास्तु कहकर चला गया । उस व्यक्ति की समस्या समाप्त हो गई वह अपने गंतव्य स्थान पर राजी खुशी पहुंच गया । 

 

स्वतंत्रता दिवस पर शान्ति का संकल्प लें

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

15 अगस्त, 2006: जम्मू: विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता, जैन धर्म दिवाकर, योगीराज, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- आज का दिन पन्द्रह अगस्त का दिवस आज से 59 वर्ष पूर्व हमें आजादी मिली । हमारा देश आजाद हो गया पर क्या हम आजाद हुए हैं यह एक विचारणीय प्रश्न है । देश को अंग्रेजों के चंगुल से हमने छुड़ा तो लिया पर हम स्वयं ही उलझ गए । देश को स्वतंत्र हमने कर दिया । हमारी स्वतंत्रता के लिए हमें एक संकल्प, एक विश्वास की आवश्यकता है । एक संकल्प पूरे राष्ट्र, पूरे विश्व को बदल सकता है । ऐसा ही संकल्प बापू गांधी ने किया था । भारत मां जब तक गोरे अंग्रेजो में जकड़ी रही तब तक उन्होंने चेन की सांस नहीं ली । गांधी की एक आवाज पर सारे भारतवासी एक हो गए । उनके आगे बड़े-2 नेता झुक गए । उनके भीतर सत्य का बल था । अहिंसा की ज्योति थी । ऐसा संकल्प हमारे भीतर जग जाए तो देश का नक्शा ही बदल जाए । 

आज हम सोचें हमारा देश किस ओर बढ़ रहा है । व्यक्ति में शान्ति होगी तो देश शान्तिमय   होगा । प्रभु महावीर ने परिवार धर्म, नगर धर्म, समाज धर्म और देश धर्म बतलाया है । भगवान ने द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव के साथ देश काल परिस्थिति का आकंकलन करने के लिए कहा है । हम आज याद करें उन वीरों की कुर्बानी । भगतसिंह, राजगुरू सुखदेव, सुभाषचन्द्र बोस, चन्द्रशेखर आजाद । इन वीरों के अन्तिम शब्द थे ‘खुश रहो अहले वतन हम तो सफर करते हैं । हमारा जीवन रहे नारहे हमारा देश आजाद हो जाए ऐसी भावना इनके भीतर थी । मार्च 1857 की घटना हम सबकी आंखों के आगे आती है जब मंगल पाण्डे को फंांसी की सजा सुनाई और अंग्रेजों ने भारतवासियों के साथ बहुत बड़़ा सलूक किया था । इस आजादी में कितने नेताओं ने अपना जीवन बलिदान कर दिया । उन सभी नेताओं का एक ही नारा था ‘अं्रग्रेजो भारत छोड़ों’ भारत हमारा है । 

महात्मा गांधी चम्पारण में गए । वहां पर वे भाषण दे रहे थे । उनकी सभा में एक वृद्धा मां बैठी थी जिसकी साड़ी फटी हुई थी । भाषण पूर्ण होने पर गांधी ने वृद्धा मां से मिलकर उनहें कहा कि हे मां शरीर को पूरी तरह ढ़क दिया करो । उस वृद्धा मां ने कहा- अगर तन ढ़कने योग्य कपड़े होते तो वैसे ही पहनकर आती । उस दिन गांधी के दिन में एक संकल्प जागा जब तक मेरी मां बहिनों को तन ढ़कने के लिए कपड़ा नहीं मिलेगा तब तक मैं लंगोठी और लाठी के सहारे अपने मार्ग को आगे बढ़ाऊँगा । 

देश की आजादी का जश्न आज पूरा भारत मना रहा है । हमारा देश आजाद हो गया पर हमें अभी आजादी नहीं मिली । आज के राजनेता केवल राजनेता हैं उनके भीतर धर्म की भावनाएं नहीं हैं । पहले राजनेता राजनेता ही नहीं अपितु धर्म नेता भी थे । आज पटेल होते तो कश्मीर की समस्या कभी हल हो जाती । आज के दिन इस देश को एक भय है आतंकवाद का इसलिए स्थान-2 पर सुरक्षाएं बढ़ाई जा रही हैं । देश से आतंकवाद को मिटाना होगा । अहिंसा शान्ति का पाठ पढ़ाना होगा । महावीर के मैत्री करूणा को बहाना होगा । हमारा जीवन कहां जा रहा है । प्रभु की अहिंसा से हम आतंकवाद मिटा सकते हैं परन्तु जीवन में संकल्प की कमी है । देश खुशहाॅल होगा तो जीवन भी खुशी से भर जाएगा और जीवन तथा देश को खुशहाल करने की लिए शान्ती में बिताने के लिए ध्यान की अत्यन्त आवश्यकता है । हम अपने जीवन को कृतज्ञता से भरें । भीतर से हम समृद्ध हों । देश की अशान्ति भगवान महावीर के ध्यान से ही ठीक हो सकती है । आज के नेता भूल गए हैं कि पूर्व के नेताओं ने देश को आजाद करने के लिए कितनी कुर्बानियां दी है । आज के राजनैताओं को सुधरना होगा । आज के दिन हम देश समाज के बारे में   सोचें । योग साधना सामायिक को भीतर उतारें । आप सबका मंगल हो ऐसी हार्दिक भावना । 

आज के दिन जैन युवक संघ द्वारा स्वतंत्रता दिवस पर सांस्कृतिक कार्यक्रम पेश किए गए जिसमें जैन स्कूल के बच्चे, न्यू एरा एनवायरामेन्ट स्कूल के बच्चे, आत्मानंद महिला मण्डल, श्रमण संस्कृति मंच, जैन तरूणी मण्डल ने अथक प्रयास किया । इन बच्चें एवं सभी संघ के पदाधिकारियों को हार्दिक शुभ-कामनाएं । 

 

जन्माष्टमी पर कृष्ण के गुणों को भीतर उतारें

जन्माष्टमी पर गौरक्षा का संकल्प करें

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

16 अगस्त, 2006: जम्मू: विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता, जैन धर्म दिवाकर, योगीराज, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- आज जन्माष्टमी का दिन है । श्रीकृष्ण के जन्म से अष्टमी अमर हो गई । पूर्णिमा बुद्ध के नाम से अमर हुई । तृतीया ऋषभदेव भगवान के पारणे से अमर हुई । नवमीं राम के नाम से अमर हो   गई । महापुरूष धरा पर अवतरित होते हैं धरा का कल्याण करने के लिए । कृष्ण ने जन्म के साथ ही अष्टमी तिथि को सदा-सदा के लिए अक्षय कर दिया । कृष्ण का जन्म कैसे  हुआ ? कैसे उनका लालन-पालन हुआ ? देवकी मोटी-मोटी दीवारों के अन्दर बंद थी । जेल खाने के ऊपर बड़े-2 ताले लगे हुए थे ऐसी परिस्थिति में कृष्ण का जन्म होता है । कृष्ण जन्म के समय तूफान लेकर अवतरित होते हैं । यमुना में बाढ़ आ जाती है । अब तक जो प्रतिकूलताएं थी जन्म होते ही वे सब अनुकूलता में परिवर्तित हो गई । पहरेदार को नींद लग गई । ताले स्वयं टूट गए । जब वे गोकुल की ओर जा रहे थे तो रास्ते में नदी ने भी रास्ता दे दिया । भारी बरसात अब धीमी पड़ गई । ऐसी परिस्थिति थी उनके जन्म के समय । 

कृष्ण का लालन-पालन एक गांव में हुआ । वह गांव बहुत बड़ा समृद्ध नहीं था । वे जहां खेले, जहां पले वह स्थान ग्रामीण था । वे गुरूकुल में पढ़े । आचार्य के पास रहे । आचार्य ने उनके साथ और अन्य बच्चों के साथ कोई भेद-भाव नहीं किया । जो कार्य कृष्ण ने किया वही कार्य सुदामा ने किया । कृष्ण राजा का बेटा था । सुदामा गरीब ब्राह्मण का बेटा था फिर भी गुरूकुल में कोई भेद-भाव नहीं था । आचार्य उन्हें जंगल में लकड़ी काटने भेजते । समीधा लाने के लिए भेजते । कृष्ण सम्पूर्ण कलाओं से युक्त थे । उनका बचपन उल्लासपूर्ण वातावरण में बीता । कृष्ण को मक्खन प्यारा   था । वे अपनी मां यशोदा से कहते हैं माँ मेरे पीछे गाय हो, मेरे आगे गाय हो, मेरी अगल बगल में गाय हो । मैं गायों के बीच रहूँ तो बहुत आनंद लगता है । कृष्ण को बांसुरी प्यारी थी । जब वे बांसुरी बजाते तो गोपीयां इकट्ठी हो जाती । उनकी बांसुरी की तान सुनकर अनेको ंपशु-पक्षी शान्त हो जाते । उन्हें मयूर पंख भी बहुत प्यारा था । आप उनके चित्र में देखते हैं उनके सिर पर मोर मुकुट लगा रहता है । उनके बाल्यकाल से यौवन अवस्था तक मथुरा, वृद्धावन तक का सारा वातावरण बदलता है । 

बचपन के बाद जैसे युवावस्था प्रवेश करती है तो एक विद्रोह मन में आता है । कंस के साथ युद्ध होता है और कंस उस युद्ध में मारा जाता है । युवाकाल में उनकी यह सबसे बड़ी घटना है । उन्हें कुरीतियां पसन्द नहीं थी । कंस उस समय नरमेध यज्ञ कर रहे थे । इस यज्ञ में बड़े-2 राजाओं को आहूत कर किया जाना था । कृष्ण को जब यह पता लगा तो उन्होंने युद्ध करके उन राजाओं को छुड़ाया । कृष्ण के जीवन दर्शन से उनका व्यक्तित्व क्रान्तिकारी प्रतीत होता है । वे साथ में नम्र भी । सहपाठियों के साथ भाई जैसा व्यवहार करते हैं । दुर्योधन के समय में कृष्ण नहीं चाहते थे कि युद्ध हो । इस हेतु उन्होंने प्रार्थना की कि तुम पाण्डवों को पांच गांव ही  दे । पर दुर्योधन को यह बात अच्छी नहीं लगी तो कृष्ण ने जंग के लिए तैयार होने को कहा । वे जन परम्पराओं के विराधी थे । बलि प्रथा उन्हें अच्छी नहीं लगती थी । जब गांवों में बरसात नहीं होती तो लोग लाखों करोड़ों मन दूध यमुना में बहाकर इन्द्र को प्रसन्न करते थे । उन्हें यह बात अच्छी नहीं लगती । उस समय उन्होंने ग्रामवासियों को गोवर्धन पर्वत की पूजा करने हेतु कहा । श्रीकृष्ण ने सत्य की स्थापना की । उनके जीवन में संतुलन था चाहे वह धर्म क्षेत्र, युद्ध क्षेत्र या न्याय क्षेत्र हो । 

मित्रता देखनी हो तो कृष्ण की मित्रता देखिए । अनेक वर्षों के बाद सुदामा कृष्ण से मिलने हेतु राजनगरी जाते    हैं । कृष्ण उन्हें पहचानकर गले से लगाते हैं अपनी अश्रुधरा से सुदामा के पांव धोए जाते हैं सोचो विचारों हृदय कितना पवित्र होगा उनका । कृष्ण ने उस समय सुदामा के कच्चे चांवल भी खाये । युधिष्ठिर के समय में राजसूयज्ञ होना था । उस समय सबके काम बंट गये । कृष्ण के लिए कोई काम ना बचा तो कृष्ण ने युधिष्ठिर को पूछकर सभी अतिथियों के पांव धोने का काम ले लिया । उनमें कोई अहंकार नहीं था । कर्तापन भी नहीं था । कृष्ण ने सार की बात करते हुए अर्जुन से कहा कि तुम कर्Ÿााभाव को छोड़ दो । साक्षी-भाव में आ जाओ । गीता का नवनीत उनके अध्यात्म से भरा हुआ है । गीता में उन्होंने कहा- आत्मा अजर अमर है उसे कोई काट नहीं सकता, जला नहीं सकता, गला नहीं सकता, बहा नहीं सकता । प्रभु नेमीनाथ के समय श्रीकृष्ण ने सभी ग्रामवासियों को अध्यात्म प्रेमियों को संयम लेने हेतु प्रेरित किया और उस समय उनके परिवारवालों की एवं गांव की रक्षा की जिम्मेदारी अपने ऊपर ली । कृष्ण ने अपनी आत्मप्रिय रानियों को भी दीक्षार्थ प्रेरित किया । हम कृष्ण की वाणी को प्रेक्टिकल रूप में अपनाएं । दीन दुःखियों की सेवा करें । 

आज भारतवर्ष में गायों की कमी होती जा रही है । उनकी ओर ध्यान नहीं दिया जाता । प्रत्येक व्यक्ति उनके दूध को तो पीता है परन्तु उनकी रक्षा नहीं करता । ऐसी स्थिति में गौमाता की रक्षा करना आवश्यक है । हम इस हेतु जन्माष्टमी पर गौशाला में गायों की रक्षा हेतु संकल्प करे । एक-एक गाय के लिए एक साल की पूंजी का व्यय करें या फिर एक  सुन्दर गौशाला बनाने का संकल्प करें । मेरा आपसे नम्र अनुरोध है हमारी समाज मे ंधन की कमी नहीं अपितु योजनाओं की कमी  है । हम कृष्ण के गुणों को जीवन में उतारें । जप, तप, सेवा करें । 

आज संक्रान्ति का दिवस है । जन्माष्टमी के साथ संक्रान्ति का एक सुन्दर मेल आज के दिवस पर हुआ है । आज सिंह की संक्रान्ति भादों का महीना । कृतिका नक्षत्र एवं 45 मुहूर्त की संक्रान्ति है । हम अपने जीवन में छोटे-2 प्रत्याख्यान करें । अरिहंत परमात्मा श्री सीमंधर स्वामी भगवान की भक्ति करें । जीवन की बुराईयों को त्यागें और आज के दिन सभी भाई बहिनों को उणोदरी तप {भूख से कम खाना} का संकल्प है । 

 

अभेद भाव से परमात्म प्राप्ति होती है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

17 अगस्त, 2006: जम्मू: विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता, जैन धर्म दिवाकर, योगीराज, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- भक्तामर स्तोत्र का पंचम श्लोक आचार्य मानतंुग ने बहुत भक्ति की थी प्रभु आदिनाथ की । प्रभु आदिनाथ उनके कण-2 में रमे हुए थे । वे कहते हैं मैं तुम्हारी भक्ति के वश होकर शक्ति ना होेते हुए भी भक्ति कर रहा हूँ । जिस प्रकार एक हिरणी का बचचा शेर के समक्ष आ जाता है तो शेर से बच्चे को बचाने के लिए हिरणी शेर का सामना नहीं करती । मैं कुछ भी नहीं जानता फिर भी तेरी थकत् करने को तैयार हुआ हुं । संसार का प्रेम हमेशा अधोगति की ओर ले जाता है जिस प्रकार हिरणी का प्रेम उसके बच्चे पर ले गया । मां का प्रेम हमेशा बच्चे पर होता है । असली प्रेम तो परमात्मा का प्रेम है । ममता के स्थान पर आज की माताओं को समता लानी होगी । संतान के मोह को छोड़कर निर्मोंही होना होगा और अपने बचचे को परमातमा की ओर अग्रसर कना होगा । धर्ममार्ग पर चलाना होगा । प्रेम एक आन्तरिक घटना है । प्रेम हृदय से नहीं बुद्धि से होता है । बुद्धि से गणधर गौतम भगवान के पास आए थे पर हृदयगत प्रेम हुआ तो समर्पित हो गए । 

सोऽहं जो तू है वो मैं हूँ । हम सबका भेद मिट जाए तो यह आत्मा परमात्म स्वरूप बन  जाए । हम मानते हैं कि मैं कुछ हूँ । एक प्राणी दूसरे प्राणी को सहन नहीं करता । हर प्राणी शक्ति प्रदर्शन करना चाहता है । हम प्रदर्शन को दोड़कर भक्ति में आ जाए । आचारांग सूत्र में सोऽहं का विस्तार से वर्णन दिया हुआ है । मानव नहीं जानता कि वह कहां से आया है पूर्व, पश्चिम, दक्षिण, उत्तर दिशा से आया हँू । हम सारी योनियों में भ्रमण कर आए हैं, ये वीतरागी महापुरूषों के वचन हैं । 

जीव अजीव का क्या बोध है । इसे जानने के लिए हमें स्वयं तक पहुंचना होगा । हमारा शरीर अजीव है और हम यानि हमारी आत्मा जीव है । बुद्धि लेश्या की तरह है जिसमें अनेक रंग भरे हुए हैं । बुद्धि झुक जाती है, तुम ज्ञानी, पंडित हो तो झुक जाओ । मेरा मन, वचन, काया कुछ भी नहीं । मैं तो केवल एक शुद्धात्मा हूं । कहने मात्र से ही काम नहीं होगा । शुद्धात्मा स्थिति का अनुभव करना आवश्यक है । सबको अपेन समान समझो । तुम्हारी जागरूकता और विवेक की आवश्यकता है । माँ त्रिशला ने प्रभु महावीर को जन्म दिया वह शीलवती, धर्मवान थी । उनके संस्कार बहुत उच्च थे तभी ऐसे महापुरूष का उस घर में पदार्पण हुआ । तुम जैसा कार्य करोगे तुम्हारे बच्चे भी वैसा ही कार्य करेंगे । तुम धर्म करोगे तो बच्चे भी धार्मिक बन जाएंगे । 

अगर तुम्हें कह दिया जाए कि तुम परमात्मा हो फिर तुम्हें क्या चाहिए । कबीर कहते हैं- ‘घूंघट के पट खोल रे, तोहे पिया मिलेंगे, कटुक वचन मत बोल रे, तोहे पिया मिलेंगे ।’ अहंकार क्रोध का घूंघट जो हमने धारण किया है उसे खोल दो तभी परमात्म रूपी पीया के दर्शन होंगे, उनकी प्राप्ति होगी । घट-2 में परमात्मा वास करता है । भगवान को केवलज्ञान की प्राप्ति के लिए अनेकों प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ा तीन ज्ञान उन्हें जन्म से थे चैथा ज्ञान दीक्षा लेते ही हो गया फिर भी पंचमज्ञान, केवलज्ञान प्राप्त करने के लिए अनेक स्थानों की यात्राएं करनी पड़ी । साढ़े बाहर वर्ष की साधना की । पूरी साधनाकाल में वे मौन रहे । मुनि वही है जो मौन रहे । हम मौन को अपने भीतर उतारे । हमारा मन समाधि में नहीं लगता तो हमें मौन का सहारा लेना आवश्यक है । जो बात है उसे यथातथ्य कहो । उसको बहुत बड़ी बनाकर कहने से भी कर्मों का बन्धन होता है । अपनी इन्द्रियों को भीतर समेट लो । अहंकार तोड़ों और सरलता में आ जाओ । 

हमें सम्यक् दृष्टि की आवश्यकता है । आज तक हम मिथ्यादृष्टि में जी रहे हैं । जब सम्यक् दृष्टि प्राप्त होती है तब शरीर को नहीं आत्मा को महत्व दिया जाता है । मन गुप्ति, वचन गुप्ति, काय गुप्ति की साधना करो । अपने समय को व्यर्थ मत गंवाओं । हमारा लक्ष्य वीतरागता का है । 

 

श्रद्धा से इच्छा पूर्ण होती है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

18 अगस्त, 2006: जम्मू: विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता, जैन धर्म दिवाकर, योगीराज, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- आचार्य मानतुंग की विनय भक्ति उन्होंने देवाधिदेव आदिनाथ प्रभु के समक्ष स्वयं को छोटा दिखलाया है । भक्तामर का काव्य विनय भक्ति से परिपूर्ण है । प्रत्येक काव्य में कवि ने अपने आराध्य को उपमाओं से उपमित किया है । भक्ति, प्रेम, समर्पण, विनय कोई भी शब्द ले लो सबका अर्थ एक ही है । हमको इन सबके द्वारा निर्जरा की ओर आगे बढ़ना है । 

अहिंसा यानि किसी को कष्ट नहीं देना । वचन से कटु नहीं बोलना । किसी की निन्दा नहीं  करना । किसी को हीन भी नहीं समझना । बात करते हुए आगे पीछे बोलना दोष-स्वरूप है । सुनी सुनाई बातों को बढ़ा चढ़ाकर पेश करना अधिक कर्म-बंधन का कारण है । अपने व्यवहार में हम माया मृषा का कथन ना करे । माया करते हुए झूठ बोलना अधिक कर्मों का बंधन होता है । हम प्रभु महावीर की अहिंसा को समझें । अपने को बड़ा कभी साबित ना करें । माया से नीच गोत्र का बंधन होता है । पुरूष माया करे तो स्त्री इस तरह नपुंसक, तीर्यंच, नरक तक व्यक्ति जा सकता है । हम अपनी बुद्धि को साफ रखने के लिए कितने झूठ बोलते हैं परन्तु आपने जो कर्म किए हैं उससे बच नहीं सकते । अपनी बुद्धि को अलग रख परमात्म भक्ति करो । इस शरीर को साधना की ओर ले जाओ । आत्म-गुणों का चिन्तन करो । हर कार्य करते हुए भेद-ज्ञान अपनाओ । एक साधक के लिए श्रद्धा आवश्यक है । भावनाएं हमेशा टिकती  नहीं । श्रद्धा अडिग रहती है । श्रद्धा, समर्पण और जिम्मेदारी तीन बातें जीवन में आ जाएं तो हमारा जीवन सुन्दर हो जाएगा । हम एक व्यक्ति को ध्यान साधना से जोड़ते हैं तो अधिक निर्जरा कर लेते हैं । ध्यान से अनंतों जन्म कम हो जाते हैं । ध्यान एक अग्नि है जो हमें पवित्र और शुद्ध करती  है । 

सोऽहं एक शब्द जीवन में आ जाए तो जीवन सुखमय हो जाए । नमो सिद्धाणं का जाप, सिद्धा सिद्धिं मम दिसन्तु का जाप करते हुए स्वयं को उसमें लगा दो । जाप जपते हुए सिद्ध ज्योति में समा जाओ । होशियारपुर की एक जीवंत घटना है । एक गरीब व्यक्ति मजदूरी करता है । जैन संत से उसका मिलन होता है तो जैन संत उसे लोगस्स का पाठ करने के लिए बताते हैं, उसे पाठ का अर्थ नहीं आता फिर भी भावों में रमकर गुरूआज्ञा को जानता हुआ वह पाठ करता चला जाता है । पाठ करते-2 उसकी समृद्धि बढ़ गई । अनेकों देवी देवताओं ने उसे दर्शन दिये यह सब हमारी श्रद्धा और भक्ति का बल है । आज उसका जीवन बदल गया है । वह जैन श्रावक बन चुका है । हम अहंकार को छोड़कर श्रीचरणों में समर्पित हो जाएं । जहां भगवान बिराजते हैं वहां शासनदेव, शासनमाता अवश्य होते हैं वे ही शासन के रक्षक होते हैं । भक्तामर के हर श्लोक में शासनमाता प्रसन्न होकर इच्छित वरदान प्रदान करती है । 

आज तक जो जीवन जीया वह सब व्यर्थ हो गया । पांचवे श्लोक की कहानी है । सोम क्रान्ति नाम का मंत्री का पुत्र था । वह पाठशाला में जाता था । तीव्र बुद्धि होने के कारण वह सब कुछ जल्दी याद कर लेता । एक दिन वह पाठशाला जा रहा था । रास्ते में कुछ बच्चे गुल्ली डण्डा खेलते हुए दिखाई दिये । उसका भी मन खेलने को हो गया । उसने एक बच्चे को बुलाकर खेलने की इच्छा प्रकट की । बच्चे ने उसे डण्डा दे दिया । वह अभी तक खेल ही नहीं पाया था डण्डा टूट गया । उसने विनयपूर्वक बच्चे से कहा कि मैं तुम्हें नया डण्डा ला देता हूँ । बच्चे ने उसे देवल बढ़ई का नाम बता दिया । वी बढई के पास पहुँचा और डण्डा बनाने के लिए प्रार्थना    की । दूसरे दिन जब वह डण्डा लेने गया तो उसके हाथ में एक किताब थी । देवल बढ़ई ने उसे उस किताब के बारे में पूछा तो सोम क्रान्ति ने बताया कि यह जैन धर्म का पवित्र ग्रन्थ भक्तामर स्तोत्र है । बढ़ई ने उसे सुनाने के लिए कहा । तो सोम क्रांति नेउसे पांचवा श्लोक मंत्र सहित प्रदान किया । श्लोक प्रदान करने से पूर्व सोम क्रान्ति ने उसे जैन धर्म का श्रावक बनने हेतु प्रार्थना की । वह श्रावक बन गया । देवल बढ़ई ने उसे दो डण्डे दिये और सोम क्रान्ति चला गया । बढ़ई ने मंत्र आराधना के साथ भक्तामर की साधना की । साधना से पूर्व शरीर की शुद्धि की । आराधना करते हुए शासनमाता श्री चक्रेश्वरी देवी सिंह पर बैठी ध्वज हाथ में लिए प्रकट हुई और मनोकामना पूर्ति के लिए कहा । देवल बढ़ई ने धन की मांग की तो शासनमाता ने बताया कि यहां से ईसान कोन में पीपल का बहुत बड़ा पेड़ है उसकी चारों ओर खुदाई करना अपार धन की प्राप्ति होगी । अगले दिन देवल बढ़ई ने पीपल के चारों ओर खुदई की तो उसे धन सम्पदा प्राप्त हुई । उस धन सम्पदा से उसने सर्वप्रथम उपाश्रय बनवाया । धर्म-ध्यान की प्रेरणा दी । वह सरल आत्मा श्रावक था उसके अनंतर उसने अपनी इच्छाएं पूर्ण की । इस प्रकार व्यक्ति धर्म से धनवान होता है । हम धन आने के बाद धर्म को ना भूलें । आपके पास लक्ष्मी हो तो उसका सही उपयोग करना । 

अध्यापकों के लिए विशेष आत्म ध्यान शिविर

आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज की सान्निध्य में डिविजनल कमीश्वर श्री प्रमोद जैन की प्रेरणा से जम्मू शहर के विभिन्न सरकारी विद्यालयों के अध्यापकों को आत्म: ध्यान साधना का प्रशिक्षण दिया जा रहा है । इसके अन्तर्गत उन्हें जिम्मेदारी, समय की प्रतिबद्धता, लीडरशिप की क्वालिटी, हैप्पीनेस एवं शुद्धात्मा का ज्ञान प्रदान किया जा रहा है । साथ ही योग, ध्यान और प्राणायाम का ज्ञान भी प्रदान किया जा रहा है । आचार्यश्रीजी की भावना है कि इन सभी अध्यापकों को प्रशिक्षित करके पूरे जम्मू शहर के सभी विद्यालयों के बच्चों को आत्म ज्ञान और ध्यान की शिक्षा दी जाए । साथ ही काॅपरेटिव बैंक के स्टाॅफ हेतु भी विशेष ध्यान शिविर चल रहा है उन्हें भी यह ज्ञान दिया जा रहा है । प्रातः 10.00 से   12.00 बजे तक अध्यापकों के लिए एवं शाम 5.15 से 7.15 बजे तक बैंक आॅफिसर्स के लिए ये क्लासें चल रही है । श्रमण संघीय मंत्री श्री शिरीष मुनि जी महाराज सभी अध्यापकों को साधना का प्रशिक्षण दे रहे हैं । जम्मू श्रीसंघ इसका सुन्दर आयोजन कर रहा है । ये सभी कोर्स श्री नैकचंद मैमोरियल हाॅल, जैन स्कूल, रानी पार्क, जम्मू में चल रहे हैं । 

 

भक्ति से बुद्धिहीन बुद्धिमान बन जाता है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

19 अगस्त, 2006: जम्मू: विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता, जैन धर्म दिवाकर, योगीराज, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने श्री नेकचंद मैमोरियल हाल, जैन स्कूल में अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- आचार्य मानतुंग ने भक्तामर स्तोत्र के अन्तर्गत अपने जीवन का सार प्रस्थापित किया है । उनकी भक्त सर्वोपरि है । वे कालों की बेड़ियों में बंधे हुए थे । राजा भोज ने उन्हें कारागृह में डाल भक्ति की परीक्षा लेनी चाहिए । भक्तामर स्तोत्र के प्रथम छः श्लोक भूमिका समय है । छठे श्लोक के अन्तर्गत आचार्य मानतंुग भक्ति करते हुए कहते हैं मैं अल्पशास्त्रों का ज्ञाता हूं । विद्वानों के मध्य हंसी का पात्र हूं । आपकी भक्ति मुझे वाचाल बना रही है । आचार्य उपमा देते हुए कहते हैं कि जिस प्रकार वसन्तु ऋतु के आने पर आम्र मंजरी पेड़ों पर लद जाती है, उसे देखकर कोयल गूजने लगती है । उसी तरह प्रभो मैं भक्ति के वश हुआ । आपकी भक्ति कर रहा हूं । 

भक्ति अकेला व्यक्ति नहीं कर सकता । ध्यान अकेला व्यक्ति कर सकता है । भक्ति दो के बीच का संबंध है । आप गुणों के समुद्र हैं, मुनियों के ईश्वर हैं ऐसी उपमाएं भगवान आदिनाथ के लिए आचार्य दे रहे हैं । निमिŸा और उपादान का संबंध होगा तभी कार्य पूर्ण होगा । जैसे पेन है पर स्याही नहीं तो पेन कुछ नहीं कर सकता । गाड़ी है पर ड्राईवर नहीं तो गाड़ी स्वयं नहीं चल सकती । दर्द के लिए दवा खुद खानी पड़ती है । परमात्मा स्वयं नहीं आता, तुम्हें दो कदम उस ओर बढ़ाने होंगे । तुम भक्ति, श्रद्धा, प्यास रखोगे और गहराई में जाओगे तभी यह सब संभव होगा । हास्य कर्म-बंध का कारण   है । हसो ऐसे की कर्मबंधन ना हो और मुस्कान भीतर हो । प्रस्तुत श्लोक में परिवार शब्द का प्रयोग हुआ है । परिवार यानि चारों ओर से वार होना । वार सुख दुःख के मान अपमान के हमें इन वारों में नहीं अटकना, इनसे पार होना है । जब मान अपमान सुख दुःख आए तब स्वयं को अलग कर लो । शरीर से आत्मा को भिन्न कर लो । शुद्धात्म भाव भीतर ले आओ तो कर्म-बंधन नहीं होगा और निर्जरा   होगी । 

संसार में दुःख है, उसका कारण है, उसका उपाय है और उससे मुक्ति है । जो सुख दुःख के ऊपर उठ गया वही साधक है । आचार्य कह रहे हैं मैं आपकी स्तुति के बिना नहीं रह सकता क्योंकि आम्र मंजरी खिलने पर कोयल अपने मीठे स्वर नहीं रोक सकती । मानव एक देहिक प्रेम का प्रतीक है । यह देहिक प्रेम संसार लम्बा करता है । तुम स्वयं से घृणा मत करो । गलत कार्य हुआ है तो उसे शरीर का कार्य जानते हुए स्वयं यानि आत्मा से अलग करके प्रायश्चित कर लो । तुम शुद्ध हो आजोगे । आचार्य को कारागृह में भक्ति का निमित्त मिला । उन्होंने गुरू की सुन्दर व्याख्या की । जो संसार व्यक्ति है वह गुरू से प्रेम करे । गुरू वह जो मुक्ति की ओर ले जाएं । गुरू ऐसा हो जिसने परमात्मा से मिला दिया हो । हम सबका अहोभाग्य है हमें जैन कुल मिला । धर्म श्रवण मिला । संत दर्शन मिले अब हम निर्जरा से ना चुके । भक्तामर स्तोत्र से अनंत निर्जरा होती है और हम मुक्ति के नजदीक पहुंचते हैं । भक्ति ऐसे करो कि मुक्ति के द्वार खुल जाएं । सामायिक करने बैठो तो स्वयं को संसार से अलग कर लो और परमात्मा से संबंध स्थापित कर लो । यह जीवन दुबारा नहीं मिलेगा । जितना भी जीवन शेष है उसे प्रेम नम्रता को बीताते हुए स्वीकार करो । जो स्वीकारेगा वह मुक्ति के नजदीक पहुंच जाएगा । प्रभु महावीर का धर्म गरिमा से परिपूर्ण है । भीतर से श्रद्धा की कोयल गूंजती है जब हृदय में आम मंजरी खिलती है । श्रद्धा नहीं तो कुछ भी नहीं हो सकता । 

काशी नरेश के दो बेटे थे । एक का नाम भुपाल और दूसरे का नाम भुजपाल था । बड़ा बेटा निरक्षर   था । अधिक पढ़ाई करने पर भी कुछ प्राप्त नहीं कर पाता । राजा के समझाने पर आचार्य के समझाने पर भी उसे विद्या प्राप्त नहीं हुई । छोटा बेटा तीक्ष्ण बुद्धि से सम्पन्न था । भुपाल को भी अधिक पढ़ाया गया परन्तु उसका परिणाम कुछ न निकला । एक बार जैन मुनि से मिलन हुआ भुपाल ने अपनी व्यथा उनके समक्ष रखी । मुनि ने भुपाल को भक्तामर स्तोत्र का छठा काव्य सुनाया और उसे मंत्र विधि सहित जाप करने के लिए कहा । भुपाल ने मंत्र सिद्धि के साथ भक्तामर स्तोत्र का काव्य हृदयंगम किया । शासनदेवी प्रसन्न हुई और पूछा वत्स क्या चाहते हो भूपाल ने अपनी व्यथा देवी के समक्ष रखी और बुद्धि का वरदान मांगा । देवी ने बुद्धिमान का वरदान देते हुए तथास्तु कहा । उसके अनन्तर भुपाल को सभी विद्याएं आत्मसात हो गई । सभी हैरान रह गये यह है भक्तामर स्तोत्र की छठी गाथा का एक साक्षात चमत्कार । भूपाल बुद्धिहीन से बुद्धिमान बन गया । हम भी श्रद्धा के साथ भक्तामर स्तोत्र को आत्मसात  करें । सच्ची भावना से धर्म आराधना करोगे तो मुक्ति अवश्य मिलेगी । 

पर्वाधिराज पर्युषण 21 अगस्त, 2006 से प्रारंभ होने जा रहे हैं । प्रातःकाल की मंगल बेला में 6.00 बजे से नवकार महामंत्र का अखण्ड जाप आठ दिन के लिए नेकचंद मैमोरियल हाल में होगा । उसके अनन्तर 7.00 से 7.50 तक वीतराग सामायिक एवं 8.00 से 10.00 बजे तक अन्तकृतदशांग सूत्र का वांचन एवं श्रद्धेय आचार्य भगवंत के मंगलमय प्रवचन । दोपहर 2.00 से 2.50 बजे तक वीतराग शुद्ध सामायिक । 3.00 से 4.00 बजे तक कल्पसूत्र का वांचन । सूर्यास्त से प्रतिक्रमण एवं रात्रि में 8.45 बजे से प्रार्थना का आयोजन होगा । आप सभी पर्वाधिराज के कार्यक्रमों में सम्मिलित होकर अधिकाधिक कर्म-निर्जरा का लाभ उठायें । 

 

विमल हैं श्री विमल मुनि जी महाराज

हर्षोल्लास से मनाया गया जन्म-दिवस

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

20 अगस्त, 2006: जम्मू: विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता, जैन धर्म दिवाकर, योगीराज, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने श्री नेकचंद मैमोरियल हाल, जैन स्कूल में अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- आज का यह दिवस परमादरणीय श्री विमल मुनि जी महाराज जिन्हें पंजाब केसरी, विश्व केसरी से नवाजा गया । जिनकी आवाज में एक ओज है, प्रेम का वरदान है ऐसे श्रद्धेय श्री विमल मुनि जी महाराज का जन्म दिवस है । जम्मू के आस-पास के पठानकोट से लेकर उधमपुर, आर0एस0पुरा आदि क्षेत्रों पर उन्होंने अपनी अपार कृपा बरसायी है । अपनी जीवन शैली के द्वारा उन्होंने उपकार किए हैं । 

शरीर बदलता है । बचपन जवानी बुढ़ापा आते रहते हैं । परन्तु एक शाश्वत् है आत्मा वह कभी नहीं बदलती । वीतराग मार्ग में हम सबने यही सीखा है कि आत्मा अमर है और शरीर नाशवान है । अनंत जन्मों में अनंत शरीरों को धारण किया, शरीर ने कर्म किया और उसकी मैल आत्मा पर जम गई । मन में अनेकों विचार आए और उनका प्रभाव आत्मा पर हुआ । हम आज से इस भ्रांति को दूर करें । हम शरीर नहीं शुद्धात्मा हंै । आत्मा कुछ करती नहीं मैं करता हूं यह भ्रांति है । संसार में फिसलने का कारण है । हम जीवन को निर्मल और शुद्ध बनाएं । महापुरूष की चेतना से प्रेरणा लंे । शरीर अलग-2 रूपों में है पर मूल्य चेतना का है । मूल्य आत्म-ज्ञान का है । प्रभु महावीर ने हमें आत्म-ज्ञान दीया हम उसे अपने भीतर उतारें । 

श्री विमल मुनि जी यथा नाम तथागुण सम्पन्न हैं । विमल यानि निर्मल, मुनि यानि मौन । विमल एक शुद्धता का प्रतीक है । बचपन, जवानी वृद्धावस्था में भी जीवन निर्मल है । आपके पास बड़े राजनीतिज्ञ जिनमें प्रतापंिसह कैरो, लक्ष्मणसिंह गिल आदि अनेकों राजनेताओं ने आपसे शिक्षाएं प्राप्त की । आपके पास राजनेता धर्म से जुड़ने हेतु आते थे । आपके जीवन में कभी राजनीति नहीं आई । आपकी विचारधारा एक क्रान्ति से पूर्ण थी । आप जैन धर्म को जन धर्म बनाना चाहते हैं । समाज इसी भ्रांति को पचा नहीं पाया । आपके साथ विहार के अनेकों क्षण आज भी स्मृति पटल पर अंकित हंै । एक बार होशियारपुर से कांगड़ा, नदौन, धर्मशाला की ओर विहार हो रहा था । रास्ते में कोई जैन घर नहीं । भोजन की व्यवस्था भी नहीं थी उस समय महाराजश्री ने अपनी वाणी से लोगों को धर्म सुनाया, भजन सुनाए । लोगो ंने सारी सेवा का लाभ लिया । 

आपकी वाणी में संयम, सहज, सरलता है । आपने क्रिया को जीवन में सहजता से उतारा । जीवन में मर्यादा को सहजता से पालन किया । आज वे बोल नहीं सकते पर नवकार मंत्र, लोगस्स, चैबीसी आज भी उनके भीतर चलती रहती है । ‘‘पथरीली पेंडे’’ नामक पुस्तक में उन्होंने जैन संत का जीवन दर्शाया   है । आज उनका जन्म दिन है । वे अस्वस्थ है । हम सभी यही मंगल कामना करते हैं कि वे दीर्घायु हों । स्वस्थ हो । उन्हें सन्मति नाम अति प्यारा है । उनके भीतर जैन धर्म के प्रचार प्रसार की एक तड़फ है । उस तड़फ को समाज की ओर से सहयोग नहीं मिला । उन्होंने समाज को बहुत दिया है ऐसी महान् आत्मा जिन्होंने कभी भेद-भाव नहीं किया । वे सर्वधर्म के उपासक हैं और सबका सम्मान और आदर करते हैं । हम आज उनके गुणों को देखें, दोषों को  नहीं । उनके गुणों को अपने भीतर उतारें । 

श्रमण संघीय मंत्री श्री शिरीष मुनि जी महाराज ने भी उनके साथ बीते अनुभवों को सबके साथ बांटा । इस अवसर पर विश्व हिन्दू परीषद के प्रमुख श्री रमाकान्त दूबे, महामंत्री श्री रमण जैन, श्रीमती कलावती जैन आदि सभी ने अपनी भावनाएं अभिव्यक्त की । श्रीसंघ की ओर से इस अवसर पर सभी को प्रभावना वितरित की गई । 

 

चातुर्मास का मुकुट है पर्युषण

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

21 अगस्त, 2006: जम्मू: विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता, जैन धर्म दिवाकर, योगीराज, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने श्री नेकचंद मैमोरियल हाल, जैन स्कूल में अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- महापर्व पर्युषण का प्रथम दिवस आप सबके लिए मंगलकारी हो । आपके भीतर धर्म का प्रवाह हो । ध्यान की गंगा बहे । पर्युषण बहुत महत्व रखते हैं । चातुर्मास का मुकुट है पर्युषण । पर्युषण में आप सभी भाई बहिन अपने प्रतिष्ठान बंद रखंे । आठ दिन सामायिक में बैठें । जितना भाव में डुबोगे उतना अधिक लाभ होगा । अन्तकृतदशांग सूत्र का वांचन आप सबके लिए बहुत महत्वपूर्ण है । 90 आत्माओं ने मुक्ति को पा लिया । उन्होंने एक ही भव में मुक्ति पाई है । आप प्रवचन सुनें उस वाणी को भीतर उतारें, भावना रखें हे प्रभु मेरे जन्म-मरण कट जाएं । मेरी मुक्ति हों । प्रभु की वाणी सुन्दर-वाणी है । श्री अन्तकृतदशांग सूत्र में भगवान महावीर स्वामी की वाणी । अरिष्ठनेमी की वाणी समायी हुई है । 

सम्यक् दर्शन का बीज मिल जाए, मोक्ष की टिकिट मिल जाए यही भावना भीतर   रखना । अहंकार का भाव भीतर मत लाना । धन पद का अभिमान ना करना । अष्ट दिवसीय पर्युषण में आठ मदों का त्याग करें । हमारी धर्माराधना में निर्जरा हो यही भाव रखें । जब भी आप नमस्कार महामंत्र का अखण्ड जाप करें तो उसे ऊँचे स्वर में करें । आज तक हमें सब कुछ मिला परन्तु मुक्ति नहीं मिली, उसे प्राप्त करने का यत्न करें । उणोदरी तप करें । रस का त्याग करें । शील का पालन करें । बाहर जाने के प्रत्याख्यान करें । संवर, ध्यान करें । धर्म तो भीतर से होता है । हम प्रदर्शन छोड़कर आत्म-दर्शन करें । 

आत्म-जागरण का पर्व है महापर्व पर्युषण । इस पर्युषण में ज्ञान, दर्शन, चारित्र की त्रिवेणी बहे । विश्व कल्याण की मंगल कामना से जुड़े हैं पर्वाधिराज पर्युषण । सबके लिए मंगल की कामना करें । धन का भरोसा नहीं । किसी समय कुछ भी हो जाए एकान्त में बैठकर सोचो मैंने कितने कर्म-ब्ंाधन किए हैं । इस शरीर पर कितनी आसक्ति की है । जिन केशों को रेशम जैसा समझा वे टूटकर अलग हो गए । जिन दातों को मोती की माला समझा वे टूटने के बाद हड्डी बन गई । घुटने खराब हो गए । आंखों की रोशनी कम हो गयी । इस शरीर का कोई भरोसा नहीं । बचपन, जवानी, बुढ़ापा ये तीन अवस्थाएं मानव पर आती  हैं । बचपन भोला-भाला होता है । जवानी नशे में गुजर जाती है । बुढ़ापे में कोई अंग साथ नहीं देता इसलिए जो कुछ करना है अभी कर डालो । धर्म को अभी अंगीकार कर लो । महापर्व पर्युषण हमें यही बात सिखाता है कि हम किसी का कूड़ा अपने घर में नहीं जाए । व्यर्थ की बातें ना करें । अतिमुक्त कुमार के जीव को देखो कितना सुहाना बचपन था । मेरी नांव तिरे ऐसी भावना थी और वह सचमुच तिरणहार आत्मा थी । 

एक भिखारी जीवन भर भिक्षा मांगा है । 30 साल तक भीक्षा मांगने के बाद एक दिन उसकी मौत हो जाती है । मौत के बाद आस-पास के लोग उसका अन्तिम संस्कार कर देते हैं और जिस स्थान पर वह रहता है उस स्थान की सफाई करते हैं । उस जमीन को खोदते हैं तो नीचे उन्हें अशर्फियां प्राप्त होती    है । जिन्दगी भर दुःखी रहने पर भी धन प्राप्त नहीं हो पाया उसे । पता नहीं यह कहानी सत्य है या नहीं परन्तु इसका सार अवश्य सत्य है । हमारे भीतर परम् धन है, हम उस परम् धन को ध्यान के द्वारा   जगायें । हमारी भीतर एक शुद्धात्मा है । हर आत्मा शुद्ध है । नाम कर्म से हमें शरीर   मिला । इस शरीर के द्वारा हम जिनवाणी को भीतर उतारें । जिनवचनों पर श्रद्धा करते हुए संसार को कम करें । 

एक राजा का हाथी युद्ध में हमेशा आगे रहता था । अब वह बूढ़ा हो गया था । राजा ने उसे मुक्त कर दिया । वह सरोवर पर पानी पीने गया और वहीं दलदल में फंस गया । अनेकों प्रयासों के बाद जब वह नहीं निकल पाया तो राजा ने युद्ध की भेरी बजाकर उसे बाहर निकाला । हम भी कीचड़ में फंसे हैं । जिन भेरी से हम बाहर निकले । भगवान की वाणी वह शक्ति है कि व्यक्ति संसार की कीचड़ से निकल सकता है । कमल कीचड़ में रहता है पर उससे अलिप्त रहता है । हम कमल सा जीवन जीएं । अरिहंत का जहाज आया है जिसने तिरना है वह उसमें बैठ जाएगा ।

 

आया जगत में क्या किया तन पाला के पेट ।

सहजो दिन धंधे गया रैन गयी सुख लेय । ।  

सहज कवि कहते हैं जगत् मंें क्या हम पेट पालने के लिए आए हैं । दिन भर धंधा करें और रात को सो जाएं क्या यही जीवन है ? हम विश्व मंगल की कामना करें । इस बात को लक्ष्य में रखकर दादू कहते हैं कि किसी को दुःख नहीं देना चाहिए । हर घट में आत्मा समायी है । हम सबके प्रति संतोष की भावना रखें, यही हमारा काम है । पर्वाधिराज पर्युषण में धर्म दलाली कमायें । आज के इस महाअवसर पर आप सबके प्रति मेरी हार्दिक मंगल कामनाएं । 

प्रातःकाल की मंगल बेला में विश्व शान्ति हेतु नमस्कार महामंत्र का अखण्ड जाप श्री नेकंचद मैमोरियल हाॅल में श्रद्धेय आचार्य भगवंत के मुखारबिन्द से प्रारंभ हुआ । प्रातः 7.00 से 7.50 तक साधकों ने वीतराग सामायिक का लाभ लिया इसके अनन्तर श्रीमद् अन्तकृतदशांग सूत्र का वांचन हुआ । दोपहर में कल्पसूत्र की वांचना एवं वीतराग-सामायिक का भी लाभ भाई बहिनों ने लिया । 

 

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

22 अगस्त 2006: जम्मू: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- महापर्व पर्युषण का दूसरा दिवस आप सबके लिए मंगलकारी हो । आपके भीतर समता का संदेश आए । पर्युषण यानि चारों ओर से जलाना । जो कर्म संस्कार हमारी आत्मा पर लगे हैं उन्हें दग्ध करना । अन्तकृतदशांग सूत्र गहरा सूत्र है । उसकी व्याख्या ध्यान के साथ सुनो । उससे कर्म निर्जरा होगी और तुम मुक्ति की ओर अग्रसर होवोगे । एक साथ चार काम हो सकते हैं । तुम सामायिक करो । सामायिक में सूत्र श्रवण करो जिससे ध्यान भी होगा और निर्जरा भी होगी । ध्यान पौषध, सामायिक, समाधि यह हमें अवश्य करने चाहिए । पर्युषण में आत्मा को कर्म संस्कारों से मुक्त करना है तो इनका आलम्बन लेना आवश्यक  है । आपके पास इतना पैसा है कि आप जिन्दगी भर आराम से जी लोगे । 

उत्तराध्ययन सूत्र के 32 वंे अध्ययन की पहली गाथा में प्रभु फरमाते हैं । अनंत अनादिकाल में अनंत दुःखों से मुक्ति का उपाय प्रभु फरमा रहे हैं उसे तन्मयता से श्रवण करो । प्रभु महावीर ने मोक्ष मार्ग बतलाया जिसमें सम्पूर्ण ज्ञान का प्रकाश है । अज्ञान का परिहार है और राग द्वेष के क्षय से मुक्ति की प्राप्ति है । बुद्ध भी यही कहते हैं कि राग के समान अग्नि नहीं द्वेष जाल के समान हैं । द्वेष से तृष्ण बढ़ती है । राग और द्वेष दो ही कर्म बीज हैं । संसार वृक्ष बढ़ाना है तो राग द्वेष के बीज चपन करो । प्रभु को इसलिए वीतरागी कहा जाता है क्योंकि उन्होंने अपना राग द्वेष समाप्त कर लिया । राग को कम करो । नवकार महामंत्र की आराधना करो । नवकार महामंत्र की आराधना अच्छी है । संकट की घड़ी में नवकार महामंत्र काम आता है । पूरे भाव से पठन करने पर शरीर के 70 करोड़ सेल एक्टिवेट होते हैं । नवकार मंत्र में दो ही पद सार्थक है सिद्ध और साधु । तीन शब्द हमारे समक्ष आते हैं । साधक, साधना और   सिद्ध । हमारा लक्ष्य एक ही है । हमें सिद्धगति को प्राप्त करना है । सिद्धालय ही हमारा घर है । सिद्धालय में जन्म एक ऐसा जन्म है वहां जन्म लेने पर मृत्यु नहीं है । वहां अकेले असंघ रहना है । प्रभु से प्रार्थना करना हे प्रभो ! मुझ सिद्धगति चाहिए । जैसा लक्ष्य होगा वैसा मार्ग मिलेगा । 

स्वर्ग और नरक कहीं ओर नहीं, यही ंपर है । अगर आप क्रोध में हो तो नरक में हो और क्षमाभाव में हो तो स्वर्ग में हो । उसी तरह राग विराग लोभ निर्लोभ में नरक और स्वर्ग है । प्रभु को समतायोगी कहा जाता है । कानों में कीले ठोकने पर प्रभु समभाव में रहे । मोक्ष के लिए गहरी समता आवश्यक है । हमारा हर क्षण समता में बीते । महान् आचार्य ने कहा है- 

तन सुख, मन सुख, मान सुख, भले ध्यान सुख होय । 

पर समता सुख परम सुख, अतुल अपरिमित होय ।।

शरीर का सुख, मन का सुख, मान का सुख, ध्यान का सुख मिल जाए पर इन सबके समक्ष समता का सुख परम सुख है जिसकी गणना नहीं की जा सकती । हम गहन चिन्तन मनन से समता की पुष्टि करें । इस जगत में दो ही वस्तु साररूप है । एक हृदय में समभाव और दूसरा उप उपकार समता कितनी गहरी है यह महत्वपूर्ण है । चातुर्मास के चार माह कल्पवृक्ष के समान है । हम अधिक धर्माराधना कर सकते हैं । धर्माराधना करते हुए संख्यातभव कम होकर हम मुक्ति के नजदीक पहुंचते हैं । अन्तिम समय में हमारी यही भावना है कि हमें अरिहंत शरण मिले । सत्गुरू का संघ मिले । यही प्रार्थना वीतरागप्रभु के समक्ष रखना । 

 

सम्यग्दर्शन से मोक्ष निश्चित है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

23 अगस्त, 2006: जम्मू: विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता, योगीराज आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने नेकचंद जैन मैमारियल हाॅल, जैन स्कूल में महापर्व पर्युषण के तीसरे दिन प्रवचन करते हुए फरमाया कि आपके भीतर धर्माराधना का मूल सम्यग्दर्शन आये । वह सम्यग्दर्शन बीज से वृक्ष का रूप धारण करे, यही मेरी हार्दिक भावना । सम्यग्दर्शन अनुभव का दर्शन है । सम्यग्दर्शन से मोक्ष निश्चित है । प्रभु महावीर को नयसार के भव में मुनियों को आहार बहराते हुए सम्यग्दर्शन की प्राप्ति हुई । जो दर्शन से भ्रष्ट हो जाते हैं वे सचमुच भ्रष्ट ही कहे जायेंगे । वीतराग धर्म का आधार सम्यग्दर्शन है । ज्ञान दर्शन चारित्र से मोक्ष की प्राप्ति होती है । कितना ज्ञान होने पर दर्शन नहीं तो ज्ञान अज्ञान बन जाता है । दर्शन एक आंख है । तुम धन, पद, प्रतिष्ठा कमा लो और कहो कि यह मेरे कारण हुआ है तो यह मिथ्यादर्शन है । कर्भाव भीतर आये तो कर्म-बंधन होते हैं । मेरा यानि आत्मा का स्वभाव केवल जानना और देखना है । तुम जो धन कमाते हो उसमें सबका हिस्सा है । 

भगवान महावीर के दस श्रावकों के पास करोड़ों की  फिर भी उनकी उसमें आसक्ति नहीं थी । वे मूलधन रखते थे परन्तु ब्याज को दान में लगा देते थे । मुस्लिम संस्कृति में दसवां हिस्सा धर्म के लिए अर्पित किया जाता है । हमारे यहाँ व्रत ग्रहण की परम्परा है । व्रत ग्रहण के बाद किया गया कार्य निर्जरा से परिपूर्ण होगा । श्रावक ने कम से कम पाँच अणुव्रत करने चाहिए । पाँच अणुव्रतों में पहला अणुव्रत सबके लिए मंगल की कामना करना है । मोटी हिंसा का त्याग और छोटी का विवेक । दूसरे अणुव्रत में सत्य का भाषण करना । तीसरे अणुव्रत में किसी का अधिकार नहीं छिनना । चैथे अणुव्रत में शील का पालन करना अपनी पत्नी का आगार है । पाँचवें अणुव्रत में जितनी वस्तु चाहिए उसकी मर्यादा करना । इसी तरह दिशाओं की मर्यादा, अनर्थ दण्ड का त्याग । प्रतिदिन काम में आने वाली वस्तुओं की मर्यादा करना । हम प्रभु महावीर के श्रावक बनें । जब नियम भीतर आयेंगे तो श्रावक वृ का पालन  होगा । 

एक ओर सम्यग्दर्शन का लाभ और दूसरी ओर तीन लोकों का राज्य मिले तो त्रैलोक्य राज्य को छोड़कर सम्यग्दर्शन अपना लेना । सम्यग्दर्शन आने पर अनेकों परीक्षाएं होती हैं । प्रभु महावीर के समय कामदेव श्रावक की भी परीक्षा हुई । देवता तलवार लेकर आया और बोला कि कह दे कि महावीर का धर्म झूठा है तो तू बच जाएगा अन्यथा तेरी मौत निश्चित है । उस समय कामदेव श्रावक डरे नहीं, परीक्षा में सफल रहे । हम कर्Ÿााभाव को छोड़ दें । कर्Ÿााभाव से मिथ्या-दर्शन की पुष्टि होती है । मुझे अवसर है चातुर्मास में लाभ लेने का, ऐसी भावना रखना । स्वयं को निमिमात्र समझना । सेवा के भाव से निर्जरा होगी । सम्यग्दर्शन पुष्ट होगा । छोटे व्यक्ति से कभी हम घृणा ना करें । शरीर को महŸव ना देते हुए आत्मा को महत्व दें । संसार की सभी आत्माएं समान हैं ऐसी दृष्टि भीतर आ गई तो जीवन सुगंधित बन जाएगा । 

कबीर भी कहते हैं:- इस शरीर को अधिक पुष्ट ना करो । अन्तिम समय में इस शरीर की हड्डियां लकड़ी की भांति जल जाएगी । रेशमी केश घास की तरह जल जायेंगे । ऐसी स्थिति में हमें नाम स्मरण का सहारा लेना चाहिए । हरि नाम से प्रीति करनी चाहिए । सिमरन की लौ भीतर जगनी चाहिए । आत्मा परमात्मा बन जाएगी अगर तुम्हारी सच्ची प्यास होगी । आचार्य ऊमास्वाती ने प्रशमरति ग्रन्थ लिखा है कि एक शिष्य मन्दबुद्धि है । उसे कुछ भी याद नहीं होता । गुरू ने उसे एक मंत्र दिया- मारूषमातु यानि किसी से राग ना करो । किसी से द्वेष ना करो । शिष्य विनीत भ्ज्ञाव से मंत्र का जाप करता ह ै। जाप करते हुए वह असली मंत्र को भूल गया और मासतुस कहने लगा । कहते-2 भीतर भाव उठा कि मासतुस यानि उड़द अलग और उसका छिलका अलग । मेरी आत्मा कर्म बन्ध से काली हो गई है । कर्मक्षय से निर्मल होगी । केवल इस मन्त्र का भाव सहित उच्चारण करने से उसे केवल ज्ञान की प्रापित हो गई । श्रद्धा और समर्पण का भाव भीतर रखो । जो कुछ तुम्हारे पास है उसे स्वीकारते चले जाओ । जीवन में सम्यग्दर्शन दृष्टि होने पर कुछ रह नहीं जाता । सम्यग्दर्शन में समता के तराजू पर स्वयं को तौलते रहना । हमारी दृष्टि निर्मल होगी तो हमें कोई दुःख नहीं दे सकता । हम महापर्व पर चिŸा शुद्धि करें । सम्यग्दर्शन की प्राप्ति हेतु ध्यान शिविरों का लाभ लें । 

 

सच्ची श्रद्धा जन्म मरण समाप्त कर देती है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

24 अगस्त, 2006: जम्मू: विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता, योगीराज आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि:- महापर्व पयुर्षण का चोथा दिवस आप सबके लिए मंगलकारी हो । आप सबके भीतर प्रभु का दर्शन वपन होकर विश्व में शान्ती फैले । प्रभु महावीर से गणधर गौतम ने पूछा प्रभो ! मैं कौनसा धर्म ग्रन्थ पढूं । संसार के सभी गुरू अपने ग्रन्थ को सर्वश्रेष्ठ मानते हैं । मैं कौनसे गुरू को मानूं । हर धार्मिक व्यक्ति अपने गुरू को श्रेष्ठ मानता है । किस स्थान पर जाकर धर्माराधना करूं क्योंकि सभी स्थान अपने आपमें अच्छे हैं । सभी दुकानदार अपने माल को बढ़िया ही बताते हैं । भगवान ने उत्तर दिया- वे वीतरागी थे सबकुछ जानते थे उन्होंने कहा- गौतम किसी धर्म ग्रन्थ को पढ़ने से पहले किसी गुरू के पास जाने से पहले किसी गुरू को मानने से पहले या किसी स्थान पर आराधना करने से पहले स्वयं के हृदय को टटोल । हृदय स्वच्छ और निर्मल होगा तो सब कुछ अच्छा लगेगा यह है वीतराग भाव दशा। कोई गुरू कहता है मेरी बात मानो तो वह गुरू नहीं हो सकता । जो कहे मेरी क्रिया उंची और उसकी क्रिया नीची तो वह भी गुरू नहीं हो सकता क्योंकि हम सब तीर्थंकरों के बताए हुए मार्ग पर चल रहे हैं और तीर्थंकरों ने कभी स्वयं को ऊँचा-नीचा नहीं  बताया । किसी ग्रन्थ को पढ़ने से पूर्व अपने हृदय को देखो । अपने शरीर को सजाने से पहले हृदय विकारों को दूर करो । 

भगवान महावीर ने इस सूत्र में गहरा विज्ञान भरा है । यह सूत्र साधना का आधार है । ज्ञान से जाना जा सकता है । दर्शन से श्रद्धा उत्पन्न होती है चारित्र से इन्द्रिय निरोध होता है और तप से शुद्धि होती है । प्रभु ने पहले स्वयं अनुभव किया फिर हमें बताया । जब अनुभव होता है तब श्रद्धा पैदा होती   है । जो भगवान महावीर को अनु भव हुआ वह हमें नहीं हुआ । श्रद्धा कहती है त्याग करो और जीवन भोग की तरफ जा रहा है तो यह कैसे संभव है । आत्म-दर्शन से ज्ञान उत्पन्न होगा । ज्ञान से श्रद्धा होगी । ज्ञान और दर्शन युगपथ है । दोनों का चुनाव करना पड़े तो दोनों को चुनना क्योंकि श्रद्धा मूल्यवान है और ज्ञान श्रद्धा से ही भीतर उतारा जाता है । ज्ञान ना हो , शास्त्र ना पढ़ो तो भी मुक्ति मिल सकती है । मुक्ति के लिए तो केवल श्रद्धा चाहिए । दर्शन के बिना श्रद्धा पंगु है । जीवन भी श्रद्धा से चलता है । श्रद्धा और विश्वास में बहुत बड़ा अन्तर है । जिसको जाना नहीं, देखा नहीं उस पर श्रद्धा की जाती है । माली बीज बोता है और मन में श्रद्धा है कि वृक्ष बनेगा तो वह वृक्ष बनता है । माँ को कभी अपने बेटे पर श्रद्धा नहीं होती विश्वास होता है । जब बेटा गर्भ में होता है तो वह नहीं जानती की वह कैसा है । विश्वास रखती है वह सब ठीक होता है । भरोसा हो तो सब संभव है । विश्वास उधार है और श्रद्धा नगद है । जिस दिन अनुभव होगा कि परमात्मा भीतर है तब श्रद्धा आएगी । अभी तो आप सब मेरी बातों पर विश्वास करते हो एक फूल पूरा भीतर से खिलता है तो वह श्रद्धा है । एक मां गर्भ की पीड़ा से बच्चे को जन्म देती है तो वह श्रद्धा है और गोद लिया हुआ बच्चा विश्वास है । जिस मां ने जन्म दिया है उसने अपना एक अंग समाज को समर्पित किया है । एक मां बच्चे को दूध पिलाती है और एक नर्स दूध पिलाती है इसमें बहुत अन्तर है । मां दूध के साथ जीवन का विज्ञान देती है । तुम मोक्ष के करीब जाओ । एक शबद से व्यक्ति तर जाता है । जब बच्चे का जन्म होता है तब मां का भी जन्म होता है । श्रद्धा है जीवन के अंग-2 का अनुभव । जब श्रद्धा होगी तब जन्म का नहीं जीवन का मूल्य होता है । 

मीरा को श्रद्धा थी तो वह कृष्ण भक्ति में नाचती है । घूंघट उठता है । गलियों मे ंनाचती है उसे राणा ने जहर का प्याला दे दिया तो उसने कृष्ण का चरणामृत समझकर उसे स्वीकार कर लिया । जीवन की शुरूआत श्रद्धा से होती है । हृदय ही तुम्हारा प्रवेश और निषेध स्थान है । आया ही था ख्याल कि आंखे छलक पड़ी, आंसू उनकी याद में कितनी करीब थे । सम्यक् दर्शन से श्रद्धा का मैल है । कबीर कहते है:-

                        नयनन में प्रीतम बसे, निद्रा को नहीं ठोर ।

आठ पहर चैसठ घड़ी, मेरे कोउन ओर ।।

कबीर कहते हैं आंखों में प्रीतम परमात्मा रहने लग जाए तो नींद नहीं आती । आठ पहर चैबीस घण्टे केवल परमात्मा का ख्याल आता है । हम भी शरीर के कर्मों का ख्याल करें । सच्ची श्रद्धा जन्म-मरण समाप्त कर देती है । माना की अभी जीवन में अंधेरी रात है पर भीतर का दीया जलाना मना नहीं है । भीतर का दीया जलाओ दर्शन को जगाओ श्रद्धा आएगी । आत्मा पर श्रद्धा आएगी । आत्मा अजर अमर अविनाशी है । आज से हम सब अपने आत्म-तत्व का पोषण करे । बड़े-2 महल आप सबने समा लिए अब एक शान्ति की कुटिया बना लो । अपनी आत्मा को शुद्ध कर लो । पर्वाधिराज का आधा हिस्सा बीतने जा रहा है । दान, शील, तप भावना ज्ञान दर्शन चारित्र तप इनको अपनाओ । एक मुट्ठी अन्न की प्रतिदिन दान दो । विश्व के सभी जीवों के प्रति मैत्री का भाव जगाओ । कृतज्ञता का भाव जगाओ । जैसी भावना होगी वैसा सुख मिलेगा और हम मुक्ति के करीब होंगे । 

 

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

25 अगस्त, 2006: जम्मू: विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता, योगीराज आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने प्रवचन में फरमाया कि- महापर्व पर्युषण का पांचवा दिवस आत्म जागृति का संदेश लेकर आया है । प्रभु ने कहा- ज्ञान एक ही है । अनंत आत्माओं में एक ही ज्ञान है । पशु पक्षी पौधे पहाड़ मानव नरक देव सभी में एक ही आत्मा है । हम सुन तो लेते हैं पर समझते नहीं । प्रभु ने पहले ज्ञान की बात कही फिर आचरण की बात कही । ज्ञाना अग्नि से सारे कर्म नष्ट हो जाते हैं । जो एक को जानता है वह सबको जानता है । ज्ञान के दस लक्षण है अक्रोध, वैराग्य, जितेन्द्रिय, क्षमा, दया, शान्ति सर्वप्रिय निर्लोभी दाता और भयशोकहर्ता जो ज्ञानी व्यक्ति होगा उसके आगे क्रोध टिकेगा नहीं । उसके जीवन में क्लेश नहीं होगा । आपके जीवन में क्रोध है तो समझना आप ज्ञानी नहीं हो । वैराग्य में संसार की रूचि नहीं होगी तुम इन्द्रियों को जीतोगे ज्ञानी होने का सार है कि वह किसी को दुःख नहीं  देता । मन, वचन, काया से वह सबके लिए मंगल भावना भावित करता है । प्रभु महावीर का ज्ञान किसी विश्वविद्यालय या विद्यापीठ में नहीं मिला । यह कोई वस्तु नहीं जो बाहर से भीतर की ओर आए । ज्ञान तो वह धारा है जो भीतर से बाहर प्रवाहित होती है । 

21 वंीं सदी में हम कम्प्यूटर को बहुत बड़ा साधन मानते हैं यह साधन अवश्य है परन्तु साध्य   नहीं । यह सूचना दे सकता है परन्तु इसमें ज्ञान नहीं, ध्यान भी नहीं । जब केवलज्ञान प्रकट होगा तो चार कर्म क्षय हो जाएंगे । मति, श्रुत, अवधि मनःपर्यव ज्ञान इनका भी कोई मूल्य ना होगा । बीज अंकुरित करने पर पल्ल्व फूटता है तो बीज का कोई महŸा नहीं होती । हम भीतर धर्म बीज को पल्लवित करे । हमारा अहंकार उसमें बाधा ना बने । जब मैं कुछ भी नहीं यह भाव होगा तब ज्ञान की शुरूआत होगी । ज्ञान आत्मा का स्वभाव है । ज्ञान लेकर आप पैदा हुए परन्तु जैसे उम्र बढ़ती गई अहंकार बढ़ता गया और हम उससे दूर होते चले गए । दो प्रकार के व्यक्ति हैं एक ज्ञानी और मुमुक्षु । ज्ञानी केवल जानता है । मुमुक्षु मुमुक्षा भाव से हर ज्ञान को अपने भीतर उतारता है । ज्ञान से जीवन रूपान्तरित होता है । दुनिया की सभी किताबें कंठस्थ कर लो पर परिवर्तननहीं हुआ तो तुम ज्ञानी नहीं हो सकते । भगवान की वाणी है शास्त्र श्रद्धा से सुनते हुए केवलज्ञान तक हो सकता है । एक शब्द भीतर गहरा उतरे तो रूपान्तरित हो जाएं । शास्त्र श्रवण फिर आचरण तभी जीवन निर्मल बनेगा । आप कुछ भी सुनो जिज्ञासा मत रखना । मुमुक्षु रखना । मानव समूचे संसार की दौलत पा ले और स्वयं को खो दे तो उसने कुछ नहीं पाया और उसने स्वयं को पा लिया तो सब कुछ पा लिया । हम कहते हैं क्रोध जहर है, लोभ पाप है पर हमारा जीवन क्रोध, लोभ की तरफ जा रहा है तो वह हमारा ज्ञान नहीं है । मानव जीवन का अवसर मिला है हम साधना करें, ज्ञान को प्राप्त करें भेद-ज्ञान करें । भेद-ज्ञान के साबुन से समता के जल से अपनी आत्मा को स्वयं के द्वारा धो डालो । आप कुछ भी करते हो तो वह कौन कर रहा है शरीर । सब कुछ शरीर करता है । आत्मा तो केवल जानती और देखती है । तुम कितना भी तप जप करो सब कुछ अरिहंतों के चरणों में समर्पित कर देना । प्रतिपल भेद-विज्ञान होगा तो आत्मा निर्मल होगी । अहंकार टूटेगा और हम आत्म-ज्ञान की ओर बढ़ जाएंगे । शरीर केा अपना मत मानो । मानोगे तो मोहनीय कर्म का बंध होगा । ज्ञानी बनकर जीओ । संसार में ऐसे रहो जैसे किसी के साथ ना दोस्ती, ना वैर । भेद -ज्ञान करते-2 एक क्षण ऐसा आएगा कि स्वतः ही भेद-ज्ञान होता चला जाएगा । पशु नारकी आदि भेद-ज्ञान को नहीं जानते और वे कर भी नहीं सकते । देव जानते हैं परन्तु कर नहीं सकते । प्रभु की वाणी का एक ही सार है कि तुम आत्म-ज्ञानी बनो । सारा संसार मिथ्या-ज्ञान से भरा है । आप ज्ञान को प्राप्त करो । अपने लक्ष्य की ओर आगे बढ़ोगे तो लक्ष्य अवश्य प्राप्त होगा । 

 

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

26 अगस्त, 2006: जम्मू: विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता, योगीराज आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने नेकचंद जैन मैमारियल हाॅल, जैन स्कूल में महापर्व पर्युषण के छटे दिन फरमाया कि- महापर्व का छटा दिन आपके जीवन में आचरण लेकर आए । हमने ज्ञान और दर्शन की चर्चा की । अब हम आचरण की चर्चा करेंगे । आचार्य भद्रबाहु ने सभी शास्त्रों का सार आचार बताया है । प्रभु ने आचारांग सूत्र में आचरण की बात कही है । ज्ञान, श्रद्धा और आचरण से ही मुक्ति होगी । ज्ञान और आचरण मुक्ति के लिए आवश्यक है । चारित्र परम धर्म है । आनंद ने भगवान बुद्ध से चार प्रश्न पूछे थे बुढ़ापे में काम आने वाली चीज कौनसी है । मन को वश में कैसे करें । मानव का असली रत्न कौनसा   है ? और ऐसी कौनसी वस्तु है जिसे चोर चुरा नहीं सकते । भगवान बुद्ध ने आनंद को उत्तर दिया बुढ़ापे में काम आने वाली वस्तु है शील यानि सदाचरण । गांधी ने अपना संदेश अपने जीवन को बताया । श्रद्धा करो तो मन वश में होगा । हिल स्टेशन में मन वश ेेमें नहीं होता । प्रभु की वाणी पर श्रद्धा होगी तो सारा जीवन आनंदित होगा । मानव का असली रत्न हीरा, पन्ना, माणक मोती नहीं है क्योंकि सूई के अग्र भाग जितना रत्न भी साथ नहीं ले जाओगे । प्रज्ञा ही मानव का असली रत्न है । जो ज्ञान आपके अनुभव से उतरे वह आपका असली रत्न है । ज्ञान आपका अनुभव बन जाए । धर्म को प्रज्ञा से उतारो । पुण्य ऐसी वस्तु है जिसे चोर चुरा नहीं सकते । संघ की सेवा, गरीबों की सेवा करो जिससे पुण्य होगा । पुण्य के बाद निर्जरा होगी । श्रावक व्रत को ग्रहण करो । तप, दान करो । जब व्यक्ति व्रत अंगीकार कर लेता है तो हर कार्य निर्जरा से पूर्ण होता है । साधु प्रतिपल प्रतिक्षण हर श्वांस में निर्जरा करते हैं । यह शरीर मोक्ष का द्वार है । यह देह मन्दिर है । जब आप प्रार्थना, सामायिक करो तब भाव से करो । हर कार्य करते हुए अपने अन्तिम लक्ष्य को अपने समक्ष रखना और श्रद्धा को साथ जोड़कर रखना । श्रद्धा परम् दुर्लभ है । अरिहंतों की वाणी, सिद्धों का स्मरण और गुरू का संग इन पर की गई श्रद्धा मुक्ति की ओर ले जाती है । 

गुरू वह जो मोक्ष की ओर ले जाए । तुम निर्णय करो गुरू किसे मानना । जो मन को शान्ति दे वह गुरू । भगवान महावीर, भगवान बुद्ध कभी बोलते नहीं थे । उनके सम्पर्क में आने से हर प्रश्न का समाधान हो गया । अरिहंत भगवान श्री सीमंधर स्वामी जी धर्म देशना देते हैं तो लोगों को केवलज्ञान हो जाता है यह सब श्रद्धा से ही संभव है । गधे पर चंदन लाद दो तो वह उसे भार ही लगता है वह उसकी सुगंधी नहीं ले सकता । जो हाथ से निकल जाए वह सोना है इसीलिए दोनों हाथों से दान देना । आज भारत को उंचा स्थान क्यों दिया जाता है । भारत के पास कुछ भी नहीं है पर भारत मां ने ऐसे महान् सपूतों को जन्म दिया जिनसे यह भारत भी महान् हो गया । महात्मा गांधी के समक्ष अंग्रेज भी झुके थे गालमेल कान्फ्रेन्स में । विवेकानंद ने विदेशी संस्कृति को दर्जी की संस्कृति बताया तो सभी विदेशी लज्जित हो गए थे । लक्ष्मण की पत्नी उर्मिला थी फिर भी वे यति कहलाए । उनके जीवन का आचरण कैसा था । वे सीता को मां समझते थे । आचार्य श्री आत्माराम जी महाराज कहा करते थे- जो लंगोट का सच्चा और जबान का पक्का है वह कभी जीवन में हार नहीं सकता । सेवा को उन्होंने जीवन में बहुत महत्व दिया । सेवा हमारे जीवन की नींव है और साधना जीवन का फल । अष्टावक्र कभी पाठशाला में पढ़े नहीं थे । राजा जनक ने भी ज्ञान प्राप्ति के लिए अष्टावक्र को अपना गुरू बनाया । जनक ने मुक्ति की कामना की तो अष्टावक्र ने कहा- हे तात! मुक्ति चाहते हो तो विषयों के विष को तजकर सत्य के अमृत को पीओ । धर्म अधर्म सुख दुःख मन के हैं । तूं सदा से मुक्त है । तू कुछ करने वाला है । ऐसा नहीं क्योंकि जो तूं चाहता है वह तूं नहीं कर सकता जो कुछ करता है वह तेरा शरीर करता है । चैतन्य में विश्राम कर सबका साक्षी हो जा मुक्ति हमारा स्वभाव है । तुम मुक्त हो ही । शरीर को आत्मा से अलग कर लो ऐसी महान् आराधना जो अरिहंतों की मूल साधना है इसे हम पर्वाधिराज के पावन दिनों में अपनाएंगे तो अवश्य ही कर्म निर्जरा की ओर अग्रसर होंगे । 

 

सदाचरण सर्वश्रेष्ठ है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

27 अगस्त, 2006 जम्मू: विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने नेकचंद जैन मेमोरियल हाल शिवाचार्य समवसरण में धर्मसभा को सम्बोधित करते हुए फरमाया कि- महापर्व पर्युषण का सातवा दिवस आप सभी के लिए मंगलकारी हो । आपके जीवन में आचरण आये । हमने ज्ञान दर्शन की चर्चा की । अब चारित्र की चर्चा करेंगे । चारित्र यानि आचरण। आचार्य भद्रबाहु ने सभी शास्त्रां का सार आयारो बताया है । आयारो यानि आचारांग सूत्र. । प्रभु ने आचारांग सूत्र में आचरण योग्य सभी बातें बताई है । अकेले ज्ञान से और अकेली क्रिया से कभी मोक्ष प्राप्त नहीं हो सकता । ज्ञान और क्रिया का मेल मुक्ति तक पहुंचा देता है । चरित्र यानि आचरण परम धर्म है । 

आनंद श्रावक ने भगवान बुद्ध से चार बातें पूछी । बुढ़ापे में काम आने वाली चीज कौनसी है ? मन को वश में कैसे करें । मानव का असली रतन क्या है ? और ऐसी कौनसी वस्तु है जो चोर चुरा नहीं सकते । भगवान बुद्ध ने उत्तर दिया- बुढ़ापे में काम आने वाली चीज है शील । शील यानि सदाचार का जीवन । सत्य का आचरण । एक बार महात्मा गांधीजी से उनके जीवन के संदेश के बारे में पूछा गया । उन्होंने बताया मेरा आचरण ही मेरा संदेश है । मन को श्रद्धा के द्वारा वश में करो । श्रद्धा होगी तो मन वश में होगा । प्रभु की वाणी पर श्रद्धा करोगे तो सारा जीवन आनन्दित होगा । मानव का असली रतन हीरा, पन्ना, माणक मोती नहीं है क्योंकि मृत्यु के बाद सूई का अग्र भाग भी साथ नहीं ले जा सकते । इसलिए प्रज्ञा ही मानव का असली रतन है । प्रज्ञा यानि वह ज्ञान जो आपके अनुभव से उतरे । यही असली रतन है । ज्ञान आपका अनुभव बन जाए । धर्म को प्रज्ञा से उतारो । पुण्य ऐसी वस्तु है जिसे चोर चुरा नहीं सकते । संघ की सेवा, गरीबों की सेवा को चुरा नहीं सकते चोर । पुण्य ऐसा करो जो निर्जरा का कारण बने । श्रावक व्रत को ग्रहण करो । वैसे तो आप तप दान पुण्य के कार्य अधिक करते हो । व्रत ग्रहण करने के बाद जो कार्य करोगे वह निर्जरा से पूर्ण होगा । साधु प्रतिपल-प्रतिक्षण हर श्वांस में निर्जरा कर सकते हैं । यह शरीर मोक्ष का द्वार है । यह देह मन्दिर है । जब आप प्रार्थना करो तो उसे पूरे भाव से   करो । श्रद्धा रखो मन टिक जाएगा । श्रद्धा परम् दुल्लहा । श्रद्धा परम दुर्लभ है । अरिहंत की वाणी, सिद्ध भगवान एवं गुस्रू पर पूर्ण श्रद्धा रखो । श्रद्धा हमें मुक्ति तक ले जाएगी । गुरू वह है जो हमें मोक्ष तक ले जाए । गुरू वह है जो मन को शान्ति प्रदान करे । महावीर और बुद्ध बोलते नहीं थे । उनके सम्पर्क में आने मात्र से हर व्यक्ति के शंका का समाधान हो जाता था । अरिहंत प्रभु की देशना सुनते-सुनते अनेकों व्यक्तियों को केवलज्ञान हो जाता है । यह केवल श्रद्धा की बात है । गधे के ऊपर चन्दन लाद दे तो उसे भार ही लगता है। वह उसकी सुगंध नहीं ले सकता । पर्वाधिराज के दिनों में अधिक से अधिक दान, शील, तप भावना की आराधना करें । जो हाथ से निकल जाए वही सोना है । 

आज भारत को इतना ऊँचा स्थान क्यों दिया जाता है । भारत के पास कुछ भी नहीं है । पर इस भारत मां ने अनेकों महापुरूषों को जन्म दिया । गांधी, विनोबा, शास्त्री, बुद्ध, राम, महावीर जैसे महापुरूषों को सबके समक्ष उपस्थित  किया । गांधीजी के समक्ष अंग्रेज झुके थे । उनके आचरण को लेकर विवेकानन्द ने कहा- मेरे देश की संस्कृति ऋषि-मुनियों की है और विदेशी संस्कृति दर्जी की संस्कृति है । लक्ष्मण की पत्नी उर्मिला थी फिर भी वे यति कहलाये क्योंकि उनका आचरण श्रेष्ठ था । लक्ष्मण सीता को माँ की उपमा देते हैं, यह रामायण का आदर्श है । 

आचार्य श्री आत्माराम जी महाराज कहते थे जो लंगोट का सच्चा और जबान का पक्का है वह जीवन में कभी हार नहीं सकता । सेवा करते-करते निर्जरा होती है । जितनी तुम सेवा करोगे उतना स्वयं का कल्याण करोगे । सेवा और साधना जीवन के मूल्यवान बिन्दु है । सेवा जीवन की नींव है तो साधना जीवन का फल है । 

अष्टावक्र आठ अंगों से टेढ़े-मेढ़े थे । उनको बचपन से ही ज्ञान प्राप्त था । वे पाठशाला में पढ़े नहीं परन्तु राजा जनक जैसे महान् राजा को उन्होंने उपदेश दिया था । एक बार की घटना है- राजा जनक के दरबार में वाद-विवाद चल रहा था । वहां पर अष्टावक्र के पिता विवाद में हार रहे थे । तब अष्टावक्र वहां पहुंचा तो उसे देखकर सभी सभासद हंसने लगे । राजा जनक भी हंसा तो अष्टावक्र भी   हंसा । राजा को यह बात समझ में नहीं आई । उन्होंने अष्टावक्र से पूछा ? तुम क्यों हंसे । तो तुरन्त अष्टावक्र बोला:-

समझ करके मैं आया था, सभा है समझदारों की । 

मगर गल्ती मेरी निकली, सभा है ये चमारों की ।।

राजा जनक तुम मेरे शरीर को देखकर हंस रहे हो क्योंकि मैं आठ जगहों से टेढ़ा मेढ़ा हूँ । और मैं इसलिए हंसा कि तुम सभी विद्वान मेरे शरीर को देखकर हंसे । मुझग लगा कि आप सभी लोग वि,ान हो पर आप सभ्ज्ञी चमार निकले । तब राजा जनक अष्टावक्र से प्रभावित हुए और जीवन के तीन मूलभूत प्रश्न उनसे पूछे । 1- ज्ञान कैसे हो ?  2- वैराग्य कैसे हो ?  3- मुक्ति कैसे मिले ? तब अष्टावक्र ने कहा- हे तात ! अगर मुक्ति चाहते हो तो विषयों के विष को तजकर सत्य के अमृत को पीओ । धर्म-अधर्म मन के हैं । सुख दुःख मन का है । तूं सदा से मुक्त है । जो तूं करता है, वह तूं नहीं तेरा शरीर करता है । तूं चैतन्य में विश्राम कर । सबका साक्षी हो जा । मुक्ति हमारा स्वभाव है । तूं मुक्त हो ही । शरीर को आत्मा से अलग कर लो । प्रभु ने ऐसी महान् साधना हमें प्रदान की है । सम्वत्सरी के पावन दिवसों में उसकी आराधना कर जीवन को सफल बनाओ । 

   

चातुर्मास का सिरमौर है सम्वत्सरी पर्व

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

28 अगस्त, 2006 जम्मू: जैन धर्म दिवाकर आचार्य सम्राट् योगीराज पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने नेकचंद जैन मेंमोरियल हाॅल में प्रवचन करते हुए फरमाया कि-  पर्व सम्वत्सरी का पावन अवसर आज के दिन आपकी निष्ठा, आपकी प्यास आपको अरिहंत तत्व तक पहुंचा देगी । प्रभु महावीर का संघ मंगलकारी है । शुद्ध सामायिक की विधि आप सब सीख रहे हैं । मेरा अनुरोध है आप सबसे की और भी अधिक उस विधि को सीखे । आज के पर्व की महत्ता थी तभी प्रातःकाल आप सबने पौषध व्रत अंगीकार किया । भगवान ने फरमाया है एक श्रावक को पक्खी के दिन पौषध अवश्य करना चाहिए । बहुत अधिक व्यस्तता हो तो सामायिक करो  । इन दो महिनों में आप अध्यात्म रंग में रंग जाओ । परमात्मा भक्ति में डुबकी लगा लो । श्रद्धा भाव और संकल्प जगाओ । जीवन में दो बातें जरूरी है प्यास और संकल्प । प्यास होगी तो पानी ढूंढोगे । धर्म और वीतराग वाणी के प्रति प्यास होना चाहिए । जब प्यास होगी तो शुद्ध धर्म की प्राप्ति होगी । धर्म की कीमत जानो । धर्म कोहीनूर हीरे से बढ़कर है । जितनी आयु शेष रह गई है आंखे खोलो धर्म आराधना करो सबसे उंची धर्मकला और धर्मरस है । धन पुण्य से मिलता है । दुकान में बैठा और चाहो कि आज इतनी बिक्री हो तो पुण्य होगा तो कमा लोगे । पुण्य नहीं होगा तो जो कुछ तुम्हारे पास है वो भी लुट जाएगा । जितना दोगे उतना और मिलेगा । 

अनंत करूणा के धर्ता प्रभु महावीर तीर्थंकर थे । हम सबके लिए उन्होंने मंगल रूप तीर्थ की स्थापना की । दिन रात व्यतीत होते जा रहे हैं । जितना समय धर्म में लगाओगे उतना जीवन सफल हो जाएगा । इस शरीर को कायोत्सर्ग, समाधि ेस पवित्र कर लो । जबसे जन्म लिया है तभी से अब तक आलोचना करो । ईसा मसीह ने आलोचना की विधि प्रभु महावीर से ली । अन्तर मन की साक्षी से आलोचना करो । जैसे कांटा चुभने पर सारे शरीर में वेदना होती है और कांटा निकलने पर सर्वांग सुखी हो जाता है उसी तरह हम भीतर के कांटो को निकाले । अठारह पाप स्थानों में मिथ्या, दर्शन, शल्य सबसे बड़ा कांटा है । इसको हम दूर करें । मायावी, कपटी जब तक आलोचना नहीं करेगा तब तक शुद्ध नहीं होगा । जो दोषों को प्रकट करता है, आत्म निन्दा करता है वह निर्मल हो जाता है । छोटा सा कांटा निकलने पर सुख प्राप्ति होती है उसी तरह आत्मा के कांटो को निकालोगे तो मन शान्त और चित्त की चेतना निर्मल होगी । मन में जब-2 लगे क्षमा याचना करो । बड़े से बड़ा दोष हुआ होउसकी आत्म-साक्षी से आलोचना करो । आज हमारे जीवन में एक आदर्श स्थापित हो । कहा है:- क्षमा बड़न को होत है, छोटन को उत्पात् । क्या घट गया विष्णु का जो भृगु ऋषि मारी लात । जो क्षमा देता है वह बड़ा हो जाता है । क्षमा वीरों का आभूषण है । जितनी उमर हो गई है पिछला हिसाब बराबर करो । सिकन्दर, नादिरशाह जिन्दगी भर मांगते रहे फिर भी आवश्यकता की पूर्ति नहीं हुई । इकट्ठा करोगे तो आकांक्षाएं बढ़ती चली जाएगी । बांटोगे तो संतोष की भावना उत्पन्न होगी । जो दोेगे वह कम नहीं होगा । सबने एक ही बात कही है दूसरों का हित करने में धर्म है और दूसरों को पीड़ा पहुंचायी तो तुम अधर्म में हो   गए । किसी को ध्यान के रास्ते पर लगाया । धर्म में दीक्षित किया तो तुमने बहुत बड़ा उपकार किया है । अध्यात्म प्रकरण में कहा है-  एक व्यक्ति एक कटवचन को समता से सहन करता है तो 86 करोड़ उपवास का फल उसे प्राप्त होता है । इन्सान इन्सान से प्यार करें परम पिता ने इतना कुछ दिया है उसके प्रति हम कृतज्ञ बने । माता के उपकार को भूले नहीं । मां की करूण क्षीर सागर से भी बढ़कर है । 

महापर्व संवत्सरी निचोड़ है पर्युषण का । अन्तर्रात्मा से आलोचना करना संवत्सरी पर्व साल में एक बार ही आता है और इस दिन जितनी धर्म की कमाई करोगे उतनी मुक्ति नजदीक होगी । यहां पर जो कुछ भी सुनने को मिलेगा गहराई से श्रवण करना । जो इस दरबार से चला जाएगा निर्जरा के अवसर से चूक जाएगा निर्जरा दान शील तप भावना द्वारा होती है । आज के दिन उसकी आराधना करना जितने भाव गहरे होंगे उतनी गहरी साधना होगी और उतनी ही गहरी निर्जरा होगी । प्रतिक्रमण करें और क्षमा का दान दे । क्षमा दान देते हुए जीवन को सफल बनाएं । आप सबके अन्तःकरण को आज तक के इस क्षण तक कोई चोट पहुंचाई हो तो अरिहंतों सिद्धों की साक्षी से अन्तःकरण से हार्दिक क्षमायाचना । 

 

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

30 अगस्त, 2006 जम्मू: जैन धर्म दिवाकर आचार्य सम्राट् योगीराज पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने नेकचंद जैन मेंमोरियल हाॅल में प्रवचन करते हुए फरमाया कि- महापर्व सम्वत्सरी की आप सबने श्रद्धा, भक्ति, स्नेह के साथ आराधना की । ध्यान साधना शिविर में भी आप सब खूब लाभ ले रहे हो । भाग्यशाली हैं वे लोग जो साधना को अपनाते हैं । सम्यक् दृष्टि को अपनाते हैं । भावना का जीवन में बहुत बड़ा महत्व है । जैसा जीवन होगा वैसा ही संकल्प और धारण होगी । सृष्टि के कण-कण में परमात्मा का वास  है । कर्म-क्षेत्र के आधार पर यह जगत नियंता व्यवस्थित शक्ति से चल रहा है । जैसा जिसका कर्म होगा वैसी ही उसे सृष्टि दिखाई देगी । उपनिषद् के ऋषि कहते हैं परम् पिता ऐसा हृदय देना जिसमें शिव संकल्प की भावना हो । विश्व कल्याण की कामना हो । प्रत्येक प्राणी को भोजन देना और सबको सुखी बनाना । हमारी सोहम की साधना भी इसी सार तक ले जाती है । जैसा मैं हूँ वैसा ही इस जगत का हर प्राणी है फिर किसे दुःख देना । जीवन में प्रतिपल प्रतिक्षण भेद-विज्ञान करना । किसी के प्रति भेद-भाव नही ंरखना । खाना खाओ पर केवल स्वाद से नहीं उदरपूर्ति के लिए ग्रहण करो । शरीर की शक्ति हेतु भेाजन को ग्रहण करो । क्षण-2 का उपयोग करो । दिन भर कार्य करते हुए प्रतिव्यक्ति में शुद्धात्मा में  देखो । अभी मेरी बात शायद आपको समझ में ना आए परन्तु ऐसा करते चले जाओगे तो एक दिन सारी बातें समझ में आ जाएगी । हर बात के साथ भावना का महत्व है । हम अशुभ भावना से शुभ भावना की ओर आगे बढ़े और शुभ भावना से शुद्ध भावना भावित करें ।  

इस शरीर की आसक्ति को तोड़ देना क्योंकि एक दिन जब श्वांस छूटेगा तो हमें जाना होगा । श्वांस हमें छोड़ दे, शरीर हमें छोड़ दे उससे पूर्व उसे हम दोड दे । हमारा एक ही घर है सिद्धालय और जब तक उसकी प्राप्ति ना हो तब तक सतत् साधना करना । भीतर जो बीज डाला है उसे पल्लवित और पुष्पित करना । साधना के वातावरण में जीओगे तो गहरी साधना होती चली जाएगी । आने वाले अवसर को खोना मत । विजय जनक चन्द्र सूरीश्वर जी महाराज भी मैं कौन हूं इस साधना को करते-2 कल ही हमारे बीच में नहीं रहे । उनका जीवन निर्लेप था । वे सम्प्रदाय मे ंरहते हुए सम्प्रदाय से अलग थे । उन्होंने स्वयं पर विजय प्राप्त की थी । बाल्यवय में दीक्षा लेकर जीवन के 75 वर्ष सेवा में समर्पित किए । शास्त्रों का गम्भीर अध्ययन किया । सन् 1986 में पूना वर्षावास में दर्शन किए । बहुत ही सच्चे ओर सीधे संत थे । उन्होंन गहरी साधना की थी । उन्हें साधना की प्यास थी तभी वे साधना कर पाए । उनके जीवन का लक्ष्य गहन साधना था । ग्राम-2 में शाकाहार और व्यसन मुक्ति का संदेश दिया । वे हमेशा पत्र द्वारा लेख द्वारा वीतराग साधना की चर्चा करते रहते थे और स्वयं तक पहुंचने की उनकी खोज थी । अवश्य ही उन्होंने आत्म-तत्व द्वारा परमात्म यात्रा की करीबी की होगी । तुम्हारे घर में भी तुम साधना, जप, जप करो । अगर पत्थर रूपान्तरित हो सकते तो दिल का रूपान्तरण बहुत सरल है । हम भी मैं कौन हूं और मेरा लक्ष्य क्या है इस सिद्धान्त पर चलते हुए अपने घर सिद्धालय की ओर अग्रसर हो ऐसी भावना हमारी होगी तो उस महापुरूष के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी । 

 

मन शान्त होगा तो हर तरफ शान्ति होगी

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

31 अगस्त, 2006 जम्मू: जैन धर्म दिवाकर आचार्य सम्राट् योगीराज पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने नेकचंद जैन मेंमोरियल हाॅल में प्रवचन करते हुए फरमाया कि- यदि आप शान्त चित्त से उगते हुए सूरज को देखो तो लगता है वह भीतर आ गया । पूर्णिमा का चन्द्रमा बगिचे में खिला सुन्दर फूल भी आपके भीतर आ सकता है शर्त यही है कि हम उसे शान्त चित्त से देखे । फूल की सुगंधी भी भीतर आ जाएगी और आप तरोताजा महसूस करोगे । किसी सागर के किनारे बेटो तो लगता है विचार स्थिर और चिŸा शान्त हो गया है इसका अर्थ क्या है ?  ये फल फूल सूरज चांद सागर कुछ भी नहीं है । जैसा आपका मन होगा वैसा ही आपको दिखाई देगा अनुभव करना उगते हुए सूरज को दो मिनिट तक देखना और फिर आंखे बंद करके वहीं पर खड़े रहना । आपको स्वयं अनुभव होगा हम बाहर शान्ती ढूढते हैं वह हमारे भीतर है । अरिहंतों की वाणी है हम अधूरे हैं भिखारी हीरे को कांच का टुकड़ा समझता है परन्तु जब उसकी कीमत पता लगती है तभी वह उसका अनुभव कर पाता है । दुनियंा की दौलत कितनी इकट्ठी कर लो परमात्मा के दरबार में सारी दौलत धूल बराबर है । एक शश्वत् चिन्तन हमारे भीतर चलता रहे कि आत्मा परमात्मा में विलीन कैसे हो । मानव का जीवन बार-बार नहीं मिलेगा । प्रभु महावीर का सारी दुनियां ने विरोध किया था जब वे मुक्ति के पथ पर अग्रसर हुए थे परन्तु उन्होंने समता से हर विरोध का सामना किया । आज सारा विश्व प्रभु महावीर को जानता है । इस विश्व में एक ही शाश्वत सत्य है और वह है आत्मा ही परमात्मा है । अहंकार सबसे बड़ा शत्रु है । स्वर्ग और नरक तुम्हारे ही भीतर है । दो दृष्टियां हैं व्यवहार और निश्चय । व्यवहार में मां बाप गुरू शिष्य मालिक नौकर बहन बेटा सब कुछ है निश्चय में हम सभी समान है । माता पिता ने आपकी पहचान के लिए आपको नाम दिया था । हमने नाम को ही अपना मान लिया । निश्चय और व्यवहार को साथ लेकर चलोगे तो जीवन सुखद होगा और मन शान्त होगा । 

एक शब्द में मन सारी यात्रा कराता है । यह मन बड़ा चलायमान है । चाहो तो अभी स्वर्ग में ले जाएगा और अभी नरक में भी ले जाएगा । हम मन की चालाकी को समझे और मन के मते न चले । स्वर्ग ओर नरक के बारे में पुराने समय में चार बातें प्रसिद्ध थी । कनक पुरानी घी नया घर कुलवंती नार । आंगन खेले बालणा, यह स्वर्ग निशानी चार । घर में पुराने गेहूं हो और नया घी हो, शीलव्रता पत्नी घर में होे जो सबको प्यार बांटने वाली हो और उस घर क आंगन में एक छोटा बालक खेल रहा हो तो स्वर्ग से बढ़कर कुछ नहीं । नरक के बारे में कहा है:- मेला कपड़ा कर्ज घणा, घर कलिहारी नार, भाई से भाई लड़े यह नरक निशानी चार । घर में मेले कपड़े हो । सिर पर कर्जा चढ़ा हुआ हो । बात बात पर घर में क्लेश होता हो । घर की नारी कलह करने वाली हो । भाई-2 आपस में लड़ते हो तो इससे बड़ा नरक नहीं होगा । स्वर्ग और नरक इसी जगह में है । तुम क्रोध में हो तो नरक में हो और क्षमा में हो तो स्वर्ग में हो, इसी तरह लोभ निर्लोभ ममता समता को भी जान लेना चाहिए । शुद्ध भावों को हम भीतर लाएं । जीवन में भावपूर्ण साधना करें । भावपूर्ण व्यवहार करें क्योंकि भावना भव का नाश करती है । भाव से अनेकों झगड़े दूर हो जाते हैं । भाव के द्वारा ही धर्मरूचि अणगार मुक्ति को प्राप्त हो गए । हम अपनी हर श्वांस को मुक्ति की ओर अग्रसर करें तो हमारा जीवन सफल होगा । 

 

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

02 सितम्बर, 2006 जम्मू: जैन धर्म दिवाकर आचार्य सम्राट् योगीराज पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने नेकचंद जैन मेंमोरियल हाॅल में प्रवचन करते हुए फरमाया कि- एक ऋषि मुनि प्रार्थना करते हैं उनकी प्रार्थना परमात्म प्रापित की है । जैसी उनकी प्रार्थना है वैसी ही आराधना है । जैसी तुम प्रार्थना करोगे वैसा ही तुम्हें प्राप्त होगा । संसार में रहते हुए तुम्हारी चाह क्या है ? यह संसार कर्मों की खेती है । इस खेती में कैसे बीज बोने हैं यह हमें देखना है । मेरे जीवन में शुद्धता के विचार आए । उठें, बैठैं खाएं पीएं हर समय भेद-विज्ञान बना रहे । अरिहंत केवलज्ञानी ऐसा ही करते हैं । उनके भीतर ऐसे ही भाव होते हैं । हम भी ऐसे ही भाव रखंे । भगवान बुद्ध से एक शिष्य ने पूछा कि इस संसार में बलवान कौन   है ? भगवान ने उत्तर दिया- बड़े-2 चट्टानों की अपेक्षा लोहा श्रेष्ठ है जो पत्थर घड़कर परमात्मा का रूप देता है । लोहे से बलवान अग्नि है क्योंकि पन्द्रह सौ डिग्री तापमान पर लोहा पानी बन जाता है । अग्नि से बलवान वायु है क्योंकि वायु अग्नि की दिशा बदल देता है । वायु से बलवान मन है । प्रश्न था ? बलवान है और अन्तिम उत्तर आया मन । मन की गति कितनी तेज है । प्रकाश की गति से भी तेज गति है मन की गति । सूर्य की पहली किरण को पृथ्वी पर आने में जितना समय लगता है उससे भी कम समय में मन अनेक स्थानों पर जा आता है । मन जो संकल्प करता है उसे पूर्ण करता है । जैसा वह चाहे वैसा होता है । मन के विज्ञान से ही पूरा विश्व एक मुट्ठी में आ गया है । यह सब मन की ही कल्पना है । मन एक कारण है बंधन और मोक्ष का । मन शैतान होता है तो कर्म बंधन होता है और मन शान्त होता है तो मोक्ष होता है । मन शुद्ध होता है तो सब ओर शुद्धता ही दिखती है । मन मैला होता है तो चारों तरफ मैला ही दिखाई देता है । मन की परतों को कैसे दूर करें ।

एक शीशा है उसके ऊपर धूल है, धूप को हटाओगे तो शीशा स्वच्छ हो जाएगा, उसी तरह मन के संस्कारों को दूर करो मन स्वच्छ हो जाएगा । नन्दन मणियार श्रेष्ठ श्रावक थे । धर्माराधना में तल्लीन थे । पौषध व्रत करते हुए उनका मन भटक गया और भगवान की वाणी से श्रद्धा हट गई । श्रद्धा हटी तो जीवन पतन की ओर जाने लग गया । काल धर्म को प्राप्त होने पर तीर्यंच गति की प्राप्ति हुई और तीर्यंच गति में श्रद्धा फिर से उत्पन्न हुई तो उस नन्दन मणियार के जीव ने मेढ़क के रूप में ग्यारह व्रतों का पालन  किया । भाव से सामायिक की । तीर्यंच भी प्रतिक्रमण कर सकता है । प्रभु भक्ति की मन में प्यास थी और उस प्रभु दर्शन के संकल्प से वह मेंढ़क मरकर देवलोक में उत्पन्न हुआ । देखों अरिहंत भक्ति से जीवन कितना सुधरता है । कहा भी है -

                देता भावे भावना, लेता करे संतोष । 

वीर करे सुन कोयमा, दोनों जासी मोक्ष ।।

भीतर जैसे भाव होंगे वैसा जीवन बनेगा । मोक्ष पास में भी है और दूर भी है । माता मरूदेवी की भावना कितनी उच्च थी जो कुछ पलों में ही वह मुक्ति को प्राप्त हो गई । उनका राग टूट गया इसी तरह हम दान देने की भावना भाएं । संतोष वृŸिा का जीवन में पालन करें तो मुक्ति अवश्य होगी । सांसारिक वस्तुओं से राग टूटेगा और आत्म-भाव में रमण होगा । जब हम आत्म-भाव में रमण करेंगे तो मुक्ति दूर नहीं होगी ।

 

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

3 सितम्बर,, 2006: जम्मू: विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता, योगीराज आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने नेकचंद जैन मैमारियल हाॅल, जैन स्कूल में अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- श्रमण संघ के महाप्रणा प्रथम पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री आत्माराम जी महाराज का जन्म-दिवस हम मना रहे हैं । उस योगी का जीवन बड़ा योग से सधा हुआ था । जिनके जीवन में सहजता, सरलता जैसे उत्तम गुण थे गुण ही नहीं वे गुणों के भण्डार थे । प्रभु ने कहा- धर्म शुद्ध हृदय में टिकता है और शुद्ध हृदय वहीं होता है जहां सरलता होती है । मनसा वाचा कर्मणा’ तीनों की एकता होनी आवश्यक है । भीतर कोई कषाय नहीं होना चाहिए । जो संसार के प्रपंच से अटका नहीं वह सहज, सरल है । धर्म का आधार ही शुद्धता है । हृदय का पात्र शुद्ध नहीं होगा तो उसमें धर्म टिकेगा भी नहीं । भीतर माया होगी तो सदैव दुःख होगा । जिसके भीतर धर्म है वह परम निर्वाण को प्राप्त करेगा । हिन्दू धर्म में एक रिवाज है यज्ञ का जिसमें घी की आहुति दी जाती है और कहते हैं कि उससे वातावरण शुद्ध होता   है । हम अपने कर्मों की आहुति देकर आत्मा को शुद्ध बनाएं । ऐसे आचार्य श्री आत्माराम जी महाराज जिन्होंने अपने जीवन को ही नहीं अपनी आत्मा को भी शुद्ध बनाया । उनका जीवन अध्यात्म से भरा हुआ था । घर, परिवार उजड़ गया । 10-11 साल का बच्चा आचार्य श्री मोतीराम जी महाराज के पास आया और अपना जीवन गुरू चरणा में समर्पित कर दिया । आचार्यश्रीजी दिखने में बड़े सुन्दर थे । वे ऐसे लगते थे जैसे मानों कोई अंग्रेज हो । उन्होंने भौतिक शरीर को तप की अग्नि में तपाया था । वे हमेशा स्वाध्याय में लीन रहते थे । सुखी जीवन लोग जीना नहीं चाहते क्योंकि उन्हें कुछ न कुछ नया चाहिए । 

आचार्यश्रीजी विनोदी स्वभाव के थे । वे विनोद भी ऐसा करते थे जिसमें ज्ञान की प्राप्ति हो और बात बात में ज्ञान प्रदान कर देते थे । जिनका जीवन साधना से ओतप्रोत था जो स्वयं प्रसन्न थे तो उनके पास आने वाला हर व्यक्ति भी प्रसन्न हो जाता था । एक बार दो व्यक्तियों की आपस में चर्चा चली कि मोक्ष में जाने के बाद व्यक्ति वापस आता है या नहीं ? काफी देर तक चर्चा का सार नहीं निकला तो दोनों व्यक्ति आचार्यश्री के पास आए और उनसे समाधान मांगा । आचार्यश्री ने कहा भाई ! पहले आप दोनों साधना कर मोक्ष में चले जाओ जिसका मन लगे वहां रह जाना जिसका मन ना लगे वापिस आ जाना । उनका विनोद भी अध्यात्म से भरा हुआ था । गुरू ने ऐसा घड़ा था उन्हें की हर तरह के संस्कार उनके भीतर थे । उन्होंने मुनि बनने के बाद संस्कृत, प्राकृत का अध्ययन किया । स्वयं कौमुदी पढ़कर सबको कौमुदी पढ़ाई । उन्होंने अपने जीवन में किसी को कष्ट नहीं दिया पर उनको बहुत कष्ट झेलने पड़े ये उनके कर्म फल ही थे । उनके ग्रन्थ देखकर बड़े-2 विद्वान आश्चर्यचकित हो जाते हैं । वे सबको ज्ञान देते थे । स्वाध्याय और ध्यान दो ही उनके लक्ष्य थे । आज उनके प्रति आपने श्रद्धा सुमन अर्पित करने हैं तो आधा घण्टा स्वाध्याय करो एक सामायिक ध्यान की करो । धन, पद, प्रतिष्ठा कुछ साथ नहीं जाएगी, साथ जाएगा तो धर्म । राणा प्रताप को धन की आवश्यकता हुई तो भामाशाह ने सारे खजाने खोल दिये । आज राणा प्रताप से भी अधिक याद भामाशाह को किया जाता है । आचार्यश्रीजी की आंखों में तेज था । उनकी वाणी में मृदुता थी । उन्होंने श्रमण संघ को सींचा था । उनके द्वारा टीकाकृत शास्त्रों की पूरे विश्व में मांग थी जिसे पिछले पांच वर्षों में पूर्ण करने का प्रयास हमने किया है । आप सभी आज के दिन संकल्प करो ‘जैन तत्व कलिका विकास’ का स्वाध्याय करो । जीव अजीव की जानकारी ले लो । हमारी आत्मा जीव है और हमारा शरीर अजीव है । सिद्ध अवस्था प्राप्त होने पर जन्म-मरण नहीं होता । हम बच्चों को संस्कारित करेें । आत्म-ज्ञान दे भीतर ज्ञान की अवस्था को बनायें । पन्द्रह मिनिट स्वाध्याय का संकल्प और शुद्ध सामायिक का संकल्प लें तभी उनके चरणों में सच्ची श्रद्धांजली होगी । 

 

जन्म-जयंती से प्रेरणा लें

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

04 सितम्बर, 2006 जम्मू: जैन धर्म दिवाकर आचार्य सम्राट् योगीराज पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने नेकचंद जैन मेंमोरियल हाॅल में प्रवचन करते हुए फरमाया कि- आचार्य सम्राट् पूजय श्री आत्मराम जी महाराज एवं प्रवर्तक श्री शुक्ल चंद जी महाराज की जन्म जयंती उनका गुणानुवाद आज हम कर रहे हैं । महापुरूषों के जन्म दिन हमें प्रेरणा देते हैं भीतर एक संकल्प और पुरूषार्थ जगात हैं । श्रद्धेय आचार्य भगवंत ने छोटी उम्र में दीक्षा ली, उस समय उनकी आयु ग्यारह वर्ष की थी और संयमी जीवन को अध्ययन में लगा दिया । उल्लेखनीय बात यह है कि श्रमण संघ के तीनों आचार्यों ने अपने गुरू को बहुत महत्व दिया । शिष्य गुरू की आज्ञा से तिर जाता है । आत्माराम शब्द समझने जैसा है । जिनकी साधना अन्तर में विलीन होने की थी । जिनकी आत्मा में राम और राम में आत्मा निवास करती थी समा गई थी । जब बूंद समुद्र में गिर गई तो कहना कठिन है । समुद्र में बूंद है या बूंद में समुद्र है । मन, वचन, काया शरीर, धारण सब समाप्त हो जाते हैं जब आत्मा में रमण होता है । एक चित्रकार ने फूल का चित्र   बनाया । भंवरे रस लेने उस फूल के पास आते हैं । इस चित्र से यह प्रेरणा मिलती है कि हम भी महापुरूषों से कुछ शिक्षा लें । कुछ लोग अपनी किए हुए कार्य का बहुत दिखावा करते हैं हमने यह कर दिया, हमने वह कर दिया । कार्य करके बोल दिया तो जितना पुण्य अर्जन किया था वह सब समाप्त हो गया । जब धर्म धारण कर लिया तो कहने की आवश्यकता नहीं । समाधि में आ जाना । धर्मरस और धर्मकला से ऊपर दुनियंा में कुछ भी नहीं है । यही रस में हम रम जाएं तो धर्म अंग-2 में समा जाता है । जब ध्यान करोगे तो भीतर कुछ बढ़ता ही चला जाएगा । यह है शास्वत सुख । जब समृद्धि भीतर आती है तो भावना होती है कि अब मुझे कुछ नहीं चाहिए । सौभाग्य हमेशा बढ़ता है जिससे मन और चित्त का समाधान होता है वह है सुख । 

आचार्य भगवंत पूज्य श्री आत्माराम जी महाराज का चित्र कभी देखा होगा आपने । वे हमेंशा ध्यान में लीन रहते थे । उनके चित्र से हमें मौन और ध्यान की प्रेरणा मिलती है । उनका चित्त शान्त था । अपनी आत्मा को कष्टों की कसौटी पर कसा था । उस महापुरूष ने लाखों भक्तों को तारा । कूल्हे की हड्डी टूट गई । आंखे चली गई । लोगो ने जहर दे दिया, सभी परिस्थितियों में वे समभाव में रहे । वे आत्मा को अधिक महत्व देते थे शरीर को नहीं । भेद-विज्ञान अपनाओ । भेद-विज्ञान मे ंरहते हुए केवल जानोगे और देखोंगे तो भीतर का ज्ञान प्रकट होता चला जाएगा । किसी ने गाली दी तो शरीर को गाली दी, आत्मा को गाली नहीं मिलती, ऐसा अनुभव करने पर अनंत कर्मों की निर्जरा होती है । कहते हैं जो निर्जरा मासक्षमण से नहीं होती वह भेद-विज्ञान से होती है । केवल-ज्ञान जैसा अनुपम-ज्ञान भी भेद-ज्ञान से होता है । आचार्य भगवंत श्रमण संघ के प्रथम आचार्य थे । श्रमण संघ जब बना तो हमेशा कोई न कोई कुछ न कुछ कहता रहता था । कैंसर जैसी असाध्य बीमारी होेने पर भी वे हमेशा हसमुख रहते थे । डाॅक्टर मनचंदा जब उन्हें देखने के लिए आए तो आचार्यश्रीजी ने कहा- बीमारी तो मुझे कुछ भी नहीं है, चैकअप करना है तो इन दर्शकों का करो जिन्हें अत्यधिक तकलीफ हो रही है । अन्तिम समय का उन्हें पता लग गया था और अन्तिम समय उनका एक ही था कि तुम मिलकर रहो । उनके पास राजनैता खींचे चले आते थे । महापुरूषों की नजर से जीवन बदलता है । मैंने एक बार दर्शन किए हैं और एक बार में ही जीवन परिवर्तित हो गया । 

उसी तरह प्रवर्तक श्री शुक्ल चंद जी महाराज का भी जन्म-दिवस हम मना रहे हैं । जैन धर्म को उन्होंने साहित्य की धरोहर दी है । उनकी शुक्ल रामायण कृति सर्वप्रसिद्ध है । वे कहते थे एक साधु को बनाने के लिए कितने वर्ष लगते हैं, कितनी मेहनत लगती है इसलिए साधु को संयम में स्थान दो । वे एक बहुत अच्छे लेखक, कवि थे । उनको शिव शंकर भी कहा जाता था । देह में रहते हुए भी वे देहातीत थे । प्रथ्वी पर उन्होंने नई कल्पना संजोयी थी । आज हम सब उनके जीवन से सीखें । साधना और स्वाध्याय को जीवन में उतारें तो उनका जन्म दिन मनाना सार्थक होगा । 

 

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

05 सितम्बर, 2006 जम्मू: जैन धर्म दिवाकर आचार्य सम्राट् योगीराज पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने नेकचंद जैन मेंमोरियल हाॅल में प्रवचन करते हुए फरमाया कि- आज श्रद्धेय आचार्य भगवन् श्री आत्माराम जी महाराज एवं पंजाब प्रवर्Ÿाक श्री शुक्लचंद जी महाराज का जन्म दिवस हम मना रहे हैं । महापुरूषों के जन्म दिन हमें प्रेरणा देते हैं । हमारे भीतर एक संकल्प और पुरूषार्थ जागृत होता है । आचार्य श्री आत्माराम जी महाराज ने छोटी उम्र में दीक्षा ली । संयमी जीवन का अध्ययन और गुरू सेवा में लगा दिया । श्रमण संघ के तीनों आचार्यों ने अपने गुरू की खूब सेवा की । आत्माराम शब्द समझने जैसा है । आत्मा में राम और राम में आत्मा समा गई थी । जिनकी साधना अन्तर में विलीन होने की थी । जब बूंद समुद्र में गिर गई तो कहना कठिन होता है कि समुद्र में बूंद समाई या बूंद में समुद्र समाया । मन, वचन, काया, धारणा सब खत्म हो जाती है । जब आत्मा में रमण होता है । कुछ लोग बहुत दिखावा करते हैं, हमने यह कार्य किया वह कार्य किया । कार्य करके बोल दिया तो वह कार्य खत्म हो जाता है । धर्म भीतर धारण कर लिया तो कहने की आवश्यकता नहीं है कि मैंने धर्म धारण किया है, यही धर्म हमारे अंग-अंग में समा जाए । 

आचार्य भगवन् श्री आत्माराम जी महाराज का चित्र आपने कभी देखा होगा । वे हमेशा ध्यान और मौन में लीन रहते थे । उनका चिŸा शान्त था । उन्होंने अपनी आत्मा को कष्टों की कसौटी पर परखा । उस महापुरूष ने लाखों भक्तों को तार दिया । मारणान्तिक कष्ट आने पर भी वे कभी दुःखी नहीं हुए । कूल्हे की हड्डी टूट गई, आंखें चली गई । लोगों ने जहर दे दिया, फिर भी वे हंसते रहे उनके भीतर भेद-विज्ञान की साधना आत्मसात थी । भेदज्ञान यानि केवल जानना और देखना । जब-जब आप जानोगे और देखोगे तो भीतर का ज्ञान प्रकट होता चला जाएगा । जो निर्जरा मासखमण के तप से नहीं होती वह भेद-ज्ञान से होती है । श्रद्धेय भगवन् के समय श्रमण संघ का गइन हुआ था । अनेकों लोग कुछ न कुछ कहते रहते थे । उन्हें केंसर का रोग था । फिर भी हमेशा मुस्कराते रहते थे । डाॅक्टर मनचन्दा एक बार चेकअप करने के लिए आए तो उन्होंने कहा- मुझे कोई वेदना नहीं । वेदना तो इन प्रत्यक्षदर्शियों को है । आप इनका इलाज करें ।  अन्तिम समय का उन्हें ज्ञान हो गया था । समाधि के साथ उन्होंने अपना आयुष्य पूर्ण किया । उनका एक ही संदेश था, तुम सब मिलकर रहो । उनके पास राजनेता खींचे चले आते थे । उसी तरह प्रवर्Ÿाक श्री शुक्लचंद जी म0 की जैन समाज को अमूल्य देन है । उन्होंने साहित्य लिखकर जैनत्व का जन-जन को परिचय करवाया । शुक्ल रामायण लिखी । वे बहुत अच्छे लेखक और कवि   थे । उनको शिव शंकर भी कहा जाता है । वे देह में रहते हुए देहातीत थे । आपने इस पावन दिवस पर उनके जीवन से कुछ शिक्षा लें । साधना करें । स्वाध्याय में अपने जीवन को लगायेंगे तो उनकी जन्म-जयन्ती मनाना सार्थक होगा । 

 

आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

06 सितम्बर, 2006 जम्मू: जैन धर्म दिवाकर आचार्य सम्राट् योगीराज पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने नेकचंद जैन मेंमोरियल हाॅल में प्रवचन करते हुए फरमाया कि- आचार्य मानतुंग प्रभु की स्तुति निश्चय नय से कर रहे हैं । वे कहते हैं हे प्रभो आपकी स्तुति से जन्मों-2 के कष्ट दूर होते हैं । कर्म, पापनष्ट होते हैं । जैसे क्षण भर में सूर्य किरण से अंधकार छिन्न-भिन्न हो जाता है उसी तरह तुम्हारी स्तुति से हर आत्म प्रदेश भक्ति से भीग जाता है । हमारी आत्मा पाप से चारों ओर व्याप्त हो गई है । उसी स्थान पर तुम्हारा स्तवन पाप को दूर करता है । दुःखी व्यक्ति सोचता है मुझे किसने दुःख दिया। दुःख तो हमारे कर्म है । हम पाप को समाप्त नहीं करते पर दुःख को समाप्त करते हैं । वृक्ष की जड़ विशैली हो तो पत्ते काटने से क्या लाभ ? वृक्ष को जड़ से ही काटना होगा । मूल में कर्म हमारा ही है । निमित्त कोई भी हो सकता है । रानी ने राजा प्रदेशी को जहर दिया । रानी राजा से अत्यधिक प्रेम करती थी, राजा ने जब धर्म अंगीकार किया तो रानी के भीतर जहर देने की भावना आयी पर किसी को पता न लग जाए इस डर से उसने राजा के गले में अंगूठा दे दिया यानि आत्म-हत्या करने का प्रयास किया ।

कोई आपको दुःख, गाली दे और आप उसे समतापूर्वक सहन करो तो आपके अनंत कर्म क्षय होते हैं । राजा प्रदेशी के भीतर रानी के लिए यही भावना थी कि यह मुझे मोक्ष ले जा रही है । एक संकल्प, एक प्रार्थना का भाव भीतर हर पल होना चाहिए कि मुझे मोक्ष जाना है । तुम्हें जो सत्य का मार्ग लगे उसे अपनाओ । प्रतिकूलता में समता आए तो कर्मक्षय अधिक होते हैं । जीवन के दुःख के लिए दूसरों को दोषी मत ठहराना । घर फेक्ट्री दुकान बेटा बेटी यह आपका अन्तिम लक्ष्य नहीं है । आपका अन्तिम लक्ष्य मोक्ष का है । इस जन्म में नहीं तो दो-पांच दस जन्मों में मुक्ति अवश्य मिलेगी । एक बार दूध से घी बन गया तो घी से दूध नहीं बन सकता । एक बार जो संसार में सब कार्य सिद्ध कर गया और परमात्मा बन गया बाद में वह संसार में फिर नहीं आएगा । परमात्मा चाहिए तो हृदय के सम्राट बनो । 

एक राजा नौकर को नहीं राजा को गले लगाता है । हमारे सम्राट अरिहंत हैं । हमारा हृदय भक्ति का हो तो हम सम्राट बन सकते हैं । हम मन के गुलाम होंगे तो परमात्मा नहीं मिल सकता । जो मन का मालिक है, परमात्मा उसे ही मिलेगा । यदि आपको बंद कमरे में बंद कर दिया जाए और अपने प्रिय से मिलने के लिए कहा जाए तो आप कैसे मिलोगे ? आपश्यकता है कमरे की चाबी की । चाबी मिल गई तो स्वतः ही कमरा खुल जाएगा और प्रिय मिल जाएगा, उसी तरह आत्मा को परमात्मा से मिलने की समता की चाबी चाहिए । अभी आत्मा कर्मों की कैद में है । समता की चाबी से आत्मा को कैद से मुक्त करो । 

कल्पवृक्ष का एक अंगुर दरिद्रता का नाश करा देता है । यह अरिहंतवाणी है । सिंह का बच्चा हाथी की पंक्ति का नाश कर देता है । अग्नि का एक कण जंगल की सभी लकड़ियों को समाप्त कर देता है । अमृत की एक बूंद सारे रोग नष्ट कर देती है उसी प्रकार परमात्मा तेरा स्वरूप तीन जगत के कष्टों का नाश करने में समर्थ है । रति शेखर की कहानी-

 

आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

07 सितम्बर, 2006 जम्मू: जैन धर्म दिवाकर आचार्य सम्राट् योगीराज पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने नेकचंद जैन मेंमोरियल हाॅल में प्रवचन करते हुए फरमाया कि- आचार्य मानतुंग द्वारा रचित भक्तामर स्तोत्र की रचना चल रही है । आज आठवें श्लोक की चर्चा हम करने जा रहे हैं । आठवें श्लोक में सात श्लोकों का अर्थ समा गया है । आचार्य ने सात श्लोंकों में स्वयं को कितना विनीत बताया है । वे कहते हैं मै बुद्धिहीन हूं, मंद बुद्धिवाला हूं, मेरे द्वारा तुम्हारा स्तोत्र प्रारंभ हो रहा है इसमें प्रभो तुम्हारा ही प्रभाव है । निश्चय से कमलीनी के पत्ते पर पानी की बूंद मोती सी सोभित होती है । भक्तामर स्तोत्र के सात श्लोक इस स्तोत्र की भूमिका है । अब स्तुति प्रारंभ हो रही है जो सज्जनों के चित्त को हरण   करेगी ।  आचार्य स्वयं को बूंद की उपमा देते हैं तो प्रभु को कमलिनी के पत्त्ेा की उपमा देते हैं । आचार्य के मन में केवल एक ही भावना थी कि मेरे कर्म टूट जाए । भरे दरबार में उनका अपमान हुआ पर वे भेद-विज्ञान में जीएं । जब व्यक्ति आत्म-दृष्टि में आता है तो शरीर गौण हो जाता है । जम्मू श्रीसंघ में सर्वप्रथम भेद-विज्ञान की साधना शिविरों के माध्यम से आप सबको मिल रही है । 21 वीं सदी के 95 प्रतिशत लोग कारोबार, घर, बच्चों को महत्व देते हैं । तुमने शरीर से शमशान पाया तो क्या पाया । सिकन्दर, हिटलर ने अपने जीवन में क्या पाया ? तुम अपने बच्चों को जन्म से धाििर्मक संस्कार दो । श्रावक चोबीस घण्टे में चार घड़ी सामायिक करें । हम शरीर को रोग लगने पर अनेक उपचार करते हैं । बढ़िया डाॅक्टर को दिखाते हैं और उसके बाद धर्म को भूल जाते हैं । धर्म वीतराग धर्म जो आपको पंचम गति की ओर ले जाए । भक्तामर स्तोत्र से कर्म-निर्जरा हो सकती है शर्त है कि उसे भाव सहित पठन करना है । भगवान ऋषभ्देव को याद करो । प्रभु ने संसार को कैसे तिराया, उनके चरणों में नमन करो । आठवा श्लोक सात श्लोकों से मिला हुआ है । आचार्य स्वयं को कितना लघु प्रस्तुत करते हैं । उन्होंने सम्बोधन दिया हे प्रभो ! मैं अनाथ था, आप नाथ की प्राप्ति होने पर मैं सनाथ हो गया । तुम्हें नाथ कहते ही मेरी सनातना सिद्ध हो गई और अनाथता समाप्त हो गई । सर यानि सिर पे बिठाने के काबिल वे सारे घटनाक्रम में अपने कर्मों का ही कारण मानते हैं । 7 श्लोंाके में उसने भगवान को उपमा दी है कि भगवान उद्योत करने वाले हैं । अंधकार रूप पाप का नाश करने वाले हैं । संसार समुद्र के आलम्बन हैं । प्रभु को सूर्य की उपमा भी दी गई है । देवों द्वारा उनके पादपीठ को पूजा जाता है । वो चरण कितने पवित्र हैं जिन चरणों के नाखुनों से देवताओं के मुकुट प्रकाशित होते हैं । जब भी तुम महापुरूषों के पास जाओ तो उनके चरणों पर ध्यान रखना । आचार्य मानतुंग भगवान को कहते हैं तुम गुणों के सागर हो मैं एक बूंद भी नहीं । मुझे ज्ञाननहीं है पर भक्तिवश मैं स्तुति करने के लिए उद्यत हुआ हूँ और जानता हूं कि आपकी स्तुति से भव परम्परा का नाश होगा । आचार्य स्वयं को निश्चित रूप से स्तुति करने वाला बतलाते हैं । स्वयं को विशेषण देते हुए वे कहते हैं कि मैं बिना बुद्धिवाला, बिना लज्जा वाला मेरे हृदय सरोवर में तुम चन्द्र बन प्रतिबिम्बित होते हो । संसार समुद्र में भुजा से पार करने वाला मैं तो एक कोयल हूँ परन्तु आप आम्र मंजरी का निमित्त हो । आचार्य स्वयं को सरल दर्शाते हैं । व्यक्ति जितना सरल होगा उतना जल्दी मोक्ष मिलेगा । हम अहंकार को तोड़ें । अहंकारधर्म का शत्रु है और विनय धर्म का मित्र है । भगवान के साथ श्रद्धा करने से हर कषाय पार हो जाता है । आचार्य मानतुंग ने कहा कि- प्रभाव तुम्हारा था, तुम्हारा है तभी यह स्तोत्र की रचना हो रही है । प्रभाव तुम्हारा और स्तुति मेरी होती तो इसका कोई मूल्य न था । प्रभाव भी तुम्हारा है और स्तुति भी तुम्हारी है । तुम्हारे चरणों में स्तोत्र रखने से इसका प्रभाव अधिक बढ़ गया है । जहां भाव होता है वहीं प्रभाव होता है और आचार्य का भाव बहुत सरल है । सिंहासन कितना भी सुन्दर हो वह तब तक शोभा नहीं देता जब तक उस पर कोई बैठता नहीं है । हीरे की शोभा सेठ की अंगुली से है । आपके प्रभाव से मुझ अल्पज्ञ का काव्य भी प्रभावपूर्ण हो गया । दूध में मिश्री मिल जाती है तो स्वाद बढ़ जाता है । भगवन् आप है ही मधुर । 

एक नगर में धनपाल नाम का नाम का सेठ रहता था ं वह धर्मात्मा था । गुणवती उसकी पत्नी थी, उसके घर में धन और पुत्र का अभाव था । एक दिन जैन साधु गांव में आए । धर्मोपदेश सुना । जैन साधु के समक्ष अपनी कठिनाई रखी तो साधु ने उस धनपाल को भक्तामर स्तोत्र का आठवां श्लोक सिखाया और मंत्र विधि सहित श्रद्धा से आराधना करने की प्रार्थना की । तेले के सहित मंत्र आराधना करने पर शासनदेवी प्रकट हुई । अब धनपाल को दो चीजें चाहिए थी परन्तु देवी ने कहा कि एक मांगो तो मिल जाएगी । धनपाल ने धन मांगा, देवी ने तथास्तु कहा । हर श्लोक के पीछे एक रहस्य छिपा हुआ है । हम निश्काल भाव से स्तोत्र पढ़े तो कर्म निर्जरा होगी और इच्छा कामना से पढ़ोगे तो जो इच्छा होगी वह पूर्ण हो सकती है । 

 

धर्म का मित्र विनय है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

8 सितम्बर, 2006:जम्मूः श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने नेकचंद जैन मेमोरियल हाल, जैन स्कूल, रानी पार्क में अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- आचार्य मानतुंग द्वारा रचित भक्तामर स्तोत्र की चर्चा चल रही है । आज आठवें श्लोक में आचार्य क्या कह रहे हैं । आचार्य ने सात श्लोकों का अर्थ आठवें शेक में समाहित किया है । वे स्वयं को बुद्धिहीन मानते हैं । प्रभो ! मन्दबुद्धि वाला होने पर भी मेरे द्वारा तुम्हारा स्तोत्र कहा जा रहा है । इसमें निश्चयसे तुम्हारा प्रभावना ह ै। कमलिनी के पŸो पर पानी के बूंद मोती से शोभित होते हैं । आचार्य स्वयं को बूंद और ।ऋषभदेव को कमलिनी का पŸाा बता रहे हैं । भक्तामर के प्रथम सात श्लोक भूमिका के हैं । स्तुति प्रारंभ हो रही   है । जो सज्जनों के चिŸा को हरण करेगी । आचार्य इतने बड़े होने पर भी स्वयं को इतने विनम्र बतलाते हैं । उनकी भावना है कि मेरे कर्मरूपी ताले टूटें । राजा भोज द्वारा भरे दरबार में अपमान होने पर भी वे भेदज्ञान में रहते हैं । जब आत्म-दृष्टि प्राप्त होती है तब शरीर गौण हो जाता है। 95ः लोग कारोबार, घर बच्चों को महŸव देते हैं । शरीर से श्मशान तक गये तो क्या पाया । सिकन्दर, हिटलर ने इतना धन एकत्रित कर लिया फिर भी कुछ नहीं पाया । 

शरीर के रोगों का हम खूब उपचार करते हैं । बढ़िया से बढ़िया डाॅक्टर को दिखाते हैं, बीमारी ठीक करने के लिए । विदेश जाना पड़े तो जाते हैं । तुम स्वस्थ हो गये तो धर्म को अपनाओ । धर्म वीतराग है । उसमें ना राग है ना द्वेष है । वीतराग-धर्म जो पंचमगति की ओर ले जाए । भक्तामर स्तोत्र से कर्म-निर्जरा हो सकती है । उसे हम भाव से गाये । भगवान ऋषभ देव को याद करो । प्रभु ने संसार को कैसे तिराया । आचार्य मानतुंग सम्बोधन करते हैं, हे प्रभो ! मैं अनाथ था । आप नाथ मिल गये तो मैं सनाथ हो गया । मेरी अनाथता समाप्त हो गई । हम अपने कर्मों के कारण नरक, निगोद की यात्रा कर आये हैं । अब हमें मुक्ति यात्रा की ओर बढ़नी है । पिछले सात श्लोकों में आचार्य ने प्रभु को उद्योत करने वाले, अंधकार रूप पाप का नाश करने वाले । इसमें प्रभु को सूर्य की उपमा दी है । संसार समुद्र में आलम्बन रूप देवों द्वारा पूजित पाद पीठ जहां पर प्रभु चरण रखते हैं । उनके चरण पवित्र हैं । उनके नाखून से देवताओं के मुकुटों की मणियां सुशोभित होती है । संसार समुद्र को भुजा से पार करने वाला मैं कोयल हूँ और आप आम्र मंजरी बन निमिŸा बने हो । इसी तरह मैं आपकी भक्ति कर रहा हूँ । व्यक्ति जितना सरल होगा, उतनी जल्दी मोक्ष की प्राप्ति   होगी ।  जहां भाव होता है, वही प्रभाव होता है । सिंहासन कितना भी सुन्दर है पर शोभित तभी होता है जब उस पर कोई बैठता है । हीरा कितना रूपवान है, उसका प्रभाव तभी है जब वह सेठ की अंगुली का भूषण बने । आपके प्रभाव से मुझ अल्पज्ञ का काव्य भी प्रभावपूर्ण हो गया । इस तरह आचार्य मानतुंग ने भक्तिभाव से प्रभु की स्तुति की है ।

 

वीतरागभाव में आना ही भक्ति है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

09 सितम्बर, 2006: जम्मू: विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता, जैन धर्म दिवाकर, योगीराज, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने श्री नेकचंद मैमोरियल हाल, जैन स्कूल में अपने मंगलमय प्रवचन में वर्तमान के आडम्बरों को दूर करने हेतु श्रद्धेय आचार्य भगवंत ने कहा कि आजकल के व्यक्ति समाज सुधार में अधिक ध्यान दें । हमारा समाज इसीलिए बंटा हुआ है कि उसमें एकता नहीं है । कुछ दिन पूर्व जैन सभा के सभी सदस्यों ने मिलकर एक प्रस्ताव पारित किया था कि शादी सादगीपूर्ण ढंग में की जाएगी एवं उसमें कम से कम चीजों का इस्तेमाल होगा । हम सभी इन बातों को अपने भीतर रखें । यह कानून केवल किताबों के लिए नहीं है हमारे जीवन के   लिए है । आप अपने जीवन में ऐसा करोगे तो एक आदर्श स्थापित होगा और जम्मू श्रीसंघ का नाम ऊंचा होगा । 

आचार्य मानतुंग ने भक्तामर स्तोत्र में अपनी भक्ति कूट-कूटकर भरी है । यही स्तोत्र क्यों रचा   गया । हम इसका स्मरण क्यों करते हैं ? यह एक मुख्य प्रश्न है । आचार्यश्रीजी ने हर श्लोक में स्वयं को भावपूर्ण स्थिति में प्रेषित किया है । वे कहते हैं- हे प्रभो ! आपके गुणों का वर्णन वर्णनातीत है । आचार्यश्रीजी के जीवन का एक मुख्य महत्वपूर्ण समय था जब उन्हें बेड़ियों में बांधकर कारागृह डाला   गया । आचार्यश्रीजी ने किसी को दोष नहीं दिया । इस स्तोत्र से यह शिक्षा हमें मिलती है कि हम किसी को दोष न देते हुए धर्म मार्ग पर अग्रसर  रहें । 

धर्म में भक्ति का मार्ग और ध्यान का मार्ग दोनों ही सर्वोत्तम है । सामायिक और ध्यान एक ही   है । भक्ति तल्लीनता से करोगे तो सामायिक हो जाएगी । बिना मेहनत तो मजदूर को भी रोटी नहीं मिलती । अगर मुक्ति को पाना है तो मेहनत करनी आवश्यक है । वीतरागता की मेहनत करें । आचार्य विनीत और सरल थे तभी उन्होंने भगवान को पाया । हमारी आयु का तीसरा हिस्सा बीत गया है, सिद्धगति जाना है तो वीतराग भावों को भीतर उतारना आवश्यक है । वतराग भाव से कर्म क्षय होते हैं । आत्मा के चारों ओर कर्म लिपटे  हैं । समभाव से वे क्षय हो जाएंगे । अरिहंत वीतराग भाव से ही अरिहंत बने । अरिहंत की भक्ति वंदन आवश्यक है । इस समय भावों की गहराई भी आवश्यक है । 

नवें श्लोक में आश्चर्य की बात आचार्यश्री ने कही है । घटनाओं का होना स्वाभाविक है व्यक्ति के सुधार के लिए धर्म ठोकर भी देता है, दुःख भी देता है । आचार्यश्री ने परमात्मा की बाह्य विभूति देखकर कभी भक्ति नहीं की । आज का संसारी व्यक्ति परमात्मा की बाह्य विभूति देखकर सोचता है कि मुझे वह विभूति प्राप्त हो इसीलिए वह भगवान की पूजा करता है परन्तु वीतराग-भाव ही सर्वश्रेष्ठ विभूति है । अरिहंतों, सिद्धों ने इस वीतरागभाव को अपनाया है । आपने लक्ष्य तो सिद्धालय का बना लिया परन्तु अभी तक घर, दुकान और बैटों में अटके हुए हैं । अगर मोक्ष जाना है तो इन सबको छोडना होगा । वीतरागभाव की पुष्टि करनी होगी । यदि आप परमात्मा से प्रेम करते हैं तो वीतरागभाव से प्रेम करते हैं । व्यक्ति अपने गुणों से अच्छा लगता है । वीतरागभाव अगर भीतर हो तो उस समय तुम भी अरिहंत हो । वीतरागभाव में आना ही परमातम की भक्ति है । परमात्मा बना नहीं जाता परमात्मा हो जाता है । नींद लाई नहीं जाती, नींद आती है । समता के भावों को बनाये रखो, तुम भी परमात्मा हो जाओगे । 

 

हमारा लक्ष्य कर्म क्षय का हो

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

10 सितम्बर, 2006: जम्मू: विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता, जैन धर्म दिवाकर, योगीराज, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने श्री नेकचंद मैमोरियल हाल, जैन स्कूल में अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- भक्ताम्बर स्तोत्र में आचार्य मानतुंग ने भगवान को अनेक उपमाओं से उपमित किया है । उन्होंने अरिहंत को सूर्य कहा । सूर्य की किरणों को अरिहंत भगवान की कृपा कहा । सरोवर भक्ति का सरोवर है और उसमें खिले कमल हमारी अन्र्तात्मा है जो भक्ति में डूबकर शुद्ध हो रही है । यदि आपने चार गति चैरासी लाख जीवों से छुटकारा पाना है तो एक लक्ष्य चुनिए, बिना लक्ष्य के कुछ नहीं होता । जीवन सभी जीते हैं पर सबका लक्ष्य संसार तक सीमित है । हमारा लक्ष्य परमात्म प्राप्ति का हो । सिद्धालय जाने का हो । घटनाएं सबके जीवन में आती है परन्तु घटनाओं से हम शिक्षा नहीं लेते । घटनाओं से हम निर्जरा भी कर सकते हैं । कर्म-बन्धन भी कर सकते   हैं । 

नवें श्लोक में आचार्य मानतुंग ने चार आश्चर्यों की बात कही । पहला आश्चर्य तो यह है कि आचार्य को बेड़ी के बंधन में बंधना पड़ा । उन्होंने रत्ती भर भी प्रार्थना नहीं की कि मेरी बेड़ी खुल जाए । दूसरा आश्चर्य बेड़ी तोड़ने की भावना उनके मन में भी नहीं आयी । तीसरा आश्चर्य यह है कि उन्होंने दैविय चमत्कार को बताने के लिए स्तोत्र की रचना नहीं की । दैवीय चमत्कार के लिए आजकल अनेक ऋषि मुनि तपस्चरण करते हैं और उन्हें सिद्ध करना चाहते हैं । आचार्य के चरणों में शक्रेन्द्र स्वयं उपस्थित हुआ और उसने कहा कि आपके जो बेड़ी के बंधन हैं मैं उन्हें तोड़ना चाहता हूं । आचार्यश्रीजी ने कहा- बंधन ही तोड़ने हैं तो कर्मों के बंधन तोड़ो । शक्रेन्द्र कर्म-बंधन तोड़ने में असमर्थ था क्योंकि स्वयं ही वह उन बंधनों में बंधा हुआ था । चैथा आश्चर्य यह है कि भक्ति के साथ आचार्यश्रीजी ने परमात्मा के साथ तात्विक संबंध स्थापित किया । 

क्या है तात्विक संबंध ? तात्विक संबंध यानि भेद-विज्ञान । शरीर और आत्मा का अलग होना । शरीर और आत्मा अलग ही है परन्तु हमने शरीर को ही जीव मान लिया । मैं शुद्धात्मा हूं यह भाव और परमात्म प्राप्ति का लक्ष्य ही तात्विक संबंध है । ये चार आश्चर्य आचार्यश्रीजी के जीवन में घटित हुए । हमारे जीवन में ऐसी परिस्थिति आए तो हमें क्या करना है ? इस स्तोत्र से हमें यह शिक्षा मिलती है कि हम कर्म-ब्ंाधन को तोड़ें । साधक की भांति साधना करें । आप भक्ति प्रभाव में जन्मों-जन्मों के कर्म-क्षय कर सकते हो । भक्ति की प्रगाढ़ता में डूबों तभी यह सब संभव होगा । 

राजा हेमब्रह्म और रानी हेमश्री बहुत आनंद में रहते थे । आनंद की कोई कमी नहीं थी । कमी थी तो केवल संतान की । एक बार वे वन क्रीड़ा हेतु जंगल में गए वहां उन्होंने मुनि को ध्यानस्थ देखा । मुनि को देखकर भाव विभोर हो गये और उनके सामने बैठे रहे । मुनि का ध्यान भंग नहीं किया । जब तक मुनि ध्यान मग्न रहे तब तक वे दोनों उन्हें अपलक दृष्टि से निहारते रहे । मुनि मनःपर्यवज्ञानी थे । मुनि का ध्यान पूर्ण हुआ तो उन्होंने जाना की राजा को क्या समस्या है । मुनि ने समस्या को ना बतलाते हुए एक आदेश दिया कि हे राजन् तुम्हारे राज्य में पंचेन्द्रिय वश का त्याग हो । मूक प्राणियों की सेवा हो और तुम अपने हाथों से गरीबों को दान दो तो तुम्हारी मन की इच्छा पूर्ण हो सकती है । मुनि ने उन्हें दान, दया, सेवा का उपदेश देते हुए कहा- कि भक्तामर स्तोत्र का 9वां श्लोक केसर चंदन से लिखकर प्रासुक पानी में डालकर पी जाओ । तुम्हारी मनोकामना पूर्ण होगी । समय आया । राजा ने मुनि के बतलाए अनुसार सारे कार्य सम्पन्न किए और उन्हें एक पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई । यह है भक्तामर स्तोत्र का चमत्कार । हमें मनोकामना से स्तोत्र का पठन नहीं करना है । स्तोत्र पठन के पीछे हमारा एक ही भाव हो की हमारी कर्मों की बेड़ियां टूटे । हमें मोक्ष चाहिए । हमारा यह लक्ष्य हो कि हम यहां पर अधिक से अधिक साधना करते हुए अगला जन्म महाविदेह क्षेत्र में हो और वहां पर आत्म-शुद्धि करते हुए हम मुक्ति को प्राप्त हों । लक्ष्य के साथ श्रम का भी जीवन में महत्व है । लक्ष्य के अनुसार श्रम करना भी आवश्यक है । हमारे जीवन की शुद्धि हो, आत्मा निर्मल हो यही आप सबके प्रति हार्दिक मंगल भावना । 

 

स्वः के अर्थ को निकालने वाला स्वार्थी है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

11 सितम्बर, 2006: जम्मू: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- आचार्य मानतुंग ने भगवान के गुणों का वर्णन करते हुए कहा है- हे प्रभो ! आप भुवन भूषण हो यानि विश्व के श्रृंगार हो । संसार प्राणियों को आपने असी मसी कृषि का उपदेश दिया । श्रृंगार का मतलब शिरोमणि है । बहनें श्रृंगार कहो पर करती है वे हमेशा कण्ठ से ऊपर श्रृंगार करती है, उसी तरह देह में सिर सर्वोपरि है । हाथ पांव कट जाएं तो व्यक्ति जिन्दा रह सकता है । सिर कट जाए तो उसका जीना मुश्किल है । आचार्य ने भगवान को भूतनाथ की उपमा दी है यानि प्रभो प्राणियों के स्वामी हैं । स्वामी वह होता है जो सेवक की रक्षा करता है । अनेक गुणों से प्रभु विद्यमान है । संसार में डूबते हुए प्राणियों के लिए वे आधार स्वरूप है । वे कहते हैं कि आपकी स्तुति करने वाला आपके समान हो जाता है । आचार्यश्रीजी ने भक्त और भगवान को एक कर दिया है । वह स्वामी ही क्या जो सेवक को धन देकर अपने जैसा नहीं बनाता । 

स्वामी शब्द बहुत ऊँचा है । इस शब्द में सभी सेवकों का स्वामीत्व छिपा हुआ है । स्वामी वही होता है जो सेवक को भी अपने जैसा बना देता है । तुम आत्मबल पर चलो संसार कुछ भी बिगाड़ नहीं सकता । जिन्होंने अरिहंतों और सिद्धों की स्तुति की है वे अरिहंत और सिद्ध बन गए  हैं । जिस प्रकार दूध में पानी मिलाने पर पानी दूध जैसा प्रतीत होता है । पानी की कीमत भी दूध जैसी बन जाती है उसी तरह जब सेवक स्वामी में घुल जाए तो वह स्वामी के समान बन जाता है । भक्त भक्ति करे तो भगवान बन जाता है । 

संसार में तीन पदार्थ है आत्मा, परमात्मा और अनात्मा । ये तीन शब्द बहुत महत्वपूर्ण है । इन तीनों के ऊपर हमारा जैन दर्शन टिका हुआ है । ये तीनों ही सम्पूर्ण लोक में व्याप्त है । संसार में दो ही तत्व है, जीव और अजीव । जीव है हमारी आत्मा और अजीव है हमारा शरीर । सारा कार्य शरीर करता है आत्मा केवल जानती और देखती है । हमें सही ज्ञान ना होने से हम शरीर को ही जीव मान लेते हैं । मन, वचन, काया, धारणा सब मिथ्या हैं । आप दान, पुण्य करते हो । किसी का जीवन बचाते हो तो वह कौन कर रहा है वह तुम्हारा शरीर कर रहा है । दान पुण्य जप तप ध्यान को कभी प्रकट मत करना । जिसको प्रकट कर दिया उसका सारा मूल्य चला गया । ये सारी चीजें केवल कर्म-निर्जरा के लिए है जिन्हें हम प्रकट कर देते हैं । हमारी बुद्धि धारणा और निर्णय मन वचन काया में एकत्रित होकर हमें आत्म-तत्व से अलग करते हैं परन्तु हमने ज्ञान से देखना है कि क्या जीव है और क्या  अजीव ।

स्वार्थी शब्द बड़ा सुन्दर है, बड़ा अच्छा है । हमने उसे गलत बना दिया । स्व अर्थी स्व के अर्थ को निकालने वाला ही स्वार्थी है । स्वः है हमारी आत्मा और जो आत्मा का अर्थ निकालता है वह स्वार्थी है । प्रभु महावीर सबसे बड़े स्वार्थी थे इसीलिए जब तक उनको केवलज्ञान नहीं हुआ, आत्मतत्व का प्राकट्य नहीं हुआ तब तक उन्होंने उपदेश नहीं दिया । मौन धारण किया । वे बहुत कम बोलते थे । हमारे सारे संबंध संसार के हैं । आत्मिक दृष्टि से देखें तो आत्मा का संबंध परमात्मा से है । जो आतमदृष्टि में रहता है उसका ना कोई पुण्य है ना कोई पाप । दिन भर किया हुआ सारा कार्य वह प्रभु के चरणों में अर्पित कर दे तो अत्यतिधक निर्जरा कर लेता है । आज का व्यक्ति पाप तो चरणों में अर्पित करता है परन्तु पुण्य को अपना समझता है अपना कुछ भी नहीं है । हम तो केवल आत्म स्वरूप है । आत्मा केवल जानती और देखती है । हम जीव में होते हुए अजीव को जीव मानते हैं । जितने भी संसार में झगड़े, युद्ध हो रहे हैं वे सब शरीर के हो रहे हैं । हम आत्म-तत्व को पहचानें । आत्मानुभूति करे यही हमारा लक्ष्य हो । 

 

जहां मांग है वहां मोक्ष नहीं मिल सकता

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

12 सितम्बर, 2006: जम्मू: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- आचार्यश्री मानतुंग की भक्ति, प्रार्थना बेजोड़ थी । उन्होंने भगवान ऋषभदेव को देखा नहीं था फिर भी वे उन्हें जगन्नाथ कहते हैं । दसवें श्लोक में उन्होंने भगवान को मालिक की उपमा दी है । मालिक वह जो सेवक को अपने जैसा बना लेता है । यदि हम आत्मा और अनात्मा को समझ ले तो परमात्मा दूर नहीं । हर जीव की आत्मा एक समान है । पच्चीस बोल में आत्मा और अनात्मा का बहुत सुन्दर विवेचन किया है । तेरहवें बोल में मिथ्यात्व दस बतलाये हैं जिसमें जीव को अजीव श्रद्धे तो मिथ्यात्व । अजीव को जीव श्रद्धे तो मिथ्याथ्व । संसार के मार्ग को मोक्ष का मार्ग श्रद्धे तो मिथ्यात्व । मोक्ष के मार्ग को संसार का मार्ग श्रद्धे तो मिथ्यात्व । हम इन्हीं सही ढंग से समझ ले तो मुक्ति नजदीक होगी । हम तप, दान, शील और अनेक कार्य करते हैं और कहते हैं मैं कर रहा हूँ, सबसे बड़ा मिथ्यात्व तो यही है । तप शरीर करता है आत्मा केवल जानती और देखती है । तीर्थंकरों ने भेद-विज्ञान से मोक्ष प्राप्त किया । उन्होंने मौन के साथ समता, ध्यान, कायोत्सर्ग को अपनाया । 

आचार्य मानतुंग भगवान को कहते हैं तुम सागर हो मैं बूंद हो । तुम सूरज हो मैं दीया हूं । तुम विश्व श्रृंगार हो । मैं माटी का पुतला हूँ । आज हम हर समय मांग करते रहते हो । जहां मांग है वहां मोक्ष नहीं हो सकता । शरीर और आत्मा के बीच श्वांस की डोरी है । जिस दिन डोरी टूटगी उस दिन सब अलग हो जाएगा । मानव जीवन का सार यही है कि हम बार-बार जन्म ना लें । जैन दृष्टि से आत्मा और पुद्गल को समझो । आत्मा का किसी से कोई संबंध नहीं । आत्मा अजर अमर निराकार है । तुम परमात्मा को चाहोगे तो वैसे बन जाओगे । हमारे शास्त्रों में तीर्थंकर गौत्र बांधने के बीस बोल आते हैं, उसमें प्रथम बोल है अरिहंत की भक्ति । हम स्तुति, विनय, भक्ति करें, उत्कृष्ट रसायन से करते हैं तो अनंत कर्मों की निर्जरा होती है । अरिहंत क्या हैं ? नमस्कार पद में क्या है ? हमारी शुद्धात्मा में पंच-परमेष्ठी समाएं हुए हैं और पंचपरमेष्ठी में हम समाएं हुए हैं क्योंकि वो भी शुद्धात्मा हैं और हम भी शुद्धात्मा हैं । केवली और तीर्थंकर में क्या अन्तर है । केवल केवलज्ञान के धर्ता होते हैं, तीर्थकर भी केवलज्ञान के धर्ता होते हैं परन्तु तीर्थंकर धर्म तीर्थ की स्थापनाकरते हैं । भवी जीवों को धर्म जहाज में बिठाकर सिद्धालय की यात्रा करवाते हैं । 

अरिहंत कौन ? जिन्होंने चार कर्म क्षय कर लिए हैं जो राग द्वेष से मुक्त हो गए । तीन लोकों में जिन्होंने अपने ज्ञान का प्रकाश फैलाया है । लोगस्स का पाठ, नम्मोत्थुणं का पाठ यह सब अरिहंत परमात्मा की भक्ति है इसे भक्ति से करो । जो महाविदेह क्षेत्र में विहरमान भगवंत श्री सीमंधर स्वामी हैं जो स्वयं तिरने के लिए उद्यत हैं और अनेक भवीजनों को तार रहे हैं । भरत क्षेत्र में उन्होंने बहुत साधना की है इसलिए उनका संबंध इस क्षेत्र से जुड़ा हुआ है । उनकी सोने जैसी काया है । 500 धनुष जितना लम्बा उनका शरीर है । एक करोड़ देवी देवता हर समय उनकी सेवा में रहते हैं । अनेकों साधु साध्वी केवल भगवंत उनकी आज्ञा में विचरते हैं । उनकी आराधना में लीन हो जाओगे तो वे भी हमें अपने जैसा बना देंगे । आपने देखा सुदर्शन सेठ और कामदेव श्रावक पर अनेकों परीषह आए फिर भी वे धर्म से डिगे नहीं । हमारी श्रद्धा अडिग हो । हमारा संकल्प मजबूत हो तो हम अवश्य मुक्ति को प्राप्त कर सकते हैं । एक ही भावना भीतर रखो कि मेरा अगला जन्म महाविदेह क्षेत्र में हो वहां पर भगवान की भक्ति करते हुए मुझे मुक्ति मिले । तुमने पैसा कमाया कोठी बनायी संसार के बहुत कार्य किए यह कोई महत्वपूर्ण बात नहीं । तुमने किसी को धर्म के संस्कार दिए वह बहुत बड़ा कार्य है । अपने बच्चों को सिखाओं कि जिनवाणी तुम्हारी माता है । अरिहंत तुम्हारे पिता हैं । इस शरीर में रहते हुए अन्तिम परिणति माटी हो गई तो कोई बात नहीं परन्तु इसी शरीर से मोक्ष प्राप्त कर लिया तो सब कुछ मिल गया । भगवान महावीर के पास ऐसा ही शरीर था जैसा हमारे पास है । तुम अंग-2 से भक्ति करो ।

 

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

13 सितम्बर, 2006: जम्मू: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- आचार्य मानतुंग फरमा रहे हैं कि हमें स्तुति किस प्रकार करनी है । स्तुति ऐसी है जिसमें भगवान भक्त को मिल जाएं । जैसे चंदनबाला ने भगवान महावीर की की थी । भीलनी ने राम की की थी । विदुर की पत्नी ने कृष्ण की भक्ति में आर केले के छिलकों को खिलाया था । धर्म की आराधना करते हुए थोड़ी दृष्टि संसार की हो तो वह भक्ति भक्ति नहीं । तुम परमात्मा से क्या मांगते हो । यदि आप निष्काम भक्ति करते हो तो वह तुम्हें मुक्ति की ओर ले जाएगी । वीतराग भाव स किया गया हर कार्य अक्षय सुख प्रदान करता     है । जैन धर्म में बारह तपों की चर्चा आती है । अनशन करना बहुत आसान है । एक दिन कुछ भी नहीं खाओगे पीओगे तो चल जाएगा परन्तु उणोदरी तप करना उससे कठिन है । उणोदरी में भूख से कम खाना है । जैसे-2 तप का क्रम बढ़ता जाएगा वैसे-2 निर्जरा अधिक होती चली जाएगी । भ्क्षिा लाना भी कोई मामुली बात नहीं । किसे क्या पसन्द है, क्या चीज लेने योग्य है यह देखकर लाने में अधिक विवेक की आवश्यकता है । 

रसनेन्द्रिय को जीतना रसपरित्याग तप में आता है । कायक्लेश तप में हम शरीर को कष्ट देते हंैं । इस शरीर को आज तक अधिक मलाई मक्खन खिलाया परन्तु यह किसी के भी काम नहीं आया । काया-क्लेश तप में लोच करना, पैदल विहार करना, शरीर को जो आवश्यकता है उसे पूर्ण ना करना आदि बातें आती है । उसके बाद आन्तरिक तप शुरू होते हैं जिसमें पहला तप है प्रायश्चित । आपके साथ कुछ भी घटित हुआ उसका प्रायश्चित करना यह भी तप है । आलोचना यानि दिन भर जो भी हुआ सब कुछ अपनी श्रद्धा आस्था के समक्ष कह देना । विनय बड़ो की विनय करना । विनय छोटो की भी की जाती है । महान् आचार्य श्री अमोलकऋषि जी महाराज सब संत सो जाने के बाद रात्रिकाल में उन्हें तिक्खुतों के पाठ से तीन बार वंदना किया करते थे । वैयावृत्य यानि सेवा करना । ध्यान और कायोत्सर्ग सबसे बड़ा तप है । कायोत्सर्ग में सबसे अधिक कर्मों की निर्जरा है । जो व्यक्ति तप ना करते हुए माया करता है उसका यह भव भी बिगड़ता है और पर भव भी बिगड़ता है । माया करने वाले को मोक्ष की प्राप्ति नहीं होती । 

प्रतिक्रमण भी दो प्रकार का है । एक द्रव्य प्रतिक्रमण और भाव प्रतिक्रमण । द्रव्य प्रतिक्रमण में हम पाठ बोलते चले जाते हैं परन्तु हमें पता नहीं कि उस पाठ का क्या अर्थ होता है । भाव प्रतिक्रमण में हम भावनाओं द्वारा अपने इष्ट के समक्ष दिन भर घटी घटनाओं की आलोचना कर देते हैं । मुख से बोलना आवश्यक नहीं । प्रायश्चित तो मन ही मन हो जाता है । सच्चे मन से की गई आलोचना सफल होती है । अवसर बार-बार नहीं आएगा । अपनी आलोचना कर लो । मोक्ष का टिकिट ले लो । तुमने गलती की चित्त की चेतना उसे गलत कहती है । कोई व्यक्ति इस दुनियां में परफेक्ट नहीं है । परफेक्ट है तो केवल अरिहंत और सिद्ध है । तुम स्वयं को ऊँचा बताकर दूसरों की निन्दा ना करो । स्वाध्याय करो  । उसके पांच अंगों को अपने जीवन में उतारो । वांचना लो । किया हुआ स्वाध्याय बार-बार उसका परावर्तन करो फिर एक शब्द पर अनुप्रेक्षा करते हुए धर्म कथा को भीतर से बह जाने दो । ध्यान और कायोत्सर्ग सबसे बड़ा तप है । हर तीर्थंकर ने इसे अपनाया है । आपके हरश्वांस में अरिहंत का नाम निकले । 24 तीर्थंकर सिद्ध हो गए हैं परन्तु वर्तमान में अरिहंत श्री सीमंधर स्वामी भगवान हैं । उनका चिन्ह वृषभ का है । उनके पिता का नाम श्रेयांसराय माता सत्यकी एवं पत्नी रूक्मिणी देवी । वे पूर्व महाविदेह क्षेत्र के पुष्कलावती विजय में धर्मदेशना दे रहे हैं । भरत क्षेत्र की आने वाली चैबीसी के सातवें आठवें तीर्थंकर के बीच उनका निर्माण होगा । तुम भक्ति करते-2 निर्जरा करो और भाव रखो कि मेरा अगला जन्म महाविदेह क्षेत्र में हो । मैं सीमंधर स्वामी भगवान की भक्ति करते हुए मुक्ति को प्राप्त करूं । 

 

भेद-विज्ञान से आत्मा पुष्ट होती है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

14 सितम्बर, 2006: जम्मू: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- भगवान के एक वचन से अनंत प्राणी संसार सागर को तैरकर पार कर लेते हैं । भक्तामर स्तोत्र का दसवां श्लोक बहुत महत्वपूर्ण है । इस श्लोक में ग्यारह बार भ शब्द का प्रयोग हुआ है । जैसे भूतम्, भुवन, भूषण, भूतनाथ आदि । भक्तामर स्तोत्र की शुरूआत ही भ शब्द से होती है । यह शब्द बड़ा गहरा और मार्मिक है । भक्त का सीधा संबंध भगवान से हो । हमें संसार के सभी संबंधों से अलग होकर भगवान से संबंध स्थापित करना है । भक्त जब भगवान में तल्लीन होता है तो वह उसे पुकारने के लिए भंते शब्द का प्रयोग करता है । भगवान मिलने पर हमारे सारे पाप, भय दूर हो जाते हैं । अहंकार स्वतः ही लीन हो जाता है । भक्ति हमें भगवान से जोड़ती है । भक्त वह है जिसका अपना कुछ नहीं । भक्त का कुछ है तो भगवान है । भक्ता का भाव हो तो भगवान अपना प्रभाव स्वतः दिखलाते हैं । 

भेद-विज्ञान एक ऐसा शब्द है जिसमें केवल अक्षय ही नहीं गहरा भाव समाया हुआ   है । यह ऐसा आत्म-ज्ञान है जिसमें देह और आत्मा की भिन्नता प्रतीत होती है । भगवान महावीर ने एक बार भी अपना नाम अपने मुख से नहीं उचारा । हमें आत्मा से नाता जोड़ना है देह से नहीं । हमारी जो आत्म-ज्योति है वह संसार में कर्म चक्रों से मलीन हो रही है । हमें उसे शुद्ध और परिशुद्ध करना  है । भेद-विज्ञान ध्यान और कायोत्सर्ग को पुष्ट करता है । अनंतकर्मों की निर्जरा करता   है । भेद-विज्ञान से सारे संबंध मधुर हो जाते हैं जिसमें साथ मोह, राग हो वह खत्म हो जाता है । राजा श्रेणिक का जीव भेद-विज्ञानी है । नरक में भी अनंत निर्जरा कर रहा है । हम क्यों राग करते हैं, क्यों मोह करते हैं क्योंकि हम शरीर पर अटके हुए हैं । हमने शरीर को महत्व दिया, आत्मा को महत्व नहीं दिया । भाषाचरिम शब्द स्तोत्र की सार्थकता का प्रतीक है तो भावचरिम शब्द में स्तोत्र का सारा भाव समाया हुआ है । श्लोक में भूतनाथ शब्द प्राणियों के स्वामी का सम्बोधन कराता है । 

संसार में चार तत्व हैं । प्राण, भूत, जीव, सŸव जिसमें भगवान को समस्त प्राणियों का स्वामी कहा है । अरिहंत परमात्मा के समवसरण में सभी प्रकार के जीव धर्म-देशना सुनने हेतु आते हैं जिसमें पशु-पक्षी, देव सभी प्रकार के मानव भगवान की देशना सुन धर्म की ओर उद्यत होते हैं । भक्ति करने पर जीवन में भद्रता आती है और व्यक्ति भद्र यानि सरल होता  है । जो सच्चा भक्त है वह कभी माया नहीं करता । दांव पेच नहीं खेलता । स्तोत्र में अन्तिम भ शब्द भुज्जो-भुज्जो आया है इसका अर्थ है बार-बार । हम बार-बार भगवान की स्तुति, भक्ति करें । आचार्यश्री की भक्ति प्रबल थी । शक्रेन्द्रय भी उनकी भक्ति को देखकर उनके चरणों में नतमस्तक हो गया । आचार्य मानतुंग कहते हैं इन्द्र के गुरू बृहस्पति भी आपकी स्तुति नहीं कर सकते तो मैं आपकी स्तुति कैसे कर सकता हूं । आचार्यश्री ने प्रत्येक काव्य में स्वयं को लघु प्रस्तुत किया है । 

इस श्लोक में तीर्थंकर गोत्र के बीस बोलों की चर्चा भी आती है जिसे क्रमशः आपकी समक्ष रखी जाएगी । अरिहंत पर आपका चिन्तन चल रहा है । अरिहंत वे जिन्होंने धर्म की आदि की । वे ना होते तो धर्म ना होता और हम संसार चक्र में भटक जाते । भक्त भगवान की भक्ति करता है तो भगवान उसे अपने तीर्थ में स्थान देते हैं । आप स्वयं गुरू, परमगुरू हैं जिनको भीतर से बोधी की प्राप्त हो गई । वे धर्म देने वाले हैं मंगल की स्थापना करने वाले हैं । अरिहंत पुरूषों में उत्तम, कमल के फूल के समान श्रेष्ठ पुरूषों में प्रधान गंधहस्ती के समान हैं । हम उनकी भक्ति करें और मोक्ष की कामना करें । मोक्ष की कामना से हमें निश्चित ही मोक्ष की प्राप्ति होगी । 

 

आत्मिक सुख की कूंजी है ध्यान

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

15 सितम्बर, 2006: जम्मू: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- भक्तामर स्तोत्र में भक्ति के द्वारा भगवान प्राप्ति की बात चल रही है । शास्त्र में वर्णन आता है कि- गुणानुवाद से गुणों का कीर्तन करने से व्यक्ति अनेक कर्मों का क्षय कर मुक्ति को प्राप्त करता है इसलिए निरन्तर साधना की आवश्यकता  है । अरिहंतों के अतिशय का वर्णन चल रहा है । अरिहंत भगवान इतने सुन्दर हैं कि उनका शरीर स्वर्ण की कांति के समान है । उन्हें मल और पसीना नहीं आता । उनके श्वासोंश्वांस से कमल के फूल के समान सुगंध आती है । तीर्थंकर जन्म से ही तीन ज्ञान के धर्ता होते हैं । उनका रक्त और मांस श्वेत गाय के दूध के समान होता है । आपने देखा भगवान महावीर के समय चण्डकौशिक ने जब प्रभु को दंश मारा तो भगवान के अंगूठे से खून की नहीं दूध की धारा बही थी । यह दूध नहीं अपितु खून ही था क्योंकि भगवान के खून का रंग सफेद होता है । उनके आहार निहार की क्रिया दिखाई नहीं देती । उनके समवसरण में मानव, देव, तिर्यंच एक योजन में करोड़ा करोड़ की संख्या में बैठकर धर्म देशना सुनते हैं । 

अरिहंत प्रभु की वाणी सभी भाषाओं में परिणत होती है । जैसे पार्लियामेन्ट में हर व्यक्ति को अपनी भाषा में लेक्चर सुनाई देता है उसी तरह मानव, देव, तिर्यंच अपनी-2 भाषा में भगवान की वाणी को अपने भीतर उतारते हैं । भगवान के मस्तक के पीछे दैदिप्यमान सूर्य के समान आभामण्डल होता है । वे जहां पर रहते हैं सवा सौ योजन तक रोग नहीं होते । यह धर्म का प्रभाव है । सनत् कुमार चक्रवर्ती ने रूप का अहंकार किया तो सोलह रोग उनके शरीर में उत्पन्न हो गए और उन रोगों को देखने के पश्चात् उन्हें देखकर वैराग्यभाव से उन्होंने दीक्षा अंगीकार कर ली । जहां अहंकार है वहां धर्म नहीं । देवता ब्राह्मण का रूप धारण कर रोग मिटाने हेतु उपस्थित हुए तो सनत् कुमार ने कहा शारीरिक रोग की कोई खास बात नहीं मिटाना है तो मेरा कर्म-रोग मिटाओ और उसी समय सनत् कुमार ने अपने थूक को अपने हाथ पर लगाकर दिखाया । हाथ कंचन सम चमकने लग गया । 

हम शरीर के सुखों को छोड़कर आत्मिक सुख प्राप्त करें । मन, वचन, काया से दूर होकर अपने भीतर ध्यान में जब डूबेंगे तो वह सुख बढ़ता ही जाएगा । अरिहंत भगवान के ईर्दगिर्द 125 योजन तक अनाज आदि को समाप्त करने वाले चूहे आदि प्राणी समूह में नहीं होते । उनके 125 योजन तक किसी प्रकार का रोग, महामारी नहीं होती । अतिवृष्टि, अनावृष्टि नहीं होती । जिन भगवान जो परम् शान्त, परम आनंद और वीतरागता में डूबे हुए हैं उनका जो उपासक है वह जैन कहलाता है । जिन जो निजगुण में आ गए । जानना और देखना जिसने सीख लिया । अरिहंत भगवान जिस राष्ट्र में विद्यमान हैं वहां पर विद्रोह और आसपास के राष्ट्रो में युद्ध नही होते । प्रभु जब चलते हैं तो उनके ऊपर तीन छत्र आकाश में चलते  हैं । दोनों ओर चामर ढ़ाले जाते हैं । ये सब देवताओं द्वारा अतिशय होते हैं । उनका सिंहासन आकाश में उनके आगे-2 चलता है । दिव्य ध्वनि उनके आगे बजती है । जिस अशोक वृक्ष की छाया तले प्रभु विराजमान होते हैं वह वृक्ष भी भगवान जब विहार करते हैं तब उनके आगे-2 चलता है । भगवान जब चलते हैं तो देवों द्वारा उनके मार्ग में स्वर्ण कमलों की रचना की जाती है । जब भगवान समवसरित होते हैं तो सोने चांदी रत्न के तीन गढ़ देवों द्वारा रचे जाते हैं । जब भगवान विहार करते हैं तो मार्ग के कांटे अधोमुखी होते हैं । वृक्ष भी झुक जाते हैं, मानों उन्हें नमन कर रहे हों । देवता उनके विहार मार्ग में सुगंधि जल की मंद-2 वर्षा करते हैं । यह सब धर्म का ही प्रभाव है । उनका इतना पुण्य है ये सब उनके पुण्य से घटित होता है । ऐसे अरिहंत भगवान की हम भक्ति करे,ं उनके अतिशयों को भीतर   उतारें । जब ध्यान में बैठे तो इन अतिशयों का स्मरण कर उनके जैसा होने का संकल्प रखें । 

जम्मू - 17 सितम्बर, 2006: व्यसन मुक्ति, षाकाहार, ध्यान साधना व भ्रूण हत्या निषेध लिए देषभर में भ्रमण करते जैन आचार्य श्री षिवमुनि जी महाराज का 65 वां जन्मदिन आज यहां जैन हायर सैकेण्डरी स्कूल के प्रांगण में धूम-धाम से मनाया गया जिसमें देष भर से आए हजारों श्रद्धालुओं ने भाग लिया । 

आज की सभा को सम्बोधित करते हुए कार्यकारी मुख्यमंत्री श्री मंगतराम जी षर्मा ने कहा कि धन्य है वह समाज जिनको ऐसे महापुरूषों का मार्गदर्षन मिलता रहे, ऐसी मेरी हार्दिक मनोकामना है । पं0 मंगलराम षर्मा ने आचार्यश्री को उनके 65 वें जन्म-दिवस पर मुबारकबाद देते हुए फरमाया कि जैन समाज जो कि बहुत ही रचनात्मक कार्यों को अंजाम देने में लगा है, इसके जो भी सहयोग मुझसे हो सकेगा मैं कभी पीछे नहीं रहूंगा । 

सभा में अपने प्रवचन व विचार रखते हुए श्रमण संघीय मंत्री श्री षिरीष मुनि जी महाराज ने फरमाया कि जिस समाज में हम रहते हैं उसके लिए कुछ न कुछ अवष्य रचनात्मक करना हर व्यक्ति का ध्येय होना चाहिए, यही ध्यान में रख आचार्य श्री षिवमुनि जी महाराज ने षाकाहार, नषामुक्ति व भ्रूण हत्या निषेध का मिषन लेकर, देष भर में भ्रमण कर रहे हैं । लगभग 37 हजार किलोमीटर पैदल भ्रमण कर अपने आचार, विचार, व्यवहार से आपने लाखों व्यक्तियों का उद्धार किया । आपने फरमाया कि व्यक्ति जन्म से नहीं कर्म से महान बनता है और यही कारण है कि आज इस महान् आत्मा के जन्म-दिवस पर बधाई व षुभकामनाएं प्रदान करने के लिए देषभर से श्रद्धालु जम्मू पहुंच रहे हैं । 

इस सभा को सम्बेधित करते हुए विष्व विभूति सर्व धर्म समन्वय समिति के प्रधान संत श्री करनैलसिंह ‘गरीब’ ने आचार्यश्री को उनके 65 वें जन्मोत्सव पर बधाई व षुभकामनाएं देते हुए कहा, सब धर्म मानव एकता, भाईचारे और प्रेम का संदेष देते हैं और आपश्री का जीवन जिस प्रकार मानव सेवा में संलग्न है यह हर व्यक्ति के लिए एक अनूठा उदाहरण है । उन्होंने सब धर्मों के पारस्परिक सहयोग का आह्वान किया ताकि देष में अमन चैन व खुषहाली हो । महंत मंजीतसिंह जी ने भी आचार्यश्रीजी को जन्म-दिवस के अवसर पर बधाई प्रेषित की । 

इस अवसर पर अपने विचार रखते हुए राज्य विधान परीषद के सदस्य श्री अषोक षर्मा ने जैन समुदाय को इस बात के लिए बधाई दी कि उन्हें ऐसे महापुरूष का सान्निध्य प्राप्त हुआ और कहा कि यह मात्र जैन समुदाय ही नहीं सम्पूर्ण मानव समाज का अहोभाग्य है कि आपके चरण जम्मू पड़े । आज के पावन अवसर पर जम्मू संभाग के डिवीजनल कमिष्नर श्री प्रमोद जैन ने भी अपने विचार रखें तथा आचार्य सम्राट् डाॅ0 षिवमुनि जी महाराज की दीर्घायु की कामना की ताकि आपका मार्गदर्षन युगों-2 तक इस समाज को मिलता रहे । 

आज की इस सभा को जिन अन्य महानुभावों ने सम्बोधित किया उनमें सर्व श्री सुमतिलाल जी कर्नावट चेयरमैन- अखिल भारतीय श्रावक समिति, श्रावकरत्न लाला नेमनाथ जी जैन संरक्षक- श्रावक समिति, श्री उमरावमल जी चैरड़िया, महामंत्री- श्री नृपराज जैन, कोषाध्यक्ष- श्री निर्मल पोखरण अध्यक्ष युवा षाखा श्रावक समिति, श्री राधेष्याम जैन, अध्यक्ष हरियाणा महासभा- श्री बहादुरचंद जैन, अध्यक्ष मंगलदेष महासभा, डाॅ0 कैलाष जैन- उप प्रधान, श्रावक समिति- अम्बाला श्रीसंघ के प्रधान श्री प्रेमराज जैन आदि । 

इस अवसर पर आचार्य श्री षिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगल संदेष में कुव्यसनों को त्यागकर सुखमय जीवन व्यतीत करने का आह्वान किया ।

इसके अतिरिक्त जैन तरूणी मण्डल, श्रमण संस्कृति मंच के सदस्यों व श्री महावीर जैन हायर सैकेण्डरी स्कूल और न्यू एरा एनवावार्यन मेंटल स्कूल के बच्चों ने सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किया । आज के इस कार्यक्रम की अध्यक्षता एस0 एस0 जैन सभा जम्मू के अध्यक्ष श्री राजकुमार जैन ने की तथा मंच संचालन महामंत्री श्री रमण जैन ने किया । 

 

आत्मिक सुख की कूंजी है ध्यान

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

16 सितम्बर, 2006: जम्मू: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- आज संक्रान्ति का दिवस   है । संक्रांति एक उद्घोष और जागरण लेकर आयी है । संक्रान्ति हृदय में धर्म, श्रद्धा, भक्तिभाव पैदा करती है । हर महीने संक्रान्ति आती है और चली जाती   है । संक्रांति संक्रमण का कारण है । सूरज की पहली किरण रात्री के काले अंधकार को समाप्त कर देती है । आज पूरे भारत से श्रावकगण यहां पर पहुंचे हैं । आप सबकी भक्ति सराहनीय है । महत्व शरीर का नहीं साधना का है । शरीर तो मिट्टी का पुतला है । प्रभु महावीर की साधना महत्वपूर्ण है । आत्मा और शरीर का संबंध है । इन दोनों के बीच श्वांस की डोर जुड़ी हुई  है । जिस दिन यह डोरी टूटेगी उस दिन सब समाप्त हो जाएगा । 

तीर्थंकरों ने जो आज्ञा दी उस धर्म पर हम चल रहे हैं । विनय, अनुशासन, व्यवस्था का जीवन में बहुत बड़ा महत्व है । आज प्रभु महावीर का शासन है पर वे सिद्ध हो गए हैं । अरिहंत भगवान वर्तमान में महाविदेह क्षेत्र में श्री सीमंधर स्वामी भगवान हैं । फूल अनेक हैं, सुगंध एक सी ही होती है । आप सबकी एकता की भावना सराहनीय है । हमारी भी भावना एकता की है परन्तु एकता के साथ विनय, अनुशासन आवश्यक है । माता पिता का अनुशासन परिवार पर चलता है उत्तराध्ययन का पहला अध्ययन विनय है । विनय का जीवन में महत्व  है । श्रावक के लिए बारह व्रतों का अंगीकार करना आवश्यक है । भगवान ने चार तीर्थों की स्थापना की जिसमें साधु-साध्वी श्रावक श्राविका आते हैं । आपका जन्म सिद्ध अधिकार है अरिहंत बनने का उसके लिए जीवन संयमित हो । साधना से भरपूर हो । आप प्रभु महावीर के श्रावकों का जीवन देखो । बहुत ही संयमित जीवन था । 

आप अपने बेटे-बेटियों की शादी करते हो, कितने धन का प्रदर्शन करते हो । सचित फूलों का प्रदर्शन, रात्री में भोजन लेना यह कहां तक उचित है । जैन धर्म में पानी भी छानकर पीया जाता है । कंद-मूल का सेवन नहीं किया जाता । हमने यह केवल स्थानक तक सीमित रखा । धर्म केवल स्थानक या मन्दिर में नहीं । धर्म का स्थान तुम्हारा हृदय है । तुम, घर, दुकान, फेक्ट्री में रहते हुए धर्म का आचरण प्रतिपल कर सकते हो । आडम्बर को दूर करो । जम्मू श्रीसंघ ने बहुत बड़ा निर्णय लिया कि प्रत्येक शादी में 21 वस्तुओं से ज्यादा नहीं रखी   जाएगी । यह सुन्दर उदाहरण है । हम इनका अनुकरण करें । श्रमण संघ बहुत बड़ा संघ है । इस संघ में श्रद्धेय आचार्यश्री आत्माराम जी महाराज । आचार्य श्री आनंद ऋषि जी महाराज । आचार्य श्री देवेन्द्र मुनि जी महाराज का बहुत बड़ा योगदान रहा है । संघ एकता की कामना सभी की है परन्तु संघ की व्यवस्था पर भी ध्यान देना होगा । एक आज्ञा, एक निष्ठा पर चलना होगा और इनके लिए विनय आवश्यक है । 

आज श्रावक सम्मेलन है जिसमें आप अपनी श्रावक समिति के कार्यकाल पर चर्चा तो करोगे ही साथ में ध्यान, स्वाध्याय, साधु-साध्वी सेवा पर भी चिन्तन मनन हो । हमारा नाता धर्म का नाता है । हमने संसार छोड़ा है तो हम आत्मिक आनंद को प्राप्त करें । प्रभु महावीर की शुद्ध सामायिक भेद-विज्ञान, व्यसन मुक्ति, शाकाहार प्रचार प्रसार करते हुए धर्म की प्रभावना करें । व्यर्थ की चर्चाओं को छोड़ दें । धर्म में सहयोग दें । स्वयं के दोष देखें । तीन लोक का राज्य मिल रहा हो और दूसरी तरफ धर्म मिल रहा हो तो धर्म स्वीकार कर लेना क्योंकि धर्म का मिलन बहुत कठिन है । आज श्रावक सम्मेलन है । दूर-2 से श्रीसंघ आए   हैं । इस सम्मेलन द्वारा श्रमण संघ को एक नई क्रान्ति आए । जम्मू वर्षावास में ध्यान साधना शिविरों का सिलसिला जारी है । वर्षों की प्यास ध्यान की जो भीतर बनी हुई थी वो यहां पूर्ण हुई । आप भी साधना करो । संगठन, विनय, अनुशासन वीतराग धर्म के ये तीन मूल तत्व   है । आप बाहर गांव से बहुत सारे लोग यहां आए हैं । खाना खाते समय झूठा मत छोड़ना । किसी प्रकार की शिकायत नहीं करना । 

हमारे जीवन में सरलता नहीं तो मोक्ष नहीं हो सकता । ध्यान पद्धति को स्वीकार कर लो मुक्ति की टिकिट रिजर्व करवा लो । मौन, ध्यान, साधना को भीतर उतारते हुए हम मोक्षगामी बनें । वीतराग भावों में जीवन जीएं । आज के दिन धर्म साधना में प्रगति करना । मूक प्राणियों की सेवा करना । इस अवसर पर दूर-दूर से आए विशिष्ट महानुभावों के लिए अपनी मंगल कामनाएं प्रेषित की । सबका मंगल हो । लाला श्री नेमनाथ जी जैन ने अपना सारा जीवन धर्म के लिए लगाया है । आज ये 75 वर्ष के हुए हैं और इनका अमृत महोत्सव की शुरूआत जम्मू में हुई है । आप सभी श्रावकों ने इनहें जो ‘समाज शिरोमणि’ के पद से अलंकृत किया है मैं इसका अनुमोदन करता हूं । लालाजी शतायु हो । समाज को आगे लेकर जाएं शासनदेव से यही हार्दिक भावना है । 

 

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

17 सितम्बर, 2006: जम्मू: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- आज का यह पावन दिवस पूरे भारत के महानगरों से पधारे विशिष्ट श्रावकगण यहां पर उपस्थित है । प्रभु महावीर के धर्म तीर्थ के चार स्तंभ साधु साध्वी श्रावक श्राविका धर्म ध्यान की प्रक्रिया यहां पर चल रही  है । प्रभु महावीर का सच में जो ध्यान मार्ग था जो उन्होंने साधना अपने जीवनकाल में की थी, उस साधना का जम्मू निवासी लाभ उठा रहे हैं । भेद-विज्ञान द्वारा मैं शुद्धात्मा हूँ और शरीर नाशवान है यह प्रक्रिया यहां सिखाई जा रही है । संसार के दुःख से आनंद की ओर हम आगे बढ़ें । आंखें हो तो परमात्म प्रतिपल प्रतिक्षण दिखाई देता है । भीतर की आंखें होनी चाहिए । हमारा जीवन क्रिएटिव बनें । किसी ने हमें गाली दी है तो हमारा ध्यान गाली पर ना जाते हुए स्वयं के शरीर, आत्मा पर जाएं । हम परनिन्दा को छोड़कर स्वनिन्दा को अपनाएं । प्रभु महावीर अकेले थे गुरू नानक अकेले थे । हमारे देश के राजनेता सभी अकेले थे उन्होंने अकेले ही सारी बाजियां जीती थी । हम भी अकेले चलते हुए उस परमात्म तत्व को प्राप्त  करें । आज यहां पर विश्व शान्ति और सर्वधर्म समन्वय के अध्यक्ष श्री करनैल्सिंह जी गरीब आएं । इनका विश्व शान्ति में बहुत बड़ा योगदान है । ये अहंकार से रहित हैं । हमें वीतरागता को पाना है तो अपने भीतर की शुद्धता, पवित्रता को बाहर लाना  होगा । प्रभु महावीर की मैत्री को भीतर उतारना होगा । व्यसन मुक्ति, शाकाहार प्रचार, भ्रूण हत्या का त्याग जैसी प्रवृतियों को अपनाना होगा और ध्यान साधना को प्रेक्टिकल रूप में जीवन में अपनाकर विश्व शािन्त की तरफ हम आगे बढ़ सकते हैं । मैं आह्वान करता हूं कि आप सभी ध्यान साधना के कार्यक्रम में आएं और देखें कि ध्यान साधना से हमें शान्ति मिलती है या  नहीं । श्रमण संघ एक है, एक था और एक  रहेगा ।  आप सभी कार्य करें । सबका गौरव बना रहे इस बात का विशेष ध्यान रखें । 

जन्म-दिन के पावन अवसर पर महासाध्वी श्री शिमला जी महाराज ने जो सांस्कृतिक कार्यक्रम भेजा एवं यहां के श्रमण संस्कृति मंच, जैन तरूणी मण्डल, न्यू एर एनवान्र्यमेन्टल स्कूल, जेन स्कूल के बच्चों ने जो प्रस्तुति दी है वह देखकर मुझे अपने बचपन की यादें ताजा हो गयी । मैं आप सबका बहुत धन्यवान करता हूं । हम विश्व भलाई के लिए आगे बढें, यही हार्दिक मंगल कामना । आज के इस अवसर पर संत श्री करनेैलसिंह जी गरीब ने जो मुझे ‘युग पुरूष’ की पदवी प्रदान की मैं इस लायक तो नहीं हूं परनतु इस पदवी का पूरा सम्मान करूंगा और इस अवसर पर मैं इन्हें ‘शान्ति दूत’ की पदवी से अलंकृत करता हूं । वास्तव में ये शान्तिदूर हैं । इन्होंने भारत में ही नहीं पूरे विश्व में शान्ति का कार्य किया है जो प्रशंसनीय   है । 

 

अमन चैन से आतंकवाद को जवाब देना है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

18 सितम्बर, 2006: जम्मू: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- अरिहंत परमात्मा श्री सीमंधर स्वामी की करूणा, मैत्री, साधना ध्यान की वर्षा बरस रही है परन्तु हमारे हृदय का पात्र छोटा है । हृदय के पात्र को विशाल करंे । वे हमें प्रतिपल प्रतिक्षण ज्ञान ध्यान प्रदान कर रहे हैं । परमात्मा को ज्ञान की आवश्यकता नहीं होती । क्या तुम आत्मा का अनुभव नहीं करते । मोर नाचते हैं, चिड़ियां चहकती हैं इनमें आत्मतŸव नहीं दिखाई देता । फूलों की डालियों में आत्म-दर्शन नहीं होते । विश्व के कण-कण में आत्माा का वास है । प्रभु का दर्शन चेतना सर्वत्र व्याप्त है । जो मेरे भीतर आत्मा है वही आत्मा मनुष्य, देव, तीर्यंच, नरक में है तो यह भेद-भाव क्यों ऊँच-नीच की बात क्यों ? 

भगवान महावीर को गौतम और गौशालक दोनांे के प्रति समभाव था । सुदर्शन सेठ और अर्जुन माली दोनों उनके लिए समान थे । जैन दृष्टि में हम सामायिक, तप, दान करते हैं परन्तु भीतर अहंकार होता है, इस अहंकार को हम छोड़ दें । गांधीजी के पास सब कुछ था । आराम से जिन्दगी व्यतीत कर सकते थे । माता बहिनों के पास जब तन ढकने के लिए कपड़ा नहीं था तब उन्होंने संकल्प लिया कि मैं भी लंगोटी के सहारे और लाठी के सहारे जीवन व्यतीत करूंगा । महात्मा गांधी ने प्रभु महावीर के दर्शन को अपनाया और वह दर्शन उन्होंने श्रीमद् रायचन्द्र जी से लिया । महात्मा गांधी ने उन्हें अपना गुरू बनाया था । आज के विश्व को गांधी की जरूरत है । विश्व शान्ति में जैन धर्म का बड़ा योगदान है । प्रभु महावीर ने मैत्री दी, आत्मीयभाव दी । भीतर मैत्री स्वतः जागृत होती है । गुलाब का फूल खिलता है तो कांटे साथ में आते हैं । जहां गुलाब खिलता है वहां का वातावरण सुगंधित होता है । गुलाब का कण-कण काम आता है । एक प्रश्न आता है कि शिव को शंकर क्यों कहा जाता है ? नीलकण्ठ क्यों कहा जाता है ? कहते हैं एक बार समुद्र मंथन हुआ तो वहां पर जहर निकला उसे पीने के लिए कोई तैयार नहीं हुआ तो उस जहर को शिव ने पीया तो उनका कण्ठ नीला पड़ गया इसलिए उन्हें नीलकण्ठ कहा जाता है । महात्मा गांधी ने इसी तरह देश की आजादी का जहर पीया था । एक गांधी ने ही नहीं हजारों ने इस देश के लिए अपनी कुर्बानी दी । आज जम्मू काश्मीर पर आतंकवाद छाया हुआ है पर हमें बन्दूक के बदले बन्दूक नहीं देनी । अमन चैन से आतंकवाद का जवाब देना है गांधी के जीवन में राजनीति नहीं थी । हमने मिलकर चुनौतियों का सामना करना है । हमें भी यह चाहिए कि हम मिलकर मैत्री की भावना भावित करें । 24 घण्टे में दो घण्टे परमात्म भजन में व्यतीत करें । प्रभु महावीर ने कहा मनुष्य जाति एक है । सारा विश्व एक है उसमें कोई भेद नहीं । हम मानव की एकता को आगे बढ़ावें । 

संत करनैलसिंह ने जो सर्व धर्म सम्मेलन की बात कही उसके लिए हम प्रयासशील   हैं । भारत के सभी प्रान्तों से आए लोग एवं जम्मू श्रीसंघ को हार्दिक बधाई है । बड़ा सुन्दर और संयोजित कार्यक्रम कल का हुआ । कहते हैं राजा मंत्री एक तो सारी जनता नेक । सबका आदर मान करते हुए सभी बधाई के पात्र हैं । जन्म और मृत्यु के बारे में किसी कवि ने कहा है:-

    कफन जो बड़ा तो आंख क्यों दबदबा गई,

श्रृंगार क्यों सहम गया, बहार क्यों लजा गई ।

न जन्म कुछ न मृत्यु कुछ,बस इतनी सी बात है-

किसी की आंख ख्ुाल गई, किसी को नींद आ गई ।’

जन्म और मौत में केवल इतना सा अन्तर है जन्म में आंखे खुलती हैं और मौन में आंखे बन्द होती हैं । जन्म शरीर का हुआ है और इस शरीर द्वारा हमें भगवान महावीर की अरिहंत परमात्माा की साधना करनी है । हमारी यात्रा कोहम से सोहम तक की है । कुछ लोग सत्य की राह पर चलते हैं । साहस से काम करते हैं तो उनका एक दिन अभिनन्दन होता है । आज श्री वर्माजी ने गांधीवादी नेता निर्मलाजी देशपाण्डे की ओर से जनम दिवस की बधाई दी और कहा कि हम आपका स्वागत सभी धर्मों की ओर से करना चाहते हैं क्योंकि शान्ती के लिए कार्य कर रहे हैं वे सभी आपका सान्निध्य पाना चाहते हैं । आचार्यश्रीजी का व्यक्तित्व सर्वप्रिय है ।

 

आत्म-तत्व को जान लो परमात्मा मिल जाएगा

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

19 सितम्बर, 2006: जम्मू: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- अरिहंत परमात्मा की कृपा सर्वत्र है । जब अरिहंत देव जन्म लेते हैं नरक के प्राणी भी कुछ क्षणों के लिए सुख का अनुभव करते हैं । जब वे वर्षीदान देते हैं तो भव्य प्राणी भौतिक सुख का अनुभव करते हैं । दीक्षा लेने पर उन्हें अनंत उपसर्ग आते हैं परन्तु वे केवलज्ञान तक मौन रहकर साधना करते  हैं । भगवान ऋषभदेव को एक वर्ष तक अन्न पानी नहीं मिला । उन्हें अपने कर्म खपाने थे हम अनंत जन्मों में भटकते आए हैं । सई की नोक जितनी जगह भी नहीं छोड़ी जहां हमने जन्म ना लिया हो । अरिहंत स्वयं तिर गए और औरों को तार रहे हैं । अरिहंत देव हैं, परमात्मा हैं, परम् पिता हैं, सर्वेसर्वा हैं । देवाधिदेव हैं । हमें जाना है सिद्धगति तो लक्ष्य को पाना होगा । पंच परमेष्ठी में निश्चय नय से तुम ही हो । आत्म-तत्व को जान लो परमात्मा मिल जाएगा । आचारांग सूत्र में आता है कि जो लोकवादी है वह क्रियावादी, कर्मवादी है । व्यवहार दृष्टि से नाम अपनी जगह है । हम नाम को लेकर अहंकार ना करें । जब तक अहंकार करेंगे तब तक कर्म-ब्ंाधन होगा। संसार के चक्र को छोड़ने के लिए पुण्य पाप को छोड़ना होगा । जब-2 हमें जैन दर्शन मिलता है तब-तब वहां पर द्रव्य और भाव की चर्चा होती है । द्रव्य है व्यवहार दृष्टि और भाव है निश्चय दृष्टि । द्रव्य से खेती उपजाऊ होगी तो भाव से बीच बोयेंगे । बाड़ लगा दी जाएगी । एक दिन वृक्ष लहलहाएगा और फल फूल आएंगे पर भूमी ही पथरीली होगी तो फल आना असंभव है । हम हृदय की भूमि को उपजाऊ करें । प्रभु के चरणों में शरीर के अहंकार को सभी कषायों को दान, शील, तप, भावना को सभी संसार कार्य और संसार कार्यों को समर्पित करें । सभी धर्म गुरूओं ने यही कहा है कि परमात्म चरणों में जीवन समर्पित कर दो । जीवन को दो ढंग से जीया जाता है । एक व्यवहार दृष्टि से और एकनिश्चय दृष्टि से । जैसे डाॅक्टर अस्पताल में होता है तो डाॅक्टर का काम करता है । सभी मरीजों की देखभाल करता है और घर में आने पर वही डाॅक्टर किसी का पति है, किसी का पिता है तो किसी का मालिक है । 

भक्तामर श्लोक की चर्चा चल रही है । दसवें श्लोक की कहानी है । सुभ्रदा नगरी में श्री दŸा नाम का वेश्य रहता था । वह धनाभाव में दुःखी था । जैन मुनि गौचरी हेतु आए । उसने गौचरी बहरायी और तारने की विनती की । उस श्रीदत्त ने कहा मैं गरीब हूूं । धन का अभाव है । मुनि कृपालु थे उन्होंने भक्तामर का दसवा काव्य उसे सिखा दिया और श्रद्धा भक्ति से पठन करने हेतु कहा । श्रीदŸा एक बार अपने साथियों के साथ व्यापार हेतु प्रदेश में गया और रास्ता भूल गया तब मुनि के उस श्लोक को याद करते ही उसे रास्ता मिल गया और उस श्लोक के प्रभाव से उसे एक उपाश्रय दिखाई दिया । वह वहां पहुंचा तो देखा वहां एक जोगी बैठा है । जोगी ने श्रीदत्त से बातचीत की तो श्रीदत्त ने अपनी जीवन कहानी उसके समख रख दी । जोगी बोला थोड़ी दूरी पर रस कूप है । उस रस को तांबे पर डाल दिया जाए तो वह सोना बन जाता है । तू चल हम उस कूप में से रस निकाल लेंगे और दोनों आधा-आधा बांट लेंगे । दोनों धनी बन जाएंगे । जोगी ने रसकूप का रास्ता दिखाया दोनों वहां पहुंचे । जोगी ने श्रीदत्त को चैकी पर बिठाकर रसकूप में डाल दिया और कहा कि तूं नीचे से बाल्टी भरकर ऊपर भेज मैं उसे उपर रखता हूं । जोगी के मन में लालसा जागी और उसने दो बाल्टियां उपर आने पर श्रीदत्त को नीचे ही छोड़ दिया । उस समय विपŸा के मारे श्रीदत्त ने भक्तामर के दसवें काव्य का सविधि जाप किया । शासनदेवी प्रकट हुई । शासनदेवी ने उसे रसकूप से बाहर निकालकर अपार संपदा प्रदान की और कहा की तुम्हें मंत्र का और श्लोक का सविधि जाप कर मुझे जनता जनार्दन के सामने प्रगट करना होगा । साथ ही उस जैन साधु को मत भूलना जिसने तुम्हें यह काव्य सिखाया है । यह कहकर देवी अन्र्तध्यान हो गयी । 

भक्तामर स्तोत्र का ऐसा प्रभाव है आचार्य मानतुंग ने सांसारिक वस्तुओं की प्राप्ति के लिए भक्तामर स्तोत्र की रचना नहीं की । उन्होंने तो भक्ति की थी परमात्मा की और उससे सभी कार्य सिद्ध होते चले गए । हम भी निष्काम भाव से कार्य करते हुए मुक्ति की ओर अग्रसर हों ।

 

भक्ति से भगवान मिलता है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

20 सितम्बर, 2006: जम्मू: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- आचार्य मानतुंग प्रभु की निर्मलता को देख भाव विभोर हो रहे हैं  । वे कहते हें कि हे प्रभो आपको देखने के बाद अन्य किसी को देखने की इच्छा नहीं होती । पूर्णमासी के चन्द्रमा से सिक्त जल को पीने के बाद लवण के खारे जल को पीने की कौन इच्छा करेगा । प्रभु आप इतने सुन्दर हैं कि आपको देखने के बाद कहीं दृष्टि ही नहीं जाती । आपने भगवान का चित्र देखा, उस चित्र में भगवान के साक्षात् दर्शन होते हैं । अरिहंत के ऊपर किसी की सुन्दरता नहीं है । सनत कुमार चक्रवर्ती को अपनी सुन्दरता पर गर्व था परन्तु वे बाहर से ही सुन्दर थे जिसे तुम प्रेम करते हो वह सर्वत्र सुन्दर होता है । परमात्मा के चित्र को देखो फिर सुन्दरता का आभास होता है । स्थानकवासी सम्प्रदाय में चित्र का प्रचलन नहीं है । पहले आप स्थानकवासी शब्द का अर्थ समझो जो अपने निज स्थान में वास कर रहा है वह स्थानकवासी है । चित्र का बड़ा गहरा अर्थ होता है । अपलक दृष्टि से देखने पर आभास होता है कि परमात्मा भीतर वास कर रहा है । बगीचे के फूल को देखकर सहज ही मुंह से निकलता है ‘सुभानअल्लाह’ क्या सुन्दरता है । क्या प्रकृति की रचना है । यदि तुम्हें कोई गुरू कहे की चित्र देखना हमारी परम्परा नहीं है तो यह बात ठीक है परन्तु उसके साथ भावों का महत्व है । हम एक प्रतिमा को पत्थर की भांति देखते है या परमात्मा की भांति देखते हैं यह हमारे भाव हैं । गुरू वह है जो अरिहंत की याद दिलाएं । मुक्ति-पथ पर कदम बढ़ाएं । गुरू में अरिहंत के दर्शन हो सकते हैं । एक ही रिश्ता परमात्मा के साथ बनाओ । कितना अन्तर है सम्राट् और अकिंचन से मिलने का । चित्र को निहारना और निहारते-2 ध्यान में डूब जाना । अनंत कर्मों की निर्जरा होती है । भक्ति संगीत की लाईनों से भीतर उतरना यह भी ध्यान की प्रक्रिया है । आचार्य मानतुंग ने कभी आदि प्रभु ऋषभदेव को नहीं देखा था परन्तु उनकी अटूट श्रद्धा थी उन पर । जिसने क्षीर-सागर का जल पी लिया वह लवण समुद्र के जल को देखने की इच्छा भी नहीं करेगा । इस श्लोक में भगवान को क्षीर-सागर की उपमा दी गई है । 

इस श्लोक में प्रेम की सफल अभिव्यक्ति की गई है । आप किसी को निहारते हो अपलक दृष्टि से तो वह एक प्रेम का अंग है । प्रेम को व्यक्त नहीं किया जा सकता । कहा भी है- 

भीखा बात आगम की, कहनन सुनन की नाहीं । 

जो जाने सो कहे नहीं, कहे सो जाने नाहीं । ।

भीखा एक बहुत बड़े संत हुए हैं उन्होंने सार की बात कही है कि अनुभव की बात बतायी नहीं जा   सकती । गूंगा गुड़ की अभिव्यक्ति नहीं कर सकता । जब कोई व्यक्ति प्रेम करता है तो एक समय उसे रोना भी आता है और एक समय उसकी आंखें भी भर आती हैं और इसी स्थिति में एक समय आता है कि वह शुन्य की स्थिति में चला जाता है । अगर ऐसा प्रेम परमात्मा से हो तो हमारा जीवन सफल हो     जाए । इस श्लोक में भेद से अभेद की बात बतायी है । आचार्य मानतुंग ने भक्ति के द्वारा भेद-विज्ञान को सिद्ध किया है । तुम भक्ति करके देखो फिर अनुभव आएगा । आज हम किसी के घर जाते हैं तो क्या देखते हैं । उसके घर की साज-सज्जा कैसी है ? उसका बैडरूम कितना डेकोरेटेड है । इंटिरियर डेकोरेशन कितना अच्छा है । हम कभी उसके भाव नहीं देखते । कुटिया में रहने वाला एक गरीब उसके भी भाव बहुत प्रबल होते हैं, जैसे भीलनी के राम के प्रति थे । कल एक मंत्री जी मिलने के लिए आए तो उन्होंने कहा कि पूजा भगवान के मन्दिर में अनेक लोग करते हैं वो पूजा भी ठीक है परन्तु सच्ची पूजा तो मानव सेवा है । झोपड़ी के गरीब की सेवा सर्वश्रेष्ठ है । तुम्हारे पास छुट्टी का दिन है तो तुम भी गरीबों की सेवा करना । उनकी जरूरतों को पूरा करना । उनके भीतर शुद्ध भाव देखना । चन्दनबाला के भाव कितने उंचे थे । भगवान को ऊँचे भावों के कारण चन्दनबाला के समक्ष आना पड़ा । पवित्र भाव भीतर हो तो मोक्ष दूर नहीं । खाना खाने से पूर्व नवकार मंत्र की आराधना करते हुए भावना भावित करना अवश्य फलित होगी । आज दान को नहीं धन को महŸव दिया जाता है । धन की पवित्रता का पालन नहीं किया जाता । हम धन पवित्र ढंग से कमाएं । आज के संत भी धनवान को ही महत्व देते हैं । जिसने परमात्मा को नहीं देखा जिन्दा रहकर परमात्मा का ध्यान नहीं किया और सिर्फ धन का ध्यान किया तो जीवन बेकार है । आज का मानव सफल जीवन जीने की अभिलाषा करता है परन्तु धर्म की आराधना नहीं करता । पूर्व जन्म के पुण्य के कारण धर्म मिला । अब हम दृष्टि बदलें । गुरू दर्शन करें । गुरू के रूप में भगवान को देखें । जिसने परमात्मा के दर्शन नहीं किए उसने कुछ नहीं पाया । जिसने परमात्मा के दर्शन किए उसने कुछ पाया और जिसने परमात्मा को आंखों में बसा लिया उसने सब कुछ पा लिया । प्रेम एक भाव दशा है । भाव आपके भीतर हो तो भक्ति की तरंगें स्वतः ही भीतर उठती हैं । भक्ति से भगवान मिलता है । आसक्ति से संसार बढ़ता है । भगवान उतना ही नजदीक है जितना तुम देखना चाहते हो । तुम अपना नजरिया बदलो भगवान तुम्हें दिखाई देगा ।

 

भक्ति में विरक्ति होगी तो मुक्ति नजदीक होगी

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

21 सितम्बर, 2006: जम्मू: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- आचार्य मानतुं्रग प्रभु आदिनाथ की सुन्दरता का वर्णन कर रहे हैं । वे कहते है। प्रभो आप निर्मल और प्रांजल हो । सुन्दरता भीतर से होती है बाहर से नहीं । अष्टावक्र आठ अंगों से टेढे मेढे थे परन्तु उनके भीतर ज्ञार भरा हुआ था । ज्ञान भीतर की सुन्दरता है । अरिहंत परमात्मा की वीतरागता भीतर आती है जब हम उनका चित्र देखते हैं । जिसे तुम अधिक प्रेम करते हो वह कैसा ही क्यों न हो तुम्हें सुन्दर ही दिखाई देता है । चित्र को देखकर भगवान की सुन्दरता को भीतर उतारना निष्कलंक है । आत्मा का सुख और शरीर का सुख अलग-2 है । जब परमात्मा की भक्ति हम करते हैं तो आधि व्याधि उपाधि सुख समृद्धि में बदल जाती है । 

आचार्यश्रीजी ने कहा- आत्मशुद्धि हेतु तप करो । आयम्बिल कष्ट निवारण के लिए सर्वोत्तम तप  है । रसनेन्द्रिय पर विजय पाने के लिए नीवीं तप करो जिसमें छाछ के साथ रोटी का सेवन किया जाता  है । चित्र को देखकर वीतराग-भाव आता है । मन्दिर का वातावरण भी भावनाओं के अनुकूल होता है । मन्दिर ध्यान के प्रतीक है । हम भगवान की छोटी सी आरती उतार देते हैं । फूल नारियल चढ़ा देते हैं और मांगों की लम्बी लिस्ट उनके समक्ष रख देते हैं । तुम्हारी किस्मत में होगा तो सब मिल जाएगा इसलिए कभी परमात्मा के समक्ष मांग मत रखना । शादी, बेटे हर जन्म में मिले । धर्म में जीवन व्यतीत करो । इस जीवन को छोटी कामना में मत लगाओ । संसार क्यों मांगते हो । अरिहंत परमात्मा के दर्शन हो सकते हैं फिर छोटी मांग क्यों ? 

प्रेम प्रदर्शन नहीं आत्म-दर्शन है । भक्ति में आसक्ति होगी तो संसार वृद्धि होगी । भक्ति में विरक्ति होगी तो मुक्ति नजदीक होगी । आंख के आंसू परमात्मा के लिए बहाओ तो मोक्ष दूर नहीं । हर आत्मा में परमात्मा निवास करता है । कृष्ण के लिए राधा और मीरा समान थी । राधा कृष्ण की पत्नी थी और मीरा कृष्ण की भक्तन थी । राधा कृष्ण से अत्यधिक प्रेम करती थी । मीरा ने कृष्ण को देखा नहीं पर मीरा का प्रेम भावगत प्रेम था । राधा कृष्ण को प्रेमी मानती है तो मीरा कृष्ण को भगवान मानती है । कृष्ण मौजूद ना हो और मीरा बनो तो तुम्हारा प्रेम ऊँचा है । गुरू की मौजूदगी में ध्यान करो तो कोई बड़ी बात नहीं । गुरू की बिना मौजूदगी में ध्यान करो तो बहुत बड़ी बात है । 

मीरा ने सिर्फ कृष्ण का चित्र देखा था और वह उस पर मोहित हो गयी । मीरा छोटी सी बच्ची थी जब उसने एक साधु के पास कृष्ण का चित्र देखा और उस चित्र की मांगी की साधु ने चित्र नहीं दिया तो रात को साधु के स्वप्न में कृष्ण ने आकर कहा कि यह चित्र तुम्हारे लिए नहीं उस बालिका के लिए है तुम उसे दे दो । कृष्ण का चित्र पाकर मीरा इतनी भावित हुई कि वह हर समय कृष्ण का चित्र अपने पास रखने लगी । यह भी उसकी भक्ति भावना हम भी अपने भावों में रहे और परमात्म प्राप्ति की ओर अग्रसर रहे । 

आज श्रद्धेय आचार्य भगवंत के दर्शनार्थ सांबा क्षेत्र के एम0एल0ए0 एवं पूर्व मंत्री श्री यशपालजी कुण्डल उपस्थित हुए उन्होंने आचार्य भगवंत के जम्मू शहर में आने पर उनका स्वागत किया और उन्होंने कहा कि आज का दिन बहुत महत्वपूर्ण है आचार्यश्रीजी शान्ति का पैगाम लेकर जम्मू कश्मीर में आए हैं । आज इन्सान दुःखी गुरूजी की वाणी से अंधहीन लोगों को रोशनी मिलेगी । समाज में शान्ति का प्रसार हो रहा है और भी होगा । इन्सान चाहे कुछ बन जाए पर इन्सानियत नही तो वह इन्सान नहीं कहला   सकता । गुरू का जीवन में बहुत बड़ा महत्व है ऐसे गुरूजी आचार्य श्री शिवमुनि जी महाराज हम सब पर दया दृष्टि बनाएं रखें । उनका आशीर्वाद हमें मिलता रहे । वे इस जम्मू कश्मीर में शान्ति का प्रसार करते रहें यही मेरी हार्दिक भावना है । 

 

परमात्मा को देखने के लिए भक्ति की आंख चाहिए

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

22 सितम्बर, 2006: जम्मू: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि-  आचार्य मानतुंग प्रभु की भौतिक और आध्यात्मिक सुन्दरता का वर्णन 11 वें श्लोक के माध्यम से कर रहे हैं । हम परमात्मा को कहीं दूर खोज रहे हैं परन्तु वह हमारे भीतर ही है । भीतर की सुन्दरता में वह छिपा हुआ है । आत्म-दर्शन ही भीतर की सुन्दरता है । आत्म दर्शन यानि हर जीव में शुद्धात्मा देखना । जल, थल, गगन दशों दिशाओं में शुद्धात्मा है । जो सबसे ज्यादा प्रिय होता है उसकी सुन्दरता देखी नहीं जाती । कथानकों में कहानी आती है लैला और मजनू   की । कहते हैं लैला बहुत सुन्दर नहीं थी । उसका रंग भी इतना उजला नहीं था परन्तु दोनों आपस में बहुत प्यार करते थे । दोनों का प्रगाढ़ प्रेम था । जब व्यक्ति प्रेम में होता है तो उसे दुनियां दिखती नहीं, वह पागल हो जाता है । मीरा राज घराने की नारी थी पर कृष्ण प्रेम में पागल हो गयी । मजनू इसी तरह लैला को सड़कों पर पुकारता जा रहा है । राजा के पास लोगों ने शिकायत की । मजनू को राज दरबार में लाया गया । राजा ने उसके समक्ष दस सुन्दर स्त्रियां खड़ी की और कहा कि इनमें से जो चाहिए वो ले ले । मजनू ने उन सबको देखा परन्तु उनमें उसे लैला नजर नहीं आयी । कहने का तात्पर्य यह है कि मजनू ही लैला की सुन्दरता को पहचान सकता है । भीतर की सुन्दरता के लिए भक्ति चाहिए और परमात्मा को देखने के लिए भक्त्ति की आंख चाहिए । 

चंदना विव्हल थी । प्रभु को देखकर हंसी भी, मूच्र्छित भी हो गयी और वापस रोयी तो भगवान का अभिग्रह पूरा हुआ । चंदना ने कोई शिकायत नहीं की भी वह राजकुमारी थी परन्तु भीतर असंतोष का भाव नहीं था । आत्मानुभूति हो जाए फिर एक ही अच्छा लगता है और वह है आत्मा में रमण । रमण महर्षि को अनंत कष्ट आए पर वे भेद-विज्ञानी थे । ध्यान करते थे । कैंसर जैसा असाध्य रोग होने पर भी वे घबराये नहीं । जब व्यक्ति साधना करता है तो दुःख आते हैं और दुःखों को समभाव से सहन करो तो कर्म-निर्जरा होती है । रमण महर्षि ने जान लिया था कि मैं कौन हूं । संसार में रहते हुए अधिक महत्व आत्मा को दो । वनस्पतिकाय में अनंत जीव है और सभी काया में इतने नहीं जितने वनस्पति काय में है । वृक्ष के पास जाकर मंगल मैत्री करो तो सारा वृक्ष खुशी प्रकट करते हुए लहलहाता है और उसके पास कुल्हाड़ी लेकर जाओ तो वह कांप जाता है । धर्म, प्रार्थना, साधु-साध्वी की सेवा की अनुमोदना करो तो कर्म-निर्जरा है और संसार के कार्यों की अनुमोदना करो तो कर्म-ब्ंाधन । हम आपस में प्रेम की बात करे । तुम्हारे एक वचन ने दो दिल तोड़ दिए तो बहुत बड़ा कार्य हो गया । हम अपने जीवन को मर्यादित बनाएं । शरीर को नहीं आत्मा को महत्व दें । शरीर नाशवान है और आत्मा अमर है । 

इस ग्याहवें श्लोक से घटित एक सिद्ध घटना का वर्णन इस प्रकार है । रत्नावती नगरी में राजकुमार तुरंग रहता था । उसके पास आमोद-प्रमोद के बहुत सारे साधन थे । उसने अपने राज्य में सुन्दर वाटिका बनवायी । उसमें तरह-2 वृक्ष लगवाये जिसमें सुगंधित पुष्प अपनी गंध बिखेर रहे थे । मनोरंजन के साधन सभी अपनाते हैं पर साधना को कोई-2 ही अपनाता है । व्यक्ति में सौ गुण हो और एक अवगुण हो तो अवगुण को पहले देखा जाता है । वह वाटिका बहुत सुन्दर थी परन्तु उसकी बावड़ी का जल खारा था । राजकुमार ने अनेक प्रयत्न किए परन्तु उसके सभी प्रयत्न असफल रहे । अनेक मंत्र-तंत्र किए पर वह जल मीठा नहीं हुआ । कहते हैं जल जीवन है । जल जीवन का अमृत है । जंगल में प्यास लगी हो । कण्ठ सूख रहा हो तो एक घूंट पानी की कीमत कई गुणा हो जाती है । राजकुमार के सभी प्रयास विफल हुए तो वहां पर जैन श्रमण का आगमन हुआ । राजकुमार ने वंदन कर कुशलक्षेम पूछा । आहार लाभ हेतु प्रार्थना की और अपनी व्यथा उनके समक्ष रखते हुए कहा कि इस जीवन में सारे सुख है परन्तु मेरी बावड़ी का जल खारा है । जिस वाटिका की सारी नगरी में चर्चा है उसी वाटिका में यह बावड़ी है । श्रमण ने सारी बात सुनने पर कहा कि पांच स्वर्ण कलशों में उसी बावड़ी का जल भरो और उन पांच स्वर्ण कलशों पर भक्तामर स्तोत्र के ग्यारहवें श्लोक से मंत्रित करो । उन्हीं पांच कलशों के जल से मुनियों को प्रासुक आहार प्रदान करेा । तुम्हारी मनोकामना पूर्ण  होगी । राजकुमार ने श्रमण ने जो कुछ कहा था उस प्रकार किया । जब मुनियों को भोजन करवाया गया उसके अनन्तर वहां पर वनदेवी प्रकट हुई और वरदान मांगने के लिए कहा । राजकुमार ने कहा कि मेरी बावड़ी का जल मीठा हो जाए । देवी ने तथास्तु कहा और जल मीठा हो गया । भक्ति, प्रार्थना और श्रद्धा से सभी कार्य सम्पन्न होते हैं यह सब धर्म का बल है । असंभव भी संभव हो सकता है अगर हम धर्म पर श्रद्धा रखें । 

 

विश्व के सभी सुन्दर परमाणु परमात्मा के भीतर व्याप्त है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

23 सितम्बर, 2006: जम्मू: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- आचार्य मानतुंग भगवान ऋषभदेव की शुद्धता का वर्णन कर रहे हैं । तीनों लोकों में भगवान जितना शुद्ध, पवित्र, सुन्दर और कोई नहीं । आचार्य मानतुंग कहते हैं कि तीनों लोकों में आप ही शान्त सुन्दर परमाणुओं से सुशोभित हो । इस श्लोक में कुछ बातें महत्वपूर्ण हैं जैसे तीन लोकों के नाथ, राजा चक्रवर्ती स्वामी आदि भी नाथ होते हैं परन्तु वे सीमित क्षेत्र के नाथ होते हैं । आप तीनों लोकों के नाथ हो । आपने तीनों लोकों को ज्ञान से प्रकाशित किया है । तीन लोकों में आप अद्धितीय हो । आचार्य मानतुंग कहते हैं जितने परमाणु इस धरा पर सुन्दर और शान्त थे आपके शरीर ने उन सभी परमाणुओं को आकृष्ट कर लिया । संसारी प्राणी क्यों सुन्दर नहीं ? इसीलिए कि सारे शान्त और सुन्दर परमाणु भगवान के शरीर की ओर आकर्षित हो गए । यह आचार्य मानतुंग की प्रगाढ़ श्रद्धा है । संदेह वही होता है जहां श्रद्धा नहीं   होती । आचार्य मानतुंग ने भगवान को शान्त चिŸा बताया । भीतर जिज्ञासा, मुमुक्षु उत्पन्न हो तो कोई बात नहीं, उसका समाधान हो सकता है पर संदेह का समाधान कभी नहीं हो  सकता । मानव जीवन का सार यही है कि मैं कौन हूँ ? कहाँ से आया हूँ और कहां जाना  है । जब आप निरन्तर स्वयं से पूछोगे तो आपको इन प्रश्नों का उत्तर स्वतः ही मिलता चला जाएगा । भगवान ने इन प्रश्नों का समाधन स्वयं के भीतर ही पाया । वे भीतर से अत्यन्त गंभीर थे । भीतरी सौन्दर्य से परिपूर्ण थे । अन्तःकरण में रत्ती भर भी किसी के प्रति कषाय भाव न था । संसारी लोग थोड़े से सुन्दर रूप को धारण कर अकड़ने लग जाते हैं । भगवान के पास अपार संपदा है । बाहरी सुन्दरता है तो भीतरी सुन्दरता भी है फिर भी अकड़न नहीं है, हृदय में अहंकार नहीं है । वे परम शान्त, परम् निर्मल, परम् वीतराग शुद्ध और पवित्रता को धारण किए हुए हैं, यही उनका आन्तरिक सौन्दर्य है । अरिहंत सब कुछ जानते हैं पर वे अभिमान नहीं करते । वे जानते हैं कि मैं मुक्ति को प्राप्त करूंगा फिर भी उस ओर उनका प्रयास गतिशील है । कल मैंने बताया था कि परमात्मा को अनिमेष दृष्टि से निहारो । परमात्मा की आंखों से आंखें मिलाओगे तो हमारी आंखे पवित्र हो जाएंगी और उन जैसी पवित्रता, शुद्धता हमारे भीतर आएगी । प्राणी मात्र के लिए मंगल कामना करना । धन, पद, यश यहीं रह जाएगा । की गई मंगल भावनाएं ही साथ जाएंगी । 

परम् सौन्दर्य का रहस्य क्या है ? सोने जैसी काया । 500 धनुष देह प्रमाण । हमारी देह दो धनुष जितनी ही है फिर भी कितना अहंकार । वे क्यों सुन्दर बने इसका एक मूल कारण है उन्होंने पूर्व भवों में अहिंसा, संयम, तप की आराधना की और प्राणी मात्र के लिए अन्तर हृदय से मंगल कामनाएं की । हम कहते हैं कि इस भव में मुक्ति नहीं । अरिहंत भगवान ने अनेक भवों में जब धर्म की आराधना की तो एक भव में उन्हें मुक्ति हुई । हम भी आराधना करेंगे तो मुक्ति के नजदीक पहुंचते चले जाएंगे । बलदेव, कामदेव, चक्रवर्ती में अपार सौन्दर्य है पर तीर्थंकर से अधिक नहीं । पूर्व जन्म में की गई तपस्या और शुद्धता का भाव ही उस सौन्दर्य को लेकर आया है । तुम भी भीतर से शुद्धता का भाव रखना । किसी को साता पहुँचाना । तीर्थंकर भगवान ने दीक्षा से पूर्व दान दिया । तुम भी दान की भावना भाना । आज सांसारिक प्राणी थोड़ा सा धन देकर अकड़ता है । 

भगवान श्रीकृष्ण को देखो । तीन खण्ड के अधिपति थे । कहां सुदामा और कहां श्रीकृष्ण । कृष्ण ने सुदामा के पांव धोए । कृष्ण को इसीलिए याद किया जाता है क्योंकि उनमें ऐसे विशेष गुण थे । यह मानव देह का घोड़ा निकला था परमात्मा की यात्रा के लिए बांधना था इसे बोधिवृक्ष के नीचे परन्तु बांध दिया आसक्ति के कूट शाल्मली वृक्ष के नीचे । कूट शाल्मली वृक्ष नरक में पाया जाता है जहां पर परमाधर्मी देवों के द्वारा अनंत वेदना दी जाती है ।  

इस श्लोक में शरीर के भेद-ज्ञान की बात बतायी है । आत्मा और शरीर को अलग-2 देखोगे तो आसक्ति टूटती चली जाएगी । आज का विज्ञान भी यह मानता है कि शरीर पुद्गल परमाणुओं से बना है और इसके अन्दर कुछ ऐसा तत्व है जिसका आभास होता है परन्तु परीक्षण नहीं हो सकता, वह है हमारा आत्म-तत्व । आत्मा का जन्म नहीं मरण नहीं । पुद्गल का स्वभाव मिटने का है । पर्याय बदलती है जैसे सोने से अंगुठी बना ली । उसी से कड़ा बना लिया । उसी से झुमके बना लिए । पर्याय बदलती चली गई परन्तु मूल-तत्व सोना वही है । आत्मा शुद्ध है हम उसे देख नहीं पाते । आपकी आंखे भी पुद्गल के स्कंध को ही देखती है परमाणु को नहीं देख सकती । उदाहरण के लिए स्कंध है मोतीचूर का लड्डू, देश है आधा लड्डू, प्रदेश है उसका एक कण और परमाणु उससे भी सूक्ष्म है जिसे हम देख नहीं सकते और जिसका छेदन-भेदन नहीं हो सकता । आज का विज्ञान यह मानता है हर परमाणु में प्रोटोन, न्यूटोन और न्यूक्लस है । 

आज का विज्ञान प्रोटोन, न्यूटोन का परीक्षण कर पाया है परन्तु न्यूक्लस का परीक्षण नहीं कर पाया । पर्वत से भी श्ािक्तशाली है परमाण्ुा । परमाणु को केवलज्ञानी ही देख सकते हैं । एटम् बम्ब परमाणु बम्ब एक स्थान पर गिर जाए तो लाखों लोग काल के गर्त में समा जाते हैं । एक परमाणु में इतनी शक्ति है तो आत्मा में कितनी शक्ति होगी । इस श्लोक में पुद्गल का विस्तार से वर्णन किया है । पुद्गल के छः भेद बताएं हैं । पहला स्थूल- स्थूल- पत्थर का जोड़,  स्थूल- पानी में तेल की रेखा, स्थूल- सूक्ष्म- आपकी छाया देख सकते हैं पर पकड़ सकते नहीं । बादल की छाया देखी जा सकती हैं परन्तु उसे पकड़ा नहीं जा सकता । सूक्ष्म- स्थूल शब्द, सुनाई देते हैं पर दिखाई नहीं देते । सूक्ष्म- आत्मा का संबंध- जो न दिखाई देता है न सुनाई देता है । सूक्ष्म- सूक्ष्म परमाणु जो कभी दिखाई नहीं देते उससे भी सूक्ष्म है हमारी आत्मा उसको देख नहीं सकते, पकड़ नहीं सकते केवल उसको अनुभव कर सकते हैं । हमें अपनी आत्मा तक पहुंचना है । पाँच इन्द्रियों का अपना-अपना काम है । आंख कभी सुनती नहीं । कान कभी देखते नहीं इसी तरह हम भी किसी के कार्य में दखलंदाजी ना करते हुए अपना कार्य करें । परनिन्दा को त्यागकर आत्म-निन्दा करें । समत्व-भाव में जीएं । किसी के प्रति राग द्वेष भाव को छोड़ दें तो हम मुक्ति के नजदीक पहुंच जाएंगे । 

 

कर्म मुक्ति का सरल उपाय भेद-विज्ञान

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

24 सितम्बर, 2006: जम्मू: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- आचार्य मानतुंग भगवान के अनंत गुणों का वर्णन भक्तामर स्तोत्र के माध्यम से कर रहे हैं । बारहवें श्लोक में भेद-विज्ञान का वर्णन करते हुए वे कहते हैं शरीर और आत्मा भिन्न-2 है । आज की मेडीकल भी यह सिद्ध करती है कि आत्मा ऐसी वस्तु है जिसे देखा नहीं जा सकता । शरीर पुद्गल परमाणुओं से बना हुआ है और आत्मा उसके भीतर है । आत्मा को कर्म-बंधन से कैसे दूर रखें । इस पर प्रकाश डालते हुए आचार्य मानतुंग ने कहा है कि चिकने और रूखे भाव से कर्म-बंधन होता है जैसे मिट्टी और पानी का मिलन हुआ तो वे दोनों एकमेक हो गए । स्वादिष्टभाव से भोजन ग्रहण करें तो भी कर्म-ब्ंाधन होते हैं । जैसा व्यक्ति विचार करेगा वैसी ही लेश्या होगी और वैसे ही कर्म-बंधन होंगे । यह जीवन कितना बीत गया । अनंतकाल से जीवयोनि में हम भटक रहे हैं अपने जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा कमाने, खाने में बीत गया । रोज-रोज एक ही काम किया, कमाया और खाया । अब कुछ धर्म   करो । 

भेद-विज्ञान करो । प्रत्येक शरीर के भीतर वही आत्मा है कर्म-मुक्ति का उपाय भेद-विज्ञान है । हमारी यात्रा कोहम से सोऽम तक की यात्रा है । हम ऐसे कर्म ना करें जिससे हमें नीचे गति में जाना पड़े । मानव शरीर के भीतर पांच शरीर है । औदारिक शरीर यानि हाड मांस का शरीर । वैक्रिय शरीर यह एक ऐसी लब्धि है जो देवताओं और नारकियों को होती है इसके द्वारा चाहे जैसा शरीर हम बना सकते हैं । आहारिक शरीर जो चैदह पूर्वधारी मुनियों को होता है । इस शरीर के द्वारा वे अरिहंत भगवान से जो चाहे वो समाधान प्राप्त कर सकते हैं । तेजस शरीर यानि ऊष्णता शरीर के भीतर जो तेज बना रहता है वह इसी शरीर के कारण है । कार्मण शरीर जो कर्म वर्गणाओं को एकत्रित करता है । तेजस और कार्मन शरीर औदारिक शरीर के भीतर रहते हैं । तेजस और कार्मन रा मेटेरियल है । औदारिक शरीर उसकी उत्पत्ति है जैसे गेंहू रा मेटेरियल है और चपाती उसकी उत्पत्ति है । हमारे शरीर में जो रोम-रोम है वह हवा के लिए है जिससे हमारे शरीर की शुद्धि होती है । हमारे शरीर में जो 9 द्वार है उनसे हमेशा मल बहता है । संसारी प्राणियों के शरीर में जो भी दुर्गंध, मल है वो इन्हीं 9 द्वारों के द्वारा बाहर निकलती है । तीर्थंकरों के शरीर में ऐसी बात नहीं होती । उनका शरीर बड़ा सुगंधीमय होता है । हमारे जैसा शरीर ही उन्हें प्राप्त हुआ । इस शरीर के द्वारा उन्होंने मुक्ति को पा लिया । हम भी इस जीवन में रहते हुए प्रभु भक्ति करें । प्रभु भक्ति नहीं की तो जीवन बेकार है । 

प्रतिपल प्रतिक्षण हम कर्म बंधन ओर कर्म-निर्जरा कर सकते हैं । चलते-2 किसी के बारे में कुछ कह दिया, परनिन्दा की, किसी को अच्छा-बुरा जाना तो कर्म-बंधन हो गया और वो ही पल साधना में बिताए तो कर्म-निर्जरा हो गयी । अरिहंत प्रभु की वाणी सत्य है । संसार अनादिकाल से ऐसा ही चलता आ रहा है और चलता रहेगा । अनंत तीर्थंकर हो गए, उनके समय भी संसार ऐसा ही था, बदलना है तो स्वयं को बदलो । कहा भी है- 

चमन उजड़ जाएगा, गर तमाम कांटे अलग करोगे ।

गुलिस्ता की खेर चाहो, तो चंद कांटे कबूल कर लो । 

आज सम्मान मिला है कल अपमान भी हो सकता है दोनों के लिए तैयार रहो । प्रातःकाल का समय और गौधूली बेला का समय अपने लिख रखो । एक-एक श्वांस के साथ अपने अवगुण देखो । श्वांस टूटने पर आत्मा के साथ जुड़ा तेजस और कार्मन शरीर आत्मा के साथ ही अगला शरीर धारण करेगा इसीलिए कर्म ऐसे करो कि हमारी निर्जरा हो । प्रभु गुणों का चिन्तन करो । अपने बच्चों को धर्म के संस्कार दो । प्रार्थना, ध्यान, सामायिक करो । 

 

भगवान को उपमाओं से उपमित नहीं किया जा सकता

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

25 सितम्बर, 2006: जम्मू: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- आचार्य मानतुंग भगवान ऋषभदेव के चरणों में अपनी भक्ति को उपमाओं से उपमित करते हैं । वे कहते हैं कि देव, मानव और नाग कुमारों के नेत्रों को हरण करने वाला आपका मुखमण्डल बड़ा ही सुन्दर है । तीन लोकों की कोई भी चीज से उसकी उपमा नहीं दी जा सकती क्योंकि आप बहुत महान हैं । आपके मुख मण्डल की उपमा चन्द्रमा से नहीं की जा सकती क्यांेकि चन्द्रमा में मृग का चिन्ह है जो उसके भीतर काला प्रतीत होता है और दिन में चन्द्रमा ढाक के पत्ते के समान हो जाता है । आपका मुख सदैव प्रकाशमान  है । उपमाएं पदार्थों को मनुष्य को दी जा सकती है पर परमात्मा को नहीं । परमात्मा को हम अपनी उपमाओं में सीमित ना करें वह अव्यय अनुपम अविनाशी हैं । परमात्मा आकाश के समान विशाल है, सूरज से अधिक प्रकाशमान है परन्तु सूरज में गर्मी है और वह शीतलता को लिए हुए हैं । सूरज एक दिशा को ही प्रकाशित करता है भगवान तीनों लोकों को प्रकाशित करते हैं । सूरज को राहू केतु ग्रस लेते हैं भगवान के ज्ञान प्रकाश पर किसी की छाया नहीं पड़ती है । सूरज उदय और अस्त होता है परमात्मा का जन्म भी नहीं और मरण भी नहीं । आकाश की उपमा भी अरिहंतों को कम पड़ती है क्योंकि आकाश में बादल आच्छादित होते हैं और आकाश ढ़क जाता है । भगवान को उपमा देना यानि सूरज को दीया दिखाना है । चन्द्रमा की उपमा में चांदनी का प्रकाश कम ज्यादा हो सकता है परन्तु भगवान के ज्ञान का प्रकाश एक जैसा है । फूल मूर्झा जाते हैं पर परमात्मा कभी ऐसा नहीं होता । आज फूल खिला कल मुरझा जाएगा । परमात्मा हमेशा खिले रहते हैं वे अपूर्व हैं आनंद अनूपम अनाम है फिर उसे पमरात्मा कह लो, तीथर््ांकर कल हो सब एक ही है । 

परमात्मा में अपूर्व शक्ति है । उनकी शक्ति को बांधते हुए भक्तामर स्तोत्र में बताया है कि बारह मानव की शक्ति एक बैल में होती है, दस बैलों की शक्ति एक घोड़े में होती है पांच सौ घोड़ों की शक्ति एक हाथी में होती है दस हाथियों की शक्ति एक शेर में होती है पांच सौ शेरों की शक्ति एक बलदेव में होती है, 200 बलदेवों की शक्ति एक वासुदेव में होती है । दस लाख वासुदेवों की शक्ति एक चक्रवर्ती में होती है एक करोड़ देवों की शक्ति एक इन्द्र में होती है और तीनों लोकों के सभी इन्द्रों से अनंत शक्ति एक तीर्थंकर में है । इतनी शक्ति होने पर भी वे शान्तचित्त हैं । कभी किसी पर रोष नहीं करते । संसार की सारी उपमाएं, शक्तियां केवल श्मशान तक है और उनकी अन्तिम परिणति राख है । तीर्थकर की शक्ति हमें मोक्ष पंचमगति की ओर ले जाएगी । धर्मशक्ति हमेशा बलवान होती है । सारी शक्तियां यही रह जाएगी इसलिए शुद्धात्मा से संबंध बनाते हुए भेद-विज्ञान को अपनाओ । परमात्मा को कोई उपमा दे नहीं सकत,े सारी उपमाएं फीकी पड़ जाती हैं फिर भी कवि को काव्य की रचनाओं के लिए उपमा की आवश्यकता होती है । कहा भी है:-

उपमा बिना काव्य रचता नही, जड़ के बिना फूल खिलता नहीं ।

संगीत बिना महफिल सजती नहीं, ढ़ोलक बिना घुघरू बजते नहीं ।

नींद के बिना रात कटती नहीं और ध्यान के बिना मुक्ति संभव नहीं ।

ध्यान ऐसा साधन है जिसमें स्व-स्वरूप का अनुभव होता है । शरीर का सहारा लेते हुए इसमें बेठे आत्म-तत्व को परमात्मा से मिलाना है । देह मन्दिर है और हमारा अन्तःस्थल तपोवन है । आज का मानव सारी शक्ति धन कमाने में लगा देता है । हम धर्म को कमाएं । शरीर की पवित्रता के लिए तप, संयम अहिंसा का आचरण करें । जीवन निर्वाह के लिए हम कितनी हिंसा करते हैं उस हिंसा को अहिंसा, संयम, तप में बदले फिर शरीर के भीतर की अद्भुत सौन्दयर्ता निखरेगी । प्रतिपल जागरूक रहें और शाश्वत तत्व को जानें । तितलियां बड़ी सुन्दर लगती है पर उन्हें छूने पर रंग उतर जाता है । फूल भी मुरझा जाते हैं । रेाज-2 एक सा ही भोजन करो तेा मन उब जाता है फिर हमें कुछ नया चाहिए उस नये में चिन्तन, मनन, मौन करो । प्रभु के प्रति श्रद्धा की भावना रखो और उनकी सुन्दरता को देखो । सुन्दरता को निहारते हुए हमारी आस्था जिनधर्म में बनें । इस श्लोक में राजा कर्ण जो जैन धर्म का नास्तिक था श्लोक का प्रभाव देखते ही जैन धर्म पर उसकी अटूट आस्था बन गयी । हम भी आस्था के साथ जीवन जीएं तो हमारा मंगल होगा । 

 

जीवन में वीतराग भावदशा महत्वपूर्ण है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

26 सितम्बर, 2006: जम्मू: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- मानव के जीवन में तीन चीजें मुख्य हैं । अरिहंतदेव, गुरू और धर्म । खून के कतरे-2 में अरिहंत के प्रति श्रद्धा का भाव हो । हम मंगलपाठ तो सुनते हैं पर अरिहंत, सिद्ध, साधु और धर्म की शरण उसी समय स्वीकार करते हैं । हर समय शरण में जीएं तो जीवन बहुत सुलभ होगा । हर पल अरिहंत की याद आती रहे । अरिहंत प्रभु ने जो धर्म दिया उस धर्म में हम अपना हर क्षण व्यतीत करें । गुरू कोई भी हो सकता है परन्तु उसका लक्षण यह हो कि वह मुक्ति की ओर हमें अग्रसर करे । जो कहं कि मैं तुम्हारा गुरू हूँ तुम मेरा शिष्यत्व स्वीकार करो तो वह गुरू नहीं हो सकता । गुरू वह है जो अरिहंत के मार्ग पर चल रहा है और सभी अनुयायियों को उस मार्ग पर बढ़नें की प्रेरणा दे रहा है । इस विश्व में अनेक धर्म गुरू अपनी-2 मान्यताओं के हिसाब से धर्म पर बढ़ रहे हैं । अरिहंत प्रभु का तो केवल वीतराग-धर्म है । वीतराग-धर्म यानि वीतरागभावदशा में जीना । वीतराग धर्म कहता है सत्य बोलो और झूठ छोड़ो कितनी सिम्पल बात है परन्तु आचरण में लाना बहुत कठिन है । युधिष्ठिर को उनके गुरू ने ‘सत्यं वद धर्मम् चर’ की शिक्षा दी तो युधिष्ठिर को वह याद ही नहीं हो पायी वो इन दो शब्दों में इतने डूब गए थे । वे कहते थे जब तक ये शब्द मेरी धड़कन में नहीं बहेंगे तब तक मैं अगली पढ़ाई आरंभ नहीं करूंगा । सत्य बोलना कठिन है और सत्य में जीना उससे भी कठिन है । हम सत्य का आचरण करें । 

अरिहंतों ने वीतराग भाव दशा में जीने की बात कही । क्या है वीतराग-भाव दशा ? वीतराग यानि ना किसी से राग ना किसी से द्वेष । भावदशा यानि उन भावों में स्वयं को तल्लीन कर देना । भगवान की वाणी है इस संसार में कुछ भी गलत नहीं है और कुछ भी सही नहीं है फिर भी हम दिन भर में कितने लोगों को सही गलत देखते हैं । हमे यह छोटा सा जीवन मिला । कितनी उम्र इसमें से चली गई । अब हम अपनी भाव दशा सुधारें । धर्म के लिए थोड़ा सा समय निकालें । बिना रूचि के धर्म भीतर नहीं आ सकता । भगवान महावीर के समय आनंद श्रावक, कामदेव श्रावक के पास अपार सम्पत्ति थी फिर भी वे धर्म के अनुयायी थे । इतनी सम्पत्ति होते हुए भी वे धर्म को प्रमुखता देते थे । आनंद श्रावक जब भगवान महावीर से श्रावक व्रत ग्रहण करके आते हैं तो अपनी पत्नी शिवानन्दा को भी भगवान के पास दर्शन हेतु भेजते हैं । पति पत्नि का नाता केवल संसार का नहीं है । वे दोनों एक दूसरे को धर्म में सहयोग देते हैं । सबसे बड़ा नाता तो धर्म का नाता है इसीलिए हम धर्मपत्नी कहकर पुकारते हैं । धर्म से आप तभी जुड़ पाओगे तब शुद्ध सामायिक को भीतर उतारोगे । हम थोड़े से सांसारिक कार्य के लिए धर्म को छोड़ देते   हैं । जब-2 भी कठिनाई आती है तब हम भगवान को देखें । उनके जीवन में कितनी कठिनाईयों आयी फिर भी उन्होंने धर्म नहीं छोड़ा । जब भी मन में उलझन हो तब बंद आंखों के साथ भीतर घटित हो रही हर घटना को प्रभु चरणों में समर्पित कर दो । कहते हैं एक भावपूर्ण वंदन भी अनंत जन्मों का क्षय कर सकता है । हम यहीं से महाविदेह क्षेत्र में विराजित अरिहंत परमात्मा श्री सीमंधर स्वामी भगवान को भावपूर्ण वंदन करें । 

भगवान ने कहा - किसी की निन्दा नहीं करना । किसी के प्रति रागभाव नहीं लाना फिर गुरू के प्रति भी राग नहीं करना । तुम्हारा अनंत पुण्य है तुम्हें मानव का भव मिला । वीतराग धर्म मिला । इस धर्म में सबके प्रति मैत्री की भावना भावित करना । मन के पीछे मत लगना । मन क्षण-2 में बदलता है । एक-एक श्वांस को हम वीतरागता में बहाएं और इस संसार-रूपी कीचड़ से किनारा करें हमारा यही लक्ष्य हो । हम किसी से टकराएं ना । धारणा को जिन्दगी भर साथ ना उठाएं । सांसारिक धारणाओं से वीतरागता की धारणा की ओर आगे बढ़ें । वीतराग-भाव ही हमें मुक्ति तक ले जाएगा । हम जीवन के कल्याण के मार्ग पर चलें तभी हमारा जीवन सफल होगा । 

 

पूर्णमासी के चन्द्रमा से भी अधिक प्रकाशित हैं अरिहंत भगवान

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

27 सितम्बर, 2006: जम्मू: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- यह मानव का जीवन छोटा सा जीवन है । इस जीवन में हम अनेकों इच्छाएं, कामनाएं लेकर जी रहे हैं और हमारी भावना होती है कि हमारी हर इच्छा पूर्ण हो परन्तु ऐसा कभी नहीं हो सकता । सूरज उदय होता है और अस्त होता है । कभी हमेशा सूर्य उदित नहीं रहता । ना कभी हमेशा अस्त रहता है । हमारे जीवन के पिछले हिस्सों में हम देखें ऐसा कौनसा क्षण हमारे जीवन में आया जब हम बहुत प्रसन्न हुए और जब हम बहुत दुःखी हुए ? प्रसन्नता का क्षण पानी का बुदबुदा बनकर आया था और दुःख का क्षण कांटो के समान आया था । दोनो ंचले गए फिर भी जीवन चल रहा है जैसे आपको आपका नाम याद करने की आवश्यकता नहीं होती वैसे ही आपको शुद्धात्मा याद आए सिद्धालय की याद आए जितना गहराई से हम शुद्धात्म-भाव में रहेंगे हम उतनी ही गहराई तक पहुंच  पाएंगे । 

भक्तामर स्तोत्र की चर्चा चल रही है जिसमें हम आज 14 वें श्लोक की चर्चा करेंगे । आचार्य मानतुंग ने प्रभु आदिनाथ के प्रति अपनी गहरी निष्ठा दिखाई है । श्लोक की चार पंक्तियों में आचार्य मानतुंग ने दो पकित्यों में उपमा और दो पंक्तियों में भावना प्रकट की है । पहली दो पंक्तियों में आचार्य मानतुंग ने पूर्णमासी के चन्द्रमा से भगवान की तुलना की है । पूर्णमासी का चन्द्रमा अपनी पूर्ण कलाओं के साथ प्रकाशित होता है ऐसे ही है भगवंत आप तीनों लोकों में पूरी तरह प्रकाशित हो रहे हो । दूज का चन्द्रमा सबसे छोटा होता है पर अधिक मूल्यवान होता है । आचार्य मानतुंग ने भगवान को त्रिजगदीश्वर की उपमा दी यानि भगवान तीन जगत के ईश्वर है । उनमें अवगुण है ही नहीं । हर दृष्टि से वे सुन्दर हैं । उनका ज्ञान तीनों लोकों में व्याप्त है । तीनों लोकों के सारे गुण आपके शरीर का उल्लंघन कर रहे हैं । पूर्ण चन्द्रमा तो एक ही दिन प्रकाशित होता है । प्रभु प्रतिदिन प्रकाशित हो रहे हैं । हर दृष्टि से वे श्रेष्ठ, सर्वोपरि, सर्व-गुण सम्पन्न हैं । 

आचार्य मानतुंग ने प्रभु आदिनाथ को सम्बोधित कर कहा कि हे प्रभो जिसने आपका आश्रय ग्रहण कर लिया वह तीन लोकों में स्वेच्छानुसार भ्रमण कर सकता है, उसे कोई रोक नहीं सकता । जहां भक्त और भगवान मिल जाए वह स्थान मन्दिर बन जाता है । भक्त जहां भक्ति करता है वह स्थान भी मन्दिर बन जाता है । कहा भी है -

जाम पर जाम पीने से क्या लाभ ? शाम को पी सुबह को उतर जाएगी ।

प्रभु के नाम की दो बूंदे पी ले अगर, उम्र सारी नशे में गुजर जाएगी । 

धर्म रस को पीओ सारी उम्र शान्ति और आनंद में जी सकते हैं । भगवान ने कहा- समय मात्र का प्रमाद ना करो । किसी से राग ना करो । गौतम ने राग किया तो केवलज्ञान उत्पन्न नहीं हुआ । जीवन की घड़ियां बीतती जा रही है । श्वांस-श्वांस में सिमरन करो । अरिहंत की भक्ति में डूब जाओ । अब हमें अमावय की काली रात्री को छोड़कर पूर्णमासी के प्रकाश में आना है । हिन्दू संस्कृति में भी अंधकार से प्रकाश की ओर गमन बतलाया है । मृत्यु से अमृत की ओर आने के लिए कहा है । अंधकार पाप का रक्षक है और प्रकाश पुण्य का रक्षक है जितने भी गलत काम होते हैं वे सब रात्रि में ही होते हैं । रात्रि में ही चोर चोरी करता है, डाकू डाका डालता है ।

प्रातःकाल में हर स्थान पर प्रभु का नाम लिया जाता है । प्रार्थना की जाती है । हम रात्रि में भी धर्माराधना कर सकते हैं । हमारे श्रावक रात्रि में पौषध, संवर किया करते थे । भक्ति, चिन्तन, मनन किया करते थे । रात्रि का वातावरण ध्यान के लिए सर्वोत्तम है । अधिक से अधिक समय साधना मंे बिताओ । बच्चा मां की गोद में जिस तरह नीडर होता है उसी तरह भक्त भगवान की गोद में नीडर बन जाता है, उसके सारे भय दूर हो जाते हैं । संसार आपको मोह की ओर ले जाएगा और गुरू आपको वीतरागता की ओर ले जाएंगे । हर श्वांस में वीतरागता का पोषण करना । केवलज्ञान परम् प्रकाश का प्रतीक है । अंधेरे में रस्सी भी सांप प्रतीत होती है । केवलज्ञान के प्रकाश के पीछे अनंत सूर्यों का प्रकाश फीका है इसीलिए अरिहंत भगवान के भा-मण्डल को देखो जिससे आपका ज्ञानावरर्ण कर्म दूर होगा । सम्यक् दर्शन में आ जाओ । सम्यक् दृष्टि जीव भीतर की ओर देखता है और मिथ्यादृष्टि जीव बाहर की ओर देखता है । हम बाहरी वैभव का दिखावा छोड़कर भीतर का दर्शन करें । सम्यक् दृष्टि जीव नरक में भी सुखी है क्योंकि वे भेद-विज्ञान की साधना करते हैं । सम्यक् दर्शन को भीतर अपनाओ । श्रद्धा जगा ली तुमने इतना ही आधार बहुत है । गुरू मिलन कराया तुमने इतना उपकार ही बहुत है । गुरू मिलन हो जाए, भीतर श्रद्धा जाग जाए तो सारे कार्य संभव है । 

 

सुमेरू जैसे निश्चल है अरिहंत भगवान

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

28 सितम्बर, 2006: जम्मू: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- जब-2 अरिहंत का नाम आपके मुख पर आए तब आपका अंग-2 झुक जाए । रोया-रोया उस नाम में भीग जाए । आचार्य मानतुंग की तरह भक्ति करो । आचार्य मानतुंग ने सारी उपमाएं भगवान के चरणों में समर्पित की है । जब तुम भगवान के चरणों में वंदन करते हो तो संसार का आकर्षण टूटता चला जाता है और तुम शुद्ध होते चले जाते हो । भक्तामर स्तोत्र के 15 वें श्लोक में आचार्य मानतुंग ने देवाधिदेव आदिनाथ भगवान को गिरिराज सुमेरू की उपमा दी है । कितनी भयंकर वायु चल रही हो गिरिराज को चलायमान नहीं कर सकता । इस श्लोक से हमें स्व के अध्ययन की प्रेरणा मिलती है । इसमें आश्चर्य ही क्या है ? देवंगनाएं नृत्य कर रही हो और भगवान अपने ध्यान से विचलित नहीं होते । प्रलयकाल के झंझावातों से बड़े-2 पर्वत चलायमान हो जाते हैं परन्तु वहीं झंझावात सुमेरू के शिखर को भी नहीं हिला सकता । उसी तरह हे प्रभो ! आपके समक्ष इन्द्र की सभी देवांगनाएं सभी तरह से आपको ध्यान से मुक्त करना चाहे फिर भी आप रत्ती भर भी चलायमान नहीं   होते । बड़े से बड़े उपसर्ग में भगवान ध्यान में लीन होने पर कभी आंखें नहीं खोलते । मैनका ने ऋषि को वश में कर लिया था परन्तु इन्द्र की सभी देवांगनाएं मिलकर भी सभी तरह से कटाक्ष करें, हाव-भाव प्रेषित करें, हर प्रकार के नाटक करें फिर भी चित्त को विचलित नहीं कर सकती । गिरिराज यानि राजाओं का राजा सुमेरू पर्वत ।

हर उपसर्ग सहन जो करते, कहकर कर्म विचित्रता ।

तन, मन देते परन्तु न तजते, अपनी ध्यान पवित्रता ।।

अरिहंत भगवान भेद-ज्ञानी होते हैं । शरीर और आत्मा का भेद करते रहते हैं । वे कभी अपने आसन को किंचित मात्र भी हिलाते नहीं । जब आप ध्यान करने बैठो, जा आपने आसन चुन लिया हो उससे कभी हिलना मत । सभी तीर्थंकरों ने राज पाठ छोड़ा । मौन, ध्यान, कायोत्सर्ग को अपनाया । सभी तरह से उपसर्ग आए फिर भी उन्होने ध्यान नहीं छोड़ा । शेर की तरह संयम का पालन किया । शेर हमेशा अकेला चलता है । उसकी एक दहाड़ से सारे प्राणी उसके पीछे हो जाते हैं । हम भी ध्यान को अपनाएं । तीर्थंकरों के मार्ग पर चले । कृष्ण ने भी अर्जुन को प्रेरित किया था कि हे पार्थ उठो, जागो । प्रातःकाल में निद्रा को तोड़ो । धर्म-ध्यान से जीवन को निर्मल करो । सारे कार्य छोड़ देना पर सामायिक नहीं छोड़ना । एक ही बात आपको बार-बार बतायी जा रही है उस बात को आप अपने भीतर उतारो । बड़े से बड़ा लांछन आ जाए पर ध्यान नहीं छोड़ना । ध्यान छूटेगा तो संसार बढ़ेगा । सामायिक में हमने सभी संबंधों को छोड़ना है । सारे सावध्य कार्यों का त्याग करना है । 

एक प्रश्न आता है संसार में रहते हुए वासना को जीतना कठिन क्यों है ? संज्ञाएं चार प्रकार की हैं आहार संज्ञा, भय संज्ञा, मैथुन संज्ञा, परिग्रह संज्ञा । आपने देखा होगा तीर्यंच प्राणी सुबह से शाम तक आहार के लिए भटकते रहते हैं, उन्हें जितना भी खाने को मिले बस खाते ही रहते हैं यह उनकी आहार संज्ञा है । नारकीयांे को हमेशा भय रहता है कि परमाधर्मी देव हमें कष्ट ना दे, वे हमेशा डरे रहते हैं यह उनकी भय संज्ञा है । देवता हमेशा परिग्रह एकत्रित करने में लगे रहते हैं । अपार सम्पदा होने पर भी एक दूसरे देव की अप्सराओं को छीनना, उनके धन को छीनना उनका कार्य होता है, यह उनकी परिग्रह संज्ञा है उसी प्रकार मानव की मैथुन संज्ञा है । वह हर समय वासना से तंग रहता है यह मानव का प्राकृतिक स्वभाव है । सौन्दर्य का आकर्षण ही ऐसा है कि उससे बचा नहीं जा सकता परन्तु इस संज्ञा से बचने के लिए भगवान की भक्ति, प्रार्थना करो । अपने जीवन में तामसिक भोजन का त्याग करो । दर्पण की तरह रहो । दर्पण हर चेहरे को देखता है पर किसी से राग भाव नहीं करता । दर्पण केवल देखता है । भगवान के ज्ञान में सारा लोक झलकता है फिर भी वे किसी से राग या द्वेष नहीं करते । हम अपनी दृष्टि को सम्यक् बनाएं । आत्म रमण करें । आत्म भाव में जीएं तो हमारा जीवन सफल होगा । 

 

हमारी शक्ति धर्म में लगे

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

29 सितम्बर, 2006: जम्मू: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- एक प्रश्न आता है संथारा और आत्म हत्या एक है या अलग । जैन धर्म की दृष्टि से दोनों ही अलग-2 है । संथारा व्यक्ति इच्छा से ग्रहण करता है वह अपनी इच्छा से शरीर का त्याग करता है हमारे यहां जैन आगमों में संल्लेखना का उल्लेख मिलता है जिसमें संथारे की बारह वर्ष की तैयारी का वर्णन है । आत्म हत्या व्यक्ति क्रोध, अहंकार, वासना के कारण करता है संथारे में व्यक्ति जो अपने पास है उसे भी सबमें बांटता है । वह स्वयं से व्यापार, परिवार, धन, दौल्त सब अलग कर देता है । उपासकदशांग सूत्र में आनंद श्रावक ने पौषध शाला में धर्म ध्यान किया और शरीर का मोह छोड़ संथारा अंगीकार किया इसका वर्णन आता है । संथारे में इस लोक की इच्छा, परलोक की इच्छा, जीने की इच्छा, मरने की इच्छा और काम भोग की इच्छा नहीं की जाती । हत्या में व्यक्ति स्वयं ही मौत के गर्त में गिर जाता है । पंखे को लटक जाते हैं । गोली, जहर खा लेते हैं । संथारा यह पवित्र धर्म घटना है । श्रावक के तीन मनोरथ में अन्तिम मनोरथ है पण्डित मरण का । रात को सोते समय श्रावक तीन मनोरथों का चिन्तन करता है जिसमें तुम्हारा भाव संथारे का हो । हमारा शरीर तो केवल शमशान तक जाएगा । शरीर का मोह छोड़ दो । शरीर से जितनी धर्माराधना हो उसे स्वीकार करो । आत्म हत्या में अधर्म का ग्रहण होता है और संथारे में धर्म ग्रहण है इसलिए संथारा सर्वथा उचित है । 

भक्तामर स्तोत्र के पन्द्रहवें श्लोक की चर्चा चल रही  है । आचार्यश्री मानतुंग ने भगवान आदिनाथ को गिरिराज सुमेरू की उपमा से उपमित किया है । वैसे तो तीर्थंकर भगवान के आगे सभी उपमाएं निरर्थक है परन्तु कवि ने अपनी भावना अभिव्यक्त करने के लिएउपमा दी है । सभी तीर्थंकरों ने मौन, ध्यान, कायोत्सर्ग को अपनाया । अपना अध्ययन किया यानि स्वाध्याय किया । आत्मा तक जाने के लिए व्यक्ति को बेशर्म होना पड़ता है । जब तुम आत्मा तक पहुंच जाओगे फिर तुम्हें मोह, क्रोध आ ही नहीं सकता । तुमको जो चाहिए वही तुम्हें दिखाई देता है जैसे दर्जी कपड़े को देखता है, जौहरी हीरे को देखता है । बिल्ली चुहे को । धर्मात्मा धर्म को और वीतरागी शुद्ध आत्मा को देखता है । 

आज कहीं पर भी शादी में चले जाओ केवल तीन बातों की चर्चा होती है । धन कितना मिला, भोजन कैसा थ ? और दुल्हन कैसी है ? धन भोग और भोजन । भोजन से शरीर का पोषण होता है । भोग से जाति समाज का, धन से प्रतिष्ठा का पोषण होता है । ये तीनों ही व्यर्थ है जब तक जीवन में धर्म नहीं है आप आदर्श जीवन जीते ही नहीं आदर्श जीवन में भोग धन और भोजन नहीं केवल धर्म होता है । आज सुन्दरता और शक्त्ि का प्रदर्शन है जहां यह प्रदर्शन है वहीं तनाव है । पुरूष की शक्ति धर्म में लग जाए और स्त्री की सुन्दरता भक्ति में लग जाए तो दोनों मुक्ति की ओर अग्रसर हो जाएंगे । आत्मा न पुरूष है न स्त्री है । हर कण में वही आत्मा विद्यमान है जो हमारे भीतर है । आप बच्चे को कितना ज्ञान सिखाओ वह ज्ञान बुद्धि तक ही सीमित रहता है । भूगोल, विज्ञान, कम्प्यूटर सब व्यवाहारिक ज्ञान है । परमात्मा को पाने के लिए आत्मिक ज्ञान की आवश्यकता है और वह ज्ञान दो मार्गों द्वारा मिल सकता है एक है भक्ति मार्ग और दूसरा है ध्यान मार्ग । भक्ति में अहंकार को भूल जाओ आपका हृदय सागर जिसमें परमात्मा का मन्दिर डूबा हुआ है जब तक वासना समाप्त नहीं होगी तब तक वह नहीं मिलेगा । वासना क्रोध मान माया लोभ अहंकार कामना यह सब हमारे भीतर है इन्हें बाहर निकालना है इस हेतु संकल्प करो अवश्य पूरा होगा । चित्त में जब तक संसार के प्रति राग द्वेष है तब तक संसार बढ़ता चला जाएगा । चित्त में परिग्रह का भाव है तो उसे भी तोड़ना होगा । कभी कबीरजी ने कहा है- सांई इतना दीजिए जामे कुटुम्ब समाय । मैं भी भूखा ना रहूं पहुंना भी भूखा न जाए ।।

कबीर जी बड़े सीमित जीवन जीते थे । उन्होंने कहा परमात्मा इतना देना जिससे मेरी दो समय की रोटी मिल सके मूर्छा आसक्ति परिग्रह का मूल है । हम इन्हें दूर करे । 

 

ज्ञान का दीया हमेशा प्रकाशित रहता है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

30 सितम्बर, 2006: जम्मू: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- भक्तामर स्तोत्र के 16 वें श्लोक का वर्णन आज हम करेंगे । सोलहवें श्लोक में आचार्य मानतुंग ने भगवान को एक अलौकिक दीपक की उपमा दी है जिसे कोई बुझा नहीं सकता । भगवान का दीया धूप और बाती से रहित है जो तीनों लोकों में प्रकाशित है वह अद्वितीय दीपक है । लोगस्स के पाठ में तीर्थंकर भगवान को उद्योत करने वाले बतलाया है । उद्योत ज्ञान का है पहले ज्ञान और फिर दया तुम्हारा नाम संसार परिवार कुछ भी नहीं है केवल ज्ञान ही सब कुछ है । जहां श्रद्धा का दीया जलता है वहां घृण नहीं होती । आज के श्रावक श्रद्धा भी करते हैं और निन्दा भी करते हैं । श्रद्धा परम् दुर्लभ है जहां निन्दा है वहां अनंत कर्मों का बंधन है । जहां सम्यक् ज्ञान का दीपक जल गया वहां मोह का धुंआ नहीं होगा । सम्यक् चारित्र में वासना नहीं होगी । भक्ति एक ऐसा शस्त्र है जिससे सारे कार्य पूर्ण होते हैं । चार बातें व्यक्ति के जीवन में आ जाए तो उसे कुछ पढ़ने लिखने या याद करने की आवश्यकता नहीं । पहला है विनय, श्रद्धा, प्रेम और भक्ति । 

व्यक्ति बुरा नहीं है, कर्म बुरे हैं । कपड़ा बुरा नहीं है मैल बुरी है । हम कर्मों को क्षय करें । कपड़े को साफ करें तभी सब कुछ संभव होगा । आचार्य मानतुंग ने भगवान की उपमा जो दीपक से की है उस दीपक में कोई बाती नहीं, कोई तेल नहीं वह भौतिक दीया नहीं है वह तो एक ज्ञान का दीपक है । तीसरी आंख है जो भीतर की आंख है । जिसे हम प्रज्ञा चक्षु कहते हैं । जैसे सुखलाल सिंघवी प्रज्ञा चक्षु थे । बचपन में ही चेचक होने के कारण आंखे चली गई परन्तु उन्होंने बड़े-2 ग्रन्थ लिखे । वे उच्च कोटि के विद्वान थे । आज भी उनके द्वारा टीकाकृत तत्वार्थ सूत्र का चारों सम्प्रदायों में स्वाध्याय होता है । आचार्य मानतुंग प्रभु से कहते हैं हे प्रभु आप अलौकिक दीपक हो । श्लोक का तात्पर्य यह है कि जहां सच्चा ज्ञान है वहां अंधकार नहीं हो सकता । क्रोध, मोह नहीं हो सकता । सच्चा ज्ञान है सम्यक् ज्ञान और सम्यक् ज्ञान है भेद-विज्ञान । श्रद्धा, अरिहंत, साधु और धर्म पर हो यह तो व्यवहार सम्यक्त्व है । निश्चय सम्यक्त्व में प्रतिपल प्रतिक्षण आत्मा और शरीर का भेद बना रहे । जहां ऐसा भेद होगा वहां आचरण बलवान होगा । श्रद्धा एक पवित्र भाव है उसके लिए कुछ नहीं चाहिए । श्रद्धा भीतर से आती है । जीवन चला जाए पर श्रद्धा अटल रहती है । शरीर के लिए हम क्यों गलत राह पर चलते हैं इस श्लोक में श्रद्धा के भाव से आचार्य मानतुंग ने अपने प्रभु को भावित किया है । भाव उमड़ा और भाषा स्वतः बनती चली गई जिसके प्रति प्रेम और श्रद्धा हो वहां कलत उठाओ और लिखते चले जाओ । 

इस श्लोक में दो दीपक की चर्चा आती है । एक है मृणमय दीपक और दूसरा है चिन्मय दीपक । मृणमय मिट्टी का बना हुआ है जिसमें बाती, तेल की आवश्यकता है । चिन्मय दीपक आत्मा का दीपक है जिसमें न बाती चाहिए न तेल । श्रद्धा से ही वह दीपक जगमगाएगा । श्रद्धा से अनंत कर्मों की निर्जरा होती है । व्यक्ति बाहर के बंधन तोड़कर भीतर की ओर अग्रसर होता है । अहंकार का दीया जलता है और बुझ जाता है परन्तु विनय का दीया हमेशा प्रकाशित रहता है । तीर्थंकर भगवान के पास अपार संपदा है फिर भी वे कभी अहंकार नहीं करते वे सबके मंगल की भावना भावित करते जिसके पास चिन्मय दीपक हो वह दान सेवा शील का पालन करेगा । आत्म-दर्शन की बात करेगा । आत्म-दर्शन ही सच्चा दर्शन   है । प्रातः उठते ही हम प्रभु से प्रार्थना करें हे प्रभो मेरे भीतर आज हर श्वांस में सबके लिए मंगल कामना बहें । मेरे भीतर आत्म-दर्शन आए । प्रभु महावीर ने साढ़े बारह वर्ष की साधना में देह के दीपक को एक वर्ष तक तेल दिया । भीक्षा में जो मिला उसे ग्रहण कर लिया । हर साधना की उत्तमता है आत्म-दर्शन और इसकी अनुभूति का उपाय है भेद-विज्ञान । भीतर से शरीर की आसक्ति टूटे और बार-बार भीतर एक ही प्रश्न चले कि मैं कौन हूँ । शरीर की आसक्ति को तोड़ने के लिए भगवान ने अनशन का सबसे बड़ा उपाय बताया । अगर आपको वासना सता रही हो तो भोजन छोड़ दो । 

सारा संसार भोजन पर खड़ा है । हर राज्य का भोजन अलग है वहां का स्वाद अलग है और वह स्वाद केवल जिह्वा तक है । गले से नीचे उतरने पर सारा भोजन एक हो जाता है । आज भोजन पर ध्यान दिया जाता है भजन पर नहीं । भोजन को प्रेमरस और भक्ति रस से बनाओ और भावना भावित करो कि मेरे द्वारा बनाया हुआ भोजन जो भी ग्रहण करे ंवह धर्म-ध्यान करें । रसनेन्द्रिय पर विजय पानी हो तो आयम्बिल करो । आत्मा को भोजन देना है तो पौषध करो जो आत्मा का पोषण करता है मौन ध्यान सामायिक चिन्तन करो । उपवास ही ऐसा साधन है जो हमें अपनी आत्मा से मिलाता है । 

 

समाधि मरण स्वेच्छा से होता है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

1 अक्टूबर, 2006: जम्मू: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- आज हम चर्चा करेंगे समाधि मरण और आत्मघात के बारे में । जैन शास्त्रांें में दो प्रकार कामरण बतलाया है । एक बाल मरण और पंडित मरण । पंडित यानि प्रज्ञा जागृत हो गई । ज्ञानपूर्वक, समाधि-पूर्वक मरण को स्वीकार करना समाधि मरण कहलाता है । समाधि तभी होती है जब बुद्धि बैलेंस में होती है । आपको कुछ चीज अच्छी मिल गई तो आपका चित्त समाधान में आ जाता है यह समाधि है । बाल-मरण यानि अज्ञान मरण । वह क्रोध, मोह, वासना के वश होता है । अपने शरीर को जहर देना, पानी में डूबना, फांसी के तख्ते पर लटकना इसके कुछ प्रकार हैं । विदेश जाते समय जिस प्रकार आप खाने पीने की समाग्र्री, पैसे आदि साथ रखते हैं उसी तरह वीतराग परमात्मा को मिलना है तो समाधि जैसी सामग्री हमारे पास होनी चाहिए । मुक्ति तक जाने के लिए समाधि एक उत्तम साधन है । 

जैन शास्त्रों में 17 प्रकार की मृत्यु बतलायी है जिसमें दो मुख्य है- अज्ञान मरण में बाल मरण में या आत्मघात में पहाड़ से नीचे गिरना, कुएं में गिरना आदि घातक क्रियाएं होती है । जिसको समाधि मरण आता है उसके भव कम हो जाते हैं ।ं जैन धर्म के तीन स्तंभ हैं सम्यक् ज्ञान, सम्यक् दर्शन और सम्यक् आचरण । ये ही मोक्ष के द्वार हैं । भगवान महावीर ने भी कहा है कि अज्ञानी जीव अकाम मृत्यु से मरते हैं और उन्हें पुनः संसार में लौटना पड़ता है । आत्म-हत्या से असंख्यात भव बढ़ते हैं वहीं पर समाधि मरण से अनंतों भव कम हो जाते हैं । समाधि मरण भेद-विज्ञान की साधना है । मैं शरीर नहीं हूँ, मैं केवल एक शुद्धात्मा हूँ इसका अनुभव होता है । अनंतकाल हम इस संसार में भटक रहे हैं । सारे कर्म-क्लेशों से मुक्ति पाने के लिए समाधि ही एक उत्तम उपाय है । बौद्ध ग्रन्थों में भी निर्वाण केा परम सुख बतलाया    है । हिन्दु धर्म में भी आधि व्याधि उपाधि से छुटकारा पाने के लिए भगवद् स्वरूप को प्राप्त करने के लिए पुरूषार्थ का मार्ग बतलाया है । ज्ञानी पुरूषों का मरण सकाम मरण होता है । जो जीव परलोक में आस्था नहीं रखते वे इसी जीवन में भोग का आधार लेकर जीने की इच्छा करते हैं यह गलत है । जैसे शूरवीर राजा पर कोई हमला करें तो उसकी नसों में खून दौड़ने लगता है और जब विजय प्राप्त होती है तो वह दुःख को भी सुख समझता है । जब असाध्य रोग शरीर को घेर ले या व्यक्ति अपने अन्तिम समय को जान ले उस समय शरीर का सर्वथा परित्याग करना ही समाधि-मरण या संथारा है । असाध्य रोगों में कोई भी रोग हो सकता है और संथारे को स्वीकार करने पर फलस्वरूप अनंत अक्षय मोक्ष सुख प्राप्त होता है । 

जैनधर्म में श्रावक का यह तृतीय मनोरथ भी है । संथारा दो प्रकार का है । भीतर से कषायों को दूर करना और बाहर से शरीर का त्याग करना । संथारा केवल जैन धर्म में ही नहीं हिन्दु धर्म में भी इसकी चर्चा है वहां पर ब्रह्मचर्य आश्रम, गृहस्थ आश्रम, वानप्रस्थ आश्रम और सन्यास आश्रम बतलाये हैं । संलेखना संथारा स्वीकार करना तो सरल है परन्तु इसका पालन करना दुर्जेय है । इसके पांच दूषण बतलाएं हैं जिन्हें हम अतिचार कहते हैं । संथारे में इस लोक की कामना नहीं करनी । परलोक की कामना नहीं करनी । जीने की कामना नहीं करनी । मौत की कामना एवं काम भोग की प्राप्ति की कामना नहीं करनी । अनंत सुखों का खजाना है समाधि मरण । आचार्य श्री आत्माराम जी महाराज, आचार्य श्री अमोलक ऋषि जी महाराज ने समाधि मरण पर सुन्दर व्याख्यान जैन आगमों ने की है । सुदर्शन सेठ पर जब अर्जुनमाली का आतंक आया तब उस समय उनसे भी सागारी संथारा ग्रहण किया था । समाधि मरण उसी को प्राप्त होता है जिसको कषाय भाव नहीं होता । समाधि मरण में समता होती है तो आत्म हत्या में ममता होती   है । युद्ध में मरे हुए लोगों को हम आत्मघाती नहीं कहते उन्हंे तो वीर-गति को प्राप्त करना कहते हैं । भगवद् गीता में उल्लेख आता है कि संग्राम में मरने वाले लोग स्वर्ग जाते हैं । समाधिमरण अहिंसा की सिद्धि की लिए स्वीकार किया जाता है । संत विनोबा भावे को 155 घण्टे का संथारा आया उन्होंने वह जैन विधि से स्वीकार किया था । मौत आनी तो निश्चित है परन्तु अपने अन्तिम समय को सुधारना हमारे हाथ है । भगवान महावीर के समय में दस श्रावकों ने भी संथारा लिया था । हिन्दु धर्म में संत ज्ञानदेव के माता पिता ने समाधि ली । निवृतिनाथ, मुक्ताबाई ने भी समाधि ली । इस शरीर का अन्तिम लक्ष्य ही मोक्ष प्राप्त है । हमें सिद्धालय जाना है तो समाधि में आना ही होगा । 

 

सत्य की असत्य पर विजय ही विजयादशमी है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

2 अक्टूबर, 2006: जम्मू: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- आज का यह शुभ दिन विजयादशमी का दिन है । आज के दिन राम ने रावण पर विजय प्राप्त की । धर्म की अधर्म पर जीत हुई । सत्य की असत्य पर विजय हुई । रामलीला आप प्रतिवर्ष देखते हैं । जीवन में सत्य और मर्यादा की आवश्यकता है । राम से रावण अधिक शक्तिशाली था, उसके पास सोने की लंका थी काल को उसने वश में कर रखा था फिर भी उसकी राम के आगे कुछ नहीं चली । निश्चय दृष्टि से देखें तो सीता हमारी आत्मा है । राम परमात्मा है । हमने आत्मतत्व को परमात्मतत्व से मिलाना है । दीपक जमीन पर ही होता है पर उसकी लौ आकाश में फैलती है उसी तरह आत्मा धरा पर रहते हुए सिद्धशीला में मिल जाए । सारे प्रलोभन समाप्त हो जाए । असुर शक्तियों पर नियंत्रण के लिए राम ने वानर सेना की सहायता ली । राम को युद्ध नहीं चाहिए था उन्हें तो सीता चाहिए थी । रावण ने राम को समझा नहीं । वह अहंकार में डूबा रहा और उसका अहंकार ही उसे पतन के गर्त में ले गया । सीता ने भी मर्यादा का उल्ल्ंाघन किया । आज के दिन हम यह शिक्षा ले कि जीवन की बुराईयों को छोड़े । अहंकार, क्रोध, मोह, वासना को दूर करें । अपने जीवन का अनुशीलन करें , आलोचना, प्रतिक्रमण करें । जब-2 दुःख आए तो समझना कि मुक्ति नजदीक हो रही   है । आज के दिन अधिकाधिक धर्माराधना करना । 

आज महात्मा गांधी का भी जन्म-दिवस है और लाल बहादुर शास्त्री का भी जन्म-दिवस है ।उनका जीवन निष्ठा से भरा हुआ था । महात्मागांधी से किसी ने प्रश्न किया आपके जीवन की तमन्ना क्या है ? महात्मा गांधी ने कहा- हर दुःखी के आंसू पौछ सकूं यही मेरी हार्दिक तमन्ना है । किसी के आंसू पौछोगे तो तुम्हारे आंसू स्वयं मिट जाएंगे । गांधी महात्मा तो बाद में बने पहले वे मोहनदास करमचंद गांधी थे । उनका जीवन बड़ा सुन्दर और स्पष्ट था । मानवतावादी दृष्टिकोण उनके जीवन में था । उनका जीवन एक प्रयोगशाला थी । आज उनको विश्व का हर नेता जानता है । हर नोट पर गांधी की फोटो छपती है । उस समय गांधी के पास कया था ? केवल एक लाठी और लंगोटी । हम साबरमती के आश्रम में गये । उनकी विरासत की चीजें देखी । बड़े-2 अंग्रेज भी उनके चरणों में अपनी समस्याएं लेकर आते थे । मृत्यु से पूर्व उनका जन्म-दिवस मनाया जा रहा था और उस दिन अनेकानेक सांस्कृतिक कार्यक्रम रेडियो पर आ रहे थे, मनु बहिन ने कहा बापू जी आज रेडियो सुन ले । आपकी जीवन गाथाएं वहां पर गायी जा रही   है । बापू ने कहा- अपने बारे में क्या सुनना है मुझे तो चरखे का संगीत अच्छा लगता है । वे प्रकृति प्रेमी थे । प्रकृति उन्हें मनभावन कर देती थी । वे सत्य को भगवान मानते थे । राजनीति में उन्होंने धर्म की स्थापना की । उनकी पंक्तियां आज भी कानों में गूंजती है:- ईश्वर अल्लाह तेरो नाम, सबको सन्मति दे भगवान । उन्होंने जीवन में प्रार्थना को अधिक महत्व दिया । आज उनके जीवन से हम कुछ सीखें । प्रार्थना, सामायिक करें । इस मानव ने उस देवता को पाकर भी उस पर पत्थर ही बरसाए । गांधी, ईसा, सुकरात, राम, कृष्ण, बुद्ध जैसे देवी व्यक्तित्व को पाकर भी उन्हें इन्सान न समझा पाया ।  

लाल बहादुर शास्त्री एक ईमानदार प्रधानमंत्री थे । वे हर कार्य ईमानदारी से करते थे । वे कहते थे मैं गरीब देश का गरीब प्रधानमंत्री हूं । उनके भीतर सच्चाई और मेहनत कूट-2 कर भरी हुई थी । भारत की जनता को जब भूखे पेट अकुलाते देखा तो उन्होंने शाम का भोजन छोड़ दिया । हर व्यक्ति को जय जवान, जय किसान का नारा देने वाला वो छोटे कद का व्यक्ति लाल बहादुर शास्त्री ही था । आज मेरे भारत को ऐसे धर्म नेता की आवश्यकता है । उनकी आत्मा जहां कहीं पर भीं हो उनके प्रति हम श्रद्धा पुष्प अर्पित करें और विजया दशमी, गांधी जयंती, शास्त्री जयंती मनानी तभी सार्थक होगी जब तक अपने देश धर्म और परिवार के लिए सुसंस्कारी बनेंगे । उसे सुदृढ़ बनाएंगे और सत्य में जीएंगे । 

 

हमें परमात्म सूर्य को पाना है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

3 सितम्बर, 2006: जम्मू: युग पुरूष जैन धर्म दिवाकर श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि:- आचार्य मानतुंग भ्क्तामर स्तोत्र के 17 वें श्लोक में सूर्य की उपमा देते हुए कहते हैं हे मुनियों के ईश्वर तुम्हें तो सूर्य की उपमा भी फीकी है क्योंकि सूर्य उदय और अस्त होता है तुम कभी अस्त नहीं होते । सूर्य राहु द्वारा ग्रसित होता है तुम्हें कौन ग्रसित कर सकता है । सूर्य पर बादल आ जाने से प्रकाश पूरा प्राप्त नहीं होता परन्तु आपका प्रभाव तीनों लोक में फैला हुआ है । सूर्य रात्रि को प्रकाश नहीं देता तुम तो चैबीस घण्टे प्रकाशित हो । सूर्य सीमित क्षेत्र में प्रकाश करता है तुम्हारे ज्ञान का आलोक सीमित क्षेत्र में ही नहीं पूरे लोक में प्रकाशित होता है । सूर्य तुम्हारे चरणों में आता है और तुम्हारे ज्ञान में तीनों लोक स्पष्ट झलकते हैं इसीलिए हे प्रभु आप सूर्यातिशायी हो । 

इस श्लोक के विशेष अर्थ में तीन सूर्यों की चर्चा की गई है जिसमें सामान्य सूर्य, आत्म सूर्य और परमात्म सूर्य है । सामान्य सूर्य जिसे आप प्रतिदिन देखते हो वह उदय होता है, अस्त होता है । आत्म सूर्य हमारे भीतर छिपा हुआ है और परमात्मसूर्य जो सिद्धशिला में ज्योति स्वरूप है जिसका लक्षण है परम सुख परम आनंद में रहना । जिस प्रकार फूल चैबीस घण्टे सुगंध देता है उसी प्रकार सिद्ध हर समय शान्त सुख और आनंद में रहते हैं । उनके भीतर अनंत गुण हैं । परमात्म सूर्य में अनंत सूर्यो ंका प्रकाश है । हम सब आत्मसूर्य हैं । सूर्य ना हो तो बहुत हानि होती है । धान्य पक नहीं सकता, पेट भर नहीं सकता और चारों तरफ प्रकाश भी नहीं होगा । अंधेर में जीवन अस्तव्यस्त हो जाएगा । आत्मा का सूर्य सामान्यसूर्य से कुछ मिलता जुलता है । सूर्य उदय से पूर्व की लालिमा को देखो तो एक भीतर नई उमंग आती है । सूर्य नमस्कार एक योग आसन है जो प्रतिदिन किया जाता है । सनातन धर्म में प्रातः सूर्य की पूजा और उसे अर्ध चढ़ाया जाता है । तुम प्रतिदिन उगते हुए सूरज को देखो तीन मिनिट देखने पर आंखे बंद कर लो ऐसा प्रतीत होगा जैसे सूर्य आपके भीतर प्रवेश कर रहा है और प्रतिदिन अभ्यास करने से आपका आज्ञाचक्र खुलता जाता है । परमात्मसूर्य सभी बंधनों से रहित है । वह निरन्तर प्रकाशित है । प्रभु सब जानते और देखते हैं उनका चित्त शान्त है तुम्हारी अशान्ति ही बहुत बड़ा कारण है संसार में अशान्ति फैलने का । योगी हिमालच में ध्यान करता है और वहां का सारा वातावरण बदल जाता है इसी तरह संसार में अग्रर कुछ गलत हो रहा है तो उसकी शुरूआत हमी से हो रही है । 

लोगस्स के पाठ में आता है कि परमात्म सूर्य यानि भगवान चन्द्र से अधिक निर्मल सूर्य से अधिक प्रकाशमान और सागर से अधिक गंभीर है । एक-एक शब्द को गहराई से जानो और देखो । सिद्ध वो जो सभी कर्मों से मुक्त हो गए । हम भी सिद्धालय से संबंध बनाएं । मुक्ति की ओर बढ़ें कदमों की भक्ति करें तो हम भी मुक्ति की ओर बढ़   जाएंगे । अधिक ज्ञान की आवश्यकता नहीं है किवल भेद-विज्ञान करते चले जाओ । हमारा लक्ष्य है परमात्म-रूप सूर्य को प्राप्त करना ।हमारे भीतर निरन्तर यही भाव बना रहे । कोई भी कार्य करो भीतर सिद्धगति का भाव हो क्योंकि भाव महत्वपूर्ण है । परमात्मा स्थानक मन्दिर या किसी शिवालय में नहीं है वह तो तुम्हारे भीतर है । संत बाल्मिकी ने राम को भीतर बसाया था । हम भी सिद्ध प्रभु में इतने रम जाएं कि हमारे मन, वचन, काया की एकरूपता हो जाए । हम अपने जीवन को सुन्दर और स्पष्ट  बनायें । इस श्लोक से रत्न शेखर जो दुराचारी था वह कल्याणश्री यानि अपनी पत्नी के सत्संग से उसकी धर्म में हुई आस्था से वह धर्म में दृढ़ हुआ और जिस योगी के कारण वह धर्म से चलायमान हुआ था उस योगी को भी शासनदेवी ने धर्म का प्रकाश दिखाया । हम भी धर्माचरण करें । सामान्य सूर्य को देखते हुए आत्म सूर्य को परमात्म सूर्य से मिलायें । 

 

मोही व्यक्ति निर्मोंही की शरण स्वीकार करे

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

4 अक्टूबर, 2006: जम्मू: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- भक्तामर स्तोत्र में आचार्य मानतुंग ने भगवान आदिनाथ की महिमा का वर्णन किया है । आचार्य मानतुंग ने भक्तामर स्तोत्र के 18 वें श्लोक में मुख कमल की महिमा का वर्णन किया है और भगवान के मुख कमल की चन्द्रमा से तुलना की है । भगवान के समक्ष सारी उपमाएं फीकी है । ऐसी कोई उपमा नहीं जिससे उन्हें उपमित किया जा सके । आचार्य मानतुंग कहते हैं हे भगवन् आपका मुख कमल सदा उदय रहने वाला है । संसार का कमल तो मुरझा जाता है और वह कमल भी कीचड़ में खिलता है आपके मुख पर अलौकिक तेज है । आपका चेहरा दीप्तिमान कान्ति को धारण किए हुए हैं । आपके चेहरे को देखते ही वैराग्यभाव, वीतरागभाव भीतर उमड़ जाता है । आपने मोहनीय कर्म को समूल नष्ट कर दिया इसलिए आपको राहू केतु कभी ग्रसित नहीं कर सकते । 

आपका मुख मण्डल अलौकिक चन्द्रमा सें भी सुन्दर है । सामान्य चन्द्र जो आप प्रतिदिन देखते हो और पूर्णमासी का चन्द्र इसमें भी अन्तर है तो उस अलौकिक चन्द्रमा में बहुत अन्तर है । उस विलक्षण चन्द्रमा से भी कहीं गुना सुन्दर है भगवान का मुख । नभ का चन्द्रमा तो रात्रि में उदित होता है परन्तु आपका मुख सदैव उदित रहता है । आपका मुख कमल समवसरण में दिन रात चमकता है । भगवान के दर्शन से व्यक्ति मोह से विरक्ति की ओर अग्रसर होता है । प्राणी मात्र का मोहनीय कर्म नष्ट हो जाता   है । मोह हमारा आन्तरिक शत्रु है । चन्द्रमा को तो राहू केतु ग्रस लेते हैं भगवान के मुख को कोई ग्रस नहीं सकता । चन्द्रमा को बादल ढ़क देते हैं भगवान के ज्ञान को कोई ढ़क नहीं सकता । पृथ्वी के हर सौन्दर्य से सुन्दर है अरिहंत भगवान । उनमें बाहरी सौन्दर्य और भीतरी सौन्दर्य समाए हुए हैं । उन्होंने मोह का नाश कर दिया । अरिहंत पद को प्राप्त करने वाला जीव चार कर्म क्षय कर लेता है ज्ञानावरणीय, दर्शनावणीय, मोहनीय और अन्तराय । भगवान इन चार कर्मों को क्षय करने के बाद अपनी धर्म-देशना प्रारंभ करते हैं और हर समय धर्म में बीताते हैं । हम कितना समय धर्म में बिताते हैं हमें यह अनमोल जीवन मिला, सबको ध्यान दिया जा रहा है फिर भी कोई उसे ग्रहण नहीं कर रहा है । हम उन सबके लिए मंगल कामना करें कि सबको ध्यान मिलें, सब लोग सुखी हो जाएं सबको भोजन मिले । 

आज का व्यक्ति लक्ष्मी के पीछे भाग रहा है । लक्ष्मी यानि पैसा यह मोहनीय कर्म का एक बहुत बड़ा साधन है । जब मोहनीय कर्म हमें आकर्षित कर लेता है तब हम सब रोते हैं और बीमारियां हमारे शरीर में प्रवेश कर जाती है । इस जगत में एक व्यक्ति ऐसे हैं जो कभी रोते नहीं और वे हैं तीर्थंकर भगवान । सभी जीवों को रोना पड़ता है वे हर समय भेद-विज्ञान में रहते हैं । आत्म-तत्व को विनाशी शरीर से अलग करते हैं । अरिहंतों की वाणी है तुम्हारे समक्ष लाखों लाशें पड़ी हो फिर भी तुम ना रोवों तो समझना तुम भेद-विज्ञान में आ चुके हों । संसार के सभी संबंध अजीव, मिथ्यात्व है और यही हमें मोहनीय कर्म में उलझा रहे हैं । हम अपने जीवन में अच्छे कार्य करें । व्यर्थ के आडम्बरो ंसे दूर रहें । जो भी मोहीं हैं वह निर्मोंही की शरण में जाएं और संकल्प रखें मोह का समूल नाश हेा जाएगा । इसलिए मंगलपाठ सुनते वक्त हम अरिहंतों, सिद्धों, साधुओं और केवली प्ररूपित धर्म की शरण ग्रहण करते हैं । उन्होंने मोह पर विजय प्राप्त कर ली । बिना संकल्प के कुछ नहीं मिलता । तुम भी संकल्प करों । तुम्हारा संकल्प अवश्य पूर्ण होगा । 

 

मुक्ति का पासपोर्ट भेद-विज्ञान

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

5 अक्टूबर, 2006: जम्मू: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- भक्तामर स्तोत्र के 18 वें श्लोक की चर्चा चल रही है । इस स्तोत्र में मोहनीय कर्म को बलवान बताया है । मोहनीय कर्म से ही हमारी कर्म परम्परा की शुरूआत होती है और सबसे प्रथम क्षय होता है तो मोहनीय कर्म सबसे अधिक बलवान है यह कर्म । आपको अधिक किसी से मोह हो तो उस मोह को अरिहंतों की शरण में समर्पित कर दो मोह दूर हो जाएगा । अरिहंत की निर्मल अवस्था को देखते हुए हम भी निर्मल बन सकते हैं । अगर हमें मोह से रहित होना है तो कुछ संकल्प अवश्य करना होगा । इन सबके लिए भेद-विज्ञान एक अचूक औषधि है । अनंत तीर्थंकर भेद-विज्ञान के द्वारा ही सिद्धगति को प्राप्त हो गए । हम अपना नाम खानदान का नाम अपने दादा परदादा का नाम लेकर साथ चलते हैं परन्तु यह काम आने वाला  नहीं । आज नहीं तो कल थोड़े वर्ष बाद जाना ही होगा । 

राजा अब्राहिम अपने दीवान खाने में सो रहे थे । अचानक छत के ऊपर चलने की आवाज आयी । उन्होंने पूछा कौन ? ऊपर से आवाज आई तुम कौन ? राजा ने कहा- मैं राजा हूँ तो उपर से आवाज आयी यह घर किसका है । राजा ने कहा- मेरा है । ऊपर से आवाज आयी यह घर तुम्हारा नहीं है यह तो यह धर्मशाला है । उस राजा को बड़ा आश्चर्य हुआ । उसने पूछा कैसे तो उपर जो व्यक्ति था उसने बताया कि मैं थोड़े वर्ष पहले आया था तब तुम्हारे पिता ने भी यही कहा था और आज वे नहीं रहे उससे पूर्व थोड़े वर्ष पहले भी मैं आया था उस समय तुम्हारे पड़दादा इस महल में रहते थे । उनसे भी मैंने पूछा था उन्होंने भी यही जवाब दिया तुम चले जाओगे तुम्हारा बेटा राजगद्दी पर बैठ जाएगा और राज उसका चलेगा तो क्या यह सब शाश्वत् है । यह संसार भी उस अब्राहिम राजा की भांति आने जाने का खेल है । दादू ने भी कहा है:-

दादू दावा दूर कर, बिन दावे बिन काठ ।

कैसे सौदा कर गये, पंसारी की हाट ।।

दादू कहते हैं कि पंसारी की दुकान पर जो कोई जाओ उसको वैसा माल मिल जाता है । यह संसार भी ऐसा ही है । तुम अपना दावा दूर करो कि मैं कुछ हूँ । तुम्हारे पिता धनवान और धार्मिक थे और तुम धनवान हो और धार्मिक नहीं हो । बार-बार यह बात तुम्हें बतायी जा रही है कि यह संसार एक धर्मशाला है तुम शरीर नहीं तुम एक शुद्धात्मा हो इस बात को समझो । जब एक जीव जन्म लेता है तो अनेक संबंध भी जन्म लेते हैं । जैसा कर्म किया था वैसा ही बंधन होता चला जाता है । संसार से छूटने का एक ही उपाय है और वह है भेद-विज्ञान । मोक्ष तुम्हारा घर है । तुम्हारा संबंध तो कुछ भी नहीं जब नाम और शरीर नहीं रहा तो संबंध तो दूर की बात है यह तो एक रेत की दीवार है या पानी का बुलबुला है कब फिसल जाए कुछ पता नहीं । शरीर का घर शमशान है इसलिए अन्तिम समय पंडित मरण की भावना भावित करना । मुक्ति जाना है तो मानव भव में पासपोर्ट वीजा बनाना ही होगा और उस वीजे को बनाने की शुरूआत आपको ध्यान साधना शिविर से करनी होगी । तुम्हारा किया अपना सब कर्म ही साथ जाएगा इसलिए अधिक से अधिक कर्म-निर्जरा करो । भेद-ज्ञान करो । हर कार्य करते हुए भेद-ज्ञान करे चले जाओगे तो एक दिन निश्चय सम्यक् दर्शन की प्राप्ति होगी और मुक्ति की टिकिट पास हो जाएगी । हमारे जीवन में परमात्म सूर्य उग सकता है अगर मोह निर्मोह हो जाए । राग विराग में बदल जाए । घृणा प्रेम में बदल जाए । संसार का प्रेम भगवत् मिलन की प्यास बन जाए । तृष्णा मोह वासना ने शरीर को डुबोया है । अपने जीवन में मोह को काटो और धर्म की ओर अग्रसर हो जाओ । संकल्प रखों महावीर का मार्ग संकल्प का मार्ग है । की गई सेवा और किया गया संकल्प ही तुम्हारे साथ  जाएगा । 

 

मोह दुःख की खान है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

6 अक्टूबर, 2006: जम्मू: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- भगवान ऋषभदेव की पावन स्तुति भक्तामर स्तोत्र पर विशेष चर्चा चल रही है । आचार्य मानतुंग स्वयं उपमा देकर उस उपमा को भगवान से घटित करने का प्रयास करते हैं परन्तु अंत में ऐसा लगता है कि वह उपमा भगवान पर उपयुक्त नहीं बैठती । अठारहवें श्लोक में मोह दुःख की खान बताया है । मोह लगता है सुख परन्तु इसका फल किंपाक फल के समान   है । किंपाक फल खाने में तो मधुर लगता है परन्तु खाने के बाद पूरे शरीर में विष की व्याप्ति हो जाती   है । भगवान महावीर की भी वाणी है क्षण मात्र का सुख बहुत काल के दुःख में परिवर्तित हो जाता है । सभी तीर्थंकरों की वाणी एक सी है क्योंकि उनका ज्ञान भी एक सा है । कहने का ढंग अलग हो सकता है परन्तु ज्ञान तो एक जैसा ही है । यह अरिहंतवाणी है । अरिहंतवाणी पर हमारा विश्वास हो । 

आपका मोहकर्म जिससे कटे वह वीतरागवाणी है । तुम वीतराग पथ पर अग्रसर हो जाओ वही आपको मोक्ष मार्ग की ओर ले जाएगा । पंचमकाल में भेद-विज्ञान की साधना एक बहुत बड़ा आश्चर्य है आपके और मेरे लिए । वीतराग-मार्ग में संकल्प ही आधारभूत है । भीतर संकल्प होगा कि मुझे मोक्ष चाहिए तो तुम परमात्मा बन सकते हो । अगर तुम परमात्मा बन रहे हो तो तुम्हें भिखारी बनने की क्या आवश्यकता है । हर समय भगवान के दर पर संसार के लिए मंागने की अपेक्षा अपनी आत्मा को उस परमात्मा से मिलाने की कामना करो । कर्म रोग कट जाएंगे फिर अनंतकाल का सुख आपके भीतर व्याप्त होगा । सुकुमारता, आलस छोड़ो । जिनशासन का मार्ग संकल्प का मार्ग है । प्रभु चरणों में प्रार्थना करो कि स्वयं के विकार दूर हो जाएं । अनंतकाल से हम दूसरों के दुर्गुण देख रहे हैं और उन्हें देखते हुए हमने स्वयं को भारी कर लिया । निन्दा में रस लेकर स्वयं को उसमें उलझा दिया । जिस प्रकार मक्खी को शहद में बड़ा रस होता है और वह उसका रस लेने जाती है और वहीं फंस जाती है । निन्दा भी कुछ ऐसी ही है । मोहनीय कर्म का भी कुछ ऐसा ही हिसाब है वह कब बंधता है पता ही नहीं चलता । अपनी कर्म की मैल उतारते चले जाओ । सेवा करो । तुम कोई भी काम करो उसके लिए अहसान मत समझो, कृतज्ञता ज्ञापित करो । श्वांस के साथ जीवन जीओ और संकल्प से कर्म निर्जरा करो । 

आचार्य मानतुंग का कारागृह में कितना अपमान हुआ, उन्होंने समता से सहन किया । पाप-पुण्य को महत्व ना देते हुए निर्जरा को स्वीकार किया । कबीर जिन्हें आज जनता पूजती है उस समय उन्हें नाजायज संतान से पुकारा गया । अष्टावक्र आठ अंगों से टेढ़े मेढ़े थे फिर भी उनकी गीता आज सारे भारत में प्रसिद्ध है । उसमें भी उन्होंने सब कर्मों का त्याग कर साक्षी भाव में रहने की बात कही है । हम उस साक्षी-भाव को समता कहते हैं । भेद-ज्ञान करते चले जाओगे तो समता स्वतः भीतर आएगी । फल की आकांक्षा मत रखो । इच्छा नहीं रखना । भीतर भेद-विज्ञान का बीज जो बोया है उसे पल्लिवित पुष्पित करो एक दिन अवश्य वृक्ष बनेगा । किसी से घृण मत करो । सबके प्रति मंगल की कामना करो और हर समय केवल अरिहंत परमात्मा की शरण स्वीकारो । भक्तामर की एक-एक गाथा बहुत गहरी है । एक गाथा भी जीवन में आ जाए तो संसार सागर पार हो जाएगा । तुम भक्ति करो और भक्ति से मुक्ति की ओर अग्रसर हो जाओ ।

 

अरिहंत भगवान का मुख कमल चन्द्र और सूर्य से अधिक सुन्दर है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

7 अक्टूबर, 2006: जम्मू: युग पुरूष, जैन धर्म दिवाकर, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि:- आचार्य मानतुंग प्रभु चरणों में अपनी प्रार्थना भक्तामर स्तोत्र के माध्यम से कर रहे हैं । 19 वें श्लोक में उन्होंने भगवान के मुख चन्द्र का वर्णन किया है । हे नाथ ! समस्त अंधकार आपके मुखचन्द्र से दूर हो जाता है तो रात्रि में चन्द्रमा का और दिन में सूर्य का क्या प्रयोजन है । खेतों में धान पक गया हो तो जल से भरे बादलों का क्या प्रयोजन है । आपका मुख कमल एक अलौकिक दिप्ती से दिप्तीमान है, उसको देखने पर सूर्य चन्द्र भी फीके लगते हैं । सूर्य चन्द्र स्वयं अपने देव विमान के साथ श्रीचरणों में उपस्थित होते हैं । जहां केवलज्ञान का प्रकाश फैला हो वहां सूर्य चन्द्र का प्रकाश कोई काम नहीं करता । अरिहंत भगवान में सबसे अधिक शक्ति है वे सबसे अधिक सुन्दर हैं । उनके भीतर लेश मात्र भी कषाय नहीं है और प्राणी मात्र को तार रहे हैं । सामान्य केवली और तीर्थंकर भगवंतों में यही अन्तर होता है कि सामान्य केवली स्वयं अपना कल्याण करते हैं और तीर्थंकर भगवान अपने साथ-साथ पूरी मानव जाति को तारते हैं । उनका आभा-मण्डल सबको शान्ती प्रदान करता है । सूर्य निकला है और प्रकाश नहीं मिला तो इसे कोई मान नहीं सकता । ऐसे भी लोग धरा पर है जो तीर्थंकर को नहीं मानते । आचार्य कहते हैं कि फसल पक गई है तो जल से भरे बादलों की कोई आवश्यकता नहीं । आत्मा का परमात्मा से मिलन हो गया तो फिर संसार में आने की आवश्यकता नहीं । फसल पकने पर कटाई की आवश्यकता होती है । दूध से घी बन जाए फिर वापस दूध नहीं बन सकता । एक बार गुरू मिल गया फिर संसार में अटकने की आवश्यकता नहीं है ।

अरिहंतवाणी को सुनकर कल्याण मार्ग को जानो । सत्य असत्य को जानो । अंधकार प्रकाश को जानो । विष और जहर की जानकारी प्राप्त करो । अच्छे बुरे को समझो । अगर श्रद्धा होगी तो सब कुछ सही दिखाई देगा । श्रद्धा नहीं है तो कुछ भी नहीं है । सूर्य की किरणें जब धरा पर दस्तक देती है तो कुछ न कुछ परिवर्तन अवश्य आता है । अरिहंतवाणी कानों में पड़े और जीवन ना बदले यह हो नहीं   सकता । भगवान की वाणी है कि कुछ भी अच्छा नहीं है और कुछ भी बुरा नहीं है । नरक निगोद की आत्मा हमारी आत्मा और सिद्ध भगवान की आत्मा एक समान है । मानव जीवन परमात्म प्राप्ति का एक सुन्दर साधन है और मानव जीवन ही परमात्मा को पाने की टिकिट है आवश्यकता है साधना और शुद्ध सामायिक की । हमें चुनना होगा हमें संसार चाहिए या परमात्मा । प्रभु महावीर को दीक्षा के समय इन्द्र ने देवदुष्य वस्त्र प्रदान किया । भगवान ने इन्द्र की भक्ति जानकर उसे अपने पास रख लिया जब एक ब्राह्मण उनके पास याचना करने आता है तो उसे वे आधा वस्त्र दे देते हैं और आंधी आयी और दूसरा आधा वस्त्र भी झाड़ियों में अटक गया । भगवान ने उसे प्राप्ति का कोई उपाय नहीं देखा । वे तो अपने संयम मार्ग में आगे बढ़ गये । उन्होंने उस वस्त्र में आसक्ति नहीं रखी । हम भी अपनी आसक्ति को   तोड़े । हमारे मोह बंधन टूटे । जब भेद-विज्ञान मिल गया तो पूजा-पाठ में अटकने की आवश्यकता न   हीं । कर्म-काण्ड में अटकने की आवश्यकता नहीं । पूजा पाठ और कर्म-काण्ड अपने स्थान पर अच्छे हैं, इनको ना करो यह तो मैं नहीं कहता परन्तु इनको ही सब कुछ मानना गलत है। हमें वीतराग धर्म मिल गयाऔर क्या चाहिए । मुक्ति के लिए प्रयास करो । 

जैन शास्त्रों में तीन शब्द आते हैं हेय, ज्ञेय और उपादेय । हेय यानि छोड़ना, ज्ञेय यानि जानना और उपादेय यानि ग्रहण करना । जीवन में कष्ट आए तो समझना आप मुक्ति के नजदीक जा रहेहो । कष्ट के समय में समता रहे वही सच्ची सामायिक है । स्थानकवासी का अर्थ ही यही है कि हम अपने निज स्थान में प्रवेश करें । निज-स्थान यानि हमारी आत्मा । जिन्दगी को जीते हुए सत्तर वर्ष हो गए क्या   पाया ? क्या सार है पिछले सत्तर वर्षों का । केवल कर्म की गठरी भारी करते गए । हमें उसे हल्का करना है । कच्ची फसल है कर्म सहित आत्मा और पक्की फसल है एक शुद्धात्मा । मानव जन्म लिया था मुक्ति के लिए परन्तु हम संसार में उलझ गए । मानव जन्म प्राप्ति के बाद मुनि बनने की आवश्कयता है और आज जो मुनि बने हुए हैं या बन रहे हैं उन्हें मौन की आवश्यकता है । मुनि मौन हो जाएगा तो अपनी लक्ष्य सिद्धि प्राप्त कर लेगा । मुनि बनना यानि केवल वेश परिवर्तन करना नहीं है । एक लक्ष्य को लेकर आगे बढ़ना है और हमारा लक्ष्य है आत्मा में छिपे परमात्मतत्व को जानना । भीतर के सम्राट् बनना । सिकन्दर जैसे बड़े-2 बादशाह बाहर के सम्राट थे परन्तु भीतर की शान्ती नहीं थी । भगवान महावीर भीतर के सम्राट् थे वे समृद्ध परिवार से होते हुए भी एक भिक्षु के समान सीधे और सरल थे । अपनी इन्द्रियों को उन्होंने वश में कर रखा था । सचमुच वे महान् और अपने सम्राट् थे । 

 

ऋजु सरल होते हुए हमें प्रभु के पास जाना है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

8 अक्टूबर, 2006: जम्मू: युग पुरूष, जैन धर्म दिवाकर, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि:- आपके समक्ष भक्तामर स्तोत्र की चर्चा चल रही है । परमात्म प्राप्ति के दो ही मार्ग है भक्ति और ध्यान । संसार सागर में लहरें उठती है और विलीन हो जाती है उसी तरह जीवन सागर में जन्म-मरण की लहरों में हम अनंत बार उठकर विलीन हो गए फिर भी हम मोह में फंसे हुए हैं । मानव जीवन की एक-एक श्वांस का उपयोग परमात्म प्राप्ति के लिए करना चाहिए था परन्तु हमने श्वांस को साधा नहीं और अपने लिए कुछ नहीं किया । यह देह एक कारागृह है । कच्ची फसल है हमारी अशुद्ध आत्मा और पक्की फसल है शुद्धात्मा । विद्वान् तों हम बन गए परन्तु आचरण नहीं आया तो विद्वान विद्वान नहीं कहला सकता । जीवन की हर श्वांस में प्रभु सिमरन बना रहे । 

अंधकार दो प्रकार का है द्रव्य और भाव । द्रव्य अंधकार बाहर का अंधकार है और भाव अंधकार भीतर का अंधकार है । द्रव्य अंधकार को तो रोशनी द्वारा दूर किया जा सकता है परन्तु जब तक भीतर प्रकाश नहीं होगा तब तक भाव अंधकार दूर नहीं होगा । भाव अंधकार के नाश के लिए सम्यक् दर्शन, ज्ञान, चारित्र की आराधना आवश्यक है और हर श्वांस में भेद-विज्ञान करना बहुत जरूरी है । आपके जीवन में क्रोध, मोह, वासना आती है तो स्वीकार करो । हम स्वीकार ना करके झूंठ बोलते हैं जो हो रहा है उसे स्वीकार करते चले जाओ यही जीवन है । जिज्ञासा और मुमुक्षु भाव को भीतर उतारो । जबसे जन्म लिया है विषय कषायों में डूबे हुए हैं क्या पाया हमने इससे ? जीवन में परमात्म प्राप्ति का बीज बोने का समय आया तो हमने आत्मा को संस्कारित किया और भावना रखी तो फल अवश्य आएंगे । अचेतन चित्त में सब कुछ उपलब्ध है केवल हमें वहां तक पहुंचना है । ध्यान आत्मा को शुद्ध करता है । आत्मा के भी दो रूप है संसारी और सिद्ध । जिस प्रकार सोना खान में पडा होता है तो अशुद्ध होता है और खान से बाहर निकलते ही शुद्ध हो जाता है । तुमने ध्यान किया तो संसारी आत्मा सिद्धदशा की ओर अग्रसर हो   जाएगी । हम भगवान को इस धरती पर बुलाते हैं क्या आवश्यकता है । प्रभु से केवल इतनी प्रार्थना करो कि हे प्रभो ! मैं ऋजु सरल और मुक्त होता हुआ तुम्हारे पास आ जाऊँ फिर प्रभु तुम्हें अपने पास रख   लेंगे । नरक, निगोद से निकलकर संसार चक्र में फसंते हुए मानवगति को हमने भोग में लगा दिया अब हम भोग से बाहर निकलें । 

भक्तातर स्तोत्र के 18 वें श्लोक से जुड़ी एक कहानी है । भक्तामर स्तोत्र का निस्वार्थभाव से पठन आवश्यक है । एक राजा थे चन्द्रकीर्ति उनका मंत्री सुमतिचन्द्र था । सुमतिचन्द्र का स्वर्गवास हो गया तो राजा ने मंत्री के पुत्र भदु्र कुमार को बुलाया और कहा कि तुम्हारे पिता का पद तुम ग्रहण कर लो । भद्र कुमार अनपढ़ था उसने कहा राजन् मैं मंत्री का पद ग्रहण कर लूंगा तो सभा के मध्य हसी का पात्र बन जाऊँगा । राजा ने मंत्री पुत्र को पठन पाठन की प्रेरणा दी । भीतर चोट लगी और वह विद्या ग्रहण की, सोचने लगा एक जैन श्रमण वहां से निकले अपने मन की व्यथा उनके समक्ष रखी । श्रमण ने उसे भक्तामर स्तोत्र का अठारहवा काव्य विधिपूर्वक आराधना के लिए कहा । भद्र कुमार ने तेले की आराधना की । तप जप के प्रभाव से शासनदेवी प्रकट हुई और मंत्री पुत्र ने अपनी व्यथा उनके समक्ष रखी । देवी ने तथास्तु कहा और वह जहां से आयी थी वह चली गई । थोड़ी ही देर में भद्र कुमार विद्वान् बन गया और राजा के समक्ष पहुंचा । राजा ने पूछा तुम इतने जल्दी विद्वान कैसे बन गए तो भद्र कुमार ने जैन धर्म के भक्तामर स्तोत्र का प्रभाव राजा को कह सुनाया । भक्तामर स्तोत्र का 18 वां श्लोक और 6 वां श्लोक विद्याध्ययन की प्राप्ति के लिए है । 

 

प्रबल पुरूषार्थ से मिले मानव भव का हम लाभ उठायें

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

9 अक्टूबर, 2006: जम्मू: युग पुरूष, जैन धर्म दिवाकर, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि:- अनंत-2 उपकारी तीर्थंका आदिनाथ भगवान को कोटि-2 नमन । वर्तमान तीर्थंकर श्री सीमंधर स्वामी भगवान को कोटि-कोटि नमन । आचार्य मानतुंग को नमन । नमन इसलिए कि उन्होंने भक्ति-भाव से आदिनाथ की स्तुति की । भगवान ऋषभदेव के गुणों का वर्णन किया । वर्तमान तीर्थंकर श्री सीमंधर स्वामी भगवान के गुणों का वर्णन एक ही है क्योंकि दोनों केवलज्ञान, केवलदर्शन एक सा है । वे तिर गए ओर ओरों को तार रहे हैं । वे मुक्त हो रहे हैं और ओरों को मुक्त कर रहे हैं । उनकी भीतर की आंखे खुली गई । भीतर की आंखों से मौन, ध्यान, कायोत्सर्ग करें तो इस देह से हम मुक्ति तक पहुंच सकते हैं । संथारा भी मुक्ति प्राप्ति का एक सुन्दर उपाय है । श्रावक का तृतीय मनोरथ है पंडित मरण और उसमें सबसे पहले नमन जरूरी है । नमन से हमारे ध्यान की शुरूआत हेाती है । नमन केवल दो हाथ जोड़ने से नहीं होता नमन कहते ही हृदय झुक जाएं, शुद्ध भाव से किया गया नमन अनेक भवों को कम कर देता है । 

हमारी आत्मा शाश्वत् है परन्तु हम प्रतिपल प्रतिक्षण बदल रहे हैं । हम इस धरा पर अकेली ही आए थे और अकेले ही जाना है इसलिए अभी से अकेले हो जाओ । छल छद्म से बाहर निकलो । जो वीतरागी हैं वे मोह से निर्मोही की ओर चले गए । प्रबल पुरूषार्थ करते हुए इस जीव ने नरक निगोद से निकलकर मानव भव को पाया और यहां आकर भी वह भोगों में अटका रहा । मानव भव का सही उपयोग करो क्योंकि बहुत बार सुना है यह भव अनमोल है परन्तु अब साधना से एक अनुभव आ रहा है कि जितनी निर्जरा हम मानव भव में कर सकते हैं उतनी हम कहीं पर भी नहीं कर सकते । अज्ञानी के हाथ में दिया गया शास्त्र शस्त्र बन जाता है और ज्ञानी के हाथ में दिया गया शस्त्र भी शास्त्र बन जाता है यह है ज्ञान की बात । हम ज्ञानी बनें । ज्ञान से हम मुक्ति तक पहुंच सकते हैं । आचार्य मानतुंग की भक्ति प्रगाढ़ थी, इसी वजह से उनका स्तोत्र भी अमर हो गया । स्तोत्र की हर पंक्ति में प्रगाढ प्रेम और प्रभु भक्ति भरी हुई है । आचार्य मानतुंग ने भगवान को सूर्य चन्द्र की उपमाओं से उपमित करने के बाद मानव जीवन की दुर्लभता बतायी और उससे संबंधित कहानी 19 वे श्लोक की है । 

हस्तिनापुर के राजा शूरपाल थे । वहीं पर एक देवल नाम का जौहरी उनका मित्र था । राजा ने एक बार देवल जोहरी को सोना चांदी आदि जेवरात देकर कुछ आभूषण बनाने का आॅर्डर दिया । जौहरी के बेटे ने सुनार को सोना चांदी देकर आभूषण बनवाने के लिए कह दिया । सुनार ने असली सोना चांदी अपेन पास रखकर नकली सोना चांदी के आभूषण बनाकर राजा को सौंप दिये । राजा उसे देखकर तुरन्त पहचान गया और उसने उस सुनार को पूछा तो सुनार ने कहा देवल जौहरी ने जैसा सोना चांदी दिए थे उन्हीं के आभूषण बनाएं हैं । देवल जोैहरी को बुलाया उसने कहा सोना चांदी असली दिया था । झूठ के पांव नहीं होते इसलिए सुनार छूट गया और देवल जौहरी को कैंद हो गई । जौहरी अब संकट में फंस गया तीन दिन का तेला करते हुए उसने भक्तामर स्तोत्र के 19 वें श्लोक की आराधना की । शासनदेवी प्रकट हुई और शासनदेवी ने उसे कैद से छुड़ाकर अपने घर पहुंचा दिया । उसी रात्रि को राजा शूूरपाल ने एक स्वप्न देखा कि देवल जौहरी मेरी केद से छूटकर अपने घर सुख्पूर्वक सौ रहा है और प्रातःकाल उसने अपनी दुकान पर दुकानकारी करना आरंभ कर दिया है । राजा को स्वप्न सच प्रतीत होने पर भी उसने उसे स्वीकार नहीं किया । प्रातःकाल देखा तो कैद में जौहरी नहंी था । राजा ने जौहरी को बुलाया तो वहीं पर शासनदेवी ने प्रकट होकर जौहरी और राजा की आंखे खोली । अब जौहरी के स्थान पर सुनार को कैद हो गयी और सही आभूषण राजा को प्राप्त हो गए । यह है भक्तामर की आराधना का फल । सच्चा भक्त खुद को मिटा देता है परमात्मा-भक्ति में और नकली भक्त भगवान को मिटा देता है अपने में हम सच्ची भक्ति करते हुए परमात्म प्राप्ति की ओर अग्रसर हों ।  

 

 धर्म हीरों का हीरा है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

 

10 अक्टूबर, 2006: जम्मू: युग पुरूष, जैन धर्म दिवाकर, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि:- भगवान आदिनाथ की स्तुति करते हुए आचार्य मानतुंग बीसवें श्लोक की चर्चा कर रहे हैं वे प्रभु के केवलज्ञान की स्तुति करते   हैं । वे कहते हैं आपका केवलज्ञान अनंत पर्यायों को प्रकाशित करने वाला है । वैसा केवलज्ञान हरीहरादिक देवों में नहीं है । जैसे स्फटिकमणि या झिलमिलाती मणियों में जो चमक है वह कांच के टुकड़ों में नहीं   है । इस श्लोक में कृतावकाशं शब्द महत्वपूर्ण है । प्रभु का केवलज्ञान दूसरों का अज्ञान हटा देता है । कांच की मणि क्षण भंगुर है गिरते ही टूट जाती है । छद्मस्थ जीवों का ज्ञान क्षण भंगुर है । शुद्ध मणि का प्रकाश सदैव स्वयं ही प्रकाशित होता है । क्षायिक सम्यक्त्व की प्राप्ति पर केवलज्ञान स्वयं प्रकाशित होता  है । सूर्य की किरण मिट्टी पर कांच की मणि पर या हीरे पर पड़े तो उनका अलग-2 प्रभाव आता है । मिट्टी पर पड़ा प्रकाश कोई शोभा नहीं देता । कांच की मणि थोड़ी सी प्रकाशित होती है हीरे पर सूर्य का प्रकाश पड़ते ही वह झिलमिलाने लगता है । उसका पारदर्शी प्रकाश मन को बड़ा अच्छा लगता है । कुछ लोग संसार में जीते हैं और श्वांस छोड़कर चले जाते हैं । वे लोग मिट्टी के समान हैं । कुछ लोग थोड़ा धर्मू-ध्यान करते हैं, पुण्य कमाते हैं वे कांच के समान हैं । कुछ लोग धर्म कर परलोक को सफल बनाते हैं या फिर सिद्धालय की ओर कदम बढ़ाते हैं वे हीरे के समान हैं । हीरा या स्फटिकमणि हेै शुद्ध सम्यक्त्व कोहीनूर हीरा मिल जाए फिर किसी की आवश्यकता नहीं । 

 

इस श्लोक में कुछ रहस्य भरा हुआ है जो देखने पर पता नहीं लगता । इस श्लोक में धर्म से उत्पन्न हीरा कोई नहीं जब तक वह हीरा ना मिले तब तक उसकी खोज करते रहना चाहिए यह बताया  है । इस श्लोक में गुरूमंत्र का रहस्य भी प्रतिपादित किया है । इस संसार में हजारों लाखों धर्म गुरू     हैं । धर्म परम धन है । मोक्ष परम लक्ष्मी है, इनसे यहां भी आनंद प्राप्त होता है और वहां भी आनंद प्राप्त होता है । कौन होता है गुरू ? गुरू कोई कपड़ों सम्प्रदाय में नहीं  है । धर्म, सम्प्रदाय में नहीं है । हर धर्म में अपने नियम हैं । नियमों को ऊपर उठाकर कुछ बातें जानी जाती है । अन्दर के जीवन को जो पवित्र कर दे वह सच में गुरू है । जिसके भीतर प्राणीमात्र के लिए समभाव है । गुरू सूरज के समान है जो अंग-2 में रोशनी प्रदान करता है । गुरू हमें अमावस से पूर्णिमा की ओर ले जाता है। वीतराग धर्म की ओर ले जाता है । छोटे-2 ज्ञान में तृप्त मत होना । कांच के टफकड़ों को हीरा मत मानना । आचार्य मानतुंग ने अपने ज्ञान में हीरे की परख जानी । सोने और पीतल की परख जानी । हीरा तो शुद्ध है । सोने को अग्नि में डाल दिया जाए तो वह और अधिक शुद्ध होता है और पीतल को अग्नि में डाल दो तो वह काला हो जाता है ।जीवन के कष्ट में तुम घबरा गए तो तुम पीतल हो । जीवन में दुख आए और तुम समता में हो तो तुम सोना हो । सोना और मिट्टी में भी अन्तर है । सोना कम है इसलिए उसकी कीमत ज्यादा है। मिट्टी यहां वहां सब जगह दिखाई देती है इसलिए उसकी कीमत नहीं है । कांच और मणि में अन्तर है इसलिए परमात्मा को मणि माना है। 

 

धर्म हीरों का हीरा है । एक बार हाथ में आ गया तो उसे हृदय की पोटली में संभालकर रखना । इस श्लोक में महाजन शब्द की भी व्याख्या की है । महान् पुरूष जिस मार्ग पर चलते हैं सारी जनता उसी मार्ग पर चलती है । सच में महाजन वह है जो सम्यक् दर्शन ज्ञान चारित्र से सम्पन्न है । जिसको धन पद का महत्व नहीं मतलब की दुनियां और सारे साथी यहां पर इकट्ठे हैं हमें उनमें से अपना कार्य पूरा करना है । जिस वृक्ष पर फल लगते है। उसी वृक्ष पर पक्षी बैठता है इसलिए तुम भी स्वार्थ में आकर सही मणि खरीदना । केवलज्ञानी द्वारा प्ररूपित धर्म पर श्रद्धा करना अरिहंत हमारे देव और सुसाधु हमारे गुरू हें इस व्यवहार सम्यक्त्व को धारण करना । मंगल पाठ में चार ही मंगल बतलाये है। उन्हीं को मंगल मानकर जीवन में अपनाना और किसी को स्वयं से बांधना मत । जीवन दाव पर लग जाए तो चलेगा परन्तु गुरू की खोज में जीवन को छोड़ना मत । जैसे विवेकानंद ने रामकृष्ण को पाया । जो खोजता है वही पाता    है । गलत सही का पता भी तभी लगेगा जब तुब खोजोगे ं। सभी के भीतर अंधकार है । आंखे बंद करो तो भीतर अंधेरा ही अंधेरा नजर आता है । उस अंधेर में क्रोध, मान, मोह आदि कषाय व्याप्त है । हम उस अंधेरे को प्रकाश में   बदले । ज्ञान को पूरी तरह आत्म-सात् करें । अध्ूारा ज्ञान खतरे से खाली नहीं होता इसलिए पूर्ण ज्ञान प्राप्त करें । धर्म को जीवन में उतारें, सत्य को स्वीकार करो । पारदशर््ीा जीवन बनाआो । वीतराग-भाव ग्रहण कर हम संसार से छूटे और मोक्ष पंचमगति को प्राप्त करें । 

 

अरिहंत भगवान को देखने पर किसी को देखने की इच्छा नहीं होती

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

11 अक्टूबर, 2006: जम्मू: युग पुरूष, जैन धर्म दिवाकर, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि:- आचार्य मानतुंग भक्तामर स्तोत्र के 21 वें श्लोक में भगवान की स्तुति करते हुए कहते हैं कि हे प्रभो ! अच्छा हुआ मैंने पहले हरिहरादिक देवों को देख लिया । आचार्य मानतुंग ने भगवान ऋषभदेव को नाथ कहा है, उनको नाथ कहते ही वे स्वयं भी नाथ बन गए । हरिहरादिक देवों में ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदि आते हैं । आचार्य कहते हैं मैंने उनको देख लिया । उनको देखने के बाद मेरा चिŸा आप में स्थिर रहता है यहां परमात्मा और देव में अन्तर प्रतिपादित किया है। परमात्मा सर्वोच्च स्थिति है, केवलज्ञानी है । देव शासन रक्षक है । वे अवधिज्ञान के धर्ता है । सूर्य निकलने पर सारे ग्रह फीके पड़ जाते हैं उसी तरह आपको देखने पर हृदय आपमें संतोष प्राप्त करता है । आपको देखने के बाद किसी में मेरा मन टिकता ही नहीं । आपकी भक्ति का रंग चढ़ गया तो उतरता ही नहीं । राग और द्वेष से दूर है वीतराग धर्म का रंग ।

अरिहंत की भक्ति उनकी आराधना और उनको नमन करने से अरिहंत भगवान खुश नहीं होते परन्तु हमारे कर्म क्षय होते हैं । भगवान ऋषभदेव के प्रति आचार्य मानतंुग की प्रगाढ़ श्रद्धा भक्ति थी तभी आचार्य मानतुग ने कहा प्रभु आपकी सर्वोत्त्म बात यह है कि आप भक्तों को अपना बना लेते हो । अरिहंत प्रभु तीनों लोकों में सबसे श्रेष्ठ, सुन्दर, शक्तिशाली है । उनके कानों में कीले ठोके जाए या फिर देवेन्द्र श्रीचरणों में वंदन करें इसमें उनमें कोई राग द्वेष भाव नहीं है कितनी पवित्र आत्मा है अरिहंत भगवान की । हम पर भी उनका प्रभाव पड़ता है जब तक उनके चित्र को देखते हैं और उन भावों में विलीन हो जाते   हैं । वे हमेशा समभाव में रहते हैं । अहंकारभाव उनमें नहीं है और हम अहंकार करते हैं तो हम स्वयं से दूर हो जाते हैं । जितनी उपाधियां या बाधाएं व्यक्तित्व के आगे बना रखी है उन्हें दूर करो । तुम कितने बड़े हो जाओ परन्तु विनम्रता, सहजता, गुणग्राहकता इन गुणों को मत छोड़ना और एक प्रार्थना हर समय भगवान के समक्ष हो कि मेरे भीतर समता कब आएगी । 

वर्तमान में महाविदेह-क्षेत्र में विराजित श्री सीमंधर स्वामी भगवान सबसे अधिक सुन्दर हैं । एक अरब साधु साध्वी और अनेको ंदेव  उनकी सेवा में हर समय उपस्थित है । उनके भीतर अनंत करूणा    है । उनके भीतर परम विनय है, हम भी परम विनय में आए । हमारा जीवन एक कोरी स्लेट है, उस पर क्या लिखना है यह हमारे हाथ में है । हम चाहे तो उस पर वीतराग-वाणी भी लिख सकते हैं और हम चाहे तो उस पर संसार की बातें भी लिख सकते हैं । वीतराग-वाणी हमें परम् धन की ओर ले जाएगी । वीतराग किसी की स्तुति से कभी प्रसन्न नहीं होते और किसी की गलती से कभी दुःखी नहीं होते, उनकी भक्ति अगर आप स्वार्थवश करोगे तो पुण्य मिलेगा और संसार बढ़ेगा । जरा सा कर्म संसार भ्रमण में हमें अटका देता है भगवान महावीर और गणधर गौतम का संवाद कई बार आपने सुना है । गौतम का जरा सा राग उनकी मुक्ति में बाधक बन गया । जैन धर्म में गुणों की पूजा है नाम की पूजा नहीं । थोड़े से दुःख से हम धर्म से पीछे हट जाते हैं । हम संकल्प करें । परम वीतरागी मुद्रा को देखने के बाद किसी में मन टिकता ही नहीं । मन बैचेन हो तो अरिहंत की मुद्रा को देखो ।उनके चित्र को देखो । मन स्वयं शान्त हो जाएगा । 

 

श्रद्धा और पुरूषार्थ से हर कार्य संभव है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

12 अक्टूबर, 2006: जम्मू: युग पुरूष, जैन धर्म दिवाकर, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि:- आचार्य मानतुंग ने प्रभु की स्तुति करते हुए समस्त उपमाएं उन्हें प्रदान की परन्तु उपमाएं उनके समक्ष भी फीकी पड़ गयी । सरागी को देखने के बाद वीतरागी में ही मन टिकता है यह इस श्लोक का भावार्थ है । एक व्यक्ति गरीबी को देखकर अमीरी का अहसास करता है । दुःख को देखकर सुख का अहसास होता है । बीमारी आए तो स्वस्थता का क्या मूल्य है पता लगता है । मुंह में बत्तीस दांत है पर एक टूट जाए तो बार-बार जिह्वा वहीं पर जाती है । आचार्य ने प्रभु को हर पहलू से देखकर उनकी स्तुति की । उनकी वीतराग मुद्रा को देखा । भगवान की वीतराग-मुद्रा बहुत शान्त, निर्मल है । उसे देखते हुए ही मन शान्त हो जाता है और चिŸा ध्यान में प्रवेश करता है । ऐसे समय में अनेक कर्म-निर्जरित होते हैं । ध्यान की गहराई में चिŸा का आनंद बढ़ता है । 

स्वर्ग और मोक्ष में अन्तर है । जैन धर्म में मोक्ष सर्वोत्तम माना गया है । मोक्ष जाने के बाद जीव वापस नहीं आता । घी बनने के बाद दूध नहीं बनता । पुण्य से स्वर्ग मिल सकता है परन्तु मोक्ष नहीं । पाप और पुण्य दोनों ही बेड़ियंा हैं एक लोहे की है तो एक सेाने की है । हम किसी की भी कामना ना  करें । जहां कामना है वहां दुःख है । जरा सी वासना भीतर होगी तो जन्म-मरण बढ़ जाएंगे । ध्यान में मांग होती है तो ध्यान शुद्ध नहीं होता, ध्यान में तो केवल वीतराग-भाव की आवश्यकता है । जो मुनि है वे हमेशा ध्यान करें और मौन में रहे, यही उनके मुनित्व का सार है । व्यक्ति पुण्य करता है तो उस पुण्य को भी निर्जरा में परिवर्तित करें । आचार्य कहते हैं हे प्रभो ! आपको देखने से जो शान्ति मिलती है जो संतोष प्राप्त होता है वह कहीं मिला ही नहीं । आपको जो चाहिए वह मिलेगा और मिलता भी है आवश्यकता है श्रद्धा और पुरूषार्थ की । एक ही प्रार्थना हमारे भीतर हो कि अन्तिम समय तक अरिहंत स्मरण हमारे भीतर चलता रहे और सतगुरू के चरणों में इस जीवन का अंत हो । यह काव्य संकल्प से परिपूर्ण है । हम संकल्प लेते हैं परन्तु तोड़ देते हैं । इस काव्य में संकल्प की मजबूती का वर्णन किया है । हम हमेशा संसार में ही अटके रहते हैं । आप बच्चे थे। बचपन में खिलौने अच्छे लगते थे । थोड़े बड़े हुए । पढ़ाई अच्छी लगी फिर बिजनेस में मन लगने लगा, फिर शादी हुई फिर बेटे की इच्छा और काल का आगमन थोड़ा सा जीवन उसे हम किस तरह व्यर्थ गंवाते हैं । इस जीवन में रिश्तेदार और संसार में ही अटके रहते हैं । समाज की सेवा करनी अच्छी है परन्तु उस सेवा में निस्वार्थ भावना हो । हमारे गुरूओं के पास सामायिक की शुद्ध विधि ध्यान की शुद्ध विधि ऐसी अनेक मंत्र तंत्रों की विधियां थी परन्तु हममें पात्रता नहीं थी हम उसे प्राप्त नहीं कर पाये । अब फिर से समय आ गया है उस शुद्ध ध्यान, सामायिक को गुरू मुख से भीतर उतारने का । 

सर्वप्रथम साधना गुरू सान्निध्य में ही सीखनी चाहिए । हमारा संकल्प भी दृढ़ होना चािहए । इस श्लोक सं संबंधित एक सत्य घटना है जिसमें संकल्प की परीक्षा हुई है । मालवा नगरी में नामचन्द्र नाम के सेठ रहते थे । उनका एक पुत्र था श्रीधर । वह बचपन से ही बुद्धि सम्पन्न था । समय आने पर श्रीधर का रूपश्री से विवाह हुआ । रूपश्री धार्मिक थी, उसका संकल्प था कि जब तक जिन मन्दिर में जिन प्रतिमा के दर्शन नहीं करेगी, जिन वंदना नहीं करेगी तब तक अन्न जल ग्रहण नहीं करेगी । ससुराल आने पर उसने अपनी प्रतिज्ञा सबके समक्ष रखी । सास ससुर ने उसे सराहा । एक दिन प्रातःकाल ही वर्षा शुरू हो गयी और वर्षा का जोर बढ़ता ही गया । सास ने दोपहर में आकर आश्वासन दिया कि शाम को जिन दर्शन करा दूंगी परन्तु होनी को यही मंजूर था । सात दिन तक लगातार वर्षा चलती रही । नगर में कुछ असंमजस्य की स्थिति उत्पन्न हुई ऐसे समय में श्रीधर और रूपश्री ने भक्तामर स्तोत्र के 21 वें काव्य का सविधि आराधन किया और शासनदेवी प्रकट हुई और उन्हे ंवायुरथ पर बिठाकर भगवान के दर्शन करवाये । प्रकोप दूर हुआ । सास-ससुर एवं श्रीधर की जिन-धर्म में आस्था दृढ़ हुई यह है भक्तामर स्तोत्र का     प्रभाव । हम साधु साध्वियों के दर्शन करें या फिर भाव से अरिहंतों को वंदन करें, उनके दर्शन करें तो वह निश्चिय ही फलदायी होेते हैं । 

 

संकल्प से जीवन सफल बनता है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

13 अक्टूबर, 2006: जम्मू: युग पुरूष, जैन धर्म दिवाकर, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि:- हमारी मंजिल एक ही   है । हमारे भीतर प्रार्थना का भाव भी एक ही है । आत्मा से परमात्मा बनना हमारी नियति है । व्यक्ति स्वयं के कारण ही दुःखी है । मानव के पास सब कुछ होते हुए भी वह दुःखी है । मानव क ेपास बुद्धि है, सभी इन्द्रियां है फिर भी वह उनका सही उपयोग नहीं कर पाता है । यह जीवन किसलिए मिला था देखाो नरक में कितनी वेदनाएं   हैं । देवता परिग्रह जुटाने में लगे हुए हैं । तिर्यंच धर्म कर नहीं सकते केवल मानव ही ऐसा है जो धर्म का आचरण कर सकता है, उसे सुन समझ सकता है ।दो बातें जीवन में आ जाए तो तुम कभी दुःखी नहीं हो सकते । कोई तुम्हें दुःखी नहीं करता और कोई तुम्हें सुखी नहीं करता । सुख दुःख सारे शरीर के हैं । हमारे जैसे कर्म है वैसा फल मिलेगा । किसी को कोठी में सुख है तो किसी को झोपड़ी में सुख है । आज तक आप सभी ने बीस-चालीस साठ साल तक की जिन्दगी जी ली देखे क्या पाया, क्या सार है जीवन का । बड़े-2 वैज्ञानिक, चक्रवर्ती राजा, महाराजा सब चले गये । भोगों में सुख नहीं है, अगर सुख होतो तो महापुरूष भी सुख भोगते । 

सच्चा सुख आत्म-तत्व में है । सुख कर्म-निर्जरा का फल है । किसी को पहले सुख दिया था तो आज सुख मिल रहा है । किसी को पहले दुःख दिया होगा तो आज दुःख मिल रहा है । तिर्यंच धर्म सेनते हैं परन्तु उसे धारण नहीं कर सकते । एक ही संकल्प भीतर हो कि मुझे भीतर जाना है । आज से कुछ कमाना है तो मोक्ष के लिए । मोक्ष के लिए भी कमाया जाता है । जैसे जो भी इनकम आए वहां पर भावना हो कि इससे मेरे परिवार का पालन पोषण हो, कोई अतिथि, साधु-साध्वी आए तो उनका लाभ मिले और बचा हुआ धन धर्म हेतु समर्पित करूं । कुछ भी करना तो केवल निर्जरा के लिए करना । हमारा जीवन निर्जरा के लिए हो । आज से सोएंगे तो भी निर्जरा के   लिए । आंखे बंद करके जब आप स्व-स्थान पर लेट जाएं तो देखें कौन सौ रहा है शरीर सो रहा है या आत्मा सो रही है ।   

भोजन रते हुए भी धर्म की आराधना करना । भोजन में जो हिंसा हुई उसके लिए क्षमा-याचना करो और भावना रखो कि मेरे द्वारा बनाया भोजन जो भी खायें धर्म करें । शुद्ध सामायिक, माला करें । खाना शरीर के लिए ग्रहण करें । स्वाद के लिए नहीं । हम सुबह शाम खाते ही जा रहे हैं- कितना समय बीत गया अब आत्मा को भोजन दें । लक्ष्मी को पूजा तो आप सभी करोगे पर मोक्ष लक्ष्मी की पूजा कौन  करेगा । पूजा करोगे, धर्म साधना    करो । जीवन को साधो । कुछ समय अपने लिए निकालो । समता को जीवन में अपराओ । भेद-विज्ञान की साधना करो । आप संकल्प करो । संकल्प अवश्य पूरा होगा । हम संकल्प तो करते हैं पर कमजोर होता है । 

संकल्प के पांच अंग है, पहला है श्रद्धा । आपकी जिसके प्रति श्रद्धा होती है उसका कार्य पूरा होता है । जिसकी श्रद्धा होती है उसका जीवन बदलता है । श्रद्धा के लिए जीवन में सब कुछ छोड़ा जा सकता है साधना के लिये बेशर्म होना पड़ता है । संकल्प करो जिनवाणी पर श्रद्धा रखो, जीवन सफल होगा । 

 

हमारा संकल्प हमें मुक्ति तक पहुंचाएगा

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

14 अक्टूबर, 2006: जम्मू: युग पुरूष, जैन धर्म दिवाकर, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि:- साधना का मार्ग संकल्प का मार्ग है । जीवन में कुछ पाना चाहते हैं तो संकल्प की आवश्यकता है । संकल्प से ही व्यक्ति उन महान उंचाईयों को छू सकता है । शाश्वत् सत्य को संकल्प के मार्ग से ही पाया जाता है । दुनियां में दो प्रकार के धर्म हैं एक धर्म जो मन्दिर, मस्जिद, गुरूद्वारा चर्च में है और दूसरा धर्म जो महावीर, कबीर, बुद्ध का है । दूसरे धर्म में केवल एक ही अभिप्सा, चाह है कि मैं कैसे परमात्मा को पा लूं । बुद्ध ने एक दिन निर्णय किया जब तक बोधि नहीं मिलेगी तब तक बोधि वृक्ष के नीचे बैठा रहूंगा चाहे सारी उम्र ही क्यों न बीत जाएं और वो ही दृढ़ संकल्प उसी दिन बोधि प्राप्ति का कारण बना । 

हम एक संकल्प करें । कम से कम एक शुद्ध सामायिक बिना हिले डुले चिŸा की स्थिरता के साथ करें । जितना चाहिये उतना सब हमारे पास है आवश्यकता है उसे देखने  की । हम हमेशा संसार की ओर देखते हैं इस नश्वर देह को जितना अधिक खिलाओगे कम नहीं है । जितनी सम्पत्ति चाहिए उतनी आपके पास है फिर क्यों व्यर्थ की चिन्ता करनी । यह संसार स्वार्थ का है कोई किसी से प्यार नहीं करता प्यार सब शरीर का है । जब श्वांस निकल जाएगी तो एक घड़ी भर भी कोई घर के अन्दर नहीं रखेगा । जो घर के प्यारे है वे ही आपके अन्तिम संस्कार का समय निश्चित करेंगे और आपको अग्नि के बल चढ़ा देंगे ।  

प्यार करना है तो आत्मा से करो । आत्मा का प्यार आपको उस परमात्मा तक पहुंचाएगा । सम्यक् दर्शन का बीज मिल जाए फिर मोक्ष का वृक्ष अवश्य बनेगा । मोक्ष की टिकिट है सम्यक् दर्शन का बीज । तुम्हारी शुद्धता और पवित्रता चाहिए । आज जितने भी मन्दिर, मस्जिद, गुरूद्वारे हैं वे सब एक दुकान जैसे बन गए हैं । दान देते हैं तो कुछ मांगने की भावना है । परमात्मा के समक्ष खड़े होते हैं तो अपनी लम्बी लिस्ट उनके समक्ष रखी जाती है और यह सब मांगना केवल संसार के लिए है आज तक कभी आत्मा के लिए किसी ने नहीं मांगा । निर्जरा की बात किसी ने नहीं की । निर्जरा तो केवल आत्म-भावों में होती है, जरा सा झूंठ बोल लो तो आप आत्मभावों से दूर हो जाते हो और निर्जरा नहीं हो पाती । हम सब जानते हैं कि क्रोध, मान, मोह, लोभ, राग, द्वेष कर्म-ब्ंाधन के कारण हैं फिर भी हम इनमें उलझते रहते हैं । सारी वासनाएं शरीर की भावनाएं, कामनाएं शरीर तक ही रहने वाली है फिर भी हम उनका पोषण करते जा रहे हैं । देखें हम धर्म को कितना अपने भीतर उतार रहे हैं, सारी निंदा प्रशंसा यहीं रह जाएगी । मान, अपमान यही रह जाएगा ।

एक संकल्प ही हमारे साथ जाएगा । संकल्प किया था महावीर ने तो सिद्धालय को प्राप्त कर लिया । संकल्प करो अब नहीं तो एक जन्म में दो जन्मों में तुम्हें मुक्ति अवश्य मिलेगी । एक बार मुक्ति की रिजर्वेशन तो करा लो । प्रभु महावीर ने 27 भव पूर्व रिजर्वेशन की तो उन्हें मुक्ति मिली, आप भी उस मुक्ति की ओर आगे बढ़ो और उस मुक्ति के लिए भेद-विज्ञान की साधना सर्वोत्त्म है, भेद-विज्ञान के ऊपर कोई साधना नहीं है । सारे मंत्र-तंत्र इस शरीर के हैं परन्तु भेद-विज्ञान तो आत्मा का है । हमें आत्मा की साधना करनी है । जब भेद-विज्ञान का स्वाद लग जाएगा फिर सारे स्वाद फीके हो जाएंगे । कितना अंधेरा हो एक किरण सारे अंधकार को चीर देती है, उसी तरह कितने भी कर्म हो भेद-विज्ञान के द्वारा वीतराग-भावों के द्वारा हम उन्हें क्षय कर सकते हैं । कपड़ा मैला हो, चिकनाई से भरा हो तो उस पर साबुन अवश्य लगानी पड़ती है उसी तरह कर्म निकाचित हो तो वे भोगने ही पड़ते हैं पर हम दृढ़ रहें, पुरूषार्थ हमारे भीतर हमेशा     रहे । जान निकल जाए परन्तु मुक्ति के उद्यम से हम दूर ना हों । 

 

सभी कार्य आत्म-दृष्टि से करें

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

15 अक्टूबर, 2006: जम्मू: युग पुरूष, जैन धर्म दिवाकर, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि:- जिनशासन का मार्ग विनय, धर्म और संकल्प का है । हम अपने जीवन को अधिक से अधिक धर्म की ओर लगायें । संकल्प से जीवन को परिपूर्ण कर दें । हम कोई ऐसा कार्य करें जिससे जन्म-मरण के चक्कर से छूट जाएं । अमर सुख को ढूंढे । तीर्थंकरों के मार्ग पर श्रद्धा करें । हम माला, सामायिक, उपवास, सेवा कार्य करते हैं पर उसके पीछे आत्म-दृष्टि नहीं आती । हम सारे कार्य स्वार्थ, कामना से करते हैं । बाजार का धर्म सभी पालन करते हैं क्योंकि सभी धर्मानुयायी अपने धर्म स्थान में अवश्य जाएंगे परन्तु धर्म स्थान को अपना नहीं बनाएंगे । आप वर्षों से सामायिक कर रहे हो क्या एक भी सामायिक से भीतर समता आयी । अगर समता आयी तो सामायिक का लाभ है । हम अटकें हैं छोटी-2 बातों में । आत्मा तो कुछ चाहती ही नहीं, सारी कामना, चाहना शरीर की   है । लोक व्यवहार के लिए सारी जिन्दगी गंवाना मत । 

एक फकीर के पास बहुत सारे लागे आए और उनसे पूछने लगे कि हमें कोई साधना का मार्ग बताइये । फकीर ने कहा- मृत्यु के प्रति जागरूक रहो । सभी लोग आते, सबको एक ही बात कही जाती । इस बात से कुछ लोग परेशान हुए और उन्होंने फकीर से पूछा तो फकीर ने कहा- एक बात ही काफी है । हम देखते हैं कि उसकी मृत्यु हुई है अभी मेरी नहीं हुई । पर हमने कभी यह नहीं सोचा कि मेरी भी मृत्यु होने वाली है । मुझे भी शमशान जाना है । आप दूसरे के अन्तिम संस्कार पर श्मशान जाते हैं, थोड़ी देर के लिए भीतर वैराग्य आता है परन्तु वो वैराग्य हमेशा नहीं बना रहता । हर समय यह बात भीतर रहे कि अगले क्षण मुझे भी मरना है तो व्यक्ति क्रोध, झूंठ, कषायांे से दूर हो जाएगा, उसके राग-द्वेष कम हो जाएंगे, उसके जीवन में भेद-विज्ञान आ   जाएगा । 

संकल्प के साथ साधना करना । आप लोगस्स का पाठ पढ़ते हैं, उस पाठ की अन्तिम पंक्ति है कि हे सिद्ध भगवान मुझे सिद्धगति प्रदान करो । उसमें कर्म-क्षय की मांग है । कर्मक्षय की मांग आपको सिद्धालय तक पहुंचाएगी और कुछ मांग रखोगे तो जीवन बढ़ता चला जाएगा । साथ ही जन्म-मरण भी बढ़ेंगे । संकल्प की पांच सीढ़ियां हैं श्रद्धा है पहली सीढ़ी । मुझे मोक्ष जाना है इस पर श्रद्धा बनाए रखना, संदेह मत रखना कि मोक्ष मिलेगा या नहीं । एक कुआ खोदना है तो पहले मिट्टी, कंकर, पत्थर, गंदगी अवश्य आएगी फिर ही साफ स्वच्छ पानी प्राप्त होगा । ऐसी ही ध्यान प्रणाली है । ध्यान में जब बैठते हैं तो सर्वप्रथम विचार बाधक बनते हैं । शरीर, मन बाधक बनता है, इन सबको छोड़कर आप अपने स्थान भीतर स्थित रहे तो समझना मुक्ति नजदीक होगी । अगली सीढ़ी है स्मृति । प्रतिपल प्रतिक्षण यह याद रखना कि मुझे मोक्ष जाना है । बार-बार स्मरण करना अध्यात्म के क्षेत्र में स्मरण की अत्यन्त आवश्यकता है । तीसरी सीढ़ी है पुरूषार्थ । पुरूषार्थ करो आत्मा के लिए सम्यक् पुरूषार्थ करना आवश्यक है । आत्मा तो बलवान है परन्तु उसके ऊपर लगे कर्म अत्यधिक बलवान है, उन्हें भी आत्मा से हटाना है इसलिए पुरूषार्थ की आवश्यकता है । चैथी सीढ़ी है एकाग्रता । अपने लक्ष्य के लिए या मोक्ष के लिए हर कार्य करते हुए एकाग्र रहो । पांचवी सीढ़ी है विवेक । विवेक यानि सही गलत की पहचान । हर समय अपने संकल्प के लिए इन पाचों की आवश्यकता है श्रद्धा होगी तो स्मृति आएगी, स्मृति होगी तो पुरूषार्थ होगा, पुरूषार्थ होगा तो एकाग्रता बढ़ेगी और एकाग्रता होगी तो विवेक स्वतः ही जीवन में आ जाएगा । एक कदम अध्यात्म के क्षेत्र में बढ़ाया तो जीवन अध्यात्म की ओर बढ़ जाएगा । हम अपनी आत्मा से निर्णय करें । जीव  अजीव के भेद को जाने । जानना ही काफी नहीं है, जानकर अनुभूति करना भी आवश्यक है । तुम्हारे भीतर का दीया जले । ध्यान, साधना, सामायिक सब शब्दों के भेद हैं पहुंचना एक ही जगह है और उसके लिए संकल्प आवश्यक है ।

 

हमारी माँ जिनवाणी है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

16 अक्टूबर, 2006: जम्मू: युग पुरूष, जैन धर्म दिवाकर, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि:- छोटी सी प्रार्थना हमें मुक्ति तक पहुंचाती है । ऐसी ही प्रार्थना है ‘शिवोहम्’ यानि मैं शिव स्वरूप हूँ । मैं शरीर नहीं, मेरा नाम नहीं । सब कुछ जाने वाला है कुछ भी स्थिर नहीं है । इसी आधार पर एक सति ने अपने सात पुत्रों को सन्यासी बनाया । जन्मते ही उनके कानों में उसने सर्वप्रथम तुम शुद्ध, बुद्ध हो ऐसा उपदेश दिया । आचार्य मानतुंग भी इसी राह पर आगे बढ़ रहे हैं । आचार्यश्रीजी ने उस मां को नमन किया है जिस मां ने तीर्थंकर को जन्म दिया और उसकी तुलना एक सूर्य से की है । आकाश में लाखों करोड़ों तारे हैं, सभी दिशाएं तारों को धारण करती है परन्तु दैदिप्यमान सूर्य को केवल पूर्व दिशा ही धारण करती है । आचार्य कहते है- हे प्रभो ! जिस माता ने आपको जन्म दिया ऐसी माता कोई और हो ही नहीं सकती । प्रतिदिन सैकड़ों माताएं, सैकड़ों पुत्रों को जन्म देती है परन्तु आप जैसे पुत्र को जन्म देने वाली मां इस संसार में विरली ही होती   है । यह आचार्य की भावना ही है कि वे कभी सूर्य को उच्च उपमित करते हैं तो कभी उस उपमा को वे निरर्थक कर देते हैं । 

कई पुरूष स्त्री को कोसते हैं, कहीं-2 पर नारी को नरक का द्वार कहा गया है । तुलसी ने भी स्त्री को कोसा पर उसे पता नहीं कि उसी स्त्री ने उसे परमात्मा तक पहुंचाया । कामी व्यक्ति अंधा होता  है । जब तुलसी घर पहुंचे तो घर पर उनकी पत्नी नहीं थी, उन्हें पता लगा कि वे अपने घर गयी हैं तो वे भी अपने ससुराल की ओर चल दिये । रात को जब पत्नी के कक्ष में पहुंचे तो पत्नी के एक दोहे ने उनका जीवन बदल दिया । कहते हैं कामी व्यक्ति अंधा होता है । कुछ ऐसी ही घटना तुलसी के साथ घटी । जब तुलसी को अपने घर में देखा तो उनकी पत्नी ने कहा- 

जितना चित्त हराम में, उतना हर में होय । 

चला जाए बैकुण्ठ में पल्ला न पकड़े कोय ।

भीतर चोट लगी और जीवन बदल गया । लोहा गरम हो और चोट ठीक स्थान पर लग जाए तो लोहा भी ठीक हो जाता है । सति मदनरेखा ने अपने पति जिनका प्राणान्त हो रहा था उन्हें नवकार मंत्र का स्मरण कराकर समाधि में लाया । आप भी किसी का जीवन समाप्त हो रहा हो तो उस समय उसे जिनवाणी का श्रवण कराना । तुम शुद्ध, बुद्ध हो ऐसा उपदेश देना । हो सकता है उसका जीवन संवर  जाएं । स्त्री मोक्ष का द्वार खोलती है पर स्त्री में अवगुण भी है । स्त्री में माया, ईष्या है, स्त्री में गुण भी बहुत है पर उनका चिŸा चंचल है । माया और ईष्र्या ऐसे दो चार गुण वे छोड़ दे तो वह सर्वश्रेष्ठ बन सकती है । तुम जिससे माया कर रहे हो उसके प्रति सरल हो जाओ । पुरूष माया करता है तो स्त्री बनता है । स्त्र.ी माया करती है तो तिर्यंच में जन्म होता है और तिर्यंच माया करता है तो नरक गति और नरक में कोई नारकी माया करें तो निगोद तक जीवन चला जाता है । जितने सरल बनोगे उतना मोक्ष नजदीक होगा । 

आचार्यश्रीजी ने यहां स्त्री की महिमा का वर्णन किया है । पुरूर्ष बीज का काम कर सकता है परन्तु पृथ्वी का काम तो नारी ही करती है । मां ही ऐसी है जो हर बच्चे का ध्यान रखती है । स्वयं अनेक कष्ट उठाकर उसका पालन पोषण करती है । सुख के सपने देखते हुए माता बीस वर्ष तक पुत्र का पालन करती है परन्तु वही पुत्र बड़ा बनकर माता को कुछ नहीं समझता । इस संसार के सारे रिश्ते नाते झूंठे हैं, एक ही रिश्ता सच्चा है और वो है परमात्मा का । प्रेम करेा तो केवल परमात्मा से करो । स्त्री होना पाप नहीं है जैसा कर्म था वैसा जन्म मिला परन्तु इस जन्म में भी हम बहुत कुछ कमा सकते हैं । धन्य हैं ऐसी माताएं जिन्होंने भगवान ऋषभदेव को जन्म दिया जैसी मरूदेवी माँ, त्रिशला माॅं, कौशल्या माँ । हमारे यहां गर्भ का भी गहरा विज्ञान है । घर में अगर कोई जीव आने वाला है तो उसके लिए अनंत प्रार्थनाएं की जाती है । जो जीव आए वह धार्मिक हो । धर्म उसके अंग-2 में हो ऐसी प्रार्थना हर मां को करनी आवश्यक है । जब तीर्थंकर का जन्म होता है तो माता को प्रसव वेदना नहीं होती । माता भी दो प्रकार की है एक माता जो जन्म देती है और दूसरी माता जो जीवन देती है । हम सबको अपनी मां ने जन्म दिया पर हर मां अपने बच्चे को दूसरी मां से भी परिचित कराएं, उसका नाम है जिनवाणी मां । धन्य है वह जिनवाणी मां जिसने ज्ञानरूपी संतान को जन्म दिया । धर्म अधर्म जिनवाणी से ही जाना जाता है । आज की माताएं अपने बच्चे को जिनवाणी मां से परिचित कराएं और उन्हें जिनवाणी के सरल संस्कार दें । 

 

वैराग्य संतान का जन्म जिनवाणी माँ से होता है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

17 अक्टूबर, 2006: जम्मू: युग पुरूष, जैन धर्म दिवाकर, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि:- आचार्य मानतुंग भगवान ऋषभदेव की स्तुति कर रहे हैं । उन्होंने भगवान को सूर्य सम कहा और भगवान की माता को धन्य कहा । विशेष अर्थ में यहां पर यह देखने को मिलता है कि पुरूर्ष कितना भी बड़ा काम कर ले पर स्त्री के समक्ष झुक जाता है । पहले की माताएं धर्म को महत्व देती थी । आज की माताएं धन को महत्व देती है । धन्य है वह मां जिसने तीर्थंकर भगवान को जन्म दिया । यदि धर्म ना होता तो कैसे ज्ञान मिलता । सीप की कीमत मोती से होती है । दिशा की कीमत सूर्य से होती है क्योंकि सूर्य पूर्व में ही उदय होता है । दिशाओं में प्रधान है पूर्व दिशा और उत्तम है उत्तर दिशा । इन दोनों के बीच जो कोण बनता है वह सर्वोत्तम है ईशान कोण जिसे ईशान दिशा भी कहते हैं । ज्ञान की कीमत आचरण से होती  है । ज्ञान वह नहीं जो आप बड़े-2 ग्रन्थों में पढ़ते हो । कबीर ने कहा कितनी भी पोथियां पढ़ लो कोई पंडित नहीं होता । पंडित तो वही है जो अपनी प्रज्ञा को जानता है और परमात्मा से प्रेम करता है । जिनवाणी माता ना होती तो हमारे भीतर वैराग्य की संतान जन्म कैसे लेती ? माता की कीमत भी शलाका पुरूषों से है । कहा भी है-

जननी जने तो भक्तजन या दाता या शूर नहीं तो जननी बांझ रहे, काहें गवायें नूर । 

माता को चाहिए कि वो अपनी संतान को भक्त-रूप, दाता रूप या फिर शूरूवीर  बनायें । भक्त ऐसा जैसे प्रह्लाद थे, रोम-रोम में प्रभु का नाम बसा था । जैसे भीलनी हर पल राम को पुकारती थी ।जैसे मीरा को हर समय कृष्ण नजर आते थे । सही भक्ति करो परमात्मा मिल जाएगा । प्रभु नाम के समक्ष सब कुछ प्राप्त होता है, प्रभु ने जो कहा उसका अनुसरण करो । प्रभु ने जो किया उसका अनुसरण करो । ध्यान, भेद-विज्ञान प्रभु ने अपनाया गहरे कर्म तोड़ने के लिए प्रबल इच्छा शक्ति आवश्यक है और संकल्प भी आवश्यक है । इस संसार को दाताओं की भी आवश्यकता है जैसे भामाशाह जिन्होंने अपनी सारी सम्पत्ति देश के लिए कुर्बान कर दी थी । जैसे दानवीर कर्ण जो अपने घर से किसी को खाली नहीं जाने देता था । समय आने पर अपने कवच-कुण्डल भी दानरूप में दे दिये । शूरवीर भगतसिंह, गुरूगोबिन्दसिंह ने अपनी जान गंवाकर भी धर्म की रक्षा की । यह सब माता पिता के संस्कारों से ही संभव है । तुम्हारा बैटा भक्त, दाता, शूरवीर, धर्मवीर, कर्मवीर  हो ।

इस श्लोक में कहा है- ऐसा पुत्र जनों जिसके पांच कल्याणक हो । गर्भ कल्याणक, जन्म कल्याणक, दीक्षा कल्याणक, केवलज्ञान कल्याणक और निर्वाण कल्याणक । कल्याणक कल्याण स्वरूप है । प्रभु के हर कल्याणक से तीनों लोकों में एक अजीब शांति फैलती है । माता ऐसी प्रार्थना करें प्रभो ्! मुझे ऐसी योगयता देना कि मेरा बेटा धर्मवान, भक्त   हो । भगवान की पूजा भक्ति करने वाला हो । मां अपना जीवन संतान के लिए लगा देती है । गर्भ धारण से माता को धर्म-धारण करना चाहिए । भगवान के चित्र का दर्शन करना चाहिए । चित्र दर्शन से भीतर आहल्लाद और आनंद की प्राप्ति होती है । पुरूष का चित्त पर्वत के समान है और नारी का चित्त घाटी के समान है । बरसात पर्वतों पर होती है परन्तु पानी घाटी में ही इकट्ठा होता है ।

पुरूष में अहंकार है तो स्त्री में भक्ति है । पुरूष में सहनशीलता नहीं परन्तु स्त्री में सहनशीलता है । स्त्री में संतोष भी है । भगवान को दाढ़ी मूछ नहीं होती ऐसा क्यों ? क्योंकि दाढी मूछ अहंकार का प्रतीक है और प्रभु में अहंकार नहीं है  । उनका चिŸा स्त्रेण चित्त है । शरीर पुरूष का है परन्तु भीतर की भावनाएं स्त्री जैसी है । स्त्रेणचित्त शान्त होता है । दोनों के स्वभाव में भिन्नता है । भगवान को अनेक उपसर्ग आ जाएं वे सहन कर लेते हैं । स्त्री के स्तन में दूध होता है भगवान का खून दूध जैसा सफेद होता है । तीर्थंकर का यह अतिशय ही है । पत्नी हर बात को स्वीकार कर लेती है चाहे पति कितना भी बुरा हो । पुराने जमाने में पति का स्वर्गवास होते ही पत्नी को सति बनना पड़ता था । यह प्रकृति का नियम था आज ऐसा नहीं है ।

स्त्री में माया है इसलिए वहां कर्म बंधन भी है । देश की आजादी के लिए जितने पुरूष लड़े उतनी स्त्रियां नहीं । स्त्री देह संस्कार की दात्री है । बेटा बुरा भी हो मां उसे छाती से लगाती है । ऐसी ही एक सत्य घटना है सति मदालसा की जिसने अपने सात बेटे धर्म पर कुर्बान कर दिये और आठवे बेटे को भी धर्म की ही शिक्षा दी । वह आठ पुत्रों को जन्म देने वाली थी फिर भी सति कहलायी । मदालसा राजकुमारी थी जब उसकी शादी हुई तो उसने एक शर्त रखी कि आने वाली संतान को संस्कार मैं ही दूं । जब बेटे का जन्म होता है तो वह जन्म से ही उसे धर्म के संस्कार देती है । उसके कानों में शुद्धता, बुद्धता के उपदेश देती   है । कहते हैं उसने सात बेटों को दस पन्द्रह साल की उम्र में ही सन्यासी बना दिया । अब राजा को मुसिबत आयी उसने मदालसा के समक्ष प्रार्थना की कि होने वाला बेटा मेरे लिए हो क्योंकि मेरा वंश चलाने वाला भी कोई चाहिये । इस पर माता ने आठवा पुत्र राजा को प्रदान किया परन्तु उसे सात बेटों की तरह ही शिक्षा प्रदान की । पुराने जमाने में युद्ध हुआ करते  थे । छोटे-2 राजा आपस में लड़कर पृथ्वी पर अधिकार जमाते थे । 

माता ने उसके राजा बनने पर उसे एक ताबीज दिया और कहा बेटे जब विपत्ति का समय हो तब यह ताबीज देख लेना तुम्हारे काम आएगा । एक बार युद्ध चल रहा था और युद्ध में वह बेटा घबरा गया उस समय माता की बात याद आयी और उसने ताबीज खोला । ताबीज में लिखा था ‘शुद्धोसी बुद्धोसी निरंजनों सी तजमोह निद्रा मदालसा वाक्यं उवाच पुत्रम्’ इतना पढ़ते ही पुत्र को नश्वर देह का ध्यान हुआ और युद्ध किसी भांति टल गया । बेटा सन्यासी बन गया यह सब धर्म के ही संस्कार है । धर्म का ही प्रभाव है । आप भी अपने पुत्रों को धर्म के संस्कार दें । 

 

मृत्युंजयी बनने के लिए अरिहंत भक्ति करें

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

18 अक्टूबर, 2006: जम्मू: युग पुरूष, जैन धर्म दिवाकर, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि:-  आचार्य मानतुंग युग पुरूष आदि तीर्थंकर आदिनाथ भगवान की स्तुति करते हुए कहते हैं,    हे मुनिश्वर ! मुनिजन आपको सूर्य के समान निर्मल मानते हैं । यहां पर आचार्य ने चार उपमाओं से प्रभु को उपमित किया है । प्रभो ! आप सूर्य सम तेजस्वी हो । प्रभो आप परम पुरूष हो । प्रभो आप निर्मल हो । प्रभो आप मृत्युंजयी हो । जो व्यक्ति धर्म में रहता है, मैत्री और करूणा की भावना भीतर रखता है वह तेजस्वी और कांतीवान रूप का धारक होता है । ऐसे तो रूपवान बहुत होते हैं । देवलोकों के देवेन्द्र और षट्खण्डाधिपति चक्रवर्ती रूप लावण्य से परिपूर्ण होते हैं परन्तु उनसे भी अधिक गुणा सुन्दर हैं अरिहंत भगवान । चक्रवर्ती की दो गति शास्त्रों में बतलायी है । चक्रवर्ती धर्म करें तो मोक्ष में जाएं और संसार भोगे तो नरक में   जायें । इसलिए कभी सुन्दरता का अभिमान मत करना । सुन्दरता को और सुन्दर नहीं   बनाना । तुम्हारा पुण्य था इसलिए तुम्हें ऐसा रूप मिला । अब इस पुण्य को अधिक खर्च ना करते हुए भीतर से सुन्दर बनो । 

वीतराग प्रभु की भांति बनो क्यों वे ही तुम्हें मुक्ति दे सकते हैं । मुक्ति वहीं हैं जहां सरलता है । महाविदेह क्षेत्र के लोग सरल हैं, मन वचन काया के एकरूप हैं । भरत क्षेत्र के जीव वक्र है । उनके मन, वचन, काया में एकता नहीं है । वे गलती को स्वीकार नहीं करते । आप गलती को स्वीकार कर लोगे और जो हो रहा है उसे उसी रूप में स्वीकार करोगे तो मुक्ति के नजदीक हो जाओगे । जो-जो भी कर्म आज तक किए हैं उनका प्रायश्चित कर  लो । प्रायश्चित नहीं करोगे तो गति बिगड़ जाएगी । गति बिगड़ने पर पता नहीं कहां जाना पड़े । तिर्यंच गति में जाने के चार कारण हैं माया करें, माया पर माया करें । खोटा तोल करें, खोटा माप करें, कभी माया मत करना । माया मित्रता का नाश करती है । प्रभु जैसे निर्मल बन जाना । उनके जैसा निर्मल इस दुनियां में और कोई है ही नहीं और इस दुनियां में अरिहंत ही मोक्ष दे सकते हैं । 

अरिहंत की जो भक्ति सेवा करता है वह मृत्यु पर विजय प्राप्त करता है । संसारी जीव निर्वाण से कोसो दूर है । अरिहंत निर्वाण के नजदीक है । इस पृथ्वी पर अकेला कोई नहीं आया । हम सभी कहते हैं कि हर जीव अकेला आता है परन्तु कोई जीव अकेला नहीं आया । सब अपने पाप की गठरी को साथ लेकर आए । जो कभी दिखाई नहीं देती । देखो आप कोई बच्चे जिद्दी होते है ंऔर कोई बच्चे सरल हाते हैं । कोई बच्चे धर्म को स्वतः अंगीकार करते हैं कोई धर्म की ओर जाना नहीं चाहते यह सब उनके कर्म ही है । हमारी एक ही प्रार्थना हो हे भगवन मैं इस जन्म से जाऊँ तो शुद्ध होकर जाउं । बर्तन मैला है तो कहने से साफ नहीं होगा उसके लिए पुरूषार्थ करना होगा । कर्म-क्षय के लिए भी पुरूषार्थ आवश्यक है । प्रभो ! आप परम् पुरूष हो । परम् पुरूष इसलिए कि आपने चार कर्म क्षय कर लिये । आपकी भक्ति करने से व्यक्ति निर्मलता की ओर अग्रसर होता है । अभी हमारे में मलीनता है कर्मों की मलीनता हमें नीचे ले जा रही है, उसके लिए ध्यान रूपी साधन और प्रार्थना रूपी जल आवश्यक है । 

कुदरत का कानून एक जैसा है जो आया है उसे जाना होगा । तुम भक्ति और प्रार्थना करोगे तो तुम्हें मुक्ति मिलेगी । चैबीस घण्टे में कुछ समय निकालो । जब सांसारिक चीजें हमें प्रभावित कर सकती है तो प्रभु क्यों प्रभावित नहीं करते । मृत्यु का भय हर व्यक्ति को   है । सबको संसार चाहिए कोई मरना नहीं चाहता और संसार परिभ्रमण का कारण भी जीवैषणा   है । हर व्यक्ति जीना चाहता है । सूअर विष्ठा में सुख मानता है । बीमार व्यक्ति मृत्यु शय्या पर पड़ा हुआ भी उसी में ही सुख मानता है । गंदी नाली का कीड़ा उस गंदगी में ही रहना चाहता है । केवल मानव की ही बात नहीं हर जीव जीना चाहता है । मौत से बचने का एक ही उपाय है हम सम्यक् भक्ति, सम्यक् प्रणाम, परम प्रार्थना करें । अल्लाह, वाहे गुरू, राम, महावीर सब एक ही है । सम्यक्ता को प्राप्त करने पर सम्यक् दर्शन की प्राप्ति होती है । आज लोग जन्म कुण्डली बनाते हैं । वह जन्म-कुण्डली जन्म-कुण्डली नहीं मरण-कुण्डली है क्योंकि उसके अन्दर वो ही बातें लिखी हुई है जो इस जन्म में आपके मरण तक घटित होने वाली है । पंडित को कुण्डली दिखाने जाते हो तो वह हमेशा अच्छी बातें ही आपको सुनाता है क्या आपके जीवन में हमेशा अच्छा ही घटित होता है ? जीवन में तो बुरा भी घटता है इसलिए उसे जन्म-कुण्डली नहीं कहा जाएगा । हम कुण्डिलयों में ना विश्वास रखते हुए प्रभु से प्रार्थना करें । पंडित मरण की मांग करें । मृत्यु से डरना क्यों ? मृत्यु तो संहारक, संवारक है ।  दीवाली के तीन दिन अधिकाधिक साधना करें । धर्म की आराधना  करें । मोक्ष लक्ष्मी को ग्रहण करें । शुद्ध सामायिक, ध्यान, मौन, प्रार्थना करें और जितना हो सके दान, शील, तप की आराधना करें । जो भाई तेले की आराधना कर सकते हैं वे तेले की आराधना अवश्य  करें । 

 

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

23 अक्टूबर, 2006: जम्मू: युग पुरूष, जैन धर्म दिवाकर, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- महाप्रभु आचार्य मानतुंग ने अनंत भक्ति असीम श्रद्धा अटल विश्वास के साथ प्रभु का गुणगान किया है । उपासना अर्चना में वो दिव्य शक्ति है जो उपासना अन्तर्मन से करता है वह शीघ्र ही मोक्ष जाता है क्योंकि जैसा चिन्तन होता है जैसे भसाव हाते हैं वेसे ही हमारे कर्मों का बन्ध भी होता है और कर्मों की निर्जरा भी होती है । आचार्य मानतुंग प्रभु की भक्त् िमें तल्लीन होते हुए कह रहे हैं, हे प्रभु ! आपका चिन्तन करते ही हमारी मलीनता नष्ट होती है । आपके कीर्तन से जन्म-मरण से छुटकारा मिल जाता है मौत अवश्यंभावी है परन्तु परमात्म सिद्ध प्रभु की सम्यक् भक्ति से सम्यक् प्रणाम से सम्यक् गति की प्राप्ति होती है । मोक्ष की प्राप्ति होती है । 

मनुष्य अज्ञान के कारण क्षणिक सुख के लिए अनंत दुःख को प्राप्त होता है। धन में सच्चा सुख नहीं है । धर्म में ही सच्चा सुख है । समाधि में रहकर संकल्प करो, मुझे मोक्ष जाना है । मृत्यु से बचने का एक ही उपाय है भक्त् िऔर ध्यान । मौत के डर से व्यक्ति धर्म, पुण्य करता है । मृत्यु न होती तो इन्सान प्रेम, करूणा, दान, पुण्य कुछ भी न करता इसलिए मृत्यु अमंगल नहीं मंगल है । मृत्यु अपवित्र नहीं पवित्र है । मृत्यु जीवन का अन्तिम निचोड़ है सार है तत्व है अर्थ है । किसी से न वैर करो न प्यार करो, सिर्फ परमात्मा से प्यार  करो । राग का त्याग करो प्रेम का मार्ग अपनालो तभी जीवन सफल होगा ।

 

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

25 अक्टूबर, 2006: जम्मू: युग पुरूष, जैन धर्म दिवाकर, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- आचार्य मानतुंग आदि तीर्थंकर ऋषभदेव की हृदयस्थल में अंकृरित भावों को अनेक उपमाओं से उपमित किया है । आचार्य मानतुंग फरमा रहे हैं- प्रभु आप तो केवलज्ञान स्वरूप हैं । कर्म कलिमल से रहित हैं क्योंकि अरिहंत स्थिति सर्वोच्च इसीलिए जो अरिहंत बनना चाहता है उसे अरिहंत के गुण कीर्तन करना आवश्यक है क्योंकि अरिहंत बनने के लिए बहुत तपस्या करनी पड़ती है बहुत साधना होती है तब जाकर ऐसे महान् पद को प्राप्त करते हैं । सारे दुःखों से पार होने का मार्ग वीतराग-मार्ग है धर्म का मार्ग है । जैसे कहीं जाने के लिए टीकट जरूरी है उसी प्रकार संसार सागर से पार होने के लिए परमात्म के नाम का भक्ति का टिकट लेना जरूरी है । प्रभु का नाम मधुर है जो भी जाएगा उसी का संसार से बेड़ा पार होगा । ध्यान ही केवलज्ञान पाने का मार्ग है । साधना का मार्ग निर्मलता का मार्ग है सुन्दरता का मार्ग है । सुन्दरता वही है, जहां न राग है न द्वेष है । राग द्वेष वहीं नहीं है जहां वीतरागता है । 

 

धर्म मंगल है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

25 अक्टूबर, 2006: जम्मू: युग पुरूष, जैन धर्म दिवाकर, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- आचार्य मानतुंग आदि पुरूष, आदि कर्Ÿाा ऋषभ प्रभु को ब्रह्मा, विष्णु, महेश कहकर स्तुति कर रहे हैं । आप देवताओं के भी देवता हैं । वीतराग प्रभु वीतराग धर्म जन-जन के जीवन में आ जाएं ऐसी मंगल कामना करते हैं । वीतराग धर्म जीवन में आ जाएं तो कहीं भी जाने की आवश्यकता नहीं ।

शरीर का मंगल हम बहुत बार करते हैं पर जब आत्मा का मंगल होता है तो शरीर के मंगल की आवश्यकता नहीं रहती । धर्म मंगल है, आत्मा भी मंगल है । अगर हम किसी की निन्दा करते हैं, झूठ बोलते हैं तो वहां धर्म नहीं होता । धर्म कहता है कि सभी को समान रूप से देखो । वास्तव में मंगल वही है जो हमारे अहंकार और ममकार को मिटा दे । धर्म प्रतिपल-प्रतिक्षण हमारे जीवन में सहजता लेकर आता है । अहंकार से शून्य करता   है । जब जीवन में धर्म आता है तो कुछ भी सांसारिक वस्तुओं को छोड़ना नहीं पड़ता, स्वयं ही छूट जाता है । 

जैसे सर्प कांचुली को त्याग देता है । प्रकृति का सारा नियम अपने आप चलता है । जब सूर्य अपने आप निकलता है । हम एक श्वांस भी खुद नहीं ले सकते, इसीलिए सुबह उठकर प्रभु का शुक्रिया अदा करो । प्रभु तूने आज का दिन हमें प्रदान किया है । जब धर्म जीवन में आता है तो सुख समृद्धि और सौभाग्य की प्राप्ति होती है । जो कभी ना घटे अपितु बढ़ती ही जाए वही सच्ची समृद्धि है ।

 

अरिहंत भक्ति सब कष्टों को दूर करती है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

30 अक्टूबर, 2006: जम्मू: युग पुरूष, जैन धर्म दिवाकर, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- एक ही पाठ एक ही गुरू इससे अधिक संसार में कुछ भी नहीं है । यदि चिन्तन, मनन, नमन करना है तो अरिहंत को करो वे वीतरागी हैं । उनके समक्ष कोई टिक नहीं पाया । स्वर्ग की अप्सराएं भी उन्हें डगमगा नहीं पायी । प्यार करना है तो अरिहंत से करो । आज हमारी स्थिति क्या है ? नवकार मंत्र पढ़ते हैं कोई फायदा नहीं हुआ तो फिर गायत्री मंत्र, फिर कुलदेवी जिसने जो कुछ कहा वैसा करते चले गए । अगर हमारी निष्ठा एक ही मंत्र, एक ही गुरू और एक ही पाठ पर हो तो हम भगवान तक जल्दी पहुंच जाएंगे । प्रभु के चरणों में वंदन इसलिए कि उन्हें अहंकार नहीं है । धर्म का द्वार है नमन । नमन नहीं आया तो कुछ भी नहीं । बाहुबली एक वर्ष तक कायोत्सर्ग में खड़े रहे । कायोत्सर्ग सबसे कठिन होता है । तुम कायोत्सर्ग करो । कायोत्सर्ग यानि शरीर को छोड़ देना । मोत आएगी तब तो शरीर को छोड़ना ही होगा । कायोत्सर्ग में अधिक निर्जरा होती है । कायोत्सर्ग का अभ्यास पंडित मरण के लिए लाभयदायक है । बाहुबली ने इतनी तपस्या की फिर भी वे कुछ प्राप्त नहीं कर पाए । बहिनों के उद्बोधन से जब पाँव वंदन के लिए उठे तो केवलज्ञान हो गया । 

आचार्य ने नमन इसलिए किया क्योंकि प्रभु तीन लोकों की पीड़ा को हरण करने वाले हैं । धर्म एक संजीवनी बूंटी है । एक व्यक्ति बुरे कर्म करता है, सातवी नरक तक पहुंच जाता है । धर्म की शरण लेता है तो मोक्ष भी प्राप्त हो जाता है । आपने तीनों लोकों की पीड़ा को हरण किया है । आप तीनों जगत के परमेश्वर हो । पृथ्वी के निर्मल आभूषण हो । भव-सागर को सुखाने वाले हो इसलिए आपको नमन । पूर्व में मैने कहा था कि प्यार करना है तो अरिहंत से करो । प्यार एक पवित्र शब्द है परन्तु आज की सदी ने उसकी परिभाषा ही बदल दी । अरिहंत सुख देने वाले हैं । कष्ट दूर करने वाले हैं । 

कष्ट तीन प्रकार के होते हैं । दैविक, दैहिक और भौतिक । दैविक कष्ट जो देवों के द्वारा दिए जाते हैं जिसे हम आज की भाषा में भूत प्रेत भी कहते हैं । दैहिक कष्ट शरीर का कष्ट है जो किसी दवा से मिटता ही नहीं । भौतिक कष्ट है सामाजिक कष्ट जिसके पास प्रतिष्ठा, पैसा नहीं है वह भूखा दर-दर भटकता रहता है । आचार्य कहते हैं इन तीनों कष्टों से दूर हुआ जा सकता है, आवश्यकता है धर्म-ध्यान की । ध्यान से चारों ओर सात्विक औरा फैलता है जिससे जीवन सुन्दर बनता है । जीवन के अन्दर धर्म की रेखा का उल्लंघन हुआ तो कष्ट की शुरूआत हो जाती है । सीता ने लक्ष्मण रेखा पार की तो कष्ट स्वतः ही चले जाए । रावण लक्ष्मण रेखा को पार नहीं कर सका । धर्म भी लक्ष्मण रेखा है । आप धर्म में रहो, धर्म का उल्लंघन ना करो । जीवन में कभी गलत निर्णय मत लेना । भावुकता में आकर लिया गया निर्णय गलत भी हो सकता है । 

आज गौ’-समिति के द्वारा गौशाला में हम सभी एकत्रित है । आज का गोपालाष्टमी का यह सुन्दर अवसर सभी कार्यकर्Ÿाा गाय की सेवा को मानव सेवा से बढ़कर बताते हैं परन्तु आज का मानव गाय की सेवा करने से कतराता है । भगवान कृष्ण ने गाय की सेवा की थी । कृष्ण की पूर्णता ही गाय में है । कृष्ण कहते हैं मेरे आगे, पीछे, दायें, बायें गायें ही हो । मैं बस गायों की बीच रहूं तो मेरा जीवन संवर जाएगा । भगवत् प्राप्ति में गाय की सेवा आवश्यक है । गाय एक सरल जीव है । सरल जीव मुक्ति का अधिकारी होता है । गाय की सेवा धार्मिक दृष्टि से भी उत्तम है । गाय को सामाजिक दृष्टि से मां कहा गया है । क्यों माँ कहा गया यह एक पूर्ण प्रश्न है । देखों जब भी गाय का बच्चा जन्म लेता है तब वह सर्वप्रथम माँ ही कहता है । गाय का बछ़ड़ा चुस्त होता है । गाय की सभी चीजें शरीर को सहायक होती है । गाय का दूध पीओ यह पौष्टिक होता है बुद्धि के लिए सर्वोत्त्म होता है । बच्चों के लिए गाय का दूध सबसे अच्छा है । गाय का दूध, मूत्र, गोबर सारी चीजें काम आती है । गाय के दूध से अनेकों बीमारियां ठीक हो जाती है । गाय का दूध स्वतः ही मीठा होता है । मानव स्वार्थी बन गया है वह दूध लेता है परन्तु चारा नहीं देता । मेरी सरकार से अपील है कि वे बूचड़खाने खुलवाने की जगह गौशाला खुलवाएं । प्राणी मात्र की रक्षा करें । माननीय विधायक श्री सधोत्रा जी एवं यहां उपस्थित सभी धर्मप्रेमी बन्धुओं को मेरा यही कहना है कि आप गौरक्षा करें । मूलदत्त शास्त्रीजी ने जो गौरक्षा की बात आप सबके समक्ष रखी है उसे हम जीवन में उतारंेगे तो गौ-रक्षा स्वतः हो जाएगी । 

 

सद्गुणों से परिपूर्ण है अरिहंत भगवान

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

1 नवम्बर 2006: जम्मू: युग पुरू