PRAVACHANMALA -CHD 2004

आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज का चण्डीगढ़ वर्षावास हेतु भव्य प्रवेश

 

श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर, ध्यान योगी, आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने डाॅ0 एम0एस0 जैन 92, सेक्टर 21 ए, चण्डीगढ़ के निवास स्थान से शोभा-यात्रा के रूप में प्रातः 8.15 बजे जैन स्थानक सेक्टर 18 डी, चण्डीगढ़ में वर्षावास हेतु भव्य प्रवेश किया । शोभा-यात्रा में श्री महावीर जैन युवक मण्डल के सदस्यों ने प्रभु महावीर के जयकारों के साथ आचार्यदेव का अनुगमन किया । श्री चन्दनबाला जैन युवती मण्डल की सदस्यों ने मंगल कलश लेकर आचार्यदेव की आगवानी की । श्री जैनेन्द्र जैन गुरूकुल के बच्चों ने पचरंगा ध्वज लहराकर प्रभु महावीर एवं आचार्यश्रीजी के जयकारों से अम्बर गुंजायमान किया । 

आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने मंगल प्रवेश पर अपनी मंगलमयी वाणी फरमाते हुए कहा कि- अरिहंत प्रभु की वाणी मंगल स्वरूप है । आज चण्डीगढ़ चातुर्मास हेतु मंगल प्रवेश हुआ । मंगल की स्थापना हुई । चतुर्विध श्रीसंघ मंगल स्वरूप है । प्रभु महावीर की वाणी ‘जीवो मंगलम्’ प्रत्येक जीव मंगल स्वरूप है । सत्संग जीवन में सत्य का संग कराता है । पाॅंच माह का समय । प्रतिदिन सत्संग आपके जीवन में अवश्य सत्य का संग कराएगा । यहाॅं पर चर्चा जीवनयोपयोगी विषयों पर होगी । चर्चा की शुरूआत हम मैत्री से करेंगे । मैत्री शुद्ध प्रेम है । मैत्री सबका मंगल करती है । मैत्री जीवन में आनंद लाती है । प्रभु महावीर की मैत्री श्रद्धा विनय हमें आराधक बनाती है । हम सबसे प्रेम संगठन मैत्री की बात    करें । इस वर्षावास में प्रभु महावीर के दो सूत्र हम अपनायें । पहला सूत्र परम विनय । आज की इस 21 वीं सदी में हम विनय को भूल गये हैं । हम मेरा कहकर अहंकार करते हैं । अहंकार हमें डूबोता है । हम यह सोचें कि सब कुछ प्रभु का है, अरिहंत का है । प्रभु महावीर का धर्म दर्शन का सार सूत्र भी यही है कि हम परम विनय में आ जायें और भीतर यह भावना रखें कि मैं कुछ भी नहीं जानता । हम हृदय से झुक जायें । जो झुकता है उसका जीवन निखरता है । हम वीतरागता की ओर आ जायें । अनुशासन श्रद्धा विनय संगठन से आगे बढ़ें यही हमारी हार्दिक मंगल कामना है । अंत में आचार्यश्रीजी ने चातुर्मास कमेटी के चेयरमैन श्री बी0डी0 बाॅंसल, प्रधान- श्री सुदर्शन जैन, प्रमुख मंत्री श्री पवन कुमार जैन, समाजरत्न श्री हीरालाल जी जैन, समाजरत्न श्री राधेश्याम जी जैन, श्री अरिहंत विश्व जी जैन-लुधियाना, श्री अभय कुमार जी जैन, मंगलदेश महासभा के प्रधान श्री बहादुरचंद जैन, महामंत्री श्री मोहनलाल जी जैन, उपाध्यक्ष श्री संदीप जैन एवं बाहर से आये सभी श्रावक श्राविकाओं को हार्दिक साधुवाद देेते हुए उनके क्षेत्र में हो रहे वर्षावास हेतु मंगल कामनाएॅं प्रेषित की । 

इस अवसर पर श्रमण संघीय मंत्री श्री शिरीषमुनि जी महाराज ने अपनी भावनाएॅं व्यक्त करते हुए कहा कि- आचार्यदेव ने प्रभु महावीर की साधना हेतु दीक्षा अंगीकार की थी और बीस वर्ष तक लगातार खोज करते हुए उन्हें वह साधना प्राप्त हुई, जो आप सभी को ‘आत्म: ध्यान साधना कोर्स’ के माध्यम से दी जा रही है । आप सभी इसमें अपना योगदान दें । आचार्यदेव उत्तर भारत से दक्षिण भारत की 25000  कि0मी0 की यात्रा करते हुए चण्डीगढ़ वर्षावास हेतु प्रवेश किया, इस अवसर पर मैं आचार्यदेव का हार्दिक अभिनन्दन करता हूॅं और यह आशा रखता हूॅं कि आप सभी चण्डीगढ़ निवासी इन पाॅंच माहों का पूर्ण उपयोग करते हुए अध्यात्म का मार्ग अपनाओगे । 

इस अवसर पर उप प्रवर्तिनी महासाध्वी श्री कौशल्या जी म0 ‘श्रमणी’ जिनका चातुर्मास भी आचार्यदेव के साथ चण्डीगढ़ होने जा रहा है । आपने भी आचार्यदेव का हार्दिक स्वागत करते हुए आपकी सरलता, सहजता को उद्धृत किया एवं आपके यहाॅ पधाारने पर हार्दिक अभिनंदन व्यक्त किया । इस अवसर पर भगवान महावीर भवन’ का उद्घाटन कंगारू इण्डस्ट्रीज के चेयरमैन श्री अरिहंत विश्व जी जैन के कर कमलों से सम्पन्न हुआ । श्री अभय कुमार जी जैन ने ध्वजा रोहण कर कार्यक्रम की शुरूआत    की । आचार्यश्रीजी का प्रवचन 1 जुलाई, 2004 से प्रतिदिन प्रातः 8.15 से 9.30 बजे होगा । आप सभी अमृतमयी वाणी का लाभ प्राप्त कर जीवन को सफल बनायें ।

 

गुरू पूर्णिमा उत्सव पर हम सब समर्पित हो जायें

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़ 2 जुलाई, 2004: आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- चातुर्मास का दूसरा दिवस आप सबके लिए मंगलकारी हो । आज गुरू पूर्णिमा है । गुरू शब्द भारतीय संस्कृति में बहुत महत्व रखता है । गुरू शब्द भारत की परम्परा में ऊॅंचा स्थान रखता है । इसका मूल्यांकन पाश्चात्य संस्कृति नहीं कर सकती । भारत में गुरू का सम्बन्ध आत्मीय सम्बन्ध है । सम्पूर्ण जीवन का सम्बन्ध है जिसे हम प्रत्यक्ष देख रहे    हैं । पुराने समय में गुरूकुल की परम्परा थी । शिष्य गुरू के पास रहकर ज्ञान के साथ व्यवहार भी सीखते थे । आज यह परम्परा लुप्त होती जा रही   है । गुरू शिष्य को भीतर में जोड़ता है । 

आज के इस पावनपर्व पर हम भूत, वर्तमान एवं भविष्य में होने वाले सभी गुरूओं को स्मरण करें । गुरू पूर्णिमा गुरूजनों का उत्सव है । गुरू वह जो आपके भीतर अंधकार को दूर कर दे और भीतरी शान्ति प्रदान करें । सद्गुरू की महिमा का गुणगान नहीं किया जा   सकता । उनके अनन्त उपकार हैं हम पर । अनेक व्यक्तियों के सृजनहार एवं पथ प्रदर्शक वही हैं । गुरू शब्द का शाब्दिक अर्थ भारी होता है । 

भारत की संस्कृति में माता पिता को भी गुरू के तुल्य माना है । प्रथम गुरू तो हमारी माॅं ही है जिसने अनेक कष्ट सहकर हमें जन्म दिया, अनेक संस्कार दिये । धार्मिक संस्कारों के बिना बच्चे की जिन्दगी अधूरी है । अगर एक माता चार साल तक बच्चे को धार्मिक संस्कारों के साथ व्यवहारिक ज्ञान कराये तो वह बच्चा अपने जीवन का साठ प्रतिशत शिक्षा पूर्ण कर लेता है । माॅं का जीवन तभी सफल होगा जब वह अपने बच्चों को धार्मिक संस्कारों से परिपूरित कर दे । बच्चा भी माॅं के चरणों में नमन कर आशीर्वाद प्राप्त करे । कृष्ण, राम एवं तीर्थंकर भगवन्त भी माता को नमन करते हैं । गुरू आपको सतपथ दिखलाता है । गुरू के प्रति इतना समर्पण होना चाहिए कि गुरू की बुराईयाॅं देखने से पूर्व हमारी आॅंखें चली  जाये । निन्दा सुनने से पूर्व कान चले जाये । अनन्त काल से हम चैरासी लाख जीव योनि में भटक रहे हैं । हमें इस मानव जीवन का सदुपयोग करना चाहिए । अपने स्वरूप का बोध करना चाहिए । गुरू भीतर का अनुभव देता है । गुरू चरणों में अहंकार कषाय आदि समर्पित कर दो तब आपका जीवन रूपान्तरित होगा । जप-तप की आवश्यकता नहीं, केवल गुरू का चरण पकड़ लेना, इससे मोक्ष की सीट रिजर्व हो जाएगी । गुरू चरणों में हम हृदय से झुकें । मेरा कुछ भी नहीं है । सब कुछ आपका    है । ऐसी भावना भीतर रखें । सेवा करें । जब तुममें नमन का भाव आ जाएगा तब जीवन सफल होगा । तब सच्चे सद्गुरू मिल जायेंगे । जब सद्गुरू मिल जायंेंगे तब जीवन रूपान्तरित हो जाएगा । वे तुम्हें आत्मज्ञान तक ले जाकर आत्म-बोध करायेंगे । 

आज के इस पावन अवसर पर हम गुरू पूजा करें । पूजा का मतलब अक्षत फूल चढ़ाना नहीं है अपितु गुरू के प्रति श्रद्धा समर्पण का है । 

 

सत्गुरू से सिद्धगति का मार्ग मांगो: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़ 3 जुलाई, 2004: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- जीवन की सफलता, शुद्धि नव निर्माण के लिए किसी सत्गुरू का सहारा लेना आवश्यक है । सत्गुरू की चरणरज ही मिल जाये, उनकी अंगुली पकड़कर हम चलें तो जन्मों-2 के बंधन टूट जाते हैं । सत्गुरू को वंदन करते हुए नरक के बंधन कट जाते हैं । छोटी-2 बातों में हम कर्म-बंधन कर देते हैं । कर्म बाॅंधने सरल हैं, कर्मों की निर्जरा करना कठिन है । मोह निद्रा को तोड़ने वाले सत्गुरू होते हैं । वह एक जागरूक चेतना है जिन्होंने भेद विज्ञान का ज्ञान पाया है, शरीर और चेतना की भेद रेखा को अलग किया है । सत्गुरू आत्मज्ञानी होते हैं उनकी वाणी अपूर्व होती है । 

कार्य करते हुए हम कर्ताभाव में जब आते हैं तब कर्म बंधन होते हैं । तुम कुछ भी कार्य करो तुम्हारी चेतना जागरूक रहे । बातचीत करते हुए या अन्य कोई कार्य करते हुए प्रभु सिमरन करो । यह भव पार करा देगा । अरिहंत भगवंतों ने शास्त्र में जो फरमाया उसके अनुसार जीवन व्यतित करने वाले एवं प्राणी मात्र की मंगल कामना करने वाले सत्गुरू होते  हैं । उनका कीर्तन  करो । कीर्तन यानि गुणगान करना । आचार्य मानतुंग ने भगवान आदिनाथ का गुणगान करते हुए 48 तालंे तोड़ डाले और मुक्ति के परम मार्ग पर वे चल पड़े । गुरू की भक्ति, सेवा सर्वश्रेष्ठ है । माॅं, पिता और गुरू एक ही होते हैं, बाकी सब इनके तुल्य होते हैं । 

शास्त्र में चार प्रकार के व्यक्तियों का वर्णन मिलता है ज्ञानी, अज्ञानी, मूढ़ और मुमुक्षु । ज्ञानी व्यक्ति हमेशा सीधी बात करता है । सीधी बात समझता है । अज्ञानी व्यक्ति हमेशा ज्ञानी के विपरीत चलता है । जो व्यक्ति मूढ़ होते हैं वे किसी भी बात को समझते ही नहीं और मुमुक्षु व्यक्ति शान्ति से सारी बात समझ लेते हैं । वे ज्ञान के आराधक होते हैं । ज्ञानी व्यक्ति से मुमुक्षु व्यक्ति के मार्ग पर हम चलें । गुरू कुछ नहीं करता, उसकी एक झलक से जीवन रूपान्तरित होता है । आत्मा को साधो, जीवन को शुद्ध बनाओ, गुरू से सिद्ध गति का मार्ग माॅंगों । गुरू के चरणों में जब संकल्प लिया है उसे हम पूरा करें । जीवन जाये पर संकल्प न जाये ऐसी भावना भीतर रखें ।   

 

अरिहंत के सिमरन से चित्त शान्त होता है: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़ 4 जुलाई, 2004: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- जीवन में एक संकल्प, श्रद्धा, निष्ठा, प्रार्थना आ जाये तो जीवन उज्ज्वलता की ओर अग्रसर होता है । जो परमात्मा की मर्जी, अरिहंत की कृपा, सिद्ध का आत्म-भाव, वीतराग-भाव, प्रभु महावीर की साधना आ जाये फिर जीवन में ओर किसी चीज की आवश्यकता ही नहीं । इससे जीवन शुद्ध से शुद्धत्तर, शुद्धत्तम होता चला जाता है । आवश्यकता है आज्ञा पालन की । गुरू नानक की समग्र वाणी का सार आज्ञा पालना है । उन्होंने अपनी वाणी में आज्ञा को शिरोधार्य करने पर विशेष महत्व दिया । 

प्रभु महावीर वीतरागी थे । उन्होंने दीक्षा से पूर्व वर्षीदान दिया । सब कुछ त्यागकर वीतराग मार्ग पर अग्रसर हुए । इन्द्र ने देव दुष्य वस्त्र प्रदान किया, फिर भी प्रभु ने नकारा नहीं । कुछ दिनों के बाद एक ब्राह्मण ने उस वस्त्र की याचना की । उस ब्राह्मण को आधा वस्त्र दान दे दिया, यह प्रभु महावीर का अपरिग्रह भाव है । प्रभु महावीर की अहिंसा, अनेकान्त सर्वोत्तम है । हम इसे जीवन में उतारें तो वर्तमान की कठिनाईयाॅ परिलक्षित नहीं होगी । 

आचार्यश्रीजी ने सत्गुरू की चर्चा को आगे बढ़ाते हुए कहा कि सत्गुरू सत्य, श्रेष्ठ और सर्वोपरि है । वह हमें सत्संग देता है । सत्संग अंधकार में प्रकाश है । ये शब्द बहुत कीमती है । सत्संग हमें रोशनी देता है, जिसके द्वारा हम अपने जीवन को अग्रसर कर पाते हैं । यह एक परम सुख है सत्गुरू की एक झलक से जीवन बदलने लग जाएगा । अगर हमारे भीतर अरिहंत का सिमरन चल पड़ें । हमें परमात्मा की याद आ जाये तो हमारा चित्त शान्त हो जाएगा । सत्गुरू के वचन सहज में भीतर ले आओ । श्रद्धा रखो । समर्पण में आ जाओ । सब कुछ गुरू चरणों में अर्पित कर दो । अहंकार को भीतर से निकाल दो । आचार्यश्रीजी ने अंत में धर्मप्रेमियों को सरल बनने की प्रेरणा दी । अपने व्यक्तित्व को निर्दोष बनाने की प्रेरणा दी । उन्होंने कहा कि ज्ञानी अगर एक मूर्त तक गुरू के साथ सत्संग करें तो वह धर्म रस पी लेता है । क्षण भर किया गया गुरू का सत्संग जीवन को धर्म-मय बनाता है ।  

सद्गुरू का संग आने से मनुष्य जीवन महान् बनता है

 

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़ 5 जुलाई, 2004: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- सत्गुरू वह है जो हमें अंधकार से निकाल दे और प्रकाश से भर दे । गुरू के तीन प्रकार हैं- गुरू, सत्गुरू और परम गुरू । गुरू सत्गुरू के चरणों में पहुंॅचाता है और सत्गुरू परम् गुरू के चरणों में पहुंॅचाता है सत्संगत करने से ही सत्गुरू की प्राप्ति होती है । सत्गुरू को पाना चाहते हैं तो उस गुरू के प्रति दिल से जुड़ना होता है । हाथ या शीश झुके या न झुके मगर हमारा हृदय झुके दिल से जुड़े, तब कहीं जाकर सत्गुरू या उस परम गुरू के दर्शन होते हैं । उनकी कृपा का प्रसाद हमें मिलता है । सत्गुरू को समझने और देखने के लिए एक जौहरी के समान पैनी दृष्टि चाहिए, श्रद्धा की आॅंख चाहिए । सत्गुरू के चरणों में अगर हम हृदय से पहुंॅचते हैं तो मोक्ष की मंजिल मिलती है । सत्गुरू की संगति हमें ज्ञान देती है, आनंद की वर्ष करती है और जीवन को परम शान्ति से भर देती है । जैसे नदी के किनारे वाले वृक्ष लहराते हैं और मरूस्थल के वृक्ष सूख जाते हैं ये सब उस स्थान का ही प्रभाव होता है । इसी प्रकार मनुष्य के जीवन में भी संगति का बहुत बड़ा महत्व है । जैसे एक ओस की छोटी सी बूंद स्वाति नक्षत्र होने पर सीप के मुंह में गिरे तो मोती बनता है वही बूंद केले के पत्त्ेा पर गिरे तो कपूर और मिट्टी में गिरे तो उसका अस्तित्व ही समाप्त हो जाता है । इसी प्रकार मनुष्य का जीवन भी सत्संगति के बिना अधूरा है । राजा अशोक महान् कब बना जब वह भगवान बुद्ध के चरणों में  पहुंॅचा । सत्गुरू के चरणों में पहुंॅचकर ही मनुष्य का जीवन महान् बनता है । 

धर्म जन धर्म है: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़ 6 जुलाई, 2004: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- जैन धर्म जन धर्म है जैन धर्म आत्म धर्म है, आत्मा को निर्विकार शुद्ध और प्रांजल करने का पावन सªोत है । जैन धर्म का अटल सिद्धान्त है ‘अप्पा सो परमप्पा’ आत्मा ही परमात्मा है । आत्म का परमात्मा स्वरूप बनाने में सत्गुरू का परम सान्निध्य जरूरी है । 

प्रभु महावीर ने साधु और श्रावक दो धर्म फरमाया है- साधु वह है जो कंचन कामिनी का त्यागी होता है और श्रावक वह है जो अपने कर्तव्य को निभाते हुए धीरे-धीरे कंचन कामिनी से युक्त होकर अपने कदम लक्ष्य की ओर अग्रसर करता है । इतिहास ने उन लोगों की पूजा की है जिन्होंने इन सांसारिक वस्तुओं का त्याग किया है । त्याग की भावना कब बनती है जब हम मंगल के भावों से भरते हैं । हर धर्म का कोई न कोई मंत्र होता है । मंत्र हमें नमन के भाव से जोड़ता है । मंगल के भावों से भरा ऐसा सुन्दर संयोजन है, ऐसी पवित्र धारा हेतु जो जीवन को मंगलमय बनाता है । आचार्य भगवन ने फरमाया कि घण्टों मंत्र उच्चारण करने से वह लाभ नहीं हो सकता जबकि मंगल के भावों से भरकर पढ़ा गया एक मंत्र ही चारों ओर मंगल ही मंगल करता है । वैज्ञानिक दृष्टिकोण से मंत्र का महत्व मंगल भावों का महत्व बताते हुए फरमाया कि मांगलिक भावों से भरपूर व्यक्ति और अमांगलिक भावों वाला व्यक्ति आस पास के वातावरण को किस प्रकार प्रभावित करता है । मानव मात्र को ही नहीं सम्पूर्ण प्राणी जगत को प्रभावित करता है । शुद्ध और पवित्र-भावों वाले व्यक्ति का आभामण्डल पवित्र होता है जबकि हिंसक या अस्थिर चित्त वाले मनुष्य का आभामण्डल आस पास के वातावरण को भी दूषित करता है । मंगल का अर्थ है ममकार, अहंकार का त्याग दे और ओमकार की ओर जोड़ दें ।

बूंद को सागर में मिलाने की प्रक्रिया है नमस्कार

 

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़ 7 जुलाई, 2004: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- नमस्कार मंत्र के तीन अर्थ हैं शाब्दिक, भावात्मक और आत्मिक । शाब्दिक अर्थ नमस्कार का है नमस्कार करना- भावात्मक अर्थ है भावों से जुड़ना और आत्मिक अर्थ है चैतन्य से जुड़ना । चैतन्य को समझने के लिए चैतन्य के दर्शन करने के लिए चैतन्य को समझने की आवश्यकता होती है, उसे नमन करने की जरूरत होती है । जैसे लोक व्यवहार में एक आॅफिसर से मिलना हो तो पहले उसे हम हाथ जोड़कर अभिवादन करते हैं । अन्दर से नहीं तो बाहर से उसके साथ जुड़ते हैं । फिर उस चैतन्य से परम चैतन्य को पाने के लिए हमें झुकना होगा । जीवन को जानने के लिए परम जीवन से जुड़ना होगा । सत्य को समझने के लिए परम सत्य से जुड़ना होगा । इसी प्रकार नमस्कार हमें जोड़ता है, प्रभु से शान्ति से, प्रेम से, आनंद से । जब कोई भी व्यक्ति क्रोध के क्षण में होता है, विभाव में होता है तो वह जुड़ता नहीं टूटता है - अलग होता है जबकि नमस्कार के क्षण में व्यक्ति जुड़ता है । नमस्कार करते ही हमारे हाथ जुड़ जाते हैं । इसी प्रकार जब हम मंत्र नमस्कार का उच्चारण करते हैं तो हमारी चेतना भी उस परम चेतना की ओर जुड़ने के प्रयास में होती है । नमस्कार मंत्र का पहला सूत्र है हृदय से जुड़ना । अपने आपको मिटाने की क्रिया है । नमस्कार मंत्र बूंद को सागर में मिलाने की प्रक्रिया   है । नमस्कार अहं को छोडकर अर्हं में जाने की प्रक्रिया है । नमस्कार स्वयं को मिटाकर खुद को मिटाकर खुदा से मिलने का सेतु है । नमन उनको करते हैं जिन्होंने जो पाना था पा लिया, जानना था जान लिया । उसी परम् सत्ता को पाने के लिए नमन करते हैं । 

 

ऊॅं पंच परमेष्ठी का वाचक है: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

8 जलाई, 2004: श्री एस0 एस0 जैन सभा, सेक्टर 18 डी, चण्डीगढ़ में विराजमान तीर्थंकर तुल्य, मैत्री के मसीहा, ध्यान-योगी, जन जन के आराध्य भगवन, आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने भव्य-सुभव्य नयानाभिराम पाण्डाल के मध्य भावुक-जनमेदिनी के समक्ष अपनी पीयूषवर्षिणी मन्दाकिनी प्रवाहित की । पूज्यश्री ने ‘ऊॅं’ शब्द को सर्व धर्मों में समान रूप से व्याख्यायित किया । ’ऊॅं’ शब्द पंच-परमेष्ठी का वाचक है, ऊॅं एक शुद्ध ध्वनि  है । ऊॅं शाब्दिक प्राणायाम है । हमारे शरीर का शुद्धिकरण करके समस्त रोगों को शान्त करता है । ऊॅं के उच्चारण से पूर्व हमें मंगल-मैत्री की पवित्र-भावनाओं से ओत-प्रोत होना चाहिए । विशेष-रूपेण बहनों को रसाईघर में मंगल की भावनाओं से सराबोर होना परमावश्यक है ।  

पूज्यश्री ने ‘णमो अरिहंताणं’ के सिमरण पर विशेष बल दिया । अरिहंत को नमन करने से पूर्व हमारा चित्त अपूर्व आनंद से भरपूर होना चाहिए । अरिहंत की प्रतिमा नहीं वरन् अरिहंत के गुणों को समक्ष लाकर नमन करना श्रेयस्कर है । हमें जीवन में छोटी-2 बातों में मैत्री से भरा होना चाहिए- जैसे किसी को चम्मच पकड़ाना हो तो मध्य भाग से पकड़ाना चाहिए । विवेकानंद जब धर्म-प्रचार के लिए विदेश जाने लगे तो माॅं ने आशीर्वाद देने से पूर्व परीक्षार्थ नरेन्द्र से चाकू माॅंगा नरेन्द्र ने फलक माॅं को पकड़ाई व अग्र-भाग अपने हाथ में रखा, यह देखकर माॅं गद्गद् हो गई और कहा बेटा ! तेरे भीतर मैत्री है, आत्मीयता है, जा तेरी चहूं ओर जय-विजय होगी । 

 

जीवन के दो मार्ग संघर्ष और समर्पण: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़ 9 जुलाई, 2004: विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- अरिहंत प्रभु, वीतराग प्रभु, अनंत ज्ञान, अनंत दर्शन के धर्ता हैं । अरिहंत, परमात्मा, सर्वज्ञ कहो बात एक ही है । अरिहंत भगवान् को नमन करते हैं, वंदन करते हैं और अपने भीतर में रहेे हुए सम्पूर्ण अहंकार विषय कषाय को प्रभु के चरणों रखकर स्वयं हल्के हो जाते हैं । जब अरिहंत के भावों में बह जाते हैं, और वीतराग प्रभु के चिन्तन और मनन में खो जाते हैं तो हम सब तरह की बुराईयों से निवृत हो जाते हैं । आचार्य भगवन् ने फरमाया कि जब हम उस परमात्मा का चिन्तन करते हुए स्वयं की तुलना करते हैं तो एक विशाल प्रकाश के समक्ष स्वयं को जुगनू के समान पाते हैं जो परम शान्ति और क्षमा का धारक हैं उनके चरणों में अपने सारे पुण्य और पाप अर्पित कर दो । प्रभु से कहो विनती करो कि प्रभु ! मैं तो भिखारी हूॅं और आपके चरणों में भीख माॅंगता हूॅं । प्रभु आपके द्वार पर आया हूॅं धीरे-2 ऊपर उठा लो । इस प्रकार किया गया नमन जन्मों जन्मों के बन्धन काट देता है । प्रभु आपके चरणों में समर्पित हूॅं । 

जीवन में दो मार्ग हैं - संघर्ष और समर्पण । संघर्ष के आस्तित्व में व्यक्ति जो भी करें अपनी इच्छा से करना चाहता है जबकि समर्पण में जो कुछ अमीरी, गरीबी, सुख, दुःख है सब कुछ प्रभु के चरणों में समर्पित करता है, पर संघर्षशील व्यक्ति जीवन में जो अर्थपूर्ण है जो जीवन को शुद्ध और पवित्र करता है जीवन को ऊॅंचा उठाता है, उसे भूल जाते हैं । जिसका चित्त अरिहंत की भक्ति में लग जाता है उसका जीवन सफल हो जाता है । उसका जीवन बदल जाता है । दुनियाॅं किसी को भी छोड़ती नहीं है । दुनियाॅं महापुरूष पर भी अत्याचार करती आई है । इतिहास इस बात का साक्षी है सुकरात को जहर दिया मंसूर के हाथ काट डाले । महावीर के कानों में कीले ठोके । इसलिए दुनियां। की परवाह मत  करो । स्वयं सत्य के मार्ग पर चलें । दुनियाॅं को छोड़ अरिहंत की शरण में आओ ।    

 

जीव से शिव बनने की प्रक्रिया है- भक्ति: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी म0

चण्डीगढ़ 10 जुलाई, 2004: विश्व मानव मंगल मैत्री के प्रणेता श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- अरिहंत प्रभु को नमन करने का तात्पर्य है अरिहंत प्रभु की वीतरागता को नमन करना । उनकी शुद्धता और निर्मलता को नमन करना । प्रभु के अतिशय को नमन करना । 

अरिहंत को नमन करके हम अपना सीधा सम्बन्ध, सीधा सम्पर्क अपने प्रभु से जोड़ लेते हैं । नमन जोड़ता है, जीवात्मा परमात्मा कैसे बने ? जीव शिव कैसे बने ? जीव की शुद्धि कैसे हो । इसका उत्तर है वीतराग प्रभु का ध्यान अरिहंत प्रभु का चिन्तन उनकी भक्ति । हमारी यात्रा की शुरूआत अरिहंत से होती है । अरिहंत ही अपने शुद्ध ज्ञान के द्वारा तीनों लोक को प्रकाशित करते हैं । वे सभी के प्रति वात्सल्य और करूणा भाव रखते हैं । चाहे कितना ही क्रूर या हत्यारा हो वे प्राणी मात्र के प्रति मैत्री भाव रखते हैं । हमारे और महावीर या अरिहंत में यही अन्तर है - हम पापी से घृणा करते हैं, पाप से नहीं । जबकि इसके विपरीत प्रबुद्ध आत्मा पाप से घृणा करते हैं, पापी से नहीं । हम एक बूंद सदृश्य हैं प्रभु तो सागर से भी विशाल हैं । एक बूंद सागर की तुलना कैसे कर सकता है । एक जुगनू सूर्य की समानता कैसे कर सकता  है । जुगनू कहे सूर्य को प्रकाश दूं ये कैसे संभव है । 

प्रभु से प्रार्थना करें प्रभु ! आपके थोड़े से गुण माॅंगता हूॅं । आपकी सुन्दरता और शुभ्रता की याचना करता हूॅं । हे करूणाशील भगवन् ! आप सदृश मुझे भी बना दें । इस प्रकार की प्रार्थना कीजिए । प्रभु आपने जीवन दिया, प्राण दिए, धन दिया सुख दिया, आॅंखों में देखने की रोशनी दी, शरीर दिया विचार दिए इतनी शक्ति दी क्या माॅंगू प्रभु आपसे यही मेरी अभ्यर्थना है- तेरी शरण मुझे मिले, तेरी कृपा के आशियाने तले मैं अपने लक्ष्य की ओर अग्रसर रहूॅं । 

आचार्यश्रीजी ने फरमाया- प्रभु को कृपा के लिए धन्यवाद करो । अगर कमी है तो स्वयं की अयोग्यता स्वीकार करो । प्रभु से कहो- प्रभु ! आपकी तो कृपा बरस रही है, मगर मुझमें पात्रता ही नहीं  है । बुद्ध और महावीर की भाॅंति संकल्पबद्ध होने के लिए सभी को भक्ति और साधना के मार्ग से जुड़ने के लिए आह्वान किया । 

 

ध्यान से तनाव, रोगमुक्त एवं चित्तशुिद्ध: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़ 11 जुलाई, 2004: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- संसार के सभी धर्मों ने आत्मा के अजर-अमर अस्तित्व को स्वीकार किया है । प्रभु महावीर की वाणी कहती है ‘अप्पा सो परमप्पा’ । हमारी साधारण जीव आत्मा ही शुभ संयोग पाकर सिद्ध बुद्ध और परमात्मा बनती  है । आत्मा तो शुद्ध स्वभाव वाली है । अनंत ज्ञान, अनंत दर्शन से परिपूर्ण है । ज्ञान हम स्वयं हैं- शान्ति हमारे भीतर है, फिर भी हम दुःखी और परेशान क्यों हैं ? अशान्त क्यों  हैं ? क्योंकि हम स्वभाव से हटकर विभाव में चले गए हैं । इसीलिए हम दुःखी है, परेशान   हैं । भगवान बुद्ध ने भी कहा है- ‘अप्पा दीपो भवः’ । बाईबल में भी कहा है- ‘मनुष्य संसार की दौलत को प्राप्त कर ले, अगर आत्मा को नहीं जाना तो कुछ भी नहीं पाया’ । जिसने आत्मा को जान लिया, उसने सब कुछ पा लिया । 

अरिहंत की भक्ति, सिद्ध का स्मरण करते हुए हम भी अरिहंत बन सकते हैं । अरिहंत बनने के लिए ध्यान साधना मैत्री करूणा आधारशीला है । अरिहंत की साधना का मूलाधार जैन शास्त्रों में ध्यान को कहा है- जैसे शरीर में सिर का मूल्य है, इसी प्रकार साधुओं का मूल धर्म ध्यान है । संसार में ऋषि मुनि खुश रहते थे क्या कारण था, इसका कारण है अपने भीतर में उतरने का आत्मा में अवगाहन करने का जब साधक भीतर में उतरता है तो वह आनंद की गंगा में अवगाहन करता है । उस अन्तर की अनुभूति को वह शब्द से प्रकट नहीं कर सकता । ध्यान केवल एकाग्रता नहीं है बल्कि अनतर की जागृति और विवेक है । ध्यान क्या है ? न अतीत का स्मरण, न भविष्य की कल्पना, न ही वर्तमान के साथ लगाव । स्वयं को जानना अन्तर के सभी रहस्य को प्रकट कर लेना ही ध्यान का लक्ष्य है । ध्यान साधना करने से व्यक्ति तनाव व बीमारियों से मुक्ति पाता है । आचार्य भगवन् ने आगे फरमाया कि- ध्यान करने से गूंगे बोल पड़े । बीमार व्यक्ति ठीक हो गए । साथ ही साधना शिविर में बैठे लोगों ने अपने सुन्दर अनुभव भी सभी के समक्ष रखे किस प्रकार शारीरिक और मानसिक लाभ ध्यान साधना शिविर से हो रहे हैं ।  

 

आहार और जीवन: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़ 12 जुलाई, 2004: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- हमारे जीवन के लिए भोजन का बड़ा महत्व है । भोजन के बिना शरीर चल नहीं सकता । जिस प्रकार गाड़ी को चलने के लिए पेट्रोल की आवश्यकता रहती है । पेट्रोल के बिना गाड़ी चल नहीं सकती उसी प्रकार शरीर को भोजन चाहिए । भोजन हम प्रतिक्षण कर रहे हैं । हम अपने आस पास के वातावरण से जो कुछ ग्रहण करते हैं वह एक प्रकार का भोजन या आहार ही ग्रहण करते हैं । पाॅंचों इन्द्रिय त्वचा मुंह नाक आॅंख और कान से जो ग्रहण करते हैं वह सब आहार हैं जैसे नासिका से सुगन्धित सूंघकर । हम अरिहंत की भक्ति में डूब भी सकते हैं और वही सुगन्ध लेकर भोग में भी डूब सकते हैं । ये चुनाव हमारा अपना है । भक्ति चुने या भोग । हम सत्गुरू के चरणों में बैठकर भी आहार ग्रहण करते हैं । वह आहार हमें विशेष प्रकार का सुकून देने वाला होता   है । जब माॅं बच्चे को कुछ पिलाती है तो वह अपने अन्तर की वात्सल्यमयी भावनाओं को प्रेषित करती है । माॅं शान्त है सुशील है तो उसका दूध पीने वाला बच्चा भी शान्त और गम्भीर होता है । जैसा आहार लेते हैं हमारी प्रकृति भी वैसी ही बनती है । आहार और शरीर का आपस के सम्बन्ध है क्योंकि जैसा खाइए अन्न वैसा होवे मन । आहार की तीन श्रेणियाॅं है तामसिक आहार, राजसिक और सात्विक । तामसिक आहार वाला तमस प्रकृति, राजसी आहार वाला राजसी और सात्विक आहार वाला सात्विक विचार और प्रकृति वाला होता है । मनुष्य शाकाहारी है उसे हमेशा सात्विक आहार ही लेना चाहिए ।  

 

भक्ति, सेवा निष्काम भाव से करें: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़ 13 जुलाई, 2004: विश्व मानव मंगल मैत्री के प्रणेता श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- जैन दर्शन नमस्कार से शुरू होता है । महामंत्र नवकार से लेकर लोगस्स नमोत्थुणं आदि पाठ भक्ति नमन और समर्पण को महत्व देता है । सबसे पहली बात विश्वास, श्रद्धा और निष्ठा की है । भक्ति करने से पहले अरिहंत को नमन कर स्मरण करना आवश्यक है । प्रभु की भक्ति प्रार्थना करने के पश्चात् माॅंगना क्या है- प्रभु से सिर्फ इतना ही माूंगना है भगवन् ! मुझे भक्ति दो शक्ति दो शुभ्रता दो । बालक कि भाॅंति निश्चल भाव से भक्ति करो । हमारी माॅंग सच्चे और पवित्र दिल से होनी चाहिए । अरिहंत को नमन किया और माॅंग की फैक्ट्री की । प्रभु से कहा- प्रभु मेरी फैक्ट्री अच्छी चले । मैं आपका मन्दिर बनवा दूॅंगा । छत्र चढ़ा दूॅंगा । इस प्रकार से अगर हमारी भक्ति के पीछे अपना स्वार्थ है तो हमारी भक्ति दो कौड़ी की नहीं । 

प्रभु महावीर कहते हैं कोई भी भक्ति करते हो तो इस लोक या परलोक की कामना लेकर मत करना । भक्ति, तप, जप, सेवा, दान कुछ भी करो निःस्वार्थ भाव से करना । अगर हमने मांग करके भक्ति की तो वह भक्ति वैसी ही होगी जैसे कोई हीरा बेचने जाए और कहे कि इसके बदले आम की टोकरी दे दो । प्रभु से कहो- हे प्रभु ! जो मिला है तेरा प्रसाद, तेरी कृपा कहना- प्रभु मेरा चित्त निर्मल हो जाए, राग द्वेष से मुक्त हो जाए । सुबह उठते ही प्रभु को दिल से धन्यवाद करो । आपकी बड़ी कृपा है आज का दिन मुझे मिला । पृथ्वी पर पैर रखने से पूर्व नवकार मंत्र का ध्यान करें, तत्पश्चात् माता पिता को प्रणाम करें ।  

 

अरिहंत सिद्ध बनना हमारा केन्द्र बिन्दु हो: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़: 14 जुलाई, 2004: विश्व मानव मंगल मैत्री के प्रणेता, जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज वर्षावास हेतु चण्डीगढ़ के सेक्टर 18 डी जैन स्थानक में विराजमान हैं । उनके मौलिक जीवनोपयोगी प्रवचन प्रतिदिन प्रातः 8.15 से 9.30 बजे तक हो रहे हैं । आज के प्रवचन में उन्होंने फरमाया कि- अरिहंत प्रभु को नमन करते हुए हमारे भाव इतने गहन हो जाएं- उनके गुणों का स्मरण करते हुए हमारे भीतर उनके गुण आ जाएं । उनके गुणों से हम प्रभावित हो जाए । बस नमन शब्द आ जाए तो हमारा मस्तक स्वतः ही झुक जाए । जिस व्यक्त् िसे हम प्यार करते, श्रद्धा रखते हैं उन्हें याद नहीं करना पड़ता । चाबीस घण्टे हर क्षण, हर पल वे हमारी स्मृति पटल पर अंकित रहते हैं । कोई ऐसी घटना हमारे साथ घटती है जो सुखद या दुःखद कुछ भी हो सकती है । वह घटना बीस साल पश्चात् भी ज्यों कि त्यों मानस पटल पर घर कर जाती है । क्या इसी प्रकार हम अरिहंत को परमात्मा को स्मरण करते हैं । क्या हमारे भीतर केवल अरिहंत रहते हैं । नहीं हमारे भीतर धन, क्रोध, विकार है फिर अरिहंत तो बाईपास हो जाते हैं । आज का व्यक्ति कहता है धन के बिना जीवन की गाड़ी कैसे चल सकती है । अरिहंत परमात्मा के बिना तो काम चल सकता है । आज हमारा केन्द्र बिन्दू अरिहंत नहीं बल्कि धन बन चुका है । जिस दिन अरिहंत सिद्ध परमात्मा हमारे केन्द्र बिन्दू बन जाएंगें हमें सब कुछ मिल जाएगा । बुद्ध, महावीर, राम ने दृढ़ संकल्प लिया कि हमें बोधित्व को पाना है और उन्होंने केवलज्ञान को पा लिया इसी प्रकार हम भी उनके अनुयायी हैं । हमें भी संकल्पबद्ध होना है । हमारे खून के कतरे कतरें में अरिहंत आ जाएं । जीवन के अन्तिम क्षण में नमन के भाव आ जाए तो भी जीवन सफल हो जाएगा । आचार्यश्रीजी ने फरमाया कि जब भी खाओ, पीओ, बैठो या उठो तो महावीर की तरह यत्नापूर्वक बैठो । जैसे भाव रखोगे तो वैसे ही बन जाओगे । 

आचार्यश्रीजी द्वारा प्रदत्त ‘आत्म: ध्यान साधना कोर्स - एडवाॅंस-ा’ 16 से 18 जुलाई, 2004 तक प्रतिदिन प्रातः 6.00 से सायं 5.00 तक ‘शिवाचार्य सत्संग भवन’ श्री एस0 एस0 जैन सभा, सेक्टर 18 डी, चण्डीगढ़ में होगा ।    

संजीव जैन, मंत्री

श्री एस0 एस0 जैन सभा

सेक्टर 18 डी, चण्डीगढ़

 

प्रीति करें प्रभु से: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़: 15 जुलाई, 2004: विश्व मानव मंगल मैत्री के प्रणेता, जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज वर्षावास हेतु चण्डीगढ़ के सेक्टर 18 डी जैन स्थानक में विराजमान हैं । उनके मौलिक जीवनोपयोगी प्रवचन प्रतिदिन प्रातः 8.15 से 9.30 बजे तक हो रहे हैं । आज के प्रवचन में उन्होंने फरमाया कि- अरिहंत प्रभु को नमन करते व वंदन करते हुए ये भाव भीतर में आ   जाए । अरिहंत प्रभु आपकी वीतरागता को नमन करता हूॅं । आपकी प्रांजलता को नमन करता हूॅं । हे प्रभु ! अनंत ज्ञान, अनंत दर्शन मेरे अन्तःकरण में समा जाए । भगवन् आपका नाम लेते ही एक शुद्धता, निर्मलता का भाव आ जाए । 

भक्ति करने से अभिप्राय है प्रभु ! मैं कुछ भी नहीं हूॅं । मैं तो टूटा हूॅं, बिखरा हूॅं । मेरी सीमाएं हैं मुझमें ज्ञान है न ध्यान है न जीवन में संस्कार है । मैं एक बूंद हूॅं आप सागर हो । प्रभु अपने भीतर में बूंद को समा लो । इस प्रकार का भाव रखना अरिहंत सिमरण के वक्त । प्रभु से प्रार्थना करो- प्रभु तेरे द्वार पर आया हूॅं । मेरी झोली भर दो- मेरे श्वांस-2 में वीतरागता के भाव भर दें । मेरा एक श्वांस भी खाली न जाए । मेरा एक श्वांस जो तेरी भक्ति और स्मरण के बिना गुजर जाए तो वह मेरा श्वांस व्यर्थ है । जैसे किसी का भाग्यवश एक्सीडेंट हो जाता है, वह चल नहीं सकता है तो वह परेशान न हो बल्कि प्रभु का धन्यवाद करे । प्रभु अभी मेरे श्वांस तेरा स्मरण करने को तेरी याद आने को बचे हैं । जिसको तुम बहुत चाहते हो, उसे खाते, पीते सोते हर पल उसकी याद आती है । वैसे ही प्रभु का हर पल हर श्वांस स्मरण चलता रहे । हर व्यक्ति प्रीति चाहता है किसी को धन से, किसी को परिवार से, किसी को पद से । हमें जिससे प्रीति होती है हम वैसे ही बनते हैं । इसलिए अरिहंत प्रभु से प्रीति कीजिए और अपना कल्याण कीजिए । अरिहंत से प्रीति करो और अरिहंत बनो । 

आचार्यश्रीजी द्वारा प्रदत्त ‘आत्म: ध्यान साधना कोर्स - एडवाॅंस-ा’ 16 से 18 जुलाई, 2004 तक प्रतिदिन प्रातः 6.00 से सायं 5.00 तक ‘शिवाचार्य सत्संग भवन’ श्री एस0 एस0 जैन सभा, सेक्टर 18 डी, चण्डीगढ़ में होगा ।    

संजीव जैन, मंत्री

श्री एस0 एस0 जैन सभा

सेक्टर 18 डी, चण्डीगढ़

 

प्रतिक्रिया में कर्मों का बंधन होता है: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़: 16 जुलाई, 2004: विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता, जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज वर्षावास हेतु चण्डीगढ़ के सेक्टर 18 डी जैन स्थानक में विराजमान हैं । उनके मौलिक जीवनोपयोगी प्रवचन प्रतिदिन प्रातः 8.15 से 9.30 बजे तक हो रहे   हैं । आज के प्रवचन में आचार्यश्रीजी ने फरमाया कि- आज का संक्रान्ति का पावन दिवस जीवन में संक्रमण लेकर आता है । सूर्य एक माह बाद मिथुन राशि से सिंह राशि में प्रवेश कर रहा है । हम भी इसी प्रकार संक्रमण करें । संक्रान्ति हमें आगे बढ़ने का संदेश देती है । आज के दिन हम अवलोकन करें । हम आगे बढ़ रहे हैं या पीछे जा रहे  हैं । पीछे हटना यानि क्रोध, मोह, लोभ, अहंकार को अंगीकार करना । आगे जाना यानि जीवन में कुछ घटित होना, हम अरिहंत, सिद्ध प्रभु की भक्ति करें । उस भक्ति की ओर आगे बढ़ें । 

तुम्हारे अस्तित्व से कृत्य निकलता है । अस्तित्व तुम्हारे भीतर है । जिन्होंने अपना सर्वकार्य सिद्ध कर लिया वे सिद्ध हैं । सिद्ध शब्द का मतलब ही पूर्ण करना होता है । सिद्ध भगवान केवल देखते और जानते हैं । वे तीनों लोकों को देख रहे हैं फिर भी वे प्रतिक्रिया नहीं करते । हम में और सिद्ध भगवान में यही अन्तर है कि हम प्रतिपल प्रतिक्षण प्रतिक्रिया कर रहे हैं और सिद्ध भगवान ज्ञाताद्रष्टा भाव में रहकर प्रतिक्रिया नहीं करते हैं । सिद्ध भगवान को नमन करते वक्त भाव रखों कि मैं भी एक दिन आपके आठ गुणों को प्राप्त   करूॅं । मैं भी शान्ति और समाधि में आगे बढूॅं । जीवन में आ रहे सुख दुःख को स्वीकार करो और भीतर सिद्ध प्रभु का सिमरन करते रहो । 

अहंकार करने पर कर्म-बंधन होते हैं इसीलिए प्रभु ने किसी भी चीज पर अपना अस्तित्व बनाने के लिए मना किया । यह शरीर भी मेरा नहीं है । मेरा तो केवल धर्म है । मेरे अरिहंत, सिद्ध भगवान हैं । मेरे गुरू हैं । मैं इनके माध्यम से अपने जीवन को शुद्ध निर्मल करना चाहता हूॅं । दुःख में प्रभु की याद आती है, उस समय अपना मन सिमरन में लगाओ ।  

आचार्यश्रीजी द्वारा प्रदत्त ‘आत्म: ध्यान साधना कोर्स - एडवाॅंस-ा’ 16 से 18 जुलाई, 2004 तक प्रतिदिन प्रातः 6.00 से सायं 5.00 तक ‘शिवाचार्य सत्संग भवन’ श्री एस0 एस0 जैन सभा, सेक्टर 18 डी, चण्डीगढ़ में शुरू हो गया है, जिसमें अनेक साधकों ने भाग लिया । आगामी बेसिक कोर्स दिनाॅंक: 21 से 25 जुलाई, 2004 को प्रातः 5.30 से 7.30 बजे तक चलेगा । 18 जुलाई, 2004 को आचार्य सम्राट् पूज्य श्री आनंद ऋषि जी महाराज की 105 वीं जन्म जयंती सामूहिक आयम्बिल दिवस के रूप में मनाई जाएगी । इस अवसर पर फ्री मेडीकल केम्प भी लगाये जाएंगें ।

संजीव जैन, मंत्री

श्री एस0 एस0 जैन सभा

सेक्टर 18 डी, चण्डीगढ़

 

सकारात्मक संकल्प करें: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़: 17 जुलाई, 2004: विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता, जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज वर्षावास हेतु चण्डीगढ़ के सेक्टर 18 डी जैन स्थानक में विराजमान हैं । उनके मौलिक जीवनोपयोगी प्रवचन प्रतिदिन प्रातः 8.15 से 9.30 बजे तक हो रहे हैं । आज के प्रवचन में आचार्यश्रीजी ने फरमाया कि- सिद्ध प्रभु को नमस्कार । सिद्ध से अभिप्राय है जो संसार सागर से पार हो चुके हैं । जो अष्ट कर्मों से मुक्त हो चुके हैं । सांसारिक मोह वासना क्रोध लोभ से जो सदा सर्वदा के लिए मुक्ति पा चुके हैं । सिद्ध से अभिप्राय है जो परिपूर्ण हो गए हैं, जो सफल हो चुके हैं, जिनके लिए कुछ भी करना या बनना शेष नहीं रहा । 

हम उपासक हैं सिद्ध भगवान के तो हमें सिद्ध कैसे बनना है । सिद्ध बनने के लिए चाहिए दृढ़ संकल्प । मनुष्य का जीवन विश्वास मान्यता और धारणा से नहीं चलता बल्कि संकल्प के आधार पर चलता है । आपने संकल्प किया मुझे शान्त रहना है और आप शान्त हुए । हमने संकल्प किया कि हमको दुःखी रहना है तो दुनियां की कोई भी शक्ति हमें सुखी नहीं कर सकती क्योंकि हमारा संकल्प दुःखी होने का   है । संकल्प हमारा सकारात्मक है तो जीवन में नयी दिशा देता है, जीवन में उत्साह और उमंग लाता है । संकल्प स्वयं से जुड़ने की सुन्दर प्रक्रिया है । बुद्ध ने संकल्प किया कि बोधि मिले और उसी रात्रि में बोधित्व की प्राप्ति हुई । संकल्प किया महावीर ने जिन बनने का और जिन बन गए । 

सिद्ध को नमस्कार करने से अभिप्राय है हम भी सिद्ध बनना चाहते हैं और सिद्ध बनने का संकल्प कर रहे हैं । सिद्ध के साथ जुड़ जाओ, शान्त हो जाओ । जैसे किरण सूर्य बनना चाहती है, कली वृक्ष बनना चाहती, बूंद सागर बनना चाहती है । इसी प्रकार हम भी सिद्ध बनने के लिए संकल्प करें, तभी कल्याण होगा । जीवन में प्यास और संकल्प होना जरूरी   है । संकल्प से पूर्व अभीप्सा चाहिए । संकल्प करो प्रभु से जुड़ने का, सिद्ध से जुड़ने का और परमात्म बनने का । 

 

जीवन में सर्वाधिक मूल्य दृष्टि का है: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़: 19 जुलाई, 2004: विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता, जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज वर्षावास हेतु चण्डीगढ़ के सेक्टर 18 डी जैन स्थानक में विराजमान हैं । उनके मौलिक जीवनोपयोगी प्रवचन प्रतिदिन प्रातः 8.15 से 9.30 बजे तक हो रहे हैं । आज के प्रवचन में आचार्यश्रीजी ने फरमाया कि-  अरिहंत प्रभु के चरणों में नमन । नमन और समर्पण कब होता है । भक्ति से जब व्यक्ति परिपूर्ण हेाता है तब नमन और समर्पण उसके भीतर आ जाता है । हमारी दृष्टि आत्म-दृष्टि हो, स्व-दृष्टि हो । वास्तव में नमन के लिए दृष्टि आवश्यक है । धर्म का आधार धर्म का मूल दर्शन है, दृष्टि है । जिस प्रकार पूरे शरीर में आॅंख अधिक मूल्यवान है उसी प्रकार धर्म में दर्शन का होना अधिक मूल्यवान है । आॅंख पूरे ब्रह्माण्ड को देख लेती है परन्तु उस पर तिनका गिर जाए तो वह कुछ नहीं देख पाती, उसी प्रकार सूरज पूरे ब्रह्माण्ड को प्रकाशित करता है पर बादल का आवरण आते ही वह पीछे रह जाता है । आत्मा में अनंत शक्ति है परन्तु उसके ऊपर मोह-माया का आवरण है, जिससे आत्मा अधोगति की ओर गमन करती है । 

प्रभु महावीर का अनमोल सूत्र है, दर्शन धर्म का मूल है । प्रभु महावीर ने कहा कि जो दर्शन से भ्रष्ट हो गये हैं वे भ्रष्ट हैं, जिनको आत्म-दृष्टि प्राप्त नहीं हुई वे निर्वाण प्राप्त नहीं कर सकते । दर्शन का मतलब हमारा दृष्टिकोण है । जैसा दर्शन होगा वैसा अनुभव होगा । जब हम क्रोध से परिपूर्ण होते हैं तब शरीर में उद्वेग होता है और क्रोध से हम कषाय-युक्त हो जाते हैं । जीवन में सर्वाधिक मूल्य दृष्टि का है, जिसकी दृष्टि निर्मल होगी उसको सब ओर निर्मल ही दिखाई देगा । आपने देखा होगा छोटा बच्चा कितना निर्मल, प्रांजल होता है, उसकी दृष्टि इतनी शुद्ध होती है जो देखता है उसे ग्रहण कर लेता है , इसलिए अपने घर में महापुरूषों के चित्र लगाओ । शान्ति से परिपूर्ण महापुरूषों की जीवन गाथाएॅं सुनाओ । 

अंत में आचार्यश्रीजी ने भक्ति के ऊपर अपने भाव व्यक्त करते हुए कहा कि चैबीस घण्टे में हम कितनी अरिहंत की भक्ति करते हैं । आज का मानव भक्ति भी स्वार्थ से करता है । ऐसी भक्ति हमें निर्वाण की ओर नहीं ले जा सकती । भक्ति करते हुए अपनी दृष्टि को निर्मल करो । 

आचार्यश्रीजी द्वारा प्रदत्त ‘आत्म: ध्यान साधना कोर्स - बेसिक’ 21 से 25 जुलाई, 2004 को प्रातः 5.30 से 7.30 बजे तक चलेगा । 18 जुलाई, 2004 को आचार्य सम्राट् पूज्य श्री आनंद ऋषि जी महाराज की 105 वीं जन्म जयंती सामूहिक आयम्बिल दिवस के रूप में मनाई गई । इस अवसर पर फ्री मेडीकल कैम्प भी लगाये गये, जिसमें डाॅ0 एम0एस0 जैन- एम0डी0, डाॅ0 संदीप बांसल-ई0एन0टी0 स्पेसलिस्ट एवं डाॅ0 नितिन जैन- डेन्टल स्पेसलिस्ट ने रेागियों की फ्री सेवा का लाभ लिया ।  

संजीव जैन, मंत्री

श्री एस0 एस0 जैन सभा

सेक्टर 18 डी, चण्डीगढ़

 

प्रतिक्रिया में कर्मों का बंधन होता है: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़: 16 जुलाई, 2004: विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता, जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज वर्षावास हेतु चण्डीगढ़ के सेक्टर 18 डी जैन स्थानक में विराजमान हैं । उनके मौलिक जीवनोपयोगी प्रवचन प्रतिदिन प्रातः 8.15 से 9.30 बजे तक हो रहे   हैं । आज के प्रवचन में आचार्यश्रीजी ने फरमाया कि- आज का संक्रान्ति का पावन दिवस जीवन में संक्रमण लेकर आता है । सूर्य एक माह बाद मिथुन राशि से सिंह राशि में प्रवेश कर रहा है । हम भी इसी प्रकार संक्रमण करें । संक्रान्ति हमें आगे बढ़ने का संदेश देती है । आज के दिन हम अवलोकन करें । हम आगे बढ़ रहे हैं या पीछे जा रहे  हैं । पीछे हटना यानि क्रोध, मोह, लोभ, अहंकार को अंगीकार करना । आगे जाना यानि जीवन में कुछ घटित होना, हम अरिहंत, सिद्ध प्रभु की भक्ति करें । उस भक्ति की ओर आगे बढ़ें । 

तुम्हारे अस्तित्व से कृत्य निकलता है । अस्तित्व तुम्हारे भीतर है । जिन्होंने अपना सर्वकार्य सिद्ध कर लिया वे सिद्ध हैं । सिद्ध शब्द का मतलब ही पूर्ण करना होता है । सिद्ध भगवान केवल देखते और जानते हैं । वे तीनों लोकों को देख रहे हैं फिर भी वे प्रतिक्रिया नहीं करते । हम में और सिद्ध भगवान में यही अन्तर है कि हम प्रतिपल प्रतिक्षण प्रतिक्रिया कर रहे हैं और सिद्ध भगवान ज्ञाताद्रष्टा भाव में रहकर प्रतिक्रिया नहीं करते हैं । सिद्ध भगवान को नमन करते वक्त भाव रखों कि मैं भी एक दिन आपके आठ गुणों को प्राप्त   करूॅं । मैं भी शान्ति और समाधि में आगे बढूॅं । जीवन में आ रहे सुख दुःख को स्वीकार करो और भीतर सिद्ध प्रभु का सिमरन करते रहो । 

अहंकार करने पर कर्म-बंधन होते हैं इसीलिए प्रभु ने किसी भी चीज पर अपना अस्तित्व बनाने के लिए मना किया । यह शरीर भी मेरा नहीं है । मेरा तो केवल धर्म है । मेरे अरिहंत, सिद्ध भगवान हैं । मेरे गुरू हैं । मैं इनके माध्यम से अपने जीवन को शुद्ध निर्मल करना चाहता हूॅं । दुःख में प्रभु की याद आती है, उस समय अपना मन सिमरन में लगाओ ।  

आचार्यश्रीजी द्वारा प्रदत्त ‘आत्म: ध्यान साधना कोर्स - एडवाॅंस-ा’ 16 से 18 जुलाई, 2004 तक प्रतिदिन प्रातः 6.00 से सायं 5.00 तक ‘शिवाचार्य सत्संग भवन’ श्री एस0 एस0 जैन सभा, सेक्टर 18 डी, चण्डीगढ़ में शुरू हो गया है, जिसमें अनेक साधकों ने भाग लिया । आगामी बेसिक कोर्स दिनाॅंक: 21 से 25 जुलाई, 2004 को प्रातः 5.30 से 7.30 बजे तक चलेगा । 18 जुलाई, 2004 को आचार्य सम्राट् पूज्य श्री आनंद ऋषि जी महाराज की 105 वीं जन्म जयंती सामूहिक आयम्बिल दिवस के रूप में मनाई जाएगी । इस अवसर पर फ्री मेडीकल केम्प भी लगाये जाएंगें ।

संजीव जैन, मंत्री

श्री एस0 एस0 जैन सभा

सेक्टर 18 डी, चण्डीगढ़

 

सकारात्मक संकल्प करें: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़: 17 जुलाई, 2004: विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता, जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज वर्षावास हेतु चण्डीगढ़ के सेक्टर 18 डी जैन स्थानक में विराजमान हैं । उनके मौलिक जीवनोपयोगी प्रवचन प्रतिदिन प्रातः 8.15 से 9.30 बजे तक हो रहे हैं । आज के प्रवचन में आचार्यश्रीजी ने फरमाया कि- सिद्ध प्रभु को नमस्कार । सिद्ध से अभिप्राय है जो संसार सागर से पार हो चुके हैं । जो अष्ट कर्मों से मुक्त हो चुके हैं । सांसारिक मोह वासना क्रोध लोभ से जो सदा सर्वदा के लिए मुक्ति पा चुके हैं । सिद्ध से अभिप्राय है जो परिपूर्ण हो गए हैं, जो सफल हो चुके हैं, जिनके लिए कुछ भी करना या बनना शेष नहीं रहा । 

हम उपासक हैं सिद्ध भगवान के तो हमें सिद्ध कैसे बनना है । सिद्ध बनने के लिए चाहिए दृढ़ संकल्प । मनुष्य का जीवन विश्वास मान्यता और धारणा से नहीं चलता बल्कि संकल्प के आधार पर चलता है । आपने संकल्प किया मुझे शान्त रहना है और आप शान्त हुए । हमने संकल्प किया कि हमको दुःखी रहना है तो दुनियां की कोई भी शक्ति हमें सुखी नहीं कर सकती क्योंकि हमारा संकल्प दुःखी होने का   है । संकल्प हमारा सकारात्मक है तो जीवन में नयी दिशा देता है, जीवन में उत्साह और उमंग लाता है । संकल्प स्वयं से जुड़ने की सुन्दर प्रक्रिया है । बुद्ध ने संकल्प किया कि बोधि मिले और उसी रात्रि में बोधित्व की प्राप्ति हुई । संकल्प किया महावीर ने जिन बनने का और जिन बन गए । 

सिद्ध को नमस्कार करने से अभिप्राय है हम भी सिद्ध बनना चाहते हैं और सिद्ध बनने का संकल्प कर रहे हैं । सिद्ध के साथ जुड़ जाओ, शान्त हो जाओ । जैसे किरण सूर्य बनना चाहती है, कली वृक्ष बनना चाहती, बूंद सागर बनना चाहती है । इसी प्रकार हम भी सिद्ध बनने के लिए संकल्प करें, तभी कल्याण होगा । जीवन में प्यास और संकल्प होना जरूरी   है । संकल्प से पूर्व अभीप्सा चाहिए । संकल्प करो प्रभु से जुड़ने का, सिद्ध से जुड़ने का और परमात्म बनने का । 

 

जीवन में सर्वाधिक मूल्य दृष्टि का है: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़: 19 जुलाई, 2004: विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता, जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज वर्षावास हेतु चण्डीगढ़ के सेक्टर 18 डी जैन स्थानक में विराजमान हैं । उनके मौलिक जीवनोपयोगी प्रवचन प्रतिदिन प्रातः 8.15 से 9.30 बजे तक हो रहे हैं । आज के प्रवचन में आचार्यश्रीजी ने फरमाया कि-  अरिहंत प्रभु के चरणों में नमन । नमन और समर्पण कब होता है । भक्ति से जब व्यक्ति परिपूर्ण हेाता है तब नमन और समर्पण उसके भीतर आ जाता है । हमारी दृष्टि आत्म-दृष्टि हो, स्व-दृष्टि हो । वास्तव में नमन के लिए दृष्टि आवश्यक है । धर्म का आधार धर्म का मूल दर्शन है, दृष्टि है । जिस प्रकार पूरे शरीर में आॅंख अधिक मूल्यवान है उसी प्रकार धर्म में दर्शन का होना अधिक मूल्यवान है । आॅंख पूरे ब्रह्माण्ड को देख लेती है परन्तु उस पर तिनका गिर जाए तो वह कुछ नहीं देख पाती, उसी प्रकार सूरज पूरे ब्रह्माण्ड को प्रकाशित करता है पर बादल का आवरण आते ही वह पीछे रह जाता है । आत्मा में अनंत शक्ति है परन्तु उसके ऊपर मोह-माया का आवरण है, जिससे आत्मा अधोगति की ओर गमन करती है । 

प्रभु महावीर का अनमोल सूत्र है, दर्शन धर्म का मूल है । प्रभु महावीर ने कहा कि जो दर्शन से भ्रष्ट हो गये हैं वे भ्रष्ट हैं, जिनको आत्म-दृष्टि प्राप्त नहीं हुई वे निर्वाण प्राप्त नहीं कर सकते । दर्शन का मतलब हमारा दृष्टिकोण है । जैसा दर्शन होगा वैसा अनुभव होगा । जब हम क्रोध से परिपूर्ण होते हैं तब शरीर में उद्वेग होता है और क्रोध से हम कषाय-युक्त हो जाते हैं । जीवन में सर्वाधिक मूल्य दृष्टि का है, जिसकी दृष्टि निर्मल होगी उसको सब ओर निर्मल ही दिखाई देगा । आपने देखा होगा छोटा बच्चा कितना निर्मल, प्रांजल होता है, उसकी दृष्टि इतनी शुद्ध होती है जो देखता है उसे ग्रहण कर लेता है , इसलिए अपने घर में महापुरूषों के चित्र लगाओ । शान्ति से परिपूर्ण महापुरूषों की जीवन गाथाएॅं सुनाओ । 

अंत में आचार्यश्रीजी ने भक्ति के ऊपर अपने भाव व्यक्त करते हुए कहा कि चैबीस घण्टे में हम कितनी अरिहंत की भक्ति करते हैं । आज का मानव भक्ति भी स्वार्थ से करता है । ऐसी भक्ति हमें निर्वाण की ओर नहीं ले जा सकती । भक्ति करते हुए अपनी दृष्टि को निर्मल करो । 

आचार्यश्रीजी द्वारा प्रदत्त ‘आत्म: ध्यान साधना कोर्स - बेसिक’ 21 से 25 जुलाई, 2004 को प्रातः 5.30 से 7.30 बजे तक चलेगा । 18 जुलाई, 2004 को आचार्य सम्राट् पूज्य श्री आनंद ऋषि जी महाराज की 105 वीं जन्म जयंती सामूहिक आयम्बिल दिवस के रूप में मनाई गई । इस अवसर पर फ्री मेडीकल कैम्प भी लगाये गये, जिसमें डाॅ0 एम0एस0 जैन- एम0डी0, डाॅ0 संदीप बांसल-ई0एन0टी0 स्पेसलिस्ट एवं डाॅ0 नितिन जैन- डेन्टल स्पेसलिस्ट ने रेागियों की फ्री सेवा का लाभ लिया ।  

संजीव जैन, मंत्री

श्री एस0 एस0 जैन सभा

सेक्टर 18 डी, चण्डीगढ़

 

सुख और दुःख को स्वीकार करो यही भक्ति: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़: 20 जुलाई, 2004: विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता, जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज वर्षावास हेतु चण्डीगढ़ के सेक्टर 18 डी जैन स्थानक में विराजमान हैं । उनके मौलिक जीवनोपयोगी प्रवचन प्रतिदिन प्रातः 8.15 से 9.30 बजे तक हो रहे हैं । आज के प्रवचन में आचार्यश्रीजी ने फरमाया कि- प्रभु महावीर की वाणी सर्वोत्त्म है । धर्म का मार्ग जो उन्होंने बताया वह ठीक है, पर अभी वह हमारे भीतर नहीं आ रहा है । तीर्थंकर की करूणा सब पर बरसती है, तुम्हारा पात्र चाहिए उसे ग्रहण करने के लिए । दृष्टि के ऊपर हमारी चर्चा चल रही थी । दर्शन से जो भ्रष्ट हो जाता है उसे वह निर्वाण नहीं प्राप्त कर सकता, परन्तु चारित्र से जो भ्रष्ट हो जाता है वह निर्वाण प्राप्त कर सकता है । दृष्टि महत्वपूर्ण है । जीवन के आचरण से भी दृष्टि महत्वपूर्ण है । जिनको आत्म-दृष्टि नहीं है वे देवलोक से भी वापस आ जाते हैं । उध्र्वगति की ओर नहीं जा पाते, जिनको आत्म-दृष्टि है उनको निर्वाण हो जाता है । 

हमारे दैनिक व्यवहार में भी दृष्टि का बहुत महत्व है । हमारी दृष्टि सब पर एक सी होनी चाहिए चाहे वह धनवान हो या धनहीन । हमारी दृष्टि शरीर की सुकुमारता, सौन्दर्य पर हती है । वह भीतरी सौन्दर्य पर चली जाये तो हम उध्र्वगति की ओर गमन कर सकते हैं । दृष्टि गलत है तो सब गलत है । प्रभु महावीर ने फरमाया कि एक ओर आत्म-दृष्टि ओर दूसरी ओर तीनों लोकों का राज्य बराबर है । तुम्हें आत्म-दृष्टि मिल गई तो जन्मों-2 के बन्धन कट जाएंगें । संसार में सभी व्यक्ति किसी न किसी दृष्टि में लगे हुए हैं । सुख दुःख तो सभी को आते हैं । दुःख राम, कृष्ण, महावीर को भी आए । अपने किये हुए निकाचित कर्म भी महावीर को भोगने पड़े । हमें साधारण बीमारी भी हो जाए तो भी हम घबरा जाते हैं । सुख और दुःख दोनों को स्वीकार करो, यही भक्ति है ।  

आचार्यश्रीजी द्वारा प्रदत्त ‘आत्म: ध्यान साधना कोर्स - बेसिक’ 21 से 25 जुलाई, 2004 को प्रातः 5.30 से 7.30 बजे तक चलेगा । 

संजीव जैन, मंत्री

श्री एस0 एस0 जैन सभा

सेक्टर 18 डी, चण्डीगढ़

 

श्रद्धा बहुमूल्य है: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़: 21 जुलाई, 2004: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर, ध्यान योग प्रणेता, आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज वर्षावास हेतु चण्डीगढ़ के सेक्टर 18 डी जैन स्थानक में विराजमान हैं । उनके मौलिक जीवनोपयोगी प्रवचन प्रतिदिन प्रातः 8.15 से 9.30 बजे तक हो रहे हैं । आज के प्रवचन में आचार्यश्रीजी ने फरमाया कि- भक्त जब प्रभु के चरणों में एक छोटी सी प्रार्थना करता है, आकांक्षा लेकर उपस्थित होता है तब वह कहता है कि दाता इस जीवन में तुम्हारा सिमरन हो जाये, तुम्हारी याद में चंद आंसू गिर जाये । प्रभु तुम्हारी दृष्टि मुझ पर पड़ जाए इतना ही मेरे लिए काफी है । सूरज रोज निकलता है । पक्षी प्रतिदिन चहचहाते हैं, सागर की लहरें उठती और विलीन हो जाती हैं । प्रकृति का कण-2 सुरभित है, मेरे भीतर मैत्री का झरना क्यों नहीं बहता । जब आप गुरू चरणों में, अपने इष्ट के चरणों में या अपने माता पिता के चरणों में जाते हो तब बुद्धि का उपयोग मत करना । हृदय से उनके चरणों में झुक जाना । श्रद्धा से भरा हुआ हृदय भक्ति में तल्लीन हो जाता है । 

महाप्रभु महावीर कहते हैं, आत्म दृष्टि से श्रद्धा का जन्म होता है और ज्ञान से जाना जाता है । प्रभु महावीर की दृष्टि में श्रद्धा का मूल्य अधिक है । जानने के साथ श्रद्धा आ जाये तो ज्ञान मूल्यवान बन जाएगा । तुमने शास्त्र पढ़ लिए पर जाना नहीं, श्रद्धा नहीं की तो कुछ भी नहीं किया । प्रभु महावीर के दर्शन में श्रद्धा बहुमूल्य है । तीन द्वार है जिस पर जैन धर्म का महल टिका हुआ है । सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चारित्र । सम्यक् दर्शन मतलब सही श्रद्धा, सही दृष्टि । प्रभु ने श्रद्धा को परम् दुर्लभ बताया । परमात्मा की अरिहंत की भक्ति में जब तुम डूब जाते हो तब तुम परमात्मा के साथ एकमेक हो जाते हो । यदि तुम्हारी अरिहंत के प्रति श्रद्धा है तो तुम सिमरन किये बिना नहीं रह सकते । 

श्रद्धा और विश्वास में बहुत अन्तर है । श्रद्धा नित्य नवीन ताजगी से भरा हुआ जीवन है । विश्वास ऊपर से होता है और श्रद्धा भीतर से होती है । जिस प्रकार एक प्लास्टिक का फूल है उसमें इत्र छिड़कर सुगन्ध भी लाई जा सकती है । जैसा चाहे वैसे रंग का प्रयोग भी किया जा सकता है, परन्तु जो स्वयं मेहनत कर बीज बोकर वृक्ष पर जो फूल आया है वह अधिक मूल्यवान है । प्लास्टिक का फूल विश्वास है और वृक्ष का फूल श्रद्धा है । विश्वास जैसा बनाओ बन जाता है, परन्तु श्रद्धा तो जन्मजात है । श्रद्धा नहीं बदलती, विश्वास बदलते रहते हैं । 

आचार्यश्रीजी द्वारा प्रदत्त ‘आत्म: ध्यान साधना कोर्स - बेसिक’ 21 से 25 जुलाई, 2004 को प्रातः 5.30 से 7.30 बजे तक गतिमान है जिसमें करीब 50 भाई बहिन ‘जीवन जीने की कला’ के सूत्रों के साथ प्राणायाम और ध्यान का अनुभव कर रहे हैं । आगामी ‘बेसिक कोर्स’ 25 से 29 जुलाई, 2004 तक शाम 4.00 से 6.00 बजे तक होगा । भाई बहिन मन की शान्ति, भीतर का आनंद प्राप्त करने हेतु इस साधना कोर्स में अवश्य भाग लेवें ।

संजीव जैन, मंत्री

श्री एस0 एस0 जैन सभा

सेक्टर 18 डी, चण्डीगढ़

 

मानव का जीवन सूरज की भांति है: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़: 22 जुलाई, 2004: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर, ध्यान योग प्रणेता, आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज वर्षावास हेतु चण्डीगढ़ के सेक्टर 18 डी जैन स्थानक में विराजमान हैं । उनके मौलिक जीवनोपयोगी प्रवचन प्रतिदिन प्रातः 8.15 से 9.30 बजे तक हो रहे हैं । आज के प्रवचन में आचार्यश्रीजी ने फरमाया कि- प्रभु महावीर ने आत्म-दृष्टि व निज स्वरूप को सर्वोपरि माना है । आत्म-दृष्टि का मतलब ही भेद-विज्ञान है । शरीर और आत्मा का भेद ज्ञात कर लेना ही भेद-विज्ञान है । तीनों लोकों का राज्य और भेद-विज्ञान भेद-विज्ञान श्रेष्ठ है क्योंकि तीनो लोकों के राज्य में शान्ति, सुख समता प्राप्त नहीं की जा सकती । भेद विज्ञान में अपने आपही यह प्राप्त होती है । प्रभु महावीर ने आत्म-दृष्टि के पांच लक्षण बताएं हैं, सम, संवेद, निर्वेग, अनुकम्पा, आस्था । पहला लक्षण सम है, हर अवस्था में समभाव में रहना । चाहे वह कैसी भी अवस्था क्यों न हो । मानव का जीवन एक सूरज की भाॅंति है । सुबह का सूरज बाल सूर्य बच्चे की भाॅंति लगता है । सुबह का सूरज हमारा बचपन है । वह खेल कूद में बीत जाता है । दोपहर में भयंकर तपता सूरज अपने नशे में होता है, उसी प्रकार जवानी भी नशे में बीत जाती है और सायंकाल का सूरज अपनी पुरानी यादें लिए हुए सूर्यास्त की ओर आगे बढ़ता है, उसी प्रकार हमारा मानव जीवन बुढ़ापे में पुरानी स्मृतियों को तरोताजा करते हुए जीवन का अंत कर देता  है ।

प्रकृति, नियति, कर्म-संस्कार जैसे होते हैं हमारी विचारधारा भी वैसी ही होती है । जीवन में दुःख न होता तो सुख का मूल्य हमें कैसे ज्ञात होता । जो इस क्षण हो रहा है उसे स्वीकार करो । धन का छोड़ना, परिवार का छोड़ना, अपने प्रियजनों को छोड़ना सहज है परन्तु अहंकार, बड़ाई, ईष्र्या आदि को छोड़ना दुर्लभ है । हम अपने अहंकार को कम करें । अपनी ईष्र्या को समाप्त करें । दूसरे लक्षण में प्रभु महावीर ने सही दिशा का आचरण संवेग को बतलाया है । इसके विपरीत है उद्वेग । संवेग हमें मोक्ष-मार्ग की ओर ले जाता है तो उद्वेग हमें अधोगति की ओर ले जाता है । संसार में रहते हुए विरक्ति आना, निर्वेद अवस्था है । सम्यक् दर्शन का द्वार है समता । पांचो लक्षण अगर हमारे भीतर थोड़े-2 ही आ जायंे तो हम आत्म-दृष्टि की ओर अग्रसर हो जाएंगे । प्रभु महावीर ने भी मोक्ष के तीन मार्ग बतलाये हैं । सम्यक् ज्ञान, सम्यक् दर्शन, सम्यक् चारित्र यही साधना, आनंद का द्वार है । हम इस पर अग्रसर होकर अपने जीवन को उज्ज्जवल बनायें ।  

 

संत सागर के समान गम्भीर होता है: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़: 23 जुलाई, 2004: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर, ध्यान योग प्रणेता, आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज वर्षावास हेतु चण्डीगढ़ के सेक्टर 18 डी जैन स्थानक में विराजमान हैं । उनके मौलिक जीवनोपयोगी प्रवचन प्रतिदिन प्रातः 8.15 से 9.30 बजे तक हो रहे हैं । आज के प्रवचन में आचार्यश्रीजी ने फरमाया कि- संत की परिभाषा, संत का संतत्व सत्य में ही है । उसका आधार भी सत्य का ही है । संत वही है जो निर्ग्रन्थ है । प्रभु महावीर को निग्र्रन्थ ज्ञात पुत्र से पुकारा जाता, इसका मतलब उन्हें संत के साथ उनके वंश से पुकारा जाता है । निग्र्रन्थ वह है जिसके मन में कोई गांठ नहीं होती । अगर एक गांठ रस्सी में लग जाती है तो रस्सी उलझ जाती है । गांठ बंधने से रस्सी का वजन नहीं बढ़ता, इसी प्रकार अगर एक गांठ हमारे जीवन में लग जाये तो हमारा जीवन भी अस्त-व्यस्त हो जाता   है । हमारी जैसी दृष्टि होती है वैसा ही सब ओर नजर आता है । बेईमान को सब कुछ बेईमान ही नजर आएगा, चोर को चोर और संत को संतत्व ही नजर आता है । संत सागर के सम गंभीर होते हैं जिस प्रकार सागर अपने भीतर सब कुछ समाहित कर लेता है, हीरे मोती, गंदा पानी सब कुछ समाहित हो जाता है, उसी प्रकार संत भी अपने भीतर सब कुछ समाहित कर लेता है । कोई किसी को सुख दुःख नहीं देता अपने ही कर्मों के अनुसार सब भोगना पड़ता है । 

आचार्यश्री कांशीराम जी महाराज ने जीवन के जो अनमोल तीन सूत्र दिये हैं उन्हें अपने जीवन में उतार लो तो जीवन नन्दन-वन बन जाएगा । उन्होंने कहा कि कम खाओ, गम खाओ और नम जाओ । एक सूत्र भी जीवन में आ जाए तो संतत्व नजर आ जाएगा । संत को धरती की भी उपमा दी गई है । धरती माॅं जिस प्रकार सब कुछ सहन कर लेती है उसी प्रकार संत भी सहनशील होते हैं । अंत में आचार्यश्रीजी ने जीवन की मूल्यवत्ता को समझाते हुए कहा कि हमें यह जो मानव जीवन मिला है उसका हम पूरा-पूरा उपयोग करें । हम अपने जीवन के बारे में सोचें । जीवन को बड़े सहज और सरल ढंग से जीयें । अगर जीवन में कोई आधि, व्याधि, उपाधि आती है तब घबराना मत । भक्ति करना, सेवा करना, अपने जीवन को आत्मार्थ में लगा लेना ।  

आचार्यश्रीजी द्वारा प्रदत्त ‘आत्म: ध्यान साधना कोर्स - बेसिक’ 21 से 25 जुलाई, 2004 को प्रातः 5.30 से 7.30 बजे तक गतिमान है जिसमें करीब 50 भाई बहिन ‘जीवन जीने की कला’ के सूत्रों के साथ प्राणायाम और ध्यान का अनुभव कर रहे हैं । आगामी ‘बेसिक कोर्स’ 25 से 29 जुलाई, 2004 तक शाम   4.00 से 6.00 बजे तक होगा । भाई बहिन मन की शान्ति, भीतर का आनंद प्राप्त करने हेतु इस साधना कोर्स में अवश्य भाग लेवें ।

संजीव जैन, मंत्री

श्री एस0 एस0 जैन सभा

सेक्टर 18 डी, चण्डीगढ़

 

आत्मा पर श्रद्धा करो: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़: 24 जुलाई, 2004: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर, ध्यान योग प्रणेता, आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज वर्षावास हेतु चण्डीगढ़ के सेक्टर 18 डी जैन स्थानक में विराजमान हैं । उनके मौलिक जीवनोपयोगी प्रवचन प्रतिदिन प्रातः 8.15 से 9.30 बजे तक हो रहे हैं । आज के प्रवचन में आचार्यश्रीजी ने फरमाया कि-

संत का सत्कार होना चाहिए, 

देव सा व्यवहार होना चाहिए ।’

धर्म का मूल है दर्शन । दर्शन का अर्थ है देखना । आत्म दृष्टि, श्रद्धा, सामान्य दर्शन, संस्कार जो आपने बचपन में धार लिया वह एक दर्शन है । संस्कारों का अपने जीवन में महत्व है । बच्चों को श्रद्धा से पूरित कीजिए । प्रेम से श्रद्धा का जन्म होता है । पहले प्रेम फिर श्रद्धा आती है । नमन भाव, श्रद्धा के भाव भीतर उधृत हों ऐसे कार्य हम करें । सत्य को जानने के लिए पहले स्वयं को जाने, जिससे आपको सुख, शान्ति, आनंद मिलेगा, उसके प्रति कृतज्ञता का भाव रखो । पहले स्वयं को जानो, स्वयं को जानने के अनंतर औरों को जानना । तुम ही परमात्मा, अरिहंत सत्य हो । भीतर खोजो । जिसने खोजा है उसने पाया- कबीर, दादू, रज्जब ने खोजा उन्हें प्राप्त हुआ है । 

रे मन तू सत्संग कर, सीख धर्म की रीत ।

काम, क्रोध, मद लोभ में, गई आयु तेरी बीत ।।

सत्संग में धर्म की रीत का अनुभव आता है । हमारा मन जल्दी श्रद्धा कर लेता है । मन पर संदेह करो । आत्मा पर श्रद्धा करो । हमारी आयु बीतती जा रही है । इतनी आयु में हम हमेशा कषायों में ही उलझे रहे । कभी क्रोध किया, कभी लोभ किया तो कभी अहंकार में आ गए । मूल्यांकन करो 24 घण्टों में कितने घण्टे प्रभु भक्ति में लगाए । अपने शरीर के बारे में सोचो । कितना हमें साथ दे रहा है । यह शरीर हमें पुण्य उपार्जन करने पर मिला । सेवा, साधना करने पर मिला । सोचो जरा आंख नहीं होती तो प्रभु के दर्शन कैसे करते ? कान नहीं होते तो प्रभु की वाणी कैसे सुनते । हाथ नहीं होते तो सेवा किस प्रकार करते । इस शरीर के महत्व को समझो । अरिहंत, सिद्ध की भक्ति करो । नमन करो । इस शरीर से आपने आपको साधो । 

आचार्यश्रीजी द्वारा प्रदत्त ‘आत्म: ध्यान साधना कोर्स - बेसिक’ 21 से 25 जुलाई, 2004 को प्रातः 5.30 से 7.30 बजे तक गतिमान है जिसमें करीब 50 भाई बहिन ‘जीवन जीने की कला’ के सूत्रों के साथ प्राणायाम और ध्यान का अनुभव कर रहे हैं । आगामी ‘बेसिक कोर्स’ 25 से 29 जुलाई, 2004 तक शाम   4.00 से 6.00 बजे तक होगा । भाई बहिन मन की शान्ति, भीतर का आनंद प्राप्त करने हेतु इस साधना कोर्स में अवश्य भाग लेवें ।

संजीव जैन, मंत्री

श्री एस0 एस0 जैन सभा

सेक्टर 18 डी, चण्डीगढ़

 

व्यक्तित्व विकास के सूत्र: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़: 26 जुलाई, 2004: विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य श्री शिवमुनि जी महाराज वर्षावास हेतु चण्डीगढ़ के सेक्टर 18 डी जैन स्थानक में विराजमान हैं । उनके मौलिक जीवनोपयोगी प्रवचन प्रतिदिन प्रातः 8.15 से 9.30 बजे तक हो रहे हैं । इस अवसर पर आज के प्रवचन में आचार्यश्रीजी ने विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के अन्तर्गत व्यक्तित्व विकास पर अपनी भावनाएॅं अभिव्यक्त करते हुए कहा कि हमारे जीवन का एक उद्देश्य होना   चाहिए । उद्देश्य से व्यक्तित्व का विकास होता है । अरिहंत प्रभु को नमन करते हुए आचार्यश्रीजी ने उनके अनंतज्ञान को भी नमन किया । नमन इसलिए कि उस ज्ञान के महासागर में हम भी डूबकी लगा सकें, जितना चित्त, सहज, शान्त मंगलभाव से भरा होता है उसी क्षण तुम्हारा चित्त भीतर चला जाएगा । परमात्मा की वर्षा प्रतिपल हो रही है । हमारी भावनाएं उसे ग्रहण करने की होनी चाहिए । 

हमारे जीवन का उद्देश्य क्या है ? आम व्यक्ति जब हमारे पास आते हैं तो वे कहते हैं महाराज फैक्ट्री चल जो, दुकान चल जाये, घर में सर्व़ आनंद हो । 21 वीं सदी के व्यक्ति का यही उद्देश्य रह गया है । जन्म से जीवन जब तक चलेगा तब तक अपना पुरूषार्थ काम करता है । पूर्वभव में आपने जो पुण्य उपार्जन किया है वह पूंजी हमें आगे ले जा रही है । जीवन का उद्देश्य महान रखो । जीवन प्रभु महावीर को भी मिला । उन्हें भी यही शरीर प्राप्त हुआ, उन्होंने इस शरीर से वीतरागता प्राप्त की । हम भी इस शरीर से उस महापथ पर आगे बढ़ें । जैन धर्म में शाकाहार और अहिंसा सर्वोत्तम है । महात्मां गाॅंधी के जीवन का उद्देश्य कितना उच्च था । उन्होंने चाहा था कि जब तक मेरा जीवन रहे तब तक इस संसार में जितने भी लोग हैं मैं उनके आंसू पौछ दूॅं, उनके दुःख को मिटा दूं । 

हमारा उद्देश्य भी इसी प्रकार महान् होना चाहिए । सुबह प्रार्थना करो । खाने से पूर्व नवकार मंत्र पढ़ो । जीवन में दो बातें हमेशा ध्यान रखो- मैं कुछ भी नहीं जानता और परम्   विनय । इससे जीवन में वीतरागता आती है । एक ही ज्ञान का चक्षु है वह है सहज विवेक । इसी से आप सब कुछ जान सकते  हैं । 

आचार्यश्रीजी द्वारा प्रदत्त ‘आत्म: ध्यान साधना कोर्स - बेसिक’ 25 से 29 जुलाई, 2004 तक प्रतिदिन सायं 4.00 से 6.00 बजे तक गतिमान है जिसमें करीब 50 भाई बहिन ‘जीवन जीने की कला’ के सूत्रों के साथ प्राणायाम और ध्यान का अनुभव कर रहे हैं । आगामी ‘एडवांस कोर्स’ 30 जुलाई से 1 अगस्त, 2004 तक प्रातः 6.00 से सायं 5.00 बजे तक तक प्रतिदिन होगा । भाई बहिन मन की शान्ति, भीतर का आनंद प्राप्त करने हेतु इस साधना कोर्स में अवश्य भाग लेवें ।

 

आत्म दृष्टि अपनाइए और मुक्ति पाइए: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़: 27 जुलाई, 2004: विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज वर्षावास हेतु चण्डीगढ़ के सेक्टर 18 डी जैन स्थानक में विराजमान हैं । उनके मौलिक जीवनोपयोगी प्रवचन प्रतिदिन प्रातः 8.15 से 9.30 बजे तक हो रहे हैं । इस अवसर पर आज के प्रवचन में फरमाया कि- अरिहंत प्रभु को नमन करते हुए हमारे भीतर भी एक नमन का भाव आता है, जिसका हम गुण कीर्तन करते हैं, जिसके प्रति हमारा श्रद्धा भाव होता है उसके प्रति उतना ही अन्तःकरण से नमन का भाव आता है । जिसको हम नमन करते हैं झुकते हैं, अकेले हम नहीं झुकते बल्कि वह चाहे सत्गुरू हो या माता पिता हो सभी हमारे झुकने के साथ ही वे भी झुकते हैं जब हम झुक-कर नमन करते हैं तो वे हमें आशीर्वाद देने के लिए झुकते हैं । गुरू कुछ न करते हुए भी सब कुछ करते हैं, मौन में रहकर सब कुछ कह जाते हैं । सत्गुरू का सान्निध्य ही हमारे जीवन को बदल देता है । नमन के शब्दों के साथ ही हमारे भीतर का भाव झलकने लगता है । नदी के किनारे जाओगे तो ठण्डक मिलेगी । अग्नि के पास बैठे तो तपस मिलेगी । इसी प्रकार प्रभु का सिमरण गुरू स्मरण हमारे जीवन को नया मोड़ देता है । शायर ने ठीक ही कहा है-

‘झुकाई जब से तेरे कदमों में खुदी मैंने ।

पाई सारे जहां की खुशी मैंने ।।’

झुकने पर ही हमें सब कुछ मिलता है । परमात्म या प्रभु महावीर के ज्ञान की विवेक से अपनी तुलना करें । उसकी नजर से देखो तो नजर बदल जाएगी । जब किसी को हम बहुत आत्मीयता से निहारते हैं तो हमारे भीतर आत्मीयता पहले ही भर जाती है, बाद में उसे मिलता है । करूणा या मैत्री सब कुछ दोनों तरफ से बहती है । सब कुछ हमारी दृष्टि में समाया हुआ है । दृष्टि का ही अन्तर है । दो दृष्टि है- एक है कर्मदृष्टि और दूसरी है आत्मिक  दृष्टि । जहां क्रोध, वासना, अहंकार है वहाॅं संसार है । वह कर्म दृष्टि है । जहां पर सब कुछ हम परमात्म के या गुरू के चरणों में छोड़ देते हैं और भीतर से कहते हैं प्रभु ! मैंने कुछ भी नहीं किया । प्रभु सब आपकी कृपा है ये है आत्म-दृष्टि । जैसे गंगा का जल गंदी नाली में गया तो गंदा हो गया और गंदी नाली का जल गंगा में गया तो पवित्र हो गया । ऐसे ही हमारी दृष्टि का महत्व है । कर्मों का मूल कारण है कर्म दृष्टि । इसलिए आत्म-दृष्टि अपनाइए और मुक्ति पाइए । 

आचार्यश्रीजी द्वारा प्रदत्त ‘आत्म: ध्यान साधना कोर्स - बेसिक’ 25 से 29 जुलाई, 2004 तक प्रतिदिन सायं 4.00 से 6.00 बजे तक गतिमान है जिसमें करीब 50 भाई बहिन ‘जीवन जीने की कला’ के सूत्रों के साथ प्राणायाम और ध्यान का अनुभव कर रहे हैं । आगामी ‘एडवांस कोर्स’ 30 जुलाई से 1 अगस्त, 2004 तक प्रातः 6.00 से सायं 5.00 बजे तक तक प्रतिदिन होगा । भाई बहिन मन की शान्ति, भीतर का आनंद प्राप्त करने हेतु इस साधना कोर्स में अवश्य भाग लेवें ।

 

विश्व की दो महान् विभूतियों का मंगल मिलन

चण्डीगढ़: 24 जुलाई, 2004: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर, ध्यान योग प्रणेता, आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज वर्षावास हेतु चण्डीगढ़ के सेक्टर 18 डी जैन स्थानक में विराजमान हैं । उनके मौलिक जीवनोपयोगी प्रवचन प्रतिदिन प्रातः 8.15 से 9.30 बजे तक हो रहे हैं । आज के इस पावन प्रसंग पर विश्व की दो महान् विभूतियाॅं विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज एवं आर्ट आॅफ लिविंग के प्रणेता श्री श्री रविशंकर जी का मधुर मिलन हुआ । इस अवसर पर आज के प्रवचन में आचार्यश्रीजी ने फरमाया कि- अरिहंत प्रभु को नमन, अरिहंत प्रभु की वीतरागता को नमन । हमारे भीतर मैत्री, करूणा का स्ोत  फूटे । अरिहंत प्रभु का व्यक्तित्व अत्यन्त शान्त है । जैन धर्म में अरिहंत सर्वोपरि हैं, उनका एक संदेश अहिंसा, अपरिग्रह और अनेकान्त है । आज सारा विश्व हिंसा में झुलस रहा है इसी से दूर रहने के लिए प्रभु महावीर ने अहिंसा का विकल्प दिया । विश्व के प्रत्येक प्राणी से मेरा प्यार है, ऐसे भाव जब भीतर आ जाएंगें तब हम अहिंसामय हो जाएंगें । प्रभु महावीर का चित्र देखते ही हमारे भीतर शान्ति, समता प्रवाहित होती है । जो आत्मा के सार को प्राप्त कर लेता है वह सब कुछ प्राप्त कर लेता है । संसार के सभी महापुरूषों ने यही संदेश दिया । शान्ति में आ जाओ, समतामय हो जाओ । सभी सम्बन्ध बाहर के हैं । सब संयोग है । निश्चयनय से हम सभी एक शुद्धात्मा हैं । प्रभु महावीर का यह संदेश हमें इस जीवन को उन्नति की ओर ले जाता है । 

आज हमारे बीच ‘आर्ट आॅफ लिविंग’ के प्रणेता श्री श्री रविशंकर जी आए जिनको पूरा विश्व जानता है । विश्व के 164 देशों में आपका कार्य चल रहा है । आप व्यक्ति को किस प्रकार जीना चाहिए, उसके भीतर शान्ति, समता, मैत्री किस प्रकार आए यह सुदर्शन क्रिया, ध्यान साधना के द्वारा बता रहे हैं । आज इसका प्रचार पूरे विश्व में हो रहा है । आपके भीतर महावीर की अहिंसा, बुद्ध की करूणा, जीसस की मैत्री प्रत्यक्ष दृश्यमान होती है ।  कुछ ही दिनों पूर्व आप पाकिस्तान जाकर आए और वहाॅं के कई लोगों ने आपसे शाकाहार का नियम लिया । आप भी शाकाहार हो बढ़ावा देते हैं । विश्व में शान्ति के लिए आपका नाम ‘नोबल पुरस्कार’ में आने की चर्चा चल रही है । 

इस अवसर पर श्रीश्री ने अपनी बात रखते हुए कहा कि- मैं आपसे सुनने आया हूॅं । प्रतिदिन बोलते हैं कभी सुनना भी चाहिए । सबको हमारा बहुत-2 प्यार । अमृत पाने के बाद कुछ पाने की इच्छा ही नहीं होती । आपने सब कुछ दे दिया है, ध्यान यानि मन को खाली करना । मन और शरीर का अलग-2 नियम है । मन का नियम विपरीत है । जैसा हो रहा है उसे होने दो । शरीर को स्थिर कर दो, मन को ढीला करते हुए विश्राम में जाना ही ध्यान ंहै । सबका मंगल-भाव स्वीकार करो । मैत्री में मन अटकता नहीं, राग में मन अटकता है । मन लहर है आत्म समुद्र है जिस प्रकार समुद्र मंे लहरें उठती हैं और उसमें विलीन हो जाती हैं उसी प्रकार आत्मा में मन रूपी लहरें उठ रही हैं हम उनको फिर आत्मा में विलीन कर दें । सब तरह की चेष्टा छोड़कर अपने आपमें विलीन होना ही ध्यान है ।  

इस अवसर पर भानूजी जो कि श्रीश्री जी की बहिन हैं उन्होंने अपनी भावनाएं भजन के द्वारा प्रस्तुत की । श्रीश्रीजी के यहाॅं पधारने पर आचार्य श्री शिवमुनि जी म0 चातुर्मास कमेटी एवं जैन सभा की ओर से श्रीश्रीजी का स्वागत सम्मान किया गया । आचार्यश्रीजी द्वारा प्रदत्त ‘आत्म: ध्यान साधना कोर्स - बेसिक’ 21 से 25 जुलाई, 2004 को प्रातः 5.30 से 7.30 बजे तक गतिमान है जिसमें करीब 50 भाई बहिन ‘जीवन जीने की कला’ के सूत्रों के साथ प्राणायाम और ध्यान का अनुभव कर रहे हैं । आगामी ‘बेसिक कोर्स’ 25 से 29 जुलाई, 2004 तक शाम 4.00 से 6.00 बजे तक होगा । भाई बहिन मन की शान्ति, भीतर का आनंद प्राप्त करने हेतु इस साधना कोर्स में अवश्य भाग लेवें ।

संजीव जैन, मंत्री

श्री एस0 एस0 जैन सभा

सेक्टर 18 डी, चण्डीगढ़

 

व्यक्तित्व विकास के सूत्र: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़: 26 जुलाई, 2004: विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य श्री शिवमुनि जी महाराज वर्षावास हेतु चण्डीगढ़ के सेक्टर 18 डी जैन स्थानक में विराजमान हैं । उनके मौलिक जीवनोपयोगी प्रवचन प्रतिदिन प्रातः 8.15 से 9.30 बजे तक हो रहे हैं । इस अवसर पर आज के प्रवचन में आचार्यश्रीजी ने विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के अन्तर्गत व्यक्तित्व विकास पर अपनी भावनाएॅं अभिव्यक्त करते हुए कहा कि हमारे जीवन का एक उद्देश्य होना   चाहिए । उद्देश्य से व्यक्तित्व का विकास होता है । अरिहंत प्रभु को नमन करते हुए आचार्यश्रीजी ने उनके अनंतज्ञान को भी नमन किया । नमन इसलिए कि उस ज्ञान के महासागर में हम भी डूबकी लगा सकें, जितना चित्त, सहज, शान्त मंगलभाव से भरा होता है उसी क्षण तुम्हारा चित्त भीतर चला जाएगा । परमात्मा की वर्षा प्रतिपल हो रही है । हमारी भावनाएं उसे ग्रहण करने की होनी चाहिए । 

हमारे जीवन का उद्देश्य क्या है ? आम व्यक्ति जब हमारे पास आते हैं तो वे कहते हैं महाराज फैक्ट्री चल जो, दुकान चल जाये, घर में सर्व़ आनंद हो । 21 वीं सदी के व्यक्ति का यही उद्देश्य रह गया है । जन्म से जीवन जब तक चलेगा तब तक अपना पुरूषार्थ काम करता है । पूर्वभव में आपने जो पुण्य उपार्जन किया है वह पूंजी हमें आगे ले जा रही है । जीवन का उद्देश्य महान रखो । जीवन प्रभु महावीर को भी मिला । उन्हें भी यही शरीर प्राप्त हुआ, उन्होंने इस शरीर से वीतरागता प्राप्त की । हम भी इस शरीर से उस महापथ पर आगे बढ़ें । जैन धर्म में शाकाहार और अहिंसा सर्वोत्तम है । महात्मां गाॅंधी के जीवन का उद्देश्य कितना उच्च था । उन्होंने चाहा था कि जब तक मेरा जीवन रहे तब तक इस संसार में जितने भी लोग हैं मैं उनके आंसू पौछ दूॅं, उनके दुःख को मिटा दूं । 

हमारा उद्देश्य भी इसी प्रकार महान् होना चाहिए । सुबह प्रार्थना करो । खाने से पूर्व नवकार मंत्र पढ़ो । जीवन में दो बातें हमेशा ध्यान रखो- मैं कुछ भी नहीं जानता और परम्   विनय । इससे जीवन में वीतरागता आती है । एक ही ज्ञान का चक्षु है वह है सहज विवेक । इसी से आप सब कुछ जान सकते  हैं । 

आचार्यश्रीजी द्वारा प्रदत्त ‘आत्म: ध्यान साधना कोर्स - बेसिक’ 25 से 29 जुलाई, 2004 तक प्रतिदिन सायं 4.00 से 6.00 बजे तक गतिमान है जिसमें करीब 50 भाई बहिन ‘जीवन जीने की कला’ के सूत्रों के साथ प्राणायाम और ध्यान का अनुभव कर रहे हैं । आगामी ‘एडवांस कोर्स’ 30 जुलाई से 1 अगस्त, 2004 तक प्रातः 6.00 से सायं 5.00 बजे तक तक प्रतिदिन होगा । भाई बहिन मन की शान्ति, भीतर का आनंद प्राप्त करने हेतु इस साधना कोर्स में अवश्य भाग लेवें ।

 

आत्म दृष्टि अपनाइए और मुक्ति पाइए: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़: 27 जुलाई, 2004: विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज वर्षावास हेतु चण्डीगढ़ के सेक्टर 18 डी जैन स्थानक में विराजमान हैं । उनके मौलिक जीवनोपयोगी प्रवचन प्रतिदिन प्रातः 8.15 से 9.30 बजे तक हो रहे हैं । इस अवसर पर आज के प्रवचन में फरमाया कि- अरिहंत प्रभु को नमन करते हुए हमारे भीतर भी एक नमन का भाव आता है, जिसका हम गुण कीर्तन करते हैं, जिसके प्रति हमारा श्रद्धा भाव होता है उसके प्रति उतना ही अन्तःकरण से नमन का भाव आता है । जिसको हम नमन करते हैं झुकते हैं, अकेले हम नहीं झुकते बल्कि वह चाहे सत्गुरू हो या माता पिता हो सभी हमारे झुकने के साथ ही वे भी झुकते हैं जब हम झुक-कर नमन करते हैं तो वे हमें आशीर्वाद देने के लिए झुकते हैं । गुरू कुछ न करते हुए भी सब कुछ करते हैं, मौन में रहकर सब कुछ कह जाते हैं । सत्गुरू का सान्निध्य ही हमारे जीवन को बदल देता है । नमन के शब्दों के साथ ही हमारे भीतर का भाव झलकने लगता है । नदी के किनारे जाओगे तो ठण्डक मिलेगी । अग्नि के पास बैठे तो तपस मिलेगी । इसी प्रकार प्रभु का सिमरण गुरू स्मरण हमारे जीवन को नया मोड़ देता है । शायर ने ठीक ही कहा है-

‘झुकाई जब से तेरे कदमों में खुदी मैंने ।

 पाई सारे जहां की खुशी मैंने ।।’

झुकने पर ही हमें सब कुछ मिलता है । परमात्म या प्रभु महावीर के ज्ञान की विवेक से अपनी तुलना करें । उसकी नजर से देखो तो नजर बदल जाएगी । जब किसी को हम बहुत आत्मीयता से निहारते हैं तो हमारे भीतर आत्मीयता पहले ही भर जाती है, बाद में उसे मिलता है । करूणा या मैत्री सब कुछ दोनों तरफ से बहती है । सब कुछ हमारी दृष्टि में समाया हुआ है । दृष्टि का ही अन्तर है । दो दृष्टि है- एक है कर्मदृष्टि और दूसरी है आत्मिक  दृष्टि । जहां क्रोध, वासना, अहंकार है वहाॅं संसार है । वह कर्म दृष्टि है । जहां पर सब कुछ हम परमात्म के या गुरू के चरणों में छोड़ देते हैं और भीतर से कहते हैं प्रभु ! मैंने कुछ भी नहीं किया । प्रभु सब आपकी कृपा है ये है आत्म-दृष्टि । जैसे गंगा का जल गंदी नाली में गया तो गंदा हो गया और गंदी नाली का जल गंगा में गया तो पवित्र हो गया । ऐसे ही हमारी दृष्टि का महत्व है । कर्मों का मूल कारण है कर्म दृष्टि । इसलिए आत्म-दृष्टि अपनाइए और मुक्ति पाइए । 

आचार्यश्रीजी द्वारा प्रदत्त ‘आत्म: ध्यान साधना कोर्स - बेसिक’ 25 से 29 जुलाई, 2004 तक प्रतिदिन सायं 4.00 से 6.00 बजे तक गतिमान है जिसमें करीब 50 भाई बहिन ‘जीवन जीने की कला’ के सूत्रों के साथ प्राणायाम और ध्यान का अनुभव कर रहे हैं । आगामी ‘एडवांस कोर्स’ 30 जुलाई से 1 अगस्त, 2004 तक प्रातः 6.00 से सायं 5.00 बजे तक तक प्रतिदिन होगा । भाई बहिन मन की शान्ति, भीतर का आनंद प्राप्त करने हेतु इस साधना कोर्स में अवश्य भाग लेवें ।

 

अध्यात्म पुरूष आत्मदृष्टि में तल्लीन रहते हैं: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़: 28 जुलाई, 2004: विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज वर्षावास हेतु चण्डीगढ़ के सेक्टर 18 डी जैन स्थानक में विराजमान हैं । उनके मौलिक जीवनोपयोगी प्रवचन प्रतिदिन प्रातः 8.15 से 9.30 बजे तक हो रहे हैं । इस अवसर पर आज के प्रवचन में फरमाया कि- जिन्दगी में सदा मुस्कुराते रहो, फासले कम करो दिल मिलाते रहो । साधक पुरूष का यही एक दृष्टिकोण है । इस शरीर का उपयोग हम साधना के लिए भी कर सकते हैं और भोगोपभोग के लिए भी कर सकते हैं । वीतरागवाणी के द्वारा सुन्दर समाधान हमें प्राप्त होता है । यदि हम उसको सरलता और सहजता से स्वीकारें तो । मूल में हम सब एक हैं । सारे परिवर्तन बाहर के हैं । जितनी दृष्टि गहरी होगी उतना अनुभव गहरा हेाता चला जाएगा । 

तुम्हें जीवन में सुखी होना है तो तुम हमेशा अपने से नीचे के लोगों को देखो । नीचे लोगों का तात्पर्य यह है कि वे अपने से धन, पद, प्रतिष्ठा में कम हों । जब तुम्हें दुःखी होना है तो अपने ऊपर के लोगों को देखो । जिन्दगी में सुखी होने के लिए हजार उपाय है और दुःखी होने के लिए भी हजार उपाय है । चुनाव तुम्हारा है क्या तुम चुनना चाहोगे । तुम्हें जो मिला है उसमें तुम सुखी रहो । क्या तुम प्रातः उठकर परमात्मा को याद करते हो । प्रभु की कितनी कृपा है उसने हमें यह शरीर दिया, श्वासें दी, यह जीवन दिया, आज का दिन देखने के लिए दिया । उसने हमें दो हाथ दिये, अगर ये दो हाथ नहीं होते तो हमें हाथों का मूल्य पता चलता । हम इन दो हाथों के द्वारा  हजार शुभ कार्य कर सकते हैं और इनके द्वारा ही किसी को मार सकते हैं, किसी का विनाश, संहार कर सकते हैं । हम अपने जीवन के दृष्टिकोण को बदलें तो हमारा जीवन कुन्दन बन जाएगा । 

तुम्हारें कर्म संस्कार और पुण्य पाथेय से सब कुछ मिलता है । जो भी हमें मिल रहा है वह हमारे कर्म संस्कारों के कारण है । जो नहीं मिल रहा है वह भी हमारे कर्म संस्कारों के कारण है । जो हमें मिला या नहीं मिला यह हमारी योग्यता के ऊपर निर्भर करता है । जब कुछ मिल जाए तो अपने को बड़ा मत समझना और कुछ न मिले तो अपने को छोटा न समझना क्योंकि आत्मा का स्वभाव अगुरूलघुत्व है । व्यक्ति का पुण्य काम करता है । सम्मान अपमान अपने ही पाप पुण्य का परिणाम है । मूल है पुण्य और पाप तुमने पाप किया और निमित्त कोई और बन गया तो तुम्हें नरक और पशु योनि मिलेगी । तुमने पुण्य किया और निमित्त कोई और बन गया तो मानव गति और स्वर्ग जैसी उच्चगति मिलेगी । जीवन का महत्व समझो । आत्म-दृष्टि को भीतर उतारो । 

आचार्यश्रीजी द्वारा प्रदत्त ‘आत्म: ध्यान साधना कोर्स - बेसिक’ 25 से 29 जुलाई, 2004 तक प्रतिदिन सायं 4.00 से 6.00 बजे तक गतिमान है जिसमें करीब 50 भाई बहिन ‘जीवन जीने की कला’ के सूत्रों के साथ प्राणायाम और ध्यान का अनुभव कर रहे हैं । आगामी ‘एडवांस कोर्स’ 30 जुलाई से 1 अगस्त, 2004 तक प्रातः 6.00 से सायं 5.00 बजे तक तक प्रतिदिन होगा । भाई बहिन मन की शान्ति, भीतर का आनंद प्राप्त करने हेतु इस साधना कोर्स में अवश्य भाग लेवें ।

 

आदर्श जीवन के सूत्र: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़: 29 जुलाई, 2004: विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज वर्षावास हेतु चण्डीगढ़ के सेक्टर 18 डी, एस0 एस0 जैन सभा, जैन स्थानक में विराजमान हैं । उनके मौलिक जीवनोपयोगी प्रवचन प्रतिदिन प्रातः 8.15 से 9.30 बजे तक हो रहे हैं । इस अवसर पर आज के प्रवचन में फरमाया कि- ज्ञानी एक आत्मा को देखते हैं । वे साहसी होते हैं । आत्म-ज्ञानी वही जो अभेद को देखता है । भेद हमारी दृष्टि में है । भेद शरीर के हैं । बचपन, जवानी, बुढ़ापा आत्मा के नहीं,ं शरीर के होते   हैं । सबसे बड़ी बाधा है कि मैं बड़ा हूॅं । यह संसार अहंकार से भरा हुआ है । संसार में त्यागने के लिए दो ही बाते हैं एक है ममकार और दूसरा है अहंकार । ममकार यानि यह मेरा, यह मेरा । संसार की वस्तुएं मेरी   है । अहंकार में ‘मैं’ आ जाता है और ममकार में ‘मेरा’ आ जाता है । यह मैं और मेरा मुक्ति प्राप्ति में सबसे बड़ी बाधा है । मैंने यह किया, वह किया स्वयं अपनी प्रशंसा करने से कर्म-ब्ंाधन होते हैं । लोग तुम्हारा नाम लें यह अच्छी बात है । 

मुफ्त की चीज कभी मत लेना । वह बहुत महंगी पड़ती है । मेहनत करो । जहां नम्रता है वहाॅं सहजता है । आदर्श जीवन जीने हेतु छोटी-2 बातों को जीवन में अंगीकार करना चाहिए । जब तुम महावीर को नमस्कार करते हो तो उनके गुणों का स्मरण स्वतः ही हो जाता है । आपको स्मरण करते ही उसकी ज्वाला, ऊष्मा स्वतः ही अनुभव होने लगती   है । आप शब्द ही हमारे भीतर ऊष्मा पैदा कर देता है । पानी कहते ही ठण्डक महसूस होने लगती है एवं पानी के उद्गम श्रोतों का स्मरण होता है । उसी प्रकार जब हम वीतरागी आत्माओं का स्मरण करेंगे तो हमारा अहंकार ममकार पिघलने लगेगा और नमन की शुरूआत हो जाएगी । जब दृष्टि में मंगल होता है तब अमंगल की शुरूआत होती है । अपनी आत्मा को शुद्धोपयोग में लगा लो । आत्म-दृष्टि का चिन्तन करो । दृष्टि बदल गई जीवन बदल जाएगा ।   

आचार्यश्रीजी द्वारा प्रदत्त ‘आत्म: ध्यान साधना कोर्स - बेसिक’ 25 से 29 जुलाई, 2004 तक प्रतिदिन सायं 4.00 से 6.00 बजे तक गतिमान है जिसमें करीब 50 भाई बहिन ‘जीवन जीने की कला’ के सूत्रों के साथ प्राणायाम और ध्यान का अनुभव कर रहे हैं । आगामी ‘एडवांस कोर्स’ 30 जुलाई से 1 अगस्त, 2004 तक प्रातः 6.00 से सायं 5.00 बजे तक तक प्रतिदिन होगा । भाई बहिन मन की शान्ति, भीतर का आनंद प्राप्त करने हेतु इस साधना कोर्स में अवश्य भाग लेवें ।

महावीर की दृष्टि से अपना मूल्यांकन करो: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़: 31 जुलाई, 2004: विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज वर्षावास हेतु चण्डीगढ़ के सेक्टर 18 डी, एस0 एस0 जैन सभा, जैन स्थानक में विराजमान हैं । उनके मौलिक जीवनोपयोगी प्रवचन प्रतिदिन प्रातः 8.15 से 9.30 बजे तक हो रहे हैं । इस अवसर पर आज के प्रवचन में फरमाया कि- अरिहंत प्रभु को नमन, उनकी वीतरागता को नमन, उनके आनंद, शान्ति को नमन इसलिए कि हमारे भीतर भी आनंद, शान्ति आए, आत्मदृष्टि आए । जिसको भावपूर्वक नमन करते हैं हम उसी तरह हो जाते हैं । अरिहंत की वाणी का एक अक्षर भी हम कम नहीं कर सकते । उन्होंने दीर्ध दृष्टि से पूर्व में ही पृथ्वी, अग्नि, जल, वायु में जीवों को बताया । जमीकंद में भी अनंतकाय जीव बताये । जमीकंद तामसिक है, हम सात्विक आहार करें । भगवान की वाणी को भीतर उतारें । आहार का हमारे जीवन पर गहरा प्रभाव होता   है । जैसा आहार करोगे वैसा ही मन बनता चला जाएगा । 

हम प्रभु महावीर की दृष्टि से अपना मूल्यांकन करें । प्रभु ने उस समय दीर्घ दृष्टि से वर्तमान के व्यक्ति को क्या आवश्यकता है सब कह दिया था । पुण्य वो जो आत्मा की ओर ले जाए, पाप वह है जो संसार की ओर ले जाये । आत्मा के लिए जीना यानि प्रार्थना, स्वाध्याय, सेवा, दान, तप, जप आदि करना । संसार के लिए जीना एक बेड़ी के समान है । चाहे वह लोहे की बेड़ी हो या सोने की । बेड़ी तो बेड़ी ही है । चार प्रकार के व्यक्ति बतलाये गये   हैं । एक पुण्यानुबंधी पुण्य वाले, दूसरे पुण्यानुबंधी पाप वाले, तीसरे पापानुबंधी पाप वाले और चैथे पापानुबंधी पुण्य वाले । पुण्यानुबंधी पुण्य वाले वे हैं जिन्होंने पूर्वभाव में पुण्य  कमाया । इस भव में भी पुण्य भोगते हुए पुण्य कमा रहे हैं । पुण्यानुबंधी पाप वाले वे जीव हैं जो पूर्वभव में पुण्य तो कमाकर आये परन्तु इस भव में पाप ही करते जा रहे हैं । पापानुबंधी पाप वाले वे व्यक्ति हैं जिन्होंने पूर्व भव में भी पाप किया था और इस जन्म में भी पाप कर रहे हैं । पापानुबंधी पुण्य वाले वे व्यक्ति हैं जिन्होंने पूर्वभव में पाप किया था परन्तु इस भव में पुण्य कमाकर कर्म-निर्जरा कर रहे हैं । पुण्यवान जीव जब गर्भ में आता है तो सब तरफ से पुण्य ही होता है, माता के विचार भी शुद्ध हो जाते हैं । जब भीतर मन, वचन, काया से किसी भी जीव को दुःख न देने का संकल्प होगा तब पुण्य का उपार्जन होगा । मन से बुरा सोचना, वचन से गलत बोलना एवं काया से अशुभ कार्य करना यह पाप कहलाता है । इनके विपरीत पुण्य होता है, हम जीवन में सुखी रहते हुए सुन्दर ढंग से जीवन जी सकते हैं, परन्तु हम इस समय भी संसार के कार्यों में उलझे हुए हैं । प्रभु महावीर की आत्म-दृष्टि को समझंे, उसमें रमण करें । 

आचार्यश्रीजी द्वारा प्रदत्त ‘आत्म: ध्यान साधना कोर्स - एडवांस- ा’ 30 जुलाई से 1 अगस्त तक प्रातः 6.00 बजे से सायं 5.00 बजे प्रारंभ हुआ जिसमें करीब 25 साधक साधना करते हुए जीवन जीने की कला के सूत्रों को अपने भीतर उतार रहे हैं । आगामी बेसिक कोर्स 4 से 8 अगस्त, 2004 तक प्रातः 5.30 से 7.30 बजे तक होगा । भाई बहिन मन की शान्ति, भीतर का आनंद प्राप्त करने हेतु इस साधना कोर्स में अवश्य भाग लेवें ।

 

प्रभु का सिमरण आवश्यक है - जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़: 1 अगस्त, 2004: विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज वर्षावास हेतु चण्डीगढ़ के सेक्टर 18 डी, एस0 एस0 जैन सभा, जैन स्थानक में विराजमान हैं । उनके मौलिक जीवनोपयोगी प्रवचन प्रतिदिन प्रातः 8.15 से 9.30 बजे तक हो रहे हैं । इस अवसर पर आज के प्रवचन में फरमाया कि- प्रभु का सिमरन, भक्ति, आराधना, अर्चना हमारे चित्त को निर्मल करती है । सोते समय और उठते समय प्रभु भक्ति अवश्य करें । प्रभुनाम प्रतिपल प्रतिक्षण उच्चारित करते रहो । यह नाम ही हमारे पुण्य-उपार्जन का अनमोल साधन है । 

सिमरन का बहुत बड़ा महत्व  है । क्या खाते हो यह महत्वपूर्ण नहीं है, मुंह से क्या निकलता है वह महत्वपूर्ण है । तुम्हारी मेहनत रंग लाती है । श्रद्धा, भक्ति से बनाया गया भोजन व्यक्ति के अंग-2 में श्रद्धा, भक्ति भर देता है । आचार्यश्रीजी ने इस बात को बताते हुए गुरूनानक का संस्मरण सुनाते हुए कहा कि- गुरूनानक को एक शहर के सेठ ने तथा एक गरीब व्यक्ति ने भोजन के लिए एक ही समय आमंत्रित किया । गुरू नानक ने गरीब व्यक्ति का भोजन स्वीकारा, जब शहर के सेठ को पता चला तब वह भी अपना भोजन लेकर वहाॅं उपस्थित हुआ । गुरू नानक ने गरीब व्यक्ति का भोजन एक हाथ में लिया एवं सेठ का भोजन दूसरे हाथ में लेकर सबके समक्ष दिखाया तो गरीब व्यक्ति के भोजन से दूध की धारा निकली एवं सेठ के भोजन से खून की धारा निकली, यह है भक्ति का चमत्कार । विदुर की पत्नी के भक्ति थी, भक्ति के कारण श्रीकृष्ण ने दुर्योधन के छत्तीस प्रकार के भोजन को छोड़कर विदुर के घर केले के छिलके खाये । 

जहां अहंकार है वहाॅं मैत्री नहीं आ सकती । अनंत मैत्री और करूणा का भाव आ गया तो समझो तुम वीतरागता के मार्ग पर अग्रसर हो गये, यही बात कबीर ने कही है । उन्होंने कहा- मैं अनुभव की बात को स्वीकारता हूॅं । जो समक्ष देखा जाता है मैं उसे स्वीकारता हूॅं । कृतज्ञता को जीवन में लाओ । अपने परिवार के प्रति । अपने माता पिता गुरू के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करो । भोजन बनाते समय एवं खाते समय भीतर प्रार्थना के भाव एवं कृतज्ञता के भाव आवश्यक है । आचार्यश्रीजी के प्रतिदिन प्रवचन आस्था चैनल पर 2 अगस्त, 2004 से रात्रि 9.45 से 10.05 तक 150 देशों में प्रसारित होंगे जिसका लाभ सभी वर्ग के श्रद्धालुओं को मिलेगा । आचार्यश्रीजी द्वारा प्रदत्त ‘आत्म: ध्यान साधना कोर्स - बेसिक कोर्स 4 से 8 अगस्त, 2004 तक प्रातः 5.30 से 7.30 बजे तक होगा । भाई बहिन मन की शान्ति, भीतर का आनंद प्राप्त करने हेतु इस साधना कोर्स में अवश्य भाग लेवें ।

संजीव जैन

मंत्री- एस0 एस0 जैन सभा

सेक्टर 18 डी, चण्डीगढ़

 

अपमान विटामिन है और मान जहर है: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़: 30 जुलाई, 2004: विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज वर्षावास हेतु चण्डीगढ़ के सेक्टर 18 डी, एस0 एस0 जैन सभा, जैन स्थानक में विराजमान हैं । उनके मौलिक जीवनोपयोगी प्रवचन प्रतिदिन प्रातः 8.15 से 9.30 बजे तक हो रहे हैं । इस अवसर पर आज के प्रवचन में फरमाया कि- प्रभु महावीर की आत्म-दृष्टि में ज्ञान और अज्ञान क्या है ? ज्ञान है निज का स्वरूप, स्वयं का बोध, आत्मा के आत्मिक गुणों को जानना और देखना । सिद्ध और संसारी में एक ही अन्तर है, सिद्ध हमेशा आत्मा में रमण करते हैं, वे जानते और देखते हैं, संसारी संसार में रहता हुआ जानने और देखने के साथ-2 प्रतिक्रिया भी करता है । संसारी अहंकार करता है और अहंकार ही कर्म बंधन का कारण है । अपमान विटामिन है और मान जहर है । अपमान को सहन करोगे तो कर्म निर्जरा होगी और मान करोगे तो कर्म-बंधन होगा । लोग तुम्हारा सम्मान करें अच्छा है । तुम सम्मान की इच्छा मत रखना । प्रभु चरणों में सब कुछ समर्पित कर देना । प्रभु ! मेरा कुछ भी नहीं है, तेरा तुझको अर्पण है ऐसी भावना भावित करना । 

आचार्यश्रीजी ने साधना और सेवा पर विशेष भावनाएं व्यक्त करते हुए कहा कि जीवन में दो बातें अपना लेना, जीवन कुन्दन नन्दनवन बन जाएगा । साधना और सेवा । साधना करते समय समर्पण में रहना और सेवा करते समय अहंकार मत करना । प्रमाद सूंक्ष्म रूप से भी अपने भीतर मत लाना । अप्रमादी बनकर रहना । प्रमादी बनकर मनोरंजन और ध्यान भी किया जा सकता है, परन्तु उस ध्यान में हम कर्म-निर्जरा नहीं, कर्म-बंधन करते हैं । लोगों की दृष्टि में तो वह ध्यान होगा परन्तु भीतर की दृष्टि में वह अहंकार हो जाएगा । आत्मा का विभाव है अज्ञान और स्वभाव है ज्ञान । अज्ञान में कर्म-ब्ंाधन मत करना । कर्म-दृष्टि में नहीं आत्म दृष्टि में रमण करना ।  

आचार्यश्रीजी द्वारा प्रदत्त ‘आत्म: ध्यान साधना कोर्स - एडवांस- ा’ 30 जुलाई से 1 अगस्त तक प्रातः 6.00 बजे से सायं 5.00 बजे प्रारंभ हुआ जिसमें करीब 25 साधक साधना करते हुए जीवन जीने की कला के सूत्रों को अपने भीतर उतार रहे हैं । आगामी बेसिक कोर्स 4 से 8 अगस्त, 2004 तक प्रातः 5.30 से 7.30 बजे तक होगा । भाई बहिन मन की शान्ति, भीतर का आनंद प्राप्त करने हेतु इस साधना कोर्स में अवश्य भाग लेवें ।

 

महावीर की दृष्टि से अपना मूल्यांकन करो: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़: 31 जुलाई, 2004: विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज वर्षावास हेतु चण्डीगढ़ के सेक्टर 18 डी, एस0 एस0 जैन सभा, जैन स्थानक में विराजमान हैं । उनके मौलिक जीवनोपयोगी प्रवचन प्रतिदिन प्रातः 8.15 से 9.30 बजे तक हो रहे हैं । इस अवसर पर आज के प्रवचन में फरमाया कि- अरिहंत प्रभु को नमन, उनकी वीतरागता को नमन, उनके आनंद, शान्ति को नमन इसलिए कि हमारे भीतर भी आनंद, शान्ति आए, आत्मदृष्टि आए । जिसको भावपूर्वक नमन करते हैं हम उसी तरह हो जाते हैं । अरिहंत की वाणी का एक अक्षर भी हम कम नहीं कर सकते । उन्होंने दीर्ध दृष्टि से पूर्व में ही पृथ्वी, अग्नि, जल, वायु में जीवों को बताया । जमीकंद में भी अनंतकाय जीव बताये । जमीकंद तामसिक है, हम सात्विक आहार करें । भगवान की वाणी को भीतर उतारें । आहार का हमारे जीवन पर गहरा प्रभाव होता   है । जैसा आहार करोगे वैसा ही मन बनता चला जाएगा । 

हम प्रभु महावीर की दृष्टि से अपना मूल्यांकन करें । प्रभु ने उस समय दीर्घ दृष्टि से वर्तमान के व्यक्ति को क्या आवश्यकता है सब कह दिया था । पुण्य वो जो आत्मा की ओर ले जाए, पाप वह है जो संसार की ओर ले जाये । आत्मा के लिए जीना यानि प्रार्थना, स्वाध्याय, सेवा, दान, तप, जप आदि करना । संसार के लिए जीना एक बेड़ी के समान है । चाहे वह लोहे की बेड़ी हो या सोने की । बेड़ी तो बेड़ी ही है । चार प्रकार के व्यक्ति बतलाये गये   हैं । एक पुण्यानुबंधी पुण्य वाले, दूसरे पुण्यानुबंधी पाप वाले, तीसरे पापानुबंधी पाप वाले और चैथे पापानुबंधी पुण्य वाले । पुण्यानुबंधी पुण्य वाले वे हैं जिन्होंने पूर्वभाव में पुण्य  कमाया । इस भव में भी पुण्य भोगते हुए पुण्य कमा रहे हैं । पुण्यानुबंधी पाप वाले वे जीव हैं जो पूर्वभव में पुण्य तो कमाकर आये परन्तु इस भव में पाप ही करते जा रहे हैं । पापानुबंधी पाप वाले वे व्यक्ति हैं जिन्होंने पूर्व भव में भी पाप किया था और इस जन्म में भी पाप कर रहे हैं । पापानुबंधी पुण्य वाले वे व्यक्ति हैं जिन्होंने पूर्वभव में पाप किया था परन्तु इस भव में पुण्य कमाकर कर्म-निर्जरा कर रहे हैं । पुण्यवान जीव जब गर्भ में आता है तो सब तरफ से पुण्य ही होता है, माता के विचार भी शुद्ध हो जाते हैं । जब भीतर मन, वचन, काया से किसी भी जीव को दुःख न देने का संकल्प होगा तब पुण्य का उपार्जन होगा । मन से बुरा सोचना, वचन से गलत बोलना एवं काया से अशुभ कार्य करना यह पाप कहलाता है । इनके विपरीत पुण्य होता है, हम जीवन में सुखी रहते हुए सुन्दर ढंग से जीवन जी सकते हैं, परन्तु हम इस समय भी संसार के कार्यों में उलझे हुए हैं । प्रभु महावीर की आत्म-दृष्टि को समझंे, उसमें रमण करें । 

आचार्यश्रीजी द्वारा प्रदत्त ‘आत्म: ध्यान साधना कोर्स - एडवांस- ा’ 30 जुलाई से 1 अगस्त तक प्रातः 6.00 बजे से सायं 5.00 बजे प्रारंभ हुआ जिसमें करीब 25 साधक साधना करते हुए जीवन जीने की कला के सूत्रों को अपने भीतर उतार रहे हैं । आगामी बेसिक कोर्स 4 से 8 अगस्त, 2004 तक प्रातः 5.30 से 7.30 बजे तक होगा । भाई बहिन मन की शान्ति, भीतर का आनंद प्राप्त करने हेतु इस साधना कोर्स में अवश्य भाग लेवें ।

 

प्रभु का सिमरण आवश्यक है - जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़: 1 अगस्त, 2004: विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज वर्षावास हेतु चण्डीगढ़ के सेक्टर 18 डी, एस0 एस0 जैन सभा, जैन स्थानक में विराजमान हैं । उनके मौलिक जीवनोपयोगी प्रवचन प्रतिदिन प्रातः 8.15 से 9.30 बजे तक हो रहे हैं । इस अवसर पर आज के प्रवचन में फरमाया कि- प्रभु का सिमरन, भक्ति, आराधना, अर्चना हमारे चित्त को निर्मल करती है । सोते समय और उठते समय प्रभु भक्ति अवश्य करें । प्रभुनाम प्रतिपल प्रतिक्षण उच्चारित करते रहो । यह नाम ही हमारे पुण्य-उपार्जन का अनमोल साधन है । 

सिमरन का बहुत बड़ा महत्व  है । क्या खाते हो यह महत्वपूर्ण नहीं है, मुंह से क्या निकलता है वह महत्वपूर्ण है । तुम्हारी मेहनत रंग लाती है । श्रद्धा, भक्ति से बनाया गया भोजन व्यक्ति के अंग-2 में श्रद्धा, भक्ति भर देता है । आचार्यश्रीजी ने इस बात को बताते हुए गुरूनानक का संस्मरण सुनाते हुए कहा कि- गुरूनानक को एक शहर के सेठ ने तथा एक गरीब व्यक्ति ने भोजन के लिए एक ही समय आमंत्रित किया । गुरू नानक ने गरीब व्यक्ति का भोजन स्वीकारा, जब शहर के सेठ को पता चला तब वह भी अपना भोजन लेकर वहाॅं उपस्थित हुआ । गुरू नानक ने गरीब व्यक्ति का भोजन एक हाथ में लिया एवं सेठ का भोजन दूसरे हाथ में लेकर सबके समक्ष दिखाया तो गरीब व्यक्ति के भोजन से दूध की धारा निकली एवं सेठ के भोजन से खून की धारा निकली, यह है भक्ति का चमत्कार । विदुर की पत्नी के भक्ति थी, भक्ति के कारण श्रीकृष्ण ने दुर्योधन के छत्तीस प्रकार के भोजन को छोड़कर विदुर के घर केले के छिलके खाये । 

जहां अहंकार है वहाॅं मैत्री नहीं आ सकती । अनंत मैत्री और करूणा का भाव आ गया तो समझो तुम वीतरागता के मार्ग पर अग्रसर हो गये, यही बात कबीर ने कही है । उन्होंने कहा- मैं अनुभव की बात को स्वीकारता हूॅं । जो समक्ष देखा जाता है मैं उसे स्वीकारता हूॅं । कृतज्ञता को जीवन में लाओ । अपने परिवार के प्रति । अपने माता पिता गुरू के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करो । भोजन बनाते समय एवं खाते समय भीतर प्रार्थना के भाव एवं कृतज्ञता के भाव आवश्यक है । आचार्यश्रीजी के प्रतिदिन प्रवचन आस्था चैनल पर 2 अगस्त, 2004 से रात्रि 9.45 से 10.05 तक 150 देशों में प्रसारित होंगे जिसका लाभ सभी वर्ग के श्रद्धालुओं को मिलेगा । आचार्यश्रीजी द्वारा प्रदत्त ‘आत्म: ध्यान साधना कोर्स - बेसिक कोर्स 4 से 8 अगस्त, 2004 तक प्रातः 5.30 से 7.30 बजे तक होगा । भाई बहिन मन की शान्ति, भीतर का आनंद प्राप्त करने हेतु इस साधना कोर्स में अवश्य भाग लेवें ।

संजीव जैन

मंत्री- एस0 एस0 जैन सभा

सेक्टर 18 डी, चण्डीगढ़

 

प्राकृतिक भोजन करो, शरीर स्वस्थ रहेगा 

आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़: 2 अगस्त, 2004: विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज वर्षावास हेतु चण्डीगढ़ के सेक्टर 18 डी, एस0 एस0 जैन सभा, जैन स्थानक में विराजमान हैं । उनके मौलिक जीवनोपयोगी प्रवचन प्रतिदिन प्रातः 8.15 से 9.30 बजे तक हो रहे हैं । इस अवसर पर आज के प्रवचन में विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के अन्तर्गत अहिंसा, शाकाहार प्रचार प्रसार के अन्तर्गत फरमाया कि- मानव के विचार उसके आहार पर निर्भर है । प्रभु महावीर ने शरीर को एक नौका कहा है, जीव को एक नाविक कहा है । संसार को समुद्र की उपमा दी है एवं महर्षिजन उसे पार कर लेते हैं क्योंकि वे शुद्ध सात्विक आहार ग्रहण करते हैं । शरीर भोजन से बनता है, हर एक पशु पक्षी का अपना-2 भोजन है । संसार में ऐसे भी पक्षी है जो कभी मांसाहार नहीं करते एवं रात्रि भोजन भी नहीं करते । हाथी जैसा प्राणी भी शाकाहारी है । वह शेर से अधिक बलवान होता है । प्रभु ने शरीर को बहुत महत्व दिया । शरीर हमारा साधन है जिसका सहारा लेकर हम साधना कर सकते हैं एवं अपने साध्य की प्राप्ति कर सकते हैं । 

आज के इस युग में फास्टफूड का रिवाज चल रहा है । हर कोई फास्टफूड खाकर खुशी है । फास्टफूड में मैदे से युक्त खाना होता है जो आंतड़ियों में जम जाता है । मैगी, पीजा, नूड्ल्स, कोल्ड-ड्रीक्स शरीर के लिए हानिकारक है । शरीर की सुन्दरता हमारे आहार पर निर्भर है । प्राकृतिक भोजन करो, शरीर स्वस्थ रहेगा । शरीर को शुद्ध आहार चाहिए दाल, चावल, दूध, फल, सब्जियां आदि के ग्रहण करने से हमारा शरीर साधना के अनुकूल होता है । अपने शरीर का प्रत्येक रोम आहार करता है । पांचों इन्द्रियां एवं मन भी आहार करता है । आहार का शरीर पर बहुत प्रभाव पड़ता है । जब आप आहार करते हैं उस समय घर का वातावरण मंगलमय हो । शान्ति एवं आनंद का हो । बहिनों के लिए रसोई मोक्ष का द्वार है क्योंकि उनके द्वारा बनाया गया भोजन कोई अतिथि ग्रहण करता है तो श्रावक का बारहवां व्रत पूर्ण होता है । बहनें भोजन बनाते समय मंगल की भावना भावित करें एवं शान्ति, आनंद से उसे परोसे एवं खाये । आज आचार्यश्रीजी के दर्शनार्थ स्थानीय एम0पी0 श्री पवन बांसल उपसिथत हुए जिनके साथ सुन्दर चर्चा धार्मिक, राजनीतिक, आध्यात्मिक विषयों पर हुई, वे अति प्रभावित हुए और पुनः2 दर्शन लाभ लेने की भावना व्यक्त की ।

आचार्यश्रीजी के जीवनोपयोगी प्रवचन प्रतिदिन ‘आस्था चैनल’ पर 2 अगस्त, 2004 से रात्रि 9.45 से 10.05 तक 150 देशों में प्रसारित हो रहे हैं जिसका लाभ सभी वर्ग के श्रावकों को मिलेगा । आचार्यश्रीजी द्वारा प्रदत्त आगामी ‘आत्म: ध्यान साधना कोर्स - बेसिक कोर्स 4 से 8 अगस्त, 2004 तक प्रातः 5.30 से 7.30 बजे तक होगा । भाई बहिन मन की शान्ति, भीतर का आनंद प्राप्त करने हेतु इस साधना कोर्स में अवश्य भाग लेवें ।

संजीव जैन

मंत्री- एस0 एस0 जैन सभा

सेक्टर 18 डी, चण्डीगढ़

 

मनुष्य की दौड़ स्वार्थ की दौड़ है: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी म0

चण्डीगढ़: 5 अगस्त, 2004: विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज वर्षावास हेतु चण्डीगढ़ के सेक्टर 18 डी, एस0 एस0 जैन सभा, जैन स्थानक में विराजमान हैं । उनके मौलिक जीवनोपयोगी प्रवचन प्रतिदिन प्रातः 8.15 से 9.30 बजे तक हो रहे हैं । इस अवसर पर आज के प्रवचन में उन्होंने फरमाया कि- हमारे जीवन में आनंद, शान्ति, सुख की अभिवृद्धि कैसे हो । हम समाधि में कैसे आएं, मनुष्य की खोज निरन्तर चलती रहती है । मनुष्य के सारे पुरूषार्थ के पीछे स्वार्थ है । मनुष्य की दौड़ स्वार्थ की दौड़ है । वह धर्म भी करना चाहता है तो स्वार्थ से । उसके भीतर स्वार्थ की भावना निरन्तर बनी रहती है । मैं कुछ करूंगा तो मुझे मिले । धन, पद, यश, प्रतिष्ठा, मान, सम्मान की चाहना उसकी निरन्तर बनी रहती है, परन्तु इससे समृद्धि, शान्ति, आनंद नहीं आ सकता । प्रभु परमात्मा इतना देता है  कि हमसे संभाला नहीं जाता, अगर आपको कुछ चाहिए तो प्रभु की भक्ति करो, परन्तु वह भक्ति भी निःस्वार्थ हो । 

किसी से ऐसे मिलो जैसे वर्षों से जानते हो और विदाई ऐसे दो कि हमारा उससे कोई रिश्ता या वास्ता ही नहीं है । अनंतकाल से हम संबंध बनाते आ रहे हैं । हर भव में हम संबंध बनाते चले जाते हैं । दुनियां का प्रत्येक संबंध हमने बनाया है, अब एक ही संबंध स्थापित करो परमातमा से सिद्ध प्रभु से प्रातः उठते समय अरिहंत को नमन करो, सिद्ध प्रभु को याद करो । यदि तुम आत्म-दृष्टि से देखोगे तो हममें इतना सुख है, इतनी शान्ति है जिसे हम आसानी से प्राप्त कर सकते हैं । आवश्यक है मन को एकाग्र करने की । विचारों को महत्व न दो । ध्यान करे, अरिहंतों के गुणों का स्मरण करो । जितना शरीर से, इस मन से प्रभु की लौ लगा लोगे उतनी ही भीतर शान्ति प्रस्थापित होगी । 

आचार्यश्रीजी के जीवनोपयोगी प्रवचन प्रतिदिन ‘आस्था चैनल’ पर 2 अगस्त, 2004 से रात्रि 9.45 से 10.05 तक 150 देशों में प्रसारित हो रहे हैं जिसका लाभ सभी वर्ग के श्रावकों को मिलेगा । आचार्यश्रीजी द्वारा प्रदत्त आगामी ‘आत्म: ध्यान साधना कोर्स - बेसिक कोर्स 4 से 8 अगस्त, 2004 तक प्रातः 5.30 से 7.30 बजे तक होगा । भाई बहिन मन की शान्ति, भीतर का आनंद प्राप्त करने हेतु इस साधना कोर्स में अवश्य भाग लेवें ।

संजीव जैन

मंत्री- एस0 एस0 जैन सभा

सेक्टर 18 डी, चण्डीगढ़

 

चण्डीगढ़: 6 अगस्त, 2004: विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज वर्षावास हेतु चण्डीगढ़ के सेक्टर 18 डी, एस0 एस0 जैन सभा, जैन स्थानक में विराजमान हैं । उनके मौलिक जीवनोपयोगी प्रवचन प्रतिदिन प्रातः 8.15 से 9.30 बजे तक हो रहे हैं । इस अवसर पर आज के प्रवचन में उन्होंने फरमाया कि- अरिहंत प्रभु को नमन । नमन हमारे जीवन का रूपान्तरण करता है । अरिहंत कोई व्यक्ति नहीं शुद्ध चैतन्य स्वरूप है । धर्म के स्तंभ हैं अरिहंत । आपके शरीर का रोंया-2, खून का कतरा-2 उन्हें याद करते हुए शुद्ध हो जाता है । सिद्ध प्रभु केवल देखते और जानते हैं । प्रतिक्रिया नहीं करते । कर्म दृष्टि, मोह, लोभ, तृष्णा, वासना में है और आत्म-दृष्टि, शुद्धता, निर्मलता, मंगल, शुभ में है । प्रभु की प्रार्थना करते समय अपने शरीर का अंग-अंग उनकी भक्ति में डूबो देना । अरिहंत के भाव भीतर आते हैं तो जीवन रूपान्तरित होता है । 

आत्म-दृष्टि को पोषण करने के लिए प्रभु ने आठ अंग बताये जिसकी चर्चा हम क्रमशः करेंगे । जिसके पास सम्यक् दृष्टि है वो प्रभु की भक्ति करते हैं । उनके चित्त में भय, शंका नहीं होती । वे सत्य को पाने के लिए संकल्प और साहस द्वारा आगे बढ़ते हैं । चैबीस तीर्थंकरों के जीवन में सत्य और साहस था । वे हमेशा सिंह की भांति जीये । साधु भी सिंह की भांति जीता है । वह हमेशा सिंह की भांति पराक्रम करता हुआ अपने मार्ग पर अग्रसर होता है । आचार्यश्रीजी ने इसके अनन्तर सन्यास का अर्थ बतलाते हुए कहा कि सम्यक् रूप से न्यास करना ही सन्यास है । हरेक वस्तु को तोलकर रखना, सुख, दुःख को, हानि, लाभ हो, प्रत्येक के जीवन में कष्ट आते हैं चक्रवर्ति वासुदेव, तीर्थंकर भगवन्तों को भी सुख, दुःख को समता से सहन करना पड़ता है । जब-2 कष्ट आए तब आत्म-दृष्टि से समतोल कर लेना । जब व्यक्ति का अभिमान गिरता है तब सब कुछ गिर जाता है । संशय करने वाला विनाश को प्राप्त होता है एतदर्थ निशंकित बनना, निशंका आत्म-दृष्टि का पहला अंग है । धर्म कार्य, सत्य कार्य में शंका को मत आने देना । संत कभी शंका नहीं करते, उनका मन बुझा-2 होता है और आंखे सोई-2 होती है । संत का लक्षण इसी में है और इसी में ही संतत्व है । 

आचार्यश्रीजी के जीवनोपयोगी प्रवचन प्रतिदिन ‘आस्था चैनल’ पर 2 अगस्त, 2004 से रात्रि 9.45 से 10.05 तक 150 देशों में प्रसारित हो रहे हैं जिसका लाभ सभी वर्ग के श्रावकों को मिलेगा । आचार्यश्रीजी द्वारा प्रदत्त आगामी ‘आत्म: ध्यान साधना कोर्स - बेसिक कोर्स 4 से 8 अगस्त, 2004 तक प्रातः 5.30 से 7.30 बजे तक होगा । भाई बहिन मन की शान्ति, भीतर का आनंद प्राप्त करने हेतु इस साधना कोर्स में अवश्य भाग लेवें ।

संजीव जैन

मंत्री- एस0 एस0 जैन सभा

सेक्टर 18 डी, चण्डीगढ़

 

प्रभु भक्ति और धर्माचरण में शंका मत करना

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़: 7 अगस्त, 2004: विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज वर्षावास हेतु चण्डीगढ़ के सेक्टर 18 डी, एस0 एस0 जैन सभा, जैन स्थानक में विराजमान हैं । उनके मौलिक जीवनोपयोगी प्रवचन प्रतिदिन प्रातः 8.15 से 9.30 बजे तक हो रहे हैं । इस अवसर पर आज के प्रवचन में विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के अन्तर्गत प्रार्थना, ध्यान के विषय पर आचार्यश्रीजी ने फरमाते हुए कहा कि- मानव का जीवन बहुत सुन्दर जीवन है । यह मन, बुद्धि चलती है, निरन्तर दौड़ती है । यह अरिहंत प्रभु के चरणों में लग जाये तो सफल हो जाएगी । एक ही उपाय है जो कुछ भी तुम्हें मिला है उसे बांटकर अरिहंत की भक्ति में लगा दो । 

आचार्यश्रीजी ने सम्यक् दर्शन के आठ अंग की चर्चा को आगे बढ़ाते हुए कहा कि ये आठ अंग जीवन को निर्मल बनाते हैं । सम्यक् दर्शन का पोषण करते हैं । पहला अंग निशंका में रहना । शंका करना जहर है । वह जीवन का रस खत्म कर देती है । प्रभु भक्ति और धर्माचरण में शंका मत करना । धर्म श्रद्धा पर आधारित है । जो है वह समग्र रूप से ग्रहण करना सम्यक् दर्शन है । आपस के संबंधों में भी शंका मत करना । पति पत्नि गुरू शिष्य के भीतर शंका हो जाए तो जीवन पतन की ओर अग्रसर होता है । निकांक्षा दूसरा अंग है । सत्य के मार्ग पर कोई आकांक्षा लेकर मत चलना । प्रभु भक्ति में जितने आंसु गिरेंगे वे मोती बन जाएंगें । हमेशा प्रभु के चरण देखना । जब तुम गुरू की, अरिहंत की भक्ति करते हो तब चित्त को प्रभु के चरणों में लगा देना ।

क्षमा हमेशा बड़ों को करनी चाहिए । छोटे तो उत्पात मचाते हैं उनका ज्ञान कम है । बड़े समझते हैं एतदर्थ उन्होंने क्षमा-भाव से हर परिस्थिति को स्वीकार करना चाहिए । प्रभु महावीर ने गणधर गौतम को आनंद श्रावक के पास क्षमा मांगने भेजा था यह उल्लेख शास्त्रों में आता है । हाथ जोड़ने में ज्यादा महत्व है । प्रार्थना धर्म की शुरूआत नमन से ही होती   है । हाथ जोड़ने से होती है । जब अहंकार शुरू होगा तब विनय के भाव नहीं आएंगें परन्तु जब अहंकार विलीन हो जाएगा तब विनय के भाव आएंगें । भीतर आनंद, शान्ति प्रस्थापित होगी । इस देह का उपयोग भक्ति और विनय के साथ कर लेना चाहिए ।

आचार्यश्रीजी के जीवनोपयोगी प्रवचन प्रतिदिन ‘आस्था चैनल’ पर 2 अगस्त, 2004 से रात्रि 9.45 से 10.05 तक 150 देशों में प्रसारित हो रहे हैं जिसका लाभ सभी वर्ग के श्रावकों को मिलेगा । आचार्यश्रीजी द्वारा प्रदत्त आगामी ‘आत्म: ध्यान साधना कोर्स - बेसिक कोर्स 4 से 8 अगस्त, 2004 तक प्रातः 5.30 से 7.30 बजे तक होगा । भाई बहिन मन की शान्ति, भीतर का आनंद प्राप्त करने हेतु इस साधना कोर्स में अवश्य भाग लेवें ।

संजीव जैन

मंत्री- एस0 एस0 जैन सभा

सेक्टर 18 डी, चण्डीगढ़

 

अरिहंत की शरण मंगलकारी है: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़: 8 अगस्त, 2004: विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज वर्षावास हेतु चण्डीगढ़ के सेक्टर 18 डी, एस0 एस0 जैन सभा, जैन स्थानक में विराजमान हैं । उनके मौलिक जीवनोपयोगी प्रवचन प्रतिदिन प्रातः 8.15 से 9.30 बजे तक हो रहे हैं । इस अवसर पर आज के प्रवचन में विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के अन्तर्गत प्रार्थना, ध्यान के विषय पर आचार्यश्रीजी ने फरमाते हुए कहा कि- अरिहंत देव प्यारे, अपना हमें बना लें

अपना हमें बना लें, चरणों स ेअब लगा लें ।

अरिहंत प्रभु की शरण, उनके चरणों में लौ लग जाती है तो सबसे मंगलकारी है । उनके चरण, उनके दर्शन अत्यन्त सुखकारी है । सचमुच हमारी भक्ति बन जाए तो हमारे दुःख समाप्त हो जाएंगें । हम शुद्ध, पवित्र, निर्मल बन जाएंगें । चार मंगल में पहले अरिहंत मंगल बताए हैं । सिद्ध, साधु, केवली प्ररूपित दया धर्म । काश ! हम उस मंगल में डूब जाते तो जीवन में आकांक्षा, निराशा, दुःख न होता । हमारा अंग-2 खून का कतरा-2 भक्ति में समाहित हो जाए तब अरिहंत के चरण हमें मिल जाते हैं । अपने को झुका देना, विनीत बना देना । प्रभु ! तेरे सिवाय मेरा कुछ भी नहीं है, तू ही सब कुछ है । ऐसी प्रार्थना करना निस्वार्थ भाव से भक्ति करना ।

भक्ति की शुरूआत के लिए सम्यक् दर्शन के आठ अंगों को भीतर उतारना आवश्यक  है । जब सम्यक् दर्शन के आठ अंग भीतर उतर जाएंगें तब भक्ति उद्धृत होंगी । संसार का मूल कारण तृष्णा है । तृष्णा है तो जगत है । आठ अंगों में पहला निशंका और दूसरा आकांक्षा । किसी के प्रति शंका नहीं रखना और किसी भी चीज की चाहना नहीं रखना । जहां अज्ञान है वहां मांग शुरू होती है । जहां राग है वहां द्वेष निराशा होती है । प्रभु के चरणों का चाकर बन जाओ । शुद्ध मन से भक्ति करो । वीतरागता भीतर आ जाएगी । आत्म-दृष्टि भीतर रखो, जीवन सुखी बन जाएगा । अपने जीवन की दृष्टि को बदलो । अपेक्षा से मांग बढ़ती   है । अरिहंत की वाणी, सिद्ध का स्मरण, साधु का संग करो, तृप्त हो   जाओ । आकांक्षा छोड़ दो तो सब तरफ मंगल ही मंगल होगा । 

आज आचार्यश्रीजी के दर्शनार्थ परवाणु, डेराबसी, खरड़, मोहाली, पंचकूला, फगवाड़ा आदि क्षेत्रों से भाई बहिन उपस्थित हुए । 15 अगस्त, 2004 को आचार्यश्रीजी का विशेष प्रवचन भारत के स्वतंत्रता दिवस पर होगा । आप सभी सुनकर जिनवाणी का लाभ उठायें । आचार्यश्रीजी के जीवनोपयोगी प्रवचन प्रतिदिन ‘आस्था चैनल’ पर 2 अगस्त, 2004 से रात्रि 9.45 से 10.05 तक 150 देशों में प्रसारित हो रहे हैं जिसका लाभ सभी वर्ग के श्रावकों को मिलेगा । आचार्यश्रीजी द्वारा प्रदत्त आगामी ‘आत्म: ध्यान साधना कोर्स - बेसिक कोर्स 8 से 12 अगस्त, 2004 तक सायं: 4.00 से 6.00 बजे तक होगा । भाई बहिन मन की शान्ति, भीतर का आनंद प्राप्त करने हेतु इस साधना कोर्स में अवश्य भाग लेवें ।

संजीव जैन

मंत्री- एस0 एस0 जैन सभा

सेक्टर 18 डी, चण्डीगढ़

 

दूसरों के गुणों की प्रशंसा करो : जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

 चण्डीगढ़: 9 अगस्त, 2004: विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज वर्षावास हेतु चण्डीगढ़ के सेक्टर 18 डी, एस0 एस0 जैन सभा, जैन स्थानक में विराजमान हैं । उनके मौलिक जीवनोपयोगी प्रवचन प्रतिदिन प्रातः 8.15 से 9.30 बजे तक हो रहे हैं । इस अवसर पर आज के प्रवचन में विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के अन्तर्गत प्रार्थना, ध्यान के विषय पर आचार्यश्रीजी ने फरमाते हुए कहा कि- यदि हमारा मन सत्गुरू के चरणों में लग जाए, अरिहंत प्रभु के चरणों में लग जाए तो आधि, व्याधि, उपाधि नष्ट होती है । अरिहंत की भक्ति हमें अरिहंत की वीतरागता की ओर ले जाती है । सिद्ध का स्मरण हमें सिद्धत्व की ओर ले जाता है । साधु का संग हमें सत्संग की ओर ले जाता है । जैसा मन में विचार होगा वैसा आचार प्रकट  होगा । व्यक्ति अपने ही कर्म संस्कारों से ऊपर और नीचे की ओर जा रहा है । राम और रावण हमारे समक्ष है, दोनों ही महान् विभूतियां थी, इनके अनेक परिवार थे फिर भी सभी चले गए । नानक की वाणी में कहा गया है:-

 राम गयो रावण गयो, जाकें बहु परिवार, 

कह नानक फिर कुछ नहीं बालू जो संसार ।

नानक कहते हैं राम और रावण के अनेक परिवार थे, फिर भी वे चले गए । संसार में कुछ नहीं है वह एक बालू की भांति है । संसार में स्थिरता नहीं है । अस्थिर संसार से जीवन रेण की भांति हो जाता है । मानव को निर्विचिकित्सा के भाव में रहना चाहिए । अपने दोषों को छुपाना और दूसरों के गुणों को भी छुपाना, यह जुगुप्सा है । मानव ने इसके विपरीत रहना चाहिए । अपने दोषों को उजागर करते हुए दूसरों के गुणों की प्रशंसा करनी चाहिए । सारा संसार इसमें उलझा हुआ    है । आचार्यश्रीजी ने आगे फरमाते हुए कहा कि- छोटी-2 बातों के बहुत बड़े परिणाम आते हैं । द्रोपदी ने दुर्योधन को केवल अंधे की औलाद कहा था । एक वाक्य से महाभारत की रचना हो    गई । उसने कहा था- ’पकड़कर हाथ में लकड़ी करो इमदाद अंधे की, यह अंधा तो नहीं मगर औलाद अंधे की ।’ दुर्योधन नये महल से गुजर रहा था । वह महल शीशे की भांति था । जहां पर पानी होता वहां पर पानी नहीं नजर आता और जहां पर पानी नहीं होता वहां पर पानी नजर   आता । एक बार दुर्योधन ने पानी समझकर अपने कपड़े ऊपर उठा लिए तब द्रोपदी हंसी थी और वही हंसी महाभारत के रूप में प्रगट हो गई । व्यक्ति ने छोटी-2 बातों पर ध्यान न देते हुए अपने जीवन के उद्देश्य को समझना चाहिए । हम अरिहंत प्रभु का सिमरन करें । सिद्धत्व की ओर आगे           बढ़ें । 

15 अगस्त, 2004 को आचार्यश्रीजी का विशेष प्रवचन भारत के स्वतंत्रता दिवस पर होगा । आप सभी सुनकर जिनवाणी का लाभ उठायें । आचार्यश्रीजी के जीवनोपयोगी प्रवचन प्रतिदिन ‘आस्था चैनल’ पर 2 अगस्त, 2004 से रात्रि 9.45 से 10.05 तक 150 देशों में प्रसारित हो रहे हैं जिसका लाभ सभी वर्ग के श्रावकों को मिलेगा । आचार्यश्रीजी द्वारा प्रदत्त आगामी ‘आत्म: ध्यान साधना कोर्स - बेसिक कोर्स 8 से 12 अगस्त, 2004 तक सायं: 4.00 से 6.00 बजे तक होगा । भाई बहिन मन की शान्ति, भीतर का आनंद प्राप्त करने हेतु इस साधना कोर्स में अवश्य भाग लेवें ।

संजीव जैन

मंत्री- एस0 एस0 जैन सभा

सेक्टर 18 डी, चण्डीगढ़

 

वीतराग दृष्टि को समझें: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़ 10 अगस्त, 2004: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचाय्र सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के अन्तर्गत व्यक्तित्व विकास पर अपने भावाभिव्यक्ति करते हुए कहा कि- जीवन में वीतरागता के भाव दृढ़ होने चाहिए । हम अरिहंत को नमन इसलिए करते हैं कि उनकी वीतरागता, शुद्धता हमारे भीतर आएं । जैसी दृष्टि होगी वैसी सृष्टि दिखेगी, तुम जो दूसरों के लिए चाहते हो वह अपने लिए चाहो । हम स्वयं के लिए शान्ति, आनंद चाहते हैं वही सबके लिए चाहो । सभी महापुरूषों ने विश्व के प्रत्येक जीव के प्रति मंगल की कामना की । वीतराग दृष्टि को समझे । दृष्टि बदली तो जीवन बदल जाएगा । 

वीतरागत मार्ग पर एक कदम बढ़ाओ । सही रास्ते पर एक कदम बढ़ाओगे तो राह अपने आप मिल जाएगी । आनंद प्रकाश सुख की चर्चा करो । दुःख की चर्चा मत करना । कोई सुख नही ंदेता और कोई दुःख नहीं देता । यह सब अपने ही कर्मों का खेल है । लोग कहते हैं कि उसने मुझे दुःख दे दिया, उसने मुझे सुखी कर दिया यह सब अज्ञानता है । अपने अवगुण प्रकट करते हुए दूसरों के गुणों को प्रकट करो । दूसरों के गुणों की प्रशंसा करो, इस जीवन में जो भी मिला है उसके प्रति समभाव रखते हुए उसे स्वीकार कर लो । स्वीकार में ही सुख है । आज हम प्रत्येक मानव को देखते हुए अपने कदम बढ़ा रहे हैं यह अमूढ़ दृष्टि है । अमूढ़ दृष्टि यानि भेड़-चाल । मेरा परिवार क्या कहेगा ? पारिवारिक संबंधीजन क्या कहेंगे ऐसा सोचकर हम वीतराग मार्ग पर आगे नहीं बढ़ सकते । विचार करो क्या हम लोगों की चाल से चल रहे हैं या अपनी चाल से । प्रभु महावीर ने आत्म-दृष्टि को बहुत महत्व दिया । अपनी चाल से चलना ही आत्म-दृष्टि है । आत्म दृष्टि को भीतर   उतारो ।

आज आचार्यश्रीजी के सान्निध्य में जय सच्चिदानंद संघ के आप्त पुत्र श्री परेश भाई एवं उनके सहयोगी उपस्थित हुए । उन्होंने आचार्यश्रीजी की ध्यान साधना को प्रशंसित करते हुए मानव जीवन के अमूल्य सूत्रों की चर्चा की । 

आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज के प्रतिदिन के प्रवचन आस्था चैनल पर रात्रि 9.50 से 10.10 तक प्रसारित हो रहे हैं जो कि विश्व के 150 देशों में देखे जा सकते   हैं । आप सभी जिनवाणी की प्रभावना कर प्रचार प्रसार में लाभ लेवे । आत्म: ध्यान साधना कोर्स बेसिक 8 अगस्त से प्रारंभ हो गया है जिसमें भाई बहिन भाग लेकर जीवन जीने की कला सीख रहे हैं । आगामी एडवांस कोर्स 13 से 15 अगस्त, 2004 तक है । आप सभी उसमें भाग लेकर मन की शान्ति, भीतर का आनंद प्राप्त करें ।

 

पुरूषार्थ करने वाला पुरूष होता है: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़ 11 अगस्त, 2004: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचाय्र सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के अन्तर्गत व्यक्तित्व विकास पर अपने भावाभिव्यक्ति करते हुए कहा कि-  भारत की संस्कृति में उपनिषद के ऋषियों ने एवं जैन दर्शन में तीर्थंकरों की वाणी का एक ही उद्घोष रहा है । मैं शुद्ध हूॅं चैतन्य स्वरूप हूॅं अजर अमर सच्चिदानंद स्वरूप हूॅं । प्रभु महावीर की वाणी परम कल्याणकारी वाणी है । आचारांग सूत्र का छोटा सा वाक्य जीवन में क्रान्ति लाता है । आचारांग सूत्र में प्रभु महावीर ने फरमाया- हे ! निर्मल ज्योति वाले पुरूष तूं पराक्रम कर । प्रभु महावीर ने यह नहीं कहा कि यह पुरूष है या यह स़्त्री है । प्रभु महावीर की दृष्टि में पुरूष स्त्री का कोई भेद ही नहीं था । 

प्रभु महावीर ने पुरूषार्थ करने वाले व्यक्ति को पुरूष से संबंधित किया है, चाहे वह पुरूष हो या स्त्री । उस समय में स्त्रियां भी पुरूषार्थ करती थी तो उन्हें पुरूष कहा जाता था, जैसे मल्ली कुमारी ने पुरूषार्थ कर तीर्थंकर पद प्राप्त किया, परम निर्वाण को प्राप्त किया यह पुरूषार्थ ही हुआ । संसार की दृष्टि में अनंतकाल से हम चक्कर काट रहे हैं । अज्ञान में हम जी रहे हैं । प्रभु महावीर की दृष्टि पराक्रम के लिए कहती है, पराक्रम करो वह भी निर्मल ज्योति के साथ । जिसको दृष्टि मिल गई उसका कल्याण हो गया । निर्मल ज्योति तो अपने भीतर होती ही है, आवश्यकता है उसे देखने की । हम जो कर रहे हैं वह भगवान की दृष्टि में पराक्रम नहीं है । हम अनेकों कार्य करते हैं परन्तु उसके पीछे हमारी स्वार्थ भावना होती है, आत्म-दृष्टि से किया गया कार्य पराक्रम तक पहुंॅचाता है । मन के भाव तो केवलज्ञानी ही जानते हैं । जैन दर्शन में भावों को अधिक महत्व दिया गया है । हमारे संसार चक्र का सारा खेल भावों पर निर्भर है । उठते, बैठते, चलते, सोते, खाते समय आत्मदृष्टि को भीतर रखना, अरिहंत को याद रखना, मैं एक हूॅं, शुद्ध हूॅं, बुद्ध हूॅं, ममता रहित हूॅं ऐसी भावना भीतर भावित करते हुए अरिहंत की भक्ति करना । 

आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज के प्रतिदिन के प्रवचन आस्था चैनल पर रात्रि 9.50 से 10.10 तक प्रसारित हो रहे हैं जो कि विश्व के 150 देशों में देखे जा सकते   हैं । आप सभी जिनवाणी की प्रभावना कर प्रचार प्रसार में लाभ लेवे । आत्म: ध्यान साधना कोर्स बेसिक 8 अगस्त से प्रारंभ हो गया है जिसमें भाई बहिन भाग लेकर जीवन जीने की कला सीख रहे हैं । आगामी एडवांस कोर्स 13 से 15 अगस्त, 2004 तक है । आप सभी उसमें भाग लेकर मन की शान्ति, भीतर का आनंद प्राप्त करें ।

 

मानव अपने आपको जाने: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़ 12 अगस्त, 2004: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचाय्र सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने भावाभिव्यक्ति करते हुए कहा कि- भारत के ऋषियों ने, श्रमण मुनियों ने एक ही बात कही है उनकी खोज, उनकी साधना उनके जीवन का उद्देश्य एक ही रहा है, इस शरीर के भीतर जो आत्मा है, जीव है उसको कैसे जाने और पहचाने । यह आत्मा अजर अमर सच्चिदानंद रूप है, इसे शस्त्र काट नहीं सकता, अग्नि जला नहीं सकती, पानी गला नहीं सकता, वायु बहा नहीं सकती । यह एक शास्वत् आत्मा है । मनुष्य नहीं जानता वह कहां से आया है और कहां जाएगा । सारी खोज कोऽहं की है । कोऽहं से सोऽहं तक की यात्रा हमें तय करनी है । भीतर प्यास हो तो हम सब कुछ प्राप्त कर सकते हैं । 

आदमी ने मौत को ललकारा है । आदमी ने वक्त को ललकारा है । आदमी ने मौत को भी मारा है । आज का विज्ञान ऐसी खोज कर रहा है कि मौत न आएं । कोशिश तो बहुत कर रहा है यह आदमी । तीनों लोकों को जीतने की भी कोशिश में लगा हुआ है । अनेक महापुरूषों ने तीनों लोकों को जीता है । प्रभु महावीर ने तीनों लोकों को युग पथवत् जीता   है । आदमी इतना सब कुछ करते हुए भी स्वयं से हार गया है ।  हमें यह मानव का जीवन मिला, शरीर मिला सब कुछ मिला फिर भी हम इसका सदुपयोग नहीं कर रहे हैं । सत्य बोलो परन्तु कड़वा सत्य न बोलो । हम किसी को उपालंभ दे देते हैं तब सामने वाला गुस्से में आ जाता है और हम भी गुस्से में होते हैं । होश में आने के बाद प्रतिक्रमण करो । छोटी सी बात पर हम गुस्सा कर लेते हैं, ऐसे समय में भीतर से क्षमा करना ही प्रतिक्रमण होता है । 

निर्मल ज्योति वाले पुरूष को प्रतिक्रमण, सामायिक, ध्यान, आलोचना में पराक्रम करना चाहिए । अपने से उच्च व्यक्ति के पास बैठकर अपनी समस्याएं सुनाने से आधी समस्याएं स्वतः ही समाप्त हो जाती है । हमारा जमा खाता धर्म है । धर्म हमें आनंद, शांति, समता देता है । जब-2 आप आनंद, शांति, समता भाव में आवोगे तब धर्म होगा और आपके जमा खाते में वृद्धि होगी और यही वृद्धि आपकी परलोक की पूंजी है । जब कोई अप्रतिकर लगे तब शान्त होना, बहुत निर्झरा होगी । हम भीतर शुभ भाव भावित करते हैं तो पुण्य का बंध होता है । शुद्ध भाव भावित करते हैं तो निर्झरा होती है । शुद्ध-भाव हमें कर्म-निर्जरा की ओर ले जाते हैं । शुभ भावों से तो पुण्य का बंध हो रहा है इसका मतलब कर्म-ब्ंाध ही हो रहा है एतदर्थ शुद्धभाव में रमण करो । शुद्धभाव सत्संग सामायिक और शुभ चर्चा करने पर धीरे-2 भीतर आते हैं । हम शुद्ध भाव में जीयें । अपने आपको जाने, समझें । 

आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज के प्रतिदिन के प्रवचन आस्था चैनल पर रात्रि 9.50 से 10.10 तक प्रसारित हो रहे हैं जो कि विश्व के 150 देशों में देखे जा सकते   हैं । आप सभी जिनवाणी की प्रभावना कर प्रचार प्रसार में लाभ लेवे । आत्म: ध्यान साधना कोर्स बेसिक 8 अगस्त से प्रारंभ हो गया है जिसमें भाई बहिन भाग लेकर जीवन जीने की कला सीख रहे हैं । आगामी एडवांस कोर्स 13 से 15 अगस्त, 2004 तक है । आप सभी उसमें भाग लेकर मन की शान्ति, भीतर का आनंद प्राप्त करें ।

 

दिव्यता की ओर जाओ: जैनाचार्य पूज्य श्री षिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़ 13 अगस्त, 2004: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आर्चा्र सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने भावाभिव्यक्ति करते हुए कहा कि- जीवन में यदि सत्य, आनंद, षान्ति है तो प्रतिपल परमात्मा की कृपा दिखाई देती है ।  जैसा कर्म होगा वैसा ही फल हमें प्राप्त होगा । दादा भगवान कहते हैं कि जगत इतना व्यवस्थित है कि एक मच्छर भी हमें काट नहीं सकता । जो भी हो रहा है वह व्यवस्थित ष्षक्ति के द्वारा हो रहा है । तुमने जो कर्म किए हैं वे भोगने ही पड़ेंगें । प्रकृति व्यवस्थित है । वह अपने सारे कार्य व्यवस्थित षक्ति से करती चली जाती है । यदि आपके पास सत्य का बल है । आत्म-दृ िट है तब दुःख आएंगें तो वह आपकी आत्मा के लिए विटामिन का काम करेंगे और सुख आएंगें तो षरीर के लिए विटामिन का काम करेंगें । आप कोई भी कार्य करते हैं उसके अनुसार हमारा जीवन बन जाता है । 

भेद विज्ञान को हमारे सामान्य जीवन में ले आओ । जैसे आपको ठोकर लगी है उस समय सोचो यह ठोकर किसको लगी है । यह ठोकर तो षरीर को लगी है, मैं एक षुद्धात्मा हूॅं, सच्चिदानंद स्वरूप हूॅं । ऐसा सोचते हुए अपने षरीर को और आत्मा को अलग-2 करो यही भेद विज्ञान है । यह संसार जैसा चल रहा है उसी के अनुसार आप भी कार्य करते जा रहे हैं । बिना सोचे समझें जैसा दिखाई देता है वैसे ही हम कार्य करते चले जाते हैं । किसी ने मंदिरों में जाकर देवताओं को पूजना प्रारंभ किया तो हम भी उसके पीछे जाकर अपने स्वार्थ की मांग करते हुए उस देवता को पूजते हैं, यह देव मूढ़ता है । 

दिव्यता की ओर जाओ । षुद्ध चैत्न्य की ओर जाओ । अपने भीतर जब राग द्वेश आऐ तब भीतर देखना । जहां-2 पर भी उसकी संवेदनाएं महसूस होगी वहां पर केवल देखना और जाना, कोई प्रतिक्रिया मत करना । प्रभु महावीर ने भी यही ध्यान की विधि बताई है । देखो और जानो । प्रतिक्रिया मत करो । हम सुख दुःख को समझें । भेद विज्ञान को समझें । 

आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज के प्रतिदिन के प्रवचन आस्था चैनल पर रात्रि 9.50 से 10.10 तक प्रसारित हो रहे हैं जो कि विश्व के 150 देशों में देखे जा सकते   हैं । आप सभी जिनवाणी की प्रभावना कर प्रचार प्रसार में लाभ लेवे । आगामी एडवांस कोर्स-ा 13 से 15 अगस्त, 2004 तक गतिमान है जिसमें श्रद्धालु भाग ले रहे हैं । आगामी बेसिक कोर्स 18 से 22 अगस्त, 2004 तक प्रातः 5.30 से 7.30 बजे तक होगा ।  आप सभी उसमें भाग लेकर मन की शान्ति, भीतर का आनंद प्राप्त करें ।

 

राष्ट्र की एकता को महत्व दें: जैनाचार्य पूज्य श्री षिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़ 15 अगस्त, 2004 श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री षिवमुनि जी महाराज ने विष्व मानव मंगल मैत्री अभियान के अन्तर्गत राष्ट्रीय एकता एवं सुरक्षा, जन जन में राष्ट्र  के प्रति भावना किस प्रकार आरोपित हो इस विशय पर अपने भावों में आचार्यश्रीजी ने कहा कि- आज का यह पन्द्रह अगस्त का दिवस भारत के इतिहास में स्वर्णिम अवसर लेकर आता है । भारत माता गुलामी की जंलीर से जकड़ी हुई थी । जो भी यहां आया उसने भातर को लूटा और भारत माता जंजीरों में जकड़ी हुई कराह रही थी । ऐसे समय में भारत माता को आजादी दिलाने में विषेष भूमिका महांत्मा गांधीजी की रही । एक आह गांधीजी की निकली हजारों गांधी प्रकट हो गये । सुभाष चन्द्र बोस, जवाहरलाल नेहरू, वल्लभ भाई पटेल, षहीद उधमसिंह ऐसे अनेकों नेताओं ने अंग्रेजों से लड़कर भारत माता को आजादी दिलाई । गांधीजी ने भारत की गरीबी देखते हुए संकल्प लिया था कि आज से मैं षूट बूट न पहनते हुए केवल खादी के वस्त्र ही धारण करूंगा । गांधीजी के जीवन में सत्य, अहिंसा, करूणा थी, समय की मूल्यता एवं अनुषासन को महत्व देते थे गांधीजी । काष आज वो होते तो कष्मीर का मुद्दा हल हो जाता । इस देष को जरूरत थी गौषाला की, गौपालन की परन्तु जगह-2 बूचड़खाने चल रहे हैं । हम विचार कर रहे हैं हमारा देष आजाद हो गया परन्तु क्या हम आजाद हुए । आज भी हम आडम्बर-युक्त जीवन जी रहे हैं । देष समृद्ध कैसे बने यह हमने सोचा है । अपनी परम्परा व गुरू को महत्व देने से पूर्व राष्ट्र की एकता को महत्व दो । आज के दिन हम कुछ संकल्प लें । जीवन में सात्विक आहार को अपनाये, पानी का सदुपयोग करें । स्वयं सुरक्षित जीवन जीते हुए देष को सुरक्षित कैसे रखें इस पर चिन्तन करें । आओ फिर से हम राम कृष्ण, बापू, गांधी के पथ पर चलें । स्वदेषी चीजों को अपनायें ।ष्षाकाहार को महत्व दें ।    

जो तुम्हें परमात्मा तक पहुंचा दे वह सद्गुरू है 

 

जैनाचार्य पूज्य श्री षिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़ 17 अगस्त, 2004: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री षिवमुनि जी महाराज ने विष्व मानव मंगल मैत्री अभियान के अन्तर्गत प्रार्थना एवं कृतज्ञता भाव के ऊपर अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि-  प्रभु की प्रार्थना, अरिहंत प्रभु का स्मरण हमें हमारे लिए सबसे अच्छा है । गुरू एक बीच की कड़ी है जो हमें परमात्मा तक ले जाता है । सद्गुरू कभी आपको बांधता नहीं, परम्परा सम्प्रदाय के बंधन में नहीं डालता । जो डराता है वह सद्गुरू नहीं हो सकता । लोभ, भय जिसमें है वह सद्गुरू नहीं हो सकता और ऐसे कार्य जो भयानक हो वह हमें सिखाता भी नहीं । तुम्हारा ध्यान चैतन्य पर होगा तो कार्य सही होगा । ध्यान हमेषा केन्द्र बिन्दू पर रखो । 

जो तुम्हें परमात्मा तक पहुंचा दे वह सद्गुरू है, परमात्मा तुम्हारी धारणा में कहीं दूर बैठा हुआ होगा ऐसा नहीं है, परमात्मा तो तुम्हारी धड़कन, प्राण, ष्वांस, पुकारों में बसा हुआ  है । हमारी मान्यता है कि वह कहीं आकाष, चन्द्रमा, तारों में होगा, परन्तु ऐसा नहीं है । हमारे यहां उपनिषद, उपासना, प्रार्थना आदि का अर्थ बहुत सुन्दर किया गया है । उपनिषद कैसे बने या बारह अंग षास्त्र कैसे बने । बौद्ध धर्म के त्रिपिटक कैसे बने । अगर इस बारे में जानकारी प्राप्त करते हैं तो हमें ज्ञात होता है कि गुरू षिष्य का मिलन आपसी प्रष्नोत्तर, संवाद से उपनिषद अंग-षास्त्र त्रिपिटक आदि बने । जब तुम अपने समीप होते हो तब उपासना हो जाती है । उपासना करो, प्रार्थना करो । बच्चे बन जाओ । जिस प्रकार पका हुआ आम सुगन्धि देता है उसी प्रकार हम बड़े बन  कर भी बच्चे बन जाये ताकि हमारे भीतर वृद्धत्व का अनुभव भी हो । 

माता पिता के प्रति कृतज्ञता के भाव रखो । अनंत उपकार है उस मां के जिसने हमें जन्म दिया । 9 माह तक गर्भ में धारण किया । अनेकों कष्ट सहे । हमारे जन्म के पष्चात् माता का भी एक जन्म हुआ जो हमने चाहा वह सब कुछ उन्होंने दिया, परन्तु क्या आज हम अपने माता पिता को परमात्मा का स्थान देते हैं । क्या उनके प्रति आदर भाव रखते हैं, यह एक विचारणीय प्रष्न है । माता पिता के प्रति अनंत करूणा, मैत्री के भाव रखो । उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करो । यह संसार एक खेत है जैसा बीज बोवोगे वैसे ही फल, फूल, पत्ते मिलेगें । सोच समझकर बीज बोना । जैसा व्यवहार तुम अपने माता पिता के प्रति कर रहे हो षायद वैसा ही व्यवहार तुम्हारे बच्चे तुम्हारे प्रति ना करें इसीलिए उन्हें माता पिता की महत्ता को समझाना, उनके भीतर अच्छे संस्कार आरोपित करना ताकि वे भविष्य में माता पिता के उपकारों को समझ सके । 

आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज के प्रतिदिन के प्रवचन आस्था चैनल पर रात्रि 9.50 से 10.10 तक प्रसारित हो रहे हैं जो कि विश्व के 150 देशों में देखे जा सकते   हैं । आप सभी जिनवाणी की प्रभावना कर प्रचार प्रसार में लाभ लेवे। आगामी बेसिक कोर्स 18 से 22 अगस्त, 2004 तक प्रातः 5.30 से 7.30 बजे तक होगा ।  आप सभी उसमें भाग लेकर मन की शान्ति, भीतर का आनंद प्राप्त करें ।

गुरू आत्मा से परमात्मा तक पहुंचा देता है: जैनाचार्य पूज्य श्री षिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़ 18 अगस्त, 2004: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री षिवमुनि जी महाराज ने गुरू की महत्ता पर प्रकाष डालते हुए फरमाया कि- 

मेरे सत्गुरू दीनदयाल, काग से हंस बनाते हैं ।

मेरे सत्गुरू दीनदयाल, सोया भाग्य जगाते हैं ।।

गुरू षब्द का जीवन में बहुत महत्व है । गुरू षब्द जीवन में गंभीरता को लेकर आता है । जो अंधकार को दूर कर दें । जीव का ईष्वर से मिलन करा दे वह गुरू है । गुरू का चुनाव भी एक आविष्कार है । सोच समझकर गुरू का चुनाव करना । अगर व्यक्ति सही गुरू को चुन ले तो बेड़ा पार हो जाता है । गुरू षिष्य को अगर आत्म ज्ञान दे तो समझना वह गुरू मोक्ष तक पहुंचा सकता है । अगर वह मिथ्या-दृष्टि में लेकर जाए तो वह गुरू नहीं हो सकता । षिष्य का मतलब सिर भी गुरू के चरणों में समर्पित कर दो । इतने समर्पित भाव से गुरू के चरणों में रहना है सिर देकर गुरू मिल जाए तो भी सस्ता है । अहंकार से सिर अकड़ता है और सत्गुरू अहंकार को कम कर देता है । इसका मतलब सिर झुक जाता है । हमारे भीतर से अहंकार निकल जाये । 

गुरू को अपने ष्वांस, धड़कन, प्राणों के पास समझना, इतनी नजदीकता से उनका अनुभव करना, गुरू चरणों को पकड़ लेने पर छोड़ना मत । मन को संतोष की ओर ले जाता है गुरू । गुरू जीवन का रूपान्तरण कर देता है । जैसे आचार्यश्रीजी ने गुरू षिष्य का संवाद सुनाते हुए कहा कि दादू रज्जब की भांति गुरू षिष्य होने चाहिए । इस संसार में धन, पद, यष का अभिमान न करते हुए संसार को एक पंसारी की दुकान मानना चाहिए । जिस प्रकार पंसारी की दुकान में वस्तुएं आती है और चली आती है उसी प्रकार इस संसार में मानव आता है और चला जाता है । जो इस जीवन का सदुपयोग कर लेता है वही अपनी मंजिल तक पहुंच सकता है । 

गुरू की महिमा महान है । तीन लोक, नव-खण्ड में गुरू से बड़ा कोई भी नहीं है । जो उनके चरणों को पकड़ लेता है, जो उनका ध्यान कर लेता है वह अवष्य ब्रह्म पद की प्राप्ति करता है । हम लघु बनें । लघुता से ही प्रभुता मिलती है । गुरू का चुनाव कर लेने पर उनसे जीवन को षुद्ध बुद्ध एवं आनंदमय किस प्रकार जीयें यह कला सीखना, मिथ्यात्व को दूर किस प्रकार करें । सबके मंगल की कामना किस प्रकार करें ऐसी कलाएं सीखना ।   

आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज के प्रतिदिन के प्रवचन आस्था चैनल पर रात्रि 9.50 से 10.10 तक प्रसारित हो रहे हैं जो कि विश्व के 150 देशों में देखे जा सकते   हैं । आप सभी जिनवाणी की प्रभावना कर प्रचार प्रसार में लाभ लेवे।  बेसिक कोर्स 18 से 22 अगस्त, 2004 तक प्रातः 5.30 से 7.30 बजे तक चल रहा है ।  आप सभी उसमें भाग लेकर मन की शान्ति, भीतर का आनंद प्राप्त करें ।

क्रोध और जिद को छोडें़ जीवन सुखी बनेगा

 

जैनाचार्य पूज्य श्री षिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़ 19 अगस्त, 2004: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री षिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- सम्यक् दर्षन का पांचवा अंग है उपगोहन । उपगोहन का अर्थ होता है सत्य में जीना चाहते हो तो मर्यादा में रहना । किसी के दोष मत बताना और प्रषंसा मत करना । हर व्यक्ति में गुण भी है और दोष भी    है । क्रोध और जिद् दोनों दोष है । क्रोध जब चरम षिखर पर पहुंचता है तो घर के घर उजड़ जाते हैं । क्रोध में हम बेहोष हो जाते हैं । घर में जैसे पति पत्नी जिद करते है । पति क्रोध व पत्नी जिद करती है उससे जीवन में अप्रासंगिक घटनाएं घटती है । जीवन दुःख से भर जाता है । 

मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि व्यक्ति जब बड़ी चोरी करता है तो वह कारखानेदान बनता है । जब छोटी चोरी करता है तो वह दुकानदार हो जाता है और जिसको चोरी करने का अवसर नहीं मिलता वह ईमानदार हो जाता है । व्यक्ति के दोषी होने का कारण क्या है ? कोई व्यक्ति गरीब है उसके माता पिता बीमार है उनको दवाई चाहिए तो वह मालिक के पास पैसे मांगता है, मांगने पर उसे जब मिलते नहीं है तो वह चोरी करता है । यह उसकी मजबूरी  है । मनोवैज्ञानिकों ने खोज की तो पाया कि व्यक्ति मानसिक रोगी भी हो सकता है जिसे चोरी करने की आदत हो जाती है । जब आपको पता चले कि इस व्यक्ति ने मजबूरीवष चोरी की है तो उसे ओर पैसे दे देना और समझा देना कि यह तुम जो चोरी कर रहे हो वह गलत काम है, आगे से चोरी मत करना । तो वह व्यक्ति चोरी नहीं करेगा । दोषी वयक्ति का कारण देखना और प्रेम से समझाना तो वह दोष नहीं करेगा । उपगोहन सूत्र कहता है कि- अपने दोषों की निन्दा करना एवं दूसरों के गुणों की प्रषंसा करना । घर में संघर्ष भी गुण और दोषों के देखने के कारण होता है । 

आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज के प्रतिदिन के प्रवचन आस्था चैनल पर रात्रि 9.50 से 10.10 तक प्रसारित हो रहे हैं जो कि विश्व के 150 देशों में देखे जा सकते   हैं । आप सभी जिनवाणी की प्रभावना कर प्रचार प्रसार में लाभ लेवे।  आगामी बेसिक कोर्स 22 से 26 अगस्त, 2004 तक सायं 4.00 से 6.00 बजे तक होगा ।  आप सभी उसमें भाग लेकर मन की शान्ति, भीतर का आनंद प्राप्त करें ।

 

स्थिरीकरण जीवन में साधना लाता है: जैनाचार्य पूज्य श्री षिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़ 20 अगस्त, 2004: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री षिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- भारत की संस्कृति का उद्घोष है कि मैं अजर हूं, अमर हूॅं, निरंजन निराकार अक्षय षक्ति का भण्डार हूॅं । यह अनुभव की बात है । यह वाक्य भीतर उतारने के हैं । सभी महापुरूषों की वाणी का यही निचोड़ है । जैसा तुम विचार करते हो या जैसी भावना भावित करते हो वैसा ही बन जाते  हो । हम अपने आपको स्थिर करें । जब-2 कभी मन, वचन, काया चंचल हो जाए तब पुनः अपने आपमें लौटे । 

अपने आपमें लौटने का नाम है स्थिरकरण । स्थिरीकरण जीवन में साधना लाता है । सत्य है, साधना है तो संघर्ष भी आते हैं । संघर्षों को समभावपूर्वक सहन करो । भगवान महावीर के सामने कितने कष्ट आए फिर भी वे स्थिर रहे । जिस समय कष्ट आए उस समय षान्त होकर अपने आपको देखना । बाहर कुछ भी हो रहा हो भीतर के चित्त को षान्त   रखो । भगवान महावीर को कितने उपसर्ग सहने पड़े । उनके कानों में कीले ठोके गये, चण्डकौषिक ने दंष मारा फिर भी वे स्थिर रहे, अचल रहे । हम भी जब-2 भीतर क्रोध आए तब षान्त हो जाएं । क्रोध ऐसा जहर है वह हमें समाप्त कर देता है । भोजन करते समय चित्त षान्त रखना । प्रार्थना के भावों में रखना । इस युग में दो बातें होनी जरूरी है । एक तो खाना खाते समय टी0वी0 नहीं देखना और प्रातः नास्ता, चाय पीते समय अखबार नहीं पढ़ना, अगर ये दो बातें मानव के जीवन में आ जाए तो मानव की अधिकांष समस्याएं समाप्त हो जाएगी ।

प्रातः आत्म-दर्षन करो । टी0वी0 दर्षन मत करो । षाम को दिन भर की घटनाओं को देखो । मन को स्थिर करने के लिए भगवान को याद करो । मन ना लगे, षरीर साथ न दें तब बाहुबली को याद करना । एक वर्ष तक लगातार कायोत्सर्ग में अडिग खड़े रहे । हम भी उन्हें याद करते हुए अपने मन, षरीर को स्थिर करें ।      

आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज के प्रतिदिन के प्रवचन आस्था चैनल पर रात्रि 9.50 से 10.10 तक प्रसारित हो रहे हैं जो कि विश्व के 150 देशों में देखे जा सकते   हैं । आप सभी जिनवाणी की प्रभावना कर प्रचार प्रसार में लाभ लेवे।  आगामी बेसिक कोर्स 22 से 26 अगस्त, 2004 तक सायं 4.00 से 6.00 बजे तक होगा ।  आप सभी उसमें भाग लेकर मन की शान्ति, भीतर का आनंद प्राप्त करें ।

 

स्थिरीकरण जीवन में साधना लाता है: जैनाचार्य पूज्य श्री षिवमुनि जी महाराज

प्रार्थना श्रद्धा से करो: जैनाचार्य पूज्य श्री षिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़ 22 अगस्त, 2004: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री षिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि:- प्रेम है फूल का खिलना, प्रार्थना है फूल की सुगंध और उस सुगंध से तृप्त होना वात्सल्य-भाव है । भीतर से उठे हुए भावों की अभिव्यक्ति है प्रार्थना । प्रार्थना अंतःकरण का स्नान है । समग्र अस्तित्व से उठे हुए अहोभाव की प्रस्तुति है प्रार्थना । प्रार्थना श्रद्धा से करो । भीतरी प्रकाष का अमर होना है प्रार्थना । प्रार्थना में स्वयं का समर्पण होता है । जैसा भीतर दृष्टिकोण होगा वैसी प्रार्थना होगी । 

भीखा बात आगम की, कहन सुनन की नांही ।

जे जाने सो कहे नहीं, कहे सो जाने नांही ।।

आगम की बात कहने और सुनने की नहीं होती, वह अनुभव की होती है । जो जानता है वह कहता नहीं है । जो कहता है वह जानता नहीं । प्रभु सब कुछ जानते थे फिर भी सब कुछ नहीं कह पाए । अनंत-ज्ञान को लिपिबद्ध नहीं कर सकते, वह तो जाना और देखा जा सकता है । सुबह उठकर प्रार्थना करो । प्रार्थना को अधिक से अधिक समय दो । नानक, महात्मा गांधी समय को मूल्यवान समझकर प्रार्थना को अधिक महत्व देते थे । नानक सच्चे मन से प्रार्थना करते थे । हम प्रार्थना करें । ध्यान करें । समय की मूल्यवत्ता को समझें । 

आज आचार्यश्रीजी के दर्षनार्थ जम्मू, मालेर कोटला, मानसा, लुधियाना, परवाणु, पंचकूला, कालका से श्रावक श्राविकाएं उपसिथत हुए । 

आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज के प्रतिदिन के प्रवचन आस्था चैनल पर रात्रि 9.50 से 10.10 तक प्रसारित हो रहे हैं जो कि विश्व के 150 देशों में देखे जा सकते   हैं । आप सभी जिनवाणी की प्रभावना कर प्रचार प्रसार में लाभ लेवे ।  आगामी बेसिक कोर्स 22 से 26 अगस्त, 2004 तक सायं 4.00 से 6.00 बजे से षुरू हो चुका है ।  आप सभी उसमें भाग लेकर मन की शान्ति, भीतर का आनंद प्राप्त करें ।

 

लघुता से प्रभुता मिले: जैनाचार्य पूज्य श्री षिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़: 23 अगस्त, 2004: विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज वर्षावास हेतु श्री एस0 एस0 जैन सभा, जैन स्थानक, सेक्टर 18 डी, चण्डीगढ़ में विराजमान हैं । उनके मौलिक जीवनोपयोगी प्रवचन प्रतिदिन प्रातः 8.15 से 9.30 बजे तक हो रहे हैं । इस अवसर पर आज के प्रवचन में आचार्यश्रीजी ने फरमाया कि- अरिहंत प्रभु, सिद्ध, गुरूदेव के चरणों में जब आप प्रार्थना करते हो तब आपके भाव समतामय होने चाहिए । मैं प्रार्थना कर रहा हूॅं यह सोचना गलत है । मैं हूॅं यह भूल जाओ । मन, वचन, काया से जो क्रिया हो रही है वह तुम नहीं   हो । समग्र अस्तित्व के साथ विलीन हो जाओ । अपने आपकेा छोटा बना लो । अहंकार षुन्य होने पर प्रार्थना की षुरूआत हेाती है । इतनी गहराई में जाकर प्रार्थना करो कि स्वयं का भान भी न रहें । प्रार्थना में कोई मांग ना करो । 

प्रार्थना करते वक्त प्रत्येक प्राणी का भला चाहो । प्रार्थना भीतर के भावों से होती है । प्रार्थना में स्वयं को दोटा बना लेना । लघुता से प्रभुता मिलती है । जब प्रार्थना करा तब षरीर, मन, स्थान आदि की षुद्धि का ध्यान रखना । प्रार्थना के भीतर नमस्कार मंत्र पढ़ो । भीतर से की गई प्रार्थना हमें गहराई तक ले जाती है । प्रार्थना एक षब्द की करो पर पूरी तरह से उसमें विलीन हो जाओ । जितना गहरे डुबोगे उतनी प्रार्थना अच्छी होगी ।

आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज के प्रतिदिन के प्रवचन आस्था चैनल पर रात्रि 9.50 से 10.10 तक प्रसारित हो रहे हैं जो कि विश्व के 150 देशों में देखे जा सकते   हैं । आप सभी जिनवाणी की प्रभावना कर प्रचार प्रसार में लाभ लेवे ।  आगामी बेसिक कोर्स 22 से 26 अगस्त, 2004 तक सायं 4.00 से 6.00 बजे तक षुरू हो चुका है ।  आप सभी उसमें भाग लेकर मन की शान्ति, भीतर का आनंद प्राप्त करें ।

 

धर्म रूपी केन्द्र से जुड़ो: जैनाचार्य पूज्य श्री षिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़: 24 अगस्त, 2004: विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज वर्षावास हेतु चण्डीगढ़ के सेक्टर 18 डी, एस0 एस0 जैन सभा, जैन स्थानक में विराजमान हैं । उनके मौलिक जीवनोपयोगी प्रवचन प्रतिदिन प्रातः 8.15 से 9.30 बजे तक हो रहे हैं । इस अवसर पर आज के प्रवचन में आचार्यश्रीजी ने फरमाया कि- प्रार्थना तुम क्या करते हो इसका महत्व नहीं है । भीतर से क्या निकलता है उसका महत्व है । प्रार्थना के भाव अन्तःस्थल से क्या प्रस्फुटित होते हैं इसका महत्व है । संयम, षील का संबंध अस्तित्व से है । भीतर का अस्तित्व षुद्धात्म भाव है । धर्म का संबंध षुद्धात्म भाव से हैं । तुम्हारे केन्द्र में षान्ति है तो बाहर प्रार्थना   होगी । तुम्हारे केन्द्र में प्रेम है तो बाहर ध्यान होगा । तुम्हारे केन्द्र में जागृति है तो बाहर तपस्या होगी । एक केन्द्र है और एक परिधि है । आप जो भी करते हो वह स्वयं के लिए करते हो । ज्ञानी वह है जो सबके लिए कार्य करता है । जिसकी ग्रन्थी टूट गई है, चित्त सहज हो गया है, जिसका सारा संबंध केन्द्र से है । आपका मन, वचन, विचार बाहर के हैं । तुम षरीर, मन, विचार, संस्कार, धारणा से जुड़े हुए हो । केन्द्र में धर्म है तो बाहर के सभी अस्तित्वों को तुम जान लोगे, उनके प्रति नमन का भाव होगा । 

आचार्यश्रीजी ने सामाजिक परम्पराओं पर कुठाराघात करते हुए कहा कि हम षादी में, किसी कार्यक्रम पर अन्तिम क्रिया में तो एकत्रित हो जाते हैं परन्तु धर्म के नाम पर अलग-2 हो जाते हैं । धर्म के नाम पर एकत्रित हो जाओ । दिगम्बर, ष्वेताम्बर, तेरापंथी, स्थानकवासी का भेद छोड़कर हम महावीर के अनुयायी बनें । तुम जैसा चाहो वैसा बन सकते हो । आनंद हमारा स्वभाव है । षान्ति हमारे भीतर है फिर भी हम सुखी नहीं है । कबीरजी ने कहा है- 

चलती चक्की देखके, दिया कबीरा रोय । 

दो पाटन के बीच में, साबुत बचा न कोय ।

चक्की के दो पाट होते हैं, उनके भीतर जो कुछ भी जाता है वह पिसा जाता है, साबुत नहीं बचता । हम भी इसी प्रकार संसार चक्र में पीसे जा रहे हैं । ऐसा सुनने पर कबीर के बेटे कमाल ने कहा-

चलती चक्की चलने दे, सबका मैदा होय ।

जो कीले से लगा रहे, बाल न बांका होय ।

चलती चक्की में सब कुछ पिस जाता है, परन्तु चक्की के बीच में जो कील होती है उसमें अगर कुछ रह जाये तो वह पीसा नहीं जाता । उसका बाल भी बांका नहीं होता । हम संसार चक्र में पीसे जा रहे हैं । हम उस एक कील से लग जायें जो ष्षुद्धात्म-भाव की है तो अवष्य ही हम जन्म-मरण के चक्र से छूट जाएंगें । जो धर्म से जुड़ जाते हैं उनका बाल बांका नहीं होता । इस संसार में ष्षुद्धात्म-भाव में रमण करो । कमल की तरह आलिप्त  रहो । 

आगामी बेसिक कोर्स 22 से 26 अगस्त, 2004 तक सायं 4.00 से 6.00 बजे तक चल रहा   है ।  आप सभी उसमें भाग लेकर मन की शान्ति, भीतर का आनंद प्राप्त करें । 2 से 5 सितम्बर, 2004 से आत्म: ध्यान साधना कोर्स एडवांस-ाा {चार दिवसीय आवासीय कोर्स} का आयोजन होने जा रहा है जिन साधकों ने उसमें भाग लेना हो अपना रजिस्टेªषन जल्दी करवावें । 

 

राग-भाव को प्रभु चरणों में समर्पित कर दो

जैनाचार्य पूज्य श्री षिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़: 25 अगस्त, 2004: विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज वर्षावास हेतु चण्डीगढ़ के सेक्टर 18 डी, एस0 एस0 जैन सभा, जैन स्थानक में विराजमान हैं । उनके मौलिक जीवनोपयोगी प्रवचन प्रतिदिन प्रातः 8.15 से 9.30 बजे तक हो रहे हैं । इस अवसर पर आज के प्रवचन में आचार्यश्रीजी ने फरमाया किः- मानव का जीवन एक अनमोल जीवन है, जिसमें प्रभु भक्ति, तप, षील का पालन कर लें । चोबीस घण्टे में घड़ी दो घड़ी प्रभु का सिमरन   करें । संध्या करते समय हम अपने मन को प्रभु में लगा लें । तुम चल रहे हो पांव में ठोकर लगी तो गलती तुम्हारी है क्योंकि तुम देखकर नहीं चले । क्या हमने चैबीस घण्टे कार्य करते हुए कितने घण्टे प्रभु को याद किया । 

हम कुछ भी कार्य करते हैं चाहे वह घर का हो, दुकान का हो या धर्म का हो उस समय हमें प्रभु की याद आए । हम धर्म में धंधा लेकर आते हैं । सामायिक करते समय या वीतरागवाणी श्रवण करते समय हमें घर, दुकान, अपने रिष्तेदारों की याद आती है । क्या हम जब घर में रहते हैं तब प्रभु को याद करते हैं ? अरिहंतों को याद करते हैं ? जो कार्य करते हो वह पूरा करो । सामायिक करते हो तो पूरी सामायिक करो । उस समय व्यर्थ के विचार या चिन्ताओं को मन में लेकर न आओ । भोजन करते हो तो पूरा भोजन करो । भोजन करते समय प्रार्थना करो प्रभु ! मुझे जो भोजन मिला है वह सबको  मिले । भीतर वीतराग-भाव का स्मरण करो । प्रभु मेरे पास तो कुछ भी नहीं है । आप तो अनंत-ज्ञान के धारक हो । प्रभु मेरे मुख से हमेषा वीतरागवाणी निकले, ऐसी भावना भावित करो ।

प्रत्येक कार्य करते समय राग भाव पर ध्यान दो । जहां-2 पर राग भाव आया उसको प्रभु चरणों में समर्पित कर दो । सोते समय दिन भर क्या-क्या कार्य किया उसको याद करो, कितने क्षण प्रभु भक्ति में बिताये उन्हें याद करो । परमात्मा की वर्षा प्रतिपल प्रतिक्षण हो रही है हम उसे स्वीकार करें । जिस प्रकार पानी में नमक डली मिट जाती है उसी प्रकार हम भी प्रभुमय हो जायें । प्रभु मुझे अपने जैसा बना लो, मुझे अपने में समा लो ऐसी प्रार्थना करो । अगर हम प्रभु के अधीन होते हैं तो भीतर भक्ति घटित होती है । अगर हम अभिमान करते हैं तो हम नरक-गामी बन जाते हैं । अभिमान बहुत बड़ा षत्रु है, इसे भक्ति में बदल दो ।    

आगामी बेसिक कोर्स 22 से 26 अगस्त, 2004 तक सायं 4.00 से 6.00 बजे तक चल रहा  है ।  आप सभी उसमें भाग लेकर मन की शान्ति, भीतर का आनंद प्राप्त करें । 2 से 5 सितम्बर, 2004 से आत्म: ध्यान साधना कोर्स एडवांस-ाा {चार दिवसीय आवासीय कोर्स} का आयोजन होने जा रहा है जिन साधकों ने उसमें भाग लेना हो अपना रजिस्टेªषन जल्दी करवावें । 

 

ज्ञानी बनना है तो वीतरागता आवष्यक है: जैनाचार्य पूज्य श्री षिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़: 26 अगस्त, 2004: विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज वर्षावास हेतु चण्डीगढ़ के सेक्टर 18 डी, एस0 एस0 जैन सभा, जैन स्थानक में विराजमान हैं । उनके मौलिक जीवनोपयोगी प्रवचन प्रतिदिन प्रातः 8.15 से 9.30 बजे तक हो रहे हैं । इस अवसर पर आज के प्रवचन में आचार्यश्रीजी ने फरमाया कि:- मानव का जीवन उसकी सोच पर, समझ पर निर्भर करता है । इस संसार में हम क्या लेकर आये और क्या लेकर जाएंगें ? जब आये तब डेढ़ किलो का षरीर था । माता पिता की असीम कृपा से हमें यह मानव का भव मिला । उनकी अनुकम्पा, मैत्री से हम आज इस स्थिति तक पहुंचे । आत्मा को तो कुछ चाहिए नहीं । जो कुछ चाहिए वह षरीर को चाहिए । हम षरीर का विस्तार करते चले जा रहे हैं और आत्मा को संकुचित करते चले जा रहे हैं । मन को संकुचित करो । समता का विस्तार   करो । इस जगत में सबसे बड़ा दुःख मोह है और सबसे बड़ा सुख वीतरागता है । ज्ञानी बनना है तो वीतरागता आवष्यक है । 

मोह बड़ा दुःख रूप है ताकु मार निकास । 

प्रीत जगत की छोड़ दे तब होये निर्वास ।। 

मोह को दूर कर दो । वह हमेषा दुःख देता है । इस जगत में मोह को छोड़ दिया जाये तो हम वीतराग पथ पर अग्रसर हो जाएंगें । संसार में दुःख है । तृष्णा मोह के कारण है और मोह अज्ञान के कारण है । जब तक मोह नहीं निकलेगा तब तक संसार नहीं छूटेगा । धर्म से प्रीत करो । वीतरागता को भीतर लाओ । जग में ऐसे रहो जैसे जिह्वा मुख में रहती है । जिह्वा सारे स्वाद ग्रहण करती है फिर भी वह निर्लेप रहती है । उसी की भांति हम इस जगत में सब कुछ देखें, फिर भी निर्लेप रहे । जब विवेक जागृत हो जाएगा तब सब कुछ चिन्तन में बदल जाएगा । कीचड़ में कमल की भांति रहो । कमल कीचड़ में पैदा होता है फिर भी वह उससे निर्लिप्त रहता है । हमारा जन्म भी कीचड़ में ही हुआ । वहां से ऊपर उठकर हम योग करें और योग से अयोग की ओर आयें । 

दिनांक: 2 से 5 सितम्बर, 2004 से आत्म: ध्यान साधना कोर्स एडवांस-ाा {चार दिवसीय आवासीय कोर्स} का आयोजन होने जा रहा है । आप सभी उसमें भाग लेकर मन की शान्ति, भीतर का आनंद प्राप्त करें एवं अपना रजिस्टेªषन षीघ्र करवावें । 

 

भीतर का धन ही ध्यान है: जैनाचार्य पूज्य श्री षिवमनि जी महाराज

चण्डीगढ़: 27 अगस्त, 2004: विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज वर्षावास हेतु चण्डीगढ़ के सेक्टर 18 डी, एस0 एस0 जैन सभा, जैन स्थानक में विराजमान हैं । उनके मौलिक जीवनोपयोगी प्रवचन प्रतिदिन प्रातः 8.15 से 9.30 बजे तक हो रहे हैं । इस अवसर पर आज के प्रवचन में आचार्यश्रीजी ने फरमाया कि:- 

उतरा सागर में उसको कि मोती मिला ।

खोज जिसने भी कि मैं उसी को मिला ।।

यदि आप जीवन में मोती, हीरे, जवाहरात प्राप्त करना चाहते हो तो खोज अवष्य करनी पड़ेगी । खोज दो प्रकार की है । एक बाहर की, एक भीतर की । प्रभु महावीर ने भीतर की खोज की और आज का विज्ञान बाहर की खोज कर रहा है । संसार के साधनों से बाहर की खोज की जा सकती है, भीतर की नहीं, भीतर की खोज करने के लिए तो हमें प्रभु महावीर का ध्यान एवं कायोत्सर्ग का मार्ग अपनाना होगा । जीवन एक अन्तसृजन है । प्रभु महावीर की साधना अकम्प की साधना है, षून्य की साधना है ।  वहां जाकर जो कुछ भी मिल जाए वह हीरे से कम नहीं है । धन से आगे ध्यान है ।

आचार्यश्रीजी ने एक दृष्टांत के द्वारा समझाते हुए कहा कि एक लकड़हारा था । एक महात्मां से उसका मिलन हुआ । महांत्मा ने उसे आगे जाने की प्रेरणा दी और वह आगे से आगे चलता गया । आगे जाते हुए उसने चन्दन के पेड़, फिर चांदी की खदाने, फिर सोने और हीरे की खदाने देखी । महात्मा ने उसे ओर आगे जाने की प्रेरणा दी । जब वह आगे गया तो महात्मा ने उसे अपनी ओर देखने की प्रेरणा दी । जब हम धन प्राप्त कर लेते हैं तो हमारा मन ध्यान की ओर आकृष्ट हो जाना चाहिए । मोती लेना चाहते हो तो गहरे-गहरे खोजो । प्रभु महावीर का जीवन आनंद से भरा था क्योंकि उन्होंने मोती प्राप्त कर लिए थे । उन्होंने भेद विज्ञान को जान लिया था । भीतर बहुत कुछ है । 

भीतर का धन ही ध्यान है । इस जीवन में जो मूल्यवान है उसकी खोज कर लेना । अक्सर हम भीतर की खोज बंद कर देते हैं और बाहर की खोज में लग जाते हैं । बाहर की खोज से हटकर हम भीतर की खोज करें । ध्यान सत्संग का लाभ उठायें । तप साधना करें और अपने जीवन को उज्ज्वल बनायें ।

दिनांक: 2 से 5 सितम्बर, 2004 से आत्म: ध्यान साधना कोर्स एडवांस-ाा {चार दिवसीय आवासीय कोर्स} का आयोजन होने जा रहा है । आप सभी उसमें भाग लेकर मन की शान्ति, भीतर का आनंद प्राप्त करें एवं अपना रजिस्टेªषन षीघ्र करवावें । 

 

योग, उपयोग, परोपकार मनुष्य का लक्ष्य हो: जैनाचार्य पूज्य श्री षिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़: 28 अगस्त, 2004: विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज के मौलिक एवं जीवनोपयोगी प्रवचन प्रतिदिन ‘षिवाचार्य सत्संग समारोह’ में हो रहे हैं । इस अवसर पर आज के प्रवचन में आचार्यश्रीजी ने फरमाया कि:- मानव जीवन का लक्ष्य है योग, उपयोग और परोपकार । मन, वचन, काया का योग अषुभ से हटाकर षुभ में लगाओ और षुभ से षुद्ध की ओर आ जाओ, यह हमारा लक्ष्य है, जीवन बड़ा सहज और सरल है । इसे जीने का बहुत सुन्दर ढंग है । वचन और काया का योग तो बाद में आता है । मन पहले है । मन चंचल  है । हमने मन को विष्वास में ले लिया और आत्मा को विष्वास में नहीं लिया । अगर हमें परमात्मा के पास जाना है तो योग से अयोग की ओर जाना होगा । योग से संयोग की ओर नहीं । 

 अध्यात्म योग से प्रतिपल प्रतिक्षण हम सार को देखें । हम अषुभ प्रवृत्तियों से बचें । उपयोग आपकी चेतना का लक्षण है । मन, वचन, काया का व्यापार परसत्ता का है, हम उसे स्व-सत्ता में ले आते हैं । आपका मन, वचन काया का योग-उपयोग और परोपकार की ओर आयें । उपयोग आपका स्वभाव है । अपने जीवन को बदलो । सार की ओर आओ । हमारे जीवन में प्रत्येक प्राणी मात्र के लिए परोपकार की भावना हो ।  

प्रभु महावीर चैबीसवें तीर्थंकर जिन्होंने इस पूरे ब्रह्माण्ड को अपने ज्ञान से प्रकाषित किया, वाणी से पवित्र किया । अपने आचरण से आलोकित किया । जन-जन का अज्ञान दूर किया ऐसे प्रभु को जब हम नमन करते हैं तब उनके गुणों को का स्मरण हो जाता है । हम अपने मन से किसी के प्रति दुर्भावना न भायें । पूरे ब्रह्माण्ड में आप जो वाणी बोलते हैं वो फिर से आपको मिलती है । यदि आज हमें दुःख मिला, हमारा अपमान हुआ या आज हमें कोई सहयोग नहीं दे रहा है तो इसका मूल कारण हमारा अज्ञान है । जो कर्म किया इसका भुगतान तो हमें देना ही होगा । 

दिनांक: 2 से 5 सितम्बर, 2004 से आत्म: ध्यान साधना कोर्स एडवांस-ाा {चार दिवसीय आवासीय कोर्स} का आयोजन होने जा रहा है । आप सभी उसमें भाग लेकर मन की शान्ति, भीतर का आनंद प्राप्त करें एवं अपना रजिस्टेªषन षीघ्र करवावें । 

 

परम् उत्कृष्ट भाव भीतर आना ही प्रभावना है: जैनाचार्य पूज्य श्री षिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़: 29 अगस्त, 2004: विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज के मौलिक एवं जीवनोपयोगी प्रवचन प्रतिदिन ‘षिवाचार्य सत्संग समारोह’ में हो रहे हैं । इस अवसर पर आज के प्रवचन में आचार्यश्रीजी ने फरमाया कि:- परमात्मा को जानने के लिए आत्म-दृष्टि आवष्यक है । आत्म-दृष्टि का आठवा अंग है प्रभावना । परम उत्कृष्ट भाव भीतर आना ही प्रभावना है । खाना खाते समय, प्रत्येक कार्य करते समय उत्कृष्ट भाव भीतर हो तब प्रभावना होती है । प्रभावना केवल बोलने से या ज्ञान प्राप्ति से नहीं होती । उसके लिए उत्तम-भावों की आवष्यकता है । व्यक्ति के भीतर मैत्री, करूणा हो तो वह प्रभावना को जल्दी प्राप्त कर सकता है । यदि मानव को आंख है तो परमात्मा प्रतिपल उसके पास है । अगर उसक आंख नहीं है तो कुछ भी नहीं है । महत्वपूर्ण है आपका विवेक, आत्मदर्षन । 

परमात्मा हमारे पास है फिर भी हमें दिखाई नहीं देता । मछली सागर में जन्म लेती है, सागर में अपना जीवन व्यतीत करती है और सागर में ही मृत्यु को प्राप्त हो जाती है फिर भी उसे सागर का पता नहीं चलता । इसी प्रकार हमारा जीवन है । हम इस जीवन को जी रहे हैं परन्तु हमें इसकी मूल्यवत्ता ज्ञात नहीं है । जीवन दो प्रकार का है, एक संसार का जीवन, दूसरा परमात्मा का जीवन । तुम्हें अपने स्वास्थ्य का पता नहीं चलता । जब स्वास्थ्य खराब हो जाता है तब तुम्हें ज्ञात होता है कि मैरा स्वास्थ्य भी है । ष्वांस का पता मृत्यु के नजदीक आने पर चलता है । इस जीवन के मूल्य को समझो । परमात्मा तुम्हारे पास है, उसे देखने के लिए दृष्टि चाहिए । आत्म-दर्षन चाहिए । परमात्मा कोई व्यक्ति नहीं तुम्हारी निज की अनुभूति है । परमात्मा तुम ही हो । भारत के ऋषि मुनियों ने कहा- मैं षिव स्वरूप हूॅं, षुद्ध हूं, बुद्ध हूॅं, मुक्त हूॅं, सच्चिदानंद रूप हूॅं । 

आज महासती श्री चंदना जी महाराज की 63 वीं पुण्य-तिथि मनाई गई । इस अवसर पर सामूहिक लोगस्स का जाप तथा महासती श्री कौषल्या जी म ‘श्रमणी’ ने अपने जीवन की घटनाएं, संस्मरण सुनाते हुए उन्हें एक जीवन प्रदायिनी षक्ति से सम्बोधित किया । आचार्यश्रीजी ने महासती श्री चंदा जी महाराज के जीवन पर पर अपनी भावनाएं व्यक्त करते हुए उन्हें महान् विभूति कहा । 

दिनांक: 2 से 5 सितम्बर, 2004 से आत्म: ध्यान साधना कोर्स एडवांस-ाा {चार दिवसीय आवासीय कोर्स} का आयोजन होने जा रहा है । आप सभी उसमें भाग लेकर मन की शान्ति, भीतर का आनंद प्राप्त करें एवं अपना रजिस्टेªषन षीघ्र करवावें । 

 

रक्षा बंधन की ऐतिहासिकता और पवित्रता: जैनाचार्य पूज्य श्री षिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़: 30 अगस्त, 2004: विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने आध्यात्मिक संस्कृति का संरक्षण एवं संवर्धन पर रक्षा बंधन की संस्कृति पर अपने मौलिक विचार प्रकट किए । इस अवसर पर आज के प्रवचन में आचार्यश्रीजी ने फरमाया कि:-  आज का यह पावन दिवस राखी का त्यौहार भाई बहिन के बंधन का पवित्र त्यौहार माना जाता है । भारतवर्ष पर्वो का देष है । हर महीने कोई न कोई त्यौहार अवष्य होता है । कई बार महीने में दो त्यौहार भी आ जाते हैं । त्यौहार हमारी संस्कृति को उद्घाटित करता है । कुछ त्यौहार लौकिक हैं तो कुछ त्यौहार अलौकिक है, इसी प्रकार आध्यात्मिक और सांसारिक त्यौहार भी माने गये हैं । रक्षा-बन्धन लौकिक त्यौहार है और पर्वाधिराज पर्युषण आध्यात्मिक त्यौहार है । त्यौहार हमारे जीवन में कुछ संदेष देते हैं । हमारा जीवन षुद्ध की ओर बढ़े । हमारा अन्तःकरण पवित्र   हो । हृदय में प्राणी मात्र के प्रति हम मंगल कामना करें । यह प्रेरणा हमें त्यौहारों से प्राप्त होती है । 

हर पर्व कुछ षिक्षा देता है । इसी प्रकार रक्षा-बन्धन का पर्व हमें बहिन की रक्षा करने की षिक्षा देता है । षुरूआत में हर पर्व षुद्धता के साथ मनाया जाता था । परन्तु कालान्तर से वह पर्व पवित्रता से हट जाता है । रक्षा-बन्धन का पर्व भाई बहिन का पवित्र पर्व है । भाई बहिन की पवित्रता को रक्षा-सूत्र में बांधा गया है । यह राखी का पर्व पहले बहुत सादगी के साथ मनाया जाता था, आवष्यक नहीं था कि रक्षा-बन्धन के दिन ही बहिन भाई की कलाई पर रक्षा-सूत्र बांधे । इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं तो किसी भी समय बहिन ने भाई को रक्षा-सूत्र बांधकर रक्षा के लिए प्रेरित किया । 

मेवाड़ की महारानी कर्मवती जिसने साम्प्रदायिकता से ऊपर उठकर हुमायु को रेषम के चार धागों में 21 रत्न जड़कर एक रत्न की पेटी में बंद कर रक्षा-सूत्र भेजा और अपनी रक्षा के लिए प्रेरित किया । इसी प्रकार चन्द्रषेखर आजाद ने एक बहिन की रक्षा धन के द्वारा   की । आजकल यह त्यौहार एक लेन-देन का कार्य बन चुका है । वर्तमान में रक्षा-बंधन के पर्व पर बहिन भाई से रक्षा के लिए कामना करने की बजाय कुछ चाह रखती है । यह त्यौहार पवित्रता से हटकर अब एक आडम्बर में आ चुका है । हम आज के दिन इस आडम्बर को हटायें । इस त्यौहार की पवित्रता को बनाये रखे । ऐसी अनेक बहिनें हैं जो आज रक्षा-सूत्र बांधने के लिए तैयार रहती हैं । हम उनकी रक्षा के लिए, उनकी खुषी के लिए रक्षा सूत्र बांधकर रक्षाबंधन का पवित्र त्यौहार बनायें । आज के दिन हम अच्छे कार्य करें । किसी की आवष्यकता की पूर्ति कर दें तो वास्तव में यह पर्व आडम्बर रहित होकर पवित्रता की ओर अग्रसर होगा ।    

दिनांक: 2 से 5 सितम्बर, 2004 से आत्म: ध्यान साधना कोर्स एडवांस-ाा {चार दिवसीय आवासीय कोर्स} का आयोजन होने जा रहा है । आप सभी उसमें भाग लेकर मन की शान्ति, भीतर का आनंद प्राप्त करें । अपना रजिस्टेªषन एस0 एस0 जैन सभा, सेक्टर 18 डी, चण्डीगढ़ में करवावें । 

 

जीवन को मधुर बनायें: जैनाचार्य पूज्य श्री षिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़: 1 सितम्बर, 2004: विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने जीवन जीने के अनमौल सूत्रों पर अपने मौलिक विचार प्रकट करते हुए फरमाया कि- 

ओ जीने वाले जीना है तो जीवन मधुर बनाया कर ।

इस संगीत के माध्यम से हम सबको जीवन जीने की प्रेरणा मिलती है । जीवन को किस ढंग से जीना चाहिए इसकी प्रेरणा मिलती है । हम सबको जीवन मिला ष्वांस मिली, ष्वांस, धड़कन और यह षरीर मिला, प्रकृति और इतना सुन्दर वातावरण मिला, फिर भी हम उसका सही लाभ नहीं उठा रहे हैं । हम समझते हैं कि धन से ही जीवन सुन्दर बनेगा, धन से नहीं ध्यान से जीवन सुन्दर बनता है । जिन्दगी षान से निकलती है परन्तु हमारी सोच है हमें धन चाहिए, कोठी, बंगला, गाड़ी चाहिए । धन केन्द्र बिन्दु नहीं, ध्यान केन्द्र बिन्दु है । यह षरीर हमें मिला । इस षरीर से हम अरिहंत का स्मरण कर लें । 

जब आप अरिहंत को नमन करते हो तो भीतर से झुक जाओ । अरिहंतों ने प्राणी मात्र को धन से धर्म की ओर आने का सुन्दर रास्ता दिखाया । आसपास के वातावरण को देखो । हमारी साधना में यह प्रकृति कितनी सहायक है । यदि आंख है तो दषों दिषाओं में मोती झरते हुए दिखाई देगें । महापुरूषों की वाणी सत्य को उजागर करती है । जिनवचनों में अनुरक्त होने वाला उस पर अपनी श्रद्धा, आस्था प्रकट करने वाला जीव इस संसार से पार हो जाता है । जिन-वचनों में डूब जाओ । पूरी तरह से उसमें तल्लीन हो जाओ । जैसे मधुमक्खी षहद में डूबती है, अरिहंतों की भक्ति उनकी वाणी, उनका ज्ञान यही कहता है, हम स्वयं केन्द्र में स्थित हो  जायें । भीतर षुद्धात्मा भाव को रखें । 

आचार्यश्रीजी ने जीवन जीने के मधुर सूत्रों की चर्चा की । हर पल जागृत अवस्था में रहें । संसारी लोग रात्र में सोते हैं, ज्ञानी लोग जागते हैं । जागने का मतलब पहरा देना नहीं है अपितु अपनी चेतना के प्रति जागरूक रहना है । षरीर विश्राम कर रहा है परन्तु मैं जागरूक हूॅं । यह मानव देह बार-बार नहीं मिलती । इसे हम क्रोध, मोह, अज्ञान में ना गवायें । हम इसका सही उपयोग करें । 

आचार्यश्रीजी द्वारा प्रदत्त आत्म: ध्यान साधना कोर्स एडवांस-ाा का प्रारंभ 2 से 5 सितम्बर, 2004 को षुरू हो रहा है । ध्यान की गहराई में जाने के लिए साधक इस षिविर का लाभ उठायें । 

 

ध्यान षरीर, वाणी, मन की षुद्धि है: जैनाचार्य पूज्य श्री षिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़: 2 सितम्बर, 2004: विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने ध्यान साधना षिविर का परिचय देते हुए फरमाया कि- आनंद हमारा स्वभाव है । षान्ति हमारे भीतर हैं । ज्ञान हम स्वयं है फिर भी आज का मानव पीड़ित है । अज्ञान के अंधकार में बद्ध है । हम क्यों फंसे हुए हैं इस अज्ञान और पीड़ा में । इसका उत्तर आपको स्वयं में मिलेगा । क्यों हम स्वयं से दूर हैं । हम तनाव पीड़ा में क्यों उलझे हुए हैं । हम परसत्ता में चले गए, स्व-सत्ता में नहीं हैं । स्व की दूरी आत्मा की दूरी है । आत्मा एक अनुभव है । ध्यान षरीर, वाणी, मन की षुद्धि है । इसमें कुछ ना करते हुए आनंद,ष्षान्ति में रहना है इसके लिए कुछ चरण   है । हमारे षरीर की षुद्धि कैसे हो, विचारों और मन की षुद्धि कैसे हो । हम समय का सदुपयोग करें । 

समय अमूल्य है । जो समय को जानते हैं वे अमृत को प्राप्त कर लेते हैं । समय अनमोल है । एक साल की कीमत उस विद्यार्थी से पूछो जिसे कुछ अंक कम मिलने पर कक्षा में फेल होना  पड़ा । एक महीने की कीमत उस मां से पूछो जिसने आठ महीने में ही बच्चे को जन्म दिया । सात दिन की कीमत एक साप्ताहिक पत्रिका के संपादक से पूछो जो पत्रिका छापने में एक दिन लेट हो गया । एक दिन की कीमत उस दैनिक मजदूर से पूछो जिसे मजदूरी करने पर भी अपना मूल्य नहीं मिला । एक घण्टे की कीमत सिकन्दर को पूछो जिसने मां को मिलने के लिए अपना राज्य भी बेच देना चाहा ।  एक सैकेण्ड की कीमत ओलम्पिक में भाग ले रहे उस धावक से पूछो जो एक सैकेण्ड पीछे रह गया और गोल्ड मेडल को हासिक नहीं कर पाया । समय बहुत अनमोल है । हमारा एक-एक क्षण समाधि, ष्षान्ति में बीते । केवल मौन, ध्यान, एकान्त में रह गये तो जीवन के सत्य को आप जान जाओगे। 

जीवन में प्यास का होना आवष्यक है । प्यास है तो साधन भी अवष्य मिलेंगे ।  जिन्दगी में प्यास जगाओ । आनंद, षान्ति, समाधि अवष्य मिलेगी । प्यास के साथ संकल्प भी आवष्यक हेै । प्यास तो है परन्तु भीतर संकल्प नहीं तो कार्य पूर्ण नहीं हो सकता । आषा का एक दृष्टिकोण भीतर होना चाहिए । प्यास और संकल्प आपके जीवन का अंग बनें तो जीवन सार्थक होगा । श्रद्धा भी आवष्यक है, जो आपको बताया है उस पर बिना किसी सोच के अनुसरण करो । श्रद्धा वह है जिसे कभी हमने सुना नहीं, देखा नहीं, जाना नहीं, उस पर विष्वास करना । परमात्मा आनंद, षान्ति और ज्ञान का संगम है । तुम्हारे भीतर भी यह संगम है, उसे देखने की आवष्यकता है । 

श्रद्धा से पूरित व्यक्ति उस परम् आत्म-तत्व को प्राप्त कर लेता है । श्रद्धा से व्यक्ति गहराई में चला जाता है । श्रद्धा प्रेम से आती है । श्रद्धा के साथ समर्पण भी जरूरी है । मौन का पालन भी आवष्यक है । अगर मौन भीतर है तो जीवन सुन्दर बन जाएगा । आर्य मौन करो । एक स्थान पर स्थित होना काया का मौन है । वाणी से कुछ भी ना बोलते हुए समता में रहना, वाणी का मौन है और मन में आ रहे प्रत्येक विचारों को समभाव से देखना, किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया ना करना मन का मौन है । हम इस कार्य मौन में जीयें । अपने स्वभाव में आयें । अपने स्वभाव में लीन होने पर संकल्प, विकल्प से मुक्त होने पर ज्ञानी स्वयं ही स्व-तत्व को जान लेते हैं । हम स्व-तत्व को    जाने । आनंद, षान्ति और ज्ञान को जाने । हमारे जीवन का यही परम् उद्देष्य है । 

 

ध्यान एकाग्रता नहीं चित्त की षुद्धि हैः जैनाचार्य पूज्य श्री षिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़: 3 सितम्बर, 2004: विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज के सारगर्भित एवं जीवनोपयोगी प्रवचन प्रतिदिन श्री एस0 एस0 जैन सभा, सेक्टर 18 डी, चण्डगढ़ में चल रहे  हैं । आज आचार्यश्रीजी ने ध्यान साधना पर विषेष प्रवचन फरमाया कि  सभी धर्मों का एक उद्घोष है कि स्वयं को जानो, स्वयं को पहचानों, आत्मा ही परमात्मा है । आत्मा का आत्मा से उद्धार करो । अपनी आत्मा के दीपक बनो । आत्मा को जानो । आत्मा अजर अमर, नित्य षुद्ध बुद्ध ब्रह्म स्वरूप है । बच्चे की हर जगह षुद्धता नजर आती है । आज मानव के भीतर तनाव, बीमारियां भरी हुई है । अपने को पहचानने के लिए हमें साधना की आवष्यकता है । ध्यान एवं समाधि अन्तर का अनुभव है । 

प्रभु महावीर ने ध्यान के चार प्रकार बताये । आर्त ध्यान । यह वह ध्यान है जिसमें रोया जाता है । घर परिवार के लिए रोना अपने बेटे के लिए रोना । मृत्यु के अवसर पर   रोना । रौद्र ध्यान आर्त ध्यान का भयानक रूप है । इसमें आत्म हत्या युद्ध जैसे प्रसंग समाहित हो जाते हैं । ये दो ध्यान अषुभ है इनकी आवष्यकता नहीं है । दो षुभ ध्यान बताये गये हैं । धर्म ध्यान और षुक्ल ध्यान । धर्म में स्थित होना, वास करना ही धर्म ध्यान है । धर्म-ध्यान में सामायिक, सम्वर समाहित हो जाते हैं । ध्यान आपके अन्दर की अनुभूति है, इसे व्यक्त नहीं किया जा सकता । 

ध्यान एकाग्रता नहीं चित्त की षुद्धि है । ध्यान अन्तर की जागृति और भीतर का विवेक है । अन्तर के रहस्य को प्रकट करना ही ध्यान है । ध्यान आत्म-संवर ओर आत्म निर्झरा   है । भीतर विचारों से आने वाले भावों को समता से हटाना ही धर्म-ध्यान है । ध्यान को धर्म-ध्यान में लाने के लिए चार प्रकार बताये हैं, जिसमें जिनेन्द्र भगवान की आज्ञा का पालन करना । षरीर को स्थिर करना, वाणी से मौन एवं मन को समभाव में रखना आज्ञाविचेय है । राग का राग में मिलना अपाय विचय है । ध्यान में समभाव से समता की ओर आते हैं । अज्ञान के कर्मों का नाष करना क्षण-क्षण में हो रहे कर्म-बन्धन से अलग होना विपाक-विचय है । पूरे षरीर को समभावपूर्वक देखते हुए उसमें स्थित होना संस्थान विचय है । 

बारह प्रकार के तत्वों में ध्यान ग्यारहवां तप है । ध्यान का फल समता और जागरूकता है । प्रभु महावीर की सारी साधना का सार समता ही है । ध्यान से नषा छूट जाता है । षराब मांसाहार छूट जाता है । ध्यान से गहराई में जाने पर समाधि आती है । एक अतुलनीय आनंद प्राप्त होता है जो कभी घटता ही नहीं, वही ध्यान है । 

श्रमणं संघीय अनुशासन व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने के लिए आचार्यश्रीजी ने आज निम्न पदों की घोषणा की गई । अधिकारी मुनिराजों कुछ महत्वपूर्ण निर्णय लिये गये जिसका चतुर्विध संघ ने स्वागत किया और व्यवस्थाएं सुन्दर बनी । शेष व्यवस्थाओं को और सुचारू रूप से चलाने के लिए श्रमण संघीय विधानानुसार उनके पूर्व के पद लेकर निम्न पदों की घोषणाएं की जा रही है:-

उपाध्याय श्री जितेन्द्र मुनि जी म0सा0, कांलावाली - हरियाणा

उपाध्याय श्री प्रवीण ऋषि जी म0सा0, इंदौर - मध्य प्रदेष

उपाध्याय श्री रवीन्द्र मुनि जी म0सा0, गुड़गांव - हरियाणा

छत्तीसगढ़ प्रवर्तक वाणी भूषण श्री रतन मुनि जी म0सा0, दुर्ग - छत्तीसगढ़

सलाहकार पं0 श्री नेमीचंद जी म0सा0, अहमदनगर - महाराष्ट्र

सलाहकार श्री दिनेष मुनि जी म0सा0, उदयपुर - राजस्थान

आत्म-दर्षन सर्वोच्च दर्षन है: जैनाचार्य पूज्य श्री षिवमुनि जी महाराज

 

चण्डीगढ़: 4 सितम्बर, 2004: विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज के सारगर्भित एवं जीवनोपयोगी प्रवचन प्रतिदिन श्री एस0 एस0 जैन सभा, सेक्टर 18 डी, चण्डगढ़ में चल रहे  हैं । आज के प्रवचन में आचार्यश्रीजी ने फरमाया कि- व्यक्ति का मन जब परमात्मा की ओर मुड़ता है, अरिहंत की प्रतीती होने लगती है । सिद्ध का स्मरण होने लगता है तब अनायास ही  अन्तर से अमृत छलकता है । प्रभु महावीर की वाणी का सार श्री आचारांग सूत्र में आता है कि आत्म-दर्षन सर्वोच्च दर्षन है । प्रभु महावीर के चित्र को देखकर भीतर ऐसा भाव उमड़े, ऐसी प्रार्थना जागे प्रभु ! मुझे अपने जैसा बना लो । अनंत जन्मों से हम बन्धन में फंसे हुए हैं और प्रतिपल प्रतिक्षण बंधन में फंसते चले जा रहे हैं । मोह, अज्ञान लोभ का बन्धन हमारी कर्म-निर्जरा नहीं करना रहा । दीर्घ दृष्टा लोक को केवल जानते और देखते हैं, परन्तु हम जानने और देखने के साथ प्रतिक्रिया करते हैं । 

प्रत्येक कार्य करते हुए हम भीतर होष बनाये रखे । साधना में केवल बाह्य क्रियाएं, आसन, प्राणायाम अथवा षुद्धि की क्रियाएं ही नहीं अपितु भीतर से चित्त का रूपान्तरण भी होता है । ध्यान करते-करते हम भेद-विज्ञान तक पहुंच जाते हैं । जीव और अजीव की भिन्नता को जान जाते हैं । जो इस भिन्नता को जान गया वह वीर बन गया । हमें स्वरूप का बोध हो जाये । मनुष्य जीवन प्राप्त करना बहुत दुर्लभ है । यह जीवन हमें कर्म-निर्जरा की ओर ले जाता है । इससे हम भक्ति, ध्यान, समाधि के द्वारा मुक्ति की ओर जा सकते हैं ।

जब-जब मन में मोह, क्रोध, मान, लोभ की भावनाएं आयें, उसे हम मन से अलग करते हुए वीतराग-भाव में लगा दें । राग-द्वेष को साक्षी भाव से देखोगे तो कर्म-निर्जरा हेा  जाएगी । जब भीतर सुख दुःख आये तब उसे समता-भाव से देखना । कोई प्रतिक्रिया मत करना । जिसने सुख दुःख को समभाव से जान लिया वह मुक्त हो गया । जितना समता, जागरूकता में रहोगे उतना ही मुक्ति की ओर अग्रसर हो जाओगे । 

धर्म हमारा स्वभाव है: जैनाचार्य पूज्य श्री षिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़: 5 सितम्बर, 2004: विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज के सारगर्भित एवं जीवनोपयोगी प्रवचन प्रतिदिन श्री एस0 एस0 जैन सभा, सेक्टर 18 डी, चण्डगढ़ में चल रहे  हैं । आज के प्रवचन में आचार्यश्रीजी ने फरमाया कि- जब बाहर की आंख बंद करके बैठते हो तो भीतर एक अलोैकिक आनंद बहता है । जब आप मौन, ध्यान में बैठते हो तो पांचों इन्द्रियां और मन अक्रिया में आ जाता है, फिर भीतर से आनंद, षान्ति का प्रवाह छूटता है । 

धर्म रीति-रिवाज, नियम, उपनियम अनुष्ठान कर लिया तो धर्म हो गया ऐसी हमारी समझ है परन्तु यह पूर्ण रूप से धर्म नहीं है, यह तो धर्म का अंग है । धर्म अलग-2 अंगों से पूर्णता की ओर आगे बढ़ता  है । धर्म फूल की सुगन्ध की भांति है । रीति-रिवाज आदि धर्म के पोषक तत्व है पर धर्म नहीं । जैसे पौधे को खाद पानी दिया तब वह बड़ा हुआ, उसी प्रकार धर्म में अभिवृद्धि करने के लिए रीति-रिवाज, नियम-उपनियम, अनुष्ठान आदि करना आवष्यक है । 

गुरू जो बताये वह करना । इस विष्व में सब कुछ है पर उसे ग्रहण करने के लिए हमारी पात्रता चाहिए । षरीर और मन से पार जाने के लिए मंत्र साधन बन सकता है । सबसे बड़ा मंत्र गुरू मंत्र है । गुरू ने जो कह दिया वह तुम्हारे लिए गुरू़-मंत्र हो गया, गुरू के प्रति समर्पण में आ जाओ । सम्प्रदाय और धर्म को एक में मत लाओ । सम्प्रदाय और धर्म अलग-2 है । जब आप अरिहंत या प्रभु महावीर का स्मरण करते हो तब भीतर वीतराग-भाव आना चाहिए । जब नमक का नाम लेते ही भीतर खारापन आ जाता है या रसगुल्ले का नाम लेते ही भीतर मिठास आ जाती है उसी प्रकार अरिहंत का स्मरण करते ही हमारे भीतर वीतराग-भाव आ जाये । 

मंत्र पढ़ना, व्रत उपवास करना, मान्यता को मानना ये भी धर्म के अंग हैं, धर्म के पोषक तत्व है । धर्म हमारा स्वभाव है । जब हमने इस धरा पर पांव रखा था तब हम कितने षांत, कितने आनंद में थे, वही हमारा स्वभाव है । कैसी भी परिस्थिति आए उसे समभाव से ग्रहण करना । जब हम समभाव को भीतर लाएंगें तब ष्षान्ति, समता, आनंद की प्राप्ति होगी । परिस्थति अनुकूल हो या प्रतिकूल हो हम आनंद में है तो धर्म हो जाएगा । प्रकृति का हर कण हमें कुछ दे रहा है । हम ग्रहण करने के लिए अपने हृदय को खुला करें । प्रभु ने धर्म को अहिंसा, संयम, तप रूपी बताया । जब हम साधना करते हैं तो यह तीनों अंग भीतर आ जाते हैं । हम किसी के प्रति द्वेष या दुर्भावना नहीं रखते । साधना करते हुए संयमी जीवन जीते हैं और ध्यान ग्यारहवां तप है तो साधना में यह धर्म हो गया । 

आपके जीवन में पांचष्षत्रु हैं जो आपको साधना करने में सहायक नहीं है - 1- राग - जब आप साधना करते हो तब भीतर राग-भाव आपको तंग करेगा उससे दूर हटना, 2- द्वेष - दूसरे के प्रति द्वेष भाव भी भीतर जन्म लेगा उससे दूर हटना, 3- आलस्य - साधना करते समय नींद आएगी, आलस आएगा उस समय आलस से दूर हटकर आनंद में रम जाना, 4- बेचेनी - जब साधना करोगे तब भीतर घबराहट भी होगी और 5- संषय: साधना करते समय भीतर संदेह उत्पन्न होगा कि मैं साधना कर रहा हूॅं इससे मुझे लाभ होगा या नहीं ? इन पांचों ष्षत्रुओं से दूर रहना । साधना करते समय पांच मित्र भी आपके पास आएंगें- 1- श्रद्धा- श्रद्धा अरिहंतों के प्रति श्रद्धा भाव रखना, वीतराग भाव में श्रद्धा रखना, 2- वीर्य - जिन्होंने स्वरूप बोध करने के लिए पुरूषार्थ किया उनका अनुगमन करते हुए हम भी पुरूषार्थ में साधना करें, 3- समता - सुख दुःख में समभाव रखना, सामायिक करते हुए कछुए की भांति स्वयं को भीतर की ओर ले आना, 4- जागरूकता - इसमें जो अपना है उसे देखना, 5- प्रज्ञा - सार को ग्रहण करना । हमने 40-50 साल की जिन्दगी में क्या पाया । क्या खोया, इसको देखते हुए सार को ग्रहण करना । आज हमने धर्म के स्वरूप को समझा है इसको भीतर उतरना । आपका जीवन आनंद और षान्ति से भर जाएगा । 

आज आचार्यश्री जी के दर्षनार्थ पूना, परवाणु, कालका, खरड़, दिल्ली आदि श्रीसंघ उपस्थित हुए । 

 

कृष्ण जन्माष्टमी पर सेवा का संकल्प लंे: जैनाचार्य पूज्य श्री षिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़: 6 सितम्बर, 2004: विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज के सारगर्भित एवं जीवनोपयोगी प्रवचन प्रतिदिन श्री एस0 एस0 जैन सभा, सेक्टर 18 डी, चण्डगढ़ में चल रहे  हैं । आज के प्रवचन में आचार्यश्रीजी ने फरमाया कि- आज का यह पावन दिवस कृष्ण जन्माष्टमी का दिवस भारत में ही नहीं पूरे विष्व में हर्षोल्लस के साथ मनाया जाता है । तिथि महापुरूषों को जन्म देकर अमर हो जाती है । राम का जन्म नवमी को हुआ । कृष्ण का जन्म अष्टमी को हुआ । भगवान महावीर चैत्र षुक्ला तेरस को इस धरा पर अवतरित हुए । साथ ही इन तिथियों को अमर कर गये । मानव अनंत षक्ति ऊर्जा का भण्डार है । इस क्षण का उपयोग हम कैसे करें । क्षण को जानने वाला ही पंडित कहलाता है । समय के अनुसार स्वयं को बदलो । यह षरीर सार को ग्रहण करते हुए निस्सार को बाहर फेंक देता है । 

आज के वैज्ञानिक कहते हैं कि इस विष्व में एक मिनिट के भीतर 70 हजार बालक जन्म लेते है। कृष्ण का जन्म विकट पस्थितियों में हुआ । माता पिता कारावास में बंद है । रात को घोर अंधेरा छाया हुआ है और उस अंधेरे में कृष्ण ने प्रकाष बनकर जन्म लिया । आपका जन्म होते ही आपके पुण्य ने आपका साथ दिया । कारावास के ताले टूट गये । सैनिकों को गहरी नींद लग गई । यमुना में बाढ़ आ गई और उस बाढ़ के भीतर वासुदेव कृष्ण को लेकर मथुरा की ओर चल पड़े । कृष्ण के पैर का अंगुठा यमुना को स्पर्ष करते ही यमुना ने रास्ता दे दिया, यह आपके पुण्य का प्रथम चमत्कार था । कृष्ण को कर्म योगी कहा जाता है । वे संकल्प के धनी थे । जो कार्य हाथ में लेते थे पूर्ण करते थे । 

कृष्ण ने बुराईयों को समाप्त कर दिया । किसी का सहारा न लेते हुए वे अपने बल पर आगे बढ़े । उन्होंने अंधमान्यताओं को दूर किया । पुराने समय में अनावृष्टि होती थी, उस समय में किसान हजारों मन दूध नदी में बहाकर इन्द्र की पूजा करते थे और उन्हें ऐसा लगता था कि इन्द्र प्रसन्न होकर बरसात करेंगे, तब कृष्ण ने कहा कि तुम पेड़ों को बढ़ाओं । वर्षा के अनुकूल वातावरण बनाओ बरसात अपने आप होगी । अंध मान्यताओं से ऊपर उठकर कम करो । गोवर्धन की पूजा करो । कृष्ण का जीवन एक सच्ची षिक्षा था जिसके माध्यम से हम अनेकों षिक्षाएं ले सकते हैं । उनका बालपन ब्रज की भूमि में बीता । पढ़ाई गुरूकुल में हुई और बड़े होकर उन्होंने सेवा का मधुर संदेष जन-जन तक फेलाया । 

कृष्ण ने प्रत्येक व्यक्ति को कर्म-योग, भक्ति-योग तक पहुंचाया । आपके जीवन में सेवा की भावना उत्तम थी । आप अतिथियों के पांव धोकर उन्हें यथा-स्थान आपस पर विराजित करते थे, यह आपकी सेवा का अनुठा नमूना है । हम भी आज के दिन सेवा का संकल्प लें । अपने जीवन की बुराईयों को दूर करें । श्रद्धा, भक्ति, दान, षील, तप भाव की आराधना करें । 

 

मन आपका सबसे बड़ा मित्र है - जैनाचार्य पूज्य श्री षिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़: 7 सितम्बर, 2004: ध्यान योग प्रणेता आचार्य सम्राट् पूज्य श्री षिवमुनि जी महाराज ने ष्वांस और ध्यान के संगम पर अपने विचार अभिव्यक्त करते हुए कहा कि- ध्यान के लिए ष्वांस को देखना क्यों आवष्यक है । ध्यान को करना नहीं पड़ता, वह हो जाता है । वह हमारेष्षरीर का सहजस्वभाव है । जगत एक नियंत्रित रूप से गतिमान है और इसमें हम अपनी दुविधाएं लेकर उपस्थित हो जाते हैं । दुविधाओं में ष्वांस को देखना, ध्यान         हो  जाएगा ।  ध्यान के लिए जो समता-भाव आवष्यक है वह ष्वांस देखने से सहज आ जाता है । प्रभु महावीर ने इस विधि को ज्ञाता-द्रष्टा में ले लिया । आचारांग सूत्र में इसका वर्णन हमें मिलता है । केवल जानना और देखना कोई भी प्रतिक्रिया नहीं करना । बुद्ध ने विपष्यना के रूप में इसे स्वीकार किया । विषेष रूप से देखना ही विपष्यना है । पातंजलि ने चित्तवृत्ति निरोध को योग कहा । श्रावक के बारह व्रत ध्यान एवं योग से जुड़े हुए हैं । 

हमारी यात्रा सोऽहं की यात्रा है । ‘मैं कौन हूॅं इससे षुरू करके वह मैं हूॅं’ यहां तक पहुंचना है । वह यानि परमात्मा जो षुद्धात्म भाव में रमण करते हैं यही यात्रा हमने तय करनी है । इस यात्रा के लिए ष्वांस हमारे जीवन का सेतु है । जब से जन्म लिया तब से ही आपने ष्वांस का आधार लिया । मां ष्वांस लेती तो गर्भ का जीव भी ष्ष्वांस लेता । जब बच्चा गर्भ से बाहर आता है तो वह रोता है । रोने में उसके फेफड़े संकुचन प्रसारण करते हैं और ष्वांस भीतर चला जाता है । ष्वांस एक सबसे नजदीक का आलम्बन है । आते जाते ष्वांस पर मन को जोड़ लिया तब पता चला कि मन चंचल है क्योंकि मन ष्वांस पर भी नहीं टिकता, वह फिर अपनी यात्रा पर चला जाता है । जब ध्यान में ष्वांस का आलम्बन लेने पर चित्त षान्त होता है तब स्वतः ही मन षान्त हो जाता है । मन के विचार बदलते हैं तो ष्वांस भी बदल जाते हैं । षरीर के साथ मन, चित्त, बुद्धि प्राण का सम्बन्ध है । ष्वांस को देखने पर पता चलता है कि मन वर्तमान में नहीं रहता, वह भूत और भविष्य तक चला जाता है ं मन को ष्वांस पर लगाओ आप समाधि तक पहुंच जाओगे । प्रत्येक कार्य करते समय ष्वांस को देखोगे तो एक साधना में आपका कार्य बदल जाएगा । 

मन आपका ष्षत्रु भी है और मित्र भी है । अगर आपने मन को साध लिया तो मन मित्र बन जाएगा और मन के पीछे चले गये तो वहष्षत्रु बन जाएगा । जब-2 मन में उलझन हो तब ष्वांस को देखो । ष्वांस हमारे जीवन षुद्धि के लिए बहुत उपयुक्त साधन ै । ध्यान का सम्बन्ध ष्वांस से है । ष्वांस आलम्बन है ध्यान नहीं । जब हम आलम्बन में रहते हैं ष्वांस को देखते रहते हैं तब हम समाधि तक पहुंच जाते हैं । भीतर समता, चित्त की षान्ति, आनंद आने लगता है, तब हम सभी संकल्प विकल्पों से मुक्त हो जाते हैं । परमात्म रूप हो जाते हैं, स्वभाव में लीन हो जाते हैं, यही साधना है ।  

पर्वाधिराज पर्युषण ‘षिवाचार्य सत्संग समारोह’ में 11 से 18 सितम्बर, 2004 तक मनाये जा रहे हैं जिसमें भाई बहिन धर्म की आराधना, साधना करते हुए एक वर्ष का लेखा जोखा देखते हैं । हम सभी पर्युषण पर्व में अधिक से अधिक भाग लेकर अपने जीवन को आत्म-षुद्धि की ओर ले जायें ।   

 

ऊॅंकार और सोऽहं से समाधि की प्राप्ति: जैनाचार्य पूज्य श्री षिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़: 8 सितम्बर, 2004: ध्यान योग प्रणेता आचार्य सम्राट् पूज्य श्री षिवमुनि जी महाराज ने ष्वांस और ध्यान के संगम पर अपने विचार अभिव्यक्त करते हुए कहा कि- ऊॅंकार की ध्वनि जीवन में बहुत महत्वपूर्ण स्थान रखती है । ऊॅंकार को सभी धर्मों ने माना है । गीता में गायत्री मंत्र में ऊॅंकार का स्पष्ट उल्लेख प्राप्त होता है । बुद्ध धर्म में मंत्र के आगे ऊॅं, सिक्ख धर्म में गुरू ग्रंथ साहब का पहला षब्द ऊॅं से षुरू होता है । क्रष्चिय, मुस्लिम सभी धर्मों में ऊॅंकार का उल्लेख प्राप्त होता है । जैनाचार्यों ने हर मंत्र के आगे ऊॅं को लगाया है । ऊॅंकार पंच-परमेष्ठी का वाचक है । ऊॅंकार एक ध्वनि है । यह अंनहद नाद भी है । जब मन अषान्त, बैचेनी, पीड़ा से भरा हो तब गहरे ष्वांस लेकर फिर ऊॅंकार बोला जाये तो पूरा प्राणायाम हो जाता है । ऊॅंकार से पूरा षरीर संवेदना से युक्त होकर षुद्धि की ओर अग्रसर होता है । ऊॅंकार की ध्वनि बाहर, भीतर से हमें एकाकार करती है । 

सुबह ऊषाकाल में उगते हुए सूरज को देखकर ऊॅंकार की ध्वनि करो । भीतर बहुत ऊर्जा जाती है । ऐसा लगता है सूरज आपके भीतर आ गया है । ऊॅंकार की ध्वनि में तीनों लोक आ जाते हैं । अधोलोक, ऊध्र्वलोक, मध्य-लोक तीनों का प्रथम अक्षर अ, ऊ, म तीनों को मिलाकर ऊॅं षब्द बनता है । इसका उच्चारण करने से षरीर की नाड़ियां षुद्ध हो जाती है । कैसी भी बीमारी हो 108 बार ऊॅंकार का उच्चारण किया जाये तो बीमारी से हम सदा के लिए मुक्ति पा सकते हैं ।   

सोऽहं भी एक ध्वनि है । यह आपके भीतर की स्वाभाविक ध्वनि है । ष्ष्वांस लेने और छोड़ने में सोऽहं की ध्वनि स्वाभाविक होती है । इस ध्वनि के द्वारा मुक्ति तक पहुंचा जा सकता है । सोऽहं से स्वरूप बोध होता है और इससे करूणा, मंगलमैत्री का जन्म होता है । जिसने जीवन की अस्तित्व को जान लिया उसने स्वयं को जान लिया । जीवन के अस्तित्व को जानने के लिए सोऽह् की ध्वनि आवष्यक है । ध्यान साधना षिविर में इसका प्रायोगिक स्तर पर प्रषिक्षण दिया जाता है । 

प््राार्थना प्रभु के उदात्त गुणों का स्मरण करना है

 

जैनाचार्य पूज्य श्री षिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़: 9 सितम्बर, 2004: ध्यान योग प्रणेता आचार्य सम्राट् पूज्य श्री षिवमुनि जी महाराज ने प्रार्थना एवं मंगलमैत्री के संगम पर अपने विचार अभिव्यक्त करते कहा कि- अरिहंत प्रभु को नमन । उनकी वीतराता षुद्धता को नमन । जब हम अरिहंत, सिद्ध प्रभु की प्रार्थना करते हैं तब हम उनके जैसे बन जाते हैं । हमारे आराध्यदेव जो कि सर्वश्रेष्ठ और सर्वोत्तम है उनकी प्रार्थना करते समय हमारे भीतर सर्वश्रेष्ठता का भाव आये । प्रार्थना में हमारे भीतर भावों का मूल्य है । प्रार्थना बुद्धि से नहीं हृदय के स्तर पर की जाती है । आप क्या बोलते हो यह महत्वपूर्ण नहीं भीतर से क्या भाव निकलते हैं यह महत्वपूर्ण है । 

अरिहंत कोई व्यक्ति नहीं एक विष्व चेतना का षुद्ध स्वरूप है । भीतर उठने वाले प्रत्येक भाव को उस विष्व चेतना के आगे समर्पित करना ही प्रार्थना है । जब आपका हृदय दलित हो तब जो भाव आये उसे बोल देना प्रार्थना हो जाएगी । प्रार्थना करते समय हर बात स्वीकार करना । परमात्मा की याद में तीन बातें अवष्य होती है । कभी हम हंसते हैं, कभी रोते हैं तो कभी गमगीन हो जाते हैं । प्रार्थना करते समय षुरूआत में अपने दुःख पर रोना आता है फिर हम हंसते भी हैं और गमगीन भी हो जाते हैं । प्रार्थना मतलब प्रभु के उदात्त गुणों का स्मरण करते हुए उन गुणों को भीतर उतारना । अरिहंत कहते हुए उन भावों में चले जाना जिन्होंने अपने सभी कर्मों को नष्ट कर लिया है । 

प्रार्थना करने के साथ-साथ मंगलमैत्री अवष्य करना । मंगल के भावों को भीतर उतारना । जो तुम अपने लिए चाहते हो वह सबके लिए चाहो । जब सबके लिए चाहोगे तो आपकी चाहना भी पूर्ण होगी । मंगलमैत्री से पूर्व क्षमा करना । क्षमा के लिए करूणा का भाव आवष्यक है । जब-2 भीतर क्रोध आए तब क्षमा के भावों को भीतर ले आना । जब क्षमा आएगी तो करूणा बहेगी और मंगलमैत्री स्वतः ही हो जाएगी । ध्यान एवं जप करने से पूर्व प्रार्थना आवष्यक है । जब-2 भीतर भाव आये तो उसमें डूब जाओ, प्रार्थना हो जाएगी । 

पर्वाधिराज पर्युषण जैन धर्म के महापर्व के रूप में मनाये जाते हैं । जो ‘षिवाचार्य सत्संग समारोह’ में 11 से 18 सितम्बर, 2004 तक मनाये जाएंगें । आप सभी इन कार्यक्रमों में भाग लेकर अपने जीवन को धर्ममय बनायें ।

 

प्राकृतिक आहार से जीवन स्वस्थ होता है: जैनाचार्य पूज्य श्री षिवमुनि जी म0

चण्डीगढ़: 10 सितम्बर, 2004: ध्यान योग प्रणेता आचार्य सम्राट् पूज्य श्री षिवमुनि जी महाराज ने आहार की सात्विकता पर अपने विचार अभिव्यक्त करते कहा कि- जो कुछ भी हम ग्रहण करते हैं उसका प्रभाव पूरे षरीर पर आता है । आहार हम पूरे ब्रह्माण्ड से ग्रहण करते हैं । हमारे षरीर में साढ़े तीन करोड़ रोम है जिसके द्वारा हम आहार ग्रहण करते हैं । जब आप बुराई में चले जाते हैं तो आप बुरा आहार ग्रहण करते हैं । आप अच्छा सुनते हैं तो सद्विचारों का आहार ग्रहण करते हैं । जब आप खाना खाओ तब टीवी नहीं देखना । सोते समय भी टीवी नहीं देखना, इससे जो आप टीवी में देख रहे हो उसका प्रभाव षरीर पर   होगा । जो हमारी भीतर बीमारियां है उसका सीधा अर्थ है हमारा आहार गलत है । पहले बहिने, माताएं घर में भोजन बनाती थी । मंगल की भावना के साथ भोजन बनाया जाता था, आजकल हम अधकच्चा आहार ग्रहण करते हैं । मैगी, नुड्ल्स आदि मैदे के आहार ग्रहण करते हैं जिससे जो पेट की आंतड़ियों में जम जाता है और हमारा पाचन यंत्र बिगड़ जाता है । 

वैज्ञानिकों ने प्रयोग किया तीन प्याले पानी के लिए गये । प्रत्येक प्याले के भीतर क्रमषः सात्विक, राजसिक, तामसिक आहार डाला गया । सात्विक आहार में दाल, चावल, लस्सी ऐसा आहार । तामसिक में प्याज, लहसुन आदि आलस-युक्त आहार, राजसिक में गरिष्ठ भोजन, पूरी पकोड़े आदि डाला गया । सात्विक आहार बारह घण्टे में गल गया, राजसिक आहार चैबीस घण्टे में और तामसिक आहार 42 घण्टे में गल गया । हम अगर सात्विक आहार ग्रहण करते हैं तो भीतर सात्विकता आती है । जो आहार 42 घण्टे तक पेट में पड़ा रहता है उससे अनेकों बीमारियां उत्पन्न होती है । प्रभु महावीर ने फरमाया कि सूरज अस्त होने के बाद हमारा नाभिकमल भी सिकुड़ जाता है । पूरी तरह पाचन ऊर्जा उत्पन्न नहीं हो पाती इसलिए सूर्यास्त से पूर्व ही आहार ग्रहण करना चाहिए । प्रातःकाल दो ग्लास पानी पीओ, अनेक बीमारियां ठीक हो जाएगी । भोजन के बाद पन्द्रह-बीस मिनिट वज्रासन करो और उसके पष्चात् बांयी करवट लेट जाओ तो आहार पच  जाएगा । जब हमें भूख लगे तभी भोजन ग्रहण करना चाहिए । ग्रास को पूरी तरह चबाना चाहिए । भोजन करते समय प्रार्थना एवं षान्ति के भाव भीतर होने चाहिए । भीतर क्रोध, नींद, डर आदि हो तो भोजन ना करें । खाना खाते समय पानी का प्रयोग नहीं करना चाहिए । चाय, काफी, गुटखा ऐसा आहार ग्रहण ना करें । बाजार की चीजें भी ग्रहण ना करें । प्राकृतिक आहार से जीवन स्वस्थ होता है । हम प्राकृतिक आहार ग्रहण करें । आहार के साथ भ्रमण आवष्यक है । भ्रमण से मन एवं षरीर स्वस्थ हो जाता है । 

भोजन को प्रभु का प्रसाद समझकर ग्रहण करो । जो कुछ आप ग्रहण करते हो उसके पीछे हजारों लोगों की मेहनत है उनके प्रति अनुग्रह व्यक्त करो । केवल आहार को जिह्वा का स्वाद ही नहीं प्रसाद समझकर ग्रहण करो । षुद्ध सात्विक भोजन ग्रहण करो । सात्विक भोजन से षरीर में प्राण षक्ति आती है । जैन धर्म के अनुसार जमीकंद का प्रयोग आहार में नहीं करना चाहिए । इनको ग्रहण करने से प्रथम अणुव्रत का दोष लगता है । हम सात्विक आहार के साथ-साथ प्राकृतिक आहार ग्रहण करें ।       

पर्वाधिराज पर्युषण जैन धर्म के महापर्व के रूप में मनाये जाते हैं । जो ‘षिवाचार्य सत्संग समारोह’ में 11 से 18 सितम्बर, 2004 तक मनाये जाएंगें । आप सभी इन कार्यक्रमों में भाग लेकर अपने जीवन को धर्ममय बनायें ।

 

पर्वाधिराज पर्युषण में धर्म की आराधना करें: जैनाचार्य पूज्य श्री षिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़: 11 सितम्बर, 2004: जैन धर्म दिवाकर, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर, आचार्य सम्राट् पूज्य श्री षिवमुनि जी महाराज ने पर्युषण महापर्व पर अपने विचार अभिव्यक्त करते कहा कि- जैन संस्कृति, जैन दर्षन, जैन धर्म में महापर्व प्र्युषण का स्थान सर्वश्रेष्ठ है । चारों ओरसे अपने कर्म समूहों को समाप्त कर देना पर्युषण है । यह पर्व नहीं महापर्व हैं । इन आठ दिनों में जितना धर्म करोगे उतनी ही कर्मनिर्जरा होगी । इस पर्व में विष्व-चेतना जुड़ी हुई है । मनोरंजन टी0वी0 आदि हमने बहुत कुछ कर लिया अब हम आत्म-दर्षन करें । आत्मानुषीलन करें । मन, वचन, काया से । धर्म की अनुमोदना करोगे तो जीवन निखरेगा । तुम षुद्ध चेतना हो । जीवन में आ रहे सुख दुःख को स्वीकार करो । अपने आपमें जागरूकता लाओ । यह पर्व स्वयं को देखने का है । अरिहंत प्रभु के गुणों को स्मरण करते हुए उनकी स्वयं से तुलना करो । उनको यही षरीर प्राप्त था । उन्होंने इस ष्षरीर द्वारा वीतरागता प्राप्त की । हमें भी यही षरीर प्राप्त है, फिर भी हम इसके द्वारा कर्मों में बंधे हुए हैं । प्रभु की भीतर बस जाओ, फिर प्रभु जो देंगे उसे संतोष कर लेना । प्रभु से मांगना हो तो वीतरागत, षुद्धता, निर्मलता मांगना । 

सभी के भीतर षुद्धात्मा विराजमान है । तुम किसको दुःख दोगे । अपनी कमाई काष्षुद्ध हिस्सा इन दिनों में किसी की सेवा में लगा देना । दान, षील, तप भावना में अभिवृद्धि करना संघ की सेवा, षासन की सेवा है । हम स्वयं से राष्ट्र तक स्वयं के द्वारा ही पहुंच सकते हैं । गुणीजनों के भीतर प्रमोद भावना को भीतर लाओ । दीन दुःखियों के प्रति भावना भीतर लाओ ।  भावनाओं से अपने आपको भावित करो । हम धर्म साधना आराधना करें । कहा भी है:-

तुलसी इस संसार में पांच रतन है सार, ।

सज्जन संगति हरि भजन, दया दैन्य उपकार ।।

पर्युषणों के पावन दिनों में पांच बातों को जीवन में अपनाना । सज्जन की संगति करना, परमात्मा का भजन करना, दीन दुःखियों के प्रति करूणा का भाव रखना, इन्द्रियों का दमन करना और मन, वचन, तन से उपकार करना । यह दिवस आप सभी के लिए मंगलकारी हो जाएगा । 

आचार्य सम्राट् पूज्य श्री षिवमुनि जी महाराज के सान्निध्य में पर्वाधिराज पर्युषण की आराधना प्रारंभ हो गई । प्रातःकाल की मंगल-वेला में अष्ट-दिवसीय ‘महामंत्र नवकार’ का अखण्ड जाप षुरू हुआ । प्रातः 8.15 से श्री अन्तकृदषांग सूत्र की वांचना एवं आचार्यश्रीजी के हृदयस्पर्षी प्रवचन, दोपहर में 3.00 बजे से श्री कल्पसूत्र की वांचन एवं साथ-2 प्रष्नमंच, ज्ञानचर्चा आदि कार्यक्रम प्रारंभ हो गये । आचार्यश्रीजी के सान्निध्य में महापर्व पर्युषण की आराधना करने हेतु भारत के विभिन्न अंचलों से भाई बहिन उपस्थित हो रहे हैं जिसमें राजस्थान से कोटा, उदयपुर, पंजाब से डबवाली, सरदूलगढ़ क्षेत्र हैं । 

 

आपके हृदय में मंगल का भाव जागे: जैनाचार्य पूज्य श्री षिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़: 12 सितम्बर, 2004: जैन धर्म दिवाकर, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर, आचार्य सम्राट् पूज्य श्री षिवमुनि जी महाराज ने पर्युषण महापर्व पर अपने विचार अभिव्यक्त करते कहा कि- महापर्व पर्युषण का दूसरा दिवस आप सभी के लिए मंगलकारी हो । आपके हृदय में मंगल का भाव जागे । आपका मन मंगल से भर जाए । चारों ओर मंगल ही मंगल छा जाये । मंगल क्या है ? इसकी प्रतीति स्थिति आधार क्या है ? जिसको पाना हो उसको देखना षुरू कर देना चाहिए । धारणा से ही आप आगे बढ़ोगे । योग-सूत्र में धारणा छठा अंग है । समाधि लेनी है तो प्रथम धारणा, फिर ध्यान और समाधि इस क्रम से चलना   चाहिए । अरिहंत, सिद्ध को भीतर स्थित करना हो तो मंगल की धारणा आवष्यक है । 

चार मंगल, चार उत्तम, चार षरण से ऊपर कुछ भी नहीं । धारणा का बहुत महत्व   है ।  यदि आप षुभ की, मंगल की धारणा करते हो तो आपके मस्तिष्क का पिछला हिस्सा प्रभावित होता है । तुम जो करोगे वैसा तुम्हें मिलेगा । किसी की मंगल कामना करोगे तो तुम्हारा मंगल होगा । अरिहंत प्रभु ने सभी के लिए मंगल की कामना की । हम भी सभी के लिए मंगल की कामना करें । हमारी आत्मा का स्वभाव तो ज्ञाता-द्रष्टा है । आत्मा तो केवल जानती और देखती है, फिर हम स्वयं को कर्ताभाव में क्यों लेकर आते । धर्म का एक मात्र नारा है प्रतिपल प्रतिक्षण मंगल के भाव में रहें । धारणा हमारे जीवन को प्रभावित करती हैं । 

मंगल दो प्रकार का कहा गया है- दही, गुड़, चावल, टीका आदि लौकिक मंगल है । पारलौकिक मंगल जो अहंकार और ममकार को गला दे वह है । मैं कौन हूॅं ? मैरा क्या स्वरूप है, यह प्रष्न साधना करते समय हमारे भीतर उत्पन्न होता है । तब भीतर से ही उत्तर मिलता है मैं सच्चिदानन्द आनंद स्वरूप हूॅं । सुख समृद्धि सौभाग्य स्वरूप हूॅं । अगर आप सत्त चित्त आनंद, सुख समृद्धि, सौभाग्य की धारणा करते हो तो वैसे ही बन जाते हो । भीतर प्रत्येक भाव मंगल का भरो तो प्रतिपल प्रतिक्षण मंगल की कामना भीतर उठेगी । समृद्धि का मतलब सब कुछ मुझे मिला हुआ है । जब तुम्हारे हृदय में यह भाव आएगा तब तुम परमात्म स्वरूप बन जाओगे । परमात्मा के समक्ष प्रार्थना करना हे प्रभु ! मुझे कुछ नहीं चाहिए । आप इतने विषाल हो । मैं छोटा सा सेवक हूॅं । जब अरिहंत की प्रार्थना करोगे तब उन्हें अंतःकरण में बसा लेना । कषायों को बाहर निकाल लेना । अरिहंत की प्रतीति भीतर आएगी, तब आप मंगल स्वरूप बन जाओगे । 

आचार्य सम्राट् पूज्य श्री षिवमुनि जी महाराज के सान्निध्य में पर्वाधिराज पर्युषण की आराधना प्रारंभ हो गई । प्रतिदिन ‘महामंत्र नवकार’ का अखण्ड जाप चल रहा है । प्रातः 8.15 से श्री अन्तकृतदषांग सूत्र की वांचना एवं आचार्यश्रीजी के हृदयस्पर्षी प्रवचन, दोपहर में   3.00 बजे से श्री कल्पसूत्र की वांचन एवं साथ-2 प्रष्नमंच, ज्ञानचर्चा आदि कार्यक्रम प्रारंभ हो गये । 

 

समृद्ध व्यक्ति अनासक्त होता है: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़: 13 सितम्बर, 2004: जैन धर्म दिवाकर, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर, आचार्य सम्राट् पूज्य श्री षिवमुनि जी महाराज ने पर्युषण महापर्व पर अपने विचार अभिव्यक्त करते कहा कि- महापर्व पर्युषण का तीसरा दिवस आप सभी के लिए शुभ हो । आपके भीतर शुद्ध धर्म की धारा बहे । धर्म का अनुभव अरिहंत को प्राप्त होता है । धर्म की आदि करने वाले अरिहंत हैं । अरिहंत मंगल हैं । उत्तम हैं उनकी शरण हमें लेनी चाहिए । अरिहंत की वाणी का एक-एक शब्द हमारा मंगल करता है, आवश्यकता है उसे धारण करने की । जब सब कुछ मिल जाता है तो मांग नहीं रहती । जब भीतर से व्यक्ति भरता है तो धर्म तुम्हारा अंग संग बन जाता है । जो व्यक्ति समृद्ध होता है उसे किसी चीज की आवश्यकता नहीं होती । समृद्ध व्यक्ति अनासक्त होता है । जिसकी आंखें जो है उसे देखती है वह समृद्ध है, जिसकी आंखें जो नहीं है उसे देखती है वह गरीब है । चक्रवर्ती दरिद्र हो सकता है परन्तु प्रभु महावीर तो समृद्ध हैं । तुम समृद्ध बनो । दुःख किसे भी ना दो । जीवन में कुछ ना हो, फिर भी उसे लुटाते रहना । दिल को बड़ा रखना । कहा भी है- 

रकबा तुम्हारे गांव का, मिलों हुआ तो क्या । 

रकबा तुम्हारे दिल का, एक इंच भी नहीं । 

गांव की दूरी, दूरी नहीं कहलाती, दिल की दूरी दूरी कहलाती है । हम अपने हृदय को विशाल करें । विशालता में उसे लेकर आयें । सेवा, पुण्य करें । अपनी कमाई का कुछ हिस्सा शुभ कार्यों में लगायें । जो कुछ तुम अपनी कमाई का हिस्सा शुभ कार्यों में लगा दोगे वह तुम्हारा हो जाएगा । समृद्धि स्वयंमेव आती है । तीर्थंकर दीक्षा से पूर्व वर्षीदान देते चले जाते हैं । सैकड़ों सोनइयां प्रतिदिन बांटते चले जाते हैं, फिर भी उनका भण्डार खाली नहीं होता । अपने लिए नहीं दूसरों के लिए मांगना । जो तुम्हें मिला हुआ है तुम भीतर बाहर से तृप्त हो तो तुम्हारे भीतर समृद्धि आ गई । 

सौभाग्य वह है जो बढ़ता ही चला जाये । जब तुम इन्द्रिय विषय के पीछे भागते हो तो तृप्त नहीं होते, परन्तु तुम धर्म की ओर आगे बढ़ते हो तो भीतर तृप्ति का भाव आता है । जब तुम ध्यान समाधि आदि करते हो तो वह बढ़ता ही चला जाता है वह सौभाग्य है, हमें चित्त, अन्तर, आत्मा का सुख चाहिए । यदि आपके जीवन में पीड़ा, दुःख, बेचैनी, तनाव है तो तुम सुखी नहीं हो । जब तुम्हारे भीतर तृप्ति, समृद्धि आ जाएगी तब तुम सुखी हो जाओगे । ध्यान, प्रार्थना करो, अरिहंत के भाव में डूबो, तुम्हें सब कुछ मिल जाएगा । अरिहंत के भीतर सुख, समृद्धि है इसलिए वे मंगल स्वरूप हैं । अरिहंत धर्म के स्रोत हैं । अरिहंत की वाणी, सिद्ध का स्मरण, साधु का संग तुम्हें समाधि तक पहुंचा देता है । जो ऋजु, सरल हो वही साधु है । अरिहंत, सिद्ध साधु का स्मरण करते हुए उनके गुणों को भीतर उतारना । उनके द्वारा प्ररूपित धर्म ही मंगल, उत्तम, शरण है । शरण-भाव में रहना । किसी के प्रति दोषारोपण मत करना । प्रतिपल प्रतिक्षण जागरूक समता में रहना तो धर्म हो जाएगा । कुछ भी हो जाए स्वयं में दृढ़ रहना तभी तुम संकल्पवान बनोगे । 

 

प्रभु महावीर का जीवन आकाश के समान निर्मल था

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़: 14 सितम्बर, 2004: जैन धर्म दिवाकर, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर, आचार्य सम्राट् पूज्य श्री षिवमुनि जी महाराज ने पर्युषण महापर्व पर अपने विचार अभिव्यक्त करते कहा कि- महापर्व पर्युषण का चैथा दिवस आप सभी के लिए शुभ हो । शासनपति भगवान महावीर स्वामी को नमन । प्रभु महावीर की भक्ति और गुणगान, उनकी साधना महापर्व पर्युषण के चतुर्थ दिवस में आपके भीतर उतरे । कल्पसूत्र में प्रभु महावीर का जीवन उनकी साधना का वर्णन आता है । प्रभु महावीर को अनेक उत्सर्ग आये । 23 तीर्थंकरों की अपेक्षा प्रभु महावीर को अनेक कष्ट सहने पड़े । देव, तिर्यंच, मनुष्य द्वारा अनेक यातनाएं उन्होने सही । हम पर सबसे अधिक उपकार प्रभु महावीर का है । उनकी वाणी का सम्बल लेकर हम वीतराग-पथ पर आगे बढ़ रहे हैं । वर्तमान में उनका शासन चल रहा है । हम देखें जीवन में साधना किस प्रकार की जाती है । प्रभु महावीर का जीवन आकाश के समान स्वच्छ निर्मल था । हम तो जुगनू भी नहीं है । 

वर्तमान का मानव दो प्रकार का जीवन जीता है । अनुस्त्रोतगामी ओर प्रतिस्त्रोतगामी । 80 प्रतिशत लोग प्रतिस्त्रोतगामी जीवन जी रहे हैं, 10 प्रतिशत लोग अनुस्त्रोतगामी जीवन जी रहे हैं । अनुस्त्रोतगामी उसे कहते हैं जो अपने नियमों पर अडिग रहता हुआ जीवन जीयें । प्रतिस्त्रोतगामी उसे कहते हैं जो लोगों को देखते हुए अपने जीवन को जीयें । 10 प्रतिशत लोग अन्तरगामी होते हैं जो साधना के द्वारा साधना की गहराईयों को छू लेते हैं । प्रभु महावीर ने माता पिता को कष्ट ना हो इसलिए गर्भ में ही कुछ संकल्प धारण किए जिसमें यह भी था कि मैं माता पिता की मृत्यु के पश्चात् दीक्षा अंगीकार करूॅंगा । प्रभु महावीर घर में रहते हुए भी एक अनासक्त होकर रहे । दीक्षा से पूर्व एक वर्ष तक प्रतिदिन करोड़ों सौनय्या का दान दिया । प्रभु महावीर के वर्षीदान से हमें दान की प्रेरणा मिलती है । 

जो चित्त की अनुकम्पा से दिया जाये वह दान है । जैसे माॅं बच्चे को जन्म देती है उसके पश्चात् उसकी इच्छा होती है कि बच्चा स्तनपान कर लंे, यह चित्त की अनुकम्पा है । दान देते समय करूणा का भाव भीतर रखें । हम अपने दृष्टिकोण को बदले । व्यक्ति जब सत्य के मार्ग पर आता है तब अपने दोष नजर आते हैं । हम स्वयं के दोषों को देखें । आलोचना करें । प्रभु महावीर दीक्षा लेते ही ध्यान की गहराई में चले गये । वे सदैव आत्म-दर्शन में लीन रहते थे । जय-पराजय से बिल्कुल अलग थे । हम प्रभु महावीर के मौन और ध्यान को भीतर लायें । उन्होंने दीक्षा लेते ही ध्यान को जीवन का सर्वोत्कृष्ट आलम्बन बनाया था । हम भी ध्यान, मौन की साधना करें । 

आचार्य सम्राट् पूज्य श्री षिवमुनि जी महाराज के सान्निध्य में पर्वाधिराज पर्युषण की आराधना प्रारंभ हो गई । प्रतिदिन ‘महामंत्र नवकार’ का अखण्ड जाप चल रहा है । प्रातः 8.15 से श्री अन्तकृतदषांग सूत्र की वांचना एवं आचार्यश्रीजी के हृदयस्पर्षी प्रवचन, दोपहर में   3.00 बजे से श्री कल्पसूत्र की वांचन एवं साथ-2 प्रष्नमंच, ज्ञानचर्चा आदि कार्यक्रम प्रारंभ हो गये । 

 

वीतरागता से परिपूर्ण विचार की पुष्टि करो: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़: 15 सितम्बर, 2004: जैन धर्म दिवाकर, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर, आचार्य सम्राट् पूज्य श्री षिवमुनि जी महाराज ने पर्युषण महापर्व पर अपने विचार अभिव्यक्त करते कहा कि- महापर्व पर्युषण का पांचवा दिवस आप सभी के लिए शुभ हो । प्रभु महावीर की साधना, भक्ति आपके जीवन में आए । प्रभु महावीर की साधना सर्वोत्कृष्ट थी । उन्होंने अपने जीवन में वीतरागता का पोषण किया । हम भी इस जीवन में वीतरागता का पोषण   करें । वीतरागता से परिपूर्ण विचार की पुष्टि करना । अगर विचार राग रंजित हो, द्वेष दूषित हो तो उसे दूर करना । यह जीवन मंगल है, शुभ है । श्रावक के बारह व्रतों में प्रभु ने क्या करना, क्या नहीं करना बता दिया । जो कार्य करने से सबका मंगल हो वह पुण्य कार्य है । जो कार्य करने से किसी को अच्छा नहीं लगे वह पाप कार्य है । प्रभु महावीर ने कहा कि- पुण्य कार्य में वृद्धि करो । पाप कार्य का त्याग करते हुए चित्त शुद्धि की साधना करो । धर्म सरल है, ़ऋजु है । भीतर जो द्वेष की गांठे हैं उसे खोलते जाओ ।

जीवन परमात्मा की अमूल्य देन है । तुम अपने गलत विचारों के कारण दुःखी हो रहे हो । अपने मन को, विचारों को बदलो । प्रभु महावीर की साधना से अमृत ग्रहण की शिक्षा मिलती है । आज मन अपनी धारणाओं के कारण दुःखी है । यह जीवन जो हमें मिला इसके द्वारा हम अष्ट कर्म से मुक्त हो सकते हैं । जीवन के सार को प्राप्त कर सकते हैं  । फिर भी हम निराश और पीड़ित नजर आते हैं । दुःखी नजर आते हैं । अपने शरीर को साधों,  इन्द्रियों का गोपन करो । 

प्रभु महावीर ने दीक्षा लेते ही अपने नगर से प्रस्थान किया । प्रथम चातुर्मास कुमार ग्राम में किया । दीक्षा लेते ही उन्होंने अपनी साधना प्रारंभ कर दी । खड़े-2 कायोत्सर्ग की मुद्रा में ध्यान किया । साधनाकाल में अनेक उपसर्ग आये । यक्ष, भूत, पिशाच, तिर्यंच, मनुष्य, देव द्वारा आये प्रत्येक उपसर्ग को उन्होंने समतापूर्वक सहन किया । प्रभु महावीर ने अपनी साढ़े बारह वर्ष की साधना में केवल 345 दिन भोजन लिया । शिकायत नहीं की । प्रभु महावीर की साधना का सार केवल देखना और जानना है । प्रभु महावीर ने अपनी साधनाकाल में एक प्रहर से भी कम निद्रा ली । इस साढ़े बारह वर्ष के काल में प्रभु ने ध्यान, कायोत्सर्ग, तितिक्षा, क्षमा को प्रमुखता दी । प्रभु महावीर क्षमावान थे । हम भी प्रभु की भांति साधना करें । संकल्पवान बनें । पर्युषण के पावन दिनों में मन की गांठे खोलकर क्षमा भाव को उजागर   करें ।आचार्य सम्राट् पूज्य श्री षिवमुनि जी महाराज के सान्निध्य में पर्वाधिराज पर्युषण की आराधना प्रारंभ हो गई । प्रतिदिन ‘महामंत्र नवकार’ का अखण्ड जाप चल रहा है । प्रातः 8.15 से श्री अन्तकृतदषांग सूत्र की वांचना एवं आचार्यश्रीजी के हृदयस्पर्षी प्रवचन, दोपहर में   3.00 बजे से श्री कल्पसूत्र वांचन एवं साथ-2 प्रष्नमंच, ज्ञानचर्चा आदि कार्यक्रम प्रारंभ हो  गये । 

 

समता जीवन का सार है: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़: 16 सितम्बर, 2004: जैन धर्म दिवाकर, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर, आचार्य सम्राट् पूज्य श्री षिवमुनि जी महाराज ने पर्युषण महापर्व पर अपने विचार अभिव्यक्त करते कहा कि- महापर्व पर्युषण का छटा दिवस आप सभी के लिए शुभ हो । साधना का प्रवाह निरन्तर प्रवाहमान हो । पर्युषण पर्व जागृति, आत्म-शुद्धि, विचार शुद्धि, चित्त शुद्धि और भाव-शुद्धि को लेकर आता है । अध्यात्म साधना में शरीर शुद्धि का भी महत्वपूर्ण स्थान है । शरीर को आहार शरीर की प्रकृति के अनुसार देना चाहिए । सात्विक और शुद्ध आहार शरीर को देना चाहिए इसीलिए पर्युषण पर्व में भगवान महावीर ने तप को विशेष महत्व दिया है । जिनकी शारीरिक क्षमता है वे पूर्ण रूप से अनशन करते हैं । अनशन से शरीर की शुद्धि होती है, विचार भावशुद्धि से उपवास होता है जिससे आत्म-शुद्धि होती है । 

व्यक्ति सबसे ज्यादा प्यार अपने आपसे करता है । जब व्यक्ति अकेला आत्म-चिन्तन की अवस्था में होता है । समाधि की अवस्था में होता है । समभाव की अवस्था में होता है तो वह अध्यात्म से जुड़ जाता है । इसमें मुख्य है व्यक्ति कर्ताभाव को तोड़कर समर्पण-भाव में आ जाये । आज जगत में सभी समस्याओं का मुख्य कारण कर्ताभाव है- मैंने किया, मैं कर रहा हूॅं इसी कारण पिता पुत्र में, गुरू शिष्य में, सास बहु में, समाज में क्लेश और कलह होता है । हम यह समझे कि ये सभी कुछ कार्य सब संयोग से हो रहे हैं । अकेला कोई व्यक्ति कोई भी कार्य नहीं कर सकता । प्रकृति का कण-कण हमें सहयोग दे रहा है । आस पास के सभी लोग हमें सहयोग दे रहे हैं । सभी के सहयोग से यह संसार चल रहा है । व्यक्ति का अज्ञान है कि मैं कर रहा हूॅं । पर्युषण के दिनों में इस कर्ताभाव को तोड़कर भेद-ज्ञान का अनुभव करें । कवि ने कहा है- भेद ज्ञान साबुन भयो, समता रस भर नीर ।

   अन्तर धोबी आत्मा, धोवे निज गुण चीर ।।

शरीर अलग है और आत्मा अलग है । इस आत्म-चिन्तन रूपी साबुन से समता-रूपी स्वभाव के रस रूपी पानी से अपने अन्तर आत्मा के द्वारा अपने अवगुणों से भरे हुए वस्त्र को धोना है और ये तभी धोया जा सकता है जब हम इन पर्युषण के दिनों में अन्र्तमुखी बनें । आत्म चिन्तन करें । स्वयं का निरीक्षण करें । ध्यान, मौन, कायोग्सर्ग करें । हर व्यक्ति इन पवित्र दिवसों में समता-रूपी रस की अभिवृद्धि करता जाये । तप से शरीर को शुद्ध करें और आत्मा को पवित्र बनाते हुए स्व पर कल्याण में लग जाये तो हमारा पर्युषण पर्व मनाना सार्थक होगा । सबके जीवन में मंगल हो, कल्याण हो यही हार्दिक भावना । 

आचार्य सम्राट् पूज्य श्री षिवमुनि जी महाराज के सान्निध्य में अनेक भाई बहिनों ने दीर्घ तपस्याएं शुरू की है जिसमें 16, 11 एवं अनेक अठाई की तपस्याएं चल रही है । साधु साध्वीवृंद भी लगातार तपस्याओं में लगे हुए हैं । 18 सितम्बर, 2004 को जैन धर्म के पवित्र दिवस सम्वतसरी का कार्यक्रम ‘शिवाचार्य सत्संग समारोह’ में मनाया जाएगा । सभी धर्मावलम्बी सादर आमंत्रित है । 

 

आलोचना और प्रतिक्रमण की आराधना जैन धर्म का प्राण है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़: 17 सितम्बर, 2004: जैन धर्म दिवाकर, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर, आचार्य सम्राट् पूज्य श्री षिवमुनि जी महाराज ने पर्युषण महापर्व पर अपने विचार अभिव्यक्त करते कहा कि- महापर्व पर्युषण का सातवां दिवस आप सभी के लिए मंगलकारी हो । जैसे वर्ष भर का अन्तिम दिवस दीपावली होता है उसी प्रकार वर्ष में एक बार आने वाला पर्व सम्वत्सरी के पूर्व आत्म-शुद्धि के लिए हम लोग तैयारी करते हैं । जिसमें दो मुख्य आराधना है आलोचना और प्रतिक्रमण । आलोचना अर्थात् विशेष रूप से अपने आपको चारों तरफ से देखना । अपने दुष्कृत्यों को देखकर उसके सद्गुरू के समक्ष प्रकट करना और शुद्ध हो  जाना । दूसरी आराधना है प्रतिक्रमण की । सहज रूप से हम जीते हैं उसको क्रमण कहते हैं और उसमें सहज रूप से जीवन जीते हुए कभी-2 जीवन में अतिक्रमण हो जाता है उस अतिक्रमण से पुनः लौटने की प्रक्रिया है प्रतिक्रमण । प्रत्येक जैन साधक को आत्म-निरीक्षण करने के लिए ये सात दिवस दिये जाते हैं, जिसमें विभिन्न आयामों से वह आत्म-शुद्धि करता है और सम्वत्सरी के दिन परिपूर्ण शुद्धि कर मंगलमैत्री का वातावरण निर्मित किया जाता है । 

प्रभु महावीर कहते हैं धर्म-रूपी वृक्ष का मूल है विनय । जैसे मूल के बिना वृक्ष की उत्पत्ति नहीं हो सकती वैसे ही विनय रूपी मूल के बिना धर्म रूपी वृक्ष का उत्पन्न होना कठिन है । हमारे जीवन को निर्माण करने में माता, पिता और गुरू का महत्वपूर्ण योगदान है, उनका ऋण हम धन, दौलत से नहीं चुका सकते, उनका सम्मान और नमन करने से तथा उन्हें धर्म की ओर मोड़ देने से हम उनका ऋण चुका सकते हैं । माता पिता गुरू हमारे चेतन तीर्थ हैं, उनकी भक्ति और सेवा करना ही उनकी पूजा है । जैस आगमों में वर्णन मिलता है कि राजा श्रेणिक ने शुद्ध हृदय से भगवान और संतों को वंदना किया तो तीर्थंकर गोत्र का उपार्जन कर लिया । अगर भावपूर्वक वंदन करते हैं तो नीच गौत्र का क्षय कर उच्च गोत्र का बंधन करते हैं ।   

18 सितम्बर, 2004 को आचार्य सम्राट् पूज्य श्री षिवमुनि जी महाराज के सान्निध्य में सम्वत्सरी पर्व की आराधना मंगलमैत्री दिवस के रूप में प्रातःकाल से पोषण व्रत आराधना, 7.30 बजे से 11.30 तक शास्त्र वांचन एवं विविध कार्यक्रम, दोपहर 2.00 से 3.00 कल्पसूत्र का वांचन, 3.00 से 4.00 बजे तक आलोचना एवं 4.30 से 6.00 बजे तक सामूहिक प्रतिक्रमण आराधना । 

 

क्षमा का सम्बन्ध करूणा, मैत्री से है: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़: 18 सितम्बर, 2004: जैन धर्म दिवाकर, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर, आचार्य सम्राट् पूज्य श्री षिवमुनि जी महाराज ने पर्युषण महापर्व पर अपने विचार अभिव्यक्त करते कहा कि- महापर्व पर्युषण का आठवा दिवस आप सभी के लिए मंगलकारी हो । तीन प्रकार का शरीर बतलाया गया है स्थूल शरीर, कर्म शरीर और भाव शरीर । स्थूल शरीर के द्वारा आप सभी कर्म करते हैं । कर्म शरीर के द्वारा आपके कर्म संस्कार चल रहे हैं । भाव शरीर के द्वारा हम सभी मंगल की कामना करें क्योंकि भावना से ही मैत्री का जन्म होता है । भाव के लिए आलोचना, क्षमा-याचना करें । क्षमा का सम्बन्ध करूणा, मैत्री से है । मैत्री की किरणें चारों ओर प्रवाहित करती है, जो कुछ तुम मुख से बाहर निकालो वही तुम्हें मिलेगा, इसलिए सबके मंगल की कामना करो, तुम्हारा भला होगा, जगत का भला होगा । आज के दिन दान, शील, तप भाव की आलोचना करना । बचपन से लेकर आज तक की उम्र की आलोचना गुरू के समक्ष अथवा एकान्त में बैठकर स्वयं की साक्षी से करना । आप सभी के जीवन में सत्य, धर्म आये, अन्तःकरण में प्रभु महावीर की वाणी समा जाये । आपके अंग-अंग में समता का प्रवाह बढ़े । महापर्व सम्वत्सरी जीवन का हिसाब किताब देखने के लिए आता है, भारत की संस्कृति में लौकिक और अलौकिक दो पर्व आते हैं । वर्ष में एक बार आने वाले दिन को सम्वत्सरी कहा जाता है, जो मंगल, शुभ है, उसे आज के दिन ग्रहण करो । जितना मनुष्य कर्म बांधता है उतना तोड़ता भी है । शुद्ध-भाव भीतर आये तो निर्झरा होती है । कहा भी है-

आया जगत में क्या किया ? तन पाला की पेट,

सहजो दिन धन दे गया, रेण कई सुख ऐंठ ।

इस शरीर का पोषण किया जिन्दगी भर कमाते रहे फिर भी हमारे हाथ कुछ भी नहीं लगा । इस शरीर को चलाने के लिए दिन भर धंधा करके धन कमाया और शरीर को विश्राम देने के लिए रात सोने में बिता दी । धर्म की कमाई हमारे हाथ में नहीं आई । आज वर्ष भर का लेख जोखा कर लेना । 

प्रभु महावीर ने वर्षाकाल के पचास दिन पूरे होने पर और 70 दिन शेष रहने पर सम्वत्सरी की आराधना करने के लिए कहा । आज वह सम्वत्सरी का पावन पर्व हमारे समक्ष है । आज के दिन हम बारह प्रकार का तप करें । पौषध तपस्या करें । चित्त शुद्धि में ध्यान लगावें । इच्छा का निरोध करना तप कहलाता है । जिसको इच्छा हो उसको त्यागना ही तप कहलाता है, जिसकी इच्छा हो उसको त्यागना ही तप कहलाता है । अपने जीवन की आवश्यक वस्तुओं को नियंत्रण में लाओ । आज के दिन सेवा कार्य करो । 

 

ज्ञानी व्यक्ति संतोषी होता है: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी म0

चण्डीगढ़: 20 सितम्बर, 2004: जैन धर्म दिवाकर, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर, आचार्य सम्राट् पूज्य श्री षिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- प्रभु महावीर की साधना मंगल है, श्रेयस्कर है । प्रभु महावीर द्वारा बतलाया हुआ धर्म सदैव सुख शान्ति आनंद देता है । धर्म का अर्थ यह नहीं कि त्यौहारों में तप अनुष्ठान कर लिया जाये या फिर गुरूओं के दर्शन कर लिये जायें । धर्म तो हमें सच्ची दृष्टि, शुद्ध ज्ञान, वीतरागता का भाव देता है । प्रभु महावीर की वाणी का एक-एक शब्द बहुत गहरा है । प्रभु महावीर ने फरमाया ज्ञान से जाना जाता है । जानने के बहुत अर्थ है । जानने का मतलब पढ़ना, शास्त्र रटना या डिग्री प्राप्त करना नहीं है । ज्ञान सूचना का संग्रह नहीं होता । ज्ञान से जानना और दर्शन से देखना यह दो गुण मानव में है । जीव वही है जो जानता है, पहचानता है, मूल्यांकन करता है । जब व्यक्ति यह समझ जाता है तब वह संसार में नहीं उलझता । कहा भी है-  

                पढने की हद समझ है, समझन की हद ज्ञान ।

  ज्ञान की हद हरिनाम है, यह सिद्धान्त उर आन ।।

फकीरी का मतलब जो मिला है उसमें संतुष्ट रहना, संतोष रखना । ज्ञानी व्यक्ति संतोषी होता है । किसी पुस्तक को पढ़ा जाता है तो उसके द्वारा हमें समझ प्राप्त होती है । ज्ञान प्राप्त होता है, जब ज्ञान प्राप्त हो जाता है तो हरिनाम के सिवा और कुछ नहीं रहता । जग में रहते हुए केवल राम का स्मरण करो । संघर्ष, तनाव, हिंसा को मत देखो । यह जीवन कौरा कागज है, जितनी काली स्याही फेरोगे उतने ही कलुषित होते चले जाओगे । 

सारे जगत के ग्रन्थ, साधु महात्मां एक ही बात बतलाते हैं हृदय में नाम स्मरण करो, चाहे वह कैसा भी नाम हो । राम, रहीम, नानक, पाश्र्वनाथ, कृष्ण है या बुद्ध किसी का भी नाम स्मरण करो, मन से करो । मन में दया भाव रखो । अपने शरीर को सेवा में लगा दो । जब अपने कषाय ज्ञात हो जाएंगें तब आप अनुभव के स्तर पर जीने लग जाओगे । ग्रन्थ पंथों से अनुभव की बात गहरी होती है । अरिहंत, सिद्ध सर्वोपरि है, उनकी शरण में जाओ । जैसा भीतर अनुभव हो वैसा ही करना । 

आचार्यश्रीजी द्वारा प्रदत्त ‘आत्म: समाधि कोर्स’ गतिमान है जिसमें साधक वर्ग भाग लेकर स्वयं को मंत्र द्वारा समाधि का अभ्यास सीख रहे हैं । आगामी आत्म: ध्यान साधना कोर्स ‘बेसिक’ 22 से 26 सितम्बर, 2004 तक शुरू हो रहा है जिसमें सभी भाग लेवें । 

 

त्रिगुप्ति की साधना से मोक्ष प्राप्ति: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़: 21 सितम्बर, 2004: जैन धर्म दिवाकर, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर, आचार्य सम्राट् पूज्य श्री षिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- आप अपने जीवन में जैसी धारणा बनाते हो वैसे ही बन जाते हो । आपने धारणा बना ली कि मैं गरीब हूॅं, दुःखी हूॅं तो तुम गरीब और दुःखी बन जाओगे । तुम्हारे मन में धारणा बन जाए कि मैं सुखी हूॅं तो तुम सुखी बन जाओगे । कितना भी दुःख आ जाये सा सुख आ जाये मुझे कुछ नहीं होगा, ऐसी धारणा बना ली तो तुम्हें कुछ भी नहीं होगा । जिन-वचनों में अनुरक्त होने पर आपको कोई सुखी दुःखी नहीं कर सकता । सुख दुःख तुम्हारी अपनी धारणा है इसलिए अरिहंत का शरणा लेना बुढ़ापा आ जाये कोई तुम्हारा साथ न दे उस समय प्रभु को धन्यवाद देना कि प्रभु मुझे प्रभु भक्ति देने का समय दे दिया । 

जब तुम समता में होते हो तब सामायिक हो जाती है । मन, वचन, काया एक समय में आ जाये तब समता आती है । सुख आये, दुःख आये प्रभु सब मेरे ही कर्मों का फल है ऐसी भावना प्रतिपल भावित करना । श्रावक वही है जो प्रभु वचनो ंपर श्रद्धा करता है । जिसकी दृष्टि गुण-दृष्टि है तुम स्वयं को तर्कवान शास्त्री पंडित समझते हो । शास्त्र पढ़ लेने से या तर्कवान बनने से मुक्ति प्राप्त नहीं हो सकती । मोक्ष प्राप्ति के लिए तो तीन गुप्ति की साधना करनी आवश्यक है । मन से मौन होना । वचन से मौन होना । काया से स्थिर होना यह त्रिगुप्ति की साधना है । 

जिन-वचन मूल्यवान है । शिव वह है जिन्होंने जीवन का कल्याण कर लिया । जब तुम समाधि में, सामायिक में बैठते हो तब तुम्हारा अंग-2 पुलकित हो जाये । शरीर का भान भी भूल जाये । तुम शरीर नहीं हो । ना ही तुम्हारा नाम भी अपना नहीं है । नाम आपके शरीर का सहारा मात्र है । तुम तो शिव स्वरूप हो । यह मन, वचन, शरीर भी तुम नहीं हो । तुम तो शुद्धात्मा हो, शुद्ध, बुद्ध, निर्मल हो । जब-2 आपका मन सामायिक में लग जाये, समाधि में लग जाये तब प्रभु को धन्यवाद देना । बुराई को छोड़ना और नैकी का कार्य  करना ।  

आचार्यश्रीजी द्वारा प्रदत्त ‘आत्म: समाधि कोर्स’ गतिमान है जिसमें साधक वर्ग भाग लेकर स्वयं को मंत्र द्वारा समाधि का अभ्यास सीख रहे हैं । आगामी आत्म: ध्यान साधना कोर्स ‘बेसिक’ 22 से 26 सितम्बर, 2004 तक शुरू हो रहा है जिसमें सभी भाग लेवें । 

 

समाधि अपने निज गुण से आती है: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़ 22 सितम्बर, 2004: को सेक्टर 18 डी स्थित जैन स्थानक में विराजित ध्यान योगी आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने विचार अभिव्यक्त करते हुए कहा कि- समाधि अपने निज गुण से आती है । तुम अपने निज गुण को देखो । संत कबीर से पूछा समाधि कैसे मिलेगी ? कबीर ने कहा- ‘सहज समाधि भली’ तुम सहज हो जाओ समाधि अपने आप आ जाएगी । सहजता में आनन्द प्रकट होता है । माली ने जल्दी फसल बोने के बीज डाला । सौ-सौ घड़े पानी भी डाला । परन्तु ऋतु आने पर ही फल प्राप्त होता है । अनुभव स्वयमेव होता है जिसे हम पुरूषार्थ कहते हैं वह संघर्ष है । संघर्स से तनाव, बेचैनी आती है हम सुबह से शाम खूब काम करें वह पुरूषार्थ कहलाता है । 

पुरूष के अर्थ में जीवन लगाना ही पुरूषार्थ है । जिसकी ज्योति, चेता निर्मल है, वह पुरूष है । हमारा स्वभाव आनन्द में रहने का है । आनन्द का मतलब मौज-मजा मस्ती नहीं है । करूणा मैत्री है । कहने और सुनने से अनुभव प्राप्त नहीं होता । अनुभव तो किया जाता है । तुम अपनी धारणा से अनुभव कर लो तो वह अनुभव नहीं है । धारणा परम्परा बन्धन है, इसे निकाल डालो, शुद्ध स्वभाव में रहो । 

शुद्ध स्वभाव केवल जानना और देखना है । प्रतिक्रिया करते हैं तो हम अटक जाते   हैं । एक स्थान पर बैठ जाओ । वाणी से मौन हो जाओ । मन को अपने भीतर लगा दो तो साधना हो जाएगी । तुम एक कदम चलो परमात्मा दस कदम चलेगा । कुछ समय प्रभु की प्रार्थना करो । एक ज्ञान को प्राप्त करो । वह ज्ञान है कि मैं कौन हूॅं ? जब-जब समय मिले स्वयं से यह प्रश्न करो कि मैं कौन हूॅं । फिर अपनी धारणाओं से उ तर आते रहेंगे । कोई भी उत्तर गलत नहीं है । जो आएगा वह सब सही है । एक समय ऐसा आएगा जब तुम भीतर से एकदम खाली हो जाओगे । वही तुम्हारा स्वभाव है । हम अपने को देखें । जीवन को सहज और सरल बनावें । यही ज्ञानियों के जीवन का सार है । 

 

चेतन स्वरूप को पहचानो: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़ 23 सितम्बर, 2004: को सेक्टर 18 डी स्थित जैन स्थानक में विराजित ध्यान योगी आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने विचार अभिव्यक्त करते हुए कहा कि- मनुष्य की विशेषता है कि वह जैसा सोचता है वैसा बन जाता है । जैसा विचार करोगे वैसा बन जाओगे । मुख्य धारा यह है कि तुम क्या मानते हो, क्या सोचते हो । जो लोग जिस वातावरण में रहते है। वैस्ेा ही बन जाते हैं । पहाड़ पर रहने वाले पहाड़ी बन जाते हैं । शहर में रहने वाले शहरी बन जाते हैं । ग्राम में रहने वाले ग्रामीण बन जाते हैं । हमारे ऋषि मुनियों ने जंगल में रहकर साधना की । उन्होंने जाना की यह शरीर केवल पंचतत्व का ढ़ांचा है । अन्तिम समय जो स्थिति होगी । जैसी दशा होगी वैसी ही गति हमें मिलेगी । धरती के पाप छुपाने को गगन है । मन के पाप छुपाने को तन है, मगर कुछ पाप ऐसे भी है जो छिपाये छिपते नहीं, इसलिए हर लाश पर कफन है । तुम परमात्मा की याद में ऐसे जीओ कि अन्तिम समय केवल उसका स्मरण आपके भीतर चलता रहे । उनकी याद भीतर आती रहे । परमात्मा प्रतिपल प्रतिक्षण तुम्हारे पास है, उसे याद करो । ध्यान में बैठो तो अंग-2 में परमात्मा के निवास को अनुभव करो । 

हमारा जीवन कितना अद्भुत है, जो हमारे पास है हम उसे याद नहीं करते । तीर्थंकर, अरिहंत, सिद्ध प्रभु को याद करो । प्रभु  प्रार्थना करो कि प्रभो ! जो कुछ है बस तूं ही है । यह प्रार्थना आत्मसात हो गई तो मोक्ष पास हो जाएगा । इस जीवन में सब कुछ प्रतिपल प्रतिक्षण बदल रहा है । बचपन सुहाना और प्यारा है । वह खेल कूद में बीतता है । जवानी धन, पद, यश रूप के नश्ेा में बीत जाती है । बुढ़ापा बचपन की ओर जवानी की यादों में बीत जाता है । इसलिए चेतन स्वरूप को पहचानो । शरीर मन, वचन, काया तुम नहीं तुम तो शुद्ध, बुद्ध, मुक्त, सिद्ध स्वरूप हो । हम रोटी, कपड़ा मकान के लिए जीते हैं । स्वयं के लिए जीना भी क्या जीना है । लोगों के लिए जीयें । सबके मंगल की कामना करें । किसी की सेवा करें, भक्ति करें, आराधना करें उसी में हमारा जीवन सफल है ।  

माता पिता तीर्थ स्वरूप है: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़: 24 सितम्बर, 2004: जैन धर्म दिवाकर, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर, आचार्य सम्राट् पूज्य श्री षिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- अरिहंत प्रभु को नमन । गुरूदेव को नमन । नमन इसलिए क्योंकि उन्होंने अपनी लक्ष्य प्राप्ति कर ली है । अरिहंत प्रभु ने कषायों पर विजय प्राप्त कर ली है । नमन करते हुए यह भाव रखना कि दाता तुम दयालु हो । सबके पालनहार हो । तुम ही सबके रक्षक हो । फिर कोई संकल्प- विकल्प मत करना । माता पिता गुरू, तीनों का जीवन में बहुत महत्व है । माता पिता सभी के सृजनहार होते हैं, परन्तु वर्तमान की स्थिति में माता पिता को कम मूल्य दिया जाता है । माता पिता तीर्थ स्वरूप है फिर भी उनकी कोई सेवा करना नहीं चाहता ।

अरिहंत की भक्ति करने से पूर्व उस माता को याद करो जिसने हमें जन्म दिया, जीवन दिया । माता पिता तीर्थ है हमें उन्हें तीर्थ स्वरूप मानना चाहिए । अरिहंत प्रभु के पास अनंत करूणा, मैत्री है, वही करूणा और मैत्री मां के दिल में है हम उसे अनुभव करें । कर्म जैसा करोगे वैसा फल मिलेगा । मनुष्य जब कर्म करता है तब उसे पता नहीं चलता, परन्तु जब उसका फल आता है तब वह उसे भोगने के लिए विवश होता है । माता पिता जन्म देते हैं, जीवन देते हैं और गुरू आपको धर्म से जोड़ता है । आपके दिल में करूणा, मैत्री जगाता है अरिहंत से संबंध स्थापित करता है । 

आज ऐसी ही महासाध्वी श्री सौभाग्यवती जी महाराज की 37 वीं पुण्यतिथि मनाई जा रही हैं । वे संयम की विलक्षण मूर्ति थे । यथानाम तथागुण थे, उनके जीवन में संयम भरा हुआ था । उनकी वाणी विलक्षण थी । आचार्यश्रीजी ने इस अवसर पर अपने वैराग्यकाल के संस्मरण जन-जन के स्मृति पटल पर अंकित किये । 

इस अवसर पर उप प्रवर्Ÿिानी महासाध्वी श्री कौशल्या जी म0 ‘श्रमणी’ ने भी अपनी भावनाएं व्यक्त की । 

 

प्रत्येक श्वांस को प्रभु भक्ति से जोड़ दो: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़: 25 सितम्बर, 2004: जैन धर्म दिवाकर, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर, आचार्य सम्राट् पूज्य श्री षिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- एक दिन में कितना समय ऐसा है जब हम प्रभु को याद करते हैं । चैबीस घण्टे में कितने मिनिट, कितने सैकिण्ड हम प्रभु की भक्ति करते हैं इसका मापदण्ड क्या किसी के पास है ? किसी ने कहा भी है- 

मैं वक्त हूॅं, वक्त पे बता दूंगा । 

वक्त में अकड़ी जिसकी गर्दन 

उसकी बिगड़ी बना दूंगा । 

प्रतिपल प्रतिक्षण धड़कन धड़क रही है । श्वांस लिया जा रहा है उस श्वांस को प्रभु स्मरण के साथ जोड़ दो तो वह सफल हो जाएगा । जो सुख समता, समाधि ध्यान में है वह और जगह नहीं । हम प्रत्येक को बदलने की कोशिश करते हैं परन्तु जब तक हम स्वयं नहीं बदलते तब तक कोई किसी को नहीं बदल सकता । यह शरीर जो पंचतत्व का ढ़ांचा है आखिर में यह मिट्टी में मिल जाएगा । उस समय अपने मित्र भी हमें साथ नहीं देंगे । हमें जितना अपने मित्रों से डर है उतना शत्रु से नहीं । मित्र जल्दी धोखा दे जाता है क्योंकि वह अपना सबसे प्यारा है । 

अरिहंत प्रभु की भक्ति उनकी निष्ठा, सिमरन, वंदन, प्रार्थना, उपासना श्रेष्ठ है । उनका आचरण हमें अरिहंत बना देता है । हे सिद्ध प्रभु आप निज स्वरूप में रमण करते हो । मुझे भी निज स्वरूप की ओर ले चलो ऐसी भावना, प्रार्थना के भीतर रखना । अरिहंत सिद्ध का नाम लेने से पहले या स्तुति करने से पहले अरिहंत के बाह्य व्यक्तित्व का स्मरण करें । प्रभु के समोसरण के भावों में रमण करने का प्रयास करें । उनका कैसा अनुपम स्थान था उस स्थान पर हम भी कभी गये होंगे, परन्तु अभी हमें याद नहीं जिसको तुम अपना प्यारा बना लेते हो वही तुम्हें साथ देता है । 

परमात्मा एक है उसके पास श्रद्धा, विश्वास सबर रखना जरूरी है । धीरज रखो । आपस के संबंधों को अच्छा बनाओ । श्रद्धा, भक्ति, भाव से सम्बन्ध अच्छे बनते हैं । जहां भजन और भोजन इकट्ठे बैठकर करोगे वहां श्रद्धा भक्ति भीतर आएगी । प्रत्येक कार्य करते समय भक्ति के भाव भीतर रखो । अरिहंत की वीतरागता के भावों को भीतर लाओ ।  

आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज के सान्निध्य में ‘आत्म शुक्ल’ जन्म जयंती के उपलक्ष्य में 26 सितम्बर, 2004 को भव्य रक्तदान शिविर एवं गुणगान सभा का आयोजन होगा । आत्म: ध्यान साधना कोर्स ‘बेसिक’ 26 से 30 सितम्बर, 2004 तक शाम   4.00 से 6.00 बजे तक होगा । जो व्यक्ति तनाव मुक्ति की साधना करना चाहते हैं स्वयं में रमण करना चाहते हैं वे उसमें भाग लेकर जीवन जीने की कला को अपनायें । 

चण्डीगढ़: 26 सितम्बर, 2004: जैन धर्म दिवाकर, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर, आचार्य सम्राट् पूज्य श्री षिवमुनि जी महाराज ने आत्म शुक्ल जन्म जयंती पर अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- श्रमण संघ प्रथम पट्टधर, महान् योगीराज, स्वाध्याय ध्यान के अध्यात्म-योगी ऐसे महान् आचार्य जिन्होंने श्रमण संघ को सींचा, पल्लवित पुष्पित किया । जो करूणा मंगलमैत्री के मसीहा थे । संयम साधना के धनी थे, उनका आज जन्म दिन मनाया जा रहा है साथ ही पूर्णिमा के चन्द्र के समान शुक्ल जिनका आचरण ही शुक्ल था ऐसे प्रवर्तक श्री शुक्लचन्द्र जी महाराज इन दो महान् विभूतियों के नाम स्मरण से ही सब कार्य सिद्ध होते हैं, आत्माराम जो आत्मा में राम बसे हैं और राम में आत्मा बसी हुई है इतना गहरा संयोजन था उनका । आचार्यश्रीजी हमेशा आत्मा में लीन रहते थे । बाल्यकाल में ही माता पिता का साया उठ गया । दादीजी भी देवलोक गमन कर गई और पुण्य कर्म की प्रबलता से गुरू चरणो में खींचे चले आ गये । अपना जीवन गुरू-चरणों समर्पित कर दिया । आचार्यश्री मोतीराम जी महाराज से शिक्षा प्राप्त की एवं महान् संत शालीग्राम जी महाराज से दीक्षा प्राप्त की । आचार्यश्रीजी प्रतिपल प्रतिक्षण स्वाध्याय में लीन रहते थे । वे हमेशा स्वयं में शान्त रहते थे । जीवन में सुखी होने का सही उपाय है स्वयं में शान्त होना । उनकी योग साधना से मन स्तब्ध होता था, उन्होंने संघ को सींचा, पल्लवित पुष्पित किया । संघ संगठन में अपनी आयु बिताई । आचार्यश्रीजी संस्कृत, प्राकृत के प्रकाण्ड विद्वान थे । उनकी शिक्षाएं आज भी उनके द्वारा टीकाकृत आगम एवं लिखित पुस्तको में उपलब्ध है । सर्वप्रथम आचार्य श्री अमोलक ऋषि जी महाराज ने आगमों का प्राकृत से हिन्दी में अनुवाद किया उसके अनन्तर आचार्य श्री घासीलाल जी महाराज एवं आचार्य श्री आत्माराम जी महाराज ने टीकाएं लिखी । युवाचार्य श्री मधुकर मुनि जी महाराज ने भी उन बत्तीस आगमों को जन-जन के समक्ष प्रस्तुत किया । अनेक राजनेता आचार्यश्रीजी के चरणों में स्वयं आते थे, उनसे मार्ग-दर्शन प्राप्त करते थे । भारत के प्रधानमंत्री पं0 जवाहरलाल नेहरू, सरदार प्रतापसिंह कैरो, भीमसिंह जी सच्चर आदि उनके जीवन से बहुत प्रभावित थे । आचार्यश्रीजी ने कहा जिसका कोई नहीं उसे तुम बनो । अगर धर्म शास्त्र नहीं सुना है तो सुनो और सुना है तो उसका चिन्तन मनन करो । पूर्वकृत कर्मों की निर्जरा करते हुए नये कर्मों का बंध मत करो । पूर्वकृत कर्मों का नाश दया, करूणा, मैत्री के द्वारा होगा और करूणा मैत्री ध्यान से प्रस्फुटित होगी । आचार्यश्रीजी का शिक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण चिन्तन था । उन्होंने देवकी देवी और डाॅ0 मुलखराज जैसे विद्वानों को शिक्षा के क्षेत्र में आगे बढ़ाया । आज भी देवकी देवी के नाम से अनेक संस्थाएं लुधियाना में कार्यरत है । उन्होंने सेवा का अनुपम संदेश दिया । दीक्षा लेने के अनन्तर वे हमेशा शास्त्र स्वाध्याय एवं सेवा में लीन रहते थे । अपने जीवन को व्यतीत करते हुए अनेक उपसर्ग उनके समक्ष आए, उनकी आंखें चली गई, केंसर जैसा भयानक रोग हो गया, हड्डी टूट गयी ऐसे अनेक कष्ट आए फिर भी उन्होंने समताभाव से सहन किया । जीवन में अगर कष्ट आ जाये तो समता शान्ति से सहन कर लेना कर्मों की निर्जर होगी । उन्होंने कहा- धर्म-शासन तो शास्वत है । समय बदलता रहता है । उनकी दी हुई शिक्षाओं को ही हम आगे लेकर चल रहे हैं । आचार्य श्री आत्माराम जी महाराज, आचार्य श्री आनंद ऋषि जी महाराज, आचार्य श्री देवेन्द्र मुनि जी महाराज ने जिस प्रकार संघ को आगे बढ़ाया उसी प्रकार हम संघ को आगे बढ़ा रहे हैं । संगठन के साथ निष्ठा, अनुशासन आवश्यक है । धर्म के नाम पर राजनीति नहीं करनी चाहिए । धर्मनीति में आगे बढ़ते हुए आचार्यश्रीजी की शिक्षाओं को भीतर उतारे । 

प्रवर्तक श्री शुक्लचंद जी महाराज ने अपने साहित्य द्वारा ‘शुक्ल रामायण’ द्वारा जन-जन में अपनी भवनाओं को प्रसारित किया । उन्हें शिव शंकर कहा जाता था । हम उनके चरण चिन्हों पर चलने के लिए कृत-संकल्प हैं । आज के दिन हम संकल्प लें उनके द्वारा प्रदत्त शास्त्र अथवा साहित्य का स्वाध्याय प्रतिदिन करें एवं आगम के द्वारा प्राप्त ध्यान साधना को जीवन में उतारें । मैं भी आज जनजन के लिए यही मंगल कामना करूंगा कि उनके द्वारा प्रदत्त, आगम, साहित्य एवं ध्यान साधना को जीवन में उतारकर सभी के मंगल एवं कल्याण की कामना करें । 

आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज के सान्निध्य में ‘आत्म शुक्ल’ जन्म जयंती के उपलक्ष्य में भव्य रक्तदान शिविर आयोजन ‘महावीर जैन युवक मण्डल’ के सौजन्य से सम्पन्न हुआ जिसमें सैकड़ों व्यक्तियों ने इसमें भाग लिया । आत्म: ध्यान साधना कोर्स ‘बेसिक’ 26 से 30 सितम्बर, 2004 तक शाम   4.00 से 6.00 बजे तक होगा । जो व्यक्ति तनाव मुक्ति की साधना करना चाहते हैं स्वयं में रमण करना चाहते हैं वे उसमें भाग लेकर जीवन जीने की कला को अपनायें । 

 

क्रोध दुःख का कारण है: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़: 27 सितम्बर, 2004: जैन धर्म दिवाकर, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर, आचार्य सम्राट् पूज्य श्री षिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि-  अरिहंत को नमन इसलिए किया जाता है कि उनको नमन करने से हमारा अहंकार दूर होता है । राग द्वेष विसर्जित होता है । चित्त निर्मल होता है । अगर निष्ठापूर्ण नमन आपके भीतर आ जाये तो सारे विकार दूर हो जाते हैं । अगर सूर्य है तो अंधकार नहीं हो सकता क्योंकि प्रकाश आते ही अंधकार दूर हो जाता है, उसी तरह अरिहंत को नमन करने से अहंकार राग द्वेष स्वतः ही दूर हो जाता है । जिस प्रकार सिंह गर्जना करता है तो सारे जंगली जानवर भाग जाते हैं, उसी तरह जब अरिहंत की वाणी हमारे भीतर आती है तो हमारा राग-द्वेष, सारे हमारे दुर्गुण काफूर हो जाते हैं । 

अरिहंत का अर्थ है शत्रुता का अभाव क्योंकि अरिहंत का ना तो कोई आन्तरिक शत्रु है और ना ही कोई बाह्य शत्रु । उनका सब जीवों पर मैत्रीभाव है । अन्तर के शत्रु क्रोध, मान, माया, लोभ, राग, द्वेष आदि को उन्होंने जीत लिया है । अरिहंत एक नाम नहीं है, अरिहंत एक शु़द्धात्मा है, चेतना है । जब उस शुद्ध चेतना का हम स्मरण करते हैं तो हमारे भीतर भी वो शुद्धता और निर्मलता आ जाती है । अरिहंत हमें शुद्ध ज्ञान देते हैं जो आपको भव बंधन में नहीं डालता, जो आपको आधि व्याधि नहीं देता, वो आपको इन सबसे दूर ले जाता है । जिस प्रकार बीज के भीतर से वृक्ष आता है उसी प्रकार ज्ञान भीतर से आता है । उस बीज को वृक्ष बनने के लिए भूमि की आवश्यकता है । शुद्ध वातावरण की आवश्यकता है । उसी तरह हमें भी वातावरण की आवश्यकता है वो वातावरण है सत्संग, सत्गुरू का सान्निध्य । जो प्रवचन आपको जगाता नहीं है, जो आपको शुद्ध नहीं करता, जो आपको आनंद नहीं देता वो प्रवचन नहीं हो सकता । 

ज्ञानी होने के दस लक्षण हैं, पहला लक्षण है अक्रोध । जब क्रोध आता है तो अरिहंत हमसे दूर हो जाते हैं । हमारी आंखें आग बरसाने लगती है, होठ फडफड़ाने लगते हैं । चेहरा भयानक हो जाता है, तो अरिहंत वहां कहाॅं से आएंगें । अगर क्रोध को दूर करना है तो प्रतिक्षण अरिहंत का स्मरण अपने भीतर रखो । जब अरिहंत का स्मरण हमारे भीतर रहेगा । अगर क्रोध आ भी गया तो धीरे-2 शान्त हो जाएगा । 

अरिहंत की नौकरी भीतर करूणा को प्रस्फुटित करती है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़: 28 सितम्बर, 2004: जैन धर्म दिवाकर, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर, आचार्य सम्राट् पूज्य श्री षिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- मेरे मालिक तेरी नौकरी सबसे ऊॅंची सबसे बड़ी एक नौकरी तुम करते हो सारे जहान की । हम सभी नौकरी करते  हैं । नौकरी का अर्थ है धन, पद, यश, रोजी,रोटी के लिए, रोटी, कपड़ा मकान के लिए कार्य   करना । नौकरी दो प्रकार से की जाती है एक अरिहंत की और दूसरी संसार की । अरिहंत की नौकरी तुम्हारे भीतर करूणा, मैत्री, प्यार को प्रस्फुटित करती है । संसार की नौकरी धन, पद, यश देती है । अरिहंत की नौकरी से बड़ी कोई नौकरी नहीं । बड़े-2 चक्रवती इन्द्र भी अरिहंत के चरणों में झुकते हैं । पंचकल्याणक के समय इन्द्र चरणों में उपस्थित होते हैं । प्रभु के जन्म, दीक्षा, केवल्यप्राप्ति, निर्वाण आदि अवसरों पर इन्द्र चरणों में उपस्थित होकर प्रार्थना करते हैं अरिहंत को जब अनेकों कष्ट आते हैं उस समय भी इन्द्र चरणों में उपस्थित होते हैं परन्तु कर्मक्षय के समय में अरिहंत किसी का सहारा नहीं लेते । कर्मनिर्जरा के समय तुम किसी का सहारा मत लेना । व्यवहार में सहारा लेना पड़ता है परन्तु भीतर से निरालम्ब होकर कर्म निर्जरा के मार्ग पर अग्रसर होना । हम मैल को साफ करते है परन्तु कहते हैं कि कपड़े को साफ करना है, कपड़ा तो साफ ही है आवश्यकता है मैल को साफ करने की । सूरज प्रकाशमान है परन्तु जब ऊपर बादल आते हैं तो अंधकार छा जाता है तो क्या वह अपना प्रकाश देना बंद कर देता है । इसी प्रकार आत्मा तो शुद्ध है परन्तु हम उसे शुद्ध करने का यत्न करते हैं । हमें आत्मा को शुद्ध नहीं करना है, उस पर जो कर्म-मैल लगी है उसे शुद्ध करना है । अरिहंत की नौकरी करने से कर्म-मैल धुल जाएगी और शुद्धात्मा स्वरूप में आ जाएगी । अरिहंत को याद करो । उनका चिन्तन, उनका ध्यान करो, उनके गुणगान करो, उनके चरणों में झुक जाओ । जितना झुकोगे उतना अहंकार मिटता चला जाएगा । मन, बुद्धि समर्पित हो जाएगी । अरिहंत जो कहे वह करना । उस समय अपने मन या बुद्धि को भीतर मत लाना । वो अनन्त ज्ञान के सागर हैं । ज्ञान से बढ़कर कुछ नहीं । प्रभु महावीर ने भी पहले ज्ञान को और फिर दया को महत्व दिया । आत्म-ज्ञानी आत्मदृष्टा को उपदेश की आवश्यकता नहीं । ज्ञान भीतर आ जाए तो नियम स्वतः ही पालन हो जाएंगे । यह जीवन मिला है । हम प्रतिदिन कहते हैं प्रत्येक श्वांस को प्रभु भक्ति में लगा दो । 24 घण्टे में आप 21600 बार श्वांस लेते हो परन्तु क्या इतनी बार नाम स्मरण करते   हो । सिद्धों का स्मरण करोगे तो सिद्धों जैसा बन जाओगे ।  प्रतिपल सिद्धों का स्मरण करना, क्रोध आ जाये तो क्षमा से उसे जीतना । जब क्रोध आ जाए तब पागलपन आता है उसे छोड़ देना । क्रोध आने पर विलम्ब करना । क्रोध आने पर अपने क्षेत्र को छोड़ देना । चिन्तन करना श्वासोंश्वास को देखना, तो क्रोध शान्त हो जाएगा और ज्ञान की धारा भीतर प्रगट हो जाएगी । अच्छा कार्य तुरन्त करना और बुरा कार्य विलम्ब से करना । हम हमेशा विपरीत करते हैं शुभ कार्य में देर लगाते हैंे और अशुभ कार्य तुरन्त कर लेते हैं ।

आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज की जन्म जयंती के उपलक्ष्य में 26 सितम्बर से 3 अक्टूबर, 2004 तक विविध कार्यक्रमों का आयोजन जैन स्थानक सेक्टर 18 डी में किया जा रहा है जिसमें आज से कष्टी तेलों का आयोजन हुआ । अनेक भाई बहिनों ने कष्टी तेलों का संकल्प लेकर स्वयं को तपस्या के मार्ग पर अग्रसर किया । 28 सितम्बर को व्यसन मुक्ति कार्यक्रम, 30 सितम्बर को फ्री मेडीकल कैम्प, 2 अक्टूबर को श्रमण संघीय श्रावक संघों की विद्वद्संगोष्ठी का आयोजन विजन-2025 के बारे में होगा । 3 अक्टूबर को आचार्यश्रीजी की जन्म जयंती मैत्री दिवस के रूप में मनाई जाएगी और इसी दिन शाम को टैगोर थियेटर सेक्टर 18 डी में ‘एक शाम महावीर के नाम’ कार्यक्रम होगा । आत्म: ध्यान साधना कोर्स में दिनांक 28 से 30 सितम्बर, 2004 तक आत्म: समाधि कोर्स का आयोजन शुरू हुआ जिसमें अनेक भाई बहिन भाग ले रहे हैं । 1 से 3 अक्टूबर, 2004 को आत्म: ध्यान साधना कोर्स एडवांस-ा का आयोजन होगा । 

 

ईष्र्या को छोड़ दो तो मोक्ष नजदीक होगा: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़: 29 सितम्बर, 2004: जैन धर्म दिवाकर, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर, आचार्य सम्राट् पूज्य श्री षिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- एक चरवाहा नदी के किनारे बंसरी बजाता है और अपना जीवन व्यतीत करता है । यह कहानी उसकी ही नहीं यह मेरी और आपकी भी है । अन्तिम क्षण तक मानव बहुत कुछ कार्य कर लेता है परन्तु जाते-2 भी उसके हाथ कुछ नहीं लगता । जिन्दगी बहुत छोटी है । जिन्दगी क्या है ? एक जाम उठाकर गिरा दिया । श्वांस आई और चली गई । कोई माता के गर्भ में ही मरता है तो कोई जन्म के बाद माता पिता को अनेक कष्ट देकर चला जाता है । राजा महाराज युद्ध लड़ते हैं अनेकों हानियां होती है, बहुत सारा धन इकठ्टा करते हैं परन्तु अंत में खाली हाथ चले जाते हैं । 

हम हमेशा स्वप्न को सच मानते हैं परन्तु सपना कभी सत्य नहीं होता । सपना हमेशा टूटता है । हम सपना बनाते हैं मेरा बेटा बड़ा होगा, मुझे सुख देगा परन्तु ऐसा देखने में बहुत कम आता है । होनी के आगे कोई रक्षक नहीं बन सकता । तीर्थंकर भी क्षण मात्र के लिए आयुष्य कर्म को नहीं रोक पाते । यह जीवन दीपक की भांति है जैसे दीपक में ज्योति प्रकाशमान है हमें लगता है कि दीपक जल रहा है परन्तु साथ में ज्योति कम होती चली जाती है । तेल भी कम होता है और अन्तिम समय में भभककर दीपक बुझ जाता है, इसी प्रकार हमारा जीवन है । प्रत्येक श्वांस ज्योति की भांति है । श्वांस अनमोल है । 

संसार एक पुल है इस पर घर मत बनाना । घर बनाओगे तो टूट जाएगा, बिखर जाएगा बस इसे पार करते चले जाना । इसमें सोना चांदी काम नहीं आएगा, सोना चांदी भी मिट्टी है और यह शरीर भी मिट्टी का है । यह शरीर मिट्टी का होकर भी अनमोल है । असली रत्न है क्योंकि इसी में ही हम धर्माराधना कर सकते हैं, इसे उपयोग कर लो, प्रायश्चित कर लो, पश्चाताप मत  करो । तुलसीदासजी ने भी कहा है- 

घर का तजना सहज है, सहज प्रिया का नेह । 

मान बढ़ाई ईष्र्या तुलसी दुर्लभ एह । 

यह घर छोड़कर जाना बहुत सुलभ है । पत्नी को तजना भी सुलभ है परन्तु व्यक्ति मान बढ़ाई, ईष्र्या को नहीं छोड़ सकता है । वह हमेशा मान में जीता है । स्वयं की बढ़ाई करता है और दूसरों के प्रति ईष्र्या के भाव रखता है । ईष्र्या को छोड़ दो तो मोक्ष नजदीक होगा । श्वांस एक धुएं की लकीर की भांति है । श्वांस चला गया तो जीवन समाप्त हो जाएगा ।  

आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज की जन्म जयंती के उपलक्ष्य में 26 सितम्बर से 3 अक्टूबर, 2004 तक विविध कार्यक्रमों का आयोजन जैन स्थानक सेक्टर 18 डी में किया जा रहा है जिसमें आज से कष्टी तेलों का आयोजन हुआ । अनेक भाई बहिनों ने कष्टी तेलों का संकल्प लेकर स्वयं को तपस्या के मार्ग पर अग्रसर किया । 28 सितम्बर को व्यसन मुक्ति कार्यक्रम, 30 सितम्बर को फ्री मेडीकल कैम्प, 2 अक्टूबर को श्रमण संघीय श्रावक संघों की विद्वद्संगोष्ठी का आयोजन विजन-2025 के बारे में होगा । 3 अक्टूबर को आचार्यश्रीजी की जन्म जयंती मैत्री दिवस के रूप में मनाई जाएगी और इसी दिन शाम को टैगोर थियेटर सेक्टर 18 डी में ‘एक शाम महावीर के नाम’ कार्यक्रम होगा । आत्म: ध्यान साधना कोर्स में दिनांक 28 से 30 सितम्बर, 2004 तक आत्म: समाधि कोर्स का आयोजन शुरू हुआ जिसमें अनेक भाई बहिन भाग ले रहे हैं । 1 से 3 अक्टूबर, 2004 को आत्म: ध्यान साधना कोर्स एडवांस-ा का आयोजन होगा । 

 

क्रोध जहर है व क्षमा अमृत है: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़: 30 सितम्बर, 2004: जैन धर्म दिवाकर, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर, आचार्य सम्राट् पूज्य श्री षिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- जीवन हमें मिला है अपने निज कर्मो से परन्तु हमें जीना नहीं आया । हमारा जन्म सब योनियों में हुआ । निगोद से लेकर देवगति तक की सभी योनियों में हम जा चुके हैं । प्रभु महावीर ने मानव को स्वतंत्रता दी है । वह मानव को जो चाहे वह बना सकता है । खेती तुम्हारे पास है उसमें क्या बोओगे यह तुम पर निर्भर करता है । तुम उसमें आम बोओगे या ईमली बोओगे, केसर की खेती करोगे या धतूरे की खेती करोगे यह तुम पर निर्भर करता है । इसी प्रकार यह जीवन बीता जा रहा है इसमें हमको तन, मन, धन से अमृत के कण बरसाने हैं । क्रोध जहर है व क्षमा अमृत है, जिस समय क्रोध आये उस समय क्षमा के कण बरसाना । जीवन सुगन्धित हो जाएगा । 

आप घर से सत्संग सुनने के लिए आते हो उस समय आपके भीतर क्या विचारधारा है, क्या भावदशा उठती है यह महत्वपूर्ण है । एक कदम उठता है तब चित्त की चेतना से क्या भाव निकलते हैं यह महत्वपूर्ण है । सत्संग करते हुए मौन में गहन समाधि में जाना उत्तम है । अपना ही संग करो । जब भीतर मन न लगे तब गीत गाओ भक्ति करो और उसमें डूब जाओ । जब गृहणियां श्रेष्ठ भोजन बनाना चाहती हैं तो वो उसमें डूब जाती हैं, उनके विचार शून्य हो जाते हैं । पूरी निष्ठा और लगन के साथ वे भोजन बनाती हैं, उसी प्रकार जब भीतर भक्ति के भाव आये, वीतरागता के भाव आये अपने भीतर डूब  जाना । 

सत्संग में शरीर, वाणी और मन से मौन हो जाना । भीतर श्रेष्ठता, दिव्यता, मैत्री के भाव लाना । जीवन सभी को मिला है, जीवन राम को भी मिला और रावण को भी मिला, कृष्ण को भी मिला और कंस को भी मिला । कृष्ण और राम ने इस जीवन को सत्संग में लगाकर अपना जीवन सार्थक कर लिया । सत्संग में निर्मोहता के भाव लाना । सत्संग को ध्यान, गहराई से सुनोगे तो प्रत्येक वचन सार्थक हो जाएगा । 

आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज की जन्म जयंती के उपलक्ष्य में 26 सितम्बर से 3 अक्टूबर, 2004 तक विविध कार्यक्रमों का आयोजन जैन स्थानक सेक्टर 18 डी में किया जा रहा है जिसमें आज से कष्टी तेलों का आयोजन हुआ । अनेक भाई बहिनों ने कष्टी तेलों का संकल्प लेकर स्वयं को तपस्या के मार्ग पर अग्रसर किया । 28 सितम्बर को व्यसन मुक्ति कार्यक्रम, 30 सितम्बर को फ्री मेडीकल कैम्प, 2 अक्टूबर को श्रमण संघीय श्रावक संघों की विद्वद्संगोष्ठी का आयोजन विजन-2025 के बारे में होगा । 3 अक्टूबर को आचार्यश्रीजी की जन्म जयंती मैत्री दिवस के रूप में मनाई जाएगी और इसी दिन शाम को टैगोर थियेटर सेक्टर 18 डी में ‘एक शाम महावीर के नाम’ कार्यक्रम होगा । आत्म: ध्यान साधना कोर्स में दिनांक 28 से 30 सितम्बर, 2004 तक आत्म: समाधि कोर्स का आयोजन शुरू हुआ जिसमें अनेक भाई बहिन भाग ले रहे हैं । 1 से 3 अक्टूबर, 2004 को आत्म: ध्यान साधना कोर्स एडवांस-ा का आयोजन होगा ।

चण्डीगढ़: 1 अक्टूबर, 2004: जैन धर्म दिवाकर, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर, आचार्य सम्राट् पूज्य श्री षिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- प्रभु का नाम स्मरण जीवन में शान्ति, समृद्धि का संदेश देता है । नाम स्मरण कहते ही हमारे भीतर कुछ प्रश्न उपस्थित होते हैं । किसका स्मरण, कैसा स्मरण । प्रभु ने सभी प्रश्नों का समाधान देते हुए एक अहिंसा और अनेकान्त का दृष्टिकोंण दिया । अहिंसा और अनेकान्त में सारी समस्याओं का समाधान आता है । जिसने अनेकान्त को समझ लिया फिर वह राम, कृष्ण, बुद्ध, ईसामसीह जिस किसी का भी स्मरण करें सभी का एक ही स्वरूप है, सभी में एक ही आत्मा है । अनेकान्त को जीवन में उतारो । 

एक लड़की एक घर में रहती है तो वह एक साथ ही कई रिश्तों से बंध जाती है । वह घर में माॅं, बहू, बहिन, बेटी, पत्नी, चाची, भतीजी हर संबंध से जुड़ी हुई है । एक क्षण में वह कई रूप धारण करती  है । अगर बालक सामने आ जायें तो वह माॅं बन जाती है । पतिदेव आ जायें तो पत्नी, सासु आ जाये तो बहू, पिता आ जाये तो बेटी ऐसे अनेक रोल अदा करते हुए वह अपना जीवन व्यतीत करती है । तुम भी इस संसार में अपना रोल अदा करते हुए समता में जीओ । माॅं को धरती की उपमा दी गई है । धरती जिस प्रकार सारी वस्तुओं को अपने आप में समेट लेती है उसी प्रकार मां विशाल हृदय से सभी को अपने हृदय में धारण करती है । पिता को आकाश की उपमा दी गई  है । आकाश जिस प्रकार सभी को स्थान देता है । वह ब्रह्माण्ड में फैला हुआ है उसी प्रकार पिता भी सभी का आदर सम्मान करते हुए जीवन व्यतीत करता है । 

जब प्रभु के नाम का स्मरण करो उस समय उनके गुणों को भीतर उतारो । प्रभु स्मरण के लिए हमारे ऋषि मुनियों ने प्रातःकाल और संध्या का समय दिया है, जिसे हम अमृत बेला और गौधूलि बेला कहते हैं । गांव में जब गायें शाम को लौटती हैं उस समय उनके पैरों से धूलि उड़ती है उस बेला को गौधूलि बेला कहा गया है । यह समय प्रभु स्मरण के लिए उत्तम है । जिसके प्रति श्रद्धा है उनका स्मरण करो । चाहे बुद्ध,राम, महावीर का करो । सभी में एक ही दृष्टि, एक ही आत्मा है । हम अपने कर्तव्य का पालन करते हुए अपने जीवन को आगे बढ़ायें तो यह जीवन नन्दनवन बन जाएगा । 

आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज की जन्म जयंती के उपलक्ष्य में 26 सितम्बर से 3 अक्टूबर, 2004 तक विविध कार्यक्रमों का आयोजन जैन स्थानक सेक्टर 18 डी में किया जा रहा है जिसमें बड़ी संख्या में कष्टी तेलों का आयोजन हुआ । 2 अक्टूबर को श्रमण संघीय श्रावक संघों की विद्वद्संगोष्ठी का आयोजन विजन-2025 के बारे में होगा । 3 अक्टूबर को आचार्यश्रीजी की जन्म जयंती मैत्री दिवस के रूप में मनाई जाएगी और इसी दिन शाम को टैगोर थियेटर सेक्टर 18 डी में ‘एक शाम महावीर के नाम’ कार्यक्रम होगा 1 से 3 अक्टूबर, 2004 को आत्म: ध्यान साधना कोर्स एडवांस-ा चल रहा है जिसमें भाई बहिन स्वयं की खोज में अपने जीवन को लगा रहे हैं ।

चण्डीगढ़: 2 अक्टूबर, 2004: जैन धर्म दिवाकर, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर, आचार्य सम्राट् पूज्य श्री षिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- आज का यह पावन दिवस गांधी जयंती का दिन राष्ट्रपिता के नाम से सदा-सदा के लिए अमर हो गया । गांधीजी एक लोहपुरूष, महापुरूष, दिव्य पुरूष थे । उन्होंने अपनी दिव्यज्योति से मानवजाति को अलंकृत किया । मानव जाति में ऐसे व्यक्ति की खोज करना कठिन है । यह धर्म और सत्य का बल है जो उन्होंने लंगोटी और लाठी के सहारे अपना जीवन व्यतीत किया । गांधीजी का जीवन दर्शन इस बात के लिए गवाह है कि सत्य की जीत होती है । गांधीजी के चित्र आज भी करंसी नोटों और स्टैम्प पर दिखाई देते है । आज इस देश को गांधी, शास्त्री, पटेल जैसे नेताओं की जरूरत है । आज हमें ऐसे नेता को चुनना चाहिए जो धार्मिक हो, साधनामय और सादगीमय जीवन जीता हो । अहिंसा और सत्य का पुजारी हो । शाकाहारी हो । जन-जन में धर्म के प्रति भावनाओं को उजागर करें ऐसा नेता हमारे देश का उज्ज्वल भविष्य बन सकता है । गांधीजी ने प्रभु महावरी और श्रीमद् रायचन्द्र के जीवन से बहुत कुछ ग्रहण किया । उनकी शिक्षाएं आज हमारे लिए बोध बनें । गांधीजी एक महात्मा होते हुए भी एक नेता थे । नेता और महात्मा का अनुठा संगम उनके जीवन में दिखाई देता है । उनके जीवन में पवित्रता थी । आज विश्व का कोई भी व्यक्ति चाहे वह किसी भी पद पर हो जब दिल्ली आता है तो सर्वप्रथम गांधीजी की समाधि पर अपने श्रद्धा सुमन अर्पित करता है । गाॅंधीजी आत्म-शक्ति के प्रतीक थे । गाधीजी प्रारंभ में दिखने में सुन्दर नहीं थे परन्तु अन्तिम अवस्था में उनका शरीर सुन्दर हो गया था । जिस प्रकार आम पकने पर मिठास उसके भीतर आप्लावित हो जाती है उसके कण-कण से सुगन्ध निकलती है उसी प्रकार गांधीजी भी अपनी अन्तिम अवस्था में सुन्दर थे । छोटे बच्चों के साथ गांधीजी बालक बन जाते थे । संकल्प के धनी थे गांधीजी । उन्होंने संकल्पवान बनने की प्रेरणा दी । संकल्पवान बन जाओगे तो आत्म-ज्ञानी और आत्म-दृष्टा बन जाओगे । अल्बर्ट आइनस्टाईन ने गांधीजी को अहिंसा और सत्य के पुजारी से सम्बोधित किया । वे दोनों समकालीन थे । आइनसटाईन वैज्ञानिक थे तो गांधीजी महात्मा थे । आइनस्टाईन की अन्तिम भावना धार्मिक बनने की थी । आज हम भी गांधी जयंती पर शिक्षा लें । हम भाग्यशाली है जो हमें ऐसा जैन धर्म मिला, ऐसी साधना मिली । गांधी जी ने राजनीति में धर्म चलाया परन्तु आज धर्म में राजनीति आ गई है । हम राजनीति में धर्म को लायें । स्वयं के लिए गांधीजी एशोआराम में रह सकते थे परन्तु भारत-माता को आजादी दिलाने के लिए, भारत की गरीबी दूर करने के लिए उन्होंने एक संकल्प लिया जो अन्तिम अवस्था में साकार हुआ । उस संकल्प के आधार पर ही उन्होंने अपने बेरिस्टर का पद छोड़कर देश धर्म में स्वयं को लगा दिया । आज देश भर में लालबहादुर शास्त्री का जन्म दिन मनाया जा रहा है । शास्त्रीजी के जीवन में अहिंसा और सत्य भरा हुआ था । वे सादगी और सत्य के पुजारी थे । उन्होंने प्रधानमंत्री पद पर रहते हुए भी स्वयं के लिए कोई लोभ लालच नहीं किया । हमेशा धर्म में दृढ़ रहे । जन जन को जय जवान जय किसान का नारा दिया । सादा व्यक्तित्व उनके जीवन का परिचायक है । ऐसे महान सपूतों का आज जन्म दिन मनाया जा रहा है । गांधीजी को अन्तिम समय में छाती में तीन गोलिया लगी और मुख से हे राम ! शब्द निकले । यह तभी हो सकता है जब धर्म भीतर हो । धर्म की जीत होती है । हम एक संकल्प लें, हे प्रभु ! जीवन जैसा भी व्यतीत हो अन्तिम समय में मुख में अरिहंत और सिद्ध का स्मरण रहे । सत्य की जीत होती है। आप शुद्ध निर्मल बनो । 

आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज की जन्म जयंती के उपलक्ष्य में 26 सितम्बर से 3 अक्टूबर, 2004 तक विविध कार्यक्रमों का आयोजन जैन स्थानक सेक्टर 18 डी में किया जा रहा है जिसमें बड़ी संख्या में कष्टी तेलों का आयोजन हुआ । 2 अक्टूबर को श्रमण संघीय श्रावक संघों की विद्वद्संगोष्ठी का आयोजन विजन-2025 के बारे में होगा । 3 अक्टूबर को आचार्यश्रीजी की जन्म जयंती मैत्री दिवस के रूप में मनाई जाएगी और इसी दिन शाम को टैगोर थियेटर सेक्टर 18 डी में ‘एक शाम महावीर के नाम’ कार्यक्रम होगा 1 से 3 अक्टूबर, 2004 को आत्म: ध्यान साधना कोर्स एडवांस-ा चल रहा है जिसमें भाई बहिन स्वयं की खोज में अपने जीवन को लगा रहे हैं । 

 

शिवाचार्य जन्मदिवस पर एकता का शंखनाद बजा

चण्डीगढ़: 3 अक्टूबर, 2004: जैन धर्म दिवाकर, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर, आचार्य सम्राट् पूज्य श्री षिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- आज का यह पावन दिवस भारत के प्रसिद्ध नगरों से आये श्रावकजन आपका स्नेह, सहृदयता मेरे हृदय में है । विश्व में जैन धर्म के प्रचार प्रसार के लिए वीजन 2025 की चर्चा हमने की । जिस समाज में संगठन हो वह आगे बढ़ता है । आज सिक्ख समाज क्रिश्चयन समाज में एकता का सितारा चमक रहा है । हमारी ज्ैान समाज हर क्षेत्र में अग्रसर है । हम एकता के सूत्र में बंधकर प्रभु वीर के उपदेशों को जीवन में अपनायें । प्रभु महावीर की वाणी का सारसूत्र ‘परस्परोपग्रहो जीवानाम्’ सभी के सहयोग से ही सारा जीवन चल रहा है । अनेकान्त दृष्टि से हर बात को सोचो हम आज यह संकल्प ले । सभी के लिए मंगल के कार्य करें । आज मैं यहां आह्वान करता हूॅं कि सम्प्रदाय की संकीर्ण सीमा से उठकर मानव जाति के लिए मंगल का कार्य करें । आज आवश्यकता है समाज में क्रान्ति की, तन, मन, धन से मिशन के साथ जुड़कर कार्य करें । आपका एक कदम दूसरों की सुख शान्ति समृद्धि के लिए उठे । आज प्रत्येक व्यक्ति सेवा का संकल्प लें । प्रभु महावीर की मैत्री अहिंसा से जुड़े । हम अपनी जिम्मेदारी का अहसास करते हुए विश्व में बढ़ते मांसाहार और प्रदूषण पर रोक लगाते हुए ध्यान साधना के मार्ग पर अग्रसर हो । मनुष्य जाति एक है । 

आज हर तरह संगठन का शंखनाद बज रहा है और मैं ऐसे समय में उन महान् विभूतियों को याद करता हूॅं जिन्होंने श्रमण संघ की एकता में अपना समर्पण किया । पूज्य श्री सौभाग्यमल जी महाराज, मरूधर केसरी श्री मिश्रीमल जी महाराज, जैन दिवाकर श्री चैथमल जी महाराज, पूज्य पृथ्वीराज जी महाराज, पूज्य श्री गणेशीलाल जी महाराज, पूज्य श्री हस्तीमल जी महाराज, पूज्य श्री बृजलाल जी महाराज, पूज्य श्री अमोलक ऋषि जी महाराज, पूज्य श्री शुक्लचंद जी महाराज, पूज्य श्री मदनलाल जी महाराज जिन्होंने सम्प्रदायवाद की बात न करते हुए जैन धर्म को एकता में जोड़ा । श्रमण संघ के लिए उनके उपकार भुलाये नहीं जा   सकते । आचार्य सम्राट् श्री आत्माराम जी महाराज, आचार्य सम्राट् श्री आनंद ऋषि जी महाराज, आचार्य सम्राट् श्री देवेन्द्र मुनि जी महाराज के पद्चिन्हों पर चलते हुए इस श्रमण संघ को उज्ज्वलता प्रदान करने के लिए मैं आज कुछ घोषणा करने जा रहा हूॅं । श्रमण संघ के विकास में एवं सभी के मंगल के लिए यह घोषणा अतिमहत्वपूर्ण है । ंआज मैं यही घोषणा करता हूॅं कि- ’धर्म संघ के विकास एवं गौरव के लिए प्रमुख मुनिवृंद के आग्रह एवं चतुर्विध संघ की हार्दिक भावना को ध्यान में रखते हुए श्रमण संघ में संगठन एवं अनुशासन को सुदृढ़ बनाने के लिए मैं 27 अप्रेल, 2003 की स्थिति की घोषणा करता हूॅं । 27 अप्रेल, 2003 के बाद मेरे द्वारा घोषित पद यथावत उसी प्रकार रहेंगे तथा जो मुनिवृंद श्रमण संघीय अनुशासन में निष्ठा व्यक्त करते हैं उन्हें ससम्मान श्रमण संघ में आमंत्रित करता हूॅं’ । श्रमण संघ एक है और एक रहेगा । श्रमण संघ में साधना स्वाध्याय को लेकर हम चलें । अनुशासन एवं निष्ठा को भीतर उतारे यही हार्दिक मंगल कामना ।   

आचार्यश्रीजी के जन्म दिवस पर श्रमण संघीय मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म0 मुनिवृंद एवं महासतीवृंद ने अपनी भावनाएं अभिव्यक्त करते हुए आचाय्रदेव को जन्म-दिन की हार्दिक बधाईयां प्रेषित की । इस अवसर पर भारत भर से आये हुए विद्वद्जनों ने अपनी भावनाएं अभिव्यक्त की जिसमें प्रमुख रूप से दिल्ली महासंघ, उत्तर प्रदेश महासंघ, मंगलदेश महासंघ, राजस्थान, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, दक्षिण भारत एवं उत्तर भारत वासियों ने आचार्यदेव के 63 वें जन्म-दिवस पर अपनी मंगल कामनाएं अभिव्यक्त करते हुए दीर्घायु एवं शतायु होने की भावनाएं अभिव्यक्त की । इस अवसर पर आचार्यदेव को भारत भर से आये श्रावकजनों ने चातुर्मास की भावभरी विनतियां प्रेषित की जिसमें उदयपुर, इन्दौर, उत्तर प्रदेश मुख्य रूप से रहे । 

घोषणा

‘धर्म संघ के विकास एवं गौरव के लिए प्रमुख मुनिवृंद के आग्रह एवं चतुर्विध संघ की हार्दिक भावना को ध्यान में रखते हुए श्रमण संघ में संगठन एवं अनुशासन को सुदृढ़ बनाने के लिए मैं 27 अप्रेल, 2003 की स्थिति की घोषणा करता हूॅं । 27 अप्रेल, 2003 के बाद मेरे द्वारा घोषित पद यथावत उसी प्रकार रहेंगे तथा जो मुनिवृंद श्रमण संघीय अनुशासन में निष्ठा व्यक्त करते हैं उन्हें ससम्मान श्रमण संघ में आमंत्रित करता हूॅं’ । श्रमण संघ है और एक रहेगा । श्रमण संघ में साधना स्वाध्याय को लेकर हम चलें । अनुशासन एवं निष्ठा को भीतर उतारे यही हार्दिक मंगल कामना ।   

 

प्राणी मात्र के मंगल का संकल्प करें: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़: 4 अक्टूबर, 2004: जैन धर्म दिवाकर, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर, आचार्य सम्राट् पूज्य श्री षिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- प्रभु ने हमें जीवन दिया । श्वांस दी । धड़कर, रोशनी दी इसलिए हमें संकल्प करना चाहिए कि हमारा प्रत्येक कदम प्राणी मात्र के मंगल एवं जन-जन की मुस्कुराहट के लिए है । किसी की भलाई के लिए हो । आप दुकान की ओर जा रहे हो तो प्रत्येक कदम उठाते वक्त सोचे कि प्रभु मेरा कार्य परिवार, समाज और देश की भलाई के लिए हो । कुछ भी करो चाहे दुकान करो, खाना खाओ या कोई भी कार्य करो परन्तु सर्वप्रथम प्रार्थना आवश्यक है । गांधीजी प्रार्थना को बहुत महत्व देते थे । प्रार्थना करने से पूर्व वे कोई भी कार्य नहीं करते थे । वे कहते थे प्रार्थना मेरी आत्मा का भोजन है । हम भी इसी प्रकार स्वयं को भोजन देने से पूर्व आत्मा को भोजन दें । हमें सैदव दिव्यता का संकल्प करना चाहिए । दिव्यता के संकल्प से हम दिव्य बनते हैं । दिव्य गुण भीतर से प्रस्फुटित होते हैं । हम नकारात्मक संकल्प करेंगे तो राक्षसी वृत्ति का विकास होगा । इसलिए हमें आवश्यक है कि हम हमेशा सकारात्मक सोच रखें । 

प्रभु महावीर कहते हैं सदा मंगल की भावना करो । तुम सबके लिए मंगल की कामना करो । सबके मंगल में तुम्हारा भी मंगल होगा । हमारा प्रत्येक कार्य मंगल के लिए हो, भले के लिए हो । अगर हमारे कदम गलत दिशा की ओर बढ़े तो हम आदमी और ईव की भांति अपनी ही गलती के कारण भटक जाएंगे । ईसामसीह ने आदमी और स्त्री किस प्रकार बनें इसकी कहानी कहते हुए बताया कि स्त्री ने माया की और पुरूष स्त्री की बातों में आकर अपनी ही भूलों से भटक गये । हम अपनी भूलों को सुधारें । अनंत जन्मों से हम इस संसार सागर में भटक रहे हैं । आवश्यकता है केवल संकल्प की । संकल्प होगा तो हम अवश्य इन्सान बनेंगे । 

हर कार्य के लिए एक संकल्प करो । बहिनें भोजन बनायंें तो संकल्प करें कि मेरे द्वारा बनाया हुआ भोजन जो भी करें उसका मंगल हो । भाई धन कमायें तो वह भी मंगल के लिए कमायें । उस धन का कुछ हिस्सा धर्म कार्य में लगायें । अगर डाॅक्टर है तो वह अपनी नौकरी करता हुआ गरीब मरीजों का मुफ्त में इलाज करें । मरीज का भगवान परिचायक ही होता है । हम कोई भी कार्य करें मंगल के लिए, कल्याण के लिए करें । 

शिवाचार्यश्रीजी के जन्म दिवस पर एकता का शंखनाद

श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज के 63 वें जन्म-दिवस के उपलक्ष्य में श्री एस0 एस0 जैन सभा, चण्डीगढ़ के तत्वावधान में 15 दिवसीय विविध धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, आध्यात्मिक एवं जन सेवा के कार्यक्रमों के द्वारा सम्पन्न हुआ, जिसके अन्तर्गत रक्त-दान शिविर, अन्नदान {लंगर}, वस्त्रदान, मुफ्त चिकित्सा शिविर, सामायिक, कष्टी तेले, शिवाचार्य शत् प्रश्नोत्तरी, सामूहिक लोगस्स का पाठ, एक शाम महावीर के नाम, वीजन 2025, विद्वद्संगोष्ठी, अखिल भारतीय श्रावक संघों के फैडरेशन पर चिन्तन गोष्ठी, श्रमण संघ के संगठन हेतु महत्वपूर्ण कदम इत्यादि रचनात्मक कार्यक्रमों के द्वारा आचार्यश्रीजी का 63 वां जन्म दिवस मनाया गया जिसमें सभी कार्यक्रमों में चतुर्विध संघ ने पूर्ण उत्साह और भक्ति के साथ भाग लिया। देश के कोन-कोने से श्रावक संघ बड़ी संख्या में उपस्थित हुए । 

विद्वद्-गोष्ठी में वीजन 2025 के अन्तर्गत जैन दर्शन और जैन विद्या के प्रचार प्रसार हेतु प्रेस्टीज युनिवर्सिटी की स्थापना एवं हाॅलेस्टिक मैनेजमेन्ट के अन्तर्गत किस प्रकार प्रारंभ की जा सकती है, इस पर सैद्धान्तिक एवं व्यवहारिक परिचर्चा का आयोजन हुआ । प्राथमिक परिचय और भूमिका जैनरत्न लाला नेमनाथ जी जैन ने रखा जिसमें पूर्ण परिचय एवं वीजन के बारे में बताया । उसके पश्चात् प्रसिद्ध जैन विद्वान् श्री एन0पी0 जैन, इंदौर वीजन 2025 की आवश्यकता क्यों है इस पर सविस्तार जानकारी दी और अपने अनुभव ज्ञान को सभी में    बांटा । डाॅ0 सागरमल जी जैन ने वीजन 2025 के दृष्टिकोण का समर्थन करते हुए व्यवहारिक समस्याओं और उसके समाधान पर अपने विचार प्रस्तुत किए । प्रो0 उदय जैन- इन्दौर, प्रो0 प्रद्युम्न शाह- पटियाला विश्वविद्यालय- पटियाला, डाॅ0 कमलेश जैन- दिल्ली, डाॅ0 कैलाश जैन- भटिण्डा, श्री मोहनलाल जी जैन- केसरीसिंहपुर आदि विद्वद्जनों ने इस गोष्ठी में भाग लिया और निष्कर्ष रूप में सभी के विचार, सलाह लेते हुए इसे तुरन्त शुरू करने का सभी ने अभिमत प्रदान किया । भारत भर से आए श्रावक संघों के प्रतिनिधियों ने इस योजना की मुक्तकंठ से प्रशंसा करते हुए अपना सक्रिय सहयोग प्रदान करने की संकल्पबद्धता प्रकट   की । 

द्वितीय सत्र के अन्तर्गत श्रावक संघों के फैडरेशन पर गहन चिन्तन मनन हुआ । उनके लिए संविधान बनाने के बारे में सभी श्रावक संघों से सुझाव लिये गये और संविधान का एक सामान्य प्रारूप प्रस्तुत किया गया । ग्यारह व्यक्तियों की एक राष्ट्रीय कमेटी जो इन्दौर में बनाई गई उसमें अपनी रिपोर्ट पेश और आगे के प्रारूप हेतु सभी के सुझाव और खुली चर्चा हुई जिसके अन्तर्गत प्रमुख श्रावक संघों के सक्रिय कार्यकर्ताओं ने अपने विचार रखे । 

आचार्यश्रीजी ने अपने उद्बोधन में कहा कि वीजन 2025 की संकल्पना के लिए मैं लाला नेमनाथ जी जैन को हार्दिक साधुवाद देता हूॅं और इस कार्यक्रम को आगे बढ़ाने के लिए हमारा पूर्ण सहयोग आपको रहेगा और आपके द्वारा बनाये गये प्रान्तीय केन्द्रों में हमारी पी0एच0डी0 युक्त जो साधु साध्वी हैं वे भी आपको पूरा सहयोग देंगे । इस ज्ञान, ध्यान और संस्कार के यज्ञ में हम सभी अपनी आहुतियां प्रदान करें । सभी विद्वानों की विद्वत्ता की भूरी-2 प्रशंसा करते हुए आचार्यश्रीजी ने कहा कि एक विद्वद् परिषद का भी निर्माण किया जाये जिसके द्वारा हम प्रतिवर्ष वैचारिक स्तर पर चिन्तन और क्रियान्वयन पर विचार कर   सकें ।  

3 अक्टूबर को मैत्री दिवस के रूप में जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज का   63 वां जन्म दिवस मनाने हेतु भारत भर से आए हुए सभी भक्तों ने अपनी श्रद्धा, समर्पण भावनाएं अभिव्यक्त की । 

इस अवसर पर आचार्यश्रीजी ने फरमाया कि-  प्रभु महावीर की वाणी का सारसूत्र ‘परस्परोपग्रहो जीवानाम्’ सभी के सहयोग से ही सारा जीवन चल रहा है । अनेकान्त दृष्टि से हर बात को सोचो हम आज यह संकल्प लें । सभी के लिए मंगल के कार्य करें । आज मैं यहां आह्वान करता हूॅं कि सम्प्रदाय की संकीर्ण सीमा से उठकर मानव जाति के लिए मंगल का कार्य करें । आज आवश्यकता है समाज में क्रान्ति की, तन, मन, धन से मिशन के साथ जुड़कर कार्य करें । आपका एक कदम दूसरों की सुख शान्ति समृद्धि के लिए उठे । आज प्रत्येक व्यक्ति सेवा का संकल्प लें । प्रभु महावीर की मैत्री अहिंसा से जुड़े । हम अपनी जिम्मेदारी का अहसास करते हुए विश्व में बढ़ते मांसाहार और प्रदूषण पर रोक लगाते हुए ध्यान साधना के मार्ग पर अग्रसर हो । मनुष्य जाति एक है । आज हर तरह संगठन का शंखनाद बज रहा है और मैं ऐसे समय में उन महान् विभूतियों को याद करता हूॅं जिन्होंने श्रमण संघ की एकता में अपना समर्पण किया । 

पूज्य श्री सौभाग्यमल जी महाराज, मरूधर केसरी श्री मिश्रीमल जी महाराज, जैन दिवाकर श्री चैथमल जी महाराज एवं उस समय वहां विराजित उन समस्त महान् मुनिराजों को याद करता हूॅं जिन्होंने सम्प्रदायवाद की बात न करते हुए जैन धर्म को एकता में जोड़ा । श्रमण संघ के लिए उनके उपकार भुलाये नहीं जा सकते । आचार्य सम्राट् श्री आत्माराम जी महाराज, आचार्य सम्राट् श्री आनंद ऋषि जी महाराज, आचार्य सम्राट् श्री देवेन्द्र मुनि जी महाराज के पद्चिन्हों पर चलते हुए इस श्रमण संघ को उज्ज्वलता प्रदान करने के लिए मैं आज कुछ घोषणा करने जा रहा हूॅं । श्रमण संघ के विकास में एवं सभी के मंगल के लिए यह घोषणा अतिमहत्वपूर्ण है ।

आज मैं यह घोषणा करता हूॅं कि- ‘‘धर्म संघ के विकास एवं गौरव के लिए प्रमुख मुनिवृंद के आग्रह एवं चतुर्विध संघ की हार्दिक भावना को ध्यान में रखते हुए श्रमण संघ में संगठन एवं अनुशासन को सुदृढ़ बनाने के लिए मैं 27 अप्रैल, 2003 की स्थिति की घोषणा करता हूॅं । 27 अप्रैल, 2003 के बाद मेरे द्वारा घोषित पद यथावत उसी प्रकार रहेंगे तथा जो मुनिवृंद श्रमण संघीय अनुशासन में निष्ठा व्यक्त करते हैं उन्हें ससम्मान श्रमण संघ में आमंत्रित करता हूॅं । कुछ पदों के समाधान हेतु आवश्यकता हुई तो पांच संतों की कमेटी बनाई जाएगी, उनकी रिपोर्ट के आधार पर समाधान कर लिया जाएगा । श्रमण संघ एक है और एक   रहेगा । श्रमण संघ में साधना स्वाध्याय को लेकर हम चलें । अनुशासन एवं निष्ठा को भीतर उतारें यही हार्दिक मंगल कामना ।’  

आचार्यश्रीजी के जन्म दिवस पर श्रमण संघीय मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म0, उप प्रवर्तिनी महासती श्री कौशल्या जी म0 ‘श्रमणी’, महासती श्री मंजूल ज्योति जी म0 आदि ने अपनी भावनाएं अभिव्यक्त करते हुए आचाय्रदेव को जन्म-दिन की हार्दिक बधाईयां प्रेषित की । इस अवसर पर भारत भर से आये हुए विद्वद्जन एवं भारत भर से आए हुए श्रावक श्राविकाओं एवं संघों के प्रतिनिधियों ने अपने श्रद्धापूर्ण भाव गद्य एवं पद्य में व्यक्त करते हुए अपना समर्पण एवं बधाईयां प्रदान की । मुख्यरूप से लाला नेमनाथ जी जैन, समाजरत्न लाला हीरालाल जी जैन ने श्रमण संघ के इतिहास पर प्रकाश डालते हुए अपना पूर्ण समर्पण अर्पित करते हुए संगठन के भाव रखें । श्री आनंद प्रकाश जी जैन- दिल्ली, श्री औंकारलाल जी सिरोया- उदयपुर, श्री उमरावमल जी चैरड़िया- जयपुर, श्री लक्ष्मीचंद जी तालेड़ा- जयपुर, श्री मोहनलाल जी जैन- मंगलदेश महासंघ के महामंत्री, हरियाणा महासभा के अध्यक्ष श्री राधेश्याम जी जैन, श्री शान्तीलाल जी कांकरिया- बैंगलोर, श्री गौतम कांकरिया- मद्रास, श्री अमित राय जैन बड़ौत {उ0प्र0}, श्री गजराजसिंह जी 

झामड- इन्दौर, श्री अशोक {बाबूसेठ} बोहरा- अहमदनगर, श्री कचरदास जी पोरवाल- पूना {महाराष्ट्र}, स्थानीय श्रीसंघ के मंत्री श्री पवन कुमार जैन, पटियाला संघ के प्रमुख श्री सतपाल जी जैन आदि गणमान्यजनों ने पूरे देश की तरफ आचार्यश्रीजी के जीवन पर प्रकाश डाला और आचार्यश्रीजी को एक   युग-आचार्य के रूप में प्रस्तुत किया ।  प्रमुख रूप से दिल्ली महासंघ, उत्तर प्रदेश महासंघ, मंगलदेश महासंघ, राजस्थान, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, दक्षिण भारत एवं उत्तर भारत वासियों ने आचार्यदेव के 63 वें जन्म-दिवस पर अपनी मंगल कामनाएं अभिव्यक्त करते हुए दीर्घायु एवं शतायु होने की भावनाएं अभिव्यक्त की । इस अवसर पर आचार्यदेव को भारत भर से आये श्रावकजनों ने चातुर्मास की भावभरी विनतियां प्रेषित की जिसमें उदयपुर, इन्दौर, उत्तर प्रदेश मुख्य रूप से रहे । 

3 अक्टूबर को सायं 4.00 बजे महावीर युवक मण्डल, चण्डीगढ़ के सौजन्य से ‘एक शाम महावीर के नाम’ सांस्कृतिक संध्या का आयोजन किया जिसमें अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त श्री विनय देवबन्दी एण्ड पार्टी, गाजियाबाद ने जैन धर्म और दर्शन के आध्यात्मिक शिक्षा की प्रेरणा हेतु विभिन्न कार्यक्रम प्रस्तुत किए जिसे देख और सुन करके जन-जन में वीतराग धर्म के प्रति श्रद्धा और भावो में संवेग की प्राप्ति हुई । इस कार्यक्रम में और भी अनेक कलाकारों ने अपनी कला की प्रस्तुति की जिसमें सरस्वती वंदना 5 वर्षीय बालक श्रेष्ठ एवं 7 वर्षीय बालिका श्रेष्ठी द्वारा प्रस्तुत की गई । श्री जैनेन्द्र जैन गुरूकुल, पंचकूला के बालक बालिकाओं द्वारा स्वागत कार्यक्रम प्रस्तुत किया गया । रजनी जैन, नकोदर- नीलम सिंघवी, दिल्ली, ऊषा बांसल, चण्डीगढ़, ने सुन्दर संगीत की प्रस्तुति की । कार्यक्रम की अध्यक्षता श्री मोहनलाल जी जैन, एडवोकेट ने की । समारोह के अतिथि श्री नेमनाथ जी जैन, इन्दौर, ध्वजारोहण श्री आनंद प्रकाश जैन, दिल्ली ने किया । इस अवसर पर जैन डायरेक्ट्री का विमोचन श्रीमती ईलायची देवी धर्मपत्नी श्री सुलेखचंद जी जैन, चण्डीगढ़ वालों ने किया । गौतम प्रसादी श्री देवराज सुशीला जैन, ब्यावर वाले, चण्डीगढ, की तरफ से थी । महावीर जैन युवक मण्डल के कार्यकर्ताओं की सेवा भक्ति सुन्दर रही ।  

मुख्य रूप से एस0 एस0 जैन सभा, महावीर जैन युवक मण्डल, स्त्री सभा, युवती संघ एवं सभी मुख्य कार्यकर्ताओं ने सभी अतिथियों की सेवा भक्ति, आवास निवास, भोजन व्यवस्था में पूर्ण सहयोग दिया । श्रीमती ऊषा जैन- बी0डी0 बांसल ने समस्त अतिथियों की भोजन सेवा का लाभ प्राप्त किया ।  

संजीव जैन, मंत्री

श्री एस0 एस0 जैन सभा

सेक्टर 18 डी, चण्डीगढ़

 

सहयोग की भावना में जीओ: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़: 5 अक्टूबर, 2004: जैन धर्म दिवाकर, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर, आचार्य सम्राट् पूज्य श्री षिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- प्रभु महावीर के पावन मंगल उद्बोधन, उनकी शिक्षा, उनके सूत्र हमारे जीवन में अनेक परिवर्तन लाते हैं । उन्होंने एक सूत्र में बताया ‘परस्परोपग्रहो जीवानाम्’ आपने जैन चिन्ह में से देखा, पढ़ा होगा । जीवन की पूंजी इसमें समायी है । मेरे अकेले से कुछ नहीं । मुझे मेरी समाज का सहयोग चाहिए । एक कदम आप चलते हैं तो सारा शरीर जागृत होता है । 

हमारा जीवन कितना सहयोग से चलता है अगर घर में पिता कहे कि पैसा मैं कमाता हूॅं और पत्नी कहे रोटी में पकाती हूॅं तो ऐसा नहीं चल सकता । दुकान तो कोई भी चला सकता है । नौकर भी चला सकता है । घर तो एक गृहिणी, एक मां ही चला सकती है । अपने भीतर के इस मेल को निकाल दो । अहंकार छोड़ दो । घर में रहते हुए आप बारह व्रत ग्रहण कर सकते हो । प्रभु महावीर ने बहुत छूट दे दी तुम्हें । नमस्कार मंत्र में नमो कहते ही स्वयं को प्रभु चरणों में समर्पित कर दो । स्वयं को खाली कर दो । प्रभु यह शरी,र, विचार, धारणा, मन, बुद्धि मेरा कुछ भी नहीं, सबकुछ आपका है । 

संकल्प रखो हमें अरिहंत जैसा बनना है । साहस रखो । जब एक बाप बेटे की भूलों को क्षमा कर सकते हैं तो क्या अरिहंत हमें क्षमा नहीं करेंगे । तुम्हारा जीवन एक सहयोग से बना है । तुमने धन कमाया तो पत्नी ने रोटी बनाई । उस रोटी से जो ऊर्जा प्राप्त हुई उसे सत् कार्यों में लगाना है या अन्य कार्यों में लगाना है यह तुम पर निर्भर करता है । मैत्री और परोपकार का बीज अंकुरित करो । स्नेह का दीया, करूणा का मंगल झरना बहा दो । एक सहयोग की भावना से बना भोजन भजन बनता है । हम हर समय सहयोग के भावों में   जीयें । गिरते हुए इन्सान को उठाओ । इन्सानियत के गीत गाओ परन्तु भीतर सहयोग की भावना रखों । अगर आप किसी को सहयोग दोगे तो सामने वाला भी तुम्हें सहयोग देगा और तुम्हारा जीवन मंगल की ओर आगे बढ़ेगा । 

अपने प्रत्येक दिवस का प्रारंभ प्रार्थना से करें: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़: 6 अक्टूबर, 2004: जैन धर्म दिवाकर, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर, आचार्य सम्राट् पूज्य श्री षिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- जगत एक दर्पण है । जगत एक प्रतिध्वनि है । दर्पण को हम जैसा चेहरा दिखाते हैं उसी प्रकार दिखता है । पृथ्वी पर जैसा बीज डालोगे वैसा ही वृक्ष बनेगा जैसा हम भोजन करते हैं वैसा ही रस भीतर में बनता है । क्रोध करते हैं तो हार्ट अटैक होता है, वैसे ही जब क्षमा करते हैं तो भीतर में मैत्री की धारा बहती है । गुलाब का फूल होगा तो वह अवश्य ही सुगंध को बिखरा देगा । आसपास के वातावरण को सुवासित कर देगा । इसी प्रकार हमारे जीवन की प्रत्येक क्रिया की प्रतिक्रिया होती है । हमारा प्रत्येक कार्य सम्यग् होना चाहिए । सुबह जब भी हमारी आंख खुले तो हमारा ध्यान टी0वी0 या अखबार पर जाता है जबकि सत् पुरूष कह रहे हैं । प्रातःकाल जब भी आंख खुले हमें प्रभु का, गुरू का, परम्पिता परमात्मा को अन्तर्मन से कृतज्ञता के भाव भीतर में भरकर अपने सिर को झुकाना चाहिए । सबसे पहले प्रातः हमारा जो भी सर्वोपरि है जो हमारे लिए आराध्य है उसी का श्रद्धा भक्ति भाव से स्मरण करें तो उनकी शुद्धता दिव्यता हमारे भीतर आएगी । हम दिया जलाएं और प्रकाश न फैले यह कैसे हो सकता है ? दीपक जलेगा तो निश्चित ही प्रकाश मिलेगा । वैसे ही भक्ति करें अरिहंत सिद्ध प्रभु की तो अवश्य ही अरिहंत सिद्ध के वीतराग-भाव भीतर में आएंगें क्योंकि जैसे विचार और भाव होते हैं वैसे ही संस्कार भीतर में बनते हैं । संस्कार के अनुरूप ही हमारा जीवन बनता है । इसीलिए जीवन को संस्कारित करना हो तो हमें अपनी शुरूआत प्रार्थना से करनी चाहिए । दिन का प्रारंभ प्रार्थना से हो तो सम्पूर्ण दिवस आनंद से बीतेगा । दिन का समापन भी प्रभु की भक्ति से ही हो । सारे दिन का लेखा जोखा प्रभु के चरणो में डाल दो । 

 

जन्म और मृत्यु के बीच जीवन की रेखा है: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़: 7 अक्टूबर, 2004: जैन धर्म दिवाकर, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर, आचार्य सम्राट् पूज्य श्री षिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- प्रभु महावीर की परम कल्याणकारी, वीतरागवाणी कहती है कि जन्म दुःख है, जरा दुःख है बुढ़ापे का, वियोग, व्याधि, रोग का दुःख और मरण के दुःख ने मनुष्य को घेरा हुआ है आश्चर्य है फिर भी मनुष्य विषयों से विरक्त नहीं होता । जन्म और मौत के बीच जीवन की रेखा है । जन्म और मौत सांसारिक प्राणी के लिए दुःखदायी है, परन्तु जिन्होंने अरिहंत, सिद्ध, सत्गुरू का शरणा ले लिया उनके लिए सुखद है । प्रभु महावीर के जीवन में बड़े दुःख आये फिर भी वे उन्हें सहन करते हुए निर्वाण को प्राप्त हुए । 

जन्म और मौत क्या है ? एक आंख का खुलना जन्म है और आंख का बंद होना मौत है । आंख का खुलना और बंद होना इसके बीच की जो रेखा है वही जीवन है । जन्म और मौत के बीच जो जीवन है उसमें दुःख आते हैं इसे सहन कर लो । मौत सभी जगह दस्तक देती है, चाहे किसी भी जगह पर चले जाओ । धन से आज तक किसी की रक्षा नहीं हुई । बड़े-2 धनपति शालिभद्र जैसे वीर मौत को नहीं रोक पाये । सुख और दुःख तुम्हारी बात पर निर्भर करता है । प्रभु महावीर को दुःख आये तो उन्होंने समझा कि यह अपना ही कर्म-संस्कार है और हमें दुःख आ गया है तो हम यह समझते हैं कि वह किसी ने दे दिया । दुःख में सुखी होने के लिए विचारधारा को कर्म-संस्कार की ओर ले जाइये ।

दुःखी होने का एक ही तरीका है मुझे क्या मिलेगा और सुखी होने का राजमार्ग है कि मैं क्या कर सकता हूॅं । मैं इस समाज, राष्ट्र, देश, परिवार को क्या दे सकता हूॅं । जीवन में यदि हम मांगते ही रहे तो हम और दुःखी हो जाएंगें । यह संसार काम वासना से बना धन से लोभ बढ़ता चला गया । अहंकार से दुःख आ गया । गलत विचारों से बीमारियों ने घेर   लिया । अगर हमें इनसे दूर होना है तो क्रोध, मान, माया, लोभ और नकारात्मक सोच से दूर होना पड़ेगा, यही दुःख का कारण है । तुम्हारे भीतर दीया जले । फूल खिले, सूरज उगे । मनुष्य शक्ति का पुंज है उसे जैसा चाहे उपयोग कर सकते हो । जीवन की शान्ति लेने के लिए हम अध्यात्म से जुड़ें । आप मुझे सुन रहे हो क्यों सुन रहे हो क्योंकि मैं आपसे जुड़ा हूॅं और आपमुझसे जुड़े हुए हो । 

हमारा एक ही लक्ष्य अरिहंत की शरण में जाना, सिद्धत्व को प्राप्त करना है । सांसारिक सुविधा को छोड़कर अध्यात्म से जुड़ना है । आध्यात्मिक होना यानि प्रेममय हो जाना । हम कोमल ऋजु बन जाये । हम भगवान के भक्त बनते हुए भगवत्ता में आ जायंे । धर्म जीवन का अंग संग बन जायें । तुम भीतर से सहज और सरल हो जाओ यही आध्यात्मिकता है । भीतर निर्मलता, पवित्रता, शुद्धता को लाओ । यह तभी आ सकती है जब हम अरिहंत की शरण में जाएंगें । मन को अरिहंत, सिद्ध, सत्गुरू के स्मरण में लगाएंगें । भीतर से जीवन को धोओ, जीवन आनंदमय बन जाएगा । जन्म और मृत्यु तो अनेक बार आ गये । जन्म और मृत्यु सत्य नहीं है । सत्य तो यह है कि हर श्वांस में परमात्मा का वास हो, फिर से हम अरिहंत की वाणी में स्थित हो जायें । इस शरीर का उपयोग निर्वाण की ओर जाने के लिए करें । जीवन में सभी का भला सोचें यही जीवन का सार और आनंद है । 

सम्राट् बनने के लिए अहंकार को विलीन करना होगा

 

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़: 8 अक्टूबर, 2004: जैन धर्म दिवाकर, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर, आचार्य सम्राट् पूज्य श्री षिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- किसी आत्मद्रष्टा गुरू के पास जब तुम जाते हो जैसे ही नमन वंदन करते हो उनके पास बैठते हो तो आपकी व्याधि मिट जाती है । यदि सौभाग्य से अरिहंत प्रभु के दर्शन हो जाये तो आप आनंदित हो जाते हो । सद्गुरू की झलक जीवन को आनंद से भर देती है । सद्गुरू के दर्शन करने मात्र से तुम खिल जाते हो । आनंदित हो जाते हो । एक बच्चा जैसे हर आदमी को हंसा देता है उसी प्रकार एक दिव्यात्मा के दर्शन करते हुए आपका हृदय दिव्य भाव से भर जाता है । 

कमल का फूल कीचड़ में पैदा होता है परन्तु वह कीचड़ से आलिप्त होता है । हमारा जीवन भोग से निर्मित हुआ । आवश्यक नहीं कि हम भोग से ही रहे । भोग से योग की ओर आयें । भिखारी बनकर नहीं सम्राट् बनकर जीयें । सम्राट् का मतलब भीतर समृद्धि का भाव होना । आनंद शान्ती से हृदय परिपूर्ण होना । अगर ऐसे भाव भीतर आ गये तो आप इस दुनिया से ऊपर उठ गये । अगर आपके भीतर अहंकार बोल रहा है तो आप सम्राट् नही बन पाओगे । सम्राट् बनने के लिए अहंकार को विलीन करना होगा । अहंकार भीतर होता है तो हम कोई भी कार्य नहीं कर पाते । अगर भीतर विनम्रता होगी तो सारे कार्य कर पाएगें । 

एक क्रिश्चियन महिला थैरेसा प्रतिदिन बाईबिल का पाठ करती थी । उसके पास धीरे-2 लोगों की संख्या बढ़ती चली गई । यदि हृदय में भक्ति हो तो लोग अपने आप खीेचंे चले जाते हैं । लोग बहुत हो गये । उसके घर में बैठने के लिए जगह भी नहीं थी । ऐसे समय में उसने एक घोषणा की कि यहां चर्च बनेगा और वह स्वयं निर्धन थी । उसने संकल्प किया, विनम्रता रखी । चार पैसे उसकी जेब में थे । उसने चार पैसे और परमात्मा को अपना आधार समझकर वहां एक चर्च बना दिया । तुम प्रतिदिन कुछ पैसे धर्म के लिए निकालो । एक-एक रूपया निकालोगे तो परलोक पूंजी बन जाएगी, उसे दान में लगाओ । तुम मेहनत करो । मेहनत से सारे कार्य सफल होते हैं । संसार का भरोसा मत रखना । अपनी शक्ति पर भरोसा रखो । सुबह शाम प्रार्थना सत्संग करो । परमात्मा के चरणों में स्वयं को समर्पित कर दो । 

अध्यात्म जीवन का सार है: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़ 9 अक्टूबर, 2004 श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के अन्तर्गत पर्यावरण की सुरक्षा एवं संवर्द्धन पर अपने विचार प्रकट करते हुए कहा कि वातावरण की शुद्धता पर प्रत्येक मानव को ध्यान देना चाहिए । जैन धर्म में सूक्षमता से जीवाजीव पर विचार किया गया है । आज की इस 21 वीं सदी में हमारा वातावरण प्रदूषित होता जा रहा है । पानी का उपयोग सही मात्रा में नहीं किया जाता । जल ही जीवन है, यह हमारी सम्पत्ति है, इसे हमें सुरक्षित रखना चाहिए । वातावरण शुद्ध होगा तो प्रार्थना, सामायिक, माला, पाठादि में हमारा मन लगेगा । इन सभी के लिए शुद्धता परमावश्यक है । 

इस अवसर पर आचार्यश्रीजी ने पिता पुत्र का पारस्परिक व्यवहार किस प्रकार होना चाहिए इस विषय पर प्रकाश डालते हुए कहा कि पिता को अपने बेटे के साथ मधुर सम्बन्ध रखने चाहिए । वह अपने बैटे को धर्म के संसकार दे, धन का उपयोग सेवा के लिए करने का उपदेश दे । मानव जन्म दुर्लभ है । जो इसका सदुपयोग करता है वह अपने लक्ष्य को प्राप्त करता है । जो इसका दुरूपयोग करता है वह नर पशु समान होता है । धन का उपयोग दुर्गति में किया तो वह शैतान को औजार बन जायेगा । भजन और भोजन जिस घर में एक साथ होता है, वह घर स्वर्ग समान होता है । 

धन का प्रयोग स्वार्थ के लिए मत करना । भगवान को कभी मत भूलना, वह अच्छी बुद्धि देता है । इन्द्रिय व मन को संयम में रखना । भोजन कोे दवा समझकर ग्रहण करना । जो स्वाद के वश होकर भोजन करते हैं, वे शीघ्र ही कालधर्म को प्राप्त हो जाते हैं । नित्य नियम से व्यवसाय करना, न्याय-नीति से धन कमाना, आवश्यकतानुसार अपने उपार्जित धन का कुछ अंश धर्म में लगाना । जीवन का सार इसी में है कि हम अध्यात्म में प्रवेश करते हुए अध्यात्म को समझे । 

 

हम अप्रमत्ता के साथ वीतराग पथ पर आगे बढ़ें: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़ 10 अक्टूबर, 2004 श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने विचार प्रकट करते हुए कहा कि- अरिहंत प्रभु की परम कल्याणकारी वाणी का हम श्रवण कर रहे हैं ।  प्रभु महावीर ने कहा- आशुप्रज्ञ पंडित को क्षण मात्र का भी प्रमाद नहीं करना  चाहिए । समय का ध्यान रखते हुए वीतराग पथ पर हम अप्रमत्त भाव से आगे बढ़ें । प्रभु महावीर का जीवन अप्रमत्ता से भरा हुआ था । महासतीजी के जीवन में अप्रमत्ता झलकती है । जिस श्रद्धा से व्यक्ति दीक्षा के पथ पर अग्रसर होता है उसी प्रकार उसका पालन करता है तो वह अपने मार्ग को सिद्ध कर लेता है । साधु साध्वी का जीवन तभी महान् बन सकता है जब वे श्रद्धा से संयम पथ पर आगे बढ़ते हैं । अपने नियम उपनियम के प्रति जागरूक रहते हैं । प्रभु महावीर कहते हैं जो जागरूक हैं वही मुनि है । जो आलसी, प्रमादी, वाचाल है वह अपनी साधना में अग्रसर नहीं हो सकता । किसी साधक की, महापुरूष की दृष्टि हमारे जीवन पर आ जाये तो हमारे जीवन का कल्याण हो जाएगा । जिस प्रकार नदी किनारे जाने से ठण्डक महसूस होती है उसी प्रकार दृष्टि से जीवन निहाल होता है । कबीर जी कहते है। सारा संसार छूट गया तभी मुझे राम रतन धन प्राप्त हुआ । हम भी संसार से पर उठते हुए श्रुतज्ञान को वीतरागता में  लगायें । अपने जीवन को अरिहंत की शरण में समर्पित कर दें । भीतर सबके मंगल की भावना रखें । जो किसी के प्रति भीतर राग द्वेष-भाव नहीं रखता वही संत, सच्चा साधक है । भीतर वीतरागता की पथ के कामना रखना । जितनी वीतरागता की पुष्टी होगी उतना ही संयम सफल होगा । मैत्री की भावना भावित करोगे तो भीतर से भर जाओगे । 

प्रभु महावीर का वैराग्य तभी फलित होगा जब हमारे भीतर का लोभ समाप्त होगा । उदासीनता वैराग्य नहीं है । वैराग्य का अर्थ है भीतर से समृद्ध, सम्पूर्ण होना । भीतर से समृद्धि तभी आएगी जब हमारे भीतर अरिहंत प्रभु के प्रति भक्ति के भाव जाग जाएंगे । महासतीजी ने सौभाग्यवतीजी महाराज के चरणों में दीक्षा ली । महासाध्वी श्री चंदा जी महाराज की छत्रछाया में इन्होंने आगम वाचना लेते हुए शिक्षा की ओर अग्रसर हुए । चन्दा जी महाराज चन्द्रमा के समान निर्मल थे । सौभाग्यवती जी महाराज जिनके जीवन में सुख समृद्धि भरी हुई थी और जिनका जीवन कुशलता से व्यतीत हो रहा हैं वे कौशल्या जी महाराज हैं । आज मैं इस वीतरागता के मार्ग में आगे बढ़ा हूॅं इसमें बहुत बड़ा हाथ है, आचार्य सम्राट् श्री आत्माराम जी महाराज, महासती श्री सौभाग्यवती जी महाराज, महासती श्री सीता जी महाराज, महासती श्री कौशल्या जी महाराज एवं महासती श्री शिमला जी ‘बहिन महाराज’ का । 

ऐसी महान् विभूति, श्रमण संघ की उज्ज्वल नक्षत्र, उप प्रवर्तिनी महासाध्वी श्री कौशल्या जी महाराज का 77 वां जन्म-दिवस आज हम सभी मना रहे हैं । जन्म-दिन तो प्रतिदिन आते हैं और चले जाते हैं । जन्म-दिन ऐसे मनाओ जिनके संयम से जीवन से प्रभु महावीर की वाणी मुखरित होती हो । महासतीजी सर्वगुण सम्पन्न तपनिष्ठ, जपनिष्ठ, संयमनिष्ठ हैं । अभी भी इनके जीवन में बचपन निखरता है । आपके जीवन को देखते ही हमें उन महान् विभूतियों की याद आती हैं जिन्होंने इस श्रमण परम्परा को गौरवमय बनाया । अगर आपके नाम से माता पिता जाने जाये तो जीवन जीना सार्थक है । पुत्र के नाम से पिता जाना जाये तो पुत्र का जन्म लेना सार्थक है । जिस प्रकार प्रभु महावीर के नाम से त्रिशला और सिद्धार्थ जाने गये उसी प्रकार हम भी अपने नाम से अपने कुल को अपने माता पिता के नाम को रोशन करें । मैं जब वैराग्यकाल में था तब मुझे महासतीजी के जीवन से बहुत प्रेरणा मिली । प्रभु महावीर की वाणी का सार उसमें समाया हुआ है । हम इनके जीवन से स्वाध्याय, तप जप संयम की सीख लें । महासतीजी ने श्रमणी परम्परा को अक्षुुण्य रखा है हम इनके जीवन की मंगल कामना करें । 

 

परम् सुख के लिए जीना ही जीवन है: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़ 12 अक्टूबर, 2004 श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने विचार प्रकट करते हुए कहा कि- यह मानव जीवन हमें त्याग के लिए मिला । इस जीवन में रहते हुए हम त्याग की ओर आगे बढ़ें यह ऋषियों मुनियों की वाणी है । इस मानव जीवन को हम दो भागों में बांट सकते हैं । अधिकांश मानव शरीर के साथ जीते हैं उनके लिए शरीर ही सब कुछ है । जो परम सुख के लिए जीते हैं वे ही सच में जीवन व्यतीत कर रहे हैं । वे हमेशा आनंद में जीते हैं । जो मानव भीतर की चेतना आनंद के लिए जीता है वह सच में जीवन जी रहा है । बेटे पोते के लिए धर परिवार धन पद प्रतिष्ठा के लिए जीना कोई जीना नहीं होता । इन सब के लिए जीना दुःख को आमंत्रण देना है । ऐसा करने वाला व्यक्ति अपने जीवन में हमेशा दुःख ही दुःख पाता है । जो व्यक्ति भोग से त्याग की ओर आगे बढ़ता है, वही सच्चा जीवन जीता है । 

जो मैत्री करूणा आनंद के लिए जीता है वह इस जीवन से सुख प्राप्त करता है । यह जीवन इन्द्रियों और मन पर भी आधारित है । इन्द्रियां कोई बड़ी बात नहीं केवल छेदमात्र    है । अगर कान का छेद न हो तो सुनाई नहीं देगा । अगर नाक का छेद ना हो तो सुगंध दुर्गध का पता नहीं चलेगा । अगर आंख का छेद ना हो तो दिखाई नहीं देगा । अगर हम इन्द्रियों और मन पर संयम रखते हैं तो योग की ओर आगे बढ़ते हैं अन्यथा वे भी हमें भोग की ओर ले जाती है । यह जीवन स्वाद पर भी टिका हुआ  है । मन को हमेशा कुछ न कुछ नया चाहिए । अगर भीतर में आनंद होगा तो प्रत्येक वस्तु परिस्थिति से सुख प्राप्त होगा । 

व्यक्ति को हमेशा आनंदित होना चाहिए । पशु पौधे पहाड़, पत्थर हस नहीं सकते । एक मानव ही ऐसा है जो हमेशा हस सकता है । व्यक्ति को हमेशा हसमुख होना चाहिए । उसके मुख पर मुस्कुराहट होनी चाहिए । जो मानव शरीर के लिए जीते हैं वे आनंदित नहीं हो पाते । मानव इस शरीर के साथ रहते हुए इससे लाभ उठायें । मानव का जन्म शरीर से उपर उठकर अध्यात्म की ओर जाने के लिए हुआ है । आत्म-तत्व और आनंद की ओर जाने के लिए हुआ है, हम उस ओर आगे बढ़ें । 

 

अध्यात्म में रमण करो: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़ 13 अक्टूबर, 2004 श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता, आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के अन्तर्गत व्यक्तित्व विकास पर अपने विचार प्रकट करते हुए कहा कि- 

पराया दर्द अपनाये उसे इन्सान कहते हैं,

किसी के काम जो आये उसे इन्सान कहते हैं । 

पशु और मनुष्य में इतना ही अन्तर है कि पशु अकेला खाता है और मानव बांटकर खाता है । अगर मानव भी अकेला खाता है तो वह पशु समान है । पशु हमें प्रकृति के द्वारा बहुत सहायता करता है । पर्यावरण सुरक्षा में उसका बहुत बड़ा उत्तरदायित्व है । मानव सहायता स्वार्थ के वश होकर करता है । प्रभु महावीर का दर्शन अन्तर्दृष्टि का है, वैज्ञानिक  है । मुनि वही है जो स्वयं को संयम में ले आये । हाथ पांव को अपनी इन्द्रियों को संयम में लाकर सूत्र के अर्थ में जीवन लगाये । वह सुख दुःख में समान रहता है । 

सुख दुःख परछाई के समान है । धूप छांव के समान है । हम इनमें भी समभाव से  रहें । प्रभु महावीर की सारी धर्मदेशना का सार समता है । जब तक हम स्वयं की ओर नहीं झांकते तब तक समता आवश्यक है । हमें चारों ओर इन्द्रियों का सुख लगता है, परन्तु यह सुख नहीं दुःख की कली है । जो शरीर के लिए नहीं जीते वे हमेशा आनंदित होते हैं । शरीर का मतलब केवल यह हड्डियों का ढ़ांचा ही नहीं धन, पद, यश, कंचन कामिनी, संकल्प विकल्प आदि सब शरीर में समाविष्ट हो जाते हैं । हम इन सबसे उपर उठकर विनम्रता में जीवन जीयें । अध्यात्म में रमण करें । 

जो आत्मा के समीप रहता है वह अध्यात्म में रमण करता है । सुख दुःख उत्तेजना   है । सुखद संवेदना सुख है । दुःख संवेदना दुःख है । शरीर एक उपकरण है वीतरागता की ओर आगे बढ़ने के लिए । शरीर का हम सदुपयोग भी कर सकते हैं और दुरूपयोग भी कर सकते हैं यह किस प्रकार करना यह हम पर निर्भर है । हम चाहे तो उसका सही उपयोग कर सकते हैं । चाहे तो दुरूपयोग कर सकते हैं । 

आत्म: ध्यान साधना कोर्स एडवांस ा 15 से 17 अक्टूबर, 2004 तक जैन स्थानक, सेक्टर 18 डी में होगा जो भाई बहिन इसमें भाग लेना चाहते हैं वे शीघ्रातिशीघ्र रजिस्टेशन करवावें । 

 

सद्गुण से सुन्दरता तक: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़ 14 अक्टूबर, 2004 विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के अन्तर्गत आडम्बर प्रथा एवं सामाजिक कुरीतियों का उन्मूलन इस विषय पर अपने विचार प्रकट करते हुए कहा कि- आज वर्तमान में भी कई प्रथाएं हमारे भारत में गतिमान है जैसे परदा-प्रथा, घूंघटप्रथा । घूंघट-प्रथा आज भी राजस्थान में देखने को मिलती है । यह घूंघट क्यों डाले गये इसके पीछे भी एक कारण है । आज से सैकड़ों वर्ष पूर्व आतंकवादियों ने हमारे बहिनों को अनेक राजाओं के हवाले करना चाहा । राजा जब युद्ध करने परस्पर राज्यों में जाते थे तब जो दासी या जो स्त्री मनमोहक होती उसे उठाकर अपने राज्य में उठाकर ले आते । स्त्री की सुन्दरता ना दिखे इस हेतु घूंघटप्रथा उस समय प्रचलित हुई थी ।  

कर बंदगी और भजन धीरे-धीरे,

मिलेगी प्रभु की शरण धीरे-2 । 

जीवन को निर्मल बनाने के लिए निरन्तर सत्संग होना आवश्यक है । तुम अपना एक नित्य नियम बना लो । गुरू दर्शन करने का, सत्संग में जाने का, कुछ समय स्वाध्याय, माला, जप करने का । आप एक कदम चलोगे तो मंजिल पार कर लोगे । एक मिल चलोगे तो हजारों मील प्रकाश फैलेगा । मूल रूप में हम अपने भीतर के सद्गुण और दुर्गुण देखें । एक सद्गुण आपके पूरे जीवन को बदल देता है और एक दुर्गुण जीवन को बुराईयों से भर देता  है । एक सद्गुण को पकड़ लो पूरा जीवन शुद्ध होता चला जाएगा । महात्मा गांधीजी ने सत्य को पकड़ा था । सत्य के मार्ग पर वे अटल खड़े थे तो उन्होंने अपने जीवन में हर अच्छाई को हासिल किया । गांधीजी ने सत्य का नियम लेकर अपनी सारी आलोचना अपने पिता के समक्ष की थी । मूल रूप में जीवन में एक दुर्गुण होता है । हम शान्ति में बैठकर सोचे कि हमारे जीवन में क्या दुर्गुण है और उसे दूर करने का प्रयास करें । अगर दुर्गुण दूर हो जाएगा तो जीवन कुन्दनवन बन जाएगा । 

हमें कुछ कार्य करने के लिए परस्पर सहयोग की आवश्यकता है । अपनत्व, प्रेम, सहयोग के बिना कोई कार्य नहीं हो सकता । हम सहयोग के पथ पर आगे चलें । छोटी-2 बातों पर ध्यान देते हुए हम अपने इस जीवन पथ पर आगे बढ़ें । स्वयं खुद के जीवन की समालोचना करें कि हमारे सूक्ष्म मन में कितने सद्गुण और दुर्गुण भरे हुए   हैं । दुर्गुण को छोडने का प्रयास करो, सद्गुणों को अपनाने का प्रयास करो । जीवन शुद्ध, पवित्र होता चला जाएगा । धीरे-धीरे सद्गुण भीतर आते चले जाएंगे और दुर्गुण छूटते चले जाएंगे । 

आत्म: ध्यान साधना कोर्स एडवांस ा 15 से 17 अक्टूबर, 2004 तक जैन स्थानक, सेक्टर 18 डी में होगा जो भाई बहिन इसमें भाग लेना चाहते हैं वे शीघ्रातिशीघ्र रजिस्टेशन करवावें । 

 

सद्गुण खोजने के लिए स्वयं को देखना आवश्यक हैजैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़ 15 अक्टूबर, 2004 विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के अन्तर्गत अपने विचार प्रकट करते हुए कहा कि-जीवन में आप जब प्रार्थना करते हैं, प्रभु भक्ति करते हैं वंदन करते हैं तब अहंकार छोड़ देना, दुर्गण उनके चरणों में रख देना । अपने दुर्गुण को प्रकट कर देना । सद्गुण और दुर्गुण का सजातीय संबंध है । जैसे आपपास के लोग होंगे भाव होंगे वैसा ही वातावरण बन जाता है । आपके सद्गुण दुर्गुण निजि है । हम अपने भीतर देंखे कि सद्गुणों का कैसे विकास हो और दुर्गुण किस प्रकार बाहर निकाल सकें । हरेक के सद्गुण और दुर्गुण अलग-2 है । 

सद्गुण और दुर्गुण को जानने के लिए मौन एवं ध्यान से गुजरों । मन के कम्पन को दूर करो । कम्पन सभी बाहर के हैं, भीतर के नहीं । भीतर में कोई कम्पन नहीं है । कम्पन रहित अवस्था ही शैलेशी अवस्था है । जब केवली भगवन मुक्ति प्राप्त करते हैं उस समय वे शैलेशी अवस्था में होते हैं । शैल का मतलब पर्वत की भांति अडिग अकम्प हो जाओ । आपके भीतर जब क्रोध, मान, माया, राग, द्वेष आयें तब कम्पन भीतर  आएगा । इन्हें दूर करोगे तो कम्पन चला जाएगा । 

स्वयं को खोजो, सद्गुण खोजने के लिए स्वयं को देखना आवश्यक है । स्वयं की खोज के लिए नितान्त मौन शान्ति आवश्यक है । जब दुर्गुण देखों तो सद्गुण भी दिखाई देगा । सद्गुण को पकड़ लेना जीवन निर्लेप निरामय हो जाएगा । जितना चित्त शान्त निर्मल होगा उतने ही तुम सुखी हो जाओगे । जब भीतर तृप्ति, समृद्धि होगी तब दुर्गुण बाहर निकल जाएंगें । जिस दिन आपको अपने सद्गुण दुर्गुण दिखेंगे उस दिन तुम महान् बन जाओगे । भीतर जो कम्पन है उसे निकालने के लिए दो घड़ी मौन करना, ध्यान करना भीतर जो हो रहा है उसे होने देना । प्रतिक्रमण करना । अपने आपमें लौट आना । एक धण्टा स्वयं की आलोचना के लिए निकालना । सद्गुण को भीतर ले लेना । दुर्गुण स्वतः ही निकल जाएंगें । सद्गुण दुर्गुण आपको दिखाई नहीं देंगें इनका ज्ञान दूसरों के माध्यम से ही मिलेगा । सद्गुण और दुर्गुण का दूसरों में प्रतिफलन होगा । आपका क्रोध आपसे छोटे व्यक्ति के द्वारा आपको पता चलेगा । आपके जीवन में सद्गुण आयें । आप स्वयं की खोज में लगें । शैलेशी अवस्था को प्राप्त हो यही हार्दिक मंगल कामना । 

आत्म: ध्यान साधना कोर्स एडवांस ा 15 से 17 अक्टूबर, 2004 तक जैन स्थानक, सेक्टर 18 डी में होगा जो भाई बहिन इसमें भाग लेना चाहते हैं वे शीघ्रातिशीघ्र रजिस्टेशन करवावें । 

 

स्वयं को साधने का प्रयत्न करो: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़ 16 अक्टूबर, 2004 विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के अन्तर्गत अपने विचार प्रकट करते हुए कहा कि-  संसार के सभी महापुरूषों ने एक ही बात कही प्रभु का सिमरन करो । सिमरन इसलिए कि उनके गुण हमारे भीतर आये । प्रभु महावीर ने एक सूत्र दिया जो जीव को नहीं जानता, अजीव को नहीं जानता वह संयम को भी नहीं जानता और जो जीव को जानता है, अजीव को जानता है, वह संयम को जानता है । जानना क्या है ? जीव अजीव संयम क्या है ? जो हम अर्थ करते हैं वह उपयुक्त नहीं । जीव और अजीव का मिला जुला असर होता है । यह शरीर जड़ है और इसके भीतर चेतन तत्व है । 

अनादिकाल से जीव अजीव हमारे भीतर है पर हम इसे जान नहीं पाये । इसे जानने के लिए भीतर जाना होगा । तुम जीव, शरीर, चेतना, आत्मा हो इसे जानने, पहचानने के लिए ज्ञानियों ने बहुत उपाय बताये परन्तु हम प्रयोग नहीं करते । यह सब अनुभव से जाना जा सकता है । अनुभव की हुई बात जन्म भर साथ रहती है । हम जीव को जान ले । जीव को जान लिया तो सब जान लिया । जीव को जो जैसा है वैसा जानना और उपयोग करना । जानने के साथ संयम आएगा और फिर सामायिक आएगी । स्वयं को साधने का प्रयत्न करोगे तो सामायिक भीतर आएगी । 

जब आपकी सामायिक सधेगी तब संयम भीतर आएगा । सामायिक का मतलब स्वयं में स्थित होना । आत्मा में स्थित होना है । माला करना, अनुपूर्वी पढ़ना, स्वाध्याय करना यह सामायिक की पूर्व तैयारी है । सामायिक तो समता में आना है । हमारा लक्ष्य सिद्ध स्वरूप का है । सिद्ध स्वरूप कम्पन-रहित है । हम भी कम्पन रहित हो जाये । भीतर के भावों को अकम्पित बनायें । एक सामायिक शुद्ध हो गई तो अन्तिम लक्ष्य तक पहुंच जाओगे । प्रभु स्मरण एक पोढ़ी पर चढ़ने जैसा है । सामायिक तो अन्तिम लक्ष्य   है । संकल्प विकल्प से ऊपर उठने पर सामायिक होगी । 

आत्म: ध्यान साधना कोर्स एडवांस ाा 24 से 27 अक्टूबर, 2004 तक आवास निवास के साथ जैन स्थानक, सेक्टर 18 डी में होगा जो भाई बहिन इसमें भाग लेना चाहते हैं वे शीघ्रातिशीघ्र रजिस्टेशन करवावें । 

 

कर्मों का आत्मा से चिपकाव करती है लेश्या: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़ 17 अक्टूबर, 2004 विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के अन्तर्गत अपने विचार प्रकट करते हुए कहा कि-  अरिहंत प्रभु के चरणों में नमन, प्रभु महावीर ने हमें अध्यात्म का मार्ग बताया । प्रत्येक व्यक्ति अपनी भावनाओं को लेकर आगे बढ़ता है तो मोक्ष प्राप्त कर लेता है । हम सोचे, विचार करें, अपनी भावनाओं को उपर उठायें । प्रभु महावीर की वाणी में लेश्या शब्द आता है । प्रभु महावीर ने वैज्ञानिक आधार पर लेश्या शब्द का सुन्दर विवेचन किया है । प्रभु महावीर ने 6 लेश्या बताई है जिसमें 3 लेश्या धर्म की ओर ले जाती है और तीन लेश्या अधर्म की ओर ले जाती है । जैसे विचार शुद्ध होंगे वैसी उन्नति होती चली जाएगी । 

आज के इस युग में किसी भी धर्म ग्रंथ में लेश्या शब्द नहीं मिलता । जैसे किसी शान्त सागर में लहरें उठती है शान्त सागर को शुद्धात्मा की उपमा दी गई है तो लहरों को लेश्या की उपमा दी गई है । लहरें उठकर वापस समुद्र में विलीन हो जाती है । लहरें असंख्य हो सकती है पर लेश्या 6 ही बतलाई गई है । लेश्या तुम्हारी विचार धारणाओं पर निर्भर है । जैसे विचार होंगे वैसी लेश्या बनती चली जाएगी । विचार शुद्ध होंगे तो लेश्या शुद्ध होंगे । विचार निम्न कोटि के होंगे तो लेश्या भी निम्न कोटि की होंगी । कर्मों का आत्मा से चिपकना लेश्या है । लेश्या शब्द लेश से बना है । लेश का मतलब चिपकाव होता है । 

प्रभु महावीर ने प्रत्येक लेश्या का रंग बतलाया है । लाल रंग उत्तेजना पैदा करता है । हरा रंग शान्ती देता है । आज के वैज्ञानिक इन रगों के आधार पर उपचार भी करते   हैं । आप बैठे हैं भीतर हिंसक विचार हैं तो कृष्ण लेश्या उस समय आपके भीतर होगी । भीतर मंगल की भावना होगी तो आप पद्म और शुक्ल लेश्या से परिपूर्ण होगे । हिंसक भावनाओं में आपका आभामण्डल काला, नीला होता है । हम इस लेश्या शब्द को समझते हुए भीतर के विचारों को स्वच्छ सुन्दर बनायें । कृष्ण, नील, कापोत ये तीन लेश्या अशुभ है । अधर्म की ओर लेकर जाने वाली है । तेजो, पद्म और शुक्ल ये तीन लेश्या शुभ है । धर्म की ओर ले जाती है । शुक्ल लेश्या शुद्ध होती है । शंख के समान सफेद होती है । आप अपने जीवन में देंखे कि मेरे भीतर कौनसी लेश्या है और उस लेश्या से उपर उठते हुए हम शुक्ल लेश्या तक पहुंचे । अपने अन्तिम लक्ष्य को प्राप्त करें ।  

आत्म: ध्यान साधना कोर्स एडवांस ाा 24 से 27 अक्टूबर, 2004 तक आवास निवास के साथ जैन स्थानक, सेक्टर 18 डी में होगा जो भाई बहिन इसमें भाग लेना चाहते हैं वे शीघ्रातिशीघ्र रजिस्टेशन करवावें ।

जीवन में रंग की महत्ता: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

अनंत उपकारी करूणा के सागर अमृत पुरूष प्रभु महावीर ने अध्यात्म का मार्ग बताया है । प्रभु ने जीवन जीने की राह बतायी है । जब व्यक्ति धर्म की राह पर चलता है, अध्यात्म के मार्ग को अपनाता है तो वह सहज ही मुक्ति को पा लेता है । प्रभु महावीर के धर्म शासन में एक अनूठा शब्द आता है लेश्या- वैज्ञानिक दृष्टि से लेश्या शब्द की सुन्दर व्याख्या मिलती है । लेश्या छः है उनमें से तीन लेश्या व्यक्ति को धर्म की ओर ले जाती है और तीन लेश्या अधर्म की ओर ले जाती है । 

तीन लेश्या संसार की ओर ले जाती है और तीन अध्यात्म की ओर, मोक्ष की ओर ले जाती है । लेश्या आत्म के साथ कर्म को जोड़ने का काम करती है और परम् शुक्ल लेश्या प्राप्त होने पर ही जीव केवल ज्ञान की प्राप्ति होती है । लेश्या से अभिप्राय है हमारे विचार, हमारे भाव और धारणाएं कल्पनाएं । विचारों के साथ ही लेश्या का जन्म होता है । छः लेश्याओं के अलग-2 रंग है । रंग का हमारे जीवन में बहुत प्रभाव पड़ता है- जैसे लाल रंग उत्तेजना पैदा करता है और हरा रंग शान्त देता है । काला रंग अशुभ विचारों का परिचायक होता है । जैसे हम पहाड़ी या जंगल आदि में जाते हैं तो दिल को शुकून मिलता है क्योंकि वहां पर हरा रंग पर्याप्त मात्रा में मिलता है । 

आज से 26 सौ वर्ष पूर्व प्रभु महावीर ने जिस बात को सिद्ध किया था उसी बात को आज के वैज्ञानिक भी सिद्ध कर चुके हैं । आज तो रंग के आधार पर ही चिकित्सा होती है जिसे कलरथैरेपी कहते है। । कहने का अभिप्राय है हमारे जीवन में लेश्या का बहुत महत्व है । लेश्या के अनुसार ही जीवन का विकास और ह्रास है । 

वैज्ञानिक दृष्टिकोण से लेश्याएं: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़ 18 अक्टूबर, 2004 विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के अन्तर्गत अपने विचार प्रकट करते हुए कहा कि- मानव जीवन की चित्तवृत्तियां अलग-2 हैं । भगवान महावीर ने जिसे लेश्या से सम्बोधित किया उसे ही महर्षि पातंजलि ने चित्तवृत्ति से सम्बोधित किया । जैसी लेश्या होगी वैसा ही कम्पन हमारे भीतर होगा । संसार का नक्शा इन छः लेश्याओं पर आधारित है । लेश्या आपके विचार, आपकी चित्त-दशा पर आधारित है । अगर हमारी चित्तदशा शुभ्र, शुद्ध, पवित्र होगी तो हम तेजो, पद्म, शुक्ल लेश्या की ओर अग्रसर होंगे । अगर हमारी चित्त दशा अशुद्ध और कलुषित विचारों से परिपूर्ण होगी तो हम कृष्ण, नील, कापोत लेश्या की ओर अग्रसर होंगे । 

जैसा विचार वैसा ही रंग हमें अच्छा लगता है । जिस व्यक्ति के शुद्ध विचार है उसे शुभ्र रंग अच्छा लगता है । आपने देखा होगा महापुरूषों का आभा-मण्डल हमेशा शुभ्र, सफेद होता है । जिनकी राक्षस वृत्ति होती है उनका आभा-मण्डल काले रंग का होता है । जो रंग आपको आकर्षित करता है उस लेश्या से आप युक्त होंगे हमारे भीतर सूक्ष्म वृत्तियां है । आप देखते हैं कि व्यक्ति बीमार हो जाते हैं और उन पर कलर चिकित्साएं करते हैं । यह प्रभु महावीर का वैज्ञानिक दृष्टिकोण ही है । 

प्रभु महावीर ने आज से 2600 वर्ष पूर्व इन रंगों के आधार पर व्यक्ति की चित्त-दशा का अवलोकन किया था । कलर चिकित्सा लेश्या का ही प्रयोग है । बौद्ध भिक्षुओं के कपड़ों का रंग पीला, सन्यासियों के कपड़ों का रंग लाल होता है । इसके पीछे भी वैज्ञानिक दृष्टिकोण है । प्रभु महावीर ने सारे आकर्षणों को छोड़ने के लिए सफेद वस्त्र का उपयोग करने की प्रेरणा दी । जो अपना नुकसान और दूसरों का भी नुकसान करता है वह कृष्ण लेश्या से युक्त होता है । जो अन्तिम समय दूसरों के लिए दुर्भावना भावित करते हैं वे भी कृष्ण लेश्या से युक्त होते हैं । कृष्ण, नील, कापोत ये तीन लेश्याएं अधर्म की है । हम अधर्म से धर्म की ओर आयें । प्राणी मात्र की मंगल कामना करें इससे विचार शुद्ध और लेश्या शुभ होगी । 

आत्म: ध्यान साधना कोर्स एडवांस ाा 24 से 27 अक्टूबर, 2004 तक आवास निवास के साथ जैन स्थानक, सेक्टर 18 डी में होगा जो भाई बहिन इसमें भाग लेना चाहते हैं वे शीघ्रातिशीघ्र रजिस्टेशन करवावें । 

 

हम कर्तव्यों का पालन करते हुए समता में आएं: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़ 19 अक्टूबर, 2004 विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के अन्तर्गत अपने विचार प्रकट करते हुए कहा कि- अरिहंत प्रभु को नमन । प्रभु महावीर की परम् कल्याणकारी वाणी का संदेश क्रान्ति से परिपूर्ण है । भगवान के समय में धर्म के नाम पर चारों ओर अत्याचार हो रहे थे, उस समय प्रभु ने प्रत्येक को सही राह  दिखाई । धर्म के रास्ते पर मोड़ा । प्रभु ने कहा केवल सिर का मुण्डन कराने से कोई श्रमण नहीं होता । उॅंकार का जप करने से कोई ब्राह्मण नहीं होता । कुशा को धारण करने से तापस नहीं होता और जंगल में रहने मात्र से मुनि नहीं होता ।

भारत की इस विशाल संस्कृति में दो संस्कृतियों का उल्लेख हमें हमेशा देखने को मिलता है । एक श्रमण संस्कृति और दूसरी ब्राह्मण संस्कृति । प्रभु महावीर और भगवान बुद्ध श्रमण संस्कृति के परिचायक हैं तो हिन्दू सन्यासी ब्राह्मण संस्कृति के उन्नायक है । ब्राह्मण संस्कृति मानती है कि ब्रह्म सत्य है, वह एक है । बाकी सारा जगत मिथ्या है । श्रमण संस्कृति ने चैबीस तीर्थंकर भगवंतों की वाणी को सत्य कहा है जिसमें भगवान ऋषभदेव से लेकर भगवान महावीर की वाणी एवं बुद्ध के त्रिपिटक सम्मिलित हैं । जो समता धारण करता है वह श्रमण है । जो ब्रह्मचर्य में रहता है वह ब्राह्मण है, जिसे ज्ञान हो गया है वह मुनि है और जो तप करता है वह तपस्वी है । श्रमण वही है जो सुख दुःख में समता रखता है, श्रम करता है, वह कोई भी हो सकता है । चाहे वह श्रावक, श्राविका, साधु, हो या साध्वी हो । आवश्यक है आवश्यक है भीतर समता होनी चाहिए और हमारा चित्त श्रम में लगा हुआ होना चाहिए । जहां हमारी समता आ जाती है वहां हम श्रमण बन जाते हैं ।

समता के लिए हमारे तीर्थंकर भगवंतों का जीवन हमारे लिए आदर्श-स्वरूप है । हम हमारे कर्तव्यों का पालन करते हुए समता में आयें तो यह जीवन स्वर्णिम बनेगा । ब्रह्मचर्य में रहने वाला ब्राह्मण होता है । ब्रह्मचर्य यानि ब्रह्म में रमण करना । परमात्मा में रमण    करना । परमात्मा की चर्या और हमारी चर्या एक जैसी बन जाये । जंगल में वास करने वाला मुनि नहीं कहलाता । जो ज्ञानी है वही मुनि है, जिसके भीतर ज्ञान उत्पन्न हुआ है वह मुनि  है । जो मन, वचन, काया से किसी की हिंसा नहीं करता । सबके लिए मंगल की भावना भावित करता है वह मुनि है । तपस्वी वही है जो तप करता है । अपनी इन्द्रियों को संकुचित करता है । ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और क्षुद्र ये कर्म से होते हैं । हमने अभी भी जाति-भेद के लिए इनका सहारा लिया है परन्तु प्रभु महावीर ने कहा कि अपने कर्म से ही व्यक्ति ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और क्षुद्र होता है । भगवान की वाणी पर हम ध्यान दें । जो ध्यान देता है उसका यहां भी मंगल होता है और आगे भी मंगल होता है । 

आत्म: ध्यान साधना कोर्स एडवांस ाा 24 से 27 अक्टूबर, 2004 तक आवास निवास के साथ जैन स्थानक, सेक्टर 18 डी में होगा जो भाई बहिन इसमें भाग लेना चाहते हैं वे शीघ्रातिशीघ्र रजिस्टेशन करवावें ।

मानव जीवन की दुर्लभता: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़ 20 अक्टूबर, 2004 विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के अन्तर्गत अपने विचार प्रकट करते हुए कहा कि- अरिहंत प्रभु की परम् कल्याणकारी वाणी का सूत्र जीव से परमात्म तत्व तक जाने के लिए सहारा है । प्रभु महावीर ने चार अंग दुर्लभ बताये जिसमें मानव जीवन दुर्लभ बताया है । 

        मानव का जीवन मिला, धर्म मिला अनमोल, 

अम श्रद्धा और यत्न से, मन की गांठें खोल । 

श्रद्धा तो जागी मगर जागे नहीं विवेक-

विवेक जागते-2 पल में होय विवेक ।

मनुष्य जन्म दुर्लभ है । क्या दुर्लभता है इसकी । तीर्थंकर प्रभु की वाणी पर हम कितनी श्रद्धा करते है । जो चीजें बड़ी दुर्लभता से मिलती है उसे हम सुलभ मान रहे हैं । एक श्वांस हीरा मोती सोने की लड़ी की तरह है जो हमारे पास है वह दिखाई नहीं देता । आपके मुख में 32 दांत है पर पता नहीं चलता । जिस दिन एक दांत टूटता है उस समय जिह्वा बार-बार उस स्थान पर जाती है । चैबीस घण्टे हृदय धड़कता है । आपको पता नहीं चलता । जब धड़कन कुछ कम तेज हो जाती है उस समय धड़कन का पता चलता है । प्रकृति ने आपके शरीर में दो-दो चीजें दी । आंख, कान, नाक, हाथ, पांव, किडनी सब कुछ दो-दो दे दिया । एक से भी काम चल सकता था परन्तु वो दो होकर भी आपको उनका पता नहीं है । 

एक-एक अंग मूल्यवान है । धन का सुख देखना है तो गरीब बनकर देखो । मानव जीवन इस धन, पद, यश में गंवा मत देना । इस दुर्लभता को अरिहंतों, तीर्थकरों ने जाना पर हम उसे नहीं जान पाये । आज तक की श्वासें हमने रोने-धाने में वासना में बहा दी । जब चीज तुम्हें मिलती है इसकी कीमत तुम्हें पता नहीं चलती । प्रभु ने चार चीजें दुर्लभ बताई- मानव जीवन, सच्ची श्रद्धा, संयम और पुरूषार्थ । हम इन चारों की दुर्लभता को जाने, पशु जीवन से मानव जीवन बहुत श्रेष्ठ है, फिर भी हम उसे पशुवत् जी रहे हैं । इस जीवन में जितना पुण्य कमा सकते हो उतना कही भी नहीं कमा सकते । एक शुद्ध सामायिक कर लो, शुद्ध ध्यान कर लो, जितना मानव जीवन का लाभ लेना चाहते हो उतना ले लो । अन्तिम समय यह पंच-तत्व का पिंजड़ा, पंचतत्व में विलीन हो जाएगा । 

आत्म: ध्यान साधना कोर्स एडवांस ाा 24 से 27 अक्टूबर, 2004 तक आवास निवास के साथ जैन स्थानक, सेक्टर 18 डी में होगा जो भाई बहिन इसमें भाग लेना चाहते हैं वे शीघ्रातिशीघ्र रजिस्टेशन करवावें । 

 

श्रुत सुनना दुर्लभ है: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़ 21 अक्टूबर, 2004 विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के अन्तर्गत अपने विचार प्रकट करते हुए कहा कि- अरिहंत प्रभु की वाणी परम् कल्याणकारी है । प्रभु महावीर ने चार अंग दुर्लभ बताये जिसमें मनुष्यत्व, सच्ची श्रद्धा, संयम और पुरूषार्थ । प्रभु ने इन अंगों को दुर्लभ बताया पर हम उसे कैसे जाने । किस प्रकार समझे कि वह दुर्लभ है । श्रुत सुनना भी दुर्लभ बताया । हम 24 घण्टों में से 18 घण्टे कुछ न कुछ सुनते ही रहते हैं । किसी न किसी धर्म ग्रन्थ, प्रभु महावीर की वाणी, बाईबिल, गुरूवाणी, त्रिपिटक, गीता आदि की परावर्तना करते ही रहते हैं और फिर कितने संत इस भारत में हैं । केवल हिन्दू सन्यासी ही एक लाख से अधिक है । इतना कुछ होते हुए भी श्रुत सुनना कैसे दुर्लभ है । 

प्रभु ने कहा- व्यक्ति सुनकर पुण्य के मार्ग को जान सकता है और सुनकर ही पाप के मार्ग को जान सकता है फिर दोनों मार्गों को जानते हुए जो श्रेयस्कर है उसे ग्रहण करो । देखी हुई बात गलत भी हो सकती है और सुनी हुई बात भी गलत हो सकती है । आपने देखा होगा हमारी आंख हमेशा एक सीध में देखती है । अगर उसे दायी ओर घुमाओ तो वह दांयी ओर देख लेती है और बायी ओर घुमाओ तो बायी ओर देख लेती है परन्तु कान तो चारों तरफ की बातों को सुनता है । आंख और कान में केवल 4 अंगुल का अन्तर है । फिर भी इन दोनों के कार्यों में बहुत बड़ा अन्तर आ जाता है । आंख केवल देखती है और कान केवल सुनते हैं ।

प्रभु का एक वचन भीतर आ जाए तो हमारा जीवन गहराई से युक्त होगा । जब भी जो कुछ भी सुनो उसे केवल सुनो । हम सुनने के साथ-2 अपने विचार उसमें लेकर आते हैं और अपने विचारों के अनुसार जो अनुकूल होता है उसे ग्रहण करते हैं । हम प्रत्येक बात को सुने । एक वाणी सुनने से केवलज्ञान तक हम पहुंच सकते हैं । एक वचन भीतर आएगा तो सारा जीवन बदल देगा । जब भी सुनो मन को अलग रखकर सुनो । अपनी धारणाओं को भीतर मत लाओ । सुनने के बाद उस पर चिन्तन, मनन करो और उसको भीतर उतारो ।  

आत्म: ध्यान साधना कोर्स एडवांस ाा 24 से 27 अक्टूबर, 2004 तक आवास निवास के साथ जैन स्थानक, सेक्टर 18 डी में होगा जो भाई बहिन इसमें भाग लेना चाहते हैं वे शीघ्रातिशीघ्र रजिस्टेशन करवावें । 

चण्डीगढ़ 22 अक्टूबर, 2004 विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के अन्तर्गत अपने विचार प्रकट करते हुए कहा कि- 

आत्म: ध्यान साधना कोर्स एडवांस ाा 24 से 27 अक्टूबर, 2004 तक आवास निवास के साथ जैन स्थानक, सेक्टर 18 डी में होगा जो भाई बहिन इसमें भाग लेना चाहते हैं वे शीघ्रातिशीघ्र रजिस्टेशन करवावें । 

 

सत्य की हमेशा जीत होती है: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़ 22 अक्टूबर, 2004 विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के अन्तर्गत अपने विचार प्रकट करते हुए कहा कि- आज का यह पावन दिवस दशहरे के नाम से जाना जाता है । बड़ी धार्मिक, ऐतिहासिक घटना हमारे सामने इस पर्व का ज्वलन्त उदाहरण है । रावण के पास सोने की लंका थी । उसने काल को वश में कर लिया था । राम के पास कुछ भी नहीं था । कहते हैं सोने की लंका दो जनों के पास थी । एक रावण के पास और दूसरी कृष्ण के पास । कृष्ण की द्वारिका नगरी भी सोने, हीरे, मोतियों से जड़ी हुई थी । राम के पास केवल धर्म था । धर्म नीति सदाचार का जीवन था । सब के जीवन में सुखी और सबके जीवन में दुःखी होने ने की कला थी । राम मर्यादा पुरूषोत्तम   थे । 

जहां धर्म है उसे ग्रहण कर लेना चाहिए । रामायण में संत तुलसीदास लिखते हैं कि राम भगवान होते हुए भी माता, पिता, गुरू का आदर करते थे । उनको नमस्कार करते थे । राम और कृष्ण दोनों के जीवन से हमें अनूठी शिक्षा मिलती है । रामायण से एक शिक्षा ले लो, नमन कर लो, पूरा शरीर झुका लो । शाष्टांग नमस्कार करने से विनय आती है । हाथ जोड़ते ही नमस्कार का पता चलता है । नमस्कार करते हुए भीतर यह भावना भावित करना कि माता पिता मेरे लिए सब कुछ है । नमस्कार करने से कितने कर्म बंधन टूटते हैं । भगवान् राम ने नमस्कार किया तभी उनके भीतर विनय, भक्ति प्रस्फुटित हुई । उन्होंने सबके लिए हितकारी सोचा इसलिए उन्हें राम कहते हैं । 

राम के द्वारा हमें यह शिक्षा मिलती है कि हमेशा सत्य की जीत होती है । राम की पूजा होती है उसके साथ । धर्म सत्य और मर्यादा की पूजा होती है । प्रभु से प्रार्थना करते समय यही भावना भावित करना प्रभु ! कष्टों को समता से सहन कर सकूं ऐसी शक्ति दे   दो । वह शक्ति जो आपके पास थी वही प्रदान करो । जब तुम्हारे जीवन में कोई संकट जाता है तो उसे अपना कर्म मानों । छोटा सा जीवन है मुस्कुराते हुए व्यतीत कर लो । 

आत्म: ध्यान साधना कोर्स एडवांस ाा 24 से 27 अक्टूबर, 2004 तक आवास निवास के साथ जैन स्थानक, सेक्टर 18 डी में होगा जो भाई बहिन इसमें भाग लेना चाहते हैं वे शीघ्रातिशीघ्र रजिस्टेशन करवावें । 

 

प्रार्थना के भावों में रमण करें: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़ 23 अक्टूबर, 2004 विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के अन्तर्गत अपने विचार प्रकट करते हुए कहा कि- जब भी आपका हृदय उस विराट् सत्ता के आगे झुक जाये । आंखे नम हो जाये । हाथ जुड़ जाये । पाचों इन्द्रियां अन्तर में समाहित हो जाये उस समय परमात्मा से क्या मांगोगे इतना कुछ करने के बाद भी हमारे भीतर मांग होती है । प्रभु ! तूने इतना कुछ दे दिया वो ही बहुत है । कोई भी कार्य किया नहीं जातना हो जाता है । 48 मिनिट की सामायिक स्वयं होती है । सामायिक धर्म की यात्रा है, अकर्म की साधना है । कुछ भी क्रिया करते वक्त स्वयं को अहंकार में मत लाना । सारी क्रिया करने के बाद भीतर का अहंकार गया नहीं तो क्रिया आपने की ही नहीं । प्रभु आज आपने कृपा कर दी । ये श्वासें दे दी । प्रभु मुझे धर्म में लगा दो ऐसे प्रार्थना के भाव भीतर लाना । 

जो शुद्ध चेतना है वह दयालु है, उसके आगे दया करने की प्रार्थना करना । दयालु आप दया करो । आप दयावान हो । जब तक प्रार्थना करूं तब तक मेरा ध्यान तुम्हारे भीतर हो, मेरे हृदय का प्याला अमृत, प्रेम, मैत्री, करूणा से भर दो । प्रभु मेरे भीतर शुद्ध भावना आ जाये । मेरे मन के मन्दिर में प्रकाश कर दो । मुझे भव तिमिर से तार दो । आचार्यश्रीजी ने श्रावक के बारह व्रतों की समझ देते हुए कहा कि क्रोध करने पर अथवा झूंठ बोलने पर शाम को प्रतिक्रमण, आलोचना कर लो । मोटे झूंठ का त्याग और छोटे झूंठ का विवेक यही श्रावक का दूसरा अणुव्रत है । जो चाहिए उतनी मर्यादा कर लो । मर्यादित जीवन जीओ । हमेशा मंगल ही होगा । 

आत्म: ध्यान साधना कोर्स एडवांस ाा 24 से 27 अक्टूबर, 2004 तक आवास निवास के साथ जैन स्थानक, सेक्टर 18 डी में होगा जो भाई बहिन इसमें भाग लेना चाहते हैं वे शीघ्रातिशीघ्र रजिस्टेशन करवावें । 

परीक्षा की सफलता पर जीवन स्वर्णिम बनता है: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़ 24 अक्टूबर, 2004 विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के अन्तर्गत अपने विचार प्रकट करते हुए कहा कि- 

भगवन तेरी शरण में, मेरी ये वंदना है  

तन से वचन से मन से, सर्वस्व अर्पणा है...... 

एक छोटी सी प्रार्थना जो आपके भीतर रम जाये । चित्त को आनंदित कर दे । आपके चित्त को सुशोभित कर दे । आप चलो तो उस प्रभु के मार्ग पर चलो । आप बोलो तो प्रभु ने जो कहा विवेक सहित बोलो । आपके भीतर के कषाय मंद से मंदतम हो जाये । बच्चे की तरह निर्मल हो जाओ । राग द्वेष रहित हो जाओ । जब बच्चा अपने स्वभाव में होता है तब वह सहज, सरल और निर्मल होता है । आप बच्चे बन जाओ । बच्चे बनोगे तो भगवान को प्राप्त कर लोगे । 

जीसस ने बाईबल में कहा कि- जो व्यक्ति बच्चे की भांति जीते हैं वे भगवान को प्राप्त करते हैं । एक बच्चा अपने बचपन को छोड़ता हुआ जब यौवन में प्रवेश करता है तब वह स्वयं से दूर होता चला जाता है । माता पिता उसे संस्कार नहीं देते, उसे स्वयं दूर करते हैं । भीतर की आंखें खोलो, अप्रमत्ता में आ जाओ । आप अपने बेटे को क्या संस्कार दे रहे हो उसे देखो । जीवन में कभी संकट आ जाये तो घबराना मत । परमात्मा ऐसी घड़ी में ही हमारी परीक्षा करता है । अगर परीक्षा में सफल हो जाओगे तो जीवन स्वर्णिम बन जाएगा । जैसे मदनरेखा परीक्षा की घड़ी में स्वयं को सफलता की ओर ले गई । 

मदनरेखा के पति के भाई के मन में बुरी भावनाएं निवास कर रही थी और वह चाह रहा था कि किसी भी तरीके से मैं मदनरेखा को अपना बनाउॅं परन्तु एक सतीत्व की परीक्षा पर मदनरेखा खरी उतरी । उसने स्वयं के जीवन को धर्ममय बनाया । पति को भी अन्तिम समय समभाव में आने का उपदेश दिया । राग द्वेष रहित होने का उपदेश दिया । शुद्ध, बुद्ध चैतन्य की ओर ध्यान देने को कहा, ऐसी पत्नियां आज के युग में बहुत कम दिखाई देती हैं । हम अपने जीवन को मदनरेखा की तरह बनायें । धर्ममय जीवन जीयें । 

आत्म: ध्यान साधना कोर्स एडवांस ाा 24 से 27 अक्टूबर, 2004 तक आवास निवास के साथ जैन स्थानक, सेक्टर 18 डी में शुरू हो गया है जिसमें भाई बहिन भाग लेकर जीवन जीने की कला का प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं । 

उपासना से वासना का अंत: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़ 25 अक्टूबर, 2004 विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के अन्तर्गत अपने विचार प्रकट करते हुए कहा कि- 

भगवन तेरी शरण में, मेरी ये वंदना है  

तन से वचन से मन से, सर्वस्व अर्पणा है...... 

सच्ची प्रार्थना, हृदय की आराधना, मन की समाधि, शुद्ध धर्म का भाव इन दो पंक्तियों में समाहित होता है । बस ये प्रार्थना जीवन का अंग संग बन जाये तो मोक्ष जरूर होगा । नमोः अरिहंताणं कहते हैं अरिहंत प्रभु की उज्ज्वलता, वीतराग-भाव भीतर आता है । नमो कहते ही अहंकार को अलग कर दो । शरीर इन्द्रियां मन बुद्धि विचार सब प्रभु के चरणों में समर्पित कर दो । अरिहंत प्रभु का जीवन वीतरागता से परिपूर्ण है । उनसे वीतराग-भाव में आने की प्रेरणा लो । तीर्थंकर प्रभु ने एक शब्द किसी को उॅंचा-नीचा नहीं कहा फिर भी उनकी निन्दा हुई । अनेक परिषह उनके जीवन में आये । सत्य का सहारा लो । एक शब्द वीतराग-वाणी का जब तुम्हारे भीतर आता है तो तुम्हारे भीतर उस वीतराग-प्रभु की विराटता आती है । भीतर का एक-एक पल वीतरागता में बिताओ । जितना सुख वीतरागता में है उतना राग मे ंनहीं । 

सच्ची उपासना तभी होगी जब वासना का अंत आएगा । अरिहंत प्रभु अनंतज्ञान, अनंत दर्शन, मंगलमैत्री के धरता है । भीतर ऐसी भावना भावित करो हे प्रभो ! हर श्वांस में तुम्हारी महिमा का गुणगान हो । तुम्हें मैं वन्दन कर सकूं ऐसी शक्ति दो । मन, वचन, काया को अलग रखते हुए शुद्ध स्वरूप में आ जाओ । जब जीवन में आनंद धर्म शान्ती आती है तो जीवन आनंदित होता है । धर्म जीवन में आ गया तो समता भीतर आ जाती है । जीवन में जो सत्य, शाश्वत् है उसे स्वीकार करो । अपने शुद्ध स्वरूप में आने का यत्न करो । प्रभु का ध्येय हमारा ध्येय बने यही हार्दिक मंगल कामना । 

आत्म: ध्यान साधना कोर्स एडवांस ाा 24 से 27 अक्टूबर, 2004 तक आवास निवास के साथ जैन स्थानक, सेक्टर 18 डी में शुरू हो गया है जिसमें भाई बहिन भाग लेकर जीवन जीने की कला का प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं । 

 

भगवान की भक्ति पर श्रद्धा करो: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़ 26 अक्टूबर, 2004 विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के अन्तर्गत अपने विचार प्रकट करते हुए कहा कि- प्रभु की प्रार्थना अपने इष्टदेव गुरू के चरणो में जब हम करते हैं । झुकते हैं उस समय हम स्वयं को खाली मत समझें । प्रभु के चरणों में झुकने से अनंत सुख की रश्मियां हमारे शरीर में प्रवेश करती  हैं । हम मानसरोवर में बैठकर मोती प्राप्त कर सकते हैं परन्तु हमें कीचड़ में रहने की आदत हो गई  है । कीचड़ में भी रहते हुए हम अलिप्त जीवन जीयें । प्रभु के चरणों में झुकोगे तो तुम्हारी शान बढ़ जाएगी इसीलिए कहा है कि श्रद्धा तीन पर करो । 

भगवान की भक्ति पर श्रद्धा करना, आत्मा की शक्ति पर श्रद्धा करना और स्वयं के शुद्ध आचरण पर श्रद्धा करना । कुछ कार्य करने के पश्चात् स्वयं की प्रशंसा के भाव मत रखना । भगवान की भक्ति करने पर अनुभव करना कि प्रभु आज मुझे तुम्हारी भक्ति करने का सुअवसर मिला । प्रभु मुझे अपने चरणों में ले लो । इससे बड़ी कोई नौकरी नहीं हो सकती । निःस्वार्थ भाव से जब सेवा करते हो तो मालिक की नौकरी से बड़ा काम हो जाता है । जितना तुम सेवा करोगे उतना समृद्धशाली हो जाओगे । 

अपनी आत्मा की शक्ति पर भरोसा रखना । आत्मिक बल पर ही यह जीवन चल रहा है । अगर स्वयं की आत्मा की शक्ति पर हमने भरोसा नहीं रखा तो कल हमें स्वयं पर भी भरोसा नहीं होगा । आत्मा में अनंत शक्ति विद्यमान है, आवश्यकता है आवरण हटाने की । स्वयं को दीन हीन मत मानना । शुद्ध आचरण्ं आ जाना । प्रभु चरणों में समर्पित हो जाना । सत्गुरू आत्म-ज्ञानी पुरूष के चरणों में समाहित हो जाना । कोई किसी को सुख दुःख नहीं देता यह तो स्वयं का ही कर्मफल है । हम परमात्मा की भक्ति, आत्मा की शक्ति और स्वयं के शुद्ध आचरण पर श्रद्धा रखें । श्रद्धा से ही विवेक जागृत होता है । शुद्ध आचरण करने से जीवन भी शुद्ध बनेगा । 

आत्म: ध्यान साधना कोर्स ‘बेसिक’ 31 अक्टूबर से 4 नवम्बर, 2004 तक श्री जैन स्थानक, सेक्टर 18 डी में होगा जो भाई बहिन इसमें भाग लेना चाहते हैं वे शीघ्रातिशीघ्र रजिस्टेशन करवावें । 

अध्यात्म का पहला चरण है प्रार्थना: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़ 27 अक्टूबर, 2004 विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के अन्तर्गत अपने विचार प्रकट करते हुए कहा कि- प्रभु की शक्ति पर, प्रभु की भक्ति पर, आत्मा की शक्ति पर और शुद्ध आचरण पर श्रद्धा रखना । श्रद्धा हमें कर्म मेल से दूर करती है । भगवान की जब प्रार्थना, वंदन, गुणगान करते है ंउस समय कोई मिलावट नहीं होनी चाहिए । दूध में पानी मिलाओगे तो उतनी शक्ति प्राप्त नहीं होगी जितनी दूध में विद्यमान है, उसी प्रकार भगवान के सामने जब प्रार्थना करते हो उस समय स्वयं की आवश्यकताओं या कमजोरियों को उनके चरणों में समर्पित कर दो परन्तु उनसे कोई मांग मत रखो । 

अध्यात्म का पहला चरण है प्रार्थना । प्रार्थना का अर्थ है विराट् सत्ता के आगे झुक जाना । प्रभु चरणों में सर्वात्मना समर्पित होना । श्रद्धा है तो आप कुछ भी करते हैं । व्यक्ति के गुणों का गुणगान करते हैं तो श्रद्धा और निर्मल हो जाती है । श्रद्धा में जरा सा संदेह आ गया तो वह पूर्णता की ओर नहीं जाएगी । नाम, पद, यश जीवन को चलाने के लिए है, जीवन के नहीं है । नाम के पीछे आज हम दौड़े जा रहे हैं । नाम को नहीं शुद्ध चेतना को महत्व दो । शुद्धाचरण में जीने का भाव रखो । स्वयं के चित्त में जो कषाय आ रहे हैं उन्हें निकाल दो । मन पर संदेह करो, आत्मा पर श्रद्धा करो, परन्तु हम विपरीत करते हैं । हम मन पर श्रद्धा करते हैं और आत्मा पर संदेह करते हैं । 

जिस समय भीतर ध्यान, सामायिक, प्रार्थना के भाव आ जाये उस समय ध्यान, प्रार्थना, सामायिक कर लेना । संदेह डावोडोल-चित्त एवं कांपती हुई चित्तदशा से होता है । श्रद्धा का मतलब एक स्वर, अखंण्डित चित्त, मन, वचन काया से कार्य को पूर्ण करना है । जब अखण्डित चित्त से कार्य करोगे तो श्रद्धा आएगी । संदेह का प्रतिफलन होता है । कुछ भी कार्य करने से पूर्व अनुशीलन करो, परीक्षण करो परन्तु करने के बाद उस पर सोचना मत । प्रभु की भक्ति करना, श्रद्धा में कोई भूल हो गई तो प्रभु के समक्ष अपनी आलोचना रखकर शुद्ध हो जाना । 

दिनांक 28 से 30 अक्टूबर, 2004 तक विशेष सत्संग जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज एवं आत्म ज्ञानी पुरूष श्री कन्नू दादा जी का ‘शिवाचार्य सत्संग समारोह’, सेक्टर 18 डी में होगा । आप सभी लाभ लेकर अपने जीवन को सफल बनायें । आत्म: ध्यान साधना कोर्स ‘बेसिक’ 31 अक्टूबर से 4 नवम्बर, 2004 तक श्री जैन स्थानक, सेक्टर 18 डी में होगा जो भाई बहिन इसमें भाग लेना चाहते हैं वे शीघ्रातिशीघ्र रजिस्टेशन करवावें । 

ज्ञानी पुरूष के पास बैठने से गहन शान्ति प्राप्त होती है

 

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़ 28 अक्टूबर, 2004 विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के अन्तर्गत अपने विचार प्रकट करते हुए कहा कि- प्रभु महावीर का एक सूत्र ‘जीवो मंगलम्’ प्रत्येक प्राणी मंगल स्वरूप है । हम उस मंगल-भाव में रमण करें । चित्त निर्मल, शुद्ध है तो उसे ज्ञान प्राप्त होगा । ज्ञानी पुरूष के पास बैठने से गहन शान्ति प्राप्त होती है । राजमार्ग की साधना खाते-पीते मोक्ष प्राप्त करना हो तो स्वयं को सहजभाव में आना पड़ेगा । मोक्ष सहज है उसे प्राप्त करने के लिए प्रयत्न नहीं करना पड़ता । हमें शुद्ध दशा में जाना है, प्रभु महावीर का जो मार्ग है वह हमें शुद्ध दशा तक पहुंचाता है । जितना शुद्ध दशा में ध्यान आएगा उतनी वीतरागता आएगी । 

ऋषि कौन है । जो स्वयं का सब कुछ जन-जन के लिए अर्पित करता है । जो देता ही देता रहता है, लेने की भावना नहीं रखता । वृक्ष को भी ऋषि की उपमा दी गई है । वृक्ष हमेशा देता रहता है । वह अपने लिए कुछ नहीं रखता- पत्ता, फल, फूल सब दे देता है । मानव के पास धन, पद, प्रतिष्ठा सब कुछ है परन्तु वह उन पर अहंकार करता है इसलिए कुछ दे नहीं पाता । वृक्ष अपना पत्ता-2 जन-जन को बांटता है । वृक्ष पर फल आते ही वह झुक जाता है । वृक्ष अकाल निर्झरा करते हैं । वनस्पतिकाय में ऐसे जीव हैं जो मनुष्य गति में जन्म लेकर मोक्ष प्राप्त करेंगे । हम भी वृक्षों की भांति बनें । यह शरीर राग द्वेष से उपर उठने के लिए है । देह मन्दिर है । तपोवन है हमारा अन्तःस्थल । मूल में हम आर्य हैं परन्तु हमें मालूम ही नहीं । शरीर में आत्मा से परमात्मा का योग उपयोग लगायें । परोपकार करें । 

आज के इस पावन प्रसंग पर अक्रम विज्ञान के प्रणेता श्री कन्नूदादाजी का आचार्यश्रीजी से मिलन हुआ । उन्होंने अपनी वाणी में कहा कि- हम इस शरीर में रहते हुए उस वीतराग-भाव को प्राप्त कर सकते हैं । उसे प्राप्त करने के लिए भेद-विज्ञान आवश्यक  है । भेद-विज्ञान करने के लिए पूज्य दादा भगवान के द्वारा एक ज्ञानविधि का प्रयोग करवाया जाता है जो स्वयं का भेद विज्ञान करना चाहते हैं वे इस ज्ञान-विधि में भाग लेकर आत्मा और शरीर की भेदता का ज्ञान कर सकते हैं । पूज्य कन्नूदादा जी शरीर और आत्मा का भेद-विज्ञान करने के लिए ज्ञान-विधि का कार्यक्रम करवाते हैं जो 29 अप्रेल, 2004 को दोपहर 1.30 से 4.30 बजे तक होगा । 

दिनांक 28 से 31 अक्टूबर, 2004 तक विशेष सत्संग जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज एवं आत्म ज्ञानी पुरूष श्री कन्नू दादा जी का ‘शिवाचार्य सत्संग समारोह’, सेक्टर 18 डी में होगा । आप सभी लाभ लेकर अपने जीवन को सफल बनायें । आत्म: ध्यान साधना कोर्स ‘बेसिक’ 31 अक्टूबर से 4 नवम्बर, 2004 तक श्री जैन स्थानक, सेक्टर 18 डी में होगा जो भाई बहिन इसमें भाग लेना चाहते हैं वे शीघ्रातिशीघ्र रजिस्टेशन करवावें । 

जो सहज पकता है वह मीठा होता है: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़ 29 अक्टूबर, 2004 विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के अन्तर्गत अपने विचार प्रकट करते हुए कहा कि- अनंत उपकारी, विश्व वंदनीय क्षमा श्रमण प्रभु महावीर की वाणी, उनका ज्ञान, शुद्ध दर्शन जीव को परमात्मा तक पहुंचाता   है । इस आत्म दर्शन को हम किस प्रकार भीतर ग्रहण करें । धर्म-दर्शन-ज्ञान सहज है । उसके प्रति जागरूकता चाहिए । जहां जागरूकता है वहां संवर, निर्जरा, आत्म मार्ग है । भीतर निर्मल ज्ञान कैसे आयें । ज्ञान हमारा स्वभाव है । हम स्वयं ज्ञान है परन्तु फिर भी हम भटक रहे हैं । जब आत्म-ज्ञान भीतर आता है तब कंचन और माटी एक सी प्रतीत होती है । प्रभु ने स्वयं के शुद्ध स्वरूप को देखते हुए शुद्धात्म-भाव में रमण किया । 

एक आत्म-भाव शाश्वत् है । वह ज्ञान दर्शन से युक्त है, बाकी सब बाहर के संयोग  है । तुमने मृत्यु को प्राप्त करके कहां जाना है यह तुम्हें पता नहीं । जन्म मृत्यु का संसार अनादिकाल से चला आ रहा है । कल्पवृक्ष तुम्हारे पास आया पर तुमने कुछ प्राप्त नहीं   किया । मुमुक्षा का भाव भीतर रखना । जिज्ञासा को मुमुक्षा तक ले जाओ । स्वयं को अरिहंत के मार्ग पर अग्रसर करते रहना । जीवन में सहजता को लेकर आओ । जो सहज पकता है वह मीठा होता है । हमने जीवन के शुद्ध स्वरूप को महत्व नहीं दिया और पैकिंग को महत्व दे रहे हैं जिससे राग टूट जाये, जिससे श्रेय की प्राप्ति हो, जिससे राग विमुख हो जाये उसे हम ज्ञान कहते हैं । हम उस परम् आनंद, परम ज्ञान को प्राप्त करें यही हार्दिक मंगल  कामना । 

इस अवसर पर अक्रम विज्ञान के प्रणेता श्री कन्नूदादा जी ने कहा कि- ज्ञानी की आज्ञा का आराधक जीवन के लक्ष्य को प्राप्त कर लेता है । शुद्धात्म भाव में रमण करने वाला साधक शुद्ध हो जाता है । हम ज्ञानी की आज्ञा की आराधना करने के लिए ज्ञान-दीक्षा का प्रयोग करवाते हैं । वह प्रयोग आज दोपहर में 1.00 से 4.00 बजे तक करवाया गया । 

दिनांक 28 से 31 अक्टूबर, 2004 तक विशेष सत्संग जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज एवं आत्म ज्ञानी पुरूष श्री कन्नू दादा जी का ‘शिवाचार्य सत्संग समारोह’, सेक्टर 18 डी,, चण्डीगढ़ में हो रहा है । आप सभी लाभ लेकर अपने जीवन को सफल बनायें । आत्म: ध्यान साधना कोर्स ‘बेसिक’ 31 अक्टूबर से 4 नवम्बर, 2004 तक श्री जैन स्थानक, सेक्टर 18 डी में होगा जो भाई बहिन इसमें भाग लेना चाहते हैं वे शीघ्रातिशीघ्र रजिस्टेशन करवावें । 

 

जीवन का सार ज्ञान में आ जाता है: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़ 30 अक्टूबर, 2004 विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के अन्तर्गत अपने विचार प्रकट करते हुए कहा कि- निश्चय दृष्टि से आप शुद्धात्म भाव नहीं है जो त्रिमंत्र आपने कल कन्नूदादाजी के सान्निध्य में उच्चारण किया वह भी शुद्धात्म दृष्टि से इस अकर्म की साधना में आपको केवल दृष्टि बदलनी पड़ती है । आंखे वही है परन्तु जब मां के सामने पत्नी के सामने, अपने बेटे, या गुय के सामने हमारी आंखे जाती है तो हर समय हमारी दृष्टि परिवर्तित होती है । आत्मदृष्टि महत्वपूर्ण है ।किसी ने तुम्हें अपशब्द कहे, गाली दी तो तुम मुस्कुराओ । अगर तुम मुस्कुराओगे तो गाली तुम्हें नहीं लगेगी । 

आत्म-ज्ञानी पुरूष हमेशा आत्म-दृष्टि में रमण करते हैं । जीवन का सार ज्ञान में आ जाता है । जो बीज बोवोगे वैसा फल मिलेगा । सिमन्धर स्वामी हमारे साक्षात् तीर्थंकर हैं । वे महाविदेह क्षेत्र में विराजमान हैं । उनको अपने समक्ष धारण करके प्रार्थना करें  । प्रभु ! वह दिन धन्य होगा जब मैं आपके प्रत्यक्ष दर्शन करूंगा । आपकी वाणी प्रत्यक्ष में सुन पाउॅंगा । आप जहां पर विराजमान हैं उस महाविदेह क्षेत्र को मै ंनमन करता हूॅं । आप जिस अशोक वृक्ष के नीचे विराजमान हैं उस पत्ते-2 को नमन करता हूॅं । अपने जीवन को आपके चरणों में समर्पित कर सकूं ऐसी शक्ति दे दो प्रभु । जब किसी को नमस्कार करो तो भीतर शुद्धात्म का भाव रखो । 

इस अवसर पर श्री कन्नू दादाजी ने अपने विचार अभिव्यक्त करते हुए कहा कि- निश्चय दृष्टि और व्यवहार-दृष्टि बहुत ही सुन्दर है । अगर हम इन दोनों का यथावत पालन करते हैं तो मोक्ष दूर नहीं । समभाव में रहते हुए अपने निकाचित कर्मों को क्षय करो । शुद्धात्मा भाव में रमण करते हुए स्वयं को प्रतिपल शुद्धात्म स्वरूप देखो, यही हमारे जीवन का सार है ।

दिनांक 28 से 31 अक्टूबर, 2004 तक विशेष सत्संग जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज एवं आत्म ज्ञानी पुरूष श्री कन्नू दादा जी का ‘शिवाचार्य सत्संग समारोह’, सेक्टर 18 डी, चण्डीगढ़ में हो रहा है । आप सभी लाभ लेकर अपने जीवन को सफल बनायें । आत्म: ध्यान साधना कोर्स ‘बेसिक’ 31 अक्टूबर से 4 नवम्बर, 2004 तक श्री जैन स्थानक, सेक्टर 18 डी में होगा जो भाई बहिन इसमें भाग लेना चाहते हैं वे शीघ्रातिशीघ्र रजिस्टेशन करवावें । 

अपने चित्त को दर्पण की भांति बनाओ: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़ 31 अक्टूबर, 2004 विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के अन्तर्गत अपने विचार प्रकट करते हुए कहा कि- शिवोहम् शिवोहम् शिवस्वरूपोहम्’ यह एक छोटी सी प्रार्थना हमारे शुद्धात्मा के प्रति भाव संदेश लेकर आती है कि मैं शिव हूॅं, शिव स्वरूप हूॅं, ब्रह्म हूॅं, नित्य हूॅं, शुद्ध हूॅं, बुद्ध हूॅं । प्रतिपल प्रतिक्षण जब-2 आपको स्मरण आता है तब स्वयं को ऐसा अनुभूत करो कि हम शुद्ध है । दर्पण पर धूल लग जाए तो हम कहते हैं कि दर्पण साफ करना है, परन्तु वास्तव में दर्पण तो साफ है ही, आवश्यकता है केवल धूल हटाने की । 

हमारा चित्त दो प्रकार का है । एक दर्पण की भांति और दूसरा फोटोग्राफी की भांति । जैसे चित्र फोटोग्राफी में डाल दिया वैसा ही बनकर आएगा । फोटोग्राफी की धुलाई करो तो वह भी वैसी ही रहेगी जैसी हमने फोटो खींची है, दर्पण को साफ करोगे तो दर्पण सुन्दर और स्वच्छ हो जाएगा । हम दर्पण की तरह रहे, देह को मन्दिर बनायें, अन्तःस्थल को तपोवन बनाये । दर्पण की भांति हमारे चित्त को बनाओ । दर्पण को जैसा दिखाओगे वैसा ही हमें दिखाई देगा । अगर दर्पण के सामने तुम हसोगे तो हसमुख चेहरा दिखाई देगा, रोओगे तो रोता हुआ चेहरा दिखाई देगा । दृष्टि बदलती है, व्यवहार दृष्टि और निश्चय दृष्टि, आत्म-दृष्टि और कर्मदृष्टि । व्यवहार से निश्चय में आ जाओ । कर्मदृष्टि से आत्म-दृष्टि की ओर मुड़ जाओ । आप जो व्यवहार कर रहे हो वह करोगे परन्तु व्यवहार से करोगे, निश्चय में तो केवल आप शुद्धात्मा हो । ऐसी दृष्टि भीतर आ गई तो सारी सृष्टि भी बदल जाएगी । सत्संग करो जिससे जीवन निर्मल बनता है । स्वयं को सोभाग्यशाली समझो कि हमें अक्रम विज्ञान की शिक्षा मिली है । सबके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करो ।

इस अवसर पर श्री कन्नूदादाजी ने प्रश्नोत्तर शैली में प्रत्येक व्यक्ति की शंकाओं को दूर करते हुए प्रतिक्रमण करने की प्रेरणा दी । प्रतिक्रमण से जीवन में आमूल-चूल परिवर्तन आता है । उन्होंने कहा ब्रह्म मुहूर्त में जो भी कार्य होता है वह सफल होता है । ब्रह्म मुहूर्त हमेशा चतुर्थ आरे के काल के समान होता है, जहां पर सर्वत्र शान्ति, सुख और आनंद होता  है । हम ब्रह्म मुहूर्त में परमात्म नाम का स्मरण करें । 

आत्म: ध्यान साधना कोर्स ‘बेसिक’ 31 अक्टूबर से 4 नवम्बर, 2004 तक श्री जैन स्थानक, सेक्टर 18 डी में होगा जो भाई बहिन इसमें भाग लेना चाहते हैं वे शीघ्रातिशीघ्र रजिस्टेशन करवावें । 

जो बांटकर खाता है वह इन्सान है: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़ 1 नवम्बर, 2004 विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के अन्तर्गत अपने विचार प्रकट करते हुए कहा कि-

किसी के काम जो आये उसे इन्सान कहते हैं,

बांटकर के जो खाये उसे इन्सान कहते हैं ।

नानक की वाणी में तीन बातें आती है जिसमें कीर्तन करो, नाम जपो और बांटकर खाओ । कीर्तन करना यानि शुभ कार्य करना । ऐसा व्यवहार मत करो जिससे दूसरे का दुःख होता हो, इसलिए प्रभु महावीर ने श्रावक को पन्द्रह कर्मदान का त्याग करवाया । भट्टा लगाना, कोयलों का व्यापार करना- जिसमें अधिक हिंसा होती हो ऐसे व्यापार करना । हाथी दात अथवा लाख के व्यापार करना । यह श्रावक के लिएउचित नहीं है । भगवान् ऋषभदेव जब प्रथम राजा थे तब उन्होंने तीन विद्या जन-जन को बतलाई जिसमें असी- शस्त्रादि बनाना, मसि- लेखन के लिए आवश्यक वस्तुएं बनवाना और कृषि- यानि खेती का व्यापार करना । जिस कार्य में बहुत लाभ और थोड़ा नुकसान होता हो वह कार्य कर सकते हैं परन्तु जिसमें थोड़ा लाभ और बहुत नुकसान हो ऐसा कार्य नहीं करना चाहिए । आस पास के व्यक्ति को पोषण मिले ऐसा कार्य करना चाहिए । 

नाम जपना यानि प्रभु स्मरण करना । प्रभु के स्मरण में स्वयं को लीन कर देना । जब अहंकार, क्रोध आये तब तुम उससे दूर होने के लिए नाम जपो । नाम स्मरण से चित्त शान्त होता है । बार-बार स्मरण से निषेधात्मक शक्ति दूर होती है । उॅकार उच्चारण में शुद्धता और अनेक  बीमारियां दूर होती है । 21 बार उॅंकार का उच्चारण प्रातःकाल करें । भीतर प्रार्थना ध्यान सामायिक का दीया जलाओ तो लौ परमात्मा से लग जाएगी । 

भोजन ग्रहण करते समय प्रभु का प्रसाद समझकर ग्रहण करो । जो भी आपको मिला है उसे बांटकर खाओ । भोजन करते हुए प्रार्थना करो कि कोई भूखा व्यक्ति भोजन करें और फिर में भोजन करूं । अतिथि सत्कार की भावना रखो । यदि तुम अकेले खाओगे तो पशु समान कहलाओगे और बांटकर खाओगे तो इन्सान कहलाओगे । तुम जन-जन की सहायता के लिए कार्य करोगे तो ईश्वर समान हो जाओगे । अगर कुछ न मिले तो संतोष कर लो । केवल रोटी को ही बांटने के लिए नहीं कहा । स्वयं की साधना, ज्ञान, शान्ति, समता, मंगलमैत्री बांटों । प्रत्येक के लिए मंगल की कामना करो तो जीवन मंगलमय बन जाएगा ।   

प्रभु भक्ति से संसार पार होता है: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़ 2 नवम्बर, 2004 विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के अन्तर्गत अपने विचार प्रकट करते हुए कहा कि- अरिहंत प्रभु की वीतरागवाणी जो सदैव हमारे जीवन में आनंद, सुख, शान्ति प्रदान करती है । जीव इस संसार सागर को छोटा कर लेता है । जिनवचनों में अनुरक्ति आ जाये । जिनवचनों में आपके भाव जुड़ जाये तो यह संसार छोटा हो जाता है । अच्छा कार्य करोगे तो जिन-वचनों में अनुरक्ति आ   जाएगी । जैन दर्शन का सारा सार भावों पर आधारित है । हमारे भीतर किस प्रकार के भाव हैं हम उस पर स्वयं को लेकर जायें । 

परमात्मा तुम्हारे भावों को देखता है । प्रार्थना क्या करते हो ? कैसी करते हो ? किस प्रकार करते हो यह आवश्यक नहीं है । लम्बी करते हो या छोटी करते हो यह भी आवश्यक नहीं है । आवश्यकता है तुम्हारे भाव किस प्रकार के हैं । प्रभु ने वीतरागता प्राप्त कर ली । हमें भी वीतरागता मिलें ऐसी प्रार्थना करो । जो अहंकार करेगा वह धर्म की आराधना का अधिकारी नहीं बन सकता । कोई सीधा सा व्यक्ति कुछ धर्माराधना नहीं करता परन्तु प्रभु भक्ति करता है तो वह संसार सागर से पार हो जाता है । 

माता को हमने धरती की उपमा दी है क्योंकि वह धरती के समान विशाल हृदय वाली होती है । प्रत्येक बात को भीतर समाहित कर लेती है । जिस प्रकार संसार का जितना भी कूड़ा करकट है धरती में समाहित हो जाता है उसी प्रकार माता सभी बातों को अपने भीतर समाहित कर लेती है । पिता आकाश के समान स्वच्छ और विशाल हृदय वाला होता है इसलिए वह प्रत्येक बात को विशालता से सोचता है । माता अपने बच्चों को धर्म के संस्कार दें, अच्छे संस्कार दें । सुबह उठते ही अरिहंत प्रभु को नमन करो, उनकी शरण में जाओ, नवकार मंत्र का स्मरण करो । माता पिता को नमन करो और संकल्प करो कि आज का दिन धर्ममय बीते । रात को सोने से पूर्व 10 मिनिट दिन के सभी कार्यों को आंखें बंद करके देखों, कहां हमने गलती कर दी, कहां हमने किसी का दिल दुखाया । उस बात को याद करते हुए क्षमा याचना करो । तुम स्वयं का निर्णय स्वयं करो । कोई अच्छा कार्य करो तो भीतर भाव रखना कि आज मुझे अवश्य मिल गया धर्म से जुड़ने का । 

हमारा लक्ष्य सिद्ध पद प्राप्त करना है: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़ 3 नवम्बर, 2004 विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के अन्तर्गत अपने विचार प्रकट करते हुए कहा कि- 

मेरे सतगुरू मुझको देना सहारा, कहीं छूट जाये न दामन तुम्हारा । 

सत्गुरू की शरण इसलिए कि सद्गुरू हमें संसार के कीचड़ से उभारकर कमल की तरह निर्लेप बनाता है । सत्गुरू एक ऐसी कसौटी है जो आपको कर्म-बंधन से मुक्त करने के लिए अरिहंत की शरण में जाना सिखाते हैं । अरिहंत की शरण में किस प्रकार जाना चाहिए यह सिखाते हैं । हमारा लक्ष्य सिद्ध पद प्राप्त करना है । मानव की देह दुर्लभता से मिलती है और इसी देह से हम मुक्ति प्राप्त कर सकते हैं । धर्म, ध्यान और साधना भी इस मानव भव में ही हो सकती है । अनेकों लोग है जो जन्म लेते हैं, संसार व्यतीत करते हैं और चले जाते हैं परन्तु कुछ पुरूष ऐसे होते हैं जो अपने जीवन को जीते हुए अनेक शिक्षाएं हमारे लिए छोड़कर जाते हैं उन्हें महापुरूष कहा जाता है । 

महापुरूष हमेशा स्मरणीय होते हैं । अरिहंत भगवन्, तीर्थंकर हमारे आदर्श रूप हैं । संसार में हम किस प्रकार जीयें । संसार से पार होने के लिए सरल मार्ग है जिनवचनों में अनुरक्त होना । अनुरक्त किस प्रकार होना चाहिए इस विषय पर प्रभु फरमाते हैं कि जिस प्रकार हमारी देह में हड्डी, मज्जा, मांस, रक्त है उसी प्रकार जिनवचनों में अनुरक्त हो   जाओ । इतने घुल जाओ कि तुम्हारी धड़कन में जिन-वचन बैठ जायें । 

ज्ञानी पुरूष कहते हैं कि यह संसार एक माया है । हम उस माया में बंधते चले जा रहे हैं । उत्तराध्ययन सूत्र का एक-एक शब्द भीतर आ जाये तो जीवन स्वर्णिम बन जाएगा । हम उन जिन-वचनों में अनुरक्त हो जाएंगें । जिन-वचनों में जुड़ना यानि उस पर श्रद्धा रखना । धर्म का मूल है विनय । जीवन जीना है तो इस विनय-रूपी सूत्र को जीवन में उतार लो । परम् विनय करो जिस प्रकार वृक्ष एक व्यक्ति को सब कुछ दे देता है- अपने फल, फूल, पत्त्ेा, टहनियां, जड़ सारा शरीर उसे दे देता है फिर भी मानव उसके प्रति विनय नहीं करता । वृक्षों पर फल आएंगे तो वे स्वतः झुक जाएंगें । 

मानव के पास कुछ आ जाए तो वह अकड़कर खड़ा हो जाता है । अहंकार में आ जाता है । इंसान इस प्रकृति से सब कुछ लेता है फिर भी कृतज्ञता ज्ञापित नहीं करता । हम कृतज्ञता ज्ञापित करे जिस मां ने हमें जन्म दिया, पिता ने जीवन दिया, गुरू ने धर्म मार्ग पर चलना सिखाया । सबके प्रति हम कृतज्ञता ज्ञापित करें । इस जीवन के सार को ग्रहण करें । 

आचार्यश्रीजी का 10 से 12 नवम्बर, 2004 तक मौन रहेगा । दर्शनार्थी बन्धु आचार्यश्रीजी की साधना में सहयोग देवें । 13 नवम्बर, 2004 को नव वर्ष का मंगल पाठ आचार्यश्रीजी प्रदान करेंगे । 

चुनौतियों से भरा जीवन गरिमापूर्ण होता है: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़ 4 नवम्बर, 2004 विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के अन्तर्गत अपने विचार प्रकट करते हुए कहा कि- भारत के ऋषियों मुनियों, अध्यात्म पुरूषों ने मानव को गरिमा दी, महिमा दी । उसे अजर अमर निरागी निर्विकारी  बनाया, फिर भी वह संसार के बंधन में बंधता चला गया । अध्यात्म पुरूषों से हमें एक नया संदेश, एक नवीन जागृति, एक अदम्य साहस मिलता है । मानव अपने स्तर पर खोज करता रहता है । आज के वैज्ञानिकों ने कितनी लम्बी खोज कर ली । परमाणु बम्ब तक आज का मानव पहुंच गया फिर भी वह स्वयं से दूर है । स्वयं की खोज अभी उसकी शुरू ही नहीं  हुई । 

बच्चा जन्म लेते ही अपनी खोज शुरू करता है । बचपन से ही उसका जीवन एक चुनौती भरा जीवन होता है । जीवन में जितनी चुनौतियां होंगी उतनी ही गरिमा होगी । तुम अपने जीवन को देखो । हम चुनौतियों से पीछे हट जाते हैं । छोटी सी बीमारी ही क्यों न हो हम उससे घबरा जाते हैं । मानव को अधिक बीमारियां रीढ़ की हड्डी के कारण होती है । उसकी रीड की हड्डी में पूरी तरह से प्रकाश नहीं मिल पाता । ऊर्जा नहीं मिल पाती इसलिए वह बीमार होता चला जा रहा है । अगर हमारी रीढ़ की हड्डी आकश की तरफ होती है और हम पशुओं की तरह चार पैर से चलें तो हम बीमारियों से दूर हो सकते हैं । बच्चा जन्म होते ही पेट के बल लेटना चाहता है परन्तु मां उसे पीठ के बल लेटाए रखती है इसलिए उसका विकास शीघ्र नहीं हो पाता । वह अपनी उन्नति नहीं कर पाता । 

बच्चों को अच्छे संस्कार दो । बच्चों को यह सिखाओ कि तुम महान् हो । तुम इस भारत देश के शास्त्री, पटेल, गांधी, आचार्य आत्माराम बन सकते हो । अपने घर में महापुरूषों के चित्र लगाओं और उनकी शिक्षाओं को बच्चों को सुनाया करो । जैसे संस्कार आप अपने बच्चों को दोगे उसी तरह बच्चे आगे बढ़ेंगे । अपने बच्चों को देश भक्ति के संस्कार दो । माता ने गजसुकुमाल को शिक्षा दी थी कि बेटा तुम वापस अपनी कोई माता मत बनाना । इस माता ने जितने कष्ट सहे है उन कष्टों को समय-समय पर स्मरण करते हुए मोक्ष मार्ग पर आगे बढ़े चले जाना । हमें यह संसार सच लगता है परन्तु यह सब संयोग है । सारा परिवार एक सपना है । भीतर विचार रखना कि मैं शुद्ध हूॅं, बुद्ध हूॅं आनंद स्वरूप हूॅं । मुझे अग्नि जला नहीं सकती, वायु बहा नहीं सकती, पानी गला नहीं सकता । ऐसा मैं अजर अमर हूॅं । 

आचार्यश्रीजी का 10 से 12 नवम्बर, 2004 तक मौन रहेगा । दर्शनार्थी बन्धु आचार्यश्रीजी की साधना में सहयोग देवें । 13 नवम्बर, 2004 को नव वर्ष का मंगल पाठ आचार्यश्रीजी प्रदान करेंगे । 

राग मुक्ति में बाधक है: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़ 5 नवम्बर, 2004 विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के अन्तर्गत अपने विचार प्रकट करते हुए कहा कि- जब आप किसी सद्गुरू के सान्निध्य में आ जाते हैं, उनकी वाणी, आशीर्वाद आपके दुःख को दूर करता है । आप सद्गुरू के पास जाओगे तो पीड़ा, दुःख बेचेनी दूर होती है । सिर झुक जाता है । आप समर्पण में आ जाते हैं । संसार में जो श्रेष्ठ और मूल्यवान है वह किया नहीं जाता हो जाता है । जैसे- ध्यान किया नहीं जाता हो जाता है । समर्पण किया नहीं जाता हो जाता है । कुछ लोग छोटी-2 बातों में उलझ जाते हैं । हम उलझन से बाहर निकलें, ज्ञानमय हो जायें । 

गुरू जो ज्ञान देता है उससे आपका जीवन बदलता है । ज्ञान एक सूरज है वह आपको प्रकाशित कर देता है । ज्ञान पोथी पुस्तको में नहीं वह हमारे भीतर है । जब तक सद्गुरू विराजमान हैं उनसे प्रत्यक्ष में ज्ञान ले लो । समय अनमोल है यह तो जाता ही रहता है । जिनशासन में ज्ञान उसे कहा जाता है जो राग को दूर करता है । जहां बंधन है वहां ज्ञान नहीं हो   सकता । सूक्ष्म दृष्टि से देखो, हम कहां बंधे हैं, कहां अज्ञान में जी रहे हैं । इस शरीर के प्रति, स्वयं के प्रति कितनी आसक्ति, कितना मोह है हमारे भीतर । प्रभु ने अज्ञान से ज्ञान की ओर आने के लिए कहा । मौत है तो व्यक्ति धर्म को याद करता है । मौत न होती तो व्यक्ति धर्म करता ही  नहीं । व्यक्ति डर से भी धर्म करता है पर डर से किया हुआ धर्म काम नहीं आता । दुःख आने पर उसे स्वीकार करो । दुःख और सुख को चलने दो । दोनों में आप समान रहो । भीतर के परमात्मा को देखो, जानो, तुम ही परमात्मा हो । आत्मा ही परमात्मा है । आत्मा ही ज्ञान है और ज्ञान ही आत्मा है । 

प्रभु ने कहा जो ज्ञान आपको राग से विमुक्त कर दे । राग किससे होता है । आपने देखा बच्चा जन्म लेता है उसका इस धरा पर पदार्पण होते ही अनेकों संबंध स्थपित होते हैं । सभी रिश्तेदार अपना संबंध बनाते हैं । कोई मां बन जाती है, कोई बहिन बन जाती है, कोई भुवा, मामा और पिता । वही बच्चा बड़ा होने पर अपना हिस्सा लेने के लिए खड़ा होता है । जिस बच्चे को आपने लाड से पाला वह बच्चा आपसे नफरत करता है इसीलिए भगवान ने कहा कि किसी भी वस्तु, व्यक्ति, परिस्थिति पर मूच्र्छा मत   करो । राग का बंधन हमें मुक्ति तक पहुंचाता है । राग मुक्ति में बाधक है इसलिए अरिहंत प्रभु को वीतराग कहा गया है । 

आचार्यश्रीजी का 10 से 12 नवम्बर, 2004 तक मौन रहेगा । दर्शनार्थी बन्धु आचार्यश्रीजी की साधना में सहयोग देवें । 13 नवम्बर, 2004 को नव वर्ष का मंगल पाठ आचार्यश्रीजी प्रदान करेंगे । 

पाॅजेटिव विचारों से मंगल भावना का जन्म होता है: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़ 6 नवम्बर, 2004 विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के अन्तर्गत अपने विचार प्रकट करते हुए कहा कि- अरिहंत प्रभु की वाणी का सूत्र आत्म-ज्ञान जब व्यक्ति को होता है तो वह उध्र्व-गमन करने लगता है जिससे राग दूर होता हो वह ज्ञान है । हम परिवार, संघ, रिश्तेदारों के साथ राग से बंधे हुए हैं, भाव से बंधे हुए   हैं । हमने देखा मुख्य है राग द्वेष । राग से सभी कषाय और अष्ट कर्म जन्म लेते हैं । प्रभु महावीर को वीतरागी कहा, वीतद्वेषी नहीं कहा क्योंकि वो राग से अलग थे । जब व्यक्ति राग से अलग हो जाता है तो द्वैष से स्वतः ही अलग होता है । वीतराग व्यक्ति आकाशवत् निर्मल जीवन व्यतीत करते हैं । जहां राग है वहां दुःख है । जिससे श्रेय की प्राप्ति हो वह ज्ञान है । 

संसार दो भागों में विभक्त हुआ है । एक श्रेय मार्ग और दूसरा प्रेय मार्ग । प्रेय का मार्ग संसार का है । इन्द्रिय और मन के सुखों का है । श्रेय का मार्ग चेतना का उध्र्वगमन कराता है । हम अपने जीवन में श्रेय मार्ग का चयन करें जिस ज्ञान से मैत्री भीतर आये उस ज्ञान को भीतर उतारो । कोई शुद्ध कार्य करने पर मंगल-भावना भावित करो । शुद्ध कार्य से पाॅजेटिव विचारों से मंगल भावना का जन्म होता है । पाॅजेटिव विचारों से जीवन मंगलमय बनता है । कोई निन्दा, प्रशंसा करता है तो नेगेटिव एनर्जी भीतर आती है । नेगेटिव एनर्जी को पाॅजेटिव की ओर ले जाओ ।

आप मंगलमैत्री करते हो तो अदृश्य शक्ति द्वारा अनेक कार्य सम्पन्न होते हैं । बड़ी से बड़ी बीमारियां दूर होती है । राग के समान अग्नि नहीं है । एक अग्नि है जो बाहर जलाती है और एक अग्नि भीतर से जलाती है । भीतर जलाने वाली अग्नि राग है । ऐसे अनेक लोग हैं जो राग की अग्नि में जल रहे हैं । द्वैष के समान ग्रह नहीं । ग्रह हमेशा चिपक जाते हैं । द्वैष हमेशा मानव को कर्मों के साथ चिपका देता है । मोह की स्थिति वर्तमान में अधिक है । मोहनीय कर्म बलवान है । मोह के समान कोई जाल नहीं और तृष्णा के समान नदी नहीं । तृष्णा जीवन में बढ़ती जाती है । नदी तो तृप्त हो जाती है परन्तु तृष्णा कभी तृप्त नहीं   होती । 

आचार्यश्रीजी का 10 से 12 नवम्बर, 2004 तक मौन रहेगा । दर्शनार्थी बन्धु आचार्यश्रीजी की साधना में सहयोग देवें । 13 नवम्बर, 2004 को नव वर्ष का मंगल पाठ आचार्यश्रीजी प्रदान करेंगे । 

मानव का जीवन बहुत मूल्यवान है: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़ 7 नवम्बर, 2004 विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के अन्तर्गत अपने विचार प्रकट करते हुए कहा कि- मानव का सुन्दर जीवन हम सबको मिला न मालूम किन परिस्थितियों से भावनाओं से यह जीवन मिला पर इस जीवन की महत्वत्ता को हम समझ नहीं पाये । एक पग धर्म की ओर कर लो धर्म की यात्रा शुरू हो जाएगी । अगर एक पांव संसार की ओर चला गया तो संसार की यात्रा चलती रहेगी । हमारा एक वचन किसी को सांत्वना प्रदान कर सकता है और एक वचन दो व्यक्तियों के बीच में दूरी पैदा कर सकता है । एक शब्द व्यक्ति के मन में गांठ का रूप भी ले सकता है और वही शब्द मानव को जन्म-जन्म भटका देता है । 

मानव का जीवन बहुत मूल्यवान है । प्रत्येक श्वांस बहुत मूल्यवान है । ये जो क्षण व्यतीत हो रहा है यह वापस नहीं आने वाला है । हम प्रत्येक क्षण का प्रयोग करें । 24 घण्टे में कितने घण्टे हम धर्म करते हैं । प्रत्येक कार्य के लिए अपना समय निर्धारित कर लें । हमें कितना समय किस कार्य के लिए देना है वह कार्य नहीं है वह जीवन ही है । धर्म के लिए जितना समय दोगे वह तुम अपने जीवन के लिए समय दे रहे हो । हमारी चेतना शुद्ध, बुद्ध, मुक्त है । जीवन को जिस दृष्टिकोण से देखोगे वह वैसा ही बनेगा । 

भक्ति करके जीवन को शुद्ध बना लो । आकांक्षा रहित हो जाओ । यदि हम अपने जीवन में छोटी-2 इच्छाएं पूरी करने में लगे रहे तो संसार सागर भटक जाएंगें । अगर कुछ नहीं चाहिए तो सब कुछ मिल जाएगा । आत्म-ज्ञान चाहिए तो शुद्ध भावना से जीवन    जीओ । प्रभु की समृद्धि भीतर ले आओ और समृद्धि भीतर आ गई तो जीवन बन गया । इतना जीवन आपने व्यतीत कर लिया, आपके हाथ में क्या आया  । विचार करो सोचो । यदि जीवन में धर्म स्मृद्धि, तृप्ति आ गई तो जीवन और सुन्दर बन जाएगा । छोटी-2 आकांक्षाओं के पीछे मन लगता है परन्तु उस मन को वहां से हटाकर समृद्धता में ले आओ वही हमारा लक्ष्य है । 

आचार्यश्रीजी का 10 से 12 नवम्बर, 2004 तक मौन रहेगा । दर्शनार्थी बन्धु आचार्यश्रीजी की साधना में सहयोग देवें । 13 नवम्बर, 2004 को नव वर्ष का मंगल पाठ आचार्यश्रीजी प्रदान करेंगे । 

जीवन शोधन का आधार वीतरागवाणी: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़ 8 नवम्बर, 2004 विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के अन्तर्गत अपने विचार प्रकट करते हुए कहा कि- अरिहंत प्रभु की वीतरागवाणी का हम अनुसरण करें । जीवन शोधन की लिए वीतरागवाणी एक मात्र आधार है । वीतराग की वाणी हमें जागृत करती है । आशुप्रज्ञ पंडित सोये हुए लोगों के बीच जागृत होकर चलें । जीवन छोटा है । काल निर्दयी है उसका कोई भरोसा नहीं कब मोत आ जाए, कब श्वांस रूक जाए । जितना जीवन हमें मिला है उसमें हम प्रभु स्मरण करें । प्रभु भक्ति करें ।

प्रभु ने ज्ञानी व्यक्ति को आशुप्रज्ञ पंडित की उपमा दी । पंडित शब्द पण्डा से बना   है । पंडा का अर्थ है मेघा । पंडित शब्द विद्वान के लिए प्रयुक्त होता है । एक कवि तुकबन्दी करता है और एक कवि भीतर से आई हुई कविता को गाता है । दोनों में वही कवि आशुप्रज्ञ हो सकता है जिसकी कविता भीतर से निकली हो । प्रभु ने जो कुछ कहा उनकी वाणी झरित हुई । फूल से सुगंध अपने आप आती है । इस प्रकार वाणी अपने आप निर्झरित होती है । उसे निर्झरित नहीं करना पड़ता । वैज्ञानिक आजकल प्रभु की वाणी को सिद्ध कर रहे हैं । प्रभु ने आज से 2600 वर्ष पूर्व ही कह दिया कि उपवास करने से शरीर को अधिक बल मिलता है । आज के वैज्ञानिक भी यही सिद्ध कर रहे है कि उपवास करने से व्यक्ति का ब्रेन शसक्त होता है । उसे हार्ट की प्रोबलम् नहीं होती । उसका ब्रेन एक्टिवेट होता है । जो व्यक्ति एक दिन आहार करता है और एक दिन निराहार रहता है वह अधिक स्वस्थ होता है । 

आज के वैज्ञानिक यह भी सिद्ध कर रहे हैं कि हम हमारे ब्रेन का सही उपयोग नहीं कर पाते । हम केवल 10 प्रतिशत ब्रेन का उपयोग करते हैं । ब्रेन का अधिकमतर उपयोग करने के लिए ध्यान करो । स्वाध्याय करो । हमारे जीवन की अधिक उर्जा का उपयोग कैसे करें । अधिक भोजन खाने से ऊर्जा का उपयोग नहीं होता । सही दिशा में उसे लगाओगे तो सही उपयोग होगा । हम अपने जीवन को निर्मल बनाये । थोड़ी सी जिन्दगी है कुछ काम कर लो । अपनी गलती को सुधारो । दीपावली में आप लक्ष्मी का पूजन तो करोगे ही पर यह जो परम् धन है उसकी भी पूजा कर लो । परम् धन ही साथ जाएगा ।  

आचार्यश्रीजी का 10 से 12 नवम्बर, 2004 तक मौन रहेगा । दर्शनार्थी बन्धु आचार्यश्रीजी की साधना में सहयोग देवें । 13 नवम्बर, 2004 को नव वर्ष का मंगल पाठ आचार्यश्रीजी प्रदान करेंगे । 

धर्म हमेशा प्रकाश में होता है: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़ 9 नवम्बर, 2004 विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के अन्तर्गत अपने विचार प्रकट करते हुए कहा कि- मानव जीवन की सार्थकता है प्रभु स्मरण । अरिहंत की भक्ति । सत्गुरू की सेवा । स्व पर कल्याण की भावना ये मानव के उदात्त गुण है । महापुरूषों ने जागरूकता की बात कही । मानव जीवन की सार्थकता के लिए प्रभु ने फरमाया कि शरीर दुर्बल है, काल निर्दयी है, हमें प्रतिपल प्रतिक्षण जागरूकता रखनी चाहिए । भारण्ड पक्षी की तरह जागरूक होना चाहिए । 

जिस घर के बाहर पहरेदार है उस घर के अन्दर चोर प्रवेश नहीं कर सकते । जिस घर में दीपक जलता हो, रोशनी हो वहां चोरी नहीं हो सकती । पाप हमेशा अंधकार में होता है और धर्म हमेशा प्रकाश में होता है । बाहर के चोर तो दिखाई देते हैं परन्तु भीतर भी चोर है । प्रमाद सबसे बड़ा चोर है । जन्मों-जन्मों से भीतर प्रमाद भरा हुआ है । आलस का आना प्रमाद का एक अंग है, प्रमाद नहीं । मद से भरा व्यक्ति प्रमादी कहलाता है । प्रमाद से दूर होने के लिए विनय में आओ । स्वयं को गुरू चरणों में समर्पित कर दो । झुक जाओ । झुकोगे तो प्रभु को पा लोगे । अहंकार मद से आता है । 

जागरूकता का दीया जलाओगे तो भीतर के चोर भाग जाएंगे । जिस घर का मालिक घर में होता है तो वह घर सुन्दर ढंग से चलता है । आपका स्वयं में होना चेतन-तत्व के प्रजि जागरूक होना ही आपकी मालकियत है । हम 24 घण्टों में कितने घण्टे स्वयं के लिए निकालते हैं अवलोकन करो । आठ घण्टे सोने में, आठ घण्टे आॅफिस में, 4 घण्टे खाने-पीने में और 4 घण्टे आपस की गपशप में बीत जाते हैं । इस तरह यह जीवन बीतता जा रहा है । सारा दिन दुनियादारी में चला जाता है । 9 प्रकार का पुण्य करो । किसी को अन्न दो, पानी दो, रहने के लिए स्थान दो, मन से शुभ-भावनाएं भावित करो । अच्छे वचन बोलो । 9 प्रकार का पुण्य करोगे तो उसका फल 42 प्रकार से मिलेगा । 

अंत में आचार्यश्रीजी ने दीपावली के पावन अवसर पर तेला तप करने की प्रेरणा दी । इन तीन दिनों में भगवान महावीर की वाणी का स्वाध्याय करने के लिए कहा । प्रत्येक कार्य शुभ के लिए हो, मंगल के लिए हो ऐसा आशीर्वाद जन-जन को प्रदान किया । 

आचार्यश्रीजी का 10 से 12 नवम्बर, 2004 तक मौन रहेगा । दर्शनार्थी बन्धु आचार्यश्रीजी की साधना में सहयोग देवें । 13 नवम्बर, 2004 को प्रातः 8.30 बजे नव वर्ष का मंगल पाठ आचार्यश्रीजी प्रदान करेंगे । 

मौन से समृद्धि की प्राप्ति: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़ 10 नवम्बर, 2004 विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने मौन में प्रवेश करने से पूर्व संदेश देते हुए कहा कि- अध्यात्म साधना में मौन का बहुत महत्व है । मौन अपने जीवन में बिखरी हुई शक्तियों को एकत्रित कर अन्तर वृत्तियों के शोधन में सहयोग देता है । जितने भी ऋषि मुनि ज्ञानी तीर्थंकर हुए हैं उन सभी ने मौन की आराधना करके अन्तर अन्वेषण किया और अन्तर प्रज्ञा को जागृत करके विश्व को सुख और शान्ति का मार्ग प्रदान किया ।

इसी प्रकार दीपावली के इन पवित्र दिवसों में आत्मार्थी साधक मौन रहें । जो लोग उपवास इत्यादि कर सकते हैं वे तप करें तथा प्रभु भक्ति में मंत्र, अनुष्ठान और स्वाध्याय में अपना समय व्यतीत करें । जो भीतर से शान्त होते हैं उनके ऊपर लक्ष्मी की विशेष कृपा होती है । जो लोग अशान्त होते हैं और पर्यावरण को अशुद्ध करते हैं पटाखे आदि फोड़कर अन्य जीवों को कष्ट पहुंचाते हैं उन पर लक्ष्मी प्रसन्न न होकर नाराज होती है और वे अपने जीवन में पाप-कर्म को बढ़ाते हैं । अतः इस आध्यात्मिक पर्व पर सबके लिए मंगल कामना करते हैं कि उनके जीवन में बाह्य समृद्धि और आभ्यान्तर समृद्धि की प्राप्ति हो । 

श्रमण संघीय तृतीय पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री देवेन्द्र मुनि जी महाराज की जन्म जयंती का आयोजन हुआ । मंत्री श्री शिरीष मुनि जी महाराज ने उनके जीवन पर प्रकाश डालते हुए कहा कि उन्होंने एक सामान्य बालक के रूप में दीक्षा लेकर गुरू कृपा से आचार्य पद तक को प्राप्त किया । जीवन में स्वाध्याय को प्रमुखता देकर आगमों का गहन अवगाहन करते हुए 300 पुस्तकों की रचना की । हम उनके जीवन से स्वाध्याय और मधुरवाणी की शिक्षा ग्रहण कर सकते हैं । 

आचार्यश्रीजी का 10 से 12 नवम्बर, 2004 तक मौन रहेगा । दर्शनार्थी बन्धु आचार्यश्रीजी की साधना में सहयोग देवें । 13 नवम्बर, 2004 को प्रातः 8.30 बजे नव वर्ष का मंगल पाठ आचार्यश्रीजी प्रदान करेंगे । 

मौन से शक्तियों का जागरण: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़ 14 नवम्बर, 2004 विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- जीवन में जैसा आपका दर्शन है वैसा आपका व्यक्तित्व विकास होता है । जैसी दृष्टि है वैसी ही सृष्टि हमें दिखाई देगी । जीवन में धर्म, सत्य नहीं तो कोई बड़ी बात नहीं परन्तु उसके लिए प्यास होनी चाहिए । धर्म और सत्य को पाने की प्यास होगी, भरसक प्रयास होगा तो आवश्यकता अवश्य पूरी होगी । प्रभु महावीर का सूत्र हमें संदेश देता है कि हम कहां से आए और कहां को जाएंगें । सद्गुरू की वाणी या तीर्थंकरों के उपदेश से हम जान सकते हैं कि हम कहां से आए हैं । मानव की खोज को कोहम् से सोहम् तक की है । मैं कौन हूॅं इसकी खोज हमेशा बनाये रखना । सत्य की जो खोज कर रहा है वह अभिनन्दनीय है । 

हमारे जीवन में अनेक शक्तियां है परन्तु उनका प्रगटीकरण नहीं होता । हमारे जीवन से हम केवल दस प्रतिशत जी रहे हैं, 90 प्रतिशत तो हमारा अवचेतन मन में पड़ा रहता है । जैसे एक बीज को पीट दो, कूट दो, उसे फैंक दो वह कुछ काम नहीं आएगा, परन्तु वही बीज किसान के हाथ में आ जाए तो वह उसे आवश्यकतानुसार पल्लवित पुष्पित करके हजारों फल फूल दे सकता है । एक बीज में हजारों फल फूलों की शक्ति समाहित है तो हमारे भीतर कितनी शक्ति समाहित होगी । बीज में फूल, फूल, पत्त्ेा अप्रेकट है उसी प्रकार हमारे भीतर अनेक शक्तियां अप्रकट है । 

आपके भीतर जो अप्रकट शक्तियां है वह मौन से जागृत होती  है । मौन करोगे तो गहरे-गहरे चले जाओगे । हमारा जीवन हमेशा दूसरों को अच्छा दिखाने में लगा रहता है और यही हमारे दुःख का कारण है । जैसे आप है वैसे बने रहेंगे तो सुखी हो जाएंगे । कुछ लोग कहते हैं हमें आनंद, सुख, शान्ति नहीं मिलती वह तो हमारे भीतर है, आवश्यकता है केवल उसे देखने की । आनंद शान्ति के लिए प्रयास करना नहीं पड़ता वह स्वतः ही आ जाती है केवल उसे देखना पड़ता है । हमेशा हमारे भीतर शान्ति विद्यमान रहती है । हम प्रत्येक क्षण का उपयोग करेंगे तो इस महत्वता को प्राप्त कर लेंगे । 

आज से आत्म: ध्यान साधना कोर्स एडवांस-ााा’ का प्रारंभ हुआ जिसमें अनेक भाई बहिन भाग ले रहे हैं । जम्मू, लुधियाना, दिल्ली आदि स्थानों से भाई बहिन शिविर करने हेतु सेक्टर 18 डी में आये । यह गम्भीर साधना शिविर है जो आचार्यश्रीजी के सान्निध्य में वर्ष में एक बार ही हुआ करता है । 

संक्रान्ति पर्व पर संक्रमण का संकल्प लें: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़ 15 नवम्बर, 2004 विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- आज का यह पावन दिवस संक्रान्ति का है । वर्ष में बारह बार और महीने में एक बार आता है । वैसे तो मकर की संक्रान्ति सर्वोत्त्म मानी गई है परन्तु हर महीने में एक बार सूरज एक राशि से अगली राशि में संक्रमण करता है वह दिवस संक्रान्ति कहलाता है । अरिहंतों को चन्द्र, सूर्य और सागर की उपमा से उपमित किया गया है । अरिहंत प्रभु चन्द्र से भी निर्मल हैं । पूर्णिमा का चन्द्र कितना श्वेत, धवल, उज्ज्वल होता है उसी प्रक्रार अरिहंत प्रभु उज्ज्वल हैं । सूर्य जिस प्रकार अपनी किरणों से सम्पूर्ण पृथ्वी को प्रकाशित कर रहा है उसी प्रकार अरिहंत प्रभु अपने ज्ञान से तीनों लोकों को प्रकाशित कर रहे हैं । सागर जिस प्रकार गम्भीरता को लिए हुए हैं, उसी प्रकार अरिहंत प्रभु के भीतर गम्भीरता विद्यमान है । 

अरिहंत प्रभु के चरणों में चैंसठ इन्द्र और तीनों लोकों के प्राणी झुकते हैं । अगर हम उनकी स्तुति करते हैं तो वे हमें अपने जैसा बना लेते हैं । जिसका तुम ध्यान करते हो तुम वैसे ही बन जाते हो । संकल्प चाहिए वैसी आशा और दृष्टिकोण चाहिए । जैसे मालिक से संबंध स्थापित होने पर मैनेजर से किसी कार्य के लिए पूछना आवश्यक नहीं होता उसी प्रकार अरिहंत से संबंध स्थापित होने पर किसी की आवश्यकता नहीं । हम वीतराग मार्ग पर अग्रसर हो जाएंगें । अरिहंत से संबंध स्थापित करने के लिए जाति विशेष की आवश्यकता नहीं है । जैन और जैनेŸार सभी संबंध स्थापित कर सकते हैं । जिस अरिहंत प्रभु ने आत्म-ज्ञान से तीनों लोकों को प्रकाशित किया है वे हमें भी प्रकाशित करते हैं, आवश्यकता है केवल उनको स्मरण करने की । जब-2 स्तुति करो तब भीतर भाव रखो प्रभु मुझे अपनी शरण में ले लो । अरिहंत की जितनी गहरी भक्ति करोगे उतना आनंद आएगा । धर्म का अन्तिम पड़ाव है कुछ नहीं करना, हम अरिहंत प्रभु की भक्ति करते हैं तो वह अन्तिम पड़ाव भी हमें प्राप्त होता है । 

संक्रान्ति के पावन दिवस पर हम सूरज की तरह अपने जीवन का संक्रमण करें । राग, मोह, क्रोध, माया अगर बढ़ी है तो उसे कम करें । वीतराग मार्ग की ओर आगे बढ़ें । हमने बहुत संघर्ष कर लिया, चैरासी लाख जीवायोनी में भटक लिये, इस जीवन के 40-50 साल व्यर्थ गंवा दिये अब हम स्वयं की ओर झांके । जब-2 कष्ट आये तो अरिहंत प्रभु को याद  करें । साधना को छोड़े नहीं, सहनशीलता को भीतर उतारें । 

आत्म: ध्यान साधना कोर्स एडवांस-ााा’ श्री एस0 एस0 जैन सभा, सेक्टर 18 डी, चण्डीगढ़ में सुन्दर ढंग से चल रहा है जिसमें बड़ी संख्या में भाग ले रहे हैं । 21 से 25 नवम्बर, 2004 तक बेसिक कोर्स एवं ट्रेनिंग शिविर होगा । 

राग मीठा दुःख है: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़ 16 नवम्बर, 2004 विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- दर पे तुम्हारे में आया हूं भगवन, दया की नजर से मेरी झोली भर दो ।

एक भक्त जब गुरू के लिए भगवान के लिए अरिहंत के लिए प्रार्थना करता है प्रभु ! मैं तुम्हारे द्वार पर आ गया हूं, मेरी झोली एक दया की नजर से भर दो । करेमि भंते’ कहते ही वह प्रभु की साक्षी से सामायिक करता है । सावद्य पापकारी कार्यों का त्याग करता है तो वह वीतराग मार्ग पर अग्रसर हो जाता है । प्रभु चरणों में जाकर प्रार्थना करना, प्रभु मुझे अपने चरणों का चाकर बना लो । मेरे भीतर अभिमान ना आये । राग मीठा दुःख है और इस राग के पीछे दुःख की लम्बी कतार है । अगर हम राग भाव में आ जाते हैं तो मीठे दुःख का स्वाद ग्रहण करते हैं । 

व्यक्ति पूजा नहीं गुण पूजा को ग्रहण करो । गुण पूजा करोगे तो प्रार्थना हो जाएगी, प्रार्थना आत्मा का भोजन है । जब नमोकार मंत्र का स्मरण करो तो भीतर नमन की भावना रखो । प्रार्थना में भाव रखो प्रभु मैं पापी, अधर्मी हूं । दिन भर में अठारह पापस्थानकों में से सेवन हो ही जाता है, प्रभु मेरे पापों से मुझे मुक्ति दे दो । पाप हो गया तो प्रभु चरणों में आलोचना कर लेना । आलोचना करते वक्त भीतर हीन भावना मत लाना । प्रभु ने बहुत छूट दी है आलोचना करते हो तो कर्म मैल साफ हो जाती है । कपड़ा कितना ही मैला हो साबुन से साफ हो जाता है उसी प्रकार आलोचना हमारे भीतर को स्वच्छ करती है । गौशालक ने तीर्थंकर प्रभु महावीर की आलोचना की, अन्तिम समय तक वह प्रभु के लिए बुरे वचन कहता रहा, परन्तु अन्तिम समय में उसने आलोचना की तो वह भी पापो ंसे बच गया । 

इस जीवन का अभिमान मत करना । यह जीवन छोटा सा है । भीतर जो अवगुण है उन्हें दूर कर देना और भीतर प्रत्येक प्राणी के लिए मंगल की कामना भावित करना । परमात्मतत्व का भाव भीतर रखना । परमात्मा सब जगह विद्यमान है वह तुम्हारी भावना को स्वीकार कर लेगा । प्रार्थना करना और अपने जीवन की बुराईयों को प्रभु चरणों में समर्पित करते हुए सद्मार्ग पर अग्रसर हो जाना ।  

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सुख दुःख जीवन के दो पहलू है: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़ 17 नवम्बर, 2004 विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- मानव का जीवन सुख दुःख का मिश्रण है । प्रकाश अंधकार का सहयोग है । अमावस्या पूर्णिमा का मिलन है खुशी कमी का गुलदस्ता है । अगर केवल सुख ही होता तो मानव उससे दुःखी हो जाता । सुख का मूल्य जानने के लिए परमात्मा ने थोड़ा दुःख भी दिया है ताकि समय समय पर व्यक्ति को सुख याद आता रहे । सुख आये तो प्रभु की कृपा समझना और दुःख आए तो प्रभु का प्रसाद समझना । जिस प्रकार मन्दिर में जाकर हम प्रसाद को ग्रहण करते हैं उसी प्रकार दुःख को परमात्मा का प्रसाद समझकर सहन कर लेना और प्रार्थना करना प्रभु मुझे अपनी शरण में ले लो । आपका आशीष, आपकी दृष्टि, आपकी प्रार्थना मैं कर पाउॅं ऐसी प्रार्थना भावित करना । 

हमने अपने नाम का अभिमान कर रखा है अगर कुछ गलत हो गया तो हम दूसरे को दोषी ठहराते हैं और कुछ अच्छा हो गया तो अपने को उसका हकदार समझते हैं हम अभिमान से उपर उठकर जीयें । हमारे पास किसी का चुनाव नही था, माता, पिता, गुरू, धर्म सब हमें अपने आप मिला । जो बीज बोए थे वे पल्लवित पुष्पित हुए, इस जन्म में जैसे बीज बोवोगे वैसे ही फल मिलेंगे । जब-2 सुख आए या दुःख आए उस समय कोई भी याचना नहीं  करना । प्रभु मुझे कुछ भी नहीं चाहिए, मैं केवल आपका पुजारी बनकर रहूं ऐसी भावना भावित करना । 

प्रभु के सामने कोई मांग मत करना, उनके सामने जाने पर अपने अस्तित्व को भी भुला देना और एक ही भावना भावित करना प्रभु मुझे समाधि मिले । मैं समता में आ जाउॅं, अपने जीवन में जो-जो छोटी-2 बातें हैं जिससे हम भूल कर जाते हैं उनको दूर करो । जीवन में सकारात्मक दृष्टि अपनाओ, अगर सुख होगा तो दुःख भी आएगा । सुख दुःख एक सिक्के के दो पहलू है । पहलूओं को साथ में लेकर जीवन को आगे बढ़ायें । 

आज आचार्यश्रीजी के दर्शनार्थ हैदराबाद, सूरत, चन्द्रपुर, दिल्ली, सिरसा, जम्मू, मालेर कोटला आदि स्थानों से बड़ी संख्या में भाई बहिन उपस्थित हुए । आत्म: ध्यान साधना कोर्स एडवांस-ााा’ श्री एस0 एस0 जैन सभा, सेक्टर 18 डी, चण्डीगढ़ में सुन्दर ढंग से चल रहा है जिसमें बड़ी संख्या में भाग ले रहे हैं । 21 से 25 नवम्बर, 2004 तक बेसिक कोर्स एवं ट्रेनिंग शिविर होगा । 

पतितों का उद्धार करना ही परमात्मा को प्राप्त करना है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़ 18 नवम्बर, 2004 विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि-  

मैं ढूंढता तुझे था जब कुंज और वन में 

तू खोजता मुझे था तब दीन के वतन में । 

हम प्रभु की खोज कैसे करें । सत्य की खोज कैसे करें । परमात्मा को दीनबन्धु कहा गया है । दीनबन्धु वह है जो दीनों, गरीबों की सेवा करता है । जो दीनों का सहायक है परमात्मा को कोई पद प्रतिष्ठा से सम्मानित नहीं किया जा सकता । परमात्मा को क्या चाहिए उसे केवल इस विश्व के प्रत्येक प्राणी की मैत्री और प्यार चाहिए । हम उससे भी मैत्री और प्यार ही मांगें । हम एकान्त में जाकर परमात्मा को पाना चाहते हैं उससे साक्षात्कार करना चाहते हैं परन्तु वह तो दीनों की सेवा में पतितों के उद्धार में लगा हुआ है । किसी ने कहा है कि दीनों का सहारा बनना या पतितों का उद्धार करना ही परमात्मा को प्राप्त करना है । माता पिता को जब हमारी जरूरत होती है उस समय हम धर्म कार्य करते हैं । धर्म कार्य से भी आवश्यक है सेवा । माता को इस समय सेवा की आवश्यकता है उस समय धर्म कार्य करके पुण्यबंध नहीं किया जा सकता । माता पिता की सेवा करो जो ग्लानियों, दीन दुःखियों की सेवा करता है वह धन्य है । प्रभु ने सेवा में झुटने का संदेश दिया । प्रभु ने कहा जो सेवा करता है वह विश्व में सर्वोत्तम-प्राणी है । समय अनमोल है गया हुआ समय वापस नहीं आता । कहा भी है 

मैं वक्त हूॅं, वक्त पे बता दूंगा, 

वक्त पे अकड़े न जिसकी गर्दन,

उसको शहंशाह बना दूंगा । 

वक्त, समय, क्षण एकार्थी शब्द है । हम इनके मूल्य को जाने । ये चिन्तामणि-रत्न के समान हैं । अगर हम वक्त के अनुसार कार्य करते हैं तो जीवन नन्दनवन बन जाता है । पशु पौधे पहाड़ पत्थर ज्यादा संवेदनशील होते हैं, उनके प्रति मंगलमैत्री करो तो वे भी हमें प्यार देते हैं । इस अवसर पर आचार्यश्रीजी ने पशु पक्षियों की सेवा करने का एवं उनके प्रति सहानुभूति रखने का संदेश दिया । आचार्यश्रीजी ने फरमाया कि सेवा ही परम् धन है, सेवा से ही व्यक्ति मोक्ष प्राप्त कर सकता है । भले ही वह शास्त्र ना पढ़ सके, मालाएं ना फेर सके, अगर वह सेवा कर लेता है तो अपने जीवन को परमात्म-तत्व तक पहुंचा देता है । 

आत्म: ध्यान साधना कोर्स एडवांस-ााा’ श्री एस0 एस0 जैन सभा, सेक्टर 18 डी, चण्डीगढ़ में सुन्दर ढंग से चल रहा है जिसमें बड़ी संख्या में भाग ले रहे हैं, 21 से 25 नवम्बर, 2004 तक बेसिक कोर्स एवं ट्रेनिंग शिविर होगा । 

परमात्मा श्रम में है: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़ 19 नवम्बर, 2004 विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- मानव जीवन सुन्दर कैसे बनें । हमारे जीवन में सत्य और सान्दर्य की झलक कैसे आयें । हमारे भीतर परमात्मा का वास किस प्रकार हो । हम किस प्रकार अपने आत्म-भाव में शुद्धात्मा को जाने इसलिए आवश्यक है अपने जीवन में परमात्मा को घटित करना । मन में परमात्मा का वास होगा तो जिसको देखोगे उसके लिए करूणा का सªोत बहेगा । मानव चैराहे पर खड़ा है वह जहां जाना चाहे वहां जा सकता है । पूर्व में जाना है या पश्चिम में जाना है, ऊपर जाना है या नीचे जाना है, दिशा में जाना है या विदिशा में जाना है यह चुनाव उसका है । हम कहीं पर भी चले जायें परमात्मा तो हमारे पास है ।

प्रभु पास में है हमें दूर के आकर्षण बड़े अच्छे लगते हैं परन्तु पास में जाने पर वही सब कुछ नजर आता है इस प्रकार हम परमात्मा को ढूंढने के लिए मंदिर, मस्जिद, गिरिजाघर चले जाते हैं परन्तु वह तो हमारे पास में ही है । हमें घर पर बना भोजन अच्छा नहीं लगता हम बाजार का भोजन खाकर प्रसन्न होते हैं, परन्तु जो घर का भोजन है वह साधना में सहायक होता है । इसी प्रकार भीतर का परमात्मा हमारे लिए सहायक है । परमात्मा को जब हम कुंज और वन में ढूढ़ते है तब वह दीन दुःखियों की सेवाओं में लगा हुआ होता है । रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने कहा था परमात्मा कहीं ओर नहीं उस पत्थर तोड़ने वालें मानव में है जो पूरा दिन मेहनत कर अपना पसीना बहाता हुआ मेहनत की रोटी खाता है । परमात्मा श्रम में है ।

सेवा धर्म परम गहन है, इसको जितना क्रिश्यचयन समाज या सिक्ख समाज ने ग्रहण किया उतना कोई ओर नहीं ग्रहण कर पाये । आज भी गुरूद्वारे में कितनी सेवा होती है, रोटी को भी प्रसाद कहकर ग्रहण किया जाता है । हमारे समाज में ऐसी एकता होती या इतना समर्पण होता तो आज ये मन की गांठे नहीं बंधती । हमारे समाज में ऊॅंच नीच का भाव ना रहे तब समर्पण प्राप्त हो जाएगा । जब-2 भीतर पीड़ा आए, प्रभु को याद कर लेना । जब भीतर शान्ति, आनंद, मैत्री होती है तो भीतर से आनंद फूटता है । परमात्मा ने हमें अनेकों अवसर दिये पर हमने उस अवसर को चुका दिया । प्रत्येक प्राणी में एक ही चेतना है । पशु, पौधे, पहाड़, पत्थर, नैरयिक, देवता, मानव और तिर्यंच सभी में एक ही आत्मा समाई हुई है, हम उस आत्म-तत्व को ग्रहण करें ।  

आत्म: ध्यान साधना कोर्स एडवांस-ााा’ श्री एस0 एस0 जैन सभा, सेक्टर 18 डी, चण्डीगढ़ में सुन्दर ढंग से चल रहा है जिसमें बड़ी संख्या में भाग ले रहे हैं, 21 से 25 नवम्बर, 2004 तक बेसिक कोर्स एवं ट्रेनिंग शिविर होगा । 

सूर्योदय से पूर्व जागृत हो जाओ: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़ 20 नवम्बर, 2004 विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- दयालु दया कर, दया कर दया कर,

ये प्याला मेरा प्रेम अमृत से दे भर ।

प्रातःकाल सूरज की किरण निकलने से पूर्व आप जागृत हो जाओ । आपकी निद्रा भंग हो जाये । धरती पर पहला कदम रखो उस समय अरिहंत प्रभु, सिद्ध प्रभु को याद करो । नदी दो तटो के बीच बहती है परन्तु वह कभी भी तटों को नुकसान नहीं देती । नारी को नदी की उपमा दी गई है । नारी भी दो कुलों के बीच रहते हुए सबको आनंदित करती है । पैतृक कुल और ससुराल दोनों घरों में अपना प्रेम, प्यार बांटती है । भगवान महावीर का जब समोवसरण लगता था तब गाय और शेर प्रभु की वाणी श्रवण करने के लिए इकट्ठे समोवसरण में आते थे । 

हम इतना तो नहीं कर सकते कि गाय और शेर इकट्ठे हो परन्तु यह तो कर सकते है सास बहू एक हो जाये । सास बहू का प्यार मां बेटी की तरह हो   जाये । पति पत्नी का प्रेम विस्तृत हो जाये । देरानी जेठानी एक साथ धर्म क्रिया करें तो कितना सुन्दर होगा । अगर किसी के वचन सुनकर आपस में मैत्री का भाव बढ़ता है तो वह व्यक्ति धन्य है । भोजन इकट्ठे करो परन्तु साथ-साथ भजन भी इकट्ठे करो । भूख न लगने पर भोजन करना विकृति कहलाती है । भूख लगने पर ही भोजन करना चाहिए । उठत्ेा ही अरिहंत प्रभु को नमन करो, उनके प्रति अनंत करूणा और मैत्री का भाव रखो जिनके भीतर अनंत करूणा और मैत्री होती है वे तन, मन से सदैव स्वस्थ होते हैं । हमारे भीतर करूणा और मैत्री नहीं है इसलिए बीमारियां शरीर को झकड़ रही है । हम इनसे ऊपर उठे । भीतर करूणा और मैत्री लाये । अपने हृदय को प्रेम, मैत्री से भर दें । 

जीव-दया बहुत सुन्दर उपक्रम है । जीव दया में गरीबों के लिए लंगर लगाओ । अपनी कमाई का कुछ हिस्सा धर्म कार्यों में लगाओ । गायो को गुड़ खिलाओ, कबूतरों को यथाशक्ति अन्न दो । कितना सुन्दर होगा जब हम जीव दया करेंगे । प्रत्येक प्राणी सुख से रहेगा तो सारा संसार सुखी हो जाएगा । 

आत्म: ध्यान साधना कोर्स एडवांस-ााा’ श्री एस0 एस0 जैन सभा, सेक्टर 18 डी, चण्डीगढ़ में सुन्दर ढंग से चल रहा है जिसमें बड़ी संख्या में भाग ले रहे हैं, 21 से 25 नवम्बर, 2004 तक बेसिक कोर्स एवं ट्रेनिंग शिविर होगा । 22 से 24 नवम्बर, 2004 को  आत्म: समाधि शिविर होगा जिसमें बेसिक कोर्स करने वाले साधक भाग ले सकते हैं । 

अस्तित्व का बोध होना ही जीवन है: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़ 21 नवम्बर, 2004 विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि-

दयालु दया कर, दया कर दया कर,

ये प्याला मेरा प्रेम अमृत से दे भर ।

जब भी आपका हृदय भक्ति से भर जाए, चित्त में प्रसन्नता आए, आंखे नम जाए, सिर झुक जाये तो प्रार्थना की शुरूआत हो जाती है । हे दयालु तूने इतनी दया की है तीनों लोकों को प्रकाशित कर दिया । प्रभु तुम दयालु हो प्रत्येक व्यक्ति पर आपका समभाव बना हुआ है ऐसी प्रार्थना प्रभु चरणों में करना । प्रार्थना भूमिका है । ध्यान करने से पूर्व प्रार्थना करो । प्रभु का धन्यवाद करो अनुग्रह भक्ति से निकले वचन प्रार्थना है । प्रभु का ध्यान सोते हुए, जागते हुए प्रत्येक कार्य करते हुए होना चाहिए । कुछ भी करो अरिहंत का स्मरण भीतर होना  चाहिए ।  

विषय वासना को भीतर मत लाना । जब भी विषय वासना भीतर आए तो झुक जाना, विनयभावना को भीतर ले आना, विनय भावना भीतर आ गई तो नमस्कार हो गया । जन्म और जीवन में अन्तर है । जन्म तो मिलता है पर जीवन नहीं मिलता । हमारे बोए हुए कर्मों के कारण हम माता के गर्भ से जन्म ले लेते हैं परन्तु जीवन तो कोई सत्गुरू ही दे सकता   है । अस्तित्व का बोध होना ही जीवन है । अन्तिम समय तक भीतर यह भावना रखना कि मुझे अस्तित्व का बोध हो जाए । यह मानव जीवन की कहानी बचपन, जवानी और बुढ़ापा इन तीन शब्दों में आ जाती है । बचपन खेल कूद में बीतता है । जवानी नशे में गुजर जाती है और बुढ़ापा पका हुआ फल है । अन्तिम समय प्रभु शरण की भावना भावित करना मानव का जीवन सुन्दर जीवन है, इसे जो सार्थक कर लेता है उसका जीवन सफल होता है । 

आज आचार्यश्रीजी के दर्शनार्थ जालंधर, अम्बाला कैंट, लुधियाना, रोपड़, परवाणु, पंचकूला आदि स्थानों से श्रीसंघ उपस्थित हुए । जालंधर एवं अम्बाला कैंट श्रीसंघ ने आचार्यश्रीजी के चरणों में चातुर्मास की भाव-भीनी विनती प्रस्तुत की । आत्म: ध्यान साधना कोर्स एडवांस-ााा’ श्री एस0 एस0 जैन सभा, सेक्टर 18 डी, चण्डीगढ़ में सुन्दर ढंग से चल रहा है जिसमें बड़ी संख्या में भाग ले रहे हैं, 21 से 25 नवम्बर, 2004 तक बेसिक कोर्स एवं ट्रेनिंग शिविर होगा । 22 से 24 नवम्बर, 2004 को  आत्म: समाधि शिविर होगा जिसमें बेसिक कोर्स करने वाले साधक भाग ले सकते हैं । 

स्वीकार में सुख है: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़ 22 नवम्बर, 2004 विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- प्रभु की प्रार्थना, अरिहंत की स्तुति जब हम करते हैं तो हम उस परम तत्व तक पहुंच जाते हैं, जीवन महाजीवन बन जाता है । जीवात्मा परमात्मा बन जाता है, कंकर शंकर बन जाता है । हम इस धरा पर प्रभु की प्रार्थना, अर्चना करने के लिए आए परन्तु हमारे पास समय ही नहीं है प्रभु भजन करने का । आशा और निराशा के बीच हमारा जीवन चलता जा रहा है, शरीर गल गया, केस सफेद हो गए, मुख पीला पड़ गया, आंखों से देखा नहीं जाता, हाथ पांव दुबले हो गए, लकड़ी का सहारा आ गया फिर भी हमारी आशा नहीं छूटी, यह जीवन धन, पद, यश, प्रतिष्ठा में अटका हुआ है, जितना हम इंकार करते चले जा रहे हैं उतना हमारा दुःख बढ़ता चला जा रहा है, जितना हम स्वीकार करते हैं उतना सुख आ रहा है । 

स्वीकार में सुख है, इन्कार में दुःख है । जीवन में जो भी स्थिति है उसे स्वीकार करते चले जाओ, जीवन नन्दनवन बन जाएगा । अगर सुख से जीवन जीना है तो श्रावक के बारह व्रत ग्रहण करो । किसी भी प्राणी की हिंसा ना करो । प्रत्येक प्राणी के प्रति मंगल की कामना करो, झूंठ ना बोलो । मालिक के बिना किसी चीज को ग्रहण ना करो, परमात्म-तत्व में रमण करो । आवश्यकता से अधिक चीजों का संग्रह न करो ये पांव अणुव्रत हमें जीवन की सही राह दिखाते हैं । पांच अणुव्रत जीवन में आ गए तो सात व्रत जीवन में स्वतः ही आ जाएंगें । 

सिद्धार्थ जो शुद्धोधन का पुत्र था जिसे महात्मा बुद्ध का पद प्राप्त हुआ । कहते हैं जब सिद्धार्थ का जन्म हुआ था तब उस समय उन्हें मृत्यु से बचाने के लिए अनेक उपाय किये जाते थे । वो जिस वाटिका में भ्रमण करता था वहां के मुर्झाए हुए फूल भी निकाल दिये जाते थे, परन्तु प्रत्येक बात से व्यक्ति को रोका नहीं जाता, जैसे हमने कर्म किए हैं वैसा फल तो आता ही है इस अनुसार उन्होंने एक बार किसी शव को शमशान घाट ले जाते हुए देखा और देखते ही भीतर वैराग्य भावना उपस्थित हो गई और वे सन्यास आश्रम की ओर मुड़ गए । उन्होंने अपने जीवन की सभी आशाएं समाप्त कर दी । स्वीकारता में आ गए और जीवन में सुख ही सुख प्राप्त किया । आत्म: ध्यान साधना कोर्स बेसिक एवं ट्रेनिंग कोर्स सुन्दर ढंग से चल रहा है जिसमें बड़ी संख्या में भाग ले रहे हैं। 

आधि व्याधि उपाधि से ऊपर उठने पर समाधि मिलती है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़ 23 नवम्बर, 2004 विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- अरिहंत प्रभु को नमन करते ही हमारे भीतर क्या भाव आता है । उनकी भक्ति, शक्ति आराधना ज्ञान हमारे जीवन में एक सम्बल देते हैं । हमारे जीवन एक आशा है कि हमें सुख मिलेगा यह आशा ही निराशा का कारण बन जाती है । सुख के साथ दुःख अवश्य आता है । प्रभु से प्रार्थना करो प्रभु मेरा सब कुछ छूट जाए पर आपकी भक्ति ना छूटे । परन्तु यह मन हमेशा चालबाजी करता है । मन धूर्त है वह पुराने पर अटका रहता है । वह चाहता है कि नया कुछ भी ना छूटे परन्तु हम अपने पर भरोसा रखें, कुछ भी हो जाए कोई साथ न दे फिर भी अरिहंत पर भरोसा रखो । 

श्रद्धा से विश्वास आता है । श्रद्धा भक्ति करो मोक्ष हमें मिल सकता है पर मन चंचल है उसे संसार में ही रसाता है । हम प्रार्थना करते हैं परन्तु प्रार्थना में भी संसार की कामना कर सकता है । स्वर्ग और मोक्ष तुम्हारे सामने है जो चाहिए वही मिलेगा । विराट् अस्तित्व कें दर्शन हो सकते हैं समाधि मिल सकती है पर हम आधि, व्याधि, उपाधि में अटके हुए हैं, सारा जीवन इनमें ही बीता जा रहा है । जो हमारे पास है उसका हमें ख्याल भी नहीं है, जो दूर है उसे हम ढूढ़ते जा रहे हैं, इतना कुछ करने के बाद हमारी मांग संसार से नहीं छूटती, इसका कारण केवल मन है । मन को समझे और जाने यही जीवन का सार है । 

चातुर्मास के पश्चात् आचार्यश्रीजी का विहार चण्डीगढ़ के आस पास के क्षेत्रों में संभावित है, 19 दिसम्बर, 2004 को आचार्यश्रीजी पंचकूला पधारेंगे जहां पर तप चक्रेश्वरी महासती श्री शुभ जी महाराज के 181 उपवास का पारणा महोत्सव सम्पन्न होगा । 

आत्मा को जीतना सच्चा सुख प्राप्त करना है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़ 24 नवम्बर, 2004 विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- जीवन एक समीक्षण है, अनतर परीक्षण है, अनुशीलन, परिशीलन है, इसका उपयोग कर लो । प्रभु महावीर की स्तुति करते हुए भीतर कैसा भाव उपस्थित होता है वह महत्वपूर्ण है । प्रभु कहते हैं अपनी आत्मा के साथ युद्ध करो । बाहर के युद्ध बहुत कर लिए कितनी सेना फौज पलटन को पछाड़ दिया, अनेकों लोगों की हत्याएं कर ली, खून की होलियां खेल ली पर फिर भी हम किसी को जीत नहीं पाये । किसी को जीतने के लिए सर्वप्रथम अपनी आत्मा को जीतो, अपनी आत्मा को देखो, उस पर चिपका जो मैल है उसे दूर करो । जो अपने द्वारा अपनी आत्मा को जीत लेता है वही सच्चा सुख प्राप्त करता है । अपना अपने द्वारा चिन्तन करो । भीतर की शान्ति, मौन को ग्रहण करो । भीतर की शान्ति को जानने के लिए गहराई आवश्यक है । गहराई एक शून्य अवस्था है उसे जाना नहीं जाता, अनुभव किया जा सकता है हम अनुभव करें, साधना को महत्व दिया जा सकता है । 

जब हम प्रभु महावीर के चरणों में नमन करते हैं तो उनका विराट अस्तित्व, असीम ज्ञान, अनंत क्षमा, मैत्री हृदय में भर जाती है । जैसा व्यक्ति है वैसे गुण हों तो नाम लेने मात्र से बहुत कुछ मिल जाता है । जैसा आप अनुभव करते हो वैसे बन जाते हो । शान्ति का अनुभव करोगे तो भीतर शान्ति आती है । जब आप अरिहंत को याद करें तब भीतर उनके गुण आ जाने चाहिए । भीतर एक भावना रखो कि मुझे अरिहंत की शरण मिल जाए, भीतर के कषाय मिट जाये । 

आचार्यश्रीजी के सान्निध्य में 26 नवम्बर, 2004 को जैन दिवाकर श्री चैथमल जी महाराज की जन्म जयंती एवं उपाध्याय श्री कस्तूरचंद जी महाराज की दीक्षा जयंती मनाई जाएगी, यह दिवस चातुर्मास का अन्तिम दिवस है, इस दिन विदाई समारोह भी होगा और चातुर्मास का निरीक्षण परीक्षण इन पांच माह में हमने क्या खोया, क्या पाया इसकी समीक्षा भी होगी, सभी आचार्यश्रीजी की वाणी का पान करें । 

चातुर्मास के पश्चात् आचार्यश्रीजी का विहार चण्डीगढ़ के आस पास के क्षेत्रों में संभावित है, 19 दिसम्बर, 2004 को आचार्यश्रीजी पंचकूला पधारेंगे जहां पर तप चक्रेश्वरी महासती श्री शुभ जी महाराज के 181 उपवास का पारणा महोत्सव सम्पन्न होगा । 

सबको सुख प्रिय है: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

चण्डीगढ़ 25 नवम्बर, 2004 विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- फकीर असन पहाड़ी की चोटी पर साधना करते हैं । गांव के लोग कभी उन्हें खाने को दे देते हैं और उनका गुजारा चल जाता है । अगर खाने को नहीं मिला तो प्रभु भक्ति और सत्संग में वे तल्लीन हैं । दिन में केवल एक ही बार भोजन करते हैं । संत को एक समय ही भोजन ग्रहण करना चाहिए । प्रभु महावीर ने भी अपनी वाणी में यह बात कही है । जब प्रभु भजन, सत्संग करते हो तब भूख कम लगती है और जब मनोरंजन करते हो तब भूख ज्यादा होती है । जिस ओर हमारी इच्छा होगी उस ओर मन दौड़ता चला जाता है, अगर भीतर सत्संग की इच्छा होगी तो मन सर्वप्रथम सत्संग करेगा फिर भोजन । 

अन्तिम समय में अरिहंत का स्मरण और सत्गुरू का सान्निध्य प्राप्त हो ऐसी भावना भावित करो क्योंकि सत्गुरू के सान्निध्य से ही हमें प्रभु भजन और सत्संग का शुभ धर्म संदेश प्राप्त होगा । बहुत लोग है नाम स्मरण करते हैं धर्म कार्य करते हैं पर जीवन नहीं बदलता । धर्म सब देता है जो मांगो वही देता है । हम मन, वचन, काया से किसी को दुःख ना दे । सभी सुख चाहते हैं, सबको सुख प्रिय है, कोई दुःख दे तो सहनशील बनो, दूसरों का भला करो । महात्मा तुलसीदास ने भी कहा है- परहित सरस धर्म नहीं भाई, पर पीड़ा सम नहीं अधमाही । दूसरों का हित करने में धर्म है । परोपकार करना धर्म कार्य है । 18 पुराणों का सार यही है कि दूसरों को दुःख, पीड़ा देना पाप है और परोपकार करना पुण्य है । सुख दो, दुःख ना दो । 

आचार्यश्रीजी के वर्षावास में पूर्व में पन्द्रह श्रावक दीक्षाएं सम्पन्न हुई उसी कड़ी में आज भी श्रावक दीक्षाएं सम्पन्न हुई । आचार्यश्रीजी ने श्रावक दीक्षा पर समझाते हुए कहा कि अणुव्रत आपका जीवन है । व्रत कोई आरोपन नहीं, जबर्दस्ती नहीं है, व्रत एक जीवन की मर्यादा है । व्रत ग्रहण करने पर श्रावक कहला सकते हो, चतुर्विध संघ में प्रवेश कर सकते हो, पांच अण्ुाव्रत, तीन गुणव्रत और चार शिक्षाव्रत इसमें जीवन का सार समाया हुआ है । हम इसे समझें और जानें ।   

आचार्यश्रीजी के सान्निध्य में 26 नवम्बर, 2004 को जैन दिवाकर श्री चैथमल जी महाराज की जन्म जयंती एवं उपाध्याय श्री कस्तूरचंद जी महाराज की दीक्षा जयंती मनाई जाएगी, यह दिवस चातुर्मास का अन्तिम दिवस है, इस दिन विदाई समारोह भी होगा और चातुर्मास का निरीक्षण परीक्षण इन पांच माह में हमने क्या खोया, क्या पाया इसकी समीक्षा भी होगी, सभी आचार्यश्रीजी की वाणी का पान करें । 

चातुर्मास के पश्चात् आचार्यश्रीजी का विहार चण्डीगढ़ के आस पास के क्षेत्रों में संभावित है, 19 दिसम्बर, 2004 को आचार्यश्रीजी पंचकूला पधारेंगे जहां पर तप चक्रेश्वरी महासती श्री शुभ जी महाराज के 181 उपवास का पारणा महोत्सव सम्पन्न होगा ।