PRAVACHANMALA - AMBALA 2007

अम्बाला कैंट में आचार्य भगवंत का मंगलमय प्रवेश सानंद सम्पन्न

 

अम्बाला कैंट 16 जुलाई, 2007: युग पुरूष श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज आज प्रातः पुलिस लाईन से विहार करते हुए अम्बाला कैंट पधारे । यहां पर काली बाड़ी चैक स्थित महावीर जैन भवन में उनका अम्बाला शहर वर्षावास हेतु शुभागमन हुआ । इसी दौर में वे अम्बाला कैंट पधारे । इस अवसर पर स्थानीय समाज ने उनका भव्य नागरिक अभिनन्दन किया । 

इस अवसर पर आचार्य भगवंत ने अपनी मंगलमयवाणी का पान कराते हुए सबको वीतरागता की ओर मुड़ने के लिए विशेष आह्वान किया और इस वीतरागता को प्राप्त करने के लिए आत्म विकास कोर्स में भाग लेने के लिए प्रेरित किया । श्रद्धेय आचार्य भगवंत ने फरमाया कि- परामात्मा को पाना है तो आंखे बंद करनी होगी । खुली आंखों से इस संसार को देखा जा सकता है परन्तु परमात्मा को नहीं देखा जा सकता । आंखे बंद होने पर परमात्मा की झलक दिखाई देती है । आंखों के बंद होने के साथ-साथ कान और मुख को भी बंद करना होगा । जिन कानों से हम बाहर की आवाजें सुन रहे हैं उन्हीं कानों से हम भीतर का अनहद नाद सुने एवं जिस मुख से हम बोल रहे हैं उस वाणी को मौन में परिवर्तित करे तभी परमात्म प्राप्ति संभव है । यह शरीर अनंत बार मिला । इस शरीर के द्वारा अनंत जीवों ने अपनी आत्मा के प्रकाश को पाया । हम भी इस शरीर के द्वारा आत्म प्रकाश को पा सके । 

आज का युग विज्ञान का युग है । आज का मानव हर बात प्रयोगात्मक स्तर पर सिद्ध कर रहा है इसलिए हमें भी प्रयोग की भूमिका में उतरना है । हमने आज तक अनेकों उपदेश सुने, अम्बाला शहर में अनेक चातुर्मास  हुए । चातुर्मास में साधु-साध्वी अनेक प्रकार के उपदेश सुनाते हैं । वे उपदेश अब हमारे भीतर आचरण में कैसे बदले, यही प्रयोग हमने प्रस्तुत वर्षावास में सीखना है । हमारी आत्मा जो निर्मल है ही केवल उसके दर्शन करने हैं और इसकी भूमिका ध्यान साधना के द्वारा संभव होगी । धर्म की शुरूआत भीतर से होती है । हम धर्म से जुड़े, शरणभाव में आए तभी यह सब संभव है । 

आचार्यश्रीजी ने अपने उपदेश में निन्दा ना करने का आह्वान करते हुए कहा कि- निन्दा से असंख्यात कर्मों का बंधन है और हमारी भव परम्परा बढ़ती है, इसलिए निन्दा नहीं करनी चाहिए । कोई भी व्यक्ति यहां निन्दनीय नहीं है सभी प्रभु महावीर के धर्म संघ के अंग हैं । हम सभी एकजुट होकर उस प्रभु महावीर की वीतरागता की ओर आगे बढ़े । देह मन्दिर है इसके भीतर तपोवन है, उस तपोवन में हमें रमण करना है । जितना समय रमण में बीतेगा वही हमारी सच्ची परलोक की पूंजी है । जब श्वासें टूट जाएगी तब एक सुई की नोक जितना सामान भी साथ नहीं ले जा पाओगे इसीलिए वीतरागता से जुड़ों । वीतरागता परलोक सुधारने वाली है । 

इस अवसर पर आचार्यश्रीजी ने संथारा साधिका महासाध्वी श्री स्वर्णकान्ता जी महाराज का नामोल्लेख करते हुए अम्बाला पदार्पण, अम्बाला का गौरव एवं महासाध्वीजी की सहजता, सरलता पर अपने भाव व्यक्त किए । अम्बाला वर्षावास में आचार्यश्रीजी के साथ शासन ज्योति महसाध्वी श्री सुधा जी महाराज एवं उनकी शिष्याएं चातुर्मासरत होंगी । 

आचार्यश्रीजी के अम्बाला कैंट पधारने पर श्रमण संघीय मंत्री श्री शिरीष मुनि जी महाराज ने स्वागत अभिनन्दन करते हुए सभी लोगों को आचार्यश्रीजी के जीवन से परिचित कराते हुए उनके द्वारा संशोधित ध्यान साधना से जुड़ने का आह्वान किया । इस अवसर पर स्वर्ण ग्रुप की ओर से प्रवचन प्रभाविका महासाध्वी श्री किरण जी महाराज ने आचार्यश्रीजी के पदार्पण पर हार्दिक अभिनन्दन एवं स्वागत किया । जैन युवती संघ ने भी भजन के द्वारा अपनी भावनाएं अभिव्यक्त की । सेक्टर 7 के महामंत्री श्री सतपाल जैन, अम्बाला श्रीसंघ के प्रधान श्री प्रेमचंद जैन एवं स्थानीय मंत्री श्री सुशील कुमार जैन ने भी आचार्यश्रीजी के यहां पधारने पर हार्दिक अभिनन्दन एवं स्वागत किया । ‘‘आत्म-दीप पत्रिका’’ चातुर्मासिक विशेषांक का विमोचन श्री एन0के0 जैन, अम्बाला कैंट ने किया ।  

आचार्यश्रीजी 19 जुलाई तक अम्बाला कैंट बिराजेंगे । प्रतिदिन प्रवचन प्रातः 8.00 से 9.30 बजे तक प्रवचन होगा । आप सभी प्रभु महावीर के उपदेश श्रवण कर जीवन को पवित्र बनायें । इस अवसर पर मुलाना, सढ़ोरा, बराड़ा, पट्टी, चण्डीगढ़, जालंधर, शाहबाद, आदि स्थानों से भाई बहिन उपस्थित हुए । 

अनिल जैन, प्रधान

श्री एस0 एस0 जैन सभा, अम्बालाकैंट

 

निन्दा प्रशंसा से उपर उठो: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

अम्बाला कैंट 17 जुलाई, 2007: युग पुरूष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- राग द्वेष के विजेता अरिहंत ही इस पूरे विश्व में ही नहीं अपितु तीनों लोकों में श्रेष्ठ, उत्तम और प्राप्तव्य है । सूरज की पहली किरण के साथ हम प्रार्थना, कृतज्ञता और भक्ति के भाव अरिहंत चरण में रखें । प्रभु से किसी ने जिज्ञासा प्रकट की, प्रभु इस ब्रह्माण्ड में नित्य मंगलरूप, शुभ पवित्र क्या है ? प्रभु ने बड़े सुन्दर और सरल शब्दों में प्रत्युत्तर दिया कि- आत्मा और परमात्मा इस ब्रह्माण्ड में उत्तम है, उसके पश्चात् पूछा तो अशुभ, अमंगल, अस्थिर, अपवित्र क्या है ? उत्तर में कहा- शरीर नश्वर, विनाशशील है । 

हमने जन्म से अब तक महत्व दिया है शरीर को जो कि अस्थिर है । शरीर का कोई भरोसा नहीं है, कब मिट्टी में मिल जाये । सुन्दर दिखने वाला शरीर जलाया जाने वाला है । जो परिवार वाले आपस में प्यार करते थे आपके बगैर नहीं रह सकते वहीं आपके शरीर को थोड़े समय के लिए भी घर में नहीं रखने वाले । हमारी सारी उधेड़बुन शरीर के लिए है । इस संसार का सबसे बड़ा झूठ है व्यक्ति का विचार भ्रम की मैं शरीर हूं, मैं पिता हूं आदि उपाधियां। आज व्यक्ति भौतिकता की चकाचैंधमें यह भूल ही गया है कि नाम तो माता और पिता ने दिया है । नाम इसलिए दिया कि परिवार में अनेक व्यक्ति रहते हैं अगर किसी को बुलाना है तो क्या किया जाये इसलिए नाम दिया गया परन्तु जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होता है तो इसको भूलकर नाम को ही अपने से जोड़ लेता है । 

मन्दिर, गुरूद्वारों, गिरिजाघरों, गुरू चरणों में जब भी प्रार्थना करते हैं सम्पत्ति, पद, परिवार के सुख समृद्धि की कामना करते हैं । धन परिवार की कामना करेंगे तो वह प्राप्त तो हो जायेंगे परन्तु संसार वृद्धि होगी । अगर संसार वृद्धि होगी तो दुःख भी बढ़ेगा और इस प्रकार भव भ्रमण का चक्र निरन्तर चलता  रहेगा । मांगना है तो धर्म और जन्म मरण से मुक्ति की प्रार्थना करो । व्यक्ति जब धर्म में रत रहता है तो उसका मन सहज ही संसार से विरक्त हो जाता है । 

प्रशंसा और निन्दा से साधक को प्रभावित नहीं होना चाहिए । अक्सर प्रशंसा के शब्दों से व्यक्ति बड़ा प्रसन्न होता है परन्तु साधक को प्रशंसा में भी सचेत रहना चाहिए । जैसे गुब्बारे में हवा भरी होती है उस गुब्बारे को सुई की नोक लगते ही गुब्बारा फूटता है इसलिए प्रशंसा में प्रसन्न होने वाले व्यक्ति निन्दा सहन नहीं कर पाते तो जीवन में दुःखी होते  हैं । कबीरजी ने निन्दा के महत्व को बताते हुए कहा है- निन्दक नियरे राखिए, आंगन कुटी छवाए । अर्थात् निन्दक को अपने पास रखे क्योंकि वह आपके दुर्गुणों को दूर करने में सहायक है व्यक्ति प्रमाद में मूच्र्छित स्थिति में अपने दुर्गुण नहीं जान पाता निन्दक के निन्दा करने से व्यक्ति को बुराईयों का ज्ञान होता है, जिसको जानकर साधक अपने बुराईयों को मिटाने का प्रयास कर सकता है । जब कोई कहे कि तुम सुन्दर हो तो एक बार अपने भीतर सोचना कि यह सुन्दरता शरीर की है । आज सुन्दर है कल बीमारी ने घेर   लिया या उम्र बढ़ने पर रूप कुरूपता में बदल   जाएगा । असली सुन्दरता तो भीतर की है । भीतर के क्रोध आदि कषाय, कुरूपता है उसे मुझे दूर करना है । अनंत जन्मों से भव-भ्रमण चल रहा है । अनंत योनियों में जाकर आये परन्तु परमात्मा की अनुभूति नहीं हुई इसका मूल कारण तो भीतर के कषाय ही है । 

आचार्यश्रीजी ने अम्बालाकैंट निवासियों की भक्ति भाव, सेवा, लगन को देखकर कहा कि हमारा चातुर्मासिक प्रवेश तो अम्बालाकैंट से ही हो गया है । विधि विधानानुसार दिनांक: 29 जुलाई से प्रारंभ हो रहे चातुर्मास के दौरान इस अनमोल प्रभु के उपदेश को अनुभव आपको सत्संग और ध्यान शिविरों के माध्यम से कराया जायेगा । भेद-विज्ञान अर्थात् शरीर और आत्मा दोनों की भिन्नता का दर्शन ही चातुर्मास का मूल उद्देश्य है । प्रवचन का श्रवण करने का अवसर तो प्राप्त होते ही रहे हैं । उन प्रवचनों को आचरण में लाने का अभ्यास करना ही चातुर्मास का लक्ष्य रहेगा । प्रवचन बरसात की धीमी बौछारों की भांति होगा जो आपके भीतर की दीवारों, संकीर्णताओं को मिटाकर प्रेम, वात्सल्य को बढ़ाएगा । 

 अनिल जैन, प्रधान

श्री एस0 एस0 जैन सभा, अम्बालाकैंट

 

शुद्ध भाव भक्ति का प्रवेश द्वार है: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

अम्बाला कैंट 18 जुलाई, 2007: युग पुरूष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- हर व्यक्ति में अनंत शक्ति विद्यमान है । व्यक्ति जीवन को स्वर्गमय बना सकता है, और फूलों की भांति जीवन को प्रफुल्लित भी कर सकता है परन्तु अज्ञानता में व्यक्ति लोहे को प्राप्त कर कंटक रूपी विषयों को प्राप्त करके ही खुश हो जाता है । आगे विकास  कर उस अनंत शक्ति का अनुभव ही नहीं करपाता शक्ति का, वस्तु का क्या उपयोग करना है यह हमारे स्वयं के ज्ञान और अज्ञान पर निर्भर है । डाॅक्टर या वैद्य के पास सुई है तो वह किसी के जीवन को बचाने का कार्य उस सुई के द्वारा करता है परन्तु अगर वही सुई किसी बच्चे या अज्ञानी के पास पहुंच गई तो किसी की जिन्दगी बिगाड़ देती है । 

धर्म की शुरूआत आपके हृदय से होती है । धर्म क्रियाएं करने से पूर्व अपने हृदय को टटोले, हिसाब किताब लगावें । हमने इन अनमोल श्वासों का शुभ विचारों में लगाया है या कहीं अशुभ विचारों में तो नहीं लगाया है । जिन श्वासों को आपने सत्कार्य में लगाया है वे श्वास सफल है । समय की अनमोलता को जाने उन्हेें यूं ही व्यर्थ न गंवाएं । जो क्षण बीत चुके हैं वे फिर लौटकर नहीं आने वाले परन्तु जो क्षण चल रहा है या आने वाला है उसे हम धर्म कार्यों में लगाए ।

भक्ति में डूबने से पूर्व अपने मन, बुद्धि, तर्क, विचार को अलग रखना क्योंकि परमात्मा बुद्धि द्वारा ग्राह्य नहीं है । महान योगी रमण महर्षि को कैंसर जैसा भयानक और असहय रोग हुआ परन्तु इन्होंने समताभाव से और मुस्कुराते हुए सहन किया । उनके पास विद्वान, शास्त्रों के मर्मज्ञ आते, विविध प्रश्न       पूछते । महर्षिजी शांतभाव से सुनते और चुपके से पूछते कि तुम कौन हो ? सारे विद्वान निरूत्तर हो   जाते । जब में कौन हूं का जवाब मिल गया तो सारी समस्याएं सुलझ जाती है । 

आप भी गुरू के आदेश के अनुसार इस विधि का प्रयोग घर में कर सकते हैं । आंखें बंद करके प्रश्न पूछते जाना कि मैं कौन हूं । पहले-पहले तो जवाब मिलेंगे कि माता हूं में इंजीनियर हूं मैं हिन्दू, मुसलमान, जैन हूं । मैं मन्दिर को मानने वाला हूं, मैं गुरू को मानने वाला हूं । प्रश्नोत्तर के अन्तिम में शुन्य की स्थिति आएगी ओर आप वास्तविक में कौन हूं, इसका प्रत्युत्तर प्राप्त कर लेंगे । अगर जीवन में ऐसा परिवर्तन जन्म पर्यंत भी आ जाए तो जीवन की सार्थकता है । 

परमात्मा के चरणों में जब व्यक्ति शुद्ध भावों से झुकने लग जाता है तो वह अपने पापों का प्रायश्चित किये बगैर नहीं रहता । धर्म कार्य करने से पूर्व पात्रता जरूरी है अगर हृदय शुद्ध पवित्र है तो परमात्मसिद्धि सरलता के साथ हो जाएगी । जिस प्रकार धन को प्राप्त करने के हजारो तरीके हैं उसी प्रकार धर्म भी विविध मार्गों से प्राप्त किया जा सकता है । प्रार्थना, भक्ति कलयुग के अंतर्गत सरल मार्ग   है । हर उम्र और धर्म सम्प्रदाय का व्यक्ति प्रार्थना के द्वारा परमात्मा और आत्मा का अनुभव कर सकता   है । 

जो भी आपने बीते समय में पाप किये हैं उन्हें गुरू-चरणों में आलोचना कर उन्हें फिर न करने का संकल्प लेकर जीवन की नई शुरूआत करो । फिर भक्ति और प्रार्थना की शुरूआत होती है। शुद्ध, पवित्र हृदय और सब जीवों के प्रति मंगल भाव ही प्रार्थना का प्रवेश द्वार है । 

   अनिल जैन

प्रधान: एस0एस0 जैन सभा

    अम्बाला कैंट

 

संथारा अर्थात् आत्मभाव में रमण: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

अम्बाला कैंट 19 जुलाई, 2007: युग पुरूष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- महान् संत स्वामी श्री मदनलाल जी महाराज के सुशिष्य एवं संघाशास्ता श्री सुदर्शनलाल जी महाराज के गुरू भाई तपस्वी श्री रामप्रसाद जी महाराज इस नश्वर शरीर को त्यागकर देवलोकगमन को प्राप्त हुए हैं । श्रीरामप्रसाद जी महाराज साधना, ज्ञान, तप के सम्पूर्ण जीवन पर्यन्त आराधक थे । पिछले कई दिनों से उन्होंने स्वयं की इच्छा से केवल जल और द्रव्य पदार्थ पर रहने का निर्णय लिया बाद में जल को भी छोड़कर आत्मभाव में रमण करने का संकल्प लिया । जिस लक्ष्य से उन्होंने संयम जीवन सन्यास ग्रहण किया था उस लक्ष्य को समभाव से प्राप्त   किया । 

जैन धर्म में संथारा जीवन का सार बतलाया है । मनुष्य जीवन में धर्म प्राप्त करने वाले बहुत कम होते हैं और उनमें भी अन्तिम समय मंे समाधिभाव रखने वाले विरले ही होते हैं । संथारा से अभिप्राय है अपनी स्व इसे, शुद्ध विचारों से मृत्यु को प्राप्त होना । सर्वप्रथम अठारह प्रकार के पापों को स्मरण करके उनकी गुरू साक्षी या आत्मसाक्षी से स्वीकार करना और प्रायश्चित लेना, संसार के किसी भी जीव के प्रति वैरभाव हो तो उसे मिटाकर उनके प्रति मंगलभाव रखना फिर शरीर की अनासक्ति स्वरूप पानी, अन्न आदि का त्याग कर केवल आत्मभाव में रहना । 

हमारा सबका चरम लक्ष्य भी यही है । शरीर सबका माटी में मिल जाना है चाहे अमीर का हो, चाहे गरीब का हो, चाहे संत का हो, चाहे ग्रहस्थ का हो । अपने-अपने कर्मों के अनुसार सभी को शरीर मिला है परन्तु शरीर का सार्थक उपयोग ही कर पाता है । आप भी हर रोज अपने पापों की आलोचना करें । संथारा एक ही क्षण में नहीं लिया जाता, उसके लिए सम्पूर्ण जीवन उसकी साधना करनी होती है । शरीर की आसक्ति छोड़ने का पूर्वाभ्यास करना होता है तब कहीं यह उपलब्धि जीवन में आती है । 

संत एवं साधकों की परीक्षा संथारे के माध्यम से होती है । चर्चा एवं उपदेश भी जीवन के लिए महत्वपूर्ण है परन्तु वास्तविक धर्म तो आचरण ही है । महापुरूषों ने भी कहा है- ‘‘धारयतिति धर्मः’’ बहुत सारे मिष्ठान्न आपके सामने पड़े हो आपको भूख लगी हो तो उसको देखने मात्र से पेट भर नहीं सकता । उसको खाने के बाद ही तृप्ति हो सकती है, वैसे ही जब तक ज्ञान को आचरण में जीवन में नहीं अपनाया जाता तब तक तृप्ति आनंदानुभूति नहीं होती । श्री रामप्रसाद जी महाराज आज देह रूप में नहीं है परन्तु उनका ज्ञान, तप, वर्चस्व आज भी विद्यमान है । 

दिल्ली में चादर महोत्सव के पश्चात् मैने उनके दर्शन किये । उस समय अधिक बोल नहीं पाते थे परन्तु उनके चेहरे से ही उनकी भीतरी शांति झलकती थी, सरलता और विनम्रता परिलक्षित होती थी । 

 

कलश स्थापना मंगल का प्रतीक है: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

अम्बाला शहर 22 जुलाई, 2007: युग पुरूष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- जीवन के हर पड़ाव में हर कार्य करते हुए जैसे गुरू स्मरण, दुकान में, घर में रहते हुए अरिहंत परमात्मा को कदापि न भूले जो इस समय महाविदेह क्षेत्र में विराजमान है अपनी साधना आराधना करते हुए अनेक भवि आत्माओं को धर्म का मार्ग बताकर भव सागर से पार कर रहे हैं । व्यक्ति जीवन में कभी भी सम्पूर्ण नहीं होता परन्तु विडम्बना है कि व्यक्ति अपने को सम्पूर्ण मान लेता है और अहंकार मंे मदमस्त हो जाता है । 

आज समाज के लोगों ने बड़े उत्साह और उमंग के साथ व्यवस्थित कार्यक्रम प्रस्तुत किया । भजन के माध्यम से नाटक प्रदर्शित किया वह सराहनीय रहा । श्रीसंघ के द्वारा आयोजित कार्यक्रम समय पर और व्यक्ति अनुसार रखा गया, जैसे गुलदस्ते में विविध सुगंधित पुष्प होते हैं माली उन फूलों को कहां पर सजाना संवारना है यह सब जानकर एक सुन्दर रूप हमारे सामने रखता है । समाज ने सभी धर्म कार्य स्वागत, जुलूस करके धर्म प्रभावना की है जो प्रशंसनीय है । 

कलश स्थापना मंगल का प्रतीक है । यह हमारे भारत की सनातन परम्परा रही है । कलश स्थापना से सभी धर्म कार्य निर्बाधगति से परिपूर्ण होते हैं इसलिए धर्म कार्य के आचरण से पूर्व कलश स्थापना होती रही है । समाज का, परिवार का, व्यक्तिगत कोई भी कार्य जब पूर्ण होता है तो उसके पीछे हर वर्ग एवं व्यक्ति का सहयोग होता है परन्तु व्यक्ति अज्ञानतावश यह भूल जाता है और कार्य की सफलता का श्रेय स्वयं लेना चाहता है । धर्म स्थान में आकर अहंकार को तिरोहित कर दें । कार्य कोई बड़ा या छोटा नहीं होता जो भी कार्य आपको मिले उसे आप हृदय के शुद्ध भावों में करें यही सेवा है । गुरू-चरणों में आओ तो बिना किसी अपेक्षा और निःस्वार्थ-भाव से आओ । धर्म क्या है ? हम कहां पर चल रहे हैं, उनमें गलत और सही क्या है इसका आत्म चर्चा करना । 

आचार्य भगवन् के प्रवचन से पूर्व आचार्यश्रीजी के आगमन के उपलक्ष्य में बहिनों ने स्वागत गीत प्रस्तुत किया । महासाध्वी श्री किरण जी महाराज ने आचार्यश्रीजी की महिमा का वर्णन किया । उसके पश्चात् मंत्री श्री शिरीष मुनि जी महाराज ने भी नवकार कलश एवं मंगल के विषय में चर्चा कर आचार्यश्रीजी के चरणों में श्रद्धा-भाव अर्पण किया । 

अर्बन एस्टेट, अम्बाला के प्रधान श्री विनोद कुमार जैन, महामंत्री श्री सतपाल जैन, श्री राजीव जैन, श्री नरेन्द्र जैन, श्री जितेश जैन, श्री ललित जैन, श्री धर्मपाल जैन, श्री बालभूंषण जी जैन, श्री नरेश जैन आदि सभी की सेवाएं सराहनीय रही । कार्यक्रम में अम्बालाकैंट के प्रधान श्री अनिल जैन, एस0एस0जैन अम्बाला शहर के प्रधान श्री प्रेमचंद जैन, महामंत्री श्री गुलशन जैन आदि की उपस्थिति रही । महामंत्री श्रीसतपाल जी जैन ने सभा का सुन्दर संचालन किया । 23, 24 जुलाई, 2007 का मंगल प्रवचन प्रातः 8.00 से 9.30 बजे तक रखा गया एवं आचार्यश्रीजी का एस0एस0 जैन सभा, महावीर भवन, महावीर मार्ग, अम्बाला शहर में 25 जुलाई, 2007 को नगर के विभिन्न स्थानों से होते हुए चातुर्मासिक प्रवेश होगा । 

प्रस्तुत कार्यक्रम के स्वागताध्यक्ष श्री सुशील कुमार जैन सुपुत्र श्री जयगोपाल जैन सराफ अम्बालाशहर, समारोह के अध्यक्ष श्री अनिल जैन प्रधान एस0एस0 जैन सभा अम्बाला शहर थे । नवकार कलश की स्थापना श्री ज्ञानचंद जी जैन पट्टी वालों ने की । ध्वजारोहण श्री वेद प्रकाश अग्रवाल, अम्बाला छावनी ने किया । समारोह गौरव श्री श्यामसुन्दर जी, श्री सुखदर्शन जी भी उपस्थित थे । 

 

आसक्ति को तोड़ना आत्म दर्शन में सहयोगी: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

अम्बाला शहर 23 जुलाई, 2007: युग पुरूष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- सर्वज्ञ प्रभु और वीतरागवाणी का सार तत्व है मैं शुद्ध हूं, मैं बुद्ध हूं, में निरंजन हूं, में निराकार हूं । यह प्रतीति जब व्यक्ति भीतर की गहराई में जाता है तब होता है । उस प्रतीति की अनूठी उपलब्धि है कि व्यक्ति संसार से विरक्त होता है ऐसा नहीं है कि उसे अलग से प्रयास करना पड़ता है बल्कि कीचड़ में कमल की भांति वह संसार में रहते हुए भी उस सार तत्व का अनुभव कर सद्चित्त आनंद की प्राप्ति करता है । 

हमें इस उपलब्धि को प्राप्त करने के लिए जो व्यर्थ और निरर्थक है उसे छोड़ना पड़ेगा । हम शरीर के रोग मोटापा आदि से मुक्ति चाहते हैं उस हेतु डाॅक्टर के पास जाते हैं दवाई आदि द्वारा इलाज कराते हैं परन्तु मिठाई, भोजन को नहीं छोड़ पाये तो उस डाॅक्टर और दवाई का कोई दोष नहीं है । वैसे ही जीवन में अधिक क्षण व्यर्थ की निन्दा और आचरण को छोड़ें क्योंकि छोटी-छोटी बातों से जुड़ने से भी कर्म का बंधन होता है । जो जन्म-मरण का चक्र चल रहा है उसके दोषी हम स्वयं है जो कर्मों का बंधन किया उसे भोगना ही पड़ेगा अथवा तप, स्वाध्याय द्वारा हमें उसे आत्मा से मुक्त करना पड़ेगा । क्षण भर किया हुआ क्रोध असंख्यात कर्मों का बंधन करता है इसलिए जहां तक हो सके क्रोध आदि अशुभ प्रवृत्तियों से बचने का प्रयास करना चाहिए । 

जीवन की हर क्रियाओं में आत्म चिन्तन करते रहना चाहिए । जीवन मिला है तो आवश्यक क्रियाएं तो करनी ही पड़ेगी परन्तु अगर हम उन क्रियाओं में जागरूकता और विवेक रखते हैं तो व्यर्थ कर्म बंधनों से हम दूर रह जाते हैं । घर, परिवार, जाति तो हमें कर्मानुसार प्राप्त होती है जैसा घर है उसी प्रकार संस्कारों का निर्माण होता है । जब भीतर की दुनिया में प्रवेश किया जाता है तो मन, बुद्धि, संस्कार और धारणा छोड़ने ही पड़ते हैं तभी कर्मों से मुक्त हुआ जा सकता है । आवश्यकता केवल उद्देश्य पूर्ति की प्यास, राग, द्वेष विजेता के प्रति श्रद्धा, समर्पण और संकल्प की है । 

हम सब यह जानते हैं कि शरीर न राजा का रहा है न रंक का, पर इस शरीर की नश्वरता अस्थिरता को जानते हुए भी हमारा ध्यान शरीर से छूट नहीं पाता है । शरीर साधना मंे सहयोगी है । शरीर द्वारा वीतराग-भाव से किया हुआ कार्य कर्म मुक्ति में सहायता देता है । मोह अर्थात् आसक्ति को महापुरूषों ने कर्मों का राजा बताया है । अगर मोह कर्म को समझकर हमने उसे जीतने का प्रयास किया तों बाकी बातें अपने आप संभल जाती है । मोह को हम स्वयं ही पनपने देते हैं । हमारा मोह बेटे, पत्नी और नश्वर चीजों के प्रति होता है जो मिटने वाले और नष्ट होने वाले हैं । जब व्यक्ति भीतर की ओर मुड़ता है तो उसे अज्ञानता का बोध होता है और वह उसे छोड़ने के लिए पुरूषार्थ भी करता है । 

ध्यान कोर्सों के माध्यम से यह प्रयोग किया गया है कि जो व्यक्ति को प्रिय कपड़े हैं उसे वह न धारण करें और जो कपड़े बेकार है, फेशन के विपरीत है दिखने में बुरे लग रहे हैं उन्हें समारोह और शादी में पहने तो उन्होंने अनुभव किया कि व्यक्ति दुःखी हुआ, परेशान हुआ, आसक्ति व्यक्ति को सहज जीवन जीने नहीं देती है ।

प्रभु महावीर ने भी शरीर, कपड़े की आसक्ति को तोड़ने के लिए बताया कि जब सर्दी का मौसम हो, कड़ाके की सर्दी हो तो भिक्षु अपने शरीर पर वस्त्र को कम कर दे और भरी दोपहर में सूरज पूर्ण गर्मी बरसा रहा हो तब धूप में बैठकर आतापना का अपनी क्षमतानुसार बैठने का अभ्यास करें तभी आसक्ति को तोड़ा जा सकता है और जो हमारी आत्मा जन्मो-जन्मों से कर्मों के आवरण से ओझल है उसे प्रकाशित किया जा सकता है, उसे कर्मों से मुक्त किया जा सकता है । 24 जुलाई, 2007 का मंगल प्रवचन प्रातः   8.00 से 9.30 बजे तक एस0एस0 जैन सभा अर्बन एस्टेट, अम्बाला शहर में होगा तदन्तर प्रवचन के पश्चात् आचार्यश्रीजी जैन स्थानक से विहार कर लाला नेमनाथ जी जैन की कोठी नं0ः 875, सेक्टर 7 अर्बन एस्टेट, अम्बाला में पधारेगें । वहां से विहार कर एस0एस0 जैन सभा, महावीर भवन, महावीर मार्ग, अम्बाला शहर में 25 जुलाई, 2007 को नगर के विभिन्न स्थानों से होते हुए चातुर्मासिक प्रवेश होगा । 

गलतियों को स्वीकार कर दूर करें: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

महापुरूष, तीर्थंकर, अरिहंत के प्रति दिल में श्रद्धाभाव है तो ईंसान अपने लक्ष्य को प्राप्त कर    लागे । चाहे कोई भी महापुरूष, पैगम्बर, गीता का सार, ग्रन्थों का निचोड़ सबका लक्ष्य एक ही है । अज्ञानी मनुष्य आज अपने वास्तविक लक्ष्य से भटक गया है । वह समझता है कि यश प्राप्त हो गया, समृद्धि, सम्पन्नता प्राप्त हो गयी तो जीवन की सफलता है और उसी को अपना लक्ष्य मान बैठा है । मनुष्य इन्हीं उलझनों में अपने जीवन में मिले अनमोल समय को व्यर्थ कर देता है परन्तु धन सम्पदा प्राप्त होने पर भी अन्तिम में पछतावा ही होता है । 

मनुष्य गलती करके उसे स्वीकार नहीं करता है और बाद में फलस्वरूप अशांति बेचैनी प्राप्त करता है । संसार में रहते हुए अज्ञानता के कारण मनुष्य से गलती हो सकती है । जब तक महापुरूष या सर्वज्ञ नहीं बनेंगे तब तक भूले तो होंगी परन्तु गलतियों को स्वीकार करके उन्हें दूर करने का प्रयास किया जा सकता है । महापुरूषों की वाणी है स्वीकार करने वाला सुखी होता है और जो इन्कार करता है वह दुःखी होता है । जीवन में धर्म है तो गलतियों को व्यक्ति स्वीकार करता है । अधार्मिक गलतियों को सुनकर तिलमिला जाते हैं । धर्म ग्रन्थ, सन्त पुरूष कभी भी झूठ, चोरी माया करने का उपदेश नहीं देने है । मनुष्य इन दुर्गुणों को जानते हुए भी बहाने बनाता है कि इन बुराईयों से आज के युग में बच नहीं सकते । यह व्यक्ति का अपना स्वार्थ और भ्रम है । अगर कोई धर्म पर श्रद्धा रखता है महापुरूषों की वाणी पर विश्वास रखता है और आत्मज्ञानी बनने की चाह है तो दृढ संकल्प गलतियों को दूर कर आत्मशुद्धि कर सकता है । 

मन, वचन और कार्य से किये हुए कर्म का भुगतान हर व्यक्ति को करना होता है । आत्माा के उपर किये हुए कर्मों का आवरण अथवा औरा बन जाता है । अक्सर हमारा मन धार्मिक गतिविधियों में नहीं लगता है परन्तु जहां पर निन्दा, अफवाहें बोली जाती है वहां पर हम रूची से पहुंच जाते हैं । धर्म हमारा स्वभाव है और शांति हमारे भीतर है । मन, शरीर का अपना अपना धर्म है । शरीर को सर्दी-गर्मी लगती है तो उसका हम बचाव करते हैं ए0सी0 आदि उपकरण लगाकर गर्मी से छुटकारा पाते हैं । कोई व्यक्ति आपके गुणों की प्रशंसा करता है तो मन खुश होता है और निन्दा करता है तो मन दुःखी होता है । यह मन की स्थिति है मनुष्य इन प्रवृत्तियोंको अपना स्वभाव मान बैठता है । धर्म मार्ग पर चलते हुए लोग आपकी निन्दा भी करेंगे परन्तु उनकी निन्दा से घबराना मत । निन्दा को भी शांति से श्रवण करोगे और यह तो अपने इस जन्म अथवा पर्ण जन्म का फल है तो आप निन्दा को सुनने की क्षमता अपने भीतर पैदा करते हो प्रभु ने दुनियां और धर्म को देखने के लिए दो दृष्टियां वर्णित की है । एक है व्यवहार दृष्टि और दूसरी है निश्चय दृष्टि । व्यवहार में नाम, परिवार, समाज के सभी कर्तव्यों को पूरा करना । उनको सुख पहुंचाने के लिए जो भी आवश्यक और उचित लगे उसे करना परन्तु निश्चय दृष्टि से विचार करना की सभी जीवों में आत्मा है । सभी कार्य करते हुए भी हम आत्मभाव न भूले यही निश्चय दृष्टि है । दोनों दृष्टियों को जिन्दगी में ग्रहण करना तभी हम संतोषी हो सकते हैं । तीर्थंकर अर्थात् संसार सागर से पार होने का मार्ग बतलाने वाले सभी कार्य आम मानव की भांति करते हैं । हमारी भांति ही बोलते, चलते और भोजन आदि क्रियाएं करते हैं परन्तु आत्मभाव होने से कर्मों की तुरन्त निर्जरा कर शुद्धि कर लेते हैं । 

आत्मभाव से दान धर्म क्रियाएं करते हैं तो वह वास्तव में सफल होती है । आपका मकान आप बनाते हैं वह थोड़े समय तक ही आपके पास रह पाता है जब तक आप जी रहे हैं तब तक आप उसमें रह सकते हैं परन्तु धर्म स्थान अथवा धर्म के लिए दिया हुआ दान जहां पर भी आप रहेंगे और जाएंगे उसके साथ-साथ काम आता है, धन कम नहीं बल्कि अधिक ही प्राप्त होता है । प्रभु महावीर ने कहा है- धन की  अधिकता अथवा हृदय अनुकम्पा से किया हुआ आचरण दान है । दान गुप्त और निःस्वार्थ-भाव से दिया जाना चाहिए । सुबह और शाम अरिहंत प्रभु से यही प्रार्थना करो कि शुद्ध धर्म हमारे जीवन में आये । जैन स्थानक सेक्टर 7 अर्बन स्टेट से विहार कर आचार्यश्रीजी लाला नेमनाथ जी जैन 875 अर्बन एस्टेट, सेक्टर 7 अम्बाला शहर के निवास स्थान पर पधारे । यहां से विहार कर एस0एस0 जैन सभा, महावीर भवन, महावीर मार्ग, अम्बाला शहर में 25 जुलाई, 2007 को नगर के विभिन्न स्थानों से होते हुए चातुर्मासिक प्रवेश होगा । 

 

पी0के0 आर0 जैन स्कूल में आत्म: ध्यान का प्रयोग

अम्बाला शहर 27 जुलाई 2007 पी0के0 आर0 जैन सीनियर सेकेण्डरी स्कूल, अम्बाला शहर में युग पुरूष आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज के सुशिष्य श्रमण संघीय मंत्री श्री शिरीषमुनि जी महाराज ने स्कूल के विद्यार्थियों एवं टीचरों को ध्यान साधना के विषय में सम्बोधित किया । मुनिश्री ने कहा कि- बच्चे स्कूल में पढ़ते समय तनाव में जी रहे हैं और जीवन के प्रारंभ में ही तनाव सहित जीवन है तो नौकरी, व्यापार और कर्तव्यों को पालन करते समय तनाव मुक्त जीवन नहीं हो सकता । पढ़ाई का उद्देश्य नौकरी आदि जीवन निर्वाह ही रह गया है अगर पढ़ाई ज्ञान हेतु की जाए तो वह विद्यार्थियों को आनंद प्रदान करती है । जैसे खेलकूद आदि बच्चे अपने लिए करते हैं इसलिए खेलते हुए आनंद महसूस होता है और खेलने की इच्छा निरन्तर बनी रहती है ।

हर कार्य 100 प्रतिशत करना चाहिए । उदाहरण स्वरूप अगर एक जगह से दूसरी जगह छलांग लगानी है तो 100 प्रतिशत ही लगानी पड़ेगी अगर 99 प्रतिशत लगा दी तो नीचे गिर जाओगे । डाक्टर बनने के लिए आपने 55 प्रतिशत अंक प्राप्त किए हैं और किसी व्यक्ति का आॅपरेशन करने लग जाओ तो 100 प्रतिशत करना पड़ेगा । आप कहोगे कि 75 प्रतिशत अंक मैंने प्राप्त किए हैं और 75 प्रतिशत ही आॅपरेशन करना है तो व्यक्ति जिन्दा नहीं रह सकता । अतः प्रेक्टिकल में कोई भी कार्य 100 प्रतिशत करना आवश्यक है । आत्म: ध्यान शिविर का रिजल्ट 100 प्रतिशत है क्योंकि यह प्रेक्टिकल कोर्स है, जीवन जीने की कला है । जब पढ़ाई, खेलकूद, आदि जो भी कार्य करो 100 प्रतिशत करोगे तो आपका मन उस कार्य में लगेगा और आप जीवन में सफल होओगे । आहार का भी जीवन में विशेष महत्व है । आहार सात्विक, शुद्ध करना चाहिए । तनाव मुक्ति, एकाग्रता आहार एवं ध्यान के बारे में बताते हुए मुनिश्री ने करीब आठ सौ विद्यार्थियों को ध्यान का प्रशिक्षण दिया और सभी बच्चों ने आनंद और शांति का अनुभव करते हुए उसे जीवन में अपनाने का संकल्प किया और प्रींसिपल ने आगे की क्लासें हेतु मांग की ।

स्कूल की प्रींसिपल ज्योत्सना जी सचदेवा ने मुनिश्री का हार्दिक अभिनन्दन किया और ऐसे कार्यक्रम पुनःपुनः आयोजित हो ऐसी प्रार्थना भी रखी । उन्होंने अपने जीवन में हर रोज ध्यान करने का संकल्प किया जिससे बच्चों को प्रेरणा मिली और उन्होंने भी संकल्प किया । स्कूल के अन्तर्गत आगे भी तीन-तीन दिन के आत्म चेतना शिविर आयोजित किये जाएंगे । 28 जुलाई, 2007 को प्रातः 7.40 बजे से पी0के0आर0 जैन हाई स्कूल में भी बच्चों को ध्यान संबंधी जानकारी दी जाएगी । 29 जुलाई, 2007 से आचार्यश्रीजी के प्रवचन प्रतिदिन प्रातः 8.00 से 9.30 बजे तक एस0एस0 जैन सभा, महावीर भवन, अम्बाला शहर में नियमित होंगे । 

स्कूल के प्रधान श्री रतनलाल जी जैन, कैशियर श्री मनीष जैन, सेक्र्रेटरी श्री अनिल जैन, मैनेजर श्री अरूण जी जैन, श्री उमेश जी जैन आदि उपस्थित थे । 

पी0के0 आर0 जैन स्कूल में आत्म: ध्यान का प्रयोग

अम्बाला शहर 28 जुलाई 2007        पी0के0 आर0 जैन सीनियर सेकेण्डरी स्कूल, अम्बाला शहर में युग पुरूष आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज के सुशिष्य श्रमण संघीय मंत्री श्री शिरीषमुनि जी महाराज ने पी0के0 आर0 जैन गल्र्स स्कूल की छात्राओं एवं टीचरों को जीवन जीने की कला का ज्ञान  दिया । बच्चों का सर्वप्रथम महामंत्र नवकार उच्चारण के बाद प्रार्थना करवायी गई । प्रार्थना के अन्तर्गत निःस्वार्थ-भाव से हृदय परमात्मा से जोड़ने का अभ्यास लगभग 15 मिनिट तक करवाया गया । स्कूल की शिक्षिकाओं और विद्यार्थियों ने प्रार्थना कर अपने जीवन को धन्य बनाया । प्रार्थना के पश्चात् चातुर्मास हेतु विराजमान परम श्रद्धेय आचार्य डाॅ0 श्री शिवमुनि जी महाराज का संक्षिप्त जीवन परिचय बताकर कहा कि महापुरूष प्रारंभ में बच्चे ही होते हैं परन्तु लक्ष्य के प्रति दृढ़ निश्चय सीखने की ललक उनको महान् और विश्व में पूजनीय बनाती है । आचार्यश्रीजी ने भी भौतिक शिक्षा का चरम प्राप्त किया । पी0एच0डी0 एवं डी0लिट् की मानद उपाधियां ग्र्रहण की परन्तु जाना की यह मात्र साधन है इनके द्वारा शांति प्राप्त नहीं की जा सकती । अनेक वर्षों तक अनुसंधान करने के बाद ध्यान की विधि प्राप्त की है उसी का अभ्यास आप करके जीवन पर्यंत तनाव मुक्त रह सकते हैं । नींद और ध्यान दोनों आपके शरीर और मन को तरोताजा करते हैं । नींद आपके अनुसार नहीं, जब चाहे तब आप नींद में नहीं जा सकते परन्तु ध्यान आप जागृत अवस्था में रहकर करते हैं । ध्यान किसी भी समय किया जा सकता है । ध्यान पर आपका नियंत्रण रहता है । ध्यान विधि का सूत्र बताते हुए कहा सर्वप्रथम मंत्र का स्मरण करें फिर गुरू को नमन वंदन कर उनके प्रति शुद्धभाव रखें । फिर अपनी श्वांस को देखते रहें । विचार ध्यान के समय आते रहेंगे परनतुू उनको आप महत्व न दंे । ध्यान कितने समय तक करना चाहिए इस हेतु सरल उपाय बताया कि जितनी आपकी आयु है कम से कम उतने समय तक ध्यान का प्रयोग हर रोज करना चाहिए जिससे आप रोगमुक्त होंगे । आपकी एकाग्रता बढ़ेगी ओर आपका मन पढ़ाई में लगेगा । 

गुरू अज्ञान को हटाकर अनंत प्रकाश के दर्शन कराते हैं

 

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

अम्बाला शहर 29 जुलाई, 2007: युग पुरूष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- शासनपति भगवान महावीर एवं अरिहंत प्रभु श्री सीमंधर स्वामी जी का यह तीर्थ मंगल स्वरूप है । संसार के सभी संतों, महात्माओं का हृदय से सम्मान करें । किसी संत का अपमान, निन्दा कदापि अपने मुख से मत करो । जिनशासन में चार तीर्थ बतलाए हैं, साधु-साध्वी श्रावक और श्राविका । सभी आत्मदृष्टि से एक समान है इसलिए आत्म शुद्धि के अनुसार हर व्यक्ति सम्माननीय और प्रशंसनीय है । 

आज का दिवस चातुर्मास प्रारंभ और गुरू पूर्णिमा का अनोख संगम और संदेश लेकर आया है । गुरू कौन होता है ? गुरू किसको बनाया जाता है ? और गुरू क्या देता है ? यह प्रश्न गुरू पूर्णिमा के अवसर पर हर जिज्ञासु के मस्तिष्क में आते हैं । गुरू को भारतीय संस्कृति में ब्रह्मा, विष्णु और महेश स्वरूप बताकर गुरू की महिमा का गुणगान किया गया है क्योंकि गुरू हमें परमात्मा स्वरूप बतलाकर उस परम उत्कृष्टता की ओर रूचि बढ़ाता है और मार्गदर्शन देकर परमात्म स्वरूप प्रदान करते हैं । 

गुरू भीतर अहंकार और अज्ञान, अंधकार से मुक्ति दिलाकर अनंत प्रकाश के दर्शन कराते हैं । गुरू के संग मात्र से बहुत कुछ प्राप्त होता है । गुरू मौन में है तो भी आप दर्शन मात्र से जीवन को परिवर्तित कर डालते हैं । गुरू चांद के समान और परामात्मा सूरज के समान अनंत प्रकाशमान है । गुरू परमात्मा का ही अंश है । परमात्मा के गुण, आचरण गुरू के जीवन में प्रतिलक्षित होते हैं । गुरू चरणों में जाकर पूर्णतः श्रद्धा से झुककर अपने अहंकार, वासनाएं, धारणाएं समर्पित कर दें । आप इतने समर्पित और अहंकार से रहित हो जाओ कि आप शुन्य अवस्था को प्राप्त हो जाओ । गुरू के वचन श्रद्धा और मन की एकाग्रता के साथ श्रवण करना वास्तव में सत्संग है । सद्गुरू चित्त को शांत कर अज्ञान मोह, ईष्या आदि का ेदूर भगाकर वीतरागता के भावों से भर देता है । 

इस अवसर पर विदुषी महासाध्वी श्री किरण जी महाराज ने भी अपने विचार रखें । श्रमण संघीय मंत्री श्री शिरीष मुनि जी महाराज ने चातुर्मासिक कार्यक्रमों की जानकारी सभी के समक्ष रखी । श्री प्रेमराज जी जैन, श्री गुलशन कुमार जैन, श्री दीपक जैन, श्री रवीन्द्र जैन, श्री कुशल जैन, श्री धर्मपाल जैन, प्रो0 अशोक जैन, श्री मनोज जैन, श्री गुरचरनलाल जैन, श्री रतनलाल जैन, श्री अमृतलाल जैन, श्री संदीप जैन, श्री ओमप्रकाश जैन, श्री शांति प्रकाश जैन, श्री सुरेन्द्र कुमार जैन आदि कार्यकारिणी के सदस्यों की उपस्थिति रही । आज की प्रभावना का लाभ श्री महावीर जैन सेवा मण्डल की तरफ से रही ।

आज से नियमित प्रातः 8.00 से 9.30 बजे तक प्रतिदिन सत्संग प्रवचन महावीर भवन में होंगे । आत्म: ध्यान शिविर दिनांक 8 अगस्त से प्रातः 5.30 से 7.30 बजे तक पंचदिवसीय चलेगा, इच्छुक साधक सम्पर्क करें:- अनिल कुमार 94666-90111

धर्म को अनुभव करने के लिए भगवान महावीर ने अनेकों अनुष्ठान बताए उसमें सबसे सहज, सरल और अनुभवगम्य है ध्यान, योग, साधना । वर्तमान में 21 वीं सर्दी के अन्तर्गत विकासशील भारतदेश में तनाव का प्रमाण बढ़ता जा रहा है । आज चार साल से लेकर 70 साल तक का हर व्यक्ति टेन्शन में जी रहा है । महिलाएं डिप्रेशन में जी रही है, ऐसे समय में सबके जीवन में आनंद, शांति, सुख और समृद्धि के लिए हमने पिछले पच्चीस वर्षों से शोध करने के पश्चात् आत्म: ध्यान कोर्स की स्थापना की । सेल्फ डवलपमेन्ट बाई मेडीटेशन । ध्यान के द्वारा अपने व्यक्तित्व का विकास कैसे करें, अपनी आत्मा को कैसे शुद्ध करें, सच्चे धार्मिक व्यक्ति बनने की प्रक्रिया है आत्म: विकास कोर्स ।

हमने देश भर में पद यात्रा करते हुए यह अनुभव पाया कि केवल प्रवचनों और शब्दों से जीवन नहीं बदलता । समस्याएं प्रतिदिन बढ़ती जा रही है । समस्याओं में व्यक्ति उलझ रहा है । जीवन में समाधान कैसे प्राप्त हो ? हर समस्या को बड़ी सहजता से कैसे समाधान करें इसकी प्रक्रिया सिखाई जाती है आत्म: विकास कोर्स में । आत्म ध्यान कोर्स से शारीरिक, मानसिक व्याधियों से भी व्यक्ति मुक्त होता है, उनका शरीर स्वसथ और मन शांत होता है । आज के हर वर्ग को ध्यान करने की आवश्यकता है चाहे बच्चे हो, युवा शक्ति हो, महिलाएं हो व्यापारी हो, प्रोफेशन्लस हो हमने यहां पर सभी वर्गों के लिए ध्यान साधना क कार्यक्रम तैयार किए हैं । हम चाहते हैं कि अम्बाला शहर का बच्चा-बच्चा इसका लाभ उठायें और जीवन जीने की कला सीखे और वर्तमान क्षण को सार्थक बनायें । 

अम्बाला शहर के इस चातुर्मास में हमने अहिंसा, शाकाहार, व्यसनमुक्ति, पर्यावरण की रक्षा, सर्वसमभाव हेतु विविध कार्यक्रम आयोजित किए हैं जिसमें स्कूलों में बालकों को नैतिक शिक्षा के साथ ध्यान योग का प्रशिक्षण । स्थान-स्थान पर आत्म विकास कोर्स के परिचय द्वारा उन्हें आत्मशुद्धि की प्रक्रिया सिखाना । यहां पर प्रतिदिन ध्यान योग का विशेष प्रवचन और कोर्सेज चलेंगे । यह यज्ञ सभी धर्मावलम्बियों के लिए आयोजित किया गया है इसमें सभी सादर आमंत्रित हैं । 

 

धर्म में अडिग रहो: आचार्य श्री शिवमुनि जी महाराज

अम्बाला शहर 30 जुलाई, 2007: युग पुरूष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- इस जगत में और तीनों लोकों में तीन बातें शाश्वत और आत्मसात करने योग्य है । अगर इन तीनों बातों को आपने नहीं समझा, नहीं ग्रहण किया तो आपने जीवन में धन, सम्पत्ति प्राप्त करने के बावजूद भी कुछ नहीं हासिल किया । वह तीन बातें हैं:- अरिहंत की वाणी, सिद्ध का स्मरण और सद्गुरू का सत्संग । अरिहंतवाणी जब आप सुनेंगे तो जीवन में दुःख नहीं होगा । हर कार्य करते हुए प्रसन्नता का अनुभव होगा । अरिहंत शब्द आपके रोम-रोम में बस जायेगा और अरिहंत कहते ही आप अरिहंतमय बन जाओगे । दूसरी बात सिद्ध का स्मरण । अरिहंतों के दर्शन वाणी का श्रवण किसी काल में हो सकता है परन्तु सिद्धों ने अपने चरम लक्ष्य को प्राप्त किया है और आत्मा में स्थित हो गये हैं । संसार हमारा घर और धन सम्पत्ति हमारा लक्ष्य नहीं बल्कि सिद्धालय और सिद्ध अवस्था ही हमारा परम लक्ष्य है । सिद्धों के स्मरण से लक्ष्य का निरन्तर ध्यान बना रहता है । 

इतिहास साक्षी है कि शेरशाह सूरी की किला बनवाने की योजना धरी की धरी  रह गई और किला बनने से पूर्व ही वह चल बसा । यह घटनाएं हर मनुष्य के जीवन की है यह मकान, शरीर अस्थिर है इसलिए लक्ष्य को शाश्वत् बनाये यह सिद्ध के स्मरण से जागृति रहती है । तीसरी बात सद्गुरू का संग । जब अरिहंत नहीं रहते है तब अरिहंत और सिद्धों का ज्ञान गुरू करवाते हैं । सद्गुरू का अर्थ है जो सत् अर्थात् आत्मा का बोध कराए और आत्मा को परमात्मा बनाए वह सद्गुरू होते हैं । सद्गुरू को अपनाने के पश्चात् विनम्र होकर शंकाओं को मिटालो पूरी तरह गुरू के चरणों में समर्पित हो जाओ । संग अर्थात् सत्संग । सत्संग की पहली प्राथमिकता है पद, प्रतिष्ठा, मान, सम्मान यहां तक की शरीर को भी भूल  जाना । धर्म, सम्प्रदाय और मान्यताओं को मस्तिष्क से उतार फेकों । जितने भी मुखौटे आपने पहने हैं अपनाये हैं उन्हें उतार दो तब सद्गुरू आपको परमात्मा के दर्शन करवाने में सक्षम है । पात्रता तैयार हो तभी अमृत उडेला जा सकता है । 

एक बार आत्म-दर्शन हो गये फिर आप जीवन पर्यंत आनंदानुभूति का अहसास करते रहेंगे । फिर वह क्षण आपके जीवन के अमूल्य क्षण हो जायेंगे । धन, सम्पत्ति, पद-प्रतिष्ठा सब तुच्छ प्रतीत होंगे । प्रभु महावीर के परम उपासक कामदेव श्रावक ने महावीर-वाणी का श्रवण किया । उनके उपदेशों को जीवन में अपनाया और धन, सम्पत्ति, व्यापार आदि जीवन की आवश्यकताओं को मर्यादित किया । जीवन भर संयमित और नियंत्रित जीवन जीने पर परिणाम भी शुभ होते हैं । पौषध रूप आत्म साधना में संलग्न है और देवता धर्म में दृढ़ता की परीक्षा ली जाती है । धर्म में रहते हुए परीक्षा भी होती है । कष्टों, संकटों से घबराना मत । प्रभु महावीर ने तो पहले ही कहा कि साधु और श्रावक साधना करते हैं तो उनहें उपसर्ग परीषह आते हैं उन्हें समता, शांति से सहन करना । देवता कामदेव श्रावक के पास नंगी तलवार लेकर डराता है कि यह तलवार से तुम्हारे परिवार को समाप्त कर दिया जाएगा । कामदेव श्रावक के समक्ष परिवार के सगे संबंधी बेटे, पत्नी को काटा डाला जा रहा है परन्तु उपासक के मन में चिन्तन की प्रभु का धर्म सत्य है यह वाणी ग्रन्थें में उल्लेखित   है । कामदेव श्रावक धर्म में अडिग रहा । धर्म से विचलित न हुआ और देवता कामदेव श्रावक चरणों में गिर पड़ा । जब अपने शरीर पर तलवार मारने आ रहा था तो चिन्तन कर रहे थे कि तलवार मेरे नश्वर शरीर को काट सकती है आत्मा तो अजर अमर है, इसलिए कष्ट शांति से सहन कर सके । 

सुदर्शन सेठ पर भी मरण जैसा प्रसंग उपस्थित हुआ परन्तु उन्हीं जीव और अजीव का बोध हुआ इसलिए संकट की स्थिति में कुछ नहीं हुआ बल्कि संकट देने वाला स्वयं संभल गया । चाहते तो सेठ सुदर्शन प्रभु महावीर के भक्त मांग सकते थे प्रभु से जीवन रक्षा परन्तु ज्ञान था कि शरीर नश्वर है । प्रभु की वाणी सत्य है । कोई कष्ट भी दे तो भी भीतर से मंगल भाव । उसके जीवन के प्रति शुद्ध हृदय से भला करने की दृष्टि । जीवो मंगलम् की पवित्र भावना । 

श्री प्रेमराज जी जैन, श्री गुलशन कुमार जैन, श्री दीपक जैन, श्री रवीन्द्र जैन, श्री कुशल जैन, श्री धर्मपाल जैन, प्रो0 अशोक जैन, श्री मनोज जैन, श्री गुरचरनलाल जैन, श्री रतनलाल जैन, श्री अमृतलाल जैन, श्री संदीप जैन, श्री ओमप्रकाश जैन, श्री शांति प्रकाश जैन, श्री सुरेन्द्र कुमार जैन, श्री उमेश जैन आदि कार्यकारिणी के सदस्यों की उपस्थिति रही ।

 

बांटकर खाना धर्म है: आचार्य श्री शिवमुनि जी महाराज

अम्बाला शहर 31 जुलाई, 2007: युग पुरूष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- अरिहंत की वाणी, सिद्ध का स्मरण और सद्गुरू का संग अनंत ज्ञान और आचरण का सार है । किसी भी अनुष्ठान चाहे धार्मिक, सामाजिक, आर्थिक हो उसके पूर्व इन तीन सूत्रों का ध्यान हमेशा बना रहे । इससे आपका अहंकार, कर्ताभाव दूर होता है और अनुष्ठान सफलतापूर्वक अवश्य पूर्ण हेाता है । अरिहंत, सिद्ध और गुरू के प्रति सच्ची दृढ़ श्रद्धाभक्ति है तो आप भवि आत्मा है अर्थात् मोक्ष को जरूर प्राप्त कर लोगे ।

प्रातःकाल उठते ही सर्वप्रथम विनम्रता का भाव रखो । अरिहंतों, सिद्धो और सब जीवों के प्रति कृतज्ञता का भाव होना चाहिए । प्रार्थना करना कि आज 12 घण्टे तक मेरे किसी कार्य प्रवृत्ति से किसी भी प्राणी को दुःख न हो । जीवन यापन के तरीको से किसी को धोखा, अन्याय इस शरीर के माध्यम से न  हो । धर्म की शुरूआत मन्दिर, मस्जिद, गुरूद्वारे से नहीं अपितु घर के आंगन से होती है । जब भोजन करो तो मिलकर बांटकर खाना । प्रभु की वाणी है जो अकेला खाता है वह पाप का भागीदार है । कोई भूखा जरूरतमंद, मूक प्राणी को अपनी कमाई का कुछ हिस्सा जरूर दान करें और जीवन को धन्य अनुभव करें । 

गुरू भक्ति का प्रथम लक्षण है विनय । प्रभु महावीर की वाणी उत्तराध्ययन का प्रथम अध्ययन विनय से संबंधित है । गुरू के प्रति भक्ति है तो कोई भी गुरू ज्ञानी आपके समक्ष आयेंगे आप पूर्णतः झुक  जाओगे । सम्प्रदायवाद में उलझोगे तो विनम्रता, उदारता नहीं आयेगी और गुरू प्राप्त कर लोगे । एक सम्राट् समाधि की खोज करने के लिए फौज, पलटन, सम्पत्ति, परिवार सब बाह्य वस्तुएं छोड़कर जंगल में निकला । खोजते-खोजते एक गुरू के पास पहुंच गया । गुरू ने कहा 25 वर्ष लगेंगे । राजा ने कहा कुछ समय कम कर दो । गुरू बड़े दयालु होते हैं । समय कम करते-करते तीन वर्ष तक का अल्प समय समाधि हेतु देने को कहा । 

एक वर्ष पर्यंत तक गुरू ने खाना बनाने के लिए कहा, दूसरे साल तक वह पानी लाना, लकड़ी जंगल से एकत्रित करना इसी में लगा रहा । सम्राट् सोचने लगा रहा । सम्राट् सोचने लगा 2 वर्ष पूरे होने को है परनतु अभी तक समाधि के साधन ध्यान, जप, प्राणायाम अब तक नहीं कराये । इस प्रकार 2 वर्ष 6 माह पूरे होने लगे । छः माह के अन्तर्गत गुरू ने सोने नहंीं दिया । जैसे ही नींद आती डण्डा मारकर उठा देते । ढ़ाई वर्ष पूरे होने पर गुरू ने कहा- अब तुम समाधि के लिए तैयार हो गये हो । उसकी मन की बात जब जान ली तब उत्तर में कहा- समाधि के लिए अहंकार छोड़ना पड़ता है । इस प्रकार 6 माह में पूरे कोरे कागज की भांति जब सम्राट् हो गया और समाधि को प्राप्त कर लिया समाधि में प्रवेश करने के लिए पासत्रता जरूरी है । जो कार्य जीवन पर्यंत तक नहीं हो पाता है उस सम्राट् ने मात्र 6 माह में प्राप्त कर लिया । 

इससे पूर्व श्रमण संघीय मंत्री श्री शिरीष मुनि जी महाराज ने पी0के0आर0 माॅडल स्कूल, अम्बाला शहर के बच्चों को प्रार्थना के द्वारा बच्चों को भक्तिमय बनाया । उसके बाद बच्चों को प्रातःकाल माता पिता और गुरू को नमन करने, उनकी आज्ञा का पालन करने की प्रेरणा दी । अगर वह डांटे तो उसे प्यार से सुनना क्योंकि वह डांटते आपके जीवन निर्माण के लिए । इस प्रकार बताकर उनके मस्तिष्क में गुरू, माता, पिता भगवान है ऐसा फीड किया । गुस्सा दूसरों को परेशान करके निकालते हैं बिना दूसरों को दुःखी किये गुस्सा आता है तब आपकी श्वांस तेज हो जाती है आंखे, चेहरा लाल हो जाता है । ध्यान के द्वारा श्वांस को नियंत्रित करके गुस्सा शांत हो जाता है । हर कार्य पूरी एकाग्रता और रूचि के साथ करें । ध्यान के द्वारा पढ़ाई में मन लगता है । शरीर की थकान दूर होती है ।  

आचार्यश्रीजी का प्रतिदिन प्रवचन प्रातः 8.00 से 9.30 बजे तक एवं साधना चैनल पर आचार्यश्रीजी का प्रवचन प्रतिदिन रात्रि 9.20 से प्रसारित किया जा रहा है । सभी इसका लाभ उठायें । 

 

जीवन का सार प्राप्त किया कवि श्री चंदन मुनि जी महाराज ने

आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

1 अगस्त, 2007: अम्बाला शहर: श्रमण संघीय सलाहकार कविरत्न श्री चंदन मुनि जी महाराज का 31 जुलाई, 2007 को लुधियाना में संथारा साधना के साथ देवलोक गमन हो गया । उनकी आयु लगभग 95 साल की थी । 75 साल से अधिक समय तक उन्होंने सन्यास जीवन में संयम, तप के द्वारा जीवन को सफल बनाया । श्रमण संघ के मुनिराजों में आयु और दीक्षा अवस्था में सबसे वरिष्ठ संत  थे । सरलता और मधुर व्यवहार से उन्होंने अनेक व्यक्तियांे को धर्म मार्ग में दृढ़ किया । कविता, लेखन व काव्य संगीत पर उनकी विशेष पकड़ थी । किसी भी बात को कहने के लिए कविता उनके मुख से सहज प्रस्फुटित होती थी । अपने जीवन में कविताओं से भरा अनेक कथा साहित्य रचकर पाठकों और अध्ययनकर्ताओं का सहयोग किया और ज्योतिष विद्या के वे प्रकाण्ड विद्वान थे । उन्होंने समाज और धर्मजिज्ञासु बन्धुओं को धर्म ज्ञान देकर लाभान्वित किया । वास्तविक सत्य मृत्यु की अनिश्चितता के विषय में बोध हुआ । धर्म कार्य शुभ कर्म जब मन में विचार आये तभी कर लेना उसको कल के लिए या अभी आयु बहुत है बाद में कर लेंगे इस प्रकार की प्रवृत्ति मत करना बल्कि अशुभ कार्यों को कल पर छोड़ देना । अधिक से अधिक मनुष्य जन्म में मिले इस अनमोल समय का सदुपयोग करना चाहिए । 

श्वासों का मिलन जन्म और श्वासों का बिछुड़ना मृत्यु है । आत्मा अजर, अमर, अविनाशी है । यह जीव अनंत जन्मों में जन्म मरण की यात्रा में चल रहा है । हर गति में जन्म मरण कर चुका है लेकिन कोई-कोई विरले महापुरूष होते हैं जो मनुष्य जन्म ग्रहण करने के पश्चात् संयम ग्रहण करते हैं । संयम ग्रहण करके कर्म-निर्जरा करते हुए देह की आसक्ति को छोड़कर अन्तिम समय संथारा ग्रहण करते हैं, समाधि मरण को प्राप्त करते हैं । आगमवाणी कहती है कि जिस व्यक्ति को सम्यक् रूप से संथारा आ जाए वह निकटभवि बन जाता है । 

पूज्य कविराज श्री चंदन मुनि जी महाराज अपने दीर्घ संयमी जीवन में वर्षों तक अकेले रहकर भी अपनी संयम और क्रिया और आचरण के प्रति दृढ़ रहे और शरीर से जितनी साधना करके कर्म काट सकते थे उतने काटे और अन्तिम श्वासों में संथारा ग्रहण करके अपने जीवन को सफल बना दिया । ऐसे महान् तपी, जपी, योगी, संयमनिष्ठ, वरिष्ठ सलाहकार पूज्य श्री चंदन मुनि जी महाराज के चरणों में हम अखिल भारतीय वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रमण संघ की ओर से हार्दिक श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं और उनके लिए प्रार्थना करते हैं कि वे जहां पर भी विराजमान हों उनकी आत्मा को शांति मिले और उनकी कृपा दृष्टि चतुर्विध संघ पर बनी रहे । एस0एस0 जैन सभा के प्रधान श्री प्रेमराज जी जैन ने उनके प्रति हार्दिक श्रद्धांजलि अर्पित की ।

आचार्यश्रीजी का प्रतिदिन प्रवचन प्रातः 8.00 से 9.30 बजे तक एवं साधना चैनल पर रात्रि 9.20 से प्रसारित किया जा रहा है । सभी इसका लाभ उठायें । 

अम्बाला शहर 02 अगस्त, 2007: युग पुरूष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- सभी जीवों के प्रति मैत्री और कृतज्ञता का भाव । प्रार्थना के भावों में निरन्तर बने रहें । अपने मन के विचारों को खाली कर दें । वीतराग प्रभु हमें सत्य मार्ग प्रदान करते हैं । नश्वर देह का सदुपयोग करो । एक न एक दिन सभी ने इस जगत् से जाना है । अपने लिए 24 घण्टे में से कुछ समय निकालें जिसके द्वारा आप स्वयं को जान सकें । एक क्षण अनमोल है । जन्म से लेकर मृत्यु तक का समय वास्तविक सत्य के लिए समर्पित कर दें । प्रातःकाल नींद से उठते ही सर्वप्रथम प्रभु अरिहंत के चरणों में कृतज्ञता के भाव रखें । राग द्वेष विजेता महापुरूषों की स्तुति प्रशंसा करो क्यांेकि जिसकी प्रशंसा चिन्तन हम करते हैं वैसे ही हम बन जाते हैं । अपने भीतर के दुष्विचारों को मिटाना है कम करना है तो गुणगान करने से कदापि पीछे मत हटना । 

अगर किसी व्यक्ति की मौत होनी है तो व्यक्ति समझने लग जाता है कि मौत उसकी हुई है यह अज्ञान मन-मस्तिष्क में घर कर जाता है परन्तु ज्ञानी, अनुभवी जन कहते हैं कि किसी की मौत हो तो समझना कि मौत मेरी भी आने वाली है । कोई भी इस पृथ्वी पर अमर नहीं है । इसलिए जब धर्म करने का मन करे तभी कर लेना । उसको कल के लिए मत टालना ।

धर्म किसी को बांटता नहीं है । धर्म जोड़ने का कार्य करता है । धर्म में कोई भेद-प्रभेद नहीं    होते । धर्म समानता का संदेश देता है । दान, परोपकार, मानवता और सभी प्राणियों के प्रति प्रेम का भाव धर्म की सीख है । धर्म को केवल सुनो या बोलो नहीं बल्कि उसे अपने जीवन में अपनाओ । तन, मन और धन से सभी का यथाशक्ति भला करो । धन जब तक जीवन है तब तक भी साथ रहे कोई गारंटी नहीं है, इसलिए लक्ष्मी को चंचल कहा है । धन आपके पास अधिक हो तो जरूरत-मंदों को देने का अवश्य लक्ष्य रखें । मूक प्राणी में भी आत्मा का निवास है । अपनी कमाई का कुछ हिस्सा उनके जीवन के प्रति भी समर्पित करें । 

सभा के प्रारंभ में नवकार महामंत्र द्वारा शांतिपाठ का आयोजन और प्रार्थना, ध्यान के द्वारा आत्म शांति के अनुभव अनेक जिज्ञासुओं ने प्राप्त किये ।

अम्बाला शहर 03 अगस्त, 2007: युग पुरूष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- संत महापुरूष जब इस जगत से देह को छोड़कर जाते हैं तो उनके जीवन के गुणों को ग्रहण किया जाता है । उनके द्वारा बताये मार्ग पर चला जाता है । हर व्यक्ति इस जगत में पूर्ण नहीं है । गुण और दोष साथ में ही रहते हैं । व्यक्ति चाहे तो गुण ले ले चाहे तो दोष ले   ले । केवल सर्वज्ञ तीनों लोकों के विजेता ही इस विश्व में पूर्ण और सम्पूर्ण हैं । संत पुरूषों की मृत्यु दुःख का कारण नहीं होती क्योंकि वे जीवन का अमूल्य समय धर्म के लिए शुभ चिन्तन में लगाते हैं । उन्होंने जीवन को सार्थक और उपयोगपूर्वक जीया होता है । 

विद्वान होना ज्योतिषि होना कवि होना कोई बड़ी बात नहीं है । कोई भी व्यक्ति बुद्धि और पुण्य की प्रबलता से यह सब बातें प्राप्त कर सकता है । धार्मिक होने के दो लक्षण हैं पहला है कृतज्ञता । आप कितने ही बड़े व्यक्ति हो गये परन्तु अगर किसी ने आपकी असहाय अवस्था में सहायता उपकार किया हो तो उसको कभी भूलना मत । स्वस्थ और सम्पन्नता में कोई भी सहायता कर देता है परन्तु मुश्किल परिस्थिति में हजारों में से एक साथ देता है । धर्म में रत मनुष्य कभी उपकारी को भूल नहीं सकता । कविजी के जीवन में यह बात विद्यमान थी । अगर आपका बच्चा कुछ अच्छा कार्य करे तो उसे प्रशंसा के दो शब्द अवश्य बोलना चाहिए । प्रशंसा करने से बच्चे की प्रतिभा विकसित होती है और वह जीवन में बहुत आगे बढ़ता है । दूसरा लक्षण है किसी का उपकार या सहयोग किया हो तो भूल जाना । हम इसके विपरीत अगर किसी ने सहायता की हो तो भूल जाते हैं और स्वयं द्वारा किया गया उपकार कदापि भूल नहीं पाते, परन्तु सज्जन के जीवन में यह बातें अवश्य होती है । 

लगभग 25 वर्ष पूर्व चातुर्मास लुधियाना के अन्तर्गत श्रमण श्री फूलचंद जी महाराज के सान्निध्य में होना था परन्तु समाचार मिला कि कविरत्न श्री चन्दन मुनि जी महाराज को चोट पहुंची उस समय वे अकेले थे । मुझे भी चातुर्मास बरनाला में कविजी महाराज की सेवा में चार माह रहनेे का अवसर प्राप्त हुआ । प्रवचन करते तो गुणों से भरपूर बातें बताते थे । कभी किसी का दोष उनके मुख से सुनने को नहीं मिला । इसी प्रकार जब उनके गुरूदेव अन्तिम अवस्था में थे तब भी उनकेसाथ रहने का अवसर मिला । जीवन को नजदीक से देखने पर सरलता, विनम्रता और कृतज्ञता आदि भाव उनके रग-रग में उपस्थित थे । ऐसे महापुरूष के प्रति सच्ची श्रद्धांजली तभी होगी जब हम उनके जीवन से प्रेरणा लेकर अधिक से अधिक सद्गुणों को अपनायेंगे ।

कविरत्न सलाहकार श्री चंदन मुनि जी महाराज के जीवन पर मंत्री श्री शिरीष मुनि जी महाराज, श्री सुव्रत मुनि जी महाराज, महासाध्वी श्री किरण जी महाराज ने भी प्रकाश डाला और संत जीवन की विशेषताओं से श्रद्धालुओं को अवगत करवाया । महामंत्री श्री गुलशन जैन ने भी एस0एस0 जैन सभा, अम्बाला शहर की ओर से श्रद्धांजली अर्पित की ।

 

बच्चों को संस्कारित करें कि जीवन नैतिकतापूर्ण जीये

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

अम्बाला शहर 04 अगस्त, 2007: युग पुरूष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- प्रभु ने फरमाया है कि- आत्मा ही परमात्मा है यह वाक्य हमने कई बार श्रवण किया है । दुःख, भूख, बेचैनी आत्मा को नहीं होती है । वीतराग-वाणी पर श्रद्धा है तो दुःख को हम अपने ही कर्मों का मूल समझेंगे । सुख आपको संसार के विषयों में उलझा सकता है परन्तु दुःख से बहुत से अनेक व्यक्तियों ने परम् लक्ष्य को पाया है । जब शरीर के दुःखों को सहज क्षमता से स्वीकार किया । किसी समय व्यक्ति तीस वर्ष तक उन्होंने पूजा अर्जना करता रहता है परन्तु जैसे ही उसको भौतिक आपत्ति या पुत्र आदि उसके जीवन से चला जाता है तो उसकी श्रद्धा विश्वास टूट जाता है और सारा दोष भगवान् को देकर दुःखी होता है परन्तु दोष उसका स्वयं का है । भगवान भी अच्छे और बुरे कर्मों का फल देता है ऐसी मान्यता है । सुख और दुःख मनुष्य और प्राणी मात्र को अपने ही अच्छे और बुरे कर्मों के फल-स्वरूप ही प्राप्त होते है ।

दिल से एवं पूरी लगन से आप अरिहंत परमात्मा को कहीं पर भी दुकान, घर, रसोई में भी याद करो उनकी स्मृति बनी रहती है । हम धर्म का संबंध मन्दिर आदि धर्म स्थानों में ही समझते   हैं । संत सूरदास जिन्होंने श्रीकृष्ण के जीवन पर छोटी परन्तु अर्थपूर्ण, भक्तिपूर्ण कविताएं लिखी । आंखों की रोशनी नहीं थी परन्तु भीतर के प्रज्ञा चक्षु खुल गए थे । कहते हैं कि एक समय वह अकेले निर्जन वन में जा रहे थे । साथ में कोई भी मित्र नहीं था । अचानक पैर फिसला और गड्ढ़े में गिर पड़े । जोर से पुकार रहे थे कोई बचाओ । कोई उस जंगल में था ही नहीं परन्तु एक बालक ने हाथ पकड़ा और बाहर  निकाला । सूरदास ने हाथ नहीं छोड़ा परन्तु झटका मार बालक ने हाथ छोड़ दिया । संत सूरदास ने उसी बच्चे को कृष्ण भगवान मानकर भक्ति में डूब गये । हर प्राणी में आत्मा है । पेड़-पौधे, पानी, वायु, मिट्टी में भी संवेदना है । संत कबीर दुकानदारी करते थे । चादर बेचते थे । कहते हैं- बनाने वाला राम, बेचने वाला राम और खरीदने वाला भी राम । ऐसे कहते-कहते प्रभु को हर समय याद कर रहे थे । कबीर ने कहा -

कस्तूरी कुण्डल बसे मृग ढूंढे वन माहीं ।

ऐसे घट-घट राम हैं, दुनियां देखत नाहीं ।।

मृग के नाभि में कस्तूरी होती है परन्तु कस्तूरी की खोज में वह पूरे जंगल में भागता रहता  है । आत्मा ही परमात्मा है परन्तु मनुष्य उसकी खोज कहीं बाहर अर्थात् किसी दूसरे में खोज रहा  है । मनुष्य अपने स्वार्थ के लिए मृग की नाभि से कस्तूरी निकालने के लिए शिकारियों को भेजकर वध या किसी अन्य तरीके से उस कस्तूरी को ढूंढता रहता है परन्तु वह अज्ञानी नहीं जानता कि इसका परिणाम भी आने वाला है । राजा श्रेणिक ने भी एक गर्भवती हिरणी का शिकार किया । तीर इस प्रकार लगा कि उससे हिरणी और उसके पेट में उसका बच्चा और तीसरा पेड़ तीनों धराशाही हो गये । राजा अपनी शिकार की कला को भी कुशल जानकर खुश होने लगा । परन्तु सर्वज्ञ वाणी है कि नरक गति का बंधन कर लिया । इसलिए कभी भी पाप कार्य कर खुश मत होना क्योंकि जो भी कार्य आप करोगे उसका फल आपको जरूर मिल जाना है । दुकान में भी आप थोड़े लाभ के लिए माप तोल में गड़बड़ी करते है वह भी न करें । इस प्रकार धर्म की शिक्षा प्रेम हर व्यक्ति में आत्मा है उसको भी हमारी भांति सुख और दुःख होता है । दुकान में भी स्मरण रखकर हम हर स्थान को धर्ममय बना सकते  हैं ।

 

समता श्रमण का स्वभाव है: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

अम्बाला शहर 05 अगस्त, 2007: युग पुरूष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- परमात्मा के भक्ति, प्रार्थना, श्रद्धा, वंदन बिना हृदय अधूरा और जीवन निरर्थक है । अरिहंत परमातमा हमें सार को ग्रहण करने की बुद्धि प्रदान कर आत्म स्वरूप का अनुभव कराते हैं ।

शासनज्योति महासाध्वी श्री सुधा जी महाराज के जीवन में विलक्षणता, शाश्वतता विद्यमान   है । जन्मतिथि, जन्म-स्थान, माता पिता और परिवार और गुरू हर मनुष्य के जीवन में होती है । महासाध्वी श्री सुधा जी महाराज के हाथ हर समय माला देखकर मदर टैरेसा की बात याद आ जाती है । एक बार मदर टेरेसा समाज के अनुरोध पर मेरे पास आई । सीधी-साधी वेशभूषा कोई अलंकार शरीर पर नहीं, कोई बनावट नहीं थी । मुख से जीवन के संतुष्टि नजर आ रही थी । सभा में बैठी और बोलने का समय आया तो सार सहित शब्दों में कहा- मैं आपके लिए प्रार्थना करती हूं । आप मेरे लिए प्रार्थना करें । आज के इस विश्व मैत्री दिवस पर उनके शब्द और महासाध्वी श्री सुधा जी महाराज का जन्म दिवस सोने पर सुहागा अवसर उपस्थित हुआ है । प्रभु महावीर की मैत्री, करूणा हर व्यक्ति जीवन में अपनाकर मनुष्य जन्म को सफल और धन्य बना सकता है चाहिए तो केवल श्रद्धा और दृढ़ संकल्प । 

चमत्कार देवों और इन्द्रों का साक्षात्कार कोई बडी बात नहीं है । प्रभु कहते हैं कि जब व्यक्ति का मन धर्म मे ंरत होता है सिद्धिया और देव अपने आप उसके चरणों में झुक जाते हैं । प्रभु महावीर ने कहा कि ‘‘समयाए समणो होई’’ । समतामय जीवन श्रमण अर्थात् साधु और साध्वी का मुख्य लक्षण है । प्रशंसा, निन्दा, सुख, दुःख में समान भाव यही साधु का वास्तविक स्वभाव है । ब्रह्मचर्य अर्थात् ब्रह्म में रमण करने वाला ब्राह्मण होता है । मौन को धारण करने वाला मुनि है । यह सभी बातें एक आत्मार्थी मार्ग पर अग्रसर होने साधक के जीवन में रहती है । 

महासाध्वीजी महाराज के जीवन में यह सब बातें परिलक्षित होती । हर समय हाथ में माला लिये जप में लगे रहते हैं । आत्म-भाव हर समय लीन रहकर मौन भाव रत रहते हैं । मौन के विषय में कहते हैं कि न बोलना सोने की भांति अमूल्य है । आहार और आचरण में समता दृष्टिगोचर होती है । धर्म मार्ग हमें निरन्तर प्रगति करते हुए अपने से लघु साध्वीवृंद को संयम मार्ग पर प्रेरणा निर्देशन देकर सफलता की ओर अग्रसर कर रही है । आप अपने जीवन में इन गुणों को अपना सकते हैं जैसे परिवार में अधिकार आग्रह के निमित्त से झगड़े हो रहे परिवार टूट रहे हैं । परिवार के मुखिया अपने लघु परिवार सदस्यों को अधिकारों को प्रदान कर उन्हें मार्गदर्शन देकर पारिवारिक कलहों से मुक्त होकर शांति और प्रसन्नतामय जीवन बना सकते हैं । मैत्री दिवस पर व्यक्ति समाज राष्ट्र और विश्व में हो रहे युद्ध समस्याएं दूर हो इसलिए मन में मंगल कामना करें । मन की शक्ति सर्वोच्च होती है उसका हम मंगल भावों के माध्यम से सदुपयोग कर सकते हैं । महासाध्वी श्री सुधा जी महाराज को जन्म-दिवस के अवसर पर महाश्रमणी पद से अलंकृत किया गया और समाज के अधिकारी वर्ग द्वारा चादर सप्रेम भेंट की गई । 

आचार्य भगवंत के प्रवचन से पूर्व श्रमण संघीय मंत्री श्री शिरीष मुनि जी महाराज, साध्वी श्री पूर्णिमा जी म0, साध्वी श्री स्मृति जी म0, महासाध्वी श्री किरण जी म0, श्री शुभम् मुनि जी म0, श्री श्रेयांस जैन, श्री विनय देवबन्दी, श्रीमती लविका जैन, एस0एस0 जैन सभा के प्रधान श्री प्रेमराज जी जैन, महामंत्री श्री गुलशन जैन आदि ने महासाध्वी श्री सुधा जी महाराज की जन्म जयंती पर उनको शुभ-कामनाएं अर्पित की और उनके जीवन पर प्रकाश डाला ।    

अम्बाला शहर 06 अगस्त, 2007: युग पुरूष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- प्रातःकाल उठते ही राग द्वेष को समान भाव से देखने वाले अरिहंत के चरणों में ऐसा नमन करो कि शरीर, बुद्धि, मन, संस्कार से पार हो जाओ । उनके सद्गुण आपके अंग-अंग में प्रफुल्लित, पुष्पित हो । इस प्रकार पूरी लगन, भक्ति, समर्पण-भाव से किया नमस्कार आपके अनंत कर्मों को पल भर में नष्ट और निर्मूल कर देंगे । प्रार्थना करो तो संसार के नश्वर और पानी के बुलबुले के समान क्षण भर सुख प्रदान करने वाले भौतिक साधन मत मांगना बल्कि यही हार्दिक भाव रखना की शाश्वत् और अनंत अध्यात्मिक सुख की परम अनुभूति मुझे प्राप्त हो । 

मेरे सब कार्य विचार और पुरूषार्थ उसी लक्ष्य की ओर अग्रसर हों । विचार आता है कि नमन करने से क्या प्राप्त हो । नमन करने से हम भगवान, अल्लाह, तीर्थंकर, गुरू और स्वयं से जुड़ते हैं । सर्वज्ञ वाणी है कि यह मानव का चोला, संसार की सुख सुविधायें हमने अनंत बार प्राप्त किया है, कर रहे हैं और करते रहेंगे परन्तु नमन से हम अरिहंतमय बनकर कष्ट-रूपी आवागमन से मुक्त होते हैं और प्रेमभाव की प्रतीति का बोध का अहसास करते है ।

जिसको धन की चाह होती है वह भूख न देखता है न परिवार देखता है उसे हर क्षण केवल पैसा धन ही नजर आता रहता है । धन प्राप्त करने के लिए प्राप्त होने पर जिस प्रकार पागल हो जाता है उसी प्रकार जब हम अरिहंत प्रभु महापुरूष और गुरू को नमन करते हुए शरीर की आसक्ति बाहर की वस्तुओं से मोह भाव कम कर केवल तन मन और धन से उनके प्रति एकाग्र-भाव होकर समर्पित हो जाएंगे तभी चरम मंजिल प्राप्त कर सकेंगे जिस प्रकार भोजन बनाने से पूर्व रसोई की सफाई बरतनों की सफाई आदि शुद्ध होने पर ही भोजन पकाया जाता है वैसे ही नमन से पूर्व मन की शुद्धि अति आवश्यक है । 

वस्तु को लेने और देने का तरीक ेसे भी व्यक्ति के मन, आत्मिक स्थिति का मूल्यांकन हो जाता है अर्थात् मनुष्य के कार्य करने के तरीका उसके विचारों का दर्पण होता है । शारदा मां स्वामी विवेकानंद की मां थी । विदेश में धर्म-प्रचार हेतु जाने से पूर्व मां को नमस्कार किया और विदेश में सफलता के लिए वरदहस्त मांगा । प्रातःकाल उठने से पूर्व और किसी विशेषप्रयोजन को प्रारंभ करने से पहले माता पिता और गुरू की आशीष कृपा हमें लेनी चाहिए जिससे कार्य निर्बाधगति से परिपूर्ण होता है । संत तुलसीजी कहते हैं- भगवान राम भी प्रातःकाल उठते ही माता पिता और गुरू को नमन करते थे इसलिए उनको आज पूरे विश्व में पूजा जाता है । 

मां का स्वरूप शारदा मां की भांति होना चाहिए । आजकल की माताएं क्लबों में जाती है तो बच्चों पर प्रभाव अच्छा नहीं पड़ता जिससे बच्चे अपने जीवन से भटकने लगे हैं । शारदा मां ने परीक्षा स्वरूप छूरी लाने के लिए कहा- छूरी लाई तो धार वाला हिस्सा अपने हाथ में रखा । और लकड़ी से ढ़क छूरी मां के हाथ में दिया । शारदा मां अनपढ़ थी, शास्त्रों को नहीं जानती पर स्वामी विवेकानंद के इस कृत्य पर गद्गद हो गई और कहां बेटा जाओ सफल होवोगे । नरेन्द्र ने पूछा- मां आशीर्वाद तो आप पहले भी दे सकती थी । मां ने कहा- बेटा तेरे छूरी पकड़ने के ढंग से तेरी विनम्रता, तेरी भीतर की दया झलक रही थी ।

जिसके पास विनम्रता, कस्णा है वही जीवन की उचाईयों को छू सकता है । मां और बेटे का पवित्र सम्बन्ध इस कहानी से हमें शिक्षा देती है । रिश्तों में कर्तव्य, सामंजस्य आ जाये तो झगड़े, कलह अपने आप मिट जायेंगे । हम भारतीय संस्कृति के सद्गुणों को ग्रहण करें । अनमोल मोती पुरातन काल से ही भारत के ऋषि मुनि हमें देते आ रहे हैं । आवश्यकता केवल उन मोतियों को जीवन में अपनाने की । जीवन अपने आप चमकने लगेगा । दिनांक: 8 से 12 अगस्त, 2007 तक आत्म: ध्यान साधना कोर्स बेसिक का आयोजन होने जा रहा है सभी आप सादर आमंत्रित हैं । 

 

सत्य स्वयं के भीतर है: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

अम्बाला शहर 07 अगस्त, 2007: युग पुरूष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- राग द्वेष विजेता अरिहंत की वाणी है कि सत्य की खोज बाहर की चीजों में मन्दिर में, गुरू के पास नहीं करनी है अपितु अपने भीतर सत्य है उसे खोज करो । सभी जीवों के प्रति मैत्री प्रेम करो । कोई भी कार्य करने से पूर्व श्रद्धा, संकल्प, लगन अटूट है दृढ़ है तो वह कार्य प्रसन्नता के साथ पूर्ण होता है । तीर्थंकर कहते हैं आत्मा में अनंत सुख है, सत्य है । मन, वचन, काया और बुद्धि से परे जो है वह आत्मा है । शरीर, नाम, परिवार जिसको हम सत्य मानते हैं जब आयु पूर्ण होती है व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है तब सभी झूठ होने ही है । किसी की मृत्यु हम हर रोज देख रहे हैं परन्तु उससे शिक्षा प्राप्त करो, जैसे भगवान बुद्ध ने पूर्वावस्था में मृत्यु द्वारा आत्म जागृति की थी । माता पिता और गुरू का परम कर्तव्य है कि वह वास्तविक सत्य की धर्म शिक्षा अवश्य दें । अगर उसके जीवन में आप धर्म न ला सके तो जीवन को बिगाड़ने में माता पिता और गुरू का प्रमुख हस्तक्षेप है । 20 वर्ष तक माता पिता इसी आशा के साथ पालन पोषण और भौतिक शिक्षा करवाते हैं कि उसके बाद बुढ़ापे में बेटा सेवा करेगा परन्तु आस पड़ौस में देखते हैं कि बच्चे जब अपने पांव पर खड़े हो जाते हैं, व्यापार करने लग जाते हैं तो क्या हाल करते हैं बुजुर्ग माता पिता का परन्तु अगर उसके बचपन से ही धर्म के संस्कार देंगे तो पुत्र आज्ञाकारी, दयालु अर्थात् माता, पिता, गुरू और सभी सहयोगी के प्रति सम्मानऔर कृतज्ञता का भाव होगा तो इस प्रकार की कल्पना से परे परिस्थिति माता पिता की कभी नहीं होगी इसलिए बेटों को शुद्ध पवित्र संस्कार जरूर दो । धन सम्पत्ति भौतिक शिक्षाएं व्यक्ति के मस्तिष्क उलझा देती   है । अहंकार ईष्या आदि दुर्गुण पैदा करती है परन्तु धर्म संस्कार से जीवन विनम्र होता है । 

ध्यान और ज्ञान की साधना आराधना विशेष व्यक्ति ही कर पाता है परन्तु भक्ति के द्वारा हर आयु जाति, सम्प्रदाय, धर्म का व्यक्ति किसी भी काल में करके जीवन की शुद्धि हो सकती है । हर जीव में आत्मा की अनुभूति करनी चाहिए । जो भी आपके इष्ट है चाहे राम, कृष्ण, महावीर, गुरू नानक उनके प्रति पूरी तरह भक्तिमय हो जाए । शिर्डी के साईबाबा के जीवन का प्रेरणास्पद प्रसंग है एक व्यक्ति संत सांईबाबा का बहुत भक्त था । सांईबाबा जी से हार्दिक अनुरोध किया कि आप हमारे घर में पधारकर अतिथि सेवा का लाभ संत सेवा का लाभ दें । उस भक्त ने खीर बनाकर रखी थी । एक 70 साल का बुजुर्ग व्यक्ति उसके घर पर भोजन की याचना करने लगा । भक्त ने उसको तिरस्कृत किया कि यह तो मैने संतों के लिए बनाई है तुम्हें कैसें दें सकता हूं । चलो निकलो यहां से । उसके पश्चात् एक भूखा कुत्ता हांफता हुआ उसके द्वार पर आया । भक्त का वही निर्दय व्यवहार और उसने उस कुत्ते को ठण्डे के द्वारा पीटकर भगा दिया । जब संत सांईबाबा का इंतजार करते-करते वह थक गया तब संत चरणों में पहुंचा । सांईबाबा ने अपनी पीठ के उपर डण्डे के निशान बताकर कहा मैं आया तो था परन्तु तुम समझ नहीं पाये अर्थात् हर मनुष्य मूक प्राणी में आत्मा विराजमान है और आत्मा में परमात्मा बनने की शक्ति विद्यमान है इस दृष्टि से सभी प्राणियों को भगवत् स्वरूप जानकर यथायोग्य सेवा भक्ति करें । प्रभु महावीर की वाणी का सार है कि सत्य की खोज स्वयं के भीतर करो और सभी जीवों के प्रति मंगल का भाव रखो । इस निष्कर्ष को जानकर हम इसे जीवन में अपनाने के लिए हर समय जागरूक रहें । दिनांक: 8 से 12 अगस्त, 2007 तक आत्म: ध्यान साधना कोर्स बेसिक का आयोजन होने जा रहा है सभी आप सादर आमंत्रित हैं । 

अंतर आत्मा को भेद-ज्ञान की साबुन से धोओ

 

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

अम्बाला शहर 08 अगस्त, 2007: युग पुरूष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- जीवन के अमूल्य समय को प्रभु नाम स्मरण में लगानाचाहिए । शरीर की नहीं अपितु भीतर की अन्तर आत्मा को धोओ । महापुरूषों ने शरीर को नहीं मन को और भीतरी आत्मा को धोकर ही पाया है । भेद-ज्ञान सावन भयो, समता रस भर नीर ।

अन्तर धोबी आत्मा, धोवे निज गुण चीर ।।

कवि बनारसीदास का यह सार भूत दोहा है । कपड़ा धोना है तो साबुन, पानी एवं धोने वाला चाहिये । उसी प्रकार अन्तर आत्मा को धोने के लिए भेद-ज्ञान रूपी साबुन चाहिए । जब सद्गुरू का ज्ञान भा जाता है । सद्गुरू की ज्ञान की रगड़ लग जाती है तो भेद-ज्ञान रूपी बोध होता है । सात पुत्रों को जन्म देने वाली मां मदालसा को सती कहा गया क्योंकि अपने सातो पुत्रों को संसार के चक्र से निकालकर आत्म स्वरूप की ओर लगा दिया । माल तम्हारे पास है, ताला लगा हुआ है इसलिए तिजोरी से सम्पत्ति निकाल नहीं सकते क्योंकि चाबी नहीं है । खजाना आदि सब कुछ तुम्हारे पास है परन्तु ताले को खोलने वाली या आत्म-बोध कराने वाला ज्ञान हमारे पास नहीं है इसलिए अनुभूति नहीं हो पाती है । पानी है समता । समता अर्थात् हर परिस्थिति में मनःस्थिति सम हो । प्रभु महावीर ने सामायिक रूपी साधना गृहस्थ एवं साधु को बताई उसका अर्थ है समभाव में रहना । धोने वाले तुम ही हो । शरीर के भीतर जो जानने वाली और देखने वाली तुम्हारी आत्मा है वास्तव में तुम हो अपनी आत्मा को धोकर शुद्ध एवं पवित्र कर सकते हो । तुम्हारी आत्मा पर अनादि काल से कर्म लगे है जिनके कारण जीव संसार में अनादि समय से परिभ्रमण करा रहा है । ज्ञानावरणीय, दर्शनावरणीय, वेदनीय, मोहनीय, आयु, नाम, गोत्र और अन्तराय इन आठ कर्मों को जब भेद-ज्ञान रूपी साबुन से, समतारूपी पानी से अन्तर आत्मा शुद्ध करेगी तभी जन्म-मरण से छुटकारा मिल सकेगा । सगे संबंधी धन सम्पत्ति यश का कोई भरोसा नहीं है । इन भौतिक साधनों पर विश्वास करने की भूल कदापि मत करना । 

राम और रावण का परिवार बहुत विशाल था । धन सम्पत्ति में भी उनकी बराबरी कोई कर नहीं सकता था परन्तु पारिवारिक लोग धन सम्पत्ति स्थिर नहीं है, इसलिए उनका अस्तित्व न रहा । यह सभी धर्म दर्शनों का शाश्वत सिद्धान्त है । यह संसार बालु की भांति टिकने वाला नहीं है । इस ज्ञान को अनुभव करें । तभी जीवन का परिवर्तन संभव है । संसार की नश्वरता एवं आत्म शुद्धि के लिए उपयोगी साधना ध्यान साधना कोर्स के माध्यम से प्रारंभ हो चुकी है । प्रसन्नता का विषय है कि चातुर्मास का परम लक्ष्य प्राप्त करने की चाह वाले युवक कार्यकर्ता पदाधिकारी इसमें पुरजोर परिश्रम से भाग ले रहे हैं । ध्यान साधना कोर्स में शारीरिक स्वस्थता मानसिक प्रसन्नता का अनुभव अनेक शिविरार्थियों ने अनुभव किया है परन्तु वस्तुतः लक्ष्य आत्म स्वरूप की उपलब्धि है ।

 

सत्य को प्राप्त करने का प्रवेश द्वार आकांक्षा

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

अम्बाला शहर 09 अगस्त, 2007: युग पुरूष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- सत्य की शोध अपने भीतर करो । सत्य प्राप्त होने पर सभी जीवो के प्रति मैत्री करो सत्य क्या है ? इस विषय में प्रभु महावीर कहते हैं- तप, विनय, व्यवहार आदि सभी गुण प्राप्त होते हैं । खोज दो तरह की है एक है विज्ञान की, दूसरी है धर्म की । विज्ञान ने बाहर की खोज की है भौतिकता के द्वारा खोज करके भी सुख प्राप्त करना चाहा । परन्तु सारी खोज प्राप्त करने के बावजूद बैचेनी और तनाव  हाथ में आया है । आईस्टाईन अन्तिम समय में दुःखी था । उससे पूछा कि अगले जन्म में क्या बनोगे । आईस्टाइन प्रसिद्ध वैज्ञानिक उसने कहा वैज्ञानिक कभी न बनूंगा । धर्म की खोज अन्तर आत्मा की खोज है । धर्म की खोज द्वारा शाश्वत् आनंद को प्राप्त किया गया । तीर्थंकरों, महापुरूषों बुद्ध पुरूषों ने धर्म की खोज की है । धर्म की खोज करना सत्य की खोज है । सत्य न वस्तु है, नम न्दिर आदि स्थान   है । सत्य की प्रतीति और अनुभूति झलक ही प्राप्त हो सकती । सत्य शब्दों के द्वारा कहा या प्रकट नहीं किया जा सकता । सत्य का अर्थ है वास्तव में तुम जो हो और असत्य है उसके उपर आवरण या जो मनुष्य द्वारा संसार चलाने हेतु मुखौटे ओढे जा रहे हैं । सत्य जब जीवन में आता है तो भीतर के भाव ही बाहर झलकते हैं फिर मन, वचन और काया तीनों एकरूप दृष्टिगोचर होते हैं । जैसे प्रभु महावीर भीतर से निर्मल है तो बाहर से भी सुन्दर और सत्य स्वरूप होते हैं । सत्य प्राप्त करना हो तो क्या करें ? संत कबीर कहते हैं- 

कबीर सोया क्या करें, जागके जपो मुरार ।

एक दिन है सोवना, लम्बे पांव पसार ।।

जैसे एक बालक अपनी मां के साथ बाजार में जाता है उसे खेलने के लिए बिल्ली मिलती  है । तब वह कहां आया ? किसके लिए आया और मां के साथ आया अर्थात् अपनी जन्मदाता मां को भी भूल जाता है । बिल्ली वहां से मौका पाकर भाग जाती है । बच्चे को तब अपनी मां का ध्यान आता है और वह जोर से मां के नाम से चीख लगाता है । कबीर उसकी चीख सुनकर उसे मां के पास पहुंचाते हैं । यह उदाहरण हमारे वास्तविक जीवन का है हम भी जन्म के साथ घर परिवार दुकान आदि में इतने रम जाते हैं कि भूल ही जाते हैं कि हम किसलिए आए थे ? तब आपको यह सब छुटने पर परमात्मा का ध्यान आता है तब प्रार्थना रूपी चीख से लक्ष्य की सत्य के लिए प्रवेश करते हैं अर्थात् सत्य की ओर अग्रसर होने के लिए प्रवृत्त होते हैं । आपकी प्रार्थना रूपी चीख सुनकर कोई बुद्ध पुरूष सद्गुरू आपके द्वार पर दस्तक देता है और आपको सत्य रूपी मंजिल तक पहुंचा देता है । स्मरण तीन चीजों का रखना चािहय । मां जो आपको संस्कार एवं जीवन दान देने वाली है । महात्मा पवित्र एवं शुद्ध आत्मा सद्गुरू परमात्मा अर्थात् आत्मा जब परम विशुद्ध हो जाती है तब आत्मा ही परमात्मा बन जाती है । 

बुद्ध के जीवन में उद्देश्य विस्मृति का जीवन्त उदाहरण मिलता है जिसे हम भी अक्सर व्यवहार में देखते हैं एवं जीवन में करते भी हैं । नदी किनारे बच्चे गीली मिट्टी से खेलते हैं मिट्टी से महल मैदान नाम आदि लिखते हैं । अधिक बच्चों में उस मकान के अधिकार पर झगड़े भी होते हैं । सुबह से शाम तक यह क्रम निरन्तर चलता रहता है जैसे ही कोई आकर कहता है कि मां ने बुलाया है तब बच्चे उस गीली मिट्टी से निर्मित आकार मिटाकर भाग जाते हैं । इसी प्रकार हम भी सम्पूर्ण जिन्दगी मकान निर्माण नाम वृद्धि आदि की जहोजहद में लगे रहते हैं परनतु यमराज का बुलावा आने पर सब बेकार है इसलिए सत्य खोज को स्मरण रखो । 

 

प्रार्थना की शक्ति अनंत है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

अम्बाला शहर 10 अगस्त, 2007: युग पुरूष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- प्रार्थना में अनंत शक्ति   है । कभी प्रार्थना की गहराई में जाकर अनुभव करके देखो । प्रार्थना जब आपके भीतर की गहराई से, आपका पूरा अस्तित्व जब पुकारे । जैसे निर्जन वन में आपको प्यास लगे और आप पानी हेतु पुकारते है फिर आपको राजमहल परिवार नहीं बल्कि केवल और केवल पानी चाहिये क्यांकि सोना चांदी से जीवन नहीं प्राप्त हो सकता । उसके लिए पानी चाहिये तभी जीवन मौजूद रह सकता है । प्रार्थना मांगलिक है इसके उपर कोई मंगल नहीं है । प्रार्थना की आचार्य मानतुंग ने भक्तामर स्तोत्र के माध्यम से भगवान ऋषभदेव के लिए वह हृदय की गहराई से निकली थी ।

प्रार्थना में शब्दों का कोई अस्तित्व मात्र नहीं है । शब्द चाहे जितने अच्छे मीठे हो उसका प्रार्थना में कोई मूल्य नहीं होता मूल्य है आप प्रार्थना भीतर की गहराई, हृदय की विशालता और निर्मलता से जो भाव उत्पन्न होते हैं वही शब्द एवं प्रार्थना अनमोल है । अक्सर प्रार्थना में केवल शब्दों को ही महत्व दिया जाता है । प्रार्थना हमें परमात्मा के प्रति करनी चाहिये । प्रार्थना में कोई संसार के पदार्थों की मांग मत करना । कोई शर्त मत रखना की मेरा काम हो जाए तो में तुम्हारी भक्ति करूंगा । आपको अमुक-अमुक वस्तुएँ चढ़ाऊंगा । प्रार्थना, विनय करने से परमात्मा खुश हो या न हो परन्तु प्रार्थना से आपका हृदय शुद्ध अवश्य होता है । प्रार्थना से आप स्वयं परमात्म स्वरूप हो जाते हैं । प्रार्थना करने वाला भक्त विनमता गुण ग्राहकता धारण किये हुए है । स्वयं को बालक की भांति निबोध समझता है तभी प्रार्थना की वस्तुतः शुरूआत होती है । 

प्रार्थना के माध्यम से सहृदय भक्त परमात्मा से सीधा सतर्क स्थापित करता है । परमात्मा से पूरी तन्मयता और लगन के साथ जुड़ जाता है फिर संसार में रहते हुए भी निर्लिप्त रहने की अपार शक्ति उसे सहज ही प्राप्त हो जाती है । प्रार्थना करने वाले को लघु होना बहुत आवश्यक है । परमात्मा से जुड़ने वाले व्यक्ति को निन्दा, प्रशंसा, आपत्ति, विपत्तियों से कोई फर्क नहीं पड़ता है । वह भयंकर तूफान में भी अडोल अकम्प रहता है उसके समस्त बुराईयां अर्थात् हमारे आन्तरिक शत्रु राग, द्वेष, क्रोध, मान, माया, लोभ अपने आप तिरोहित हो जाते हैं । 

धर्म प्रार्थना में रमण करने वाले व्यक्ति को चमत्कार भी दृष्टिगोचर होते हैं । आचार्य मानतुंग की बहुत प्रसिद्धि थी । राजा ने कहा कि तुम्हारा ध्र्मा उच्च है तो कोई चमत्कार दिखाओ परन्तु आचार्य मानतुंग ने सरल और स्पष्ट शब्दों में कहा कि राजन धर्म में चमत्कार का कोई स्थान नहीं  है । चमतर में हम उलझते नहीं हैं । हम केवल शुद्ध धर्म का प्रचार करते हैं । चमत्कार नहीं दिखाया तो राजा का क्रोध आया और आचार्य मानतुंग को 48 ताले में बंद कर दिया । मानतंुंग को कोई क्रोध नहीं आया । शांती समता भाव बना रहा । बंद स्थिति में हृदय से केवल प्रथम तीर्थंकर की स्तुति की और मुक्त हो गये परन्तु विपरीत परिस्थति में भी धर्म के प्रति श्रद्धा बनी रही । 48 ताले में बंद होने के बावजूद भी छूटने हेतु प्रार्थना नहीं की बल्कि आत्म आजादी से छुटकारा हो ऐसी भीतरी चाह थी । 

श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज, श्रमण संघीय मंत्री श्री शिरीष मुनि जी महाराज आदि ठाणा 8 एवं शासन ज्योति महाश्रमणी श्री सुधा जी महाराज आदि ठाणा 14 की प्रेरणा से धर्म ज्ञान की गंगा अविचल उत्साह एवं उमंगमय वातावरण में प्रवाहित हो रही है । चातुर्मास के प्रारंभ से ही अम्बाला निवासी प्रवचन, जाप, तप, ज्ञान, ध्यान आदि कार्यक्रम श्रद्धा एवं निष्ठा से भारी संख्या में लाभ उठा रहे हैं । 

चातुर्मास 29 तारीख को प्रारंभ हो गया । सर्वप्रथम प्रातः 6.00 बजे समाज, राष्ट्र एवं चातुर्मास निर्विघ्न-रूपसे संचालित हो इसलिए 24 घण्टे अखण्ड महामंत्र नवकार का जाप एस0एस0 जैन सभा के प्रांगण में प्रारंभ हुआ जो कि 9 दिन तक निरन्तर रूप से चलता रहा । साथ ही सम्पूर्ण चातुर्मास के अन्तर्गत घर-घर अखण्ड पाठ चलता रहेगा जिससे सभी घरों का वातावरण भी पवित्र होगा । 

प्रवचन सभा का प्रारंभ प्रातः 8.00 से 9.30 बजे तक चलता रहा । प्रारंभ में 15 मिनिट ध्यान मंत्री श्री शिरीष मुनि जी महाराज की ध्यान विषयक जानकारी और विपाक सूत्र पर सारगर्भित प्रवचन एवं महासाध्वी श्री किरण जी महाराज भजनों के माध्यम से विभिन्न विषयों पर प्रवचन से श्रद्धालुओं की ज्ञान में वृद्धि कर रहे हैं । आचार्य भगवंत का प्रथम जीवन की बुराईयां, निपन्दा आदि से हटने एवं शरीर, बुद्धि, मन से उपर उठकर आत्म स्वरूप अध्यात्मपूर्ण प्रवचनों से आत्म शांति का अहसास आत्मार्थी बन्धु जन प्राप्त कर रहे हैं । 

चातुर्मास प्रारंभ से ही तपस्याओं की जड़ी लगी हुई है, जिसके अन्तर्गत बेले, तेले, अठाईयों, आयम्बिल आदि तपस्या भाई बहिन कर रहे हैं । रतलाम से आ श्री सुशील कुमार जी जैन द्वारा मासखमण का संकल्प लिया । महासाध्वी श्री सुधा जी महाराज के 64 वें जन्म दिन पर सैकड़ों बन्धुओं ने एकासने किए । 

1 अगस्त, 2007 को महासाध्वी श्री सुधा जी महाराज के जन्म दिन पर लंगर का आयोजन किया एवं 5 अगस्त, 2007 को उनके जीवन पर माहसाध्वी श्री किरण जी म0, महासाध्वी श्री पूर्णिमा जी म0, महासाध्वी श्री स्मृति जी म0 आदि ने अपने भाव रखे ंएवं आचार्य भगवंत ने उनको हार्दिक बधाई प्रदान की एवं उन्हें ‘‘महाश्रमणी’’ के पद से अलंकृत किया । 

श्रमण संघीय आचार्य सम्राट् पूज्य श्री आनंद ऋषि जी महाराज की जन्म जयंती ‘‘आयम्बिल दिवस’’ के रूप में मनायी गई जिसके अन्तर्गत बड़ी संख्या में आयम्बिल हुए । इस अवसर पर आचार्यश्रीजी ने स्व0 आचार्यश्रीजी के जीवन पर प्रकाश डालते हुए पूर्व की स्मृतियों को ताजा किया एवं उनके प्रति श्रमण संघ में दिए गए अनूठे योगदान की अपूर्व प्रशंसा की । 

प्रस्तुत वर्षावास में ध्यान की अपूर्व झड़ी लगी हुई है जिसके अन्तर्गत पी0के0आर0 गल्र्स जैन हाई स्कूल के बच्चे एवं टीचरों, प्रबंधक कमेटी को मंत्री श्री शिरीष मुनि जी महाराज ने समझाया और ध्यान का प्रयोग भी करवाया गया । 8 अगस्त, 2007 से प्रातः आत्म: ध्यान साधना कोर्स बेसिक की शुरूआत हुई जिसमें लगभग 185 भाई बहिन भाग लेकर जीवन जीने की कला का प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं । शिविर का संचालन मंत्री श्री शिरीष मुनि जी महाराज के निर्देशन में वीतराग साधिका सुश्री निशा जैन, पंचकूला कर रही है । 

वरिष्ठ सलाहकार श्री चंदन मुनि जी महाराज के देवलोक गमन पर 2 अगस्त, 2007 को नवकार महामंत्र के द्वारा शांति पाठ एवं ध्यान करवाया गया एवं 3 अगस्त, 2007 को गुणगान सभा का आयोजन किया गया जिसमें संत सतीवृंद एवं आचार्यश्रीजी ने उनके जीवन पर प्रकाश डाला । प्रातः प्रवचन में पूरा पाण्डाल श्रद्धालुओं से भर जाता है । 

 

प्रार्थना में हृदय भीगता है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

अम्बाला शहर 11 अगस्त, 2007: युग पुरूष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- प्रार्थना कब, कैसे, क्यों करनी चाहिए । वैसे तो प्रार्थना कभी भी 24 घण्टे में कर सकते हैं । प्रार्थना की पहली शर्त है विनम्रता, पद, प्रतिष्ठा, स्त्री, पुरूष, शिक्षा सब कुछ प्रार्थना करते समय भूल जाओ । प्रार्थना में आपका अंतरंग भीगता है । बरसात होती है तो चारों ओर हरियाली छा जाती है । प्रार्थना में रोना आये तो रो लेना, संकोच मत करना कि लोग क्या कहेंगे । आप रोते तो है जब दुःख होता है पीड़ा होती है परनतु वह रोना बेकार है । जो आंसु परमात्मा के स्मरण में निकले वह आंसू की बूंदे मोती हो जाती है । हम तीन उद्देश्य से रोते हैं- जब परेशानी में होते हैं । कोई परिवार या स्वार्थ पूरा न होने की वजह से जो आंसु आते हैं परन्तु फिर भी रोने से हल्का हो जाता है आपका हृदय । दूसरा रोना आता है जब परमात्मा के स्मरण करते करते अपने स्वयं के पापों की ओर दृष्टि जाती  है । तब परमात्मा गुणों की ओर देखते-देखते स्वयं के दुर्गुणों की ओर ध्यान केन्द्रित हो जाता है । सरल हृदय रोता है जब परमात्मा के केवल गुणों की ओर उनकी पवित्र गरिमा की ओर दृष्टि जाती है केवल मन में शुभ चिन्तन मनन चलते हुए आंखों में अश्रु आ जाते हैं वह है आनंदाश्रु । बाहुबली की श्रवण बेलगोला में दक्षिण भारत के अन्तर्गत विशाल अच्छी सुन्दर प्रतिमा है । भक्त का मन उस मूर्ति की सुन्दरता को देख आकर्षित हो जाता है । तब विचार आता है कि बाहुबली की प्रतिमा इतनी सुन्दर है तो वास्तव में बाहुबली की सुन्दरता कितनी होगी । बाहुबली की बहुत सी प्रेरणास्पद प्रसंग जैन साहित्य में मिलता है । वीतराग मार्ग की ओर चलने की दृढ़ संकल्प मन में आया महीनों ध्यान अवस्था में खड़े हैं । पक्षी शरीर के उपर ही अपने रहने का स्थान निर्मित करते हैं परन्तु बाहुबली को तो शरीर का ध्यान ही नहीं है । इतनी कठोर तपस्या करते है परन्तु ज्ञान न हुआ । जब उनकी बहन ने कहा कि उतरो विचार आया कि मैं तो खड़ा हूँ, कहीं पर चढ़ा ही नहीं इस प्रकार चिन्तन चला तब ध्यान आया की मैं अहंकार रूपी हाथी पर चढ़ा हूँ और जैसे ही विनय का भाव आया और पैर उठाया सभी छोटे भाईयों को भी वंदन करूंगा चलता हूं । जैसे ही पैर उठाया की ज्ञान हो गया । तीसरी प्रकार से जब रोना आता है तब न दुःख है न आनंद की अनुभूति है केवल भीतर का अहोभाव है । भीतर की करूणा और मैत्री जब चरम स्थिति में पहंुचती तब व्यक्ति शुन्य स्थिति का बोध प्राप्त कर अश्रु निर्झर बहते है वह रोना सबसे उत्कृष्ट रोना है । प्रार्थना की शुरूआत करने के पश्चात् भी आप ध्यान की गहराई में जाकर आत्म स्वरूप का अहसास कर सकते हो । प्रार्थना करते हुए पद प्रतिष्ठा परिवार स्वार्थपूर्ति की मांग को भूलकर समर्पण विनम्रता की पवित्र शुरूआत के द्वारा ‘‘अरिहंत परमात्मा’’ की स्तुति प्रशंसा करना प्रार्थना का प्राथमिक स्वरूप है । शुद्ध भावों से परमात्म के प्रति जो भी क्रियाएं रोना हंसना, प्रशंसा शब्दों की सुमधुरता आदि होती है वह प्रार्थना के ही अंग है । प्रार्थना में इस प्रकार की प्रवृत्तियां हो तो इन्हें अन्यथा न लेना । पूरा 100 प्रतिशत डूब जाना । परमात्म भक्ति में पूरी तरह तन्मय हो जाना चाहिए । 

 

सागर के समान हृदय से विशाल और गंभीर थे: आचार्य श्री आनंद ऋषि जी महाराज

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

अम्बाला शहर 12 अगस्त, 2007: युग पुरूष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- श्रमण संघीय द्वितीय पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री आनंद ऋषि जी महाराज की जन्म जयंती मनाई जा रही है । आनंद हमारा स्वभाव है पर हमें यह मालुम नहीं है । संघर्ष एवं कष्टों में भी यथानाम तथागुण सम्पन्न थे और हर क्षण हर परिस्थिति में समता और आनंद में निवास करते थे । महापुरूषों के जीवन को शब्दों में मर्यादित करना असंभव है । सागर और सूर्य को किसी रेखा, दीवार से बांध नहीं सकते । महापुरूषों के गुणगान, स्तुति मन के शुभ विचारों, वचनों की मधुरता एवं शरीर की विनम्रता करने से असीम कर्मों की निर्जरा होती है ।

आचार्यश्रीजी के जीवन को देखना स्वयं का दर्पण, स्वयं की भीतरी स्थिति ही प्रदर्शित करती है । जैसे दर्पण के सामने हम जैसी क्रियाएं करते हैं वैसे ही दर्पण में दिखाई देता है । उन्होंने 13 वर्ष की लघु वय में दीक्षा अंगीकार की एवं 79 वर्ष तक जीवन संयमित जीया । उनके जीवन की घटनाओं से कुछ मोती ग्रहण करे । माना की दीक्षा ग्रहण कर नहीं पाते परन्तु अपने गृहस्थ जीवन को मर्यादित तो कर सकते हैं । धर्म क्षेत्र के भव्य प्रांगण में प्रवेश करते हुए विरोध, परेशानियाँ व्यक्ति को झेलना पड़ता  है । उसको धर्म मार्ग पर चलने की स्वीकृति परिवार समाज नहीं देता है परन्तु आप में दृढ़ संकल्प है, भीतर की श्रद्धा विश्वास है तो व्यक्ति कीचड़ में कमल की भांति निर्लिप्त रहता है । संसार में रमण करते हुए दुकान, परिवार चलाते हुए कोई किसी को पूछता नहीं है परन्तु जैसे ही धर्म में रमण करने के लिए कदम उठाते ही चर्चाएं शुरू हो जाती है, उसके संकल्प की परीक्षाएं होती है । किसी भी व्यक्ति को बड़ी शांति से सुनते, चिन्तन करते और थोड़े शब्दों में मधुर-भाषा में संतोषपूर्ण जवाब दते थे । सभी श्रद्धालु प्रत्युत्तर से गद्गद हो जाते थे । कोई निर्णय करते थे तो भविष्य की ओर दृष्टि करते अर्थात् दूर दृष्टि से चिन्तन करते थे । भीतर की कोमलता मैंने स्वयं अनुभव किया है । कुछ विद्यार्थी उनके पास बैठे थे । उनका हालचाल पूछा, तुम क्या करते हो ? कोई दिक्कत तो नहीं है । काॅपी पेन्सिल पर्याप्त मात्रा में है । 

इस प्रकार जीवन की वास्तविक समस्याओं को पूछते थे और समाधान भी करते थे । बच्चों को धर्म शिक्षा प्राप्त हो इस हेतु उन्होंने धार्मिक परीक्षा बोर्ड की येाजना रखी, जहां से साधु-साध्वी अथवा कोई भी धर्म जिज्ञासु ज्ञान निःशुल्क प्राप्त करता था । ऐसे लाखों अध्ययनकर्ताओं ने धार्मिक संस्था का लाभ प्राप्त किया । अम्बाला श्रीसंघ को भी उत्तर भारत में उनके प्रथम प्रवेश पर नगर प्रवेश का सुस्वागत का अवसर प्राप्त हुआ था । पूरी नगरी ने पलक पंावड़े बिछाकर जो स्वागत किया वह ऐतिहासिक घटना कोई भी भूल नहीं सकता । स्वागत में अपनी उपस्थिति दर्ज कर जो भक्तिभाव उमड़ा था उसका तो शब्दों में वर्णन नहीं किया जा   सकता । श्रद्धालुओं ने शामिल होकर अनन्त कर्म निर्जरा कर अपने जीवन का परम कल्याण किया था । जो समय धर्म में बीता है वह व्यक्ति के मन मस्तिष्क से कभी विस्मृत नहीं हो सकता ।

आचार्य सम्राट् पूज्य श्री आनंद ऋषि जी महाराज की 108 वी जन्म जयंती पर श्रमण संघीय मंत्री श्री शिरीष मुनि जी महाराज, महासाध्वी श्री किरण जी महाराज, सर्वधर्म शांति मिशन के अध्यक्ष श्री करनैलसिंह जी गरीब ने अपने श्रद्धाभाव समर्पित किये । आत्म विकास कोर्स का सफल आयोजन आज पूर्ण हुआ जिसमें करीब 180 साधकों ने भाग लेकर जीवन जीने की कला का प्रशिक्षण प्राप्त किया । श्रीमती लविका जैन, प्रेम जैन ने भजनों के माध्यम से अपने भाव अर्पण किये । श्रीमती चन्दन जैन ने शिविर का अनुभव सभी के सामने रखा । 13 तारीख से आत्म समाधि कोर्स एवं एडवांस-ा कोर्स भी प्रारंभ होगा ।

 

संत मानव जाति का कल्याण करते हैं

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

अम्बाला शहर 13 अगस्त, 2007: युग पुरूष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- संत किंचन को छोड़कर अकिंचन बन जाता है । निर्मोही हो जाता है । संत को अनगार की उपमा प्रभु महावीर ने दी है । श्रावक का घर, व्यापार, संबंध होता है । साधु का घर न पैसा न संबंध होता है । भिक्षु साधु शब्द का अर्थपूर्ण शब्द है । भोजन हेतु ऊँच, नीच कुलों में भ्रमण करके जो भी साधना के अनुकूल भोजन देता है । जब तक अरिहंत और तीर्थ।कर होते तब सम्प्रदाय नहीं होता । बाद में संगठन व्यवस्था हेतु संघ सम्प्रदायों की उत्पत्ति हुई परन्तु मोहवश सम्प्रदाय और संत से बंध जाता है । जीवन में तप, समता, विनय होता है तो उनका आचरण लोगों को अपने आप प्रभावित करता है । उनके शब्दों से जीवन का कल्याण स्वतः हो जाता है । संत का सर्वप्रथम एवं सर्वोत्तम गुण होता है विनय । चाहे व्यक्ति छोटा हो, चाहे बड़ा हो वह सभी का हार्दिक सम्मान करते हैं ।

आचार्य श्री आनंद ऋषि जी महाराज के जीवन में विनम्रता स्वयं अनुभव किया है । प्रथम बार उनके चरणों में पंजाब से पैदल यात्रा करते हुए पहुंचा । उनकी आयु जितनी थी उससे भी आधी उम्र मेरी दीक्षा पर्याय परन्तु जैसे ही उनके पास पहुंचा बड़े ही विनम्र शब्दों में कहा- आओ मुनिजी पधारो बड़ी कृपा आपने की । गृहस्थ जीवन में भी सासु-बहु का बहु सासु का बाप बेटे का बेटा बाप का सम्मान करेंगे । सभी एक दूसरे को समझेंगे तो झगड़े झंझावात अपने आप दूर होते  हैं । सभी गुरूजनों को सम्मान करो नमस्कार करो । संत सम्पूर्ण मानव जाति के कल्याण की बात करते हैं । मेरे गुरू इस प्रकार संकुचित दायरे में मत बांधना ।

संत हर व्यक्ति में प्रेम, शांति और समता का उपदेश देकर धर्म का प्रचार प्रसार करते हैं । धर्म में जाति, धर्म, अमीर, गरीब किसी भी तरह का भेद नहीं होता । भेद व्यिक्त् की दुर्भावनाओं से पैदा होता है । संघ के सरताज आचार्यश्रीजी जैन अजैन किसी भी प्रकार का मतभेद नहीं फैलाते  थे । अपने मधुर उपदेशों से सभी धर्मों की वाणी जन-मानस को सुनाते थे । वृद्धा अवस्था में भी अपने कर्तव्यों के प्रति सचेत रहते थे । 

आचार्यश्रीजी इस युग के एक महान् प्रकाश स्तंभ थे । जिनके आलोक जैन ही नहीं बल्कि मानव समाज ने विश्व को अहिंसा सत्य एवं प्रेम का संदेश फैलाया । वे उत्कृष्ट साधक, मनीषी, तत्ववेत्ता थे जिनके विचारों में आज के उलझे हुए मस्तिष्क को सही दिशा में आने की प्रेरणा दी । संतों की अध्यात्म् साधना गुरू ज्ञान और निर्मल व्यवहार न चर्म चक्षुओं से देखा जा सकता अै और न उन्हें कोई मूर्तिमान आकार ही दिया जा सकता है । उनकी अमृतमय वाणी का मात्र श्रवण ही किया जा सकता है जिसमें उनके उज्ज्वल ज्ञान दर्शन और चारित्र की त्रिवेणी प्रवाहित होती है । देश काल की सीमाओं से मुक्त वह शाश्वत् चिन्तन नित्य नवीन संदेश मानव जाति को प्रदान करती है ।

धर्म बुद्धि तर्क और चिन्तन का विषय नहीं है । दर्शन अपने-अपने सिद्धान्तों में वस्तु-तत्व की परिभाषा करते आए हैं और बुद्धि के विकास होता भी रहा है । आवश्यकता है आस्था श्रद्धा विश्वास की जिससे व्यक्ति जीवनम ें अन्तर्मन से स्वीकार करके पश्चात् आत्मसात करने का भरसक पुरूषार्थ करें । संत और धर्म संसार के दुःखों के निवारण की यही एक अनुपम औषधि हमेशा ही पिलाते रहे हैं । आचार्यश्रीजी का जीवन सर्वगुण सम्पन्न था । उनके जीवन पर विचार करके उन्हें अपने जीवन में यथाशक्ति अवश्य ग्रहण करें तभी जन्म-जयंती आदि कार्यक्रम बनाना सार्थक होगा ।

पूना के साधना चातुर्मास से पूर्व समाज संघ में उथल पुथल मची परन्तु उनके थोड़े से शब्दों से तुफान शांत हो गया । इसी प्रकार आचार्य सम्राट् श्री आत्माराम जी महाराज की जन्म जयंती मनाने हेतु बिना किसी जबरदस्ती के वृद्धा अवस्था की चरम स्थिति में भी उनका स्वयं आना उनकी हृदय की उदारता का उदाहरण हमारे समक्ष है । उनका एक वाक्य हमारे लिए अवश्य उपयोगी है कि- ‘जब कर्तव्य तुम्हें पुकारें तुम तैयार हो जाओ’’ । अपने जीवन में धारण करे समस्याएं दूर होगी एवं जीवन आनंदमय होगा । 

 

अतिथि को भगवान की तरह पूजा जाता है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

अम्बाला शहर 14 अगस्त, 2007: युग पुरूष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- जीवन आराधना, अर्चना, उपासना जितनी गहराई से सोचते है विचारते है, तब उस विषय वस्तु के रहस्य को हम समझ पाते है । निःस्वार्थ-भाव से की हुई प्रार्थना में कोई भी आलम्बन की आवश्यकता नहीं है । घंटियाँ मन्दिरों में बजाने या पुस्तक की बनावटी प्रार्थना शुरूआती दौर में जरूरत होती है । प्रार्थना की गहराई में शुन्य की स्थिति आती है । शुन्य स्थिति को शब्दों द्वारा प्रकट नहीं किया जा सकता ।

भारत की पवित्र संस्कृति में अतिथि को भगवान का रूप समझा जाता था । मेहमान आता है उसके सर्वप्रथम पैर धोये जाते थे । श्रीकृष्ण के जीवन में भी ऐसा ही प्रसंग अंकित है । गांव के लोगों में आज भी भक्ति-भाव बना हुआ । भारत की संस्कृति को जीवन रखने का श्रेय गांव के लोगों को ही जाता है । प्रभु भक्ति में आनंद के क्षण बार-बार स्मरण करते रहो । प्रार्थना में प्रसन्नता आयी गुरू के चरणों में जाकर दर्शन लाभ प्राप्त हुआ । ध्यान अवस्था में शुन्य अवस्था का अहसास हुआ तो उसे निरन्तर याद करते  रहना । हम जब कोई निन्दा करता है, कोई गाली देता है, कोई दुःख देता है तो उसे जीवन पर्यंत स्मरण रखता है । दुःख के क्षणों को कभी भूलते नहीं है । सुख के क्षणों को स्मरण करागे तो सुख जीवन में बढ़ेगा और दुःख और परेशानियों के प्रसंग को बोलते और चिन्तन करता रहेगा तो मानसिक तनाव   बढ़ेगा । बीमारियां बढ़ती है जीवन तनाव से भर जाता है । 

किसी जरूरतमंद की सहायता की हो, भला किया हो । किसी भूखे व्यक्ति को भोजन खिलाया हो प्यासे को पानी पिलाया हो कपड़ों द्वारा शरीर ढ़कने का प्रयास किया हो ऐसे पुण्य प्रसंगों को भूल जाना चाहिए । किसी को दुःख, पीड़ा, धोखा दिया हो उसे याद रखना एवं तप, दान और प्रायश्चित द्वारा अपने दिलों दिमाग से उन कार्यों को पुनः न करने का संकल्प ले लेना । दुःख के क्षणों में व्यक्ति स्वयं को जिम्मेदार समझता है और अपने पूर्वोपार्जित कर्मों का फल समझता है तो उसे दुःखों को सहने की क्षमता प्राप्त होती   है । जो बीज बोया है फल भी उसे वैसा ही मिलता है । आम का बीज बोया है तो बबुल की भांति कांटे नहीं आते है । आम का बीज बोओगे तो आम के मीठे फल खाने को मिलते है । जीवन में दुःख रूपी कांटे आ रहे हैं तो उसे भी अपना स्वयं का बोया जानकर दुःख को सुख में बदला जाए सकता है । चाहे सुख हो चाहे दुःख हो हर परिस्थिति में आनंद में रहो मन कभी चंचल अथवा प्रतिकूल नहीं होगा । 

परमात्मा के साथ जब हम प्रेम करते हैं तो भक्त के भक्ति में तीन बातें घटित होती है । कभी आप दुःख में सुख में अथवा अहोभाव में रोते है । प्रभु कृपा अर्थात् गुरू कृपा प्राप्त होने पर व्यक्ति प्रसन्न होकर हंसता है । अरिहंत दर्शन की पिपासा से और इंतजार से भक्त का हृदय गमगीन होता है । यह बातें हर प्रभु भक्त के जीवन में आती है । मीरा ने श्रीकृष्ण की भक्ति की थी उसे भी यह अनुभव हुआ । भीलनी की भक्ति राम के प्रति अटूट थी । प्रभु भक्ति के इन प्रसंगों में यह बोध परिलक्षित होता है । इसी प्रकार प्रभु महावीर की भक्ति में कुछ ही क्षणों में यह बातें चंदना के भीतर से प्रकट हुई और उसी से प्रभु महावीर का अभिग्रह पूर्ण हुआ एवं लगभग माह बाद उनकी तपस्या का पारणा हुआ । राजा की सुन्दर एवं सर्वप्रिय पुत्री थी चंदनबाला परन्तु कर्मों की गति बड़ी विचित्र है । उनके पिता किसी राज्य के राजा से पराजित हो   गये । विजेता राजा ने राजकुमारी को बेचा । किसी धर्मप्रिय सेठ ने सुसंस्कृत जानकर मुंह मांगा दान देकर खरीदा । सेठानी ईष्र्या एवं संदेह के कारण दुःखी करती रही एवं अंधेरी कोठरी में बाल काटकर हाथों से बेड़ियां बांधकर भूखी ही बंद कर दिया एवं अपने माता पिता के घर चली गई । सेठ घर आया खोजा तो अंधेर कोठरी में पाया । घर में से उड़द बाकुले लेकर उसको दिये एवं जंजीरों से मुक्त करने हेतु कारीगर को लाने चला गया । चंदनबाला तीन दिन से भूखी प्यासी है परन्तु मन में भाव है कि किसी साधु, महात्मा, अतिथि को पहले भोजन दूं । उस हेतु जंजीरों सहित दरवाजे पर इंतजार करती है । भीतर की पुकार से पुण्य संयोग से प्रभु महावीर को देखा , आनंदित हुई । प्रभु पुनः लौटने लगे तो आंखों से पानी बहने   लगा । प्रभु भक्ति को देखकर पुनः लौट आये एवं लगभग 6 महीनों की तपस्या का पारणा किया । भीतर की अनंत उज्ज्वल की हुई प्रार्थना का फल अवश्य उच्च होता है । 

 

हर व्यक्ति, नेता स्वतंत्रता सेनानियों की कुर्बानी को स्मरण करे

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

अम्बाला शहर 15 अगस्त, 2007: युग पुरूष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- दृढ़ संकल्प आजादी दिलाने हेतु गांधी ने मन में धारण किया था । आजादी को प्राप्त हुए 60 वर्ष हो चुके हैं । मन में संकल्प अंग्रेजों के भेद-भाव रंग-रूप के कारण आया । अंग्रेजों ने गांधीजी को तिरस्कृत शब्द कहे ‘इण्डियन डाॅग’’ । दिल दहल उठा भारत हमारा देश है और अंग्रेज हमें गालियां देते हैं । यह कैसे हा ेसकता है ? उसके लिए केवल मात्र एक लंगोटी और लाठी के सहारे अकेले अहिंसा के मार्ग द्वारा स्वतंत्रता दिलाने का विचार किया । भारत की जनता को भाषणों द्वारा जाग्रत किया गया । भारत के लोग जाग गये और गांधी की राह पर अंग्रेजों को भगाने के लिए चल पड़े । 

संसार में रहने वाला मनुष्य ही नहीं अपितु मूक प्राणी, अदृश्य सूक्ष्म जीव तक गुलाम नहीं रहना   रहता । पक्षी को बांधने के बाद उसे मिष्ठान्न प्रिय भोजन दिये जाये परन्तु उसे खुले आकाश में भ्रमण करना सर्वप्रिय है । पटेल, नेहरू, भगतसिंह, चन्द्रशेखर आजाद, सुभाष चन्द्र बोस आदि ने जो परिश्रम  किया । आजादी के लिए अपने प्राण की परवाह नहीं की उनके बलिदान और योगदान को इतिहास में कभी भुला नहीं जा सकता । देशभक्त नेता पाई-पाई का हिसाब रखते थे परन्तु आज विडम्बना है कि नेताओ को देश की कोई परवाह नहीं वह केवल अपना पेट भर रहे । उसके लिए भ्रष्टाचार अनैतिकता को बढ़ावा दे रहे हैं । कोई भी सरकारी काम बिना भ्रष्टाचार के सफल एवं पूर्ण नहीं होता है । आज के युग के नेताओं को व्यक्तियों को अपनी अन्तर-आत्मा से पूछना जरूरी है की हमने भारत के शहीदों के लिए सहयोग, कुर्बानी को मूर्त रूप दिया है ।  

स्वतंत्रता प्राप्त हुई है परन्तु कुछ लोग अमीर बने हैं । कुछ लोग सुखी हैं । कुछ लोगों को तरक्की हासिल हुई है भारत का हर व्यक्ति सुखपूर्वक रह सके हैं, भोजन की आवश्यकताएं पूर्ण हो यह व्यक्ति अपने जीवन में संकल्प ले और यथाशक्ति इन ज्वलन्त समस्याओं को पूरा करने का प्रयास करें । यह तभी हो सकता है जब व्यक्ति सभी जीवों की आत्मा को अपने समान समझे । ‘‘परस्परोपग्रहो जीवानाम्’’ की परम मंगल भावना से ही यह विकट कार्य सरलता के साथ पूर्ण हो सकता है । 

बाह्य सुख समृद्धि भी प्राप्त हो गई परन्तु फिर भी हम अपने मन के शरीर के गुलाम हैं जो आपका मन कहता है वैसा ही कार्य, प्रवृत्ति आप करते हैं । चाहे वह बुरा ही क्यों न हो । शरीर अस्वस्थ है तो शरीर की अनुकूलतानुसार आपको चलना पड़ता है । वास्तविक स्वतंत्रता वही है जब व्यक्ति अपनी आत्मा का बोध करे और मन को स्थिर करे, मन को वश करें और स्वतंत्र. हो । 

तीन दिन से चल रहे आत्म समाधि कोर्स एवं आत्म: विकास कोर्स एडवांस-ा का आज सुन्दर ढंग से समापन हुआ इसमें बड़ी संख्या में साधकों ने भाग लेकर जीवन जीने की कला का प्रशिक्षण प्राप्त   किया । 16 से 19 अगस्त, 2007 तक आत्म: विकास कोर्स एडवांस-ाा शुरू हो रहा है जिसमें भाग लेकर जीवन जीने की कला का प्रशिक्षण प्राप्त करें ।

 

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

अम्बाला शहर 16 अगस्त, 2007: युग पुरूष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- आज तक स्वभाव में लीन नहीं हो पाया परभाव में अधिक रहता रहा । यह प्रेरणा परमात्मा से ही लेनी पड़ेगी क्योंकि वह स्वयं बुद्ध है ।  

भीखा बात आगम की, कहन सुनन की नाही ।

जो जाने से कहे नही, कहे सो जाने नहीं ।।

संत भीखा अनुभूति की बात कह रहे हैं । जो रहस्य की बात है अर्थात् आत्म-तत्व एवं सत्य की बात न कही जा सकती है न ही सुनी जा सकती है । जो व्यक्ति जान लेता है वह सत्य को कह नहीं पाता है और कहता है वह उस रहस्य को जान नहीं पाता है । कहने वाली बातें आप स्वयं अनुभव करो वह बात तुम्हारी स्वयं की होती है । प्रभु महावीर ने जो कहा सत्य का अंश हो सकता है । सत्य तो भीतर है । जो कहा उसे वैसा का वैसा गणधर उसे ले नहीं पाये गण्धरों द्वारा जाने रहस्य को आचार्यों ने जो समझा उसमें ही अन्तर आ जाता है । 

परमात्मा घट-घट के ज्ञाता है । सर्वज्ञ है अरिहंत हैं । कोई बुरा कर्म उनकी निगाह से छूट नहीं सकता । पाप कार्य करके यह मत समझना कि कौन देखता है, यह भ्रम कभी मत पालना । जो कर्म किये हैं उन कर्मों को भोगना पड़ता है । मन से जो सोचा वह भी सर्वज्ञ जानते हैं । एक मौत और दूसरा परमात्मा को हरदम याद रखते बाकी सबके चाहे भूल भी जाओ । मौत एक रोज तो अवश्य आनी ही है उससे न पहले कभी कोई बचा था न बचने वाला है और न बचेगा झूठ, चोरी करते हो तो आपक आत्मा आपको अवश्य झकजोर देती   है । आत्मा तो पाप, बुरा कैसे स्वीकार सकती है वह शुद्ध उज्ज्वल है । एक दाग भी लगता है तो तुरन्त अहसास होता है । परमात्मा जो सबको जानते है, क्रोध आदि कषायों पर जिन्होंने विजय पा लीर है और शुद्ध, बुद्ध हो गये है उन्हें प्रतिदिन हर कार्य करते हुए स्मरण रखना क्योंकि व्यक्ति का चरम लक्ष्य परमात्म स्वरूप में रमण करना ही है । उद्देश्य के प्रति सचेत हो जाओ और उस हेतु यथा-योग्य पुरूषार्थ करो । अनंत जन्मों से आपकी आत्मा 8 कर्मों के बंधन से बंधी है आत्मा से कर्म-बंधन मुक्त हो यही प्रार्थना और आस जरूर रखो । 

प्रार्थना, सामायिक, भक्ति, उपासना, सेवा जब करो तो पूरी तरह एकाग्र हो जाओ फिर संसार के कार्यों में आपका मन विचार कदापि होने नहीं चाहिए । अगर इस प्रकार धर्म साधना करते हुए होता है तो वह धर्म-साधना अधूरी ही नहीं अपितु निरर्थक है । गुरू नानक को हिन्दु भी मानते और मुसलमान भी मानते हैं । सच्चे संतों में धर्म, जाति, अमीर, गरीब, छोटे, बड़े आदि भेदरेखा नहीं खींचते हैं । एक बार हिन्दु और मुसलमान दोनों गुरू नानक को या तो हिन्दु या मुसलमान मानने लगे और गुरू नानक को कहने लगे कि आप हिन्दु है या मुसलमान । गुरू नानक ने कहा मं तो सम्पूर्ण मानव जाति का सम्मान करता हूं । मुसलमान ने कहा- आप हिन्दुओं की प्रार्थना बोलते हो परन्तु कभी नमाज नहीं पढ़ते । आप कैसे सभी धर्मों के हो गये ? गुरू नानक ने कहा कि में तो रोज नमाज भी पढ़ता हूं और प्रार्थना भी करता हूँ । मुसलमानों की विनती पर गुरू नानक नमाज पढ़नें मस्जिद में गये । बहुत से लोग एकत्रित हो गये । शर्त यह थी कि मौलवी मगर नमाज पढ़ेगा तो मैं भी पढूंगा । मौलवी नमाज की विधि अनुसार नमाज पढ़ता रहा पर गुरू नानक केवल खड़े  रहे । सब कहने लगे कि आपने तो नमाज पढ़ी नहीं । शर्त याद दिलाई और मौलवी का मन पूरी तरह नमाज में नहीं लगा हुआ था बल्कि मन में विचार घोड़े बेचने का और खेत में फसल को काटने का चल रहा था । सभी को वास्तविक धर्म का बोध हुआ । प्रार्थना में आपका केवल शरीर ही हलचल नहीं करें अपितु मन भी प्रार्थना के भावों में जुड़ जायें ।

 

देखो, सुनो पर प्रतिक्रया मत करो

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

अम्बाला शहर 17 अगस्त, 2007: युग पुरूष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- स्थानांग सूत्र के अन्तर्गत प्रभु महावीर ने 10 प्रकार के मुण्डन की बात कही है जिसमें 5 मुण्डन है इन्द्रियों के, 4 मुण्डन है कषाय संबंधित और 10 वा मुण्डन है केशलोच । भगवान की आज्ञा भेद-ज्ञान की साधना है । जब से की है तब ज्ञात हुआ कि यह सर्वोत्तम साधना है । 

अक्सर मनुष्य जो सुनता है देखता है और उसके ऊपर प्रतिक्रिया करता है । मन, बुद्धि, संस्कार, धारणा के अनुसार इन्द्रियां कार्य करती है । न कुछ सही है और कुछ गलत है जो आपकी धारण है उसके अनुसार कुछ चीजे अच्छी और बुरी दृष्टिगोचर होती है । वीतराग साधक आत्म स्वभाव में रहता है क्योंकि आत्मा तो केवल जानती और देखती है इसलिए आँखों का धर्म है देखना, कान का स्वभाव है सुनना, नाक सुगंध हो अथवा दुर्गंध उसको सुंघती है । रस जबान का स्वाद है जैसे कड़वा, मीठा, खट्टा आदि स्वाद की अनुभूति इसके द्वारा ही होती है ।  स्वाद के कारण हम अपनी क्षमता तक नहीं आंकते हैं और जो स्वादिष्ट भोजन है उसे खाते ही जाते हैं और परिणाम से बीमारियां शरीर को घेर लेती है । उपवास व्रत धारण कर लिया भोजन पानी आदि सब चीजे त्याग दी है अथवा कम कर दी है परन्तु आपकी रूची स्वाद पदार्थ सेवन की है तो भगवान कहते हैं कि आपका व्रत बाह्य हो गया । वह उपवास साधना निरर्थक है ।

स्पर्श का अनुभव गरम हो अथवा ठण्डा हो इसी प्रकार कोमल खुरदरा आदि बातों में आपका मन न अटके । सब बातों को समता भाव से सहन कर सको । कषाय का मतलब है आन्तरिक दुर्भावनाएं है । क्रोध, मान, माया, लोभ इनको मात्र स्वीकार करना है । भीतर की वृत्तियों बाहर आएगी परन्तु इनके स्वभाव को देखना जानना है यही वीतराग साधना है । प्रतिक्रिया क्रोध आदि कषाय को बढ़ाने में सहयोग न देना । केश लूंचन मात्र परम्ही परा नहीं है कि प्रभु महावीर और उनके पश्चात् आचार्यों ने किया इसलिए करना है बल्कि शरीर की ममता आसक्ति को छोड़ना है उसे नष्ट करने का वास्तव में अभ्यास है । गौरतलब है कि सम्वत्सरी महापर्व के पूर्व समस्त जैन साधु चारों सम्प्रदाय दिगम्बर स्थानकवासी तेरापंथ एवं मूर्तिपूजक केशों का लुंचन करते है यह परम्परा अनेक सदियों से निरन्तर चल रही है । 

आचार्य भगवंत ने सभी श्रद्धालुजनों को संक्रांति के अवसर पर संक्रांति का पाठ सुनाया एवं सभी को धर्म ध्यान करने की विशिष्ट शब्दों से प्रेरणा दी एवं यथायोग्य जरूरतमंदों की सहायता करने का मार्गदर्शन किया ।

 

प्राणी मात्र की सेवा करना प्रार्थना है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

अम्बाला शहर 18 अगस्त, 2007: युग पुरूष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- मानव रूपी अनमोल जीवन को उपयोगपूर्वक जीये । 24 घण्टे में अधिक से अधिक समय सोने में, खाने में या इन कार्यों हेतु सामग्री एकत्रित करने में ही चला जाता है । मनुष्य को सोचना है कि कितना समय प्रभु भजन, भक्ति अथवा स्वयं के लिए निकाला है वही समय सार्थक है । वैसे तो भक्ति, प्रार्थना की नहीं जाती वह स्वयं प्रकट होती है । एक कवि कहता है कि कल्पवृक्ष एवं बैकुण्ठ मुझे कुछ नहीं चाहिए केवल परमात्मा के अंग-संग रह सकूं ऐसी परम उपलब्धि चाहिये ऐसे अनुपम-भाव परमात्म भक्ति की पात्रता है । परमात्मा के मार्ग पर चलने हेतु व्यक्ति का पढ़ा लिखा विद्वान होना आवश्यक नहीं है । दृढ़ता और हृदय की शुद्धता है तो ही मुमुक्षु उस मार्ग पर निर्बाध-गति से चलकर सफल होता है । जैसे संत कबीर, स्वामी, विवेकानंद के गुरू रामकृष्ण परमहंस अधिक पढ़े लिखे नहीं थे परन्तु फिर भी पूजा भक्ति की चरम अवस्था में विराजमान थे । प्रार्थना और ध्यान में समर्पण बहुत जरूरी है । 

परमात्मा को धन फूल और आरती के द्वारा प्रसन्न नहीं किया जा सकता क्योंकि परमात्मा महावीर को चाहे आप स्तुति करो अथवा गाली दो कोई फर्क नहीं पड़ता है । सोने के मन्दिर नहीं हृदय की सम्पत्ति अर्पित करो फूल चढ़ाने की अपेक्षा कोमलता उजागर करो । लक्ष्मी की प्रार्थना, पूजा इसलिए करते हैं क्योंकि धनवृद्धि हो धन तो आज है कल नहीं रहेगा ऐसी अद्भुत चीज मांगो जिससे फिर मांगना नहीं पड़े । शाश्वत् आनंद की प्राप्ति हो ऐसी प्रार्थना करो । संसार की वस्तु मत मांगना बल्कि संसार से मुक्त होने हेतु गलतियां, कर्म से मुक्त और अहंकार की समाप्ति हो और पवित्रता, मैत्री, करूणा, शुद्धता बढ़े ऐसे भाव रखना एवं चाहे पनघट मन्दिर घर कहीं भी रहो असली पूजा तो हृदय से होती है । मन्दिर और मस्जिद से कोई फर्क नहीं पड़ता । मस्जिद में ब्रह्म स्वरूप का बोध नहीं हो सकता ऐसी बात नहीं है बल्कि आप स्वयं के स्वरूप को कही भी प्राप्त कर सकते हो । वैसे तो कहीं बाहर परमात्मा को खोजने की जरूरत नहीं है बल्कि आपके भीतर ही वह परम उज्ज्वल ज्योति प्रकाशमान है आवश्यकता केवल कर्मों के आवरण को हटाने की है । मन्दिर, मस्जिद, गुरूद्वारे, स्थानक कही भी जा रहे हो रास्ते में कोई जरूरतमंद मिला उसे सहायता कर दी प्रार्थना हो गई । मन्दिर जा रहे हो माता पिता बीमार है और आपने उनका इलाज करवा दिया फिर कहीं मन्दिर जाने की जरूरत नहीं । आपका घर ही मन्दिर बन गया । प्रार्थना के लिए कोई विशेष स्थान की आवश्यकता नहीं है आपका चित्त शुद्ध है और आप हर प्राणी में परमात्मा का वास समझते हैं हर असहाय व्यक्ति की सहायता करते हैं आपकी भक्ति और अर्चना हो जाती है । सामायिक, पूजा, गुरू सेवा, प्रार्थना, वास्तव में मानव मात्र की सेवा में है ।

 

साधना का उद्देश्य आत्म शुद्धि

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

अम्बाला शहर 19 अगस्त, 2007: युग पुरूष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- अध्यात्म की खोज जीव से शिव बनने की कला एवं आत्मा से परमात्मा बनने की उपलब्धि कहीं बाहर नहीं है बल्कि भीतर है । जीवन मिला है उसे निरन्तर जीते जा रहे हैं । धन, सम्पत्ति की अपारता होने पर व्यक्ति संतुष्ट नहीं है । पाँच प्रकार के कमल वर्णन शास्त्रों में मिलता है । कमल प्रतीक है की कमल का जन्म कीचड़ में ही होता है परन्तु कमल कीचड़ से उपर रहता है । कीचड़ में रहते हुए भी कीचड़ से अलग रहने की प्रेरणा कमल के फूल से मिलती है । हर व्यक्ति का जन्म भी संसार रूपी कीचड़ में ही होता है परन्तु कीचड़ में रहते हुए कमल की भांति जीवन को सुगधित बनाना और प्रफुल्लित करना है । फूल तो फूल ही रहेगा वह कोमल एवं आकर्षण का केन्द्र ही रहेगा परन्तु जिसने देखा है । जिसने अनुभव नहीं किया है वह कांटे के समान कठोर मान सकते हैं । इसी प्रकार ध्यान साधन शिविर फूल की भांति है जो अनुभव करते हैं महान् पुरूषों एवं अरिहंतों तीर्थंकरों की साधना है । ध्यान शिविरों में सभी प्रकार के बाह्य भेद प्रभेद एवं धर्म जाति, स्त्री पुरूष, पद आदि का अहंकार सर्वप्रथम निकालो उन्हें भूल जाओ यह प्राप्त करने की पहली सीढ़ी है । 

पक्का पता है सभी को एक दिन इसको दुनिया से जाना है । सम्पूर्ण शरीर भी राख की भांति ढ़ेर होना है । परन्तु मनुष्य मृत्यु को भुलाने का प्रयास करते, फिर पुनः उन्हीं रोजमर्रा के कामों में लग जाते हैं, सोते, खाते, दुकान चलाते हैं । सारी उम्र इसी उधेड़बुन में लगे रहते हैं । मनुष्य रूपी अनमोल जीवन पुण्य के प्रबल उदय से प्राप्त हुआ   है । अगर मनुष्य जीवन के अनमोलता का अहसास न कर पाये तो जीवन को व्यर्थ कर रहे  हैं । समय को अधिक से अधिक नाम-स्मरण एवं जीवन के वास्तविक शत्रु क्रोध, मान, माया, लोभ आदि को कम करने की साधना आराधना करने में लगाना । हम मन्दिर आदि में जाकर प्रभु नाम लेते हैं सामायिक आदि क्रियाएं भी करते हैं और वह भी कुछ समय अर्थात् कुछ घण्टों के लिए करते हैं । वह पूर्ण रूप से शुद्ध नहीं होता उसमें भी स्वयं का स्वार्थ होता है की दुकान चले, नौकरी मिले, बेटा हो । इस प्रकार की भक्ति एवं धर्म कार्यों के करने से कोई फायदा नहीं   है । 

शरीर शाश्वत् नहीं है । एक दिन नष्ट हो जाना है आत्मा तो शाश्वत् है, हर योनि में विद्यमान है । मोक्ष अवस्था में आत्म स्वरूप ही रहता है । श्रद्धा, विश्वास एवं पुरूषार्थ यही करो कि जिन्दगी के असली उद्देश्य की प्राप्ति हो । इस प्रकार के शुभ विचार आ जाये फिर किसी प्रकार की परवाह मत करो । रास्ता अपने आप सुन्दर और सरल बन जाएगा । धर्म के मार्ग पर चल सहयोग और सुख स्वतः साथ ही आ जाता है । सभी जीवों के भीतर धर्म की वर्षा हो, यही भाव निरन्तर बनाये रखे । 

कार्य करने से पूर्व सोचो कि हम यह कार्य क्यों कर रहे हैं । डिग्री हासिल करने हेतु अध्ययन मत करो अपितु ज्ञान वृद्धि हेतु करो । कार्य होने पर क्या प्राप्त किया है इस पर भी अवश्य चिन्तन करो यही ग्रन्थ एवं महापुरूषों की वाणी है । धर्म मार्ग पर चलते हुए उद्देश्य आत्म शुद्धि कर परमात्म स्वरूप में विराजमान होने का रखना । संसार के साधन कभी मत मांगना और इस हेतु कोई भी धर्म कार्य कदापि नहीं करने चाहिये । 

 

ध्यान द्वारा मन की स्थिरता एवं आत्म अनुभव

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

अम्बाला शहर 20 अगस्त, 2007: युग पुरूष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- इस संसार में रहते हुए एक शाश्वत और ध्रुव संबंध, आत्मा का परमात्मा से है । आत्मा का मुक्ति स्वभाव है चाहे वह आत्मा पशु-पक्षी की हो अथवा कीड़े या मनुष्य की सब मक्ति चाहते हैं । हमारी यात्रा मैत्री की, धु्रव एवं शाश्वत की यात्रा है जिसमें सुख समृद्धि का वैभव भीतर से   लहराएगा । समत्व आपके भीतर के उज्ज्वल भावों से आये यही साधना की निष्पत्ति । कबीर जी कहते हैं, उठते, बैठते, खाते, सोते हर समय स्मरण करता हूं । कहीं मन्दिर आदि स्थान विशेष में नहीं जाना पड़ता है । 

उपासना का अर्थ है परमात्मा के समान आसन हो जाये । प्रार्थना, भक्ति, सामायिक आदि उपासनाएं दिल की गहराई से करते हो तो परमात्म ज्योति के समान हो जाते हैं । परमात्मा और तुम अलग नहीं बल्कि एकमेक हो जाते हो । संसार की सुख समृद्धि हेतु भौतिक वस्तुएं हम उच्च पदों पर आसीन व्यक्तियों से मांग करते हैं । जो स्वयं ही किसी और से या प्रभु से सुख समृद्धि मांग करते हैं । मांगना है तो सीधी मांग प्रभु से करो क्योंकि वह परम शुद्ध है । भौतिक जगत में बड़ी चकाचैंध है । एक प्रकार से मृग मरीचिका नजर आती है । मांगना है तो अनमोल हीरा रूपी आत्म समृद्धि की मांग करो । मन की शक्ति बहुत है, मन ही प्लानिंग बनाता है, विध्वंस करता है, चंचल है परन्तु फिर भी स्थिर नहीं होता है । आगे से आगे बढ़ जाता है और चन्द्रमा एवं मंगल जितनी लम्बी दूरी यहां बैठे ही कुछ सैकण्डों में तय कर लेता है । यह मन एक भूत है । भूत को अगर कोई काम न दो तो वह परेशान करेगा । ध्यान विधि द्वारा मन को स्थिर करने का प्रयास किया जाता है उसे जो श्वांस एवं प्रश्वांस निरन्तर चल रहा है उस श्वांस प्रश्वांस रूपी खम्बे पर निरन्तर लगाये   रखो ।

सारे धर्मों और महापुरूषों की ध्यान विधि श्वांस से ही शुरू होती है । भगवान बुद्ध की साधना आना पाना अर्थात् श्वांस प्रश्वांस पर आधारित है । क्रोध, मान, माया, लोभ आदि आते हैं तो श्वांस पर असर पड़ता है । श्वांस यों तो तेज हो जाती है या धीमी हो जाती है । साधक को श्वांस पर ध्यान देकर उसे सम करना है, सहज करना है । क्रोध आदि कषाय अपने आप निष्फल हो जाते हैं । 

आजकल बहुत सी ध्यान योग की साधनाएं दुनियां में चल रही है । एक होड सी लगी है किसी भी विधि का विरोध नहीं किया जा सकता । हर विधि अनूठी हो सकती है । जब आप प्रतिदिन अभ्यास करेंगे । जो विधि आपको अच्छी लगे उसे करते चले जाना । ऐसी ही साधना विधि राग द्वेष को समभाव से देखने की वीतराग साधना आत्म विकास कोर्स के माध्यम से करवाई जा रही है । आजकल की संस्कृति बदल चुकी है, बच्चों का खान पान संस्कार गलत हो रहे हैं । बच्चे ही नहीं अपितु मानव जगत गलत राह पर चल रहा है और उससे दुःखी होकर छूटना भी चाहता है परन्तु संगति वेश वातावरण की प्रतिकूलता के कारण छोड़ नहीं पाता है परन्तु ध्यान शिविरों में प्रवेश करने मात्र से खान पान शुद्ध मन हर स्थिति से निपटने हेतु तैयार हो जाता है और मन, बुद्धि, संस्कार और धारणा से ऊपर उठकर आत्म अनुभूति के मार्ग पर अग्रसर होता है । अवसरों का लाभ उठाने वाला व्यक्ति ही वास्तव में बुद्धिमान है । 

 

वीरागवाणी का ज्ञान कोहिनूर हीरे से भी बढ़कर है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

अम्बाला शहर 21 अगस्त, 2007: युग पुरूष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- एक हाजरी तुम दुकान में या बाॅस के सामने लगाते हो उससे बढ़कर है मालिक के लिए जो हाजरी लगाई जाती है । शुरूआत में नाम स्मरण माला द्वारा धर्म ध्यान होता है । जैसे नर्सरी या पहली क्लास में बच्चे को ‘‘क ख’’ आदि पढ़ाया जाता है परन्तु जैसे ही अगली क्लास में प्रगति करते है वह ‘‘क ख’’ आदि वर्णमाला के अक्षर भी छूट जाते हैं उसी प्रकार माला भी पहली क्लास  है । हम जीवन भर शुरू से लेकर क्लास में आखिर तक रहते हैं लेकिन उस क्लास को छोड़ना ही नहीं  चाहते । जैसे ही धर्म मार्ग में आगे बढ़ते हैं तो नाम स्मरण जप तप आदि क्रियाएं केवल नाम मात्र के रह जाती है और फिर नाम लेना नहीं पड़ता अर्थात् कोई अतिरिक्त प्रयास नहीं करना पड़ता । अलग से कोई स्थान और समय नहीं निकालना पड़ता बल्कि जाप, तप भीतर से सहज चलता है और एक समय वह भी छूट जाता है । प्रार्थना भक्ति में व्यक्ति का पढ़ा, लिखा होना आवश्यक नहीं है । गांधी ने दो व्यक्तियों को गुरू माना है अपने जीवन में एक है टालस्टाय एवं दूसरे हैं श्रीमद् राजचन्द्र । टाॅलस्टाय ने एक घटना लिखी है वह घटना तीन अनपढ़ लोग की है । जो प्रभु से प्रार्थना करते हैं प्रार्थना भी बड़ी सीधी है । हम तीन और तुम तीन अर्थात् जो प्रार्थना करते है वह तीन मनुष्य और तुम तीन अर्थात् ब्रह्मा, विष्णु महेश । प्रभु कृपा करो । पुरोहित उनकी प्रार्थना को बदलवाना चाहता है । ऊपर आकाशवाण्ी होती है कि वह तीन व्यक्ति मेरे से जुड़े हैं परन्तु तुमने अपनी बनावटी प्रार्थना सिखाकर उनको मुझसे अलग कर दिया । 

किसी भी वृक्ष को प्रफुल्लित करने के लिए बीज बोना पड़ता है परन्तु उस हेतु भूमि भी उपजाऊ होनी चाहिए तभी वृक्ष बड़ा हो सकता है । इसी प्रकार परमात्म के सत्चित्त आनंद को प्राप्त करना है तो हृदय शुद्ध हो तभी प्राप्त किया जा सकता है । हर समय जब केवल और केवल परमात्मा का ध्यान और परमात्म स्वरूप हेतु पुरूषार्थ हो तभी विकास हो सकता है जिस दिन तुम्हारे मन में विश्वास आ जाए कि अरिहंत परमात्मा जिस हाल में रखे हम खुश रहे । प्रभु का सिमरन सबसे श्रेष्ठ है, अमृत है । इस धर्म गंगा में बहुमूल्य समय निकालकर डुबकी लगाओ वह क्षण सार्थक है । एक बार धर्म कर लिया ऐसा मत समझना कि बहुत कर लिया बल्कि जैसे पौधे को रोज पानी देना पड़ता है तभी वह वृक्ष बनता है उस पर फूल और फल आते हैं ऐसे ही धर्म प्रतिदिन करना जरूरी है । 

आत्म स्वरूप तब प्राप्त होगा जब आपकी गहरी रूचि होगी कि मुझे चरम उद्देश्य को प्राप्त करना है । धन, दुकान, पद, प्रतिष्ठा प्राप्त करने हेतु आप खान पान शरीर तक का ध्यान नहीं रखते हैं बल्कि वह सभी अस्थिर है परन्तु फिर भी उसके प्रति इतने सचेत एवं जागरूक रहते हैं ऐसी गहरी प्रतीति जब परमात्म प्राप्ति के लिए हो आपको केवल परमात्मा ही दृष्टिगोचर हो और कोई वस्तु न दिखती हो तभी कुछ हासिल किया जा सकता है । सोना, हीरा और उससे मूल्यवान कोहीनूर हीरा पाने की लालसा हममें रहती है क्योंकि वह शाश्वत है क्रमशः एक से एक बढ़कर मूल्यवान है इसलिए उसे ग्रहण करना चाहते हैं । वीतरागवाणी, वीतराग दृष्टि रूपी हीरा उससे कहीं अधिक अनमोल है । धर्म, प्रार्थना को जीवन में धारण करके जीवन को सुन्दर, प्रसन्नचित्त किया जा सकता अन्य मार्ग आपको भटकाने वाले हैं ।

 

जीवन और संसार की वस्तुएं नश्वर है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

अम्बाला शहर 22 अगस्त, 2007: युग पुरूष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- शासनपति भगवान महावीर की वाणी हमारे जीवन में राग द्वेष को मिटा देती है और संसार सागर से पार कर मुक्ति की ओर ले जाती है । प्रभु महावीर ने कहा जीवन अधु्रव है जिसको हम धु्रव मानते हैं और जिसे हमने समझा नहीं अर्थात् सिद्धि का मार्ग धु्रव है जिसकी तरफ हमारा ध्यान कदापि नहीं है । इन्द्र चक्रवर्ती आदि का आयुष्य पूरा होता है तब उनका आसन भी डोलायमान होता है । प्रभु महावीर की वाणी का एक वाक्य हमारे जीवन में आ जाए तो भी जीवन परिवर्तन होता है । 

मनुष्य माया अर्थात् धन, यौवन और ऐश्वर्य पर अहंकार करने लग जाता है । यह भ्रम पाल लेता है कि यह संसार के सुख साधन का ही सब कुछ मान लेता है । धन सम्पत्ति बादल की छाया के समान है परन्तु मोह ममता के कारण यह सब भूल ही जाता है । परिस्थिति जब सामने आ जाती है तब घबराता है तब घबराने से कोई फायदा नहीं है अपितु हर क्षण का श्वांस का सार्थक सदुपयोग करो । 

आज तुम्हारे जीवन में मानसिक तनाव और शारीरिक बीमारियां आती है तो उसके पीछे तुम्हारे अपने ही कर्म है । छोटी-छोटी बातों में हम अपने को दूर कर लेते हैं जब स्वयं के जीवन में परिवार में कोई उचित अनुचित कार्य को भी सही ठहराते हो परन्तु जब दूसरा गलती करता है तो उसे बूरे शब्दों द्वारा परिभाषित करते हो उसके सही कार्य को भी गलत ठहराते हो । आपका बैटा पास होता है तो उसकी प्रशंसा करते हो देखो मेरा बेटा कितना होशियार है अच्छे नम्बरों से पास हो गया परन्तु पड़ौसी का बेटा पास होता है तो सोचते हो इतना प्रतिभावान तो नहीं था जरूर रिश्वत दी होगी नौकर के हाथ से ग्लास टूट जाता है तो उसे दोष देते हो और भला बुरा कहते है परन्तु स्वयं से टूटता है तो दूसरे को दोष देते हो । दुःख परेशानी आये तब दूसरों को दोष मत देना और अच्छा कार्य एवं जीवन में सफलताएं प्राप्त हो तो अहंकार मत करना । 

शाश्वत् वाणी है कि आठ कर्मों में एक कर्म का अंश मात्र कर्म भी रह गया तो मोक्ष होने वाला नहीं है । जीवन की श्वासें थोड़ी है और कर्म बहुत अधिक इसलिए छुटकारा कैसे होगा 23 घण्टों तक कर्म का बंधन करो और घटा ही कर्म मुक्ति हेतु साधना करोगे वह भी पूरी तरह नहीं करते हो । कर्मों का छुटकारा इस विधि के अनुसार नहीं हो सकता । धन आदि आवश्यक क्रियाएं तो करनी पड़ती है परनतु वह क्रियाएं शुद्ध पवित्र हो और उनमें भी हर कदम पर प्रभु नाम सिमरण होना चाहिए नाम चाहे राम का हो महावीर या अन्य किसी का इष्ट का हो कोई फर्क नहीं पड़ता आपकी श्रद्धा निष्ठा होनी चाहिए । उसीसे बेड़ा पार होता है ।

जब जीवन का क्रम विपरीत होगा जैसे अधिक से अधिक समय आप संसार के लिए निकालते है और धर्म के लिए बहुत थोड़ा समय निकालते है जब धर्म में रमण अधिक समय पर्यंत और संसार में मन थोड़े समय तक ही लगेगा तभी मोक्ष की अग्रसर हुआ जा सकता   है । साधन और साध्य सही होना जरूरी है तभी मुक्ति संभव है । भगवान श्रीकृष्ण ने आपकी ही भांति सब कार्य किये परन्तु फिर भी भगवान मानकर पूजा की जाती है क्योंकि गृहस्थ जीवन में रहते हुए अलग   रहे । सम्राट् अशोक ने अहंकार पुष्ट करने हेतु युद्ध किया । बहुत से लोग मारे गये परन्तु भगवान बुद्ध का उपदेश मिलते ही युद्ध न करने का संकल्प किया । धर्म को जीवन में अपनाया । धर्म का प्रचार प्रसार किया । यह तभी होता है जब जीवन में धर्म आता है ।

 

सभी धर्मों का सार परोपकार है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

अम्बाला शहर 23 अगस्त, 2007: युग पुरूष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- प्रभु की वाणी हमारे जीवन की आधि, व्याधि, उपाधि को मिटा देती है । प्रभु महावीर की वाणी कहती है मनुष्य जाति एक है । सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में मनुष्य की चेतना में कोई भेद नहीं है । चेतना के गुण सभी में विद्यमान है । यह जीवन असंस्कृत है एक बार नष्ट हो जाये तो फिर जुड़ता नहीं है । समय का सदुपयोग करो, प्रमाद कभी मत करना हर समय जाग्रत रहना चाहिए । जब तक व्यक्ति को बुढ़ापा नहीं आता, इन्द्रियां शिथिल नहीं होती और शरीर को बीमारियां घेर नहीं लेती उससे पूर्व की धर्म को जीवन में अपनाना चाहिये । 

महर्षि वेदव्यास ने 18 पुराणों की रचना की । उनसे पूछा इतने विशाल ग्रन्थ को हर व्यक्ति पढ़ नहीं सकेगा इन 18 पुराणों का सार बताओ । उन्होंने एक वाक्य में कहा दूसरे का भला करना पुण्य है और दूसरों को पीड़ा देना है संत तुलसी कहते हैं- परहित सरस धरम नहीं भाई ।

 पर पीड़ा सम नहीं अध भाई ।।

दूसरों का हित इससे सुन्दर धर्म नहीं है और दूसरों को दिये हुए दुःख के समान अधर्म नहीं   है । महापुरूषों की वाणी का भाव एक ही होता है चाहे वह श्रीराम, गुरू नानक, प्रभु महावीर, बुद्ध कोई भी हो एक ही बात कहते हैं । गुरूनानक कहते हैं तीन बातें अवश्य जीवन में धारण करनी चाहिए- क्रत करना दूसरों का परेापकार करो नाम जपना, महापुरूषों का प्रभु का नाम स्मरण करना और बंद के छकना अर्थात् भोजन बांटकर खाओ । प्रभु महावीर ने भी कहा कि जो व्यक्ति अकेला भोजन करता है वह पापी होता है जिसके जीवन में विनय गुण ग्राहकता और सरलता होती है वह कभी असफल नहीं हो सकता । 

यह संसार मैला है हरि भजन करोगे तो सुच्चा हो जाएगा । सुख दुःख हो कैसी भी स्थिति हो हरि भजन मत छोड़ना । गांधी इतने बड़े व्यक्ति थे परन्तु प्रातःकाल प्रार्थना करते थे । प्रार्थना में हिन्दु, मुसलमान, सिख, ईसाई सब शामिल होते थे । लोगों को बीमारियां घेर रही है डाॅक्टर वैज्ञानिक भी रोगों का ेदूर नहीं कर सकते परन्तु ध्यान, प्रार्थना और योग के माध्यम से शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, राष्ट्रीय हर समस्या का समाधान कर देती है । गुरू नानक ने भी सिमरण करके ही ज्ञान प्राप्त किया था । 

व्यापार करते हुए भी धर्म किया जा सकता है । मनुष्य सोचता है कि झूठ, चोरी करेंगे तभी कमाई होगी तभी व्यापार चलेगा, परिवार का पालन पोषण होगा । इज्जत मान बढ़ेगा परन्तु इस प्रकार की भ्रांत धारणाओं को मन, मस्तिष्क से निकालना चाहिए । एक निर्धन व्यक्ति धन प्राप्त करना चाहता था । अनुभवी सज्जन ने पांच बातें बताई उनको धारण किया और अमेरिका का बहुत बड़ा उद्योगपति बना और उसकी वस्तुएं पूरे विश्व में खरीदी जाती है । वह व्यक्ति था विलियम कोलगेट जिसने टूथ पेस्ट, ब्रश, साबुन आदि वस्तुओं द्वारा प्रसिद्धि पाई । वह पांच बातें बहुत उपयोगी और ग्राह्य है । ईमानदारी, जरूरत के मुताबिक लाभ असली में नकली का मिलावट न करना । माप तोल कम न करना और कुछ लाभ दान द्वारा देकर उपकार करना । वास्तव में धर्म का सार भी यही है कि मन से, वचन से, प्रार्थना और भजन करना । बुद्धि द्वारा परोपकार करना और धन का कुछ प्रतिशत लाभ गरीबों, मूकप्राणियों हेतु देना चाहिए । 

 

लक्ष्य प्राप्ति के दो मार्ग है भक्ति और ध्यान

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

अम्बाला शहर 24 अगस्त, 2007: युग पुरूष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- अरिहंत परमात्मा ने हमें ध्यान समाधि जीवन जीने की कला दी है, हम उसे उदार मन से ग्रहण करने की क्षमता उत्पन्न करे और प्राप्त करके अथक परिश्रम करना बहुत आवश्यक है । मनुष्य को मन, बुद्धि, शरीर आदि का पूर्णतः विचार करके धर्म मार्ग में रमण करने की और अग्रसर होना चाहिए । सुख एवं दुःख मन की कल्पना मात्र है और कुछ नहीं है । दो मार्ग दुनिया में प्रचलित है एक है भक्ति का मार्ग जिसमें प्रार्थना एवं प्रभु स्तुति का चिन्तन है एवं दूसरा है ध्यान जिसमें साधक संकल्प ग्रहण कर अपनी शक्ति मन आदि का विशेष संयोजन करते हैं । संयोजन कैसे करना है इस विषय में प्रभु महावीर ने कहा कि अपने शरीर को अधिक कोमल मत बनाओ और सुकुमालता को छोड़ना चाहिये अर्थात् शरीर को तपाओ क्योंकि काम भोग ही व्यक्ति को दुःखी करते हैं । आप भी अनुभव करते हैं कि व्यवहार में वस्तु, पारिवारिक सदस्य आदि जिस भी साधन के प्रति को मोह होता है पहले तो सुखाभास लगता है परन्तु अंत में दुःख ही जीवन में परेशान करता है । धर्म का सहारा लोगे तो जीवन प्रसन्नचित होता  है । आज लोग बैंक बैलेंस, बीमा, धन, गाड़ी, मकान आदि को अधिक सुरक्षित मानता है और धर्म पर विश्वास करते ही नहीं धर्म को जीवन से विपरीत मान बैठा है । तुम्हारा जो भी सर्वप्रिय है क्या उस पर किसी को पक्का विश्वास है । शरीर और मन को इतना साधों जिससे कोई भी आपदा और विपदा आपको पीड़ा न पहुंचा सके । हर परिस्थिति में अनुकूलता का अहसास हो । 

गुरू नानक ने गाकर परमात्मा की अनुभूति कर ली । उनके भीतर सम्पूर्णतः समग्रता का संयोजन हो चुका था । गाने में इतने तल्लीन एवं एकाग्र हो चुके थे कि चरम उपलब्धि सहज प्राप्त हो गई । गुरू नानक का सिमरण ही ध्यान तप भक्ति हो गई अतिरिक्त प्रयास नहीं करना पड़ा । आप भी धर्म कार्य करते हैं । चाहे सामायिक कर रहे हो चाहे प्रार्थना भक्ति तप अर्थात् जो भी शुभ प्रवृत्ति हो उसे हृदय मन की एकाग्रता के साथ करते हैं वही सार्थक धर्म है । अक्सर मनुष्य का मन पूजा, भक्ति करते हुए कही ओर भ्रमण करता कछ विभिन्न प्रकार के विचार चलते रहते हैं इसलिए धर्म साधना में रूचि विश्वास उत्पन्न नहीं होता है । परमात्मा को प्राप्त करना है या आत्मा को परम शुद्ध बनाना है तो उसके लिए देह को तैयार करो । देह के द्वारा ही प्रभु महावीर, भगवान बुद्ध, श्री राम, अष्टावक्र ने अपने इष्ट को पाया था । दुःख सुख आये तो विचार करो कि यह हमारे ही अच्छे और बुरे कर्मों का प्रतिफल है । माता कुन्ती ने प्रार्थना में दुःख को मांगा । माता से पूछा उसने उत्तर दिया कि दुःख में प्रभु को स्मरण तो करती रहेगी । मनुष्य के जीवन में सभी उपभोग के साधन उपलब्ध होते हैं एवं जिस समय वह सुखी होता है उस वक्त उसे भगवान रहता है एवं वह अहंकार के नशे में अधार्मिक कार्य करने लग जाता है परन्तु जब दुःख में होता है उसे हरदम भगवान की याद बनी रहती है एवं प्रभु स्तुति तप आदि धर्म कार्य करता रहता है । सुख एवं दुःख पानी के बुलबुले के समान चंचल है इस ज्ञान को हमेशा स्मरण करते रहना । किसी का बुरा मत करना यह प्रवृत्ति का शाश्वत नियम है कि जो आप दूसरे को देते हो वही आपस तुम्हें मिलता है अगर दुःख होंगे तो दुःख एवं सुख दोगे तो सुख जीवन में आएगा । 

 

अरिहंत कहते ही अरिहंतमय हो जाओ

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

अम्बाला शहर 25 अगस्त, 2007: युग पुरूष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- पंच परमेष्ठी का प्रतिदिनप स्मरण करते हैं । वह क्यों किया जाता है ? सत्य को प्राप्त करना है तो परम सत्य से प्रेरित जीवन को हम नमन करते हैं । चेतन का स्वरूप जानना है उसके लिए चेतन का अनुभव प्राप्त करने वाले व्यक्ति का सम्मान करते हैं । नमन करते वक्त आपके भीतर शुन्य का बोध होना जरूरी है । नमन करते वक्त पद, प्रतिष्ठा, ज्ञान सब धारणाओं को तिलांजली दे देना । नमन का अभिप्राय है आप गुणों को ग्रहण करना चाहते । आपके भीतर गुणग्राहकता का सद्गुण विद्यमान है । गुलाब के पौधे पर फूल भी है और कांटे भी है ? हर प्राणी गुलाब के पौधे के समान होता है । अगर आपकी दृष्टि सही है अर्थात् शुभ को ग्रहण करने की कला है तो फूल की सुन्दरता ही दृष्टिगोचर होती है । कुछ व्यक्ति ऐसे भी होते हैं जो सर्वज्ञ जैसे महापुरूश में भी गलतियां निकालते हैं । किसी को नमन करते ही उनके गुणों का स्मरण हो जाये और उनके समान भीतर का कण-कण हो जाये, वही नमन यथार्थ में नमन है । जिस प्रकार फूल का नाम लेते ही गुलाब, चमेली आदि फूलों का चित्र अंकित हो जाता है फिर जिस फूल का नाम लिया जाता है उसकी सुगंध भी मन को प्रसन्न कर देती है । मिष्ठान्न आदि चर्चा आते ही मिठाईयों की मिठास का अहसास होता है । नमन केवल शब्द मात्र से न बल्कि ज्ञानपूर्वक हृदय की गहराई, अहंकार को तिरोहित करके होना बहुत आवश्यक है तभी उनके गुणों से बोधित हुआ जा सकता है । 

मंत्र स्तोत्र परम्परा, परिपाटी नियम लिया है इसलिए मत करना । मंत्र स्तोत्र रूचिपूर्वक होना चाहिए तभी साधना की सिद्धि होती है । ध्यान की ओर मुख करके जो साधक ध्यान में भीतर ही भीतर डूब जाते हैं उन्हें फिर बाहर में रस आता ही नहीं है । नींद तक भी दूर हो जाती है । संत कबीर को भी शिष्यों ने कहा कि गुरूजी प्रकृति की अद्भुत छटा का दृश्य तो देखो प्रकृति की वर्षा का आनंद देखो । संत कबीर कहते- भीतर की छटा और भीतर की आनंद वर्षा के सामने बाहर की हरियाली तुच्छ है । ध्यान कोर्स के माध्यम से भी आत्म अनुभव कराया जाता है । साधक आते है और कहते हैं कि अब तो ध्यान ही सब कुछ लगता है । अरिहंत कहते ही आप अरिहंतमय हो जाओ और राग द्वेष रूपी शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने में सफल हो सको । भगवान शिव आदि कोई भी नाम जप करो स्तोत्र करो नमन करो उनकी भांति हो जाओ । सिमरण नमन करते वक्त इतने तल्लीन हो जाओ कि शरीर, भूख, का ध्यान न आये । केवल स्वरूप में रमण हो सके । बाहर की ओर ध्यान ही न जाये क्योंकि भीतर ही सब कुछ है और भीतर के वैभव के सामने बाहर का वैभव कण मात्र भी नहीं है ।

 

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

अम्बाला शहर 10 सितम्बर, 2007: युग पुरूष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- महापर्व पुर्यषण पर सभी जीवों में अध्यात्मिक प्रकाश होना चाहिये । गणधर गौतम ने प्रभु महावीर से पूछा हम कौनसा धर्म करे । कहां पर जाये । किस व्यक्ति का संग करें ? प्रभु ने स्पष्ट शब्दों में उत्तरदिया है हे गौतम ! किसी भी धर्म शास्त्र पढ़ने से पहले अपने भीतर टटोलना । मन में राग द्वेष कपटता हो तो धर्म को ग्रहण नहीं कर पाएगा परन्तु अगर मन शुद्ध पवित्र सरल है तो जहां पर भी जाओगे जो भी करोगे जो भी सुनोगे वह धर्म हो जाएगा । शास्त्र की परिभाषा में इस उज्ज्वल दृष्टि को सम्यग् दर्शन कहा है  जो यथार्थ है वास्तविक है उसे उसी प्रकार ग्रहण करो । सब जीवों को आत्म-दृष्टि से देखो । हम बाहर के व्यवहार, रूप रंग को देखते हैं । स्त्री को सुन्दरता पर अहंकार होता है एवं पुरूष को पुरूषत्व पर अहंकार होता है । महापुरूषों की वाणी है जीवन भर भूखा रहे तप करे परन्तु अगर माया, मोह, अहंकार भरा है तो सब तपास्याएं, क्रियाएं बेकार है । विद्वत्ता धर्म की मोक्ष की गारंटी कदापि नहीं दे सकता बल्कि उसकी दुर्भावनाएं मूल से नष्ट हो यही मोक्ष का प्रवेश द्वार है । हृदय की सरलता, सहजता और गुरू के प्रति समर्पण एवं विनम्रता है तो आप सही मार्ग पर अग्रसर हो रहे हो । 2000 वर्ष पूर्व एक अनपढ मंदुबुद्धि शिष्य ने हृदय की शुद्धता द्वारा केवलज्ञान अर्थात् सर्वज्ञता को प्राप्त किया था । 

कबीर ने कहा है कि मैंने स्याही कागज हाथ में ली नहीं परन्तु संत कबीर की वाणी पर शोध ग्रन्थ लिखे जाते हैं । बिना किताबें पढ़े लिखे ज्ञान कहां से प्राप्त हुआ । इसका एक मात्र रहस्य है भीतर का प्रकाश प्रकट हो गया । आत्म ज्ञान का सर्वोच्च अनुभव हुआ इसलिए उनकी वाणी में अनमोल ज्ञान भरा पड़ा है । श्वांस के छूटते ही जीवन एक क्षण भर नहीं रहेगा । मनुष्य जीवन भर शरीर, परिवार के लिए जी तोड़ मेहनत, प्रयास करते रहते हो परन्तु आत्म साधना के लिए हमारे पास समय नहीं है । महीनों, सालों में की हुई धर्म साधना से कल्याण नहीं होता बल्कि जैसे दिन में तीन बार भोजन करते हो वैसे ही आत्मा का भोजन भजन सामायिक ध्यान स्वाध्याय से ही आत्म तृप्ति मिल सकती है । कर्मों का बंधन प्रमाद और आलस्य के कारण होते हैं । शरीर को विश्राम देना पड़ता है परन्तु ध्यान विचार, चिन्तन भीतर में होना चाहिये । इसलिए मुनि हर क्षण जागरूक रहता है । श्रीकृष्ण ने भी गीता में कहा है कि जब गृहस्थी, भोगी मानव सोते हैं तब योगी एवं संत जन जागते हैं, यही वचन प्रभु महावीर ने कहा है- मुनि सदा सचेत रहते हैं । 

संत कबीर जीवन निर्माण के विषय में कहते हैं कि धन वह कमाओ जो साथ में रहे, वह धन है ध्र्मा की कमाई वही जीवन में आपके साथ रहने वालीर है । द्रव्य, पैसा जितना कमाओगे वह तिजोरी में पड़ा रहेगा । धन, दौलत न कोई लेकर गया है न लेकर जाने वाला है । दुनिया में पेट को पालन पोषण करने के लिए नहीं आये हैं । दिन भर दुकान में बैठकर कमाई की और रात को आराम से सो गये वह जीवन निरर्थक है । आत्मा की ओर प्रवृत्त होना एवं जीवन में धर्म को अपनाना जीवन का वास्तविक उद्देश्य है । 

 

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

अम्बाला शहर 11 सितम्बर, 2007: युग पुरूष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- हर श्वांस सोने और हीरे से भी अधिक मूल्यवान है । अगर हर क्षण को धर्ममय बनाया जाए । नवकार महामंत्र के पांच पदों में दो पद सारभूत है पहला है साधु क्योंकि साधु के मार्ग पर अग्रसर होने के पश्चात् ही आचार्य एवं उपाध्याय आदि सम्माननीय अवस्था को प्राप्त किया जा सकता है । दूसरा पद है सिद्ध, सिद्ध अवस्था श्रावक अथवा जैन ग्रहस्थ एवं संत का चरम लक्ष्य है । 

मानव का मन चंचल है विकारों से भरा है और गुरू का मार्गदर्शन प्राप्त होने पर भी कोई फर्क नहीं प़ता है और मन की स्थिरता, शुद्ध हृदय से सज्जित व्यक्ति बिन गुरू के ही परमात्म पद को प्राप्त कर सकता है । पहले अपने मन को साफ करो । यह प्रक्रिया चलते-चलते चिŸा इतना निर्मल हो जाएगा कि परमात्मा का मार्ग कठिन नहीं रहने पाता है । यह बातें सभी धर्म सम्प्रदाय ग्रहण करते हैं एवं निर्मल चिŸा से भरे व्यक्ति की मुक्त कंठ से प्रशंसा भी करते हैं । संत तुलसीजी कहते हैं मोह, माया नष्ट होने पर धर्म मार्ग में प्रवेश होता है ।

प्रभु महावीर ने शरीर द्वारा मोक्ष प्राप्ति के विषय में दशवैकालिक सूत्र में कहा है ‘‘देह दुःख महाफलं’’ परिस्थितिवश कर्म बंधन का फल आने वाला है उन परिस्थितियों को समताभाव से सहन करते हैं तो अनंत कर्म छूट जाते हैं । वही दुःख को परेशान होकर मजबूरीवश सहन करते हैं तो दुःख दुगुना होकर लौटता है । दुःख के प्रति स्वीकारभाव मोक्ष एवं आत्मा की ओर अग्रसर करता   है । सुख में अक्सर व्यक्ति के भटकने की, शरीर के प्रति ममत्व में निमिŸा बन जाता है जिसके भीतर आत्म दृष्टि आ जाती है वह संसार-रूपी कीचड़ में भी कमल के फूल की भांति निर्लिप्त रहता है । मनुष्य भ्रम में रहता है और धर्म चर्चाओं में अक्सर कहते हुए सुना जाता है कि विषयों ने संसार ने हमें घेर लिया है हमारा विषयों से मुक्त होना असंभव है । वह दोष विषयों के देता है परन्तु ज्ञानी महात्मा कहते हैं कि मूल कारण विषय नहीं अपितु मनुष्य स्वयं ही बंधन का मूल जिम्मेदार   है ।

जैसा कर्म मनुष्य करता है उसका फल भी वैसा ही मिलता है । महापुरूषों के जीवन में भी प्रतिकूल परिस्थितियां आती है । संसारी व्यक्ति परिस्थितियों के अनुसार जीवन को चलाता है । वीतरागी पुरूष परिस्थितियों को समभाव से स्वीकार करते हैं, दुःख एवं सुख दोनों के प्रति न क्रिया करते हैं और प्रतिक्रिया भी नहीं करते हैं । मानव सुख की खोज भौतिक पदार्थों में करता है । जगत् की कोई भी वस्तु स्थिर न रही है न रहेगी और न रहने वाली है । उसी प्रकार जैसे-जैसे वस्तु में परिवर्तन होता है मन नई चीजों को ग्रहण करने की अपेक्षा रखता है । पदार्थ स्थिर न रहने के कारण पदार्थ की चाह में भी सुख नहीं होता है । मन के अनुसार चलने वाले सुख प्राप्त नहीं कर सकते हैं । साधक आध्यात्मिकता की खोज द्वारा परम् आनंद की अनुभूति करता है । आत्मा, अजर, अमर, शाश्वत् होती है इसलिए आत्म सुख भी अक्षय होता है । 

 

स्वर्ग और नरक पृथ्वी पर है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

अम्बाला शहर 12 सितम्बर, 2007: युग पुरूष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- महापर्व पर्युषण में करूणा, मैत्री एवं अध्यात्मरस बहे जिससे हमारा सिद्धालय निश्चित हो जाये । कर्मों का भुगतान करना पड़ता   है । निर्जरा की राह पर न चले तो परमात्मा से प्रार्थना करने से भी कुछ नहीं हो सकता । शरीर की चाह से ऊपर उठकर आत्म की अग्रसर होने हेतु कदम बढ़ओ यही जीवन की सार्थकता है । पशु, पक्षी, जानवर परमात्म पद प्राप्त नहीं कर सकते केवल मनुष्य जन्म में ही परमात्म प्राप्ति की क्षमता विद्यमान है । प्रभु महावीर ने कहा है कोमलता को छोड़ों काम, क्रोध दुःख का कारण है । दोषों से छुटकारा पाओगे तभी सुख को उपलब्ध हुआ जा सकता है । जिन्दगी का लक्ष्य निश्चित कर लो फिर हम क्षण उसका स्मरण करते रहो । लक्ष्य को प्राप्त करने के विभिन्न मार्ग है । कुछ मार्ग कठिन होते हैं और देर से पहुंचाते हैं एवं कुछ मार्ग सरल भी होते हैं और जल्दी पहुंचा देते हैं उसी प्रकार भेद-ज्ञान रूपी मार्ग सरल एवं जल्दी पहुंचाने वाला है । 

हर व्यक्ति में परमात्म ज्योति विराजमान है । सभी में परमात्मा का स्वरूप विद्यमान है । परमात्मा चिन्तन, मनन हर क्षण हो जाये फिर कोई काम गलत होता नहीं है । सभी काम शुद्ध और परम उज्ज्वल भावों से होते हैं । सम्बन्ध केवल आत्मा का परमात्मा से रखो बीच में किसी को भी लाने की जरूरत नहीं है फिर देखो जीवन परिवर्तन होता है । प्रभु महावीर ने उत्तराध्ययन सूत्र में फरमाते हैं कि सम्पूर्ण ज्ञान के प्रकाश से राग द्वेष रूपी कषाय के क्षय से साधक एकान्त रूप मोक्ष रूपी लक्ष्मी को प्राप्त करता है । साधक को राग द्वेष रूपी कषाय भीतर है ऐसा पहले स्वीकार करना है और राग द्वेष की उत्पत्ति का कारण वह स्वयं ही है । यह दो सूत्र साधक स्मरण रखे तो फिर वह कभी दुःखी नहीं होता है । 

स्वर्ग और मोक्ष कहां पर है ? इस पर दार्शनिकों ने तरह-तरह के विचार भारतीय शास्त्रों में उल्लेखित है । कोई स्वर्ग ऊपर मानता है एवं नरक नीचे मानता है । उदारवादी चिन्तक कहते हैं अगर भीतर दया है, क्षमा है तो पृथ्वी पर स्वर्ग है और क्रोध, दूसरे को दुःख के लिए तैयार होते हो तो वह नरक है । मन ही क्रोध करता है और मन ही क्षमा करता है । सीढ़ी एक ही है उसी सीढ़ी से व्यक्ति नीचे उतरता है उसी से ऊपर चढ़ता है । मुमुक्षु मन पर नियंत्रण करना होता है तभी वह मोक्ष लक्ष्मी को प्राप्त कर सकता है । महापुरूषों ने क्रोध को अग्नि एवं लोभ को नदी की उपमा दी है । जब क्रोध आता है तब जीवन की महŸवपूर्ण सफलताएं जलकर राख हो जाती है । लोभ नदी के समान सदा बहने वाली है इसलिए इन दुर्भावनाओं के पीछे मानव चलता है तो दुःखी होता है । 

मोह केवल पारिवारिक सदस्यों पर तो होता ही है परन्तु वस्तु पर किया हुआ मोह व्यक्ति को दुर्गति में ले जाता है । बौद्ध परम्परा में मोह से प्रेरित भिक्षु की दुर्गति में जाने की घटना प्रचलित भी है । जैन धर्म में गृहस्थ शिष्य संत महापर्व पर्युषण के आठ पावन दिनों का उपयोग क्रोध आदि दुर्भावनाओं कम करने हेतु ही तप करने का प्रावधान है । 

 

ज्ञान मनुष्य जीवन का लक्ष्य

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

अम्बाला शहर 14 सितम्बर, 2007: युग पुरूष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- शरीर, पद, प्रतिष्ठा आदि जो भी लक्ष्य मानव ने तय किये हैं वह केवल इस भव में काम आयेंगे परन्तु आत्म ज्ञान जन्मों-जन्मों तक साथ रहता है । आत्म ज्ञान किसी शास्त्र, युनिवर्सिटी से प्राप्त नहीं हो सकता । आत्म ज्ञान प्रत्येक व्यक्ति के भीतर है । सूरज को किरण से और किरण से सूरज अलग नहीं किया जा  सकता । बीज में ही वृक्ष की क्षमता विद्यमान है । बाहर पानी, हवा, सूरज, किरणों का सहयोग रहता है । कम्प्यूटर सूचनाओं का विश्वकोश है परन्तु उसको ज्ञान नहीं है अथवा उसको ज्ञानी नहीं कह सकते । ज्ञान प्राप्ति का आधार विनय है । विनय और समता दो बातें जीवन में आ जाये तो साधक धर्म मार्ग पर आगे बढ़ते हैं । अक्सर मनुष्य विद्वान होने के बाद अहंकार करने लग जाता   है । विद्वान व्यक्ति को अध्यात्म के राह पर अधिक सचेत रहना पड़ता है । विद्वान विनय को अपना ले तो जीवन के उच्चशिखर पर पहुंच जाता है ।  

प्रश्न जिज्ञासावश एवं मुमुक्षुवश पूछे जाते हैं । मन मस्तिष्क में जो भी प्रश्न आता है वह जिज्ञासा है । जिज्ञासा में संसार से जुड़े प्रश्नों की अधिकता अधिक रहती है । सृष्टि का निर्माण किसने किया ? आदि दूसरों से जुड़े प्रश्न बेकार होते हैं । इन प्रश्नों का जवाब न अब तक कोई दे पाया न दे पाएगा । मोक्ष से जुड़े प्रश्न कर्म बंधन से विमुक्त हेतु कैसे पुरूषार्थ किया जाये । मैं कौन हूँ, में कहो से आया हूं यह मुमुक्षु है जीवन को उन्नत करने की प्यास है । मुमुक्षा ही जीवन का सार है । परमात्मा एवं आत्म चिन्तन मानव हमेशा करते हुए गुहस्थ जीवन में भी सुखी रह सकता है । दुकान में खाते समय सोते समय स्मरण परमात्मा का होना चाहिये । 

ज्ञान जिस साधक के भीतर होता है वह परम सुखी होता है । ज्ञानी के दस लक्षण बताये हैं जिसके द्वारा ज्ञानी महात्मा की पहचान की जा सकती है । ज्ञानी पुरूष क्रोध से रहित संसार से विरक्त पांच इन्द्रियों को जीतने वाला क्षमा, दया, शान्ति, संतोषी, दानी एवं दूसरों के जीवन से भय और चिन्ता को हटाने वाला होता है । प्रभु महावीर ने ज्ञानी व्यक्ति का लक्षण केवल एक शब्द में दिया है । ‘‘एवं खु णणिनो सारं जं नं हिंसई किंचन’’ । ज्ञानी होने का सार है वह किसी को दुःख नहीं पहुंचाता ।  ज्ञानी बनने के लिए मनुष्य को पहले अज्ञान को जानना चाहिये । अज्ञान दूर हो गया तो ज्ञान का प्रकाश स्वतः हो जाता है । ज्ञान मनुष्य और पशु में भेद करता है ।

 

सभी ग्रन्थों का सार है आचरण

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

अम्बाला शहर 15 सितम्बर, 2007: युग पुरूष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- आचार्य भद्रबाहु से पूछा- सभी ग्रन्थों का, तीर्थंकर की वाणी का महान् आत्माओं का क्या उपदेश है । आचार्य भद्रबाहु ने उŸार दिया आचार सार है । प्रभु ने कहा है- ज्ञान जब आचरण में आता है तब मोक्ष निश्चित है । आचार का अर्थ है समभाव । सुख, दुःख, प्रशंसा, निन्दा दोनों विपरीत परिस्थितियों में सम स्थिति है । बुढ़ापे में काम आने वाली क्या चीज है शील, श्रद्धा । वृद्धत्व में जीवन सदाचार है तो वृद्धत्व सुख शांति से व्यतीत हो जाता है । धर्म को जीवन में लाना चाहिए । मन का स्वभाव चंचलता है इसको काबू करना मुश्किल है । मन को साधने का उपाय है श्रद्धा । जिस प्रकार धन, व्यापार में मन लगता है क्योंकि मन को उनमें रूचि होती है, उसी प्रकार धर्म में श्रद्धा का होना मन की चंचलता को कम करता है । 

श्रद्धा हृदय में हो तो हर क्षण मात्र परमात्मा का स्मरण रहता है । दिन में भारतीय काल गणना के अनुसार 8 पहर एवं चैसठ घड़ी होती है जिनमें 4 दिन के पहर एवं रात्रि के 4 पहर होते हैं । श्रद्धा हो तो हर जगह परमात्मा दिखते हैं । जीवन में असली रत्न है- पन्ना अर्थात् प्रज्ञा । प्रज्ञा का जिन्दगी में आवास रहे तो व्यक्ति धोखा नहीं खाएगा और हर मोड़ पर सफल होता है । प्रभु ने कहा- धर्म की परख, शास्त्र की परख भीतरी चक्षु प्रज्ञा से करनी चाहिए । आपके द्वारा किए हुए दान, पुण्य को कोई भी चोर चुरा नहीं सकता । यह चार बातों का हर समय चिन्तन कर जीवन में शील, सदाचार, श्रद्धा, प्रज्ञा और पुण्य की वृद्धि करें । 

आचरण में दिखावा, प्रदर्शन आज के युग में अधिक प्रचलित हो गया है । भारतीय संस्कृति बड़ी ही वैज्ञानिक एवं आत्मसात् करने योग्य है । स्वामी विवेकानन्द ने शिकागो के विश्व सम्मेलन सम्बोधन में सभा सदस्यों को भाई बहिन कहकर भारतीय परम्परा को गौरवान्वित किया था । लक्ष्मण का सीता के प्रति इतना सम्मान आदर था कि केवल चरणों को निहारता है । उसे सीता माता की कुण्डल की पहचान नहीं थी । आज भाई-भाई में धन सम्पत्ति, जमीन, जायदाद के लिए झगड़े होते हैं । कोई केस, हत्या जैसे अनैतिक कार्य पर उतारू हो जाते हैं उन्हें भरत, राम के जीवन पर विचार कर त्याग एवं बड़ों के प्रति प्रेमभाव की सीख को अपने जीवन में अपनाना चाहिये । भारतीय संस्कृति ज्ञान, आत्मा, भाव सर्वोपरि मानता है । अष्टावक्र आठ अंगों से टेढ़ा था । राजसभा में अपने ज्ञान से लघु आयु अष्टावक्र द्वारा अनुभवजन्य ज्ञान अष्टावक्र महागीता के नाम से प्रसिद्ध है । 

आचरण में भौतिकता को कम करें एवं भारतीय संस्कृति का अनमोल रहस्य का मूल्यांकन कर सदाचरण को बढ़ावा देकर जीवन को संस्कारित, मर्यादित करें यह सभी बुद्ध पुरूषों का पावन संदेश है । 

 प्रेस नोट

जैन धर्म में वर्ष में एक बार आने वाले आध्यात्मिक पर्व को सम्वत्सरी कहा जाता है । यह विश्व मैत्री दिवस है । इस दिवस पर विश्व के छोटे से बड़े सभी प्राणियों से वर्ष भर में जाने अनजाने में किसी भी कार्य से किसी भी जीव को कोई कष्ट पहुंचा हो तेा उसके लिए क्षमा-याचना की जाती है तथा आध्यात्मिक तथ्य द्वारा स्वयं को विशेष-रूप से देखने की क्रिया को आलोचना कहते हैं जिसमें इस जन्म और पिछले अनंत जन्मों में जाने अनजाने में हुए पाप कर्मों को स्वीकार किया जाता है फिर जहां-2 अतिक्रमण हुआ है पुनः अपने भीतर लौटने की क्रिया को प्रतिक्रमण कहते हैं । इस पर्व का ऐतिहासिक महत्व है और उसके पश्चात् सबसे क्षमा-याचना करते हैं इस वर्ष अम्बाला में आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज के सान्निध्य में यह पर्व अपूर्व उत्साह के साथ मनाया गया । सैकड़ों लोगों ने निराहार उपवास किए और पौषध अर्थात् एक दिन का साधुपने का पालन कर अपनी आत्मा को पुष्ट किया । अनेक भाई बहिनों ने 12, 11, 8, 7, 6, 5, 4, 3, 2 आदि लम्बे उपवास करके अपनी आत्म शुद्धि की । इस अवसर पर विभिन्न संस्थाओं को दानराशि भी प्रदान की गई । महासाध्वी श्री किरण जी महाराज, श्री शुभम् मुनि जी महाराज के शास्त्रीय प्रवचन हुए । विश्व शांति के लिए आठ दिन का पाठ रखा जिसका भोग 17 सितम्बर, 2007 को प्रातः 6.00 बजे महावीर जैन भवन में होगा । कार्यक्रम का संयोजन संघ के महामंत्री श्री गुलशन जी जैन ने किया । प्रधान श्री प्रेमराज जी जैन एवं कार्यकर्Ÿााओं ने अपनी भावना रखते हुए श्रीसंघ से क्षमा-याचना करते हुए सबके लिए क्षमा-याचना की । अनेक भाई बहिनों ने अपने विचार गद्य एवं पद्य में व्यक्त किए । पर्युषण के आठों दिनों की प्रभावना प्रो0 रमेश जी जैन, अम्बाला शहर की तरफ से रही । 

आचार्यश्रीजी का चतुर्विध संघ के नाम क्षमापना संदेश

महापर्व सम्वत्सरी जो आलोचना, प्रतिक्रमण, क्षमायाचना का विशेष पर्व है ।

जैन धर्म में आज के दिन जहाँ हर श्रावक-श्राविका, साधु-साध्वी आपस में क्षमा-याचना करते हैं वहाँ आज मैं भी पूरे वर्ष भर, इस जन्म में, इस भव में, पूर्व भवों में, चार गति चैरासी लाख जीव-योनियों में भ्रमण करते हुए मेरे मन, वचन, काया से आपके मन, वचन, काया को ज्ञानवश, अज्ञानवश, कारणवश, अकारणवश, किंचित मात्र भी कष्ट हुआ हो तो उसके लिए मैं अन्तःकरण की साक्षी से क्षमा-याचना करता हूँ

मेरे व मेरे साथ विचरण करने वाले समस्त मुनियों के सर्व प्रकार की तमाम भूलों के लिए क्षमा-याचना करते हैं व आशा रखते हैं कि आप भी हमें क्षमा प्रदान करेंगे । 

हम आपके भीतर विराजित शुद्ध-आत्मा की मुक्ति की मंगल प्रार्थना करते हैं । आप, हम सभी अपने घर सिद्धालय लौटें, यही इस महापर्व पर हार्दिक मंगल मनीषा । 

श्रमण संघीय विज्ञप्ति

श्रमण संघ संगठन हेतु श्रमण-संघ की मुख्य-धारा से जो भी महामुनि अलग हुए हैं एवं जो तटस्थ हैं वे सभी मुख्यधारा की पूर्वस्थिति में लौटें । मैं आप सभी को हार्दिक आमंत्रण देता हूँ । आप सभी के सम्मान और गौरव की रक्षा की जाएगी । पूर्व में जो भी हुआ उसे संयोगवश एवं उदय-कर्म समझकर आप हमें क्षमा करें हम आपको क्षमा करते हैं । सम्वत्सरी महापर्व पर संगठन, एकता की भावना एवं मंगलमैत्री के साथ,

श्री एस0 एस0 जैन सभा  आचार्य शिवमुनि

महावीर भवन, महावीर मार्ग

अम्बाला शहर - हरियाणा

दि0ः 15 सितम्बर, 2007

 

दान, तप मं निर्मल भावों का अधिक महŸव है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

अम्बाला शहर 18 सितम्बर, 2007: युग पुरूष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- परमात्मा की भक्ति, प्रार्थना, स्तुति ध्यान के बगैर जीवन पंगु है । मुक्ति और ज्ञान हमारा स्वभाव है । हमारा ज्ञान और चरम लक्ष्य परमात्म है । भौतिकता की चकाचैंध से स्वयं को हटाकर अपने घर सिद्धालय लौटना श्रेयस्कर है । महापर्व पर्युषण के आठ पावन दिनों में चाहे तप, आलोचना, सामायिक, स्वाध्याय किया सभी क्रियाओं का उद्देश्य है कर्म आवरण से मुक्ति है । संसार में जीवन-यापन करने हेतु आज का मानव भाग दौड़ कर रहा है । जीवन का अनमोल हिस्सा धन-दौलत एकत्रित करने की उधेड़बुन लगा देते हैं । देह के भीतर आत्मा परमात्मा छुपा हुआ है परन्तु बाहर की ओर ध्यान केन्द्रित करने की वजह से परमात्मा का अनुभव नहीं   होता । दूध में मक्खन, घी, दही, सब छिपा है परन्तु हमें दूध में दही आदि पदार्थ दृष्टिगोचर नहीं होते । 

माता पिता और गुरू का उपकार जीवन भर तक चुकाया नहीं जा सकता । स्थानांग सूत्र की वाणी है अगर पुत्र धर्म मार्ग में रमण करने हेतु उद्यत होता है तो वह माता पिता का ऋण चुका सकता है । इतनी अपार महिमा धर्म मार्ग पर अग्रसर होने की है । धर्म मार्ग के विशेष रूप से चार लक्षण बताये जाते हैं । धर्म पर्वों में इन्हीं चार लक्षणों की आराधना की जाती है । चार लक्षण है दान, शील, तप और भावना । दान शील एवं तप में शुद्ध निःस्वार्थ भावों का बहुत महत्व है । दान करके साधक को नाम प्रचार का प्रयोजन कदापि नहीं रखना चाहिये क्योंकि दान, मोक्ष मार्ग की साधना है जिस कार्य में मन के दुर्भाव सम्मिलित होते हैं वह धर्म कार्य निरर्थक हो जाते हैं । तप का प्रयोजन कषायों का कम होना है । शील और भावना से साधक अध्यात्म की ओर मुड़ता है । ध्यान साधना धर्म का अर्क है । ध्यान से व्यक्ति को आत्मा के प्रति विश्वास बढ़ता है । बाहरी जीवन में अधिक रमण के कारण ध्यान साधना करना मुश्किल लगता है परन्तु जैसे ही अक्षय आनंद का बोध होता है संसार के पदार्थ तुच्छ और अशाश्वत् लगने लगते हैं । ध्यान का अंग सामायिक एवं भेद-विज्ञान । प्रतिपल प्रतिक्षण समभाव एवं शरीर और आत्मा की भेद-दृष्टि का स्मरण करने से ध्यान में अधिक गहराई आती एवं मनुष्य जन्म का वास्तविक लक्ष्य परमात्म प्राप्ति, आत्म विशुद्धि एवं सर्वज्ञता प्राप्त होती है । 

18 सितम्बर, 2007 के पावन दिवस पर श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज का जन्म दिन को छः दिवसीय कार्यक्रम आयोजित कर मनाया जा रहा है । इसी कार्यक्रम की कड़ी में आज लंगर का आयोजन किया गया । 19 सितम्ब्र को धर्म सभा के अन्तर्गत गुणगान एवं उसके पश्चात् प्रश्नमंच का आयोजन भी हो रहा है । 

 

जहाँ मैत्री है वहाँ प्रेम है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

अम्बाला शहर 19 सितम्बर, 2007: युग पुरूष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- प्रभु महावीर का एक छोटा सा वचन विश्व, परिवार, समाज, व्यक्ति को अमृतमय, आनंदमय बना देता है । सूत्र को सुनना कहना ही नहीं अपितु उसे जीवन में अवतरित करना है । सारे संसार के प्राणी मानव पशु-पक्षी नरक के जीव, देवों में सभी में एक ही आत्मा है । सूरज की एक किरण से पौधे, मानव सब जागृत हो जाते हैं । सूरज करोड़ों मील दूरी पर है परन्तु फिर भी उसके साथ हमारा गहरा संबंध है । सूर्योदय के समय के बाल सूरज को देखकर भीतर की सरलता प्रकट होती है । भारतीय संस्कृति की धारणा भी है कि उगते सूरज को देखते है अस्त के सूरज को दखने की परम्परा नहीं है । सूर्यास्त को निहारने की संस्कृति पाश्चात्य संस्कृति   है । मैत्री की गूंज भी भारत के ऋषियों मुनियों अनमोल गूंज है । सभी विश्व में निवास करने वाले जीवों के प्रति मित्रता का भाव मैत्री है । सभी जीवों के प्रति मैत्री हो तो शत्रुता कदापि रहने वाली नहीं है । जहां मैत्री है वहां प्रेम है जहां शत्रुता होगी वहां वैर होगा । प्रभु महावीर सभी के प्रति मित्रता भाव रखा था । उनको कष्ट देने वाले अध्यात्म राह पर कंटक बिछाने वाले व्यक्ति बहुत थे परन्तु जिस मार्ग पर अग्रसर हो रहे थे उसको कभी भूले नहीं और निर्बाध-गति से बढ़ते गये । बाहुबली ने अहंकार की गांठ खोलते ही चरम लक्ष्य को उपलब्ध किया । 

सबंध तीन प्रकार के होते हैं प्रथम संबंध बुद्धि से जुड़े हैं । जैसे गुरू शिष्य ! शिष्य ज्ञान वृद्धि शास्त्रअध्ययन करने हेतु गुरू से संबंध बनाता है । दूसरा संबंध हृदय से है । बुद्धि से हृदय के संबंध श्रेष्ठ है । माता पुत्र कारिश्ता हृदय से है परन्तु माता का केवल पुत्र के प्रति प्रेम संकुचित होता है । तीसरा संबंध नाभि कमल से जुड़ा है । शरीर आत्मा का संवेदन जुड़ाव नाभि से संबंधित है ऐसी मान्यता है । कभी किसी अनहोनी की घटना का प्रथम संकेत नाभि द्वारा होता है । नाभि से संबंध सर्वश्रेष्ठ है । बुद्धि और हृदय से हम संबंध अनादिकाल से बनाते आ रहे हैं । आत्मा का अनुभव एवं आत्मा का परमात्मा से संबंध बनाने से मोक्ष मार्ग प्रशस्त होता है । आत्मा का परमात्मा का होना शरीर की आसक्ति मन, बुद्धि के दुर्भावों को विलीन करने से ही संभव है । ध्यान शिविरों में मानव की वस्तु व्यक्ति के प्रति गहरे लगाव को कम करने हेतु विभिन्न प्रयोग किये जाते हैं । प्रयोगों का मूल सूत्र है जिसके प्रति आपका लगाव है उसको छोड़ना । अनंत जन्मों के संस्कारवश करना मुश्किल अवश्य है परन्तु अभ्यास से यह विकट कार्य सरल बनाया जा सकता है । 

 

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

अम्बाला शहर 20 सितम्बर, 2007: युग पुरूष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- प्रभु महावीर की करूणा, मैत्री सभी मानव जाति के प्रति है । प्रभु महावीर फरमाते हैं ‘‘एगा मणुस्सा   जाइ’’ । विश्व के समस्त मानव जाति एक समान है । हरा भरा वृक्ष पल्ल्वित एवं पुष्पित  होता है उसका कारण जड़ का सुदृढ़ होना है । धर्म की जड़ है प्राणी मात्र के प्रति अनुकम्पा रखना । प्रभु महावीर, बुद्ध अपने हर कार्य को जागरूकता के साथ व्यतीत करते थे क्योंकि कोई प्राणी दुःखी एवं परेशान न  हो । इंसान में इन्सानियत आनी चाहिये । आज के युग में मानव अपने स्वार्थ पद प्रतिष्ठा धन, दौलत के लिए मानव को धोखा देता है । आज तक धन के प्रति संतुष्टी कोई नहीं पाया है । संत तुलसी एवं संत मलुकदास ने मानव सेवा को बहुमूल्य बताया है ।

मनुष्य स्वयं के स्वास्थ्य को ठीक करने के लिए बढ़िया से बढ़िया डाॅक्टर, दवाई लेता है उसके लिए चाहे लाखों करोड़ों रूपए लग जाये परन्तु उत्तम कार्य है पड़ौसी के दुःख दर्द को अपना समझे । उसके लिए दवाई आदि का प्रबंध करना आवश्यक है । प्रभु महावीर से गौतम ने प्रश्न पूछा कि- प्रभु ! एक व्यक्त् िआपकी पूजा भक्ति नित्य प्रति जप करता है वह धन्य है अथवा जो नाम जप नहीं करता परन्तु दीन दुःखियों की सेवा करता है वह धन्य है । प्रभु ने कहा- जो असहायों की सेवा करता है वह श्रेष्ठ है उसे दीन दुःखियों की सहायता करने वाला इस जीवन में प्रसन्न रहता है और परलोक में भी सुगति प्राप्त होती है । भूखे व्यक्ति को भोजन की कीमत पता चलती है । रोगी व्यक्ति डाॅक्टर को भगवान के समान समझता   है । अक्सर आजकल डाॅक्टर को अधिक प्रमाणित मानते है उनके द्वारा बताये सुझाव को अनमोल सूत्र समझते हैं । डाॅक्टरों को चाहिये कि वह शुद्ध आहार शरीर स्वस्थता हेतु मन की प्रसन्नता के लिए ध्यान करने की प्रेरणा के साथ ही व्यसनों को छुटवाने का अनुरोध करेंगे तो अपनी सेवाओ को देश, समाज के लिए अर्पित कर सकते हैं । अनुसंधानों से भी अब ज्ञात हो चुका है कि मन, आहार एवं व्यसनों को जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ता है जिसका मन स्वस्थ है उसे किसी भी बीमारी का आना मुश्किल है । 

20 सितम्बर, 2007 को महावीर चैरीटेबल अस्पताल द्वारा आई फ्री चेकअप केम्प में अनेक व्यक्तियों ने भाग लिया । डाॅक्टरों एवं सहयोगियों ने अपना समय सेवा मानवता के लिए अर्पित किया । इस अवसर पर चैरीटेबल के डाॅक्टर एवं केम्प में दान, दवाई आदि देने वालों का सम्मान सत्कार किया गया । डाॅक्टरों ने गांवों के लोगों को आंखों के प्रति जागरूक करते हुए केम्प आयोजित करने की भावना रखी । 

 

संघ प्रगति में समय एवं सहयोग का भी योगदान होता है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

अम्बाला शहर 21 सितम्बर, 2007: युग पुरूष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- धर्म तीर्थ अरिहंत परमात्मा का है क्योंकि उनका ध्यान, तप, ज्ञान, कृपा से हमारा संसार आलोकित है । सम्वत्सरी पर्व क्षमा का पर्व है । सभी दिलों को आपस के मनमुटाव को मिटाकर जोड़ने का  है । प्रभु महावीर के कानों में कीले ठोके गये । एक रात के अन्तर्गत बीस-बीस मुश्किलें आती है फिर भी हृदय एवं मन में उनके प्रति कोई दुराव नहीं रखा बल्कि साधना के लिए ऐसा प्रदेश चुना जहां लोग संत एवं धर्म को जानते नहीं थे । इतनी सहनशीलता प्रभु ने जीवन में अपनाई तो उनके उपासक होने के नाते हमें भी उनके गुणों को जीवन में उतारना चाहिये । व्यक्ति परिवार के लिए जीवन लगाने वाले बहुत हैं परन्तु विरले मानव संघ समाज के  प्रति चिन्तन एवं समर्पण करते हैं । संघ प्रगति में संयोग और समय का महत्वपूर्ण योगदान है । साधक को कर्तव्य भाव को छोड़कर विनम्रता के भावों की वृद्धि करनी चाहिए । परिवार, संघ के मुखिया की आज्ञा को अनुपालन करने वाले परिवार की शांति, प्रगति में निरन्तर अभिवृद्धि होती है । 

प्रशंसा और निन्दा से साधक को प्रभावित नहीं होना चाहिए । अक्सर प्रशंसा के शब्दों से व्यक्ति बड़ा प्रसन्न होता है परन्तु साधक को प्रशंसा में भी सचेत रहना चाहिए । जैसे गुब्बारे में हवा भरी होती है उस गुब्बारे को सुई की नोक लगते ही गुब्बारा फूटता है इसलिए प्रशंसा में प्रसन्न होने वाले व्यक्ति निन्दा सहन नहीं कर पाते तो जीवन में दुःखी होते  हैं । कबीरजी ने निन्दा के महत्व को बताते हुए कहा है- निन्दक नियरे राखिए, आंगन कुटी  छवाए । अर्थात् निन्दक को अपने पास रखे क्योंकि वह आपके दुर्गुणों को दूर करने में सहायक है व्यक्ति प्रमाद में मूच्र्छित स्थिति में अपने दुर्गुण नहीं जान पाता निन्दक के निन्दा करने से व्यक्ति को बुराईयों का ज्ञान होता है, जिसको जानकर साधक अपने बुराईयों को मिटाने का प्रयास कर सकता है । जब कोई कहे कि तुम सुन्दर हो तो एक बार अपने भीतर सोचना कि यह सुन्दरता शरीर की है । आज सुन्दर है कल बीमारी ने घेर   लिया या उम्र बढ़ने पर रूप कुरूपता में बदल   जाएगा । असली सुन्दरता तो भीतर की है । भीतर के क्रोध आदि कषाय, कुरूपता है उसे मुझे दूर करना है । अनंत जन्मों से भव-भ्रमण चल रहा  है । अनंत योनियों में जाकर आये परन्तु परमात्मा की अनुभूति नहीं हुई इसका मूल कारण तो भीतर के कषाय ही है । 

 

आज आचार्यश्रीजी के जन्म जयंती के उपलक्ष्य में पी0के0आर0 सीनीयर सेकेण्डरी स्कूल, पी0के0आर0 माॅडल स्कूल, पी0के0आर0 वाटिका के बच्चों ने सुन्दर नाटिका प्रस्तुत   की ।     

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

अम्बाला शहर 22 सितम्बर, 2007: युग पुरूष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- यह संसार शरीर मन बुद्धि संस्कार हम नहीं है । यह संसार अनादिकाल से चला आ रहा है अनंत व्यक्ति सिद्ध बुद्ध और मुक्त हुए है हो रहे हैं और होने वाले हैं । मनुष्य जन्म अनमोल हीरा है । सभी जीवों में ज्योति प्रकाशमान है उसको प्रकट करना है उसके लिए संतुलन आवश्यक है । योग का अर्थ दो बातों से प्रकट होता है । बाह्य बातों में संतुलन और भीतर में समभाव यह योग का सर्वांग अर्थ है । प्रभु महावीर को निग्रन्थ के नाम से पुरातन समय में पुकारा जाता था । निग्रंन्थ अर्थ गांठ मनमुटाव हृदय की संकुचितता आदि के रूप में श्रवण करने को प्राप्त होता  है । मानव छोटी-छोटी बातों में गांठ बांध लेता है । मनुष्य चिन्तनशील प्राणी है उसे क्षुद्र बातों को छोड़कर हृदय में उदारता धारण करनी चाहिए । प्रभु महावीर की निग्रन्थता ही जैन साधु एवं गृहस्थ का परम लक्ष्य है । साधु अपना कर्तव्य समझे एवं श्रावक अथवा गृहस्थ अपने कर्तव्य का पालन करें । किसी भी तरह से आपस में भागीदारी और सलाह देने का प्रयास नहीं करना चाहिए । व्यवहार में सलाह की अधिकता से विघटन की संभावना बनी रहती है । सलाह देनी हो तो उसमें किसी प्रकार का स्वार्थ महत्वाकांक्षा नहीं होनी चाहिये । हर श्रावक श्राविका को प्रभु महावीर के अनमोल संदेशों एवं साधना को जीवन में अपनाकर जीवन सफल बनाना चाहिए । 

जब आप अरिहंत कहते हैं तो आपके दुःख मिटते हैं या नहीं । प्रभु का स्मरण दिन रात भीतर चलता रहे । अरिहंत प्रभु की भक्ति से जीवन की शुरूआत करो । कुछ समझना है तो भक्ति करो । बच्चा भक्ति के द्वारा सब कुछ प्राप्त कर लेता है । उसे बोलना भी नहीं आता फिर भी वह जो चाहे अपनी मां से करवा लेता है । बच्चे को केवल रोना आता है और रोने से ही वह अपने सारे भाव प्रकट कर देता है । भीतर दुःख भी आए तो उसे सुख रूप में स्वीकार कर लेना । हर परिस्थिति में आनंद में रहना । चंदना ने बेड़ियों में भी सुख माना था । जैसा अनुराग हमारा धन, पद, प्रतिष्ठा के लिए है वैसा अनुराग भगवान की भक्ति के लिए हो । भक्ति भी एक नर्तक की भांति हो जो नृत्य करते समय स्वयं को अलग नहीं करता उसके पांव स्वयं ही थिरकने लगते हैं । उसे पता ही नहीं चलता की नृत्य हो रहा है । इसी तरह हम भक्ति करें । अपने शरीर का हर रोम । रक्त की हर बूंद प्रभु के चरणों में समर्पित कर दें । जिस प्रकार खीर का स्वाद दिनों दिन बना रहता है उसी प्रकार अरिहंत प्रभु की भक्ति की मस्ती दिनों दिन बनी रहे । प्रभु को अत्यन्त भक्ति से नमन करें । पांच अंगों से नमन करें, दो हाथ, दो पांव एवं मस्तक झुकाकर नमन करें । प्रभु जिन्होंनें बाल्य अवस्था में ही अनंतज्ञान को प्राप्त कर लिया । जो तीनों लोकों को अपने ज्ञान से विस्मय कर रहे हैं । अरिहंत शब्द जब मुख से निकले तब उनके गुणों का स्मरण हो । उनको परम भक्ति से नमन हो । जब उनको नमन हो तब भीतर आने वाला हर भाव उनके चरणों में स्मरण हो तब रोना आए तो रो लेना, हंसना आए तो हंस लेना मन की हर बात उनको बता देना । कैसे स्वयं को जानना है यह साधना शिविरों में हम सिखाते हैं । आप साधना शिविर में भाग लेकर अपने जीवन को प्रभु भक्ति से   जोड़ें । जीवन जीने की कला को सीखे । पं्रतिपल प्रतिक्षण आनंद में रहें । 

ध्यान साधना एवं योग का केवल स्वाद मात्र से जीवन और हृदय परिवर्तन होता है । निरन्तर अभ्यास से अपूर्व परिवर्तन आत्म विशुद्धि होती है जो मनुष्य जीवन की सार्थकता है साधु साध्वी श्रावक श्राविका ध्यान संबंधित श्राविका रूप चारों तीर्थ एक संयोग है । परस्पर सहयोग से जीव सहजता को प्राप्त होता है । मन में विनम्रता, वचन में सम्यकता, समाज हितैषी दृष्टिकोण संघ परिवार को उन्नति प्रदान करता है । सभी में प्रेम, सहयोग की वृद्धि हो यही सभी ज्ञानी महात्माओं का उपदेश है । 

 

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

अम्बाला शहर 23 सितम्बर, 2007: राष्ट्र संत, युग पुरूष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज की 66 वीं जन्म-जयन्ती का कार्यक्रम भव्य समारोह पूर्वक पी0के0आर0 जैन स्कूल, अम्बाला शहर में मनाया गया । इस अवसर पर भारतवर्ष के विभिन्न अचंलों से 

आये श्रद्धालुओं ने आचार्यश्रीजी को हार्दिक शुभ-कामनाएं प्रस्तुत की । विशेष रूप से उदयपुर, इंदौर, दिल्ली, मालेर कोटला आदि प्रान्तों के जैन समाज ने आगामी चातुर्मास हेतु पुरजोर और उल्लासपूर्वक विनती रखी । समारोह के स्वागताध्यक्ष श्री अरूण कुमार जी जैन, अम्बाला शहर कार्यक्रम के अध्यक्ष श्री नेमनाथ जी ज्ैान, मुख्य अतिथि श्री रामेश्वर प्रसाद जी अग्रवाल, सरदार सुरजीतसिंह रखड़ा एवं शांतिदूत संत श्री करनेलसिंह जी गरीब, सम्माननीय अतिथि जगदाचार्य श्री चन्द्रास्वामी जी ध्वजारेाहणकर्ता श्री श्याम सुन्दर जिन्दल, श्रावक समिति के चेयरमैन श्री सुमतिलाल जी कर्नावट एवं अनेक प्रान्तों के कार्यकर्ताओं, जैन काॅफ्रेंस के अध्यक्ष श्री कांतिलाल जी जैन, महामंत्री श्री पारस जी छाजेड़, पूर्व अध्यक्ष श्री नेमीचंद जी चैपड़ा आदि गणमान्य महानुभावों का प्रतीक एवं माला पहनाकर स्वागत किया गया । 

श्रमण संघीय मंत्री श्री शिरीष मुनि जी महाराज, महासाध्वी श्री किरण जी महाराज, शांतिदूत श्री करनेलसिंह जी ‘‘गरीब’’, जगदाचार्य श्री चन्द्रास्वामी जी, श्री सुमतिलाल जी कर्नावट, श्री नेमीचंद जी चैपड़ा, श्री कांतिलाल जी जैन, श्री हस्तीमल जी मुणोत, श्री अमितराय जैन आदि ने आचार्यश्रीजी के दीर्घायुकी भावना प्रकट की । महिला मण्डल एवं पी0के0आर0 जैन सीनियर सेकेण्डरी स्कूल की ओर से प्रेरणा और आचार्यश्रीजी के जीवन पर आधारित प्रमुख प्रसंगों को श्रद्धालुओं के समक्ष रोचक ढंग से प्रस्तुत किए गए ।  

अंत में आचार्यश्रीजी ने अपने मंगलमय उद्बोधन मंें फरमाया कि- संगठन आज के युग की मूल शक्ति है । एकता की भावना का उद्घोष हमारी अंतर्हृदय की सद्भावना है । सम्मेलन में हृदय के पवित्र भावना एवं भविष्य की संघ प्रगति की रूपरेखा आवश्यक है । क्षमा प्रभु महावीर की अमूल्य देन है । किसी के प्रति मनमुटाव हो उसको हृदय की निर्मलता से क्षमा याचना मांगना करना प्रभु महावीर का अनमोल सूत्र है । सभी धर्मों के तलस्पर्शी अध्ययन के बाद यह अर्क निकलता है कि मूलरूप से सभी धर्मों का भाव एक समान है । शब्दों में विभिन्नता हो सकती है । सिक्ख समाज के प्रति धर्म समन्वय का ऐतिहासिक उदाहरण टोडरमल जैन ने अपनी धन-दौलत को गुरू गोबिन्दसिंह जी के बेटों के संस्कार हेतु जमीन खरीदकर अर्पित की थी । सभी धर्म भावों एवं संगठन शक्ति को महत्व प्रदान करें । श्रावक संघ संत समाज अपने कर्तव्य के प्रति सचेत हो । ध्यान साधना को जीवन का अंग बनाये । संगठन के लिए व्यर्थ की चर्चाओं में हस्तक्षेप न करते हुए सकारात्मक भावना की अभिवृद्धि करें । 

इस अवसर पर साध्वी सुधा मण्डल की ओर से आपश्रीजी को ‘‘हरियाणा केसरी’’ की उपाधि का सम्मान दिया गया । श्री सुरजीतसिंह जी रखड़ा को जैन सभा की ओर से ‘उद्योग शिरोमणि’ का अवार्ड देकर सम्मानित किया गया । एस0एस0 जैन सभा के प्रधान श्री प्रेमराज जी जैन एवं उनकी कार्यकारिणी के सदस्यों की सेवाएं सुन्दर रही । महामंत्री श्री गुलशन जी जैन ने सभा का सुन्दर संचालन किया । 

 

समभाव महापुरूषों की वाणी एवं जीवन का सार है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

अम्बाला शहर 24 सितम्बर, 2007: युग पुरूष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- प्रभु महावीर की मैत्री, क्षमा, करूणा जीवन का मूल्यवान सूत्र है । वीतरागता का भाव धारण करने से क्षमा, मैत्री स्वतः आ जाती है । महात्मा गांधी की अहिंसा को लोग जल्दी समझ नहीं पाये । उनकी निन्दा और प्रशंसा भी होती रही परन्तु जीत महात्मा गांधी की हुई । दीये का प्रकाश अंधकार को मिटा देता है परन्तु सूरज की रोशनी के समक्ष क्षुद्र है । तीनों लोकों को केवलज्ञानी अरिहंत प्रकाशमान करते हैं । 

वीतरागता का जीवन में समावेश होना मुश्किल है । वीतरागता का अभिप्राय है सुख दुःख प्रशंसा निन्दा दोनों अनुकूल एवं प्रतिकूल परिस्थिति में सम रहना । संघ, परिवार के प्रति आप अपनी ओर से अथक प्रयास करते हैं । कार्य करते हुए विनम्रता का भाव रखें तो वीतराग का भाव अधिक पुष्ट होता हैं । वीतरागता आये इसके लिए वीतराग पुरूष की गुणस्थिति परमावश्यक है । ध्यान शिविरों में योग, प्राणायाम शुद्ध आहार वीतरागता के सहयोगी है । ध्यान साधना से हृदय निर्मल होता है । परिवार को चलाते हुए धर्म का सम्बल, ज्ञान और आचरण को जिन्दगी में प्रमुख स्थान दो । बीज डालते हुए मानव विशाल वृक्ष की कल्पना नहीं करता । बच्चे बीज स्वरूप है उन्हें पवित्र वातावरण एवं धर्म शिक्षा दो जिससे जीवन में हर मोड़ पर वह  प्रसन्नचित रह सके । वीतरागता धर्म की चर्चा धर्म श्रवण करने से नहीं बल्कि धर्माचरण करने से फलित होती है । 

शरीर, पद, प्रतिष्ठा इस जीवन में प्राप्त है । बुद्धिमान मानव चिन्तन मनन करके समझ लेता है कि जीवन की सुख साधन शाश्वत् नहीं है इसलिए मानव जीवन की दुर्लभता को जानते हुए समय का सदुपयोग धर्ममय जीवन आत्मानूभूति की ओर रूचि के हेतु ध्यान करना ही श्रेयस्कर है । धन-दौलत सम्मान के शिखर पर पहुंचकर भी मानव को संतुष्टी प्राप्त नहीं होती है क्योंकि इच्छाएं बढ़ती जाती है । वीतरागकता और ध्यान की ऊँचाई पर पहुंचकर अक्षय आनंद का अक्षय-कोष प्राप्त किया जाता रहा है । 

विनम्रता से हमें जीवन की राह मिलती है । अरिहंत परमात्मा एवं सिद्ध प्रभु महावीर के प्रति विनम्रता एवं उनके ज्ञान को अपने अन्तर की आंखों से देखो । जब किसी व्यक्ति को हम आत्मीयता से निहारते हैं तो हमारे भीतर आत्मीयता भर जाती है । संसार में दो दृष्टियां विद्यमान है- एक है कर्मदृष्टि और दूसरी हीै आत्म-दृष्टि । जहां क्रोध, वासना, अहंकार, मोह की अधिकता है वह कर्म-दृष्टि है । जहाँ पर सब कुछ हम परमात्म के या गुरू के चरणों में छोड़ देते हैं और भीतर से कहते हैं प्रभु ! मैंने कुछ भी नहीं किया । प्रभु सब आपकी कृपा है ये है आत्म-दृष्टि । जैसे गंगा का जल गंदी नाली में गया तो गंदा हो गया और गंदी नाली का जल गंगा में गया तो पवित्र हो गया । ऐसे ही हमारी दृष्टि का महत्व है । कर्मों का मूल कारण है कर्म दृष्टि । इसलिए आत्म-दृष्टि अपनाइए और मुक्ति पाइए । 

 

जैसा कर्म करोगे वैसा फल प्राप्त होगा

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

अम्बाला शहर 26 सितम्बर, 2007: युग पुरूष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में विश्व में एक ही सार, सत्य है । सत्य सबको अप्रकट रूप से प्राप्त है । लाखों, करोड़ों वर्षों बाद कोई एक व्यक्ति आत्म सत्य को प्रकट रूप में अनुभव कर पाता है । सत्य की उपलब्धि को अनुभव करने वाले व्यक्ति को हम तीर्थंकर पैगम्बर ईश्वर आदि नाम से पुकारते हैं । जीवन में चिन्तन, मनन करना सुख दुःख देने वाला कौन है ? सभी धर्म, सम्प्रदाय मानते हैं कि सुख दुःख देने वाला व्यक्ति का स्वयं का कर्म है । जैसा बीज बोओगे फल भी वैसा ही प्राप्त होगा । मानव बबुल के बीज बोकर आम का स्वाद लेना चाहता है । जो व्यक्ति समझता है कि दुःख सुख देने वाला कोई और है तो वह अज्ञानी जीव है । मैं अच्छा करने वाला हूँ आदि मिथ्या विचार मानव का वृथा अभिमान है । आत्मा का वैभव, आनंद जितना भीतर है उतना बाहर नहीं है । दो मार्ग है एक भीतर का दूसरा है बाहर का ।

कुछ लोग जीवन का अमूल्य समय सोने में धन कमाने में लगा देता है । संत कबीर कहते हैं- सोने में समय मत गंवाओ । जागकर प्रभु का नाम सिमरण करो । एक दिन ऐसी गहरी नींद में सोओगे अर्थात् मृत्यु को प्राप्त हो जाओगे । शुभ कर्म करते हैं तो इस लोक में व्यक्ति सुखी रहता है परलोक में भी सुख को प्राप्त करता है । कर्म किसी व्यक्ति को छोड़ने वाला नहीं है । तीर्थंकर महापुरूषों को जीतने कष्ट आये उतने कष्ट तो हमें नहीं आये हैं । बछड़ा उन सबमें अपनी माँ को ढूढ़ लेता है उसी प्रकार कर्म व्यक्ति को खोज लेता है । आठ कर्मों से यह आत्मा अनादीकाल से लिप्त है । जीवन छोटा है और कर्मों का पहाड़ ऊँचा है इसलिए जीवन को मर्यादित, संयमित, करूणामय बनाओ । हर व्यक्ति की आत्मा में परमात्मा बनने की शक्ति विद्यमान है । प्राणीमात्र के प्रति मैत्री का भाव रखो । किसी व्यक्ति को परेशान और दुःखी देखो तो यथाशक्ति सहयोग अवश्य करो । सहयोग न कर सको तो मन में उसके प्रति पवित्र भाव रखो । 

विश्व के सभी धर्मों में एक ही सत्य धर्म एवं आचार है । सत्य एक है उसे भिन्न-भिन्न दृष्टियों से बताया जाता है । सत्य पर अटल श्रद्धा नहीं आ पाती है क्योंकि हम मोह में फंसे हुए हैं । सत्य क्या है ? यह प्रश्न प्रभु से पूछा गया है ? प्रभु ने उत्तर दिया- जो सम्प्रदाय, ग्रन्थ है वह सत्य नहीं है । यह सभी सत्य को प्राप्त करने के मार्ग हो सकते हैं । जैसे आपने किसी प्रमुख शहर में जाना हो तो रास्ते मील पत्थरों पर भी वह लिखा होता है । प्रमुख शहर में पहुँचने के मार्ग एवं साधन भी अनेक है परन्तु हम उन्हें पकड़कर नहीं बैठते हैं । ध्यान का अनुभव करने वाले परम सत्य को प्राप्त कर लेते हैं । स्वामीराम ने बहुत सुन्दर बात कही है कि दो पक्षी है एक उछलकूद करता है । एक फूल से दूसरे फूल पर भ्रमण करता रहता है दूसरा एक फूल पर बैठकर रसपान कर लेता आनंद उसी को प्राप्त होता है । इसी भांति आत्मा में रमण करो शरीर के भीतर आत्मा कर्म बंधन में है कर्म से मुक्त होने का सहज मार्ग यही महापुरूषों, अनुभवियों ने बताया है । ध्यान और ज्ञान में गहरे डूबने वाले को शरीर के प्रति आसक्ति अपने आप नष्ट हो जाती है । देह को मन्दिर बनाने के लिए आत्म-रूचि आनी जरूरी है। भगवान को मन्दिर, मस्जिद में खोजने की जरूरत नहीं है । बाहर खोजोगे तो परमात्म प्राप्त होने वाला नहीं है । मन्दिर आदि धर्म साधन एवं धर्म स्मृति का माध्यम है ।

 

अध्यात्म सदा अमर रहता है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

अम्बाला शहर 27 सितम्बर, 2007: युग पुरूष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- इस संसार में हम अनादिकाल से भ्रमण कर रहे हैं । ऐसी कोई गति नहीं जिसमें हमने भ्रमण नहीं किया हो । मोक्ष-गति में मानव जा न पाया । मोक्ष का मार्ग आत्म-ज्ञान से खुलता है । जिनशासन में आत्म-ज्ञान को सम्यक् ज्ञान कहा है । ज्ञान से अभिप्राय नव-तŸवों का बोध है । नव-तŸवों प्रथम है जीव एवं अन्तिम है मोक्ष । जीव ने अजीव की संगति की उससे वह संसार में भ्रमण करता है । संसार में दो ही तत्व है जीव अर्थात् आत्मा और अजीव अर्थात् शरीर । धर्म की खोज आत्मा की खोज है । विज्ञान की खोज शरीर से संबंधित है । धर्म विवेकपूर्वक होता है तो चरम लक्ष्य तक पहुँचा देता है । 

हमारी असली सम्पत्ति शुद्ध सामायिक है । हर एक श्वांस समता में बीते, ध्यान में मन लग जाए । ध्यान से हम भेद से अभेद की ओर जाते हैं । पूजा पाठ, माला करोगे पुण्य मिलेगा स्वर्ग की प्राप्ति हो जाएगी परन्तु ध्यान करोगे तो निर्जरा होगी और मुक्ति प्राप्त हो जाएगी । ध्यान करते हो तो भीतर का कूड़ा करकट विचारों के माध्यम से बाहर निकलता है उसे निकलने दो । झाड़ू लगाते हो तो बाहर की गंदगी नासापुटों से भीतर प्रवेश करती है कुछ लोग कहते हैं समाधि अच्छी या भेद-विज्ञान अच्छा । भगवान ने फरमाया- भेद-विज्ञान सर्वश्रेष्ठ   है । भेद-विज्ञान हीरा है और समाधि सोना है । भीतर मन लग गया तो ध्यान की गहराई में चले   जाना । प्रतिपल प्रतिक्षण भेद-विज्ञान करते रहना । भगवान महावीर ने भिन्न-2 प्रयोग किए । कायोत्सर्ग किए और भेद-विज्ञान की साधना भीतर से निकली । भेद-विज्ञान आत्मा और शरीर की भिन्नता है । पाठ के लिए ध्यान को मत छोड़ना । स्वाध्याय करो तो उसे ध्यान से गुजारों । 

धर्म के नाम पर अंधश्रद्धा का बोलबाला आज के युग में है । प्रभु महावीर ने तत्कालीन समाज और राष्ट्र में चल रहे कर्मकाण्ड का विरोध किया । प्रभु महावीर की साधना बहुत गहरी है । पद, प्रतिष्ठा को खोना ही साधना की शुरूआत है । धर्म शास्त्र, सद्गुरू एवं ज्ञान वह है जो आपको संसार परिभ्रमण से छुटकारा दिला सके । जीव अजीव दो तŸव सार है । जीव-अजीव दोनों अलग है । मानव शरीर में आत्म तŸव विद्यमान है । शरीर और आत्मा का भेद-विज्ञान करो । भेद-विज्ञान करने के लिए तप से आत्म विशुद्धि करनी होती है । भेद-विज्ञान की साधना करने के मार्ग को प्रभु महावीर ने भाव सामायिक कहा है । दस प्रमुख श्रावकों को जीव अजीव का बोध था इसलिए उनको देव उपसर्ग आने पर भी वह विचलित नहीं हुए । इतिहास बनते है और बिगड़ जाते हैं परन्तु अध्यात्म हमेशा ही अमर रहा है और रहेगा । चंगेज खां, सिकन्दर, का लक्ष्य इतिहास की रचना थी और प्रभु महावीर आदि पूजनीय महापुरूषों का उद्देश्य आत्म अनुभूति था । दोनों में विजय अध्यात्म की हुई । 

 

धर्ममय जीवन आनंद प्रदान करता है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

अम्बाला शहर 28 सितम्बर, 2007: युग पुरूष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- प्रार्थना ध्यान करते समय अकसर लोग शिकायत करते हैं । संसार की वस्तुएं मांगते हैं । परमात्मा के पास परमात्मा बनने की कला मांगो । परमात्मा बनने की कला सब जीवों के पास है परन्तु अप्रकट रूप से विद्यमान है । परमात्मा का अनुभव प्राप्त करने के लिए विनम्रता के भावों में आ   जाओ । भक्ति के सच्चे उदाहरण है मीरा का कृष्ण के प्रति प्रेम । मीरा की रेदास के प्रति सच्ची भक्ति । रैदास का जीवन बाह्य रूप से साधारणा था परन्तु भीतर की भक्ति असाधारण थी । जूते गांठने का व्यापार था । व्यापार में प्रामाणिकता थी । कभी किसी व्यक्ति से धोखा करना रैदास की कल्पना में भी नहीं था । मीरा ने रैदास को अपना गुरू बनाया क्योंकि आत्मा बहुत ही शुद्ध एवं पवित्र थी । अध्यात्म के उच्च शिखर पर पहुँचे थे । परमात्मा से हृदय का सीधा सम्पर्क था । 

बन्दगी करने के लिए बाह्य आडम्बरों की बाह्य वस्त्रों की आवश्यकता नहीं है । मानव जब तक अज्ञान के आवरण में है तब तक उससे गलतियां होनी स्वाभाविक है । कर्मों से सर्वथा मुक्त अवस्था में पहुँचन तक व्यक्ति अज्ञानी है । प्रतिदिन का शाम को लेखा जोखा करो । जहां पर गलतियां दृष्टिगोचर हो उसका आकलन करो । गलतियों को स्वीकार करो और पुनः न करने का संकल्प धारण करो । बुराई को स्वीकार करने मात्र से हृदय का बोझ हल्का हो जाता है । आत्मा निरन्तर विशुद्धि को प्राप्त होती है और जीवन का अद्भुत परिवर्तन अवश्य होता है । 

मानव अनंतकाल से संसार में परिभ्रमण करता आ रहा है । कुछ मनुष्य जन्म लेते ही मृत्यु को प्राप्त होते हैं । संसार में सुख दुःख हर व्यक्ति के जीवन में आता है । सुख दुःख देने वाला कोई ऊपर परमात्मा बैठा है ऐसा कदापि नहीं है बल्कि मानव जैसे कर्म पूर्वजन्म में करता हैं उसी का फल आगामी जीवन में प्राप्त होता है चाहे वह प्राणी मानव हो अथवा पशु हो सभी को पूर्वोपार्जित कर्मों का भुगतान करना ही पड़ता है । 

पद, धन, प्रतिष्ठा एवं आयु इस दुनिया में शाश्वत् नहीं है । प्रभु महावीर कहते हैं कि इस दुःखी संसार से पार होने के लिए मानव को एक मात्र धर्म की शरण ही है । आयु का भरोसा नहीं है कब मृत्यु का बुलावा आ जाये । संसार में मृत्यु को प्राप्त होने वाले अनेक मानवों की आश्चर्यजनक घटनाएं हमें देखने को मिलती है । धन दौलत होते हुए भी मृत्यु आती है । पृथ्वी पर जन्म नहीं लिया इससे पूर्व ही चल बसा इसका प्रमाण वैज्ञानिक साधनों द्वारा ज्ञात हो रहा है इसलिए धर्म को बुढ़ापे के लिए मत संभाल कर रखो । जब आपका मन करे प्रार्थना भक्ति, तप एवं दान उसी समय धर्म प्रवृŸिा में प्रवृŸा हो जाना, महापुरूषों की यही वाणी है । शुभ कार्य तुरन्त कर लेना और अशुभ कार्य कल के लिए टाल देना । धर्म में रमण करने वाला व्यक्ति इस भव में आनंद को प्राप्त होता है और साथ ही अपने अगले भवों को सद्गति की ओर अग्रसर कर देता है । 

 

वीतराग मार्ग को प्राप्त करने के लिए उत्कंठा चाहिए

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

अम्बाला शहर 29 सितम्बर, 2007: युग पुरूष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- प्रभु महावीर का ज्ञान आचरण हमारे जीवन का अंग संग बन जाये । प्यास जितनी तीव्र होती है पानी की कीमत भी उसी प्यासे व्यक्ति को पता चलती है । थका मांदा व्यक्ति स्थान खोज लेता है चाहे जैसा स्थान हो । भूखे, प्यासे राहगीर की चाह जैसी तीव्र है उसी प्रकार धर्म की राह पर चलने वाले व्यक्ति की चाह की परमावश्यक है । जीवन का लक्ष्य है हमें तृप्ति मिले । धन, पद के परमोत्कर्ष पर पहुंचने पर भी वह तृप्त नहीं है । सभी मनुष्य आनंद, शांती प्राप्त करने की चाह रहती है । सुख बाह्य सुख साधनों में प्राप्त नहीं होने वाला है । अनंत जन्मों से सुख साधन प्राप्त हुए हैं एवं जब तक जीवन है तब तक प्राप्त होते रहेंगे । सुख शांति का एकमात्र मार्ग धर्म है । धर्म मार्ग पर निरन्तर चलने वाला व्यक्ति अपने सभी कर्ज चुका देता है यह शास्त्र का अनमोल वचन है । धर्म का अर्थ है स्वयं सुखी रहना ही नहीं अपितु अपने समान सभी जीवों का यथाशक्ति तन, मन, धन से सहयोग करना । धर्म आपके जीवन का अंग बन जाये वही वास्तव में धर्म है । वही वास्तविक धर्म की विधि है । 

वीतराग-वाणी का श्रवण आचरण करने वाला व्यक्ति सौभाग्यशाली है । वीतराग धर्म में रमण करने वाले व्यक्ति के जीवन में आन्तरिक दुर्भावना क्रोध आदि कषाय दूर हो जाते हैं । अक्सर मानव जीवन का लक्ष्य घर परिवार को सही ढंग से चलाना ही समझते हैं । समय  धन कमाने में अधिकतर लगाते है । धर्म, ध्यान करने के लिए समय निकालना मुश्किल लगता है । मोह और राग के वशीभूत अज्ञानी मानव धर्म मार्ग में बहुत मुश्किल से प्रवृŸा होते हैं । पुण्य के प्रबल संयोग से मानव धर्म श्रवण धर्म आचरण धर्म रूचि अपने जीवन में प्रकट कर पाता है । निष्काम-भाव से सेवा, दान, तप करो वही कार्य सार्थक है । भक्ति ऐसी करो कि शरीर, मन, वाणी तीनों योग समर्पित हो जाये । जिनशासन में ज्ञान वह है जिससे तत्व का बोध होता है । नव-तŸव का अनुभव होता हो शरीर और आत्मा दोनों का भेद तŸव-बोध से होता है । तप एवं चित्त का निरोध ज्ञान के माध्यम से होता है । 

मनुष्य अज्ञान के कारण क्षणिक सुख के लिए अनंत दुःख को प्राप्त होता है। धन में सच्चा सुख नहीं है । धर्म में ही सच्चा सुख है । समाधि में रहकर संकल्प करो, मुझे मोक्ष जाना है । मृत्यु से बचने का एक ही उपाय है भक्ति और ध्यान । मौत के डर से व्यक्ति धर्म, पुण्य करता है । मृत्यु न होती तो इन्सान प्रेम, करूणा, दान, पुण्य कुछ भी न करता इसलिए मृत्यु अमंगल नहीं मंगल है । मृत्यु अपवित्र नहीं पवित्र है । मृत्यु जीवन का अन्तिम निचोड़ है सार है तत्व है अर्थ है । किसी से न वैर करो न प्यार करो, सिर्फ परमात्मा से प्यार  करो । राग का त्याग करो प्रेम का मार्ग अपनालो तभी जीवन सफल होगा ।

 

जीवन का लक्ष्य मानव से महामानव बनना है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

अम्बाला शहर 30 सितम्बर, 2007: राष्ट्र संत, युग पुरूष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- इस संसार में एक ही सार है सहारा है संत साईंबाबा की दो बातें हैं जब आप केवल आत्म परमात्मा को मानते हैं एक है श्रद्धा और दूसरा है धैर्य । संसार एक भूलभूलैया है । जो सार है उसे हम ग्रहण नहीं कर पाते हैं और निस्सार है उसे अधिक से अधिक ग्रहण कर लेते हैं । विश्व में सार तŸव है परमात्म तत्व है । 

परमात्मा को मालिक कहा है । मालिक को प्राप्त करना उस हेतु पुरूषार्थ करना मानव जन्म की सार्थकता है । संसार में सभी लोग जन्म लेते हैं, युवावस्था को प्राप्त होते हैं बीमार होते हैं, वृद्धावस्था को प्राप्त होते, संबंध प्रगाढ़ होते हैं और मृत्यु को प्राप्त होते हैं । यह प्रवाह निरन्तर चल रहा है जन्म और मरण रूपी प्रवाह को रोकने का एक मात्र उपाय धर्म-रूपी द्वीप है । धर्म मार्ग पर इरंगे दुरंगे लोग ही निरन्तर चल पाते हैं । प्रभु की भक्ति करते हुए पाँचों इन्द्रियों और मन को समेट लो । कछुआ जैसे अपनी सभी इन्द्रियों का गोपन कर लेता है। पुरातन समय में मन्दिर के बाहर आसपास भीतर कुछ प्रतीक दृष्टिगोचर होते हैं । भीतर जाने हेतु दरवाजे छोटे होते थे वह प्रतीक है कि आप परमात्मा की अनुभूति के प्रवेश से पूर्व विनम्र हो जाओ ।

फूल बाहर के नहीं अपितु हृदय के पुष्प चढ़ाओ । अक्सर मानव क्रियाएं करता रहता है परन्तु उसके भाव समझ नहीं पाता है । भाव निरन्तर क्रियाओं से विलीन हो जाते हैं परमात्मा से हृदय जुड़ जाये तो धीरे-धीरे व्यक्ति उसी भांति ज्ञानी, गुणी हो जाता है । बच्चों को प्रारंभ में ए0बी0सी0 आदि बेसिक जानकारी प्रदान की जाती है । जैसे-जैसे कक्षाएं आगे बढ़ती है पिछली कक्षाओं का ज्ञान छूटता जाता है और नूतन ज्ञान का आविष्कार होता है । धर्म की प्रारंभ की कक्षाएं हैं मन्दिर, माला, द्रव्य सामायिक, क्रियाएं परन्तु चरम कक्षा परमात्म अनुभव वीतराग-भाव है । मानव का वास्तविक उद्देश्य महामानव बनना ही है । मन, वचन, काया को सम्पूर्णतः परमात्मा के प्रति लगाओ । 

जीवन में दो मार्ग हैं - संघर्ष और समर्पण । संघर्ष के आस्तित्व में व्यक्ति जो भी करें अपनी इच्छा से करना चाहता है जबकि समर्पण में जो कुछ अमीरी, गरीबी, सुख, दुःख है सब कुछ प्रभु के चरणों में समर्पित करता है, पर संघर्षशील व्यक्ति जीवन में जो अर्थपूर्ण है जो जीवन को शुद्ध और पवित्र करता है जीवन को ऊॅंचा उठाता है, उसे भूल जाते हैं । जिसका चित्त अरिहंत की भक्ति में लग जाता है उसका जीवन सफल हो जाता है । उसका जीवन बदल जाता है । दुनियाॅं किसी को भी छोड़ती नहीं है । दुनियाॅं महापुरूष पर भी अत्याचार करती आई है । इतिहास इस बात का साक्षी है सुकरात को जहर दिया और मंसूर के हाथ काट डाले । महावीर के कानों में कीले  ठोके । इसलिए दुनियाँ की परवाह मत करो । स्वयं सत्य के मार्ग पर चलो । दुनियाॅं को छोड़ अरिहंत की शरण में आओ ।    

 

आत्मा का आत्मा के प्रति प्रेम सर्वोत्कृष्ट होता है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

अम्बाला शहर 1 अक्टूबर, 2007: राष्ट्र संत, युग पुरूष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- प्रेम परमात्मा है । प्रेम के तीन रूप है । शरीर से शरीर का प्रेम मानव, पशु-पक्षी सभी अनादिकाल से करते आ रहे हैं । पशुओं की बुद्धि इतनी विकसित नहीं है । छोटे बच्चों का पालन पोषण सक्षम होने तक करते हैं उसके पश्चात् पता ही नहीं चलता बच्चा कहाँ है ? मानव का कर्Ÿाव्य भी बालक को जीवन जीने का मार्ग प्रशस्त करना है । बेटा और बेटी के प्रति कर्Ÿाव्य पूर्ण हो जाए तो सन्यास की ओर मुख और गृहस्थ परिवार के प्रति पीठ कर लेना चाहिए । परिवार के प्रति मोह दुःख का कारण बनता है । परिवार के प्रति आकांक्षाएं पूर्ण नहीं होती है । पारिवारिक-जन दुःख रोग को मिटाने वाले बाहरी साधन एकत्रित करवा सकता है परन्तु दुःख दूर नहीं कर सकते हैं । आगमों में उदाहरण मिलता है कि राजा को भयंकर बीमारी ने घेर लिया । राज्य के उत्कृष्ट वैद्यों द्वारा चिकित्सा करवाई जा रही है परन्तु बीमारी दूर नहीं    हुई । बीमारी धर्म शरण लेने से दूर हई । 

दूसरा प्रेम है मन से मन का प्रेम । जाति, सम्प्रदाय देश-विदेश आदि भेद इस प्रेम में नहीं है । मन आकर्षित हुआ और लगाव बढ़ जाता है दूसरा प्रेम प्रथम से कुछ अच्छा है । तीसरा प्रेम है आत्मा से आत्मा का प्रेम । यह प्रेम सर्वोच्च हृदय की पवित्र स्थिति है । यही साधक की साधना का उद्देश्य होता है । ध्यान शिविरों के माध्यम से आत्मा के प्रति गहरा संबंध स्थापित होता है । आत्मा सभी प्राणी मात्र में विद्यमान है । हर चेतन के प्रति आप स्नेह भाव रखें । किसी भी प्राणी को दुःख नहीं देना, उसको अपनी आत्मा के समान समझना और अरिहंत परमात्मा के समान आत्मा को उज्ज्वल बनाना ही सर्वोत्कृष्ट प्रेम है । आठ कर्मों के आवरण से मुक्त होने के लिए आत्मा केा परमात्म बनाने के लिए उद्यत हो जाना । प्रत्येक महापुरूषों के गुणों को स्मरण कर झुककर ग्रहण करना । सिद्ध की परम शुद्ध ज्योति स्वरूप होना । आत्मा से परमात्मा बनना जिनशासन की साधना का सार है । तीन प्रेम के रूपों में दो व्यक्ति संसार में रहते हुए करता ही है । सौभाग्यशाली जीव आत्मा से आत्मा के प्रति प्रेम करता है । 

 

गाँधी और शास्त्री राजनेताओं के आदर्श हैं

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

2 अक्टूबर, 2007: अम्बाला शहर: युग पुरूष, राष्ट्र संत, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- आज महात्मा गांधी और लाल बहादुर शास्त्री का भी जन्म-दिवस   है । महात्मागांधी से किसी ने प्रश्न किया आपके जीवन की तमन्ना क्या है ? महात्मा गांधी ने कहा- हर दुःखी मानव के आंसू पौछ सकूं यही मेरी हार्दिक तमन्ना है । किसी के आंसू पौछोगे तो तुम्हारे आंसू स्वयं मिट जाएंगे । उनका जीवन बड़ा सुन्दर और स्पष्ट था । मानवतावादी दृष्टिकोण उनके जीवन में था । आज महात्मा गाँधी को विश्व का हर नेता जानता है । भारत को उन्होंने लाठी और लंगोटी की वेशभूषा में आजाद करवाया । 

मृत्यु से पूर्व उनका जन्म-दिवस मनाया जा रहा था और उस दिन अनेकानेक सांस्कृतिक कार्यक्रम रेडियो पर आ रहे थे, मनु बहिन ने कहा बापू जी आज रेडियो सुन ले । आपकी जीवन गाथाएं वहां पर गायी जा रही   है । बापू ने कहा- अपने बारे में क्या सुनना है मुझे तो चरखे का संगीत अच्छा लगता है । वे पुरूषार्थ प्रेमी थे । प्रकृति उन्हें मनभावन कर देती थी । वे सत्य को भगवान मानते थे । राजनीति में उन्होंने धर्म की स्थापना की । उनकी पंक्तियां आज भी कानों में गूंजती है:- ईश्वर अल्लाह तेरो नाम, सबको सन्मति दे भगवान । गांधीजी प्रतिदिन जीवन पर्यंत किसी भी परिस्थिति में प्रार्थना द्वारा भावों को पवित्र रखते थे । 

लाल बहादुर शास्त्री एक ईमानदार प्रधानमंत्री थे । वे हर कार्य ईमानदारी से करते   थे । वे कहते थे मैं गरीब देश का गरीब प्रधानमंत्री हूं । उनके भीतर सच्चाई और मेहनत कूट-2 कर भरी हुई थी । भारत की जनता को जब भूख से आकुल व्याकुल देखा तो उन्होंने शाम का भोजन छोड़ दिया । हर व्यक्ति को जय जवान, जय किसान का नारा देने वाला  व्यक्ति लाल बहादुर शास्त्री ही था । आज भारत को ऐसे धर्म नेताओं की आवश्यकता है । गांधी जयंती, शास्त्री जयंती मनानी तभी सार्थक होगी जब तक अपने देश धर्म और परिवार के लिए सुसंस्कारी बनेंगे एवं सत्य में जीएंगे । 

 

स्वीकार करने में मोक्ष है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

3 अक्टूबर, 2007: अम्बाला शहर: युग पुरूष, राष्ट्र संत, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- परमात्मा को पाने का सीधा मार्ग है जैसे हम है उस स्थिति में खुश रहना । हम अक्सर अपने विचारानुसार घर, परिवार, समाज को चलाना चाहते हैं । मन के अनुसार कार्य न हो तो व्यक्ति तनाव से ग्रसित हो जाता है । जैसा हो रहा है उसे आप स्वीकार करो । स्वीकार करना मुश्किल है क्योंकि भीतर अहंकार आदि दुर्भावनाएं भरी पड़ी है । कोई गालियाँ देता है तो कर्म बंधन उसका होता है परन्तु अगर गाली सुनने वाला प्रतिक्रिया स्वरूप प्रत्युत्तर में गाली देता है तो कर्म बंधन में वह व्यक्ति भी शामिल हो जाता है । सभी के प्रति प्रेम, स्नेह का भाव रखे एवं प्राणी मात्र को अपने समान समझते हैं तो क्षमा का भाव आता है अन्यथा व्यक्ति अहंकार करता है कि मैं बड़ा हूँ, मैं प्रमुख हूँ । राग-द्वेष दोनों विपरीत परिस्थितियों में सम रहना । परिवार के प्रति राग के कारण व्यक्ति धन आदि भौतिक संसाधन एकत्रित करता है । धन को अर्जित करना कठिन है उससे अधिक कठिन है धन की रक्षा करना । माता पिता के पास धन है तो बेटे मान सम्मान करते हैं नहीं तो घर के बाहर निकाल देते है । धन बहुत हो गया परन्तु बेटे-बेटियों का आपस में प्रेम, सहयोग नहीं है तो वह धन क्या काम का है । संसार की यह विचित्र स्थिति है । व्यक्ति थोड़े से सूख के लिए दुःख को अपना लेता है । गृहस्थ जीवन में समर्पण और भक्ति है तो सुख दुःख से व्यक्ति घबराता नहीं है बल्कि उसको आनंद के साथ सहन करने की क्षमता पैदा होती है । धन, शरीर आदि जो साधन प्राप्त हुए उसमें संतोष रखना और प्रिय वस्तु के प्रति न लगाव हो और अप्रिय वस्तु के प्रति बुरे भाव न हो । दोनों को समान दृष्टि से देखोगे तो संसार के किसी भी कोने में व्यक्ति शांति, आनंद के साथ मानव जीवन को व्यतीत कर सकता है । ध्यान, प्रार्थना, भक्ति की चर्चाओं से जीवन परिवर्तन नहीं होता अपितु उसे जीवन में अपनाने से लाभ अवश्य होता है । कलयुग में ध्यान सहज और सरल साधना का मार्ग है । यह सभी महान पुरूषों और ग्रन्थों का सार है । 

 

मनुष्य जन्म का उद्देश्य आत्म-ज्ञानी बनना है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

4 अक्टूबर, 2007: अम्बाला शहर: युग पुरूष, राष्ट्र संत, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- प्रभु महावीर ने कहा तुम आत्म-ज्ञानी बनो । प्रभु महावीर के जीवन में कठिन उपसर्ग आये परन्तु उनका ध्येय संकल्प दृढ़ था इसलिए वह साधना के मार्ग पर अडिग रहे । प्रभु महावीर का उपसर्ग सुनकर सामान्य मानव के मन कांप उठता है परन्तु उन्होंने दीक्षा के अनन्तर भेद-विज्ञान द्वारा सरलता से कर्मों से विमुक्त हुए । संसार में दो मूल तŸव है एक है शरीर और दूसरा है आत्मा । ज्ञान का अभिप्राय यह है कि आप जीव-अजीव को जान सके । सम्यग् दर्शन आदि तीन रत्नों द्वारा तत्व का बोध होता है । आत्मा अजर अमर अविनाशी है एवं शरीर नाशवान है । शरीर और आत्मा श्वांस के माध्यम से जुड़े है । श्वांस के विलीन हो जाए तो संसार की कोई शक्ति बचा नहीं सकती । मानव जो अच्छे और बुरे कर्म करता है उसके अनुसार शांति को प्राप्त होता है । अच्छे कर्म किए तो मनुष्य-गति एवं स्वर्ग गमन होता है । बुरे कर्म करेंगे तो नरक एवं पशुयोनि में व्यक्ति जन्म धारण करता है । सामायिक का अर्थ है आत्मा में स्थित हो जाना । समय का एक अर्थ आत्मा भी ग्रहण किया गया है यही अर्थ प्रभु महावीर के उपासकों ग्रहणीय है । तीन योगों के दोषों से सर्वथा मुक्त हो जाना सच्ची सामायिक है । ध्यान शिविरों में भाग लेने से व्यक्ति आत्म ज्ञान की ओर अग्रसर होता है । मानव जैसे वस्त,ु व्यक्ति एवं परिस्थिति को देखता है वैसा ही चिŸा का परिवर्तन होता  है । भाव आते है चिŸा की तरंगांे का विस्तार होता है और व्यक्ति कर्म बंधन में और उलझता जाता है । प्रभु महावीर के सामने कितना सुन्दर दृश्य हो अथवा विकट परिस्थिति हो उनका मन डांवाडोल नहीं होता । ज्ञान वह है जो चिŸा को निरोध करें । भोजन करते हुए पदार्थ के विभिन्न स्वाद प्रवृŸिा से चिŸा विभिन्न प्रकार का हो जाता है परन्तु शरीर को साधना हेतु भोजन करते हैं तो जैसा भोजन होता है चाहे मीठा हो, नमकीन उसको शांत भाव से ग्रहण कर चिŸा को एक धारा में बहाया जा सकता है । चिŸा की अनेकता की वजह से अक्सर व्यक्ति निरर्थक झगड़ों में प्रवृŸा हो जाता है । चिŸा अशुभ कामों में जल्दी प्रवृŸा हो जाता है क्योंकि अनेक जन्मों में संस्कार पड़े हैं वहां जागृत होते हैं । शुभ कर्म करने का मन जल्दी कर नहीं पाता है । शुभ कार्य करना संसार में मुश्किल है । ज्ञान से आत्मा कर्मों से विमुक्त होता है । महापुरूषों की वाणी है संसारी जीव आठ कर्मों के आवरण से युक्त है इसलिए वह संसार में भ्रमण कर रहा है । ज्ञान से कर्मों का आवरण हट जाता है । आत्मा परम् उज्ज्वल होकर सिद्ध अवस्था को ज्ञान द्वारा प्राप्त कर लेता है । मानव जीवन का वास्तविक उद्देश्य आत्मा को पवित्र करना है । 

 

ज्ञान से राग भाव नष्ट होता है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

5 अक्टूबर, 2007: अम्बाला शहर: युग पुरूष, राष्ट्र संत, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- सच्चा भक्त भगवान से प्रार्थना करता है तो पद धन नहीं अपितु हर समय प्रभु का ध्यान प्यार कृपा रहे यह मांग रखता है । आचारांग सूत्र में सोऽहं की साधना आचार्य श्री आत्माराम जी महाराज ने बतायी है । सोऽहं के लघु सूत्र के माध्यम से व्यक्ति भगवत्ता रूप हो जाता है । अनन्त जन्म बीत चुके हैं जीव को संसार में परिभ्रमण करते हुए । एक कर्म भी शेष हो तो मुक्ति संभव नहीं है । भगवान् बाहुबली ने कठोर साधना अनेक वर्षों तक करते रहे । शरीर मात्र का भान नहीं है । पशु-पक्षी बाहुबली के शरीर पर अपने घोंसले बना रहे हैं । वनस्पतियों का आश्रय बन गये थे परन्तु अहंकार रूपी भाव मन के किसी कोने में रहने से मुक्ति का द्वार नहीं खुल पाया । अहंकार के विलीन होते ही सिद्धालय का अनुपम मार्ग खुल गया ।

भगवान के प्यार में राग नहीं होता है । आसक्ति और द्वेष संसार भ्रमण का कारण है । राग द्वेष नष्ट हो गया तो मुक्ति हो जाती है । भगवान महावीर के प्रति गौतम स्वामी का राग था जब तक राग था तब तक ज्ञान नहीं हुआ । राग भाव के छोड़ने से केवलज्ञान की ज्योति प्रज्ज्वलित हो गई । प्रभु महावीर के दरबार में तो सभी प्राणी समान थे । व्यवहार में व्यक्ति आपस के मित्रों, पड़ोसियों से आचार एवं विचारों का आदान प्रदान करता है । अच्छे और बुरे विचार आचार संसार भर में दृष्टिगोचर होते   हैं । साधक को गुणदृष्टि से अच्छे विचार को ग्रहण कर तुच्छ विचारों को त्याग देना चाहिए । प्रशंसा और निन्दा समान रूप से स्वीकार कर  लेना । किसी की बुरी बातों की चर्चा करने की आवश्यकता नहीं है बल्कि उसे जाकर सीधी बात करना श्रेयस्कर होता है क्योंकि कई बार व्यक्ति अल्पज्ञानी होने की वजह से भ्रम की स्थिति भी पैदा होती है । आपस में विचारों के आदान प्रदान करने से शंकाएं मिट जाती है । सुनने और बोलने वाले में मैत्री का संबंध स्थापित होता है । संसार में व्यक्ति उलझ गया है इसलिए प्रार्थना आत्म विशुद्धि का मार्ग प्रशस्त करती है । 

जिनशासन में ज्ञान हो तो शरीर और आत्मा का भेद अनुभव होता है । आत्म-ज्ञान से राग टूटता है । राग का अभिप्राय है आसक्ति । राग के विपरीत है  वीतरागता । ज्ञान से जीवन वीतरागता से ओतप्रोत होता है । आयु पर्यन्त तक राग छूट नहीं पाता है । वस्तु, व्यक्ति, परिस्थति के प्रति जो अनुकूल संबंध है वह राग भाव के नाम से विख्यात है । वस्तु व्यक्ति के प्रति राग क्षण मात्र के लिए होता   है । धन आदि द्वारा संसार के कार्य सम्पन्न करने होते हैं । शरीर इतना बलवान नहीं है कि किसी भी ऋतु में आप सहज-भाव से रह सके वस्तु व्यक्ति से संयोग जीवन में अवश्य होता है परन्तु आप वस्तु का उपभोग करते हुए आसक्ति का भाव, ममŸव भाव त्याग  देवे ।

 

मुक्ति का द्वार सम्यग् दर्शन है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

9 अक्टूबर, 2007: अम्बाला शहर: युग पुरूष, राष्ट्र संत, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- जैसी व्यक्ति की दृष्टि होगी वैसा अनुभव होगा जैसा अनुभव होगा वैसा ज्ञान और जैसा ज्ञान वैसा आचरण होता है । धर्म का मूल दर्शन है । मोक्ष के मार्ग के तीन सूत्र है सम्यग् दर्शन, सम्यग् ज्ञान, सम्यक् आचरण । आत्मज्ञानी जीव शरीर नहीं आत्मा को महत्व प्रदान करता है । तीनों लोकों की सम्पदा आपके पास आ जाये वह व्यर्थ है अगर आत्म ज्ञान नहीं है । आत्म-ज्ञान प्रकट है तो तीनों लोको के राज्य से सर्वश्रेष्ठ है । मुक्ति को प्राप्त करने वाला व्यक्ति दृष्टि को सम्यक् और निर्मल रखने का प्रयास अवश्य करें । भोजन एवं शरीर लक्ष्य प्राप्ति में सहयोगी हो सकते हैं । तप, दान करने के बाद दृष्टि शुद्ध नहीं है तो वह आत्म् विशुद्धि अर्थात् माक्ष में बाधक हो सकते हैं । संसार के सभी कार्य करते हुए परिवार और समाज को भावों और ज्ञान से अशाश्वत् मानकर जीवन यापन करते हुए भी साधना के द्वारा आत्म-शुद्धि हो सकती है । उसके पीछे मूल आधार भी दर्शन है । व्यक्ति जो सोचता है जो देखता है वैसा हो जाता है । 

धन, शरीर और सम्पदा नश्वर है जब तक जीवन है तब तक भौतिक साधन भी साथ रहते है । वासना और आकांक्षा वस्तु के प्रति, व्यक्ति के प्रति है वह आपको जन्म भ्रमण करवाती है । जिस भाव से जो आप कर्म करते हैं उसका फल आपको अवश्य प्राप्त होता है । संसार से मुक्त होने के लिए समय का सार्थक उपयोग करो, हर पल परमात्मा का स्मरण रखो और यथाशक्ति आचरण करना चाहिये । शरीर से प्रतिक्षण धर्म भाव रखते हुए आत्म-दृष्टि में रमण करते हुए आठ कर्मों के पहाड़ों को तोड़ा और फोड़ा जा सकता है । कर्म पहाड़ों को भी सम बनाने की अनंत-शक्ति, आत्म-ज्ञान में विद्यमान है । शरीर में जैसे आंखों का महत्वपूर्ण स्थान है आंख के अभाव में कार्य सिद्धि मुश्किल है । उसी प्रकार मोक्ष के साधक व्यक्ति को दर्शन अर्थात् निर्मल दृष्टि के अभाव में मोक्ष रूपी लक्ष्मी को प्राप्त करना असंभव है । 

हमारा सबका मूल उद्देश्य है कि हम आत्मा से परमात्मा बने अगर लक्ष्य होगा तो भीतर सम्यक्त्व आएगा । हम सब मिलकर एक दूसरे का सहयोग करें । हर श्वांस जो आ रही है और जा रही है इसका उपयोग आत्म साधना के लिए करें । प्रत्येक श्वांस में सुख को स्वीकार करें । प्रत्येक श्वांस का उपयोग कर्मबंधन के लिए ना होकर कर्म-निर्जरा के लिए  हो । श्वांस के साथ अरिहंत प्रभु के भाव, उनके गुण, उनकी आभा से तुम भर जाओगे । और प्रार्थना करें प्रभु तूने आज श्वांसे दे दी, तेरी अनंत कृपा है । प्रभु मेरी प्रत्येक श्वांस किसी के काम आए । जब-2 भी हम धर्म आराधना या अन्य कोई कार्य करें तब श्वांस पर ध्यान देकर देखें कि क्या वह श्वांस कर्म-निर्जरा में लग रही है । 

 

संतोष प्रसन्नता का सम्बल है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

10 अक्टूबर, 2007: अम्बाला शहर: युग पुरूष, राष्ट्र संत, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- धन, पद, रूप एवं सम्मान की अधिकता से व्यक्ति अहंकार करने लग जाता है । अहंकार से तनाव बढ़ता है और तनाव के कारण शारीरिक बीमारियाँ घेर लेती है । अहंकार अधिक हो जाये तो प्रभु भक्ति करने से अहंकार विलीन होने लगता है । अरिहंत शरण लेना भी दुर्लभ है क्योंकि व्यक्ति अपने पूर्व जन्म के संस्कारवश संसार की ओर अधिक बढ़ता है । आत्म दर्शन जीवन पर्यंत रखते हैं तो वह आपको परमात्म की ओर ले जाती है । श्रद्धा व्यवहारिक-रूप से देव, गुरू, धर्म के प्रति परन्तु निश्चय में आत्मा की दृष्टि रखो । धर्म करने के लिए व्यक्ति को परिश्रम करना पड़ता है । संसार के कार्य मानव आसानी से कर लेता है । हर स्थिति में साधक को संतोष से रहना चाहिये । 

संतोष जीवन को आनंदित कर देता है । आपको पक्का विश्वास हो गया कि मैं आत्मा हूँ तो व्यक्ति पुण्य-पाप में नहीं भटकता । भरत क्षेत्र के महानुभाव पुण्य पाप के चक्कर में फंसे है । महाविदेह क्षेत्र के साधक निर्जरा के धर्म कार्य अधिक मात्रा में करते है । श्रद्धा और परमात्मा को जिन्दगी का आधार बनाना । मानव जन्म की अमूल्यता को जानकर अधिक से अधिक समय धर्म ध्यान में लगाकर सदुपयोग कर सकते हैं । धर्म को कल के लिए मत टालना । शरीर का कोई भरोसा नहीं आज स्वस्थ है कल बीमार हो जाते हैं इसलिए जब तक शरीर बलवान है मानव को धर्म ध्यान अवश्य करना चाहिये । गुरू, शास्त्र आदि भी मुक्ति के आलम्बन बन है । जब आपके आपको लगे गुरू आपको राग द्वेष से संचित कर रहा है तो आप गलत रास्ते पर जा रहे हैं इसलिए साध्य के साथ-साथ साधन भी पवित्र होना चाहिये । सम्यग् दर्शन तीनों लोकों में मूल्यवान है । सम्यक्त्व लिया या दिया नहीं जाता वह स्वतः प्रकट होता है । 

जीवन की घटना और प्रसंग से गुण ग्रहण करना चाहिये । किसी की मृत्यु पर शामिल होते हुए अपने जीवन के बारे में भी चिन्तन करना चाहिये । मौत के समय राम नाम सत्य   हैं । केवल कहना मत बल्कि यही वास्तव में सत्य है यह जानना । प्रभु महावीर पूर्व जन्म को स्मरण कराते थे । राजा मेघ जब संयास जीवन से परेशान होने लगा तो प्रभु ने कहा यह तो कोई कष्ट नहीं है । तुम पूर्व जन्म में हाथी की योनि में खरगोश की रक्षा की । उसी अनुकृपा का फल है कि तुम राजा बने   हो । पशुओं में भी करूणा होती है । मंगलपाठ श्रवण करते हुए हृदय में मंगल-भावों को धारण करना चाहिये । सम्यग् दर्शन के पांचों लक्षण बताये गये । सम, संवेग, निर्वेद अनुकम्पा आस्था । पांच बातें जीवन में आ गयी तो आप धर्म के मार्ग में चल रहे हैं अन्यथा धर्म से विमुख है । जिनवचनों पर अनुरक्त रहना आत्म ज्ञान प्रकट हो गया तो वह जन्म-जन्म तक साथ रहेगा । भाग्य प्रबल है तो सुख साधन स्वतः प्राप्त हो जाते हैं । शुभ-कर्म शुभ-भाव निरन्तर करते रहना चाहिये जिससे आगामी जीवन भी सुख शांति के साथ व्यतीत हो । 

 

आत्म: विकास कोर्स ‘‘बेसिक’’ 16 से 20 अक्टूबर, 2007 तक महावीर भवन, अम्बाला शहर में शुरू हो रहे हैं, इस हेतु आप सभी सादर आमंत्रित हैं । 

धर्म से जीवन में समृद्धि आती है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

11 अक्टूबर, 2007: अम्बाला शहर: युग पुरूष, राष्ट्र संत, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- अनादिकाल से कर्म और आत्मा का संबंध चला आ रहा है । मोह ममता से वशीभूत जीव कर्मों का बंधन करता है । आप देखे अपने जीवन में आसक्ति और द्वेष कहाँ-2 पर है उसे कम करने का प्रयास करें । राग से वीतराग दशा में आते है तो कर्म-बंधन नहीं होता  है । वस्तु, व्यक्ति के प्रति राग आता है तब उसे प्रभु चरणों में समर्पित देना चाहिए । संसारी भोग किम्पाक फल की भांति क्षण मात्र के लिए सुख देते हैं । अनंतकाल दुःख देते हैं । व्यक्ति को जब खुजली होती है तब लगता है खुजलाने का मन करता रहता है परन्तु बाद में शरीर पर जख्म हो जाता है फिर वह अनेक दिनों तक कष्ट प्रदान करता है । संसार के भोगों में व्यक्ति को तृप्ति नहीं आती है । प्रभु महावीर ने शरीर की आवश्यक क्रियाओं को करने के लिए मना नहीं किया है बल्कि सभी कार्य विवेकपूर्वक करना चाहिये । ध्यान से मन, वाणी और काया है । ध्यान कर्मों को नष्ट करने का सरल साधन है । मन को शांति मेंु लाते हुए धर्म वाणी का श्रवण करना चाहिये । धर्म कार्य के अनेक रूप विश्व में विद्यमान है । मन, वचन और काया रूपी योग को अलग करने का साधन रूप ध्यान उनमें अधिक श्रेयस्कर है । शरीर के लिए जीवन का अधिकांश समय हम लगा देते हैं । मानव को अधिक से अधिक आत्मा की मुक्ति के लिए प्रयत्न करना चाहिये । शास्त्र, तप, दान आदि धर्म क्रियाओं के पीछे आपकी दृष्टि अधिक महŸवपूर्ण है । दान करते हुए अगर स्वार्थ भाव है तो वह धर्म की ओर नहीं ले जा सकता । गुलाब के फूल के ऊपर अनेकों काटे हैं परन्तु गुलाब प्रफुल्लित है उसी प्रकार जीवन में अनेक कांटे है व्यक्ति को गुणग्राहक दृष्टि से गुणों के अधिक महŸव देना चाहिये । जीवन ताश के पŸाों के भांति है । पŸो कैसे भी आ सकते है कुशल खिलाड़ी कमजोर पŸाों को भी बलवान बना देता और खेल को जीत लेता है । अकुशल अच्छे पत्तों से भी हार बन सकता है । ऐसे ही जीवन के सुख साधन अमीरता गरीबी सब पत्तों के भांति अनिश्चित है परन्तु जीव ने जीने की कला में कुशल व्यक्ति अमीरता और गरीब की परवाह नहीं करता है । अमीर व्यक्ति दुःखी परेशान हो सकता है और गरीब आनंद से जीवन यापन कर सकता है । महत्वपूर्ण है जीवन जीने का ढंग । जीवन जीने के उदारता और सहिष्णु विचार आदि साधक जीवन मूल आधार है । धर्म से सुख शांति और समृद्धि आती है । अधर्म से आधि व्याधि और उपाधि आती है । मानव के स्वतंत्र विचारों पर निर्भर है कि वह चुनाव कर सकता है । तीनों लोकों का राज्य तुच्छ है आत्म समृद्धि और वीतरागवाणी के सामने ।

 

विवेकवान व्यक्ति मर्यादित रहता है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

12 अक्टूबर, 2007: अम्बाला शहर: युग पुरूष, राष्ट्र संत, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- अरिहंत परमात्मा की शरण ग्रहण कर मानव को निश्चिन्त हो जाना चाहिये । जितना व्यक्ति अपने को लघु मानता है उतने जल्दी वह परमात्मा को प्राप्त कर लेता है । जब व्यक्ति अपने नाम को प्राथमिक बना देता है और प्रभु के नाम गौण कर देता है तब उसकी वह प्रार्थना बेकार हो जाती है । गुरू नानक भी कहते हैं:-

नानक नन्हें हो रहो, जैसे नन्हीं दूब ।

बड़ा घास जल जाएगा, दूब खूब की खूब ।।

तुम्हारे मकान के आगे छोटी-छोटी घास होती है उसको भी परिस्थिति में कोई फर्क नहीं पड़ता परन्तु बड़े-2 वृक्ष वायु के पानी के प्रवाह में टूट जाते हैं । विनम्रता छोटी घास के समान होती है । अहंकार व्यक्ति के जीवन को नष्ट कर देता है । अपने जीवन को विवेकवान बना लेना चाहिये । विवेक होने से व्यक्ति का जीवन मर्यादित हो जाता है । विवेकवान व्यक्ति को हर कार्य के प्रति प्रेम होता है, उसके किसी भी कार्य से किसी को तकलीफ नहीं होती    है । प्रभु महावीर ने कहा है व्यक्ति अज्ञानी है इसलिए प्रतिदिन अपने दोषों को देखे । अपने दोषों को स्वीकार करना चाहिए । दोषों को शुद्ध करने के लिए प्रायश्चित स्वरूप तप आदि करके पाप को साफ किया जाता है । 

सम्यग् दर्शन के पांच लक्षण बताये गये हैं । प्रथम लक्षण है   प्रशम । क्रोध आदि कषाय व्यक्ति के जीवन में निमित्त पाकर प्रकट हो जाते हैं तब शांति, समता, सरलता, विनम्रता को धारण करना । सद्गुणों को धारण करने से क्रोध आदि कषाय विलीन हो जाते  हैं । धार्मिक व्यक्ति के जीवन का यह थर्मामीटर है । क्रोध आ रहा है और साथ ही शांति का उद्भव हो जाता है । जीवन में कठिनता समस्याएं लाभ हानि होती है, उस समय शांत अवस्था में रहना । 

श्रीराम को चैदह वर्ष वनवास मिला । कैकेयी ने बड़ा अन्याय किया है । भरत को राज्य देना था इसलिए राम को चैदह वर्ष का वनवास दिया । श्रीराम ने उŸार दिया कि कैकेयी माता ने मेरे ऊपर बड़ी कृपा है कि मुझे ऋषियों मुनियों की सेवा का ज्ञान वृद्धि का सहनशीलता का अवसर मिलेगा । मुझे वन में जाकर ऋषियों मुनियों की सेवा करने का, ज्ञान वृद्धि का, सहनशीलता का अवसर मिलेगा । भरत को राज्य मिलेगा तो कोई बुरा थोड़े ही   है । वह भी मेरा भाई ही है । दूसरी बात कोई किसी को दुःख नहीं देता है । सब मेरे अपने कर्मों का फल है । यह भावना सम्यग् दर्शन को प्रथम लक्षण प्रशम हो तभी आ सकती है । 

 

ध्यान से जीवन परिवर्तन होता है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

13 अक्टूबर, 2007: अम्बाला शहर: युग पुरूष, राष्ट्र संत, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- कर्म बंधन का मूल कारण है राग और द्वेष । मानव बार-बार क्रोध करता है । क्रोध के निमिŸा और कारण बदल जाते हैं । क्रोध आदि कषाय आयु के साथ बढ़ते जा रहे हैं । कम होने का नाम ही नहीं लेता । हमें चिन्तन मनन करना है कि कैसे राग को कम करना है । जो कर्म आज कर रहे हैं वह आगे भोगने पड़ते हैं । 

सम्यग् दर्शन के पाँच लक्षण है । सम भाव उसका प्रथम लक्षण है । धर्म मर्यादित समय के लिए नहीं है बल्कि धर्म जीवन का अंग बने । धर्म से जीवन का आमूल चूल परिवर्तन होता है । मकान ठीक न बन पाया तो व्यक्ति आर्कीटेक्ट को बदल देता है । जीवन परिवर्तन हो तो धर्म कार्य के ऊपर परीक्षण और निरीक्षण अवश्य करना चाहिये । जीवन को बदलने के लिए हर क्षण जागरूक रहना परमावश्यक है । ध्यान साधना करने से राग आदि दुर्भावनाएँ कम होती है हुई है और होगी । धर्म कार्य की अपेक्षा ध्यान से जीवन अधिक जल्दी परिवर्तित होता है । 

सद्गुरू के पास आत्मज्ञान होगा । धर्म का मूल आधार आत्म ज्ञान एवं समदर्शिता है । आत्म-ज्ञानी सुख दुःख आदि को स्वीकार करता है । अपने कर्मों को कारण रूप मानता है । अरिहंतां की वाणी अपूर्व होती है और ज्ञान की ज्योति सर्वोच्च होती है । अनुभव से वाणी प्रकट होती है । यह सद्गुरू के मुख्य लक्षण कहे हैं । समय का अधिक से अधिक धर्म में लगाकर समय का वास्तविक सदुपयोग करो । 

सद्गुरू वह है जो ज्ञान से परिपूर्ण हो गया है । गुरू किसी को बांधता नहीं वह आपको एक रोशनी देता है । उसके सहारे आज आप चल रहे हो । गुरू वह है जिसके भीतर विवेक, जागरूकता का दीया जल रहा है । गुरू का कण-कण आपको आशीर्वाद देता है । गुरू की हर बात में मैत्री प्रवाहित होती है । 

 

सद्गुरू सत्य दृष्टि प्रदान करते हैं

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

14 अक्टूबर, 2007: अम्बाला शहर: युग पुरूष, राष्ट्र संत, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- सद्गुरू आपको परमार्थ मार्ग की ओर ले जाता है । जो अंधकार को दूर करता है वह गुरू है । भीतर, मोह, काम का अन्धकार दूर कर देता है वह गुरू है । जो सत्य की ओर ले जाता है वह है सद्गुरू । जो परम पद की ओर ले जाए वह परम गुरू का लक्षण है । गुरू के शरण में जाने के पश्चात् संसार फीका एवं निस्सार दिखाई पड़ता है । सद्गुरू हमें देखने की निर्मल दृष्टि प्रदान करता है । आँखें बाहर की है उसमें भी अगर व्यवधान हो तो दिक्कते आती है । अध्यात्म मार्ग पर भीतर की दृष्टि सत्य होनी चाहिये । साधक को हंस के समान गुण दृष्टि रखनी चाहिये और बगुले के समान दृष्टि को त्याग देना चाहिये । गिलहरी और में बाहरी तौर पर बड़ी समानताएं है परन्तु गिलहरी एक-एक तंतु को जोड़ने का काम करती है और चूहा काटने का काम करता है । गिलहरी विश्वास और प्रकाश का प्रतीक है । चूहा तर्क और अंधकार का प्रतीक है । गिलहरी का सोचने का ढंग सकारात्मक है और चूहे का कार्य और दृष्टि नकारात्मकता का प्रतीक है । जैसी दृष्टि होती है वैसी सृष्टि दिखाई पड़ती है । मानव को आत्म दृष्टि रखनी चाहिये । दृष्टि सत्य यथार्थ हो तो उसके जीवन में पांच प्रकार के सद्गुण प्रकट होते हैं । संवेग सम्यर्गदर्शन का दूसरा लक्षण है । सुख शांति परमात्मा के मार्ग पर है मोक्ष का मार्ग सरल सीधा है । संवेग में उध्र्वगमन और मोक्ष के प्रति अभिरूचि होती है । तीसरा लक्षण है निर्वेद । निर्वेद का अर्थ है वैराग्यप्रद जीवन । संसार से वैराग्य आकर परमात्म पद की ओर आगे बढ़ने हेतु सन्यास ग्रहण करना । निर्वेद रूपी सद्गुण से सज्जित व्यक्ति ही आगे बढ़ पाते   हैं । सौभाग्यशाली व्यक्ति ही ऊध्र्वगमन की ओर अग्रसर होते हैं । चैथा लक्षण है अनुकम्पा है । पशु-पक्षी, मनुष्य जिनमें भी प्राण है उसके प्रति दया और करूणा का भाव आना ही अनुकम्पा है । अकसर लोग मन्दिरों में तो जाते हैं परन्तु किसी दुःखी एवं असहाय व्यक्ति की सेवा नहीं करते बल्कि उसे दुतकारते हैं परन्तु सम्यग् दर्शन को उपलक्ष्य व्यक्ति सभी के प्रति मैत्री का भाव रखता है । पाँचवा सम्यग् दर्शन है आस्था । आस्था किसके प्रति रखनी चाहिए ? संसार में से तत्व है जीव और अजीव । अजीव के अंतर्गत शरीर, पद, धन, लक्षण आदि वस्तुएं हैं और जीव में चेतनत्व आत्मा है । परम् शुद्ध आत्मा परमात्मा है । अजीव का उपयोग आयु पर्यंत करता है परन्तु आत्मा के ऊपर अटूट श्रद्धा रखता है । संसार में अनंतकाल तक दुःख भोगा है । अनंत योनि में भ्रमण किया है क्योंकि हमें आत्म बोध नहीं हुआ   था । जो सद्गुरू आपको स्वयं का बोध करादे उनके श्रीचरणों में बैठकर ज्ञान प्राप्त कर लेना चाहिए । 

 

संसार के प्राणियों में मानव स्वतंत्र है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

अम्बाला शहर: 15 अक्टूबर, 2007: युग पुरूष, राष्ट्र संत, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- भगवान् महावीर का मार्ग संकल्प का मार्ग है । मानव एक ऐसे चैराहे पर खड़ा है वह चिन्तन मनन के द्वारा चारों ओर गति कर सकता है । प्रभु महावीर को भी आम व्यक्ति की भांति ही शरीर मिला उन्होंने संकल्प, वीरता के द्वारा आठ कर्मों के आवरण को नष्ट कर दिया है । हर श्वांस में कर्म निर्जरा हो सकती है अगर लक्ष्य शुभ है । मानवता का उद्देश्य है सभी को सुख प्रदान  करना । किसी भी व्यक्ति को अपने स्वार्थ हेतु कष्ट नहीं देना यही वास्तव में मानव जन्म की सार्थकता है । पशु-पक्षी, पेड़-पौधे वातावरण की प्रतिकूलता के बावजूद मानव को आॅक्सीजन और सुख के साधन प्रदान करता है । मानव अगर मानव जन्म को धारण करके स्व पर कल्याण नहीं कर सके तो वह जीवन पशु की भांति बेकार है । जमात की आवश्यकता कमजोर जीवो को होती है । सिंह बलवान होता है और अकेला निश्चिंत जंगलों में भ्रमण करता है । संत का जीवन सिंह के समान होता है । अनेक फक्कड़ संत हुए हैं भारत के पटल पर उनमें से प्रसिद्ध संत हैं आनंदघन प्रवचन गांव में करने वाले  थे । गांव की परम्परा थी कि गांव के अमीर सेठ आयेंगे तभी प्रवचन प्रारंभ होगा । आनंदघन ने नियम को लांघते हुए सेठ के आने से पूर्व ही प्रवचन प्रारंभ कर दिया । सेठ बौखला   गया । संत किसी की परवाह नहीं करते । संत संयम साधना के मार्ग पर सिंह की भांति अकेला और बिना जमात के निर्भय होकर चलता है । प्रवचन वहीं पर छोड़ दिया और जंगल की ओर निकल गये । समाज की परवाह नहीं की क्योंकि परम्परा उचित नहीं   थी । संसार में वीतराग मार्ग ही सच्चा मार्ग है । शास्त्र कहते हैं कि प्रभु भक्ति मार्ग पर चलने वाला गुण अवगुण सब कुछ प्रभु चरणों में समर्पित करना चाहिये । आत्मा निश्चय में शुद्ध है । जैसे सूरज का प्रकाश सूर्योदय होते ही प्रकट होता है परन्तु बादलों के सूरज के सामने आने से सूरज की उपस्थिति को नकारा नहीं जा सकता । ध्यान, प्रार्थना आदि धर्म साधन आत्मा के ऊपर कर्मों के बादलों को हटाकर प्रकाशमान करने का प्रमुख साधन है । जीवन के 24 घण्टों में से कुछ समय स्वयं के लिए निकालना चाहिये । श्वांस का भरोसा नहीं है । प्रभु महावीर कहते हैं कि बुढ़ापा आने से पूर्व शरीर की स्वस्थता में ही धर्म को जीवन का अभिन्न अंग बनाना  चाहिये । जीवन का बहुमूल्य सूत्र है उसके ऊपर चिन्तन साचरण करना चाहिये वह है आत्म को परमात्मा बनाना है । जन्म जन्म के प्रबल पुण्य संयोग से मनुष्य जन्म, शास्त्र श्रवण गुरूदर्शन प्राप्त होते हैं । 

 

धर्म जीवन का सार है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

अम्बाला शहर: 16 अक्टूबर, 2007: युग पुरूष, राष्ट्र संत, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- जीवन पेड़ के पŸो-पŸो में है । मनुष्य, पशु, देवता सभी में परमात्मा के सद्गुण विद्यमान है । आत्मा के ऊपर कर्मों के आवरण आ गया है इसलिए परमात्मा प्रकट नहीं हो पाया है । प्रभु महावीर का धर्म अनेकान्तवादी है वह वस्तु के केवल एक धर्म अर्थात् गुण को स्वीकार नहीं करता अपितु वस्तु के अनंतगुणों को स्वीकार करता है । संसार में दो मार्ग प्रचलित है व्यवहार और निश्चय । प्रभु महावीर दोनों मार्गों का प्रतिपादन करते हैं । व्यवहार के ज्ञान से अकसर मानव अहंकार में वृद्धि करता है परन्तु आत्म-ज्ञान से अहंकार विलीन हो जाता है । अनंत जन्म हो चुके है इस संसार में परिभ्रमण करते हुए । मनुष्य जन्म अनंत पुण्य के संयोग से प्राप्त होता है । समय को धर्म कार्य में लगाकर सदुपयोग करो । जो श्वांस बीत जाएगी वह पुनः लौटकर नहीं आती । 

पंजाबी कवि ने सम्पूर्ण जीवन को कविता के माध्यम से बताया है । मनुष्य जन्म से पूर्व माँ के गर्भ नौ माह तक रहा । जन्म के पश्चात् बोलना चलना सीखता है बचपन में बच्चा सरल होता है । धीरे-धीरे आयु वृद्धि के साथ-साथ माया-रूपी दुर्गुण भी बढ़ता जाता है । बचपन में प्यार माँ के साथ होता है परन्तु युवावस्था में प्यार पत्नी के प्रति हो जाता है । दुनियादारी के जो उच्च सिम्बल माने जाते हैं जैसे भौतिक साधन उन्हें अपने जीवन का श्रेष्ठ सिंबल मानने लगता है । धन- दौलत आदि का अधिक से अधिक दिखावा करता है । गाड़ी, मकान में जितने अधिक रूपये लगे होंगे अक्सर मानव इन्हीं प्रकार के कार्यों में युवाव्था गंवा देता है फिर बुढ़ापा घेर लेता है । शरीर के अंग शिथिल होने लगते हैं और संसार का जो सत्य है मृत्यु उसको प्राप्त कर लेता है । अमीर व्यक्ति अहंकार में अपना जीवन व्यतीत कर देता है और गरीब व्यक्ति संघर्षहीन भावना में जीवन लगा देता है । घर में धर्म स्थान अवश्य होना चाहिये जिससे आपको धर्मकी याद बनी रहे । 

सेवा धर्म परम गहन है, इसको जितना क्रिश्यचयन समाज या सिक्ख समाज ने ग्रहण किया उतना कोई ओर नहीं ग्रहण कर पाये । आज भी गुरूद्वारे में कितनी सेवा होती है, रोटी को भी प्रसाद कहकर ग्रहण किया जाता है । हमारे समाज में ऐसी एकता होती या इतना समर्पण होता तो आज ये मन की गांठे नहीं बंधती । हमारे समाज में ऊॅंच नीच का भाव ना रहे तब समर्पण प्राप्त हो जाएगा । जब-2 भीतर पीड़ा आए, प्रभु को याद कर लेना । जब भीतर शान्ति, आनंद, मैत्री होती है तो भीतर से आनंद फूटता है । परमात्मा ने हमें अनेकों अवसर दिये पर हमने उस अवसर को चुका दिया । प्रत्येक प्राणी में एक ही चेतना है । पशु, पौधे, पहाड़, पत्थर, नैरयिक, देवता, मानव और तिर्यंच सभी में एक ही आत्मा समाई हुई है, हम उस आत्म-तत्व को ग्रहण करें ।  

 

साहसी व्यक्ति धर्म मार्ग पर चलता है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

अम्बाला शहर: 17 अक्टूबर, 2007: युग पुरूष, राष्ट्र संत, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- भजन, भक्ति, सत्संग और ध्यान इसका मूल आधार और बैरामीटर है जिसको तुम प्राप्त करना चाहते हो वह भीतर तो आये । भजन में मन कहीं और है बोल कुछ और रहे हैं तो वह भक्ति असफल होती है । प्यास से आकुल, व्याकुल हो तो व्यक्ति केवल पानी की आवश्यकता होती है । पानी से तृप्ति हो जाये तो जीवन में ऊर्जा का संचार होता है । नियम को धारण करने के पश्चात् नियम को अवश्य पालन करना चाहिए । भूख और प्यास लग जाय तो उसको समता से सहन करना और सोचना कि शरीर को प्यास लगती है जिस कार्य में मन, वचन और काया की एकरूपता हो वह धर्म कार्य है । भजन और ध्यान में जब इतनी उत्कट प्यास और नियम की दृढ़ता हो तो वही श्रद्धा है । 

परमात्मा को प्रभु महावीर स्वयं में विद्यमान बताया है । सब जीवों में परमात्मा विद्यमान है । एक आत्मा दूसरी आत्मा ऐसे ही मिलती है जैसे बूंद सागर में मिलती है । बूंद सागर में मिल जाए तो बंूद का अस्तित्व नहीं रहता । सरिता सागर में जाते ही विलीन हो जाती है । मानव के पास सभी साधन मौजूद है परन्तु कर्मों के आवरण से मुक्त हुए बिना परमात्मा के दर्शन नहीं हो सकते । रोटी बनाने के लिए पानी, अग्नि और व्यक्ति का परिश्रम भी है परन्तु आटा गुंथना नहीं आया तो रोटी बन नहीं सकती ऐसे ही जीव को मानव जन्म धर्म श्रवण आदि साधन विद्यमान है पर संयोग, परिश्रम भीतर की जागृति आनी जरूरी है । शरीर का पालन पोषण व्यक्ति अनंतकाल से करता आ रहा है मुक्ति आत्मा की जागृति से ही संभव   है । ध्यान साधना और  प्रार्थना से आत्म विशुद्धि होती है । धर्म जो करते हैं उन्हें कठिनाईयां भी आती है । साहसी व्यक्ति ही धर्म मार्ग पर चलता है ।

व्यक्ति पूजा नहीं गुण पूजा को ग्रहण करो । गुण पूजा करोगे तो प्रार्थना हो जाएगी, प्रार्थना आत्मा का भोजन है । जब नमोकार मंत्र का स्मरण करो तो भीतर नमन की भावना रखो । प्रार्थना में भाव रखो प्रभु मैं पापी, अधर्मी हूं । दिन भर में अठारह पापस्थानकों में से सेवन हो ही जाता है, प्रभु मेरे पापों से मुझे मुक्ति दे दो । पाप हो गया तो प्रभु चरणों में आलोचना कर लेना । आलोचना करते वक्त भीतर हीन भावना मत लाना । प्रभु ने फरमाया है आलोचना करते हैं तो कर्म मैल साफ हो जाती है । कपड़ा कितना ही मैला हो साबुन से साफ हो जाता है उसी प्रकार आलोचना हमारे भीतर को स्वच्छ करती है । गौशालक ने तीर्थंकर प्रभु महावीर की आलोचना की, अन्तिम समय तक वह प्रभु के लिए बुरे वचन कहता रहा, परन्तु अन्तिम समय में उसने आलोचना की तो वह भी पापो ंसे बच गया । 

 

तप निर्जरा का अमोघ साधन है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

अम्बाला शहर: 18 अक्टूबर, 2007: युग पुरूष, राष्ट्र संत, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- आत्म-दृष्टि जीव किसी वस्तु के प्रति आकांक्षा नहीं रखता । संसारी की हर वस्तु के प्रति आकांक्षा होती है । प्रभु महावीर की वाणी जीवन के हर पहलु को उजागर करती है । सूरज का प्रकाश पृथ्वी पर प्रकाशमान होता है । प्रकाश आपके घर में तभी प्रवेश करेगा जब आपका द्वार खुला हो । धर्म का प्रकाश प्रवाहित हो रहा है आवश्यकता मात्र भीतर के द्वार को उघाड़ने की है । कर्म के करने में व्यक्ति स्वतंत्र है । कर्म भोगने में व्यक्ति परतंत्र है । साते, उठत्े, चलते हर पल परमात्मा का स्मरण करना चाहिए जिससे जीवन शुद्ध, निर्मल होता है । परमात्मा के नाम अलग-अलग है किसी एक को स्मरण कर लेना । तिरने के लिए एक नाँव पर विचरण अनिवार्य है । हर व्यक्ति में परमात्मा बनने की शक्ति विद्यमान है । 

तीर्थंकर बनने से पूर्व अनंत-अनंत पुण्य कर्म किया होता है । अनेक व्यक्तियों को धर्म मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी है । तीर्थंकर पद को प्राप्त करने के 20 धर्म कार्य बताये हैं । सेवा करते-करते भी तीर्थंकर गोत्र बांधा जा सकता है । कर्मों के बंधन से छुटकारा पाने के लिए 12 प्रकार के तपो का प्रतिपादन ग्रन्थों में उल्लेखित है । धर्म का कार्य है प्रेम, वात्सल्य की वृद्धि करना है । धर्म से भीतर के कषाय-रूपी कचरे को जलाने का कार्य होता है । जन्मों-जन्मों के संस्कार लगे हुए उनसे छुटकारा पाना आसान नहीं है परन्तु कौनसा ऐसा कार्य है जो पुरूषार्थ और संकल्प के द्वारा सम्पूर्ण नहीं होता है । तप के द्वारा आत्मा की विशुद्धि होती है । कर्मों की निर्जरा का सरल साधन है गलतियों को स्वीकार करना । व्यक्ति जानते हुए तो कर्म बंधन करता है उसी प्रकार अनजाने में भी होती है । धर्म जिसके भीतर आया दुर्भावना आने से पूर्व जागृत हो जाता है । संकल्प करने के पश्चात् परीक्षा आती है । तप का संकल्प करना वीरता का कार्य है । प्रभु ने फरमाया है- निष्काम तप द्वारा निर्जरा होती है । 

आज मानव दो धाराओं में विभक्त है । शरीर को सजाने की दृष्टि आजकल अधिक मात्रा में होती है । शरीर को कितना भी शुद्ध बनाने का प्रयत्न करो । शरीर तो नश्वर है वह नष्ट होगा । कुछ व्यक्ति तप शरीर तपाने के लिए करते एवं कुछ आत्मा को जगाने के लिए करते हैं । श्रीमती निर्मल जैन ने लगातार 40 दिन तक भोजन का त्याग किया है । कुछ दिन व्रतों में पानी भी ग्रहण नहीं किया । तपस्विनी निर्मल जैन ने व्रतों को समता, शांति और दृढ़ संकल्प द्वारा आत्मा को जाग्रत करने का सफल कार्य किया है । 

 

मानव यथा-शक्ति मानव का सहयोग करे

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

अम्बाला शहर: 19 अक्टूबर, 2007: युग पुरूष, राष्ट्र संत, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- हमें देव-दुर्लभ मानव जन्म मिला है । शरीर को रोज सजाते संवारते हैं । शरीर के भीतर चेतनत्व को उज्ज्वल बनाना है । हर श्वांस में परमात्मा का नाम स्मरण करो । हर जीव में परमात्मा विद्यमान है । जीवन के भीतर जो आत्मा है शुद्ध है, बुद्ध है । परन्तु कर्मों का आवरण बढ़ता जा रहा है । आत्मा का स्नान कर मन, वचन, काया को मर्यादित करके जहाँ पर गलती हो उसको स्मरण करना । हमें आदत पड़ गई है कि हर बात की हम प्रतिक्रिया करते हैं । मानव किसी के गिरने पर हंसता है वह भी कर्म-बंधन का कारण है । गिरने वाले व्यक्ति को अज्ञानी समझकर स्वयं को ज्ञानी समझते हैं । गिरने वाले व्यक्ति के प्रति प्रेम, दया आ गई तो वही भाव प्रशस्त मार्ग की ओर मोड़ देते हैं । ज्ञानी और अज्ञानी संसारी और मुमुक्षु में केवल मात्र विवेक का अन्तर है । चलते उठते बात करते हुए यह ध्यान रखना कि मेरे कार्यों से किसी को पीड़ा तो नहीं पहुँच रही   है । प्रतिपल प्रतिक्षण आप कर्मों के मैल को धो सकते हो । समय को अधिक से अधिक सत्संग में लगाओ । सत्संग का अर्थ है सत्य का, धर्म का संग करना । मानव जन्म को धारण करे मानवता के सद्गुण आए । विचार व्यक्ति आचार से गिर रहा है किसी की इज्ज्त पर कोई आपŸिा आये तो उसकी अस्मत को बचाओ इससे श्रेष्ठ मानवता का धर्म नहीं है । वीतराग-धर्म को श्रावक-श्राविका साधु-साध्वी जिसने भी धारण कर लिया उससे अपार सुख प्राप्त होता है । दुःखी, पीड़ित, असहाय व्यक्ति के घाव पर मरहम लगाओ । आपŸिा विपŸिा हर व्यक्ति के जीवन में आती है । श्वांस का पल भर का भी भरोसा नहीं है । प्रभु महावीर और भगवान बुद्ध जब व्यक्ति मरता था तो शिक्षा देने के लिए मरघट में चले जाते और शिक्षा देते कि अमीर- गरीब साधु सुन्दर रूप सब यहाँ नष्ट होते हैं इसलिए शक्ति के रहते हुए धर्म कर लो । मानवता वही है जो अपने लिए ही नहीं बल्कि आस पड़ोस के सभी जीवों के प्रति जिन्दगी को न्यौछावर कर देना । एक संकल्प अवश्य करना कि मैं मानवता से सभी को सुखशांति प्रदान कर सकूं और इंसानियत धर्म में वृद्धि कर सकूं । किसी दुःखी व्यक्ति के आँसू पोंछ सकूँ । अधर्म में रत कुव्यसनों में प्रमŸा व्यक्ति को जीवन का सच्चा मार्ग धर्म दिखा सकूँ ।

 

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

अम्बाला शहर: 21 अक्टूबर, 2007: युग पुरूष, राष्ट्र संत, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- प्रभु को अपने अंग बनाने के लिए विनम्रता अर्थात् लघुता चाहिये । भरे हुए घड़े में कुछ भरा नहीं जा सकता । खाली घड़े में कुछ उड़ेला जा सकता है । बूंद बूंद में शक्ति है प्यास मिटाने की । उसी प्रकार सभी जीवों में परमात्मा विद्यमान है । परमात्मा के पास जाने के दो कदम है पहला कदम है मैं अज्ञानी हूँ और दूसरा कदम है मैं हूँ ही नहीं । 

आज का दिवस विजयादशमी का है । हर माह दो द्वादशियाँ आती है । परन्तु श्रीराम ने रावण पर विजय प्राप्त की । अच्छाई की बुराई पर जीत हुई थी । श्रीराम को राज्य प्राप्त हो रहा था परन्तु श्रीराम ने कहा विमल वंश में एक अनुचित बात है । छोटे भाईयों को भी राज्य प्राप्त होना चाहिये । अहंकार धर्म का शत्रु है । जहां पर अहंकार होता है वहां अधर्म   है । श्रीराम सारा कार्य परहित के लिए करते थे । श्रीराम का जीवन हमेशा से ही आदर्श रहा है । आज रावण हजारों है पर राम कहाँ पर हैं । आज रावण की भांति अहंकार, पद, यश के लिए लड़ रहे हैं परन्तु राम की भांति विनम्र त्यागी जीवन आदि नहीं प्राप्त हो रहे हैं । रावण के पुतले को जलाने की आवश्यकता नहीं है बल्कि भीतर की दुर्भावनाएं जलाना है । विजयादशमी के दिन अहंकार को छोड़ना जरूरी है ।

आदमी दान, सेवा, तप कर सकता है परन्तु उसे लिए अहंकार छोड़ना बमुश्किल है । महापुरूषों के जन्म दिन विजय पर्व आदि दिन शुभ कार्य करने चाहिए । शुभ कार्य वैसे तो कभी भी कर सकते हैं । धर्म दया करूणा दानशील आदि धर्म के अंग है । धर्म को जीवन का अंग बना  लो । अधर्म एक दुर्गुण है उसे अपनाओगे तो सारे दुर्गुण घर कर लेंगे । धर्म करने वाले की सहायता धर्म ही करता है । श्रीराम का जीवन सहज था और रावण का जीवन संघर्षमय था । धर्म सुधारने के लिए ठोकर लगा देते हैं । रावण ने अधर्म का संग लिया तो परिवार आदि राज्य नष्ट हो   गया । धर्म का सफल परिणाम सब कुछ प्राप्त हो ।

सच्चा सुख आत्म-तत्व में है । सुख कर्म-निर्जरा का फल है । किसी को पहले सुख दिया था तो आज सुख मिल रहा है । किसी को पहले दुःख दिया होगा तो आज दुःख मिल रहा है । तिर्यंच धर्म सुन सकते हैं परन्तु उसे धारण नहीं कर सकते । एक ही संकल्प भीतर हो कि मुझे भीतर जाना है । आज से कुछ कमाना है तो मोक्ष के लिए । मोक्ष के लिए भी कमाया जाता है । जैसे जो भी इनकम आए वहां पर भावना हो कि इससे मेरे परिवार का पालन पोषण हो, कोई अतिथि, साधु-साध्वी आए तो उनका लाभ मिले और बचा हुआ धन धर्म हेतु समर्पित करूं । कुछ भी करना तो केवल निर्जरा के लिए करना । हमारा जीवन निर्जरा के लिए हो । आज से सोएंगे तो भी निर्जरा के लिए । आंखे बंद करके जब आप स्व-स्थान पर लेट जाएं तो देखें कौन सो रहा है शरीर सो रहा है या आत्मा सो रही है । 

 

अहिंसा का संक्षिप्त अर्थ है प्रेम, मैत्री और करूणा

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

अम्बाला शहर: 22 अक्टूबर, 2007: युग पुरूष, राष्ट्र संत, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- परमात्मा की वाणी है कि सब प्राणियों को अपने समान समझो । जिस प्रकार आप सुख चाहते हैं । जैसे आपको दुःख अप्रिय है वेसे ही सब जीवों को दुःख अप्रिय । हर प्राणी में अनंत ऊर्जा निहित है उस ऊर्जा को बेकार मत करना बल्कि उसे ऊर्जा को ऊध्र्वगमन की ओर ले जाना ं सूरज, चन्द्रमा, वायु आदि प्राकृतिक वस्तुएं अगर न हो तो आप एक क्षण मात्र भी जीवित नहीं रह सकते हैं । भगवान महावीर का हार्द अहिंसा है । अहिंसा का संक्षिप्त और सारभूत अर्थ है- प्रेम, मैत्री, अरूणा । प्रेम शब्दों द्वारा प्रकट नहीं होता । प्रेम की तरंगे हृदय की अंतरस्थिति में पैदा होती है । प्रभु महावीर ने मौन में रहते हुए सभी जीवों के प्रति मैत्री रखी थी । प्रभु महावीर ने धर्म को युवाओं का धर्म बनाया है । वैदिक धर्म में धर्म की शुरूआत आधी जिन्दगी बिताने के बाद होती है । प्रभु ने कहा- जिन्दगी का कोई भरोसा नहीं है । युवा का अर्थ आयु से नहीं अपितु भीतर की जागृति से है । एक 17 वर्ष की आयु का व्यक्ति वृद्ध हो सकता है एवं एक 70 वर्ष की आयु का व्यक्ति युवा हो सकता है । हर कार्य के पीछे शक्ति, ऊर्जा और साहस की आवश्यकता है । 

मैत्री धर्म का मूल है । मैत्री प्रेम होगी तो क्षमा स्वतः प्रकट होती है । प्रभु के प्रांगण में शेर और बकरी दोनो ंपहुंचते हैं सब अपने वैर द्वेष मिट जाते है । धर्म बहुत उदार होता है परन्तु मानव के सम्प्रदायवाद के कारण धर्म संकुचित हो गया है । युवा शक्ति जिस समाज और धर्म में होती है, वह धर्म शीघ्र प्रगति करता है । धर्म का सार, जीवन का लक्ष्य सीधा परमात्मा से सम्पर्क स्थापित होना है । धर्म प्रगति के मूलभूत अंग है सेवा, साधना एवं परस्पर सहयोग । 

युवाजन यह तीनों बातें जल्दी उजागर कर देते हैं । युवाओं का मस्तिष्क नूतन विचारों का ग्रहण करने के लिए खुला होता है । साधना से ही सेवा होगी ओर संगठन मजबूत होता है । साधना को मानव भूलता जा रहा है । वास्तव में धर्म की जड़ साधना है । साधना जितनी साधक की सुदृढ़ होगी सेवा साधना रूपी पŸो, फल, फूल अधिक पल्लवित, पुष्पित  होगंे । साधना के द्वारा भीतर में शांति और समृद्धि आती है । त्याग, अहिंसा के द्वारा जीवन अधिक सफल हो सकता है । महात्मा गांधी ने त्याग किया परन्तु आज हर नोट के ऊपर गांधीजी की तस्वीर है एवं सम्मान के साथ गांधी को स्मरण किया जाता है । अहिंसा, मंगल की भावना और कामना के द्वारा वृद्धि को प्राप्त होती है । पशु, पक्षी, वृक्ष सभी के प्रति मंगल भावना का सूत्र सब साधकों जीवन में आना जरूरी है । 

 

धर्म से जीवन में नम्रता आती है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

अम्बाला शहर: 23 अक्टूबर, 2007: युग पुरूष, राष्ट्र संत, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- धर्म की शुरूआत नमन से होती है । नमन दुर्भाव-रूपी कचरे को नष्ट करता है । नमन व्यक्ति को गुण ग्रहण करने की दृष्टि प्रदान करता है । नमन बाह्य-रूप से हाथ जोड़ना सिर झुकाना है और भीतरी नमन, बुद्धि मन के संस्कार आदि समर्पित करना है । नमन करने से अहंकार विलीन हो जाता है । धर्म से जीवन में नम्रता आती है एवं अहंकार नहीं रहता । परिवार, राष्ट्र, समाज में नमन आ जाये तो टकराहट, लड़ाई नहीं होगी । आजकल तो छल छद्म से लड़ाई हो रही है । पुरातन समय में लड़ाई होती थी तो धर्मनीति से होती थी । गणधर गौतम ने प्रभु महावीर से प्रश्न पूछा कि- प्रभु माता पिता का कर्जा कैसे चुकाया जा सकता है । प्रभु ने फरमाया- माता पिता का हजारों प्रकार के तेलों से मालिश करें और भोजन आदि भी करवाएं परन्तु माता पिता का कर्जा चुकाया नहीं जा सकता । अधर्म में प्रवृŸा माता-पिता को धर्म में प्रवृŸा कर माता-पिता का कर्जा चुकाया जा सकता है । दूसरा प्रश्न पूछा- एक निर्धन असहाय व्यक्ति को कोई धन आदि देकर सहायता करे उसका निर्धन कैसे कर्जा कैसे चुकाया जा सकता है । प्रभु ने कहा- निर्धन धनी हो जाये और धनी निर्धन हो जाये जो पहले निर्धन था वह धन देकर भी धनी व्यक्ति का कर्जा चुकाया नहीं जा सकता परन्तु इसे धर्म मार्ग में लाये तो कर्जा चुकाया जा सकता । तीसरा प्रश्न पूछा- धर्माचार्य किसी व्यक्ति को सदुपदेश देकर सद्गति प्राप्त हो जाये अर्थात् देवगति प्राप्त करे वह देव धर्माचार्य को दुभिक्ष स्थिति में भोजन, वस्त्र आदि की सहायता करे फिर भी कर्जा चुकाया नहीं जा सकता । देव अगर धर्माचार्य के धर्म मार्ग से भटकते पर धर्मवाणी सुनाकर या बताकर केवल प्ररूपित धर्म में स्थित करें तब वह अपना कर्जा चुका सकता है । धर्म का बल धन के बल से कहीं अधिक  है । कठिन अवस्था में भी धर्म मार्ग पर अडिग रहना धार्मिक का लक्षण है । स्वाध्याय, शुद्ध सामायिक आदि मार्ग धर्म वाणी द्वारा श्रवण नहीं करना अपितु आचरण में लाना है । शास्त्रों में जीवन जीने की कला के अनमोल सूत्र प्रतिपादन किये गये हैं । महान् आचार्यों ने अपनी तीक्ष्ण बुद्धि से ग्रन्थों का अध्ययन और सम्पादन और विस्तृत व्याख्या की   है । धर्म के साधन सम्पूर्ण जगत में विद्यमान है । हर रोज शास्त्र का वाचन आवश्यक है । विशेष रूप से श्रावकों से संबंधित शास्त्र श्री उपासकदशांग सूत्र जिसके अन्तर्गत दस श्रावकों का वर्णन है जो धर्म मार्ग की ओर प्रवृŸा हुए उनके पास अपार सम्पत्ति होते हुए भी जीवन मर्यादित कर धर्म मार्ग में लगाया । शास्त्र के पठन पाठन से सद्मार्ग का ज्ञान होंता है एवं जीवन उज्ज्वल बनता है । शास्त्रों में जीवन से जुड़े प्रश्न भी है एवं प्रभु द्वारा प्रत्युत्तर देकर पथ प्रदर्शन भी है । मानव को आवश्यकता है प्रबल पुरूषार्थ करने की । पुरूषार्थ के द्वारा ही लक्ष्य की प्राप्ति संभव है ।

 

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

अम्बाला शहर: 24 अक्टूबर, 2007: युग पुरूष, राष्ट्र संत, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- अरहिंत प्रभु धर्म जहाज के समान तारणहारे हैं । भक्ति, प्रार्थना हृदय की गहराई से उठनी चाहिए । जो भक्ति दिल की अतल गहराई से की जाती है वही प्रभु के पास पहुँचती  है । मानव जीवन में भक्ति, प्रार्थना का बड़ा महŸव है । अरिहंत परमात्म हरपल यही संदेश दे रहे मानव को जागृत होना चाहिए । परमात्मा कहीं मन्दिर गुरूद्वारे में नहीं है अपितु स्वयं के भीतर है । ज्ञान हर आत्मा के भीतर है । कर्मों के आवरण के कारण हमें इसका अवबोध नहीं हो पाता । आत्मा कर्मों का संबंध आपस में मिला हुआ प्रतीत होता है परन्तु आत्मा और कर्म अलग-अलग है । लोहे के गोले को अग्नि में डाल दिया जाता है तो लोहे का गोला आग का गोला मालुम पड़ता है । तपे हुए लोहे के ऊपर पानी डाल दिया जाये तो वह अपनी स्वस्थिति में आ जाता है । पृथ्वी, पानी, अग्नि, वनस्पति आदि में आत्मा है यह सर्वज्ञ प्रभु की पानी है । हीरे को रेशम के कपड़े में बांधा उसको पेटी में रखा । पेटी को तिजोरी में रखा । तिजोरी कमरे में रख दी । इतने बंधन में बंधे होने के बावजूद उसकी सŸाा को नकारा नहीं जा सकता, इसी प्रकार कर्मों के बंधन में भी आत्मा का अस्तित्व है । चिड़िया से भी शिक्षा ग्रहण की जा सकती है । एक कवि ने चिड़िया की प्रवृŸिा को देखकर कविता की रचना की । कवि मकान में बैठा था उसने चिड़िया की उधेड़बुन को देखा । वह एक-एक तिनके से अपने मकान को बना रही थी । सुबह शाम के प्रयास के बाद कुछ समय में घोंसला तैयार हुआ फिर उसके बच्चे घोंसले में चहचहाने लगे । थोड़े दिन में वह बच्चे अपने पैरों पर खड़े होकर उड़ने लगे और दूर चले गये । कवि ने कहा है- बार-बार निहारने से मेरे जज्बात जुड़ गये तो मैंने कहा कि तुम माँ होकर भी तुम्हारे बच्चे तुम्हें क्यों छोड़ गये । चिड़िया ने मानव की प्रवृŸिा पर व्यंग करते हुए कहा कि मानव और चिड़िया में यही अन्तर है । मानव के बच्चे लालच मोह में पड़े हैं परन्तु पक्षी अनंत आकाश में भ्रमण करते हैं और मानव के बच्चे हक जताते   हैं । चिड़िया कहती है बच्चे मेरे पास क्यों रहेगी ? क्योंकि मेरे पास कोई जायदाद नहीं है । माता-पिता के पास धन-दौलत हो तो ही बच्चे उनके पास रहते हैं परन्तु जायदाद न हो तो उनका ध्यान तक नहीं रखते । मानव को चाहिए माता-पिता की निःस्वार्थ सेवा करें और जायदाद आदि के प्रति ममत्व नहीं रखें । मानव जन्म को महामानवता की ओर अग्रसर करना चाहिए । जो व्यक्ति आत्मा के बोध प्राप्त कर लेता है उसे सब कुछ प्राप्त हो जाता   है । जीसस कहते हैं- एक तरफ सारी दुनिया का वैभव है और दूसरी तरफ आत्म बोध है तो वह आत्मबोध का ही चुनाव करना चाहिये वास्तविकता है कि जगत में आत्मा ही सर्वश्रेष्ठ है ।

ध्यान प्रभावना

राष्ट्र संत, यगु पुरूष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज के दिशा निर्देशन में आत्म: ध्यान साधना कोर्स अविराम गति से गतिशील है । दिनांक 22 से 24 अक्टूबर, 2007 तक आत्म समाधि कोर्स एवं आत्म: ध्यान साधना कोर्स एडवांस-ा का सफल समापन हुआ । आत्म: समाधि कोर्स में और एडवांस-ा में अनेक साधकों ने भाग लिया एवं आत्मा की अनुभूति की और चलने का भीतरी मानस तैयार किया एवं साथ ही मानसिक शांति एवं शारीरिक स्वस्थता में सुधार की झलक प्राप्त  की । आत्म: समाधि कोर्स और एडवांस-ा का संचालन श्रमण संघीय मंत्री श्री शिरीष मुनि जी महाराज के मार्गदर्शन में चला । आत्म: समाधि कोर्स के अन्तर्गत आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय उद्बोधन में समाधि क्या है एवं मंत्र द्वारा समाधि में कैसे प्रवृŸा हुआ जा सकता है इसका सरल एवं विस्तृत ज्ञान साधकों को दिया । आत्म: ध्यान साधना कोर्स एडवांस-ाा कोर्स 25 से 28 अक्टूबर, 2007 तक चलेगा । 

 

अरिहंत के नाम स्मरण से पापों का नाश होता है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

अम्बाला शहर: 25 अक्टूबर, 2007: युग पुरूष, राष्ट्र संत, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- प्रभु अरिहंत नाम का जप स्मरण करना उनके अद्भुत अमूल्य गुणों को आमंत्रित करना है । गुलाब का नाम लेते ही उसकी तस्वीर उसकी सुगंध, उसकी कोमलता स्मृति-पटल पर उभरकर आती है । मिश्री का नाम लेते ही मुख मिठास से भर जाता है और कड़वाहट दूर होती है । अरिहंत के नामस्मरण से पापों का नाश होता है । क्रोध आये तो परमात्मा का नाम नहीं ले पायेंगे । शांत मन से अरहिंत का नाम आप वास्तव में ले पायेंगे । ध्यान भक्ति की बहुत सी विधियां हैं । हजारों तरीके से भोजन बनाया जाता है । संसार में सुख दुःख आये शारीरिक बीमारियाँ आती हैं तब आप भगवान को भूल जाते हैं । सच्चा भक्त सुख दुःख में भी धर्म और भगवान को नहीं भूलता । दुःख आये तो नरक की वेदनाओं को स्मरण करना । शरीर की बीमारियों को दूर करने के लिए मानव अथक परिश्रम करता है परन्तु आत्म शुद्धि के लिए हम र्को कार्य नहीं करते । परमात्मा का नाम लेते हुए कर्मों से मुक्त हो सकते हैं । हर क्षण में हम कर्म निर्जरा और कर्म बंधन कर लेते हैं । बोलते चलते उठते और बैठते हुए कर्म बंधन होता है । किसी व्यक्ति से भूल हो जाये तो हम हंसते हैं वह भी कर्म बंधन का कारण बनता है । जो जैसा कर्म करता है उसे वैसा फल मिलता है । जो किसी को दुःख देता है उसे दुःख आने वाला है । किसी की राह पर कांटे बिछाओगे तो कांटे आपकी राह पर  आयेंगे । भोजन करते हुए उद्देश्य पेट भरने का है तो कर्म बंधन हो जाता है । दुकान में कार्य करते हुए आप तोल कम करोगे तो वह भी आपको लुटेगा । यह निश्चत और प्रकृति का शाश्वत् नियम है । परिवार में परस्पर सहयोग, सौहार्द और विवेक हो तो परिवार वृद्धि   करेगा । साधक को नित्यक्रम में प्रातःकाल प्रार्थना करनी चाहिये और शाम को दिन के कार्य आदि का आकलन करना चाहिए । दिन में चैबीस घण्टों में आत्म स्वरूप में बीता वह सार्थक है । हर कार्य में शरीर और आत्मा का विभेद करते जाना चाहिये । शारीरिक कार्य करते हुए भोजन करते हुए हर समय ध्यान रखना कि कार्य शरीर कर रहा है आत्मा का स्वभाव तो मात्र जानना और देखना है । मानव जन्म में ही आप आत्म बोध कर संसार से मुक्त होने के लिए कर्म-निर्जरा कर सकते हो । 84 लाख जीवयोनियों में एक मात्र मानव सर्वश्रेष्ठ है । मानव जन्म की सार्थकता आत्मा को विशुद्ध कर परमात्मा बनाने में है जो साधक इस भाव को जान लेता है वही संसार से विमुक्त होने का प्रयास और संकल्प करता है । प्रभु महावीर ने आत्मा को परमात्मा बनाने का सफल और सरल साधन बताया है जीवन में प्रत्येक प्राणी के प्रति मैत्री, करूणा और समभाव रखो ।

 

धर्म से शांति तीनों कालों में प्राप्त होती है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

अम्बाला शहर: 26 अक्टूबर, 2007: युग पुरूष, राष्ट्र संत, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- हमारा जीवन किसी के काम आ जाए और सुख दुःख में सहारा बन सके यही जीवन की सार्थकता है । जीवन की हर श्वांस हर क्षण कम हो रही है । प्रत्येक श्वांस को स्वयं के लिए और दूसरों के सुखद जीवन में अनुप्राणित कर सके, यही पवित्र भाव मानव के मन में हो । जगत में दो ही खोजे हुई है एक धर्म की खोज और दूसरी है विज्ञान की खोज । धर्म की खोज आत्मा की ओर आकर्षित करती है एवं विज्ञान हमें बाह्य सुख साधन प्रदान करता है । विज्ञान ने अभी तक भूखमरी को दूर नहीं किया है परन्तु धर्म द्वारा शांति की प्राप्ति हुई है । बाह्य साधन तो आकृति मात्र है सुख तो व्यक्ति के मन में और आत्मा में है । विज्ञान ने जगत् में आश्चर्यजनक अनुसंधान किया है जिसकी कल्पना व्यक्ति कदापि नहीं कर सकता । आपकी प्रतीति सच्ची है तो समय का सदुपयोग आप धर्म ध्यान में करेंगे । अक्सर मानव समय को मनोरंजन में लगा देता है । विज्ञान के आविष्कार ने मानव को अहंकार दिया है परन्तु धर्म ने नम्रता और प्रसन्नता दी है । दुःख के कारण मानव स्वयं तैयार करता जो आप चाहते है वह आपको मिलेगा । पानी, धन, भोजन, शरीर जो भी मांगोगे वह मिलेगा परन्तु इन वस्तुओं में कोई सार नहीं है । चाह साधक को आत्म शुद्धि की रखनी चाहिए । साधक को दो सूत्र हमेशा ध्यान में रखने चाहिए एक में अज्ञानी हूँ । अपने आपको अज्ञानी समझने वाला सम्यक् ज्ञान की ओर अग्रसर होगा । दूसरा अमूल्य सूत्र है में हूँ ही नहीं । दोनों सूत्रों का निरन्तर चिन्तन करेंगे तो भीतर में निर्मलता उजागर होगी । दुनिया का सर्वश्रेष्ठ पुरस्कार नोबल प्राईज है प्रसिद्ध वैज्ञानिकों ने सर्वोत्तम पुरस्कार को प्राप्त करके आत्महत्या की है । आत्महत्या धर्म दृष्टि से नरक का द्वार है । आत्म हत्या व्यक्ति तनाव में दुःख के चरम पर पहुंचकर करता है । विज्ञान की अधिकता से मनुष्य शरीर के प्रति मोह को बढ़ाता है । धर्म अंत समय में शरीर के प्रति मोह भी कम करता है । प्रभु महावीर ने ममत्व अन्तिम समय में कम करने की साधना को संथारा कहा है । साँप जिस प्रकार केंचुली को छोड़ देता है उसी प्रकार एक दिन शरीर छूटना है परन्तु मृत्यु भी प्रसन्नता बने उसे साधक समता, शांति के साथ स्वीकार करें, इसलिए जैन साधु एवं गृहस्थ संथारे की साधना करते हैं । विज्ञान से शांति प्राप्त न अतीत में हुई है न वर्तमान में हो रही है एवं अनागत का काल में होगी । धर्म के द्वारा पूर्व समय में महान् आत्माओं ने सुख पाया है । वर्तमान में भी प्राप्त कर रहे हैं एवं आने वाला समय भी धर्म का स्वर्णिम है इसलिए मानव को सुख की खोज धर्म में रमण करके मिल सकती है ।  ग्रन्थों, ऋषि मुनियों की वाणी का सार है- हम आत्मा को परमात्मा बनाये, यही मोक्षपूरी का शाश्वत् द्वार है । 

 

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

अम्बाला शहर: 27 अक्टूबर, 2007: युग पुरूष, राष्ट्र संत, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- अरिहंत परमात्मा की कृपा से शाश्वत् सुख प्राप्त करने की चाबी प्राप्त होती है । शाश्वत् सुख से अभिप्राय है धर्म का सुख है । जो सुख बढ़ता चला जाये वह सौभाग्य का सूचक है । प्रभु महावीर के पास धन-दौलत नहीं थी परन्तु फिर भी समृद्ध थे । ध्यान तप आदि धर्म-साधनों द्वारा प्राप्त होता है वह भीतर की समृद्धि है । प्रभु महावीर कहते हैं संसार एक सागर है उसमें जन्म लेने वाले जीव लहरों की भांति जन्म लेते हैं और मृत्यु को प्राप्त हो जाते है । धर्म की धारण करने वाले जीव संसार समुद्र से पार हो जाते हैं । धर्म प्रत्येक श्वांस में  है । किसी व्यक्ति को पीड़ित, दुःखित है उसको देकर हृदय कंपित हो जाता है वह धर्म का सद्गुण है । पुराणों का सार है ‘‘परोपकाराय पुण्याय और पापाय परपीडनम्’’ । संत तुलसीजी भी कहते हैं- परहित सरस धरम नहीं भाई, परपीड़ा बन नहीं अधमाई ।’’

प्रभु महावीर की अहिंसा तीनों जगत् पर आधारित है । सभी प्राणियों में आत्मा है उनको भी सुख दुःख है इसलिए प्रत्येक प्राणी के प्रति प्रेम, मैत्री का भाव रखो । धर्म धारण करने से प्राणियों में परस्पर सौहार्द की वृद्धि होती है । शारीरिक बीमारियों को दूर करने के लिए डाॅक्टर के पास जाते हैं अगर धर्म के अभाव आ जाये तब अरिहंत एवं गुरू की शरण में चले जाओ । आपके भीतर से माया, कपट की गांठ को तुरन्त निकालकर हल्के हो जाओ । एक रस्सी में गांठ पड़ जाए तो रस्सी में उलझन हो जाती है । रस्सी की उलझन को समाप्त करने के लिए गांठ को धीरे-2 निकालना चाहिए । गांठ का पुनः बंधन न हो इसके लिए महापुरूषों ग्रन्थों ने कहा है हरपल जागरूक रहो । गांठ की उलझन को निकालने का साधन प्रभु महावीर क्षमापना की साधना बतलाई है । साधु प्रतिदिन दो समय सुबह एवं शाम गलतियों को स्वीकार और क्षमापना का क्रम चलता है । धर्म में जातिगत एवं सम्प्रदायगत सभी भेद-भाव विलीन हो जाते हैं । धर्म में महŸव प्रेम, करूणा और क्षमा का है । महासाध्वी संथारा साध्किा श्री स्वर्णकान्ता जी महाराज ने समाज शिष्य समुदाय को धर्म एवं अनुशासन प्रदान किया । धन शाश्वत् नहीं है अपितु धर्म शाश्वत् है । साध्वी श्री स्वर्णकान्ता जी महाराज के दीक्षा जयंती पर उनके द्वारा की गई सेवा का हम संघ समाज की सेवा में हार्दिक अनुमोदना करते हैं । दीक्षा जयंती मनाना तभी सार्थक है जब उनके गुणों को धारण किया जा सके । दीक्षा जयंती के अवसर पर अम्बाला निवासियों को धर्म वृद्धि हेतु सजोड़े सामायिक एवं परोपकारी कार्य भंडारे का आयोजन भी सुन्दर रहा । साध्वीजी के जीवन से प्रेरणा प्राप्त करने के लिए प्रश्नमंच आयोजित किया गया ।

 

धर्म संसार सागर से पार होने का आधार है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

अम्बाला शहर: 28 अक्टूबर, 2007: युग पुरूष, राष्ट्र संत, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- अरिहंत प्रभु की वाणी है- इस संसार में जरा मरण रूप वेग प्रवाहित है । संसार को समुद्र की उपमा दी गई है । संसार में लहरें उठती हैं और विलीन हो जाती हैं । संसार में जीव जन्म लेते हैं और मरण को प्राप्त होते हैं । संसार के इस वेग से मुक्त होने का एकमात्र तरीका है धर्मद्वीप । नाटक में अलग-2 रोल अलग-अलग व्यक्तियों को मिलते हैं, उसी प्रकार संसार एक नाटक के समान है । उस नाटक को केवल समदृष्टी से स्वीकार करते चले  जाओ । अरस्तु का वचन है मरण न हो तो व्यक्ति धर्म ही नहीं कर सकता । वास्तव में व्यक्ति सिद्धान्ततः मृत्यु के भय के कारण धर्म करते हैं । चार्वाक से व्यक्ति अधोगति में जाता है । वीतराग धर्म से व्यक्ति ऊध्र्वगमन को प्राप्त होता है । पशु-पक्षियों को मृत्यु का भान नहीं है । मानव मृत्यु को जानते हुए अपने को मृत्यु से अलग करता है । दूसरे व्यक्ति की मृत्यु को देखकर श्मशान भूमि में दूसरों के शरीर को जलते देखकर अपने विषय में अवश्य   सोचना । मौत आएगी ये निश्चित है परन्तु कब आएगी पता नहीं है । गौतम बुद्ध को मृत्यु देखकर वैराग्य हो गया । गौतम बुद्ध के पास एक संत आया और कहा कि यह बुद्ध बनेगा । 80 वर्ष के बुजुर्ग ने छोटे से बच्चे को नमन किया और आँखों में अश्रु आए क्योंकि आयु के अन्तिम क्षणों में विचरण कर रहा था । जब सिद्धार्थ गौतम बुद्ध बनेंगे वह जीवित नहीं होगा । पिता ने सन्यास न ले लिया सिद्धार्थ इसके बहुत उपाय किये परन्तु जो होना हो वह होता   है । एक बार सारथी को लेकर एक राजा गांव में भ्रमण कर रहा थी तब बूढ़े व्यक्ति की दयनीय स्थिति देखी । मृत्यु को प्राप्त होने के पश्चात् लोग उसको उठाकर ले जा रहे थे उसको देखकर प्रश्न पूछा मैं भी बूढ़ा होऊँगा और मेरी भी मृत्यु होगी । सारथी ने कहा- इस जगत में जो जन्म लेता है वह बूढ़ा भी होता है और मृत्यु को भी प्राप्त कर लेता है । बुद्ध के मार्ग पर प्रवेश कर लिया और चार आर्य सत्यों का प्रतिपादन कर स्वयं मुक्त हुए और अनेक लोगों को मुक्ति का मार्ग बताया । मानव की तृष्णा खत्म नहीं होती है । बूढ़ा व्यक्ति भी कहीं से सुख की खोज करता है । धर्म इस प्रवाह से व्यक्ति को मुक्त करने का प्रबल आधार है । जैने ही मृत्यु चेतन बनती है वैसे ही धर्म का जन्म होता है जैसे ही यह प्रतीति साफ हो जाती है कि मृत्यु निश्चित है वैसे ही जीवन का सारा अर्थ बदल जाता है क्योंकि अगर मृत्यु निश्चित है तो फिर जीवन की क्षुद्रताओं में हम जीते हैं उनका सारा अर्थ खो जाता है । देखा है जिस प्रकार रेलगाड़ी के दो डिब्बों के बीच बफर होते हैं जो डिब्बे के अन्दर रहे हुए लोगों की सुरक्षा प्रदान करते हैं जिससे किसी को धक्के का ख्याल नहीं आता उसी प्रकार मृत्यु का बोध व्यक्ति को नहीं होता है । 

 

मनुष्य अपने जीवन का भाग्य निर्माता है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

अम्बाला शहर: 29 अक्टूबर, 2007: युग पुरुष, राष्ट्र संत, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- मनुष्य अपने जीवन का भाग्य निर्माता है । इस संसार में हर प्रकार के जीव हैं और अच्छी बुरी दोनों प्रकार की प्रवृŸिायाँ है । समुद्र मंथन में विष एवं अमृत दोनों निकले । अमृत को सब पीना चाहते थे परन्तु विषय को कोई पीना नहीं चाहता । शिव शंकर ने विषय को पीया । संसार में एक मात्र अमृत है वह है वीतराग धर्म- आप अपने विचारों को देखें कि कहाँ पर धर्म से अलग हो रहे हैं । दुनिया में दो ही दृष्टियां हैं एक है वीतराग-दृष्टि और दूसरी संसार-दृष्टि । वीतराग-दृष्टि में व्यक्ति, वस्तु समदृष्टिगोचर होती है । संसारी आत्मा बाह्य पदार्थों में प्रिय अप्रिय की खोज करता है । संसार में रहने का सबका मन करता है । संसार लुभावना लगता है । प्रभु महावीर कहते हैं जरा-मरण रूप यह संसार प्रवाहित हो रहा है । संसार में कोई भी वस्तु व्यक्ति टिकाऊ नहीं है । बच्चे का जन्म होता है तो साथ ही बुढ़ापे की शुरूआत होती है । हमें वह सूक्ष्म प्रक्रिया दिखाई नहीं पड़ती है । जन्म-मरण के प्रवाह में व्यक्ति उलझ जाता है और उसका बोध नहीं होता । धर्म है शाश्वत् चेतना । धर्म का परिवर्तन नहीं होता परन्तु शरीर मन बुद्धि संस्कार आदि परिवर्तित होते हैं । कर्मों के अनुसार आत्मा को गति प्राप्त होती है । हमारा जीवन दीये के लौ की भांति है । दीये की लौ निकलती है और विलीन हो जाती है । बार-बार नयी लौ का जन्म होता है । सामायिक, माला, पूजा आदि धर्म के साधन है । आत्मा को जागृत करने के उपाय मात्र हैं । प्रभु महावीर ने अनमोल सूत्र पर चिन्तन मनन करके जीवन परिवर्तन हो सकता है ऐस उपाय बतलाया । विदेशी विचारक कहता है कि नदी में पानी प्रवाहित हो रहा है उसमें व्यक्ति पैर रखे और समझे कि यह पानी वही है परन्तु यह नहीं हो सकता है क्योंकि पानी तो बह रहा है । प्रभु महावीर से प्रश्न पूछा गया कि धर्म को कैसे प्राप्त किया जाये । प्रभु ने फरमाया- बुद्धों का यही मार्ग है सारे पापकारी कार्यों का त्याग करना । मन से किसी का बुरा सोचना किसी का बुरा बोलना और शरीर से कष्ट देना पाप है । मांसाहार स्वार्थ वृŸिा आदि भी पाप कार्य है । पुण्य कार्य की सम्पदा को बढ़ाना । मन से वचन से काया से किसी की भलाई करना पुण्य कार्य  है । जिस कार्य के करने से आत्मा को शांति प्राप्त हो वह पुण्य कार्य की कसौटी है । पुण्य पाप का थर्मामीटर मानव की आत्मा में ही है । चिŸा पर संस्कारों की धूल जमी है उसे वीतराग भाव बारह भावनाओं से चिŸा को शुद्ध करते रहना । धर्म कार्य करने के लिए किसी प्रकार के अध्ययन की आवश्यकता नहीं है इतना सरल मार्ग धर्म को प्राप्त करने का प्रभु ने बताया है ।

 

जैसा खाओगे अन्न वैसा होगा मन

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

अम्बाला शहर: 30 अक्टूबर, 2007: युग पुरुष, राष्ट्र संत, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- मनुष्य का जीवन स्वच्छ सुन्दर बने इसलिए प्रवचन श्रवण एक सुन्दर माध्यम है । आहार का जीवन पर गहरा प्रभाव है । कहावत है कि जैसा खावे अन्न वैसा होवे मन । जैसा हम खाते पीते हैं उसके अनुसार मन के विचार उत्पन्न होते हैं और वैसा ही आचारहोता है । भोजन करने से पूर्व आपके पास अन्न पहुंचने की एक लम्बी यात्रा है उसे जानें और कृतज्ञतापूर्वक  प्रार्थना करें । हजार लोगों की मेहनत के परिणाम से वस्तु हमारे पास पहुँचते हैं । एक संत ध्यान में लीन थे परन्तु ध्यान में नवयुवती बार-बार प्रवेश कर बाधा पहुंचा रही थी । गुरूजी के समक्ष अपनी समस्या शिष्य ने रखी । गुरू ने अनुसंधान किया तो पता लगा कि जहाँ से भोजन प्राप्त किया था उस घर में पैसे के लालच में अपनी बेटी की शादी वृद्ध से कर दी । शादी करने के बाद पछतावा होने लगा तो उसी पैसे से लंगर आयोजन किया । उसी भोजन का प्राप्त करने के साधन के कारण ध्यान में परेशानी झेलनी पड़ी । मानव का मन जितना शुद्ध होगा उसे परेशानी का पता उतने जल्दी चलता है । जैसे सफेद कपड़े पर छोटा सा भी काला दाग पता चल जाता है । आचार्य हरिभद्र सूरी कहते हैं- न्याय से धन अर्जन करना चाहिए । पूनिया श्रावक की आजीविका शुद्ध थी उसी का परिणाम था कि उनका मन सामायिक में लगता था । संत कबीर जुलाहे का कार्य करते थे । सब कार्य लेने देने बनाने में राम नाम लेते थे । सब अपने कार्य राम के चरणों में समर्पित करते थे । संत कबीर प्रार्थना करते थे कि- सांई इतना दीजिए जामे कुटुम्ब समाय ।

मैं भी भूखा न रहूँ, पहुँना भी भूखा न जाय ।।

आजीविका अर्जन करते हुए इतना धन मिले कि परिवार आसानी से चल सके । मैं भी भूखा न रहूँ मेहमान भी खाली हाथ न जाये । व्यापार करते समय एवं भोजन शुद्ध भावों से करना चाहिए । अतिथि को देवता के रूप में स्वीकार किया है । अतिथि आये तो प्रसन्न मन से स्वीकार करना चाहिए । कपड़े और मकान के बगैर पशु-पक्षी मानव आदि समस्त जीव रह रहे हैं यह हमें दिखाई पड़ता है । वस्त्र और निवास के बिना रहा जा सकता है । भोजन प्राणी मात्र का आवश्यक साधन है इसके बगैर जीव अधिक समय तक जीवित नहीं रह सकता है । भोजन कैसे और क्या लेना है यह जानकारी आज के लोगों को आवश्यक है । आजकल चीजें तो बहुत बन रही हैं परन्तु उसमें गुणवŸाा नाम मात्र की है । भोजन ग्रहण करने के बाद उसकी तीन यांत्रिक प्रक्रिया है बेकार व्यर्थ के पदार्थ को शरीर बाहर निकाल देता   है । सूक्ष्म भोजन मन का निर्माण करता है, उससे सूक्ष्म भाग रक्त मज्जा वीर्य आदि बनते   हैं । सात्विक भोजन से सात्विक मन बनता है । तामसिक मन से तामसिक है और राजसिक भोजन से मन राजसिक बनता है । 

 

देह मन्दिर बन सकता है अगर भोजन शुद्ध हो

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

अम्बाला शहर: 31 अक्टूबर, 2007: युग पुरुष, राष्ट्र संत, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- प्रभु महावीर ने कहा है शरीर एक नाव हैं एवं जीव नाविक है । महर्षिजन वह हैं जिन्होंने जीवन को जान लिया है शरीर को प्रभु महावीर ने बहुत आदर दिया है । नाव में छिद्र है नाव कमजोर हो तो उस नाव से सागर को पार नहीं किया जा सकता । शरीर बलशाली हो तो भौतिक और अध्यात्मिक दोनों कार्य सुगमता के साथ हो जाते हैं । धर्म को प्रभु महावीर ने स्वस्थ शरीर और युवकों से जोड़ा है । वीर हनुमान में जितनी शक्ति है उतनी हर जीव में है परन्तु प्रसुप्त है । पशु-पक्षी शरीर का ध्यान रखते हैं परन्तु मानव ध्यान नहीं रखता । पशु पक्षियों को बीमारियाँ हो जाए तो वह भोजन छोड़ देते हैं । मनुष्य दवाईयां ग्रहण करता है परन्तु भोजन के ऊपर उसका ध्यान नहीं है । भोजन की जानकारी मानव प्राप्त कर ले कि कैसे खाना है क्या खाना है ? तो वह बिना औषधियों के स्वस्थ प्रसन्न रह सकता है । पुरातन समय में बीमार होने के बाद बुजुर्ग भोजन छोड़ देते थे । मनुष्य पेट को कचरे का डिब्बा बनाता जा रहा है और जो भी स्वाद लगता है उसे पेट में डाल रहा है । शरीर को भोजन जैसा दोगे उसका वह तुरन्त प्रभाव सामने आता है । उत्तेजक पदार्थों के सेवन से उत्तेजना आती है । शरीर रसायन की भांति है उसका तुरन्त प्रभाव शरीर पर पड़ता   है । शरीर को स्वस्थ रखना चाहते हैं, शरीर को साधना लायक बनाना है तो साधक को भोजन पर नियंत्रण आवश्यक है । देह भोजन के नियंत्रण से मन्दिर के समान पूज्नीय बन सकता है । भोजन की मात्रा निश्चित करो । शरीर स्वस्थता की प्रथम सूत्र है । दूसरा सूत्र है भोजन करते समय और बनाते समय भावदशा को पवित्र रखो इसलिए ऋषि मुनि कहते हंै, भोजन से पूर्व इष्ट प्रभु का स्मरण करो । जब चिŸा शांत हो तब भोजन करना और बनाना चाहिए । अहंकार क्रोध आदि दुर्भाव हो तो भोजन आदि क्रियाओं के लिए थोड़ी देर रूक जाना अगर नहीं रूकोगे तो अहंकार आदि बढ़ेगा और भोजन विष का रूप ले लेगा । वैज्ञानिकों ने इसका प्रयोग किया है कि हाथों से ऊर्जा प्रवाहित होती है । मन शांत करने के लिए चिन्तन ध्यान मनन करना चाहिए । दुर्भावना आने का मूल कारण हम स्वयं हैं ।

पी0के0आर0 जैन स्कूल में आत्म: चेतना कोर्स

एकाग्रता ध्यान नहीं । ध्यान का प्रतिफल एकाग्रता है । ध्यान के द्वारा हम मन बुद्धि विचारों पर इतना संतुलन प्राप्त कर लेते हैं कि एकाग्रता स्वयं सध जाती है । जीवन को सही दिशा देने के लिए नित्य प्रति ध्यान करना परमावश्यक है । यह विचार मधुर गायक श्री शुभम् मुनि जी महाराज ने पी0के0आर0 जैन पब्लिक स्कूल में 10 वीं के विद्यार्थियों के समक्ष रखें ।

उन्होंने कहा कि- यह वर्ष आपकी जिन्दगी का एक अनमोल वर्ष है । केरियर बनाने का वर्ष है और यही उम्र परमात्मा की ओर ध्यान लगाने की है । इस उम्र में हमारा ध्यान सहजता से परमात्मा की ओर लग जाएगा । उन्होंने विद्यार्थियों को पढ़ाई के गुर सिखाते हुए कहा कि- अगर हम वर्ष के प्रथम दिन से पढ़ाई करते हैं तो कभी भी हम फेल नहीं हो  सकते । पढ़ाई की सफलता के लिए वर्ष के प्रथम दिन से मेहनत करनी आवश्यक है । पहले दिन से की गई पढ़ाई सफलता की ओर अवश्य ले जाती है । 

महाराजश्रीजी ने बच्चों को एकाग्रता और शारीरिक मानसिक आध्यात्मिक शांति के लिए प्राणायाम, योग व ध्यान का प्रयोगात्मक अभ्यास करवाया । बच्चों को महानता की शिक्षा देते हुए उन्होंने हर बच्चे को महान से अवगत कराया । साथ ही जीवन में सकारात्मक सोच, सत्य भाषण, सबका सहयोग करने की प्रेरणा प्रदान की । 

इस शिविर में करीब 111 बच्चों ने भाग लिया । शिविर में श्रीमती दामिनी मल्होत्रा, श्रीमी रेणु जैन का विशेष सहयोग रहा । इसके साथ ही 7 वीं क्लास पी0के0आर0 गल्र्स स्कूल में भी आत्म: चेतना कोर्स का आयोजन मुनिश्री के सान्निध्य में हुआ जिसमें 200 बालिकाओं ने भाग लेकर जीवन जीने की कला का प्रशिक्षण प्राप्त किया । 

ज्मद ामले व िस्पमि

1- अपेक्षा {हक से मांगना} से आनन्द कम होता है ।

2- वर्तमान के क्षणों में जीवन बिताना {खुश रहना चाहते हो} ।

3- 100: देना चाहिए । { अगर कम दिया तो खटकता रहेगा} ।

4- जिम्मेदारी लेने से ताकत बढ़ती है, शिकायत से शक्ति नाश होती है । 

5- एक की वजह से दूसरे का अस्तित्व है ।

6- खुश रहने के लिए क्वदज डपग ।दलजीपदहण्

7-खुश कब रहना है- {छवू अभी} ।

8- वर्तमान अटल है । बुद्धिमानी इसी में है स्वीकार करें, आगे बढ़ें । कई चीजे बातें स्थान आपको पसन्द नहीं मगर वर्तमान में है, उसे स्वीकार करें रूकें नहीं आगे बढ़ें । यह मन सोचे क्या हुआ कैसे हुआ कब हुआ क्यों हुआ अरे-अरे छोड़ों ये न सोचो ।

9- अगर कोई बहुत बड़ा अन्याय आपके साथ हो रहा है तो मन को व्याकुल न करें । न ही उस बात का चिन्तन करें । याद रखें ऐसा हुआ तो गडढे में गिरते जाएंगे । शांत व मस्त होकर इस चिन्तन व चिन्ता को कचरे के डिब्बे में डालकर आगे बढ़ते जाएं क्योंकि वर्तमान अटल है । सुखशांति आनंद हमारा भीतर का स्वभाव है इसलिए खुशी बनाए रखें ।

10- जिन चीजों को भूलना चाहते हो वह ज्यादा याद आएगी । बात पकड़ो नहीं । आई- गई कर दो । रोकना नहीं- रोकने से बढ़ेगी- बढ़ने से फैलेगी । छमहंजपअम मदमतहिल बनेगी । याद रखो कि च्वेपजपअम ज्ीपदापदह ही भव सागर से पार कर सकती है । 

नोट:- जो याद रह जाता है वह कर्म है । जो बार-बार चिन्तन करके फैलता है वह कर्म का फल है । मैत्री भाव करके आगे बढ़ते जाएं ।

भोजन के तीन प्रकार है सात्विक, राजसिक, तामसिक

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

अम्बाला शहर: 1 नवम्बर, 2007: युग पुरुष, राष्ट्र संत, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- धर्म का आधार है सम्यक्-दर्शन । दृष्टि आपकी शरीर पर है अथवा आत्मा पर है । नब्बे प्रतिशत लोग शरीर के लिए जीवन व्यतीत करते हैं । शरीर का अर्थ मन, बुद्धि, संस्कार आदि है । अंत में राग आसक्ति के सिवाय कुछ नजर नहीं आता है । शरीर में रहते हुए कुछ लोग आत्मा के लिए समय व्यतीत करते हैं । जीवन आत्मा को उद्धार करने के लिए लगाते हैं । सम्यग् दर्शन का दूसरा अर्थ आत्म-दृष्टि है । संत कबीर, मीरा आदि संसार में रहते हुए भी महान् थे । बचपन, जवानी, बुढ़ापा आदि शरीर की अवस्थाएं हैं । आत्मा के अनंत-अनंत सम्पदा के समक्ष सभी बाह्य संपदाएं बेकार हैंु । हमारे जीवन का लक्ष्य देह में रहते हुए आत्म-बोध करना है एवं व्यक्ति 23 घण्टे कड़ी मेहनत परिवार शरीर के लिए करते हैं परन्तु 1 घण्टे के लिए ध्यान नहीं कर सकते । महापुरूषों ने इसलिए मन, वाणी, शरीर को साधने की बात कही है । काया और मन को साधने का एक महत्वपूर्ण साधन आहार है । जीवन की दृष्टि बदलो । जीवन में सुख दुःख दोनों हैं । जीवन मिला जुला होता है । जीवन अनार के दाने की भांति है । अनार को प्रकृति की देर होती है कि वह स्वाद में खट्टा मीठा होता है । किसी के जीवन या मात्रा में दुःख ही दुःख अथवा हानि ही हानि नहीं हुई है या केवल सुख ही सुख लाभ ही लाभ हो ऐसा नहीं है । संत पुरूष सुख दुःख से ऊपर उठकर शाश्वत् सुख की ओर बढ़े हैं । नीरो एवं सम्राट् को खाने का शौकिन था । बीस बार दिन में खाता था । डाॅक्टर रखे थे वे अच्छे भोजन को बाहर करवाते थे और वह सम्राट् पुनः भोजन कर लेता   था । हम भी दिन में बीस बार तो नहीं परन्तु पांच छः बार से अधिक भोजन करते हैं और भोजन को अधिक से अधिक वेस्ट करते हैं । 

तीन प्रकार का भोजन मानव करता है । तामसिक, राजसिक और सात्विक । जो जैसा मनुष्य है वह वैसा भोजन करेगा और दूसरे अर्थों में जो जैसा भोजन खाएगा उसी प्रवृत्ति का हो जाता है । तामसिक से अभिप्राय आलसी प्रवृत्ति और आलस को बढ़ाने वाले भोजन से   है । बासी, गरिष्ठ भोजन आदि तामसिक भोजन के अन्तर्गत आते हैं । राजसिक भोजन से चंचलता उद्विग्नता आती है । लाल मिर्च नमक गरमा-गरम भोजन, तला हुआ भोजन, चाय आदि राजसिक भोजन के प्रतीक हैं । विवाह शादियों में अधिकतम तामसिक राजसिक भोजन बनाया जाता है । राजसिक, तामसिक दोनों हानिकारक है । तीसरा और उत्तम सात्विक भोजन है । सात्विक भोजन ऊर्जा शांती को प्रदान करता है । जिस पदार्थ में सत्व हो वह सात्विक भोजन है । सात्विक भोजन स्वस्थता की निशानी है । सीधा सादा और ताजा भोजन सात्विक भोजन है । सात्विक भोजन भी राजसिक भोजन बन सकता है । दूध सात्विक है अगर मात्रा सम्यक् है । दूध की अधिक मात्रा भी राजसिक बन जाती है । मात्रा को चार हिस्सों में बांटा गया है । 2 हिस्सों में पानी एवं तीसरे में भोजन और चैथा हिस्सा हवा का  है । भोजन करते हुए शांत भाव रखोगे तो सात्विक भोजन अधिक उपयोगी हो जाएगा । वैज्ञानिकों ने भोजन करते हुए अगर भाव शुभ है तो वह नुकसानदेह होते हैं इसका प्रयोग पशुओं पर किया है । भोजन ठीक हो गया तो मन, बुद्धि ठीक होंगे और दृष्टिकोण दृढ़ होगा यह जीवन को विकसित करने में सहायक है ।

ध्यान धर्म का प्रायोगिक रूप है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

अम्बाला शहर: 2 नवम्बर, 2007: युग पुरुष, राष्ट्र संत, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- परमात्मा अथवा अपने इष्ट गुरु के चरणों में सब कुछ समर्पित करें । समर्पित करने वाले  ऐसा चरमोत्कर्ष रुप मात्र अरिहंत एवं सिद्ध ही हैं । प्रार्थना, भक्ति, साायिक आदि से पूर्व जीवन को निर्मल बना लो । निर्मल बनाने के लिए विनम्र बनना जरूरी । अहंकार ज्ञान और दान आदि जिसके कारण भी है वह बाधक है परमात्म प्राप्त के प्रति । दो बातें जीवन में स्मरण रखना परमात्मा और मौत । कोई अपने अन्तिम समय में मौत के समय झूठ, चोरी आदि कुछ नहीं कर सकता । दुःख आदि का कारण व्यक्ति का ज्ञान जीवन या पूर्वजन्म का कर्म  है । मानव देह और धर्म का वातावरण मनुष्य को सौभाग्य से प्राप्त होता है । मानव देह अमूल्य है इसका सदुपयोग कर सकें तो देह पूजनीय बन जाएगा । वीतराग साधना का सार है सब करो परन्तु अपना मत मानों । माँ, नर्स से अधिक सेवा करती है पर धाय माँ, माँ नहीं बन सकती है । 

धाय माँ जानती है बेटा किसी और का है । माँ और धाय माँ में अन्तर देखकर निर्णय न कर पाओगे । धाय माँ वास्तव में माँ प्रतीत होगी । संत कबीर संसार के सभी कार्य करते हुए भी महात्मा बने हैं । कबीर ने ज्ञान भी प्राप्त कर लिया । कुछ भी करो परन्तु भेद-विज्ञान के साथ में करो । संसार को परिवार को अपना मत मानों । सारी जिम्मेदारियां पूरी करो शरीर अपना नहीं है तो घर, परिवार, बेटा कोई अपना नहीं हो सकता है । गुरू और परमात्मा से आपको संबंध स्थापित करना है । धर्म को जीवन में उतारने का साधन है भेद-विज्ञान । कहने की नहीं अपितु भीतर से विवेक रखना है । पति पत्नी में आपस में सौहार्द का भाव बना रहे । जितना धर्म करोगे उतनी भीतर से मैत्री आएगी । भेद-विज्ञान यह कहता है कि जीवन का सत्व समझो । जीवन का सत्य यह है कि शरीर नश्वर है । जैसा जिसका कर्म संस्कार है उसे वैसा ही फल प्राप्त होता है । कोई अपना दोषी नहीं है । मन्दिर, धर्म स्थान किसी व्यक्ति विशेष का नहीं है । धर्म सबक होता है । धर्म वीतराग धर्म है जहाँ पर न मेरा है न तेरा बल्कि जो प्रेममय होना चाहते हैं उनके लिए धर्म है । प्रभु महावीर ने गौतम का मोह छुड़वाने की शिक्षा दी थी ।  

पक्षी की भांति जीवन बनाना । पक्षी दाना चुगते हैं और उड़ जाते हैं । प्रार्थना से पूर्व हृदय का अवलोकन कर लेना दिन में अधिक समय हम अपराध दूसरों को पीड़ा देने में लगा देते हैं । प्रार्थना में पहले प्रार्थना लायक बनना । भेद-विज्ञान की साधना जीवन का अर्क है । धर्म का आधार भूत तत्व है । परमात्मा बनना जीवन का चरम लक्ष्य है । अगर जीवन में यह सूत्र स्मरण हर पल याद रहा और उसके लिए पुरूषार्थ करें तो जीवन का आमूलचूल परिवर्तन इस अनमोल सूत्र से होता है । धन के साथ धर्म हो तो वह भी उपयोगी बन जाता है । धर्म है हृदय की पवित्र भाव करूणा मैत्री नम्रता । कवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर प्रातः परमात्मा के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करते हैं । प्रार्थना से पूर्व हृदय को शुद्ध कर लो । धर्म का स्मरण ध्यान के द्वारा अधिक गहरा होता है । पौधे को निरन्तर पानी देना पड़ता है नहीं तो वह पौधा मुरझा जाता है । ऐसे ही ध्यान आदि निरन्तर अभ्यास करना परम आवाश्यक है । समय हमारे पास बहुत है केवल नियोजन करना जरूरी है । ध्यान धर्म में लगाना समय की सार्थकता है । 

शुभ घटनाओं को स्मरण करना चाहिए

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

अम्बाला शहर: 3 नवम्बर, 2007: युग पुरुष, राष्ट्र संत, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- हम जीवन व्यतीत कर रहे हैं परन्तु जिस जीवन एवं श्वांस में परमात्मा की भक्ति हो वह जीवन सार्थक है । धर्म का फल यही है कि मनुष्य जन्म में, ध्यान, सत्संग का लाभ मिलता रहे । प्रकृति में अपार क्षमता है वह हमें निःस्वार्थ-भाव से दे रही है । सूर्य प्रकाश वर्षा नदी का प्रवाह पृथ्वी का अस्तित्व न हो तो मानव जीवन का आधार मालुम न पड़ेगा । कर्ता और समर्पण भाव दोनों में जमीन आसमान का अन्तर है । भेद-विज्ञान साधक का प्राप्तव्य लक्ष्य   है । शरीर में आत्मा न हो तो विचार सब कुछ व्यर्थ है । परमात्मा जब साथ में हो तभी वह जीवन अमृत है । मीरा कृष्ण को सब कुछ मानती है । कृष्ण, राम व्यक्ति विशेष का नाम ही नहीं अपितु भीतर की पवित्र आत्मा है। संसार में वीतरागता के अलावा कुछ सार नहीं है । साधक ने प्रश्न पूछा कि- ध्यान की गहराई में उतरने के पश्चात् प्रकाश की झलक प्राप्त होती है वह निरन्तर किस प्रकार बना रहे । मन में जो कुछ संस्कार हैं वह बने रहते हैं । 

ध्यान, आनंद के क्षणों को मानव भूल जाता है । अपमान को हम भूल नहीं पाते हैं । शुभ घटना को स्मरण करो तो वह भाव पुनः जुड़ जाते हैं । उस स्थिति में जैसे भाव थे वह पुनः उसी प्रकार प्रकट होते हैं । यह समाधि में आनंद में रहने का एक सफल तरीका है । एकान्त में ध्यान, धर्म के अद्भुत क्षणों को स्मरण करो । अथक दिन के 24 घण्टों में आनंद के क्षणों को याद करोगे तो जीवन में ताजगी आती है । दुःख में हम दूसरों को जिम्मेवार ठहराते हैं परन्तु सर्वज्ञ प्रभु की वाणी है कि कर्मों के कारण दुःख आता है । माँ छोटे बच्चे की सार संभाल रखती है । छोटी-छोटी बातों को भी बड़े ध्यान से ख्याल करती है । ऐसे ही छोटी-छोटी शुभ घटनाएं व्यक्ति को आनंदित करती है । गर्मी के दिनों में वृक्ष के नीचे बैठने से जैसे सुख अनुभव होता है । जब दुःख में हो तो सुख के क्षणों को याद कर लेना । अच्छे विचारों, अच्छी घटनाओं आदि को संभालकर रखो । वैसे तो चित्त में सब घटनाएं संग्रहीत होती हैं । जब याद करते हो चलचित्र के समान दिखाई पड़ती हैं । मित्रों में बैठकर उसको प्रकट करो और सुख के क्षण पुनः आये ऐसी प्रार्थना करो । 

भगवान बुद्ध का शिष्य पूरण किसी गांव में जाना चाहता है । भगवान बुद्ध ने कहा- जिस गांव में तुम जा रहे हो वहाँ अधार्मिक लोग है वह भला बुरा कहेंगे । पूरण ने कहा- भला बुरा कहेंगे पर मारेंगे तो नहीं । भगवान बुद्ध ने कहा- वह मार सकते हैं । पूरण ने कहा- मारेंगे पर जान से तो नहीं मारेंगे । बुद्ध ने कहा- जान से भी मार सकते हैं । पूरण प्रसन्न होकर कहने लगा- में आनंदित होऊँगा कि धर्म का उपदेश करते हुए प्राण त्यागे । भगवान बुद्ध ने आशीर्वाद दिया कि तुम पूर्ण हो गये हो । यह शुभ क्षणों को स्मरण करने वाली उदार घटना है । मानव को घटनाओं से प्रेरणा लेकर जीवन सफल बनाना चाहिए । 

मोक्ष जीवन की परम उपलब्धि है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

अम्बाला शहर: 4 नवम्बर, 2007: युग पुरुष, राष्ट्र संत, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- सौभाग्यशाली हैं वे लोग जो सत्य के लिए जीवन समर्पण करते हैं । सत्य ना मिले परन्तु अगर सत्य की प्यास न हो तो वे दुर्भाग्यशाली हैं । दुनिया में गिनती के महान् पुरूष सत्य के लिए जीवन न्यौछावर करते हैं । सत्य के लिए साधन जुटाए गए और उन पर परिश्रम किया वह भी शांति पा लेते हैं । क्षुद्र आकांक्षा पाने के बाद जीवन व्यर्थ है विराट की कामना करते हैं आनंद ना भी मिले परन्तु निरन्तर चाह है वह धन्य है । क्षुद्र की कामना करने वालों को क्षुद्र प्राप्त होता है विराट की कामना करने वाले को विराट मिलता है चाहे इस जन्म में मिले अथवा अगले जन्म में मिले मिलता अवश्य है । माली बीज डालने के बाद कौनसा बीज पल्ल्वित, पुष्पित होगा और विराट वृक्ष होगा इसका उसे अनुमान नहीं है परन्तु जब फसल आती है माली बीज को बार-बार देखे तो वृक्ष का विराट होना मुश्किल है । इसी प्रकार हृदय में परमात्म प्राप्ति के बीज डालोगे तो परिणाम शुभ ही होगा । जैसा बीज डालोगे वैसा फल प्राप्त होगा । जैसी भीतर की कामना है वह आपको जरूर मिलेगी । 95 प्रतिशत लोग जीवनयापन की समस्या में उलझे हैं । 

मनुष्य जन्म केवल रोटी, कपड़ा, मकान आदि के लिए नहीं है अपितु लक्ष्य सत्य पाने के लिए मिला है । चारों ओर कर्मों का आवरण है हमें दिखाई नहीं पड़ता । कर्मों के आवरण को केवल सर्वज्ञ प्रभु देख सकते हैं । मानव जीवन को नैतिक बनाना चाहिए । जैन धर्म के चैबीस तीर्थंकरों में प्रभु महावीर के कर्मों का बोझ अधिक था । आयु सब तीर्थंकरों से कम थी फिर भी पुरूषार्थ तप समता द्वारा अनेक परिषहों को सहन किया । आत्म शुद्धि की प्यास के कारण ही संकल्प-दृढ़ रहा । 

जीवन में शुभ की कामना बाहर से नहीं भीतर से शुरू होती है । बीज के अंकुरित होने का आरंभ जमीन के भीतर से होता है । प्यास होगी तो साधन स्वतः प्राप्त होते हैं । आप एक कदम चलो तो परमात्मा दो कदम चलकर आता है । मोक्ष जीवन की परम् उपलब्धि है । इसलिए तो कभी-कभी कोई एकाध उपलब्ध होता है । अधिकांश लोग तो संसार की शाखाओं और उपशाखाओं में उलझकर रह जाते हैं । संसार से मुक्त होना है तो संसार की ओर भागिए मत । जब तक हमारा सम्पूर्ण व्यक्तित्व प्रकट नहीं हो जाता है तब तक हम सम्पूर्ण आनन्द, तृप्ति, संतोष और समाधान को उपलब्ध नहीं हो पाते । जब तक हम अधूरे रहते हैं तब तक असंतोष, पीड़ा और दुःख है । आपकी पीड़ा और दुःख इस बात के संकेत हैं कि आप कहीं अधूरे हैं । जहां आप पूरे हो जाते हैं आपका पूरा विकास हो जाता है, जो बनना आपकी संभावना है वह आप बन जाते हैं ।

सब जीवों को सुख प्रिय है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

अम्बाला शहर: 5 नवम्बर, 2007: युग पुरुष, राष्ट्र संत, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- प्रभु महावीर कहते हंै- सब जीवों को सुख प्रिय है । सब जीव जीने के इच्छा रखते हैं । मानव शरीर सद्पुण्य से प्राप्त होता है उसका सदुपयोग तीनों लोकों में करना चाहिए । सौभाग्यशाली है वे लोग जो सत्य के लिए परिश्रम करते हैं । संसारी जन मोह में फंसे रहते हैं । जीवन के अधिकतर बसंत विषय विकार में लगा देते हैं परन्तु प्रार्थना, भक्ति नहीं कर पाते । एक-एक श्वांस प्रभु के नजदीक ला सकती है । एक-एक श्वांस से कर्म-निर्जरा मोह माया से छुटकारा मिलता है । ध्यान सामायिक आदि द्वारा श्वांस का सार्थक सदुपयोग होता  है । मानव को लक्ष्य निर्धारित करना चाहिए । जिन्दगी भर व्यक्ति मोह माया में उलझा रहे तो अंत में निर्मोही होना मुश्किल है । देवता भी मनुष्य जन्म धारण करना चाहते हैं क्योकि सत्य को मानव देह द्वारा ही पाया जा सकता है । 

भगवान महावीर गौतम बुद्ध श्रीकृष्ण सबमें जैसी क्षमता थी वैसी हर व्यक्ति में है उसे केवल प्रकट करने की जरूरत है । संसार में आत्मा से परमात्मा का रिश्ता शाश्वत है । बाकी सब रिश्ते श्वांस छूटते ही बिखर जायेंगे । शरीर, नाम, संबंध सब मिथ्या है । आत्मा से परमात्मा का रिश्ता बनाना था वह तो संसार में मानव भूल गया है । मैं शुद्धात्मा हूँ यह बार-बार स्मरण करोगे तो धीरे-धीरे उस संस्कार से एक अद्भुत संयोग पैदा होगा । मानव देह में सत्य का बीज डालोगे फिर परमात्मा की ओर प्रगति होगी । हम सारभूत जीवन का सार्थक सदृपयोग नहीं कर पाते । प्रभु महावीर ने कहा- क्षण को जानने वाला ही पंडित है । क्रोध, मोह को जानों । प्रतिक्रिया मत करो । वर्तमान क्षण को शांति में बिताया तो पृथ्वी पर मोक्ष है एवं क्रोध में बीता तो नरक का मार्ग है । 

सौभाग्यशाली लोग क्षण को सचेत अवस्था में बिताते हैं । ध्यान द्वारा क्षण को जागृत अवस्था में जीने की कला सिखाई जाती है । प्रकृति को एकाग्रचित होकर निहारो तो आपको प्रसन्नता का अनुभव होगा । महापुरूषों को अक्सर बोधि में प्रकृति निमत्त रही है । भगवान बुद्ध वृक्ष के नीचे बैठे और संकल्प किया कि जब तक बोध नहीं होगा तब तक नहीं उठूंगा और अकस्मात बोधि को उपलब्ध हो गये । कोई भी कार्य में संकल्प का महŸवपूर्ण स्थान रहता है । पहाड़ जैसी बाधाएं भी कण की भांति मालुम होती हैं । हम शरीर को महŸव न दे भीतर की आत्मा को महत्व दें । दीपावली के दिन लोग बाहर की लक्ष्मी की ओर बाह्य साधनों द्वारा आनंद प्राप्त करने की कोशिश करेंगे । बाह्य साधनों द्वारा अनुभव कभी हुआ नहीं है और न होगा । भीतर की लक्ष्मी प्राप्त करो जैसे प्रभु महावीर ने प्राप्त की थी ।

कर्मों का बंध करना आसान है पर छुटकारा पाना मुश्किल

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

अम्बाला शहर: 6 नवम्बर, 2007: युग पुरुष, राष्ट्र संत, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- प्रभु दर्शन की प्यास सच्ची है तो वह आपको पार लगा देती है । हमें मानव जीवन का सदुपयोग के लिए जीवन में संकल्प और प्यास अवश्य चाहिये । दियासलाई से किसी के घर में रोशनी की जाती है वहीं दूसरी तरफ दियासलाई किसी के घर को फूंकने के लिए भी उपयोग में लाई जा सकती है । मानव अपने पास संचित ऊर्जा को सृजनात्मक कार्य में लगाये । मानव इन्द्रिय, मन और शरीर को व्यर्थ की बातों में गंवाते हैं । जीसस के शब्दों में- शराबी, आंखों वाले एवं स्वस्थ शरीर वाले व्यक्ति जीवन को बोझ समझ रह थे । जीसस उनके कार्य को देखकर दुःखी हुए उनके प्रति करूणा का भाव उत्पन्न हो रहा था क्योंकि सुख दुःख जीवन के आवश्यक अंग हैं । मानव जीवन को दुःख में बिताते हैं रोते हैं और शिकायत करते हैं । दुःखी होने से दुःख बढ़ता है और आनंदित रहने से आनंद बढ़ता है । सामूहिक-रूप से किया हुआ ध्यान, सत्संग आपको जीवन में मार्गदर्शन करता है । नर हंसते हुए और अहंकार आदि दुर्भावनावश कर्मों का बंधन करता है । कर्मों का बंधन करना आसान है परन्तु कर्मों का भुगतान करना मुश्किल है इसलिए कर्म करते हुए किसी को धोखा, माया, दुःख मत देना और हर क्षण जागरूक अवस्था में व्यतीत करना । प्रमाद में बहुत श्वांस व्यर्थ हो रहे है । धर्ममय जीवन श्वांस का सार्थक सदुपयोग है । प्रभु महावीर कहते हैं समझो और जानो । बोधि को प्राप्त करना मुश्किल है । नदी में पानी बह गया तो बह गया । जो कुछ बुरे कार्य अतीत जीवन में किये उन्हें भूल जाओ । वर्तमान को सुन्दर बनाओ जो अवसर हाथ में है उसे व्यर्थ मत गंवाओ यही जीवन का सार है । महापुरूषों के जीवन में अनेक डाकू, चोर आते हैं परन्तु जैसे ही बोध प्राप्त होता है जीवन परिवर्तन हो जाता है । जीवन का सार पता चलने पर किसी भी समय अथवा अवस्था में व्यक्ति बदल जाता है जिसके भीतर धर्म होता है वह बाहरी शस्त्रों आदि से नहीं डरता । आत्मा अजर अमर अविनाशी उसे तो काटा, मारा नहीं जा सकता । भगवान बुद्ध को भी अंगुलीमाल डाकू डरा रहा था परन्तु वे डरे नहीं । अंगुलीमाल तो चैंक गया उसके पश्चात् बुद्ध ने कहा डाली से पत्ते तोड़कर लाओ । अंगुलीमान तोड़कर लाया और बुद्ध ने पुनः जोड़ने के लिए कहा । अंगुलीमाल असहाय अवस्था में खड़ा रहा वह तो तोड़ सकता था जोड़ नहीं सकता  था । घटना से सीख प्राप्त हुई और भिक्षु जीवन धारण कर साधना की उच्च अवस्था में पहुँचा ।  कर्म तीन प्रकार के हैं अच्छे, बुरे और मिश्रित । अच्छे कर्म मनुष्य को स्वर्गलोक में और मृत्युलोक में देवता और देवपुरूष बनाते हैं । दुष्कर्म निम्न योनियों में जन्म होने का कारण बनते हैं । यदि आप किसी पर अत्याचार करते हैं तो उसका फल आपको अगले जन्म में भोगना पड़ेगा । यदि आप किसी की आंख में चेाट पहुंचाते हैं तो दूसरे जन्म में आपकेा आंख का कष्ट झेलना पड़ेगा । ऐसी कोई शक्ति नहीं जो किये गये कर्मों का फल देने से रोक  सके । मिश्रित कर्म से मनुष्य जन्म प्राप्त होता है ।

गुरू के समक्ष आलोचना कर हल्के हो जाओ

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

अम्बाला शहर: 11 नवम्बर, 2007: युग पुरुष, राष्ट्र संत, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- दीपावली सम्पूर्ण भारतवर्ष में अलग- अलग ढंग से मनायी जाती है । भौतिक सुख को प्राप्त करने के तरीके वाले लोग पटाखे छोड़ते है, मौज मस्ती करते हैं । गिनती के लोग आत्मा के सुख को प्राप्त करना चाहते हैं । दीपावली वाले दिन प्रभु महावीर को भीतर का प्रकाश उद्घाटित हुआ था । एक प्रसिद्ध लोकोक्ति है- जैसी दृष्टि होगी वैसी सृष्टि होती   है । जैसा तुम देखते हो वैसे बनते हो उसी प्रकार गुण और अवगुणों को ग्रहण करते समय विचार करना चाहिए । प्रभु महावीर ने 2600 वर्ष पूर्व जो सूत्र कहा था वो आज भी उतना ही प्रासंगिक है । किसी के शरीर को कांटा लगने पर शरीर में पीड़ा होती है निकलने पर सुख मिलता है । ऐसे ही माया आदि शल्य निकलने पर मन की शुद्धि होती है । मनोवैज्ञानिक तो आज इस स्थिति पर पहुँचे है कि सारे दुःख, पीड़ा भीतर के दबे विचार हैं । प्रभु ने इस सूत्र द्वारा आलोचना का निरूपण किया है । जो व्यक्ति पाप, निन्दा, चोरी करते हैं और दोषों को प्रकट नहीं करते उनके जीवन में दुःख बना रहता है । आलोचना कर दो तो सुख होता है । गुरू के समक्ष अपने दोषों को प्रकट कर देना चाहिए । गुरू का चयन आपको करना है ऐसा न हो कि वह आपके दोषों को बजार में बताये । बाहर के दोषों को प्रकट करने वाले को दुगुना प्रायश्चित आता है । गुरू के समक्ष एक बार कहने के बाद फिर बार-बार दोहराने की जरूरत नहीं है जैसे अग्नि की चिंगारी जला देती है । थोड़ा सा जख्म अधिक समय तक रहे तो वह फैल जाता है उसी प्रकार दोषों की स्थिति है । मनुष्य के द्वारा गलती होना स्वाभाविक है । अपने दोषों को प्रकट न करने वाले के भीतर भट्टी जलती रहती है । दोष प्रकट न करने वाले के तीन जन्म तो कम से कम बेकार होते हैं । व्यक्ति तप कर सकता है, प्रवचन कर सकता है परन्तु आलोचना करना वीर पुरूषों का कार्य है । परिवार में समाज में जरा सी बात होती है वह दरारें पैदा करती है । गलती स्वीकार करोगे तो मुक्त हो जाते हो और अस्वीकार बंधन में डालता है । ईसाईयों में कन्फेशन की प्रक्रिया है । जिसमें अपने मन के विचारो ंको जो वह किसी से नहीं कह सकता वहां जाकर कह देता है । परिवार में अगर आपसी प्रेम बढ़ाना हो तो गलती को स्वीकार करो । व्यक्ति माया आदि दोष करता है तो उसे भीतर में गलती की अनुभूति होती है । माया जानकर फिर भी माया करना पशु जीवन प्रदान करता है । मानव झूठ, माया करके समझता है कि किसको पता चलता है वह भ्रम में है । अध्यात्मवादी कहते हैं कि दुर्भाव करने मात्र से आत्मा का अंश बिखर जाता है । उसको जोड़ना है तो इसके लिए प्रायिश्चत आलोचना सर्वोत्तम साधन है । श्रावक का कर्Ÿाव्य है कि वह चाहे कुछ भी न कर सके पर अपने दोषों को प्रकट कर दो । बच्चों के समान सरलभाव से जो जैसा है वह वैसा बता दो । बताने में भी कोई होशियारी मत करना । मन, वचन, काया की शुद्धि से आलोचना सर्वोेŸाम औषधि है । धन, दौलत रक्षा नहीं कर सकता केवल धर्म रक्षा करेगा ।

स्वभाव रमण से सुख प्राप्त होता है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

अम्बाला शहर: 13 नवम्बर, 2007: युग पुरुष, राष्ट्र संत, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- प्रभु चरणों में अपने भीतर के अशुद्ध-भावों को अर्पित कर दो । धन, दौलत आदि कुछ भी उनको नहीं चाहिए । जिस दिन मानव स्वयं को अर्पित कर देगा मन, वचन, काया को भी समर्पित कर दो । नाम, शरीर, संबंध सब झूठे है मनुष्य व्यर्थ में इनको मानकर अहंकार करता है । श्वांस मात्र का भी भरोसा नहीं है । श्वांस कब चली जाएगी कुछ पता नहीं है । 

मनुष्य यह सब सत्य बाते भूल जाता है । विभाव को प्राप्त कर शांति नहीं मिल  सकती । स्वभाव में रमण से ही शांति प्राप्त होती है । पानी को बिलोने से मक्खन नहीं निकल   सकता । रेत से तेल प्राप्त नहीं हो सकता इसी प्रकार भौतिक साधनों से सुख नहीं मिल सकता । उम्र इंतजार और शिकायत में चली जाती है । हर श्वांस में भीतर का आलोक प्रकाशित हो सकता है । नव माह तक कठिन परिस्थिति में बच्चे का जन्म होता है । माता को नौ माह तक पीड़ा होती है तब जाकर बच्चे का जन्म होता है । माता पिता जब तक बच्चा अपने पांव पर खड़ा न हो जाए तब तक उसका पालन पोषण ध्यान माता को रखना होता है । बच्चे को अच्छे संस्कार माता पिता को देने चाहिए जिससे जीवन सुख शांति से व्यतीत हो । वास्तव में बच्चे के ऊपर माता-पिता अधिकार जमाने लग जाते हैं । आकांक्षाएं सपने माता पिता उच्च रखते हैं परन्तु जैसे ही मन एवं शरीर से बच्चा बलवान होता है तो वह फिर माता पिता का ध्यान नहीं रखता परिणाम स्वरूप माता पिता और बच्चे दोनों दुःखी परेशान रहते हैं । 

ध्यान का अर्थ है मन की मौत । प्रभु महावीर का सोऽम बड़ा अद्भुत सूत्र है । सो वह और हम अर्थ है मैं । भक्ति आदि शुद्ध आलंबन द्वारा ध्यान में प्रवेश हो सकता है । सब संसार के कार्य करते हुए अपने जीवन में धर्म ध्यान अवश्य करे । परमात्मा की बात हमें याद नहीं । हमने दफ्तर, दुकान, पति-पत्नी और बच्चों आदि को जीवन का आधार मान लिया है । यह अगर आपका सच्चा आधार है तो सच्ची शांति कभी नहीं मिलेगी क्योंकि ये वस्तुएं आज है कल नहीं । सच्चा सुख तो शाश्वत् साधनों से प्राप्त हो सकता है वह शाश्वत् साधन तुम्हारी आत्मा एवं परमात्मा है । 

प्रभु महावीर की प्रमुख प्रक्रिया: आलोचना

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

अम्बाला शहर: 14 नवम्बर, 2007: युग पुरुष, राष्ट्र संत, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- जैन सिद्धान्त का हार्द है अपने दोषों की आलोचना करना । प्रभु महावीर कहते हैं कि जैसे पैर में कांटा चुभने पर शरीर में पीड़ा होती है । कांटा निकलने पर सर्वांग शरीर में राहत महसूस होती है । कांटा चुभने पर किसी भी कार्य करने पर वह परेशान करता है । मायावी व्यक्ति अपने दोषों की आलोचना करता है गुरु के समक्ष तब मन में शांति की अनुभूति होती  है । मनुष्य अज्ञानी होने के कारण गलतियाँ कर बैठता है । केवल प्रभु महावीर एवं सर्वज्ञ महापुरूष दोषों से बचते हैं । शरीर पर घाव हो जाए तो धन-सम्पत्ति आदि समर्पित कर शरीर स्वस्थ करना चाहते है। ऐसे ही चेतना पर झूठ, चोरी, धोखे द्वारा जो घाव लगे हैं उन्हें प्रकट करदूर हुआ जा सकता है । माया का अर्थ है भीतर बाहर से अलग-अलग होना । आज का व्यक्ति सभ्य होने की वजह से पुराने समय की अपेक्षा अधिक माया करता है । 90 प्रतिशत बातें व्यक्ति के अचेतन मन में जमा रहती है । धीरे-धीरे वह अर्धचेतन मन में आती है फिर मन, वचन द्वारा प्रकट होती है । ध्यान द्वारा अचेतन मन की जमा की हुई बातें बिना कुछ संयोग मिले अर्ध-चेतन मन में आती है और मन की शुद्धि होती है । अधिक बीमारियों की वजह चिŸा की अनेकता प्रमुख कारण है । मनोवैज्ञानिक यह बात अभी सिद्ध कर पाये है परन्तु प्रभु महावीर ने लगभग 2600 वर्ष पूर्व यह बात प्रतिपादित कर दी थी । कई बार छोटी बात विस्तृत रुप धारण कर लेती है एवं बड़ी बात बड़ी बात नहीं मालुम पड़ती । इसके पीछे मूल कारण कहने का उचित अनुचित ढंग है । बड़ी बात को सहजता से ले लो तो वह बात विलीन हो जाती  है । दोषों को प्रकट करने के लिए सहनशील गुरू के पास जाओ । सद्गुरु के समक्ष की गई आलोचना शुद्ध-रुप धारण कर लेती है । दोषों को चैराहे में खड़े होकर कहने से गलत प्रभाव अन्य लोगों पर पड़ सकता है इसलिए एकान्त में दोषों को प्रकट करो । आलोचना से व्यक्ति उसी क्षण हल्का हो जाता है । आलोचना खुले हृदय से करोगे तो जीवन निर्भार हो जाता है । गुरु आपके मन से मिल शुद्धिकरण करवा देते हैं । मनोचिकित्सक आलोचना की प्रक्रिया को बढ़ी सुदृढ़ता के साथ उपयोग में ला रहे हैं और उसके सफल परिणाम हमारे समक्ष आ रहे हैं । खेलो में तनाव को कम करने के लिए, डाॅक्टर बीमारियों को दूर करने के लिए मनौवैज्ञानिकों की सहायता लेना चाहते हैं । 

जो तृप्त है वह सम्राट्

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

अम्बाला शहर: 16 नवम्बर, 2007: युग पुरुष, राष्ट्र संत, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- उपनिषद् के ऋषि कहते हैं ‘‘तमसो मा ज्योतिर्गमय असतो मा सद्गमय’’ । किसी को अंधकार अच्छा नहीं लगता है । भीतर के अंधेरे को दूर करने का प्रभु महावीर मार्ग बताया   है । सत्य, अमृत और प्रकाश क्या है ये प्रश्न बड़े ज्वलन्त है । इन प्रश्नों को सुलझाने में पूरा जीवन दाव पर लगा दो तो वह भी कम है । सत्य है आत्मा और परमात्मा असत्य है शरीर धन, पद आदि । सारे संबंध शरीर के झूठे है । श्वांस छूटते ही शरीर का विनाश हो जाता   है । मनुष्य यह जानता भी है मृत्यु होने वाली है । मरने वाले व्यक्ति के संस्कार कर लेने पर फिर वही रोजमर्रा के कामों में लग जाता है । आयु का भरोसा नहीं है । जितनी भी श्वासें बची है मृत्यु रूपी सत्य को समझकर धर्म में लगा दो । दुनिया में अंधेरा है और भीतर अनंत सूर्यों से अधिक प्रकाश है । परिवार चलाते हुए जीवन की सार्थकता पर विचार अवश्य करे । मानव जीवन एवं स्वस्थ शरीर सौभाग्य से प्राप्त होते हैं । बुद्धिमान इनका जरुर सदुपयोग करता है । प्रातःकाल उठते ही प्रभु भक्ति एवं सायं अथवा सोने से पूर्व अपने दोषों की आलोचना करो । निन्दा से व्यर्थ में पापों का बंधन होता है । प्रार्थना मोक्ष प्राप्त करने की करो । भौतिक वस्तुएं प्रार्थना की मांग कदापि न हो । किसी भी कार्य में परस्पर सहयोग रहता है । एक रोटी का टुकड़ा भी अगर आप ग्रहण कर रहे हैं तो पानी, हवा, मिट्टी, किसान आदि सभी का सहयोग मिलता है तब रोटी का टुकड़ा हमें प्राप्त होता है । मानव कुछ भी कार्य करता है तो समझता है यह मैंने किया है । सिकन्दर को पूछा गया मरूस्थल में जहां दूर-दूर तक पानी न हो वहां तुम्हें प्यास लगे और सन्यासी एक लोटा पानी दे दे उसके बदले में तुम क्या दोगे ? उसने कहा सम्पूर्ण राज्य । सन्यासी ने कहा तुम्हारे राज्य की कीमत जीवन से ज्यादा और एक लोटा पानी से अधिक नहीं है । वह सन्यासी के शब्दों का भाव तो समझ गया परन्तु सम्पूर्ण विश्व को जीतने की महत्वकांक्षा के कारण अपने को मार्ग से हटा नहीं पाया । सिकन्दर को डायोजनीज ने भिखारी कहा क्योंकि सिकन्दर को सम्राट् बनने की चाह थी जो और प्राप्त करना चाहता है, वह भिखारी है जिसे सब कुछ प्राप्त हो गया वह सम्राट् है । शब्दों में कहा जाने वाला सत्य नहीं हो सकता सत्य निःशब्द होता है । कई बार घटनाएं असत्य हो परन्तु उसमें सत्य भाव छुपा हो सकता है । मरने के बाद धन दौलत वस्त्र आदि कुछ भी किसी के भी साथ नहंी जाने वाला । संत, राजा, अमीर-गरीब सब खाली हाथ आये थे और खाली हाथ जाते हैं । जो व्यक्ति जीवन में तृप्त होता है अंत में भी तृप्त होता है वह सम्राट् है । जिनकी चाह अंत में भी बनी रहती है वह भिखारी है । 

अहंकार दुःख का कारण है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

अम्बाला शहर: 17 नवम्बर, 2007: युग पुरुष, राष्ट्र संत, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- प्रभु नाम में ऐसी शक्ति है कि संसार की मोह, माया व्यक्ति का कुछ बिगाड़ नहीं  सकता । अनादिकाल से अहं के कारण संसार में परिभ्रमण कर रहे हैं । प्रकृति का बदलाव मनुष्य के हाथ में नहीं है । शरीर का मद व्यक्ति को होता है परन्तु शरीर भी स्थिर नहीं । मानव उसको किसी भी तरीके से नित्य नहीं रख सकता । राजा महाराजाओं को प्राचीन समय में शिकार का शौक होता था । पीछे से वार करके हथियार से निहत्थे मूक प्राणियों पर वार करता है और अज्ञानी जीव स्वयं को बहादुर समझता है । प्रभु महावीर की वाणी कहती है आत्मा कर्ता, विकर्ता, दुःखों को सुखों को भोगने वाली भी आत्मा है । किसी कार्य को करते हुए अपनी कार्य सफलता को प्रभु चरणों में समर्पित कर देते हैं एवं स्वयं को निमिŸा मात्र मानकर चलते हैं तो हम निर्भार हो जाते हैं । माता पिता को यह भी पता नहीं है बेटो का रंग रूप बुद्धि आदि कैसी है परन्तु माता पिता व्यर्थ में अहंकार को पुष्ट करते हैं । श्वांस लेने छोड़ने में भी मानव को सम्पूर्ण अधिकार नहीं है । जो यह समझते हैं कि श्वांस में ले रहा हूं यह भी मिथ्या धारणा है । मानव भोजन करता है पर भोजन का पाचन होना और मांस मज्जा रक्त बनना भी मानव के हाथ मं नहीं है । प्रकृति के अनुसार सब कार्य स्वतः संचालित हो रहे हैं । इसी प्रकार शरीर की अवस्थाएं बचपन, जवानी, बुढ़ापा । पारिवारिक संबंध आदि मानव पुरूषार्थ से भी परिवर्तित नहीं कर सकता पर मानव कर्ताभाव में यह मान बैठता है कि मेरे बगैर कुछ नहीं हो सकता, सब कार्य में करता हूं और जीवन में दुःखी परेशान होता है । आयु की नश्वरता को जानकर भी नर धर्म के लिए समय निकाल नहीं पाता । अहंकार से व्यक्ति कछ भी ग्रहण नहीं कर सकता विनम्रता से धर्म की शुरूआत होती है । मानव शुरू से लेकर अंत तक संसार में अहंकार का जीवन व्यतीत कर रहा है । परिणाम स्वरुप दुःख के महागर्त में जी रहा है । मन, वचन, काया से परोपकार कर जीवन सार्थक करो कई जन्मों से संसार की यात्रा करते हुए महल, पद, सब प्राप्त कर चुका है । अपना लक्ष्य सिद्धालय का रखना । 

धर्म के लिए समर्पित जीवन था साध्वी स्वर्णकान्ता जी महाराज

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

अम्बाला शहर: 18 नवम्बर, 2007: युग पुरुष, राष्ट्र संत, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- महासाध्वी श्री स्वर्णकान्ता जी महाराज की दीक्षा जयन्ती का पावन अवसर है । महासाध्वी श्री स्वर्णकान्ता जी महाराज यथानाम तथागुण सम्पन्न थीं । स्वर्ण सब धातुओं में मूल्यवान है । सोने को प्राप्त करने के लिए व्यक्ति को मेहनत करनी पड़ती है । सोना प्राप्त होने के बाद उसकी मिट्टी को उतारा जाता है । सोने को तपाने के पश्चात् सोने की चमक जाती नहीं है बल्कि चमक अधिक निखरता है । सब धातुओं की कीमत कम हो जाती है परनतु सोने की कीमत कम नहीं होती बल्कि अधिक बढ़ती है । आचारां गसूत्र में प्रभु महावीर कहते हैं ‘‘जाव सद्धाए निक्खंतो’’ । जिस श्रद्धा से संयम अंगीकार किया है उसी श्रद्धा से पालन करना उत्कृष्ट है । संत जीवन में प्रवेश बड़ी कठिनाई से मिलता है । अंत समय में संथारा धारण किया था । संथारे द्वारा शांति, समता के साथ मृत्यु को जीता । साधु साध्वी श्रावक-श्राविका के संयोग से संघ बनता है । सभी का अपना विशेष महŸव रहा है । 

महाभारत की घटना है । द्रोणाचार्य पाठ पढ़ा रहे थे । द्रोणाचार्य कौरवो-पाण्डवों में युधिष्ठिर को अधिक योग्य मानते थे परन्तु जैसे ही पाठ पढ़ाया गया सभी आगे बढ़ गये परन्तु युधिष्ठिर उसी पाठ पर बना रहा । पाठ था ‘‘सत्यं वद धर्मम् चर’’ अर्थात् सत्य बोलो और धर्म पर आचरण करो । द्रोणाचार्य ने कहा- इतना लघु पाठ अभी तक तुम्हें याद नहीं हुआ । युधिष्ठिर ने कहा- जब तक पहला पाठ अच्छी तरह समझ न लूं तब तक आगे कैसे बढ़ सकता हूँ । सत्य बोलकर जब तक धर्म जीवन में नहीं आता में आगे के पाठों को ग्रहण नहीं कर सकता । द्रोणाचार्य युधिष्ठिर की बुद्धिमŸाा पर प्रसन्न हुए और शिष्य से शिक्षा ग्रहण की । 

कई बार छोटे बच्चे अथवा शिष्य से भी कुछ शिक्षा प्राप्त कर सकते हैं । अन्तिम समय में युधिष्ठिर और कुŸाा साथ में गया । बाकी सब भाई नीचे गिर गये । युधिष्ठिर को प्रवेश मिला परन्तु कुŸो को बाहर रखा गया । युधिष्ठिर ने कहा- कुŸाा मेरे साथ जाएगा । इतना जीवन में सत्य था । वह कुŸाा कोई और नहीं साक्षात् विष्णु भगवान युधिष्ठर की परीक्षा ले रहे थे इसलिए युधिष्ठर को धर्मराज युधिष्ठर कहाँ जाता है । 

हम अपने दिन की शुरूआत नमन से करें

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

अम्बाला शहर: 1 दिसम्बर, 2007: युग पुरुष, राष्ट्र संत, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- अरिहंत परमात्मा को नमन । उनकी अनंत वीतरागता को नमन । उनके ज्ञान को नमन । भीतर विनय का भाव ऋजुता सरलता का भाव हो तो व्यक्ति मुक्ति के करीब होता है । विनम्रता सभी धर्मों में मुख्य है । विनम्रता यानि भीतर की सरलता । अच्छे कार्य करने के लिए हृदय शुद्ध और पवित्र होना चाहिए । हमारे आराध्य सर्वश्रेष्ठ है अरिहंत परमात्मा । आप कोई कार्य करो पहली श्वांस लो, नींद से जागो तो अरिहंत परमात्मा का स्मरण करो । स्मरण यानि बोलना नहीं हृदय से भावों में समाहित होना । भीतर के तार परमात्मा से जुड़ जाए । हम अपने दिन की शुरूआत नमन से करें । 

किसी ने आपको कुछ दिया उसके प्रति कृतज्ञता । मूल कृतज्ञता देव गुरु धर्म के   प्रति । देव हमारे अरिहंत हैं, गुरु जो उनके बताए हुए मार्ग पर चलते हैं और धर्म हमारा वीतराग है । इसे सम्यक्त्व भी कहते हैं । सम्यक्त्व व्यवहार में देव गुरु धर्म की है और निश्चय में आत्मा परमात्मा की । व्यवहारनय में संसार है निश्चयनय में परमात्मा है । परमात्मा जो आत्मा का विशुद्ध-रुप है । आज के इस युग में भेद-विज्ञान की साधना मिलना बहुत कठिन है । अरिहंत परमात्मा की कृपा से अप्रमत्त-भाव से आप तक यह साधना पहुंची । हम इस साधना को भीतर स्वीकार करे । मौन होकर विनम्रता से स्वयं में परमात्मा को खोजे । यह शरीर तो मिट्टी में मिलेगा । धन, पद, यश सब यहीं रह जाएगा साथ जाएंगे तो केवल कर्म और इन कर्मों से छूटना है तो परम पद को पाना होगा । गुरु उसे बनाओ जो तुम्हें परम पद, वीतरागता तक ले जाए । तुम्हारे भीतर समता आए । कृष्ण ने जो ज्ञान, भक्ति और कर्म का मार्ग बताया वही मार्ग शुद्धात्मा के स्मरण में है । हम प्रतिपल शुद्धात्म स्मरण में रहे । स्मरण के लिए दिन में दो घण्टे अवश्य निकाले । दो वीतराग सामायिक करें । हर एक जीव जिसे भी हमने मन, वचन, काया से दुखाया है उसके प्रति क्षमा का भाव भीतर बनाए रखें । धर्म का मार्ग बहुत सरल है और बहुत पवित्र है । धर्म भीतर तृप्ति देता है । भक्ति से धर्म की शुरूआत होती     है । परमात्मा के चरणों में एक ही प्रार्थना प्रभो ! मुझे हर समय तेरा ध्यान रहे । मैं तेरे जैसा  हो जाउं । राग मोह कर्म-बंधन सब छूट जाएं । मन के मन्दिर में प्रकाश ही प्रकाश हो । ऐसी विनय परमात्मा के चरणों में करें । 

ध्यान से एक उर्जा भीतर आती है । जब हम इकट्ठे बैठकर ध्यान करते हैं तो अधिक उर्जा एकत्रित होती है । ध्यान, प्रार्थना हमारे जीवन का ध्येय हो । चैबीस तीर्थंकर भगवंतों ने परम पद को पाया तो ध्यान के द्वारा पाया । आप दो बातों का अपने जीवन में ध्यान रखें इकट्ठे बैठकर प्रार्थना करें और हमेशा भीतर विनम्रता का भाव रखें । सबके लिए मंगल की कामना भीतर हो क्योंकि प्रत्येक प्राणी मंगल स्वरुप है । प्रत्येक जीव में वही शुद्धात्मा है जो शुद्धात्मा हमारे भीतर है । 

मानव जीवन उपहार है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

2 दिसम्बर, 2007: युग पुरुष, राष्ट्र संत, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- अरिहंत परमात्मा के चरणों में एक भाव रखें । वे ज्ञान के अद्भुत भण्डार हैं, करुणा के सागर हैं । प्रभु की शरण में जो कोई आया प्रभु उनके गुणों को उजागर करते हैं । हम पर अरिहंत परमात्मा की अनंत कृपा है । हमारे भीतर अनंत सूर्यों का प्रकाश है परन्तु कर्म-मल से वह ढ़क गया है, उसे प्रकाशित करने के लिए आंखें बंद करनी होगी । प्रभु शरण में जाना होगा । सबके मंगल की कामना करनी होगी । भगवान पाश्र्वनाथ के जीवन में कठिन से कठिन उपसर्ग आए । कमठ ने उन्हें बहुत कठिन उपसर्ग दिए फिर भी प्रभु के भीतर एक मंगल का भाव था । जीवन में जो कुछ भी मिल रहा है वह हमारा ही बोया हुआ फल है । हमारा जीवन कैसा है यह तो हमें अभी पता लग रहा है । जैसे बीज पीछे हमने बोए वैसे ही फल हमें मिल रहे हैं । 

प्रभु की अनंत कृपा से यह जीवन हमें उपहार स्वरुप में मिला । हमारे भीतर वह योग्यता नहीं थी कि हम मानव जीवन को पा सके परन्तु भक्ति और शक्ति से हमें यह जीवन मिला । अब हम उस सत्य के लिए अपना कण-कण समर्पित कर दें । जैसे राजा हरिश्चचन्द्र ने किया था । राज त्यागकर चाण्डाल के घर नौकरी की और बेटे की अर्थी शमशान में लेने के लिए भी किराया लिया । सत्य को महत्व दें । महापुरुषों के जीवन से यही शिक्षा हमें मिलती है कि हम अपने जीवन को जाने । धर्म की जीत ही सत्य की जीत होती है । हम अपने धर्म में आ जाए । भीतर में करुणा का झरना बहे । भीतर केवल परमात्म दर्शन हो । हमारे भीतर करुणा, मैत्री, सत्य रुपी जल है पर उसे अहंकार क्रोध रुपी पत्थरो ने दबा रखा है । हर कर्म में परमात्मा की आराधना हो । हर घर मन्दिर बन जाए, प्रभु का द्वार बन   जाए । दान, शील, तप भावना की आराधना करते हुए हम यथाशक्ति परमात्म स्वरुप में डूबते चले जाए । प्रभु बहुत निर्मल हैं । करुणा के सागर है । सागर में हर नदी समा जाती है, उसी तरह हम भी परमात्मा में समाएं । 

तुम चाहो तो परमात्मा आ सकते हैं परन्तु वैसी प्यास और पुकार हमारे भीतर होनी चाहिए । मीरा ने पुकारा था कृष्ण ब्रज की गलियों में आ गए । द्रोपदी ने पुकारा कृष्णा राज दरबार में उपस्थित हुए । भीलनी ने पुकारा राम जंगल में आ गए । क्या हमारी पुकार इनके जैसी है ? सच्चे मन से परमात्मा को पुकारो परमात्मा मन्दिर मस्जिद स्थानक गुरुद्वारों में नहीं वह अपने भीतर है । क्या कभी हमने अपने भीतर परमात्मा को ढूंढा ? हर पत्ते, फूल, वृक्ष में कण-कण में परमात्मा है देखने की आंख चाहिए बस एक आंख में परमात्म दृष्टि भर लो और एक आंख में श्रद्धा जिससे जीवन का कल्याण ही कल्याण होगा ।

अहंकार का पोषण ना करे

जैनाचार्य पूज्य श्र्री िशव मुनि जी महाराज

8 दिसम्बर, 2007: युग पुरुष, राष्ट्र संत, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- हर कार्य करते हुए व्यक्ति अरिहंत कृपा को याद रखें । उनकी कृपा के बिना एक श्वांस भी भीतर प्रवेश ना करे परन्तु हम ऐसा नहीं कर पाते । हम जब दुःख और क्लेश उपस्थित होते हैं तब तो परमात्मा को याद करते हैं और खुशी में सारा श्रेय स्वयं को देते हैं । व्यक्ति कितना ही धन, पद, यश पा ले यह सब कुछ जब तक देह है तब तक है जैसे ही श्वांस छूटी देह छूट जाएगी और यही देह श्मशान का श्रृंगार बन जाएगी । सारे संबंध शरीर के हैं । शरीर का कोई मूल्य नहीं, मूल्य है आपकी आत्मा का, वीतरागता का । हम किसी से जुड़े या ना जुड़े पर अरिहंत परमात्मा से अवश्य जुड़े । 

अपने दैनिक जीवन में अहंकार का पोषण ना करे । हमारा लक्ष्य सिद्धत्व प्राप्ति का  हो, उसके लिए हमें कितना ही परिश्रम करना पड़े तो उसे हंसते-हंसते करे । कर्म बांधते हुए हर्ष के साथ बांधे थे । अब भोगते हुए रुदन क्यों ? आंखें बंद करो परमात्मा को याद करो देखो परमात्मा आपके साथ है । आपको केवल उसे याद करने की आवश्यकता है ? कहते हैं हर घट में सांई रमता पर वह कैसे रमण करता है । आज तक यह पता ही नहीं था । जब साधना की गहराईयों में प्रवेश किया तो पता लगा परमात्मा भीतर ही है जिसे पाने के लिए पहाड़ों की यात्राएं की । दर-दर भटके वह अपने भीतर ही मिला । कहते हैं- बच्चा परमात्मा का रुप होता है । ऐसा क्यों कहा जाता है ? क्योंकि बच्चे में सरलता, सत्य, प्रेम और करुणा है । वह दोष करता हुआ भी निर्दोष है क्योंकि वह सब कुछ बता देता है । आप भी इन गुणों को जीवन में अपनाओ तो परमात्मा आपसे दूर नहीं होगा । 

वीतराग सामायिक द्वारा ये गुण स्वतः ही भीतर आते चले जाते हैं । जैसे ही आंखे बंद की मन, वचन, काया के संस्कार बंद हो गए । मन के संस्कार विचार-रुप में चलते हैं परन्तु उन्हें पोषण नहीं मिलता । इस तरह हम धीरे-धीरे स्वयं के सत्य की ओर अग्रसर होते हैं । आप संकल्प रखों आंखें बंद कर पचास मिनिट बैठकर देखो तुरन्त ही परिणाम आएंगे । मिश्री खाने पर मुंह मीठा होता है उसी तरह ध्यान करने से शांति मिलती है । हम कहते हैं ध्यान मे विचार अधिक आते हैं इन विचारों की श्रृंखला को तोड़ना कोई आसान नहीं क्यांेकि ये विचार जन्मों-जन्मों के है । हर जन्म का संस्कार शरीर छूटने पर आत्मा के साथ अगले जन्म में आता है इसीलिए कोई व्यक्ति धर्मप्रिय होता है तो कोई व्यक्ति धर्म से विमुख होता है । किसे परमात्म भक्ति करना अच्छा लगता है तो किसे परमात्म भक्ति करना अच्छी नहीं लगता । वीतराग सामायिक द्वारा ये सारे संस्कार दूर होंगे और हम स्वयं के नजदीक आते चले   जाएंगे ।

आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

पंचकूला 31 दिसम्बर, 2007: राष्ट्र संत, युग पुरूष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिव मुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- सुख की चाहना करने से संसार बढ़ता है और आए हुए दुःख को समभाव से स्वीकार करोगे तो संसार छोटा होता है । सुख दुःख अपने ही बोए हुए बीज है । दुःख को स्वीकार करो । स्वीकार में मोक्ष है । जितना हम स्वीकार करते चले जाएंगे उतने मुक्ति के करीब पहुंचेंगे । हम स्वीकार नहीं करेंगे तो संसार में उलझते चले जाएंगे । संसार बहुत भयानक है । अनंतकाल से इस संसार में भटक रहे हैं । कभी पशु बने, कभी देव बने, कभी नारकी बनें तो कभी मानव बनें ।

सुख से हम भवभ्रमण बढ़ाते हैं जिससे संसार बढ़ता है । मानव भव मिलने के बाद भी हमने धर्म को महत्व ना दिया । धर्म को महत्व दें । धर्म हमें स्वयं तक लेकर जाता है । स्वयं में जो आनंद है वह कहीं बाहर नहीं । सुख और दुःख से पार हम स्वयं तक पहुंचे । ध्यान साधना में हम स्वयं तक पहुंचने का उपक्रम कर रहे हैं । 

हम अनंतकाल से शरीर का सुख चाह रहे हैं । हम थोड़ा दुःख चाहे जिससे परमात्म भक्ति होगी और हम परमात्मा जैसे बन जाएंगे । इस संसार में बहुत थोड़े लोग ऐसे हैं जो इस बात को समझ रहे हैं । शिवाचार्यश्रीजी के प्रतिदिन प्रवचन सेक्टर 17 जैन स्थानक, पंचकूला में आत्म ध्यान साधना पर हो रहे हैं साथ ही प्रतिदिन प्रातः 8.40 से 9.30 बजे तक ध्यान की क्लास भी हो रही है । 

वीतराग सामायिक से नये वर्ष का आगाज करें

आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

पंचकूला 1 जनवरी, 2008: राष्ट्र संत, युग पुरूष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिव मुनि जी महाराज ने नव वर्ष पर विश्व मैत्री की भावना रखते हुए कहा कि- नये वर्ष की शुरुआत वीतराग शुद्ध सामायिक से करें । नव वर्ष आप सभी के लिए मंगलकारी हो । अरिहंत परमात्मा की हम सब पर अनंत कृपा है । हम महसूस करें उनकी कृपा को बाहर के जगत से हटकर भीतर के जगत में प्रवेश करें । अपने भीतर अकेलेपन का अहसास हो । संसार में सभी प्राणी अकेले आए है अकेले जाएंगे ।

वीतराग सामायिक की आधारशिला यही है कि हम परमात्मा से संबंध बनाये । एक भाव एक आराधना हर श्वांस में प्रभो की याद आए । परमात्मा से बना संबंध हमें मुक्ति के जहाज के द्वारा सिद्धशिला ले जाता है । हर श्वांस में परमात्म भाव रखते हुए हम भवसागर से पार हो सकते हैं । जितनी वीतरागवाणी पर श्रद्धा होगी उतनी सबकी सामायिक पुणिया श्रावक जैसे होती चली जाएगी । नये वर्ष की शुरुआत धर्म से हो, वीतराग सामायिक से हो । अरिहंतों के प्रति अटूट श्रद्धा का भाव । आज एक संकल्प लेकर जाना प्रतिदिन शुद्धभावों की वीतराग सामायिक अवश्य करनी है ।

शुद्ध भाव जहाँ न राग है न द्वेष है न प्रशंसा है न निन्दा है । वीतराग सामायिक में श्वांस, सोऽहं द्वारा भीतर की शांति का अहसास करवाया जाता है । एक बार समाधि लग जाए तो हम असंख्य कर्मों से मुक्त हो सकते हैं । सामायिक में मिलावट ना हो । सारी मांगों से परे हो हमारी सामायिक । आज के दिन भीतर एक भाव कि- प्रभो ! मेरा अगला जन्म महाविदेह क्षेत्र में आपके चरणों में हो और मैं साधना करता हुआ अपने घर सिद्धालय लौटूं । 

मुखवस्त्रिका, आसन, माला, पाठ ये द्रव्य सामायिक के अंग हैं । हम द्रव्य से भाव सामायिक में प्रवेश करें । मन, वचन, काया से मौन हो भीतर डुबकी लगाएं । नया वर्ष आपके लिए खूब मंगलकारी हो, आपके जीवन में धर्म वृद्धि हो । अंत में आचार्यश्रीजी ने प्राणीमात्र के मंगल की कामना करते हुए नव वर्ष का मंगलपाठ प्रदान किया ।

इस अवसर पर साधिका निशा जी जैन ने वीतराग सामायिक द्वारा बीते वर्ष की आलोचना प्रतिक्रमण प्रायश्चित सभी को करवाया । मंत्री श्री शिरीष मुनि जी महाराज ने महामंगलपाठ की महिमा सबको बताई । नए वर्ष का स्वागत करते हुए युवामनीषी श्री शुभम् मुनि जी महाराज ने भजन द्वारा अपने भाव रखें । 

इस अवसर पर दिल्ली, चण्डीगढ, परवाणु, जालंधर, जम्मू, मालेर कोटला, लुधियाना, श्रीगंगानगर, अम्बाला आदि अनेक श्रीसंघों ने आचार्य भगवन् का आशीर्वाद ग्रहण किया । 

आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

पंचकूला 2 जनवरी, 2008: राष्ट्र संत, युग पुरूष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिव मुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- मुक्ति का एक मात्र साधन है वीतराग सामायिक, वीतरागता जहां न राग है न द्वेष है । राग और द्वेष से कर्मों का बंधन होता है । जिस क्षण राग आता है उसी क्षण कर्म बंधन हो जाते हैं प्रभु महावीर ने गणधर गौतम को वीतराग भाव में रहने की प्रेरणा दी । भगवान ने कहा- जो तुम्हारा मेरे प्रति प्रशस्त राग है वह मुक्ति में बाधक है । गुरु के प्रति किया गया राग मुक्ति नहीं लेकर जाएगा । उनके बताए हुए मार्ग से किया गया राग तुम्हें मुक्ति की ओर ले जा सकता है । गणधर गौतम बेले-बेले पारणा करते थे । बहुत तपस्या थी फिर भी जब तक राग नही छूटा तब तक मुक्ति प्राप्त नहीं हुई ।

किसान खेत के लिए भूमि तैयार करता है उसी प्रकार आज तक मुखवस्त्रिका बांधकर अड़ताीस मिनिट एक आसन में बैठने की भूमि आपने तैयार की इस पर अब वीतरागता का बीज बोओ । तुम मोक्ष जा सकते हो केवलज्ञान प्राप्त कर सकते हो बस आवश्यकता है हर क्षण में जागरुकता की । राग द्वेष के प्रति जो भाव आए उसे अलग कर दो । हर समय एकत्व भावना भावो । इस संसार में मैं अकेला आया हूं और मुझे अकेला जाना है तुम्हारे चाहने से कुछ नहीं होता । जैसे कर्म बीज बोए थे वैसा ही फल मिल रहा है । बारह भावनाओं में एक एकत्व भावना है जिसमें कहा है- 

आप अकेला अवतरे मरे अकेला होय 

यों कबहूं या जीव को साथी सगो न कोय ।

एक जीव का जन्म होता है साथ ही हम अनेक संबंध बना लेते हैं । उसकी शुद्ध आत्मा को तो हम भूल ही जाते हैं । कोई कहता है यह मेरा बेटा है, कोई उसे भानजा बनाता है तो कोई उसे भजीता । जन्म पर खुशियां मनायी जाती है परन्तु उसकी आत्मा जो कर्म रोग से इस धरा पर अवतरित हुई है उसके भीतर की शुद्ध आत्मा कोई नहीं देख पाता । हर समय हम शुद्धात्म भाव को देखे । मैं अकेला हूं इसका अहसास करें । ऐसा अहसास करने से अन्तिम समय में तकलीफ नहीं होगी । एक गाली समभाव से सही जाए तो असंख्यात कर्मों की निर्जरा हो सकती है । मोह, वासना, लोभ आए तब अकेलेपन का अभ्यास करना ज्ञाता द्रष्टा भावना भावना । एकत्व भावना की पुष्टि करना इससे कर्म-निर्जरा होगी । देखो सब कुछ बदल रहा है जब जन्म लिया तब कितना छोटा शरीर था । आज कितना बड़ा हो गया तब कर्मों का बोझ था । आज कुछ हल्का और कुछ भारी हो रहा है । हम स्वयं को देखें, स्वयं को जाने और वीतराग भाव में रहें । 

इ्र्रटों का मकान धर्मशाला है

आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

पंचकूला 3 जनवरी, 2008: राष्ट्र संत, युग पुरूष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिव मुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- भगवान महावीर ने परिग्रह को ‘‘मुच्छा परिग्गहो वुत्तो फरमाया’’ । जहां मूच्र्छा, आसक्ति, राग है वहां परिग्रह है । जहां हम जुड़ गए वो है   परिग्रह । वस्त्र, अलंकार, आभूषण, खाना-पीना ये बाहर का परिग्रह है । भीतर का परिग्रह कषाय है । चैबीस तीर्थंकर भगवंतों ने सारे परिग्रह को छोड़ जिन धर्म को अपनाया । वे राजकुमार थे फिर भी उन्होंने किसी व्यक्ति वस्तु स्थान पर ममत्वभाव नहीं रखा । मोक्ष जाने में आसक्ति, परिग्रह बाधा है । मुक्ति के लिए हल्कापन चाहिए और जब हम परिग्रह से मुक्त होंगे तब स्वतः ही हल्कापन आएगा । जहां मोह, अटकाव, आसक्ति है वहाँ बंधन है । सभी महापुरूषों ने परिग्रह का त्याग किया । चाहे वे बुद्ध, नानक, दादू, रज्जब, मोहम्मद या प्रभु महावीर हो । परिग्रह किसके लिए है ? इस शरीर के लिए । शरीर हमारा है ही नहीं । जब शरीर ही हमारा नहीं तब क्यों आसक्ति करनी ?

वीतराग सामायिक में परिग्रह से मुक्ति की निधि प्रतिदिन आपको सिखाई जा रही है । बाहर से नहीं भीतर से परिग्रह का त्याग करो । जिस पर भी ममता है वह साथ नहीं जाता । भरत चक्रवर्ती छः खण्ड के मालिक थे फिर भी र्निममत्व-भाव से जीते थे । अनुभव करो क्या मैरा है, क्या मैं लेकर आया था और क्या मैं साथ लेकर जाऊंगा । सुई की नोक भी साथ नहीं जाएगी । कल पता नहीं आए या न आए । हर श्वांस में भेद-विज्ञान करें । बौद्धिक स्तर पर यह अनुभव करें कि मैं शरीर नहीं शुद्धात्मा हूं । भीतर से यह ज्ञान हो कि मेरा कोई नहीं और मैं किसी का नहीं । यह घर एक धर्मशाला है जिस प्रकार गाड़ी में बैठकर टिकिट का पैसा देते हुए हम नियत स्थान पर उतर जाते हैं उसी प्रकार इस संसार रुपी गाड़ी में हम बैठें हैं । एक समय इससे उतरना ही है । ईटों का मकान धर्मशाला है और शास्वत सत्य सिद्धालय हमारा घर है । 

एक समय में आत्मा सिद्धालय जा सकती है । इतनी शक्ति उसके भीतर है फिर भी हम स्वयं को शक्तिहीन समझते हैं । सारी ममता का त्याग करो आसक्ति को तोड़ो । जिस पर आसक्ति है उसे देखो और उसका विश्लेषण करो । सोचो क्या वह साथ जाएगा मोह दुःख का कारण है । सुबह उठो तो प्रार्थना करो प्रभो ! मेरा पूरा दिन वीतराग भाव में बीते । मैं अनासक्त भाव में जीऊं । प्रार्थना से हर कार्य सिद्ध होता है । हम अनासक्त भाव में जीते हुए अपने घर सिद्धालय लौटें, यही मंगल कामना । 

आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

पंचकूला 4 जनवरी, 2008: राष्ट्र संत, युग पुरूष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिव मुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में भवी अभवी पर प्रकाश डालते हुए फरमाया कि- जो भवी होगा उसके भीतर करुणा होगी, अरहिंतों के प्रति श्रद्धा होगी । उसका हर प्रयास कर्म-निर्जरा का होगा । अभवी में करुणा नहीं होगी । उसको भगवान की वाणी पर श्रद्धा नहीं होगी । करूणा के स्थान पर भीतर क्रोध आएगा । वह स्वयं उपदेश का पालन नहीं करेगा परन्तु उसके उपदेश का श्रवण कर उसे पालन कर अनेक आत्माएं भवी बन सकती है । भवि यानि जो अपने घर मोक्ष सिद्धालय लौटने वाला जीव है उसे भवी कहा जाता है । अभवी जो कभी मोक्ष जाएगा ही नहीं । वह पुण्य बंधन के द्वारा इक्कीसवे देवलोक तक जा सकता है । उसका हर कर्म पुण्य-बंधन का होगा, निर्जरा का नहीं होगा । भवी जीव हर कर्म निर्जरा का करेगा । शेष तो निश्चय में अरिहंत परमात्मा ही जानते हैं । 

हम भीतर करुणा भाव लायें । भगवान की वाणी पर श्रद्धा रखें और हर श्वांस में भेद-विज्ञान   करें । श्वांस को देखें और जाने । सहज श्वांस पर ध्यान करें । मात्र ज्ञाताद्रष्टा भाव में रहें । ध्यान करते समय हमारा मन, चित्त, बुद्धि की एकाग्रता नासापुटों पर हो जहां से श्वांस भीतर जाता है और बाहर आता है । ध्यान की अलग-2 विधियां है । हर विधि को अपनाने जाएंगे तो हम सही राह पर पहुंच नहीं पाएंगे । हम केवल श्वांस को देखें और जाने । देखना जानना ही हमारा स्वभाव है । 

आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

पंचकूला 5 जनवरी, 2008: राष्ट्र संत, युग पुरूष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिव मुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- भगवान ने हमें दो दृष्टि प्रदान की । एक व्यवहार दृष्टि और एक निश्चय दृष्टि । हमने व्यवहार को महत्व दिया और निश्चय को भूल गए । गुरु शिष्य, माता, पिता सभी संबंधों में उलझ गये । शरीर नाम चलाने के लिए मिला परन्तु उसे हमने अपना समझा । निश्चय में हम एक शुद्धात्मा है । तुम्हें निश्चय से अपने भीतर गहरे जाना होगा । दान, शील, तप, माला, पाठ सब एक ही मार्ग पर लेकर जाते हैं । धीरे-2 जाओगे तो स्वयं ही सब समझ में आ  जाएगा । व्यवहार दृष्टि से हम किसी के पिता या पुत्र हैं परन्तु निश्चय में तो हम शुद्धात्मा ही है । स्थानक में भी हमने द्रव्य को महत्व दिया । यहां आकर मुखवस्त्रिका बांधकर वंदना कर सामायिक की परन्तु समभाव भीतर नहीं आया । समभाव भावों से भीतर आएगा । भगवान की वीतरागवाणी यही कहती है कि हम अपना एक लक्ष्य बनायें ।

भगवान ने चार दुर्लभ बातें बतायी जिसमें मनुष्य जन्म, धर्म श्रवण श्रद्धा और पुरूषार्थ है । मनुष्य जन्म हमें मिला धर्म भी मिला । हमने धर्म का श्रवण भी किया उस पर श्रद्धा भी की परन्तु पुरुषार्थ नहीं कर पाये । पुरूषार्थ यही है कि जैसा भगवान ने बताया वैसा आचरण करना । एक बेटा यदि मां को याद ही नहीं करें तो मां बेटे को कैसे बुलाएगी इसी तरह हम भावों में जाकर अरिहंत परमात्मा को याद करें । हमारे भीतर एक विनम्रता का भाव हो, हम संसार के आर्कषण से दूर हो जाएं । निश्चय और व्यवहार को समझें और उनके साथ चलें ।  

आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

पंचकूला 6 जनवरी, 2008: राष्ट्र संत, युग पुरूष, श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिव मुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- प्रभु का मार्ग अनेकान्त का मार्ग है । जब तक जीवन है तब तक व्यवहार है । ज्ञानी पुरूष ने पांच बातें बतलायी जिसमें जीवन का रहस्य उन्होंने हमें समझाया । निश्चय में मैं शुद्धात्मा हूं । व्यवहार में मेरा नाम पद प्रतिष्ठा है । यह संसार व्यवस्थित शक्ति के द्वारा चल रहा है । समभाव से सभी फाईलों को निपटाना है और शुद्धात्मभाव में बढ़ोतरी करनी  है । हम इन पांच बातों को भूल गए और संसार में उलझ गए । भगवान ने कहा- राग द्वेष नहीं करना । हमने राग द्वेष संघर्ष किया जिससे कर्म बंधन में हम बंध गए । जीवन का रहस्य आपके हाथ में आप न पुरूष हो ना स्त्री हो न काला हो ना गोरा हो आप तो केवल शुद्धात्मा हो और आप सबके लिए मुक्ति की प्रार्थना करो । नरक के जीव तीर्यंच के पशु पक्षी सभी मनुष्य सभी देव अपने घर सिद्धालय जायें । यह जगत तो व्यवस्थित चल रहा है परन्तु जागरूकता से हम अपने कर्मों को क्षय कर सकते हैं । सिद्धालय का लक्ष्य सामने हो तो सामग्री साथ-साथ चलती रहेगी । बहिनें उतनी ही सामग्री लेती है जितना भोजना बनाना हो । इसी तरह लक्ष्य को सामने रखें । 

समभाव से फाईलों का निपटारा करें । हमारी सबसे नजदीकी फाईल है शरीर इस पर समभाव ईष्र्या द्वेष क्रोध, मोह इनसे दूर हो हम शरीर को शरीर समझें । शुद्धात्मा का स्मरण हो । हर पल हर क्षण में एक ही भाव कि मैं शुद्धात्मा हूं और मेरा घर परमात्मा है । हर श्वांस कर्म निर्जरा की लें । अगर क्रोध मान लोभ आया तो देखें यह शरीर को आया मुझे नहीं आया और अनित्य भावना भाएं कि मेरा कुछ नहीं मैं किसी का नहीं मैं अकेला हूं । व्यक्ति प्रमाद में आकर निन्दा कर देता है परन्तु कर्म बंधन से छुटकारा मुश्किल है । विश्व में एक ही संबंध बनाना परमात्मा से हर कार्य में वीतराग भाव । श्रीमद् राजचन्द्र जोहरी थे बड़ा व्यापार था फिर भी वीतराग भाव में जीते थे । पूणिया श्रावक सत्य की कमाई पर जीवन यापन करता था हम अपने स्वरूप का बोध करें । सारा संसार असत्य की नींव पर खड़ा है । जीवन में सत्य है तो आत्मा है । हर कार्य को कृतज्ञता से करो । निर्जरा होगी और चारगति चैरासी लाख जीवयोनी का अंत हो हम अपने घर सिद्धालय लौटेंगे । 

के0 एम0 आर0 डी0 जैन काॅलेज फाॅर वूमेन में आत्म: ध्यान का प्रयोग

मालेर कोटला 06 अगस्त 2007  के0एम0आर0डी0 जैन कालेज फाॅर वूमेन में युग पुरूष आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज के के सान्निध्य में आत्म: ध्यान साधना के प्रयोग सम्पन्न हुए । ध्यान शिविर का शुभारंभ काॅलेज की बालिकाओं द्वारा मंगलाचरण से किया गया । काॅलेज की प्रिंसिपल श्रीमती मीना कुमारी एवं काॅलेज मैनेजमेंट कमेटी की तरफ से श्री वीरेन्द्र जी जैन ने आचार्यश्रीजी का काॅलेज की तरफ से अभिनंदन किया । 

श्रमण संघीय मंत्री श्री शिरीषमुनि जी महाराज ने स्कूल के विद्यार्थियों एवं टीचरों को ध्यान साधना के विषय में सम्बोधित किया । मुनिश्री ने कहा कि- बच्चे स्कूल में पढ़ते समय तनाव में जी रहे हैं और जीवन के प्रारंभ में ही तनाव सहित जीवन है तो नौकरी, व्यापार और कर्तव्यों को पालन करते समय तनाव मुक्त जीवन नहीं हो सकता । पढ़ाई का उद्देश्य नौकरी आदि जीवन निर्वाह ही रह गया है अगर पढ़ाई ज्ञान हेतु की जाए तो वह विद्यार्थियों को आनंद प्रदान करती है । 

इस अवसर पर आचार्यश्रीजी ने अपने उद्बोधन में आहार शुद्धि के बारे में अपने विचार प्रकट करते हुए फरमाया कि- हर कार्य 100 प्रतिशत करना चाहिए । उदाहरण स्वरूप अगर एक जगह से दूसरी जगह छलांग लगानी है तो 100 प्रतिशत ही लगानी पड़ेगी अगर 99 प्रतिशत लगा दी तो नीचे गिर जाओगे । डाक्टर बनने के लिए आपने 55 प्रतिशत अंक प्राप्त किए हैं और किसी व्यक्ति का आॅपरेशन करने लग जाओ तो 100 प्रतिशत करना पड़ेगा । आप कहोगे कि 75 प्रतिशत अंक मैंने प्राप्त किए हैं और 75 प्रतिशत ही आॅपरेशन करना है तो व्यक्ति जिन्दा नहीं रह सकता । अतः प्रेक्टिकल में कोई भी कार्य 100 प्रतिशत करना आवश्यक है । आत्म: ध्यान शिविर का रिजल्ट 100 प्रतिशत है क्योंकि यह प्रेक्टिकल कोर्स है, जीवन जीने की कला है । जब पढ़ाई, खेलकूद, आदि जो भी कार्य करो 100 प्रतिशत करोगे तो आपका मन उस कार्य में लगेगा और आप जीवन में सफल होओगे । आहार का भी जीवन में विशेष महत्व है । आहार सात्विक, शुद्ध करना चाहिए । तनाव मुक्ति, एकाग्रता आहार एवं ध्यान के बारे में बताते हुए मुनिश्री ने करीब आठ सौ विद्यार्थियों को ध्यान का प्रशिक्षण दिया और सभी बच्चों ने आनंद और शांति का अनुभव करते हुए उसे जीवन में अपनाने का संकल्प किया और प्रींसिपल ने आगे की क्लासें हेतु मांग की ।

स्कूल की प्रींसिपल ज्योत्सना जी सचदेवा ने मुनिश्री का हार्दिक अभिनन्दन किया और ऐसे कार्यक्रम पुनःपुनः आयोजित हो ऐसी प्रार्थना भी रखी । उन्होंने अपने जीवन में हर रोज ध्यान करने का संकल्प किया जिससे बच्चों को प्रेरणा मिली और उन्होंने भी संकल्प किया । स्कूल के अन्तर्गत आगे भी तीन-तीन दिन के आत्म चेतना शिविर आयोजित किये जाएंगे । 28 जुलाई, 2007 को प्रातः 7.40 बजे से पी0के0आर0 जैन हाई स्कूल में भी बच्चों को ध्यान संबंधी जानकारी दी जाएगी । 29 जुलाई, 2007 से आचार्यश्रीजी के प्रवचन प्रतिदिन प्रातः 8.00 से 9.30 बजे तक एस0एस0 जैन सभा, महावीर भवन, अम्बाला शहर में नियमित होंगे । 

स्कूल के प्रधान श्री रतनलाल जी जैन, कैशियर श्री मनीष जैन, सेक्र्रेटरी श्री अनिल जैन, मैनेजर श्री अरूण जी जैन, श्री उमेश जी जैन आदि उपस्थित थे