PRAVACHANAMALA - 2003

नवता का सार: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी म0

20 जुलाई, 2003 { मालेर कोटला }: आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने श्रद्धालुओं को उद्बोधन देते हुए कहा कि- ‘करो प्यार सत्गुरू से, जीवन सफल बना लो ।‘ इस संगीत के भीतर हमें एक प्रेरणा मिलती है, एक संदेष मिलता है वह यह है कि हम सत्गुरू से प्यार, प्रेम का सम्बन्ध स्थापित करते हुए जीवन को सफल बनायें । दुनियाॅं में हजारों सम्बन्ध है जिस किसी से भी हम आज तक मिले है या सुबह से ष्षाम तक मिलते हैं वहाॅं पर सम्बन्ध स्थापित हो जाते हैं । सम्बन्ध स्थापित होते समय चाहे वह कैसा भी व्यक्ति क्यों न हो, बडा, छोटा, बच्चा हो, व्यापारी हो या कोई घर का सदस्य ही क्यों न हो हम उनके साथ सम्बन्ध का निर्माण कर लेते हैं । इसी तरह  गुरू के साथ सम्बन्ध स्थापित किये जाते हैं उनके सत्संग में आकर । 

एक गुरू को चुन लेना उसकी शरण में आ जाना, वह जो कहे उसे मानना और भीतर उनके प्रति कोई षंका या संदेह नहीं लाना, यह सम्बन्ध स्थापित करने की एक कडी है । उपनि द में गुरू षि य का जो वार्तालाप हुआ है वही वर्णन है । गणधर गौतम ने प्रभु महावीर के साथ वार्तालाप किया या प्रष्नोत्तर किये वही हमारे पूज्य आगम बन गये । आनन्द श्रावक ने भगवान बुद्ध के साथ जो वार्तालाप किया वह त्रिपिटक में समाहित है । गणधर गौतम ने या आनन्द श्रावक ने अपने लिये नहीं अपितु हरेक संदेहषील व्यक्ति के लिए प्रष्नोत्तर किये । 

मनुष्य के जीवन के सामने एक शश्वत् प्श्ष्न है, मैं तृप्त कैसे हो जाउॅं । मुझे आनन्द, षान्ति कैसे मिले । दुनियाॅं का कोई भी व्यक्ति है उसका यह षाष्वत प्रष्न बना हुआ है । व्यक्ति को पद, यष, प्रति ठा मिलने से वह तृप्त नहीं होता । अनेकों व्यक्ति ऐसे हुए जिन्होंने धन कमा लिया परन्तु अन्तिम समय उन्हें समाधि मरण नहीं आया अपितु महावीर, बुद्ध, राम, कबीर इनके पास कुछ भी नहीं था फिर भी वे तृप्त थे, ष्षान्ति आनंद में जीते   थे । उनके पाॅंव में तरंग थी । आॅखों में रोषनी थी । उनका व्यक्तित्व उनके कृतित्व से झरता था । हमने आज तक बहुत सारा धन कमा लिया, अनेकों बंगले, गाडियाॅं खरीद   ली । हमें पद यष प्रति ठा भी मिल गई परन्तु अगर भीतर तृप्ति का भाव नहीं आया तो यह सब अनर्थक है । ज्ञानी का उपदेष ही प्रत्येक मनु य को तृप्त कर देता है । अज्ञानी को कितना भी उपदेष दो उसके उपर कोई असर नहीं होता । यह संसार एक सराय है तूं इसमें अटक नहीं जाना । घर मत बनाना । आगे से आगे चलते ही जाना । इसी भाॅंति यह जीवन भी एक सराय है जिसके भीतर हम जितना दान,ष्षाील, तप भावना का आचरण करेगें उतना ही हमारा जीवन अग्रसर होता जाएगा । हमारे पास धन है पर परमधन नहीं, पद है पर परम्पद नहीं, यष है पर परमयष नहीं । हम परमधन, परमपद, परमयष की प्राप्ति के लिए प्रयत्न करें, तो यह जीवन निष्चय ही सार्थक एवं सफल होगा ।  

आचार्यश्रीजी के आषीर्वाद से मालेर कोटला सब जेल में कैदियों के जीवन रूपान्तरण हेतु पंचदिवसीय आत्म ध्यान साधना षिविर का आयोजन 19 जुलाई से हो रहा है जो 23 जुलाई,2003 तक चलेगा, इस षिविर में अनेकों केैदी भाग लेकर अपने जीवन को सफल बना रहे हैं । इस षिविर का सफल आयोजन श्रमण संघीय मंत्री श्री षिरी  मुनि जी म0 करवा रहे है । आचार्यश्रीजी के दर्षन हेतु आज लुधियाना, रोपड, समाना, संगरूर, धूरी, मण्डी अहमदगढ एवं विभिन्न अॅंचलों से दर्षनार्थी उपस्थित हुए । अनेकों लोगों ने अपने विचार प्रकट किये एवं अपनी नि ठा आचार्यश्रीजी के चरणों में व्यक्त   की । 

हमारी सृष्टि सृजन की हो: जैनाचार्य पूज्य श्री षिवमुनि जी महाराज

21 जुलाई, 2003: मालेर कोटला: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री षिवमुनि जी महाराज ने श्रद्धालुओं को अमृतपान करवाते हुए कहा कि- मनुष्य जीवन की चेतना परमसिद्ध, अरिहंत निराकार, वाहे गुरू को पा सकती है । प्रभु महावीर की देषना आचारांग सूत्र का पहला सूत्र भी यही बताता है यही खोज करवाता है कि मैं कौन हूॅं 9 कहाॅं से आया हूॅं, कहाॅं जाउगां इसकी जानकारी बहुत थोड़े साधकों को है । श्रीमद रायचन्द्र भी यही फरमाते हैं- ‘जे स्वरूप समज्या बिना, पाम्यो दुःख अनन्त, समझव्यू ते पदनमंू श्री सद्गुरू भगवन्त‘ । अनंत संसार में हम रूप, रस गंध, स्पर्ष के पीछे भटके परन्तु हमें अपने स्वरूप का ध्यान ही नहीं है । वस्त्र, बंगला, रूप, रस में हमारी आसक्ति बढती गई जिसे स्वरूप समझना है उसके लिए यह सब बातें गौण है । यहाॅं पर किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं है स्वरूप समझने के लिए कोई भी आ सकता है और स्वरूप समझने के अनन्तर हमें कुछ भी नहीं चाहिये । हरिकेषी, अर्जुनमाली, चण्डकौषिक जैसे नीच गोत्र में जन्म पाकर भी तर  गये । प्रभु महावीर ने अपने सामने कभी भेद भाव रखा ही नहीं । दीपक अलग अलग हो सकते हैं मन्दिर तो एक ही है । रास्ते अलग-2 हो सकते हैं जाना तो एक ही जगह है । हम इस जीवन में सृजनात्मक कार्य  करें । हमारी दृष्टि सृजन की    हो । भेद डालने पर खण्डन बैचेनी तनाव आ जाता है । छोटी -2 बातों में हम अटक जाते हैं । अगर भेदभाव न रखों तो सभी में एक चेतना है । आप समदृष्टि रखें, सभी में एक ही आत्मा है । धर्म तो एक ही है । जिस प्रकार मिश्री कौनसी भी खा लो, कहीं से भी खा लो, किसी तरह से भी खा लो मीठी ही है । धर्म को कोई भी धारण कर सकता है । सिक्ख धर्म की कई बातें जैन धर्म से मिलती जुलती है । धर्म सनातन है । वस्त्र बदलने से व्यक्ति नहीं बदलता । सभी में एक प्रभु का स्वरूप समाया है और उस एक प्रभु में हम सभी समाये हुए हैं । हमारी दृष्टि जैसी होगी वैसा ही हमें दिखेगा, इसीलिए प्रभु महावीर ने अनेकान्त की बात कही । सत्य तो एक ही है, प्रकट अलग-2 तरह से कर सकते हैं । आजकल भेद भाव हमारा तुम्हारा, मेरा तेरा ज्यादा दिखाई देने लगा है । कागज पत्रों पर साईन करवाकर हम धरती तो बाॅंट लेंगे पर नील गगन का क्या होगा 9 आज हम सब उस एक छत के नीचे इकट्ठे हुए हैं जिस छत ने हमे ंधर्म साधना आराधना का रास्ता बताया । 

सभी को धन्यवाद दो । उस माता ने हमें पृथ्वी, ये विष्वलोकन करने का अवसर दिया ऐसी माता को धन्यवाद दो । प्रषंसा और निन्दा दोनों एक साथ साथ ही चलती है जिसकी आज प्रषंसा हो रही है उसकी कल निन्दा होगी ही । 

श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट श्री शिवमुनि जी म0

के पावन सान्निध्य में ‘आत्म शिव दरबार’ मालेर कोटला

में अपूर्व धर्माराधना:-

प्ंजाब प्रान्त के सुविख्यात नगर मालेर कोटला में श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् श्री षिवमुनि जी म0 का चातुर्मास गतिमान है । 9 जुलाई, 2003 को कुप्प-कलाॅं से सीता ग्रामर स्कूल होते हुए आचार्यश्रीजी का मालेर कोटला में भव्य प्रवेष हुआ । प्रवेष का षुभारंभ एस0एस0 जैन गल्र्स स्कूल से हुआ जिसके भीतर अनेकों भाई बहिनों ने अपने हाथ में जैन धर्म का ध्वज लिये आचार्यश्रीजी के पद-चिन्हों पर चले । इस समय इन्द्र देवता ने भी अपनी अपार कृपा मालेर कोटला के उपर रखी । सदर बाजार, मोती बाजार होते हुए लाल बाजार स्थित ज्ञान मुनि नगर ‘आत्म षिव दरबार’ में यह षोभा यात्रा पूर्ण  हुई । आचार्यश्रीजी का भव्य स्वागत एवं अभिनन्दन करने हेतु पंजाब हाई कोर्ट के जज डाॅ0 एम0 एम0 कुमार, सेशन जज भाई सरदार जगरूपसिंह जी- संगरूर, श्री सर्वजीतसिंह जी ए0 एस0 पी0 एवं प्रवेष के अवसर पर मुख्य अतिथि श्री अरिहंत, विष्वनाथ जैन, श्रीमती नीलम जैन ने भी आचार्यश्रीजी का भव्य स्वागत अभिनन्दन किया । इस सुअवसर पर समाजरत्न श्री हीरालाल जी जैन भी आचार्यश्रीजी के स्वागतार्थ पहुंॅचे । इस अवसर पर ध्वजारोहण श्रीमती चन्द्रमोहिनी जैन धर्मपत्नी श्री केसरीदास जैन, मालेर कोटला, चार माह भोजन व्यवस्था श्रीमती विनोद प्रेमचंद जी जैन समस्त परिवार ‘प्रेम प्रोपर्टीज’ वालों का हार्दिक स्वागत किया गया । आस्था टी0 वी0 के प्रसारण सौजन्य श्री प्रेमसागर जैन, लुधियाना आदि का भी स्वागत श्रीसंघ द्वारा किया गया । आचार्यश्रीजी के भव्य प्रवेष के अवसर मंगलदेष की अनेकों मण्डियों से एवं पंजाब प्रान्त के विभिन्न अॅंचलों से श्रावक संघ आचार्यश्रीजी के भव्य स्वागत हेतु उपस्थित हुए, जिसमें सिरसा, लुधियाना, बरनाला, डबवाली, रोपड, होषियारपुर, नालागढ, राणियाॅं, धूरी, नाभा, पटियाला, संगरूर, समानामण्डी, गीदडवाहामण्डी, मलोट, अबोहर, श्रीगंगानगर, हनुमानगढ, केसरीसिंहपुर, पद्मपुर, अहमदगढमण्डी आदि स्थानों से श्रावक संघ उपस्थित थे ।  

आचार्यश्री का चातुर्मासिक संदेश

इस सुअवसर पर आचार्यश्रीजी ने प्रभु महावीर का एक सूत्र धर्म मंगल है, उत्कृष्ट है वह हमारे जीवन में किस प्रकार प्रवाहमान हो । यह प्रवेष केवल मालेर कोटला का ही नहीं अपितु पूरे पंजाब, पूरे विष्व का है । यह वर्षावास भी जन जन का है । वर्षावास के भीतर सेवा, सत्संग, स्वाध्याय के साथ साथ साधना को भी महत्व दें । संगठन के साथ साथ अनुषासन पर भी बल दें आदि भाव आचार्यश्रीजी ने फरमाये एवं जिन-जिन स्थानों पर श्रमण संघीय पूज्य मुनिवृंद एवं महासतीवृंद है उन सबके सफल वर्षावास की मंगल कामना की एवं सभी चातुर्मास स्थलों पर विराज रहे संत एवं साध्वीवृंद जिनषासन की प्रभावना करते हुए सभी. को संस्कारित करें एवं जन जन को जिनधर्म से जोडे, यह भाव फरमाये । श्रमण संघ के घटनाक्रम को एक सामान्य घटना के रूप में लें, अनुषासन की दृष्टि से लें, आपस में अषुभ की ज्यादा चर्चा न करे, षुभ की चर्चा करें । अषुभ की चर्चा करने वाले पत्र पत्रिकाओं एवं समाचारों को महत्व न दे । जीवन में सद्गुणों को महत्व दे । धर्म को महत्व दे । संयम को महत्व दे । संघ का गौरव   बढेगा । लुधियाना संगोष्ठी के पष्चात् हमने चतुर्विध संघ के अनुग्रह पर संगठन के लिए प्रस्ताव मुनियों के समक्ष भिजवाया है, वे पूर्वाचार्यों की व्यवस्था एवं अनुषासन में सहयोग दें ऐसा संगठन हम चाहते हैं ।  

आचार्यश्रीजी 13 जुलाई,2003 से निरन्तर सभी धर्मप्रेमियों को ज्ञान के साथ साथ अनुभव-युक्त वाणी द्वारा लाभान्वित कर रहे हैं जिनके भीतर सत्गुरू किस प्रकार होना चाहिए, सत्गुरू के लक्षण, जीवन का द्वन्द, सत्गुरू का एक मात्र सहारा एवं समय बडा मूल्यवान है, आदि विषयों पर अनुभवात्मक प्रवचन दे रहे हैं, जिसे श्रवण करने हेतु केवल जैन भाई बहिन ही नहीं अपितु जन साधारण भी प्रवचन सुनने हेतु पहुंॅच रहे हैं । 

विधिवत तप साधनाएॅं 

आचार्यश्रीजी के मालेर कोटला चातुमासार्थ बिराजने से तपस्याओं के भी ठाट लगे हुए हैं जिसमें उग्र तपस्विनी महासती श्री सुमित्रा जी म0 एवं श्री संतोष जी म0 जो कि आचार्यश्रीजी की बहिन महाराज है वे चातुर्मास की षुरूआत से ही सर्वतोभद्र तप की आराधना कर रहे हैं एवं महासती श्री सुमित्रा जी म0 के अठाई, तप्त तपस्विनी महासती श्री सुनीता जी म0 के 21 उपवास की तपस्या चल रही है एवं आगे बढने के भाव हैं, महासती श्री चन्द्रप्रभा जी म0 भी चातुर्मास के षुरूआत से ही एकासन-व्रत की आराधना कर रहे हैं । महासती श्री अचला कुंवर जी म0 के चातुर्मास आरंभ से ही एकान्तर तप चल रहा है । आचार्य सम्राट श्री षिवमुनि जी म0, श्रमण संघीय मंत्री श्री षिरीष मुनि जी म0, नवदीक्षित श्री निरंजन मुनि जी म0 के भी निरन्तर एकान्तर तपस्या गतिमान है । इसी तरह श्री सुव्रत मुनि जी म0 भी चातुर्मास से लेकर एकान्तर एकासन की तपस्या कर रहे हैं । वैरागी भाई वैरागिन बहिनों की भी तपस्या चल रही है । महासतीवृंद तपस्याओ की प्रेरणा दे रहे हैं । इसी तरह आज पाॅंच भाईयों ने अठाई की तपस्या आरंभ कर दी है एवं प्रतिदिन तीन आयम्बिल एवं नवकारसी, पौरसी, नीवी, एकासन आदि तपस्याएॅं गतिमान है एवं सामायिक आराधना नियमित चल रही है । 

आचार्यश्रीजी के चातुर्मास में अनेकों धार्मिक प्रवृत्तियाॅं भी गतिषील है, जिनके भीतर चातुर्मास के षुरूआत से सप्तदिवसीय अखण्ड नवकार महामंत्र का चैबीस घण्टे का जाप स्थानक भवन में चलता रहा एवं अब नवकार महामंत्र का जाप घर घर में हर रोज गतिमान है । हर षनिवार को आचार्यश्रीजी के सान्निध्य में उवसग्गहर स्तोत्र एवं चतुर्विंषंति स्तोत्र का जाप हो रहा है । इसके साथ साथ ही सामायिक, प्रवचन श्रवण प्रतिदिन चल रहा है । 

आचार्यश्रीजी ने स्वयं साधना कर जन जन के लिए जो साधना का मार्ग खोला है इससे भी अनेकों जैन अजैन भाई बहिन लाभान्वित हो रहे हैं, जिसमें स्थानक भवन में आचार्यश्रीजी के षुभ सान्निध्य में 15 से 19 जुलाई,2003 तक पंचदिवसीय आत्म ध्यान साधना षिविर हुआ जिसमें अनेक भाई बहिनों ने भाग लेकर अपने जीवन को सफल बनाया। आचार्यश्रीजी की षुभ प्रेरणा से मालेर कोटला स्थित सब जेल में पंचदिवसीय आत्म ध्यान साधना षिविर हुआ जिसमें अनेकों कैदियों ने अपने जीवन का रूपान्तरण किया । इसी तरह जैन स्थानक भवन में बच्चों को संस्कारित करने हेतु बाल संस्कार षिविर भी गतिमान है एवं भविष्य में स्कूल के बच्चों के लिए भी संस्कार षिविर प्रारंभ हो रहे हैं । 

आचार्यश्रीजी के दर्शन हेतु प्रतिदिन भारत के विभिन्न अॅंचलों से भाई बहिनों का आवागमन निरन्तर जारी है । जिसके भीतर सिकन्द्राबाद से महावीर रिलीफ सोसायटी के प्रतिनिधि मण्डल ने आचार्यश्रीजी के षुभ दर्षन कर मार्गदर्षन प्राप्त किया । मंगलदेष के प्रधान डाॅ0 कैलाष जैन, श्री राजेन्द्रपाल जैन- लुधियाना, श्री राकेश जैन - लुधियाना आदि भी उपस्थित हुए एवं अपनी गतिविधियों की जानकारी देकर आचार्यश्रीजी का षुभ मार्गदर्षन प्राप्त किया । आचार्यश्रीजी की ओर से वर्षावास के षुभ अवसर पर श्रमण संघीय संत सतीवृंद से भी पत्राचार किया गया जिसमें अनेको संत सतीवृंद के आचार्यश्रीजी के मालेर कोटला पधारने पर स्वागताभिनन्दन के बधाई संदेष प्राप्त हो रहे हैं एवं आचार्यश्रीजी द्वारा उठाये गये अनुषासनात्मक कदमों का समर्थन कर रहे हैं । हर रोज आचार्यश्रीजी के प्रति समर्पण के समाचार साधु साध्वियों की ओर से प्राप्त हो रहे हैं । 

आचार्यश्रीजी के अग्रिम कार्यक्रमों के अन्तर्गत अनेकों पंचदिवसीय एवं त्रिदिवसीय ध्यान साधना षिविर, मंत्र साधना षिविर, बाल संस्कार षिविर, स्वाध्याय षिविर एवं मुमुक्षु अध्ययन भी गतिमान है । स्थानीय, जैन मिलन, जाप व्यवस्था, ध्यान षिविरों में सेवा दे रहा है । महावीर युवक संघ के प्रधान रजनीष जैन सक्रिय रूप से अपने संघ के साथ जुडे हुए हैं । इसी प्रकार वर्धमान युवक संघ के प्रधान श्री राकेश जैन आदि जुडे हुए हैं और महिला मण्डल की प्रधान श्रीमती सुनीता जी जैन, मंत्री श्रीमती विनोद जी जैन एवं बहु-मण्डल भी सक्रिय सेवाएॅं प्रदान कर रहे हैं । चातुर्मास समिति के चैयरमेन श्री प्रेमचंद जैन, अध्यक्ष श्री रतनलाल जैन, महामंत्री श्री सुदर्शन कुमार जैन, मंत्री श्री प्रमोद जैन, स्टोर इन्चार्ज श्री अशोक जैन आदि मालेर कोटला श्रावक श्रीसंघ के सभी सक्रिय कार्यकर्ता उत्साहपूर्व लेकर जीवन को सफल बना रहे हैं ।

एस0एस0 जैन सभा

जैन स्थानक, मोती बाजार

पो0ः मालेर कोटला

जिलाः संगरूर - पंजाब

 

धर्म कोहीनूर हीरे की भाॅंति है: जैनाचार्य पूज्य श्री षिवमुनि जी म0

22 जुलाई, 2003 { मालेर कोटला }: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री षिवमुनि जी महाराज ने श्रद्धालुओं को अमृतपान करवाते हुए कहा कि- प्रभु नाम पल - पल उचारा करो तुम, न पापों में जीवन गुजारा करो तुम---’ ये पक्तियाॅं हमें नाम स्मरण करने का संदेष देती है । हम अपने जीवन में प्रभु नाम का स्मरण करते हैं तब अपने आप हमारा जीवन प्रभु की ओर मुड जाता है । पल पल जब हम नाम स्मरण करते हैं तब जो हमारा जीवन है वह षुभ कार्यों में लग जाता है । नाम स्मरण करते हुए जब व्यक्ति तल्लीन हो जाता है तब नाम स्मरण स्वतः ही होता है । नवकार मंत्र का सिमरन करने से हमारे भीतर के भाव षुद्ध होते हैं । नवकार मंत्र का सिमरन हम प्रायः मुख से करते  हैं, परन्तु भीतर के भाव अगर नहीं होते तो वह सिमरन, सिमरन नहीं माना जाएगा । महत्वपूर्ण नाम स्मरण नहीं है ? महत्वपूर्ण है तुम्हारे भीतर के भाव । जब तुम भीतर डुबकी लगाकर बैठ जाते हो तो भीतर बहुत आनन्द आता है । श्रद्धा का, विष्वास का दीपक जलता है । अन्धकार से व्यक्ति प्रकाष की ओर मुडता है तो स्वतः ही हमें परम सुख और परम षान्ति का अनुभव होता है । इसी को ही हम सामायिक, प्रार्थना, ध्यान कहते हैं । मूल है भीतर के भाव, अगर भीतर के भाव षुद्ध होंगे तो स्वतः ही चित्त समता में आ जाएगा और सामायिक हो जाएगी । जिस प्रकार मिठाई का मूल षक्कर है । अगर मिठाई में षक्कर न डाली जाये तो वह मिठाई नहीं कहलाएगी, उसी प्रकार घी का मूल दूध है, चाहे हम दही बना ले, लस्सी बना ले अथवा मक्खन बना ले ।

मूल है सिमरन । हम किस भाॅंति प्रभु का स्मरण करते हैं, किस भाॅंति उसे याद करते हैं । जन्म से हमें जैसे संस्कार मिले हैं अन्त तक हम उन्हीं संस्कारों के आधार पर जीते   हैं । महात्माॅं गाॅंधी को अमरीका से एक सज्जन व्यक्ति का प्यार भरा पत्र प्राप्त हुआ, उसमें लिखा था- प्रिय बापू जी ! आप गीता को मानते हो, आप हिन्दू हो तो क्या मैं भी गीता को अपने जीवन में मान्यता देकर हिन्दू बन जाउॅं । तब महात्मा गाॅंधी जी ने प्रत्युत्तर में उस सज्जन को कहा कि- तुम जिस धर्म में हो, जैसे हो, जिसको मानते हो उसी को मानो । परन्तु षर्त एक ही है मानते हुए सच्चाई का परिचय दो । सत्य को अग्रसर करो । अगर सत्य आपके जीवन में आएगा तो अपने आप धर्म से, मान्यता से हम उपर उठ जायेगें । यही बात महावीर की सामायिक कहती है । नानक का सिमरन कहता है । बुद्ध का ध्यान कहता है । पातांजलि का योग कहता है और रमण महऋि की समाधि कहती है । महापुरू  कहते हैं कि जब तुम भीतर डूबकी लगाओ तब अपने घर परिवार को, साथीजनों को एवं संसार को इस भाॅंति भूल जाओ जैसे तुम्हारा इस विष्व में कोई भी नहीं है । भीतर हर पल यही भाव रहने चाहिये कि मैं कहाॅं से आया हूॅं ? मैं कौन हूंॅ ? मैरा अस्तित्व कैसा है ? उस समय आपका भीतर से रूपान्तरण होगा । चिन्तन करते हुए धर्म रूपी कोहीनूर हीरा प्राप्त होगा, तब तुम्हारे भीतर धर्म पल्लवित पु िपत होगा और धर्म ही इस जीवन नैय्या को पार लगाएगा । धर्म एक पुण्य पाथेय स्वरूप है, उस पुण्य पाथेय को कमाने के लिए तपस्या, जप, तप, सामायिक करो और अपने जीवन को सफल बनाओ । 

 

जो धारण किया जाये वह धर्म है: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी म0

23 जुलाई, 2003: आचार्य सम्राट पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने श्रद्धालुओं को उद्बोधन देते हुए फरमाया कि- मानव जीवन की तीन अवस्थाएॅं, बचपन, बुढापा और  जवानी । बचपन भोलेपन में बीत जाता है, जवानी अहंकार में, ऐशो आराम और मौज मस्ती में बीत जाती है । बुढापा जब निकट आता है तब धर्म की याद आती है । धर्माचरण करना चाहता है परन्तु अवस्था ऐसी है कि वह धर्म का आचरण नहीं कर  पाता । ये तीनों मानव जीवन के तीन पडाव है, जिनके भीतर धर्म का आचरण करने से यह जीव सुख शान्ति का अनुभव करता है । शाश्वत सुख आनन्द अगर प्राप्त करना है तो उसके लिए एक ही उपाय है वह है धर्म की आराधना, धर्म का आचरण, धर्म में लीन होना । 

धर्म शब्द बहुत ही व्यापक है इसकी व्याख्या अगर पूर्ण जीवन लगाकर भी की जाये तो भी पूर्ण नहीं हो सकती, ऐसी अलौकिक निधि है धर्म । आज धर्म के नाम पर अत्याचार, युद्ध चल रहे हैं जितनी हिंसा हो रही है वह धर्म के नाम को लेकर ही हो रही है । सम्प्रदायवाद, जातिवाद धर्म के नाम पर ही बढ रहा  है । हर व्यक्ति यह सोच रहा है कि मैं मन्दिर, मस्जिद, गुरूद्वारा या स्थानक में जाऊ, तो मुझे धर्म मिल सकता है । परन्तु वह व्यक्ति यह नहीं सोचता कि धर्म प्रतिपल, प्रतिक्षण होता है । अगर जीवन में धर्म आ जाये तो उस व्यक्ति को हर जगह मन्दिर, मस्जिद, गुरूद्वारा ही दिखाई देते हैं । धर्म की व्याख्या में व्याख्याकार बतलाते हैं कि जो धारण किया जाये वह धर्म है, जो अंगीकार किया जाये, जो स्वीकार किया जाये, जिसमें हम स्वतःरम जाये, जीन हो जाये वही धर्म है । धर्म आप किसी अवस्था में या कही ंपर भी धारण कर सकते हैं । धर्म की शुरूआत हमारे जीवन की शुरूआत है जिस प्रकार शरीर में श्वांस आ रहा है, धडकन चल रही है, नसों में रक्त का प्रवाह हो रहा है यह हर कार्य धर्म से ही हो रहा है । जो सब जगह विद्यमान है । जिसमें हमें आनन्द, शान्ति, समता, प्रेम मैत्री की अनुभूति हो वह धर्म है । वह धर्म हमारे जीवन में आना चाहिये । 

महर्षि वेदव्यास ने अठारह पुराण का सार बतलाते हुए धर्मोंपयोगी दो ही बातें बतलाई । जो भी परोपकार हो रहा है वह पुण्य है और जो अधम एवं नीच कार्य हो रहे हैं वह पाप   है । जब आप किसी का हित चाहते हो, किसी के प्रति मंगल कामना करते हो तो पुण्य हो जाता है । जब आप किसी को काॅंटे चुभोते हो, किसी को शूली पर लटकाते हो, किसी का बुरा सोचते हो तो पाप मार्ग में प्रवृत्त हो जाते हो । पुण्य का संचय, सारे पापों को छोडना और चित्त को शुद्ध करना यह भी धर्म की एक विधि है । इसी प्रकार बुद्ध के अनुयायियों में श्वांस प्रश्वांस को देखना यह एक विधि बतलाई । उसी प्रकार बाबा फरीद के पास कोई व्यक्ति आया, उसे धर्म की प्राप्ति या परमात्मा की प्राप्ति की इच्छा थी, परमात्मा की प्राप्ति के लिए बाबा फरीद ने भी उसे एक विधि बतलाई ।उसमें उन्होंने बतलाया कि सर्वप्रथम शान्त बैठकर श्वांस प्रश्वांस पर ध्यान लाओ, उसके अनन्तर तुझे विचार आयेगें, तू उसे देखते रहना, फिर शून्यता का अनुभव होगा, फिर घबराहट होगी और फिर अपने आप भीतर ही भतर परम शान्ति का अनुभव होगा और मंत्र जाप यह सिमरन अपने आप ही होने लगेगा । प्रभु को पाने के लिए तेरी उत्कंठा बढती जाएगी और तुझे परम आनंद, सुख, शन्ति का अनुभव   होगा । 

आचार्यश्रीजी ने अन्त में बतलाया कि ध्यान करने की अथवा समता में आने की अनेकों विधियाॅं है । उन विधियों द्वारा हम अपना जीवन का रूपान्तरण कर सकते हैं उनमे ंसे कुछ विधियाॅं त्रिदिवसीय ध्यान साधना शिविर में दी जाती है । यह साधना शिविर 24 से 27 जुलाई, 2003 काली माता मन्दिर, मालेर कोटला में लगेगा । 

 

मिटने की कला है धर्म: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी म0

24 जुलाई, 2003 {मालेर कोटला} श्रमणसंघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने श्रद्धालुओं को उद्बोधन देते हुए कहा कि- जीवन की घडियाॅं, वृथा न खोय, ऊॅं जपो, महावीर जपो..... यह जीवन एक पहेली है । यौवन स्मृति की रंगरेली है । जग को जान नहीं पाता हूॅं, निज को पहचान नहीं पाता हूॅं, यही वास्तव में ज्ञानी का ज्ञान है । चातक से सीखो तडफ तडफ मर जाना । पतंगा से सीखो निज अस्तित्व मिटाना । जीवन एक पहेली के रूप में हमें प्राप्त हुआ परन्तु हमने इसे संकल्पना का रूप दिया । माया और स्वप्न में हम फंसते चले गये, उसे ही हम सच मानने लग गये, परन्तु जो इन सब बातों में न अटकते हुए जाग गये उनका जीवन भगवत्ता तुल्य है । हमारे भीतर जागने के लिए प्रेम, सौहार्द, करूणा, मैत्री की भावना होना आवश्यक है । मिटने की कला है धर्म । अपने आपको ऐसे मिटाना, जैसे बूॅंद सागर में मिट जाती है । एक बीज अनेकों परिस्थितियों से मिटते हुए अपने आप पत्ते, शाखाएॅं, वृक्ष, फल, फूल का रूप ले लेते हैं । उसी प्रकार एक पक्षी को जन्म धारण करने के लिए अण्डज रूप में आना पडता है । जब बीज मिट जाता है, अपना अस्तित्व खो देता है तब वह वृक्ष का रूप ले लेता है । वृक्ष का रूप ले लेने के अनन्तर वह मुसाफिरों एवं पशु पक्षियों का आश्रय बन जाता है । 

बसन्त जिस भाॅंति अपने आने की सूचना पूर्व ही दे देता है । कोयल मधुर गीत गाती है । वृक्षों पर नव-पल्लव आता है । कलियाॅं फूल खिलते हैं इसी प्रकार हम भी खिलें । हमें खिलने के लिए अपने अस्तित्व को मिटाना परम् आवश्यक है । जिस प्रकार माॅं के पेट में एक बच्चा नौ माह तक रहता है उस समय गर्भ पालन के लिए माॅं उसका कितना ध्यान रखती है, उसी प्रकार हम धर्म में रहते हुए धर्म का पालन करते हुए उनके नियम उपनियमों का भी ध्यान रखें । अपने आपको अगर कुछ प्राप्त करना होगा तो कुछ मिटाना भी आवश्यक है । इस कडी में सर्वप्रथम हम अपने शरीर को देखेंगे ।

शरीर एक मन्दिर है । इस शरीर के भीतर नौ द्वार है, जिनसे हम भीतर की अनावश्यक वस्तुओं को बाहर छोडते हैं । इन नौ द्वारों से योग भी साधा जा सकता है और भोग भी साधा जा सकता है । अगर इन नौ द्वारों को भीतर की ओर लगा दिया जाये तो वह योग में परिवर्तन हो जाएगा । अगर बाहरी विषयभोगों में लगा दिया जाये तो वह भोग बन जाएगा । नौ द्वारों का हम किस भाॅंति उपयोग करें इसका चिन्तन आप स्वयं करें । 

आचार्यश्रीजी की शुभ प्रेरणा से आज त्रिदिवसीय साधना शिविर काली माता मन्दिर में लगने जा रहा है जिसमें समत्व की साधना शरीर को किस प्रकार साधा जाये, मन, वचन, काया तीनों योगों को किस प्रकार स्थिर किया जाये यह सिखाया जाता है । यह शिविर 24 से 27 जुलाई, 2003 तक चलेगा । 

 

जैनाचार्य श्री शिवमुनि जी म0

25 जुलाई, 2003 {मालेर कोटला} श्रमणसंघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य शिवमुनि जी महाराज ने श्रद्धालुओं को उद्बोधन देते हुए कहा कि- जापान में कुछ मित्रों ने इकट्ठे होकर एक भिक्षु को सत्संग के लिए होटल में निमंत्रण दिया । होटल की सातवीं मंजिल पर सत्संग का आयोजन किया गया । 

नियत समय पर तीस चालीस भाई एवं भिक्षुजी होटल की सातवी मंजिल पर सत्संग हेतु उपस्थित हो गये । उपस्थित होने के अनन्तर होटल काॅंपने लग गया । भूचाल सा आ गया । होटल लकडी का था एतदर्थ 30- 40 मित्र होटल से नीचे उतरने लग गये । होटल से बाहर जाने हेतु सीढियाॅं एक ही तरफ थी इसलिए उतरने वालों की भीड हो गयी । इतने में एक मित्र का ध्यान गया कि भिक्षु भी नीचे आये हैं या नहीं । ढूंढा गया और देखा गया कि भिक्षु नीचे नहीं आये हैं इतने में भूचाल शान्त हो गया, मित्रों ने ऊपर जाकर भिक्षु से पूछा कि भूचाल आया 9 हम सब नीचे की ओर भागे । आप नीचे क्यों नहीं आये, क्या आपको घबराहट महसूस नहीं हुई । क्या आपके ऊपर भूकम्प का प्रभाव नहीं हुआ । प्रत्युत्तर में भिक्षु ने कहा- आप भी भागे और मैं भी भागा, आप बाहर की ओर भागे, मैं भीतर की ओर भागा । आपने आॅंखे बाहर की ओर खोली, में अपनी आॅंखे भीतर की ओर ले गया । आप सब हैरान हो गये । मेरे चित्त में समता व्याप्त हो गयी । भिक्षु का उत्तर सुन सभी प्रभावित हुए । 

शरीर आपको भी मिला है, मुझको भी मिला है और सबको भी मिला है । इसी शरीर के द्वारा भिक्षु भीतर गया । आप सब डरकर बाहर की ओर भागे यह क्या है 9 भिक्षु ने अपने शरीर को साध लिया, शुद्ध दशा प्राप्त कर ली इसलिए वह भीतर की ओर भागा और चित्त में समत्व प्राप्त करलिया सबने शरीर को नहीं साधा । ज्ञानीजन भीतर जाने के लिए कहते हैं, आप सभी बाहर रहते हुए सूर्य का प्रकाश देखते हैं परन्तु जिन्होंने शरीर को साधा है वे भीतर जाकर सूर्य से भी अलौकिक प्रकाश का अवलोकन करते हैं । आपके मन में प्रश्न होगा कि भीतर किस प्रकार का प्रकाश होगा 9 जिस प्रकार अन्धा खीर का रंग नहीं जान सकता, उसी प्रकार हम भी जब तक भीतर की आॅंखें नहीं खोलेगें तब तक भीतर का प्रकाश नहीं जान पायेगें । 

शरीर में नौ द्वार हैं । दो आॅंखें, दो कान, दो नासिका के छेद, एक मुख एवं मलमूत्र निकलने के दो द्वार, आॅंखें खोले तो बाहर का प्रकाश होगा । आॅंखे बन्द करें तो भीतर भी प्रकाश दिखाई देगा । कान से बाहर भी सुनाई देता है परन्तु भीतर भी अनहत नाद बजता रहता है । स्पर्श बाहर अच्छा भी होता है और बुरा भी होता है, परन्तु भीतर का स्पर्श बहुत ही सुन्दर होता है । विचारों से पूरे जगत को जाना जा सकता है और निर्विचार होने पर चैतन्य अवस्था प्राप्त होती है । मौन, शान्ति, समाधि के द्वारा चैतन्य अवस्था को समझा जा सकता है, जितना कम बोलोगे निर्विचार स्थिति प्राप्त होगी । मनुष्य जैसा चिन्तन करेगा वैसे ही विचार उसकी करनी, कथनी में होगें । किसी ने बहुत ही सुन्दर कहा है, देह मन्दिर है, तपोवन है मैरा अन्तः स्थल, आर्य हम मूल है, शायद हमें मालूम नहीं । देह को स्वच्छ और सुन्दर बनावो, नौ द्वारों को भीतर की ओर ले जाओगे तो वह योग का रूप धारण कर लेगें, अगर बाहर की ओर ले जाओगे तो उनके द्वारा भोग, दुःख पीडा की प्राप्ति होगी । पूर्ण दिवस में कम से कम दो घण्टे, नौ द्वारों को भीतर की ओर संकुचित कर लो, फिर जीवन में सुख, शान्ति, आनन्द की प्राप्ति होगी और परिवर्तन दिखाई देगा । हम फिर देह को शुद्ध   करें । अन्तःस्थल को तपोवन बनायें ।

 

आहार एवं आजीविका शुद्धि जीवन को पवित्र बनाती है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

26 जुलाई, 2003 {मालेर कोटला} श्रमणसंघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य शिवमुनि जी महाराज ने श्रद्धालुओं को उद्बोधन देते हुए कहा कि-  देह एक मन्दिर है, तपोवन है मैरा अन्तःस्थल, आर्य हम मूल है शायद तुम्हें मालुम नहीं । हमारा मूल सªोत, श्रेष्ठ आर्य एक शुद्ध परमात्मा है, जो हमारे आत्मा में ही निवास करती है । वह निराकार स्वरूप है, परम आनंद रूप है । यह एक ऐसी आत्मा है जो हमेशा परम सुख, परम र्शािन्त, परम आनंद का अनुभव करती है । इसे कोई शस्त्र काट नहंीं सकता, अग्नि जला नहीं सकती । वायु बहा नहीं सकती । ऐसी हमारी आत्मा परम शुद्ध है । 

इस देह में सब कुछ है । संकल्प, विकल्प, विकास, हªास है । जिस प्रकार दूध में मलाई भी है, रबडी भी है, मक्खन भी है, घी भी है । उपयोग हमारे ऊपर है हम किस प्रकार उस दूध से कौनसा व्यंजन बनाना चाहते हैं । इसी प्रकार देह हमारे पास है, देह का उपयोग करना अपने ऊपर निर्भर करता है । कल मैंने कहा था कि नौ द्वारो ंसे संसार बसता है और नौ द्वारों से ही संसार उजडता है । शरीर के ऊपर हमारी चर्चा चल रही थी । शरीर एक मन्दिर स्वरूप है जिसे हमने कूडादान का रूप दे दिया है । जो भी हमारे मन को भाये, चाहे वह शरीर के अनुकूल हो या प्रतिकूल, उसे शरीर के भीतर डालते ही जा रहे हैं । महापुरूषों की वाणी कहती है कि जैसा हम भोजन करेगें वैसा हमारा शरीर बनता है, इसीलिए ऋषि मुनियों ने अन्न को ब्रह्म रूप कहा है । परमात्मा का रूप है, अन्न । अन्न का कभी भी दुरूपयोग नहीं करना चाहिये ।  प्यार से, भाव से, परम आनंद रूप से उसे भीतर ग्रहण करो । ग्रहण करते समय यह मन के भीतर भाव रहे कि किस प्रकार इस अन्न को बनने में कितनी महान आत्माओं ने अपना सहयोग दिया होगा । परम् शान्त-भाव से उस कवल को ग्रहण करो । भोजन तभी बन सकता है जब हमारी आजीविका शुद्ध और न्याय सम्पन्न हो ।

श्रावक का पहला गुण है न्याय सम्पन्न विभव । कबीर ने भी भोजन के विषय में कहा है कि- हे परमात्मा तुम मुझे इतना देना जिससे मेरे परिवार का पालन पोषण हो और घर पर आया हुआ अतिथि कभी भी भूखा न जाये । मैं भी भूखा ना रहूॅं । इसी प्रकार कबीरजी ने अपनी कमाई भी बहुत शुद्ध रूप से रखी थी ऊन को लाकर चादर को बुनना, उसे बेचना, उसका जो मूल्य आएगा उस पर ही अपना जीवन निर्वाह करना और इतना सब करते हुए मन के भीतर यही भाव रहता था उनके कि राम की चादर, राम ही बनाता, राम ही बेचता, लेने वाला भी राम, देने वाला भी राम । इसी प्रकार अपनी आजीविका शुद्ध रखने वाले अनेकों महान लोग हैं, जैसे लाल बहादुर शास्त्री, महात्मा गाॅंधी आदि महान आत्माओं ने अपने देश के लिए अपनी आहूति देकर जीवन में हमेशा सच्चाई और न्याय से हर कार्य किया ।

जो हम भोजन ग्रहण करते है वह शरीर के में आमूल चूल परिवर्तन करता है । शरीर के भीतर नौ द्वार है उनसे अनावश्यक चीजें बाहर चली जाती है और सूक्ष्म अन्न से माॅंस, मज्जा, रक्त बनता है और उससे सूक्ष्म अन्न से हमारा मन बनता है क्योंकि जिस प्रकार हम अन्न को ग्रहण करेगें उसी प्रकार वह हमारे शरीर के ऊपर प्रभाव करेगा एतदर्थ अन्न को ग्रहण करते समय परम आनन्द, सुख, शान्ति का अनुभव करें । 

 

सात्विक आहार जीवन में सत्वता प्रदान करता है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी म0

27 जुलाई, 2003 {मालेर कोटला} श्रमणसंघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य शिवमुनि जी महाराज ने श्रद्धालुओं को उद्बोधन देते हुए कहा कि- मानव का जीवन सुन्दर है, जिसे देह भी एक मन्दिर की भाॅंति मिली है । इसके द्वारा वह परमात्मा को प्राप्त कर सकता है । अनन्त विभूतियों ने इस देह को परमात्म प्राप्ति तक पहुंॅचाया है और परमात्म तत्व से साक्षात्कार भी किया है । यह देह सुन्दर कैसे बने, इसमें हम चर्चारत हैं । प्रभु महावीर ने शरीर को नौका कहा है । संसार को समुद्र कहा है । महर्षिजन संसार में रहकर शरीर के द्वारा इस संसार समुद्र को पार कर जाते हैं, परन्तु जिस प्रकार नदी या समुद्र में नौका छेद रहित होनी चाहिये उसी तरह  इस शरीर में भी संसार समुद्र को पार करते हुए त्रुटियाॅं नहीं होनी चाहिये । हमारी शरीर रूपी नौका स्वच्छ, सुन्दर, स्वस्थ, रोग-रहित होनी चाहिये । शरीर सुन्दर कैसे बने ? इस पर ऋषियों ने अनेकों प्रयोग किये एवं अनेकों प्रयोजन भी दिये । एक दिन एक ऋषि सूर्य को जल अर्पित कर रहे थे इतने में एक कौवा वहाॅं से गुजरा । जाते जाते वह कोहरूक इस शब्द को तीन बार बोला । इस प्रकार आवाज आने पर ऋषि ने उस कौवे को उत्तर देते हुए तीन शब्द कहे, जो हमारे जीवन में बडे ही उपयोगी है- हितभुख, मितभुख, ऋतभुख । हितभुख का अर्थ- हितकारी भोजन करना है । मितभुख मतलब मितकारी एवं प्रमाण के अनुसार भोजन करना है और ऋतभुख, मतलब ऋतु के अनुसार एवं शरीर के अनुकूल भोजन करना है । 

आज हम कवल आहार की चर्चा करेगें । कवल आहार तीन प्रकार का होता है । तामसिक, राजसिक एवं सात्विक । जैसा मनुष्य होगा वैसा ही वह आहार ग्रहण करेगा । तामसिक आहार करने वाला व्यक्ति आलसी, मोह एवं अधिक निद्रा लेने वाला होगा । तामसिक आहार वह है जिसमें बासी अन्न एवं गरिष्ठ भोजन खिलाया जाता है, वह आहार हमें स्वस्थता प्रदान नहीं करता । बाजारी वस्तुएॅं भी तामसिक आहार में प्रविष्ट होती है । बिस्किट, आचार, पेय पदार्थ एवं तले हुए पदार्थ आदि ग्रहण नहीं करने  चाहिये । राजसिक आहार वह है जिसमें व्यक्ति खट्टा, तीखा अधिक मसालेदार एवं अधिक मिर्च वाला आहार करते हैं । यह आहार गारिष्ट आहार होता है । सात्विक आहार वह होता है जिसमें सत्व की प्रधानता हो । जिसमें शरीर को सत्व अधिक प्रमाण में मिले । सब्जी, दाल भाजी, चपाती आदि सात्विक आहार है । सात्विक आहार करने से शरीर में सात्विकता आती   है । मन स्वस्थ एवं चित्त प्रसन्न रहता है । सात्विक आहार शुद्ध एवं परिपक्वता से परिपूरित है । 

करीब तीन भाई एवं दो बहिनों के अठाई व्रत पूर्णता की ओर है । महासती श्री सुनीता जी म0 के भी आज 15 व्रत हैं, वे भी तपस्या के क्षेत्र में आगे बढ रहे हैं । आचार्यश्रीजी के दर्शन हेतु आज मुम्बई, परवाणु, पंचकूला, लुधियाना, हनुमानगढ, सिरसा, धूरी, संगरूर, अहमदगढ मण्डी आदि क्षेत्रों से भाई बहिन आये हैं । विद्यार्थियों को संस्कार देने हेतु एस0 एस0 जैन माॅडल स्कूल के विद्यार्थियों को मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म0 दि0 28 जुलाई, 2003 को सुबह: 10.15 से 11.30 बजे तक आत्म शिव दरबार में उदॅबोधन  देगें । 

 

28 जुलाई, 2003: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने अमृत-वचनों को प्रस्फुटित करते हुए कहा कि- प्रभु नाम पल पल उचारा करो तुम, न पापों में जीवन गुजारा करो तुम..........हमारे भीतर प्रेम, समाधि, शान्ति, अनुकम्पा आये यह सब कुछ होने के लिए आवश्यक है हम बर्हिमुखी ऊर्जा को भीतर ले आये । जब आप शान्त, मौन होते हो तब आॅंखे बन्द हो जाती है । जब आप जोश में होते हो तो आॅंखे खुलती है और पाॅंचो इन्द्रियाॅं सक्रिय हो जाती है । हमारा जीवन का 80 प्रतिशत समय निस्सार बातों में चला जाता है । 20 प्रतिशत समय में हम प्रतिदिन के आवश्यक कार्य करते हैं और दिन गुजर जाता है । इसी तरह आज तक अपनी इतनी उम्र गुजर गई, जो रही है उसमें हम यह सोचे कि हमारा धर कैसे स्वर्ग बने, एक आदर्श पत्नी, एक आदर्श माॅं, बहिन धर्म की राह पर हमें किस प्रकार ला सकती है । यह सब बातें आहार से जुडी हुई है ।

हमने कल कवल आहार पर चर्चा की थी । जो हम सब इस ब्रह्माण्ड से ग्रहण करते हैं वह हमारे लिए आहार है । आहार को तीन प्रकारों में बाॅंटा गया है । ओज आहार, रोम आहार, कवल आहार । मनुष्य को इन सबका ज्ञान होना अति आवश्यक  है । आपने पशुओं को देखा होगा वे रात में कुछ नहीं खाते  हैं । कुछ पशु ऐसे हैं वे दिन में कुछ नहीं खाते हैं वे रात को ही खाते हैं जैसे चमगादड, उल्लू आदि । कुछ पशु शाकाहारी होते हैं वे माॅंस भक्षण नहीं करते । मनुष्य भी एक ऐसा प्राणी है जो आठों पहर, चैबीस घण्टे कुछ न कुछ खाता ही रहता  है । प्रभु महावीर ने खाने की अपेक्षा अनशन को अत्यधिक महत्व   दिया । हम भोजन छोड देते हैं तो तप से संलग्न हो जाते हैं । मनुष्य जुडा है शरीर से, चेतना जुडी है शरीर से, सारे सम्बन्ध हमने इस शरीर से बनाये रखे हैं परन्तु जब शरीर के भीतर की चेतना परलोक के लिए अग्रसर हो जाती है तब सारे सम्बन्ध समाप्त हो जाते हैं । हमें सारी परेशानी है रोटी, कपडा और मकान   की । कई कई प्रदेशों में ऐसा भी देखा गया है कि वे बिना मकान और बिना कपउे के रह लेते हैं परन्तु रोटी उनके लिए अत्यावश्यक   है । कई कई महानुभाव इस प्रकार भी कहते हैं कि भोजन के बिना भजन भी नहीं होता, परन्तु प्रभु महावीर ने भोजन की अपेक्षा अनशन को महत्व दिया है । उपवास में तुम्हारा चित्त आत्मा से मिल जाता है । आत्म परमात्मा से मिल जाती है । शव से शिव का रूप धारण कर लेती है । प्रकृति से पुरूषता का रूप धारण कर लेती है ।

गुरू का सान्निध्य हमे ंचेतना से मिला देता है । तुम जिस प्रकार गुरू को या अपने इष्ट को स्थान देते हो उसी तरह आहार को भी स्थान दो । आहार करते समय भीतर कृतज्ञता के, विनम्रता के भावांे को आरोपित करो, तभी तुम्हारा आहार करना सफल होगा । ओज आहार वह है जब एक बच्चा माॅं के गर्भ में आता है तब माता पिता के संयोग से जो आहार वह ग्रहण करता है उसे ओज आहार कहते हैं । जब तक उसकी आयु रहती है तब तक वह ओज आहार उस बच्चे में विद्यमान रहता है । ओज आहार ग्रहण करते समय बच्चा किस भावदशा में है एवं माता पिता के कैसे विचार हैं, कैसे संस्कार है उसी भाॅंति के विचार और संस्कार उस बच्चे के ऊपर आयेगें । ओज आहार सम्पूर्ण जीवन में एक ही बार ग्रहण किया जाता है ।  जिस समय बच्चा गर्भ में होता है उस समय माॅं धर्म में अपने मन को लगाये तो वह बच्चा धर्म के मार्ग पर चलेगा । सत्गुरू के संग में आएगा । यह माॅं का परम कर्तव्य है ।

 

29 जुलाई, 2003 {मालेर कोटला} श्रमणसंघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य शिवमुनि जी महाराज ने श्रद्धालुओं को उद्बोधन देते हुए कहा कि- करो प्यार सत्गुरू से, जीवन सफल बना लो, यह तन न फिर मिलेगा, कुछ नाम धन कमा लो । सत्गुरू का शरणा, सत्गुरू की मैत्री, सत्गुरू के चरणों में आना हमे ंसत्संग की ओर ले जाता है । जब मानव धर्म में आता है तो पुण्य की प्राप्ति होती है । पुण्य प्राप्ति के अनन्तर समृद्धि बढती जाती है फिर सुख और आनंद अपने आप प्राप्त होते हैं । सौभाग्य अपने आप खींचा चला आता है । फिर मंगल होता है और मंगल ही धर्म है । परमात्मा से जुडने वाला धर्म है । धर्म की ओर हम सत्गुरू की शरण में आकर ही जुड सकते हैं । बहुत से आयाम है धर्म से जुडने के । सत्गुरू हमें जीवन में एक उत्तम शिक्षा देता है, कब ध्यान करना है, कब तप करना है, कब सेवा आदि कार्य करने  हैं । यह सत्गुरू ही बताता है । जब हम सत्गुरू के पास नहीं होते तो समस्याएॅं हमें घेर लेती  है । जहाॅं समस्या है वहाॅं समाधान भी अवश्य होता है । जब व्यक्ति उद्विग्न, क्रोधित होता है, छोटी समस्या, बडी समस्या बन जाती है तब हमारा चित्त समता में नहीं होता हमारा चित्त समता में कैसे रहे, धर्म प्रतिपल प्रतिक्षण हमारे साथ कैसे रहे । हमारा जीवन धर्म में कैसे जुटे, आहार किस प्रकार शुद्ध बने यह चर्चा हमारी चल रही थी ।

ओज आहार में माता पिता द्वारा हमें जीवन भर के संस्कार मिले, धर्म के संस्कार   मिले । कवल आहार से हमने किस प्रकार खाना, कैसे खाना, कौनसा खाना यह  सीखा । अब हम रोम आहार की चर्चा करेगें । जिस प्रकार हम नासिका से श्वांस लेते हैं, उसी प्रकार शरीर का कण कण श्वांस लेता है । हमारे शरीर पर साढे तीन करोड रोम है । आपने देखा होगा गर्मी में हमें प्रत्येक शरीर पर पसीना आता है तो वह रोम से ही आता है । हर रोम में छिद्र है । स्थान का भी रोम आहार में विशेष महत्व है । हम होटल, सिनेमाघर में जाते हैं अथवा अस्पताल में जाते हैं तो हमारा मन, हमारे विचार बदल जाते हैं, यह रोम आहार का ही प्रभाव है । जब हम मन्दिर में या धर्म स्थान में जाते हैं तब हमारे विचार, संस्कार बदल जाते हैं यह भी रोम आहार का ही प्रभाव है । रोम आहार प्रत्येक इन्द्रिय से आहार ग्रहण करता है । 

रोम आहार तीन प्रकार का बलताया गया है- तमस रोम आहार- जिसमें हमारा चित्त अगर कोई गाली गलोच दे, मारपीट करे तो उत्तेजित हो जाता है । हमारे संस्कार बदल जाते  हैं । यह तमस रोम आहार है, इसी प्रकार रजस रोम आहार- में भी अगर कोई हमें ऊॅंच नीच शब्द कह दें या हमारे से कोई गलती होने पर सामने वाला हमे उस गलती के प्रति कुछ कहे तो हमारे संस्कार, हमारी इच्छाएॅं हमारे विचार बदल जाते हैं यह  रोम आहार ही है । तमस रोम आहार और रजस रोम आहार छोडने योग्य है । ऐसे स्थानों में जाने से हमारा चित्त, हमारा मन गलत धारणाओं में चला जाता है । ऐसे स्थानों का हमें प्रयोग नहीं करना चाहिये । सत्व रोम आहार वह है जहाॅं पर हमें रोम-रोम से सात्विक विचार हमारे शरीर को घेर लेते हैं, जैसे मन्दिर, धर्म स्थान आदि जगह पर हमारे विचार शुद्ध बनते हैं । प्रार्थना, सत्संग, सेवा, प्रशंसा, मंत्रोच्चारण करते हुए हमारे विचार शुद्ध एवं सात्विक बनते हैं । ऐसी जगह का हमें अनुभव लेना चाहिये, जिस प्रकार हम नदी के किनारे अथवा अग्नि के पास बैठते हैं उस समय न हम पानी पीते हैं, न हम सेक लेते हैं फिर भी हमें ठण्डक अथवा उष्णता का अनुभव होता है, यह रोम आहार ही है । प्रभु महावीर के पास सत्संग करने से अंग अंग कण कण रोया रोंया धर्म में रंजित हो जाता था । संस्कारित हो जाता था । पल भर का सत्संग भी जीवन को बदल देता था, यह भी रोम आहार का ही प्रभाव है । जहाॅं झगडे, कलह व निन्दा होती है वहाॅं पर नहीं जाना चाहिये क्योंकि वहाॅं से जो हमारे संस्कार आयेगें वह रोम आहार में परिवर्तित होकर पूरे शरीर पर प्रभाव डालेगा एतदर्थ ऐसे स्थानों का वर्जन करना चाहिये ।

मानवता के मसीहा: आचार्य सम्राट् श्री आनंद ऋषि जी महाराज

 

आचार्य सम्राट् श्री शिवमुनि जी महाराज

30 जुलाई, 2003 {मालेर कोटला} श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् श्री शिवमुनि जी महाराज ने आचार्य सम्राट् पूज्य श्री आनंद ऋषि जी म0 की 104 वीं जन्म-जयन्ती पर अपने भावों को अभिव्यक्त करते हुए कहा कि- पूज्य आचार्य सम्राट् एक महान गुरू, सत्गुरू थे । श्रमण संघ के द्वितीय पट्टधर जप, तप, साधना के कर्मयोगी, अहिंसा, करूणा, मैत्री के मसीहा पूज्य आचार्यश्रीजी थे । दिल में दर्द होते हुए भी आॅंखों पर मुस्कान थी । मालेर कोटला वासियों ने उनकी सेवा, सुश्रूषा का लाभ लिया है । उनका चातुर्मास करवाया है । उनके प्रवचन सुने हैं । आप लोगों की सेवा भावना बहुत  प्रशंसनीय है । आचार्यश्रीजी ने पंजाब में दो वर्षावास किये, प्रथम लुधियाना और उसके अनन्तर दूसरा मालेर कोटला । जब आचार्य भगवन की चरण रज यहाॅं पडी, उनकी अमृतमय वाणी सुनकर यह नगरी धन्य हो गयी । मेरा भी प्रथम वर्षावास यहीं पर  हुआ । मूल्य धन का, श्रृंगार का या तिजोरी का नहीं है । मूल्य भक्ति, श्रद्धा, प्रेम, निष्ठा का है । पंचम-काल में मोक्ष गति नहीं है तो भक्ति एवं ध्यान अवश्य है जिसके द्वारा हम उस मोक्ष पथ में सहायक बन सकते हैं । आया ही था ख्याल की आॅंखें छलक पडी । आॅंसु किसकी याद में कितने करीब थे । किसी गुरू का नाम लेते ही चित्त विभोर हो जाता है और आॅंखों में आॅंसू आ जाते हैं । एक आॅंसू हम बच्चे धन, परिवार के लिए निकालते हैं । एक आंॅंसू परमात्मा की याद में, सत्गुरू की याद में निकालते हैं । परिवार के लिए निकाले हुए आॅंसू अपना महत्व नहीं रखते परन्तु परमात्मा सत्गुरू के लिए निकाले हुए आॅंसू मोती बन जाते हैं ।

तुम्हारे इश्क ने सिखलाई मुझे ये तीन बातें, 

कभी रोना, कभी हसना, कभी गमगीन हो जाना ।

जीवन में तीनों ही बातें आवश्यक है । चन्दन बाला के साथ प्रभु महावीर के समय ये तीनों बातें घटित हुई थी । हमारी ऊर्जा, हमारा प्रेम, शक्ति शुभ कार्यों में लगे, भक्ति में लगे, साधना में लगे । अरिहंत की वाणी, सिद्ध का स्मरण, साधु का संग जीवन के लिए परमावश्यक है । आज पूज्य आचार्य भगवंत की हम 104 वीं जन्म-जयन्ती मनाने जा रहे हैं, उनसे सम्बन्धित कुछ संस्मरण सुनाने का प्रयास करूॅंगा । आचार्य भगवंत के भीतर बहुत से सद्गुण थे । उनमें से कम बोलो और सुनो ज्यादा, यह एक सदगुण हमारे जीवन में कायाकल्प कर देता है । एक बार पूना के अन्दर पूज्य आचार्यदेव अस्वस्थ थे । प्रवचन का समय हो रहा था । अस्वस्थ होते हुए भी पूज्य आचार्यश्रीजी प्रवचन के लिए चल पडे तब मैंने कहा इतने सारे संत हैं कोई भी प्रवचन कर देगा । आप क्यों कष्ट उठाते हैं । तब उन्होंने एक बात कही थी जो मेरे जीवन में परम् उपयोगी बनी -’जब कर्तव्य पुकारे उसकी पालना करनी चाहिए’ । हर व्यक्ति का अपना कर्तव्य   है । उनके चिन्तन में चेतना थी । अन्तःकरण में कोमलता, मुख में मृदुलता, शरीर में कोमलता । उनका सारा जीवन निर्मल था । जीवन के 75 वर्ष भारतभर भ्रमण कर जिनवाणी का प्रचार प्रसार किया और श्रमण संघ की शान बढाई । आपने जगह - 2 पर पुस्तकालय, विद्यालय, औषधालय खुलवाकर जन-जन की सेवा की भावना हर मानस में भरी । महापुरूष संवेदनशील होते हैं, उनकी दृष्टि विशाल हेाती है, वे छोटे से छोटे व्यक्ति का भी ध्यान रखते हैं । उनके पास बैठने से ही समस्या का समाधान हो जाता है । श्रमण संघ की गद्दी पर उन्होंने अपना तीस वर्ष शासन चलाया । उनके जीवन में श्रमण संघ को सृदढ एवं संगठित रखने की भावना थी । इसीलिए उन्होंने सन् 1987 में पूना {महाराष्ट्र} में पूरे श्रमण संघ का सम्मेलन बुलवाया जिसके भीतर अनेकों प्रान्तों से अनेकों पदाधिकारी संत या उनके प्रतिनिधि संत साध्वीवृंद करीब 360 की संख्या में उपस्थित थे । दस दिन तक चर्चा चली, उसके अनन्तर उन्होंने उपाचार्य, युवाचार्य की घोषणा दीर्घ दृष्टि से सर्वसम्मति से लाखों श्रावक श्राविकाओं के बीच सभी संत एवं सतीवृंद की सहमति से की । जब मैं प्रथम बार उनके दर्शन के लिए गया तो उन्होंने मुझे इतना वात्सल्य दिया जिसे मैं भुला नहीं  सकता । आचार्यश्रीजी ने अपने प्रवचन में आज पूज्य आचार्य श्री आनंदऋषि जी म0 के जीवन से जुडे अनेक संस्मरणों को सुनाया ।

आचार्यदेव की जन्म-जयन्ती पर पूज्य श्रमण संघीय मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म0, श्री सुव्रत म0, महासती श्री ओम प्रभा जी म0, महासती श्री ऊषा जी म0 ने अपने भाव व्यक्त किये । उसी भाॅंति श्री सुरेन्द्र कुमार जी, श्रीमती रजनी जैन ने भी अपनी भावनाएॅं अभिव्यक्त की । पूज्य आचार्यदेव की जन्म जयंती के उपलक्ष में आज सामूहिक आयम्बिल करवाये गये जिसके भीतर सैकडो भाई बहिनों ने भाग लिया एवं छोटे बच्चों के लिए ‘फ्री हेल्थ चैकअप केम्प’ भी 3 अगस्त, 2003 को रविवार के दिन जैन माॅडल स्कूल में करवाया जाएगा । 

आचाय्रदेव का गुणगान करने हेतु एवं आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी म0 के दर्शन हेतु आज लुधियाना, नकोदर, संगरूर, धूरी, मण्डी अहमदगढ आदि स्थानो ंसे भाई बहिन एवं श्रावक संघ उपस्थित हुए ।  

चित्त को स्थिर करने हेतू मन को शुभ आलम्बनों में लगाओ

 

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

31 जुलाई, 2003 {मालेर कोटला} श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् श्री शिवमुनि जी महाराज ने उद्बोधन देते हुए फरमाया कि- प्रभु महावीर को नमस्कार करने से क्या होता है ? जैन भाई जब आपस में मिलते है तो जय जिनेन्द्र कहते हैं, हिन्दू राम राम करते हैं, सिक्ख वाहे गुरू कहते है । जब दो भाई आपस में मिलते हैं तो सम्बन्ध बनाने हेतु सर्वप्रथम अभिवादन करते हैं । ये बातें व्यवहारिक है, शिष्टाचार की है ताकि हम आपस में सम्बन्ध स्थापित कर सके । आपने ध्यान किया होगा कि बच्चे बहुत जल्दी अपने बडों के या आस पास के वातावरण के  इशारे पकड लेते हैं । बच्चों को पता नहीं किस भाॅंति, किसके साथ बोला जाये । परमात्मा सर्वज्ञ सर्वदर्शी है । सबके भावों को वह जानता है । छोटा सा बच्चा अपने भाव जान लेता है तो क्या अपने भाव परमात्मा नहीं जान पाएगा । वह सर्वज्ञ होने के नाते सब कुछ जानता है । 

प्रभु महावीर ने कहा कि संसार में दुःख है, दुःख का कारण है, कारण से मुक्ति है, मुक्ति से परमानन्द प्राप्त होता है । संसार में जन्म, जरा, मृत्यु, व्याधि सब तरफ दुःख ही दुःख है । हम जानते हुए भी बाहर नहीं निकलते । जो जीव जिस योनी में आया है उसे वैसे ही संस्कार है । वह उन्हीं संस्कारों में रहकर आगे बढता है । दुःखों को हम दुःख मानते नहीं । दुःखो ंसे कैसे पार जाओगे । दुःख का कारण कर्म है । कर्म के कारण राग द्वेष पैदा होता  है । संसार चंचल है । दुःख रूप है । क्यों कि चित्त चॅंचल है, चलायमान है, भ्रमित  है । प्रभु महावीर को अनेकों दुःख होते हुए भी उन्हें दुःख नजर नहीं आये । वे मौन और शान्ति में लीन थे । हमारा चित्त जब भ्रमित होता है तब हमें दुःख नजर आते   हैं । मन चित्त स्थिर नहीं है । महापुरूषों ने कहा, चित्त को स्थिर करने हेतु मन को शुभ आलम्बनों में लगाओ । भक्ति, ध्यान, प्रार्थना, सामायिक, नमस्कार मंत्र का जाप ये शुभ आलम्बन है । जो हमारा मन बाहर भटक रहा था, उसे भीतर की ओर लगा दिया तो परिवर्तन हो गया । बाहर में भटकने वाला चित्त भीतर पाॅंच मिनिट में ही शान्ति, समाधि को प्राप्त कर सकता है । अगर वह शान्ति और समाधि विधि से प्राप्त की जाये तो जब चित्त शान्त होता है तब संवर और निर्जरा होती है । जब संवर और निर्जरा होती है तब पुण्योदय होता है या पुण्य संचित होता है । तुम आराधना, भक्ति करो, भीतर डूब जाओ, भूल जाओ अपने अस्तित्व को और अरिहंतमय हो जाओ । जिस प्रकार नमक पानी में मिलकर पानी का रूप धारण कर लेता है उसी भाॅंति आप मिल जाओ । जैसा प्रयोग आप चित्त का करोगे वैसा परिणाम आएगा । पल पल बीता जा रहा है । हम समय बर्बाद न करते हुए इस अनमोल समय को समझे । 

श्वासों का भरोसा नहीं, कब रूक जाएगी । एक एक श्वांस देखो । भीतर भी ध्वनि है । श्वांस की अपनी ध्वनि है, जिसे शान्ति से, समता से पाया जा सकता है । जिस प्रकार व्यक्ति मेहनत की कमाई व्यर्थ नहीं करता है उसी प्रकार इस मानव भव में साॅंसों की कमाई व्यर्थ न जाने दो । मन को, चित्त को, शुभ आलम्बन में लगाने के साथ साथ गुणों का स्मरण करो तब ध्यान घटित हो जाएगा । भगवान की भक्ति करो, तल्लीनता में आ जाओ, तुम शुद्ध और पवित्र हो जाओगे । पानी की कीमत तभी है जब तुम्हें प्यास  लगी हो । भोजन और सोने की कीमत भी तभी है तब तुम्हें भूख और नींद आये । इसी प्रकार भक्त् िकी कीमत तभी है जब आपका मन, चित्त भीतर की ओर डूब जाये । डूबने के अनन्तर कुछ गुनगुनाये तब तुम्हारा चित शुद्ध बुद्ध मुक्त हो जाएगा । मंत्र जाप में लग जाएगा । शब्दों से मौन अवस्था से जाप करने से अधिक फल मन से जाप करने पर है । जब तुम तल्लीन हो जाओगे, भीतर अपने आप जाप प्रस्फुटित होगा केवल आपका ध्यान वहाॅं होना चाहिये । यह जीवन पतझड बसन्त की भाॅंति है । इसका महत्व समझते हुए जीवन को शुभ आलम्बनों में लगावें ।

 

परमात्मा प्राप्ति के लिए भक्ति आवश्यक है: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी म0

1 अगस्त, 2003 {मालेर कोटला} श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् श्री शिवमुनि जी महाराज ने उद्बोधन देते हुए फरमाया कि- भक्त का हृदय पुकारता है परमात्मा के प्रति अनुग्रह करता है उस भक्त को परमात्मा जगह-2 और स्थान-स्थान पर वृक्षों के पत्तों में, चन्द्रमा में, सूर्य में, बादलों में दिखाई देता है । मनुष्य में परमात्मा का प्रतिबिम्ब झलकता है जब वह भक्ति करता है । भक्ति परम आवश्यक है । क्या है   भक्ति ? कोई व्यक्ति बिरला ही होता है जो भक्ति तक पहुंॅच पाता है । तुम मिटो परमात्मा तुम्हारे द्वार पर दस्तक देगा । जब तक हमारे मन में कुछ बनने की पद की, प्रतिष्ठा की, मान 

सम्मान की, रूप रस गन्ध की कामना है तब भक्त हृदय तुम नहीं बन सकते । जब भक्त के मन में कुछ माॅंगने की पद प्रतिष्ठा की कामना है तो वह भक्त नहीं ? भिखारी बन गया । सौदा दुकानदाारी कर ली उसने । हमने परमात्मा को कुछ दिया भी नहीं और अर्पण भी नहीं किया और याचना करने लग गये । तुम चाहे मन्दिर मस्जिद गुरूद्वारा कहीं पर भी जाओ । मन में कुछ माॅंग होती है । कुछ माॅंगने की इच्छा होती है तुम्हें माॅंगना ही है तो परमात्मा से परम पद की याचना करो । परमात्मा में विलीन हो जाओ । जब परमात्मा ही मिल जाएगा तो किसकी अपेक्षा, जब कोहिनूर हीरा मिल जाएगा तो कंकर पत्थर क्या करना- 2 । नानक, दादू, रज्जब ने भक्ति की थी और वे उस परम पद की प्राप्ति की ओर बढ गये । नानक ने गा-गा कर परमात्मा को पा  लिया । भक्ति करने के लिए मरना मिटना पडता है, अपने अस्तित्व को मिटाना पडता है, तब परमामा मिलता है ।

परमात्मा एक ही है । जो भक्ति ज्ञान क्रिया है उसका सार परमात्मा में आ जाता है । जब ज्ञान, वैराग्य, भक्ति होती है तब मृत्यु नजदीक होते हुए भी इस भाॅंति समझो कि दोस्त का पैगाम आ गया है । परमात्मा की पूर्ति में अपनी पूर्ति समझना वही भक्ति है । जिसको मानते हो उसमें पूर्ण हो जाओ । चाहे वह वाहे गुरू हो, राम हो, रहीम हो या नमोक्कार मंत्र हो । इस भाॅंति लीन हो जाओ कि अपने देह का भान भी आपको ना रहे । भक्ति करो, भक्ति में बडी शक्ति है वह ही हमें पार लगा सकती है । इस जीवन में दो ही बातें संसार सागर से छूटने के लिए हैं । एक ध्यान करो और दूसरा भक्ति  करो । इन दोनों में जीवन का सारा सार समाया हुआ है । 

 

परमात्म प्राप्ति का राजमार्ग है भक्ति: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी म0

2 अगस्त, 2003: श्रमण संधीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने भक्ति के ऊपर प्रकाश डालते हुए फरमाया कि- हृदय के भीतर भक्ति की जिज्ञासा ही नहीं तो भगवान नहीं मिल सकते । जो भक्त है उन्हें भगवान से प्रमाण पत्र नहीं लेना पडता कि मैं भक्त हूॅं । तुम प्रार्थना, भक्ति, आराधना करो । प्रमाण पत्र मत माॅंगों । भक्त मिटता है तब भगवान का आविर्भाव होता है । बीज मिटता है तो वृक्ष का रूप धारण कर लेता है । अण्डा मिटता है तो पक्षी का रूप धारण कर लेता है उसी प्रकार हम भी मिटे । हमारा अहंकार टूटे । पक्षी जब तक घोसले में हैं उसे अच्छा लगता है । जब उसके माता पिता उसे घोसले से बाहर निकाल देते हैं । तब उसे पता लगता है कि घोसले में बन्द होना कितना भयानक है । स्वच्छंद विचरण करना कितना अच्छा है । 

अहंकार सबसे बडी बाधा है । हम संसार में भी रहना चाहते हैं और परमात्मा की प्राप्ति भी चाहते हैं, परन्तु एक म्यान में दो तलवारंे नहीं बैठ सकती । यह अटल सत्य है कि एक को पाने के लिए दूसरा छोडना ही पडता है । भक्ति प्रेम का विराट् स्वरूप है । प्रेम की भीतर माॅंग है, वासना है, परन्तु ये सब छूट जाता है और प्रेम का ऊध्र्वगमन होता है तब भक्ति प्रस्फुटित होती है । प्रेम, वासना की चाहना करता है, अगर हम माॅंगने जाये तो प्रेम जब शुद्ध होता है तो वह स्वयं भक्ति स्वरूप होता है । महापुरूषों ने प्रेम की चार सीढियाॅं बतलाई है । पहली सीढी है, स्नेह - छोटों के प्रति या अपना बेटा शिष्य या विद्यार्थी के प्रति हम स्नेह रखते हैं, दूसरी सीढी है - प्रेम- अपने समान के प्रति हम प्रेम रखते हैं जैसे मित्र, पत्नी, पति । तीसरी सीढी है श्रद्धा- जो अपने से बडों के प्रति रखते हैं । माता पिता गुरू आचार्य इनको श्रद्धास्पद माना जाता है । जब श्रद्धा से भी व्यक्ति ऊपर उठता है तब परमसत्ता के प्रति श्रद्धा होती है, तभी भक्ति जागती   है । परमसत्ता ऐसी अवस्था है जब हमें कुछ भी नहीं चाहिये, रोटी, कपडा, मकान,पैसे, यश, पद, धन, दौलत कोई भी माॅंग नहीं रहती तब परमसत्ता प्रकट होती है । परमसत्ता के प्रति प्रेम है तो यह कुछ भी नहीं चाहिये । 

 

सुख और दुःख

शिवमुनि जी महाराज ने भक्ति के ऊपर प्रकाश डालते हुए फरमाया कि- मनुष्य के भीतर जब भक्ति का भाव उमडता है, जब प्यारे प्रभु की याद आती है तब उसका हृदय डोलने लग जाता  है । मन आनंदित, चित्त प्रफुल्लित हो जाता है । चेहरे पर अनोखी आभा आ जाती   है । तब उसका जीवन स्वर्णिम बन जाता है । उसे कोई आवश्यकता नहीं रहती । जब व्यक्ति धािर्मक बन जाता है । प्रभु महावीर की वाणी  सामायिक, ध्यान, कायोत्सर्ग जब होता है तब चित्त में वैराग्य आता है । उदासी या संकीर्णता नहीं आती । महावीर का वैराग्य चित्त में आनन्द तृप्ति का भाव है । इसीलिए कहा है कि साधु को इतना सुख है जितना इन्द्र को भी नहीं । साधु का सुख, समता, इन्द्रिय विजय में है । ध्यान और भक्ति दोनों आपस में जुडे हुए हैं । भक्ति करते हुए व्यक्ति ध्यान में चला जाता है । हमारा मूल ध्यान ही है । सांसारिक लोगों का प्रेम पत्नी, पैसा, यश से होता है । संकीर्ण दृष्टि होती है परन्तु जब यही प्रेम समर्पण की ओर आगे बढता है तब भक्ति होती है । भक्ति जिनेश्वर भगवान की करें । 

स्थानकवासी परम्परा भी यही कहती है कि हम अपने निज स्थान में आ जाये । जो मूल सौम्य अमृत सार था उसे हमने अलग कर दिया । मूल परम्परा निज घर में लौटने की है । सामायिक करते करते हम कितने गहरे जा सकते हैं । कितने समता में जा सकते है यह अन्दाजा लगाया जा सकता है । महावीर की मैत्री, संगठन, करूणा, प्रेम को महत्व दो । प्रभु महावीर ने कहा कि परनिन्दा नहीं आत्म-निन्दा करो । दूसरों की आलोचना करने के बजाय अपनी आलोचना करो । रोज का हिसाब किताब आलोचना द्वारा पूर्ण कर लो । परम धन, परम संपदा, परम ऐश्वर्य की कामना करो । यही हमारा मूल धर्म है । 

हमारी मूल सम्पत्ति शान्त, निर्विचार, निर्वेर हो जाने की है इसलिए तो भगवान महावीर ने अनेकान्तवाद पर जोर दिया । भीतर की समाधि आती है, समय के साथ आती है परिस्थितियाॅं बदल जाती है । चित्त का वैराग्य कैसे बढे हम इसे महत्व दे, जो कुछ हमारे पास है हम उसे बाॅंटे । भक्ति जब जीवन में आती है तब श्रद्धा और ग्रहणता का भाव होता है । भक्ति में भाव का मूल्य अधिक है । श्रद्धा और विश्वास में ही भाव अधिक है । जो बिना भक्ति के चला गया, जिसने संसार में आकर भक्ति ही न की उसका जीवन व्यर्थ है । इस जगत को पीने की कला है भक्ति । तुम प्रार्थना, दान, सामायिक करते हो उस समय तुम्हारे शब्द नहीं भाव महत्वपूर्ण है । भावों को महत्व देने से चित्त में वैराग्य आता है । 

आज के इस पावन अवसर पर महासतीवृंद ने भी अपने भाव व्यक्त किये । महसती श्री सुरभि जी म0 ने एवं श्री सुव्रत मुनि जी म0 ने मानव भव एवं मन के ऊपर अपने भाव व्यक्त किये । मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म0 ने आत्म शिव दरबार में आए हुए श्रद्धालुओं को साधुवाद देते हुए उनकी भावाभिव्यक्ति सुनी । 

आचार्यश्रीजी के दर्शनार्थ आज जालंधर, मण्डी अहमदगढ, लुधियाना, मोड मण्डी, शिर्डी आदि स्थानो ंसे श्रीसंघ उपस्थित हुए । जालंधर श्रीसंघ ने आचार्यश्रीजी को जालंधर पधारने की भावभरी विनती की ।   

 

गुरू हमें भक्ति तक पहुंॅचाता है: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

4 अगस्त, 2003: श्रमण संधीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने भक्ति के ऊपर प्रकाश डालते हुए फरमाया कि- भक्ति तक पहुंॅचाने वाला गुरू होता है जो हमें पाप से बचाता है ओर ज्ञान को दिखाता है । गुरू हमें ब्रह्म से ध्यान की अवस्था में मिलाता है, तुम ब्रह्म स्वरूप हो यह हमें अहसास करवाता है । गुरू है हमें झुकना और देखना, एक कदम चलाना नहीं आता । पात्र सीधा है तो भर जाता है, अगर पात्र को उल्टा कर दो तो कितना ही उसके भीतर डालने का प्रयत्न करो वह भरेगा नहीं । छल, कपट, माया त्याग देनी चाहिये । कुछ भी ना करो, माया भी मत करो । एक साधु,    ˜ó  ¬  शिवमुनि जी महाराज ने भक्ति के ऊपर प्रकाश डालते हुए फरमाया कि- मनुष्य के भीतर जब भक्ति का भाव उमडता है, जब प्यारे प्रभु की याद आती है तब उसका हृदय डोलने लग जाता  है । मन आनंदित, चित्त प्रफुल्लित हो जाता है । चेहरे पर अनोखी आभा आ जाती   है । तब उसका जीवन स्वर्णिम बन जाता है । उसे कोई आवश्यकता नहीं रहती । जब व्यक्ति धािर्मक बन जाता है । प्रभु महावीर की वाणी  सामायिक, ध्यान, कायोत्सर्ग जब होता है तब चित्त में वैराग्य आता है । उदासी या संकीर्णता नहीं आती । महावीर का वैराग्य चित्त में आनन्द तृप्ति का भाव है । इसीलिए कहा है कि साधु को इतना सुख है जितना इन्द्र को भी नहीं । साधु का सुख, समता, इन्द्रिय विजय में है । ध्यान और भक्ति दोनों आपस में जुडे हुए हैं । भक्ति करते हुए व्यक्ति ध्यान में चला जाता है । हमारा मूल ध्यान ही है । सांसारिक लोगों का प्रेम पत्नी, पैसा, यश से होता है । संकीर्ण दृष्टि होती है परन्तु जब यही प्रेम समर्पण की ओर आगे बढता है तब भक्ति होती है । भक्ति जिनेश्वर भगवान की करें । 

स्थानकवासी परम्परा भी यही कहती है कि हम अपने निज स्थान में आ जाये । जो मूल सौम्य अमृत सार था उसे हमने अलग कर दिया । मूल परम्परा निज घर में लौटने की है । सामायिक करते करते हम कितने गहरे जा सकते हैं । कितने समता में जा सकते है यह अन्दाजा लगाया जा सकता है । महावीर की मैत्री, संगठन, करूणा, प्रेम को महत्व दो । प्रभु महावीर ने कहा कि परनिन्दा नहीं आत्म-निन्दा करो । दूसरों की आलोचना करने के बजाय अपनी आलोचना करो । रोज का हिसाब किताब आलोचना द्वारा पूर्ण कर लो । परम धन, परम संपदा, परम ऐश्वर्य की कामना करो । यही हमारा मूल धर्म है । 

हमारी मूल सम्पत्ति शान्त, निर्विचार, निर्वेर हो जाने की है इसलिए तो भगवान महावीर ने अनेकान्तवाद पर जोर दिया । भीतर की समाधि आती है, समय के साथ आती है परिस्थितियाॅं बदल जाती है । चित्त का वैराग्य कैसे बढे हम इसे महत्व दे, जो कुछ हमारे पास है हम उसे बाॅंटे । भक्ति जब जीवन में आती है तब श्रद्धा और ग्रहणता का भाव होता है । भक्ति में भाव का मूल्य अधिक है । श्रद्धा और विश्वास में ही भाव अधिक है । जो बिना भक्ति के चला गया, जिसने संसार में आकर भक्ति ही न की उसका जीवन व्यर्थ है । इस जगत को पीने की कला है भक्ति । तुम प्रार्थना, दान, सामायिक करते हो उस समय तुम्हारे शब्द नहीं भाव महत्वपूर्ण है । भावों को महत्व देने से चित्त में वैराग्य आता है । 

आज के इस पावन अवसर पर महासतीवृंद ने भी अपने भाव व्यक्त किये । महसती श्री सुरभि जी म0 ने एवं श्री सुव्रत मुनि जी म0 ने मानव भव एवं मन के ऊपर अपने भाव व्यक्त किये । मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म0 ने आत्म शिव दरबार में आए हुए श्रद्धालुओं को साधुवाद देते हुए उनकी भावाभिव्यक्ति सुनी । 

आचार्यश्रीजी के दर्शनार्थ आज जालंधर, मण्डी अहमदगढ, लुधियाना, मोड मण्डी, शिर्डी आदि स्थानो ंसे श्रीसंघ उपस्थित हुए । जालंधर श्रीसंघ ने आचार्यश्रीजी को जालंधर पधारने की भावभरी विनती की ।   

 

गुरू हमें भक्ति तक पहुंॅचाता है: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

4 अगस्त, 2003: श्रमण संधीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने भक्ति के ऊपर प्रकाश डालते हुए फरमाया कि- भक्ति तक पहुंॅचाने वाला गुरू होता है जो हमें पाप से बचाता है ओर ज्ञान को दिखाता है । गुरू हमें ब्रह्म से ध्यान की अवस्था में मिलाता है, तुम ब्रह्म स्वरूप हो यह हमें अहसास करवाता है । गुरू है हमें झुकना और देखना, एक कदम चलाना नहीं आता । पात्र सीधा है तो भर जाता है, अगर पात्र को उल्टा कर दो तो कितना ही उसके भीतर डालने का प्रयत्न करो वह भरेगा नहीं । छल, कपट, माया त्याग देनी चाहिये । कुछ भी ना करो, माया भी मत करो । एक साधु, एक श्रावक मासखमण करता है और पारणे में कुशा के अग्र भाग जितना भोजन ग्रहण करता है, उससे भी अधिक श्रेष्ठ है कि हम माया न करें । हमारे आगम, वेद,त्रिपिटक, कुरान, बाईबल भी हमें यही संदेश देते हैं । जो तप करते हैं उनका गुणानुवाद करने से भी पुण्य की उपलब्धि होती है । 

धर्म, ऋजुता सरलता में है । माया से अहंकार, अहंकार से लोभ, लोभ से ईष्र्या और ईष्र्या के अनन्तर यह सारा प्रपंच बढता ही चला जाता है । यह सब एक दूसरे से जुडा हुआ है । एक कांटा चुभता है तो उसकी कितनी वेदना होती है, जब तक वह बाहर नहीं निकलता, तब तक हम अनेकों प्रयत्न करते हैं उसे निकालने के लिए । हमने अपने भीतर जो माया-रूपी कांटा चुभोकर रखा है उसे भी निकालने का प्रयत्न करो । अगर वह नहीं निकलेगा तो आप किस भाॅंति भक्ति कर पाओगे, इसे निकाल दो । शरीर के अनुकूल जो होगा वह उसे ही ग्रहण करेगा । आपने देखा होगा, हमारा खून अन्य खून को ग्रहण न करते हुए समान दर्जे वाले खून को ही ग्रहण करता है । माया, कपट हमने क्यों पकड लिया । जब व्यक्ति सरलता, ऋजुता में होता है तो वह आनन्द में जीता है, जब माया और कपट में जीता है तो वह यही सोचता रहता है कि कैसे इसका बुरा हो, अमंगल की भावनाएॅं उसके जीवन में अपना अमिट प्रभाव छोडती हैं । 

हमारी जिन्दगी क्या है ? जब हम आये तो अपनी खुशी से नहीं आये । जब हम यहाॅं से गये तो भी अपनी खुशी से नहीं गये क्योंकि जैसे हमने पहले कर्म किये थे, जैसा पुण्योपार्जन किया था उसी भाॅंति हमे ंयह मानव का भव मिला और जैसे हमने इस भव में कर्म किये हैं उसी के अनुसार हमें अगला भव मिलेगा । यह निश्चित है न हम खुशी से आये, न हम खुशी से गये । इस जीवन में रहते हुए भी इस भाॅंति जीओ जैसे कमल कीचड में रहता है, फिर भी कीचड से अलिप्त रहता है । यह जिन्दगी मिली है इसका सदुपयोग कर लो । गुरू का संग कर लो जिससे जीवन में आमूल-चूल परिवर्तन होगा । 

भक्ति करते हुए भीतर ऐसे भाव होने चाहिए कि मेरा हर कण-कण भक्ति में डूब जाये । ऐसी भक्ति करो कि भगवान को भी चलकर आना पडे । भक्ति करते हुए मेरे प्राण छूटे । मैं जन्मो-जन्म उसका दास रहूॅं । श्वांस श्वांस में भगवान का मुझे ध्यान रहे और वह मेरे सारे पापों को नष्ट कर दे । मुझे उस चरम लक्ष्य की ओर आगे बढाये, यही भावना हमारे भीतर होनी चाहिये । 

 

जीवन की महत्वपूर्ण सीढी है आलोचना: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी म0

5 अगस्त, 2003: { मालेर कोटला }आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने उद्बोधन देते हुए कहा कि- सत्य ही भगवान स्वरूप है । भगवान महावीर की वाणी का सार अहिंसा और सत्य है । अहिंसा का अर्थ हमने हिंसा नहीं करना ऐसा ले लिया परन्तु प्राणी मात्र के लिए विश्व के सभी प्राणियों के लिए भीतर मंगल का भाव रखना, यह अहिंसा का सही स्वरूप है । यह भाव तभी आता है जब भीतर हम श्रद्धा, निष्ठा रखते  हैं । साधना और सेवा दो कार्य मानव जीवन के लिए आवश्यक है । प्राणी मात्र के लिए सेवा करना और अपने लिए साधना करना यह बात प्रभु महावीर ने कही है । 

जैन दर्शन में आलोचना, प्रतिक्रमण, प्रायश्यित की बात आती है । गुनाहों की माॅफी तभी होती है जब व्यक्ति ऋजु और सरल होता है, तब गुरू उसकी आलोचना सुनकर उसे यथा-योग्य दण्ड देकर शुद्धि की ओर आगे बढाता है । यह जीवन की महत्वपूर्ण सीढी है ईसाई और सिक्ख धर्म के साथ-साथ जैन धर्म में आलोचना का अपूर्व महत्व है । आलोचना करने वाले और सुनने वाले दोनों के ही भाव शुद्ध होने चाहिये, आलोचना करने वाला आलोचना करके हमेशा उच्च गति प्राप्त करता है । किये पापों को सच- सच गुरू के समक्ष बता देना आलोचना है । गुरू कृपा से ही यह सब कुछ होता  है । प्रभु महावीर ने भी सत्य को महत्व दिया । एक सीढी है सत्य की, जिसके ऊपर व्यक्ति अटल खडा रहता है । एक सत्य से सब कार्य हो जाते हैं ।

हमें सत्य में जीना है तो परमात्मा की मर्जी में रहो । गुरू नानक देव ने परमात्मा को जपते जपते परमात्म तत्व को प्राप्त कर लिया । समता भाव साक्षी भाव में जीओ । कर्ताभाव न रखों, यह सब कुछ अपने आप हो रहा है इसे करने वाला कोई ओर नहीं, ऐसा भाव जीवन में न आये । यह मार्ग सभी ने अपनाया और सभी सफल हुए । मीरा, नानक, दादू, रज्जब, प्रभु महावीर ने भी इस मार्ग पर चलकर अपना जीवन सफल बनाया ।

महावीर की साधना ध्यान संकल्प और समाधि की है । यह मार्ग बडा सरल और सीधा है । प्रभु महावीर अप्रमत्त की साधना करते थे । वे हमेशा जागरूक रहते थे । उनकी नग्नता में भी सुन्दरता नजर आती थी । ये भाव आचार्यश्रीजी ने एक भक्त के प्रश्न करने पर उत्तर रूप में फरमाये । आचार्यश्रीजी के दर्शनार्थ भारत भर से श्रद्धालु आ रहे हैं जिसमें आज नासिक, शिर्डी, राहता, लुधियाना आदि स्थानों से श्रद्धालु आचार्यश्रीजी के दर्शन एवं मार्गदर्शन हेतु पहुंॅचे हैं ।  

 

सात्विक आहार हमारे विचार शुद्ध रखता हैं:जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी म0

6 अगस्त, 2003: { मालेर कोटला } आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने उद्बोधन देते हुए कहा कि- भगवन तेरी शरण में मेरी ये वन्दना है, भगवन की शरण में हम जाये । किसी गाॅंव में भोले भाले लोग खेती करके अपने कुटुम्ब का पालन पोषण करते थे । उनके छोटे बच्चे खेतों में जाते  हल चलाते । पहनने को कपडंे भी नहीं थे परन्तु उन्होंने अपने शरीर में सहनशीलता तैयार कर ली । बच्चों ने कठोरता में जीना सीख लिया अपने भीतर हम सहिष्णुता पैदा कर दें । शरीर की आसक्ति को छोड दे । अगर वृक्ष का मूल है तो वृक्ष पर पत्ते फल फूल पल्लवित पुष्पित होंगे । उस गाॅंव के लोग सीधे साधे थे । गाॅंव के बाहर भगवान की प्रतिमा थी । लोग आते भगवान को सिर झुकाते उनके नाम की माला फेरते रहते थे । एक दिन उस गाॅंव में एक महात्मा पहुंॅचे । उन्होंने देखा भगवान के सिर पर छाता नहीं है उन्होंने गाॅंव के लोगों को इकट्ठा किया ओर अपशब्द कहते हुए कहा कि- आप लोग कैसे हो भगवान को धूप लगती होगी, बरसात पडती होगी, भगवान के ऊपर छाता भी नहीं है । भोले भाले लोगों ने अपनी कमाई का कुछ हिस्सा निकालकर भगवान के ऊपर छत बना दी । सिलसिला चलता रहा कुछ दिन बाद उसी गाॅंव में दूसरे साधु आये । उन्होंने कहा- तुम लोग पागल हो जो भगवान के ऊपर छत बना रहे हो । भगवान तो सहिष्णुता वाले हैं, तुम भगवान के ऊपर के छत को हटा दो । सीधे साधे लोगों ने महात्माॅं का कहना माना और छत को हटा दिया ।

एक दिन लोगों को एक जुट होकर आपस में बात चीत की और महात्माॅं के पास जाने से इन्कार कर दिया । धर्म के नाम पर उन महात्माओं ने अन्ध्विश्वास सिखा दिया । आज भी कई ऐसे महात्माॅं हैं जो सकारात्मक सोच से नकारात्मक बना देते हैं । हिन्दू, बौद्ध और मूर्तिपूजक आज भी मूर्ति को पूजते है ओर मुसलमान उन्हीं मूर्तियों को तोडते हैं । धर्म का आडम्बर बन गया है । धर्म जैसा है उसे वैसा ही स्वीकार   करो । शरीर आत्मा अलग-2 है, यह हमें भान हो जाये तभी हम धर्म में स्थिर होगें । जैसी हमारी दृष्टि होगी वैसी सृष्टि होगी । हम समाधि में कैसे आये ? इसलिए हमारा मूल आहार ही मनुष्य का शाकाहार है । शाकाहार में सात्विक आहार हमारे विचार शुद्ध रखता है । तामसिक आहार हमारे जीवन को अन्धेरे में ले जाता है । जो व्यक्ति तामसिक होंगे उनको सोना अच्छा लगता है । इस शरीर के भीतर 70 करोड सेल है जो हमारे भीतर आवश्यक वस्तुओं की माॅंग करते हैं । तामसिक आहार से हमारे जीवन में उन्मुक्तता आती है । 

हम सात्विक आहार से शरीर को स्वस्थ रखें । दैनिक कार्यक्रम बराबर करें ।  भोजन से पूर्व प्रार्थना और पश्चात् आराम का ध्यान दें । सम्यक् आहार कैसे करना यह त्रिदिवसीय ध्यान शिविर में भली भाॅंति समझाया जाता है । इसका अनुभव करने हेतु 13 से 16 अगस्त, 2003 तक लगने वाले ध्यान शिविर में नाम लिखवाकर अपने जीवन को सफल बनावें ।

 

गौसेवा परम सेवा है: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

7 अगस्त, 2003: { मालेर कोटला } आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने उद्बोधन देते हुए कहा कि- प्रातःकाल का समय सूरज निकलने वाला ही   था । सुबह भोर हो गई थी, पास में एक मन्दिर था । एक क्षुद्र व्यक्ति पोढियाॅं चढी और दहलीज पर आया । पुजारी ने उसे देखते ही रोक दिया और कहा कि तू क्षुद्र है, मन्दिर में नहीं जा सकता है । तेरा जन्म क्षुद्र घर में हुआ है, इसीलिए तूॅं क्षुद्र है । तूने मन्दिर की पोढियाॅं चढकर अशुद्ध कर दिया । व्यक्ति ने कहा- परमात्मा क्या मैं तुम्हारा दर्शन भी नहीं कर सकता । मैं तुम्हारे दर्शन करना चाहता हूॅं । कई वर्षों तक वह साधना की और मन्दिर गया । पुजारी ने उसे देखते ही पहचानते हुए कहा कि तूॅं शुद्ध हो गया । व्यक्ति ने कहा, मैं शुद्ध हो गया । पुजारी ने पूछा- तूं मन्दिर क्यों नहीं आता । व्यक्ति ने कहा- मुझे प्रभु ने अन्दर ही दर्शन दे दिया । उसकी आनन्द व अनुभूति मैं भीतर ही अनुभव कर रहा हूॅं ।

गौ एक माता है । माॅं क्यों कहा गया ? क्योंकि जब गाय के बछडे ने जन्म लिया तब उसने सबसे पहले माॅं शब्द पुकारा था । उसका दूध लेकर हम उसे सडकों पर खुला छोड देते हैं । हम इतने स्वार्थी हो गये हैं कि उसकी आजीविका का ध्यान भी नहीं रखते । आचार्यश्रीजी ने आज गौसेवा को परमसेवा बताते हुए गौ-माता की सेवा करने हेतु लोगों को प्रेरित किया जिसमें अनेकों लोगों ने एक-एक गाय का पालन पोषण करने का संकल्प लिया । 

जीवन का आनंद, शान्ति, मस्ती, धर्म में है । धर्म वही कहलाता है, जहाॅ सेवा करूणा मैत्री की बात हो । सेवा परम धर्म माना गया है । आज सडकों पर मूक पशुओं को देखकर भीतर करूणा जाग उठती है । जहाॅं धर्म है वहाॅं शान्ति नजर आती है । हम भीतर तो अशान्त हंै परन्तु बाहर से शान्ति का नाटक करते हैं । यह धर्म नहीं, धर्म के नाम पर आडम्बर है । प्रतिमा एक भगवान का प्रतीक है, स्वरूप है जिसके द्वारा तुम उस धर्म तक पहुंॅच सको । उसे देखते ही तुम्हें उनके गुणों का स्मरण हो जाये । तुम शुद्ध हो जाओ, तुम्हारा अन्तःकरण भक्ति से आप्लावित हो जाये । भीतर परमात्मा का भाव आये और तुम उसके गुणानुवाद करने लग जाओ । आचार्यश्रीजी ने भाई-चारे को लक्ष्य में रखकर कहा कि हम सभी भारतवासी या विश्व मे ंरहने वाले भाई- भाई का आदर करते हैं तो क्या एक हिन्दू मुसलमान की मस्जिद में जाकर नमाज नही ंपढ सकता और एक मुस्लिम मन्दिर में जाकर दर्शन नहीं कर सकता । हम आपस में भाई चारे को  बढायें ।

 

कोल्ड्रींक्स जानलेवा हो सकते हैं: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी म0

8 अगस्त, 2003: { मालेर कोटला } आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने उद्बोधन देते हुए कहा कि- पुराने समय की बात है । एक राजा था । उसकी कीर्ति चारों ओर फैली हुई थी । वह दान करता था एतदर्थ दानी कहलाता था । उसके व्यक्तित्व में बाहर से करूणा झलकती थी परन्तु भीतर अभिमान, अहंकार से भरा हुआ  था । परमात्मा की दृष्टि से वह दानी नहीं परन्तु संसार की दृष्टि से वह दानी कहलाता था । उसी नगर में एक व्यक्ति रहता था जो धन कुबेर होते हुए भी दान की भावना नहीं रखता था । कंजूस था । लोगों के पास पैसा बहुत है फिर भी वे दान नहीं करना चाहते । प्रभु महावीर की वाणी में उन्होंने पापानुबन्धी पुण्य कर्म का उपार्जन किया है । कोई व्यक्ति ऐसे भी होते हैं जो कमाई भी खूब करते हैं, दान भी खूब करते हैं परन्तु भीतर शान्ति नहीं है । संसार की दृष्टि में ऐसे व्यक्ति कंजूस हैं और परमात्मा की दृष्टि में भी कंजूस है । राजा का अहंकार बढता चला गया । उधर वह व्यक्ति शान्ति पाने हेतु एक महात्मन् के पास पहुंॅचा । महात्मन् ने उपाय बताया कि तुम अपना सारा धन लुटाओ, फिर मेरे पास आना । उसने घर जाकर अपना सारा धन लुटाया । घर परिवार को त्यागा और फिर से महात्मा के पास आया, शन्ति ग्रहण करने हेतु । महात्मा ने कहा एक काम कर सकते हो ? उसने कहा- सारे काम कर सकता हूॅं । सत्गुरू ने उसे भगाया और कडाके की ठण्ड में वह बाहर बैठा रहा । कहते हैं रात को वृक्ष के नीचे बैठे-2 उसकी समाधि लग गई । वह परम आनंद, परम सुख, परम शान्ति में लीन हो गया । सुबह हुई । महात्मा जी  बाहर आये । उन्होंने देखा कि व्यक्ति अभी बाहर बैठा है । उसके चेहरे पर अलौकिक आभा है । महात्माजी ने जाकर उस व्यक्ति के चरण पकड लिये क्योंकि उस व्यक्ति ने उस परम तत्व को प्राप्त कर लिया था । बेसहारों का सहारा भगवान होता है । 

धर्म है आत्म तृप्ति और भीतर की शान्ति में रहना । मन को समता में रखो । प्रभु परमात्मा सत्गुरू आपकी किसी भी समय परीक्षा ले सकते हैं । परीक्षा दे देना, शुद्ध बुद्ध हो जाओगे । परमात्म-तत्व की प्राप्ति हेतु हमारी चर्चा चल रही थी आहार के   ऊपर । तामसिक आहार जीवन में तमस, मूर्छा आलस्य लाता है । जो व्यक्ति तामसिक आहार करता है तो उसे आराम करने का अनुभव होता है । वह कुछ भी नहीं करता, सोया ही रहता है । वह परम आलसी है । अधपका, कच्चा, खट्टा आहार तामसिक आहार में आता है । बोतल बंद सारे पेय पदार्थ जीवन को हानि पहुंॅचाते हैं । इनके भीतर अनेकों कीटनाशक हैं जो शरीर में कैन्सर जैसे रोग पैदा कर सकते हैं । सारी बीमारी खान पान से होती है । पसीना बहाने से सारे रोग ठीक हो जाते हैं एतदर्थ श्रम करो । दोषों का छेदन और राग का भेद न कर दो ताकि हमारे शरीर में कोई रोग उत्पन्न नहीं न होने पाये । सारी बीमारियाॅं मन की हैं । मन को स्वस्थ कर लोगें 

 

विचार स्वस्थ हो   जायेगें । जब विचार स्वस्थ हो जायेगें तो शरीर स्वस्थ हो जायेगें । 

हम शिकायत में न जीकर शान्ति में जीयें: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी म0

9 अगस्त, 2003: { मालेर कोटला } आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने उद्बोधन देते हुए फरमाया कि- एक संत, एक वृद्ध व्यक्ति के पास बैठे थे, उस वृद्ध व्यक्ति का जीवन शिकायत से भरा हुआ था । संघर्ष, तनाव उसके चेहरे पर झलक रहा था । महात्माॅं ने कहा- क्या मैं आपके लिए प्रार्थना करूॅं ? व्यक्ति ने उत्तर दिया कि मैं भगवान से एक ही प्रार्थना करना चाहता हूॅं कि अब मुझे अपने पास बुला ले । उसका कहना ऊपर - 2 से था, उसके चेहरे पर ऐसे कोई भाव नजर नहीं आ रहे थे, तब महात्माॅं ने उसको एक कहानी सुनाई, एक बुढा लकडहारा बूढा हो गया था । 85 साल की उम्र । मुश्किल से उसका पेट भरता था । शहर से जाता, लकडियाॅं काटकर बेचता अपना पसीना बहाता, उससे जो पैसे मिलते अपना जीवन यापन करता था । एक दिन उसने प्रार्थना की कि- यमदूत तूं सबको लेने आता है परन्तु मेरे पास क्यों नहीं आता । कभी कभी प्रार्थना भी पूरी हो जाती है । उसी समय किसी अदृश्य शक्ति ने उस लकडहारे के पीठ पर अपना हाथ रखा और पूछा कौन ? अदृश्य शक्ति ने जबाब दिया, मैं मौत, लकडहारा पसीना पसीना हो गया और उस अदृश्य शक्ति से कहा कि यह लकडियों का गट्ठर मेरे सिर पर रख दो । मौत उसके सामने खडी थी फिर भी वह जीना चाहता   था । 

हमारा मन भी ऐसा ही है । मौत सामने खडी है फिर भी हम मरना नहीं   चाहते । अशान्ति और अधर्म में जीते हैं परन्तु धर्म और शान्ति के मार्ग पर आना नहीं चाहते । 85 वषर््ा का बूढा गाॅंव में गया । उस गाॅंव में एक वैद आये थे । उसके मन में इच्छा जागी कि मैं ठीक हो जाऊॅं । महात्माॅं ने कहा हमारा मन कितना चालाक है । इसलिए हम शिकायत में न जीकर शान्ति में जीयें । हम सबके लिए शान्ति करें । हम सभी शान्ति की मंगल कामना करें, यह है जिवेषणा । हमारे मन में न जीने की इच्छा होती है और न मरने की । कामना वासना भी मन में न आये । मौत आये या न आये हमेशा समभाव में रहे । हम अन्धकार से प्रकाश की ओर, असत्य से सत्य की ओर और मौत से अमृत की ओर जायें ।

राजसिक आहार हमारे जीवन को आलसी बना देता है । ज्यादा गरम अथवा ठण्डा नहीं खाना चाहिये । करीब चालीस वर्ष पूर्व बहने घर पर स्वयं चक्की पीसती थी । मक्खन निकालती थीे । भोजन बनाकर गरम- गरम परोसती थीं । आजकल मशीनी- युग आ गया है । हम कुछ भी नहीं करना चाहते । ज्यादा नमक अथवा चीनी खाना हमारे स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है । प्रकृति ने हमें हर वस्तु में खानापन और मीठापन दिया है । ज्यादा नमक खाने से बी0पी0 बढ जाती है । हम मेहनत करें, सात्विक आहार करें मन शान्त हो जाएगा । योग ध्यान करें चित्त शान्त हो जाएगा ।

 

संकल्प से तप साधना सहज होती है: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी म0

10 अगस्त, 2003: { मालेर कोटला } आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने तप अभिनन्दन समारोह पर उद्बोधन देते हुए फरमाया कि- आज का यह पावन महोत्सव तप का अभिनन्दन है । भारत के विभिन्न अॅंचलों से लोग आज तप की अनुमोदना हेतु यहाॅं आये हैं । इस मालेर कोटला वर्षावास का प्रथम मासखमण तप्त तपस्विनी महासती डाॅ0 सुनीता जी म0 ने तपस्या कर चार चाॅंद लगाये हैं । महासतीजी तप में, स्वाध्याय में, जप में हमेशा लीन रहते हैं । प्रभु महावीर के संघ में तप का विलक्षण महत्व है । तप से मन, चेतना, शरीर शुद्धि की ओर अग्रसर होता है । आत्मा कुन्दन बनती है । मन निर्मल बनता है । तप करना अर्थात् अपने आपको एक-एक क्षण के लिए गलाना होता है । तपस्या करना सहज मार्ग होते हुए भी कठिनतम मार्ग है । संकल्प से तप साधना सहज होती है । व्यक्ति तप नहीं कर सकता तो तप का अनुमोदन अवश्य करें जिससे वह उस परम साधना को प्राप्त कर सके । हम तपस्वियों का गुणानुवाद करें ।

संसार के समस्त प्राणियों के प्रति मैत्री भाव, समता भाव भावित करते रहे । अब मालेर कोटला शहर तीर्थ स्थल, तपोभूमि जैसा बन गया है, यहाॅं पर तपस्याएॅं गतिमान  है । तप, दान, शील, भावना ये चार मोक्ष मार्ग बतलाये गये हैं । मैं आज यहाॅं के श्रीसंघ को बधाई देता हूॅं, बाहर से जो भी भाई बहिन आज तप अनुमोदन हेतु पहुंॅंचें हैं उनको भी बधाई देता हूॅं । 

तप का मार्ग संकल्प का मार्ग है । संकल्प का अर्थ है कि हम जो निर्णय करें उसके ऊपर अडिग रहे । हमारा संकल्प पूरा हो । प्रभु महावीर ने साढे बारह वर्ष साधना करके संकल्पबद्ध होकर परम प्रकाश को प्राप्त किया । तप करते समय हमारे भीतर आनंद, शान्ति, समता आये । हम संकल्प पूर्ण मन से करे । आज के इस तपस्या के शुभ अवसर पर कुछ न कुछ संकल्प जरूर करें । कोई व्यसन छोड दे । यह तप का अच्छा अनुमोदन होगा । जो व्यक्ति तप नहीं कर सकते वे अनुमोदना करें, ध्यान करें जिससे हमारा शरीर कुन्दन बने और आत्मा निर्मल बनें । 

आज के इस तपाभिनन्दन समारोह पर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने तप्त तपस्विनी महासती श्री सुनीता जी म0 को ‘तप रत्नेश्वरी’ के पद से अलंकृत किया । वैसे ही उग्र तपस्विनी महासती श्री सुमित्रा जी म0 की गुरूणी उप प्रवर्तिनी महासती श्री सीता जी म0- संयम सुमेरू महासती श्री शिमला जी म0 ने तप्त तपस्विनी महासती श्री सुनीता जी म0 को ‘तपोनिधि’ पद से अलंकृत किया है । महासती श्री सुनीता जी म0 ने अपने जीवन में यह दूसरा मासखमण किया है, जो अनुमोदनीय है ।   

आज के इस शुभ अवसर पर महासती श्री चन्द्रप्रभा जी म0, महासती श्री ओमप्रभा जी म0, महासती श्री सुमित्रा जी म0, महासती श्री संतोष जी म0, श्रमण संघीय मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म0 आदि ने अपने भाव अभिव्यक्त करते हुए तप आत्मा को परिशुद्ध करता है । तप निर्जरा के लिए हो ।

मालेर कोटला श्रीसंघ की ओर से भी महासतीजी तप अभिनन्दन किया गया । आज के इस तप अभिनन्दन समारोह के अवसर पर संगरूर, मानसा, धूरी, भदौड, मण्डी अहमदगढ, लुधियाना, नासिक, मोगा आदि स्थानो ंसे श्रद्धालु तप अभिनन्दन हेतु   पहुंॅचे । 

धर्मात्मा वही होता है जो कृतज्ञता ज्ञापित करता है

 

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

11 अगस्त, 2003: { मालेर कोटला } आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने उद्बोधन देते हुए फरमाया कि- प्रतिपल प्रतिक्षण प्रभु की याद हमें आती रहनी चाहिये । हमारा चित्त समाधि, मैत्री में डूबा रहे । चित्त में जागरूकता, धर्म- साधना, स्व-पर कल्याण की भावना रहे । सद्गुरू के सहारे से जीवन रूपान्तरण होता  है लेकिन व्यक्ति का अपना स्वयं का संकल्प होना चाहिए । सद्गुरू तो प्रेरक ही बन सकते हैं । सद्गुरू का जीवन सूरज के समान है । सूरज जिस भाॅंति उदय होकर सभी लोगों को जगाता है उसी भाॅंति सद्गुरू भी जगाते हैं । संसार को एक सराय समझो । थोडी देर का आराम करना है फिर तो अपने घर जाना ही है, यह जो संसार सराय है इसे सॅंभालने में क्यों लगे हो । अपना अमूल्य समय इसमें व्यर्थ न करके अपने जीवन को उज्ज्वल बनाओ । सद्गुरू की शरण में समाधि, शान्ति आती है । हमारा संकल्प, पुरूषार्थ पराक्रम चाहिये । मन अनुकूल होना चाहिये । एक वाक्य, एक शब्द कोई भी विलक्षण कार्य, घटना हमारे जीवन का रूपान्तरण कर देती है ।

जीवन-रूपी दीये में तेल बहुत थोडा है लेकिन रात बहुत लम्बी है । फल लगने से पूर्व वृक्ष को उखाड दिया तो फल कैसे लगेगा । हमारा मानव जीवन अनमोल है, आयुष्य भी थोडी है । बाधाएॅं बहुत आएगी फिर भी साधना में रत रहो । किसी व्यक्ति ने आपको उपकृत किया है तो उसका मान बढाना, उसके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना । धर्मात्मा वही होता है जो कृतज्ञता व्यक्त करना जानता है । तुमने किसी की सेवा की, किसी को सहयोग दिया उसे भूल जाना । किसी ने तुम्हारे लिए कुछ किया है उसे जरूर याद रखना । हमने पिछले भव में किसी को धर्म पर लगाया था । दान देने की भावना भायी थी । दान दिया था इसलिए यह अनमोल मानव जन्म और जैन धर्म मिला । इस जन्म में आकर यथाशक्ति पुण्य कमाना, दान देना जीवन को धन्य बनाना है । मनुष्य जीवन एक पुण्य की खेती है, जितना चाहो बीज डालकर अमूल्य निधि प्राप्त कर लो । हम स्वयं बदले और ओरों को सत्संग में लाकर सुधारे । संकल्प करें हम एक दूसरे के सहयोगी बने । परिवार, समाज, गाॅंव, राष्ट्र, विश्व, ब्रह्माण्ड के प्रति मंगल मैत्री करें ।

कल आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज का रक्षा बन्धन के पावन पर्व पर विशेष प्रवचन होगा । रक्षा बन्धन की शुरूआत कैसे और कब हुई ? आदि की जानकारी प्राप्त करने हेतु पूज्य आचार्यश्रीजी का प्रवचन सुनने हेतु पधारे ।

 

रक्षा-बन्धन: भाई बहिन के प्यार का प्रतीक है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

12 अगस्त, 2003 { मालेर कोटला }: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् श्री शिवमुनि जी महाराज ने रक्षा बन्धन के अवसर पर फरमाया कि आज का यह पावन दिवस रक्षा बन्धन का है । रक्षा का बन्धन, स्नेह और सौहार्द का बन्धन होता है । भारतवर्ष पर्वों का देश है । एक महीने में दो पर्व हमारे भारत में मनाये जाते हैं । हमारी संस्कृति धर्म और चेतना के द्वारा परिलक्षित होती है । पर्व दो प्रकार के होते हैं, लौकिक और आध्यात्मिक पर्व । रक्षा बन्धन का पर्व लौकिक है, रक्षा के द्वारा एक दूसरे को जोडा जाता है । इस पर्व का बाहर का रूप है कि एक बहन एक भाई के घर जाकर अथवा भाई, बहिन के घर जाकर राखी बॅंधवाता है और उसकी रक्षा का प्रण लेता है और उपहार रूप में बहन को कुछ न कुछ प्रदान करता है । भीतर का रूप है प्रेम बन्धन का पर्व, बाहर का रूप भौतिक है और भीतर का आध्यात्मिक ।

राखी का पर्व भाई बहिन का है । राखी का पर्व भाई बहिन के प्यार का प्रतीक  है । भाई बहिन का प्रेम विश्व में प्रसिद्ध है । अनजाने में कोई बहिन भाई की कलाई पर रक्षा सूत्र बाॅंधकर उससे रक्षा का प्रण ले सकती है । रक्षा बन्धन के विषय में अनेक ऐतिहासिक घटनाएॅं प्रसिद्ध है । सम्राट सिकन्दर ने राजा पूर पर आक्रमण किया । उस समय सिकन्दर की पत्नी के मन में यह विचार आया कि कहीं राजा पूर मेरे पति का अन्त न कर दें इसलिए सिकन्दर की पत्नी ने राजा पूर को राखी भेजकर रक्षा का वचन ले लिया । सिकन्दर और राजा पूर में घमासान युद्ध हुआ । युद्ध में सिकन्दर हारता गया फिर भी राजा पूर ने रक्षा को ध्यान में रखकर उसे छोड दिया । 

राजस्थान में रानी कर्मवती की कहानी बडी पुरानी है । गुजरात के बहादुरशाह ने रानी के राज पर अपनी नजर रखकर उसे अपनी पत्नी बनाना चाहा वह कमजोर थी उसकी सेना शक्तिशाली नहीं थी । रानी कर्मवती ने मुगल सम्राट हिमायु को मखमल की पट्टी पर 21 रत्न जडकर राखी भेजी थी । 

राखी बाॅंधना भाई बहिन का आदर्श है, मुसलमान भाई के घर जाकर हिन्दू भाई राखी बाॅंधकर भाई चारा बढाते थे । पंडित मदन मोहन मालवीय ने काशी नरेश के दरबार में जाकर रक्षा बाॅंधकर उनसे बनारस विश्वविद्यालय बनाने हेतु स्थान प्राप्त किया वह विश्वविद्यालय आज भी विद्यमान है । सुलताना 

डाकू एक बहुत बडा डाकू था, जिस गाॅंव में डाका डालने जाता पहले ही उस गाॅंव में सूचना भिजवा देता । एक दिन वह किसी गाॅंव में डाका डालने गया सीधे गाॅंव में पहुंॅचा । गाॅंव में एक घर पर सीधा ही चला गया । वहाॅं पर उसने एक युवती को देखा । युवती ने थाली में मोळी रोळी लेकर उस सुल्ताना को तिलक किया और रक्षा सूत्र बाॅंध दिया। सुल्ताना डाकू ने अपने पाॅकेट मे ंसे सारे रूपये देकर उसकी रक्षा का प्रण किया । आप भी इसी तरह किसी बहिन के घर जाकर उसकी रक्षा का संकल्प लें । छोटे बच्चों को जिनका इस दुनियाॅं में कोई नहीं हैं उन्हें रक्षा-सूत्र बाॅंधकर रक्षा करें और मिठाई बाॅंटे । भीतर प्रेम, मैत्री, करूणा की रक्षा करें तो सच में रक्षा पर्व मनाना सार्थक होगा ।

 

भाव से नमस्कार मंत्र का पठन करें

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेर कोटला 13 अगस्त, 2003: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने धर्म सभा को सम्बोधित करते हुए फरमाया कि- ‘नमस्कार तुमको महावीर प्यारे’ - नमस्कार मंत्र जैन धर्म में सर्वोत्कृष्ट मंत्र माना है । नमस्कार हमारी दृष्टि दल देता है । नमस्कार हम करते हैं जब हमारा हृदय खुला होता है । नमस्कार का अर्थ है- कुछ ग्रहण करने के लिए अपने आपको खाली करना । अपने विचार, दर्शन, दृष्टि से सहमत होना । नमस्कार हमारे भीतर श्रद्धा / नमन का भाव लाता है । जैन धर्म जनतंत्र धर्म है । आत्मा का धर्म है । भारत एक धर्म-निरपेक्ष राष्ट्र होने से जैन धर्म सभी अंगीकार कर सकते हैं । 

धर्म मानव जीवन की एक ऐसी दृष्टि है, जिसमें नफरत, ग्लानि नहीं होती । जैन धर्म पाॅंच पदों को नमस्कार करने वाला मंत्र है । इन पाॅंचों से बना यह मंत्र सर्वोपरि   है । जैन धर्म की अनेक परम्परा होते हुए भी मंत्र एक ही है । छोआ से छोटा शब्द हो, परन्तु उसमें भाव अधिक हो तो वह मंत्र कहलाता है । मंत्र में गहरा अर्थ समाया हुआ  है । जिस प्रकार बीज में वृक्ष समाया हुआ है, उसी प्रकार इस नमस्कार महामंत्र में चोदह पूर्व का सार समाया हुआ है । नमस्कार मंत्र को भाव से, समझ से पढना चाहिए । द्रव्य की अपेक्षा भाव हितकारी है । भाव से नमस्कार मंत्र का पठन करें तो अधिक लाभ होगा । 

नमस्कार मंत्र आपके आभा मण्डल बदल देता है । आभा मण्डल क्षण-क्षण बदलता रहता है । जैसे हमारे विचार होंगे उसी भाॅंति हमारा आभा मण्डल होता है । स्वस्थ व्यक्ति का आभा मण्डल अच्छा होता है । हमारा जैसा आभ मण्डल होगा, वैसा चित्त और मन होगा । नमस्कार मंत्र के पठन से हमारा आभ मण्डल बदल जाता है । बार- बार नमस्कार महामंत्र पढने से आभा-मण्डल शक्तिदायक रहेगा । धर्म वही होता है, जहाॅं अन्दर बाहर स्पष्ट होता है । नमो कहते हुए अपने आपको खाली कर दो । शरीर के भीतर नमन का भाव आये । हृदय खाली हो जाए । निष्ठा और समर्पण भाव से नमस्कार मंत्र हम पढें तो उसका भाव गहरा होता है । 

 

यह जीवन नश्वर है: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेर कोटला {14 अगस्त, 2003} श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने फरमाया कि- मानव की तीन अवस्थाएॅं हैं । बचपन, जवानी और बुढापा । बचपन खेल कूद में बीत जाता है । जवानी अहंकार और मौज मस्ती में बीत जाती है और बुढापे में इस लोक से जाने की तैयारी हो जाती है । हम सम्पूर्ण जीवन को व्यर्थ में गवाॅं देते हैं, अगर हम निरीक्षण करें कि हमारे पिछले 70-75 साल के जीवन में हमने क्या पाया, क्या खोया ? जीवन का अर्थ क्या निकला ? यह विचारणीय बात है । मनुष्य का जन्म एक अनमोल हीरे की भाॅंति है । जिस प्रकार हीरे को तराश कर सुन्दरतम रूप दिया दिया जाता है, उसी प्रकार मानव जीवन को हम सुन्दरतम् रूप देने का प्रयास करेंगे । मनुष्य का जन्म कमल की भाॅंति कीचड में हुआ । कमल अक्सर कीचड में ही खिला करते हैं । हीरे, जवाहरात भी कीचड में ही मिलते   हैं । मोती समुद्र की गहराई में डूबकी लगाने के बाद प्राप्त होते हैं । हम भी इस गंगा रूपी जीवन में डूबकी लगायें और इस जीवन का सार, जीवन के अर्क को प्राप्त करें ।

सब कुछ हमें मिल जाता है, इस संसार में आकर, धन, दौलत, मान, सम्मान, यश, पद, प्रतिष्ठा, बेटा, पत्नी, परिवार, संसार । जो कुछ भी हमने चाहा वह मिल गया परन्तु आनन्द की अनुभूति, तृप्ति का भाव नहीं मिला । हमारे जीवन का सार यही है कि हम आनन्द शान्ति तृप्ति में रहें । वैराग्य ही हमारे जीवन का सार है । यही हमारी उपलब्धि, तृप्ति और आनन्दानुभूति है ।

गुलाबस्वयं खिलकर औरों को तृप्त करता है । चाहे वह काॅंटे ही क्यों न हो ? इस जीवन के लिए भोजन के साथ-साथ भजन करना भी आवश्यक है क्योंकि अन्तिम समय में भजन ही काम आने वाला है । पुण्य धर्म की बातें ही हमारे जीवन को सुधार देती  है । जो भीतर से तृप्त और आनन्दित है, वह सम्राटों का सम्राट है । धर्म का बल हमें उस परम पद, परम धन, परम सम्पदा की प्राप्ति करा देता है । इस जीवन को समझने के लिए परम जीवन को नमस्कार करें । नमन का भाव हमें सिद्ध स्थिति की ओर ले जाएगा । 

कल स्वतंत्र भारत का 56 वाॅं स्वतन्त्रता दिवस है । आचार्यश्रीजी का विशेष प्रवचन स्वतंत्रता दिवस के ऊपर होगा । भारत को आजादी कैसे मिली, इसको जानने हेतु अधिक से अधिक संख्या में लाल बाजार स्थिति आत्म शिव दरबार में पहुंॅचे ।

 

देश आजाद है: क्या हम आजाद हैं ?: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी म0

15 अगस्त, 2003 { मालेर कोटला }: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने प्रवचन में फरमाया कि- आज का यह पावन दिवस 15 अगस्त भारत की आजादी लेकर आता है । 15 अगस्त और 26 जनवरी ये दोनों ही दिन भारत की जनता के लिए महत्वपूर्ण दिवस हैं । भारत आजाद हुआ इसके पीछे अनेकों महान् सेनानियों का हाथ रहा परन्तु क्या हम आजाद हुए ? आजादी सबको प्रिय है । एक तोता सोने के पिंजरे में बन्द है उसे खाने के लिए अनुकूल भोजन दो फिर भी वह दुःखी है, वह स्वतंत्र नहीं है । स्वतंत्र पक्षी सुखी होता है जो मनमर्जी वह चाहे वैसा कर सकता है । वह सोने के पिंजरे में रहकर स्वतंत्र होना चाहता है ।

सबसे बडा दुःख है परतंत्रता का । हम भी पिंजरे में बन्द है कोई स्त्री के पिंजरे में बन्द है, कोई पुरूष, बच्चा, धन-दौलत, नरक स्वर्ग के पिंजरे में बन्द है । कब यह आत्मा स्वतंत्र होगी । हम सभी भी इस देह-रूपी पिंजरे में बन्द हंै । सरदार भगतसिंह, सुभाषचंद बोस, महात्मा गाॅंधी, सरदार वल्लभ भाई पटेल, लोकमान्य तिलक आदि हजारों स्वतंत्रा सेनानियों ने इस भारत को आज ही के दिन आजाद करवाया था । गाॅंधीजी की इसमें महत्वपूर्ण भूमिका रही थी । गाॅंधीजी ने देश के लिए कुछ नया करना चाहा परन्तु कुछ लोगों ने उनका विरोध किया । गाॅंधीजी विरोध के समय में भी अडिग खडे रहे । मानवता में नया विचार स्वीकार करना, लोगों में सहमत नहीं है, देखा जाये तो महात्मा गाॅंधी कुछ नहीं हडिडयों का ढांचा मात्र है, परन्तु वे स्वतंत्र भारत के राष्ट्रपिता कहलाते  हैं । हम स्वतंत्र तो हो गये हैं परन्तु अभी भी परतंत्रता में बॅंधे हुए हैं, जो स्वतंत्रता मिली उसके लिए हजारों लाखों लोग नींव के पत्थर बने, उन्होंने खून दिया, बहुत संघर्ष   किया । गोरे लोगों ने हमें बहुत छलकर स्वतंत्रता प्रदान की । स्वतंत्रता हमें आज के ही दिन मिली थी । हमारा भारत तो आजाद हो गया पर हम अभी भी वस्तु, व्यक्ति, परिस्थितियों के गुलाम बने हुए हैं । हम चाय, काॅफी, गुटखा आदि व्यसनों के गुलाम बने हुए हैं, इनके बन्धनों में बॅंधे हुए हैं । आज के दिन बन्धनों से मुक्त बनंे, हम संकल्प करें और इन व्यसनों का त्याग करें । दान, शील, तप भावना का आचरण करें । धर्म, कर्म की बातें करें । सद्भावनाओं को भावित करें और चिन्तन करें कि आज के दिन हम कितने गुलाम बने हुए हैं, इस गुलामी से स्वतंत्र हो जाये इसका संकल्प करें । 

रविवार को पावन संक्रान्ति का पर्व है । आचार्यश्रीजी संक्रान्ति के अवसर पर अपना विशेष प्रवचन फरमायेगें । आप सभी धर्मप्रेमी जनता अधिक से अधिक संख्या में पधारकर प्रवचन का श्रवण करें ।

 

आत्मा में परमात्मा निवास करता है : जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

16 अगस्त, 2003 { मालेर कोटला }: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर वर्तमान आचार्य सम्राट् श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने प्रवचन में फरमाया कि- हे ! सत्गुरू ! प्रणाम बार- बार, होठों पर हो आपका नाम बार बार----’ ऐसी भक्ति करो, ऐसी भक्ति में आ जाओ कि सद्गुरू को तब गुनगुनाओं,  उसकी याद में डूब जाओ । मुख से तब नमो अरिहंताणं निकलना चाहिये । आपकी प्यास, आपकी चेतना, आपका शरीर, आपका हृदय नमो अरिहंताणं को पुकारे, जिस प्रकार प्यासे व्यक्ति को पानी की याद आती है उसी प्रकार हम परमात्मा की याद में डूब जायें । खाना खाने से पहले, सोने से पहले, हर कार्य से पहले मुख से नमो अरिहंताणं निकले । मनुष्य जीवन की कीमत बहुत थोडी   है । अहंकार छोडो समर्पण करो, सब कुछ हृदयंगम हो जाएगा । परमात्मा अपना बन गया तो प्रकृति अपनी बन जाएगी । अहंकार तोडो, परमात्मा भीतर आ जाएगा । 

नमस्कार मंत्र बडा सरल, सार्वभौमिक है, इसमें किसी व्यक्ति विशेष को नहीं अपितु भगवंत्ता, गुणवत्ता को ही याद किया गया है । नमस्कार मंत्र में भगवत्ता प्रदर्शित होती है । अरिहंत का सार समझ में आ जाये तो यह जीवन शक्ति की ओर अग्रसर हो जाएगा । अरिहंत जिसके सारे शत्रु परास्त हो गये हैं, जिन्होंने अपने आपको जीत लिया है, वे अरिहंत हैं । अरिहंत अपने मालिक बन गये हैं, उनके भीतर से सुख दुःख निकल गये हैं । हम उनको नमन करेंगे तो उनको प्राप्त करने का रास्ता सरल हो जाएगा । नमन करना यानि अपने आपको खाली करना है । नमो कहते ही आपकी कामना, वासना, इच्छा, आकांक्षा को खाली कर दो । अरिहंत का भाव भीतर लाना हो तो भीतर का कचरा निकाल दो । आनंद, मस्ती, मौज में आकर अपने आपको खाली करके नमस्कार करो । 

जब तुम खाली हो जाओगे तब तुम अपने आप भर जाओगे । अरिहंत का व्यक्तित्व अपने आप भीतर आ जाएगा । अरिहंत का स्मरण करते हुए भीतर उनके भावों को स्थापित करो । प्रयोग करो जीवन सफल बनेगा । अरिहंत का सार अपने जीवन में उतारो । प्रेमपूर्ण व्यक्तित्व में डूब जाओ । अरिहंत को जपो । उनके भाव में रहो । परमात्मा को आवाज लगाओ । वह भीतर प्रवेश करेगा । जब जब सामायिक समता में होते हो तो आत्मा में परमात्मा निवास करता है । परमात्मा के ध्याने से बहुत शक्ति मिलती है, जीवन का रूपान्तरण हो जाता है । 

कल रविवार 17 अगस्त, 2003 को संक्रान्ति का प्रवचन है । आचार्यश्रीजी संक्रान्ति के अवसर पर अपना विशेष प्रवचन फरमायेगें । आप सभी धर्मप्रेमी जनता अधिक से अधिक संख्या में पधारकर प्रवचन श्रवण करें ।

 

संक्रान्ति हमारे जीवन में संक्रमण लाती है: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी म0

17 अगस्त, 2003 { मालेर कोटला } श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर वर्तमान आचार्य सम्राट् श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने प्रवचन में फरमाया कि- आज का यह पावन दिवस तप अभिनन्दन संक्रान्ति समारोह एवं जन्म दिवस को लेकर हमारे सम्मुख उपस्थित है । संक्रान्ति का पर्व हमारे जीवन में संक्रमण लाता है । आज की संक्रान्ति सिंह की संक्रान्ति है । सिंह पराक्रम का सूचक है । प्रभु महावीर का चिन्ह भी सिंह का ही है । महावीर की साधना सिंह की साधना है । सिंह कभी भी निमंत्रण स्वीकार नहीं करता । वह निर्भय होकर अकेला चलता है । महावीर अकेले चले थे । वे जहाॅं पर भी चले वहाॅं पर साधना के दीपक जले । उन्होंने निर्मल प्रेम, करूणा, मैत्री की पावन त्रिवेणी बहाई । तुम्हारा अस्तित्व है तुम्हारी हर क्रिया भीतर से जुडी है, उसी भाॅंति मंगल मैत्री का संदेश वैज्ञानिक धारा से जुडा हुआ है । परिवार, राष्ट्र, समाज के लिए सृजन का कार्य करो । जोडना, सृजन करना महावीर का मार्ग है । आजकल के लोग व्यावसायिक तौर पर फायदा और नुकसान देखते हैं । महावीर के पास कुछ भी नहीं था । फिर भी तीनों लोक उस पावन चरणों में झुकते थे । इन्द्र भी उनके चरणों में झुका था । 

नमस्कार मंत्र के समान विश्व के किसी धर्म में कोई ऐसा मंत्र नहीं है जो सर्वांगीण है । किसी भी मंत्र में किसी भी वस्तु अथवा व्यक्ति की चर्चा की है । नमस्कार मंत्र में चेतना को नमस्कार किया गया है । इस मंत्र में शुद्ध चेतना का भी उल्लेख मिलता है । नमो सिद्धाणं जो मैं हूॅं वह तूं है जो तूं है वह मैं हूॅं । यह ज्ञान हो जाए है तो सिद्धत्व की प्राप्ति हमारे लिए दूर नहीं है । तुम जैसा सिमरन करोगे वैसा बनोगे । अन्तर्रात्मा रंगमंच की भाॅंति है जिसके ऊपर आत्मा नर्तक का काम करती है इस संसार में रहकर भी हम कुछ प्राप्त नहीं कर सके तो हमारा जीवन व्यर्थ है । इस जगत में हमने दो कार्य मुख्य रूप से किये । तन को पाने के लिए हम पेट भरते रहे और दिन भर कमाई में लगाया और रात को सो गये । हम सभी इस भावना से उठकर सबके कल्याण की भावना करें । संतोष से जीवन जीयें । आनंद सुख शान्ति में जीयें । सुख दुःख शरीर की अवस्थाएॅं आती है और चली जाती है । हम शिकायत में न जीकर शान्ति में जीये । चिन्ता को छोडकर चिन्तन करें । पंच परमेष्ठी को किया गया नमस्कार करोडों पापों को मिटा देता है । आज के इस संक्रान्ति के पावन दिवस पर हम संक्रमणकाल में सहायक बनकर सहायता करें । आचार्यश्रीजी ने इस अवसर पर जीव दया के लिए भी प्रेरणा दी । 

आज के इस पावन दिवस पर विदुषी महासती श्री श्वेता जी म0 के 31 आयंबिल का तपाभिनन्दन किया गया । आचार्यश्री ने श्रमण संघ की ओर से उन्हें ‘तप ज्योति’ पद से समालंकृत कर आदर की चादर भेंट की । विदुषी महासती श्री ओमप्रभा जी म0 के 58 वें जन्म दिवस पर उन्हें शुभकामनाएॅं दी । आज आचार्यश्रीजी के दर्शनार्थ जम्मू, लुधियाना, बागापुराना, दिल्ली, निहालसिंहवाला, संगरूर, धूरी, नाभा, पटियाला, अहमदगढ मण्डी, सूरत, मोगा, बरनाला, गाजियाबाद, राजस्थान आदि स्थानों से भाई बहिन उपस्थित हुए । आज के इस पावन अवसर पर दिल्ली महासंघ के महामंत्री प्रो0 रतन जी जैन ने भी अपनी भावनाएॅं व्यक्त की ।  

 

सब धर्मों का सार महामंत्र नवकार: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

18 अगस्त, 2003 { मालेर कोटला } श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर वर्तमान आचार्य सम्राट् श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने प्रवचन में फरमाया कि- नवकार मंत्र महामंत्र  है । यह चैदह पूर्वों का सार है, इसकी आराधना करने वालों को जीवन में आने वाली अनुकूल प्रतिकूल परिस्थितियों में समभाव मे ंरहने की क्षमता प्राप्त होती है । अगर कोई उपसर्ग या जीवन का खतरा आ जाये तो धार्मिक दृष्टि से उससे बचने में सहयोग मिलता है । भावपूर्वक शुद्ध उच्चारण सहित उसकी साधना शुरू करो और धीरे-धीरे शान्त होते चले जाओ । मौन होते चले जाओ । मौन रहने से आप निर्भार हो जाते हो, हल्के रहते हो । दुनियाॅं में जो भी हो रहा है इसके लिए हम स्वयं जिम्मेदार   हैं । कोई दूसरा जिम्मेदार नहीं है । जो भी हम कार्य कर रहे हैं उसके लिए हम ही जिम्मेदार हैं । 

आचार्यश्री ने एक दृष्टान्त देेते हुए फरमाया कि- एक प्रोफेसर की स्कूल में नई नई नियुक्ति हुई । दोपहर के भोजन के समय सभी टीचर आपस में एक साथ बैठकर अपना अपना लाया हुआ भोजन करते । एक प्रोफेसर ने भोजन करने के पूर्व कहा- वही सब्जी, वही रोटी, ऐसा एक दिन नहीं, लगातार तीन दिन तक कहता रहा, तब उस नये प्रोफेसर ने कहा- भाई तुम्हें यह रोटी सब्जी पसन्द नहीं है तो अपनी पत्नी से परिवर्तन क्यों नहीं करवाते, तब वह कहता है मेरी पत्नी है ही नहीं, मैं ही बनाने वाला हूॅं । सभी लोग उस पर हॅंसने लगे लेकिन हम सभी सोचें क्या हम सभी यह नहीं कर रहे हैं । हम इस दुनियाॅं में उल्टे सीधे कार्य कर रहे हैं और हम ही उसकी शिकायत कर रहे हैं । अगर वो प्रोफेसर जिम्मेदारी के द्वारा बदल लेता है तो उसे सुख प्राप्त हो सकता है । उसी प्रकार हम भी अपने जीवन में हर कार्य को जिम्मेदारी के साथ करें । पोजेटिव हो रहा है तब भी हम जिम्मेदार है, नेगेटिव हो रहा है तब भी हम जिम्मेदार हैं । हर समय में हम अलग-2 रोल में रहते हैं, उस रोल को 100 प्रतिशत जिम्मेदारी के साथ निभायें । जैसे परिवार में रहते हैं तब पिता हैं । डाॅक्टर के पास होते हैं तब रोगी है, मन्दिर में जाते हैं तब भक्त हैं, किसी गुरू के पास जाते हैं तो आप शिष्य हैं, किसी से कुछ माॅंगते हैं तो आप भिखारी हैं, किसी से आप लेन-देन करते हैं तो आप व्यापारी है। आप किसी को दान देते हैं तो आप दाता हैं । हर क्षण आपकी स्थितियाॅं बदल रही हैं । बदलती हुई स्थितियों में हर रोल को सौ प्रतिशत निभायें और अपने कर्तव्य के प्रति जागरूक रहे । 

जैसे माॅं अनेक रिश्तों के बीच भी अपने आपको बैलेंस बनाये रखती है और अपने कर्तव्य की ओर सजग रहती है । उसी प्रकार हम महामंत्र की आराधना करते हुए सभी कार्यों को जिम्मेदारी से करते हुए अपने लिये भी समय निकालें । 24 घण्टे में से दो घण्टे अपने लिये अवश्य निकालंे । नमस्कार मंत्र की आराधना करें । मंत्र की गिनती करना आवश्यक नहीं है । शुद्ध-भाव से आराधना करो, पहले उच्चारण करो, धीरे-2 मौन हो जाओ और ध्यान में चले जाओ । संकल्प विकल्प रहित होकर सिद्ध भगवान की तरह सब जानो, देखो और कोई प्रतिक्रिया न करो, निर्भार हो जाओ, निर्विकल्प हो जाओ । शान्त और समाधि में आ जाओ । अपने स्वरूप में रमण करो, यही महामंत्र की आराधना है ।

हर कार्य को सौ प्रतिशत करने से सफलता मिलती है

 

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

19 अगस्त, 2003 { मालेर कोटला } श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर वर्तमान आचार्य सम्राट् श्री शिवमुनि जी महाराज ने नमस्कार मंत्र की आराधना समग्रता के साथ कैसे करें, इस पर चिन्तन करते हुए फरमाया कि जिस प्रकार एक पुल को क्रोस करने के लिए सौ प्रतिशत क्रोस करना पडता है, अगर 99 प्रतिशत करेंगे तो पानी में गिर जाएंगें । उसी प्रकार अगर आप गाडी भी चला रहे हैं तो सौ प्रतिशत चलानी होगी, अगर जरा सा होश खो गये तो गाडी भी जाएगी और आप भी जाएंगे । उसी प्रकार कोई भी कार्य आप समग्रता से करेंगे तो आपको पूर्ण उसका फल प्राप्त होगा । वैसे ही नमस्कार मंत्र की आराधना करते हुए आप अपना आत्म परीक्षण करें कि क्या आप समग्रता से पूर्ण समर्पण के साथ मंत्र का अनुष्ठान कर रहे हैं । सिर के सिरे से  अंगूष्ठे तक एक एक रोम से आपका समर्पण हो । सम्पूर्ण समर्पण आधा आधा भाग नहीं । आधा मन भोजन में आधा मन जप में, आधा मन अन्य कार्यों में तो एक भी कार्य सम्पूर्ण नहीं होता । जैसे दो घोडों की सवारी करने वाला व्यक्ति अपनी जान से हाथ धो बैठता है उसी प्रकार मंत्र की आराधना के लिए समग्रता से समर्पण के साथ अपने आपको पूर्ण खाली करके साधना करो । श्वासों श्वांस के साथ आराधना करो । जैसे छोटे बालक को पढने लिखने के लिए माॅं कितना साहस के साथ उसे सिखाती है और एक दिन वो बच्चा पढना लिखना अच्छी तरह से सीख जाता है, उसी प्रकार हम भी महामंत्र की आराधना में बच्चे ही हैं और बच्चे बनकर सीखें । मन बार बार चंचल होगा, विचारों में उलझेगा लेकिन आप साहस के साथ साधना करते जायें । धीरे धीरे आपका मन समग्रता से जुड  जाएगा । 

महावीर का मार्ग संकल्प का मार्ग है । हम अपने भीतर संकल्प करें तो वह संकल्प पूरा होना प्रारंभ हो जाता है । सिद्ध का अर्थ है जो सफल हो, जो पूर्ण हो गया, जिसने सब कुछ साध लिया, जो अष्ट-कर्मों से मुक्त हो गया । निर्विकल्प हो गया ऐसे सिद्धों का स्मरण करें । सिद्धों का ध्यान करें तो धीरे धीरे हमारी सिद्ध बनने की प्रक्रिया प्रारंभ हो जाती है । जैसे एक नर्तकी का नृत्य हमें प्रभावित कर देता है और हम नृत्य में झूमने लग जाते है ंउसी प्रकार हम सिद्धों का अगर स्मरण करेंगे, 100 प्रतिशत समर्पण और समग्रता के साथ तो हम अवश्य सिद्धत्व की ओर बढंेगें । समग्रता में प्राण ऊर्जा एकत्रित हो जाती है और जो हम संकल्प करते वह पूर्ण होता है । जैसे क्रोध में व्यक्ति की प्राण ऊर्जा एकत्रित हो जाती है और कमजोर व्यक्ति भी बडी से बडी वस्तु उठाकर फेंक देता है उसी प्राण ऊर्जा को हम सकारात्मक रूप में प्रयोग करते हैं, शान्ति के लिए प्रयोग करते हैं, अपने आप से जुडने के लिए उपयोग करते हैं तो संकल्प शक्ति फलित होने लगती है । इसके साथ ही रात्रि भोजन का निषेध करते हुए आचार्यश्री ने कहा कि- रात्रि भोजन करने से शरीर में अनेक रोग उत्पन्न हो जाते हैं । हमारा अष्ट कमल नाभी चक्र संकुचित हो जाता है । अतः प्रातःकाल हल्का नास्ता और सायंकालीन भी हल्का भोजन करना चाहिये, इससे मंत्र की आराधना करने में सहयोग मिलता है । आज आचार्यश्रीजी के दर्शनाथ देश के कोने कोने से यात्री पहुंॅंचे, जिसमें मध्य प्रदेश, हरियाणा, गुजरात, राजस्थान आदि प्रमुख प्रदेशों से उपस्थित हुए ।      

 

जहाॅं सभी साथ छोड जाते हैं वहाॅं धर्म साथ देता है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

20 अगस्त, 2003 { मालेर कोटला } श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर वर्तमान आचार्य सम्राट् श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने प्रवचन में फरमाया कि- जन्माष्ठमी का नाम श्रीकृष्ण से जुडा हुआ है । जन्माष्टमी श्रीकृष्ण के जन्म से प्रसिद्ध है । इस दिन हजारों व्यक्ति जन्म लेते हैं परन्तु किसी का नाम जन्माष्टमी से नहीं जुडा हुआ है और न किसी को जन्माष्टमी की वजह से जाना जाता है । श्रीकृष्ण में ऐसा साहस पराक्रम शक्ति थी । श्रीकृष्ण का जन्म कहाॅं हुआ और कब  हुआ अगर उस घटना को याद करें तो रोंगटे खडे हो जाते हैं । कंस की तलवार मार देने के लिए हर क्षण तैयार रहती थी ंजैसे ही देवकी के कोई पुत्र जन्म लेता, कंस उसे खत्म कर देता था । जब श्रीकृष्ण पैदा हुए उस समय कौनसा महोत्सव मनाया गया, कौनसी पाटियाॅं की गई, कौनसे घी के दीये जलाये गये, श्रीकृष्ण का जन्म तो अॅंधेरी कोठरी के अन्दर जेल में हुआ । उस समय कृष्ण के पास क्या था चारों ओर भय शोक पीडा का आतंक छाया हुआ   था । जैसे श्रीकृष्ण का जन्म हुआ । पहरेदारों को नींद आ गई । अपने आप ताले टूट गये ।

वासुदेव श्रीकृष्ण को उठाकर यमुना में उतरे, यमुना ने भी श्रीकृष्ण के चरण स्पर्श कर उन्हें जाने का रास्ता दे दिया । श्रीकृष्ण को किसी राजमहल में नहीं छोडा गया बल्कि एक किसान के घर ले जाया गया । किसान की पत्नी यशोदा ने लालन पालन किया  व शिक्षण के लिए गुरूकुल में गये । वहाॅं राजा रंक में कोई भेद नहीं था । गुरू सबको एक समान शिक्षा देते थे । बचपन में श्रीकृष्ण वृंदावन में गाॅंव के आस पास खेले व बडे हुए । कृष्ण का बचपन और यौवन बडा समृद्ध रहा, जिसका बचपन, यौवन और बुढापा आनंद में बीता हो उसका जीवन बडा सुखमय होता है । कृष्ण ने गायों को चराया । ग्वालों के साथ खेले, यौवन में कंस जरासंध जैसे दुष्टों का आतंक मिटाया । कृष्ण को स्नेह के प्रतीक के रूप में जाना जाता है । सखियों के साथ रास रचाते हुए श्रीकृष्ण का नाम आता है । राधा और मीरा के साथ उनका नाम आता है । कहते हैं मीरा जब राजमहलों को छोडकर जंगलों में चली गई तब वहाॅं पर भी वह सदा ही श्रीकृष्ण की भक्ति में लीन रहती थी । मीरा में ऐसी थी भक्ति, जहाॅं श्रद्धा और भक्ति रहती है वहाॅं अलौकिक घटना घटती है । राणा ने आदमी भेजे कि मीरा को महलों में ले आओ उसने देखा कि मीरा मानने वाली नहीं है, जब आदमी मीरा से जाकर मिले और उससे प्रार्थना की कि हमारे साथ महलों में चलो तो उसने कहा कि मैं श्रीकृष्ण से पूछकर आती हूॅं । वह मन्दिर में गयी श्रीकृष्ण से प्रार्थना की कि बहुत हो गया अब अपने भीतर लो । वह भक्ति में खूब नाची । इतने में एक अलौकिक घटना घटी कि श्रीकृष्ण ने अपना आॅंचल खोला और कहते हैं कि मीरा उस आॅंचल में समा गई । फिर मीरा बाहर नहीं आई । बूॅंद सागर में मिल गई । प्रेम में अपने आपको समर्पित कर दिया । शरीर के रूप में गई हो या न गई हो परन्तु चेतना के रूप में वह श्रीकृष्ण में समा गई, अमर हो गई । मीरा ने समर्पण किया और श्रीकृष्ण ने स्वीकार कर लिया ।

महाभारत में द्रौपदी की लाज किसने बचाई । श्रीकृष्ण ने उस समय द्रौपदी के स्मरण करने पर उसकी लाज बचाई । जहाॅं सभी साथ छोड देते हैं वहाॅं धर्म साथ देता है, श्रीकृष्ण को हम कर्मयोगी और धर्मज्योति के नाम से जानते हैं । कृष्ण की मैत्री भी बडी गजब की थी । जिसे हम श्रीकृष्ण और सुदामा के रूप में जानते हैं । सुदामा के पाॅंव पानी के बजाय अपने आॅंसुओं से धो दिये । श्रीकृष्ण का सेवाभाव युधिष्ठिर के द्वारा किये गये राजसू-यज्ञ में नजर आता है । वहाॅं पर श्रीकृष्ण ने आने वाले अतिथियों के पाॅंव धोने का कार्य स्वेच्छा से किया । छोटे से छोटा कार्य अगर व्यक्ति प्रेम और भक्ति से करता है तो वह कार्य छोटा न रहकर महान हो जाता है । गायों के प्रति श्रीकृष्ण की अत्यन्त भक्ति थी । आज हमारा जन्माष्टमी मनाना तभी सार्थक होगा जब हम एक एक गाय के लालन पालन का संकल्प लें । आचार्यश्री के कहने से सैकडों व्यक्तियो ंने एक- एक गाय के लालन पालन की जिम्मेदारी ली ।

 

आचार्य की योग्यता: साधु में पायी जाती है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

21 अगस्त, 2003 { मालेर कोटला } श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर वर्तमान आचार्य सम्राट् श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने प्रवचन में फरमाया कि- नमस्कार मंत्र के आराधना के सम्बन्ध में हमारी चर्चा चल रही थी । नमो अरिहंताणं एवं नमो सिद्धाणं की चर्चा भी हमने कर ली है साथ ही हमने भावों में जाने की कोशिश भी कर दी है । आज हम नमो आयरियाणं की चर्चा करेगें । आचार्य का आचरण और ज्ञान हमें नमन की ओर ले जाता है । आचार्य को समझने से पहले हम साधु को समझे क्योंकि आचार्य की योग्यता साधु में ही पायी जाती है । साधु वह है जो हमेशा जागृत अवस्था में जीता है । साधु रात्रि में भी जागता है । योगी की निद्रा योग निद्रा की भाॅंति होती है । ऊपर से वह निद्रा ले रहा है लेकिन भीतर से वह जागृत अवस्था में जीता है । 

जगत में दो बातें प्रायः देखी जाती है । किसी की आॅंख खुलती है और किसी की आॅंख बन्द हो जाती है । आॅंख का खुलना जीवन है और आॅंख का बंद हो जाना मृत्यु है । जन्म और मृत्यु में इतना ही अन्तर है कि किसी की आॅंख खुलती है और किसी की बन्द हो जाती है परन्तु एक आॅंख ऐसी है जो हमें परम अवस्था तक ले जाती है, वह है भीतर की आॅंख जिसे तीसरा नेत्र अथवा सी नेत्र भी कहते हैं सब कुछ न होते हुए भी आनन्द में रहना यह उस परम्अवस्था में भी प्राप्त हो सकता है । साधु आत्म-निन्दा, आत्म-आलोचना करें । साधु की पहचान ही ऋजुता और सरलता है । साधु भीतर के मौन को साधता है । आत्मार्चा में निःस्वार्थ जुड जाता है, चाहे वह कोई भी जगह हो उसका मन समता में रमण करता है । कपडे पहनकर नहीं, भीतर से साधु बनो । जीवन स्वस्च्छ और निर्मल बनाओ । साधु का स्वभाव समभाव में रहना  चाहिये । उसका हृदय विशाल और खुला हुआ चाहिये । अगर वह समता में रहेगा तो सब कुछ प्राप्त कर पाएगा ।    

 

भेद विज्ञान से साधक सिद्ध अवस्था को प्राप्त होता है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

22 अगस्त, 2003 { मालेर कोटला } श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर वर्तमान आचार्य सम्राट् श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने प्रवचन में फरमाया कि- आचार्य को जानने से प्रथम साधु को जानना चाहिये क्योंकि आचार्य की योग्यता साधु में ही पायी जाती है । साधु में बच्चे जैसा भोलापन होना चाहिये क्योंकि धर्म शुद्ध हृदय में ही फैलता है और शुद्ध हृदय भोलेपन में ही मिल सकता है । परमात्मा भोलेभाव में ही मिलेगा । कोई संत कपटी, मायावी नहीं होगा । संत हमेशा संतता से परिपूर्ण होता है । जहाॅं जमीन समतल होती है वहाॅं पानी बहता है । हम भी चेतना ज्ञान धर्म साधना का प्रवाह सरलचित्त में बहायें तो हम उन्मुक्त होंगे । सहज जीवन में जीवो । जिसको तुम मानते हो उसके प्रति श्रद्धा आस्था निष्ठा पूर्ण रखो । 

काहे को दुःख दीजिये, घर घर आतम राम ।

दादू सब संतोषी है, ये संतों का काम । 

परमात्मा सबके हृदय में बसा है । हमें किसी को भी दुःख नहीं देना चाहिये क्योंकि हर घर में आतम राम बसा हुआ है । संतोषी भाव में रहना ही साधु का लक्ष्ण होता है । ध्यान करते समय यह अवस्था सहज आ जाती है और भीतर शान्ति समृद्धि का अनुभव होता है । ज्ञानी अपने आपको हर परिस्थिति में बदल देता है । साधु के भीतर भेद-विज्ञान है जिससे वह इस आत्मा और शरीर को अलग-रूपों में देख सकता   है । भेद विज्ञान से सामान्य आदमी, साधक, साधक से साधु, साधु से सिद्ध बनता है । वासनाएॅं शरीर की है आत्मा की नहीं । भेद-विज्ञान को अपनाओ ।

भेद विज्ञान साबन भयो, समता रस भर नीर ।

अन्तर धोबी आत्मा, धोये निज गुण चीर ।।

भेद विज्ञान का साबन अपनाकर समता का नीर लेकर हम अपनी आत्मा से अपने निज गुण धोयें ।  भेद विज्ञान के साथ चेतना बदलेगी । तुम नमस्कार मंत्र पढो नमाज या ग्रन्थ साहब पढो । पढने के बाद चिन्तन करना, जीवन का रूपान्तरण होगा । हर कार्य करते समय भेद विज्ञान का अनुभव करो ।  

श्री अन्तकृतदशांग सूत्र का विमोचन एवं तपाभिनन्दन समारोह

भारत की शूरवीर धरा पंजाब में श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज के पधारने से सर्वत्र आनंद और उल्लास का वातावरण छाया हुआ है । आचार्यश्रीजी का सफल, ऐतिहासिक वर्षावास मालेर कोटला में गतिमान है । इस चातुर्मास में कई नई गतिविधियाॅं आचार्यश्रीजी के शुभ सान्निध्य में हररोज गतिशील हो रही हैं । शिववाणी आचार्यश्रीजी की मंगलमय अमृतवाणी  हर रोज प्रत्यक्ष रूप से ‘आत्म शिव दरबार’ ज्ञान मुनि नगर, लाल बाजार, मालेर कोटला में प्रवाहित हो रही है । वैसे ही पूरे विश्व के अन्दर आस्था चैनल के माध्यम से आचार्यश्रीजी लोगों के भीतर जिन-धर्म के प्रति आस्था उत्पन्न कर रहे हैं इस चैनल के अन्तर्गत मंगलमय प्रवचन प्रतिदिन प्रातः 6.40 से 7.00 बजे तक गतिमान है । आहार, स्वतंत्रता दिवस, श्रीकृष्ण जन्माष्टमी आदि पावन दिनों पर तथा संक्रान्ति के शुभ अवसर पर आचार्यश्रीजी ने अपने मंगलमयी प्रवचन फरमाये एवं हर रोज नमस्कार महामंत्र के ऊपर आध्यात्मिक समझ के साथ साथ प्रायोगिक रूप में नमस्कार मंत्र के ऊपर आचार्यश्रीजी ध्यान भी करवाते हैं । 

तपस्या

आचार्यश्रीजी के शुभ सान्निध्य में तपस्याओं का क्रम निरन्तर जारी है जिसमें तप रत्नेश्वरी महासती डाॅ0 सुनीता जी म0 के आज 44 उपवास हो गये हैं अभी आगे बढने के भाव हैं । वैसे ही उग्र तपस्विनी महासती श्री सुमित्रा जी म0, महासती श्री संतोष जी म0 सर्वतोभद्र तप कर रहे हैं । विदुषी महासती श्री चन्द्रप्रभा जी म0 चातुर्मास के प्रारंभ से ही एकासन व्रत की आराधना में संलग्न हैं । वैसे ही तप ज्योति महासती श्री श्वेता जी म0 के 32 आयंबिल पूर्ण हो चुके हैं । महासाध्वी श्री अचला कुमारी जी म0 चातुर्मास प्रारंभ से ही एकान्तर तपस्या में संलग्न हैं ।

श्रावक संघ में भी तपस्याओं का ठाट लगा हुआ है । आज तक करीब 30 अठाईयाॅं हो चुकी हैं और अब भी कई साधक अठाई तप में संलग्न हैं । हर रोज चार आयम्बिल भाई बहिनों की तरफ से चल रहे हैं । 

जाप

महामंत्र नवकार का अखण्ड जाप हर रोज घर-घर में बारह घण्टे का चल रहा है । वैसे ही हर शनिवार भद्रबाहु स्वामी द्वारा रचित श्री उपसर्गहर स्तोत्र जाप एवं चैबीस तीर्थंकरों की स्तुति लोगस्स का जाप भी गतिमान है । 

सेवा प्रकल्प

जन-जन के कल्याण हेतु आचार्यश्रीजी की शुभ नेश्राय में महावीर जैन युवक मण्डल द्वारा एस0 एस0 जैन सभा के तत्वावधान में बच्चों का फ्री हेल्थ चेकअप कैम्प 17 अगस्त, 2003 को लगाया गया जिसमें अनेक बच्चों ने अपना चेकअप करवाकर दवाई मुफ्त रूप से ली । दवाईयों का वितरण संघरत्न लाला श्री श्रीराम जी जैन सर्राफ, मालेर कोटला की ओर से हुआ । यह शिविर लुधियाना के प्रसिद्ध शिशु चिकित्सक डाॅ0 बी0 के0 जैन तथा उनके गु्रप ने किया । 

विमोचन

आचार्यश्रीजी की शुभ नेश्राय में जन-जन को शिववाणी सुनने को मिले इस हेतु एस0 एस0 जैन सभी की ओर से आचार्यश्रीजी के मंगलमय प्रवचनों की कैसेट ‘सम्यक् आहार’ का विमोचन आचार्य शिवमुनि चातुर्मास कमेटी के चेयरमैन, प्रधान आदि ने किया । आचार्य सम्राट् पूज्य श्री आत्माराम जी महाराज द्वारा टीका लिखित एवं पूज्य आचार्य सम्राट् श्री शिवमुनि जी महाराज द्वारा सॅंपादित आगम ‘अन्तकृतदशांग सूत्र’ का विमोचन दिल्ली महासंघ के महामंत्री प्रो0 रतन जैन ने किया । यह आगम पर्वाधिराज पर्युषण के भीतर स्वाध्याय हेतु उपयुक्त है । इसके भीतर 90 साधकों का वर्णन है, जिन्होंने परम गति को प्राप्त किया ।  श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज के दर्शन एवं मार्गदर्शन हेतु दर्शनार्थियों का तांता निरन्तर लगा हुआ है । दिल्ली महासंघ के अध्यक्ष श्री आनंद प्रकाश जैन एवं महामंत्री प्रो0 रतन जैन आदि महाराष्ट्र का सफल दौरा कर आचार्यश्रीजी के दर्शनार्थ उपस्थित हुए । उन्होंने भी आचार्यश्रीजी से मार्गदर्श्रन प्राप्त किया । इन्दौर, सूरत, दिल्ली, मानसा, बरनाला, लुधियाना, धूरी, संगरूर, जालंधर, पटियाला, जम्मू, मेरठ आदि श्रीसंघो ंने भी आचार्यश्रीजी के दर्शन लाभ लेकर मार्गदर्शन प्राप्त किया ।      

मंत्री

एस0एस0 जैन सभा, मालेर कोटला

 

जिन्दगी धुएॅं की लकीर है: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

23 अगस्त, 2003 { मालेर कोटला} श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर वर्तमान आचार्य सम्राट् श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने प्रवचन में फरमाया कि- यह हमारा जीवन संसार सपनों का बनाया हुआ अपना महल ढह जाता है । परमात्मा की तरफ से इस महल के लिए कोई बीमा भी नहीं है । पक्की दीवार नहीं है यह संसार कच्ची दीवार    है ।  इस जीवन की कहानी मेरी और आप सबकी है । जिन्दगी धूएं की लकीर की भाॅंति है जब आग जल जाती है धूएं की लकीर निकलती है जिसे हम दीपक जलता हुआ समझते हैं । कृष्ण, राम और रावण को भी इन महलों को छोडना पडा । हमने इस धरती पर पता नहीं कितनी बार जन्म लिया और मृत्यु को प्राप्त हो गए । 

जिन्दगी में अहंकार आता है तब क्रोध आता है । अहंकार एक विषय की भाॅंति है, विष को जो ग्रहण करेगा वह मृत्यु को प्राप्त होगा । उसी तरह जो अहंकार को ग्रहण करेगा उसे क्रोध आएगा ही । हम सपना बनाते हैं पर वह टूट जाता है । आप देखों सपनों का संसार हम ही बनाते हैं जीवन की वास्तविकता को हम पहचानें । सपने के साथ हम अपने आपको भी छोड देते हैं । हमारी उमर एक श्वांस है । जो दीये की भाॅंति है । दीया बुझ गया तो हमारा श्वांस भी बुझ जाता है । यह भी सत्य है कि जितने श्वांस तुमने बाॅंधे हैं उतने भोगने ही पडेगें । शुभगति बाॅंधने हेतु तुम धर्म करो । दान करो । किसी की सेवा करो । वही तुम्हें सम्बल प्रदान करेगा । 

महाराजा कृष्ण ने द्वारका नगरी बसाई थी, जहाॅं पर सोने चाॅंदी के अलावा कुछ दिखाई नहीं देता था । हर तरफ हीरे चमकते थे । बडी मेहनत से बसाई हुई नगरी वह भी एकदिन छोडनी पडी । जल गई वह । वह भी सपनों का ही संसार था जिसे हमने अपना माना था । 

महापर्व पर्युषण 24 अगस्त, 2003 से शुरू होने जा रहा है । यह वह दिन है जो जीवन में बार बार नहीं आते । बिना बीज के वृक्ष पर फल भी कहाॅं आते हैं । हम महापर्व पर्युषण में धर्म के वृक्ष को लगाकर मैत्री, करूणा से आप्लावित कर जप तप को जोडकर, दान देकर किसी की सेवा करके अपने जीवन को उज्ज्वल बनायें । महापर्व पर्युषण में प्रवचन प्रातः 8.00 से 10.00 बजे तक होगा । अन्तकृतदशांग सूत्र का वाॅंचन एवं पूज्य आचार्यदेव का विशेष प्रवचन इन सप्त दिनों में श्रवण करने हेतु प्राप्त   होगा । दोपहर में कल्पसूत्र का वाॅंचन वैसे ही अनेक धार्मिक अनुष्ठान इन सात दिनों के अन्दर होगें । हम अपने प्रतिष्ठानों को इन सप्त दिनों में बन्द रखें एवं ज्यादा से ज्यादा धार्मिक अनुष्ठान करें । 24 घण्टे का जाप एस0 एस0 जैन सभा, मोती बाजार में भाईयों का एवं चैधरियाॅं मौहल्ला में बहनों का होगा । इन बातों का विशेष ध्यान रखें । 

 

पर्युषण में धर्माराधना कर जीवन को सफल बनायें

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

24 अगस्त, 2003 { मालेर कोटला} श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर वर्तमान आचार्य सम्राट् श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने प्रवचन में फरमाया कि- महापर्व पर्युषण का पहला दिन आप सबके लिए मंगलकारी हो । जीवन में धर्म की गंगा बहती रहे । पर्युषण विश्व में धर्म सुख शान्ति स्मृद्धि सौभाग्य का संदेश देता है । जैन भाई आज से आठ दिन तक धर्म साधना में रत रहते हैं । हम परमात्मा बनना चाहते हैं या शैतान । सत्कर्म करना चाहते हैं या दुष्कर्म । हम सुखी रहना चाहते हैं या दुःखी इसका चुनाव हम सभी करें । धर्म को अंगीकार करके जीवन सफल बनाओ । तुम चैतन्य हो यह तुम्हारा धर्म  है । तुम सुख शान्ति समृद्धि आनंद का द्वार पकड लो, परमात्मा तक पहुंॅच जाओगे ।

आज के दिन पाॅंच बातों का हम ध्यान रखेंगें-

तुलसी इस संसार में, पाॅंच रतन है सार ।

सज्जन संगत हरि भजन, दया दैन्य उपकार ।। 

सज्जन की संगति आठ दिन हम जरूर करें । इन आठ दिनों में हम परोपकार करें । किसी के ऊपर दया करें । सज्जन की संगति के साथ प्रभु भक्ति में मन को लगायें । आठ दिन भक्ति, निष्ठा, श्रद्धा के साथ भाग लें । जो वर्षों में नहीं होता वह इन आठ दिनों में पल भर में हो जाता है । प्राणी मात्र की रक्षा, मूक प्राणियों की रक्षा कीजिए । इन आठ दिनों में सामायिक, संवर, प्रतिक्रमण, आलोचना, एकाग्रता और भाव से मन को लगाइये ।

प्रभु महावीर की वाणी को भीतर में उतारे । हम शुभ विचार करेंगे तो कार्य भी शुभ होगा । हम कार्य शुभ करेंगे तो हमारी आदत अच्छी बनेगी । आदत के साथ-साथ अचरण से चारित्र आएगा । चारित्र से हमारा भाग्य बदलेगा । धर्म के विचार भीतर लाएंगें तो भाग्य बदलेगा । श्रावक के कर्तव्यांें को हम भीतर उतारें । मंगल की भावना भायें । ब्रह्म मुहूर्त, ऊषा-काल एवं गौधूली वेला में धर्म का आचरण करें । 

आज से महापर्व पर्युषण शुरू हो गये हैं । अन्तकृतदशांग सूत्र का वाॅंचन सुबह प्रवचन के समय चल रहा है । आचार्यश्रीजी दोपहर में अपने मुखारबिन्द से कल्पसूत्र का वाॅंचन करेंगे एवं कल्प का मर्यादा विशेष रूप से समझायेंगे । आज अनेकों भाई बहिनों ने उपवास, आयम्बिल आदि तपस्याएॅं की है । महासतीवृंद भी तपस्या के क्षेत्र में संलग्न   हैं । वे भी अनेकानेक तपस्या कर अपने जीवन को सफल बना रही हैं । आचार्यश्रीजी के जीवन पर पंजाब की सुविख्यात गायिका रजनी जैन ने ‘शिव दरबार’ कैसेट तैयार की है जिसमें उन्होंने अपने अनुपम भावों को लिखकर स्वयं ही गाया है । इस कैसेट का विमोचन भी आज यहाॅं पर समपन्न हुआ ।

 

मंगल के भाव से राग-द्वेष कम होते हैं: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी म0

मालेर कोटला 25 अगस्त, 2003: आचार्य सम्राट् श्री शिवमुनि जी महाराज ने धर्म सभा को सम्बोधित करते हुए फरमाया कि- पर्वाधिराज पर्युषण का दूसरा दिवस आप सबके लिए मंगलकारी हो । जीवन में धर्म की गंगा बहे । मैत्री करूणा के सªोत प्रवािहत हों । जीव अनन्त अनादिकाल से संसार परिभ्रमण करता चला आ रहा, उसका उपाय भी प्रभु महावीर ने अपनी वाणी में कहा कि- जब साधक को सम्पूर्ण ज्ञान होता है तो प्रकाश की भाॅंति होता है । अज्ञान के परिहार से जीव मोक्ष को प्राप्त करता है । जब राग द्वेष का क्षय होता है तब अज्ञान मोह का परिहार होता है और मोक्ष की प्रापित होती है । मोहनीय कर्म को पतला करो । स्वाध्याय, ध्यान, सत्संग सेवा भावना, दान, शील, तप करते समय ीज्ञीतर से राग-द्वेष छोडो । लोभ और माया राग से आती है । 

नमस्कार मंत्र की आराधना से साधक साधना करते हुए सिद्धगति को प्राप्त कर लेता है । निरीक्षण-परीक्षण के लिए दान देते हुए अहंकार आ जाता है । अहंकार को तोडो । मंगल के भाव से राग-द्वेष कम होंगे । श्रावक को दिन में दा सामायिक करनी चाहिए । सामायिक से समताभाव आएगा । धर्म क्रिया करते समय जागरूक रहें । सोते समय अपने श्रद्धास्पद को याद करो । मंगल की भावना करो, भीतर भावना भाओ कि मेरा चित्त शान्त हो । जो भावना तुम सोते समय भाओगे वही भावना अगले दिन का जाप का पहला विचार बनेगा । 

साधक को परमात्मा तक पहुंॅचने के लिए तपि-तप-ध्यान बीच के पडाव हैं । नमस्कार मंत्र में हमारा उद्देश्य साधुत्व को प्राप्त करते हुए सिद्ध बनना है । अरिहंत, आचार्य, उपाध्याय, ये तो बीच के पडाव है । भावों के लिए चित्त की दशा आवश्यक   है । भगवान बुद्ध ने कहा- राग के समान अग्नि नहीं, मोह के समान जाल नहीं, तृष्णा के समान नदी नहीं है । इसीलिए व्यक्ति रागी से वीतरागी की ओर बढे । मोह से शान्ति और मौन की ओर बढे । तृष्णा से तृप्ति की ओर बढे । सुपात्र दान दे जिससे जीवन में शान्ति और समृद्धि आएगी । 

आचार्यश्रीजी ने प्रवचन में श्रद्धालुओं को दान शील तप भावना की प्रेरणा देते हुए सामायिक, प्रतिक्रमण आलोचना करने के लिए प्रेरणा दी । सूत्र वाॅंचन प्रतिदिन की भाॅंति हो रहा है । अनेक भाई बहिन तपस्या में संलग्न हैं ।

हिंसक व्यक्ति को कर्म के फल का चिन्तन करना चाहिए

 

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेर कोटला 26 अगस्त, 2003: आचार्य सम्राट् श्री शिवमुनि जी महाराज ने धर्म सभा को सम्बोधित करते हुए फरमाया कि- पर्वाधिराज पर्युषण का तीसरा दिवस आप  सबके लिए मंगलकारी हो । 

हमारे भीतर सम्यक् दर्शन की ज्योति जले । धर्म साधना के बीज अंकुरित हों, जीवन में दृष्टि का अपार महत्व है । धर्म और साधना का मूल है, सम्यक् दर्शन । सब अंगों में आॅंख छोटी है, पर वह बडा काम करती है । अंधे व्यक्ति को प्रकाश दिखाई नहीं देता और प्रकाश का कोई गन्ध, रस, स्पर्श नहीं होता, उसे तो देखा ही जा सकता है । अनुभवी व्यक्ति ही उसे अनुभव कर सकता है । दर्शन दृष्टि क्या है ? हमारे भीतर जो राग का आवरण है उसे हटा दें तो परमात्मा हमें मिल सकता है । प्रभु महावीर ने हर सत्संगी व्यक्ति को जिसे परमात्मा प्राप्ति की इच्छा थी उसे अरिहंत तक पहुॅंचा दिया ।

हर प्राणी अपने लिए तो पेट भरता है और उसके जीवन में तीन ही काम है । खाना खाना, पानी पीना और इस जीवन का भोग करना । यह सब अपने लिए करता   है । प्रभु महावीर ने तो परोपकार की बात कही । जिस प्रकार पारसमणि के स्पर्श से लोहा स्वर्ण में परिवर्तित हो जाता है उसी प्रकार मानव भी सिद्धत्व में परिवर्तित हो सकता है, आवश्यकता है उसे सम्यक् दर्शन रूपी रसायन की ।

आज ही वर्तमान पत्र में देखने में आया कि देश के विघटनकारी तत्वों ने मुम्बई महानगर में कार बम्ब विस्फोट कर गम्भीर स्थिति पैदा कर दी है । जिसके अन्दर सैंकडों लोग गम्भीर रूप से घायल एवं मारे गये । ऐसे कर्म करने वाले देश की समृद्धि को ठेस पहुंॅचाने वाले निर्दोष लोगों को मोैत के घाट उतारने वाले लोग जब इन कर्मों का उदय इन्हें होगा तब यह जानकर मन करूणा से भर जाता है । जब वे नरक आदि गतियों का दुःख भोगेंगे तब उन्हें पता चलेगा । अतः व्यक्ति जैसा कर्म करता है वैसा ही उसे फल भोगना पडता है । व्यक्ति को कर्म करने के पहले सजग होना चाहिये । व्यक्ति को अपनी दृष्टि शुद्ध रखनी चाहिये । व्यक्ति को किसी धर्म स्थान या गुरू के पास जाने से पूर्व अपने भीतर अपने मन को टटोलना चाहिए । जीवन का सार ग्रहण करो । सुख और आनंद से भर जा 

 

पाॅंच इन्द्रियों का विजेता ज्ञानी कहलाता है: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेर कोटला 27 अगस्त, 2003: आचार्य सम्राट् श्री शिवमुनि जी महाराज ने धर्म सभा को सम्बोधित करते हुए फरमाया कि- पर्वाधिराज पर्युषण का चैथा दिवस आप  सबके लिए मंगलकारी एवं शुभ हो । आप सभी के जीवन में ज्ञान व विवेक जागृत हो । जीवन जीने की कला का आर्विर्भाव हो । प्रभु महावीर ने कहा- एगे नाणे - एक ही ज्ञान है, सारी आत्मा एक है और और उनका निजगुण ज्ञान है । आत्मा की पहचान ज्ञान से होती है । चाहे वह कोई आत्मा हो और कैसी भी योनि की हो । छोटे प्राणी से सिद्ध भगवान तक सभी में एक ही आत्मा और एक ही ज्ञान है, अन्तर केवल कर्मों के आवरण का है । कर्म-क्षय का है । सबसे जुडने की बात ज्ञान है । ज्ञान हमारा स्वभाव है । मुक्ति भी हमारा स्वभाव है । ज्ञान जन्म से ही होता है । समझ आने पर व्यक्ति उसका उपयोग करता है । ज्ञान बाहर से नहीं भीतर से आता है । ज्ञान वह है जो तुम्हें मुक्ति की ओर ले जाता है । आनंद, मैत्री, प्रेम, करूणा में जब हम होते हैं तब हम ज्ञानी होते हैं । जहाॅं पर प्रेम एवं अज्ञान है एतदर्थ हमें प्रेम लुटाना चाहिये । कबीर ने भी पंडित उसी को कहा है जिसने ढाई अक्षर प्रेम के समझे है । अन्तर का ज्ञान सम्बन्ध और भीतर की ज्योति जगे तो जीवन आनंदमय हो जाता है । 

आत्मा के ऊपर ध्यान दो । शरीर तो बनता बिगडता है । प्रभु महावीर ने भी आत्म ज्ञानी की बात कही है । अपनी आत्मा का अनुभव कर लो । मैं सिद्ध हूॅं, बुद्ध हूॅं, चैतन्यमय हूॅं । अग्नि मुझे जला नहीं सकती, पानी मुझे गला नहीं सकता, शस्त्र मुझे काट नहीं सकते, मृत्यु मिटा नहीं सकती, ऐसी परम्शुद्ध आत्मा मेरी है । आत्मा अमर है वह कभी मर नहीं सकती । मरती तो काया है । यही बात आगम, त्रिपिटक, उपनिषद आदि में बताई गई है ।

ज्ञानी के विविध लक्षण है । जीवन में क्रोध नहीं है तो वह ज्ञानी है । पाॅंच इन्द्रियों का विजेता, क्षमा धारण करने वाला । दयामय निर्लोभी और हमेशा दान देने की भावना रखने वाला ज्ञानी कहलाता है । वह भय और शोक हरण करने वाला होता है । इन लक्षणों मे ंसे एक भी लक्षण आ जाये तो जीवन का कायाकल्प हो जाता है । जीवन का महत्वपूर्ण क्षण है, आत्म-ज्ञान । घर मे ंरहते हुए हम इस तरह से रहे जैसे हम ज्ञान को प्राप्त कर रहे हैं । पहले ज्ञान का आचरण करो, फिर दयामय जीवन जीओ यह प्रभु महावीर का फरमान है । जो मनुष्य ज्ञान को प्राप्त नहीं करता है वह संसार में तिर्यंच की भाॅंति है । अपनी आत्मा को जानो, पहचानों । ज्ञान और विवेक से जीवो, जीवन आनंद से भर जाएगा ।  

 

जिनवाणी का सार है आचरण: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेर कोटला 28 अगस्त, 2003: आचार्य सम्राट् श्री शिवमुनि जी महाराज ने धर्म सभा को सम्बोधित करते हुए फरमाया कि- पर्वाधिराज पर्युषण का पाॅंचवा दिन आप सबके लिए मंगलकारी एवं शुभ हो । आपके भीतर सम्यग् दर्शन, ज्ञान चारित्र की त्रिवेणी बहे । जैनागमों में आचार को प्रथम धर्म कहा गया है । मोक्ष प्राप्ति के तीन मार्ग हैं जिसमें सम्यग् दर्शन, सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चारित्र की प्ररूपणा की गई है । जिनवाणी का सार है आचार । आचरण को जीवन में उतारो, अगर यह आचरण जीवन में नहीं है तो ज्ञान व्यर्थ है । ज्ञान और क्रिया से मोक्ष मिलता है । क्रिया के रूप में ज्ञान आने पर हमारा जीवन सफल होता है । आचरण, चारित्र, सम्भाव, समता में है । प्रभु महावीर को अनेकों उपसर्ग आए फिर भी वे समता में रहे । 

बुद्ध के पास किसी जिज्ञासु ने चार प्रश्न पूछे- बुढ़ापे में आने वाली चार वस्तु क्या है ? बुढ़ापे में शील, सदाचार ही काम आता है । श्रावक के बारह अणुव्रत सदाचार के दर्शक हैं । महात्मा गाॅंधी बुढ़ापे में ही अति रूपवान लगते थे । सदाचार से व्यक्ति के जीवन में आमूल-चूल परिवर्तन हो जाता है । 

दूसरा प्रश्न यह पूछा गया कि मन की चंचलता को किससे बाॅंधा जाये । भगवान ने उत्तर देते हुए कहा कि मन को वश में करने के लिए श्रद्धा रूपी कवच में स्थित हो जाओ और उसे मन रूपी धागे में पिरोओ । मनुष्य का असली रत्न है, प्रज्ञा । प्रज्ञा वह है जहाॅं पर ज्ञान अनुभूत किया गया है । पुण्य रूपी धन चोरों के द्वारा चुराया नहीं जा सकता । इन चारों उत्तरों को अगर व्यक्ति अपने जीवन मे ंउतार ले तो व्यक्ति का जीवन सार्थक हो जाएगा । यह सब जीवन में लाने के लिए जीवन को परखों । जीवन के संकल्प को दृढ़ रखो, जिस व्यक्ति का आचरण अच्छा नहीं है उसे वेद, आगम, त्रिपिटक भी ऊॅंचा नहीं उठा सकते । 

एक गधा चन्दन की लकड़िया ढ़ोता है परन्तु उसे शीतलता का अनुभव नहीं हुआ या उसके भीतर चन्दन की सुगन्ध नहीं व्याप्त हुई तो उसका चन्दन उठाना भार रूप ही माना जाएगा । आचरण को प्रमुखता दो, जिससे जीवन सुन्दर और सुव्यवस्थित बने । 

साधु का जीवन खजूर के पेड़ की भाॅंति है । खजूर के पेड़ पर चढ़ने से मिठास अनुभव होती है परन्तु अगर गिर जाये तो चकनाचूर होता है । अगर हम ऊॅंचे पर्वत से गिरेंगे तो एक ही बार गिरेगें परन्तु चारित्र-रूपी पर्वत से गिरंेगें तो हमारे हजारों जन्म व्यर्थ हो जाएंगें । इसलिए आचरण को शुद्ध रखों, कथनी करनी को एक रखो । जो व्यक्ति धर्म में अग्रसर होता है वह जीवन में सर्वोत्कृष्ट स्थान प्राप्त करता है, हम जीवन में आचरण को प्रमुखता दें जिससे हमारा जीवन आचार-युक्त बनें और हम ज्ञान व क्रिया के द्वारा जीवन की उच्चता को प्राप्त कर सकें ।

 

धारणा करने से मंगल होता है: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेर कोटला 29 अगस्त, 2003: आचार्य सम्राट् श्री शिवमुनि जी महाराज ने धर्म सभा को सम्बोधित करते हुए फरमाया कि- पर्वाधिराज पर्युषण का छटा दिन आप सबके लिए मंगलकारी एवं शुभ  हो । आपके भीतर चार मंगल, चार उत्तम, चार शरण का आर्विर्भाव हो । मंगलपाठ आपके लिए मंगलकारी हो । प्रभु महावीर ने भी प्रत्येक प्राणी के लिए मंगल की कामना की । धारणा से परिपूर्ण है मंगलपाठ । प्रभु महावीर ने कहा- जिसको पाना हो उसकी सोच करो । जिसको धारण करना हो उसकी आकांक्षा करो । धारणा प्रभु महावीर के शासन में सर्वोत्त्म है, सर्वोपरि है । पातंजलि ने जो योगसूत्र लिखा उसमें धारणा को छठा स्थान दिया गया  है, परन्तु महावीर के योग दर्शन में धारणा को प्रथम स्थान दिया गया है । जब हम मंगल की धारणा करेंगे तो मंगल होगा । जैसी धारणा करोगे वैसा होता जाएगा । जो बात दवा से न हो सके वह दुआ से होती है । सच्चा गुरू मिलने पर आत्मा की परमात्मा से बात होती है । 

धारणा के आधार पर कई वैज्ञानिकों ने कठिनतम कार्यों को सरल बना लिया । धारणा करने के लिए अपने अपको साधना पड़ता है । तप और संकल्प से व्यक्ति धारणा तक पहुंॅचता है । आज का विज्ञान कहता है कि सोच अच्छी रखोगे तो प्रभाव भी अच्छा आएगा । सोच बूरी रखोगे तो प्रभाव बुरा आएगा । महावीर के समक्ष आने वाला हर प्राणी धारणा से ही बदल जाता है । 

मंगलपाठ जीवन में मंगल लाता है । मंगलपाठ सुनने से भीतर पूर्ण मंगल की कामना करो । शरीर और चेतना को प्रथक समझो । महापुरूषों का अतिशय और धारणा से सर्व-कार्य सुलभ हो जाते हैं । शुभ की धारणा करने से मस्तिष्क का पिछला हिस्सा प्रभावित होता है । अशुभ की धारण करने से मस्तिष्क का अगला हिस्सा प्रभावित होता है । मंगल पाठ को भक्ति, प्रेम और एकाग्रता से सुने । जीवन रूपान्तरित होगा, मंगल की कामना करने से जीवन परिवर्तन की ओर ढल जाएगा ।

रविवार को आचार्य सम्राट् श्री शिवमुनि जी म0 के शुभ सान्निध्य में संवत्सरी महापर्व तप, त्याग पूर्वक, श्रद्धा से मनाया जाएगा । इस दिन प्रत्येक भाई बहिन सामायिक, दया, पौषध, उपवास आदि प्रत्याख्यान कर प्रतिक्रमण के साथ साथ गुरूजनों के समक्ष आलोचना कर अपने जीवन को उज्ज्वल   बनावें । कल्पसूत्र का वाॅंचन भी चल रहा है । यह वाॅंचन दोपहर 3.00 से 4.00 बजे तक मोती बाजार जैन स्थानक में हो रहा है । आचार्यश्रीजी अपनी अनुभवमय वाणी फरमाकर प्रत्येक जीवन के लिए मंगल की ओर अग्रसर कर रहे हैं । 

 

मंगलपाठ मोक्ष के द्वार खोलता है: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेर कोटला 30 अगस्त, 2003: आचार्य सम्राट् श्री शिवमुनि जी महाराज ने धर्म सभा को सम्बोधित करते हुए फरमाया कि- पर्वाधिराज पर्युषण का सातवां दिन आप सबके लिए मंगलकारी एवं शुभ  हो । धर्म की शरण, अरिहंत, सिद्ध, साधु की शरण में जायें । चार मंगल, चार उत्तम, चार शरण के भाव आने पर व्यक्ति मोक्ष तक पहुंॅच जाता है । मंगल की भावना करो । जैसी भावना करोगे वैसा विकास   होगा । साधु हर कार्य करते समय मंगल की भावना में डूबा रहे, अमंगल की कामना न करें सबके शुभ मंगल एवं भले की भावना रखें । प्रभु ने कहा कि हमें चार ही मंगल, चार उत्तम और चार शरण में जाना चाहिए । 

मंगल दो प्रकार का माना जाता है । एक भौतिक मंगल एवं दूसरा आध्यात्मिक मंगल । भौतिक मंगल वह है जिसमें हम शुभ मुहूर्त आदि देखकर नारियल, दही, गुड़ अक्षत प्रदान करते हैं, यही भौतिक मंगल है । आध्याित्मक मंगल मंे हमारे भाव परिस्पष्ट हो जाते हैं । मंगल के दो अर्थ किये जाते हैं, जिससे ममकार गले वह निषेधात्मक मंगल है और जिससे सुख समृद्धि और सौभाग्य की अभिवद्धि होती है तथा सच्चिदानन्द की प्राप्ति होती है वह विधेयात्मक मंगल है । हम अपने कर्ताभाव को पौषित न करते हुए शरणभाव में जीयें । कर्ताभाव दुःख का मूल कारण है । ज्ञाता, द्रष्टा-भाव सुख का कारण है । कर्ताभाव में आदि, व्याधि, उपाधि आती है । दुःख बढ़ता चला जाता है । दुःख का कांटा निकल गया तो मानो सुख आ ही गया । भीतर समृद्धि का भाव रखो । जीवन जीने की कला भी हमें यही बताती है कि हम प्रतिपल प्रतिक्षण समृद्धि भाव में रहे । पैसा धन, पद, यश हमें आन्तरिक समृद्धि नहीं दे सकता । आन्तरिक समृद्धि तो भीतर के भाव ही प्रदान कर सकते हैं इसलिए सुख को बाॅंटों, जितना दोगे उतना मिलता चला   जाएगा । 

जो आपको मिला है उसकी वृद्धि हमेशा होती रहे, यही वह भाव है जो सभी प्राणियों के लिए अमिट प्यार देता है । ध्यान करो । साधना करो, जीवन में आगे बढ़ते चलो । हमारा चित्त शान्ति समता और मैत्री में आ गया तो वह सुख है, जिससे हमारे चित्त का समाधान हो वह सुख है । सुख दुःख कर्म संस्कार के कारण है । इन्द्रियों का सुख दुःख ठीक है, परन्तु चित्त के समाधान का सुख अपरम्पार है । अरिहंत, सिद्ध, साधु एवं धर्म को मंगल मानें । मंगल स्वरूप समझें । पंचपरमेष्ठी को मंगल स्वरूप समझें तो हमारी मोक्ष प्राप्ति नजदीक है । नमस्कार मंत्र की आराधना से कैवल्य प्राप्ति हो सकती है । आवश्यकता है उसके भाव और अर्थ में डूबने की, वह चैदह पूर्व का सार है । वह अनादि अनंत है । हमारी हर क्रिया सरल-भाव में होनी चाहिए । उठते, बैठत्े, सोते, जागते हम सरल भाव में डूब जायें । हमेशा शरण-भाव में जीयें जिससे हमारा मंगल होगा । क्रोध, लोभ, अहंकार आये तो शरण ग्रहण करना जिससे चित्त शान्त हो जाएगा ।

इच्छा से पार होकर समाधान करना यही धर्म है । धर्म ही मंगल, उत्तम है । मंगल-पाठ मोक्ष के द्वार खोल देता है । हमें मंगल-पाठ सुनते समय चार मंगल, चार उत्तम, चार शरणा की भावना रखनी चाहिये । शुद्ध-भाव से मंगल-पाठ श्रवण करें । शरीर शुद्धि, मन शुद्धि, वस्त्र एवं भूमि शुद्धि को देखते हुए मंगलपाठ की गहराई में जावें तो अवश्य ही कल्याण होगा ।

 

महापर्व संवत्सरी क्षमा का प्रतीक है: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेर कोटला 31 अगस्त, 2003: आचार्य सम्राट् श्री शिवमुनि जी महाराज ने संवत्सरी महापर्व के अवसर पर अपना उद्बोधन देते हुए फरमाया कि- आज का यह महान पर्व विश्व बन्धुत्व का परिचायक   है । यह पर्व सबके भीतर मैत्री का भाव लायें । संवत्सरी पर्व साल में एक बार आता है । पर्व दो प्रकार के हैं- लौकिक पर्व और लोकोत्तर पर्व । भैय्या दूज, रक्षाबन्धन, दशहरा, दीपावली आदि पर्व लौकिक कहलाते  हैं । संसार की सुख शान्ति के लिए इन पर्वों का अधिक महत्व है । लोकोत्तर पर्व आत्म निरीक्षण, आत्म चिन्तन और स्वरूप रमण का संदेश देता है । सभी मेरे मित्र हैं, कोई भी मेरा शत्रु नहीं है । मित्रत्व की भावना को अपनाओ । आज के दिन मिल बैठकर अनबनों को हल करें । संवत्सरी शब्द ही हमें बताता है कि संवत्सर यानि एक वर्ष बाद आने वाला पर्व पर्युषण के सात दिन तैयारी के हैं । कर्म संस्कारों को वहन करते हुए शरीर को कुन्दन बनाने का सिरमौर है पर्व । मानव गलती का पुतला है । गलती हर पल, हर क्षण किसी भी समय होती रहती है । उसे भुलाकर हम प्रतिदिन क्षमा याचना करते हैं । प्रतिदिन अगर क्षमा याचना नहीं की तो आठ दिन में कर लेनी चाहिए । आठ दिन में नहीं तो पक्खी, चैमासी, संवत्सरी के दिन अवश्य क्षमा याचना करें जिससे हम शुद्ध बन सकें । संवत्सरी की आराधना भगवान महावीर के समय से चली आ रही है । चातुर्मास के 50 दिन बीत जाने के अनन्तर भादवा सुदी 5 के दिन यह संवत्सरी पर्व मनाया जाता है । आज के दिन कई आदि मानवों ने माॅंसाहार न करने का प्रत्याख्यान किया था । यह भी संवत्सरी का एक जीवन्त उदाहरण है । महापर्व संवत्सरी अभूतपूर्व ऊॅंचाई लिए हुए है । संकल्प जितना ऊॅंचा होगा उतना ही अच्छा होगा । जो आत्मा के साथ कर्म-बन्धनों को तोड़ते हैं वह व्यक्ति अपने कर्मक्षय कर लेते हैं । ध्यान स्वाध्याय तप-जप का संकल्प लें । 

आचार्यश्रीजी ने फरमाया कि आज के दिन मैं सभी से क्षमा-याचना करता हूॅं । अनुशासन और संघ हित के लिए जो कदम मैंने उठाये हैं उस समय में मेरे द्वारा कुछ कहने सुनने में आया हो तो साधु-साध्वी, श्रावक श्राविका चारों तीर्थों से क्षमा याचना करता हूॅं । महावीर का धर्म संघ सर्वोत्तम है । क्षमा सर्वप्रथम हमें करनी चाहिए । तप, विनय, संगठन के क्षेत्र में महासतीवृंद सबसे आगे रहती हैं । यह हमारे संघ की श्रृंगार है । कर्ताभाव को छोड़ें । अपनी कमाई का कुछ हिस्सा आज के दिन दान करें । चित्त की अनुकम्पा से दान देवें ।

महापर्व संवत्सरी का दिवस मंगल लेकर आया है । जो भी कार्य करें मंगल की भावना से करें । सबके प्रति मंगल का भाव रखें । मंगल की भावना जीवन का रूपान्तरण कर देता है । अहिंसा और धर्म के लिए कार्य करें । महापर्व संवत्सरी हमें यह सुन्दर संदेश देता है । कृतज्ञता से मैत्री का भाव रखें । भावनाओं से मन को भावित करें । प्रतिक्रमण, आलोचना करें । 

आज के दिवस पर आचार्यश्रीजी ने आगम प्रकाशन हेतु लोगों को प्रेरणा दी जिससे प्रेरित हाकर अनेकों भाई ब हिनों ने दान दिया । श्रीसंघ, युवक मण्डल, महिला मण्डल ने भी आगम प्रकाशन में दान दिया ।

हृदय को पवित्र बनाना ही क्षमापना पर्व का सार है

 

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेर कोटला 1 सितम्बर, 2003: आचार्य सम्राट् श्री शिवमुनि जी महाराज ने क्षमा महापर्व के अवसर पर अपना उद्बोधन देते हुए फरमाया- जैन धर्म में संवत्सरी पर्व के पश्चात् प्रत्येक व्यक्ति साधु साध्वी श्रावक श्राविका आपस में खुले हृदय से एक दूसरे के जाने अनजाने में हुई गलतियों के लिए क्षमा प्रदान करते हैं एवं क्षमायाचना भी करते हैं इसे क्षमापर्व भी कहते हैं । समग्र जैन समाज में यह पर्व बड़े उत्साह और आदर के साथ मनाया जाता है । संसार के हर प्राणी में आज क्षमा याचना करनी चाहिये । संवत्सरी महापर्व के अवसर पर हम सभी ने सायंकालीन प्रतिक्रमण करते हुए चैरासी लाख जीवयोनि से क्षमायाचना करते हुए जिनके साथ भी हमारा मन-मुटाव था उन सबके प्रति क्षमायाचना के भाव रखें । क्षमा देना और लेना दोनों ही महत्वपूर्ण माने जाते हैं ।  

आज प्रातः नमस्कार महामंत्र का अखण्ड पाठ सम्पूर्ण कर आचार्यश्रीजी आत्म शिव हाॅल में पधारे, उन्होंने नमस्कार महामंत्र की महिमा बताते हुए कहा कि- यह चैदह पूर्वों का सार है और सबसे बढ़कर नवकार है । इस अवसर पर तेरापंथ संघ के महासतीजी श्री जतन कुमारी जी म0 भी पधारे । उन्होंने आचार्य श्री महाप्रज्ञ जी की ओर से आचार्य सम्राट् श्री शिवमुनि जी म0 से क्षमायाचना की । इस अवसर पर आचार्यश्रीजी ने सभी को उद्बोधन देते हुए कहा कि- यह एकता और संगठन का प्रतीक है । हम सभी साथ मिलकर क्षमा, मैत्री का पर्व मना रहे हैं । प्रभु महावीर हर समय क्षमा प्रदान करते रहे हैं । गौशालक हर समय कर्म बाॅंधता रहा । यह प्रभु महावीर ने क्षमा का दान देकर एक अपूर्व इतिहास जैन धर्म में स्थापित किया । यह क्षमा का अनमोल उदाहरण है । प्रभु पाश्र्वनाथ एवं कमठ का कथानक सभी को पता ही है । प्रभु पाश्र्वनाथ भी क्षमा से उच्च से उच्च गति में जाते रहे और कमठ को नरक में जाना पड़ा ।

इस अवसर पर एस0 एस0 जैन सभा के प्रधान, चातुर्मास समिति के चैयरमेन एवं महामंत्री आदि ने भी आचार्यश्रीजी से सांवत्सरिक क्षमायाचना की तथा सकल श्रीसंघ से भी क्षमायाचना की । 

 

हर परिस्थिति हमारा प्रेरणा स्रोत बनती है: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी म0

मालेर कोटला 2 सितम्बर, 2003: आचार्य सम्राट् श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय उद्बोधन में फरमाया कि- पर्वाधिराज पर्युषण की हम सभी ने भाव भक्तिपूर्वक आराधना की । दान, शील, तप भावना का यथाशक्ति लाभ लिया ।  धर्म, प्रवचन, तप, साधना, महामंत्र नवकार का अखण्ड जाप आदि साधना हमने इन आठ दिनों में की । भावपूर्वक की गई साधना हमें मुक्ति तक पहुंॅचाती है । धर्म को अंग संग बनाओ ताकि वह हमारे रोम-रोम में व्याप्त हो जाये । भाव-चित्त को निर्मल करते हैं । धर्म हमारा स्वभाव है, ज्ञान और मुक्ति में जीना यह भी हमारा स्वभाव है परन्तु आजकल हम स्वभाव को छोड़कर विभाव में जी रहे हैं । 

जैसा जिसका भाव होगा वैसा उसका कर्म संस्कार होगा । जैसी दृष्टि होती है वैसी ही सृष्टि दिखाई देती है । आज हर कोई अपना प्रयोजन सिद्ध करने में लगा हुआ है । हम जो भी कृत्य कर रहे हैं उसे सोच समझकर करना चाहिये । अगर हमें क्रोध आता है तो विभाव में है । परन्तु यह हमारा स्वभाव नहीं है, हमारा स्वभाव तो आनंद, शान्ति एवं मैत्री में रहना है । प्रतिपल प्रतिक्षण हर वस्तु, हर स्थान हमारा प्रेरणास्रोत बन सकता है वैसी ही हमारी दृष्टि होनी चाहिये । ग्रहणता का भाव रखो । हर समय, हर वस्तु से कुछ ग्रहण करो, वह भी हमें कुछ संदेश दे रही है । उस संदेश को ग्रहण करो । अगर हमारी दृष्टि सम्यक् होगी तो हमारा कायाकल्प हो सकता है । 

प्रकृति हमें बहुत कुछ सिखाती है । सूरज, चन्द्रमा, हवा, पानी, वनस्पति आदि नहीं होते तो हमारा जीवन व्यर्थ हो जाता । सभी की सहायता से ही यह जीवन चल रहा है । हम प्रकृति में जीयें, प्रकृति हमारा साथ देती है, हम उसको देखें जाने, प्रकृति, वनस्पति हमारे ऊपर परोपकार करते हैं । 

7 सितम्बर, 2003 को आचार्य सम्राट् पूज्य श्री आत्माराम जी महाराज तथा प्रवर्तक पूज्य शुक्लचंद जी महाराज की जन्म जयंती मनाई जा रही है । यह जन्म जयन्ती जप त्याग के साथ मनाई जाएगी । 18 सितम्बर, 2003 को आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी म0 की 62 वीं जन्म जयंती मनाई जा रही है ।इस जन्म जयंती के अवसर पर 17 सितम्बर, 2003 को अखिल भारतीय स्थानकवासी जैन श्रावक संघ का सम्मेलन आयोजित मालेर कोटला में किया जा रहा है जिसमें भारत के विभिन्न क्षेत्रों से श्रद्धालु आचार्यश्रीजी के दर्शनार्थ पहुंूचेगें । इस अवसर पर सामूहिक दया, सामायिक, कष्टी तेले तथा अनेकानेक सेवा प्रकल्प कराये जायेंगें । 

 

धर्म करने के लिए आवश्यक है भक्ति करना: जैनाचार्य सम्राट् श्री शिवमुनि जी म0

मालेर कोटला 3 सितम्बर, 2003: आचार्य सम्राट् श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय उद्बोधन में फरमाया कि- महामंत्र नवकार की चर्चा चल रही थी जिसमें चैथा पद ‘नमो उवज्झायाणं’ नमन करना, झुकना सिखाता है । विनम्रता पवित्रता निर्मलता के भाव लाता है । हृदय को खाली करके नमन   करो । नमस्कार करने से नमस्कार मिलता है । प्रकृति का नियम है, जो तुम दोगे वह वापस तुम्हें   मिलेगा । महामंत्र नवकार चैदह पूर्व का सार है । महामंत्र नवकार को निरन्तरता शुद्धि संकल्प के साथ पढ़ना चाहिए । उपाध्याय को नमस्कार करने से वे हमें आचरण और ज्ञान सिखाते हैं । ज्ञान पुस्तक अथवा बाहर का नहीं । अन्तर की प्रज्ञा का ज्ञान वे हमें सिखाते हैं जिससे भीतर का स्रोत प्राप्त होता है ।    ‘उप $ अध्ययन’ स्व का अध्ययन करो । अपने समीप बैठकर अध्ययन करोगे तो अपनी शुद्धता का अनुभव होगा जिससे आत्मा की शुद्धि और चित्त का निरोध हो वह ज्ञान है । तत्वों का बोध कर लो ।

जैन धर्म में नौ तत्व बताये गये हैं जिनमें कोई परम्परा सात ही तत्व मानती है । मुख्यतः तत्व दो हैं । जीव और अजीव । कौन जीव है और कौन अजीव है यह जानना हमारे लिए परम आवश्यक है । इसे जानने से हमारा ज्ञान धर्म और भक्ति का मार्ग खुलेगा । जो चैतन्य एवं सुख दुःख का अनुभव करता है वह जीव है । जो जड़ है तथा सुख दुःख का अनुभव नहीं करता वह अजीव है । तत्व के बोध को प्राप्त करो जिससे हमारा स्व का अध्ययन होगा । भक्ति, धर्म, सत्य , ज्ञान का मंगल हमें साथ देता है । जो मंगल उत्तम है उसे आगे रखो । भक्ति, आनन्द, धर्म का भाव भीतर रखो । शरीर तथा आत्मा भिन्न भिन्न है । उसका अनुभव करो । हमारे जीवन को शुद्ध कर देता है तथा अरिहंत सिद्ध तक पहुंॅचा देता है । 

धर्म करने के लिए आवश्यक है भक्ति करना । भक्ति में सब छोड़ दो । शुद्ध भक्ति करो, भक्ति में कामना, वासना सब छोड़ दो । बिना माॅंग के भक्ति करो, तुम्हारे भाग्य में जो मिला है वह मिलने वाला   है । उन्मुक्त भाव से जीवन जीओ, जीवन को प्रभु का प्रसाद समझो । संतुलित जीवन जीओ और भीतर शिकायत का भाव न रखो । उपाध्याय जी महाराज के समीप का अध्ययन करके स्वयं की शुद्धता को प्राप्त करो ।

 

उपाध्याय ज्ञान और प्रज्ञा देता है: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी म0

मालेर कोटला 4 सितम्बर, 2003: आचार्य सम्राट् श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय उद्बोधन में फरमाया कि- मेरे सद्गुरू मुझको देना सहारा, कहीं छूट जाए न दामन तुम्हारा........ । हमें सत् का उपदेश दे जो सत् की धारणा रखें और सत् में विश्वास रखें वह सत्गुरू है । सत् अर्थात् जो सत् है, गुरू है, अविनाशी है, सबको सुखशान्ति देने वाला है वह व्यक्ति जिसके पाठ बैठने से नई योजनाएॅं मिलती है, कुछ व्यक्तियों के पास बैठने से मन शान्त होता है । आनन्दानुभूति एवं शीतलता अनुभव होती है, वह व्यक्ति सद्गुरू के योग्य होता है । उसकी आभा किरणें प्रभावित करती है । सत्संग से कुछ धटित होता  है । सद्गुरू सत्संग देता है । सत्संग हजारों व्यक्तियों के बीच अथवा अकेले में भी किया जाता है । 

नमस्कार मंत्र का निरन्तर उच्चारण करने से जीवन में कुछ परिवर्तन होता है ।  मन से पार शान्त होकर बैठ जाओ तब आपको उस मंत्र की शक्तियों का अनुभव होगा । हर मंत्र की शक्ति है, आभा-मण्डल है, भाव से उच्चारण करो भीतर रूपान्तरण हो जाएगा । उपाध्याय की चर्चा चल रही थी, शिक्षक, टीचर, अध्यापक उपाध्याय नहीं होता, उपाध्याय ज्ञानाचरण करता है एवं दूसरों को ज्ञानाचरण करवाता है । जो अध्ययन की समीप है वह उपाध्याय है । स्व का अध्ययन सर्वोपरि है । जिस शास्त्र का अध्ययन करना है पहले उसको पढ़ों, फिर शंका हो तो प्रश्न पूछो । बार बार परिवर्तन करो, फिर शान्त होकर गहराई से उस सूत्र को देखों और अनुभवमय होकर धर्मकथा करो । अनुभव से की गई धर्म-कथा हजारों हजार सत्संगियों का रूपान्तरण कर देती है । स्वाध्याय भी हमें स्व का अध्ययन करवाता है । जो अध्ययन हमें स्व की ओर ले जाये वही स्वाध्याय कहलाता है । स्वाध्याय का उद्देश्य भी यही है कि हमें स्व की ओर ले जाना । मंगल की ओर ले जाना । छोटी -छोटी घटनाएॅं भी जीवन का रूपानतरण कर देती है । 

हम चिन्तन करें, विचार करें और अपने परमात्मभाव को देखें । तुम स्वयं ज्ञाताद्रष्टा हो, शुद्ध चैतन्यमय हो, परमात्मा हो, तुम्हें कोई दुःख नहीं दे सकता । जो तुम्हें ठीक लगे वह ग्रहण करो । उपाध्याय ज्ञान और प्रज्ञा देता है । तुम्हारे भीतर ज्ञान आए, तुम शुद्ध, बुद्ध, निर्मल हो जाओ यही जीवन का परम लक्ष्य हो । 

आचार्य सम्राट् के सान्निध्य में पर्वाधिराज पर्युषण की धर्मप्रभावना

जैन धर्म में पर्व दो प्रकार के बताये गये हैं । लौकिक पर्व तथा लोकोत्तर पर्व । पर्वाधिराज पर्युषण लोकोत्तर पर्व के रूप में मनाया जाता है । इन पर्व के आठ दिनों में जैन धर्म के अनुयायी निरन्तर आठ दिन तक धर्माराधना कर संवत्सरी महापर्व के दिन अपने पूरे जीवन की जाॅंच पड़ताल कर सांवत्सरिक प्रतिक्रमण करते हुए क्षमा का दान देते और लेते हैं । 

आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज के सान्निध्य में वर्ष 2003 का पर्वाधिराज पर्युषण पंजाब की औद्योगिक नगरी मालेर कोटला में मनाया गया जिसमें अनेक भाई बहिनों ने भाग लेकर अपने जीवन को सफल बनाया ।  

प्रवचन सार:-

पर्वाधिराज पर्युषण में आचार्यश्रीजी ने अपनी अमृतमयवाणी के द्वारा लोगों को अमृतपान करवाते हुए बहुत ही सुन्दर और सटीक उदाहरणों के द्वारा कई विषयों पर चर्चा की, जिसके भीतर मंगल हमारे जीवन में किस प्रकार आए, हम किस प्रकार मंगल की कामना करें । पर्वाधिराज पर्युषण की आराधना किस प्रकार करनी चाहिए आदि भाव फरमाते हुए उन्होंने कहा कि- इस संसार में पाॅंच रत्न सार है, जिसमें सज्जन की संगति, सिमरन, दया, सेवा तथा परोपकार की भावना रखना, ये पाॅंच रतन जीवन का आमूलचूल परिवर्तन कर देते हैं । सम्यक् दर्शन जीवन में धर्म, ज्ञान, मंगलपाठ, सम्यक् आचरण तथा प्रतिक्रमण, आलोचना आदि विषयों पर अपने भाव फरमाये । आपश्रीजी ने फरमाया कि- जीवन में व्यक्ति को  अपने द्वारा हुई गलतियों को देखते हुए एक बार गुरू के समक्ष आलोचना अवश्य करनी चाहिए । आलोचना करने से मन हल्का तथा प्रसन्न होता है ।  प्रतिक्रमण हमारे जीवन का अंग संग बन जाये । मंगलपाठ को किस भाव से श्रवण करना चाहिए तथा हम अपने जीवन में मंगल, उत्तम किसकी शरण ग्रहण करें आदि विषयों पर सुन्दर एवं सटीक उदाहरण द्वारा जन जन को लाभान्वित किया । 

सूत्र वाॅंचन

पर्वाधिराज पर्युषण के पावन दिनों में अन्तकृतदशांग सूत्र एवं कल्पसूत्र का वाॅंचन किया गया । अन्तकृतदशांग सूत्र प्रेरणादायी सूत्र है जिसके अन्दर ऐसे 90 साधकों का वर्णन है जिन्होंने अपने जीवन को बाल्यावस्था, तरूणावस्था, गृहस्थावस्था एवं संयम में रहकर पार किया । इस सूत्र का वाॅंचन सुबह 8.00 से 9.00 बजे तक आत्म शिव दरबार में श्रमण संघीय मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म0 ने अनुभवमय विवेचन द्वारा  किया । कल्पसूत्र का वाॅंचन दोपहर 3.00 से  4.30 बजे तक किया गया । कल्पसूत्र के वाॅंचन में पूज्य आचार्यश्रीजी स्वयं विराजमान थे । कल्पसूत्र में भगवान महावीर तथा चैबीस तीर्थंकरों के जीवन दर्शन को दर्शाया गया है । स्थविरावली का भी सुन्दर वर्णन इस सूत्र के अन्दर है । भगवान महावीर से लेकर पूज्य आचार्यों तक की स्थविरावली का वाॅंचन भी किया गया । साधु की कल्प-मर्यादा, समाचारी का भी वर्णन किया गया है जो प्रत्येक साधु को ग्रहण करने योग्य है ।      

कैसेट विमोचन

आचार्यश्रीजी के जीवन पर अनुभवमय भजनों को लिखकर पंक्तिबद्ध किया है पंजाब की सुविख्यात गायिका रजनी जैन ने । इनके द्वारा गायी हुई केसेट ‘शिव दरबार’ का विमोचन श्रीसंघ के प्रमुख पदाधिकारियों ने किया । आचार्यश्रीजी की अमृतमयी वाणी हर रोज प्रवाहित हो रही है । इसमें ‘भक्ति योग’ नामक प्रवचन कैसेट का भी विमोचन किया गया । इस कैसेट को तैयार करने में श्री महेश जैन का अच्छा योगदान रहा । इस कैसेट के भीतर भक्ति के सम्बन्ध में आचार्यश्रीजी की अनुभवमयवाणी है । 

सहमति पत्र

महाराष्ट्र प्रवर्तक आनन्द कुल कमल दिवाकर पूज्य श्री कुन्दन ऋषि जी महाराज जो कि श्रमण संघ के विवाद में तटस्थ थे उन्होंने भी पिछले दिनों आचार्यश्रीजी की सेवा में एक पत्र भेजा जिसके भाव थे कि- पूज्य गुरूदेव आचार्य सम्राट् श्री आनन्द ऋषि जी म0 के अथक प्रयासों से पूना सम्मेलन में जो व्यवस्था बनी थी उसी व्यवस्था के अनुरूप चलना मेरा परम कर्तव्य बनता है और मेरा पूर्ण समर्थन चतुर्थ पट्टधर के रूप में आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज को है क्योंकि पूज्य गुरूदेवश्री ने दीर्घ दृष्टि से इन्हें पद भार सौंपा था । समर्थन की इसी कड़ी में पंजाब की शासन मुक्ता मणि उप प्रवर्तिनी महासती श्री कैलाशवती जी म0 का भी पत्र प्राप्त हुआ, जिसमें उन्होने भी यही भाव व्यक्ति किये कि हम आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज की आज्ञा में हैं और उनकी आज्ञा ही हमे ंशिरोधार्य रहेगी । इन पत्रों से प्रेरणा प्राप्त कर और भी तटस्थ साधु साध्वी आचार्यश्रीजी के समर्थन में उचित निर्णय लेने का ध्यान रख रहे हैं । 

तपस्या 

आचार्यश्रीजी के मालेर कोटला चातुमासार्थ बिराजने से यहाॅं पर तपस्याओं का क्रम चल रहा है । पर्वाधिराज पर्युषण में अनेक भाई बहिनों ने अपने इस पुद्गलमयी शरीर को तपाकर कुन्दन बनाया । जिसके भीतर महासाध्वी तप रत्नेश्वरी श्री सुनीता जी म0 के आज 57 उपवास हो गये हैं तथा उनके आगे बढ़ने के भी भाव हैं ।  महासाध्वी श्री ओमप्रभा जी म0 ने भी आचार्यश्रीजी के आशीर्वाद से इस बार अठाई तप  किया । तपस्विनी महासती श्री अचला जी म0 के भी आज 15 उपवास हो गये हैं, उनके भी आगे बढ़ने के भाव हैं । महासती श्री सुमित्रा जी म0, महासती श्री संतोष जी म0  भी सर्वतोभद्र तप कर रहे हैं । महासती श्री ऊषा जी म0 के 15 आयम्बिल हो गये हैं वे भी आयम्बिल तपस्या में संलग्न हैं ।

श्रावकवृंद एवं श्राविकाएॅं भी तपस्या में संलग्न हैं । पर्वाधिराज पर्युषण में आचार्यश्रीजी की प्रेरणा से यहाॅं पर अनेक भाई बहिनों ने 128 के आसपास अठाई तप की आराधना की । 3 भाई बहिनांे ने ग्यारह तथा 9 उपवास की आराधना की । 25 भाई बहिनों ने उपवास का अठाई तप किया । 25 भाई बहिनो ंने आयम्बिल का अठाई तप किया । 67 भाई बहिनों ने एकासनों का अठाई तप किया । कुछ भाई बहिन अब भी अठाई तप में संलग्न है तथा तप करके अपने जीवन को उज्ज्वल बना रहे हैं ।   

आत्म शुक्ल जन्म जयंती महोत्सव

प्रथमाचार्य पूज्य श्री आत्माराम जी महाराज तथा पंजाब प्रवर्तक पूज्य श्री शुक्लचंद जी महाराज की जन्म जयंती आत्म शिव दरबार में 7 सितम्बर, 2003 को मनाई गई जिसमें पूज्य आचार्यश्रीजी एवं सहयोगी मुनिवृंद एवं साध्वीवृंद ने अपनी भावनाएॅं व्यक्त करते हुए अनुभवमयवाणी फरमाई । इस अवसर पर सेवा प्रकल्प तथा तपस्याओं का आयोजन भी किया गया । 

शिवाचार्य जन्मोत्सव

आगामी कार्यक्रम के अन्तर्गत आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज का 62 वाॅं जन्म-दिवस तप त्याग के साथ मनाया जा रहा है जिसमें ग्यारह दिवसीय कार्यक्रम रखा गया है । सामूहिक नीवीं, एकासना, दया, आयम्बिल, सामायिक, कष्टी तेले, रक्तदान शिविर, न साधना शिविर एवं सहारा जनसेवा की ओर से द्विदिवसीय फ्री हाॅर्ट चेकअप केैम्प भी लगाया जा रहा है । 17 सितम्बर, 2003 को आचार्यश्रीजी के सान्निध्य में अखिल भारतवर्षीय स्थानकवासी जैन श्रावक संघों का सम्मेलन होने जा रहा है । इस अवसर पर भक्ति संध्या का भी कार्यक्रम रखा गया है । 18 सितम्बर, 2003 को आचार्यश्रीजी का गुणानुवाद किया जाएगा, जिसमें भाई बहिन तथा श्रावक संघ पहुंॅचकर अपनी उपस्थिति दर्शायें । 

 {  अनिल कुमार }

 

ज्ञान एक परम योग है: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेर कोटला 5 सितम्बर, 2003: आचार्य सम्राट् श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय उद्बोधन में फरमाया कि- ज्ञान एक परम योग है । नमस्कार मंत्र का चैथा पद उपाध्याय को नमस्कार है, जिनके सान्निध्य में जाने से सम्यक् बोध का जन्म होता है । आपके भीतर क्रान्ति घटती है । उपाध्याय को नमस्कार करने से हम खाली हो जाते हैं । नमस्कार करना भारतीय संस्कृति है । भारत की गुरूकुल परम्परा में एक चैतन्य का सम्बन्ध है । गुरूकुल में गुरू जिम्मेदारी से शिष्य के जीवन का विकास करता  है । गुरू उसे संस्कार देता है । आजकल अध्यापक और विद्यार्थी का सम्बन्ध लेन देन का सम्बन्ध हो गया है । विद्यार्थी अध्यापक को गुरू नहीं मानता है और अध्यापक विद्यार्थी को शिष्य-रूप में नहीं मानता । ज्ञान एक परम योग है, जो उपाध्याय के पास ग्रहण किया जा सकता है जिससे तत्व का बोध हो तथा शरीर आत्मा का सम्बन्ध कुछ देर के लिए आयुष्य कर्म से है ऐसा बोध होता हो तो हम उस ज्ञान को प्राप्त कर सकते हैं । 

हमारा चित्त चंचल है । मन बन्दर की भाॅंति कम्पायमान है । मन को साधना बड़ा कठिन है । उसे समाधि में लाने के लिए साधना करो । जिससे चित्त का निरोध हो वह ज्ञान है । ज्ञान से साधना अपनाओ, चित्त को निर्मल करो । ज्ञान एक मार्ग है वह हमें राह दिखाता है । दर्शन से देखकर, ज्ञान से जानकर आचरण करो, ज्ञान से ही आत्मा की शुद्धि होती है । आजकल के भौतिक युग में ज्ञान भार रूप हो गया  है ।  विद्यार्थी ज्ञान को केवल परीक्षा की दृष्टि से ग्रहण कर रहा है । ज्ञान को उपयोग की दृष्टि से ग्रहण करो । 

आज के इस युग में ज्ञानी होने का सार यही है कि हम किसी को पीड़ा न दे । घाव पर नमक न छिड़ककर मरहम लगायें । तत्व का बोध, चित्त का निरोध तथा आत्मा की शुद्धि ज्ञान से होती है । पढ़ने की हद समझ है । विवेक और ज्ञान तथा आचरण से सुमिरन करो । परमात्मा को याद करो । परमात्मा की याद आएगी तो योग ध्यान में रूचि आएगी । हम ज्ञानी हैं तो ज्ञान को जीवन में उतारें । ज्ञान को समझें । ध्यान से विवेक रखें, योग ध्यान को अपनाकर ज्ञान को परिपूर्ण कर लें । 

हम उपाध्याय के पास अध्ययन करते हुए तत्वों का बोध करें । चित्त की शुद्धि करें, जिससे हमारे ज्ञान का मार्ग खुल जाएगा और मुक्ति तक पहुंॅचना आसान हो जाएगा ।  

 

ज्ञान से राग दूर होता है: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेर कोटला 6 सितम्बर, 2003: आचार्य सम्राट् श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय उद्बोधन में फरमाया कि- अरिहंत को नमन करते हुए भगवान महावीर ने धर्म का सारसूत्र देते हुए कहा कि- आत्मज्ञानी बनो । ज्ञान दो प्रकार का है । भीतर का और बाहर का । बाहर का ज्ञान डिग्री प्राप्त करने का पुस्तकीय ज्ञान है । पूरा संसार चलाने के लिए सुख साधन दे सकता है । भीतर का ज्ञान आपको तृप्ति, शान्ति और समृद्धि देता है । जीवन में सबसे अधिक मूल्य सौभाग्य, शान्ति और समृद्धि का   है । धन और यश प्राप्त करते हुए आनंद नहीं आ सकता ।  आनंद को प्राप्त करने के लिए भीतर का ज्ञान अति आवश्यक है । छोटा बच्चा आनंदित होता है उसके चेहरे की निर्दोषता, चाल, चलन, बोलना, हॅंसना, रोना उसका स्वभाव आदि सब प्राकृतिक है । बच्चे की शान्ति, प्रेम, निर्दोषता बड़े होने पर समाप्त हो जाती है । बच्चा तुतलाता हुआ बोलता है तो माॅं को आनन्द आता है । डिग्री प्राप्त करने के बाद वही बच्चा माॅं के जीवन पर कविता रचकर सुनाएं तो भी उसे वो आनंद नहीं मिलता । वह बड़ा होने पर व्याकरण की भाषा जानने लगता है । बच्चे की तरह सरल और सहज होना मानव जीवन के लिए आवश्यक है । जब हम बच्चे की भाॅंति बन जाएंगें तब भीतर का ज्ञान प्रस्फुटित हो जाएगा । भीतर का ज्ञान भगवत्ता प्राप्ति के लिए होता है । अभ्यास की निरन्तरता, योग की स्थिरता से चित्त शान्त हो जाएगा । 

जिनशासन में ज्ञान की तीन कसौटियाॅं पायी गयी हैं । भगवान महावीर अपनी वाणी में फरमाते हैं कि वह ज्ञान जिससे राग दूर होता चला जाये, वह ज्ञान जिससे श्रेय प्राप्त होता हो तथा वह ज्ञान जो हमारे भीतर मैत्री बढ़ाये वही वास्तव रूप में ज्ञान है । राग करने से द्वेष, क्रोध, ईष्र्या आएगी इसलिए राग को जड़ से निकाल दो । राग से व्यक्ति अधोगति में जाता है । प्रभु महावीर फरमाते हैं कि अपने गुरू के प्रति भी राग नहीं रखना । वीतरागी बनो । गौतम को महावीर से राग था तो वे ज्ञान को प्राप्त नहीं कर पाये । महावीर वीतरागी थे, राग को तोड़ने के लिए प्रशंसा होने पर फूलना नहीं । कोई भी कार्य करो परन्तु भीतर रागभाव मत लाओ । दान देते समय राग से नहीं अपितु अनुग्रह के भाव से चित्त की अनुकम्पा से दान  दो । राग को तोड़ो ।

जिससे श्रेय की प्राप्ति हो वह भी ज्ञान है । जिस कर्म को करने से दूसरे का मंगल हो सबका मंगल हो वह श्रेय मार्ग है । हम जन्मों जन्मों से इस संसार में भटक रहे हैं जिसका कारण राग द्वेष और मोह है । जिससे मैत्री बढ़े वह ज्ञान है । नदी और फूल सबके लिए है । नदी और फूल सबको पानी और सुगन्ध देते हैं । उसी प्रकार मैत्री सबके लिए बहाओ, आत्म-ज्ञानी बनो ।

 

विलक्षण प्रतिभा के धनी: आचार्य सम्राट् श्री आत्माराम जी महाराज

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेर कोटला 7 सितम्बर, 2003: आचार्य सम्राट् श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय उद्बोधन में फरमाया कि- जो श्रद्धालु अरिहंत देव को श्रद्धा से नमन करता है और अरिहंत देव के गुणगान करता है वह भीतर से भर जाता है । सब कुछ उसे मिल जाता है । धर्म का जागरण होता है । सुख समृद्धि सौभाग्य जागता है । आपके जीवन में माॅंग है तो धर्म नहीं है । आनन्द प्रसन्नता का भाव रखो । आज श्रमण संघ के महाप्राण आचार्य सम्राट् श्री आत्माराम जी महाराज एवं पूज्य प्रवर्तक श्री शुक्लचंद जी म0 की जयंती मना रहे हैं । श्री आत्माराम जी म0 सचमुच में आत्माराम थे । उनकी आत्मा में राम और राम में आत्मा बसा हुआ था । आपका नाम सार्थक था । आपकी साधना, योग, ध्यान, प्रेम, करूणा जानकर साधक स्तब्ध हो जाता है । उनका चित्र देखने से मन शान्त होता है । धर्म जीवन में मंगल देता है । आचार्यश्रीजी भी हमेशा मंगल कामना किया करते थे । आप अनेक कष्ट आने पर भी हमेशा ध्यान मंे लीन रहते थे । 

आप विनोदी स्वभाव के विलक्षण महापुरूष थे । अद्भुत प्रवचनकार, साहित्य सर्जक और टीकाकार थे । आपके जीवन में मौन, ध्यान, साधना झलकती थी । आप हमेशा स्वाध्याय, ध्यान में लीन रहते थे । प्रवर्तक श्री शुक्लचंद जी म0 भी शुक्ल थे । 

इस संसार में दो रस है । इक्षु-रस और लवण-रस । इक्षु-रस मीठा देने वाले हैं । लवण-रस भी जीवन में आवश्यक है । जरा सा नमक भोजन का स्वाद बदल देता है । प्राणी मात्र के लिए मंगल की कामना करो । अहिंसा सभी शास्त्रों का सार है । मंत्र छोटा होते हुए भी कार्य बड़ा करता है, इसी प्रकार अहिंसा भी शब्द छोटा है परन्तु इसका सार बड़ा है । अहिंसा में शान्ति और ऊर्जा समाई हुई है । प्राणी शक्ति का केन्द्र है । अहिंसा शक्ति से हम निर्माण भी कर सकते है और विनाश भी, यह हमारे ऊपर निर्भर करता है । भगवान महावीर का धर्म अहिंसा सत्य का है । अहिंसा प्राणी मात्र के प्रति होनी चाहिए । 

मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म0 ने प्रेरणा देते हुए कहा कि 15 मिनिट ध्यान और 15 मिनिट स्वाध्याय अवश्य करना चाहिए । आज की धर्म सभा में आचार्य सम्राट् श्री आत्माराम जी द्वारा रचित आगम ‘श्री दशवैकालिक सूत्र’ का लोकार्पण लुधियाना निवासी सुशीला बहिन एवं श्री मुन्नीलाल जी लोहटिया द्वारा किया गया । इस अवसर पर मेरठ विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डाॅ0 रवीन्द्र कुमार जी भी  श्री अमितराय जैन, बड़ौत के साथ विशेष रूप से उपस्थित हुए । 

इस अवसर पर मलौट, होशियारपुर, अम्बाला, समाना, लुधियाना, संगरूर, फरीदकोट, धूरी, नाभा, पटियाला आदि क्षेत्रों से भाई बहिन आचार्यश्रीजी के दर्शनार्थ उपस्थित हुए । 

आत्म शुक्ल जयंती के उपलक्ष में एस0 एस0 जैन सभा, मालेर कोटला द्वारा लंगर लगाया गया । सामूहिक आयम्बिलों का भी आयोजन हुआ । 

 

उच्चकोटि के साधक: आचार्य श्री जयमली जी महाराज 

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेर कोटला 8 सितम्बर, 2003: आचार्य सम्राट् श्री शिवमुनि जी महाराज ने आचार्यश्री जयमल जी म0 की 296 वीं जयंती के अवसर पर अपने मंगलमय उद्बोधन में फरमाया कि- आचार्य श्री जयमल जी महाराज एक उच्चकोटि के महान् साधक थे । उन्होंने जिनशासन की महत्ती प्रभावना की । उनकी तपःसाधना, ज्ञान साधना, आगम साधना बहुत ही गहन और आत्मानुशासन से ओतप्रोत थी, उन्होंने जन-जन के मंगल के लिए महत्त कार्य किए । उन्होंने अपने जीवन को अप्रमत्ता के साथ जीया । जन-जन को स्वाध्याय की ओर मोड़ने में महान् महामुनियों को स्मरण करने के लिए ‘बड़ी साधु वंदना’ की रचना कर जिनशासन के प्रत्येक साधक के हृदय में आपने वास प्राप्त किया है, ऐसे महामुनिश्वर की जन्म-जयंती पर हम श्रमण संघ की ओर से हार्दिक वंदनांजलि प्रकट करते हैं । उनकी कृपा श्रमण संघ पर बनी रहे । साधु साध्वीवृंद आत्मार्थी, स्वाध्यायी बने । 

उतरा सागर में कि उसको मोती मिला ।

खोज जिसने भी कि में उसी को मिला ।।

तुम्हारी खोज, प्रार्थना, तुम्हारा होना, तुम्हारी अभिप्षा, चाह, जीवन जीने का ढंग जैसा होगा वैसा परमात्मा मिलेगा । परमात्मा तुम्हारे भीतर चित्त की चेतना में खून के कतरे-कतरे में है । सारी कामना, वासना को दूर रखो, भीतर की प्यास से परमात्मा को देखो । मोती चाहते हो तो समुद्र की गहराई में डुबकी लगानी पड़ेगी । 

ध्यान भी एक मोती है । भीतर की छलांग, भीतर का स्नान, भीतर की पुकार, धर्म का होना अपने आपको देखना है । ध्यान कैसे किया जाता है ? यह तो कोई अनुभवी ही कर सकता है । ध्यान कभी बताया नहीं जाता । अगर कोई बताने का साहस करेगा तो वह अभिनय ही कर पाएगा । प्रेम कुछ ओर है, अभिनव कुछ ओर है । जब हमारे भीतर ध्यान की लौ लगेगी तब भीतर का क्रोध मान, माया, राग, द्वेष, लोभ आदि चला जाएगा । एक ही पल की लौ से हजारों दीपक जल जाते हैं, उसी प्रकार जब कोई व्यक्ति ध्यान करेगा तब वह बहुतों को प्रेरणा दे सकता है । 

आनन्द हमारा स्वभाव है । शान्ति हमारा मित्र है । ज्ञान हमारा सत्य है, उसे भीतर खोजो । जब भीतर खोजोगे तो पहले बुरे संस्कार निकलेगें, फिर भीतर से अच्छा लगेगा । जो आनंद क्लब, होटल, हिल स्टेशन में नहीं मिलता वह भीतर में मिल जाता है । संसार में रहते हुए ध्यान की ओर जाओ, जीवन सार्थक बन जाएगा । दान, पुण्य की भावना रखो । अरिहंत को तुमने चाहा नहीं तो, वे तुम्हें कैसे मिल सकते हैं, परमात्मा बिना बुलाये नहीं आता । तुम दो कदम चलो तो परमात्मा दस कदम चलेगा, पहल तुमको करनी पड़ेगी ।

 

श्रद्धा से किया गया कार्य सफल होता है: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेर कोटला 9 सितम्बर, 2003: आचार्य सम्राट् श्री शिवमुनि जी महाराज ने उद्बोधन में फरमाया कि- ज्ञान से व्यक्ति जानता है । दर्शन से उसके भीतर श्रद्धा उत्पन्न होती है । चारित्र से आत्म-निग्रह होता है और तप से आत्मा परिशुद्ध होती है । ज्ञान वह है जो हमारे राग को कम करे, भीतर मैत्री स्थापित करें और तत्व का बोध हो । ज्ञान के बाद दर्शन की चर्चा आती है । दर्शन धर्म का आधार है । मोक्ष-मार्ग का सार तुल्य है दर्शन । दर्शन सम्यक दर्शन सत्य का दर्शन है जो हमारे भीतर श्रद्धा उत्पन्न करता है । दर्शन का अर्थ देखना है, मान्यता परम्परा को अलग रखकर शुद्ध एवं सत्य की दृष्टि से देखना ही दर्शन  है । दर्शन शुद्ध स्फटिक-मणि की भाॅंति है । दर्शन गंगाजल की तरह है जो हमें पावन कर देता है । दर्शन है तो श्रद्धा है । श्रद्धा परम् दुर्लभ है । भक्ति, ध्यान, दान, सत्संग करो । परमात्म-तत्व के प्रति श्रद्धा निष्ठा रखो । श्रद्धा से किया हुआ कार्य सफल होता है । डाॅक्टर की दवाई भी श्रद्धा से लेने पर ही काम करती है । श्रद्धा से जीवन जैसा चाहे वैसा बना सकते   हैं । हर व्यक्ति, हर परिस्थिति को अपने ढंग से देखता है । दृष्टि प्रतिपल बदलती रहती है । आज और कल में बहुत अन्तर है । आज जैसे हम हैं वैसे कल नहीं थे और ना ही कल वैसे होंगे । व्यक्ति के भीतर के विचार प्रतिपल प्रतिक्षण परिवर्तित होते जा रहे हैं । विचारों के ऊपर वह अपना जीवन व्यापन कर रहा   है । इसीलिए भगवान कहते हैं कि- निरीक्षण करो, अपने आपको प्रतिपल प्रतिक्षण देखो । संसार में कमल की भाॅंति जीओ, हॅंसते रहो, आनन्द बिखेरते रहो । तुम जैसा चाहो वैसा अपना जीवन बना सकते हो । 

याचक को खाली हाथ न लौटाओ, उसे कुछ न कुछ जरूर दो । उसे जो कुछ तुम दोगे, वह तुम्हें और मिलेगा । दृष्टि से हम सज्जन भी बन सकते हैं और दुर्जन भी बन सकते हैं । हम किस दृष्टि से अपने जीवन का मूल्याॅंकन करते हैं यह हमारे ऊपर निर्भर करता है । दृष्टिकोंण बदलों जीवन बदल   जाएगा । 

दृष्टिकांेण बदलने हेतु आचार्यश्री के शुभ सान्निध्य में साधना शिविर का आयोजन नित्य प्रतिदिन गतिमान है । जैन सभा मोती बाजार में आत्म ध्यान साधना शिविर प्रातः 6,00 से 8.00 बजे तक हो रहा   है । अपना दृष्टिकोंण बदलने हेतु आप इसमें भाग लेवें । स्वयं साधना करें और ओरों को करावें ।

 

परमात्मा से बड़ा कोई नहीं है: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेर कोटला 10 सितम्बर, 2003: आचार्य सम्राट् श्री शिवमुनि जी महाराज ने उद्बोधन में फरमाया कि- ज्ञान से जाना जाता है, दर्शन से श्रद्धा उत्पन्न होती है । चारित्र से आत्म निग्रह एवं मनो-निग्रह होता है । तप से चित्त शुद्ध होता है, अहंकार, क्रोध वासना समाप्त होती है । जिस प्रकार सोना अग्नि में जलकर कुन्दन बनता है वैसे ही यह शरीर तप-रूपी अग्नि में जलकर निखरता है । हर व्यक्ति का अपना दर्शन है । प्रभु महावीर ने कहा- अपने आपको देखो । जब अपने आपको देखोगे तो परमात्मा या मोक्ष हमारे से दूर  नहीं । परमात्मा इसी क्षण हमारे भीतर है, उसे देखो ओर जानो । श्रद्धा परम् दुर्लभ है । परम श्रद्धेय जिसे मान लिया वह हमेशा के लिए हमारा परम् श्रद्धेय बन गया । जिसे देखा नहीं, सुना नहीं या जिस व्यक्ति या वस्तु को देखा नहीं उसके प्रति निष्ठा रखना श्रद्धा है । श्रद्धा से पूर्व हमारे भीतर संदेह उत्पन्न  हो जाता है । संदेह निवारण परमावश्यक है । 

रात नहीं तो दिन का मूल्य ही क्या  है । ठण्डा नहीं तो गर्म का मूल्य क्या ? शरीर की स्वस्थता का महत्व तब ही पता चलता है जब हमारा शरीर अस्वस्थ हो । हर व्यक्ति, वस्तु, परिस्थिति का विरोधी होने पर हमें हमारे जीवन का पता चलता है । विरोधी हमें ऊॅंचा उठाते हैं । विरोध के बिना जीवन सूना है । हर महापुरूष के विरोधी हुए हैं, भी वे पुरूष महापुरूष कहलाये । आजकल का युग चमत्कार को नमस्कार करता है । हमारे जीवन का सबसे बड़ा चमत्कार अपने जीवन को पहचानने का ही है । परमात्मा से बड़ा कोई नहीं है । परमधन, परम् पद, परम यश से कोई ऊॅंचा नहीं है । परमात्म-रूपी परम् धन से धन की याचना न करो, यह तो अपने आप मिलता है । भक्ति करो, बिना माॅंग के झुको । भीतर की समृद्धि प्राप्त करो । ज्ञान से जानो और दर्शन से श्रद्धा करो, यही हमारे जीवन का परम लक्ष्य है । 

 

श्रद्धा को समर्पण में बदलोगे तो परमात्मा मिलेगा

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेर कोटला 11 सितम्बर, 2003: आचार्य सम्राट् श्री शिवमुनि जी महाराज ने उद्बोधन में फरमाया कि- प्रभु जी दया करो एक छोटी सी प्रार्थना, इष्टदेव, तीर्थंकर, महावीर, सिद्ध के चरणों में प्रार्थना है, मेरे पास कुछ भी नहीं है, हे प्रभु ! मुझ पर दया करो । तंत्र मंत्र पूजा में कुछ भी नहीं जानता हूॅं । आप हृदय में विराजो । प्रभु जब शरीर में रोमांच होता है तब प्रभु पधारते हैं । गुरू के सिवाय, प्रभु के सिवाय कुछ भी नहीं है । वे ही मेरे सब कुछ   है ।

श्रद्धा है वहाॅं संदेह है । संदेह के साथ संशय, आशंकाएॅं उत्पन्न हो जाती है । संशय करने वाले का हमेशा विनाश होता है । माया मित्रता का नाश करती है । जहाॅं गुरू शिष्य और प्रभु भक्त का नाता है वहाॅं कपट नहीं होना चाहिए । वहाॅं तो प्रेम, मैत्री की अविरल धारा बहनी चाहिये । गुरू का आशीष हमें पा ले जाता है । भक्ति आधीन होकर करो । प्रार्थना, ध्यान सामायिक की जरूरत नहीं है । सच्चे मन से भक्ति करो । एक को जीत लेने पर सभी अपने आप जीत सकते हैं । संदेह वह है जहाॅं डांवाडोल चित्त है । जहाॅं काॅंपती हुई चित्तदशा है, किसी के ऊपर भरोसा नहीं है । एक हाथ से लिखना है और दूसरे हाथ से मिटाना है । यह करूॅं या वह करूॅं ऐसी भावना भीतर उत्पन्न होने पर संदेह का जन्म होता  है । संदेह आने पर हम डूब जाते हैं । संदेह से हम कुछ नहीं कर सकते । 

श्रद्धा को समर्पण में बदलोगे तो परमात्मा मिलेगा । श्रद्धा वह है जहाॅं अटूट प्रीति है । स्वभाव में रमण है । जो जैसा है उसे वैसा मानना है । श्रद्धा से जीवन बदलता है । श्रद्धा से जीवन में शुभ आता है अशुभ नहीं । श्रद्धा से चित्त भरा हो तो भीतर अच्छाई ही नजर आती है । श्रद्धा वह है जिसे कभी देखा नहीं, जाना नहीं फिर भी उस पर विश्वास रखना, भरोसा रखना । तुम्हारे भीतर परमात्मा की प्यास है तो परमात्मा मिलेगा । जब भोजन पानी मिल सकता है तो परमात्म भी जरूर मिलेगा । शिवाचार्यजी के जन्म दिवस पर 17 सितम्बर, 2003 को राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिनिधि सम्मेलन मालेर कोटला में सम्पन्न होने जा रहा है ।

 

शरण का भाव रखो: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेर कोटला 12 सितम्बर, 2003: आचार्य सम्राट् श्री शिवमुनि जी महाराज ने उद्बोधन में फरमाया कि- शरण में आए हैं, हम तुम्हारी, दया करो दयालु भगवन् .....। प्रभु का मार्ग, गुरू का द्वार भीतर होने का ढंग, प्रभु की शरण में जाना, उनके प्रति समर्पण करने से एक नई क्रान्ति उद्घाटित होती है । शरण का भाव शरणागत रखो । सब सहारे छोड़   दो । धन, पद, यश, प्रतिष्ठा, सौन्दर्य को त्यागकर ही तुम शरणभाव में जा सकते हो । पद, यश, प्रतिष्ठा तुम्हारे भीतर अहंकार भर देता है, जिस कारण तुम शरण भाव में नहीं जाते । जब तुम सब त्याग दोगे तो भीतर वैराग्य की भावना उमड़ेगी, तब तुम शरण-भाव में जा सकते हो । पता नहीं शरणभाव प्राप्त होने पर परमात्मा किस समय मिल जाये । परमात्मा मिलने का भी एक क्षण आता है । जब भीतर घटना घटित होती है, समय पकता है और बोध को मानव प्राप्त हो जाता है, तब परमातमा मिल जाता है । क्षयोपशम होने पर ही घटना घटती है । हमेशा शरणभाव रखो । शरणागति को स्वीकार करो । कबीरजी भी अपने वाक्यों में कहते हैं, जग लड़ता है तो तू उसे लड़ने दे । तू केवल राम का सुमिरन कर । राम शब्द यहाॅं तो आध्यात्मिक दृष्टि से लिया गया है । रा अर्थात् अंधकार को हरने वाला, म मतलब ममकार को गलाने वाला । जो हमारे अंधकार को हरने वाला है तथा ममकार को गलाने वाला है वही राम है । जब अंधकार हट जाएगा, ममकार गल जाएगा तब परमात्म प्राप्ति हो जाएगी । ध्यान की साधना भी इसी पद्धति से जुड़ी हुई है । ध्यान करने से चित्त शुद्ध हो जाता है । भीतर का अंधकार क्रोध, ईष्र्या निकल जाती है । 

सुमिरन के कि साथ-साथ सत्संग का भी अपूर्व महत्व है । कबीरजी ने कहा कि कुछ क्षण का सत्संग भी हमारे कोटि अपराध टाल देता है । सुमिरन करो । पढ़ना लिखना नहीं आता है, अपनढ़ हो फिर भी सुमिरन करो । भक्ति करो । मेहनत का धन कमाओ  क्योंकि मेहनत ही पूजा है । सुमिरन करते समय कोई और मंत्र फेरने की आवश्यकता नहीं । जो आपका मूल मंत्र है उसी का सुमिरन करो, वो ही पार लगा सकता है । श्रद्धा से भक्ति करो क्योंकि श्रद्धा से की गई भक्ति हमें पार लगा सकती है ।

शिवाचार्य जन्मोत्सव के कार्यक्रम प्रारंभ हो चुके हैं । आज सामूहिक नीवी का आयोजन करवाया गया जिसमें अनेकों भाई बहिनों ने भाग लेकर नीवी का महत्व समझा ।   

 

समर्पण से जीवन जीओ: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेर कोटला 13 सितम्बर, 2003: आचार्य सम्राट् श्री शिवमुनि जी महाराज ने उद्बोधन में फरमाया कि- जीवन जीने के दो ढंग हैं । इस जीवन को दो ढंगों से जीया जा सकता है । संघर्ष और समर्पण । संघर्षमय जीवन जीते हुए हम अपनी मर्जी लगाते हैं । प्रतिस्पर्धा करते हैं । संघर्ष करते हुए जीते हैं । समर्पण का मार्ग परमात्मा का मार्ग है । जो परमात्मा, नियति, स्थिति में घट रहा है मैं उसके साथ हूॅं, धर्म के साथ हूॅं । समग्र का अस्तित्व ही मेरा अस्तित्व है । जीवन में संघर्ष आता है तो तनाव, दुःख, पीड़ा, बेचैनी, व्याधियाॅं आती है । जीवन में समर्पण आता है, तो प्रेम, मैत्री, आनंद, सुख, शान्ति आती है । दुःख, क्लेश, पीड़ा से संघर्ष करते हुए यह जीवन बीता जा रहा है । 

आपके जीवन में दुःख निराशा है तो आपका मार्ग संघर्ष का है । जैसा मार्ग चुनोगे वैसा फल मिलेगा । प्रकृति का नियम है जैसा चाहोगे वैसा होगा । सत्गुरू तुम्हें पसन्द आ गया तो परामर्श की जरूरत नहीं है । डूब जाओ, भक्ति करो । विश्वास, निष्ठा, श्रद्धा से स्मरण करो । खाली होकर बैठ  जाओ । सत्संग केवल सुनना मात्र नहीें है । भीतर पूछो, जीवन कैसे रूपान्तरण होगा । साधना करके मन को शान्त करो । संघर्ष अहंकार लाता है । श्रद्धा समर्पण लाती है । प्रकृति सब कार्य समान करती है । जीवन में सहजता और सरलता को अपनाओ । आत्मा के ऊपर जो संस्कार लगे हुए हैं उसे हटाओ । 

निर्भार हो जाओ । ज्ञानी वही है जो किसी को दुःख नहीं देते । ज्ञानी निर्भार होते हैं । हमारे जीवन में ज्ञानी के लक्षण आये । हम आनंद, सुख, शान्ति, मैत्री में जीयें । आचार्यश्रीजी के जन्मोत्सव के कार्यक्रम प्रारंभ हो चुके हैं । कल प्रातः से आत्म समाधि शिविर प्रारंभ होने जा रहा है । जिसके भीतर मंत्र द्वारा समाधि कैसे प्राप्त हो, यह कला सिखाई जाएगी एवं आचार्यश्रीजी स्वयं अपने मुखारबिन्द से मंत्र दंेगें जिसे प्राप्त कर हम परम लक्ष्य तक पहुंॅच सकते हैं । 

 

परमात्मा तुम्हारे भीतर है: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी म0

मालेर कोटला 14 सितम्बर, 2003: आचार्य सम्राट् श्री शिवमुनि जी महाराज ने उद्बोधन में फरमाया कि- परमात्मा, सत्गुरू, शान्ति, आनन्द, प्रेम कहीं दूर नहीं । तुम्हारे ही पास है । परमात्मा मन्दिर, मस्जिद  में हो भी सकता है और नहीं भी, परन्तु वह तुम्हारे अन्तर्मानस में नित्य-प्रति विराजमान है । उसके नित्य प्रति तुम दर्शन कर सकते हो । परमात्मा तुम्हें इसी क्षण मिल सकता है आवश्यकता है केवल देखने की ।  संघर्ष तनाव से परमात्मा नहीं मिल सकता, परमात्म प्राप्ति के लिए शान्ती भीतर लाना आवश्यक है । क्रोध जड़ पर नहीं चेतन पर आता है । हम हमेशा किसी व्यक्ति वस्तु अथवा परिस्थिति के वश होकर क्रोध करते हैं । क्षमा के भाव से भीतर शान्ति, प्रेम, तृप्ति आती है । 

जब तक व्यक्ति का हृदय प्रेमपूर्ण नहीं है तब तक साधना नही ंहो सकती । साधना में लीन हो जाओ । व्यक्ति खींचा चला आएगा । आदमी बन जाओ, परमात्मा अपने आप मिलेगा । सेवा करो, भक्ति करो इस जीवन को सफल बनाओ । सारे झगड़े परमात्मा को स दो । आप केवल शरण-भाव से जीओ । परमात्मा की बात करो । सीमंधर स्वामी अरिहंत का नाम स्मरण करो । आज के युग की जितनी भी बीमारियाॅं हैं वे इस तन से नहीं केवल मन से ही हैं ।  शरीर की बीमारी नहीं मन की ही बीमारी है । आज के वैज्ञानिक यह बात सिद्ध करते हैं कि ध्यान से अनेकों बीमारियाॅं नष्ट हो जाती हैं । 

भीतर प्रेम को लुटाओ । जितना बांटोगे उतना तुम्हें मिलता जाएगा । फूल की भाॅंति, नदी की भाॅंति सुगन्ध तथा पानी बंाटो । सूरज जिस प्रकार सबको प्रकाश देता है उस प्रकार सबको प्रकाश दो । श्रद्धा को मूल्य देने से शान्ति आती है । संघर्ष से जीवन में अशान्ति आती है । चुनाव हमारा है, हम श्रद्धा चाहते हैं या संघर्ष । आपको जो चाहिये वह स्वीकार करो । मार्ग तो यही है ।

मद्रास, होशियारपुर, लुधियाना, सरदूलगढ़, शिर्डी, नासिक, पंचकूला, चण्डीगढ़, फरीदाबाद आदि श्रीसंघों ने आचार्यश्रीजी के दर्शनार्थ उपस्थित हुए एवं चण्डीगढ़ तथा फरीदाबाद श्रीसंघ ने आचार्यश्रीजी के आगामी वर्षावास 2004 के लिए विनती की । 

 

प्रेम शुद्ध होना चाहिए: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेर कोटला 15 सितम्बर, 2003: आचार्य सम्राट् श्री शिवमुनि जी महाराज ने उद्बोधन में फरमाया कि- जीवन में मधुरतम क्षण आये । हमारा जीवन मंगलमय बने । हमारे व्यक्तित्व का सम्पूर्ण विकास हो । हम प्रेमपूर्ण ढंग से जीयें ऐसी कला, भाव, प्रतीति होना, ऐसी चेतना का हमारे भीतर प्रस्थापित होना है । हमारी चेतना हमारे भीतर लौटकर आये । हम प्रेमपूर्ण सम्बन्धों में जीयें । सम्बन्ध भीतर के हैं, बाहर के नहीं । जहाॅं सम्बन्ध है वहाॅं प्रेम नहीं है । प्रेम शुद्ध होना चाहिए । प्रेम का सम्बन्ध रिश्तेनातों से नहीं मन की स्थिति, चित्त की भावदशा से है । चित्त की भावदशा जीवन का सहज विकास है । जब किसी से प्रेम करते हो तो भीतर प्रतीति होती है । 

हमारा धर्म सहज और निर्मल है । प्रकृति से हमें सबकुछ प्राप्त होता है, वह हमें प्यार भी करती   है । हमारी वैसी दृष्टि चाहिये । प्रेम के वातावरण में सुगन्ध बिखेरो । सबके प्रति प्रेम, आदर, मंगलमैत्री का भाव रखो तो हमारा जीवन उज्ज्वल बन सकता है । जितना बाॅंटते हो उसका चार गुना हमें मिलता है । एक बीज बोने पर दस बीज प्राप्त होते हैं और दस से सौ और सौ से हजार बीज उत्पन्न हो जाते हैं । आजकल सब नकली माल नजर आता है, कहीं पर सत्य नजर नहीं आता और असली भी नहीं नजर  आता । अपने भीतर ऋजुता और कोमलता को लाओ । हरेक कार्य किस समय होना है यह शुरू से ही निश्चित है । उस समय वैसी घटना घटती है और वह कार्य हो जाता है । 

तुम सूरज बनकर जीओ । हंसो मुस्कराओ । जब व्यक्ति के भीतर प्रेम होता है तो सारे काम आसान हो जाते हैं । प्रेम कुएं की भाॅंति है, कुएं से जितना पानी निकालो और निकलता ही जाता है । प्रेम जितना करो उतना गहरा होता चला जाता है । जीवन के हर पहलू को सोचो, समझो और अपने जीवन को उन्नत बनाओ । 

आचार्यश्रीजी के सान्निध्य में आत्म समाधि शिविर मंत्र द्वारा ध्यान में कैसे समाधि प्राप्त हो यह शिविर आज से शुरू हुआ जिसमें करीब 50 भाई बहिनों ने भाग लेकर आचार्यश्रीजी से साक्षात्कार कर उनके मुखारबिन्द से मंत्र लिया । यह शिविर दो दिन तक चलेगा । 

 

क्षणिक सुख सुखाभास है: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी म0

मालेर कोटला 16 सितम्बर, 2003: आचार्य सम्राट् श्री शिवमुनि जी महाराज ने उद्बोधन में फरमाया कि- इस जीवन में जो भी महत्वपूर्ण है, पाने योग्य है, श्रेयस्कर है, इस लोक में मंगल व शान्ति देता है उसको शब्दों में नहीं कहा जा सकता । उसकी व्याख्या नहीं होती । वह केवल अनुभव किया जाता है । उसका स्वाद लिया जा सकता है । तुम्हें प्यास लगी है । एक व्यक्ति तुम्हें पानी के घड़े का चित्र दिखाये और तुम्हें पानी के ऊपर समझाये । मटकी दिखाये परन्तु पानी न पिलाये तो तुम्हारी प्यास नहीं मिट सकती । 

मोक्ष, धर्म, कैवल्य क्या है ? उपनिषद के रचयिता कहते हैं कि यह भी नहीं, यह भी नहीं उसे तर्क से नहीं जाना जा सकता । निर्वाण परमसुख है, पर हमें सुख का बोध नहीं होता । जब तुम सुख से परिपूर्ण हो जाते हो तब मोक्ष सुख मिलता है । क्षणिक सुख सुख नहीं, सुखाभास है, जो तुमने चाहा वह मिल गया तो तुम सुखी हो जाते हो परन्तु हमारी चाहना, इच्छा कभी पूरी नहीं होती । स्वीकार करो । आनंद से भर जाओ । अपनी खोपड़ी के अनुसार न चलो । जो भी बात है वह सुनो, देखो, जानो और स्वीकार करो । मन बड़ा चंचल है, वह भटकता रहता है । मन गलत रास्ते पर जाता है । पानी की भाॅंति वह भी नीचे की ओर जाता है । मन तो पंगू है ।

जिन्दगी में हमने क्या पाया । चन्द यादें, चन्द आॅंसू, चंद आहें यही कुछ पाया है । उम्रे दराज माॅंगकर लाये थे चार दि, दो आरजू में बीत गये दो इंतजार में बीत गये । किसी की चाहना आज तक पूर्ण नहीं हुई है । हमें जो चाहिये था वह भगवान ने हमें दे दिया फिर भी हम किसी चाह में लगे रहते हैं । गलत रास्ता, गलत मंजिल बताएगा । सही रास्ता सही मंजिल पर ले जाएगा इसीलिए हम सही रास्ते को स्वीकार करें । मौन रहेंगे तो झगड़े कम हो जाएंगें । प्रकृति के अनुसार चलें । वह हमें स्वस्थ रखती है क्योंकि प्रकृति ही हमारा सबकुछ है । 

धर्म में राजनीति नहीं, राजनीति में धर्म को अंगीकार करें

 

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेर कोटला 18 सितम्बर, 2003: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने जन्म दिवस के अवसर पर अपनी पावनवाणी मुखरित करते हुए कहा कि- हमारा धर्म संघ मालेर कोटला का यह पावन प्रवचन प्रांगण आत्म दरबार में आए भारत के विभिन्न अॅंचलों से विशिष्ट व्यक्तियों ने जन्म-दिवस के पावन अवसर पर मुझे बधाईयाॅं दी । आप सभी इतनी देर तक शान्ति और समता से बैठे रहे । राणियाॅं हमारा जन्म हुआ । मलोट हमारा शिक्षण हुआ । आज भी वह धरती की याद करते ही सारी स्मृतियाॅं स्मरण पटल पर उभर आती है ।

जिनशासन का मूल विनय है । धर्म का मूल सहजता और सरलता है । हम सभी सहज और सरल बने । महावीर का यह संदेश है । महावीर ने दान सरलता को महत्व  दिया । अपने हृदय को हम सरल बनायें । अन्र्तमन में चित्त की शुद्धि करें । धर्म में राजनीति नहीं, राजनीति में धर्म को अंगीकार करें । प्रभु महावीर 24 तीर्थंकरों की परम्परा, उनका शासन हमें यही सिखाता है । आप सबका प्यार और निष्ठा बनी हुई है । पूना सम्मेलन में आप सभी के सहयोग से आचार्य सम्राट् पूज्य श्री आनंद ऋषि जी म0 ने सभी के सहयोग से इस पद पर बिठाया । आज में उन सबके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करता हूॅं । धार्मिक होने का लक्षण यही है कि हम कृतज्ञता ज्ञापित करें । प्रस्ताव तभी पारित होगें जब हम उसे अपने शहरों में कार्यान्वित करेंगे । निन्दा, प्रशंसा एक ही सिक्के के दो पहलू है । प्रभु महावीर के शासन में दोनों ही बाते बनी रही । हम अनुशासित होकर ओर निष्ठाबद्ध होकर कार्य करें । आपका समर्पण और निष्ठा से ही सब कार्य होगा । 

अरिहंत की वाणी, सिद्ध का स्मरण, साधु का संघ जीवन के लिए परमावश्यक है । श्रमण संघ के साथ ऋषि परम्परा और दिवाकर परम्परा पूर्ण-रूपेण साथ दे रही है । यह सब कुछ धर्मसंघ शासन का ही है । हर संघर्ष हमें कुछ सिखाता है । हम समर्पण को भीतर लायें । 

आचार्यश्रीजी ने जन्म दिन के पावन अवसर पर श्रावक सम्मेलन के सार रूप में कुछ प्रस्ताव पारित किये एवं आचार्यश्रीजी ने आज विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान की शुरूआत की जिसमें हर व्यक्ति ग्यारह सूत्रों को लेकर आगे बढ़ें । मालेर कोटला शहर को भी में हार्दिक साधुवाद देता हूॅं । यहाॅं पर पधारे सभी महानुभावों को भी हार्दिक साधुवाद देता हूॅं । गुण दृष्टि ग्रहण करें ।    

इस अवसर पर आचार्य सम्राट् श्री आत्माराम जी महाराज द्वारा व्याख्यायित और आचार्य सम्राट् श्री शिवमुनि जी महाराज द्वारा संपादित श्री आचारांग सूत्रम् प्रथम श्रुतस्कंध का लोकार्पण किया गया । आगम विमोचन के सौजन्य रतनलाल जी जैन- प्रधान, संघरत्न श्री श्रीराम जी जैन, श्री चमनलाल जी जैन- संरक्षक, श्री अनिल भूषण जैन, श्री रामूर्ति जैन, श्री रतन जैन- कमल सिनेमा वाले, श्री बचनलाल जैन, एस0 एस0 जैन तपा बिरादरी, मालेर कोटला आदि ने सहयोग दिया । चातुर्मास समिति के चेयरमैन श्री प्रेमचंद जी जैन द्वारा सिलाई मशीनें निर्धन और जरूरतमन्दों को बांटी  गई । गुरूभक्तों द्वारा भोजन की सुन्दर व्यवस्था की गई । विभिन्न महानुभावों ने विभिन्न वस्तुएं वितरित कर धर्म प्रभावना द्वारा आचार्यश्री को उनके जन्मदिवस पर उन्हें बधाई दी ।  इस समारोह के अध्यक्ष श्री आनंद प्रकाश जी जैन, दिल्ली एवं मुख्य अतिथि श्री नेमनाथ जी जैन, इंदौर थे । 

 

प्रभु महावीर की वाणी का अनुसरण करो: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेर कोटला 19 सितम्बर, 2003: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय उद्बोधन में फरमाते हुए कहा कि- अरिहंत की वाणी, सिद्ध का स्मरण, साधु का संग तीन बातें जीवन में प्रमुख है । वीतरागता की दृष्टि, आध्यात्मिकता की र्दृिष्ट हमें इनसे प्राप्त होती है । धन, पद, यश, सम्बन्ध सब यहीं तक रहेंगे । श्वांस है तो सब कुछ है । सबसे नजदीक हमारा शरीर है और इस शरीर से ही हमने सारे संबंध बनाये हैं । जो जो सम्बन्ध हमने बनाये वे स्थापित हो गये । सम्बन्धों में नामकरण भी हो गया । नाम के प्रति हमारा मेाह भी बढ़ गया । यह जो नामकरण किया गया, यह केवल काम चलाने के लिए है । घर में तीन बेटे हैं तो हरेक को किस प्रकार पुकारा जाये । हरेक की क्या निशानी हो इस उद्देश्य से माॅं बाप ने नामकरण किया था, परन्तु आज उस नाम से ही हम बंध गये हैं । दुनियाॅं निन्दा प्रशंसा करती रहती है, ये सारे बीच के पड़ाव हैं । छोटा सा जीवन हमें मिला है और इस पूरे जीवन में हमें 100 लोग जानते होंगे, 3-4 लोग नजदीक होंगे और वे ही हमें गहराई से जानते हांेगे । झगड़े हमारे घर में बढ़ गये । सुखाभास को हम सुख मानने लग गये यह हमारी गलती है । सुख की मान्यता ही गलत है । 

प्रभ्ुा महावीर की वाणी का अनुसरण करो । हृदय की पोटली पर गाॅंठ बाॅंध लो । इस संसार में हर व्यक्ति दुःखी पीड़ित और शिकायत से भरे हुए हैं । सोचो, जीवन का ढंग बदलो । जब-जब संकट आये प्रभु महावीर को याद कर लेना । संकट अपने कर्मों से आया है । आपका घर प्रयोगशाला है । सत्संग, भजन करो, जीवन में इसका बड़ा उपयोग है । किसी को दोष मत देना । जो भी हमने कार्य किया है । जो प्रशंसा और निन्दा हमें मिली है वह अपने ईष्ट के चरणों में समर्पित कर दो। दुःख सुख जीवन के पहलू हैं । यश, अपयश, लाभ, हानि ये जीवन की पूर्णता नहीं है । सुख दुःख को स्वीकार कर लो, शरीर की शुद्धि करो । योगा, प्राणायाम करो सब ठीक हो जाएगा । मौन, शान्ती, ध्यान का आधार ले लो । जीवन में साधना नहीं है तो हमारा जीवन व्यर्थ है । साधना को स्वीकारो, जीवन बदल जाएगा । हम शरणभाव में  रहे ।

 

लोगस्स का रहस्य: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेर कोटला 20 सितम्बर, 2003: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय उद्बोधन में फरमाते हुए कहा कि- एक मन्दिर में प्रार्थना चल रही थी । कुछ भिक्षु वहाॅं आए । मन्दिर पर पताका हिल रही थी । वहाॅं बैठे भिक्षुओं में विवाद हो गया । इसको कौन हिला रहा है । एक ने कहा- हवा हिला रही है ।दूसरे ने कहा- स्वयं हिल रहा है । मैं आपसे पूछता हूॅं यह पताका हवा हिला रही है या अपने आपसे हिल रही है । एक व्यक्ति शान्त समाधि में बैठा था, उसने समाधान देते हुए कहा कि आप क्यों झगड़ रहे हैं । यह पताका न हवा हिला रही है, न स्वयं हिल रहा   है । तुम्हारा मन हिला है इसलिए पताका हिल रहा है । तुम शान्त समाधि में होते तो सबकुछ शान्त हो जाता । क्रोधी व्यक्ति अशान्ति का वातावरण निर्मित कर देता है । समाधिस्थ व्यक्ति शान्ति का वातावरण निर्मित करता है । एक कंकर दरिया या नदी में फैक दो तो वह कितना कम्पायमान हो जाता है । एक सागर में कितनी लहरें उठती हैं फिर भी वह सागर शान्त हो जाता है । 

लोगस्स का पाठ भी हमारे जीवन में शान्ति और समाधि प्रदान करता है । लोगस्स के पाठ का एक शब्द का अर्थ बहुत गहरा है । भाव में डूबो । आत्म-ज्ञान, केवलज्ञान-रूपी प्रकाश से सम्पूर्ण लोक को प्रकाशित करने वाले 24 तीर्थंकर सबकुछ देख रहे हैं । चैबीस तीर्थंकर की स्तुति करो । भीतर उनको स्थापित कर लो, इनकी स्तुति करते ही कर्म-संस्कार दूर हो जाते हैं । चित्त निर्मल होता है । जन्म, जरा, मरण समाप्त होते हैं और चैबीस तीर्थंकर होते हैं । मैं उनको वन्दन कर उनकी महिमा का गुणगान करता हूॅं ।

झुक जाओ । स्थापित हो जाओ । सिर को चरणों में रख दो । चैबीस तीर्थंकर चन्द्र से भी निर्मल हंै, सूर्य से भी अधिक प्रकाशमान हैं । सागर से भी अधिक गम्भीर । ऐसे सिद्ध भगवान मुझको सिद्ध गति का मार्ग दिखा दें । मन को शान्त करो । मन शान्त हो जाएगा तब शान्ति हो जाती है । धर्माराधना     करो । प्रकृति सर्वकार्य सुलभ कर देगी । 

आत्म शिव दरबार में देवता पधारे

 

श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज की 62 वीं जन्म जयन्ती के अवसर पर अनेकानेक रचनात्मक कार्यक्रम सम्पन्न हुए, जिसमें सांस्कृतिक भक्ति संख्या का भी कार्यक्रम हुआ । 

17 सितम्बर, 2003 रात्रि 8.00 बजे से भक्ति संध्या का कार्यक्रम आरंभ हुआ । जैन विनय देवबन्दी गु्रप, गाजियाबाद भक्ति संध्या कार्यक्रम प्रस्तुत कर रहे थे । रात्रि करीब 10.00 बजे ज्ञान मुनि नगर, लाल बाजार स्थित, आत्म शिव दरबार के प्रांगण में विराजमान चारों आचार्यों की चैकी, जिस पर आज तक द्वितीय पट्टधर से लेकर चतुर्थ पट्टधर के आचार्य विराजमान हुए हैं । ऐसी परम पावनी चैकी को स्मृति स्वरूप आत्म शिव दरबार के प्रांगण में रखा गया है, जहाॅं पर पूज्य आचार्य सम्राट् श्री आत्माराम जी म0 की फोटो लगी हुई है, वहाॅं पर ऊपर के कंगूरों से केशर, चंदन युक्त पीला अमृत जल बरस रहा था । उसे देखकर संघ के व्यक्ति आश्चर्य चकित हो गये । जैन सभा के वरिष्ठ कार्यकर्ताओं ने आचार्यश्री को जैन सभा में सूचना देने हेतु आये । वह वास्तव में पीला पानी नहीं अपितु अमृतमयी चन्दन-जल था । यह वर्षा रात्रि के दस बजे से लेकर 18 सितम्बर, 2003 तक दोपहर 11.00 बजे तक होती रही । प्रातः होने पर आचार्यश्रीजी चमत्कार देखने हेतु वहाॅं पहुंॅचे और आपश्रीजी ने अपने प्रवचन में भीतर के उद्गारों को उद्घाटित करते हुए फरमाया कि पूज्य दादा जी आचार्य सम्राट् पूज्य श्री आत्माराम जी म0 की हमारे पर विशेष कृपा है वह आज हमें प्रत्यक्ष रूप से दिखाई दे रहा है । इस बरसात से पूरा पाण्डाल चन्दन की सुगन्ध से व्याप्त हो रहा था । हजारों व्यक्तियों ने इस चमत्कार को देखा ।  

रतनलाल जैन, अध्यक्ष प्रेमचंद जैन, चेयरमेन

श्री एस0 एस0 जैन सभा    आचार्य सम्राट् श्री शिवमुनि जी म0 चातुर्मास समिति, 2003

मालेर कोटला {पंजाब} मालेर कोटला {पंजाब}

शिवाचार्य जन्मोत्सव तप त्याग के साथ मनाया गया

श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी म0 के 62 वें जन्म दिवस के उपलक्ष्य में पंजाब के सुप्रसिद्ध शहर मालेर कोटला में विविध कार्यक्रम हुए । 

दिनाॅंक 9 सितम्बर, 2003 से ‘आत्म ध्यान: प्राणायाम शिविर हुआ । जिसके भीतर 45 भाई बहिनों ने भाग लेकर अपने जीवन को शिवत्व की ओर लगाया । प्राणायाम व ध्यान के द्वारा मन को कैसे शान्त किया जाये यह अनुभव किया । 

दिनाॅंक 12 सितम्बर, 2003 को आचार्यश्रीजी के जन्म दिवस के उपलक्ष्य में सामूहिक नीवी तप का आयोजन कराया गया । करीब 150 नीवी इस उपलक्ष में  हुई नीवी तप में भाई बहिनों ने सुन्दर सहयोग दिया। 

दिनाॅंक 13 सितम्बर, 2003 को सामूहिक एकासन दिवस मनाया गया जिसमें 200 एकासने हुए । भाई बहिनों ने इसमें सुन्दर सहयोग दिया । इसका आयोजन श्री सुदर्शन जैन, महामंत्री -एस0 एस0 जैन सभा, मालेर कोटला ने किया । 

दिनाॅंक 14 सितम्बर, 2003 को सामूहिक दया दिवस मनाया गया । 91 भाई बहिनों ने दया व्रत अंगीकार करके एक दिन का साधुवेश धारण कर साधुत्व स्वीकार किया एवं सप्त व्यसन का त्याग किया । 

15 सितम्बर, 2003 को सामूहिक आयम्बिल करवाये गये । रसना को किस प्रकार जीतना है यह हमें आयम्बिल सिखाता है । इस उपलक्ष्य में 150 आयम्बिल हुए । 

16 सितम्बर, 2003 को सामायिक दिवस मनाया गया । इस अवसर पर सैकड़ों सामायिक हुई । सामायिक के भीतर माला, जप, ध्यान एवं आचार्यश्रीजी की अमृतवाणी का पान किया गया । आज के इस शुभ अवसर पर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री आत्माराम जी म0 एवं आचार्य सम्राट् पूज्य श्री  श्री शिवमुनि जी म0 के महान् चारित्र के ऊपर प्रश्न मंच का भव्य आयोजन हुआ जिसमें 52 भाई बहिनों ने भाग लेकर ज्ञानार्जन किया । इस प्रश्न मंच का सफल आयोजन श्रमण संघीय मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म0 की प्रेरणा से एवं मधुर गायक श्री शुभम् मुनि जी म0, श्री सुव्रत मुनि जी म0  एवं अन्य लघु मुनिराजों के सहयोग से हुआ ।  

17 सितम्बर, 2003 को अखिल भारतीय श्वेताम्बर स्था0 जैन श्रावक संघ का सम्मेलन हुआ जो कि श्रमण संघीय निष्ठा एवं अनुशासन दिवस तथा विश्व मानव मंगल मैत्री दिवस के रूप में मनाया गया । आज के दिवस पर पूज्य आचार्यश्रीजी ने ग्यारह सूत्रीय कार्यक्रम भारत के विभिन्न अॅंचलों से आए श्रावकों के सामने रखा जिसे सभी श्रावक वर्ग ने ग्रहण कर उसकी अनुपालन करने एवं करवाने की जिम्मेदारी   ली । आचार्यदेव के जन्म दिवस के उपलक्ष्य में 17-18-19 सितम्बर, 2003 को महामंत्र नवकार का अखण्ड जाप का आयोजन हुआ । यह जाप करने वाले भाई बहिनों को प्रभावना भी दी गई । इस अवसर पर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री आत्माराम जी म0 द्वारा लिखित कृति जैनागमों में अष्टांग योग का विमोचन लाला नेमनाथ जी जैन द्वारा किया गया ।

17 सितम्बर, 2003 को शाम को भक्ति संध्या का आयोजन श्री एस0 एस0 जैन सभा, मालेर कोटला की तरफ से किया गया जिसमें अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त गीतकार श्री विनयदेवबन्दी जैन, श्री विषु देवबन्दी, गाजियाबाद एवं पंजाब की सुप्रसिद्ध गायिका रजनी जैन ने जैन धर्म एवं पूज्य आचार्य सम्राट् के जीवन पर प्रकाश डालने वाले भक्तिगीत एवं प्रभु महावीर के जीवन्त प्रसंगों का वर्णन किया ।

18 सितम्बर, 2003 को आचार्यदेव का जन्म दिन गुणगान सभा के रूप में मनाया गया । जिसमें आचार्यदेव ने फरमाया कि हमारा यह धर्म तीर्थ, धर्म संघ, प्रभु महावीर का शासन हमे ंप्रगति की ओर ले जाये । जिनशासन महान् है । पूर्वाचार्यों की महान गौरवशाली परम्परा ने इस श्रमण संघ की वृद्धि में हमेशा अपना अमूल्य सहयोग दिया है । प्रभु महावीर ने सरलता और सहजता को महत्व दिया है । आज के इस जन्मोत्सव के कार्यक्रम में आप सभी ने सहयोग दिया । मैं आप सभी के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करता हूॅं । धार्मिक होने का लक्षण यही है कि हम कृतज्ञता ज्ञापित करें । अनुशासित और निष्ठा में बद्ध रहो । समर्पण के साथ कार्य करो । ऋषि परम्परा, दिवाकर परम्परा, पंजाब परम्परा एवं महान् गौरवशाली संतों का इस श्रमण संघ में हमेशा सहयोग रहा है और आज के दिवस पर मैं शासनदेव से यही प्रार्थना करूॅंगा कि हम सभी साथ मिलकर कार्य करे जिससे जन-जन लाभान्वित हो । 

आचार्यश्रीजी ने 17 सितम्बर, 2003 को विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान का ग्यारह सूत्रीय कार्यक्रम प्रस्तुत किया । इस उपलक्ष्य में समाज के गणमान्य व्यक्तियों के द्वारा आपको विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता के रूप में उद्बोधित किया गया । 

आचार्यश्रीजी के जन्म-दिवस के उपलक्ष्य में आचार्य सम्राट् पूज्य श्री आत्माराम जी म0 द्वारा व्याख्यायित आगम का अष्टम पुष्प ‘श्री आचारांग सूत्र प्रथम श्रुतस्कंध’ का विमोचन हुआ । आचार्यश्रीजी के अमृतमयीवाणी की कैसेट्स का भी विमोचन इस अवसर पर रामलीला कमेटी के प्रधान श्री महेश कुमार जैन ने किया । इस अवसर पर आचार्यश्रीजी के प्रवचनों की तीन कैसेट्स का विमोचन हुआ । 

आज के दिवस पर आचार्यदेव के आगामी वर्षावास हेतु भारत के विभिन्न अॅंचलों से विनतियाॅं की गई जिसमें प्रमुख रूप से उदयपुर, फरीदाबाद, चण्डीगढ़ आदि क्षेत्रों की रही एवं क्षेत्र फरसने हेतु भारत भर से आये हुए सभी श्रीसंघों ने अपने अपने क्षेत्र की तरफ से विनतियाॅं आचार्यश्रीजी के चरणों में रखी । इस समारोह के सुअवसर पर तप रत्नेश्वरी महासती डाॅ0 सुनीता जी म0 ने 69 एवं महासती श्री अचला जी म0 ने 27 व्रतों के प्रत्याख्यान किये । महासतीवृंद के भाव अभी आगे बढ़ने के हैं । आज के इस पावन अवसर पर चातुर्मास समिति के चेयरमैन श्री प्रेमचंद जी जैन द्वारा गरीबों की सहायता हेतु सिलाई मशीनें, कम्बल एवं अन्य उपयोगी वस्तुओं का वितरण किया गया । शिवाचार्य जन्मोत्सव की गुणगान सभा के विशिष्ट अतिथि श्री नेमनाथ जी जैन, इन्दौर एवं अध्यक्ष श्री आनंद प्रकाश जी जैन, दिल्ली एवं ध्वजारोहण मालेर कोटला निवासी श्री सुखनन्दन जैन, अशोक जैन, मालेर कोटला  ने किया । इस समारोह का सफल बनाने में एस0 एस0 जैन सभा के प्रधान श्री रतनलाल जी जैन, श्री सुदर्शन कुमार जैन, श्री प्रमोद कुमार जैन, श्री राकेश कुमार जैन, श्री सुरेश कुमार जैन आदि का अनन्य सहयोग रहा । आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी म0 के जन्मोत्सव के पावन अवसर पर ‘जिनेन्दु’ साप्ताहिक पत्र का विमोचन समाज के गणमान्य व्यक्तियों ने किया । यह साप्ताहिक पत्र आचार्यश्रीजी के जन्मोत्सव का विशेषांक था । आचार्यश्री ने कहा कि ‘जिनेन्दु’ धर्म प्रचार, जन-जागरण एवं संगठन के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है । इसके मुख्य संपादक श्री जिनेन्द्र कुमार जी जैन को में हार्दिक साधुवाद देता हूॅं । इसी प्रकार यह देश में धार्मिक क्रान्ति में अति महत्वपूर्ण कार्य करता रहे यही मंगल मनीषा ।  विदुषी महासती श्री ओमप्रभा जी म0, विदुषी महासती श्री संतोष जी म0, नव तेरापंथ की साध्वी महासती श्री महिमाश्री जी, महासती श्री श्वेता जी म0 आदि ने अपने भक्तिपूर्णभाव पद्य एवं गद्य में रखें । श्री शमित मुनि जी म0, श्री सुव्रत मुनि जी म0, श्री शुभम् मुनि जी म0 ने भी अपनी भावनाएॅं रखी । कार्यक्रम का सुन्दर संचालन मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म0 ने किया । देश भर से आए अनेक गणमान्य सदस्यों एवं भक्तों ने अपनी श्रद्धा-भक्ति के भाव गद्य एवं पद्य में अर्पित किये ।

7-18 सितम्बर, 2003 के कार्यक्रम की गौतम प्रसादी एवं लंगर कार्यक्रम गुरूभक्तों द्वारा किया गया जिसका सफल संयोजन श्री राकेश जैन एवं साथियों द्वारा किया गया । प्रत्येक रविवार अन्नदान के लिए सभी के लिए लंगर गुरूभक्तों द्वारा लगाया जा रहा है । 17- 18 सितम्बर, 2003 को देश भर के दर्शनार्थी-बन्धु एवं प्रतिनिधि उपस्थित थे । महाराष्ट्र, राजस्थान, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु, आन्ध्रप्रदेश, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश आदि से करीब 2000 से अधिक सदस्य आचार्यश्रीजी के जन्म-दिवस एवं कार्यक्रमों में उपस्थित थे ।

19 सितम्बर, 2003 को आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज के जन्म दिवस के उपलक्ष्य में कष्टी तेलों का आयोजन किया गया जिसमें 70 भाई बहिनों ने भाग लिया । प्रथम दिन उपवास दूसरे दिन एक समय मीठा खाना एवं तीसरे दिन पुनः उपवास । इस प्रकार कष्टी तेले कराये गये । आचार्यश्रीजी के जन्म दिवस के उपलक्ष्य में 19 सितम्बर, 2003 से 22 सितम्बर, 2003 तक त्रिदिवसीय आत्म ध्यान साधना शिविर का सफल आयोजन हुआ जिसमें 59 साधक साधिकाओं ने भाग लिया । 

20-21 सितम्बर, 2003 को आचार्यदेव की प्रेरणा से सहारा जन सेवा संस्थान, मालेर कोटला द्वारा फ्री हार्ट चेकअप कैम्प का आयोजन किया गया जिसमें सैंकड़ों भाई बहिनों ने अपने हृदय का फ्री में चेकअप करवाकर फ्री में दवाईयाॅं हासिल की एवं शान्ति का अनुभव किया । 21 सितम्बर, 2003 को महावीर युवक मण्डल द्वारा रक्तदान शिविर का आयोजन हुआ । 

इस प्रकार आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी म0 की जन्म-जयन्ती तप, त्याग के साथ मनाई गई एवं इस अवसर पर गरीबों को भी सहायता प्रदान की गई । 

श्रमण संघीय निष्ठा एवं अनुशासन दिवस पर प्रबुद्ध श्रावकों के विचार

एवं आचार्यश्रीजी का मंगलमय उद्बोधन

श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज के सान्न्ध्यि में अखिल भारतवर्षीय श्वेताम्बर स्थानकवासी जैन श्रावक संघ एवं महासंघों के प्रतिनिधियों का सम्मेलन एवं श्रमण संघीय निष्ठा एवं अनुशासन दिवस दिनाॅंक 17- 18 सितम्बर, 2003 को उत्साहपूर्वक मनाया गया जिसमें भारत के विभिन्न अॅंचलों से आए श्रावक संघों एवं महासंघों ने भाग लेकर आचार्यश्रीजी से मार्गदर्शन प्राप्त किया एवं आचार्यश्रीजी के समक्ष अपने विचार रखे । 

सम्मेलन में पहुंॅचे श्री नेमनाथ जी जैन, इन्दौर ने अपने विचार अभिव्यक्त करते हुए कहा कि- श्रमण संघ एक विशाल संघ है और हमारे पूज्य आचार्य सम्राट् जानते हैं कि इस समय के श्रावक श्राविका एवं युवा वर्ग को क्या आवश्यक है । किस दिशा में उनको लेकर जाना है और किस प्रकार उन्हें मार्गदर्शन करना है । 

प्रो0 रतन जैन, दिल्ली ने कहा कि आचार्य भगवन् ने समाज को दिशा देने हेतु सुन्दर प्रयास किये हैं और आपका अभियान भी अच्छा है । संघ को सुदृढ़ कैसे करें । एकरूपता से कार्य करें । आचार्य पद में निष्ठा रखते हुए श्रमण संघ में अनुशासन हो एवं इस दिवस पर मुझे विशेष तीन बातें याद आ रही है, संगठन का प्रश्न, संगठन को कैसे मजबूत करें कुरीति को कैसे दूर करें एवं साधु साध्वियों की व्यवस्था किस प्रकार हो और संघ का उसमें क्या योगदान हो ।

युवापीढ़ी धार्मिक कार्यों में  भाग नहीं ले रही है । वह किन कारणों से हमसे नहीं जुड़ रही है और उनके लिए उचित माहौल व प्रकल्प कैसा होना चाहिए इस विषय पर चर्चा अनिवार्य है । 

हमारी समाचारी, साधु, साध्वी, स्थानक ये हमारे पूज्य हैं । इनसे ही समाज निर्धारित होती है । श्रावकों की भी समाचार बननी चाहिए । साधु समाज अपनी समाचारी का पालन करे एवं श्रावक समाज अपनी समाचारी का पालन करते हुए समाज की पूर्ण शक्ति का उपयोग करें एवं धार्मिक गतिविधियों से  जुड़े । 

श्री राधेश्याम जी जैन, प्रधान- एस0 एस0 जैन हरियाणा महासभा ने कहा कि-  आचार्य भगवन् के सान्निध्य में वर्ष भर में दो सम्मेलन भारत के स्तर पर होने चाहिए एवं जिस प्रान्त में आचार्यश्रीजी हों उस प्रान्त के कार्यकर्ताओं के दो सम्मेलन वर्ष भर में होने चाहिए । आचार्यश्रीजी का मैत्री का संदेश साफ और सुथरा है । आपमें सहनशीलता है । आप समाज के हित में जो भी स्टेप्स ले रहे हैं हम आपके साथ हैं । हम आचार्य पद में निष्ठा एवं आस्था रखते हैं । आप जो आदेश देंगें हम उसकी अनुपालना करेंगें एवं करवायेंगें । 

डाॅ0 कैलाश जैन, प्रधान- एस0एस0 जैन महासंघ मंगलदेश ने कहा कि- सम्मेलन के शुभ अवसर पर आचार्यश्रीजी एवं विभिन्न अॅंचलो ंसे आए श्रावक वर्गों को हार्दिक बधाई देता हूॅं । समाज संगठन को  मजबूत करें । मजबूती हमें ही लानी है । आज के बुजुर्ग अपनी अवस्था से समाज को देख रहे हैं परन्तु आज का समाज आधुनिक समाज बन चुका है । समाज को बनाये रखें । जो भी निष्ठा की बात हो वह आचार्यश्रीजी से ही हो । हम आगे बढ़ते जायें । श्रावकों का सम्मेलन बहुत जरूरी है इससे हमारे विचार खुलते हैं । हरेक श्रावक की बात कही व सुनी जाती है । समाज का संगठन तभी होगा जब हम एकजुट होकर सेवा कार्य करें । इस सम्मेलन में डाॅ0 कैलाश जी जैन ने वृद्ध साधु साध्वी, वैरागी वैरागनों की पढ़ाई

औषध व्यवस्था की जिम्मेदारी लेते हुए अर्थ व्यवस्था की माॅंग की । 

श्री अरूण जैन, प्रधान- एस0एस0 जैन सभा, होशियारपुर ने आचार्यश्रीजी के चरणों में निष्ठा एवं आस्था के साथ समर्पण करते हुए कहा कि- संगठन में अथोरिटी देनी होगी । अनुशासन से ही संगठन मजबूत होगा । जब हमारी प्रान्तीय,केन्द्रीय इकाईयाॅं मजबूत होंगी तभी संगठन बनेगा । केन्द्रीय बोर्ड बनाने के लिए सिसटमस कार्य करने एवं कार्य प्रणाली बनाने के सुन्दर सुझाव आपने दिये । श्री एस0 एस0 जैन सभा के सामाजिक कार्यों के बारे में भी आपने सुन्दर सुझाव रखे ।  

श्री गजराजसिंह जी झामड़, महामंत्री- इन्दौर श्रीसंघ ने कहा कि- श्रमण संघ एवं भारतवर्ष में प्रभु महावीर की वाणी का प्रचार प्रसार किस प्रकार हो । सम्मेलन के सुअवसर पर मालेर कोटला आते हुए अनेक मुनिराजेंा से चर्चा करने का अवसर प्राप्त हुआ । हम संतों के सकारात्मक बिन्दुओं पर सोचकर सकारात्मक भूमिका निभायें । संतों की अच्छाईयाॅं समझें । आलोचनात्मक कार्य न करें एवं सामान्य जनता को वस्तु स्थिति की जानकारी देवें । युवा-वर्ग का एक संगठन बनें जो सुदृढ़ एवं आचार्यश्रीजी के प्रति पूर्णतः समर्पित हो । एक मासिक पत्रिका का प्रकाशन हो जिसमें श्रमण संघीय साधु साध्वी एवं श्रावक श्राविकाओं के सुलझे विचार हरेक ग्राम, शहर में पहुंॅंचकर उनके लिए प्रेरणादायी बन सके । 

श्री कचरदास जी पोरवाल- पूना, ने इस अवसर पर कहा कि- आचार्यश्रीजी सरलात्मा, महान आत्मा है । आपही हमारे आचार्य थे, हैं और रहेंगे । यह गद्दी पूज्य आचार्य सम्राट् श्री आनंद ऋषि जी म0 ने दीर्घ दृष्टि से आपको सौंपी है । आनंदाचार्य का निर्णय हम अपना निर्णय मानते हैं । 

श्री हस्तीमल जी मुणोत, अध्यक्ष- अहमदनगर श्रीसंघ, जो अपने विचार अभिव्यक्त करते हुए कहा कि- आचार्यश्रीजी के समर्पण में पूर्ण महाराष्ट्र समर्पित है । आपश्रीजी जो भी निर्णय लेंगे वे हमें मान्य  होंगें । साधु साध्वीवृंद के वर्षावास, विहार चर्या, शिक्षण, औषध व्यवस्था आदि के विषय में आचार्यदेव विशेष मार्गदर्शन देकर इन समस्याओं को सुलझाने का प्रयास करें । 

श्री प्रेमचंद फूलफगर, अध्यक्ष- औरंगाबाद श्रीसंघ ने कहा कि- आचार्यश्रीजी एक पाठ्यक्रम निर्धारित कर उसे स्थानकवासी साधु साध्वीवृंद एवं विरक्त आत्माओं पर लागू करें । पाठ्यक्रम हेतु पाथर्डी बोर्ड की परीक्षा एवं पाठ्यक्रम सुव्यवस्थित है । गौतम निधि नामक एक फण्ड बनाया जाये जिसमें गृहस्थ एवं साधु साध्वीवृंद की हर समस्या का समाधान हो सके । 

श्री सुमतिलाल जी कर्नावट, ठाणा ने कहा कि- आचार्यश्रीजी के प्रयास सुन्दर हैं । मैं सम्मेलन की सराहना करता हूॅं । आचार्यश्रीजी ऐसे सम्मेलन लेते रहें एवं इनके द्वारा समाज को दिशा बोध प्राप्त हो, इस हेतु जो भी कार्य होगा उसे करने के लिए मैं तैयार हूॅं । 

श्री नृपराज जी जैन, मुम्बई वालों ने कहा कि- आचार्यश्रीजी का अभियान स्वीकार करने योग्य है । आपकी ध्यान साधना से जन जन बदलता जा रहा है । हरेक के भीतर शान्ति एवं समृद्धि प्राप्त हो रही   है । ध्यान साधना शिविरों का आयोजन हो एवं आपके द्वारा समाज को जो दिशा निर्देशन प्राप्त हो वह उपयोगी हो । 

श्री प्रकाश सुराण, एडवोकेट- बोदवड़ ने कहा कि- ध्यान एक महत्वपूर्ण बात है । ध्यान के बिना आध्यात्मिक शान्ति नहीं मिल सकती । प्रकृति पर्यावरण के साथ हमें आनन्द प्राप्त होता है । उसी प्रकार ध्यान से भीतर का आनन्द हमे ंप्राप्त होता है । आचार्यश्रीजी करूणामूर्ति हैं । प्रेम का संदेश देते हैं । भगवान महावीर के ध्यान को उद्घाटित करने वाले हैं । आपश्री के दरबार में मैंने लोगों को नये रूप में ढ़़लते देखा । अपने को नये अन्दाज में बदलते देखा । यह एक अनुभवात्मक स्तर पर सुन्दर बात है । आप सभी इस अनुभव को स्वयं के जीवन में उतारें । आचार्यश्रीजी के प्रति में पूर्णतः समर्पित हूॅं । आपका आदेश मुझे शिरोधार्य होगा ।

 

श्री मोहनलाल जी जैन, अध्यक्ष- केसरीसिंहपुर श्रीसंघ- ने कहा कि- आचार्यश्रीजी के प्रति हम पूर्णतः समर्पित हैं । आप जो भी कार्य दंेगे हम उसे स्वीकार करेंगे । 

सम्मेलन में डीम्ड युनिवर्सिटी के बारे में भी चर्चा की गई । यह युनिवर्सिटी तीन सालों में मध्य प्रदेश की औद्योगिक नगरी इन्दौर में शुरू होगी । इस युनिवर्सिटी के द्वारा श्रमण संघ का हर साधु साध्वी एवं हर श्रावक श्राविका पी0एच0डी0, डी0लिट् एवं शिक्षक स्तरीय शिक्षण को प्राप्त करेगा । वैसे ही स्वाध्याय संघ के बारे में भी चर्चा हुई । राजस्थान, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र आदि प्रान्तों में स्वाध्याय-संघ सुचारू रूप से गतिमान हैं । ऐसे ही स्वाध्याय संघ उत्तर भारत, दक्षिण भारत में कार्यान्वित कराये जाएंगें ।

श्रमण संघीय मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म0 ने कहा कि- आचार्यश्रीजी के निशा निर्देशन में हम सभी कार्य करें । आचार्यश्रीजी हमें जो आदेश दंेगें हम उसे शिरोधार्य कर उसकी अनुपालना करें, यही हमारा विनय-धर्म है । आचार्यश्रीजी के ग्यारह-सूत्रीय कार्यों में हम सहभाग लेकर स्वयं पालन कर दूसरों को भी पालन करवाने में सहयोगी बनें एवं विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान में सम्मिलित होकर विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज का संदेश घर घर तक पहुंॅचायें । स्वाध्याय संघ हर स्थान पर स्थापित हो । हर रोज हम पन्द्रह मिनिट ध्यान एवं पन्द्रह मिनिट स्वाध्याय करें, जिससे हमारा मन धर्ममय होकर जीवन उत्थान के लिए सहयोगी बनें । स्वाध्याय हेतु आचार्य सम्राट् पूज्य श्री आत्माराम जी म0 द्वारा लिखित आगमों का उपयोग करें । 

आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने कहा कि- धर्म सम्मेलन भारत के विभिन्न प्रान्तों से आए श्रावक श्राविका वर्ग को मैं हार्दिक साधुवाद देता हूॅं । इस सम्मेलन में भारत के महासंघों ने सक्रिय भूमिका निभायी है । व्यक्ति नहीं संघ का महत्व है । पूर्वाचार्यों ने इस संघ को पल्लवित, पुष्पित कर ऐतिहासिक बनाकर हमें सौंपा है । हम भी इस संघ को उन्नति की ओर ले जायें । व्यक्ति नहीं संघ को महत्व दें, जिनशासन की प्रभावना करें । एक संघ, एक निष्ठा, एक संकल्प हमारा हो । श्रावक के व्रतों में धर्म-रूपी धारा जुड़े । वस्तु का निजगुण एवं हमारी चेतना आत्मा का धर्म ही सच्चा धर्म है । प्रत्येक श्रावक को रात्रि भोजन का त्याग करना चाहिये जिससे जीवन शुद्ध और सात्विक बन सके । सभी श्रावक मौन, ध्यान, स्वाध्याय का निरन्तर अभ्यास करें । हम मौन रहकर साधना करें । व्यक्तिगत साधना के साथ सेवा करें । सेवा को प्रमुखता दें । फूल खिलेगा तो सुगन्ध आएगी । संघ के विकास में हम क्या योगदान दे सकते हैं, इस विषय पर चिन्तन करें । सकारात्मक सोच रखकर निष्ठा एवं अनुशासन में बद्ध हो जायें । भगवान महावीर जीव कल्याण समिति’ एवं ‘विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान’ का हम स्वयं पालन कर घर घर में पालन करायें । समाज के प्रबुद्ध युवा-वर्ग को जोड़ें । सेवा एवं साधना प्रकल्प को प्रमुखता दें ।   

 

विश्व की सेवा है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेर कोटला 21 सितम्बर, 2003: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- मन के सम्बन्ध में चर्चा चल रही थी । मन चंचल है, स्थिर नहीं रहता । मन को संकुचित कर लो । मन्दिर में जाते समय आपने देखा होगा कि बाहर कछुए का चित्र होता है, उसका अर्थ यही है कि कछुए ने जिस प्रकार अपनी पाॅंचों इन्द्रियों और मन को संकुचित कर लिया है, अपने वश में कर लिया है । आप भी अपने मन को एवं पाॅंचों इन्द्रियों को वश में कर लो । 

जब व्यक्ति मन को वश में कर लेता है वह ध्यान मग्न हो जाता है । ध्यानावस्था में वह मृत्यु की भी परवाह नहीं करता । समुद्र मन्थन हुआ था, अमृत और जहर दोनों ही चीजें निकली थी । अमृत पीने वाले तो बहुत थे परन्तु विषपान करने वाला कोई नहीं था । भगवान शिव ने जहर को कंठ में धारण कर लिया और वे नीलकण्ठ बन गये । इसका अर्थ यही है दुःख को मैं ले लेता हूॅं, सुख तुम ले लो । माता, पिता, गुरू इनके ऋण को कभी चुकाया नहीं जा सकता । इनको खुश रखो । कर्तव्य पर ध्यान दो । अपने कर्तव्य का पालन करो । माॅं की असीम कृपा और पिता का प्यार दोनों प्राप्त होने पर ही हम आज इस अवस्था तक पहुंॅचे है । हमारी संस्कृति के आधार है, माता, पिता व गुरू । हम इनको पूज्य माने यही हमारे तीर्थ स्थान है । इनकी सेवा विश्व की सेवा है । बच्चों को विनय धर्म का ज्ञान दें । 

जिस प्रकार माता, पिता व गुरू को नहीं भुलाया जा सकता, उसी प्रकार परमात्मा कर्म और मौत इनको भी मत भूलना । अपनी आत्म निन्दा और आत्म गर्हा करना । जीवन में आॅंधी तूफान आते ही रहते हैं । गलती का अहसास करो । तुम्हारी वृत्ति संघर्ष एवं झगड़े की है तो जहाॅं जाओगे वहाॅं झगड़ा ही होगा, समर्पण की वृत्ति रखो । विनम्र, सहज और सरल हो जाओ । फूल की भाॅंति हल्के, निर्भार, कोमल और सुगन्धित हो जाओ । भीतर का, ज्ञान का, प्रज्ञा का, ध्यान एवं समता का दीया जलाओ । ऊपर की बातों में मत उलझना, व्यर्थ की चर्चा मत करना । जब मन स्थिर हो जाये तब अपने जीवन को सारगर्भित बनाना, जीवन का सदुपयोग करना ।  

आज आचार्यश्रीजी के जन्म दिन के उपलक्ष में कुष्ट रोगियां को वस्त्र दान एवं सिलाई मशीनें चातुर्मास समिति के चेयरमैन श्री प्रेमचंद जी जैन द्वारा दी गई । फ्री र्हाअ चैकअप कैम्प एवं रक्तदान शिविर चल रहा है जिसमें सैकड़ों भाईयों का चैकअप हुआ एवं रक्तदान हुआ । यह कैम्प सहारा जन सेवा एवं महावीर युवक मण्डल द्वारा लगाया गया । गुरूभक्तों द्वारा लंगर लगाया गया ।

 

सरलतामय जीवन जीओ: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेर कोटला 22 सितम्बर, 2003: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- उपानिषद के ऋषि का एक वाक्य है- हे प्रभु ! मुझे कुछ नहीं चाहिए । जब आप प्रार्थना, सामायिक ध्यान करें, गुरू के पास जायें, सत्संग में जायें तो उनसे क्या माॅंगे ? हमारी माॅंग सकारात्मक होनी चाहिए, जीवन उत्थान में सहयोगी होनी चाहिए । हम यह माॅंग करे कि मेरा मन, मेरी बुद्धि, कर्म, विचार अच्छे हो, उनमें ऋजुता, नम्रता, पवित्रता आये । कुछ धार्मिक अनुष्ठान, कुछ क्रियाएॅं हम प्रतिदिन कर रहे हैं । हमारा जीवन परमार्थ में लगा हुआ है । यदि हमारे जीवन में समर्पण है तो हम सही जीवन व्यतीत कर रहे हैं । यदि हमारे जीवन में संघर्ष, पीड़ा, तनाव है तो सारी शक्ति व्यर्थ हो रही है । 

हमें संस्कारित करने का कार्य हमारे माता, पिता, गुरू एवं हमारे विचार और परिस्थितियाॅं करती   है । व्यक्ति को हमेशा खानदान देखकर वार्तालाप करना चाहिए । आप सेवा कर रहे हैं परन्तु सेवा करते समय अहंकार आता है तो वह सेवा भी निरर्थक है । सामायिक से चित्त में शान्ति आती है ओर तनाव दूर होते हैं । भारतीय संस्कृति अपनाओ । सूर्य उदय से पूर्व ही योग, ध्यान, सामायिक में रम जाओ, जिससे पूर्ण दिवस आनंदमय बीतेगा ।

सरलता में जीवन जीओ । स्वयं बुद्धु न बनो और न ही औरों को बुद्धु बनाओ । स्वच्छ व्यवहार रखो  । माया, छल, कपट न करो । धार्मिक होने का लक्षण यही है कि हम सहज और सरल हो जाये । जब मन में विकल्प आये तब शान्त हो जाओ । जो आपको मिला है उसका सदुपयोग करो । धर्म ही आपको उच्चगति में ले जाएगा, इसलिए धर्म की आराधना करो । मन को टिकाओ, मन चंचल है, फिर भी आप मन को लगाओ । साधना में तपो । बुरे कार्य करते समय उनको टालने की कोशिश करो । अच्छे कार्य बिना अवलम्ब के करो । यही मानव जीवन की सहजता और सरलता है । 

 

धन के साथ धर्म का होना जरूरी है: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेर कोटला 23 सितम्बर, 2003: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- करो प्यार सत्गुरू से, जीवन सफल बना लो । एक धन है संसार का, एक सुख है बाहर का । एक धन और एक सुख है भीतर का । भीतर का सुख परम सुख  है । बाहर के धन को जीवन के कल्याण के कार्य के लिए एवं धर्म के साथ जोड़ोगे तो वह कल्याणमय बन जाएगा । धन के साथ धर्म का होना जरूरी है । यह धन आपको ऊपर की ओर ले  जाएगा । 

ब्लेक बोर्ड तुम्हारे पास है । वर्णमाला के अक्षर भी तुम्हें याद है । लिखना क्या है यह तुम्हारे ऊपर निर्भर करता है । चाहे तुम उसके ऊपर प्रशंसामय शब्द लिखों या फिर निन्दा के शब्द लिखों, उसी वर्णमाला के द्वारा बड़े, बड़े श्लोक लिखे गये हैं और उसी वर्णमाला के द्वारा अश्लील शब्दों का प्रयोग भी किया गया है । क्या ग्रहण करना है यह तुम्हारे ऊपर निर्भर करता है ।

व्यक्ति जब भक्ति में तल्लीन होता है तब भगवान भीतर प्रतिष्ठित होते हैं । तुम भीतर डुबो, भगवान मिलेंगे । बीज टूटने पर ही वृक्ष बनता है और एक बीज अपने साथ एक वृक्ष, सैकड़ों फल फूल और हजारों बीजों को लेकर उत्पन्न होता है । जब तुम स्वयं टूटते हो तो चित्त निखरता है । नई स्फूर्ति, नई जागृति आती है । मनुष्य के कर्म संस्कार है वह भटकता ही रहता है । जब धर्म का रास्ता उसे मिल जाता है तब वह धर्म में लग जाता है । गलती होना स्वाभाविक बात है परन्तु गलती को स्वीकार करना अच्छी बात है । तुम गलती को स्वीकार करते हो यह बहुत जरूरी है । जब गलती स्वीकृत हो जाएगी तब भीतर से कुछ महसूस होगा । 

धर्म आनंदमयी है । धर्म जीवन में शान्ति व समता देता है । जब भीतर शान्ति व समता है तभी तुम्हारे भीतर धर्म है । जब धर्म भीतर आता है तब जीने का ढंग, जीवन की कला हमें प्राप्त हो जाती है । धर्म की राह पर चलो । धर्मात्मा का यही लक्षण है कि हम अपनी भूल को स्वीकार करें । धर्म का बल बड़ा है । धर्म और साधना की बात करो । साधना को पकड़ों, गहराई में आओ, जीवन आनंदमय बनेगा । 

 

विचार का उद्गम स्थान है चित्त: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेर कोटला 24 सितम्बर, 2003: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- एक समय की बात है । एक बहुत बड़े पर्वत के पास कुछ व्यक्ति इकट्ठे हुए और चर्चा करने लगे कि इस पर कौन शासन कर सकता है । इस पर्वत पर कौन विजय प्राप्त कर सकता है । इस पर्वत का मालिक कौन है ? एक व्यक्ति ने उत्तर दिया, लोहे की छोटी सी हथोड़ी इस पर्वत को तोड़ सकती है । इस पर्वत का मालिक या शासक वही कहलाएगी । लोहे से शक्तिशाली कौन है ? अग्नि लोहे से अधिक शक्तिशाली है क्योंकि अग्नि में लोहा पिघलता है । लोहे पर अग्नि का शासन चलता है । अग्नि पर पानी का शासन चलता है । पानी पर वायु का शासन चलता है, वायु जिधर जाये पानी को बहा देती है । समुद्री जहाज वायु के आधार पर ही चलते है । वायु को देखा नहीं जा सकता । उसे तो केवल अनुभव ही किया जा सकता है । 

वायु पर विचार का शासन चलता है । एक क्षण में विचार द्वारा ब्रह्माण्ड का चक्कर लगाया जा सकता है । विचार की गति तेज है । विचार स्थूल से सूक्ष्म, सूक्ष्म से सूक्ष्मतर और सूक्ष्मतर से सूक्ष्मतम चले जाये तो शक्ति बढ़ जाती है । विचार उद्गम स्थान है चित्त का । मन से ही विचार उत्पन्न होते हैं, जब तक मन में संकल्प विकल्प है तब तक समाधि प्राप्त नहीं हो सकती । जब मन शान्त हो जाएगा तब यह चित्त समाधिस्थ हो जाएगा । एतदर्थ मन को शान्त करो । 

प्रकाश की गति एक सैकेण्ड में एक लाख छियासठ हजार है । बिजली की इससे अधिक है । मन की गति एक सैकेण्ड में बाईस लाख पैंसठ हजार एक सौ बीस मिल तक पहुंॅचती है । मन, विचार दिखते नहीं हैं । इन्हें अनुभव किया जा सकता है । सारा जगत मन पर आधारित है । इस मन ने ही इतनी कल्पनाएॅं की थी, जब चाॅंद, तारे, सूरज संसार की प्रत्येक वस्तुएॅं बनी । ये सारी वस्तुएॅं मूल्यवान है तुम्हारे लिए । वीतरागी महापुरूष के लिए धन, पद, यश मूल्यवान नहीं है । चाहे वह प्रभु महावीर ही क्यों न हो । वे महापुरूष समस्त संकल्प विकल्प को जीत चुके हैं ।

अरिहंत, सिद्ध, परमात्मा ने परमात्म तत्व को प्राप्त किया है । परमात्म तत्व से आनंद को प्राप्त किया है । वे समस्त संकल्प विकल्प से मुक्त हो गये हैं और उनका परमात्म-तत्व आनंद रूप है । आनंद, सुख और दुःख के पार है । बिना व्यक्ति, वस्तु और परिस्थिति के जो आए वही आनन्द है । आत्मा की शुद्ध दशा भी आनंद स्वरूप है । मन में जो चिन्तन हुआ, धारा बही, तुमने साथ दिया और विचार बन   गया । मन को समझो, जानो, चिन्तन करो, विचार को देखो । मन और विचार ही हमें बुद्धिमान से बुद्धु तक पहुंॅचाते हैं, इसलिए मन पर विजय प्राप्त करो । विचारो ंसे ऊपर उठ जाओ ।    

 

अशुभ कर्म करके प्रशंसा न करें: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेर कोटला 25 सितम्बर, 2003: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- मन के संबंध में चर्चा चल रही है । मन चंचल है स्थिर नहीं रहता । यह सभी महापुरूषों ने स्वीकार किया है । संसार की सभी महान आत्माओं ने मन को स्वीकार किया है । श्रीकृष्ण महाराज ने गीता के अन्दर कहा कि मन बड़ा चंचल है, वायु के समान चंचल है । जिस प्रकार हम वायु को रोक नहीं सकते, उसी प्रकार हम मन को भी नहीं रोक सकते । पानी के प्रवाह को, अग्नि की ज्वालाओं को, फूल की सुगन्ध को, जंगली प्राणियों को अथवा मनुष्य को जिस प्रकार बाॅंधा नहीं जा सकता उसी प्रकार मन को भी बाॅैधा नहीं जा सकता । 

एक व्यक्ति कर्म करने पर स्वयं की प्रशंसा करता है वह कर्म अच्छा है या बुरा है इसका भी उसे ज्ञान नहीं है, परन्तु वह अपने आपको प्रशंसित करता है तो वह चिकने कर्म बाॅंधता है । कर्म करने के बाद वह स्वयं की प्रशंसा करके प्रगाढ़ कर्म-बन्धन करता है । कुछ लोग है जो धर्माराधना करना चाहते हैं परन्तु नहीं कर पाते क्योंकि उन्होंने पहले कुछ अन्तराय कर्म ऐसे बाॅंधे हैं जिस कारण वे साधना नहीं कर सकते । महाराजा श्रेणिक ने नरक का बंधन एक तीर में तीन शिकार करने पर बाॅंधा । भगवान महावीर ने नरक के बंधन काटने के लिए उपाय भी बताये, परन्तु वह कर्म निकाचित था, प्रगाढ़ था, इस कारण वह नहीं कट सका । कपिलादासी शुद्ध भाव से दान नहीं दे सकी । कालू कसाई हिंसा नहीं रोक सका । महाराजा श्रेणिक एक सामायिक और नवकारसी तप नहीं कर सके । इस कारण महाराजा श्रेणिक को नरक की गति भोगनी पड़ी ।  शुद्ध मन से दिया गया दान या शुद्धभाव से किया गया कार्य हमें उच्च गति तक पहुंॅंचा देता है । 

भाव का बहुत महत्व है । मन से निकाचित कर्म बाॅंधते हैं परन्तु प्रायश्चित कर ले और मन में शुद्ध भावना भा ले तो वे कर्म कट जाते हैं । 

                          भावे जिनवर ध्यायिये, भावे दीजे दान ।

                          भावे धर्म आराधिये, भावे केवल ज्ञान ।।

तुम्हारा मन, वचन, काया तीनों जब एक साथ जुड़ते हैं तब भाव आता है । भावना का बड़ा परिणाम आता है । अच्छी भावना भावो, कलुषित भावना न भावो । मन में जब विकार आ जाये, क्रोध आ जाये तब शान्त हो जाना । श्वासोश्वांस पर ध्यान ले आना । धर्म की आराधना करना । भाव से दान देना, यही तुम्हारा कर्म बंध काट सकेगा । 

मन को श्रुत सेवा और साधना से नियंत्रित कर लो: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेर कोटला 26 सितम्बर, 2003: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- मानव जीवन में मुख्य तत्व है चित्त की चेतना । मन का भक्ति में लग जाना । सेवा में लग जाना । मन हमारा निरन्तर प्रवाहमान रहता है । यदि मन स्थिर रहे तो मन की मौत हो जाती है । संकल्प विकल्प मुक्त होते हैं । मन इतना दुष्ट है । घोड़े के समान है । इसे श्रुत-सेवा और साधना से नियंत्रित कर लो । पानी नीचे की ओर जाता है, उसे मोटर लगाते हैं तो वह ऊपर पहुंॅच जाता है । मन हमेशा विपरीत सोचता है, इन्द्रिय विषयों में चला जाता है । जैसा उपयोग करोगे वैसा ही होगा । मन ने ही गाॅंधी और हिटलर, राम और रावण जैसों को जन्म दिया । राम की मर्यादा हमें आज भी याद आती है । माता पिता की आज्ञा का पालन करना, वनवास हेतु जाना, यह माता पिता की आज्ञा ही थी । रावण की सोने की लंका थी उसे बहुत समझाया फिर भी वह नहीं माना । उसका अहंकार बीच में आ गया । कहा भी है- 

                               राम गयो रावण गयो, जाके बहु परिवार ।

                               कह नानक फिर कुछ नहीं, बालु जो संसार ।।

राम, रावण जैसे अनेक चले गये । रेत या बालु जिस प्रकार धीरे धीरे ऊपर से नीचे की ओर खिसकती है ऐसा ही यह संसार है । कृष्ण और कंस की घटना आप सभी को याद ही है । कंस राजा था और कृष्ण ने उसके बराबर अपनी शक्ति बढ़ाई । कृष्ण ने इस जगत में आकर अत्याचार दूर किए । श्रीकृष्ण पाण्डवों के मध्यस्थ बने । आज कृष्ण को सभी जानते हैं । कंस को कोई नहीं जानता है । हमेशा धर्म की जीत होती है । अधर्म की जीत नहीं होती । मन ही हमें शान्ति और अशान्ति की ओर ले जाता   है ।  जब मन कुविचारों में जाये तब उसे हटा लेना । महर्षि वेदव्यास ने सार की बात बताते हुए कहा कि- पुण्य करना हो तो परोपकार करो और पाप करना है तो दूसरे को पीड़ा पहुंॅचाओ । सुख पहुंॅचाते हैं तो धर्म की ओर आगे बढ़ जाओगे । अमंगलकारी कार्य, पाप के कार्य कभी न करो । हमेशा मंगलमय कार्य करो । छोटा सा किया गया कार्य भी हमारे जीवन को बदल देता है । जब मन बदल जाता है तो सब कुछ बदल जाता है । शाश्वत् तत्व को पहचानो । चिन्तन करो । मन को टिकाओ । 

ध्यान द्वार है, साक्षी भाव मंजिल है: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेर कोटला 27 सितम्बर, 2003: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि-  मानव के जीवन को चार हिस्से में बाॅंट सकते हैं । सम्पूर्ण मानव जीवन का आधार यही चार हिस्से है । कर्मों का जगत, विचार का जगत, भाव का जगत और साक्षी-भाव । इन चार हिस्सों में मनुष्य जीता है । साक्षी-भाव मध्य में है । साक्षी-भाव में शान्ति, समता भरी हुई है । हर व्यक्ति कर्म जगत, विचार जगत या भाव जगत में रहता है । लाखों, करोड़ों में कोई एक व्यक्ति ऐसा होगा जो साक्षी-भाव में जीता है ।  ध्यान साक्षी नहीं, मार्ग है । ध्यान पूर्ण है । ध्यान पूर्णता की ओर पहली सीढ़ी है । जहाॅं ध्यान है वहाॅं शान्ति समता है । जहाॅं ध्यान नहीं वहाॅं प्रतिक्रिया है । 

कर्म-योग, ज्ञान-योग, भक्ति-योग इनके द्वारा भी परमात्मा को पाया जा सकता है, ऐसा श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है । ये तीनों योग और मानव जीवन के चार हिस्सों में समता पाई जाती है । इन तीनों में से कुछ भी नहीं आता हो तो समर्पण कर दो । सभी कर्म करते है पर वह कर्मयोग नहीं कहलाता । आत्मा का परमात्मा से मिलन कर्मयोग है । कर्म को ध्यान में लगाओ तो कर्मयोग हो जाएगा । हर कार्य ध्यान से करो । जब कोई व्यक्ति नृत्य करता है तब उसके तीनों योग उसमें लग जाते है । अगर वह एक योग नृत्य में नहीं लगाता तो उसका नृत्य सफल नहीं बन सकता । ज्ञान को ध्यान में लगाओ, ज्ञानयोग बन जाएगा । भक्ति को ध्यान में लगाओ भक्तियोग बन जाएगा ।

ध्यान के द्वारा तुम ठीक हो सकते हो । कर्म के साथ ध्यान करो । ध्यान एक दवाई है । ध्यान, योग से अनेकों विपत्तियाॅं दूर हुई है । विचार बहुत आते हैं । मन कहाॅं कहाॅं चला जाता है । मन नहीं लगता, फिर भी उसे भक्ति में, ज्ञान में, ध्यान में डुबा दो । विचारों का अस्तित्व नहीं है । विचार हमारे संकल्प, विकल्प, कामना, वासना, उलट, पुलट संस्कार है । शाश्वत् मूल्य तो चित्त की चेतना का ही है । विचारों का मूल्य शाश्वत नहीं है । 

ध्यान की विधि से विचार को शान्त कर लो । ध्यान से भक्ति करो । जिसके प्रति श्रद्धा निष्ठा है, उसकी भक्ति करो । गीत गुनगुनाओं । कविता लिखो । कर्मयोगी, ज्ञानयोगी, भक्तियोगी बनना है तो ध्यान जरूरी है क्योंकि योग तभी कहलाएगा जब वह ध्यान के साथ जुड़ जाएगा ।

ध्यान के साथ जुड़ों । भक्ति में मन को लगाओ ।      

सारे दुःख शरीर के है चित्त के नहीं: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेर कोटला 28 सितम्बर, 2003: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- जीवन जीने का ढंग, जीवन जीने की कला, जीवन जीने का सार, जीवन में कुछ पाया है उसे बाॅंटने की विधि है जिन्दगी में सदा मुस्कुराते रहना चाहिए । प्रकृति चारों तरफ मुस्कुरा रही है । हम भी मुस्कुराये । प्रकृति का कण-कण हमें कुछ देता है । मनुष्य के भीतर अहंकार है । वह कुछ लेना ही नहीं चाहता । मनुष्य का जीवन चार भागों में बॅंटा है, कर्म, विचार, भाव, साक्षीभाव । प्रतिपल प्रतिक्षण निरीक्षण करो ।

सारा दुःख शरीर का है । जन्म शरीर का होता है । मृत्यु भी शरीर की होती है । हमें जन्म, मरण, आधि, व्याधि का दुःख लगा हुआ है । सारे दुःख संसार से है । तुम्हारी धारणा मजबूत हो जाए तो तुम उसके पार भी जा सकते हो । भीतर धारणा करो कि यह शरीर मेरा नहीं । चैतन्य अवस्था मेरी है । तुम जो भी कार्य करते हो शरीर के आधार पर चित्त से उस कार्य को जानो । हमारा मन, वचन, काया परोपकार में लगाओ यही हमारी जप तप साधना है, आराधना है । 

हम अपनी सुविधा में जीना चाहते हैं । शरीर को साधने में लगाओ । भीतर धारणा को दृढ़ करो । मैं शरीर नहीं शुद्ध चेतना हूॅं । ऋषि मुनि अपने शरीर को दूसरे की सहायता में लगाते हैं । महात्माॅं गाॅंधी जिन्होंने अपने शरीर के साथ-साथ अपने पूरे जीवन को भारत की स्वतंत्रता में लगाया । आज वे राष्ट्रपिता के नाम से जाने जाते हैं । शरीर को जीतना, सुरक्षित रखना चाहते हो उतना ही वह दुःखी होता है । क्षणिक सुख है परन्तु उसके अनन्तर दुःख की लम्बी कतार है । इस जीवन से क्या चाहते हो । 

अपने जीने का ढंग बदलो । आपने माना कि मैं शरीर हूॅं तो सब दुःख आएगें । आपने माना कि मैं चेतना हूॅं तो फिर कोई विकार नहीं आएगा । धर्म कार्य में मन लगाओ । काया से दुःखी प्राणी की सेवा करना, मन से शुभ भावनाएॅं भाओ । वाणी से अच्छे शब्द निकालना यही तप, जप, ध्यान, भक्ति है । हमारा मन दुषम, सुषम है, संकल्प विकल्प में है तो सुख दुःख है । मन को जानो, पहचानो, सबके मंगल की कामना करो । 

अपनी धारणा सही बनाओ: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेर कोटला 29 सितम्बर, 2003:  श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- 

‘नमस्कार तुमको महावीर प्यारे, नमस्कार तुमको सिद्धार्थ दुलारे . . . . . 

प्रभु महावीर को किया गया नमस्कार हमें लाभकारी है । पाॅंच इन्द्रियाॅं मन और भक्ति से नमस्कार करने से हम उन जैसे बनने शुरू हो जाते हैं । नमस्कार करना पहली सीढ़ी है । नमन से अहंकार नहीं टिकता । नमन करते हुए प्रभु महावीर की वाणी का चिन्तन करें । मनुष्य को जन्म, जरा, मृत्यु, आधि, व्याधि का दुःख है । सारे दुःख शरीर के है । आत्मा का जन्म मरण आधि व्याधि कुछ भी नहीं है, फिर भी आश्चर्य है कि मनुष्य विषय भोगों में लगा हुआ है । 

पुरूष व स्त्री के शरीर में भेद है, फिर भी आत्म सम्मोहित व्यक्ति स्त्री की चाल चल लेता है । वह आत्म-सम्मोहन में बदल गया है । क्षण भर में ही वह आत्म-सम्मोहित हो जाता है । हम तो जन्मों जन्मों से भटक रहे हैं । जन्मों जन्मों से हमने इस शरीर को, इस नाम को, अपना माना है । नाम केवल परिवारवालों ने पहचान के लिए रखा था फिर भी हम उसे अपना मान बैठे । जन्म-जन्म से हमने अपने आपको आत्म-सम्मोहित किया है । यह शरीर मेरा है । मेरा बेटा, मेरी बेटी, मेरी पत्नी, यह धन, पद, पैसा,संसार सब मेरा ही है । कोई भी व्यक्ति महापुरूष के पास जाता है तो वहाॅं पर भी उसकी यही माॅंग होती है । हम अपने आपको भूलकर आत्म-सम्मोहित होकर किसी ओर को ही ढूंढ रहे हैं । जिसको हम ढूंढ रहे हैं वह तो हमारे भीतर ही है । 

कस्तूरी कूंडल बसे, मृग ढूढें वन माही ।

ऐसे घट घट राम है, दुनियाॅं देखत नाहीं ।

मृग की नाभी में कस्तूरी रहती है । वह नाभी में होते हुए भी उसकी सुगन्ध चारों ओर फैलती है । मृग उस कस्तूरी को लेने के लिए दर-दर भटकता है । वह कस्तूरी उसकी नाभी में ही स्थित है, यह उसे पता नहीं । ऐसे ही स्वस्थता, आनंद, शान्ति हमारे भीतर है फिर भी हम उसे पाने के लिए कहीं ओर भटकते रहते हैं । प्रभु महावीर का जन्म हुआ । उन्हें जन्म का कोई दुःख नहीं था । उनकी मृत्यु नहीं हुई अपितु निर्वाण हुआ । निर्वाण को जैन दर्शन में परम सुख माना है । जिन्दगी में हम दोहरे मापदण्ड में जीते हैं । जैसी तुम्हारी धारणा होगी वैसा ही क्रियान्वित होगा । अगर हम गलत धारणा करेंगे तो क्रिया भी गलत होगी । अगर हम सही धारणा करेंगे तो हम कार्य भी सही करेगे । भक्ति करो, ध्यान करो, अपनी धारणा सही बनाओ, नमन करो । अपने भीतर विराजित शुद्धात्मा, शुद्ध चैतन्य का अनुभव करो ।

जीवन में संकल्प और प्यास जरूरी है: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेर कोटला 30 सितम्बर, 2003:  श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- 

उतरा सागर में उसको कि मोती मिला ।

खोज जिसने भी मैं उसी को मिला ।।

जीवन में जो भी संकल्प और प्यास से भरे होते हैं उनका संकल्प पूर्ण होता है । आप अपने जीवन को देखो, आपने जो संकल्प किया था वह पूर्ण होता जा रहा है । प्यास जरूरी है । प्यास के साथ संकल्प अपने आप आएगा । प्यास नहीं है तो संकल्प अकेला कुछ नहीं कर सकता । प्यास का अर्थ पानी नहीं है या कंठ सूख जाना यह भी नहीं है । प्यास का अर्थ है तुम क्या पाना चाहते हो ? क्या तुम्हें चाहिए ?   दूर दूर तक जंगल है । कहीं पानी नजर नहीं आ रहा है । प्यास लगी है तो तुम तीन चार किलोमीटर घूमकर पानी को ढूंढ लोगे । कुआ तुम्हारे पास है, परन्तु भीतर प्यास नहीं है तो उस कुएॅं की कोई कीमत नहीं है । शरीर में मन, वचन, काया है । शरीर के पार भी एक अदृश्य तत्व है, जो हमारे जीवन में सहायक है । अगर आपकी प्यास है तो पानी मिलेगा । 

भीतर यह प्यास रखे कि मुझे चेतना के पास आत्मा को लाना है । महर्षि पातंजलि ने चित्तवृत्ति के निरोध की भीतर प्यास रखी थी वह पूर्ण हुई । तुम भी चित्त वृत्तियों का निरोध करो । आत्मा से परमात्मा मिल जाएगा । भीतर देखो । भूख किसको लगी है इस शरीर को या आत्मा को । आत्मा को तो भूख लगती नहीं । जन्म-मरण भी प्राण का ही होता है । मोह शोक मन को ही है शरीर को नहीं । मन से ही व्यक्ति मोहित होता है और शोक भी मन के भीतर ही होता है । जन्म-मरण भी प्राण का ही है । प्राण तत्व चला गया तो मौत हो जाएगी । 

व्यक्ति की निष्ठा, आस्था, श्रद्धा, आधार, संकल्प, प्यास मजबूत होनी चाहिए । जैसा विचार तुम्हारा होगा वैसी ही तुम्हारी क्रिया होगी । यह शरीर तो मरणशील है । आत्मा ही अमर है । जब इस शरीर में से आत्मा निकल जाती है तो शरीर कोई कार्य नहीं करता । कबीर जी ने भी कहा है- 

कबीरा जब जग में भयंे, जग हंसा हम रोय ।

ऐसी करणी कर चलो, हम हंसे जग रोय ।।

जब तुम जग में आए थे तो प्रत्येक व्यक्ति ने हंसकर आनंद व्यक्त किया था, परन्तु तुम श्वांस लेने हेतु या कुछ चाहिए था इसलिए रोते रहे । यह जीवन व्यतीत करते समय ऐसी करनी करो कि इस शरीर का अंत होने के बाद भी हर व्यक्ति हमें याद करें और इस जग से विदा लेते समय हम हंसे और हमारी याद में पूरा जग रोये । ऐसी करनी हमारी होनी चाहिए ।  

मानव का जीवन असीम शक्ति का स्रोत है: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेर कोटला 1 अक्टूबर, 2003:  श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- मानव का जीवन असीम शक्ति का स्रोत है । उसके भीतर अक्षय शक्ति का खजाना भरा हुआ है । उसके भीतर अलौकिक ऊर्जा है । वह चाहे जैसा उसका उपयोग कर सकता है । मान लो एक हजार रूपये आपके पास है । तुम जैसा चाहो वैसा उसका उपयोग कर सकते हो । चाहे होटल में जाओ । रोटी खाओ, दान दो । किसी तरह से तुम इसका उपयोग कर सकते हो । कोरी स्लेट तुम्हारे पास है । क्या लिखना है यह तुम्हारे ऊपर निर्भर करता है । चाहो तो किसी की स्तुति लिखो या फिर अन्य कार्यों में उसे प्रयोग करो । 

जीवन की धरातल को समझो । जीवन को समाधि में ले आओ । बाहर के जितने सम्बन्ध है उनसे हम अलग कैसे हो इसका चिन्तन करो । जैन धर्म में कैसे हमारी अन्तिम गति हो इस बारे में कहा है कि हम अन्तिम समय समाधि मरण संलेखना पूर्वक करें । यह निश्चित बात है कि एक दिन जाना जरूर पड़ेगा, परलोक की तैयारी करो, शरीर तो यही साथ रहने वाला है । जो तुमने पुण्य कमाया है वह परलोक तक जाएगा । मोक्ष में तो शुद्धात्मा ही जाएगी । 

भीतर से समझो । मैं अकेला हूॅं । सबमें रहते हुए भी अकेले रहो । ज्ञान, दर्शन से युक्त हो   जाओ । संयोग, वियोग तो होने ही वाला है । अन्तिम समय बाहरी संयोगों का तीन करण तीन योग से त्याग कर देना । भीतर समाधि मरण की भावना भाओ । सुखी व्यक्ति वही होता है जो थोड़े में गुजारा करता है । पूर्णिया श्रावक सुखी था । श्रेणिक राजा सुखी नहीं था । पूर्णिया श्रावक की कमाई निर्मल थी । पुर्णिया श्रावक की सामायिक शुद्ध थी । श्रेणिक का पूरा राज्य, राजमहल, स्वर्ण मुद्राएॅं चारों सेनाएॅं होते हुए भी वह सामायिक खरीद नहीं सका । बहुत थोड़े लोग है जो भीतर आचरण करते हैं । जो आचरण करते हैं वे ही अच्छे मानव कहे जाते हैं । सत्संग हमें आचरण की प्रेरणा देता है । मनुष्य अपने ध्येय से बहुत जल्दी भटक जाता है । मनुष्य का जीवन बड़ा अनूठा और अनमोल है । इस जीवन की अनमोलता को समझना यही श्रेयस्कर मार्ग है । 

सत्य की प्रतिमूर्ति थे राष्ट्रपिता महात्मां गाॅधी जी

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेर कोटला 2 अक्टूबर, 2003:  श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् श्री शिवमुनि जी महाराज ने गाॅंधी एवं शास्त्री जयंती के अवसर पर अपनी अमृतमयी वाणी में  फरमाया कि- आज का यह पावन दिवस 2 अक्टूबर हमारे राष्ट्रपिता महात्मा गाॅंधी जी एवं भारत के पूर्व प्रधानमंत्री श्री लाल बहादुर शास्त्री का जन्म दिवस है । दोनों महापुरूषों ने सत्य के लिए जीवन जीया । चाहे कैसी ही वस्तुस्थिति आई वे हर कार्य में ईमानदार और अहिंसक तथा सत्यमय रहे । उनके जीवन की ईमानदारी अहिंसा, सत्य, गुणग्राहकता, धर्म की सीख भारत को सदा-सदा के लिए याद रहेगी । थोड़े से लोग है जिनको विश्व याद करता है । आज पूरा विश्व प्रभु महावीर की अहिंसा, अनेकान्त और अपरिग्रहवाद को मानता है । ये तीनों ही बातें जीवन में अंगीकार कर लें तो भीतर में शान्ति का अनुभव होगा । प्रभु महावीर की मंगल मैत्री जीवन के कलिमल भावों को दूर करती है । अहिंसा मूल है । मैत्री इसका परिणाम है । 

आज पूरे भारत में रामलीला मनाई जा रही है, रामायण का पाठ कराया जा रहा है । मर्यादा पुरूषोत्तम श्री राम ने जो लीला अपने जीवन में की थी उसे ही आज जन-जन के समक्ष रखा जा रहा   है । महात्मा गाॅंधी का जीवन अच्छे संस्कारों में व्यीतत हुआ, उनकी शादी केवल 13 वर्ष की उम्र में हुई और आपने 36 वर्ष की उम्र में ब्रह्मचर्य व्रत ग्रहण कर लिया । 

आज प्रातः मैं दैनिक न्यू पेपर देख रहा था । गाॅंधी जी व शास्त्री जी का आज जन्म दिन है परन्तु आज पूरे अखबार में केवल एक इश्तेहार एवं छोटे से काॅलम में गाॅंधीजी के जीवन की दस लाईने लिखी   हैं ।  मुझे देखकर आश्चर्य हुआ । जिस महापुरूष ने भारत को आजादी दिलाई उसके जन्म दिन पर भी वर्तमान पत्र में उनका यथोचित गुणगान नहीं किया जा रहा है । उनकी गुण गौरव-गाथा नहीं याद की जा रही है । आज का पूरा वर्तमान पत्र आपके गुणगान से लिखा हुआ होना चाहिए था । प्रेरक प्रसंगों से भरा हुआ होना चाहिए था जिससे हर व्यक्ति को प्रेरणा मिलती । गाॅंधीजी ने देश को अहिंसा, सत्य, ईमानदारी सिखाई । गाॅंधीजी ने कार्य दक्षिण अफ्रीका में किया परन्तु उसकी सुगंध पूरे भारत में फैली । गाॅंधीजी ने देश की गरीबी देखते हुए केवल लंगोटी और लाठी धारण की । हड्डियों का ढ़ांचा मात्र थे महात्मा गाॅंधीजी, वे सबको अपने समान सम्मान देते थे । उन्होंने कहा- जब तक भारत माॅं अंग्रेजों में जकड़ी रहेगी तब तक मैं चैन की सांस नहीं लूॅंगा । उनके मन में संकल्प जागा । उस संकल्प को हजारों ने ग्रहण  किया । हम भी सत्य, धर्म का जीवन जीयें । गाॅंधीजी जों कहते थे वे करते थे । गाॅंधीजी स्वयं अपने हाथों से सेवा किया करते थे । 

आज धर्म के नाम पर राजनीति झूठ आ गया है । कम से कम परिवार धर्म, संघ में राजनीति न लाओ । आज विश्व का कोई भी व्यक्ति भारत की राजधानी आता है तो पहले राजघाट पर महात्माॅं गाॅंधी की समाधि पर अपनी श्रद्धा अभिव्यक्त करता है । गाॅंधीजी ने अन्तिम समय में अपनी पत्नी को भी माॅं बना 

लिया था । उन्होंने कहा- कस्तूरबा मेरी पत्नी नहीं, कस्तूरबा मेरी माॅं है । गाॅंधी जी से पूछा गया कि आपके जीवन का अन्तिम संदेश क्या है, तो उन्होंने कहा- ‘मेरा जीवन ही मेरा संदेश है’ । 

प्रार्थना विराट, असीम अस्तित्व के आगे झुक जाना है 

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेर कोटला 3 अक्टूबर, 2003: आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने फरमाया कि- राष्ट्रपिता महात्माॅ गाॅंधी एवं भारत के पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की चर्चा चल रही थी । विश्व में शायद कोई ऐसा ही कोई विरला महापुरूष होगा जिसने प्राणी मात्र के प्रति अहिंसक भावनाएॅं व्यक्त की । जिन्होंने अपने आपको अहिंसा में ढ़ाला । गाॅंधीजी प्रार्थना को बल देते थे । उन्हें प्रार्थना बहुत अच्छी लगती थी । चाहे कितने ही जरूरी कार्य हो वे प्रार्थना अवश्य करते थे । उनकी प्रार्थना में एक बल था जो भारत की आजादी के लिए उपयुक्त रहा । उन्होंने कहा था यदि में प्रार्थना नहीं करूॅंगा तो देश की समस्या को कैसे हल करूॅंगा । प्रार्थना मेरी आत्मा का भोजन है । बड़ी से बड़ी समस्या का समाधान वे प्रार्थना के द्वारा करते थे । प्रार्थना विराट, असीम अस्तित्व के आगे झुक जाना है । 

गाॅंधीजी समय का मूल्य समझते थे । वे एक-एक मिनिट का हिसाब रखते थे । एक बार कोई अंग्रेज व्यक्ति आपसे मिलने आया और उसने वार्तालाप करने की भावना व्यक्त की । गाॅंधीजी ने अपने आवश्यक कार्य करते हुए उसके साथ वार्तालाप किया । गाॅंधीजी का जीवन शुद्ध, सात्विक एवं सदाचार का जीवन था । गाॅंधीजी सत्य, प्रार्थना, शाकाहार, राजनीति में धर्म को महत्व देते थे । 

लाल बहादुर शास्त्रीजी विश्व में एक कहावत प्रसिद्ध है ‘मूर्ति छोटी परन्तु कीर्ति बड़ी’ । इस कहावत के अनुसार ही लाल बहादुर शास्त्री का जीवन था । आपका कद छोटा होते हुए भी आपने अनेक ऊॅंचाईयों को प्राप्त किया । एक बार शास्त्रीजी किसी दौरे पर जा रहे थे । पत्नी के लिए साड़ी खरीदनी थी । एक दुकान मे ंवे साड़ी खरीदने हेतु में गये और दुकानदार से खादी की साड़ी खरीदकर अपनी पत्नी को दी । ऐसा प्रधानमंत्री जिसके पास गाड़ी नहीं थी । पत्नी को देने के लिए साड़ी नहीं थी । बेटे के लिए नौकरी नहीं थी । बहुत ही ईमानदार व्यक्तित्व के धनी थे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री । भारत में उन्होंने ‘जय जवान जय किसान’ का नारा दिया और भारत ने इस नारे के साथ एक बार फिर हरियाली का उद्गम हुआ । 

आज तपस्विनी महासती श्री अचला जी म0 के 41 उपवास की दीर्घ तपस्या के उपलक्ष में तप अभिनन्दन समारोह का आयोजन किया है । आज हम तप के गुणगान करें । मैंने देखा कि इनकी दीर्घ तपस्या अपने आपमें मिशाल है । 41 व्रत करते हुए भी इन्होंने शान्ति, समता बनाये रखी । शारीरिक स्वस्थता न होते हुए भी ये तप जप में हमेशा लीन रहे । मैं आज श्रमण संघ की ओर से इन्हें  ‘तप चन्द्रिका’ की उपाधि से अलंकृत करता हूॅं । आप सभी तप अनुमोदना करते हुए तप और जप में अपने जीवन को लगायें ।

विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के अन्तर्गत 

आत्म ध्यान प्रभावना

श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज के निर्देशन में विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के अन्तर्गत जिनशासन की प्रभावना हेतु ग्यारह सूत्रीय कार्यक्रम प्रदान किया गया जिसके अन्तर्गत मानव मात्र को आत्म शुद्धि, आनंद, शान्ति, सुख से जीने की कला, सर्वधर्म समभाव के माध्यम से राष्ट्रीय उत्थान हेतु मालेर कोटला के अन्तर्गत निम्न कार्यक्रम आयोजित किए गए । 

आत्म प्राणायाम ध्यान साधना शिविर:-

जैन स्थानक, मोती बाजार, मालेर कोटला में विविध साधना शिविरों का आयोजन हुआ जिसके अन्तर्गत अनेक भाई बहिनों ने व्यसनों से मुक्ति प्राप्त की । अपने जीवन को शाकाहार-युक्त बनाया । धर्म के शुद्ध स्वरूप को समझकर धार्मिक समन्वय की भावना शाकाहार हुई । राष्ट्रीय एकता एवं सुरक्षा के लिए उन सभी को जिम्मेदारी का अहसास कराया गया । सामाजिक कुरीतियों के उन्मूलन हेतु उन्हें शुद्ध धर्म एवं जीवन जीने की कला सिखाई गई । इस प्रकार के आचार्यश्रीजी के निर्देशन में अभी तक पाॅंच शिविरों का आयोजन हो चुका है जिसमें करीब 250 से 300 भाई बहिनों ने यह सब व्यवहारिक ज्ञान प्राप्त किया और अपने जीवन को आदर्शरूप में स्थापित किया । इस प्रकार के साधना शिविर स्थानीय संघों में और काॅलेजों के अन्तर्गत भी लगाये जा रहे हैं । जिससे जिनशासन की महिमा और गरिमा में अभिवृद्धि हो रही है । 

आत्म मौन ध्यान साधना शिविर:-

इसी प्रकार पाॅंच मौन ध्यान साधना शिविरों का भी आयोजन मालेर कोटला में आचार्यश्रीजी के निर्देशन में हो चुका है जिसमें स्थानकवासी, तेरापंथी, मूर्तिपूजक, हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख आदि सभी धर्मों के धर्मावलम्बी इन साधना शिविरों मंें भाग ले रहे हैं । धर्म सम्प्रदाय से ऊपर उठकर ये सभी लोग मानवीय मूल्यों का मूल्याॅंकन करते हुए परस्पर सहयोग, सेवा और साधना कर लाभ ले रहे हैं । इससे पूरे क्षेत्र में एक अपूर्व सत्संग का वातावरण बना हुआ है । हर व्यक्ति आचार्यश्रीजी के द्वारा प्रेरित साधना शिविरों की प्रशंसा करता रहता है और अन्य लोगों को प्रेरणा देकर साधना शिविरांें में भेज रहा है । 

आत्म समाधि ध्यान शिविर:-

आचार्यश्रीजी के आशीवा्रद से मंत्र द्वारा समाधि में किस प्रकार प्रवेश किया जा सकता है । इस साधना का प्रशिक्षण आचार्यश्रीजी ने स्वयं साधकों को करवाया । यह त्रिदिवसीय दो-दो घण्टे का साधना शिविर है जिसमें पुराने साधकों को समाधि ध्यान का प्रशिक्षण दिया गया । जिसमें करीब 50 के आस पास साधकों ने भाग लिया । इसके अन्तर्गत करीब दस साधु साध्वीवृंद ने भी भाग लिया । 

सामाजिक कुरीतियों के उन्मूलन के अन्तर्गत जेल में साधना शिविर:-

इसी प्रकार आचार्यश्रीजी के आशीर्वाद से मालेर कोटला जेल, बरनाला जेल में भी कैदियों के लिए ध्यान साधना शिविरों का आयोजन हुआ । उनके जीवन का दृष्टिकोण बदला । उनकी अपराध भावना कम हुई और वहाॅं के जेलर ने अपने अनुभव बताते हुए कहा कि- अगर ऐसे शिविर समाज में लगते रहे तो जेल में आने वाले अपराधियों की संख्या निश्चित रूप से कम होगी और अन्दर बैठे हुए कैदियों को ऐसा शिक्षण मिलता रहा तो भविष्य में ऐसे अपराध नहीं करेंगे । अनेक कैदियों ने शाकाहारी रहने का नियम लिया और भविष्य में अपराध न करने का संकल्प लिया । 

शाकाहार के प्रचार हेतु विद्यालयों में साधना शिविर

विद्यालयों में साधना: आचार्यश्रीजी की प्रेरणा से एस0 एस0 जैन माॅडल स्कूल के करीब 600 विद्यार्थियों को नैतिक संस्कार एवं धर्म के शु़द्ध स्वरूप की शिक्षा, राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी, परिवार, समाज में एक दूसरे के सहयोग की भावना, हमेशा आनंद और सुख मे ंजीने की कला, तनाव-मुक्त होकर विद्या का अध्ययन किस प्रकार करना आदि शिक्षा के सूत्र साधना शिविर के माध्यम से स्कूल के बालकों को दिया गया, जिसका पूरे स्कूल में बहुत ही सुन्दर वातावरण निर्मित हुआ । इस विद्यालय में साठ प्रतिशत मुस्लिम बच्चे थे उन्होंने भी ‘नवकार मंत्र’ का शुद्ध स्वरूप समझकर सामूहिक रूप से आराधना की । 

सामाजिक कुरीतियों के उन्मूलन एवं व्यसन मुक्ति अभियान के अन्तर्गत काॅलेज में साधना शिविर:-

आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज के आशीर्वाद से स्थानीय के0 एम0 आर0 डी0 जैन गल्र्स काॅलेज, मालेर कोटला में साधना शिविर का आयोजन किया जिसमें बी0ए0 फाईनल की पचास बालिकाओं को आत्म साधना का प्रशिक्षण दिया गया, जिसके अन्तर्गत ‘विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान’ के साकार रूप देखकर हृदय प्रसन्न हुआ । बालिकाओं ने अपने जीवन में प्रथम बार इस ज्ञान का साक्षात्कार किया । उन्होंने जीवन में जिम्मेदारी का अहसास करते हुए हर क्षण को कैसे स्वीकार करना हर कार्य को सौ प्रतिशत किस तरीके से किया जा सकता है और सात्विक आहार का क्या लाभ है आदि ज्ञान प्राप्त किया ।

अनुभव एवं वक्तव्य:-

काॅलेज की बालिका अनु गोपाल मोहन कहती है कि- हमें शिविर से बड़ा आनंद मिला और इसमें आपने कई ज्ञान की बातें बताई जिससे कि आपने हमारी आॅंखों खोल दी । हमें लीडर की तरह कैसे जीना यह सिखाया । प्राणायाम करने से मेरा सारा शरीर हल्का फुलका हो गया । मन को अजीब सी शान्ति महसूस हो गई । हम आपके जीवन भर आभारी रहेंगे ।

संगीता जासवानी कहती है कि- यहाॅं मेरे मन को एक प्रकार की शान्ति और आनंद मिला । यहाॅं पर बहुत सारी शिक्षाएॅं मिली, जो हमें अन्य जगह नहीं मिल सकती थी । इस शिविर से पता चला कि आपस में कैसे प्रेमपूर्वक रहना । कैसे बड़़ों का आदर करना । भोजन के जो ण अवगुण है वो सीखे । हमारी बाॅडी के जो मूल तत्व है उनके बारे में ज्ञान मिला । हमारे भीतर ही भगवान है उन्हें कैसे पाया जा सकता है, इसका तरीका हमें मिला । ये पाॅंच दिन का शिविर में अपने जिन्दगी भर याद रखूॅंगी और जब भी मौका लगा पुनः शिविर लगाऊॅंगी । 

अमरजीत कौर लेक्चरर ने कहा कि- ये शिविर काफी ज्ञानवर्द्धक है और हमने अनुभव किया कि हम पहले से काफी अच्छे ढंग से जीवन जी सकते हैं । आपके बताये हुए सात्विक भोजन को अच्छे ढंग से निर्मित करेंगे तो मैं विकारों से मुक्त हो सकूॅंगी । मन को काफी शान्ति मिली । एज ए लीडर जीवन जीने से आत्म-विश्वास बढ़ता है । आपके द्वारा दी हुई अमूल्य शिक्षा के लिए मैं हार्दिक आभारी हूॅं ।

डाॅ0 बलजीत कौर संस्कृत लेक्चरर कहती है- 29 सितम्बर, 2003 को काॅलेज में दो-दो घण्टे का प्राणायाम शिविर प्रारंभ हुआ । विद्यार्थियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया । प्रत्येक कक्षा की इच्छा थी कि पहले हमारा शिविर लगाया जाये लेकिन अन्तिम वर्ष होने के कारण बी0ए0 तृतीय वर्ष की छात्राओं को सर्वप्रथम प्रवेश दिया गया । जिस दिन शिविर का प्रथम दिवस था सभी का उत्साह देखते ही बनता था । गुणों की निधि महाराजश्रीजी ने बाद में भी उत्साह वैसे ही बनाये रखा । प्रतिदिन सभी में नया सीखने का उत्साह और ही होता था । आज अन्तिम दिन मन को टीस सी हो रही है कि यह शिविर समाप्त ही होने आ गया लेकिन दूसरी ओर जो ज्ञान अर्जित किया उससे मन आनंदित हुआ । श्वांस, प्राणायाम, ध्यान और जो विशेष ज्ञान प्राप्त हुआ वह हमारे जीवन-भर उपयोगी होगा और सभी बालिकाओं के लिए यह ज्ञान एक प्रकाश-स्तंभ का कार्य करेगा और हम इस ज्ञान में हमेशा जीने के लिए संकल्प-बद्ध है ।

इस प्रकार पूरे काॅलेज के विद्यार्थियों के लिए आचार्यश्रीजी के आशीर्वाद से श्रमण संघीय मंत्री श्री शिरीष मुनि जी महाराज शिविर करवा रहे हैं । इसके पूर्व साधक श्री शैलेश कुमार जी द्वारा त्रिदिवसीय मौन ध्यान साधना शिविर लगाये गये और बरनाला जेल में भी उन्हीं के द्वारा शिविर का आयोजन हुआ । 

अम्बाला केन्ट में विदुषी महासती श्री अजय कुमारी जी म0 की शिष्या महासती श्री शिवाजी महाराज की प्रेरणा से पंचदिवसीय प्राणायाम साधना शिविर और आत्म मौन ध्यान साधना शिविर का आयोजन हुआ । दोनों शिविरों में 100 से अधिक भाई बहिनों ने भाग लेकर अपने जीवन में गौरव का स्थान प्राप्त किया । आगे भी इस प्रकार के समय समय पर साधना शिविरों का आयोजन आचार्य भगवंत के आशीवा्रद से चल रहे हैं और आगे चलते रहेंगे । 

स्वाध्याय शिविर:-

स्वाध्याय बन्धु एवं जैन धर्म के प्रशिक्षण हेतु दिनाॅंक 1 से 5 नवम्बर, 2003 तक आचार्यश्रीजी के सान्निध्य में एक स्वाध्याय शिविर का आयोजन किया जा रहा है । 

आत्म गम्भीर साधना शिविर:-

10 से 17 नवम्बर, 2003 तक सप्त दिवसीय ध्यान साधना शिविर का आयोजन हो रहा है जिसमें गम्भीर एवं योग्य साधकों को विशिष्ट साधना एवं प्रचार का प्रशिक्षण भी प्रदान किया जाएगा । यह शिविर केवल पुराने साधकों के लिए रहेगा ।

                                                              { प्रमोद जैन }

                                                                  मंत्री

                                                  एस0 एस0 जैन सभा, मालेर कोटला {पंजाब}

जीवन को जागरण में लगाओ: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेर कोटला 4 अक्टूबर, 2003: आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने फरमाया कि- मनुष्य का मन शान्त, आॅंखे खुली, मन की चाहत, हृदय का कुछ करना और भीतर से खाली होना आवश्यक है । परमात्मा भीतर से पुकारता है । वर्षा सब पर समान होती है । पहाड़ और समतल जगह पर भी एक साथ वर्षा होती है, परन्तु पहाड़ खाली रह जाते हैं और झीलें भर जाती है । आकाश, प्रकृति, बादल अन्याय नहीं करते । मनुष्य ने ही प्राकृतिक सम्पदा को नष्ट किया है एतदर्थ प्रकृति उचित दण्ड देती है । वृक्ष, पशु, पक्षी, पहाड़, जल, वायु आदि न होते तो मनुष्य का जीवन व्यर्थ ही हो जाता । संगमरमर के महल काम नहीं आते । जीवन जीने के लिए तो प्रकृति अत्यधिक सहायक है । मन को साधने का प्रयास करो । ध्यान लगाने का प्रयास करो । जीवन बदलता है, बदलने वाला चाहिए । भीतर इच्छा होनी   चाहिए । ध्यान, सत्संग जीवन में आमूल चूल परिवर्तन लाते हैं । जहाॅं एक है वहाॅं शन्ति है, सुख है, जहाॅं अनेक है वहाॅं विरोध, तनाव, संघर्ष है । जहाॅं मन होता है वहाॅं दुविधा उत्पन्न हो जाती है । आत्मा की कोई इच्छा नहीं होती, मन ही इच्छा उत्पन्न करता है । मैं परमात्मा कैसे बनूॅं । आत्मा की यही एक इच्छा है । जहाॅं इच्छाएॅं ज्यादा है वहाॅं दुःख भरा हुआ है । जहाॅं इच्छाएॅं कम है वहाॅ वहाॅं सुखशान्ति है । भीतर एक ही आवाज, पुकार, आकांशा होनी चाहिए मैं एक ही हूॅं । मैं शाश्वत् आत्मा हूॅं, यह भीतर भाव होना चाहिए । जब प्यास होती है तो पानी मिलता है । भीतर प्यास रखोगे तो धर्म-सूत्र अवश्य  मिलेंगे । छोटी से छोटी वस्तु भी प्रतिबोध देती है । प्रतिबोध लेने वाला चाहिए । एक कंगन से ही राजर्षि नमि ने प्रतिबोध प्राप्त किया । यह जीवन नश्वर है । यह तो मिटने ही वाला है । सदुपयोग कर लो । जीवन को जागरण में लगाओ । जागरण की किरण, प्यास, मन, हृदय, चेतना चाहिए । जागृति अपने आप आती है । परमात्मा, धर्म खरीदा नहीं जा सकता, उसे तो प्राप्त ही किया जा सकता है ।

आज आचार्यश्रीजी के दर्शनार्थ पंजाब हाई कोर्ट के जज श्री एम0 एम0 कुमार आदि उपस्थित  हुए । आचार्यश्रीजी के दर्शन लाभ प्राप्त कर उन्होंने धन्यता का अनुभव किया । 

कल के0एम0 आर0डी0 गल्र्स काॅलेज, मालेर कोटला में पंचदिवसीय आत्म प्राणायाम ध्यान शिविर सम्पन्न हुआ, जिसमें बी0ए0 फाईनल की बालिकाओं ने भाग लेकर अपने जीवन की कुंजी प्राप्त की । ध्यान साधना से उनके भीतर आमूल-चूल परिवर्तन आया । कल दशहरा है । दशहरे के पावन अवसर पर आचार्यश्रीजी अपनी मंगलमयी-वाणी फरमायेगें एवं नौ दिवसीय मौन की पूर्णाहुति होगी । भाई बहिन सत्संग का लाभ लेकर जीवन को उज्ज्वल बनायें ।        

विजयादशमी पर हम सेवा का संकल्प लें: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेर कोटला 5 अक्टूबर, 2003: आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने फरमाया कि- 

मन लागो मेरो यार फकीरी में, जो सुख पायो राम भजन में, वो सख नाहीं अमीरी में........

कबीर की अन्र्तध्वनि की पुकार है कि जो सुख राम भजन में है वह अमीरी में नहीं मिल सकता । कबीर एक जुलाहे थे । चादर बुनने का काम किया करते थे और बुनी हुई चादर को बाजार में बेचते समय वे यही कहते थे कि राम की चादर, राम ने ही बनाई, राम ही देने वाला और राम ही लेने वाला है । खूब जतन से चादर बनाई है । दुनियाॅं में जो कुछ भला बुरा है वह सब सुन लो और ऋजुता में आ जाओ । श्रद्धा और सबूरी दो चीजें जीवन में आना परमावश्यक है । सबूरी मतलब जो मिल गया उसमें सुखी रहो । सब्र करो, श्रद्धा रखो । 

आज का यह पावन दिवस विजया दशमी का दिवस । आज विजय पर्व है । यह पर्व अन्धकार से प्रकाश की ओर ले जाता है । मृत्यु से अमृत की ओर, युद्ध से शान्ति की ओर ले जाता है । रामायण का ही प्रतिरूप रामलीला यहाॅं हर वर्ष देखी जाती है । कहानी छोटी है परन्तु सारपूर्ण है । राम का चलना, बात करना उत्कृष्ट है । अभिनय मानव को श्रेष्ठ बनाता है । अभिनय में ही आदर प्राप्त होता है । रामायण में प्रमुख पात्रों के रूप में राम, लक्षमण और सीता माने गये हैं । यह रामायण अयोध्या में हुआ था जहाॅं पर रामराज्य स्थापित था । अयोध्या शब्द ही युद्ध न करना बताता है । राजा दशरथ जैसे धर्मपिता उस नगरी में विद्धमान थे । दशरथ की पाॅंच ज्ञानेन्द्रियाॅं एवं पाॅंच कर्मइन्द्रियाॅं हमेशा धर्म में रत रहती थी । रामायण एक प्रतीक और साक्षी देता है कि व्यक्ति के साथ धर्म नहीं है तो वह गिर जाता है । धर्म ही जीवन को ऊॅंचा उठाता है । आज के विजय पर्व पर हम संकल्प करें सेवा का । 

आज उत्तर भारतीय प्रवर्तक एवं मेरे दीक्षा दाता भण्डारी श्री पद्मचंद जी म0 का जन्म दिन है । आपने सोलह वर्ष तक उत्तर भारत का प्रवर्तक पद सॅंभाला और उत्तर भारत में धर्म की प्रभावना की । भण्डारी जी महाराज के भीतर स्कूल, काॅलेज और स्थानक बनाने की अटूट इच्छा रही है और उसे समय समय पर पूर्ण भी किया गया । आप आगम रसिक थे । आपकी प्रेरणा से वाणी भूषण उत्तर भारतीय प्रवर्तक श्री अमर मुनि जी महाराज आगम कार्य भी कर रहे हैं । 

दशहरे के पावन अवसर पर एवं भण्डारी श्री पद्मचंद जी महाराज के जन्म दिवस के अवसर पर विश्वविद्यालय, विद्यालय एवं शोधपीठों को 21 शास्त्रों एवं पुस्तकों के सेट फ्री भेजे जाएंगे जिससे विद्यार्थी शोध कर जैन धर्म की प्रभावना करेंगे । इस पावन अवसर पर मोती बाजार में गुरू भक्तों की तरफ से लंगर का आयोजन भी हुआ । 

भाव सहित एक नवकार मंत्र की आराधना करोड़ों जप के समान है 

 जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेर कोटला 6 अक्टूबर, 2003: आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- अरिहंत की वाणी, सिद्ध का स्मरण, साधु का संग, सत्गुरू का संग हमारे जीवन का कायाकल्प कर देता है । इनका आचरण करने से हमें परम् सुख, परम शान्ति, सौभाग्य, समृद्धि की प्राप्ति होती है । प्रभु महावीर की परम कल्याणकारी-वाणी जन जन को शिवत्व की ओर ले जाती है । उनकी वाणी का एक शब्द भीतर उतरता है तो जीवन की दिशा मोड़ देता है । नवकार मंत्र एक प्रभावशाली मंत्र है, जिसमें नमन का भाव आता है । जब तक नमन का भाव भीतर नहीं आएगा तब तक जीवन का कायाकल्प नहीं हो सकता । करोड़ जप कर लो और भाव सहित एक नवकार मंत्र का जप करो, दोनों का फल एक समान होगा । आपके खून का कतरा-कतरा, शरीर का अंग-अंग उस जप में डूब जाये, भीतर भाव में तल्लीन हो जाये । 

अरिहंत शब्द बड़ा विलक्षण और गहरा शब्द है । अरिहंत शब्द सुनने मात्र से ही भीतर रूपान्तरण होता है । आपको नवकार मंत्र जपते हुए यह अनुभव होता होगा कि हम एक तो नहीं अपितु अनेक को नमस्कार कर रहे हैं । पहले जन्म में जो तुमने पुण्य पाथेय इकट्ठा किया था, उसी का फल है तुम्हारा यह भव । जो तुम इस भव में पुण्य का कार्य करोगे वह अगले भव की पुण्य संपदा होगी । सम्पदा को बनाये रखो, उसमें वृद्धि करो । दान, पुण्य  करो । अपनी कमाई का कुछ हिस्सा गरीबों के लिए दो । मूक प्राणियों की रखा करो । 

मनुष्य का स्वतंत्र होना ही सबसे बड़ी बात है । स्वतंत्र बाहर से नहीं भीतर से हो जाओ । जब तुम भीतर से स्वतंत्र होगे तो परमात्मा की प्यास जगेगी । दरवाजा खटखटाओगे, द्वार खुलेगें और परमात्मा मिलेगा । परमात्मा कहीं आकाश, सितारों में नहीं है, वह तो तुम्हारे भीतर विद्यमान है ।तुम्हारी दृष्टि वैसी होनी चाहिए । परमात्मा का वास हर जगह है । धर्म, अध्यात्म, साधना का अपूर्व बल है । साधना के बल से ही हम सिद्धत्व की ओर जा सकते हैं । साधना करो । स्वाध्याय करो । सत्कर्म करो । साधना से मंगल होता   है । जप तप में डूब जाओ ।      

सुखी होने का राजमार्ग है, ज्ञान: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेर कोटला 7 अक्टूबर, 2003: आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- प्रभु महावीर की वाणी का सार यह है कि प्रथम ज्ञानाचरण और फिर दया करनी चाहिए । प्रभु महावीर ने फरमाया कि- एकान्त सुखी होने का राजमार्ग है, ज्ञान । ज्ञान सब ओर से प्रकाशमान होता है । भीतर आत्म-ज्ञान उत्पन्न होता  है । दर्शन अज्ञान मोह को उत्पन्न करता है । जब तक राग द्वेष जीवन में है तब तक जीवन दुःखी होता है । 

अरिहंत भगवान ब्रह्माण्ड को प्रकाशित करने वाले होते है। वे सूर्य, दीपक या बिजली से प्रकाशित नहीं करते अपितु वे ज्ञान-रूपी प्रकाश से तीनों लोक को प्रकाशमान कर देते   हैं । धर्म के साथ चलो, बाकी सब जगह स्वार्थ बॅंधा हुआ है । धर्म ही निःस्वार्थ है । जब स्वार्थ भीतर आता है तब मोह उत्पन्न होता है । भक्ति ऐसी करो कि वह धर्म की ओर ले जाये । बेटे, पत्नी, परिवारजन का प्यार संसार की ओर ले जाये तो वह सच्चा प्यार नहीं कहा जा सकता । सच्ची भक्ति, सच्चा प्यार जीवन भर साथ देता है । सच्चा संत वही होता है जो सबके प्रति मैत्री-भाव रखता है परन्तु मित्र नहीं बनाता । वायु की तरह साधु को निःसंग रहना चाहिए । जहाॅं कहीं अटकाव आ जाता है वहाॅं जीवन खटकने लगता है । कबीर जी ने भी कहा है कि- दो पाॅंटन के बीच में आज तक कोई भी साबूत बचा नहीं है । 

जीवन में भूल होना महत्वपूर्ण नहीं है परन्तु भूल के प्रति प्रायिश्चत, आलोचना, प्रतिक्रमण करना बहुत बड़ी बात है । किसी के जीवन में मत उलझो । अपने जीवन को सॅंवारों, अपने जीवन रूपी गाड़ी की सर्विस करो । आत्म-साधना करो । आत्म-ज्ञानी बनो । यह जिन्दगी एक नाटक के समान है । थोड़ा सा दुःख दूर करने की हम सोचते हैं तो हम ओर दुःखी हो जाते हैं । मन की इच्छाएॅं कभी पूरी नहीं होती । धर्म की आराधना करो । मौन व ध्यान में आ जाओ । समर्पण करो, मार्ग मिल जाएगा । जीवन का लेखा जोखा, हिसाब किताब देखो । निज की गलती को सुधारो, जिन अपने आप मिल जाएंगें । 

सामायिक समता का द्वार है: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेर कोटला 8 अक्टूबर, 2003: आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- 

उतरा सागर में उसको कि मोती मिला ।

खोज जिसने भी की मैं उसी को मिला ।।

जीवन में मोती प्राप्त करना, माधुर्यता आनंद, शान्ति अगर पाना चाहते हो तो भीतर की गहराई में जाना होगा । समुद्र में मोती प्राप्त करने के लिए गहराई में जाना आवश्यक है । अगर हम ऊपर- 2 डुबकी लगाएंगें तो हमें केवल सीपियाॅं ही प्राप्त होगी । मोती प्राप्त करने के लिए तो डुबकी गहराई में ही लगानी होगी, तभी हमें सम्यक्त्व रूपी मोती प्राप्त होगा । तुम सामायिक, स्वाध्याय, ध्यान, पाठ, माला आदि करते हो एवं वर्षों से करते आ रहे हो । जब तक भीतर की डुबकी नहीं लगेगी तब तक उसका सही रस प्राप्त नहीं होगा । खाना खाया परन्तु पेट ना भरा, सामायिक की परन्तु समता ना आई यह बात हो नहीं सकती । शुद्ध सामायिक करने के अनन्तर समता आती है । सामायिक को ऐसी विधि से किया जाये जिससे भीतर समता का आगमन हो, वह विधि हमें गुरू-गम्य से हो । ध्यान, सामायिक, कायोत्सर्ग एक ही बात है । इन तीनों में समता ही दर्शायी गई है । 

आपने अपने जीवन में अनमोल हीरे को गॅंवाकर घास फूस ही इकट्ठा किया है । जिस समता को पाना था वह तो अलग बात रही । हम क्रियाओं में ज्यादा चले गये । जीवन को सॅंवारों, जीवन के छोटे-छोटे अनुभव हमें बहुत कुछ सिखाते हैं । अगर समता में आना है, जीवन को संवारना है तो अपने जीवन की दैनिक चर्या बनाओ । जिसमें कम से कम दो घण्टे स्वयं को दो । अपने लिए जीवन जीओ, जीवन की गहराई में उतरो, उसका अर्क ग्रहण   करो । 

संतत्व वहाॅं है जहाॅं प्रेम, प्यार मिल बैठकर बाॅंटा जाता है । अपने जीवन के संस्कारों को बदलो । उन्हें बदलने के लिए अभ्यास करो । अपने अस्तित्व को पहचानो । शरीर का महत्व नहीं है, चेतना का महत्व है । चेतना जितनी समता, शान्ति में आएगी उतना ही जीवन उज्ज्वल व निर्मल बनेगा । 

संत सत्य को स्वीकार करता है: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेर कोटला 9 अक्टूबर, 2003: आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- 

संत का सत्कार होना चाहिए, देव सा व्यवहार होना चाहिए । 

संत को पूजा न पूजो पंथ को, सत्य ही आधार होना चाहिए ।।

भारत की संस्कृति का संत सर्वोत्कृष्ट जीवन जीता है । वह सर्वोपरि है । संत का स्थान राजा, महाराज, चक्रवर्ती से भी ऊपर होता है । प्रभु महावीर को श्रमण नाम से पुकारा गया । आज भी उनके नाम के आगे श्रमण लगता है । श्रमण का अर्थ है जो श्रम करता है । भीतर का श्रम करता है । स्व पर कल्याण की भावना रखता है । संत वही है जो सत्य को स्वीकार करता है । एक रस्सी पर गाॅंठ लगी हुई है । गाॅंठ लगते ही वह उलझ जाती है ऐसे ही मनुष्य विचारों से उलझ जाता है । 

मन जो देखता है उसकी चाहना करता है । मन जब साधना की गहराई में नहीं जाता, उसकी सामायिक नहीं होती, जब तक वह भीतर डुबकी नहीं लगाता तब तक वह शान्ति को प्राप्त नहीं कर सकता । संत के मन में कोई गाॅंठ नहीं रहनी चाहिए । उसके हृदय में सत्य का आधार होना चाहिए । संतत्व प्राप्त होने पर पूरा विश्व ही संत का परिवार बन जाता है । जीवन में शान्ति, आनंद लाओ, भीतर की गाॅंठों को देखो और उसे सुलझाओ ।

21 वी सदी में जितनी सुविधाएॅं मानव के लिए प्राप्त हुई है उतनी ही परेशानियाॅं बढ़ती चली जा रही है । जीवन जैसा है उसे आनंदपूर्वक जीओ । जब हृदय में प्रेम होगा तो सहानुभूति का भाव उमड़ेगा । जब हृदय में ज्ञान होगा तब बुद्धि चलेगी और तर्क-वितर्क उत्पन्न हो जाएंगें । जहाॅं तर्क होंगे वहाॅं पीड़ा, दुःख, अशान्ति जरूर होगी । जहाॅं प्रेम होगा वहाॅं भक्ति होगी । रूखी सूखी रोटी प्रेम से खाते हो तो वह मिष्ठान बन जाता है । शबरी के झूठे बेर लक्ष्मण के लिए संजीवनी बूॅंटी बन गये थे । ज्ञान और तर्क से अहंकार उत्पन्न होता है । प्रेम में मोह तो है परन्तु वह भक्ति की ओर चला जाता है तो वह अरिहंत को प्राप्त होता है । अरिहंत को भजो, सिद्ध का स्मरण करो, साधु का संग करो, वे ही परमात्मा की ओर ले जाने वाले हैं ।  

साधक के जीवन में सिंह जैसा पराक्रम होना चाहिए

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेर कोटला 10 अक्टूबर, 2003: आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- जैन धर्म में साधु को मंगल, उत्तम व शरणदायक कहा गया है । जैन धर्म में साधु का विशिष्ट स्थान है । इसे श्रमण, मुनि, निर्गन्थ व अनगार भी कहा गया है । जो आत्म साधना के क्षेत्र में श्रम करे वह श्रमण कहलाता है । मुनि जो चिन्तन मनन करता है वह मुनि है । निग्रन्थ वह है जिसने सारी गाॅंठें खोल दी है । अनगार का अर्थ घर का त्यागी है अर्थात् मुनि अन्तरंग और बाह्य परिग्रह का त्यागी होकर संसार को मंगलमैत्री का संदेश देता है और विश्व को जीवन जीने का नया आयाम प्रदान करता है । 

संत का सत्कार होना चाहिए । उसके साथ देव सा व्यवहार होना चाहिए । संत देव तुल्य होना चाहिए । देव और दानव में क्या अन्तर है । देव देता है, दानव लेता है । मनुष्य देव भी है दानव भी है । जब मनुष्य सत्कर्म करता है, किसी पर उपकार करता है । जो दुःख सुख में सहयोग करता है वह मनुष्य देव है । संत भी मनुष्य   है । वह संसार से कम ग्रहण करता है और संसार को ज्यादा देता है । 

शास्त्रों में साधु के चैदह लक्षण बताये हैं, उसमें सिंह सा पराक्रमी, हाथी सा स्वाभिमानी, वृषभ सा भद्र, मृग सा सरल, पाॅंचवा पशु सा निरीह, वायु सा निसंग, सूर्य सा तेजस्वी, सागर सा गम्भीर, मेरू सा विशाल, चन्द्रमा सा शीतल, मणि सा कान्तिवान, प्रथ्वी सा सहिष्णु, सर्प सा अन्यत, आकाश सा निरालम्ब । जो इन गुणों से सम्पन्न हो, वही साधु मोक्षगामी बन सकता है । सिंह अकेला चलता है वो किसी का सहारा नहीं लेता बल्कि अपना सहारा स्वयं बनाता है । इसी प्रकार हाथी अपनी मस्त चाल आप चलता है । साधक के जीवन में सिंह जैसा पराक्रम होना चाहिए, जिस प्रकार जीवन हमारे तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव से भगवान महावीर तक ने जीया । उनकी साधना सिंहवृत्ति की थी । 

अगर आप किसी को फूल दोगे तो तुम्हें फूल मिलेगा । किसी को कांटा दोगे तो कांटा मिलेगा । पहाड़ की चोटी पर खड़े होकर जैसी भी ध्वनि बोलोगे वैसी ध्वनि सुनने को  मिलेगी । साधु का व्यवहार देवताओं जैसा होना चाहिए । तीर्थंकरों ने श्रमण धर्म पालन को महत्व दिया । श्रमण धर्म पालन करने के कारण ही वो तीर्थंकर कहलाएं । संत का आधार सत्य का होता है, पंथ का नहीं । विपरीत परिस्थितियों में भी संत एकदम शान्त रहता है । अगर आपके भीतर चिन्ता है, वेदन है, पीड़ा है तो समझो तुम संतत्व से दूर हो ।  

हमें सद्गुरू की शरण लेनी चाहिए: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेर कोटला 11 अक्टूबर, 2003: आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- सद्गुरू का सहारा, सद्गुरू का संग, सद्गुरू का सम्बल मिल जाये तो इससे बढ़कर व्यक्ति का ओर कोई सौभाग्य नहीं हो सकता । सद्गुरू का मिलना बहुत कठिन है । जैसे दुनियाॅं में लाखों करोड़ों हीरे, पत्थर है परन्तु कोहिनूर हीरा एक ही है । वैसे ही गुरू तो लाखांे मिल जाएंगें लेकिन सद्गुरू उनमें एक ही होगा । व्यक्ति जितनी चाहे गलतियाॅं कर ले सद्गुरू उसको माफ कर देते  हैं । उसका जीवन परिवर्तित कर देते हैं । 

सद्गुरू का सिमरन हो जाये सद्गुरू का नाम आपके होठों पर, कंठ पर आ जाये । सद्गुरू के नाम की प्रतीति हो । उठते- बैठते, खाते, पीते, चलते, सोते हर समय प्रभु का नाम ही आपके होठों पर हो । घर में हमेशा सद्गुरू का चित्र लगाओ । जिसको आप मानते हो, जिसका आप सिमरन करते हो जैसा भी चित्र लगाएंगें बच्चों के ऊपर उन्हीं संस्कारों की अमिट छाप पड़ेगी । माॅं बाप के हाथों में बड़ी शक्ति है, बच्चे के जीवन को बदल सकते हैं । 

महावीर का ज्ञान, ध्यान, तप, साधना कितनी ऊॅंची है । वृक्ष फलों फूलों से भरा होता है तो पक्षी अपने आप उसके ऊपर मण्डराते हैं, उसके ऊपर बैठते हैं । ऐसे ही तुम भी अपने को साधना, मैत्री, करूणा, ध्यान, सद्भावना से भरो । कोई सुकृत्य करो तो लोग भी आपके आस पास चक्कर लगाएंगे । कई बार बड़ों का उपदेश नहीं लगता, छोटों का लग जाता है । इतिहास साक्षी है कि गौतम का उपदेश व्यक्ति को लग गया था लेकिन प्रभु महावीर का नहीं लगा । तात्पर्य यह है कि अगर आपका बेटा आपकी बात को नहीं मानता तो यह जरूरी नहीं है कि वह इस जन्म के संस्कार होंगे । कोई बेटा बनकर, कोई गुरू बनकर, कोई शिष्य बनकर अपने कर्मों का भुगतान करता है । 

कर्मों की गति बड़ी विचित्र है, पता नहीं जीवन में कब पलटा खा जाये । संसार में कुछ भी नहीं है यह तो कर्मों की खेती है । हम जैसा बीज बोते हैं हमें वैसा ही फल मिलता है । केवल बीज का अन्तर है । पौधे को एक ही वातावरण में रखा जाता है । भूमि, खाद, पानी, मालिक तो वही होते हैं परन्तु हम मिर्च के बीज बोते हैं तो हमें मिर्च ही मिलती है, तम्बाकू के बीज बोते हैं तो तम्बाकू ही प्राप्त होती है ।  संसार का नाता भी कर्मों का ही है । यहाॅं पर जो सम्बन्ध स्थापित किये जाते है वैसे ही कर्म बनते हैं । हम जैसी चाह रखते हैं हमें वैसा ही मिलता है । अगर हम संसार की चाह करेंगे तो हमें संसार मिलेगा ही । परमात्मा की चाह है तो परमात्मा मिलेगा ही । मोक्ष की चाह है तो मोक्ष जरूर मिलेगा । अगर बीज नहीं डाला, चाहे भूमि में पानी, खाद देते रहो कुछ भी प्राप्त नहीं होगा । इसी प्रकार आपका किया हुआ कार्य धर्म ही साथ देने वाला है । हम अपने जीवन में सद्गुरू की शरण लेंगे तो हमारे जीवन का रूपान्तरण हो जाएगा । 

सच्चा साधु कौन ? जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेर कोटला 12 अक्टूबर, 2003: आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- करो प्यार सत्ग्ुरू से, जीवन सफल बना लो ।

   यह तन ना फिर मिलेगा, कुछ नाम धन कमा लो ।।

आज दुनियाॅं धन के पीछे भाग रही है । एक धन है भीतर का, एक धन है बाहर का । तुम क्या लेना चाहते हो यह तुम्हारे पर निर्भर है । सद्गुरू तुम्हें मिल जाये तो तुम्हें आनंद शान्ति मिल जाएगी । सद्गुरू कौन है ? जिसके भीतर सत्य है, मैत्री है, मंगल की कामना   है । वो ही सच्चा सद्गुरू है, साधु है । सच्चे साधु की परिभाषा करते हुए कहा गया है- लेना एक न देना दो, ऐसा नाम संत का हो। साधु एक परमात्मा का नाम लेता है । चाहे परमात्मा अरिहंत हो, बुद्ध हो, राम हो, वाहे गुरू हो, अल्लाह हो । सच्चा साधु न किसी को वर देता है और न ही किसी को अभिशाप देता है । 

अगर तुम्हारा पुण्य होगा तो तुम्हें अपने आप मिलेगा, बिन माॅंगे मिलेगा । जब तुम गुरू की स्तुति करते हो तो मन से अहंकार निकल जाता है । गुरू की कृपा आपके ऊपर बरसती है । जैसे मिश्री पानी में मिल जाती है, पानी की एक बूॅंद समुद्र में मिल जाती है, इसी प्रकार जब तुम गुरू का सम्मान, स्तुति करते हो तो सब कुछ अपने आप मिल जाता है । धर्म करोगे तो सद्गुरू अवश्य मिलेंगे । चाहे सद्गुरू तुम्हारे पास चलकर आये या तुम्हें सद्गुरू के पास जाना पड़े ।

अगर तुम्हारे भीतर मैत्री, ध्यान, प्रेम, भक्ति की भावना है तो सद्गुरू स्वयं ही खींचे चले आएंगें । बुलाने की भी जरूरत नहीं । भंवरा स्वयं फूल के पास पहुंॅचता है फूल नहीं जाता । बस जीवन में धर्म को, सत्य को अगीकार करो सद्गुरू की प्राप्ति स्वयं हो जाएगी । 

आज उपाध्याय प्रवर श्री पुष्कर मुनि जी महाराज की जन्म जयंती है । उपाध्यायश्रीजी ने अपने ज्ञान से श्रमण संघ को उज्ज्वल बनाया है । वे पुष्कर के समान पावन, पवित्र थे । उन्होंने साहित्यकार आचार्य सम्राट् पूज्य श्री देवेन्द्र मुनि जी महाराज जैसे रत्न को श्रमण संघ को प्रदान किया । आज हम उनके जन्म दिन पर यही प्रार्थना करते हैं कि वे जहाॅं भी विराजमान हो श्रमण संघ की उन्नति में हमें आशीर्वाद प्रदान करते रहे । 

साधु सूर्य की भाॅंति तेजस्विता प्रदान करें: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेर कोटला 13 अक्टूबर, 2003: आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि-

मेरे सत्गुरू दीनदयाल, काग से हंस बनाते हैं ।

मेरे सत्गुरू दीनदयाल, सोया भाग जगाते हैं ।।

सत्गुरू काग से हंस बनाते हैं । वे भक्ति का भण्डार भर देते हैं । मन का भ्रम मिटाकर सत्संग का अमृत पिलाते हैं । जब व्यक्ति सत्गुरू के पास चला जाता है तो वह निज में चला जाता है । सत्गुरू सत्संग देते हैं । सत्संग का मतलब अपनी दिव्यता का संग करना । मनुष्य भीतर सोया हुआ है, उसके भीतर अनंत शक्तियाॅं विद्यमान है, उसे यह पता नहीं है कि उन शक्तियांें को किस प्रकार जगाया जाये । उन शक्तियों को जगाने के लिए अनेक उपाय है । मानसरोवर पर हंस और बगुला दोनों ही निवास करते हैं । दोनों पक्षी है, दोनों का रंग सफेद है परन्तु दृष्टि में अन्तर है । बगुले की दृष्टि शुद्र पर होती है जबकि हंस की दृष्टि मोती पर होती है । हंस हमेशा मोती चुनता है । दोनों की दृष्टियों में अन्तर है । 

साधु के गुणों का वर्णन चल रहा था । साधु को वृषभ की भाॅंति भद्र, हाथी के समान स्वाभिमानी, सिंह सा पराक्रमी बताया गया है । वृषभ एक ऐसा प्राणी है जिसके ऊपर मानव जीवन अवलम्बित है । वृषभ न हो तो खेती नहीं होगी, खेती नहीं होगी तो अन्न प्राप्त नहीं होगा वृषभ जिस तरह भद्र है उसी तरह साधु को भद्र व्यवहार करना चाहिए, सरल होना चाहिए । साधु मृग की भाॅंति सरल होता है । मृग के नाभी में कस्तूरी होते हुए भी वह उसकी खोज में चारों दिशाओं में भटकता है ।  

साधु को अपमान और सम्मान दोनों में समभाव रखना चाहिए । उसे वायु की भाॅंति निसंग होना चाहिए । वायु सबके लिए समान है । सुगंध हो या दुर्गन्ध वायु में कोई भेदभाव नहीं है । वायु सेठ हो, साहुकार हो या गरीब हो हरेक क्षेत्र में अपना अस्तित्व लुटाती है, उसी तरह साधु भी सबके लिए समान रहे, वायु सबको प्राण और ऊर्जा देती है । साधु भी सबको निःसंग-भाव से रहे, मैत्री दे परन्तु संग ना   करें । साधु को सूर्य सा तेजस्वी भी कहा गया है । सूर्य का तेज ब्रह्माण्ड को आलौकित कर देता है । सूर्य सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को तेज प्रदान करता है । सूर्य के आगे सब फीका है, चाॅंद, तारे, नभमण्डल सब सूर्य से ही प्रकाशित है । सूरज जीवन में नई क्रान्ति लाता है, उसके निकलते ही विश्व के सारे कार्य प्रारंभ होते हैं । साध्ुा को सूर्य की भाॅंति प्रकाशनमान, तेजस्वी एवं उज्ज्वल होना चाहिए । साधु जहाॅं विद्यमान है, वहाॅं निर्मलता, प्रांजलता रहती है । वह चारों ओर तेजस्विता बिखेरता है । साधु साधना में उच्चता प्राप्त करता है । साधु को भीतर बाहर एक होना चाहिए । उसे बच्चे की भाॅंति सरल होना चाहिए । 

ध्यान हमें भक्ति की ओर ले जाता है: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेर कोटला 14 अक्टूबर, 2003: आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- मानव का मन जब श्रद्धा से तृप्त हो जाता है । इष्टदेव के प्रति समर्पित होता है । मन लक्ष्य की ओर अग्रसर होता है, चेतना परमात्मा के लिए आकुल होती है तब भीतर करूणा, मैत्री, आनंद, उल्लास भर जाता है । वह व्यक्ति संकटों से अथवा बाधाओं से डरता नहीं है । उसके लिए त्याग और भक्ति का मार्ग श्रेष्ठ मार्ग है । 

प्रभु महावीर ने भी अपनी मंगलमयवाणी में त्याग और भक्ति के मार्ग को श्रेष्ठ मार्ग बताया है । प्रभु महावीर का, बुद्ध का मार्ग त्याग का मार्ग है । मीरा, कृष्ण, दादू, रज्ज्क आदि का मार्ग भक्ति का मार्ग है । ध्यान भी आपको भक्ति की ओर ले जाता है । ध्यान, संकल्प, भक्ति, त्याग का मार्ग हमें श्रेष्ठता की ओर ले जाता है । यही मार्ग हमें समर्पण की ओर ले जाता है । भक्ति समर्पण से ही शुरू होती है । प्रभु महावीर का मार्ग संकल्प का मार्ग था । उन्होंने बताया कि यह चेतना अमर है और काया मरणशील है । 24 तीर्थंकरों का जीवन हमे यही संदेश देता है कि हम त्याग, भक्ति, समर्पण के मार्ग में जीयें ।

इस विश्व में हर चीज के दो पहलू है । सुख है तो दुख भी है । त्याग है तो राग भी है, जहाॅं आसक्ति है वहाॅं वैराग्य भी है, भक्ति है, समर्पण है, ध्यान है, चुनाव तुम्हारा है, तुम क्या ग्रहण करना चाहते हो । शरीर का मूल्य तभी है जब तुम्हारी चेतना, भीतर का हृदय साथ दे । भारत आध्यात्मिक सम्पदा से परिपूर्ण है । परन्तु हमने इस आध्यात्मिक सम्पदा का भलिभाॅंति उपयोग नहीं किया । इसीलिए हम इस जीवयोनी में भटक रहे हैं । मानव जीवन की कहानी केवल तीन शब्दों में ही सिमट जाती है । बचपन, बुढ़ापा, जवानी । बचपन खेल कूद में बीतता है । जवानी में कुछ कर दिखाने का जोश होता है और बुढ़ापा रोग-शोक में बीत जाता है । हम अपने चित्त को देखें । जीवन के जितने भी साल जिये हैं क्या हमें शान्ति प्राप्त हुई है ? क्या हमें समता, सजगता प्राप्त हुई है ? अगर यह प्राप्त नहीं हुई तो हम फिर से एक बार प्रयत्न करें और अपने चित्त की चेतना को समता, सामायिक में लगायें । जीवन का अमृत प्राप्त करें । इस अनमोल जीवन का मूल्य समझे ।

आचार्यश्रीजी के दर्शनार्थ श्रद्धालुओं का जन-समुदाय हर रोज की भाॅंति उमड़ रहा है । आज आचार्यश्रीजी के दर्शनार्थ उदयपुर, सूरत, आगरा, अहमदाबाद आदि कई स्थानों से भाई बहिन उपस्थित हुए और आचार्यश्रीजी से मार्गदर्शन प्राप्त किया । जैन दर्शन के विद्वान पुरूष आगरा निवासी श्री श्रीचंद जी सुराणा ‘सरस’ आज आचार्यश्रीजी के दर्शनार्थ उपस्थित हुए एवं मार्गदर्शन प्राप्त कर उन्होंने आचार्यश्रीजी को तीर्थंकर का प्रतिनिधि बताते हुए पवित्र आत्मा एवं अमृत पुरूष से सम्बोधित किया । 

भक्ति हमें जिनेश्वर रूप बनाती है: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेर कोटला 15 अक्टूबर, 2003: आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि-

प्रभु जी दया करो, मन में आन बसो ।

तुम बिन लागे सूना, खाली घट में प्रेम भरो ।

एक छोटी सी प्रार्थना अगर हम भावयुक्त होकर करते हैं तो क्या होता है ? निष्ठा, भक्ति, समर्पण भीतर से उत्पन्न होता है । प्रार्थना भावपूर्वक करनी चाहिए । निष्ठा, भक्ति जितनी होगी उतना ही हम जुड़ेगे । हमारे हृदय का नहीं संवेदना का मूल्य है, प्रार्थना का नहीं चित्त का मूल्य है । धर्म भी यही है, चित्त की अवस्था में आ जाओ । जितना तुम मिटोगे परमात्मा के करीब आ जाओगे । 

चातक से सीखो तड़फ-2 मर जाना ।

पतंग से सीखो निज अस्तित्व मिटाना ।।

चातक पक्षी स्वाति नक्षत्र में पूरी रात जागता है । केवल एक बूंद के लिए । वह तड़फता रहता है और मर जाता है । इसी प्रकार पतंग नाम का कीड़ा शम्मा के पास जाता है और प्रकाश पाने की लालसा से मिट जाता है । शम्मा जलती है । मक्खी और परवाना दोनों उसके पास जाते हैं । परवाना वहीं मिट जाता है और मक्खी वापिस लौटती है । परवाना भक्ति में इतना लीन हो जाता है कि वह अपना शरीर दे देता है । 

सच्चे प्रेमी वही कहलाते हैं जो परमात्मा के लिए इस शरीर का कोई मूल्य नहीं रखते । शरीर मिट जाये, मर जाये परन्तु परमात्मा मिले, यही भावना हमारी होनी चाहिए । धर्म भी हमें मिटने की कला सिखाता है । बीच मिटता है, मरता है तब उसके जीवन की शुरूआत होती है । बीज टूटता है और चमत्कार घटित होता है । वृक्ष बनता है और फल फूल से परिपूर्ण हो जाता है । एक बीज के मिटने से बसंत रूपी बहार आती है । हम भी मिटे । जीवन में बसंत की बहार आएगी । बीज अगर न टूटता तो यह संभव ही नहीं होता की बसंत की बहार आये । तुम मिटो, परमात्मा अपने आप प्राप्त हो जाएंगें । बाल्मिकी ने राम राम करते हुए राम को पा लिया । कुछ प्राप्त करना है तो पहले मिटना पड़ेगा । मिटो प्रभु अपने आप मिल जाएंगें । 

जब तुम सच्चे हृदय से पुकार करते हो तो सद्गुरू चले आते हैं । मीरा ने पुकारा श्रीकृष्ण चले आये । शबरी ने पुकारा राम चले आये । गहन भक्ति और समर्पण का भाव रखो । हनुमान की तरह समर्पित भाव से जीवन जीओ । हनुमान के लिए राम ही सब कुछ थे, हनुमान ने समर्पित होकर भक्ति   की । भक्ति आपको जिनेश्वर रूप बनाती है । गहन श्रद्धा, भक्ति, समर्पण, निष्ठा का भाव लाओ । प्रभु, परमात्मा अपने आप चले आएंगें । 

परमात्मा के बिना जीवन अधूरा है: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेर कोटला 16 अक्टूबर, 2003: आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- परमात्मा के बिना मानव अधूरा है । तृप्ति, आनंद, सौंदर्य, स्वभाव में रमण की बात कहना अलग है और उसे प्राप्त करना अलग बात है । इसे कैसे प्राप्त करोगे ? बिना परमात्मा के बहुत मिल जाये फिर भी वह कम है । परमात्मा मिल गया परन्तु कुछ नहीं मिला फिर भी बहुत कुछ मिल गया । व्यक्ति के जीवन मे ंधन, पद, प्रतिष्ठा, मान, सम्मान आदि है, परन्तु धर्म नहीं है तो सब फीका है । भूख न लगी हो और भोजन आगे रख दिया जाये तो अच्छा नहीं लगता । सूरज न निकला हो तो जीवन में उत्साह नहीं आता । रात्रि में चाॅंद न हो तो विश्राम नहीं होता । पूर्णिमा के चन्द्रमा की रात्रि कुछ ओर ही होती है । प्रकृति के आगे विश्व का कण-कण फीका है । 

परमात्मा तुम्हारे पास भी है और दूर भी है, नेत्र चाहिए देखने के लिए । तुम्हारी भक्ति एवं प्रेम रूपी आॅंख होनी चाहिए । परमात्मा हर जगह दिखाई देगा । वह हर कण-कण में विद्यमान है । इस ब्रह्माण्ड में दृश्य अदृश्य शक्तियाॅं बहुत काम करती है । वे इन चर्म चक्षुओं से नहीं देखे जा सकते । उन्हें देखने के लिए तो अलौकिक दिव्य नेत्र ही काम आ सकते हैं । भीतर की आॅंख हो तो परमात्मा प्राप्त होता है । बच्चे जैसी मासूमियत, भोलापन, सहजता, सरलता, निर्दोष आॅंखे पवित्रता भीतर लाओ, तभी परमात्मा प्राप्त हो सकते हैं । परमात्मा मन्दिर, मस्जिद, गुरूद्वारा में विद्यमान है भी और नहीं भी । देखने की आॅंख चाहिए । 

तू तू ना रहे, मैं मैं ना रहूॅं ।

हम राम ऐसे मिल जाये ।

पानी में मिले जो नमक डली ।

ऐसी भक्ति, निष्ठा, समर्पण भीतर लाओ । हम एक दूसरे में प्रभु की भक्ति में परमात्मा में ऐसे विलीन हो जाये जैसे पानी में नमक का मिलना होता है । नमक अपना अस्तित्व खोकर पानी में विलीन हो जाता है । भीतर की श्रद्धा, समर्पण का मूल्य है । मन की दशा एवं चित्त की दशा जब विचारों के साथ लगती है तब विचार बदलते चले जाते हैं । तुम विचारों में न लगकर परमात्मा में अपने आपको लगाओ । जो कार्य कर रहे हो वह पूरी निष्ठा के साथ करो । तुम जीओ, परमात्मा के लिए जीओ । भक्ति, श्रद्धा, निष्ठा रखकर जीओ । जीवन की हर घटना से सीख लो । हर जगह परमात्मा विद्यमान है । सूर्य की भाॅंति भीतर से खिलो । आनंदित, रोमांचित हो जाओ । जब तक हमें परमात्मा नहीं मिलेगा तब तक यह जीवन अधूरा है । परमात्मा को प्राप्त करने के लिए सरल उपाय भक्ति, समर्पण एवं ध्यान का है उसे अंगीकार करो, जीवन सफल बनेगा ।

ज्ञान तीसरा नेत्र है: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेर कोटला 17 अक्टूबर, 2003: आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- प्रभु महावीर ने ज्ञान को प्रथम स्थान दिया है । पहले ज्ञान फिर आचरण, क्रिया, अनुभव है । ज्ञान प्रथम है । ज्ञान भीतर आने पर ही आचरण होगा । वह क्रियान्वित होगा । उसके साथ साथ अनुभव भी आएंगें । ज्ञान के साथ किया गया अनुभव मुख्य है । विश्व के सभी महात्माओं का यही संकल्प है कि हम आत्म-ज्ञानी बने । आत्म-ज्ञानी तो बने पर कैसे बने ? बाह्य ज्ञानी अहंकारी होता है । उसमें अकड़ होती है । आत्म-ज्ञान से तृप्त है तो सारी सम्पदा आपके पास है । जो आत्म-ज्ञान से तृप्त है उसकी तुलना नहीं कर सकते । महावीर, बुद्ध, लाओत्से आत्मज्ञान से तृप्त थे । इनके आगे चक्रवर्ती का साम्राज्य, अनमोल खजाने फीके रह गये । 

ज्ञानी साधक धर्मात्मा ज्ञान को महत्व देता है । ज्ञान तीसरा नेत्र है । ज्ञान से विनय, नम्रता, मैत्री प्राप्त होती है । ज्ञानरूपी प्रकाश प्राप्त हो तो अॅंधकार समीप नहीं आ सकता । चन्द्रमा मन के समीप है । पूर्णमासी के दिन सागर में ऊॅंची लहरें उठती है, चन्द्रमा की  ओर खुद जाना चाहती है परन्तु वह वहाॅं तक नहीं पहुंॅच पाती । आत्म-ज्ञानी बने । ज्ञान का उद्भवन कहाॅं से हुआ है ? यह उद्भवन भीतर से ही हुआ है । ज्ञान बाहर से नहीं आता, भीतर से ही आता है । शील, तप, समाधि, ध्यान आदि का सौन्दर्य भीतर का सौन्दर्य है । बाहर का सौन्दर्य तो कुछ क्षण में मिट जाता है । 

ध्यान से भीतर की तेजस्विता आती है । बाहर का सुख बहुत बार मिला है । भीतर का सुख कभी कभी अनुभव किया होगा । निमित्त कोई भी बनें, मैं तो यही चाहूॅंगा कि आप सभी भीतर के सुख की ओर चले । हमारा चित्त एवं मन भीतर के सुख में लग जाए । आत्म-ज्ञानी का पढ़ना लिखना जरूरी नहीं है । रामकृष्ण, शारदा, कस्तूरबा, कबीर पढ़े लिखे नहीं थे । परन्तु जब तक आत्म-ज्ञान नहीं होता तब तक पढ़ो लिखो । संत रैदास जाति के चमार थे, मीरा राजघराने की होते हुए भी उसने संत रेदास को अपना गुरू बनाया था और गुरू से ज्ञान की गुटकी माॅंगी थी । ज्ञान का दीया भीतर जलाओ । जब व्यक्ति किसी चीज को ग्रहण करता है तो उसकी उपयोगिता को भी देखता है, इसलिए पहले ज्ञान भीतर लाओ । आचरण, क्रिया, अनुभव अपने आप भीतर आएंगें । भीतर के ज्ञान में रमण हो जाओ ।

आज संक्रान्ति के शुभ अवसर पर आचार्यश्रीजी ने सभी भक्तजनों को संक्रान्ति का पान कराया एवं सक्रमण की ओर जाने का आह्वान किया । संक्रमण काल में ध्यान जप तप अत्यन्त आवश्यक है । हम सभी साधना करें जप तप करें एवं संक्रमण-काल से अपने आपको संक्रमित करें ।

वर्तमान का चिन्तन करो: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेर कोटला 18 अक्टूबर, 2003: आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि - व्यक्ति जैसा चिन्तन करता है वैसा ही हो जाता है । संसार में दो प्रकार के व्यक्ति है एक वह है जिनका चिन्तन भोजन एवं शरीर के लिए चल रहा है । दूसरे वे व्यक्ति होते हैं जो चित्त की चेतना का चिन्तन करते हैं । बहुत थोड़े लोग हैं जो रहते शरीर में हैं चेतना भी शरीर में है परन्तु चेतना से ऊपर ऊठकर बात करते हैं, ऐसे व्यक्ति वर्तमान का ही चिन्तन करते हैं । लोग हमेशा भूत भविष्य का चिन्तन करते हैं । क्या हुआ था और कैसा होगा ? यही चिन्तन उनके मन में हमेशा चलता रहता है । वर्तमान का चिन्तन करो । सत्संग से वर्तमान का चिन्तन होता है ।

जिसको आत्म-ज्ञान हो जाए उसकी तुलना नहीं की जा सकती । एक व्यक्ति साधना के लिए भोजन करता है । भोजन को भी वह चित्त शुद्धि के लिए प्रयोग करता है । भोजन का अपने आपमें बहुत अच्छा स्वाद है । हम उसके ऊपर और स्वाद लगाकर खाते हैं, यह उचित नहीं है । रूखी सूखी रोटी अमृत तुल्य लगती है जब भूख हो । साधना करते समय भोजन को साधन रूप में उपयोग करो । साधु वह है जो आवश्यकता के अनुसार भोजन स्वभाव में रमण के लिए लेता है । बाह्य उपकरणों की अपेक्षा वह भीतर में उतरता है । उसका जीवन स्वतः के लिए होता है । वह दिव्यता का संग करता है ।

साधु  सिंह सा पराक्रमी, वृषभ सा भद्र और हाथी सा स्वाभिमानी होता है । हाथी अपनी चाल में चलता है वह स्वाभिमानी है । मृग सा सरल होना चाहिए साधु को । सरलता साधु का प्रथम लक्षण है । साधु का जीवन सरलता से, आत्म-चिन्तन से परिपूर्ण होता है । वायु सुगन्धदेती है । साधु महात्माॅं अध्यात्म ज्ञान देते हैं । संत को सूर्य सा तेजस्वी होना चाहिए । मेंरू सा निश्चल, अपनी साधना में, अपने मार्ग में उसे विचलित नहीं होना चाहिए । चन्द्रमा सा शीतल यह साधु का मुख्य लक्षण है । इस बात का उल्लेख लोगस्स के पाठ में भी आता है । हम चन्द्र की भाॅंति शीतल, निर्मल बनें ऐसे भाव भीतर लायें । भाव बहुत जरूरी है, जब भाव नहीं आएंगें तो वह क्रियान्वित कैसे होगा । जैसा चिन्तन करोगे वैसा फलीभूत होगा । भक्ति, ध्यान करो । भक्ति करते हुए भीतर में डूब जाओ । यह जीवन बहुत सुन्दर है इसमें धर्म साधना करो । यह परमावश्यक है ।

स्वयं को तपाना तप है: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेर कोटला 19 अक्टूबर, 2003: आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- प्रभु महावीर की वाणी का एक सूत्र धर्म मंगल है । कितने उपकारी है  तीर्थंकर-देव, एक सूत्र में धर्म का फल, जीवन का अमृत हमें दे दिया । तीर्थंकर वीतरागदेव की वाणी संजीवनी है, अमृत की बूॅंदें है । आनंद का सागर है । परम सुख की सम्पदा है । धर्म मंगल है, न्यूनतम धर्म है किसी को दुःख नहीं देना । अधिकतम धर्म है सबको सुख देना । कई बार अनुशासन हेतु डाॅंटना पड़ता है वह दुःख में नहीं आता । मंगल को मंगल समझो और मंगल के अनुसार चलो । जो तुम्हारे चित्त में आनंद, उल्साह, समृद्धि, सौभाग्य दे वह मंगल है । वही सबसे ऊॅंचा है । वह धर्म अहिंसा, संयम और तप रूप है । ये तीन बातें प्रभु ने बताई । प्रभु महावीर ने तप को सर्वोत्कृष्ट स्थान दिया है । भगवान आदिनाथ ने एक वर्ष तक अन्न जल नहीं लिया । प्रभु महावीर ने घोर तप किया । 

तप के बारह भेद है । भोजन को छोड़ने से भीतर निर्मलता आती है । अपने आपको तपाना ही तप है । तप हमारे पुराने कर्म को क्षय करता है । करोड़ों जन्मों के बन्धन तप से छूट जाते हैं । महावीर के कर्म 23 तीर्थंकरों से भारी थे । प्रभु महावीर ने कायोत्सर्ग, ध्यान, तप, मौन के द्वारा सब कर्म क्षय कर   दिये । प्रभु महावीर का एक अक्षर जीवन का रूपान्तरण कर देता है । हम सभी तप करते हैं परन्तु हमारा तप अज्ञान तप है । तप के साथ साथ उसकी विधि, उसका ज्ञान होना आवश्यक है । प्रभु पारणा करने जाते तो दिव्य वृष्टि होती थी । अनंत अनंत देव तीर्थंकरों की रक्षा करते हैं और उनके सहायक होते हैं ।

मालेर कोटला में भी दो बार चमत्कारिक घटनाएॅं हुई, 17 सितम्बर, 2003 की रात्रि को आचार्य सम्राट् पूज्य श्री आत्माराम जी महाराज की चैकी से अमृत वर्षा प्रारंभ हुई जो करीबन पन्द्रह घण्टे चली । 18 अक्टूबर, 2003 की रात्रि 9.00 बजे महासाध्वी श्री सुमित्रा जी महाराज की सुशिष्या तपस्विनी महासती डाॅ0 सुनीता जी महाराज के 98 वा उपवास था । रात्रि में वे जप एवं ध्यान में लीन थे । उस समय अचानक उनके कपड़े भीग गये । चारों तरफ केसर कीक सुगन्धि आई और आस पास केसर की वर्षा   हुई । इतना ही नहीं पास के एक घर में भी यह वर्षा चल रही है । महासती श्री सुनीता जी महाराज जिस आसन पर बैठते है वह आसन भी केसर से सुगन्धित हो गया है । अभी भी यह वर्षा चल रही है । यह अपने आप हो रहा है । महासतीजी ने कोई चाह न रखी थी । चाहना न रखो, चमत्कार अपने आप घटित होता है ।

तप करो, अनुमोदना करो, दृष्टि बदलो । तप नहीं कर सकते हो तो अनुमोदना करो । दान   करो । भूखों को खाना खिलाओ । गरीबों की सहायता करो । तप के साथ ध्यान, मौन, समता रखो । आडम्बर न करो । महासतीजी से तप की प्रेरणा लो । जैन मुनि को तपस्वी, ध्यानी होना चाहिए, सहनशील होना चाहिए । तप जीवन में मंगल लाता है । मंगल का वातावरण धर्म से, मैत्री से बनता है । दृष्टि को निर्मल रखो । अमृत ग्रहण करो, जहर का त्याग दो । सार ग्रहण करो निःस्सार को छोड़ दो ।

आज आचार्यश्रीजी के दर्शनार्थ चण्डीगढ़, लुधियाना, खन्ना, संगरूर, धूरी, उदयपुर आदि स्थानों से दर्शनार्थी बन्धु पहुंॅंचे । चण्डीगढ़ श्रीसंघ ने आचार्यश्रीजी को वर्ष 2004 के वर्षावास की भाव भरी विनती प्रस्तुत की । इससे पूर्व भी उदयपुर, इन्दौर आदि क्षेत्रों से वर्षावास हेतु विनति हुई । 

आनंद का सूत्र है समता: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेर कोटला 20 अक्टूबर, 2003: आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- 

गुरूदेव दया करो मुझ पर ।

मुझे अपनी शरण में रहने दो ।।

एक भक्ति का भाव, हार्दिकता का भाव, श्रद्धा, प्रतीती का भाव, धर्म का बोध होने पर अहंकार से मुक्ति होती है । आत्मा का परमात्मा से मिलन यह अनुभव है । जब कोई व्यक्ति गुरू के पास आता है, सत्संग करता है तब यह अनुभव होता है । चेतना का रस है भक्ति । भक्ति हमें समर्पण, साधना तक ले जाती है । अन्तर की निष्ठा भाव होन ेचाहिए । 

व्यक्ति प्रमुख नहीं उसके प्राण चित्त की चेतना प्रमुख है । आॅंखे प्रमुख नहीं, आॅंखों की ज्योति प्रमुख है । हम अपना समय व्यर्थ न गंवाए । प्रभु महावीर ने साढ़े बारह वर्ष की साधना में केवल अन्तमुहूर्त तक सोए । एक झपकी आई और दस स्वप्न प्रभु ने देखें । तुम जितनी साधना करोगे उतने ही निरोग होते चले जाओगे । साधना से विरोगता आती है । ज्यादा खाना और ज्यादा सोना बीमारी का घर है । महावीर का धर्म पुरूषार्थ का धर्म है । पुरूषार्थ करो, साधना करो कार्य अपने आप होता चला जाएगा । 

प्रत्येक वस्तु के दो पहलू है । सुख है तो दुःख है, धूप है तो छाॅंव है । दिन है तो रात है । प्रत्येक परिस्थिति में हम सभाव में जीए । मन, वचन, काया से संघ, समाज, इष्ट गुरू के चरणों में समर्पित हो जाएं । यही श्रेष्ठ धर्म है । अच्छा कार्य करो । तुलना मत करो । किसी का दुःख सुनो । उसकी आॅंखें के आॅंसु पोंछो । मदर टेरेसा ने जन जन के लिए कार्य किया वह विश्व प्रसिद्ध हो गई । वह हमेशा कम बोलती थी, कम बोलने में अधिक महत्व है । समता में रहना ही आनंद का सूत्र है । समता में रहो । दृष्टि बदलो । नवकार मंत्र का स्मरण करो । स्मरण के साथ-साथ अनुभव करें । मूक प्राणी एवं गरीबों के लिए सेवा करो ।  

सेवा मानव का भूषण है: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेर कोटला 21 अक्टूबर, 2003: आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- मानव के भीतर प्रभु, गुरू अपने इष्ट के प्रति श्रद्धा भक्ति समर्पण होना चाहिए । अगर उसके भीतर श्रद्धा भक्ति समर्पण आ गया तो उसको कुछ भी नहीं चाहिए । भक्त के हृदय में भक्ति का प्रवाह गतिमान है तो उसे बैकुण्ठ और कल्पवृक्ष की आवश्यकता नहीं है । उसे तो केवल ठूंठ वृक्ष भी हो और उसके नीचे बैठकर उसका मन प्रभु भक्ति में लग जाये तो उसे किसी भी चीज की आवश्यकता  नहीं । व्यक्ति के पास, धन, पद, प्रतिष्ठा, मान, सम्मान मिल जाये परन्तु उसके पास गुरू ही नहीं है तो उसे कुछ भी नहीं मिला है । 

दीया भले ही सोने का हो परन्तु उसके भीतर रोशनी प्रवाहमान नहीं होती तो वह किसी काम का नहीं । हमारे भीतर संघ गुरू आचार्य के प्रति समर्पण की भावना होनी चाहिए । प्रभु महावीर ने भी समर्पण, विनय की बात कही है । प्रभु महावीर ने विनय को मूल धर्म कहा है । उनकी अन्तिम वाणी में उन्होंने कहा है कि एक शिष्य को गुरू के पास कैसा व्यवहार करना चाहिए ? कैसे बैठना चाहिए आदि का सुन्दर विवेचन उसमें दिया गया है । अविनीत शिष्य को हर जगह पर अपमान सहन करना पड़ता है । परन्तु विनीत शिष्य हो तो उसके ऊपर गुरू प्रसन्न होते हैं और उसे श्रुत का लाभ देते  हैं । 

गुरू के प्रति समर्पण का भाव रखो । एक शिष्य गुरू की, बेटा बाप की, बहू सास की सेवा करते हुए उस परम पद् की प्राप्ति कर सकते हैं । अगर तुम तप, ध्यान, दान, शील आदि अंगीकार न कर सको और सेवा में रत रहो तो तुम्हें सब कुछ प्राप्त हो सकता है । जिसके पास तुम रहते हो उसे अपना बना  लो । प्रभु महावीर अनन्तज्ञानी, अनन्तदर्शी थे, उन्होंने संघ के लिए चतुर्विध संघ की स्थापना कर एक सुन्दर व्यवस्था सबको दी है । हम उसी की अनुपालना करते हुए एवं धर्म- प्रभावना करते हुए आगे बढ़े यही मेरी मंगल कामना है । 

दिनाॅंक 26 अक्टूबर, 2003 को आचार्यश्रीजी मौन साधना के पश्चात् विश्व के सभी प्राणियों के प्रति मंगलमैत्री करते हुए मंगलपाठ सुनाएंगें ।

जो धारण किया जाये वह धर्म है: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज 

मालेर कोटला 22 अक्टूबर, 2003: आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि-  धर्म मंगल है, उत्कृष्ट है । धर्म सबसे ऊॅंचा है । धर्म से ऊॅंचा कुछ भी नहीं है । जो आप ग्रहण, धारण करते हो वही धर्म करते हैं । कर्तव्य पालन में धर्म है । संसार में सब कुछ है पर जो निज-गुण है वह धारण करो । निज-गुण को धारणा करना ही धर्म है । पाप करना नहीं पड़ता, जाप हो जाता है । जिसका ध्यान करोगे वैसा ही हो जाएगा । हर व्यक्ति, वस्तु का अपना-अपना धर्म है । एक फूल है गुलाब का उसका धर्म है सुगन्ध देना, कोमलता, खिलना । इसी भाॅंति आपका ही अपना स्वभाव है, मूल तत्व को जानना देखना । साक्षी भाव, सुख, आनंद, मैत्री का विस्तार करना । सबके लिए मंगल कामना करना ।

धर्म जो धारण किया गया है । जो सबको धारे हुए है वह धर्म है । आकाश के नीचे सब कुछ है । आकाश का अनंत-अनंत विराट अस्तित्व है । आकाश सबको धारण करता है । जहाॅं सभी प्राणी इकट्ठे होकर रहते हैं एवं जिसने सबको बाॅंधा है वह परिवार कहलाता है । परिवार को संगठित रखना ही धर्म   है । धर्म का अर्थ है हमारे भीतर मैत्री मंगल सद्भावना, आएं । अगर इस विश्व में पशु, पक्षी, हवा, पानी, पौधे, अग्नि, आकाश न हो तो हमारा जीवन खतरे में आ जाये । धर्म जिसने सबको धारण किया है । हिन्दू धर्म में भी धर्म की व्याख्या करते हुए कहा है कि- किसी को मत मारो । 

जो भीतर धड़कन होती है । श्वांस आता है । अस्तित्व में जिसने सबको बाॅंधा है वही धर्म है । जब भीतर संघर्ष, तनाव, पीड़ा होती है तब भीतर धर्म नहीं होता । दूध से मलाई एवं पौषक तत्व निकाल लिये जाये तो वह दूध नहीं, केवल नाम रूप है । जो अपने लिए चाहते हो वह सबके लिए चाहो । आनंद, मंगल सबके लिए चाहो । उपकार से पुण्य होता है और पीड़ा से पाप होता है । सबके हित के लिए सोचना धर्म है और अहित सोचना धर्म नहीं है । भीतर से आनंदित हो जाओ । जैसा भीतर होगा वैसा ही बाहर होगा । 

आचार्य सम्राट् श्री शिवमुनि जी महाराज मौन साधना में संलग्न

26 अक्टूबर, 2003 को प्रातः 8.00 बजे मंगलपाठ

26 अक्टूबर, 2003 को प्रातः 8.00 बजे आचार्यदेव मौन साधना के पश्चात् विश्व के सभी प्राणियों के प्रति मंगल मैत्री करते हुए मंगलपाठ प्रदान करेंगे । आप सभी मंगल पाठ श्रवण कर अपने जीवन को उज्ज्वल बनायें । 

मानव का जीवन असीम शक्ति का स्रोत है: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेर कोटला 23 अक्टूबर, 2003:  श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- मानव का जीवन असीम शक्ति का स्रोत है । उसके भीतर अक्षय शक्ति का खजाना भरा हुआ है । उसके भीतर अलौकिक ऊर्जा है । वह चाहे जैसा उसका उपयोग कर सकता है । मान लो एक हजार रूपये आपके पास है । तुम जैसा चाहो वैसा उसका उपयोग कर सकते हो । चाहे होटल में जाओ । रोटी खाओ, दान दो । किसी तरह से तुम इसका उपयोग कर सकते हो । कोरी स्लेट तुम्हारे पास है । क्या लिखना है यह तुम्हारे ऊपर निर्भर करता है । चाहो तो किसी की स्तुति लिखो या फिर अन्य कार्यों में उसे प्रयोग करो । 

जीवन की धरातल को समझो । जीवन को समाधि में ले आओ । बाहर के जितने सम्बन्ध है उनसे हम अलग कैसे हो इसका चिन्तन करो । जैन धर्म में कैसे हमारी अन्तिम गति हो इस बारे में कहा है कि हम अन्तिम समय समाधि मरण संलेखना पूर्वक करें । यह निश्चित बात है कि एक दिन जाना जरूर पड़ेगा, परलोक की तैयारी करो, शरीर तो यही साथ रहने वाला है । जो तुमने पुण्य कमाया है वह परलोक तक जाएगा । मोक्ष में तो शुद्धात्मा ही जाएगी । 

भीतर से समझो । मैं अकेला हूॅं । सबमें रहते हुए भी अकेले रहो । ज्ञान, दर्शन से युक्त हो   जाओ । संयोग, वियोग तो होने ही वाला है । अन्तिम समय बाहरी संयोगों का तीन करण तीन योग से त्याग कर देना । भीतर समाधि मरण की भावना भाओ । सुखी व्यक्ति वही होता है जो थोड़े में गुजारा करता है । पूर्णिया श्रावक सुखी था । श्रेणिक राजा सुखी नहीं था । पूर्णिया श्रावक की कमाई निर्मल थी । पुर्णिया श्रावक की सामायिक शुद्ध थी । श्रेणिक का पूरा राज्य, राजमहल, स्वर्ण मुद्राएॅं चारों सेनाएॅं होते हुए भी वह सामायिक खरीद नहीं सका । बहुत थोड़े लोग है जो भीतर आचरण करते हैं । जो आचरण करते हैं वे ही अच्छे मानव कहे जाते हैं । सत्संग हमें आचरण की प्रेरणा देता है । मनुष्य अपने ध्येय से बहुत जल्दी भटक जाता है । मनुष्य का जीवन बड़ा अनूठा और अनमोल है । इस जीवन की अनमोलता को समझना यही श्रेयस्कर मार्ग है । 

श्रमण संघीय मंत्री श्री शिरीष मुनि जी महाराज ने उत्तराध्ययन सूत्र का सरल विवेचन करते हुए फरमाया कि प्रभु महावीर की अन्तिम-वाणी उत्तराध्ययन सूत्र का एक-एक सूत्र जीवन को रूपान्तरित कर देता है । उत्तराध्ययन सूत्र का स्वाध्याय गत तीन दिनों से प्रारंभ हुआ है जो दीपावली महा-पर्व तक चलेगा । आज के स्वाध्याय में मुनिश्री ने हरिकेशी मुनि का दृष्टान्त सुनाते हुए फरमाया कि व्यक्ति को कभी भी जाति, बल, रूप का मद नहीं करना चाहिए । हरिकेशीबल मुनि ने पूर्व भाव में जाति का मद किया था एतदर्थ उनको चाण्डाल कुल में उत्पन्न होना पड़ा । उन्होंने तप साधना करके अपने अन्तिम लक्ष्य को प्राप्त किया ऐसे ही चित्र और सम्भूति मुनि जो पाॅंच भवों तक साथ साथ रहे  एवं छटे भव में संकल्प करने से बिछुड़ गए । एक ने प्रभु महावीर का धर्म अंगीकार किया एवं एक चक्रवर्ती सम्राट बने । हम अपने जीवन में प्रभु महावीर की वाणी को अंगीकार करें एवं अभिमान न करें । प्रभु महावीर ने अपनी वाणी में यही फरमाया है कि साधक को सरल होना चाहिए । 

 

जितना कम बोलोगे निर्विचार स्थिति प्राप्त होगी 

जैनाचार्य श्री शिवमुनि जी म0

24 अक्टूबर, 2003 {मालेर कोटला} श्रमणसंघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य शिवमुनि जी महाराज ने श्रद्धालुओं को उद्बोधन देते हुए कहा कि- जापान में कुछ मित्रों ने इकट्ठे होकर एक भिक्षु को सत्संग के लिए होटल में निमंत्रण दिया । होटल की सातवीं मंजिल पर सत्संग का आयोजन किया गया । नियत समय पर तीस चालीस भाई एवं भिक्षुजी होटल की सातवी मंजिल पर सत्संग हेतु उपस्थित हो   गये । उपस्थित होने के अनन्तर होटल काॅंपने लग गया । भूचाल सा आ गया । होटल लकडी का था एतदर्थ 30- 40 मित्र होटल से नीचे उतरने लग गये । होटल से बाहर जाने हेतु सीढियाॅं एक ही तरफ थी इसलिए उतरने वालों की भीड हो गयी । इतने में एक मित्र का ध्यान गया कि भिक्षु भी नीचे आये हैं या नहीं । ढूंढा गया और देखा गया कि भिक्षु नीचे नहीं आये हैं इतने में भूचाल शान्त हो गया, मित्रों ने ऊपर जाकर भिक्षु से पूछा कि भूचाल आया 9 हम सब नीचे की ओर भागे । आप नीचे क्यों नहीं आये, क्या आपको घबराहट महसूस नहीं हुई । क्या आपके ऊपर भूकम्प का प्रभाव नहीं हुआ । प्रत्युत्तर में भिक्षु ने कहा- आप भी भागे और मैं भी भागा, आप बाहर की ओर भागे, मैं भीतर की ओर भागा । आपने आॅंखे बाहर की ओर खोली, में अपनी आॅंखे भीतर की ओर ले गया । आप सब हैरान हो गये । मेरे चित्त में समता व्याप्त हो गयी । भिक्षु का उत्तर सुन सभी प्रभावित हुए । 

शरीर में नौ द्वार हैं । दो आॅंखें, दो कान, दो नासिका के छेद, एक मुख एवं मलमूत्र निकलने के दो द्वार, आॅंखें खोले तो बाहर का प्रकाश होगा । आॅंखे बन्द करें तो भीतर भी प्रकाश दिखाई देगा । कान से बाहर भी सुनाई देता है परन्तु भीतर भी अनहत नाद बजता रहता है । स्पर्श बाहर अच्छा भी होता है और बुरा भी होता है, परन्तु भीतर का स्पर्श बहुत ही सुन्दर होता है । विचारों से पूरे जगत को जाना जा सकता है और निर्विचार होने पर चैतन्य अवस्था प्राप्त होती है । मौन, शान्ति, समाधि के द्वारा चैतन्य अवस्था को समझा जा सकता है, जितना कम बोलोगे निर्विचार स्थिति प्राप्त होगी । मनुष्य जैसा चिन्तन करेगा वैसे ही विचार उसकी करनी, कथनी में होगें । किसी ने बहुत ही सुन्दर कहा है, देह मन्दिर है, तपोवन है मैरा अन्तः स्थल, आर्य हम मूल है, शायद हमें मालूम नहीं । देह को स्वच्छ और सुन्दर बनावो, नौ द्वारों को भीतर की ओर ले जाओगे तो वह योग का रूप धारण कर लेगें, अगर बाहर की ओर ले जाओगे तो उनके द्वारा भोग, दुःख पीडा की प्राप्ति होगी । पूर्ण दिवस में कम से कम दो घण्टे, नौ द्वारों को भीतर की ओर संकुचित कर लो, फिर जीवन में सुख, शान्ति, आनन्द की प्राप्ति होगी और परिवर्तन दिखाई देगा । हम फिर देह को शुद्ध करें । अन्तःस्थल को तपोवन बनायें ।

श्रमणसंघीय मंत्री श्री शिरीष मुनि जी महाराज ने उत्तराध्ययन सूत्र का विवेचन करते हुए संसार की असारता को समझाते हुए कहा कि यह जीवन क्षण-भंगुर है । श्वांस का भी हमें पता नहीं है । मृगापुत्रीय अध्ययन में दो ब्राह्मण पुत्रों ने अपने माता-पिता एवं नगर के राजा रानी चारों को प्रतिबोध देते हुए धर्म की ओर मोड़ा । प्रतिबोध कहीं से भी प्राप्त हो सकता है, उसे अंगीकार करने वाला चाहिए । यज्ञीय अध्ययन में जीवन की असारता का बहुत ही सुन्दर वर्णन है । एक मेंढक को एक साॅंप निगलता है और एक साॅंप को चील निगलती है, यह रोचक चित्र नदी में स्नान कर रहे विजयघोष देखते हैं और उन्हें संसार की असारता का ज्ञान होता है । वे धर्म की ओर मुड़ जाते हैं । हम भी धर्म की ओर मुड़े और अपने जीवन को सफल बनायें । 

आचार्य सम्राट् श्री शिवमुनि जी महाराज मौन साधना में संलग्न

26 अक्टूबर, 2003 को प्रातः 8.00 बजे मंगलपाठ

26 अक्टूबर, 2003 को प्रातः 8.00 बजे आचार्यदेव मौन साधना के पश्चात् विश्व के सभी प्राणियों के प्रति मंगल मैत्री करते हुए मंगलपाठ प्रदान करेंगे । आप सभी मंगल पाठ श्रवण कर अपने जीवन को उज्ज्वल बनायें । 

दीपावली पर्व से हमारे भीतर प्रकाश आरोहित हो

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेर कोटला 25 अक्टूबर 2003: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- उपानिषद के ऋषि का एक वाक्य है- हे प्रभु ! मुझे कुछ नहीं चाहिए । जब आप प्रार्थना, सामायिक ध्यान करें, गुरू के पास जायें, सत्संग में जायें तो उनसे क्या माॅंगे ? हमारी माॅंग सकारात्मक होनी चाहिए, जीवन उत्थान में सहयोगी होनी चाहिए । हम यह माॅंग करे कि मेरा मन, मेरी बुद्धि, कर्म, विचार अच्छे हो, उनमें ऋजुता, नम्रता, पवित्रता आये । कुछ धार्मिक अनुष्ठान, कुछ क्रियाएॅं हम प्रतिदिन कर रहे हैं । हमारा जीवन परमार्थ में लगा हुआ है । यदि हमारे जीवन में समर्पण है तो हम सही जीवन व्यतीत कर रहे हैं । यदि हमारे जीवन में संघर्ष, पीड़ा, तनाव है तो सारी शक्ति व्यर्थ हो रही है । 

हमें संस्कारित करने का कार्य हमारे माता, पिता, गुरू एवं हमारे विचार और परिस्थितियाॅं करती   है । व्यक्ति को हमेशा खानदान देखकर वार्तालाप करना चाहिए । आप सेवा कर रहे हैं परन्तु सेवा करते समय अहंकार आता है तो वह सेवा भी निरर्थक है । सामायिक से चित्त में शान्ति आती है ओर तनाव दूर होते हैं । भारतीय संस्कृति अपनाओ । सूर्य उदय से पूर्व ही योग, ध्यान, सामायिक में रम जाओ, जिससे पूर्ण दिवस आनंदमय बीतेगा ।

सरलता में जीवन जीओ । स्वयं बुद्धु न बनो और न ही औरों को बुद्धु बनाओ । स्वच्छ व्यवहार रखो  । माया, छल, कपट न करो । धार्मिक होने का लक्षण यही है कि हम सहज और सरल हो जाये । जब मन में विकल्प आये तब शान्त हो जाओ । जो आपको मिला है उसका सदुपयोग करो । धर्म ही आपको उच्चगति में ले जाएगा, इसलिए धर्म की आराधना करो । मन को टिकाओ, मन चंचल है, फिर भी आप मन को लगाओ । साधना में तपो । बुरे कार्य करते समय उनको टालने की कोशिश करो । अच्छे कार्य बिना अवलम्ब के करो । यही मानव जीवन की सहजता और सरलता है । 

आज का यह पावन दीपावली पर्व आप सबके लिए मंगलकारी हो । आपके जीवन मंें बाह्य एवं भीतर की समृद्धि प्राप्त हो । आपके जीवन मे ंसाधना, आराधना बढ़ें । आप जीवन में परम लक्ष्य को प्राप्त करें यही हार्दिक मंगल भावना ।

आज के दिन प्रभु महावीर निर्वाण पहुंॅचे एवं प्रथम गणधर श्री गौतम स्वामी को केवलज्ञान हुआ । प्रभु महावीर की साधना आराधना हमें परम निर्वाण पहुंचाएॅं एवं गौतम स्वामी जैसी लब्धी हमें प्राप्त हो । आज के दिन हम सभी प्रभु महावीर एवं गणधर गौतम की साधना आराधना भक्ति करें ।

श्री उत्तराध्ययन सूत्र का वाॅंचन अभी श्री शिरीष मुनि जी महाराज कर रहे हैं । आज उन्होंने दीपमालिका पर्व पर अपने विचार करते हुए कहा कि- प्रभु महावीर जब मुक्ति को पहुंॅचे तब भीतर का प्रकाश परिपूर्ण हो चुका था एतदर्थ प्रभु महावीर के अनुयायियों ने बाहर दीपक जलाकर रोशनी की । यही रोशनी आगे चलकर दीपमालिका के रूप में परिवर्तित हो गई । दीपमालिका पर्व विश्वकर्ता एवं स्वामी दयानन्द के जीवन से भी जुड़ा हुआ है । 

आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज के भव्य मंगलपाठ श्रवण हेतु जनसमूह उमड़ा:-

मालेर कोटला 26 अक्टूबर, 2003 श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने त्रिदिवसीय मौन के पश्चात् श्रद्धालुओं को मंगलपाठ प्रदान करते हुए फरमाया कि- प्रभुजी दया करो, मन में आन बसो । अरिहंत भगवान, सिद्ध भगवान को नमन करते हुए शरण-भाव में जाना चाहिए । शरणभाव हमें चरमस्थिति तक पहुंॅचा सकता है । हम हमेशा समर्पण, शान्ति एवं समाधि में रहे यही हमारे जीवन का परम् उद्देश्य है । आचार्यश्रीजी ने तीन दिन की मौन साधना के पश्चात् आज भक्तजनों को मंगलपाठ प्रदान किया । मंगलपाठ के साथ साथ आचार्यदेव ने सभी श्रद्धालुओं को ध्यान, साधना एवं मंगलमैत्री का अनुभव करवाया । 

श्रमण संघीय मंत्री श्री शिरीष मुनि जी महाराज ने उत्तराध्ययन सूत्र का वाॅंचन करते हुए फरमाया कि- प्रभु महावीर की अन्तिम-वाणी उत्तराध्ययन सूत्र का एक-एक सूत्र जीवन का रूपान्तरण कर देता है । आज के विवेचन में उन्होंने फरमाया कि- जीव और अजीव का हमें बोध कैसे हो एवं श्रमणाचार की समाचारी किस प्रकार होनी चाहिए । मोक्ष मार्ग की प्राप्ति के लिए क्या परम आवश्यक है । तप का जीवन में बड़ा महत्व है, तप से व्यक्ति परम पद को प्राप्त कर सकता है । 

भाई बहिन के प्यार का प्रतीक है भाई दूज: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेर कोटला 27 अक्टूबर 2003: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- आज का दिवस परम पवित्रता लेकर हमारे सम्मुख उपस्थित हुआ है । आज भैय्या दूज का पवित्र दिन है । जिसे लोग यम-द्वितीया के नाम से भी जानते   हैं । यह दिन भाई बहिन के अनूठे प्यार का दिन है । बहिन भाई का नाता पवित्रता का नाता है । विश्व में इस नाते को सबसे अच्छा नाता माना जाता है । भाई बहिन जिन्दगी भर साथ निभाते हैं । भैय्या दूज के पीछे कई दृष्टान्त उपस्थित है, परन्तु मुख्य रूप से यमुना ने यमराज से आज के ही दिन कार्तिक शुक्ला द्वितीया को अपने घर भोजन हेतु आमंत्रित किया एवं उसे मंगल का प्रतीक टीका लगाकर रक्षा का वर माॅंगा कि आज के दिन कोई बहिन भाई को अपने घर बुलाना चाहे तो उसकी रक्षा तुम करोगे । यह वर यमुना ने यमराज से माॅंगा था । भाई बहिन का यह पर्व पवित्र त्यौहार है । आज के दिन बहिन भाई को टीका लगाती है एवं उसके उज्ज्वल जीवन की मंगल कामनाएॅं करती है । टीका लगाने का मतलब यह है कि हमारा आज्ञा-चक्र तीसरा नेत्र मतलब शिव नेत्र खुलता है । हम सबके लिए मंगल कामना करते हैं । मैं आज के दिन आप सभी से यह अनुरोध करूॅंगा कि हर बहिन की मदद करो तभी यह भैय्या दूज का पर्व मनाना सार्थक होगा । सेवा एवं साधना को जीवन में लाओ । सेवा से शुद्धि और साधना से समृद्धि आती है । 

भारत की संस्कृति में विश्व के सभी धर्मों ने सेवा एवं साधना को बल दिया है । साधना कई प्रकार की है जिसमें ऊॅंकार की साधना प्रत्येक सम्प्रदाय को मान्य है । ऊॅंकार कोई शब्द नहीं एक शुद्ध ध्वनि है,  चेतना की पुकार है । सिक्ख, ईसाई, मुस्लिम, बौद्ध, जैन, हिन्दू सभी ने ही ऊॅंकार को स्वीकार किया है ।  प्रभु की वाणी, धर्म, सत्संग इससे बढ़कर इस दुनियाॅं में कुछ भी नहीं है । भीतर की चेतना में चित्त की प्रांजलता, ऋजुता में धर्म है । धर्म है दृष्टि को निर्मल करना । एक बात निश्चित है कोई भी कार्य करो गुरू-चरणों में समर्पित होकर करो । जिस प्रकार बच्चा अपनी माॅं के सामने पूर्ण-रूप से समर्पित हो जाता है उसी भाॅंति हम सभी समर्पित हो जाएॅं । आज की प्रत्येक माॅं भारत की माॅं बने । शारदा, कस्तूरबा, मदर टेरेसा इन्होंने अपनें मातृत्व की भारत की माॅं तक पहुंॅंचाया और वे भारत की ही नहीं अपितु विश्व की माॅं बनी । आज भी मदर टेरेसा को गरीबों की माॅं कहा जाता है । ऐसी कई माताएॅं हैं जो अपनी ही नहीं सबके बेटों का ध्यान रखती है । हृदय का विस्तार करो । यही हमें अपनेपन में लोटा देगा । सभी को अपना मानो । आकाश की भाॅंति सबको फैला दो । धर्म हमें अनंत आकाश की यात्रा कराता है । 

आचार्यश्रीजी की सान्न्ध्यि में चातुर्मास प्रारंभ से साधना शिविर चल रहे हैं, 28 अक्टूबर, 2003 से इस वर्षावास का अन्तिम त्रिदिवसीय आत्म ध्यान साधना शिविर प्रारंभ होगा । जिसमें सभी भाई बहिन भाग लेकर अपने जीवन में साधना को स्वीकारें एवं प्रभु महावीर की साधना को जन जन तक फैलायें ।

निमित्त कोई भी हो मूल में कर्म अपने है: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेर कोटला 28 अक्टूबर 2003: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि-

तू ही सागर है तू ही किनारा है, ढूंढ़ता है तूं किसका सहारा ।।

इस संगीत के माध्यम से प्रभु के दर्शन, प्रभु की वाणी का सार हमें प्राप्त होता है । मनुष्य सर्वोपरि है, वह जो चाहे कर सकता है, उसमें इतनी क्षमता है कि वह प्रत्येक कार्य अपनी क्षमता के बल पर कर सकता है । एक दृष्टि से देखा जाये तो सारी सृष्टि हमारे भीतर है । सब कुछ हमारे भीतर समाया हुआ है, तुम सोचो, दृष्टि रखो । गुरू, गुरूत्व, संसार, परमात्मा, पर्वत जो भी कुछ इस सृष्टि में है उसे हम अपने भीतर ला सकते हैं, दृष्टि चाहिये । हमारे विचार वैसे बन जाएंगें तो सब कुछ हो सकता है । 

हमें हमारे विचारों ने धोखा दिया है । नजदीक का व्यक्ति हमेशा धोखा देता है । जीवन में जिसको आपने अपना माना, आपने उसे सब कुछ अपना दे दिया । पर उसने ही हमें धोखा दिया है । इतिहास साक्षी है निमित्त अपने है और कर्म भी अपने है । इस संसार में जो हो रहा है वह न्याय-संगत ही हो रहा है । जिसे तुम अपने मन में फिट बिठाते हो वह बैठ जाता है । जो कुछ मेरे साथ हो रहा है या जो कुछ मुझे मिल रहा है मूल में तो अपना कर्म संस्कार ही है, निर्मित चाहे कोई भी बने ऐसी भावना भीतर रखो । 

हम सबके प्रति मंगल की कामना करें । आज हम किसी के लिए बुरा सोचते हैं तो पहले हमारा बुरा हो जाता है । दुःख में कभी भी घबराना मत, हसन कवि ने प्रार्थना करते हुए कहा था कि- प्रभु ! मुझे दुःख दिया करो । हसन कवि ने प्रभु के समक्ष दुःख की याचना की क्योंकि दुःख के समय में परमात्मा हमेशा याद आता है । हमारे भीतर एक ही प्रार्थना होनी चाहिए कि- भीतर अरिहंत की शरण, सिद्ध का स्मरण और साधु का संग आये । ये तीनों बातें सभी बाधाओं का हल कर देती है । मन चंचल है, जो नहीं मिला उसकी याचना करता रहता है । हम मन के पीछे न जायें । दुःख में सुख को देखें । कांटों में फूल को देखें । विष में से अमृत को निकाले । हम किसी का सहारा बनें यही जीवन की अमूल्य संपदा है ।  

आचार्य भगवन के मालेर कोटला वर्षावास में निरन्तर तपस्याएॅं गतिमान है । तपस्याओं के क्षेत्र में अनेक भाई बहिन अपना नामांकन कर चुके हैं । उग्र तपस्विनी महासती श्री सुमित्रा जी म0 एवं तप्त तप्त तपस्विनी महासती श्री संतोष जी म0 चातुर्मास प्रारंभ से सव्रतोभद्र तपस्या कर रहे हैं । यह तप भी पूर्णाहुति की ओर है, आज उनके 6 उपवास हो गये हैं । अठाई पूर्ण होने पर वे अपने इस तप की पूर्णाहुति करेंगे । तप रत्नेश्वरी महासती डाॅ0 सुनीता जी महाराज के वर्षावास प्रारंभ से ही तपस्या चल रही है । आज उनके 108 व्रत पूर्ण हो चुके हैं एवं उनका तप अभिनन्दन समारोह दिनाॅंक 2 नवम्बर, 2003 को मालेर कोटला स्थित आत्म शिव दरबार, लाल बजार में होने जा रहा है, इस अवसर पर आप पधारकर प्रवचन दर्शन कर लाभ लेवें । महासती श्री ऊषा जी म0 के आज 65 आयंम्बिल हो चुके हैं । उनकी भावना आगे बढ़ने की  है । 

अपना घर प्रयोगशाला है: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेर कोटला 29 अक्टूबर 2003: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- प्रभु महावीर की वाणी का सार, पुण्य पाप की कहानी का हम वर्णन कर रहे हैं । प्रभु महावीर ने 9 प्रकार के पुण्य और अठारह प्रकार के पाप बतलाये हैं । पुण्य हमारे जीवन में शान्ति,समृद्धि, सौभाग्य लाता है । पाप, अशान्ति, दुःख, पीड़ा, बिखराव, टकराव लाता है । दो वस्तुएॅं आपके सम्मुख पड़ी है । अग्नि भी है और पानी भी है । आप उसमें से क्या ग्रहण करना चाहोगे, यह आपकी इच्छा है । आग से आग कभी नहीं बुझती । दुःख से दुःख नहीं जाता । आग को शान्त करना है तो पानी के छींटें छीटने पड़ेगें तभी आग शान्त हो सकती है । 

क्रोध आए तो शान्ति व क्षमा धारण करना आपका घर एक प्रयोगशाला स्वरूप है । यदि घर को आपने सॅंभाल लिया तो सब सॅंभल गया । हमारे जीवन में क्रोध, वैर की गाॅंठ न बनें । अगर गाॅंठ बन गई तो लाखों जन्म बिगड़ जाएंगें और गाॅंठ खुल गई तो हमारा यह जीवन सुधरेगा । घर में शान्ति से रहो । शान्ति से रहना आ गया तो आपके भीतर सामायिक आ गई । सामायिक का रंग चढ़ गया । भक्ति की शक्ति आपको प्राप्त हो गई । सामायिक का प्रतिफल यह है कि मेरा देश, संघ, परिवार स्वस्थ हो । 

परमात्मा से यही कामना करो कि प्रत्येक प्राणी सुखी रहे और उसका जीवन मंगलकारी बने । जब तुम परमात्मा कोमल के संघ में है । जब तुम कोमल या संवेदनशील बनोगे तब परमात्मा तुम्हारी सहायता करेगा । परमात्मा के प्रति गुणानुवाद प्रकट करो । 9 प्रकार के पुण्य में भूखे को भोजन खिलाओ । भीतर पुण्य की सत्कार्य की भावना रखो । भोजन को फैकों मत, वह ब्रह्म स्वरूप है । प्यासे व्यक्ति को पानी पिला दो । एक प्यासे को पानी पिलाने से बहुत पुण्य मिलता है । जन्म-जन्मांतर सुधर जाते हैं । जो बीमार है उसे दवाई प्रदान करो । थके हुए को शीतल छाया दो । स्थान दो, बिस्तर दो और कुछ नहीं कर सकते तो मन से मंगल कामना ही करो । मन से मंगल कामना करना मन-पुण्य में आता है । अच्छे वचन, आदर सूचक वचन बोलो । इस मृतिका रूप काया को सेवा में लगा दो । भीतर से शान्त रहो, मौन रहो । 

अंत में आचार्यश्रीजी ने सभी श्रद्धालुओं को तप एवं दान की प्रेरणा दी । महासतीजी के तपपूर्ति समारोह पर तेले के अनुष्ठान करवाये जा रहे हैं । जो भाई बहिन तपस्या नहीं कर सकते वे दान, शील भावना के द्वारा तप का अनुमोदन करें ।

उग्र तपस्विनी महासती श्री सुमित्रा जी म0 एवं तप्त तप्त तपस्विनी महासती श्री संतोष जी म0 चातुर्मास प्रारंभ से सव्रतोभद्र तपस्या कर रहे हैं । यह तप भी पूर्णाहुति की ओर है, आज उनके 7 उपवास हो गये हैं । अठाई पूर्ण होने पर वे अपने इस तप की पूर्णाहुति करेंगे । तप रत्नेश्वरी महासती डाॅ0 सुनीता जी महाराज के वर्षावास प्रारंभ से ही तपस्या चल रही है । आज उनके 109 व्रत पूर्ण हो चुके हैं एवं उनका तप अभिनन्दन समारोह दिनाॅंक 2 नवम्बर, 2003 को मालेर कोटला स्थित आत्म शिव दरबार, लाल बजार में होने जा रहा है, इस अवसर पर आप पधारकर प्रवचन दर्शन कर लाभ लेवें । महासती श्री ऊषा जी म0 के आज 66 आयंम्बिल हो चुके हैं । उनकी भावना आगे बढ़ने की  है । 

जीवन में धर्म का सामंजस्य स्थापित करो: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेर कोटला 30 अक्टूबर 2003: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- प्रभु का सिमरन, प्रभु महावीर की धर्म साधना हमारे जीवन में दिव्यता का आभास करवाती है । मनुष्य को अपनी क्षमता, दिव्यता, आनंद का पता नहीं है । जैसे कोई अनपढ़ गॅंवार व्यक्ति को ज्ञान का पता नहीं है उसी प्रकार मनुष्य को अपनी दिव्यता का आभास नहीं है । मनुष्य के जीवन में धर्म का अनुभव नहीं आया है इसीलिए प्रायः झगड़े होते रहते हैं । धर्म का सम्बन्ध उनके जीवन में स्थापित नही हुआ है ।

जीवन में धर्म का सामंजस्य स्थापित करो । बुरे विचार बदल जायेगें । जिस घर में भोजन भजन एक साथ होता है वहाॅं पीड़ा, दुःख नहीं होता । धर्म सृजन करता है । जीवन में धर्म आ गया तो जहर से भी अमृत ग्रहण कर लोगे । प्रभु, गुरू परीक्षा लेते हैं कि जीवन में धर्म आया है या नहीं । भीतर में मैत्री की धारा बहाओ, धर्म जीवन में भीतर की सम्पदा देता है । कोई रो रहा है उसके आॅंसू पोछों, तो वह धर्म ही हो रहा है । सरल हो जाओ । प्रभु के दर्शन हो जाएंगें । धर्म आपके जीवन की दृष्टि को बदल देता है । कर्म इन्द्रिय ज्ञानेन्द्रिय को झुकाओ । अहंकार दूर होगा । तृप्ति का अहसास होगा । माता, पिता, गुरू चरणों में सर रखने पर आशीर्वाद मिलता है । 

राम वनवास को गये । वनवास के अनन्तर जब वे घर लौटे तो उन्होंने माता कैकयी के प्रति अनुग्रह व्यक्त करते हुए कहा कि ‘आपकी कृपा से मैं चैदह वर्ष के वनवास में सात चीजें प्राप्त करके आया हूॅं । अगर में वनवास नहीं जाता तो मुझे पिता का स्नेह, भरत की महिमा, हनुमान का पौरूष, माता सीता का शील, मेरा भुजबल, वेरियों का वैर भाव । सुग्रीव, बाली की शक्ति, लक्ष्मण की भक्ति इनका ज्ञान मुझे प्राप्त नहीं होता । माॅं तेरी कृपा से ये सात चीजें मुझे प्राप्त हुई है’ । प्रभु राम ने कैकयी के प्रति अनुग्रह भाव व्यक्त किया । अनुग्रह-भाव में धर्म है, यही सम्यक् दर्शन है । कोई तुमसे विरोध करता हो तो उसे अपना कर्म संस्कार समझो । विरोध को विरोध न समझकर अपना अहसान समझो । जो हो रहा है उसे स्वीकार करो, उसी में आनंद, शान्ति, समृद्धि प्राप्त होगी । 

सुख और दुःख में जब तुम समानता लाओगे तब सहज समाधि प्राप्त होगी 

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेर कोटला 31 अक्टूबर 2003: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि-  सृष्टि का नियम है सुख और दुःख निरन्तर प्रवाहमान रहता है । हर वस्तु के दो पहलू है- सुख- दुःख, लाभ- हानि । ये सब एक दूसरे से जुड़े हुए हैं । संत का, संत से क्या मिलन होता है ? संतत्व की क्या अनुभूति होती है ? इसके कोई संत महात्मा ही पहचान सकता है । जीवन में सुख दुःख निश्चित है । हमारा जीवन धूप और छाया की भाॅंति है । जीवन में जो आये उसे स्वीकार कर लो । सुख को बड़ा मत मानो । सुख और दुःख में जब तुम समानता लाओगे तब सहज समाधि प्राप्त होगी । सहज समाधि जो सहज-भाव में हो रहा है उसे वैसे ही होने दो । जीवन का सम्यक् न्यास करो । प्रशंसा, निन्दा, दुःख, सुख को स्वीकार करो । एकान्त सुख को भी स्वीकार करो । हम समाधि, शान्ति, संतुलन में रहे । एक साधक है और एक मायावी है । एक संसारी है, एक संयमी है, उनकी क्रिया में अन्तर है । जब समाधि प्राप्त होती है तो कर्ताभाव समाप्त होता है । संसारी अहंकार में बॅंधा हुआ है, संयमी अहंकार से विलुप्त है । अपने जीवन में संतत्व को उपलब्ध करो । दोनों व्यक्ति है । दोनो ही संयमी है, उनको देखने में कोई अन्तर नही है परन्तु भाव में अन्तर है । मानसरोवर में हंस भी जाता है और बगुला भी जाता है । हंस मोती चुनता है । बगुला ध्यान करते हुए मछली को ही ग्रहण करता है । क्रिया का महत्व नहीं, भाव का महत्व है । श्वांस रूपी डोरी को चित्त रूपी सुई में पिरोओ और भीतर निरन्तर यह सोचो कि समाधि कैसे प्राप्त हो ? हम सहज समाधि में कैसे आएॅं, इस बात को समझना परम् आवश्यक है । जब जीव को समाधि को प्राप्त करता है तो उसे शाश्वत् सुख मिलता है । समाधि का शाश्वत् सुख हमें जन्म-मरण की परम्परा से छुटकारा दिलाता है । जन्म मरण की परम्परा का क्षय ही निर्वाण है, मोक्ष है और जीवन का अन्तिम लक्ष्य भी है ।

आज हमारे बीच स्वामी अध्यात्मानन्द जी अहमदाबाद-गुजरात से आए । आपका आत्मीयभाव, गहन निष्ठा का साक्षात्कार हुआ । आप विनम्र, सहज, सरलता की प्रतिमूर्ति हैं । आपने भी ध्यान साधना का मार्ग अंगीकार कर जन-जन को इस साधना से जोड़ रहे हैं यह एक शुभ बात है । आपसे हमारा प्रथम साक्षात्कार लुधियाना में हुआ । प्रथम साक्षात्कार में ही आपका संतत्व का अनुभव एवं आत्मीय-भाव हमें प्राप्त हुआ । मैं इनका मालेर कोटला पधारने पर इन्हें साधुवाद देता हूॅं । इस अवसर पर स्वामी श्री आध्यात्मानंद जी ने विराजित जनसमूह को अपने मंगलमय विचारों से सम्बोधित किया ।

उग्र तपस्विनी महासती श्री सुमित्रा जी म0 एवं तप्त तप्त तपस्विनी महासती श्री संतोष जी म0 चातुर्मास प्रारंभ से सव्रतोभद्र तपस्या कर रहे थे । उन्होंने अपनी सर्वतोभद्र तपस्या की पूर्णाहुति अठाई तप द्वारा की । तप रत्नेश्वरी महासती डाॅ0 सुनीता जी महाराज के वर्षावास प्रारंभ से ही तपस्या चल रही है । आज उनके 111 व्रत पूर्ण हो चुके हैं एवं उनका तप अभिनन्दन समारोह दिनाॅंक 2 नवम्बर, 2003 को मालेर कोटला स्थित आत्म शिव दरबार, लाल बजार में होने जा रहा है एवं तपस्विनी महासती डाॅ0 सुनीता जी म0 का पारणा 7 नवम्बर, 2003 को होगा । इस अवसर पर आप पधारकर प्रवचन दर्शन कर लाभ लेवें । महासती श्री ऊषा जी म0 के आज 68 आयंम्बिल हो चुके हैं । उनकी भावना आगे बढ़ने की  है । महासतीजी के तप अभिनन्दन के उपलक्ष में कई भाई बहिन तेले के अनुष्ठान भी कर रहे  हैं । 

जो तुमने कर्म किया है उसका फल भोगने के लिए तैयार रहो 

 जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेर कोटला 1 नवम्बर, 2003: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि-  जीवन में जो भी हो रहा है, जो हमने पाया है और जो हमें मिलेगा वह सब हमारे पूर्व कृतकर्मों से हो रहा है । पूर्व जन्म में हमने जो बीज बोये थे उनका फल हमें मिल रहा है । परमात्मा के हुकुम में रहो, उसकी आज्ञा मानो । तुम उसकी मर्जी में रहोगे तो सारे संकट दूर हो जाएंगें । ब्रह्म और संसार एक ही है । भगवान महावीर का सिद्धान्त भी यही कहता है कि जो तुमने कर्म किये हैं उनका फल भोगने के लिए तैयार रहो । किये हुए कर्मों के फल भोगे बिना छुटकारा नहीं हो सकता । कर्म को निष्फल बनाने में लग जाओ । अपना कर्म संस्कार देखो । अपने जीवन में हमंे जिसको देखना चाहिए वह हम नहीं देखते और दूसरा ही देखते रहते हैं । मौत और परमात्मा इन दो बातों को जिन्दगी में कभी मत भूलो । हम घर संसार, धन, पद, प्रतिष्ठा को याद रख लेते हैं परन्तु हम मौत को याद नहीं रखते और न ही परमात्मा को याद रखते हैं । यह निश्चित है कि मौत आने वाली है । जो कष्ट आते हैं उन्हें स्वीकार कर लो । तुम्हारा सौभाग्य है कि तुम्हें अपने ही स्थान पर अपने ही स्वभाव में कष्ट आ रहे हैं । प्रभु महावीर को कष्टों को झेलने के लिए अनार्य प्रदेशों में जाना पड़ा । पुरूषार्थ करते रहो । गुरू के प्रति इतना समर्पण कर दो कि वह जो कहे उसे ही अपना मुख्य बिन्दु   मानो । गुरू आपको जलती अग्नि में डाल दे । शूली पर लटका दे तो भी उसे सूक्ष्म रूप मानो । मन को, दृष्टि को बदलो । दुःख में ही सुख आएगा । मन, वचन, काया से किसी का बुरा मत करो यही सबसे बड़ा धर्म है । धर्म मंगल देता है । जो तुमने चाहा वह तुम्हें मिल गया । तुमने संसार चाहा तुम्हें मिल गया, आगे क्या चाहना है ? परमात्मा के प्रति अपनी श्रद्धा, निष्ठा, समर्पण को चाहो । यह संसार एक रंगमंच   है । इस रंगमंच में प्रामाणिकता से काम करो । अपनी नेक कमाई का कुछ हिस्सा धर्म में लगाओ । 

आज मलौट से आचार्यश्रीजी के माताजी श्रीमती विद्यावतीजी एवं भाई श्री विजय कुमार जी आदि मलौट से आचार्यश्रीजी के समक्ष उपस्थित हुए । आचार्यश्रीजी ने माॅं के प्रति अपनी भावनाएॅं उद्धृत करते हुए कहा कि- माॅं का उपकार भुलाया नहीं जा सकता । माॅं शब्द सुनते ही हृदय भीग जाता है । माॅं हमें सदा आशीर्वाद देती रहती   है । माॅं के उपकार कभी हम चुका नहीं सकते । माॅं से कोई ऊऋण नहीं हो सकता कोई । माता, पिता और गुरू का दर्जा इस संसार में सबसे बड़ा है । 

उग्र तपस्विनी महासती श्री सुमित्रा जी म0 एवं तप्त तपस्विनी महासती श्री संतोष जी म0 की सुशिष्या तप रत्नेश्वरी महासती डाॅ0 सुनीता जी महाराज के वर्षावास प्रारंभ से ही तपस्या चल रही है । आज उनके 112 व्रत पूर्ण हो चुके हैं एवं उनका तप अभिनन्दन समारोह दिनाॅंक 2 नवम्बर, 2003 को मालेर कोटला स्थित आत्म शिव दरबार, लाल बजार में होने जा रहा है एवं तपस्विनी महासती डाॅ0 सुनीता जी म0 का पारणा 7 नवम्बर, 2003 को होगा । इस अवसर पर आप पधारकर प्रवचन दर्शन कर लाभ लेवें । महासती श्री ऊषा जी म0 के आज 70 आयंम्बिल हो चुके हैं । उनकी भावना आगे बढ़ने की  है । महासतीजी के तप अभिनन्दन के उपलक्ष में कई भाई बहिन तेले के अनुष्ठान भी कर रहे  हैं । 

आज आचार्यश्रीजी के दर्शनार्थ भारत के विभिन्न अॅंचलों से श्रद्धालुजन उपस्थित हुए जिसमें अहमदनगर, दिल्ली, करनाल, सुनाम, मलौट, अबोहर, धूरी, लुधियाना, सिरसा आदि ।    

तप का अभिनन्दन धर्म की प्रभावना है: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेर कोटला 2 नवम्बर, 2003: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि-  आज जैन इतिहास का मंगलमय दिवस है । विशेष तौर पर श्रमण संघ के लिए यह दिन इतिहासिक दिन से कम नहीं । आज तप रत्नेश्वरी महासती डाॅ0 सुनीता जी महाराज के 112 व्रतों के अभिनन्दन के लिए सारे देश से इकठ्ठे हुए हैं । यह जन समूह उनकी तपस्या की अनुमोदना का प्रतीक है । जैन धर्म में तप का विशिष्ट महत्व है । तप कर्म निर्जरा का प्रमुख कारण है । तप में विपरीत स्थितियों में गुजरना पड़ता है । आज के युग में तप का विशिष्ट महत्व है क्योंकि संसार भौतिकता की चकाचैंध में उलझा हुआ है । जैन धर्म में तपस्या को मोक्ष का द्वार कहा गया है । तपस्या के साथ-साथ स्वाध्याय व ध्यान किया जाता है, उससे तप में और निखार आता है । साध्वी डाॅ0 सुनीता जी महाराज ने उसी दिन से तप पारंभ किया है जिस दिन से चातुर्मास शुरू हुआ है । वे सुबह प्रवचन में भी पधारती हैं एवं दोपहर के समय स्वाध्याय में भी पधारती हैं । जबकि तपस्वी के शरीर में अक्सर कमजोरी देखी जाती है पर ऐसी घटना उनकी तपस्या के कारण ही घटित होती है कि उनका ध्यान, स्वाध्याय सतत् जारी रहे । 

भगवान महावीर ने अहिंसा, संयम व तप को मंगल कहा है । यह मंगल अनंत जीवों के लिए प्रेरणा का कारण बने ऐसी मेरी कामना है । इस अवसर पर मैं इनकी गुरूणी उग्र तपस्विनी महासती श्री सुमित्रा जी महाराज व महासाध्वी श्री संतोष जी महाराज को साधुवाद देता हूॅं कि उन्होंने ऐसी शिष्या हमारे श्रमण संघ को दी है । दोनों साध्वियाॅं सदैव जप तप में लीन रहती है । वर्षों से वे सर्वतोभद्र तप कर रही हैं । जो कि इस तप का समय 100 दिन तक होता है । ऐसी साध्वी की शिष्या हैं महासती डाॅ0 सुनीता जी महाराज जो स्वयं पी0एच0डी0 हैं । देव गुरू धर्म के प्रति समर्पित हैं । इस अवसर पर मैं महासाध्वी श्री सुमित्रा जी महाराज एवं महासाध्वी श्री संतोष जी महाराज को ‘सर्वतोभद्र तप आराधिका’ के पद से विभूषित करता हूॅं । साथ ही उनकी शिष्या साध्वी डाॅ0 सुनीता जी महाराज को 117 उपवास की तपस्या के अवसर पर ‘शासन प्रभाविका’ के पद स विभूषित करता हूॅं । हमारे श्रमण संघ में इससे पहले भी उप प्रवर्तिनी महासती श्री महासाती श्री मोहनमाला जी महाराज, तप प्रवर्तिनी महातसी श्री हेमकुंवर जी म0, तपस्विनी महासती श्री शुभ जी महाराज लम्बी तपस्या की है । इस चातुर्मास में भी महासाध्वी श्री मोहनमाला जी महाराज, लुधियाना में व महासती श्री शुभ जी महाराज पटियाला में लम्बी तपस्या में संलग्न है । सभी महासतियाॅं हमारे श्रमण संघ के श्रृंगार है । इनका आशीर्वाद तप के माध्यम से हमारे श्रमण संघ को हमेशा प्राप्त और आगे भी इसी प्रकार होता रहेगा । 

इस अवसर पर आचार्य श्री शिवमुनि जी म0 चातुर्मास समिति, 2003 के चैयरमेन श्री प्रेमचंद जी जैन व उनकी धर्मपत्नी श्रीमती विनोद जैन मै0 प्रेम प्रोपर्टीज प्रा0लि0, मालेर कोटला ने अपनी सुपुत्री मनीषा जैन के 62 एकासनों की खुशी में शहर के दो भिन्न भागांें में दो वाटर कूलर देने की घोषणा की । ये वाटर कूलर शहर के बस स्टैण्ड एवं मुख्य चैक में लगाये जायेगें । इसकी सारी व्यवस्था स्वयं श्री प्रेमचंद जी जैन व उनका परिवार करेगा ।

इस अवसर पर दैनिक अजित समाचार के स्थानीय पत्रकार इलियास अब्दाली व जैन ज्योति पत्रिका के डाॅ0 कैलाशचंद जी जैन एवं श्री प्रमोद जी जैन का श्रीसंघ की ओर से सम्मान किया गया । ध्यान रहे कि स्थानीय अखबारों ने आचार्यश्रीजी के प्रवचन इन पत्रकारों के माध्यम से रोजाना प्रकाशित किये जा रहे हैं ।  इस अवसर पर जैन धर्म के प्रसिद्ध विद्वान डाॅ0 धर्मचंद जैन, पूर्व प्राध्यापक संस्कृत विभाग, कुरूक्षेत्र विश्वविद्यालय व डाॅ0 धर्मसिंह जी संपादक- सिक्ख विश्वकोष पंजाबी विश्वविद्यालय, पटियाला का भी श्रीसंघ की तरफ से सम्मान किया गया । 

आज के इस अवसर पर मलौट, फरीदकोट, बहादुरगढ़, सूरत, जम्मू, सिरसा, लुधियाना, संगरूर, बंगा, रोपड़, मोगा, अहमदगढ़, धूरी, पटियाला, सिरसा, अहमदनगर, भटिण्डा, सुनाम, यमुनानगर, बुढ़लाढ़ा, सरदूलगढ़ आदि स्थानों से श्रीसंघ एवं श्रद्धालुजन उपस्थित हुए ।  

सुख वीतरागता में है: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेर कोटला 3 नवम्बर, 2003: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- 

घबराओ ना दुःख से जीवन में, जीवन सुख दुःख का मेला है ।

शरणा ले लो अरिहंतों का क्यों करता व्यर्थ झमेला है, ये प्रभु सिमरन की वेला है ।

ये तीन पंक्तियाॅं हमें प्रभु सिमरन की ओर ले जाती है । जीवन में क्या करना चाहिए । किस प्रकार की उपलब्धि हमें हो । यदि हम धर्मात्मा, साधक है । हमें वीतरागवाणी से अनुराग है तो जीवन में सुख दुःख अवश्य आएंगें । सुख दुःख में न घबराते हुए क्षमा-भाव, समर्पण भाव में अपने आपको ले जायें । ऐसा कौनसा जीव है जिसके जीवन में दुःख नहीं आया । चैरासी लाख जीव योनी में जितने भी जीव है ?      वे प्रतिपल खुश नहीं रह सकते । कभी ऐसा पल आता है जब उनका जीवन दुःखमय बन जाता है । हर जगह दुःख है । सुख वीतरागता में है संसार के विषय वासनाओं में नहीं, कषायों में नहीं । सच्चा सुख प्रभु के दरबार में है । प्रभु के अस्तित्व में तीन प्रकार के स्पंदन है । हर क्रिया में स्पंदन होता है । कोई क्रिया बुरी नहंीं है, दृष्टि बदलनी चाहिए । 

जीवन की उपयोगिता को देखो जो सांस आ रही है उसे शुभ स्पंदनों में लगाओ । गाड़ी, बंगला, कोठी, पद, प्रतिष्ठा में हर व्यक्ति अपनी अमूल्य साॅंसे लगा देता है । वीतराग धर्म ही साथ जाएगा । आत्मालोचना करो । जब कोई व्यक्ति धर्म करता है तो उसकी भी परीक्षा होती है । हम अपनी सारी जिन्दगी दिन के चैबीस घण्टे व्यर्थ की बातों में बीता देते हैं । उस समय को हम ध्यान साधना, आराधना भक्ति में लगायें । जब जीव चिन्तन, मनन, ध्यान साधना करता है तो व्यर्थ के झमेले मिट जाते हैं । अपने जीवन का मूल्याॅंकन करो । संसार में सब कुछ है । निष्काम भाव से भक्ति करो । भगवान के चरणों में समर्पण कर दो । जो कुछ अच्छा, बुरा है सब समर्पण कर दो । सुख आया तो उसे अपना मत मानो । दुःख आया तो उसे भी अपना मत मानो । भगवान की वाणी सुनते हुए आत्मा का, चेतना का, प्राणों का स्पंदन होता है । धर्म तुम्हारे रग रग में बस जाये । तुम्हारे जीवन में धर्म की साधना आ जाये । सत्संग करो, भजन करो, सिर को झुकाओ बहुत कुछ मिलेगा । धर्म तुम्हारे जीवन में आएगा । 

इस वर्षावास का अन्तिम त्रिदिवसीय आात्म: मौन साधना शिविर 4 से 7 नवम्बर, 2003 तक लगने जा रहा है । जो भाई बहिन साधना का स्वाद चखना चाहते हैं वे साधना शिविर में भाग लेकर अपने जीवन को उज्ज्वल बनावें ।

धन को शुभ कार्यों में लगाओ: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

मालेर कोटला 4 नवम्बर, 2003: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि-  अरिहंत की वाणी कल्याणकारी है । उनकी शरण, उनकी भक्ति हमारे जीवन में परम कल्याणकारी है । व्यक्ति जिसका संग करता है वैसा बनता है । संसार के सभी महापुरूषों ने एक ही बात कही, चाहे वे नानक, रज्जु, दादू, कबीर, मीरा, कृष्ण, प्रभु महावीर, भगवान बुद्ध उन्होंने एक ही बात कही प्रभु के चरणों में प्रीत लगा लो या मन में ध्यान लगा लो । भगवान बुद्ध ने कहा- दुःख है, दुःख का कारण है, कारण के उपाय है, उपाय से मुक्ति है परन्तु हमें दुःख से मुक्ति कैसे मिले इसके लिए हमें उपाय ढूॅंढ़ने पड़ेंगे ? दुःख से मुक्ति प्राप्त करनी हो तो अपने भीतर आ जाओ । अपने मन को ध्यान में लगा लो । प्रभु के चरणों में सब कुछ समर्पित कर दो । चैबीस तीर्थंकरों की स्तुति हम इसीलिए करते हैं कि हमारे भीतर उनके गुण आ जाये । हमारा जैसा चिन्तन होगा वैसी ही क्रिया  होगी । जब जीवन में धर्म होता है तो परीक्षा होती है । सत्य को स्वीकार करो । आवश्यकता देखकर संसार का फैलाव करो । अगर आपको एक रूम की आवश्यकता है तो उतने में ही अपना काम चलाओ, कोठी बनाने की जरूरत नहीं । एक गाड़ी में काम चलता है तो उतनी ही हमारे लिए काफी है । दुःख का कारण है तृष्णा, मोह, लोभ । तृष्णा से लोभ बढ़ता है और लोभ से दुःख आता है । संतोष को भीतर लाओ तो तृष्ण समाप्त हो जाएगी और लोभ मिट जाएगा । जितनी तुम्हारी तृष्णा होगी उतना ही जीवन लम्बा होता चला जाएगा । 

हाड बड़ा हरिभजन कर, द्रव्य बड़ा कुछ देय ।

अक्ल बड़ी उपकार कर, जीवन का सुख ये ।।

शरीर में ताकत हो तो हरि का भजन करो । ध्यान, स्वाध्याय करो । अगर धन है तो उसे लुटाओ, शुभ कार्यों में लगाओ । अक्ल है तो उपकार करो । अक्ल को सही दिशा में लगाओ । किसी कविने भी कहा है- 

              देने वाला ओर है देता है दिन रेन, ।

               लोग भ्रम मेरा करे, तासे नीचे नैन ।।

देने वाला परमात्मा मुझे दिन रात दे रहा है और लोग मेरा नाम लेते हैं । मेरे प्रति भ्रम करते हैं इसीलिए मैं अपनी आॅंखें नीचे रखता हूॅं । आप हमेशा यह सोचे कि जो देने वाला है वह हमें देता जाएगा, हम तो केवल उस धर को लुटाये, दान करें, दान की महिमा अपरम्पार है । बुद्धिमत्ता का उपयोग करो । धन को शुभ कार्यों में लगाओ । 

आचार्य भगवन् 6 नवम्बर, 2003 को के0एम0आर0डी0 जैन गल्र्स काॅलेज में अपना मंगलमय उद्बोधन प्रदान करेंगे, 7 नवम्बर, 2003 को शासन प्रभाविका महासती डाॅ0 सुनीता जी महाराज का पारणा 117 व्रतों का होगा, 8 नवम्बर, 2003 को आचार्य भगवंत प्रवचन के उपरान्त नामधारी काॅलेज में पधारेंगे, 9 नवम्बर, 2003 एस0 एस0 जैन सभा की ओर से भव्य विदाई समारोह होगा । आचार्य भगवन् का विहार मालेर कोटला से लुधियाना होते हुए पटियाला की ओर होगा ।

सुखी होना है तो राग-भाव छोड़ों: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

5 नवम्बर, 2003: मालेर कोटला: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री षिवमुनि जी महाराज ने श्रद्धालुओं को अमृतपान करवाते हुए कहा कि-

मेरे सत्गुरू मुझको देना सहारा कहीं छूट जाए न दामन तुम्हारा ।

सत्गुरू धन पद प्रतिष्ठा मान सम्मान नहीं देता वह हमें जीवन के अध्यात्म की ओर ले जाता है । सत्गुरू उसे कहते हैं जो तुम्हें सत्य की ओर ले जायें । सत्गुरू एक ईशारा है । यात्रा करते हुए माईल स्टोन यात्रा का सहारा बनते हैं । माईल स्टोन से हमें यह पता चलता है कि हमारी कितनी यात्रा हो चुकी है । सत्गुरू समता का कार्य करते हैं । हम जीवन में दुःखी है पर दुःख को स्वीकार नहीं करते । आज आपने सुख चाहा तो दुःख आने ही वाला है । सुख भी सही है और दुःख भी सही है । सुख को भोगो मत, उसे विस्तीर्ण करो, वह महासुख की ओर ले जाएगा । सत्गुरू मार्ग बताता है ।

दुःख का मूल परिग्रह मूच्र्छा है । राग-भाव मेरा पन, ममत्वभाव इन्हें छोड़ों, दुःख दूर हो जाएंगें । अधिकांश लोग तिजोरी भरने में जीवन व्यतीत करते हैं परन्तु उसका उपभोग नहीं कर पाते । आसक्ति, तृष्णा, मोह को छोड़ों, यही मूल है । कर्मबन्धन यहीं से होते हैं । सुखी होना है तो राग-भाव छोड़ों, क्रोध आया तो उसे शान्त-भाव से देखो । क्रोध चला जाएगा । जो करना है उसे शत् प्रतिशल करो और कामों में मन को न लगाओ । जो कार्य हाथ में लिया है उसको प्रथमता देकर पूर्ण करो । आसक्ति तोड़ों । अगर आसक्ति बनी रही तो यह जीवन धूलमय हो जाएगा । जीवन को साधों, जीवन को देखो । सत्गुरू यही कुछ देते हैं । जीवन को निर्मल बनाओ ।

आचार्य भगवन् 6 नवम्बर, 2003 को के0एम0आर0डी0 जैन गल्र्स काॅलेज में अपना मंगलमय उद्बोधन प्रदान करेंगे, 7 नवम्बर, 2003 को शासन प्रभाविका महासती डाॅ0 सुनीता जी महाराज का पारणा 117 व्रतों का होगा, 8 नवम्बर, 2003 को आचार्य भगवंत प्रवचन के उपरान्त नामधारी काॅलेज में पधारेंगे, 9 नवम्बर, 2003 एस0 एस0 जैन सभा की ओर से भव्य विदाई समारोह होगा । आचार्य भगवन् का विहार मालेर कोटला से लुधियाना होते हुए पटियाला की ओर होगा ।

मौन से शिक्षा शुरू होती है: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

6 नवम्बर, 2003: मालेर कोटला: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री षिवमुनि जी महाराज ने के0एम0आर0डी0 जैन गल्र्स काॅलेज के प्रांगण में श्रद्धालुओं को अमृतपान करवाते हुए कहा कि- आज के इस पावन प्रसंग पर काॅलेज के प्रांगण में आप सभी ने हमें श्रद्धा और भक्ति से बुलाया । महासतीवृंद का पदार्पण हुआ । काॅलेज में सुन्दर वातावरण होता है । सुन्दर वातावरण नई उमंग, नया जोश, नई क्रान्ति लेकर आता है । क्रान्ति का ऐसा अवसर काॅलेज के विद्यार्थियों को ही मिलता है । हमारा बचपन खेल कूद में बीतता है । युवावस्था में हम शिक्षा लेते हैं । 

जहाॅं भक्ति और प्रेम का वातावरण है वहाॅं मौन होता है । मौन महत्वपूर्ण है । मौन से भीतर शान्ति आएगी । अगर आपकी किसी से अनबन, क्रोध है या विषम अवस्था जीवन में आ चुकी है उस समय मौन रखो । मौन से शिक्षा शुरू होती है । अधिक पढ़ना लिखना जरूरी नहीं है । जो भी कुछ पढ़ो मौन होकर पढ़ो । शिक्षा में मौन के साथ ध्यान साधना का महत्व है । अगर हम किसी से बात करते हैं । वार्तालाप होता है वहाॅं पर अहंकार, तनाव आता है । एक क्षण का किया क्रोध जीवन की मित्रता को मिटाता है । आज की शिक्षा उच्च स्तर पर पहुंॅचने की शिक्षा है । अगर आप शिक्षा ग्रहण करते हुए संघर्ष और तनाव से पड़ते हो तो कुछ नहीं होता । मौन और शान्त होकर पढ़ो यह जीवन ज्ञान का प्याला है । ज्ञान को ऐसे पढ़़ों जो जीवन भर काम आए । वह ज्ञान जो हमें आनंद, प्रेम, मैत्री दे उस ज्ञान को अपनाओ, उसी ज्ञान को बाॅंटो, आनंद अपने आप बट जाएगा । मनुष्य बुद्धिमान है । बुद्धिमत्ता, प्रज्ञा उसके भीतर है । आवश्यकता है जागरूकता की । अगर वह जागरूक हो जाए तो जीवन का रूपान्तरण हो सकता है । 

जो आपने सीखा है उसे जीवन में लाओ । ध्यान करो, मन शान्त हो जाएगा । पाॅंच मिनिट भी ध्यान से चित्त शुद्ध, मन साफ हो जाता है । ध्यान आपके जीवन में जरूरी है । वीतरागता को भीतर लाओ, जीवन निर्मल हो जाएगा । भीतर देखों कितना अहंकार, क्रोध, द्वेष, ईष्र्या भरी है, उसे दूर करो । सत्संग करो । वृद्धों का सहारा बनो, उनकी सेवा करो । किसी के घर अॅंधेरा हो तो उसके घर भी दीया जलाओ । ज्ञान, ध्यान और मौन का दीया जलाओ । श्रद्धा रखो, विश्वास करो, सब कुछ मिल जाएगा । विनम्रता को प्राप्त करो । अपने जीवन को बाहरी नशाओं से मुक्त करो । नशा एक कीड़ा है जो सम्पूर्ण शरीर को खोखला बना देता है । काॅलेज में आए सभी महानुभावों को मैं अपनी ओर से, श्रमण संघ की ओर से साधुवाद देता हूॅं और सबके प्रति मंगल की कामना करता हूॅं ।

तपस्विनी महासती डाॅ0 सुनीता जी महाराज वर्षावास प्रारंभ से ही तपस्या में लीन है । आज उनके 117 उपवास है । कल 7 नवम्बर, 2003 को उनके 117 व्रतों की पूर्ति होगी । महासतीजी ने दीर्घ तपस्या कर शासन को गौरवान्वित किया है और श्रमण संघ की शान बढ़ाई है एतदर्थ में महासतीवृंद एवं समस्त समाज को हार्दिक साधुवाद देता हूॅं ।

आचार्यश्रीजी का मालेर कोटला का ऐतिहासिक चातुर्मास

भाव-भीना विदाई समारोह

श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज का ऐतिहासिक चातुर्मास 35 वर्ष पूर्व हुए द्वितीय पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री आनंद ऋषि जी महाराज की स्मृतियों को उजागर कर गया । आचार्य पद की महिमा और गरिमा जो हमने 35 वर्ष पूर्व आचार्य श्री आनंद ऋषि जी महाराज में अनुभव की थी, उसी गरिमा को चार चाॅंद लगाते हुए वर्तमान आचार्यश्रीजी ने मालेर कोटला के इतिहास में अपने नाम को स्वर्णिम अक्षरों में लिख दिया । मालेर कोटला का हिन्दू, मुस्लिम, जैन, सिक्ख सभी भाईयों ने इस चातुर्मास में सक्रियता से सहभाग लिया । सत्संग के लाभ के साथ-साथ स्कूलों, काॅलेजों, जेलों में आचार्यश्रीजी के प्रभावक प्रवचन बाल संस्कार शिविर, आत्म ध्यान साधना शिविर, विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के कार्यक्रम प्रत्येक वर्ग को प्रभावित कर गये । क्या बाल, क्या युवा पढ़े लिखे विद्वान, डाॅक्टर, मौलवी सभी आचार्यश्री की विद्वत्ता, सरलता एवं प्राज्ञता से प्रभावित रहे । आपश्रीजी के निर्देशन में अनेकानेक जन सेवा के कार्यक्रम हुए । जिसमें मानव सेवा, जीव दया, गौ-सेवा, गरीबों को अन्नदान, वस्त्रदान, सिलाई मशीनों का वितरण आदि प्रमुख है । 

संगठन

श्रमण संघ के संगठन एवं सामाजिक कुरीतियों के उन्मूलन हेतु आचार्यश्री के सान्निध्य में समय समय पर देश भर के प्रमुख लोगों ने अपने विचार आचार्यश्री की सेवा मे ंरखें एवं आचार्यश्री से मार्गदर्शन प्राप्त किया । आचार्यश्रीजी के जन्म दिन पर आयोजित राष्ट्रीय सम्मेलन एवं विश्व मानव मंगल मैत्री  अभियान का प्रारंभ एक संघ में जागरण लाने हेतु एवं देश भर के साधु साध्वियों श्रावक श्राविकाओं को रचनात्मक कार्यक्रमों में जोड़ने का एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम हुआ । प्रतिवर्ष आचार्यश्रीजी के निर्देशन में अक्षय-तृतीया पर प्रान्तीय सम्मेलन एवं 18 सितम्बर को राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित करने का निर्णय लिया गया । 

तप अभिनन्दन

आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज के सान्निध्य में महासतीवृंद की दीर्घ तपस्याओं का आयोजन हुआ जिसमें तपस्विनी महासती डाॅ0 सुनीता जी महाराज ने 117 उपवास प्रथम बार जीवन में   किये । ये तप उनका शासन प्रभावना की दृष्टि से महत्वपूर्ण रहा । तप आराधना के अन्तर्गत अधिकांशतः वे चोविहार साधना करते रहे । अन्तिम आठ दिन उन्होंने सम्पूर्ण चैविहार उपवास किये । तपस्या के बीच दो बार केसर की वर्षा और प्रतिदिन स्वाध्याय एवं प्रवचन में आना और अपनी नित्य क्रियाओं के साथ बड़ी ही सहजता से तपस्या की । इस अवसर पर श्रमण संघ की ओर से उन्हें आचार्यश्रीजी ने ‘शासन प्रभाविका तप रत्नेश्वरी’ के पद से अलंकृत किया । साथ ही महासती श्री सुमित्रा जी महाराज एवं महासती श्री संतोष जी म0 को ‘सव्रतोभद्र तप आराधिका’ के पद से अलंकृत किया । महासती श्री ऊषा जी महाराज को 71 आयम्बिल के उपलक्ष में ‘तपज्योति’ के पद से अलंकृत किया । इसके पूर्व महासती श्री अचला जी महाराज को 41 उपवास के उपलक्ष में ‘तप चन्द्रिका’ के पद से अलंकृत किया । इसके साथ साथ प्रस्तुत वर्षावास में सैकड़ों की संख्या में अठाईयाॅं, कष्टी तेले, सामूहिक तेले एवं विविध तपस्याएॅं सम्पन्न हुई । 

आत्म ध्यान साधना शिविर

चातुर्मास के प्रारंभ से ही आत्म ध्यान साधना शिविरों का आयोजन होता रहा जिसमें पंचदिवसीय एवं त्रिदिवसीय मौन साधना शिविरों का आयोजन विशेष रहा । सम्पूर्ण चातुर्मासकाल में पन्द्रह साधना शिविरों का आयोजन हुआ । जिसके अन्र्गत सैकड़ों साधकों ने आत्म, आनंद, सुख, समृद्धि एवं मैत्रीपूर्ण जीवन जीने की कला सीखी । शरीर मन से परे आत्मा को कैसे शुद्ध करना, चित्त को कैसे शान्त रखना ये सारी प्रक्रिया इन साधना शिविरों में  सिखाई  गयी । इसके  अलावा  एस0  एस0 जैन  माॅडल  स्कूल, के0एम0आर0डी0 जैन काॅलेज, मालेर कोटला जेल, बरनाला जेल, अम्बाला केन्ट आदि क्षेत्रों में भी ध्यान योग साधना के विशेष शिविरों का आयोजन हुआ जिससे समाज के सभी वर्ग प्रभावित हुए । व्यसन मुक्ति एवं अहिंसा एवं शाकाहार का विशेष प्रचार किया गया । सभी को शुद्ध धर्म एवं जीवन जीने की कला का प्रशिक्षण दिया गया । मालेर कोटला के सभी शिविरों का सौजन्य श्री प्रमोद जैन के माताजी श्रीमती सुशीला श्री श्रीपाल जी जैन परिवार की ओर से किया गया । 

जन्म जयंतियाॅं

आचार्यश्रीजी के चातुर्मास में अनेक महापुरूषों की जन्म जयंतियाॅं का आयोजन दान, शील, तप भावना के द्वारा सम्पन्न हुई । जिसमें प्रमुख रूप से आचार्य सम्राट् पूज्य श्री आत्माराम जी महाराज, आचार्य सम्राट् पूज्य श्री आनंद ऋषि जी महाराज, आचार्य सम्राट् पूज्य श्री देवेन्द्र मुनि जी म0, उत्तर भारतीय प्रवर्तक श्री भण्डारी जी म0, पंजाब प्रवर्तक श्री शुक्लचंद जी म0, जैन दिवाकर श्री चैथमल जी महाराज, लोकाशाह जयंती, उपाध्याय श्री कस्तूरचंद जी महाराज की दीक्षा जयंती मनाई गई । इन सभी जयंतियों में सामूहिक रूप से कष्टी तेले, उपवास, आयम्बिल, एकासन आदि तप करवाये गये । साथ ही सामायिक दिवस के रूप में भी मनाये गये । 

इन सभी महापुरूषों की जन्म जयंतियों के उपलक्ष में जन सेवा के कार्यक्रम के अन्तर्गत बच्चों के लिए फ्री मेडीकल चैकअप केम्प, रक्तदान शिविर, फ्री हार्ट चैकअप केम्प, आॅंखों के चैकअप केम्प आदि जन सेवा के कार्यक्रम हुए । साथ ही आचार्य सम्राट् श्री शिवमुनि जी महाराज के जन्म दिवस से ही प्रत्येक रविवार को गुरूभक्तों की तरफ से लंगर सेवा का कार्यक्रम चल रहा है । जो अभी तक के इतिहास में प्रथम बार आरंभ हुआ, इससे जैन अजैन समाज में जैन धर्म की अत्यधिक प्रभावना हो रही है । इसी प्रकार यह लंगर कार्यक्रम आगे भी चलता रहेगा । 

आगम प्रकाशन

आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज के निर्देशन में भगवान महावीर मेडीटेशन एण्ड रिसर्च सेन्टर ट्रस्ट द्वारा आत्म ज्ञान श्रमण शिव प्रकाशन समिति के अन्तर्गत श्रमण संघ के प्रथम पट्टधर आचार्य सम्राट् श्री आत्माराम जी महाराज के द्वारा टीका लिखे हुए शास्त्रों का पुनः प्रकाशन हुआ जिसमें आचारांग सूत्र भाग 1-2 के प्रकाशन में मालेर कोटला वासियों का विशेष सहयोग रहा । साथ ही दशवैकालिक, उत्तराध्ययन सूत्र भाग 1- 3, अन्तकृतदशांग सूत्र, अनुत्तरोपपातिक सूत्र, उपासकदशांग सूत्र आदि प्रकाशित हो चुके हैं । शेष आगम प्रकाशनाधीन है । सभी संघों को चाहिए कि स्वाध्याय हेतु अपने अपने श्रीसंघों की लाईब्रेरी हेतु अपने आगम बुक करें ताकि भविष्य में आने वाले साधु साध्वियों को स्वाध्याय हेतु उपलब्ध हो सके, इस हेतु आप सम्पर्क कर सकते हैं । 

विनतियाॅं

समय समय पर आचार्यश्रीजी के आगामी चातुर्मास हेतु देश के कोने कोने से विनतियों का कार्यक्रम चलता रहा जिसमें प्रमुख रूप से इंदौर, उदयपुर, फरीदाबाद, जालंधर, चण्डीगढ़ आदि क्षेत्रों का विशेष आग्रह रहा । आचार्यश्रीजी ने इस वर्ष उत्तर भारत में ही चातुर्मास करने की भावना अभिव्यक्त है । विधिवत घोषणा यथा समय की जाएगी । 

सेवा

स्थानीय श्रीसंघ की सेवाएॅं अविस्मरणीय रही । स्थानीय श्रीसंघ के सभी पदाधिकारीगण एवं महावीर युवक मण्डल, वर्द्धमान युवक मण्डल, प्रार्थना मण्डल, पार्वती जैन महिला मण्डल, लंगर कमेटी, जैन मिलन, तपा बिरादरी, सनातन धर्म सभा, डेरा बाबा नरसिंहदास कमेटी एवं समस्त गुरूभक्तों ने बड़ी श्रद्धा और निष्ठा के साथ इस चातुर्मास का लाभ लिया । श्री वेदप्रकाश कमल जी जैन ने सम्पूर्ण चातुर्मासकाल में कोरियर सेवा का लाभ लेकर सम्पर्क कार्यक्रम में सहयोग दिया । श्री प्रेमचंद जी जैन प्रेम प्रोपर्टीज वालों ने चार माह तक अतिथि सेवा का लाभ लिया । इसके साथ ही संघ के सक्रिय कार्यकर्ता प्रधान श्री रतनलाल जी जैन, चातुर्मास समिति के चेयरमैन श्री प्रेमचंद जी जैन, महामंत्री श्री सुदर्शन जैन, मंत्री श्री प्रमोद जैन, श्री राकेश जैन, श्री सुरेश जैन, श्री धर्मदेव जैन, श्री मनीष जैन, श्री जसवंतराय जैन, श्री अमीष जैन,     श्री वीरेन्द्र जैन, श्री राममूर्ति जैन, श्री चमनलाल जैन, श्री अनिल जैन, श्री दीपक जैन, श्री भूषण जैन, श्री तीर्थ जैन, श्री संजय जैन, श्री सतीश जैन श्री प्रमोद जैन, श्री विमल जी जैन आदि सभी कार्यकर्ताओं का अभूतपूर्व सहयोग रहा ।

प्रवचनों द्वारा जिनशासन की प्रभावना

आचार्यश्रीजी के सर्वधर्म समभाव एवं जीवनोपयोगी प्रवचनों से स्थानीय जनता एवं विद्वद परिषद आपसे विशेष प्रभावित रही । देश के कोने कोने से आए हुए भक्तों के साथ साथ प्रतिदिन हजारों की संख्या में धार्मिक बन्धुओं ने लाभ लिया । आस्था चैनल के माध्यम से पूरे विश्व में जिनवाणी के प्रचार प्रसार हेतु लुधियाना निवासी श्री प्रेमसागर जी जैन. . . . . . . . का सहयोग विशेष अनुकरणीय रहा जिससे प्रतिदिन सभी श्रद्धालु आचार्यश्री की वाणी का लाभ लेकर उनके हृदय से जुड़े रहे । 

विदाई संदेश

चातुर्मास का समापन समारोह आप सबकी हार्दिकता, श्रद्धा, प्रेम भक्ति, आपके हृदय में विदाई का वातावरण परमादरणीय महासतीजीवृंद की हार्दिकता । शासन के प्रति गौरव के भूमिका सदा-सदा के लिए याद रहेगी । आज का दिन क्षमायाचना का दिन है । सम्पूर्ण वर्षावास में किसी भी संत साध्वी या मेरी ओर से किसी की बात न सुनी गई हो या कम ज्यादा बोला गया हो तो में आप सभी से क्षमा-याचना करता   हूॅं ।

आज जैन दिवाकर श्री चैथमल जी महाराज की  134 वीं जयंती है । आपने अपनी दीक्षा पर्याय में प्रवचन साहित्य सर्जन कर जैन समाज को एक बड़ी दे नदी है । आपके भीतर त्याग और वैराग्य की भावना भरी हुई थी । उपाध्याय श्री कस्तूरचंद जी महाराज का भी आज दीक्षा दिवस है । मैंने आपके दर्शन किये । आप सम्मुख व्यक्ति के चेहरे के भाव देखकर ही सब कुछ बता देते थे । महासती श्री कौशल्या जी महाराज ने मेरी जन्म-पत्री आपके पास भेजी थी, उस समय आपने कहा था कि यह व्यक्ति उच्च पद पर आसीन होगा । व्यक्ति जितना साधक, प्रज्ञावान होता है वही बड़ा होता है । क्रान्तिकारी वीर लोकाशाह ने भी क्रान्ति का बिगुल बजाया । आज उनकी जयंती पर भी हम उनको भी स्मरण करते हैं । 

चार चीजों का हमेशा ध्यान रखना । पैसा न हो फिर भी दान का भाव हमेशा रखना । आप समर्थ हो, फिर भी क्षमा का भाव हमेशा भीतर रखना । आपके पास सभी प्रकार की सुख सुविधाएॅं है फिर भी तप करना और जवानी की अवस्था में इन्द्रियों का निग्रह करना । अपमान को पीना ही साधना का अंग है । सेवा करो । लंगर लगाओ । दीन दुखियों की पीड़ा सुनो । 

           ऋतु बीत चुकी है बरखा की, अब बीत के मारे रहते हैं ।

            रोते हैं रोने वाले की आॅंखों में, आॅंसू बहते हैं । ।

          दिल तोड़ कर जाने वाले सुन । दो ओर भी रिश्ते बाकी है ।

         एक सांस में डोरी अटकी है एक प्रेम में बन्धन रहता है ।।

इन पंक्तियों को हमेशा याद रखना । मिल-जुलकर रहना । साधना  और सेवा में अपने आपको लगाना ।

आगामी कार्यक्रम

यहाॅं से आचार्यश्रीजी का विहार लुधियाना की ओर हो रहा है जहाॅं पर 16 नवम्बर, 2003 को उप प्रवर्तिनी महासती श्री मोहनमाला जी म0 के 131 उपवास के उपलक्ष में कार्यक्रम होने जा रहा है । इस अवसर पर उपाध्याय श्री रमेश मुनि जी म0, उत्तर भारतीय प्रवर्तक श्री अमर मुनि जी म0, सलाहकार श्री रतनमुनि जी म0, उप प्रवर्तक डाॅ0 राजेन्द्र मुनि जी म0, उप प्रवर्तिनी महासती श्री कौशल्या जी म0, उप प्रवर्तिनी महासती श्री सरिता जी म0, महासती डाॅ0 पुनीत ज्योति जी म0, महासती श्री आदर्शज्योति जी महाराज आदि ठाणा 100 के लगभग साधु साध्वीवृंद आचार्यश्रीजी से मार्गदर्शन प्राप्त करने हेतु लुधियाना इस अवसर पर पहुंॅच रहे हैं । 

लुधियाना से आचार्यश्रीजी गोविन्दगढ मण्डी, नाभा, धूरी, संगरूर होते हुए पटियाला 14 दिसम्बर, 2003 को तप रूप रत्नेश्वरी महासती श्री शुभ जी महाराज के 175 की तपस्या के उपलक्ष में आयोजित अभिनन्दन कार्यक्रम में पधार रहे हैं वहाॅं पर भी बड़ी संख्या में साधु साध्वीवृंद एवं हजारों की संख्या में श्रावक श्राविकाएॅं पहुॅंच रहे हैं । आगे आचार्यश्रीजी हरियाणा के क्षेत्रांे को फरसने के भाव रखते हैं । 

 

प्रमोद जैन

    मंत्री  श्री एस0 एस0 जैन सभा

         मोती बाजार, मालेर कोटला {पंजाब}

जिन्होंने आत्म स्वरूप को जान लिया वे जिन है: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

7 नवम्बर, 2003: मालेर कोटला: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री षिवमुनि जी महाराज ने आत्म शिव दरबार के प्रांगण में श्रद्धालुओं को अमृतपान करवाते हुए कहा- हम जैसा चिन्तन करते हैं वैसे हो जाते हैं । जीवन में हम किसको प्रमुखता देते हैं यह बात आवश्यक है । प्रभु महावीर ने सर्वोत्तम स्थान स्व अर्थात् निज को अपने आपको दिया है । प्रभु महावीर ने फरमाया- निज को देखते, देखते जिन हो जाओ और वे स्वयं भी निज को देखते देखते जिन हो गये । जिन का अर्थ है जिन्होंने आत्म स्वरूप को जान लिया । जो शुद्ध, बुद्ध, चैतन्यमय हो गये । यह भावना हमारे भीतर रहे कि मैं शिव रूप हूॅं । 

मैं अजर अमर आत्मा हूॅं । आत्मा अमर है । चेतना यह जीव अनंतकाल से भिन्न-भिन्न योनियों में भटक रहा है । कभी हम पशु, पक्षी, मानव, देव, नरक, तिर्यंच नाना प्रकार की योनियों में भटक रहा है । प्रभु की वाणी का सार क्या है ? मैं कौन हूॅं । कोऽहं - मॅैं वहीं हूॅं जो तूं है, सोऽहं । इन दो शब्दों में जीवन की यात्रा पूर्ण हो जाती है । अपने आपसे यह प्रश्न बार-बार पूछो, तब आपको पता लगेगा कि मैं कौन हूॅं । आत्मज्ञानी बनो । अपने को जानो । आत्म-ज्ञान से बढ़कर कुछ भी नहीं है । सोने, हीरे, जवाहरात और आत्म-ज्ञान दोनों बराबर है । चैबीस तीर्थंकरों ने आत्म-ज्ञान पाने का उपदेश दिया और स्वयं उसका अनुसरण किया । साधना का मार्ग सरल भी है और कठिन भी है । शासन प्रतिपल प्रतिक्षण परीक्षा लेता है । गलती करना या गलती होना कोई बड़ी बात नहीं है । गलती को बताना भी बुरा नहीं   है । भीतर के शल्य और काॅंटों को निकालो । इस संसार में जो हो रहा है वह सब ठीक है ।

चातुर्मास का अन्तिम चरण चल रहा है । वर्षावास में अनेक तपस्याएॅंे हुई । महासतीवृंद ने भी तपस्या के क्षेत्र में भी अपना नाम सर्वोच्च स्थान पर रखा जिसमें तप्त तपस्विनी, तप रत्नेश्वरी, शासन प्रभाविका महासती डाॅ0 सुनीता जी महाराज ने 117 उपवास करके इस वर्षावास में तप के क्षेत्र में अपना एक स्थान दर्शाया है । उपवास मंगल है, तो पारणा भी मंगल है । आज महासतीजी का पारणा है । हम महासतीजी का अभिवादन करते हैं । 9 नवम्बर, 2003 एस0 एस0 जैन सभा की ओर से भव्य विदाई समारोह होगा । आचार्य भगवन् का विहार मालेर कोटला से लुधियाना होते हुए पटियाला की ओर होगा ।

जीवन पानी के बुलबुले के समान है: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

8 नवम्बर, 2003: मालेर कोटला: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री षिवमुनि जी महाराज ने आत्म शिव दरबार के प्रांगण में श्रद्धालुओं को अमृतपान करवाते हुए कहा- मानव का जीवन बहुत छोटा सा जीवन है । यह जीवन पानी के बुलबुले के समान है । तृषा के अग्र भाग पर ओस की बूॅंद की भाॅंति मानव का जीवन है । ओस की बूॅंद सूरज निकलने से पूर्व चमकती है, लगता है जैसे मोती ही  हो, परन्तु जब सूरत निकलता है तो वह मिट जाती है । बचपन, जवानी, बुढ़ापा इन तीन अवस्थाओं में मानव का जीवन बीत जाता है । प्रकृति इंतजार नहीं करती है । तीर्थंकर की प्रार्थना पूजा अर्चा करोगे हमारा जीवन निर्मल होगा । एक स्मृति, तृप्ति का भाव भीतर होना चाहिए । अरिहंत प्रभु के सिवाय यह जीवन खाली है । अरिहंत का सिमरन करो । माना कि अमावस है, अंधेरी रात है परन्तु दीया तो हम जला ही सकते हैं । भीतर का दीया जलाओ । ज्ञान का दीया जलाओ । सृष्टि का विनाश जब होता है तब शिव अपना तीसरा नेत्र खोलते हैं । सत्गुरू की याद और सत्य पर जीवन यह हमारा आदर्श होना चाहिए । अपना जीवन खुद जीओ । अपना निर्णय स्वयं करो । आत्म-ज्ञान को प्राप्त करो । 

सेवा की भावना भीतर रहे । अतिथि घर पर आए तो उसे कुछ न कुछ अवश्य दो । कबीरजीने भी कहा है- ’खाऊ पीऊ सो सेवा, उठू बैठूं सो परिक्रमा ।’ उन्होंने कहा- जो में खाता पीता हूॅं और ओरों को खिलाता हूॅं वह मेरे लिए सेवा स्वरूप है । मैं उठता और बैठता हूॅं इतने में ही परिक्रमा हो जाती है । परमात्मा सबका भला करें । ना हमारी किसी से दोस्ती हो और न ही किसी से वैर हो । जीवन को ज्ञानी की भाॅंति कमलवत् जीओ । जीवन में सुख, दुःख, लाभ, हानि, विषम परिस्थितियाॅं एवं सम परिस्थितियाॅ है  फिर भी हम समाधान में कैसे जीयें ? समाधान में जीने हेतु हम ध्यान साधना का अवलम्बन लेवें और अपने जीवन को सफल बनावें ।

आज चातुर्मास का अन्तिम दिन है । इस पूरे वर्षावास मे ंआपने क्या पाया इसकी चर्चा हम कल करेगें । वैसे ही जैन दिवाकर श्री चैथमल जी महाराज, उपाध्याय श्री कस्तूरचंद जी म0 जयंती और लोकाशाह जयंती एवं विदाई समारोह कल बड़े ही हर्षोल्लास से लाल बाजार स्थित ‘आत्म शिव दरबार’ में मनाया जाएगा ।

धर्म कोहीनूर हीरे की भाॅंति है: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी म0

श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने श्रद्धालुओं को अमृतपान करवाते हुए कहा कि- प्रभु नाम पल - पल उचारा करो तुम, न पापों में जीवन गुजारा करो तुम---’ ये पक्तियाॅं हमें नाम स्मरण करने का संदेश देती है । हम अपने जीवन में प्रभु नाम का स्मरण करते हैं तब अपने आप हमारा जीवन प्रभु की ओर मुड़ जाता है । पल पल जब हम नाम स्मरण करते हैं तब जो हमारा जीवन है वह षुभ कार्यों में लग जाता है । नाम स्मरण करते हुए जब व्यक्ति तल्लीन हो जाता है तब नाम स्मरण स्वतः ही होता है । नवकार मंत्र का सिमरन करने से हमारे भीतर के भाव शुद्ध होते हैं । नवकार मंत्र का सिमरन हम प्रायः मुख से करते  हैं, परन्तु भीतर के भाव अगर नहीं होते तो वह सिमरन, सिमरन नहीं माना जाएगा । महत्वपूर्ण नाम स्मरण नहीं है ? महत्वपूर्ण है तुम्हारे भीतर के भाव । जब तुम भीतर डुबकी लगाकर बैठ जाते हो तो भीतर बहुत आनन्द आता है । श्रद्धा का, विश्वास का दीपक जलता है । अन्धकार से व्यक्ति प्रकाश की ओर मुड़ता है तो स्वतः ही हमें परम सुख और परम शान्ति का अनुभव होता है । इसी को ही हम सामायिक, प्रार्थना, ध्यान कहते हैं । मूल है भीतर के भाव, अगर भीतर के भाव शुद्ध होंगे तो स्वतः ही चित्त समता में आ जाएगा और सामायिक हो जाएगी । जिस प्रकार मिठाई का मूल शक्कर है । अगर मिठाई में शक्कर न डाली जाये तो वह मिठाई नहीं कहलाएगी, उसी प्रकार घी का मूल दूध है, चाहे हम दही बना ले, लस्सी बना ले अथवा मक्खन बना ले ।

मूल है सिमरन । हम किस भाॅंति प्रभु का स्मरण करते हैं, किस भाॅंति उसे याद करते हैं । जन्म से हमें जैसे संस्कार मिले हैं अन्त तक हम उन्हीं संस्कारों के आधार पर जीते हैं । महात्माॅं गाॅंधी को अमरीका से एक सज्जन व्यक्ति का प्यार भरा पत्र प्राप्त हुआ, उसमें लिखा था- प्रिय बापू जी ! आप गीता को मानते हो, आप हिन्दू हो तो क्या मैं भी गीता को अपने जीवन में मान्यता देकर हिन्दू बन जाउॅं । तब महात्मा गाॅंधी जी ने प्रत्युत्तर में उस सज्जन को कहा कि- तुम जिस धर्म में हो, जैसे हो, जिसको मानते हो उसी को मानो । परन्तु शर्त एक ही है मानते हुए सच्चाई का परिचय दो । सत्य को अग्रसर करो । अगर सत्य आपके जीवन में आएगा तो अपने आप धर्म से, मान्यता से हम उपर उठ जायेगें । यही बात महावीर की सामायिक कहती है । नानक का सिमरन कहता है । बुद्ध का ध्यान कहता है । पातांजलि का योग कहता है और रमण महर्षि की समाधि कहती है । महापुरूष  कहते हैं कि जब तुम भीतर डूबकी लगाओ तब अपने घर परिवार को, साथीजनों को एवं संसार को इस भाॅंति भूल जाओ जैसे तुम्हारा इस विश्व में कोई भी नहीं है । भीतर हर पल यही भाव रहने चाहिये कि मैं कहाॅं से आया हूॅं ? मैं कौन हूंॅ ? मेरा अस्तित्व कैसा है ? उस समय आपका भीतर से रूपान्तरण होगा । चिन्तन करते हुए धर्म रूपी कोहीनूर हीरा प्राप्त होगा, तब तुम्हारे भीतर धर्म पल्लवित पुष्पित होगा और धर्म ही इस जीवन नैय्या को पार लगाएगा । धर्म एक पुण्य पाथेय स्वरूप है, उस पुण्य पाथेय को कमाने के लिए तपस्या, जप, तप, सामायिक करो और अपने जीवन को सफल बनाओ ।

31 अप्रेल, 2004 को आचार्यश्रीजी जैन टेडर्स, 99- इण्डस्टीयल एरिया में पधारे । 1 अप्रेल, 2004 को प्रातः 8.30 से 10.00 बजे तक 14 इण्डस्टीयल एरिया, अम्बाला छावनी में आचार्यश्रीजी का प्रवचन   होगा प्रवचन के पश्चात् विहार कर महावीर भवन, कालीबाड़ी चैक, अम्बाला छावनी जैन स्थानक में  पधारेंगे । उनके सान्निध्य में महावीर जयन्ती का कार्यक्रम दिनाॅंक 3 अप्रेल, 2004 को बाबापूर्णचंद जी समाधि स्थल, जगाधरी रोड़, अम्बाला छावनी में मनाई जाएगी । यह जानकारी संघ प्रधान श्री अनिल जैन ने दी । आचार्यश्री के निर्देशन में त्रिदिवसीय आत्म: ध्यान साधना शिविर भी 4-5-6 अप्रेल, 2004 को अम्बाला कैंट में लगने जा रहा है । 

जो धारण किया जाये वह धर्म है: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी म0

श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने श्रद्धालुओं को उद्बोधन देते हुए फरमाया कि- मानव जीवन की तीन अवस्थाएॅं, बचपन, बुढापा और  जवानी । बचपन भोलेपन में बीत जाता है, जवानी अहंकार में, ऐशो आराम और मौज मस्ती में बीत जाती है । बुढापा जब निकट आता है तब धर्म की याद आती है । धर्माचरण करना चाहता है परन्तु अवस्था ऐसी है कि वह धर्म का आचरण नहीं कर  पाता । ये तीनों मानव जीवन के तीन पडाव है, जिनके भीतर धर्म का आचरण करने से यह जीव सुख शान्ति का अनुभव करता है । शाश्वत सुख आनन्द अगर प्राप्त करना है तो उसके लिए एक ही उपाय है वह है धर्म की आराधना, धर्म का आचरण, धर्म में लीन होना । 

धर्म शब्द बहुत ही व्यापक है इसकी व्याख्या अगर पूर्ण जीवन लगाकर भी की जाये तो भी पूर्ण नहीं हो सकती, ऐसी अलौकिक निधि है धर्म । आज धर्म के नाम पर अत्याचार, युद्ध चल रहे हैं जितनी हिंसा हो रही है वह धर्म के नाम को लेकर ही हो रही है । सम्प्रदायवाद, जातिवाद धर्म के नाम पर ही बढ रहा    है । हर व्यक्ति यह सोच रहा है कि मैं मन्दिर, मस्जिद, गुरूद्वारा या स्थानक में जाऊ, तो मुझे धर्म मिल सकता है । परन्तु वह व्यक्ति यह नहीं सोचता कि धर्म प्रतिपल, प्रतिक्षण होता है । अगर जीवन में धर्म आ जाये तो उस व्यक्ति को हर जगह मन्दिर, मस्जिद, गुरूद्वारा ही दिखाई देते हैं । धर्म की व्याख्या में व्याख्याकार बतलाते हैं कि जो धारण किया जाये वह धर्म है, जो अंगीकार किया जाये, जो स्वीकार किया जाये, जिसमें हम स्वतः रम जाये, लीन हो जाये वही धर्म है । धर्म आप किसी अवस्था में या कहीं पर भी धारण कर सकते हैं । धर्म की शुरूआत हमारे जीवन की शुरूआत है जिस प्रकार शरीर में श्वांस आ रहा है, धडकन चल रही है, नसों में रक्त का प्रवाह हो रहा है यह हर कार्य धर्म से ही हो रहा है । जो सब जगह विद्यमान है । जिसमें हमें आनन्द, शान्ति, समता, प्रेम मैत्री की अनुभूति हो वह धर्म है । वह धर्म हमारे जीवन में आना चाहिये । 

महर्षि वेदव्यास ने अठारह पुराण का सार बतलाते हुए धर्मोंपयोगी दो ही बातें बतलाई । जो भी परोपकार हो रहा है वह पुण्य है और जो अधम एवं नीच कार्य हो रहे हैं वह पाप   है । जब आप किसी का हित चाहते हो, किसी के प्रति मंगल कामना करते हो तो पुण्य हो जाता है । जब आप किसी को काॅंटे चुभोते हो, किसी को शूली पर लटकाते हो, किसी का बुरा सोचते हो तो पाप मार्ग में प्रवृत्त हो जाते हो । पुण्य का संचय, सारे पापों को छोडना और चित्त को शुद्ध करना यह भी धर्म की एक विधि है । इसी प्रकार बुद्ध के अनुयायियों में श्वांस प्रश्वांस को देखना यह एक विधि बतलाई । उसी प्रकार बाबा फरीद के पास कोई व्यक्ति आया, उसे धर्म की प्राप्ति या परमात्मा की प्राप्ति की इच्छा थी, परमात्मा की प्राप्ति के लिए बाबा फरीद ने भी उसे एक विधि बतलाई ।उसमें उन्होंने बतलाया कि सर्वप्रथम शान्त बैठकर श्वांस प्रश्वांस पर ध्यान लाओ, उसके अनन्तर तुझे विचार आयेगें, तू उसे देखते रहना, फिर शून्यता का अनुभव होगा, फिर घबराहट होगी और फिर अपने आप भीतर ही भतर परम शान्ति का अनुभव होगा और मंत्र जाप यह सिमरन अपने आप ही होने लगेगा । प्रभु को पाने के लिए तेरी उत्कंठा बढती जाएगी और तुझे परम आनंद, सुख, शन्ति का अनुभव   होगा । 

आचार्यश्रीजी ने अन्त में बतलाया कि ध्यान करने की अथवा समता में आने की अनेकों विधियाॅं है । उन विधियों द्वारा हम अपना जीवन का रूपान्तरण कर सकते हैं उनमें से कुछ विधियाॅं त्रिदिवसीय ध्यान साधना शिविर में दी जाती है । यह साधना शिविर 4 से 6 अप्रेल, 2004 तक एस0 एस0 जैन सभा, काली बाड़ी चैक, अम्बाला कैंट में  शुरू होने जा रहा है । आप सभी इसका अधिक से अधिक लाभ उठायें ।

अहंकार को निर्मूल कर प्रभु महावीर का जन्मोत्सव मनाओ

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

अम्बाला कैंट 2 अप्रैल, 2004: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज एवं दिगम्बर जैन आचार्य विद्याभूषण श्री सन्मति सागर जी महाराज के भगवान महावीर जन्म जयंती के एक दिवस पूर्व जैन धर्म की एकता, संगठन एवं समन्वयवाद का परिचय देते हुए अम्बाला कैंट जैन स्थानक में सामूहिक प्रवचन हुए । इस अवसर पर आचार्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने प्रवचन में फरमाया कि- जैन धर्म का मूल हृदय है नम्र हो जाना, समर्पण करना । जब व्यक्ति समर्पित भाव से अरिहंतों को नमन करता है तो उसके भीतर निर्दोषता, सहजता, पवित्रता, शुद्धता का स्ोत प्रवाहित होने लगता है । सारे संकल्प विकल्प, परम्पराएॅं, शरीर के अंग गौण हो जाते है, उसके भीतर शान्ति का प्रवाह प्रस्फुटित होने लगता है । जिस प्रकार मनुष्य संसार के कार्यों में लीन हो जाता है उससे भी अधिक मनुष्य प्रभु की भक्ति में लीन हो जाये तो उसकी साधना सफल हो जाती है । जब आकाश में सूर्य होता है तो चन्द्र, तारे गौण हो जाते हैं उसी प्रकार प्रभु महावीर लोक में ज्ञान का प्रकाश करने वाले सूर्य थे । जब तक वे थे तब तक कोई सम्प्रदाय नहीं था उनके जाने के बाद तारे और दीपक के समान विभिन्न सम्प्रदाय अपना अस्तित्व दिखाने लगे । सूर्य की अनुपस्थिति में जैसे तारे और दीपक का महत्व है, उसी प्रकार वर्तमान में सम्प्रदायों का महत्व है लेकिन सम्प्रदाय से ऊपर उठकर हम धर्म को महत्व दें, मानव धर्म को समझें, भगवान महावीर की अहिंसा, अनेकान्त, अपरिग्रह को जन-जन तक पहुंॅचायें । व्यवहारिक स्तर पर ध्यान और मौन के माध्यम से विश्व में शान्ति का वातावरण निर्मित करें तो भगवान महावीर की जयंती मनाना सार्थक होगा । 

इस अवसर पर आचार्य श्री सन्मति सागर जी महाराज ने धर्म का महत्व बताते हुए धर्म का मूल ज्ञान, दर्शन एवं चारित्र बताया और उन्होंने कहा कि हम एक दूसरे की बुराई करते हैं तो कषाय बढ़ते हैं, अतः हम एक दूसरे की प्रशंसा करें । राष्ट्रीय स्तर पर जैनत्व की बात आये तो हम सब एक होकर प्रभावना के लिए तैयार रहें । भगवान महावीर के जन्म अवसर पर विभिन्न प्रकार की भाषण प्रतियोगिताएॅं, निबंध प्रतियोगिताएॅं आदि धर्म प्रभावना का कार्य करें । इस अवसर पर दिगम्बर सम्प्रदाय एवं जैन सभा के कार्यकर्ताओं ने महावीर जयंती की रूपरेखा पर प्रकाश डाला । 

कल प्रातः प्रभात फेरी एवं बाबा पूरणचंद समाधि स्थल, जैन स्कूल में महावीर जयंती का कार्यक्रम मनाया जाएगा । साधना शिविर 4 से 6 अप्रैल, 2004 तक एस0 एस0 जैन सभा, काली बाड़ी चैक, अम्बाला कैंट में  शुरू होने जा रहा है, आप सभी इसका अधिक से अधिक लाभ उठायें ।

चित्त को स्थिर करने हेतू मन को शुभ आलम्बनों में लगाओ

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

अम्बाला कैंट 6 अप्रैल, 2004:  श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् श्री शिवमुनि जी महाराज ने आत्म ध्यान साधना शिविर में उद्बोधन देते हुए फरमाया कि- प्रभु महावीर को नमस्कार करने से क्या होता है ? जैन भाई जब आपस में मिलते है तो जय जिनेन्द्र कहते हैं, हिन्दू राम राम करते हैं, सिक्ख वाहे गुरू कहते है । जब दो भाई आपस में मिलते हैं तो सम्बन्ध बनाने हेतु सर्वप्रथम अभिवादन करते हैं । ये बातें व्यवहारिक है, शिष्टाचार की है ताकि हम आपस में सम्बन्ध स्थापित कर सके । आपने ध्यान किया होगा कि बच्चे बहुत जल्दी अपने बडों के या आस पास के वातावरण के  इशारे पकड लेते   हैं । बच्चों को पता नहीं किस भाॅंति, किसके साथ बोला जाये । परमात्मा सर्वज्ञ सर्वदर्शी है । सबके भावों को वह जानता है । छोटा सा बच्चा अपने भाव जान लेता है तो क्या अपने भाव परमात्मा नहीं जान पाएगा । वह सर्वज्ञ होने के नाते सब कुछ जानता है । 

प्रभु महावीर ने कहा कि संसार में दुःख है, दुःख का कारण है, कारण से मुक्ति है, मुक्ति से परमानन्द प्राप्त होता है । संसार में जन्म, जरा, मृत्यु, व्याधि सब तरफ दुःख ही दुःख है । हम जानते हुए भी बाहर नहीं निकलते । जो जीव जिस योनी में आया है उसे वैसे ही संस्कार है । वह उन्हीं संस्कारों में रहकर आगे बढता है । दुःखों को हम दुःख मानते नहीं । दुःखो ंसे कैसे पार जाओगे । दुःख का कारण कर्म है । कर्म के कारण राग द्वेष पैदा होता  है । संसार चंचल है । दुःख रूप है । क्यों कि चित्त चॅंचल है, चलायमान है, भ्रमित  है । प्रभु महावीर को अनेकों दुःख होते हुए भी उन्हें दुःख नजर नहीं आये । वे मौन और शान्ति में लीन थे । हमारा चित्त जब भ्रमित होता है तब हमें दुःख नजर आते   हैं । मन चित्त स्थिर नहीं है । महापुरूषों ने कहा, चित्त को स्थिर करने हेतु मन को शुभ आलम्बनों में लगाओ । भक्ति, ध्यान, प्रार्थना, सामायिक, नमस्कार मंत्र का जाप ये शुभ आलम्बन है । जो हमारा मन बाहर भटक रहा था, उसे भीतर की ओर लगा दिया तो परिवर्तन हो गया । बाहर में भटकने वाला चित्त भीतर पाॅंच मिनिट में ही शान्ति, समाधि को प्राप्त कर सकता है । अगर वह शान्ति और समाधि विधि से प्राप्त की जाये तो जब चित्त शान्त होता है तब संवर और निर्जरा होती है । जब संवर और निर्जरा होती है तब पुण्योदय होता है या पुण्य संचित होता है । तुम आराधना, भक्ति करो, भीतर डूब जाओ, भूल जाओ अपने अस्तित्व को और अरिहंतमय हो जाओ । जिस प्रकार नमक पानी में मिलकर पानी का रूप धारण कर लेता है उसी भाॅंति आप मिल जाओ । जैसा प्रयोग आप चित्त का करोगे वैसा परिणाम आएगा । पल पल बीता जा रहा है । हम समय बर्बाद न करते हुए इस अनमोल समय को समझे । 

 

श्वासों का भरोसा नहीं, कब रूक जाएगी । एक एक श्वांस देखो । भीतर भी ध्वनि है । श्वांस की अपनी ध्वनि है, जिसे शान्ति से, समता से पाया जा सकता है । जिस प्रकार व्यक्ति मेहनत की कमाई व्यर्थ नहीं करता है उसी प्रकार इस मानव भव में साॅंसों की कमाई व्यर्थ न जाने दो । मन को, चित्त को, शुभ आलम्बन में लगाने के साथ साथ गुणों का स्मरण करो तब ध्यान घटित हो जाएगा । भगवान की भक्ति करो, तल्लीनता में आ जाओ, तुम शुद्ध और पवित्र हो जाओगे । पानी की कीमत तभी है जब तुम्हें प्यास  लगी हो । भोजन और सोने की कीमत भी तभी है तब तुम्हें भूख और नींद आये । इसी प्रकार भक्त् िकी कीमत तभी है जब आपका मन, चित्त भीतर की ओर डूब जाये । डूबने के अनन्तर कुछ गुनगुनाये तब तुम्हारा चित शुद्ध बुद्ध मुक्त हो जाएगा । मंत्र जाप में लग जाएगा । शब्दों से मौन अवस्था से जाप करने से अधिक फल मन से जाप करने पर है । जब तुम तल्लीन हो जाओगे, भीतर अपने आप जाप प्रस्फुटित होगा केवल आपका ध्यान वहाॅं होना चाहिये । यह जीवन पतझड बसन्त की भाॅंति है । इसका महत्व समझते हुए जीवन को शुभ आलम्बनों में लगावें ।

आज त्रिदिवसीय आत्म: एडवाॅंस ध्यान साधाना शिविर का समापन हुआ । समापन के अवसर पर साधकों के आनंद के क्षणों का स्वाद चखने के लिए समाज के सभी वरिष्ठ कार्यकर्ता उपस्थित थे । साधकों ने अपने मौलिक अनुभव सुनाये जिसे सुनकर सभी आत्म विभोर हो उठे । ध्यान शिविर में श्री संजय जैन, प्रधान- श्री अनिल जैन, श्री रमेश जैन आदि की सेवायें सराहनीय रही ।

भक्ति में भाव का मूल्य अधिक है: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी म0

श्रमण संधीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने भक्ति के ऊपर प्रकाश डालते हुए फरमाया कि- मनुष्य के भीतर जब भक्ति का भाव उमडता है, जब प्यारे प्रभु की याद आती है तब उसका हृदय डोलने लग जाता  है । मन आनंदित, चित्त प्रफुल्लित हो जाता है । चेहरे पर अनोखी आभा आ जाती   है । तब उसका जीवन स्वर्णिम बन जाता है । उसे कोई आवश्यकता नहीं रहती । जब व्यक्ति धािर्मक बन जाता है । प्रभु महावीर की वाणी  सामायिक, ध्यान, कायोत्सर्ग जब होता है तब चित्त में वैराग्य आता है । उदासी या संकीर्णता नहीं आती । महावीर का वैराग्य चित्त में आनन्द तृप्ति का भाव है । इसीलिए कहा है कि साधु को इतना सुख है जितना इन्द्र को भी नहीं । साधु का सुख, समता, इन्द्रिय विजय में है । ध्यान और भक्ति दोनों आपस में जुडे हुए हैं । भक्ति करते हुए व्यक्ति ध्यान में चला जाता है । हमारा मूल ध्यान ही है । सांसारिक लोगों का प्रेम पत्नी, पैसा, यश से होता है । संकीर्ण दृष्टि होती है परन्तु जब यही प्रेम समर्पण की ओर आगे बढता है तब भक्ति होती है । भक्ति जिनेश्वर भगवान की करें । 

स्थानकवासी परम्परा भी यही कहती है कि हम अपने निज स्थान में आ जाये । जो मूल सौम्य अमृत सार था उसे हमने अलग कर दिया । मूल परम्परा निज घर में लौटने की  है । सामायिक करते करते हम कितने गहरे जा सकते हैं । कितने समता में जा सकते है यह अन्दाजा लगाया जा सकता है । महावीर की मैत्री, संगठन, करूणा, प्रेम को महत्व दो । प्रभु महावीर ने कहा कि परनिन्दा नहीं आत्म-निन्दा करो । दूसरों की आलोचना करने के बजाय अपनी आलोचना करो । रोज का हिसाब किताब आलोचना द्वारा पूर्ण कर लो । परम धन, परम संपदा, परम ऐश्वर्य की कामना करो । यही हमारा मूल धर्म है । 

हमारी मूल सम्पत्ति शान्त, निर्विचार, निर्वेर हो जाने की है इसलिए तो भगवान महावीर ने अनेकान्तवाद पर जोर दिया । भीतर की समाधि आती है, समय के साथ आती है परिस्थितियाॅं बदल जाती है । चित्त का वैराग्य कैसे बढे हम इसे महत्व दे, जो कुछ हमारे पास है हम उसे बाॅंटे । भक्ति जब जीवन में आती है तब श्रद्धा और ग्रहणता का भाव होता  है । भक्ति में भाव का मूल्य अधिक है । श्रद्धा और विश्वास में ही भाव अधिक है । जो बिना भक्ति के चला गया, जिसने संसार में आकर भक्ति ही न की उसका जीवन व्यर्थ है । इस जगत को पीने की कला है भक्ति । तुम प्रार्थना, दान, सामायिक करते हो उस समय तुम्हारे शब्द नहीं भाव महत्वपूर्ण है । भावों को महत्व देने से चित्त में वैराग्य आता है । 

आचार्यश्रीजी का आज चण्डीगढ़ पदार्पण हुआ । चण्डीगढ़ में श्री श्रीचंद जी म0, तपोकेसरी श्री अजयमुनि जी म0, श्री अश्विन मुनि जी म0 आदि से मधुर मिलन हुआ । उप प्रवर्तिनी महासती डाॅ0 सरिता जी म0, विदुषी महासती श्री मंजू जी म0 आदि ठाणा एवं श्रीसंघ के सभी पदाधिकारियों ने आचार्यश्रीजी का हार्दिक अभिनंदन किया । कल यहाॅं पर आचार्यश्रीजी के सान्निध्य में तपोकेसरी श्री अजय मुनि जी म0 के 251 दिन की तपस्या का अभिनंदन समारोह मनाया जाएगा एवं 11 अप्रैल, 2004 को उनकी तपस्या का पारण पारणा होगा ।  

आचार्य सम्राट् श्री शिवमुनि जी महाराज के

सान्निध्य में राष्ट संत महाश्रमण पूज्य श्री ज्ञानमुनि जी म0 का पुण्य स्मृति दिवस

खरड़ 12 अप्रैल, 2004 श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् श्री शिवमुनि जी महाराज के खरड़ पधारने पर उनका भव्य स्वागत किया गया । आचार्यश्रीजी ने अपने प्रवचन में पूज्य गुरूदेव श्री ज्ञानमुनि जी महाराज के जीवन पर प्रकाश डालते हुए कहा कि आज से एक वर्ष पूर्व गुरूदेवश्री की छाया-छाया हम सभी पर थी । समय, काल, नियति को रोक नहीं सकते । चाहे वे पार्थिव रूप से हमारे बीच नहीं किन्तु उनके द्वारा किये गये धार्मिक, सामाजिक एवं राष्टीय स्तर पर जो कुछ सेवा कार्य उन्होंने किये वे आज भी अमर है, उन्होंने धार्मिक स्तर पर स्थान-2 पर जैन स्थानक, जैन स्कूल बनवाये । समाज सेवा के रूप में उन्होंने सिलाई स्कूल, डिस्पेंसरियाॅं स्थान-स्थान पर बनवाई । राष्टीय स्तर पर श्रमण संघ के संगठन में और जैन आचार्यों की सेवा में उन्होेने अपनी सेवाएॅं प्रदान की । उन्होंने मुझे दीक्षा देकर धर्म के मार्ग पर आगे बढ़ाया अतः में उनके उपकारों के प्रति हार्दिक कृतज्ञता ज्ञापित करता हूॅं । 

आचार्यश्री ने आगे कहा कि- तीन बातें धर्म में प्रमुख है अरिहंत की भक्ति, सिद्ध का स्मरण, साधु का संग । सब कुछ बदल रहा है उसके अन्तर्गत शरीर, विचार, संकल्प, विचार, मकान, शत्रु, मित्र सब बदल रहे हैं किन्तु उसमें जो शाश्वत तत्व है जो नहीं बदलता वह है हमारी चेतना । वह सत्य है, उसी का हम सत्संग करें, वही धर्म है । अरिहंत का पद सर्वोत्तम पद है, उनकी सेवा में चैसठ इन्द्र हैं । अरिहंत को नमन करते हैं तो उन सबको नमन हो जाता है । अरिहंत की भक्ति करने से प्रभु स्वयं तो नहीं आते लेकिन उनके रक्षक देवी देवता हमें सहयोग देते हैं । इसीलिए पंच परमेष्ठी को गहन महत्व दिया गया   है । मंत्र को पढ़ते समय उसमें इतना डूब जाओ कि अपना शरीर, श्वांस सब भूल जाओ । जैसे नृत्य और नृत्यकार एकाकार हो जाते हैं, वैसे ही आप भक्ति में एकाकार हो जाओ । इसी प्रकार लोगस्स की आराधना करने से भी हमारे समकित में दृढ़ता आती है, उसकी साधना करने से हमारे भीतर ऐसी तरंगें उठती है कि हम देव गुरू धर्म के प्रति दृढ़ होते चले जाएं । 

इसके पूर्व श्रमण संघीय मंत्री श्री शिरीष मुनि जी महाराज ने पूज्य गुरूदेव श्री ज्ञानमुनि जी महाराज के जीवन पर प्रकाश डालते हुए उनके जीवन के अनेक संस्मरण सुनाए । खरड़ क्षेत्र से उनका अति नजदीक का सम्बन्ध रहा है । पिछले पन्द्रह वर्षों से वे मण्डीगोविन्दगढ़ में विराजमान रहें, वहाॅं उनकी स्मृति में ज्ञान स्मारक, पूज्य शालीग्राम जैन विद्यालय, पूज्य श्री ज्ञान मुनि विद्यालय एवं श्री ज्ञान मुनि डिस्पेंसरी आदि अनेक संस्थाएॅं उनकी प्रेरणा से चल रही है । 

खरड़ श्रीसंघ के प्रधान श्री राकेश जैन, मंत्री श्री जितेन्द्र कुमार जैन, श्री प्रदीप जैन, श्री शिवकुमार जी शर्मा, चण्डीगढ़ निवासी श्री बी0डी0 बाॅंसल एवं श्रीमती उषा बाॅंसल आदि सभी ने गुरूदेवश्री के प्रति अपने विचार गद्य एवं पद्य में रखें । 13 अप्रैल, 2004 को आचार्यश्रीजी रोपड़ पधार रहे हैं जहाॅं पर संक्रान्ति का कार्यक्रम रखा गया है । 

वैशाख संक्रान्ति पर रोपड़ में जैनाचार्य की प्रेरणा :-

सूर्य न बन सको तो कम से कम दीपक बनो 

श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज के वैशाख संक्रान्ति के पवित्र दिवस रोपड़ पधारने पर स्थानीय श्री एस0 एस0 जैन सभा, श्री महावीर जैन युवक मण्डल, जैन महिला संघ एवं जैनेत्तर समाज के सैकड़ों नागरिकों ने आचार्यश्रीजी का भव्य स्वागत किया । उपरान्त ‘श्री आत्म देवेन्द्र जैन भवन’ , सदर बाजार रोपड़ में श्रद्धापूर्वक अभिनन्दन समारोह का आयोजन हुआ । इस अवसर पर उप प्रवर्तिनी महासाध्वी श्री कौशल्या जी म0 ‘श्रमणी’ एवं उनकी आठ 7 अन्य शिष्याएॅं भी उपस्थित थीं । 

आचार्यश्रीजी ने वैशाख मास संक्रान्ति का नाम सुनाते हुए कहा कि सूर्य जैसे संक्रमण करते हुए आगे बढ़ रहा है वैसे ही हम सभी भी आगे बढ़ने का संकल्प करें । उन्होंने कहा कि मैं आप सबके जीवन के लिए मंगल कामनाएॅं करता हूॅं । आचार्यश्रीजी ने प्रेरणा देते हुए कहा कि सुबह उठकर हम सबको कुछ अच्छा करने की सोच आनी चाहिए । उन्होंने कहा कि परिवार, समाज, राष्ट और समाज के अभावग्रस्त लोगों के लिए कुछ करने की भावनाएॅं जागृत होने पर हमें यह मानना चाहिए कि हमारे भाव अच्छे बन रहे हैं । आचार्यश्रीजी ने कहा कि किसी राह भटके को सहारा दें, बीमार की सेवा करें, भूखे को भोजन और प्यासे को पानी दें, अशिक्षित को विद्यादान दे सकें तो अच्छा नहीं तो मीठे वचन और हृदय से शुभकामनाएॅं दें, तभी संक्रान्ति का शुभ लाभ मिलेगा । उन्होंने प्रभु के चरणों में ये भाव रखने के लिए भी प्रेरणा दी कि आपकी कृपा से जो मुझे मिला है वह सभी कुछ आपके प्रकट-रूप समाज को समर्पित हो । आचार्यश्रीजी ने कहा कि- हम अन्यों के प्रति विनम्रभाव, मुस्कुराहट द्वारा अपने दिल की खुशी अभिव्यक्त कर सकते हैं । किसी को अच्छा परामर्श दे सकते हैं । संगीत के द्वारा प्रभु की भक्ति करें । उन्होंने कहा कि यदि सूर्य न बन सकें तो दीया तो अवश्य बनें ताकि घटाघोप अंधकार से भरी रात्रि में भी प्रकाश की एक किरण बन सकें । 

स्थानीय श्रीसंघ, युवक मण्डल, महिला मण्डल तथा अन्य नागरिकों को आचार्यश्रीजी ने हार्दिक साधुवाद दिया । इसके पूर्व श्रमण संघीय मंत्री श्री शिरीष मुनि जी महाराज ने सेवा का महत्व बताते हुए अरिहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय, साधु की सेवा करने वाले महान कार्य को कर्म निर्जरा का कारण    बताया । उन्होंने श्रीसंघ को प्रेरणा दी कि आचार्यश्री के रोपड़ नगर में पधारने से जो सेवा का अवसर मिला है उसका पूरा लाभ लें ।  

श्री शिरीष मुनि जी ने बताया कि आचार्यश्रीजी रोपड़ से विहार कर 15 अप्रैल, 2004 को बलाचैर पधारने के भाव रखते हैं । बलाचैर से विहार कर आचार्यश्रीजी 20 अप्रैल, 2004 को होशियारपुर पधारेंगे जहाॅं पर 22 अप्रैल, 2004 को अक्षय तृतीया के पारणा महोत्सव में सम्मिलित होंगे । 

श्रमण संघीय मंत्री श्री शिरीष मुनि जी महाराज ने शुभ सूचना देते हुए बताया कि रोपड़ में आचार्यश्रीजी के सान्निध्य में  21 मई, 2004 को जैन भागवती दीक्षाएॅं आयोजित की जाएगी । इस अवसर पर श्री एस0 एस0 जैन सभा के अधिकारियों ने आचार्यश्रीजी को शीघ्र वापिस रोपड़ पधारने की विनती   की । इस अवसर पर बलाचैर, नालागढ़, चण्डीगढ़, जालंधर आदि नगरों से दर्शनार्थी पहुंॅंचे हुए थे जिन्होंने आचार्यश्रीजी को वंदन नमस्कार कर उन्हें अपने क्षेत्र में पधारने की विनती की । 

मानव का जीवन असीम शक्ति का स्रोत है: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- मानव का जीवन असीम शक्ति का स्रोत है । उसके भीतर अक्षय शक्ति का खजाना भरा हुआ है । उसके भीतर अलौकिक ऊर्जा है । वह चाहे जैसा उसका उपयोग कर सकता है । मान लो एक हजार रूपये आपके पास है । तुम जैसा चाहो वैसा उसका उपयोग कर सकते हो । चाहे होटल में जाओ । रोटी खाओ, दान दो । किसी तरह से तुम इसका उपयोग कर सकते हो । कोरी स्लेट तुम्हारे पास है । क्या लिखना है यह तुम्हारे ऊपर निर्भर करता है । चाहो तो किसी की स्तुति लिखो या फिर अन्य कार्यों में उसे प्रयोग करो । 

जीवन की धरातल को समझो । जीवन को समाधि में ले आओ । बाहर के जितने सम्बन्ध है उनसे हम अलग कैसे हो इसका चिन्तन करो । जैन धर्म में कैसे हमारी अन्तिम गति हो इस बारे में कहा है कि हम अन्तिम समय समाधि मरण संलेखना पूर्वक करें । यह निश्चित बात है कि एक दिन जाना जरूर पड़ेगा, परलोक की तैयारी करो, शरीर तो यही साथ रहने वाला है । जो तुमने पुण्य कमाया है वह परलोक तक जाएगा । मोक्ष में तो शुद्धात्मा ही जाएगी । 

भीतर से समझो । मैं अकेला हूॅं । सबमें रहते हुए भी अकेले रहो । ज्ञान, दर्शन से युक्त हो   जाओ । संयोग, वियोग तो होने ही वाला है । अन्तिम समय बाहरी संयोगों का तीन करण तीन योग से त्याग कर देना । भीतर समाधि मरण की भावना भाओ । सुखी व्यक्ति वही होता है जो थोड़े में गुजारा करता है । पूर्णिया श्रावक सुखी था । श्रेणिक राजा सुखी नहीं था । पूर्णिया श्रावक की कमाई निर्मल थी । पुर्णिया श्रावक की सामायिक शुद्ध   थी । श्रेणिक का पूरा राज्य, राजमहल, स्वर्ण मुद्राएॅं चारों सेनाएॅं होते हुए भी वह सामायिक खरीद नहीं सका । बहुत थोड़े लोग है जो भीतर आचरण करते हैं । जो आचरण करते हैं वे ही अच्छे मानव कहे जाते हैं । सत्संग हमें आचरण की प्रेरणा देता है । मनुष्य अपने ध्येय से बहुत जल्दी भटक जाता है । मनुष्य का जीवन बड़ा अनूठा और अनमोल है । इस जीवन की अनमोलता को समझना यही श्रेयस्कर मार्ग है । 

राजनीति में धर्म अवश्य हो: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

फगवाड़ा: श्रमण संघीय आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने फगवाड़ा निवासियों को सम्बोधित करते हुए फरमाया कि- अहंकार धर्म का शत्रु है । विनय धर्म का मूल है । जीवन में नमस्कार को महत्व दें, विनम्र हो जायें । भारत की परम्परा है कि कोई भी ग्रन्थ शुरू करने से पूर्व नमस्कार किया जाता है । भारत की संस्कृति में मातृदेवो भवः, पितृदेवो भवः, आचार्यदेवो भवः की रही है । माता प्रथम गुरू है, जो केवल जन्म ही नहीं देती, जीवन भर के संस्कार देती है । आज की विज्ञान भी कहती है कि चार साल के बच्चे को जीवन भर के संस्कार माॅं दे सकती है । अतः जीवन में विनम्रता का भाव रखें । प्रभु महावीर, बुद्ध, नानक, राम कृष्ण सभी ने हमें विनम्रता के संस्कार दिये । 

आज धर्म में राजनीति आ गई है । राजनीति में धर्म की आवश्यकता है । आज देश में चुनाव चल रहे हैं । मनुष्य मात्र में इन्सानियत के भाव जागृत हों । शाकाहार का प्रचार हो । एक दूसरे के प्रति हार्दिक संवेदना के भाव जागृत हों । माॅंसाहार का निषेध हो । इस लक्ष्य को लेकर सभी आगे बढ़ें तो भारत में बहुत ही सुन्दर वातावरण निर्मित हो सकता है । सभी धर्मों ने मैत्री, प्रेम, प्यार और इन्सानियत की बात सिखाई, जिसका आचरण हम सब मिलकर करें । 

आचार्य श्री शिवमुनि जी महाराज देश भर की करीब बीस हजार किलो मीटर की यात्रा करते हुए लगभग 28 वर्ष पश्चात् आज फगवाड़ा पधारे । फगवाड़ा पधारने पर भव्य अभिनंदन समारोह का कार्यक्रम फगवाड़ा निवासियों की तरफ से किया गया । इस अवसर पर धार्मिक समिति के  संयोजक डाॅ0 जोगेन्द्रपाल जी, प्रधान- नगर कौंसिल श्री मलकियतसिंह जी, स्वतंत्रता सेनानी श्री कालीचरण जी सूद, भूतपूर्व एम0एल0ए0 श्रीमती संतोष चैधरी ने आचार्यश्रीजी का भव्य स्वागत किया एवं उनके स्वागत में अपने विचार रखे । 

इस अवसर पर श्री रमेश सचदेवा, श्री अरूण खोसला, श्री मनोहरलाल चोपड़ा, श्री राजीव जालोरा, श्री राकेश जैन एवं स्कूल के बच्चों ने आचार्यश्रीजी का भव्य स्वागत किया एवं स्वागत गीत रखा । इस अवसर पर श्री एसए0एस0 जैन सभा के प्रधान श्री रमेश जैन, मंत्री श्री कीमतीलाल ओसवाल, श्री कीमती लाल ‘चंदन’, श्री वीरेन्द्र जैन, श्री यशपाल जैन, श्री पद्म जैन, श्री सुभाष जैन आदि उपस्थित थे । स्थानीय सीता तरूणी मण्डल, महिला मण्डल, युवक मण्डल आदि ने भी आचार्यश्रीजी का भव्य स्वागत किया । 

आचार्यश्रीजी का आगामी प्रवास 6 मई को जालंधर कैंट जैन स्थानक एवं 7 मई, 2004 को जैन स्थानक गुड़ मण्डी, जालंधर में रहेगा । 

जहाॅं नम्रता और अनुशासन है वहाॅं धर्म है: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- भगवान महावीर का धर्म नमन से शुरू होता है । जहाॅं नम्रता और अनुशासन है वहाॅं धर्म है । जहाॅं पर अहंकार है, स्वच्छंदता है वहाॅं अधर्म है । भगवान महावीर के तीर्थ में साधु, साध्वी, श्रावक, श्राविका रूपी चार तीर्थ है । तीर्थ की सुन्दर व्यवस्था प्रभु महावीर ने दी है जो जैन धर्म के अलावा और कहीं नहीं मिलती । प्रभु महावीर ने तप, ध्यान, प्रार्थना, भक्ति और साधना का मार्ग दिया, वह सभी के लिए अनुकरणीय है । वर्तमान युग में बिना साधना के, बिना भक्ति के जीवन में शान्ति और समाधि नहीं आ सकती । भगवान महावीर का शासन वीतरागता का शासन है । उन्होंने सत्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी । सत्य को भगवान बताया । प्रभु महावीर ने किसी का पक्षपात नहीं किया । गौतम जब गलत थे तो उन्हें आनंद श्रावक के पास क्षमा माॅंगने के लिए   भेजा । प्रभु महावीर ने कहा कि साधु ऐसे हैं जो श्रावकों से ऊॅंचे हैं और कई श्रावक ऐसे हैं जो साधुओं से ऊॅंचे हैं । संघ सत्य और धर्म के साथ चले । पक्षपात का रवैया न हो । छोटा सा जीवन अगर हम वीतरागता से हटकर पक्षपात करने के लिए किसी को खुश करने की नीति अपनाएंगें तो कहाॅं जाएंगें, स्वयं चिन्तन करें । छोटा सा जीवन जागरण के लिए मिला है । ‘आत्मवत् सर्वभुतेषु’ की भूमिका को अपनाएं । सभी आत्माएॅं समान है । कोई छोटा बड़ा नहीं । भगवान महावीर ने कहा ‘आयतुले पयासु’ अपनी आत्मा के तुल्य सभी को समझो । आत्मा गुण रूप में है तो सभी शुद्ध आत्माएॅं साथ में रहेगी तो ऊॅंच नीच का भाव निन्दा प्रशंसा का भाव स्वयंमेय समाप्त हो जाएगा । सभी शुद्ध आत्माएॅं हैं इस दृष्टि से आचारांग सूत्र में प्रश्न उत्पन्न हुआ, मैं कौन हूॅं ।  भगवान महावीर ने साधना का मार्ग बताते हुए उत्तर दिया - मैं वही सिद्ध भगवान हूॅं । भगवान महावीर के मार्ग में अहिंसा, अनेकान्त और ध्यान के माध्यम से विश्व की सभी समस्याओं का समाधान हो सकता है । भीतर में जागरण का संदेश आ सकता है । मैत्री, प्रमोद, करूणा के भाव विकसित हो सकते हैं । इस अवसर पर आचार्यश्रीजी ने जालंधर श्रीसंघ को हार्दिक साधुवाद प्रदान करते हुए उनके अनुशासन एवं संघ के प्रति कटिबद्धता की प्रशंसा की । 

28 वर्षों के बाद करीब बीस हजार किलो मीटर की लम्बी विहार यात्रा करने के पश्चात् आज जालंधर शहर में बड़े उत्साहपूर्ण वातावरण में आचार्यश्रीजी का भव्य प्रवेश हुआ । श्री एस0 एस0 जैन सभा {रजि0} जालंधर के अधीन चल रहे स्कूल श्री पार्वती जैन कोॅ-एजूकेशन सीनीयर सेकेण्डरी स्कूल, श्री राजमती जैन गल्र्स हाई स्कूल, श्री महावीर जैन माॅडल हाई स्कूल के स्टाॅप एवं हजारों बच्चों श्री एस0 एस0 जैन सभा के प्रधान श्री विमल प्रकाश जैन, महामंत्री श्री रविभूषण जैन, सभी संरक्षकगण, एजुकेशन बोर्ड के चेयरमैन श्री नरेन्द्र जैन, महासचिव श्री महिन्द्र कुमार जैन ‘किताबों वाले’, सभा के उपप्रधान श्री चमनलाल जैन, स्वामी श्री शुक्लचंद जैन चैरीटेबल हाॅस्पिटल के अध्यक्ष श्री दर्शनलाल जी जैन सर्राफ, धार्मिक कमेटी प्रमुख श्री योगेश जैन, श्री महावीर जैन भवन निर्माण सोसायटी के अध्यक्ष श्री सतीश जैन, श्री महावीर जैन युवक मण्डल के अध्यक्ष श्री योगेश जैन, जैन मिलन के अध्यक्ष श्री गुलशनराय जैन, श्री एस0 एस0 जैन सभा कार्यकारिणी के सभी सदस्यों एवं समाज के हजारों लोगों ने आचार्यश्रीजी का श्रद्धापूर्वक हार्दिक स्वागत / अभिनन्दन किया । जैन समाज की विविध संस्थाओं के द्वारा भी आचार्यश्रीजी का स्वागत किया गया । इस अवसर पर स्थानीय प्रत्याशी ने आचार्यश्रीजी से आशीर्वाद प्राप्त किया ।   

श्री एस0 एस0 जैन सभा द्वारा आयोजित अभिनन्दन समारोह में महामंत्री श्री रविभूषण जी ने आचार्यश्रीजी का अभिनंदन करते हुए ‘अभिनंदन पत्र’ पढ़कर सुनाया । संघ के संरक्षक, अध्यक्ष आदि ने भी आचार्यश्रीजी का अभिनंदन किया । इस अवसर पर श्री विलायतीराम जैन, श्री प्रेमचंद जैन ‘तृषित’, श्री विमल जैन ‘अंशु’, महावीर युवक मण्डल, जैन आदर्श तरूणी मण्डल, जैन नवयुवती मण्डल, बहू मण्डल आदि ने आचार्यश्रीजी के अभिनन्दन में अपने भक्तिभावपूर्ण भाव गद्य एवं पद्य में रखें । 

कल आचार्यश्रीजी का प्रवचन सुबह 8.30 बजे महावीर जैन भवन, कपूरथला चैक, जालंधर होगा । वहाॅं से विहार कर शाम को ‘नार्दन मोटर्स’, जालंधर पधारेंगे जहाॅं पर सायं 8.00 बजे आचार्यश्रीजी का प्रवचन होगा ।

समग्र अस्तित्व का सत्कार करो : जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- जब साधक अरिहंत के चरणों में नमन करता है । सिद्ध भगवान को भाव से स्मरण करता है । जब उसके भीतर सद्गुरू की दिव्यता का प्रवेश होता है, तब उसके जीवन में शिकायत, शिकवा नहीं रह  सकता । परमात्मा की याद व दिव्यता के बिना जीवन व्यर्थ है । जीवन में हर पल, हर क्षण उस दिव्यता के दर्शन भावनात्मक स्तर पर होने चाहिए । जीवन में सामायिक, गुरू-दर्शन और भक्ति है तो आपके चेहरे पर मुस्कुराहट होगी । जिसके जीवन में त्याग, तपस्या, वैराग्य है उसको देव भी नमन करते  हैं । वर्तमान में आज आप मुमुक्षु आत्मा का सत्कार कर रहे हैं । हमारा सम्मान कर रहे हैं वो सत्कार हमारा नहीं, प्रभु महावीर का है । उनके तीर्थ का है । उनकी वाणी का है । उनके दर्शन का है । साधु, साध्वी, श्रावक, श्राविका रूप चार तीर्थ हैं, जिनका संघ में समान स्थान है । सभी का लक्ष्य मोक्ष को प्राप्त करना है । इस साधक जीवन में अहंकार कहीं पर भी न आये । जीवन में मैत्री, करूणा, सरलता, ऋजुता और अहिंसा का प्रवेश हो । अनेकान्त का चिन्तन हो । ध्यान की साधना हो तो मोक्ष बिल्कुल नजदीक है, इसी क्षण है । सबके मंगल के बारे में  सोचें । हम अपने जीवन में प्रमाणिक हो जायें । केवल बातें न करें, प्रेक्टिकल कार्य करें । साधु वह है जो परमात्मा का द्वार खोल देता है । अरिहंत की याद दिला देता है । सरलता एवं ऋजुता का प्रवाह उसके जीवन में बहता है । समग्र जीवन का सम्मान करो । कोई भी छोटा बड़ा नहीं । सभी का सहयोग लो । सभी का सत्कार करो । मनुष्य जाति एक है । हम सबका भीतर का एक नाता है, संबंध है, उस संबंध का अनुभव करें । हृदय के स्तर पर हम जुड़े हुए हैं ’वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना रखें । 

विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के अन्तर्गत समाज में बढ़ती हुई कुरीतियों और परम्पराओं पर चोट करते हुए आचार्यश्रीजी ने प्रेरणा दी कि बढ़ते हुए आडम्बरों को रोकने के लिए प्रत्येक व्यक्ति दिन में विवाह करें, रात्रि विवाह बंद करे । भोजन में बनने वाली वैराईटियों पर सामाजिक बंधन हो और व्यर्थ के आडम्बरों को रोका जाये । स्थानीय श्रीसंघ के अध्यक्ष श्री विमल प्रकाश जैन  ने आचार्यश्रीजी की अपील का स्वागत करते हुए कहा कि अगले रविवार को आम सभा की मीटिंग में हम इन सभी बातों पर चिन्तन करेंगे एवं अनेक व्यक्तियों ने संकल्प किया कि हम रात्रि की शादियों को अटेण्ड नहीं करेंगे । 

इस अवसर पर आचार्यश्रीजी ने सभी लोगों को धर्म से जुड़ने के लिए कहा । सभी को कहा कि प्रतिदिन सभी अपने जीवन में एक घण्टा नियमित साधना करें और अनेक श्रद्धालुओं ने हाथ खड़े करके संकल्प ग्रहण किया कि हम प्रतिदिन एक घण्टा प्रभु की भक्ति, सामायिक, ध्यान, स्वाध्याय इत्यादि करेंगे । आचार्यश्रीजी ने कहा कि- महात्मा गाॅंधी ने कहा कि मैं भोजन छोड़ सकता हूॅं लेकिन प्रार्थना नहीं छोड़ सकता । गाॅंधीजी ने प्रभु महावीर के अहिंसा एवं अनेकान्त के सिद्धान्त के माध्यम से देश को आजाद करवाया । लाल बहादुर शास्त्री जैसे नेता अपनी प्रमाणिकता और नेैतिकता के आधार पर आज भी सम्मान से स्मरण किये जाते हैं । आचार्यश्रीजी ने वर्तमान के पद लौलुप और धन नेताओं पर कटाक्ष करते हुए कहा कि ये धन साथ नहीं आएगा, उनके द्वारा किये हुए सेवा के कार्य, नैतिकता के सिद्धान्त, धर्म की कमाई याद रहेगी । हर व्यक्ति धर्म से जुड़े, ध्यान से जुड़े । संत की परिभाषा करते हुए आचार्यश्रीजी ने कहा कि सच्चा संत वही होता है जो किसी की निन्दा नहीं करता । मंगल की बात करता है । सबके मंगल की सोचता है और जीवन में मंगल की भावना करता है । इस अवसर पर यहाॅं विराजिता वयोवृद्धा महासती उप प्रवर्तिनी श्री सावित्री जी महाराज को आचार्यश्रीजी ने श्रमण संघ की ओर से ‘स्थविरा’ पद से अलंकृत किया । 

स्थानीय श्रीसंघ के अनेक कार्यकर्ताओं ने अपने भाव रखे और विदुषी महासती श्री उमेश जी म0 की ओर से एक अभिनन्दन पत्र श्री विजय कुमार जी जैन, सराफ ने पढ़कर सुनाया और संघ के अध्यक्ष श्री विमल प्रकाश जी जैन ने आचार्यश्रीजी के चरणों में अभिनंदन पत्र अर्पित किया । इस अवसर पर अनेक भाई बहिनों ने अपने विचार आचार्यश्री के चरणों में रखे । संघ के बच्चे-2 में उत्साह का वातावरण था । इस अवसर पर रोपड़ में 21 मई, 2004 को जैन भागवती दीक्षा ग्रहण करने वाले मुमुक्षु रूबी बाॅंसल का विभिन्न संस्थाओं और श्रीसंघ द्वारा सत्कार किया गया । 

इस कार्यक्रम में जालंधर श्रीसंघ के धार्मिक कमेटी के प्रमुख श्री योगेश कुमार जैन, एजुकेशन बोर्ड के जनरल सेके्रटरी श्री महेन्द्र कुमार जैन, होशियारपुर निवासी श्री रजनीश जैन जी, महिला मण्डल की तरफ से श्रीमती कमलावती जैन एवं श्रीमती सुनीता जैन ने भजन गाकर आचार्यश्रीजी का अभिनन्दन   किया । इस समारोह में महावीर जैन भवन निर्माण सोसायटी के प्रधान श्री सतीश जैन, महामंत्री श्री नरेन्द्र जैन एवं श्रीसंघ के संरक्षकगण, श्री महावीर जैन युवक मण्डल के प्रधान श्री योगेश जैन, जैन महिला संघ की उपाध्यक्षा श्रीमती कमलावती जैन, युवती मण्डल की अध्यक्षा कल्पना जैन एवं तरूणी मण्डल की अध्यक्षा श्रीमती पूनम जैन, बहू मण्डल की अध्यक्षा नीलू जैन, जैन मिलन अध्यक्ष श्री गुलशनराय जैन, महावीर इण्टरनेशनल के अध्यक्ष श्री जीत कुमार जैन अपने संघ के सदस्यों के साथ इस समारोह में उपस्थित थे । अभिनंदन समारोह में आने वाले सभी धर्म प्रेमी भाई बहिनों के भोजन की व्यवस्था श्री महावीर जैन भवन निर्माण सोसायटी की तरफ से की गई । मंच का संचालन संघ के महामंत्री श्री रविभूषण जैन ने किया । 

साधक के जीवन में सिंह जैसा पराक्रम होना चाहिए

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- जैन धर्म में साधु को मंगल, उत्तम व शरणदायक कहा गया है । जैन धर्म में साधु का विशिष्ट स्थान है । इसे श्रमण, मुनि, निर्गन्थ व अनगार भी कहा गया है । जो आत्म साधना के क्षेत्र में श्रम करे वह श्रमण कहलाता है । मुनि जो चिन्तन मनन करता है वह मुनि है । निग्रन्थ वह है जिसने सारी गाॅंठें खोल दी है । अनगार का अर्थ घर का त्यागी है अर्थात् मुनि अन्तरंग और बाह्य परिग्रह का त्यागी होकर संसार को मंगलमैत्री का संदेश देता है और विश्व को जीवन जीने का नया आयाम प्रदान करता है । 

संत का सत्कार होना चाहिए । उसके साथ देव सा व्यवहार होना चाहिए । संत देव तुल्य होना चाहिए । देव और दानव में क्या अन्तर है । देव देता है, दानव लेता है । मनुष्य देव भी है दानव भी है । जब मनुष्य सत्कर्म करता है, किसी पर उपकार करता है । जो दुःख सुख में सहयोग करता है वह मनुष्य देव है । संत भी मनुष्य   है । वह संसार से कम ग्रहण करता है और संसार को ज्यादा देता है । 

शास्त्रों में साधु के चैदह लक्षण बताये हैं, उसमें सिंह सा पराक्रमी, हाथी सा स्वाभिमानी, वृषभ सा भद्र, मृग सा सरल, पाॅंचवा पशु सा निरीह, वायु सा निसंग, सूर्य सा तेजस्वी, सागर सा गम्भीर, मेरू सा विशाल, चन्द्रमा सा शीतल, मणि सा कान्तिवान, प्रथ्वी सा सहिष्णु, सर्प सा अन्यत, आकाश सा निरालम्ब । जो इन गुणों से सम्पन्न हो, वही साधु मोक्षगामी बन सकता है । सिंह अकेला चलता है वो किसी का सहारा नहीं लेता बल्कि अपना सहारा स्वयं बनाता है । इसी प्रकार हाथी अपनी मस्त चाल आप चलता है । साधक के जीवन में सिंह जैसा पराक्रम होना चाहिए, जिस प्रकार जीवन हमारे तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव से भगवान महावीर तक ने जीया । उनकी साधना सिंहवृत्ति की थी । 

अगर आप किसी को फूल दोगे तो तुम्हें फूल मिलेगा । किसी को कांटा दोगे तो कांटा मिलेगा । पहाड़ की चोटी पर खड़े होकर जैसी भी ध्वनि बोलोगे वैसी ध्वनि सुनने को  मिलेगी । साधु का व्यवहार देवताओं जैसा होना चाहिए । तीर्थंकरों ने श्रमण धर्म पालन को महत्व दिया । श्रमण धर्म पालन करने के कारण ही वो तीर्थंकर कहलाएं । संत का आधार सत्य का होता है, पंथ का नहीं । विपरीत परिस्थितियों में भी संत एकदम शान्त रहता है । अगर आपके भीतर चिन्ता है, वेदन है, पीड़ा है तो समझो तुम संतत्व से दूर हो ।  

बंगा पदार्पण पर आचार्यश्रीजी का भव्य स्वागत

श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने नमस्कार मंत्र का भावार्थ बताते हुए नमस्कार की विधि की प्रेरणा प्रदान की । आहार शुद्धि की बात करते हुए सात्विक आहार की प्रेरणा बच्चों को प्रदान की । उन्होंने शाकाहार का महत्व बताते हुए कहा कि जीवन-भर स्वस्थ एवं आनंदित रहने के लिए शाकाहारी रहना आवश्यक है और सभी बच्चों को जीवन-भर शाकाहारी रहने एवं सात्विक भोजन लेने का संकल्प करवाया । ध्यान का महत्व बताते हुए ध्यान का प्रयोग करवाया । 

इससे पूर्व श्री शिरीष मुनि जी महाराज ने जीवन जीने की कला के सूत्र बतायें एवं हमेशा आनंदपूर्वक तनाव-मुक्त होकर जीवन जीने के लिए रूचिपूर्वक कार्य करने की प्रेरणा  दी । हर कार्य सौ प्रतिशत करने से सौ प्रतिशत परिणाम मिलता है आदि बच्चों को बातें बताई जिससे बच्चे अति प्रभावित हुए । 

इससे पूर्व श्रीसंघ के प्रधान श्री आर0आर0 जैन, स्कूल के अध्यक्ष श्री जानकीदास जैन ने आचार्यश्रीजी के स्वागत में अपने विचार रखे । एस0आर0सी0जैन माॅडल हाई स्कूल के बच्चों ने संगीत एवं विविधभावों से आचार्यश्रीजी का स्वागत किया । 

आचार्यश्रीजी यहाॅं से विहार कर नवाॅंशहर, राहों, बलाचैर होते हुए 16 मई, 2004 को रोपड़ पधारेंगे जहाॅं पर वैरागी बन्धु रूबी बाॅंसल की जैन भागवती दीक्षा सम्पन्न होने जा रही है । 

रोपड़ पधारने पर आचार्यश्रीजी का हार्दिक अभिनन्दन

श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- अरिहंत भगवान की शरण ग्रहण करो । अपना सर्वस्व उनके चरणों में समर्पित करके खाली हो जाओ, नमन, समर्पण, विनय जिनशासन की मूल साधना   है नमन से ही जीवन पवित्र बनता है । दीक्षा लेना अर्थात् संसार से विरक्ति की ओर आना, संयम में आना, शुभ पुण्यों से प्राप्त होता है । जन्म-2 की साधना के अनन्तर पुण्योपार्जन करने पर हमें यह शुभ अवसर प्राप्त होता है । दीक्षा लेना, दीक्षा देना और दीक्षा की अनुमोदना करना तीनों ही पुण्योपार्जन कराते हैं । आप सभी की उदारता और भावना को देखकर यह सेवा का अवसर दिया गया है । दीक्षा हेतु विनतियाॅं तो अनेक क्षेत्रों की थी परन्तु रोपड़ के क्षेत्र ने यह अनमोल अवसर प्राप्त कर लिया । स्वागत के शुभअवसर पर मंत्री श्री शिरीषमुनि जी म0, संतवृंद एवं महासतीवृंद ने भी आचार्यदेव का स्वागत गुणगान किया । 

उत्तर भारत के विभिन्न अॅंचलों में विचरण बहुत ही सुन्दर रहा । मुख्य उद्देश्य होशियारपुर श्रीसंघ की भावना । वहाॅं पर जैन स्थानक का शिलान्यास समारोह और अक्षय तृतीया के पारणें का था । एक माह पूर्व यहाॅं से ही होशियारपुर के लिए प्रस्थान किया था और दादीकोठी, जालंधर, नवाॅंशहर, राहो, बंगा होते हुए फिर से दीक्षा निमित्त रोपड़ में आना हुआ । उप प्रवर्तिनी महासती श्री कौशल्या जी म0 ‘श्रमणी’, तपाचार्या महासती श्री हेम कुंवर जी म0, विदुषी महासती डाॅ0 दिव्यप्रभा जी म0 आदि महासतीवृंद पधार चुके हैं और भी महासतीवृंद पधार रहे हैं । 21 मई, 2004 को आचार्य भगवंत के सान्निध्य में जैन आर्हती दीक्षा समारोह होने जा रहा है जिसमें कल 17 मई, 2004 को आचार्यदेव का 32 वाॅं वार्षिक ‘दीक्षा दिवस’ एवं वैरागी रूबी बाॅंसल की केसर रस्म अदा की जाएगी । प्रतिदिन प्रवचन ‘आत्म देवेन्द्र हाॅल’, मेन बाजार, रोपड़ में होगा ।

रोपड़ पदार्पण पर सम्पूर्ण जैन समाज के द्वारा आचार्यदेव का हेडवक्र्स के पुल पर अभिनन्दन किया गया और वहाॅं से शोभायात्रा के रूप में आचार्यदेव काॅलेज रोड़, मेन बाजार होते हुए आत्म देवेन्द्र हाॅल, मेन बाजार, रोपड़ पधारे । चतुर्विध श्रीसंघ ने आचार्यदेव के जयकारों के साथ उनका जैन स्थानक में प्रवेश करवाया । वैसे ही स्थानीय सनातन धर्म सभा, आर्य समाज सभा, आत्माराम जैन शिक्षा निकेतन आदि के द्वारा भी आचार्यदेव का स्वागत अभिनन्दन किया गया । आत्म: ध्याना साधना कोर्स बेसिक का प्रारंभ 17 मई, 2004 से प्रारंभ हो रहा है जिसका समय प्रातः 5.30 से 7.30 बजे रहेगा । इच्छुक साधक इस कोर्स में भाग 

लेकर अपने जीवन को सफल बनावें ।

गुरू दृष्टि मिलने पर समस्त सृष्टि पर अधिकार हो जाता है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- गुरू शरीर एवं सीमाओं में बद्ध नहीं है । उसकी दृष्टि विशाल है । वह कोई व्यक्ति नहीं, वह तत्व है । आकाश की भाॅंति उसका जीवन है । आकाश में तारा-मण्डल होते हुए भी वह खाली नजर आता है । इसी प्रकार गुरू संसार में रहते हुए भी भीतर से शान्त है । विराट अस्तित्व वाला गुरू होता है । गुरू के नाम में न उलझना । एक शिष्य के लिए गुरू होता है । गुरू के लिए शिष्य हो यह आवश्यक नहीं । गुरू प्राणाधार है, सर्वस्व है । माॅं की भाॅंति गुरू होता है । जिस प्रकार माॅं के लिए बेटे बराबर है उसी प्रकार गुरू के लिए सारी सृष्टि समान है । गुरू की दृष्टि सम-दृष्टि होती है । माता, पिता, गुरू, देव गुरू धर्म इनके मर्म को समझो । पिता आकाश की भाॅंति स्वच्छ निर्मल होता है, विशाल हृदय वाला होता है । माता धरती की भाॅंति सहनशील होती है, वह ममता से परिपूरित होती है । गुरू समदृष्टि होते हैं । गुरू में सबका प्रतिम्बिब दृश्यमान होता है । 

गुरू को संसार का हिस्सा मत बनाओ । गुरू त्रिकालजयी होते हैं, वे भूत, वर्तमान एवं भविष्य की हर कठिनाई को आसान बना देते हैं ।  उनका शरीर से नहीं भावना से मूल्याॅंकन करो । धर्म का अनुभव करो । समर्पण का भाव लाओ । जब प्रार्थना गहरी होती है तब गुरू के प्रति समर्पण-भाव अपने आप उत्पन्न होता है । स्वतः ही आॅंसू छलक पड़ते हैं, जिससे हमारी आॅंखें पवित्र होती है । आॅंसू हृदय की शुद्धता, पवित्रता, वीतरागता के लिए गिरे । गुरू हमारा आश्रय स्थान है । गुरू धन, पद, यश नहीं देता है, वह तो सत्यदृष्टि देता है । गुरू जीवन को सम्यक्ता प्रदान करता है । पहले स्वयं की दृष्टि बदलो । सृष्टि स्वतः ही बदल जाएगी । जब गुरू दृष्टि बदलेगा तब कृतज्ञता से भर जाना । अपने अस्तित्व को मिटा   देना । नमक और पानी की भाॅंति एक हो जाना । तब गुरू तुम्हें अपने अस्तित्व में समा   लेंगे । तब हम गुरू के अंश हो जाएंगें और तभी साधना का उदय होगा । गुरू की दृष्टि मिलने पर समस्त सृष्टि पर हमारा अधिकार हो जाता है । कहना बड़ा आसान है, करना उतना ही कठिन है । पहले शिष्य बनो, समर्पण की भावना भीतर लाओ, ध्यान, सत्संग, सेवा, भक्ति करो, समर्पण के भावों के लिए साधना, मौन, वीतरागवाणी आवश्यक है । 

आज हमारे श्री शुभम् मुनि जी म0 एव श्री श्रीयश मुनि जी म0 का दीक्षा दिवस है, ये भी इस वीतराग के महापथ पर आगे बढ़ रहे हैं । हम इनके प्रति हृदय से मंगल कामना करते हैं । आज के इस पावन अवसर पर दिल्ली महासंघ के उपाध्यक्ष श्री अशोक जैन ‘जयचंदा’ ने भी अपनी भावनाएॅं अभिव्यक्त करते हुए आचार्यदेव एवं साथी द्वय मुनिवृंद को दीक्षा दिवस की शुभकामनाएॅं प्रेषित की एवं विरक्तात्मा के जीवन की मंगल कामना की ।

अनुकम्पा, दान, मोक्ष का द्वार है: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- प्रभु, परमात्मा की असीम अनुकम्पा से यह जीवन हमें मिला है । धन, पद, यश, मान, सम्मान इतना ही नहीं इन्हें प्राप्त करने के लिए जो अनमोल श्वांसे थीं, जो अनमोल प्राण थे वे भी मिले । हृदय की संवेदनशीलता मिली । वर्तमान युग में हम इसका क्या उपयोग कर रहे हैं । जो श्वांस तुम ले रहे हो, वह क्या सच में तुम ले रहे हो, थोड़ी देर के लिए प्राण ऊर्जा, वायु न रहे तो हम श्वांस नहीं ले सकते । अनंत सहयोग है 

प्रकृति का, चेतन आत्मा का जो हमें भोजन, फल, मकान, वस्त्र आदि मिले । 

आज अनुकम्पा दान का दिवस है । विशाल दृष्टि से देखो, प्रकृति का कण-कण हमें कुछ न कुछ दे रहा है । प्रकृति की असीम अनुकम्पा से हम जीवित हैं । इसी बीच अरिहंत, सिद्ध, गुरू, माता, पिता के भी अनंत उपकार हैं । इस जीवन को ऊध्र्वमुखी बनाने के लिए उनका सहयोग है । श्रावक धर्म में दान का अपूर्व महत्व है । साधु, साध्वी, श्रावक, श्राविका अपनी योग्यता के अनुसार दान कर सकते हैं । साधु ज्ञान, ध्यान, मैत्री, करूणा का दान नहीं कर सकता तो वह साधु नहीं हो सकता । साधु अपने ज्ञान को लुटाये तो उसका ज्ञान बढ़ता ही चला जाएगा । यही मोक्ष का द्वार है । हम हर स्थिति को अनुकूल बना सकते हैं, आवश्यकता है वीतराग-पथ पर एक कदम चलने की । अपने भीतर जो क्रोध, ईष्र्या, जलन है उसे कम करो । नर तन त्याग के लिए है । जितने महापुरूष हुए हैं उन्होंने त्याग किया । ईसा, मोहम्मद, प्रभु महावीर, नानक, गाॅंधी, विनोबा त्याग से ही वीतराग पथ पर आगे बढ़े । आज हमें त्याग की शिक्षा लेनी है । प्रत्येक प्राणी पर अनुकम्पा करनी है । जितना हम दान देंगे उतना ही हमारा जीवन सफल बनेगा । 

अनुकम्पा, दान के विषय में महासाध्वी डाॅ0 सरिता जी महाराज ने भी अपनी भावनाएॅं अभिव्यक्त की । विरक्तात्मा रूबी बाॅसल के पिता श्री देवराज जी बाॅंसल ने गायों को चारा देने की भावना अभिव्यक्त की । इस अवसर पर अनेक भाई बहिनों ने गौ-माता के लिए अपनी धनराशि में से यथायोग्य दान दिया । 

20 मई, 2004 को आचार्यदेव के पावन सान्निध्य में विरक्तात्मा रूबी बाॅंसल की मेंहदी की रस्म दोपहर 3.00 से 5.00 बजे तक होगी, 21 मई, 2004 को प्रातः साढ़े पाॅंच बजे विरक्तात्मा की तिलक रस्म, उसके पश्चात् शोभा-यात्रा प्रातः 8.00 बजे गाॅंधी चैक, रोपड़ से मेन बाजार होते हुए डी0ए0वी0 पब्लिक स्कूल पहुॅंचेगी जहाॅं पर जैन आर्हती दीक्षा समारोह का आयोजन प्रातः 9.30 बजे से शुरू होगा । 

सत्गुरू के सिमरन से कष्ट दूर होते हैं: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- सत्गुरू जीवन में अन्धकार दूर करता है । वह हमारी आत्मा में निवास करता है । गुरू सब कुछ सुनकर कह देता है । गुरू विष को भी पचा लेता है । गुरू आपके जीवन का सम्बल है । सत्गुरू के सिमरन से कष्ट दूर होते हैं । गुरू जीवन का आधार है । वह सही दृष्टि हमें प्रदान करता है । गुरू, सद्गुरू, परमगुरू तीनों शब्द है । गुरू बनना बहुत कठिन है । इस 21 वीं सदी में सैकड़ों में कोई गुरू नजर आता है । लाखों करोड़ों में कोई सत्गुरू नजर आता है तो अरबो खरबों में कोई परम गुरू होता है । सत्गुरू जिन्होंने जीवन में जो भी अर्जित करना था, सार ग्रहण करना था वह ग्रहण कर लिया और निस्सार को छोड़ दिया है । अरिहंत, तीर्थंकर, केवलज्ञानी, सत्गुरू हैं, जो हमें सही दिशा प्रदान करते हैं । धर्म की ओर ले जाते हैं । उनके चरणों में झुकों, उनकी दृष्टि भीतर आएगी जीवन ऐसा ही हो जाएगा । गुरू सबकुछ देता है उसका अस्तित्व ही बहुत है । उसकी मौजूदगी ही बहुत है । गुरू शिष्य का नाता सदा-सदा से रहा है ऐसा दृष्टिकांेण उत्तम है । शिष्य प्राण की बाजी लगाने को तैयार होता है । इतना समर्पण उसके भीतर आता है जब

वह सत्गुरू के चरणों में रहता है । प्रकृति, नियति, सम्बन्ध स्थापित होते हैं जब ऐसी घटना घटित होती है । सत्गुरू बहुत ज्ञानी होगा, शास्त्रों का जानकार होगा यह आवश्यक नहीं । उसका क्रियाकाण्डी होना भी आवश्यक नहीं है । सत्गुरू तो जीवन को धर्म मार्ग में लगाता है, वह साधना के महापथ पर अग्रसर होते हुए औरों को भी ज्ञान देता है । गुरू के लिए यह आवश्यक नहीं कि वह शिष्य को ढूंढ़ता है, शिष्य गुरू को ढूंढता ही है । हम अपनी धारणाओं में गुरू को बाॅंध लेते हैं, उनके अनुसार अपने जीवन को नहीं ढ़ालते । सत्य को स्वीकारो । सत्गुरू जो कहे वह करो । जो वह करता है उसका अनुकरण करना आवश्यक नहीं है । हमारा जीवन एक संयोग है । पूर्व-जन्मों के कृत-कर्मों के अनुसार हमें यह सब कुछ प्राप्त हुआ है । इस जन्म में हम जैसा कार्य करेंगे वैसा ही हमें प्राप्त होगा । किये हुए कर्मों का फल तो भोगना ही पड़ता है । प्रकृति हमें कर्म भोगने के लिए सहयोग देती है । यह सब एक नियति है । नियति के अनुसार सबकुछ होता जा रहा है । 

आज दोपहर 2.30 से 5.00 बजे तक विरक्तात्मा श्री रूबी बाॅंसल की दीक्षा के उपलक्ष में मेंहदी की रस्म हुई । आचार्य सम्राट् पूज्य गुरूदेव श्री शिवमुनि जी महाराज ने इस अवसर पर मेंहदी का महत्व बताते हुए कहा कि मेंहदी हमें शान्ति की ओर ले जाती है । वह एक ऐसा रंग प्रदान करती है जो हमें जीवन-भर साथ देता है । मेंहदी जितनी पीसते हैं उतनी ही रंगदार होती है । इस रंग को विरक्तात्मा धारण कर अपने संयम के पथ पर इसी रंग की भाॅंति आगे बढ़ता रहे । इस अवसर पर अनेक महासतीवृंद ने अपनी भावनाएॅं गद्य एवं पद्य के माध्यम से व्यक्त की । इस अवसर पर विरक्तात्मा के माता पिता द्वारा मेंहदी की रस्म अदा की गई । कल 21 मई, 2004 को प्रातः सात बजे से आठ बजे तक ‘आत्म देवेन्द्र हाॅल’ जैन स्थानक मेन बाजार में विरक्तात्मा की तिलक रस्म, उसके पश्चात् शोभा-यात्रा प्रातः 8.00 बजे गाॅंधी चैक, रोपड़ से मेन बाजार होते हुए डी0ए0वी0 पब्लिक स्कूल पहुॅंचेगी जहाॅं पर जैन आर्हती दीक्षा समारोह का आयोजन प्रातः 9.30 बजे से शुरू होगा । 

श्री शशांक मुनि की दीक्षा के उपलक्ष में जैनाचार्यश्री की प्रेरणा से

गौशला को 70 हजार रूपये का अनुकम्पा दान

भारतीय संस्कृति में गाय का बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान है । भारतीय मनीषियों ने गहन खोज करके ये घोषणा की हुई है कि गाय को यदि माता कहा जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं है । इसीलिए भारतीय संस्कृति का दम भरने वाले ‘देश धर्म का नाता है, गाऊ हमारी माता है’ का उद्घोष करके जन-मानस को जागृत करते रहते हैं, ये शब्द आज मंगलवार 25 मई, 2004 को रोपड़ की गोपाल गौशाला में गायों की चल रही सेवा को देखने के लिए पधारे श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने गौशाला प्रबन्धकों द्वारा आयोजित प्रवचन मण्डप में कहे ।   

इस अवसर पर गौशाला प्रबन्धकों के अतिरिक्त देश के विभिन्न भागों से आये जैन संत, साध्वियाॅं तथा सैकड़ों नगर निवासी उपस्थित थे । आचार्यश्रीजी ने उपस्थित श्रद्धालुओं को प्रेरणा देते हुए कहा कि- जिस गाय के दूध को अमृत तुल्य कहा गया है और हमारी जन्म देने वाली माता से भी अधिक हमारी सेवा करती है, आज भारत में इसकी जो दुर्दशा है वह देखकर कलेजा मुंह को आता है । आचार्यश्रीजी ने कहा कि- आज विदेशी मुद्रा के लोभ में अपनी माॅं के तुल्य गाय का माॅंस विदेशों को भेजने के लिए दर्जनों कत्लखाने सरकार की अनुमति से चल रहे हैं । गलियों ओर बाजारों में पेट की भूख मिटाने के लिए गन्दगी के ढेरों पर मुंह मारती सैंकड़ों गायें देखी जा सकती है । उन्होंने कहा कि वे लोग धन्य हैं जो गाय की आजीवन सेवा करते हैं, गौशालाएॅं बनाकर गायों की वृद्धि और अमृत तुल्य दूध उत्पादन से समाज को बुद्धिमान, स्वस्थ और सुसंस्कारों वाला बना रहे   हैं । आचार्यश्रीजी ने बताया कि गौशाला के प्रबन्धकों ने उन्हें बताया है कि गौशाला में 550 से भी अधिक गायें होने से उनको भर पेट भोजन भी नहीं दिया जा सकता । क्योंकि साधनों की कमी है । गर्मी और सर्दी से बचाने के लिए गौशाला में पर्याप्त शेड भी नहीं है । 

जैनाचार्यश्री ने श्रद्धालुओं से प्रेरणा की कि गौशाला को अधिक से अधिक धन, चारा, भवन बनाने का सामान तथा अन्य सहयोग प्रदान किया जाये । आचार्यश्रीजी की प्रेरणा से जैन महिला मण्डल, रोपड़ की ओर से आठ हजार रूपये, नवदीक्षित श्री शशांक मुनि के सांसारिक पिता श्री देवराज जी बाॅंसल, भटिण्डा निवासी ने छः हजार रूपये का चारा तथा अनेक श्रद्धालुओं ने अपने सामथ्र्य अनुसार दान देकर लगभग 70,000 हजार रूपये से भी अधिक का गौशाला में सहयोग  किया । इस अवसर पर श्री सतीश मुनि जी म0, महासाध्वी श्री रविरश्मि जी म0, साध्वी श्री मनीषा जी म0, साध्वी श्री अनुपमा जी म0 तथा श्री सुव्रत मुनि जी म0 ने भी अपने विचार प्रस्तुत कर लोगों को गौ-सेवा के लिए प्रेरित किया । नवदीक्षित श्री शशांक मुनि जी म0 ने सुन्दर भजन गाकर गौ-सेवा की प्रेरणा दी । 

इस अवसर पर आचार्यश्रीजी, अन्य संतों एवं साध्वियों के गौ-शाला में पधारने पर हार्दिक स्वागत करते हुए प्रबन्धक कमेठी के महासचिव श्री सुरेन्द्र कुमार ‘शास्त्री’ ने आचार्यश्रीजी को कल्पवृक्ष अथवा कामधेनु की उपमा दी । उन्होंने कहा कि आचार्यश्रीजी के यहाॅं चरण पड़ने से अब कोई कमी नहीं रहेगी । प्रबन्धक कमेटी के प्रधान श्री प्रेम कुमार कपूर ने भी भाव-भीने शब्दों में संतजनों एवं नगरनिवासियों का स्वागत किया । श्रद्धालुभक्तों ने आचार्यश्रीजी के सान्निध्य में गायों को चारा, गुड़ और अन्य मिठाईयाॅं खिलाकर अपने सेवाभाव को प्रकट किये । 

साधना को जीवन का आवश्यक अंग बनाएं: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी म0

नालागढ़ 27 मई, 2004: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- अरिहंत की वाणी, सिद्ध का स्मरण, सत्गुरू का संग भीतर आए तो सब मिल गया । चढ़ते सूरज को सभी नमस्कार करते हैं । व्यक्ति धन, पद, प्रतिष्ठा प्राप्त कर ले परन्तु सिद्ध का स्मरण न करे तो उसे कुछ भी नहीं मिला, परन्तु एक व्यक्ति सिद्ध का सिमरन करें और पद, यश, प्रतिष्ठा प्राप्त भी न करे फिर भी उसे सब कुछ मिल गया । सिद्ध का स्मरण सर्वोच्च है । अरिहंत की वाणी धर्म को उत्कृष्ट स्थान प्रदान करती है । धर्म उत्कृष्ट मंगल है जिसे देवता भी नमस्कार करते हैं । धर्म मन्दिर,  मस्जिद, गुरूद्वारे या स्थानक में नहीं है, वह तो हमारे हृदय में है । मन्दिर आदि आलम्बन है जहाॅं जाकर हम धर्म साधना कर सकते हैं । आलम्बन को हमने अपना मान लिया । तीर्थंकर भगवान, सिद्ध भगवान को नमस्कार कर साधना में प्रविष्ट होते हैं और अपना सारा जीवन साधना में लगा देते हैं । हम भी साधना में डूबें, सिद्ध की प्राप्ति सभी चाहते हैं परन्तु साधना कोई नहीं  चाहता । साधना को जीवन का आवश्यक अंग बनाएं । 

जीवन में जो भी हो रहा है वह हमारे कर्म-संस्कार हैं । तुम स्वयं कर्ता और भोक्ता हो, कोई कार्य तुमने किया और मान लिया कि मैंने किया तो तुम्हारे भीतर कर्ताभाव आ गया, अनेकों कार्य तुमने कर लिये परन्तु कर्ताभाव नहीं आया तो कर्म-बंधन नहीं होगा । हमारी, चाहना, इच्छा से कुछ भी नहीं होता, सब कुछ नियति, प्रकृति, पूर्व कर्म-संस्कार हैं । आम तो एक ही है पकने से पूर्व कच्चा आम खट्टा होता है, आम पकते ही मिठास आ जाती है, सहज प्रकृति से सब कुछ होता है । प्रकृति की भाॅंति तुम भी सहज हो जाओ । भक्ति करो, साधना करो, अपनी दृष्टि को बदलो । मंगल की भावना रखो । 

आज आचार्य भगवन् का नालागढ़ में शुभ मंगल प्रवेश हुआ । इस अवसर पर श्री रघुवर दयाल पब्लिक स्कूल से आचार्यश्रीजी के स्वागत में भव्य शोभा-यात्रा का आयोजन हुआ जिसमें अनेक स्कूलों के बच्चों ने भाग लिया । उत्तर भारत के विभिन्न अॅंचलों से आये श्रावकों ने जैन धर्म एवं आचार्यों के जयकारों से अम्बर गुंजायमान करते हुए आचार्य भगवन् का स्वागत किया ।  इस अवसर पर जैन सभा, नालागढ़ की ओर से आचार्यश्रीजी का स्वागत किया गया । तप प्रवर्तिनी महासती श्री हेम कुंवर जी म0- उप प्रवर्तिनी महासती डाॅ0 सरिता जी म0, विदुषी महासती डाॅ0 दिव्यप्रभा जी म0, तप कौमुदी महासती श्री निर्मल जी म0 आदि महासतीवृंद ने भी अपनी भावनाएॅं आचार्यदेव के चरणों में रखी । 

28 मई, 2004 को नवदीक्षित श्री शशांक मुनि जी म0 को बड़ी दीक्षा के माध्यम से आचार्यदेव पंच महाव्रत प्रदान करेंगे । यह कार्यक्रम प्रातः 8.00 बजे से श्री रघुवर दयाल पब्लिक स्कूल, नालागढ़ में होगा । 

आचार्य भगवंत के पधारने से यहाॅं पर आत्म: ध्यान साधना कोर्स ‘बेसिक’ का आयोजन 31 मई से 4 जून, 2004 प्रतिदिन प्रातः 5.30 से 7.30 बजे तक एवं आत्म: ध्यान साधना कोर्स ‘एडवाॅंस-ा’ का आयोजन 4 से 6 जून, 2004 तक तक प्रतिदिन प्रातः 6.00 से सायं 5.00 बजे तक श्री एस0 एस0 जैन सभा, नालागढ़ में होगा ।

साधक के जीवन में परम् विनय आवश्यक है: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी म0

श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- अरिहंत प्रभु को नमन । नमन करने से हमारी सारी समस्याएॅं दूर हो जाती हैं । हमारी साधना का मूल स्ोत नमन है । धर्म का मूल विनय है । यदि आप धर्मात्मा हैं, साधक हैं तो आपके जीवन में दो बातें अवश्य होगी या दो बातों को जीवन में अवश्य स्वीकार कीजिए । परम विनय और मैं कुछ भी नहीं जानता । परम विनय यानि मेरा कुछ भी नहीं है । मेरी धड़कन, मेरा श्वांस, शरीर, अंग, प्रत्यंग, जगत, प्रकृति कुछ भी मेरा नहीं है, सब प्रभु के चरणों में समर्पित है । जब ऐसे भाव भीतर आएंगें तब परम विनितता आएगी । हाथ जोड़का, शीश झुकाकर घुटनों के बल झुकना नमन है । आप किसी नाम विशेष को नमन नहीं करते, उस सर्व-सत्ता को नमन करते हैं जिसके अनंत उपकार हैं आपके ऊपर । नाम तो केवल एक खूंटी है, कपड़े टांगने के लिए खूंटी चाहिए उसी प्रकार हर एक को पहचानने के लिए माता, पिता द्वारा नाम दिया जाता है । 

जिस व्यक्ति के भीतर अरिहंत की वाणी, सिद्ध का स्मरण, सत्गुरू का सत्संग नहीं है उसका जीवन निस्सार है । जिस प्रकार मन्दिर में प्रतिमा का महत्व है उसी प्रकार हृदय में श्रद्धा का महत्व है । जिस मन्दिर में परमात्मा नहीं है उसमें कुछ भी नहीं है और जिस मन्दिर में परमात्मा विराजमान है उसमें सबकुछ है, जो परमात्मा की नजर से गिर गया वह अपने जीवन से भी गिर गया । आपका और परमात्मा का सम्बन्ध एक अटूट सम्बन्ध बने । दुनियाॅं के सारे सम्बन्ध हमने जो बनाएं हैं वे शाश्वत् नहीं हैं । हमारा सम्बनध हर एक के साथ साधना से हो, साधना विनीतता से की जाए, समर्पण से की जाए । भीतर अहंकार न आए । विनय से केवल-ज्ञान तक पहुंॅचा जा सकता है । क्रिया महत्वपूर्ण नहीं है, भाव महत्वपूर्ण है । अपनी बुद्धि से कार्य करो । झुक जाओ, विनय को भीतर उतारो । हम अपने जीवन को देखें, भीतर ऋजुता, सरलता लाएं । सेवा करें । सेवा परम् धर्म है । विनय और समर्पण से जीवन में सब कुछ आ जाएगा । विनय प्रभु के प्रति हो । भीतर चल रही प्रत्येक श्वांस उसके चरणों में समर्पित कर दो । प्रभु ने हमें सब कुछ दिया है पर उसकी भक्ति के लिए हमारे पास समय नहीं है । प्रतिपल प्रतिक्षण समर्पण में रहो । प्रभु की भक्ति करो ।  

आचार्य भगवंत के पधारने से यहाॅं पर आत्म: ध्यान साधना कोर्स ‘बेसिक’ का आयोजन 29 मई से 2 जून, 2004 प्रतिदिन प्रातः 5.30 से 7.30 बजे तक चल रहा है एवं आत्म: ध्यान साधना कोर्स ‘एडवाॅंस-ा’ का आयोजन 2 से 4 जून, 2004 तक तक प्रतिदिन प्रातः 6.00 से सायं 5.00 बजे तक श्री एस0 एस0 जैन सभा, नालागढ़ में होगा ।

श्रद्धा ही भक्ति, प्रार्थना, ध्यान है: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- राजी ओसदी रजा विच रहिये । परमात्मा की मर्जी में रहना सबसे अच्छा है । परमात्मा जिस प्रकार रखे वही ठीक है । एक मार्ग है संघर्ष का, एक मार्ग है समर्पण का, चुनाव तुम्हारा है, तुम किसे ग्रहण करोगे । संघर्ष जीवन में तनाव, पीड़ा, बेचैनी, अशान्ति लाता है । समर्पण जीवन में सुख समृद्धि सौभाग्य शान्ति की अभिवृद्धि करता है । ब्लैक-बोर्ड तुम्हारे सामने है, स्लेट भी हाथ में है किसका चित्र बनाओगे यह तुम पर निर्भर करता है, जिस प्रकार मन में भावनाएॅं होती हैं उसी प्रकार चित्रित हो जाता है । भावनाओं में बड़ा बल होता है । 

प्रभु महावीर ने श्रद्धा को परम दुर्लभ बताया । व्यक्ति ज्ञान, ध्यान, तप, क्रिया कर सकता है परन्तु उसके भीतर श्रद्धा का आना दुर्लभ है । तप करना सहज है, सेवा करना कठिन है, जब भीतर श्रद्धा, भक्ति, विनय होती है तब सेवा स्वतः हो जाती है । सेवा से व्यक्ति केवलज्ञान तक पहुंॅच जाता है । श्रद्धा भी दो प्रकार की है । तुम कहते हो कि ईश्वर नहीं है यह भी श्रद्धा है । ईश्वर को नहीं मानोगे तो किसी को तो मानोगे ही । ईश्वर पर आस्था रखना भी श्रद्धा है । तुम 33 करोड़ देवी देवता, परमात्मा पर श्रद्धा कर लो फिर भी मोक्ष निर्माण नहीं पा सकते क्योंकि प्रथम अपने पर श्रद्धा होनी जरूरी है । अपने पर भरोसा रखो, अपने पर मतलब नाम, धन, पद, गुरू, शिष्य पर नहीं, आपके शुद्ध तत्व, परमतत्व पर श्रद्धा रखो । जैसे सेठ सुदर्शन में था । उसने कभी अपना और पराया माना ही नहीं । परमातम और तुम एकनेक हो जाओ । 

प्रकृति को स्वीकार करो । अपना दिमाग मत लगाओ । परमात्मा में और अपने में अन्तर मत रखो । हर पल भीतर यही चिन्तन रहे कि मैं जैसा भी हूॅं प्रभु तेरा हूॅं । आज श्रद्धा में कमी आ गई है । आज अपने पर परमात्मा पर यहाॅं तक कि अपनी श्वांस पर भी श्रद्धा नहीं है । हर कोई यह देखता है कि पता नहीं कब श्वांस रूक जाये । अगर श्रद्धा होगी तो श्वांस भी अपने अनुसार चलेगा । श्रद्धा रखो, आत्मा परमात्म बनेगा । श्रद्धा ही भक्ति, प्रार्थना, ध्यान है । परमात्म-तत्व को चाहते हो तो प्रभु चरणों में ध्यान लीन हो जाओ । अपने जीवन का सब कुछ समर्पित कर दो । यह मानव जीवन बहुत अनमोल है । अनेक भवों के बाद यह हमें मिला है । इसको यों ही न गंवाओ । इसका मूल्य समझो । सही उपयोग करो । 

आचार्य भगवंत के पधारने से यहाॅं पर आत्म: ध्यान साधना कोर्स ‘बेसिक’ का आयोजन 29 मई से 2 जून, 2004 प्रतिदिन प्रातः 5.30 से 7.30 बजे तक चल रहा है जिसमें 50 साधक भाग ले रहे हैं । आत्म: ध्यान साधना कोर्स ‘एडवाॅंस-ा’ का आयोजन 2 से 4 जून, 2004 तक प्रतिदिन प्रातः 6.00 से सायं 5.00 बजे तक श्री एस0 एस0 जैन सभा, नालागढ़ में होगा ।

प्रभु भक्ति में लगे श्वांस परलोक की पूंजी 

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- प्रभु नाम पल पल उचारा करो तुम, ना पापों में जीवन गुजारा करो तुम । प्रभु नाम प्रतिपल प्रतिक्षण तुम्हारे भीतर चलता रहे । यह मानव का जीवन  कितना अनमोल हमें मिला । हम इसका उपयोग कैसे कर रहे हैं । सभी तीर्थंकरों ने अपनी वाणी में फरमाया कि- मानव जीवन अनमोल है । उनके सारे उपदेशों का सार-सूत्र अगर निकाला जाये तो वह योग, उपयोग और विवेक होगा । अधिकतर तीर्थंकर महाप्रभु योग, उपयोग और विवेक का विवेचन करते हैं । योग को जीवन में कैसे लाएं, इस मानव जीवन का उपयोग किस प्रकार करें और विवेकपूर्ण जीवन कैसे जीयें ?

जब तुम प्रातः उठते हो, निद्रा त्याग करते हो तब प्रभु का धन्यवाद करो । प्रभु आज का दिन तूने दे दिया, ये श्वासें दे दी, धड़कन, प्राण दे दिया, प्रभु धन्यवाद है तेरा, तूने जीने का अवसर दिया । अरिहंत का सिमरन करो । कबीर ने भी सिमरन के लिए कहा है- 

कबीरा सोया क्या करे, जाग के जपो मुरार ।

एक दिन है सोवना, लम्बे पाॅंव पसार ।।

प्रतिदिन हम सोते आ रहे हैं । अनेक जन्मों में हमने नींद ली । कभी जागने का विचार भी मन में आया है । यह जीवन अनमोल है । सुबह उठते ही नवकार मंत्र का स्मरण करो, अरिहंत प्रभु को याद करो । हमें प्रतिदिन धन, पत्नी, भोजन आदि की याद आती है, अरिहंत की याद नहीं आती । अरिहंत प्रभु के अनंत उपकार हैं । अपना कण-कण उनके चरणों में समर्पित कर दो । अरिहंत तुम्हारे भीतर आएंगे तो आनंद, शान्ति, समता भीतर आएगी । मूल्याॅंकन करो श्वासों का । 24 घण्टों में कितने श्वांस हमने प्रभु भक्ति में लगाये । जितने श्वांस हमने प्रभु की भक्ति में लगाएं हैं वो ही हमारी सही पूॅंजी है । भोजन करो, चलो, उठो, बैठो, हर कार्य करो, भीतर अरिहंत का सिमरन चलता रहे । परमात्मा के दीवाने बन जाओं, जो परमात्मा के दीवाने होते हैं उनको संसार पागल ही समझता है परन्तु वो ही भवसागर पार कर जाते हैं । 

अरिहंत प्रभु, सिद्ध प्रभु की भक्ति करो, उनकी लौ भीतर जला लो, हर तरफ प्रकाश ही प्रकाश होगा । प्रार्थना करो, अहंकार छोड़ दो । जैसा तुम करोगे वैसा ही तुम्हें मिलेगा, अगर कांटे बोये हैं तो कांटे ही प्राप्त होंगे, आम की गुठली बोई है तो मीठे आम प्राप्त होंगे । दूसरों के दर्द में आॅंसू बहाओ । परोपकार करो । करूणामय बनो । अपने भाव विचारों को शुद्ध कर लो, यही विचारों का अनमोल सार है । 

अरिहंत की भक्ति ही निज स्वरूप की प्राप्ति है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

नालागढ़ 1 जून, 2004: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- 

तेरे करम से बेनियाज, कौनसी शय मिली नहीं, 

झोली ही मेरी तंग है, तेरे यहाॅं कमी नहीं । 

यदि तुम हृदय से परमात्मा को पुकारोगे, अन्तःकरण की साक्षी से याद करोगे तो लगेगा कि अनंत आनंद, सुख, समृद्धि तुम्हारे भीतर है । परमात्मा की वर्षा प्रतिपल प्रतिक्षण हो रही है, हमारा पात्र ही छोटा है । हम उसे पूर्णतः ग्रहण नहीं कर पा रहे हैं । जब परमात्मा के प्रति समर्पण रखोगे तब अपनी बुद्धि मत लगाना । अन्तःकरण की अवस्था को देखकर समर्पित हो जाना । जैनागमों में तीर्थंकर गोत्र उपार्जन की बीस बोल भक्ति के हैं । भक्ति में इतने डूबो कि तुम्हें अपने शरीर का भान ही न रहे । अहंकार में दुःख है, समर्पण में सुख है । जब तुम भक्ति करोगे तो समर्पण भीतर आएगा । अरिहंत, सिद्ध प्रभु के आगे झुकोगे तो विराट् आनंद भीतर अवतरित होगा । समय का सदुपयोग करें । दिन का कितना समय हम व्यर्थ में गॅंवा रहे हैं, अगर यही समय भक्ति में लग जाये तो मोक्ष के द्वार खुल जाएंगें । यह अवश्य है कि प्रत्येक व्यक्ति को यहाॅं से जाना है । मृत्यु तो आनी ही है । कबीरजी ने कहा था-

हाड़ जले ज्यों लाकड़ी, केस जले ज्यों घास,

सब तन जलता देखकर, भया कबीर उदास ।

सारा शरीर घास की भाॅंति जल जाएगा । हड्डियाॅं लकड़ी की तरह धू-धू कर जल जाएंगी । सब खेल खत्म हो जाएगा । यह मानव जीवन पुण्य से मिला है । कितना पुण्य किया तब यह मिला है । यह जन्म ही ऐसा है जहाॅं पर हम प्रभु की भक्ति कर सकते हैं । देवता भी भक्ति करने के लिए तरसते हैं । इस मानव जन्म का हम सदुपयेाग करें । भक्ति से एक नमस्कार मंत्र ही पढ़ें, परन्तु सारा ध्यान उसमें लग जाये । भीतर समर्पण, श्रद्धा, भक्ति, निष्ठा आ जाए । इतना समर्पण कर दो कि प्रभु ही सब कुछ हो जाए । जैसे मीरा ने श्रीकृष्ण के प्रति, चंदना ने प्रभु महावीर के प्रति समर्पण किया था । अरिहंत की भक्ति करना यानि निज स्वरूप की प्राप्ति करना है । जहाॅं अहंकार है वहाॅं बोझ है, भारीपन है, तुम अहंकार मत रखो । जब अहंकार नहीं होगा तो तुम निर्भार हो जाओगे । मोक्ष का सुख इतना है कि तीनों कालों वर्तमान, भूत, भविष्य के देव इकट्ठे हो जाएं, उनका सारा सुख मिला लिया जाऐ तो अरिहंत के सुख का अनंतवां भाग भी नहीं होगा । इतना सुख है अरिहंत तत्व में, उसकी प्राप्ति के लिए हमें भक्ति करनी होगी । समर्पण को भीतर लाना होगा । अपने इस तन को भूलना होगा । उस भक्ति में इतना तल्लीन हो जाओ कि हम प्रभु-मय बन जायें ।

आचार्य भगवंत के पधारने से यहाॅं पर आत्म: ध्यान साधना कोर्स ‘बेसिक’ का आयोजन 29 मई से 2 जून, 2004 प्रतिदिन प्रातः 5.30 से 7.30 बजे तक चल रहा है जिसमें 50 साधक भाग ले रहे हैं । आत्म: ध्यान साधना कोर्स ‘एडवाॅंस-ा’ का आयोजन 2 से 4 जून, 2004 तक प्रतिदिन प्रातः 6.00 से सायं 5.00 बजे तक श्री एस0 एस0 जैन सभा, नालागढ़ में होगा ।

जीवन की अप्रमत्तता को साधो: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- प्रभु महावीर की वाणी परम कल्याणकारी है । प्रभु महावीर की वाणी का सार ‘जीवो मंगलम्’ एक सूत्र में आ जाता है । प्रत्येक जीव मंगल-स्वरूप है । किसी जीव को कष्ट न पहुंॅचे, उसके हृदय को दुःख न पहुॅंचे, सभी सुखी हों । प्रभु महावीर की साधना का सार-सूत्र एक शब्द में बताया जाये तो वह है अप्रमत्तता । प्रमाद रहित हो जाना, आलस्य का छूट जाना, अहंकार में हम ये मेरा, ये तेरा करते रहते हैं, अहंकार में आ जाते हैं, किसी भी स्थल पर रहो पर अप्रमत्त रहो । घर में रहो, संसार में रहो परन्तु संसार से अलग रहो । जागरूक रहो । 

आज हमारे जीवन का लक्ष्य खो गया है । आज के इस युग में शिक्षा का लक्ष्य ही खो गया है । हमारे मस्तिष्क के दो हिस्से हैं एक राईट ब्रेन एक लेफ्ट ब्रेन जिसे हम छोटा दिमाग और बड़ा दिमाग कहते हैं । राईट ब्रेन भावनाओं का है, छोटे दिमाग में भक्ति, सेवा, नृत्य, प्रेम, विविध तरंगें निर्मित होती हैं और लेफ्ट ब्रेन में हमारा सारा काम-काज फिट होता है एक कम्प्यूटर की भाॅंति एक दिमाग काम करता है । वैज्ञानिकों ने खोज की है कि लेफ्ट ब्रेन की भाॅंति राईट ब्रेन को भी महत्व देना चाहिए । इसका विकास होना आवश्यक है । आज जन जन केवल लेफ्ट ब्रेन पर ही जोर दे रहा है इसी कारण से संसार में तनाव, पीड़ा, बेचैनी, अशान्ति बढ़ती जा रही है । जितनी सेवा होगी उतने ही तुम रोमांचित हो जाओगे, जितना ध्यान, स्वाध्याय करोगे उतना ही मस्तिष्क खुलता चला जाएगा । 

एक ही सुख है जिसे हम परम सुख मान सकते है वह है अरिहंत की भक्ति, वीतरागता, निर्मलता, बच्चे की भाॅंति शुद्ध, सरल, निर्मल हो जाओ । जीवन की पवित्रता, निर्मलता को साधो, यही जीवन का खजाना है ।  हर कार्य होशपूर्वक करो । अप्रमत्त रहने से परमात्मा को पा सकते हो, यही जीवन का लक्ष्य है ।

धन से परमात्म प्राप्ति दुर्लभ: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

नालागढ़ 3 जून, 2004: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- 

‘करो प्यार सत्गुरू से, जीवन सफल बना लो । 

यह तन न फिर मिलेगा, कुछ नाम धन कमा लो ।।

संसार के सभी लोग धन कमाते हैं इसलिए कि धन से सुख, सुविधा मिले । धन से दुनियाॅं की सारी चीजें खरीद सकते हो परन्तु एक चीज नहीं प्राप्त कर सकते वह है  परमात्मा । हीरे, जवाहरात, राज, प्रतिष्ठा, सिंहासन सब कुछ प्राप्त कर सकते हो परन्तु परमात्म प्राप्ति दुर्लभ है । सत्गुरू हमें परमात्मा की प्राप्ति कराते हैं । सत्गुरू वह है जो सत् की शिक्षा देते हैं, परमात्मा सच्ची राह पर आगे बढ़ाते हैं । मोह भंग कर देते हैं । 

धन दो प्रकार का है एक तो वह धन जिससे संसार की सारी चीजें प्राप्त की जा सकती है और दूसरा वह धन जिससे परमात्म प्राप्ति हो सकती है, जिसे नाम धन कहते हैं । विश्व के सारे संत नाम धन कमाने की प्रेरणा देते हैं । वे कहते हैं नाम धन से ही यह जीवन अपने अन्तिम लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है । जीवन को कैसे जीएं ? यह हमारा लक्ष्य है । हम अपने जीवन को दुःख में भी दुःखमयी जी रहे हैं और सुख में भी भार समझकर जी रहे हैं, ऐसा जीवन जीना आपको अच्छा लगता है परन्तु प्रभु महावीर फरमाते हैं कि प्रतिपल प्रतिक्षण आनंद, सुख, शान्ति में रहना ही जीवन जीने का उत्तम ढंग है । जो कुछ भी हो रहा है उसे प्रभु का प्रसाद समझो । संयोग, वियोग, अनुकूल, प्रतिकूल सब प्रभु का प्रसाद ही है । जीवन में निश्चित है अनुकूल के साथ प्रतिकूल अवश्य मिलेगा । 

जीवन से तुम्हें कभी संतोष मिला है । हमेशा हमारी तृष्णा बढ़ती ही चली गई । हर बार हमने कुछ न कुछ याचनाएॅं की और यह याचना कभी खत्म ही नहीं हुई । दुनियाॅं के सारे आकर्षण, सारी वासनाओं को समेटकर प्रभु के चरणों में अर्पित कर दो । प्रभु दुःख भी तेरा है और सुख भी तेरा है । मेरा सर्वस्व ही तेरा है । प्रभु की भक्ति में श्रद्धा, निष्ठा, सेवा के साथ समर्पित हो जाओ । जो तुम्हें मिला है उसे बांटते चले जाओगे, जितना बोटोगे उतना ही मिलेगा, खुले हृदय से बाॅंटते चले जाना । जब बांटोगे तो तुम्हें कुछ न कुछ नया   मिलेगा । अहंकार विलीन हो जाएगा और श्रुद्धता की स्थापना होगी । 

 

नालागढ़ में आचार्यश्रीजी के सान्न्ध्यि में आत्म: ध्यान साधना कोर्स सम्पन्न

नालागढ़ 5 जून, 2004: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- ‘उतरा सागर में उसको कि मोती मिला, खोज जिसने भी कि मैं उसी को मिला । यदि तुम मोती प्राप्त करना चाहते हो तो समुद्र की गहराई में जाना पड़ेगा । इस संसार में जिसने भी जो कुछ पाया है, कुछ खोकर पाया है । बीज के टूटने पर वृक्ष उत्पन्न होता है । जब बीज मरता है तब वह अपना नया जीवन प्रारंभ करता है । चेतना अजर अमर है । हमारा आत्म-तत्व ही ऐसा है जो शाश्वत् है जिसे शस्त्र काट नहीं सकते । अग्नि जला नहीं सकती । पानी गला नहीं सकती । वायु बहा नहीं सकती, ऐसी आत्मा अजर अमर है । मूर्तिकार एक प्रतिमा बनाता है तो वह एक पत्थर में निस्सार भाग को निकाल देता है । जो सारभूत तत्व रह जाता है वह प्रतिमा बन जाती है । जब समुद्र की गहराई में जाना है, मोती प्राप्त करना है तो हल्का होकर जाना पड़ेगा । इसी प्रकार परमात्मा के पास भी हल्का होकर जाओ । धन, पद, यश, शरीर मेरा नाम भी नहीं है ऐसी भावना भीतर रखो । जो मिला है उसका विसर्जन कर दो । शुद्धता को भीतर लाओ, भक्ति करो अहंकार टूटेगा । तुम्हारा हृदय चाहिए भक्ति के लिए । भक्ति हृदय से होती है । पूर्णतः समर्पित हो जाओगे तब तुम परमात्मा के हो जाओगे । परमात्म् भक्ति के आगे स्वर्ग की अप्सराएं, कल्पवृक्ष सब कुछ फीके हैं । जो उस परम तत्व में आनंद है वह संसार की भौतिक चीजों में हमें प्राप्त नहीं हो सकता । प्रभु तुम मेरे पास हो तो मुझे सब कुछ मिल गया है । अगर प्रभु से कुछ माॅंगना ही है तो यही माॅंगना कि प्रभु मुझे सिद्ध-गति दे दो । सहजता, सरलता, निर्मलता में आ जाओ । जैसी भक्ति करोगे वैसा प्रसाद प्राप्त होगा । भीतर सिद्ध-प्रभु के प्रति शरण भाव रखो । 

आज ध्यान साधना शिविर का समापन हुआ जिसमें 21 भाई बहिनों ने भाग लिया । ध्यान साधना शिविर में हम यही प्रयोग करते हैं कि हम भक्ति में समर्पण में कैसे   आयें । शिविर में शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक पटल पर परिवर्तन होता है । प्रत्येक शिविर का अपना अनुभव अनूठा है । आज हम स्वास्थ्य प्राप्ति के लिए अनेक डाॅक्टरों के पास घूमते हैं फिर भी वह स्वस्थता हमें प्राप्त नहीं होती । स्वस्थता का सारा खजाना योग में भरा पड़ा है । योग, प्राणायाम, ध्यान मानसिक स्तर पर काम करते हैं । हमारी मनःस्थिरता होती है । इससे अनेकों बड़ी बीमारियाॅं दूर होती हैं । आध्यात्मिक स्तर पर चित्त शान्त, मन पवित्र और आत्मा आनंद से परिपूर्ण हो जाती है । ध्यान से हमारी निर्णय शक्ति बढ़ती है, शुद्धि सामायिक भीतर आती है, अहंकार टूटता है, भक्ति समर्पण में मन लगता है । शारीरिक स्तर पर हमारा स्तर साधना के अनुकूल बनता है । शरीर साधना में सहयोग दें सबसे उत्तम कार्य है अगर शरीर ही साथ नहीं देता तो हम साधना किस प्रकार कर पाते । साधना के द्वारा हम शरीर को साध सकते हैं । इस साधना शिविर से अनेक व्यक्तियों को बहुत लाभ हुए जिसमें एक बहिन को घुटनों की पुरानी प्रोब्लम थी, पीजीआई तक इलाज हुआ परन्तु वह स्वस्थ नहीं हो पाई, साधना शिविर के द्वारा वह पूर्णतः स्वस्थ हो गई । किसी का क्रोध शान्त हो गया, किसी को अनमोल जड़ी बूंटी प्राप्त हो गई । किसी ने इस शिविर को कल्पवृक्ष की भाॅंति समझा । 

आज आचार्यश्रीजी का विहार यहाॅं से पंचकूला की ओर होगा । आचार्यश्रीजी बद्दी, पिंजोर होते हुए 8 जून को श्री जैनेन्द्र जैन गुरूकुल, पंचकूला पधारंेगे । उसके पश्चात् सेक्टर पन्द्रह एवं सेक्टर 17 में भी साधना शिविर के आयोजन एवं आचार्यश्रीजी के अनमोल प्रवचन होंगे, 23 जून, 2004 को आचार्यश्रीजी का चण्डीगढ़ वर्षावास हेतु प्रवेश होगा । 

चैबीसवें अवतार श्रमण भगवान महावीर का धर्म-शासन एक तरफ दूसरी तरफ तीनों लोकों का साम्राज्य है तो तुम्हारी चाहना क्या होगी ? तुम महावीर का धर्म-शासन चाहोगे या तीनों लोकों का साम्राज्य चाहोगे । तुम जो भी चाहते हो उसको हृदय से चाहो । अपने हृदय को टटोलो कि हम हृदय से क्या चाह रहे हैं । युद्ध हो रहा है कृष्ण के पास कौरव भी गये, पाण्डव भील गये । श्री कृष्ण भी लेटे हुए थे दुर्योधन सिर की तरफ खड़ा था और अर्जुन पैरों की ओर खड़ा हो गया । जैसे ही श्रीकृष्ण उठे उनकी निगाह दोनों पर पड़ी । उसके बाद श्रीकृष्ण ने दुर्योधन से पूछा कि क्या चाहते हो तो दुर्योधन ने कहा कि मुझे आपकी सारी सेना की सामग्री यह सब दे दो और अज्र्रुन ने कहा कि प्रभु हमें तो सिर्फ आप ही चाहिए । तीन खण्ड के मालिक वासुदेव को दुर्योधन ने कहा हे ग्वाले अगर राज्य चाहता है तो युद्ध कर भीख माॅंगने से कुछ नहीं मिलता, फिर भी श्रीकृष्ण उसे समझाते रहे । पाॅंच गाॅंव भी उसने पाण्डवों को देने के लिए वो नहीं माना । अन्तिम समय तक श्रीकृष्ण समझौता करते रहे पर जब कौरव नहीं माने तो युद्ध करना पड़ा । जीत किसकी हुई पाण्डवों क्योंकि उन्होंने श्रीकृष्ण के लिए समर्पित कर दिया था, उन्होंने युद्ध का साज-सामान नहीं माॅंगा । उन्होंने सेना फौज पलटन नहीं माॅंगी, हाथी घोड़े नहीं माॅंगे उन्होंने तो केवल श्रीकृष्ण को माॅंगा । जो तुम्हारी इच्छा होगी वो तुम्हें मिलता है, तुम जिसकी इच्छा करते हो वो तुम्हें मिलता है । क्या तुमने कभी प्रभु महावीर को याद किया ? क्या महावीर को याद करते हुए आॅंखों में आॅंसु आए । भक्ति करना चाहते हो, समर्पण करना चाहते हो तो चन्दना जैसी भक्ति करो । अर्जुन जैसी भक्ति करो । अपनी दृष्टि को बदलो । जो तुम्हें प्रिय है उसकी याद तुम्हें सदा बनी रहती है । अपना प्रिय प्रभु महावीर को बनाओ । अरिहंत को बनाओ । उठते, बैठते सदा अरिहंत तुम्हें याद आते हैं । एक छोटा सा कांटा पैर में चुभ जाए, एक छोटा सा कण दांतों में अटक जाये तो तुम्हारा सारा ध्यान उस कण की तरफ रहता है । जब तुम्हारा शरीर किसी एक छोटी सी चीज को स्वीकार नहीं करता । इतना सुख सुविधाओं को लेकर प्रभु महावीर को पा सकते हो । दुनियाॅं को तो मुट्ठी में कर सकते हो परन्तु महावीर को नहीं कर सकते । अगर महावीर को पाना है तो सब कुछ समर्पित करना होगा ।

सबके प्रति मंगल भाव रखने में ही अपना कल्याण सॅंभव

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

पंचकूला आज 10 जून, 2004 को जैन भवन सेक्टर 15 में प्रवचन करते हुए अखिल भारतवर्षीय श्वेताम्बर स्थानकवासी जैन श्रमण संघ के आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने जीवन जीने की कला पर अपने विचार रखे । उन्होंने फरमाया कि- वर्तमान में जीना सीखो । भूलकाल तो चला गया और भविष्यकाल अभी अनिश्चित है । अतः आत्म चिन्तक व्यक्ति को अपने वर्तमान को सुखद बनाने पर ध्यान देना चाहिए । हम व्यर्थ के झमेलों में अपने को दुःखी और संतप्त रखते हैं । मन को ध्यान की विधि से नियंत्रित करो और सबके प्रति मंगल भाव रखो । दूसरों के प्रति ईष्र्या और वैरभाव रखने से अपना अहित ज्यादा होता है । 

जैन भवन में ही आत्म ध्यान साधना कोर्स ‘बेसिक’ के साधकों को सम्बोधित करते हुए आचार्यश्रीजी ने ध्यान की क्रियाओं और ध्यान तथा प्राणायाम की विधियों को समझाया । करीब 100 बहिन भाईयों ने इस ध्यान शिविर में भाग लिया । यह ध्यान शिविर अब 11 से 14 जून, 2004 तक प्रातः 5.30 से 7.30 बजे तक जैन स्थानक, सेक्टर 17, पंचकूला में चलेगा एवं त्रिदिवसीय आत्म: ध्यान साधना कोर्स ‘एडवाॅंस-ा’ 14 से 16 जून, 2004 तक प्रातः 6.00 बजे से शाम 5.00 बजे तक श्री एस0 एस0 जैन सभा, सेक्टर 17, पंचकूला में चलेगा । इस कोर्स का संचालन आचार्यश्रीजी के सुशिष्य मंत्री श्री शिरीषमुनि जी महाराज करेंगे । साथ ही प्रतिदिन आचार्यश्रीजी के सारगर्भित प्रवचन प्रतिदिन प्रातः 8.15 से 9.30 बजे तक श्री एस0एस0 जैन सभा, सेक्टर 17, पंचकूला में होंगे ।

18 जून से आचार्यश्रीजी का संचरण विचरण चण्डीगढ़ के विभिन्न सेक्टरों में होगा तदन्तर 23 जून, 2004 को आचार्यश्रीजी का चातुर्मास हेतु मंगल प्रवेश श्री एस0 एस0 जैन सभा, सेक्टर 18 डी, चण्डीगढ़ में होगा । 

सेवा धर्म सभी धर्मों का सार है: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

आज दिनाॅंक 11 जून, 2004 को जैन स्थानक सेक्टर 17, पंचकूला में दूसरे दिन प्रवचन फरमाते हुए आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने कहा कि सेवा धर्म में ही सच्चा सुख समाहित है और यह सब धर्मों का सार है । सेवा धर्म एक ऐसा गहना है जो देवताओं को प्राप्त नहीं । सेवा करने से जो अन्र्तात्मा में प्रसन्नता का आभास होता है उसे शब्दों में व्यक्त करना कठिन है । उन्होंने अपने विचारों को आगे बढ़ाते हुए कहा कि बच्चों को अपने माता पिता की करके सेवा उनका आशीर्वाद लेना चाहिए, इससे उन्हें जीवन के सत्व प्राप्त होंगे और उनका जीवन श्रेष्ठ बनेगा । सेवा सें ज्ञान योग, कर्म योग एवं भक्ति-योग के फल प्राप्त होते हैं । जैसे सूई में धागा होता है वैसे ही धर्म के साथ सेवा जुड़ती है । उससे आत्मा का विकास होता है और इससे लोक एवं परलोक दोनों सुधरते हैं । 

आचार्यश्रीजी ने आगे कहा- चैबीसवें अवतार श्रमण भगवान महावीर का धर्म-शासन एक तरफ दूसरी तरफ तीनों लोकों का साम्राज्य है तो तुम्हारी चाहना क्या होगी ? तुम महावीर का धर्म-शासन चाहोगे या तीनों लोकों का साम्राज्य चाहोगे । तुम जो भी चाहते हो उसको हृदय से चाहो । अपने हृदय को टटोलो कि हम हृदय से क्या चाह रहे हैं । युद्ध हो रहा है कृष्ण के पास कौरव भी गये, पाण्डव भी गये । श्री कृष्ण लेटे हुए थे दुर्योधन सिर की तरफ खड़ा था और अर्जुन पैरों की ओर खड़ा हो गया । जैसे ही श्रीकृष्ण उठे उनकी निगाह दोनों पर पड़ी । उसके बाद श्रीकृष्ण ने दुर्योधन से पूछा कि क्या चाहते हो तो दुर्योधन ने कहा कि मुझे आपकी सारी सेना की सामग्री और अर्जुन ने कहा कि प्रभु हमें तो सिर्फ आप ही चाहिए । तीन खण्ड के मालिक वासुदेव को दुर्योधन ने कहा हे ग्वाले अगर राज्य चाहता है तो युद्ध कर भीख माॅंगने से कुछ नहीं मिलता, फिर भी श्रीकृष्ण उसे समझाते रहे । पाॅंच गाॅंव भी वह पाण्डवों को देने के लिए राजी नहीं हुआ । अन्तिम समय तक श्रीकृष्ण समझौता करते रहे पर जब कौरव नहीं माने तो युद्ध करना पड़ा । जीत किसकी हुई पाण्डवों की, क्योंकि उन्होंने श्रीकृष्ण के प्रति समर्पित कर दिया था, उन्होंने युद्ध का साज-सामान नहीं माॅंगा । उन्होंने सेना फौज पलटन नहीं माॅंगी, हाथी घोड़े नहीं माॅंगे उन्होंने तो केवल श्रीकृष्ण को माॅंगा । जो तुम्हारी इच्छा होगी वह मिलेगी । तुम जिसकी इच्छा करते हो वो तुम्हें मिलता   है । क्या तुमने कभी प्रभु महावीर को याद किया ? क्या महावीर को याद करते हुए आॅंखों में आॅंसू आए । भक्ति करना चाहते हो, समर्पण करना चाहते हो तो चन्दना जैसी भक्ति करो । अर्जुन जैसी भक्ति करो । अपनी दृष्टि को बदलो । जो तुम्हें प्रिय है उसकी याद तुम्हें सदा बनी रहती है । अपना प्रिय प्रभु महावीर को बनाओ । अरिहंत को बनाओ । उठते, बैठते सदा अरिहंत तुम्हें याद आते हैं । एक छोटा सा कांटा पैर में चुभ जाए, एक छोटा सा कण दांतों में अटक जाये तो तुम्हारा सारा ध्यान उस कण की तरफ रहता है । जब तुम्हारा शरीर किसी एक छोटी सी चीज को स्वीकार नहीं करता । दुनियाॅं को तो मुट्ठी में कर सकते हो परन्तु महावीर को नहीं कर सकते । अगर महावीर को पाना है तो सब कुछ समर्पित करना होगा ।

                 डी0सी0 जैन, मंत्री

श्री एस0एस0 जैन सभा

सेक्टर 17, पंचकूला

माॅं के चरणों में सब आशीर्वाद समाहित है: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

पंचकूला 12 जून, 2004: अखिल भारतवर्षीय जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने जीवन जीने की कला पर अपने चतुर्थ दिवस के व्याख्यान में सर्वप्रथम अरिहंत और सिद्ध भगवान की स्तुति में ‘नमन‘ शब्द पर प्रकाश डाला और बताया कि बड़ों के प्रति नमन के भाव रखने से अहंकार टूटता है और हमारे कर्मों का क्षय होता है । नमन करना- दिल से नमन करना भी भक्ति है । हमारी आत्मा पर आए कर्मों के मैल को श्रद्धाभाव से युक्त नमन धो डालता है और हम अपने शुद्ध स्वरूप की ओर बढ़ते हैं । जैन धर्म के अनुसार हर व्यक्ति परमात्म पद को पा सकता है जिसे हम जैन भाषा में अरिहंत और सिद्ध कहते  हैं । हमारे महामंत्र नवकार में भी महापुरूषों का ही नमन है । 

इसी श्रृंखला में आचार्यश्रीजी ने सर्वप्रथम माॅं को नमन की बात कही । माॅं के चरणों में सब देवता निवास करते हैं । उन्हें नमन करने से सब तीर्थों की यात्रा का फल मिलता है । गणेश जी ने माता पिता की परिक्रमा करके चारों धाम की यात्रा का फल पाया था । आज हमारे बच्चे माता पिता से विमुख हो रहे हैं, यह आज की संस्कृति की विडम्बना है । हमारी संस्कृति तो माॅं बाप के नमन से ही प्रारंभ होती है । बच्चा अपने शैशव में कितना सुन्दर लगता है, कितना प्यारा लगता है क्योंकि वह सरल है । पर बड़ा होकर वही गलत संस्कारों में पड़कर सैकड़ांे प्रपंचों में पड़ता है और दुःख भोगता है । 

आचार्यश्रीजी ने सात्विक भोजन पर भी प्रकाश डालते हुए फरमाया कि- इस नूडल संस्कति ने हमारे खान-पान को दूषित कर दिया है । गाय हमारी माता स्वरूप है, यह हम भूल गए हैं । उसके दूध घी में जो शरीर, मन, बुद्धि निर्माण की क्षमता थी, वह भैंस के दूध में नहीं । हमें तले भूने भोजन को त्याग कर प्राकृतिक भोजन और गाय के दूध की ओर आना चाहिए और गाय की सेवा करनी चाहिए । 

अन्त में आचार्यश्रीजी ने पुनः नमन शब्द पर आते हुए बच्चों में विनय के संस्कार देने पर बल   दिया । धर्म का मूल भी विनय है और शिक्षा का मूल भी विनय है । विनयवान ही सबका प्यार, स्नेह और सम्मान प्राप्त करता है । 

जैन स्थानक सेक्टर 17, पंचकूला में आत्म ध्यान साधना का कार्यक्रम चैथे दिन में प्रवेश कर रहा है । मंत्री श्री शिरीष मुनि जी महाराज ध्यान साधना कोर्स का प्रातः 5.30 से 7.30 बजे तक संचालन कर रहे हैं । शिविरार्थी इस शिविर के प्रति बड़े उत्साहित हैं । इस शिविर में मुनिरी ने व्यक्ति को जिम्मेदारी का अहसास कराते हुए राष्ट्र में व्यक्ति कैसे शक्तिशाली बनें, राष्ट्रीय से कैसे कार्य करें इसके सूत्र   सिखायें ।

                                                                         डी0सी0 जैन, मंत्री

श्री एस0एस0 जैन सभा

सेक्टर 17, पंचकूला

सेवा और साधना का जीवन में महत्व है 

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

पंचकूला 13 जून, 2004: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- जैन धर्म में नमस्कार मंत्र सर्वोपरि   है । अरिहंत हमारा लक्ष्य है । अनंतकाल से हम इस संसार में भटक रहे हैं । हमारा अपना मोह, अज्ञान हमें संसार में अनंतकाल से भटका रहा है । प्रत्येक व्यक्ति सुख, आनंद, शान्ति चाहता है, जो हमें सांसारिक सुख शान्ति मिल रही है वो शारीरिक और बौद्धिक है, फिर भी हमें तृप्ति नहीं मिल रही है । हमारा मन अशान्त है । हम जितना मर्जी धन, पद, सुख-सुविधा प्राप्त कर लें वो सब व्यर्थ है, मनुष्य शान्ति की खोज में निरन्तर बढ़ रहा है । मनुष्य ने विकास कर लिया है उसकी खोज निरन्तर चल रही है । खोज दो प्रकार की है- एक विज्ञान की खोज और दूसरी धर्म की खोज । विज्ञान की खोज शारीरिक सुख सुविधाओं की है । विज्ञान ने हमें बाहर की सुविधाएॅं दी है जैसे कूलर, भोजन, कहीं जाना हो तो वायुयान, संगीत सुनना हो तो रेडियो, टेलीविजन हमें विज्ञान ने दिया है । आज जो सुविधाएॅं झोपड़ी वालों के पास में है कभी वो राजा महाराजाओं के पास में थी । दूसरा व्यक्ति संगीत नहीं सुन सकता था । आज छोटी से छोटी झोपड़ी वालों के पास चले जाइये वहाॅं पर टेलीविजन, रेडियो सब सुविधाएॅं हैं पर पुराने समय में संगीत सुनने का शौक राजा महाराजा रखते थे । प्रभु महावीर का जीव जब राजा के भव में था, रात्रि को संगीत सुनते-सुनते नींद आ गई । संगीतज्ञ को कहा कि संगीत बंद कर दो पर मंत्रियों को संगीत प्रिय लग रहा था  उन्होंने राजा के आदेश की अवहेलना करके दुबारा संगीत चालू करवा दिया । जब राजा के कानों में संगीत के स्वर सुनाई पड़े तो गुस्से से आदेश दिया कि किसको मेरा हुक्म प्रिय नहीं संगीत प्रिय है । इसके कानों में उबलता हुआ शीशा डाल दिया जाये । 

यहीं पर प्रभु महावीर के जीव ने निकाचित कर्म का बंधन कर लिया और अरिहंत का पद पा लेने के बाद भी कानों में कीले ठुकवाने पड़े, इसलिए व्यक्ति को कभी भी अहंकार, मोह, लोभ, पद प्रतिष्ठा में आकर कभी भी ऐसे कर्मों का बंधन नहीं करना चाहिए । जब निकाचित कर्म बंध जाते है तो उसका भोगे बिना छुटकारा नहीं हो सकता । एक बार का किया गया क्रोध अहंकार, जन्मों-जन्मों को बिगाड़ देता है, इससे बचने का उपाय है तुम्हारे अन्दर जो भी अहंकार, लोभ, वासना, पद, प्रतिष्ठा का मोह है उसे सब प्रभु के चरणों में समर्पित कर दो । चाहे तुम्हारा सुख है, चाहे तुम्हारा दुःख है प्रभु के चरणों में समर्पित कर दो, तुम हल्के हो जाओगे और तो धीरे-2 तुम भी अरिहंत की भक्ति करते अरिहंतमय हो जाओगे । सेवा और साधना का जीवन में महत्व है । आज आचार्यश्रीजी की प्रेरणा से श्री एस0 एस0 जैन सभा सेक्टर 17, पंचकूला की तरफ से लंगर का आयोजन किया गया ।

श्रद्धावान को ही ज्ञान प्राप्त होता है: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

पंचकूला: 14 जून, 2004: आज जैन स्थानक पंचकूला में ‘जीवन जीने की कला’ विषय पर पर छठें दिन का प्रवचन फरमाते हुए आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने ‘श्रद्धा’ पर अपने विचार रखे । श्रद्धा का अर्थ है आस्था, श्रद्धा का अर्थ है समर्पण, श्रद्धा का अर्थ है सत्य के प्रति आत्मसात् होना । श्रद्धा के बिना ज्ञान शक्ति की प्राप्ति सॅंभव नहीं । हनुमान की राम के प्रति श्रद्धा का उदाहरण हमारे सामने है । राम में श्रद्धा के कारण हनुमान अविजयी वीर बने । गौतम की भगवान महावीर के प्रति श्रद्धा - गौतम महावीर बन गए । जिन बच्चों में अध्यापक और गुरू के प्रति श्रद्धा है उनकी प्रगति शीघ्रता से होती है । श्रद्धा के कारण ही कंकर में भी शंकर के दर्शन होते हैं । विवेकानंद की रामकृष्ण परमहंस में श्रद्धा और स्वामी दयानंद की विराजानंद गुरूदेव में श्रद्धा ने उन्हें क्या से क्या बना दिया ।

आज आषाढ़ मास की संक्रान्ति पर आशीर्वाद देते हुए आचार्यश्रीजी ने सब श्रोतावृंद को 15 मिनिट ध्यान करने तथा गौमाता की सेवा करने का आह्वान किया । उन्होंने लोगों को योग के सभी आयाम, प्राणायाम, आसन और ध्यान साधना में भी रूचि लेने की प्रेरणा दी । यहाॅं पर पंचदिवसीय: आत्म: ध्यान साधना कोर्स ‘बेसिक’ का समापन हुआ । इस अवसर पर सिटी चैनल द्वारा पूरे शिविर की रिकार्डिंग की गई जिसे पूरे पंचकूला में दिखाया जाएगा । इस अवसर पर अनेक भाई बहिनों ने अपने अनुभव बताते हुए कहा कि- हमें शारीरिक स्तर पर बहुत लाभ हुआ । शिविर में आने से पहले शरीर पूरा अकड़ा हुआ था । घुटने आदि में अधिक दर्द था किन्तु शिविर में योग, प्राणायाम ध्यान करने से शरीर हल्का और लचीला बन गया । आध्यात्मिक आनंद का अनुभव करते हुए बहिन रजनी जैन ने कहा- यह शिविर परमात्मा से मिलन करने का बहुत सहज मार्ग है । ध्यान ही मुक्ति का मार्ग है । साधना करते हुए असीम आनंद का अनुभव हुआ । स्थानीय मंत्री श्री डी0सी0 जैन ने शिविर का अनुभव बताते हुए कहा कि- शरीर को तरोताजा और जीवन को आनंदित बनाने में जीवन तत्व के सात आसन बहुत ही प्रभावकारी हैं । हरेक व्यक्ति इसका लाभ उठा सकता है और भी अनेक भाई बहिनों ने साधना शिविर के अपने अनुभव बताते हुए आगे के एडवाॅंस - ा शिविर में भाग लेने की इच्छा व्यक्त की । आत्म: ध्यान साधना कोर्स एडवाॅंस- ा दिनाॅंक 15 से 17 जून, 2004 की शुरूआत हो रही है । आगामी आत्म: ध्यान साधना कोर्स ‘बेसिक’ चण्डीगढ़ में 7 से 11 जुलाई, 2004 तक चलेंगे जिसकी जानकारी आप 90872294875 इन नम्बरों से ले सकते हैं । 

                                                                          डी0सी0 जैन, मंत्री

श्री एस0एस0 जैन सभा

सेक्टर 17, पंचकूला

शाकाहार भोजन ही हमारा स्वाभाविक भोजन है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने आज यहाॅं पर ‘जीवन जीने की कला’ पर प्रवचन फरमाते हुए शाकाहार की आवश्यकता पर बल दिया । उन्होंने अपनी अन्तर्वेदना प्रगट की कि आज भारत पश्चिमी सभ्यता के रंग में पड़कर अपनी संस्कृति को भूल रहा है । हमारे ऋषि महर्षि शाकाहारी भोजन के बल पर ही अपनी आत्मिक शक्तियों को जागृत करते रहे । पर आज आमिष भोजन घर घर की सजावट बन रहा है । यह भोजन किस प्रकार से हमारे शरीर, मन और आत्मा को नष्ट करता है, इसका हमें भान ही नहीं । मानव शरीर की संरचना निरामिष भोजन के लिए बनी है । भारत में तरह-तरह के रोगों के प्रस्तार का मुख्य कारण माॅंसाहारी भोजन ही है जो तरह-तरह की विकृतियाॅं पैदा कर हमें शारीरिक और मानसिक रोगी बना रहा है । 

पश्चिम के देश अब शाकाहारी भोजन का महत्व समझ कर