ज्ञान वह जो आपको मुक्त करे

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11 सितम्बर 2014: प्रशांत विहार, दिल्ली आत्मज्ञानी सद्गुरुदेव, युगप्रधन, आचार्य सम्राट पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन फरमाया कि - भगवान महावीर ने सबसे अधिक महत्व ज्ञान को दिया। ज्ञान वो नहीं जो आपको पुस्तकों से प्राप्त हो, ज्ञान वो नहीं जो आपको विश्वविद्यालय से प्राप्त हो, ज्ञान वो नही जो आपको तीर्थस्थल, मंदिर, मस्जिद, चर्च, गिरजाघर, गुरुद्वारे से प्राप्त हो, असली ज्ञान वह है जो आपको मुक्त करे \

ज्ञानी के दस लक्षण हैं अक्रोध्। ज्ञानी कभी क्रोध् करता भी है तो पानी की लकीर की तरह पत्थर की लकीर की तरह नही। जो हमें नरक तिर्यंच आदि योनि में ले जायें। वैराग्य विशेष रूप से आपका राग समाप्त करना। आसक्ति की भावना है तो आप ज्ञानी नहीं हैै।

जितेन्द्रिय अब तक हमने इन आंखों से कितने दृश्य देख लिए, कानों से मधुर संगीत सुन लिए, नाक से सुगंध् भी ले ली। जिह्ना से कितने स्वाद लिये, कितने ही शरीरों का स्पर्श कर लिया परन्तु हमें मिला क्या? क्षमा, दया, शांति, निर्लोभ, दाता वह लेगा नही देगा। वह सर्वप्रिय होगा वो सबको प्रिय होगा। भय व शोक का हरता होगा हम इन गुणों में से है कम से कम एक गुण को भी अपने जीवन में विकसित कर लेंगे तो आप ज्ञानी हो जायेगे।

जीव अनादि से भटक रहा है उसका कारण क्या है? हमारा संबंध् किससे है? पुदगल् की संगति से हमारा संबंध् है और हम इस पुदगल् के कारण ही अनादि से भटक रहे है। पुदगल् की संगति का अर्थ है जो शरीर संबंध्, धन, पद, कोठी, बंगला आदि को मुख्यता देना। आत्मा से संबंध् जीवन का विकास है। ज्ञानी जिसका संबंध् अपने चैतन्य से होगा। स्वरूप में नही आये तो वैसे ही थकते रहोगे जो पूर्व जन्म में संबंध् थे। क्या हमें पता है क्या थे हम।

एक धनी सेठ था उसे एक ही पुत्र था। पुत्र और उसकी मां एक बार एक संत का प्रवचन सुनने गए। वहां पुत्र अध्यात्म से अत्यध्कि प्रभावित हुआ। घर आकर उसने मां से कहा कि मां ! मैं दीक्षा लेना चाहता हूं। तो मां ने कहा कि तुम्हें दीक्षा नहीं लेनी है। बालक एक-दो महीने तक लगातार जिद करता रहा कि मां मुझे दीक्षा लेनी है, लेकिन मां सर्वदा इन्कार कर देती थी। एक बार मां खाना परोस रही थी तो बालक ने कहा कि मां मुझे दीक्षा लेनी है।

मां को क्रोध् आ गया, उसने कह दिया कि जा दफा हो जा, ले ले दीक्षा। बालक का इतना सुनना था कि उसने जाकर दीक्षा ले ली। मां को बहुत दुःख हुआ। एक ही लड़का था, उसने भी दीक्षा ले ली। पुत्र वियोग में उसने आत्महत्या कर ली। मां का पुनर्जन्म हुआ एक शेरनी के रूप में। वह उसी जंगल में रहती थी जहां उसका पुत्र संत साधना कर रहा था। एक दिन उस शेरनी ने उस संत को देखा और क्षुध-पूर्ति के लिए उसे मार डाला और उसकी छाती चीरकर रक्तपान करने लगी। यह मां का अज्ञान। वह मां नहीं जानती थी कि जिसका वह रक्तपान कर रही है वह उसी का पुत्र है।
 

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