PRAVACHANMALA JALANDHAR - 2005

प्रदर्शन नहीं अन्तर्यात्रा है: आचार्य शिवमुनि जालंधर में शिवाचार्यश्रीजी का भव्य चातुर्मासिक प्रवेश

 

जालंधर 18 जुलाई, 2005: विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज का वर्षावास हेतु प्रवेश भव्य शोभा यात्रा के साथ  मीठा बाजार से प्रारंभ माता चिन्तपूर्णी मन्दिर मार्ग, चंदन नगर, सत नगर होते हुए दीन दयाल उपाध्याय नगर स्थित श्री विमल सन्मति चेरीटेबल भवन होते हुए गाजी गुल्ला रोड़ स्थित लक्ष्मी पैलेस में प्रवचन सभा के रूप में रूपान्तरित हो गया । पूरी शोभा यात्रा के दौरान हजारों श्रद्धालुओं ने भगवान महावीर एवं पूज्य गुरू भगवंतों के जयकारों से आकाश को गूंजायमान कर दिया । नन्हें मुन्ने बच्चे जैन धर्म का ध्वज लिए आचार्यश्रीजी की अगवानी कर रहे थे वहीं पर लुधियाना से पहुंचे श्री अशोक खुशदिल अपनी आवाज के द्वारा हर व्यक्ति को खुश कर रहे थे । 

लक्ष्मी पैलेस पदार्पण पर पूरे जालंधर शहर ही नहीं अपितु भारत भर से आए हुए सभी श्रद्धालुओं की ओर से आचार्यश्रीजी का भव्य चातुर्मासिक अभिनन्दन समारोह प्रारंभ हुआ । इस अवसर पर आचार्यश्रीजी ने अपना चातुर्मासिक संदेश प्रदान करते हुए फरमाया कि- अरिहंत प्रभु तीर्थंकर भगवान महावीर की परम्परा का यह तीर्थ प्रभु महावीर की वाणी हम तक चली आ रही है । यह वाणी अनंतकाल से भगवान ऋषभदेव से लेकर आज तक  इस धरती पर प्रत्येक व्यक्ति को धर्म प्रदान कर रही है । आज यह तीर्थ जालंधर में वर्षावास हेतु स्थापित होने जा रहा है । चातुर्मास कमेटी का उल्लास और इसके पीछे महासाध्वी श्री शिमला जी महाराज की विशेष प्रेरणा रही । आज पूरे भारत के संघ यहां पर उपस्थित हैं । आचार्यश्रीजी ने चातुर्मास के प्रवेश का पहला सूत्र ‘लोगस्स पाठ’ के उच्चारण से प्रारंभ किया और अपना वक्तव्य प्रदान करते हुए फरमाया कि- अरिहंत प्रभु चैबीस तीर्थंकर तीनों लोकों के अंधकार को दूर कर अपने ज्ञान से प्रकाशित करते हैं । अरिहंत प्रभु के जन्म से प्रत्येक जीव आनंद को प्राप्त होता है, यहां तक कि नारकी के जीवों को भी क्षण भर सुख का अनुभव होता है । 

लोगस्स का लाक्षणिक अर्थ है विश्व की समग्रता । लोगस्स का पाठ एक ऐसा साधन है जो स्वतः मंजिल बन जाता है । समग्रता का अभिप्राय चेतना के अस्तित्व का साक्षी सूत्र है । यह एक ऐसा साधन है जो स्वयं साध्य बन जाता है । यह एक ऐसी यात्रा है जो अन्त में मंजिल बन जाती है । धर्म प्रदर्शन नहीं है । धर्म अन्तर की यात्रा है । इसमें एक ऐसा आनंद है जो कभी पूरा नहीं होता । तीर्थंकर भगवान उस अन्र्तयात्रा के अनुसंधान हैं । तिरने योग्य को तारना इनका नियम है और पार उतारना इनका धर्म है । जो तिरना चाहते हैं वे अपनी पात्रता तैयार करें । अपने आपको समर्पित करें । तीर्थंकर प्रभु आपको मुक्ति के द्वार ले जायेंगे । यह वर्षावास कर्मक्षय करने का है । कम्पीटीशन का नहीं है । बस भीतर को जानने की तैयारी करो । स्वयं अपना काम क्रोध मद लोभ प्रभु के चरणों में समर्पित कर दो । जो आपने पकड़ रखा है उसे उनके चरणों में छोड़ दो । अपना दुःख समर्पित करते समय सुख भी समर्पित करना । बुद्धि के स्तर पर नहीं हृदय के स्तर पर कार्य करो । प्रभु का तीर्थ वंदन करने योग्य है । उसके चार स्तंभ हैं । साधु, साध्वी, श्रावक, श्राविका किसी की निन्दा मत करना । अवगुणों का प्रचार प्रसार नहीं करना । अगर कुछ करना ही है तो धर्म चर्चा करो । तीर्थं की निन्दा से तीर्थ की असातना होती है और हम जैसा बीज बोयेंगे वैसा ही फल प्राप्त होगा । हमने मोती चुगने हैं किसी के बारे में कोई चर्चा नहीं करनी । हमने अरिहंत प्रभु की वाणी का स्मरण करना है । हम यहां उपदेश देने नहीं आए । संवाद करने आए हैं । 24 तीर्थंकरों की स्तुति द्वारा हम मुक्ति के द्वार तक पहुंच सकते हैं । प्रभु का नाम उनके गुण बड़े महान हैं । 

कीर्तन करना, वंदन करना और महिमा करना इन तीनों शब्दों में सारी भक्ति समाई है । कीर्तन शब्द नर्तन से बना है । कीर्तन तब होता है जब हम मस्ती में आ जाते हैं । अपने शरीर, मन, बुद्धि को भूल जाते हैं । वंदन करना यानि समर्पित हो जाना । प्रभु के अनंत गुणों में से एक गुण भीतर आए । हम चार माह अरिहंत प्रभु का कीर्तन करेंगे । भक्ति योग ध्यान साधना करेंगे । अन्त में लोक में जो अनंत सिद्ध हैं उन्हें वंदन करता हूॅं । प्रभु चन्द्रमा से अधिक निर्मल हैं । सूरज से अधिक प्रकाशमान है और सागर से अधिक गम्भीर है । प्रभु मेरा लक्ष्य केवल सिद्धगति का हो । पहले प्रभु को मांग लो फिर और मांगना । प्रभु से मांगोंगे तो सब कुछ प्राप्त हो जाएगा । 

गुलशनों गुल जुदा जुदा मगर बांगवा तो एक है 

चाहे जमीं को बांट लो, मगर आसमां तो एक है ।

तर्जे बयां अलग-2, मगर बयां तो एक है-

मुंह की जबाने हो जुदा-2, मगर दिल की जबां तो एक है ।। 

आप कुछ अच्छा कार्य करते हो तो कितने आनंदित होते हो । चाहे सब कुछ अलग हो पर दिल में एक ही बात रखना कि मुझे सिद्धगति मिल जाये । आप सबने मेरा स्वागत किया । मैं भी आप सब का स्वागत करता हूॅं । मैं सबके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करता हूॅं । 

विश्व केसरी पूज्य श्री विमल मुनि जी महाराज यहां पधारे । उनकी अनंत कृपा इस जैन समाज पर रही है और आगे भी रहेगी । इस अवसर पर प्रवर्Ÿाक श्री शुक्ल चंद जी महाराज, पूज्य श्री रघुवर दयाल जी महाराज, पूज्य श्री सोहनलाल जी महाराज, महासाध्वी श्री पार्वती जी महाराज, महासाध्वी श्री राजमती जी महाराज को कैसे भूला जा जा सकता है, उनकी असीम कृपा इस समाज पर रही है और यह जालंधर नगरी उनकी कर्मभूमि, पुण्यभूमि, धर्मभूमि रही है । जालंधर में विराजित उप प्रवर्तिनी महासाध्वी श्री सावित्री जी महाराज- महासाध्वी श्री शिमला जी महाराज, विदुषी महासाध्वी श्री सुलक्षणा जी महाराज, उप प्रवर्तिनी महासाध्वी श्री संतोष कुमारी जी महाराज आदि सबको साधुवाद प्रकट करता हूॅं । साथ ही चातुर्मास समिति के अध्यक्ष श्री महेन्द्रपाल जी जैन, उपाध्यक्ष श्री विजय कुमार जी जैन, मंत्री श्री सुनील जैन एवं पूरी कार्यकारिणी के सदस्य, युवा काॅफ्रेंस, महिला मण्डल, तरूणी मण्डल एवं सभी सत्संग प्रेमी साधुवाद के पात्र हैं । 

इस अवसर पर श्रमण संघीय मंत्री श्री शिरीष मुनि जी महाराज ने वर्षावास की रूपरेखा बतलाते हुए कहा कि- हम प्रस्तुत वर्षावास को साधनामय बनायें । वीतरागता की ओर अग्रसर हों । आचार्यश्रीजी जिनका जीवन निर्मल है । जिन्होंने बीस वर्षों से जिस साधना को प्राप्त की है, उसका हम लाभ उठायें ।  इनके प्रवचनों का लाभ लें एवं संघ को हर प्रकार का सहयोग प्रदान करें । महासाध्वी श्री संतोष कुमारी जी महाराज एवं लघु साध्वीवृंद ने अपनी भावनाएं अभिव्यक्त करते हुए आचार्यश्रीजी का वर्षावासिक अभिनन्दन किया । महासाध्वी श्री शिमला जी महाराज ने अभिनंदन पत्र के द्वारा आचार्यश्रीजी का भव्य स्वागत किया । चातुर्मास कमेटी की ओर से मंत्री श्री सुनील कुमार जैन ने इस वर्षावास को एक ऐतिहासिक वर्षावास बतलाते हुए कहा कि जालंधर एक औद्योगिक, धार्मिक क्षेत्र है एवं पूरा मीडियां यहां पर है । इस वर्षावास से जालंधर का हर व्यक्ति प्रभावित होगा । इस अवसर पर समारोह के अध्यक्ष श्री सुमतिलाल जी कर्नावट ने आचार्यश्रीजी का अभिनंदन करते हुए अपनी शुभ इच्छाएं भेंट की और कहा कि यह वर्षावास धार्मिक प्रचार प्रसार के लिए लाभदायक होगा । हरियाणा महासभा के प्रधान श्री राधेश्याम जी जैन ने जालंधर वर्षावास को यशस्वी बतलाते हुए पूरे पंजाब के लिए ही नहीं, अपितु उत्तर भारत के लिए  लाभदायी बतलाया । मंगलदेश महासंघ के महामंत्री श्री मोहनलाल जी जैन ने हार्दिक बधाई प्रेषित करते हुए श्रावक संघ को वर्षावास का पूरा लाभ लेने की विनती की । लुधियाना से डाॅ0 मुलखराज जी जैन ने प्रस्तुत वर्षावास को ज्ञान दर्शन चारित्र की त्रिवेणी से भरपूर बतलाया एवं कहा कि वर्षावास में योग साधना ध्यान को महत्व दें । हम सब मिलकर इस वर्षावास से कुछ शिक्षा प्राप्त करें । संघ का धन्यवाद करते हुए आचार्यश्रीजी को हार्दिक बधाई प्रेषित की । 

कार्यक्रम के प्रमुख वक्ता समाजरत्न श्री हीरालाल जी जैन ने इतिहास के स्वर्ण पृष्ठों को खोलते हुए जालंधर क्षेत्र के पूज्य महाराजश्रीजी एवं महासतीवृंद को स्मरण करते हुए उनके उपकारों से उपकृत होने के लिए कहा एवं सम्मेलनों की चर्चाएं दोहराते हुए कहा कि पूना सम्मेलन में पूज्य आचार्य श्री आनंद ऋषि जी महाराज ने आपको युवाचार्य पद से सुशोभित किया था । अहमदनगर में चतुर्विध संघ की ओर से आचार्य पद ग्रहण समारोह हुआ उसके पश्चात् दिल्ली में चादर हुई और फिर आचार्यश्रीजी उत्तर भारत पधारे । उत्तर भारत में आपका यह चतुर्थ वर्षावास है । इस वर्षावास में भी खूब तप, संयम की आराधना हो । साधना और धर्म का केसर बरसे जिसे हम सभी प्राप्त करें, यही हार्दिक मंगल कामना । 

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि सुश्रावक दानवीर श्री अरिहंत जैन, विश्व जैन, श्रीमती नीलम जैन, मै0 कंगारू इण्डस्ट्रीज, लुधियाना वालों ने कीे । अध्यक्षता श्रावक रत्न श्री सुमति लाल जी कर्नावट-ठाण ने  की । ध्वजारोहण श्रेष्ठी परम गुरू भक्त श्री सुरेश- विनय जी जैन मै0 स्वास्तिक ग्रुप आॅफ इण्डस्ट्रीज, लुधियाना ने किया । प्रवचन स्थल का उद्घाटन दिल्ली निवासी श्री मुलख राज जी जैन ने किया । श्री नृपराज जी जैन, मुम्बई निवासी एवं अनेक गणमान्यजनों का स्वागत सत्कार किया गया । समग्र चातुर्मास की गौतम प्रसादी का लाभ लेने वाले श्री राजेन्द्र जैन, राकेश कुमार जैन ‘बस्ती वाले’ ‘नेशनल नावल्टी रबर इण्डस्ट्रीज, जालंधर का विशेष रूप से सत्कार किया गया । सभी महानुभावों का ‘श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टध शिवाचार्य चातुर्मास समिति सन् 2005’ की ओर से स्मृति चिन्ह देकर स्वागत किया गया । सभी विशिष्टजनों ने समिति को विशेष सहयोग देकर अपने आपको गौरवान्वित महसूस   किया । इस अवसर पर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री आत्माराम जी महाराज द्वारा लिखित एवं आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज द्वारा संपादित ‘स्थानांग सूत्र भाग 1’ का  उउउउ  े विमोचन मलौट निवासी श्री राजकुमार जी विजय कुमार जी जैन एवं श्री संदीप जैन, सिरसा परिवार द्वारा आचार्यश्रीजी की मातुश्री की स्मृति में इस ग्रन्थ का प्रकाशन करवाया का विमोचन किया । आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज द्वारा लिखित ‘सेल्फ डवलपमेंट बाई मेडीटेशन’ { ैमस िक्मअमसवचउमदज ठल डमकपजंजपवद} का विमोचन जस्टिस एम0एम0 कुमार जी द्वारा हुआ जिसका प्रकाशन विद्या प्रकाशन के श्री अजीत जैन, दिल्ली द्वारा हुआ । इस अवसर पर लुधियाना से आए श्री अशोक खुशदिल जी, गाजियाबाद से आए श्री विनय देवबन्दी जी एवं नकोदर निवासी श्रीमती रजनी जैन ने सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत कर जनमानस को अपनी वाणी के द्वारा मुग्ध किया । 

इस अवसर पर पूरे भारत भर से श्रद्धालुओं ने आचार्यश्रीजी का स्वागत अभिनंदन किया जिसमें लुधियाना, चण्डीगढ़, नकोदर, पंचकूला, परवाणु, भटिण्डा,मालेर कोटला, मुम्बई, ठाणा, दिल्ली, गंगानगर, हनुमानगढ़, सिरसा, मलौट, पटियाला, रोपड़, फगवाड़ा, मोगा,े बाघा पुराना, निहालसिंहवाला, अम्बालाकैंट, गीदड़वाहा, केसरीसिंहपुर, अहमदगढ़मण्डी, फिल्लोर, होशियारपुर, खन्ना, समराला, अमृतसर, जम्मू, कालावांली, डबवाली, नवांशहर, कपूरथला, गाजियाबाद, मानसा, राणियां आदि अनेक श्रीसंघों के पदाधिकारीगण अपने संघ के साथ उपस्थित थे । 

 

जो अपने लिए चाहो वह सबके लिए चाहो: आचार्य शिवमुनि

जालंधर 19 जुलाई, 2005: विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने शिवाचार्य सत्संग स्थल, लक्ष्मी पैलेस, गाजी गुल्ला रोड़ में सत्संग करते हुए फरमाया कि- जो तुम अपने लिए चाहते हो वह सबके लिए चाहो । जो तुम अपने लिए नहीं चाहते वह किसी के लिए भी ना चाहो । प्रस्तुत सूत्र जिनशासन की अनमोल पूंजी है । कल आप सबके उत्साह से सौहार्दपूर्ण वातावरण में चातुर्मास का मांगलिक प्रवेश एवं अभिनन्दन समारोह सम्पन्न हुआ । भारत के भिन्न-2 प्रान्तों से आए श्रद्धालुओं ने अपनी भावनाएं अभिव्यक्त की । 

20 जुलाई, 2005 से चातुर्मास प्रारंभ हो रहा है । तैयारी यही है कि हम अपने ईष्टदेव के चरणों में स्वयं को समर्पित कर दें । अपना मन, बुद्धि,विचार, मांग सब कुछ समर्पित कर दे । व्यक्ति नहीं चाहता कि मुझे सुख मिल रहा है तो सबको सुख मिले, पर वह यह अवश्य चाहता है कि दूसरे को तो दुःख आया नहीं, मुझे दुःखों ने घेर रखा है यह उसकी मानसिकता है । हमें ऐसी परिस्थिति में भी उस अनमोल सूत्र का प्रयोग करना है । जो सुख मुझे मिला है वह सबको मिले । आपको एक महल बनाना है और उसकी प्रारंभिक तैयारी आपको करनी । बहुत खुश प्रसन्न हुए । कुछ दिनों के बाद आपके पड़ौसी ने उससे सुन्दर महल आपके महल के साथ ही बना लिया तो आपका सारा मजा किरकिरा हो जाता है । उस समय आपके मन में सबके मंगल की भावना नहीं आती । 

किसी की मोत हुई तो हम कहते हैं कि उसकी मौत हुई है । कच्ची उम्र मे ंवह चला गया । पर यह सोचो कि मौत हमारी भी आएगी । एक दिन इस दुनिया से जाना ही  होगा । हम सकारात्मक सोच न रखते हुए प्रतिस्प्र्धा की आग में आगे बढ़ रहे हैं । यदि कोई व्यक्ति उन्नति के शिखर पर चढ़ रहा है तो हर व्यक्ति उसे नीचे खींचने की कोशिश करता है पर ऐसा ना करो, अगर कोई आगे बढ़ रहा है तो तुम उसके लिए मंगल कामना करो । अगर तुम्हें आगे बढ़ना है तो तुम प्रार्थना करो । प्रभु चरणों में प्रार्थना करो कि सबको सुख, शान्ति, आनंदमय जीवन मिले । आज हम देखते हैं कि व्यक्ति के पास सब कुछ है पर समाधि भरा चिŸा नहीं है । किसी के लिए कौन रोता है सबको अपना स्वार्थ सिद्ध करना होता है । तुम क्रोध करते हो और क्रोध में उस अग्नि को किसी और पर फेंकते हो ऐसा ना करो । क्रोध को शान्ति एवं प्रेम में बदल दो । इस दुनिया में धन, पत्नी, घर बार सब छोड़ना सहज है परन्तु मान, बड़ाई, ईष्र्या  छोड़ना मुश्किल है । संत तुलसीदास जी ने कहा है:-

धन का तजना सहज है, सहज प्रिया का नेह ।

मान बड़ाई ईष्या, तुलसी दुर्लभ यह ।

आज चारों तरफ मोह का वातावरण बढ़ता जा रहा है । आपके दैनिक जीवन में भी वह बढ़ रहा  है । माध्यम चाहे कोई बने हमें उस मोह को कम करना है । उसके लिए अपने खान पान के साधनों को बदलो । ऐसी परिस्थिति में रहो जिससे आपका मोह न बढ़े । बच्चों को अच्छे संस्कार दो । महापुरूषों का जीवन चारित्र सुनाओ । अन्त में आचार्यश्रीजी ने प्रत्येक व्यक्ति को चातुर्मास में धार्मिक कार्यक्रमों की प्रेरणा देते हुए कहा कि प्रत्येक व्यक्ति सामायिक करे । इन चातुर्मास के चार माह में रात्रि भोजन, जमीकंद का त्याग करें । कल प्रातः से महामंत्र का अखण्ड जाप 24 घण्टे का श्री विमल सन्मति जैन चैरीटेबल ट्रस्ट के भवन में होगा आप सभी जाप में भाग लें ।

प्रतिदिन आचार्यश्रीजी का प्रवचन प्रातः 8.00 बजे से 9.15 बजे तक गाजी गुल्ला रोड़ स्थित लक्ष्मी पैलेस में चल रहे हैं आप सभी सत्संग का लाभ लें । आचार्यश्रीजी के प्रवचन केवल जालंधर में ही नहीं अपितु देश विदेशों में साधना चैनल के माध्यम से दिखाये जा रहे हैं । साधना चैनल पर आचार्यश्रीजी का प्रवचन रात्रि 9.00 से 9.20 बजे तक होते हैं आप सभी जिनवाणी का लाभ लेकर जीवन को मंगल बनायें ।

 

चातुर्मास का मुख्य लक्ष्य - भीतर का आनंद: आचार्य शिवमुनि

जालंधर 20 जुलाई, 2005: विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने शिवाचार्य सत्संग स्थल, लक्ष्मी पैलेस, गाजी गुल्ला रोड़ में प्रवचन करते हुए चातुर्मास का महत्व एवं चातुर्मास में हमारा लक्ष्य क्या होना चाहिए इस पर अपनी भावाभिव्यक्ति करते हुए फरमाया कि- आज वर्षावास का प्रथम दिवस है । अनंत उपकारी प्रभु महावीर को वंदन । उनके शासनदेव शासनमाता को नमन । आज के दिवस से साधु साध्वी चार माह के लिए एक स्थान पर रहकर अपने अन्तर का मन, वचन, काया का शोधन करें । चातुर्मास केवल जैन धर्म में ही नहीं अपितु हिन्दू, बौद्ध धर्म का भी होता है पर चातुर्मास का जो यथाविधि पालन होता है वह अन्य धर्मों की अपेक्षा जैन धर्म में अच्छी तरह आज भी दिखाई देता है । वह श्रीसंघ भाग्यशाली है जो चातुर्मास का उत्तरदायीत्व लेकर जिम्मेदारी को निभाता है । आज के ही दिवस से सभी साधु साध्वीवृंद श्रीसंघ की आज्ञा लेकर एक स्थान पर स्थित होकर प्रतिक्रमण के पश्चात् चातुर्मास की शुरूआत करते हैं । 

चातुर्मास का मुख्य लक्ष्य क्या होना चाहिए ? हम अपने जीवन का निरीक्षण परीक्षण कैसे करें ? जीवन एक समस्या है । समाधान भी उसके भीतर है । जहां सूरज काम नहीं आता वहां दीया काम आता है । उसी प्रकार जीवन के निरीक्षण परीक्षण के लिए वर्षावास की आवश्यकता है । चार माह एक स्थान पर स्थित होकर हम अपना पर्यालोचन करें । स्वयं का परीक्षण करें । चातुर्मास का मुख्य लक्ष्य हो कि हमारे भीतर आनंद शान्ति कैसे आएं । हम कैसे प्रभु महावीर की साधना को भीतर उतारें । जब प्रवचन स्थल में आएं खाली होकर आएं । हृदय को खाली रखें । जूतों के साथ-2 अपने विचार, धारणाएं छोड़कर आएं । जब तक तुम भीतर से भरे रहोगे तब तक तुम्हें कुछ नहीं मिलेगा । प्रभु चरणों मे ंनत मस्तक हो जाओ और प्रार्थना करो कि हे प्रभु मुझे कुछ भी नहीं आता । तूने सब कुछ दिया है पर मेरा पात्र ही छोटा है । प्रभु मेरे पात्र को बड़ा कर दो । जो खाली होता है वह भर जाता है । यह सत्संग का हाॅल प्रार्थना और भक्ति से गूंजे । प्रभु की अनंत कृपा से हमें यहां सत्संग करने का अवसर मिला है । सत्संग के भीतर इतने भक्तिमय हो जायें कि स्वयं का भान ही ना रहे तब देखना आपके भीतर कितना रोमांच आता है । 

धर्म की शुरूआत तुम्हारे घर से होती है जहां तुम आजीविका कमाते हो, पूरे जीवन का लेखा जोखा करते हो उस घर को शुद्ध करो । आचार्य श्री हस्तीमल जी महाराज कहते थे व्यवस्था ही घर की शोभा   है । कितने बजे क्या कार्य करना है यह समय सारणी आवश्यक है । प्रातःकाल में उठो । सोते समय अरिहंतों की शरण ग्रहण करो । भोजन के साथ प्रार्थना करो । प्रार्थना से आहार की शुद्धि होती है । हम अपने घर की व्यवस्था स्वयं बनायें । व्यवस्था बनेगी तो जीवन में बदलाव आएगा । संतुष्ट स्त्री ही घर की लक्ष्मी है । समाधान ही घर का सुख है । आतिथ्य सत्कार ही घर का वैभव है । धार्मिकता ही घर का शिखर है । हम अपने घर की व्यवस्था को बनायें । दुःखी लोगों की मदद करें । 

इस अवसर पर श्रमण संघीय मंत्री श्री शिरीष मुनि जी महाराज ने चातुर्मास का महत्व बतलाते हुए चातुर्मास के इन चार माह में श्रावक श्राविका बारह व्रतों की समीक्षा करें । सत्संग का लाभ लेकर वीतरागता की ओर अग्रसर हो एवं साधु साध्वीवृंद पांच महाव्रत एवं संयम में जो दोष लगे हैं उनकी आलोचना करते हुए उन्हें शुद्ध करें । वर्षावास तीन प्रकार के होते हैं ग्रीष्म कालीन, शीत कालीन और वर्षा कालीन  । हम प्रतिदिन प्रतिक्षण समाधान में जीयें और वर्षावास का लाभ उठायें । 

प्रतिदिन आचार्यश्रीजी का प्रवचन प्रातः 8.00 बजे से 9.15 बजे तक गाजी गुल्ला रोड़ स्थित लक्ष्मी पैलेस में चल रहे हैं आप सभी सत्संग का लाभ लें । आचार्यश्रीजी के प्रवचन केवल जालंधर में ही नहीं अपितु देश विदेशों में साधना चैनल के माध्यम से दिखाये जा रहे हैं । साधना चैनल पर आचार्यश्रीजी का प्रवचन रात्रि 9.00 से 9.20 बजे तक होते हैं आप सभी जिनवाणी का लाभ लेकर जीवन को मंगल बनायें । महामंत्र नवकार का अखण्ड पाठ का प्रारंभ आज से हो चुका है एवं आत्म: विकास कोर्स ‘बेसिक’ दि0ः 27 से 31 जुलाई, 2005 प्रातः 5.15 से 7.15 बजे तक एवं सायंः 4.00 से 6.00 बजे तक बच्चों के लिए भी संस्कार कोर्स आयोजित होगा । आप सभी साधना शिविरों में भाग लेकर ‘जीवन जीने की कला’ का आनंद उठायें ।

 

गुरू वह जो ज्ञान से परिपूर्ण हो गया: जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

जालंधर 21 जुलाई, 2005: विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने शिवाचार्य सत्संग स्थल, लक्ष्मी पैलेस, गाजी गुल्ला रोड़ में प्रवचन करते हुए गुरू पूर्णिमा के पावन अवसर पर गुरू की महिमा बतलाते हुए कहा कि- गुरू वह हैं जो हमारे अंधकार को दूर कर देते हैं । आज का यह पावन दिवस आषाढ़ मास की पूर्णिमा गुरू पूर्णिमा के रूप में प्रसिद्ध   है । भारत की संस्कृति में गुरू को सर्वोच्च स्थान दिया गया है । गुरू आपके अज्ञान को दूर करता है । गुरू आधि, व्याधि, उपाधि से शिवत्व की ओर ले जाता है । गुरू वह है जो आपके अज्ञान अंधकार को दूर कर दे । भारत की संस्कृति में मातृदेवोभव पितृदेवो भवः आचार्य देवोभव इस प्रकार प्रथम गुरू माता, उसके पश्चात् पिता और फिर आचार्य का स्थान आता है । गुरू शुद्ध चेतना का नाम है जिसे देखकर आंखे नम हो जाएं । इस संसार में गुरू तो बहुत मिल जाएंगें पर सत्गुरू कोई-कोई होता  है । 

सत्गुरू वह है जो ज्ञान से परिपूर्ण हो गया है । गुरू किसी को बांधता नहीं वह आपको एक रोशनी देता है । उसके सहारे आज आप चल रहे हो । गुरू वह है जिसके भीतर विवेक, जागरूकता का दीया जल रहा है । गुरू का कण-कण आपको आशीर्वाद देता है । गुरू की हर बात में मैत्री प्रवाहित होती है । आज के इस युग में गुरू और शिष्य का नाता टीचर और विद्यार्थी के नाते में बदल चुका है वहां पर लेन-देन का संबंध आ गया है । आपने महाभारत रामायण में सुना होगा राम लक्षण, कृष्ण सुदामा, लव-कुश गुरूकुल में पढ़ते थे । दिन में गुरू से शिक्षा प्राप्त करते थे और रात में गुरू माता से वह प्यार प्राप्त करते थे जो स्वयं की माता द्वारा प्राप्त होता है। गुरूकुल में उन्हें सब प्रकार की शिक्षा प्राप्त होती थी । गुरू उन्हें 72 कलाओं में निष्णात किया करते थे । आज यह गुरूकुल की परम्परा लुप्त होती जा रही है । 

‘गुरू ब्र्रह्मा गुरू विषर््णुः  गुरूर्देवो महेश्वराः

गुरू साक्षात् परब्रह्म, तस्मै श्री गुरवे नमः

गुरू को अनेक उपमाओं से उपमित किया गया है । गुरू को ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर से भी ऊपर साक्षात् परब्रह्म की उपमा दी है और ऐसे गुरू को नमन करने के लिए कहा गया है । शास्त्र में यहां तक बताया है कि आपको जिसके प्रति श्रद्धा हो उसे अपने सामने रखकर ध्यान करो । गुरू के चरण मिल जाए तो पूजा हो गई । गुरू का वाक्य मंत्र से भी बढ़कर है । गुरू का एक शब्द हमारा जीवन बदल देता है । और जब हम गुरू वाक्य को मंत्र से भी बढ़कर समझते हैं तब गुरू की जो कृपा होती है वह हमें मोक्ष तक पहुंचा देती है । कहा भी है:-

ध्यान मूलं गुरोर्मूर्तिः, पूजा मूलं गुरोःपदम,्

मंत्र मूलं गुरोर्वाक्यं, मोक्ष मूलं गुरोः कृपा ।

गुरू शब्द देता है आवश्यकता है उसे ग्रहण करने की । गुरू चरणों में झुक जाना । स्वयं की धारणाओं को अलग कर देना । हम सब अरिहंत प्रभु के चरणों मे ंनमन करें । उनकी प्रार्थना आराधना करें इससे कर्म-क्षय जल्दी हो जाएगा । 

इस अवसर पर विश्व केसरी श्री विमल मुनि जी महाराज ने अपना संदेश देते हुए कहा कि गुरू शब्द ही सब कुछ बता देता है । गुरू की महिमा को समझो । एक होकर रहो । गुरू की महिमा हमारे दिल में रहे। श्रमण संघीय मंत्री श्री शिरीष मुनि जी महाराज ने गुरू को दीर्घद्रष्टा बताया । इस अवसर पर उप प्रवर्तिनी महासाध्वी श्री संतोष कुमारी जी महाराज ने गुरूदेव से भगवान वाणी श्रवण करने की प्रेरणा दी और श्री जैन भारती जी महाराज ने भजन के द्वारा गुरूदेव के उपकारों से उपकृत नहीं हुआ जा सकता ऐसी भावनाएं प्रकट की । 

प्रतिदिन आचार्यश्रीजी का प्रवचन प्रातः 8.00 बजे से 9.15 बजे तक गाजी गुल्ला रोड़ स्थित लक्ष्मी पैलेस में चल रहे हैं आप सभी सत्संग का लाभ लें । आचार्यश्रीजी के प्रवचन केवल जालंधर में ही नहीं अपितु देश विदेशों में साधना चैनल के माध्यम से दिखाये जा रहे हैं । साधना चैनल पर आचार्यश्रीजी का प्रवचन रात्रि 9.00 से 9.20 बजे तक होते हैं आप सभी जिनवाणी का लाभ लेकर जीवन को मंगल बनायें । महामंत्र नवकार का अखण्ड पाठ का प्रारंभ आज से हो चुका है एवं आत्म: विकास कोर्स ‘बेसिक’ दि0ः 27 से 31 जुलाई, 2005 प्रातः 5.15 से 7.15 बजे तक एवं सायंः 4.00 से 6.00 बजे तक बच्चों के लिए भी संस्कार कोर्स आयोजित होगा । आप सभी साधना शिविरों में भाग लेकर ‘जीवन जीने की कला’ का आनंद उठायें ।

हम स्वयं से सम्पर्क स्थापित करें 

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने प्रवचन करते हुए स्वयं से जुड़ने की बात कही । जो स्वयं से जुड़ता है वह मुक्ति को अवश्य ही प्राप्त करता है । आचार्य भगवन् ने फरमाया कि उत्तराध्ययन सूत्र के पहले अध्ययन का पहला सूत्र है कि प्रत्येक साधक को संयोग से अलग रहना चाहिए । एक बालक गर्भ में आता है तो सभी संयोग स्थापित होते हैं । कोई उसका पिता बनता है, कोई माता तो कोई भाई बहिन बन जाते हैं । एक संयोग स्वयं से स्थापित कर लो । बाहर के संयोग धन, पद, यश, पत्नी, व्यवहार इनसे हम जुड़े हुए हैं । संयोग में रहो पर उससे अलग होकर रहो । साधु आपके भीतर रहता है । भिक्षा लेता है । आपकी आज्ञा से रहता है फिर भी वह सबसे अलग है । 

इस संसार में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं जो किसी न किसी से प्यार न करता हो । आन्तरिक जीवन में देखो तो वह किसी न किसी से भीतर से जुड़ा हुआ है । रिश्वत देने की कोशिश करो फिर भी प्यार बना रहता है । प्रेम के अनेक उदाहरण इतिहास के स्वर्ण पृष्ठों पर अंकित है । किसी का पत्नी से प्रेम है, किसी का भाई से है तो किसी का बहिन से है ये सारे प्रेम छोटे पड़ते है जब सत्गुरू से प्रेम जुड़ जाता    है । प्रेम में हम स्वयं को भूल जाते हैं । जैसे स्वाति नक्षत्र की बूंद केले के पत्ते पर गिरती है तो कपूर का रूप धारण कर लेती है । सीप में गिरती है तो मोती का रूप धारण कर लेती है । चातक के मुंह में गिरती है तो उसकी प्यास शान्त कर देती है और वही बूंद नीचे गिर जाती है तो एक गंदे पानी का रूप धारण कर लेती है । बूंद वही है बस संग अलग-2 है । हम ऐसा संग ना करे जिससे हमें अधोगति की ओर जाना पड़े । एक बूंद की भांति एक गुरू को चुन लो । जब एक बार चुनाव हो गया तो फिर उसके चरणों में स्वयं को समर्पित कर दो । 

तीन मार्ग है कर्म का, ज्ञान का और भक्ति का । भक्ति का अर्थ है तुम सब कुछ अपने ईष्ट देव के चरणों में छोड़ दो । चाहे अपनी मान्यता हो चाहे सुख या दुःख हम अपने दुःख को तो समर्पित कर देते पर सुख को समर्पित नहीं कर पाते । प्रतिपल प्रतिक्षण अरिहंतों का ध्यान रहे । मन शान्त रहे । सुबह उठने पर पहला विचार वही आता है जो हमारा रात का अन्तिम विचार होता है इसलिए मैं कहता हूॅं कि रात्रि को सोते समय अरिहंतों का स्मरण   करें । रात को नींद ना आए तो नाभि पर ध्यान करें । सारी दवाओं का रामबाण उपाय है अपने से जुड़ना । अपने से जुड़ना यानि ध्यान करना । तीन शब्द है राग, विराग और वीतराग । जब हम किसी से जुड़ जाते हैं, एकमेक हो जाते हैं तो वहां हमारे रागभाव का जन्म होता है । जैसे एक व्यक्ति नोट गिनता है और नोट गिनते-2 वह सब कुछ भूल जाता है । उसे उसमें बहुत आनंद आता है यही उसका राग है । ऊर्जा वही है उसे बदल दो । राग से वीतराग की ओर आओ । विराग यानि टूटना । राग से टूटना ही विराग है और विराग और वीतराग यानि राग से पूर्णतः अलग होना । प्रभु से जुड़ोगे तो स्वयं से जुड़ जाओगे । सभी झगड़ों का मूल कारण यही है कि हम स्वयं से नहीं जुड़े । 

 

अपने प्राणों को दाव पर लगा देना प्रार्थना है: आचार्य शिवमुनि

जालंधर 23 जुलाई, 2005: विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने शिवाचार्य सत्संग स्थल, लक्ष्मी पैलेस, गाजी गुल्ला रोड़ में प्रवचन करते हुए प्रार्थना का अर्थ बतलाते हुए शून्य की समझ प्रदान  की । शून्य का शब्दों में वर्णन नहीं किया जा सकता । मन से पार की अवस्था जब आती है तब शुन्य प्रकट होता है, तब समाधि की ओर व्यक्ति अग्रसर होता है । भक्ति, प्रार्थना, गीत और नृत्य ये एक ऐसे साधन हैं जो अपने भावों को प्रकट करते हैं । सत्य सुनने में मिलता है । धर्म मौन में मिलता  है । शब्दों में शून्य होता है और उसमें जब हम खोजते चले जाते हैं तो अपने आप में एक भाव प्रकट होता है उस समय अपना नाम, पता, शरीर भूल जाना । प्रार्थना का अर्थ है कि तुम अपने प्राण दाव पर लगा दो । आपने देखा एक छोटा बच्चा जब जन्म लेता है तो उसके पास कोई भाषा, कोई व्याकरण नहीं है वह शून्य में उतर जाता है । शून्य को समझा नहीं जाता अनुभव किया जा सकता है । 

स्वामी रामकृष्ण को किसी ने एक बार शादी में बुलाया । उन्होंने वहां गोविन्द का नाम सुना और नाम सुनते ही नाचने लगे । वो स्वयं में खो गये, शून्य में उतर गये । जब बच्चे का जन्म होता है तो साथ में माॅं का भी जन्म होता है । बच्चे के जन्म से पहले मां, मां नहीं होती वह एक स्त्री होती है । बच्चे और मां का जन्म इकट्ठा होता है और फिर उस बच्चे के साथ अनेकों लोग अपना संबंध स्थापित करते हैं, मोह में आ जाते हैं, जब तक तुम घर, परिवार के मोह में रहोगे तब तक धर्म की यात्रा नहीं हो सकती । मोह को छोड़कर जिसके प्रति श्रद्धा है उसके प्रति डूब जाओ । एक शब्द बहुत कुछ कर सकता है । स्वामी रामकृष्ण ने केवल गोविन्द शब्द सुना था और वे शून्य में डूब गये । 

हमने अरिहंत का कितने बार उच्चारण किया । कितनी बार उसे सुना होगा फिर भी हम अब तक उसमें डूबे नहीं । आंख खुलते ही अरिहंतों को याद कर लेना । जब तुम नमो अरिहंताणं कहते हो तो भीतर क्या अनुभव होता है । देखो, अनुभव करो । जब एक रसगुल्ला मुंह में आता है तो उसके स्वाद को पूरा शरीर अनुभव करता है । उसी प्रकार कहते ही उस अरिहंत शब्द का भाव आपके भीतर क्यों नहीं आता । क्यों नहीं हम उस परम प्रभु के प्रति झुक जाते हैं । अरिहंत शब्द आपको मुक्ति तक ले जा सकता है । आवश्यकता है उसे अनुभव करने की । भीतर उतारने की । प्रार्थना की शुरूआत सरलता, सहजता से होती है और वह सहजता एक बच्चे में देखी जा सकती   है । हम बच्चे बन जाये । स्वयं को अलग कर लें । भीतर आह निकले तो उसे वाह में बदल दें । अगर ऐसा होगा तो हम मुक्ति के द्वार तक जल्द ही पहुंच जाएंगें । 

24 जुलाई, 2005 को ‘सामूहिक लोगस्स का पाठ’ प्रातः 8.00 से 8.30 बजे तक गाजी गुल्ला रोड़ स्थित लक्ष्मी पैलेस में होगा एवं प्रवचन 10.00 बजे तक होगा  । साधना चैनल पर आचार्यश्रीजी का प्रवचन रात्रि 9.00 से 9.20 बजे तक होते हैं आप सभी जिनवाणी का लाभ लेकर जीवन को मंगल बनायें ।  आत्म: विकास कोर्स ‘बेसिक’ दि0ः 27 से 31 जुलाई, 2005 प्रातः 5.15 से 7.15 बजे तक एवं सायंः 4.00 से 6.00 बजे तक बच्चों के लिए भी संस्कार कोर्स आयोजित होगा । आप सभी साधना शिविरों में भाग लेकर ‘जीवन जीने की कला’ का आनंद उठायें ।

 

शिवाचार्य सत्संग में जालंधरवासियों की पूर्ण भक्ति-भाव और समर्पण झलक रहा है

जालंधर 24 जुलाई, 2005: विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने शिवाचार्य सत्संग स्थल, लक्ष्मी पैलेस, गाजी गुल्ला रोड़ में प्रवचन करते हुए फरमाया कि- अरिहंत शब्द परम मंगलकारी, कल्याणकारी है । इसके स्मरण मात्र से मानव जीवन की आधि, व्याधि, उपाधि समाप्त हो जाती है और जीवन में शान्ति, सुख और समृद्धि भर जाती है । आचार्यश्रीजी ने अपने प्रवचन में कहा कि- नमन, वंदन, पूजा, कीर्तन, भक्ति के भावों को जो व्यक्ति समझ जाता है वह जैन संस्कृति के मूल को समझ जाता है । अरिहंत प्रभु का जो महाप्रसाद है वह हमें नमस्कार मंत्र, आगमवाणी, लोगस्स के पाठ और नमोत्थुण के द्वारा प्राप्त होता है जब भी व्यक्ति आकुल, व्याकुल हो जाए, अशान्त हो जाए तो एकान्त बैठकर इन मंत्रों का स्मरण विधिपूर्वक करे तो निश्चित रूप से वह शान्त और समाधिस्त हो सकता है, उसके लिए आवश्यकता है गुरूगम से प्राप्त विधिवत तरीके से इनकी आराधना करें । जो भी इसकी आराधना करता है वह प्रफुल्लित, आनंदित हो जाता है । 

नमन शब्द बहुत प्यारा है । नमन के बिना कुछ भी नहीं हो सकता । अगर सामान्य रूप से पानी भी पीना है तो आपको झुकना होगा । बिना झुके आप पानी भी नहीं पी सकते । भोजन भी करना है तो शरीर के सभी अंग एक दूसरे का सहयोग करे तभी भोजन पच सकता है । प्रकृति का कण-कण हमें सहयोग देता है तब कहीं एक भोजन का कौर हमारे भीतर जाता है । किसान से लेकर गृहिणी तक की जो यात्रा है उसमें सबका परस्पर सहयोग और नमन का भाव होता है । अगर हम अकड़ में आ जाए तो हमारा कुछ भी कार्य नहीं हो सकता । अतः जीवन जीने की कला यही है कि व्यक्ति अपनी अकड़ को छोड़कर विनम्र बनें और विनम्र बनने के लिए नाम स्मरण के अन्तर्गत ‘नमो अरिहंताणं’ का पाठ पढ़े अथवा जिस किसी ईष्ट को आप मानते हैं उसका स्मरण करें, उसके समझ झुक जायें सारा अहंकार, सारी वृत्तियां उनके चरणों में छोड़कर खाली हो जाएं तो प्रकृति आपको ज्ञान और समाधि से भर देगी । 

अगर हम प्रार्थना सम्यक् रूप से, भावपूर्वक करें और उसमें शरीर मन, बुद्धि, संस्कार, चित्त ओर चेतना को जोड़ दें और एकाकार हो जाएं तो हमारी समस्त बीमारियां प्रार्थना करते-2 ही ठीक हो   जाएगी । समग्र अस्तित्व से निकली हुई ध्वनि, अहोभाव से भरी हुई ध्वनि हमें शान्त और समाधिस्त कर देती है । आचार्य भगवंत ने अरिहंत की भक्ति करते हुए अरिहंत वंदनावली के द्वारा कहा कि हम वंदन कैसे करें । वंदन की भी विधि है जब भी हम वंदन करें तो पंचांग हमारा झुक जाना चाहिए । दोनों हाथ, दोनों घुटने और मस्तक झुकाकर भावपूर्वक की हुई वंदना अनंत जन्मों के कर्म काट देती है । आचार्यश्रीजी ने कहा कि प्रतिदिन भक्ति के साथ-साथ योगासन, प्राणायाम, ध्यान का अभ्यास करें । हमारे ऋषि मुनि ये साधना करते थे जिससे भारत में कोई आधि, व्याधि, उपाधि टिक नहीं सकती थी । अगर हम चैबीस घण्टे में से 48 मिनिट सुबह और 48 मिनिट शाम को अपने लिए देंगे तो हम 24 घण्टे आनंदित और उत्साही बनकर रह सकेंगे । इस हेतु यहां पर विविध प्रकार के साधना शिविरों का आयोजन किया गया है । आज 95 प्रतिशत साइकोसोमेटिक बीमारियां हैं जो साधना करने से दूर हो जाती है । गर्भवती माताओं को भी ध्यान करना चाहिए जिससे आने वाली संतान संस्कारित और शान्ती की दूत बनकर आएगी । जब हमारे भीतर से अरिहंत शब्द निकले तो हमारा हृदय पसीज जाये, भीग जाये, हम उसमें डूब जाये तो वह प्रार्थना हमें अमरता की ओर ले जाएगी ।

आज रविवार का दिवस था । लक्ष्मी पैलेस खचाखच भरा हुआ था । हिन्दू, मुस्लिम, जैन, सिक्ख, ईसाई सभी धर्मावलम्बी इस धर्म सभा का लाभ ले रहे हैं । आप पंजाब की मुस्लिम सभा के प्रधान भी वहां पर उपस्थित  थे । इसके सााि-2 बाहर गांव से जोधपुर, भटिण्डा, चण्डीगढ़, खरड़, मेरठ एवं अनेक शहरों के दर्शनार्थी बन्धु उपस्थित थे । जब से आचार्यश्रीजी चातुर्मास के लिए पधारे हैं तब से जन-मानस का प्रवाह आचार्यश्रीजी की तरफ बढ़ता जा रहा है । जनता आचार्यश्रीजी के प्रवचनों को सुनकर अभिभूत हो रही है । बच्चे, युवक, युवतियां, प्रौढ़ सभी खींचे चले आ रहे हैं । विश्व केसरी श्री विमल मुनि जी महाराज भी प्रतिदिन सबको दर्शन और आशीर्वाद प्रदान कर रहे हैं । आज के प्रवचन के पश्चात् अनेक भाई बहिनों ने आचार्यश्रीजी के प्रति अपने विचार पद्य और गद्य में रखें जिसमें प्रमुख रूप से श्री प्रेम जी तृषित, श्री रजनीश जैन, श्वेताम्बर स्थानकवासी बहुमण्डल की अध्यक्षा नीलू जैन, अनु जैन एवं महासतीवृंद ने अपने भाव भक्ति के साथ प्रकट किए । समिति के मार्गदर्शक श्री आर0सी0 जैन द्वारा प्रतिदिन समय पर आने वाले बन्धुओं के लिए एक लक्की ड्रा की योजना चला रखी है जिसके अन्तर्गत प्रतिदिन आचार्यश्रीजी के फोटो सहित दो घड़ियां प्रदान की जाती है । महामंत्री श्री सुनील जैन ने समस्त आगन्तुकों का स्वागत करते हुए कहा कि आप सभी का व्यापक सहयोग हमें मिल रहा है । सभी व्यवस्थाएं सुचारू रूप से चल रही है इसी प्रकार आप सभी शहरवासी इस सत्संग का पूरा-पूरा लाभ उठायें, सभी को खुला आमंत्रण है । 

आगामी आत्म: विकास कोर्स ‘बेसिक’ दि0ः 27 से 31 जुलाई, 2005 प्रातः 5.15 से 7.15 बजे तक एवं सायंः 4.00 से 6.00 बजे तक बच्चों के लिए भी संस्कार कोर्स आयोजित होगा । आप सभी साधना शिविरों में भाग लेकर ‘जीवन जीने की कला’ का आनंद उठायें । सम्पर्क सूत्र अनिल कुमार - 9872294874 

 

प्रभु का स्मरण संजीवनी बूंटी है: आचार्य शिवमुनि

जालंधर 25 जुलाई, 2005: विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने शिवाचार्य सत्संग स्थल, लक्ष्मी पैलेस, गाजी गुल्ला रोड़ में प्रवचन करते हुए फरमाया कि- अरिहंत शब्द नहीं है तुम्हारी चेतना है, तुम्हारी आत्मा है बस तुम्हें उघाड़ना है । कबीर की भाषा में घुंघट के पट खोल तुझे पिया मिलेंगे- चाहे पिया कहो, सांई, रहवर, राम, नानक, कृष्ण, अरिहंत कुछ भी कहो नाम का कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि जो तुम्हें प्यारा है उसे तुम किसी भी नाम से पुकारो उसे अच्छा लगता है । जैसे आप किसी व्यक्ति को बहुत प्रेम से किसी भी नाम से पुकारते हो तब वह प्रसन्न होता है, इसी प्रकार जब तुम नाम का स्मरण करते हो तो प्रभु की कृपा तुम पर बरसती है । जब हम किसी एक प्रतिमा को देखते हैं तो हमारे भीतर इतने भाव आते है, अगर हम साक्षात् प्रभु के दर्शन करें कि प्रभु कितने निर्मल, कितने पवित्र, कितने शुद्ध होंगे यह वीतरागता के भाव जागृत हो जाते हैं । 

जैसे मिठाई के साथ नमकीन पसन्द होती है । अगर केवल मिठााई खायें तो व्यक्ति बीमार हेा जाता है इसी प्रकार व्यक्ति की हमेशा प्रशंसा होती रहे तो आनंद नहीं आता । प्रशंसा के साथ निन्दा भी जुड़ी हुई है । अकेली प्रशंसा व्यक्ति को अहंकार में पहुंचा देती है । निन्दा उस व्यक्ति को बैलेंस में रखती है । प्रकृति ने हमारे शरीर के हर अंग के अनुसार फल बनाये हैं अगर उन फलों का प्रयोग करते हैं तो शरीर के वे अंग विशेष रूप से स्वस्थ रहते हैं जैस बदाम का आकार आंख के समान है । अखरोट का आकार मस्तिष्क के समान है इसी प्रकार जीवन में जब हम सभी प्रकार से दुःखी हो जाते हैं तो एक रामबाण औषधि है वह है नाम की धारा । जैसे पानी की धारा लगातार पत्थर पर पड़ती है तो पत्थर भी घिस जाता है वैसे ही नाम की धारा हमारे साथ लगातार चलती रहे तो सभी रोग दूर हो जाते हैं । 

जैन दर्शन में नमस्कार मंत्र, लोगस्स, नमोत्थुणं का पाठ जीवन की संजीवनी है । जो व्यक्ति इनकी निरन्तर आराधना करता है उसको कोई आधि, व्याधि, उपाधि नहीं सताती । सारे दूषित प्रभाव दूर हो जाते हैं । कोई दानवी शक्ति का उस पर प्रभाव नहीं पड़ता । जब तुम बेसहारा हो जाओ । दुःख के पहाड़ तुम्हारे ऊपर पड़े, तुम अकेले हो जाओ । कोई संगी साथ तुम्हारे साथ न रहे उस समय तुम प्रभु का स्मरण करो । केवल समर्पण के साथ स्मरण करते हैं तो हम इन सारे चक्रव्यूह से बाहर निकल जाते हैं । आचार्यश्रीजी ने दृष्टान्त देते हुए कहा कि- एक व्यक्ति गोविन्द, गोविन्द पुकार रहा था तो गोविन्द उनकी सहायता के लिए गए लेकिन तब तक उसने क्रोध में आकर अपने हाथ में पत्थर उठाकर प्रतिकार करने लगे तो गोविन्द उसकी रक्षा करने की बजाय वापिस चले आए । व्यक्ति स्वयं ही अपना जवाब देने लग गया तब प्रभु की वहां क्या आवश्यकता है । 

आचार्यश्रीजी ने कहा परमात्मा पता नहीं किस रूप में मिल जाये । हर रूप में उसमें उसकी सेवा, भक्ति करें । पति घर में भोजन के लिए आए तो उसे प्रेमपूर्ण भोजन करायें, उसके साथ किसी की व्यर्थ की बातें ना करें । क्रोधपूर्ण वातावरण न बनायें । व्यक्ति अगर क्रोध में है तो भोजन न करें । भोजन करवाने वाला अगर क्रोध में है तो वह भी न भोजन करवाये । न ही बनायें क्योंकि क्रोध एक जहर है जिससे परिवार में क्लेश उत्पन्न होगा । भोजन आपका भजन बन सकता है अगर हम शान्त मन से भक्तिपूर्वक भोजन करें तो वह भजन बन जाता है । अनेक दृष्टान्तों के द्वारा भक्तों को ज्ञान देते हुए आचार्यश्रीजी ने श्रद्धा और सबूरी का विशेष संदेश दिया ।

आगामी आत्म: विकास कोर्स ‘बेसिक’ दि0ः 27 से 31 जुलाई, 2005 प्रातः 5.15 से 7.15 बजे तक एवं सायंः 4.00 से 6.00 बजे तक बच्चों के लिए भी संस्कार कोर्स आयोजित होगा । आप सभी साधना शिविरों में भाग लेकर ‘जीवन जीने की कला’ का आनंद उठायें । सम्पर्क सूत्र अनिल कुमार - 9872294874

 

तर्क और श्रद्धा का मिलन जीवन की सफलता है: आचार्य शिवमुनि

जालंधर 26 जुलाई, 2005: विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने शिवाचार्य सत्संग स्थल, लक्ष्मी पैलेस, गाजी गुल्ला रोड़ में प्रवचन करते हुए फरमाया कि- धर्म अन्तर्यात्रा है । तीर्थंकर अन्तर्यात्रा के अनुसंधान है । धर्म के प्रवर्Ÿाक, धर्म के संस्थापक हैं । साधु साध्वी श्रावक श्राविका रूपी तीर्थ की स्थापना करने वाले हैं । जो तिरना चाहते हैं उनको तिराने वाले हैं । जो संसार सागर से पार होना चाहते हैं उन्हें पार करवाने वाले हैं लेकिन उन्हीं को पार करवाते हैं जिनकी तैयारी हो ।  तैयारी दो प्रकार से होती है । किसी भी अनुष्ठान के लिए बुद्धि और हृदय दोनों की आवश्यकता है । केवल बुद्धि तर्क का कार्य करती है वह कहती है मैं करूं या न करूं इसके बदले में मुझे क्या मिलेगा । दूसरा है हृदय जिससे श्रद्धा की प्राप्ति होती है । केवल श्रद्धा कई बार अंध श्रद्धा बन जाती है, अतः तर्क और श्रद्धा दोनों का मिलन होने पर कार्य सुगम हो जाता है । जैसे अंधा और लंगड़ा दोनों एक दूसरे में परस्पर मिल जाए तो वे अपने जीवन को आरामपूर्वक जी सकते हैं । कुछ लोग केवल दार्शनिक होते हैं जो बुद्धि के स्तर पर जीते हैं वे कवेल बाल की खाल निकालते हैं और जीवन में कुछ भी नहीं पा सकते और कुछ लोग केवल श्रद्धा पर रहते हैं । अगर दोनों का मिलन हो जाए तो नये जीवन की शुरूआत होती है ।

सूफी संतों ने एक रहस्य की बात में कहा कि किसी व्यक्ति के पास आटा, जल, अग्नि सब कुछ है फिर भी वह भूखा है क्योंकि उसे ज्ञान नहीं है कि भोजन कैसे बनाया जाता है । उसी प्रकार परमात्मा ने हमें सब कुछ दिया है ऐसा शरीर सम्पूर्ण अंग, वातावरण जिसे पाने के लिए देवता भी तरसते हैं लेकिन हमें इसका उपयोग करना नहीं आता और हम जीवन के क्षणों को ऐसे ही व्यर्थ खोते जा रहे हैं । क्या हमने कभी प्रभु के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित की है कि प्रभु आज का दिवस मुझे मिला । आज मुझे श्वासोश्वांस   मिले । आज का दिन मेरा वीतरागता में बीते । मेरे हाथ किसी की सेवा के काम आएं । पांव से मैं किसी का सहयोग कर सकूं । अगर इस प्रकार के भाव आते हैं तो हमारी प्रार्थना हो गई । जैसे उस व्यक्ति के पास आटा, दाल सब कुंछ होते हुए भी वो भूखा है । हम उस पर मुस्कुराते हैं लेकिन हमारे पास भगवान ने सब कुछ दिया क्या हम उसका सही उपयोग हम कर पा रहे हैं । जैसे नानक प्रतिपल प्रतिक्षण उठते बैठते वाहे गुरू का नाम स्मरण करते थे क्या हम उठते, बैठते चलते ‘सिद्धा सिद्धि मम दिसन्तु’ का पाठ करते हैं या अरिहंतों का स्मरण करते हैं । अगर करते हैं तो हमारी हर श्वांस सफल है । 

मनुष्य हजार बार गलतियां करता है फिर भी पुनः2  वे ही गलतियां करता है । जैसे क्रोध है तो पुनः-2 क्रोध करता है । महाभारत की एक घटना - पांचों भाईयों को जंगल में प्यास लगती है । सरोवर के पास जाते है । पानी पीने के लिए जो भी वहां पहुंचता है यक्ष उनसे प्रश्न पूछता है और जवाब न मिलने पर उन्हें मूच्र्छित कर देता है । प्रश्न है- दुनियां में सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है । धर्मराज युधिष्ठिर उत्तर देते हैं मनुष्य अनुभव से सीखता नहीं है वही गलती बार-बार करता है । हम भी अपने जीवन में हर स्टेप से कुछ सीखें । गलती को पुनः पुनः न दोहराये उसके पश्चात् आचार्यश्रीजी ने अरिहंत की भक्ति करते हुए अरिहंत का जन्म कल्याणक कैसे मनाया जाते हैं । कैसे 56 दिक्कुमरियां, सौधर्म देव आकर भगवान का जन्म महोत्सव मनाते हैं । कितना उनका वैभव होता है । कैसी उनकी पूजा की जाती है यह सभी मार्मिक वर्णन आचार्यश्रीजी ने अपने मुखारबिन्द से किया और सभी को भक्ति भाव की प्रेरणा  दी । 

शिवाचार्य सत्संग स्तर पर गाजी गुल्ला रोड़ पर देश के कोने-कोने से दर्शनार्थी बन्धु पहुंच रहे हैं और हजारों की संख्या में धर्मावलम्बी धर्म लाभ ले रहे हैं । इन प्रवचनों का प्रसारण साधना चैनल पर रात्रि 9.00 से 9.20 बजे तक हो रहा है । आत्म: विकास कोर्स ‘बेसिक’ दि0ः 27 से 31 जुलाई, 2005 प्रातः 5.15 से 7.15 बजे तक शुरू हो रहा है । जनता का अति उत्साह है । भारी संख्या में भाई बहिनों ने अपने नाम लिखाये है । यही क्लस शाम को  4.00 से 6.00 बजे तक भी आयोजित की है । मुमुक्षु भाई बहिन इसमें सादर आमंत्रित है । 

 

श्रमण संस्कृति श्रम की संस्कृति जै: आचार्य शिवमुनि

जालंधर 27 जुलाई, 2005: विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने शिवाचार्य सत्संग स्थल, लक्ष्मी पैलेस, गाजी गुल्ला रोड़ में प्रवचन करते हुए फरमाया कि- श्रमण संस्कृति श्रम की संस्कृति है । इसमें साधक अपने श्रम से, अपने आत्मबल से अपनी यात्रा तय करता है, वह किसी का सहारा नहीं लेता । वह किसी से कुछ उधार नहीं लेता बल्कि अपने भीतर रहे हुए ज्ञान को जागृत करता है । भगवान महावीर श्रमण संस्कृति के मुख्य आयाम हैं । उन्होंने बिना किसी के सहयोग से संकल्प-बल और साधना के द्वारा मुक्ति को प्राप्त किया । उनका जन्म भी हम सभी के लिए कल्याणकारी है । हम यहां पर अरिहंत की भक्ति में उनके जन्म कल्याणक का वर्णन सुन रहे थे । दुनियां में लाखों लोग जन्म लेते हैं लेकिन प्रभु के जन्म को जन्म कल्याणक कहा जाता है क्योंकि उनके पास जो भी तिरना चाहता है उसको वे तिरा देते हैं । करोड़ो लोगों की मुक्ति के वे निमित्त बनते हैं । वे स्वयं कुछ भी नहीं करते फिर भी सब कुछ हो जाता है । सद्गुरू कैथलिक एजेन्ट के समान हैं । उनकी उपस्थिति में ही सब कार्य सिद्ध हो जाते  हैं । उनका जीवन एक फूल के समान होता है जैसे फूल खिलता है तो वह किसी को आमंत्रण नहीं देता कि मेरी सुगंध लो, फिर भी सभी लोग उसकी सुगंध से परिपूर्ण हो जाते   हैं । उसके ध्यान से फूल जैसे कोमल बन जाते हैं और उसका जीवन खिल जाता है उसी प्रकार परमात्मा की भक्ति है जिनके स्मरण मात्र से हमारा जीवन बदल जाता है । किसी ने कहा है परमात्मा के बारे में:-

मुद्दते गुजर गई तेरी याद ना आई हमें ।

हम भूल गए हों, ऐसी भी बात नहीं ।।

यही बात परमात्मा के साथ घटित होती है । जब हम शान्त, निर्विकल्प हो जाते हैं तो परमात्मा की प्रतिपल हो रही वर्षा का हम अनुभव कर पाते हैं । एक अन्तर्यात्रा करने वाला व्यक्ति अगर शान्त होकर बैठ जाए । आस पास जो भी हो रहा उसको जाने, देखें पर कोई प्रतिक्रया ना करे । समग्र चित्त से अगर वह नमो अरिहंताणं का स्मरण करें । रोम-रोम से खून के कतरे-कतरे से अगर वह स्मरण करता है तो सारी नेगेटिविटी उसकी बाहर चली जाती है और वह शान्त हो जाता है लेकिन उसके लिए आवश्यक है सौ प्रतिशत समग्रता के साथ स्मरण   करे । जैसे पानी 99 डिग्री पर गरम हुआ हो उसका कोई उपयोग नहीं होता उससे भाप नहीं बनती उसी प्रकार आधे मन से केवल मुंह से हम रटन करते जाएं तो कोई विशेष फायदा नहीं होता लेकिन उसी को हम पूर्ण तादात्म होकर उसी में डूब जाते हैं, हमारा कण-कण उसमें सम्मिलित हो जाता है तो हमारी सारी अशान्ति, सारे रोग अपने आप दूर हो जाते हैं । जब भी तुम अशान्त हो या रोगी हो जाओ तो गहरे श्वांस के साथ नमो अरिहंताणं का उच्चारण करो या ऊॅंकार का उच्चारण करो, देखो आपके सारे रोग तो दूर होंगे ही अन्तर से भी शान्त हो जाएंगे । यह वैसा ही है जैसे मिश्री खाओ और मुंह मीठा हो जाए । दूध पीओ और आपको ताकत आ जाए । अगर ऐसा नहीं हो रहा है तो या तो आपको धर्म करना आया नहीं । केवल सद्गुरू के पास बैठ जाने मात्र से ही आपके जीवन में परिवर्तन होना शुरू हो जाएगा । आगे आचार्यश्रीजी ने अरिहंत की भक्ति करते हुए जैसे एक प्रेमी अपनी प्रेयसी को याद करता है या एक प्रेयसी अपने प्रेमी को याद करती है उसी तादात्म भाव से अगर एक भक्त भगवान को याद करता है तो उसकी भक्ति फलित हो जाती है । उन्होंने अरिहंत की भक्ति करते हुए उनका जन्म-कल्याणक, उनकी अतिशय के बारे में बताया कि अरिहंत माॅं के दुग्ध का पान नहीं करते वो जो भी आहार, निहार करते हैं उसे हम अपनी आंखें से नहीं देख पाते । उनको रोग नहीं होते । उनका रक्त और मांस गाय के दूध के समान श्वेत होता है ऐसे अनेक अतिशयों के धारक होते है अरिहंत प्रभु । उनके एक शब्द से चण्डकौशिक जैसा सर्प सांप की गति से ऊपर उठकर आठवें देवलोक में चला गया और उसी का जीव पिछले भव में साधु था किन्तु क्रोध किया तो सर्प बन गया । इस प्रकार प्रभु की करूणा से करोड़ों जीव तिर गए और तिरने वाले हैं । हम उनकी भक्ति करके अपना जीवन पवित्र और शुद्ध बनाकर वीतरागता की ओर बढ़ते चले जाएं यही उनकी उत्कृष्ट भक्ति है ।  

आत्म: विकास कोर्स में जालंधर वासियों का अपूर्व उत्साह:-

आज प्रातः काल की मंगल बेला में आत्म: विकास कोर्स ‘बेसिक’ का प्रथम सत्र दीन दयाल उपाध्याय नगर स्थित कप्यूनिटी हाॅल में शुरू हुआ जिसमें गरीब 71 भाई बहिनों ने भाग लिया । शहर के अनेक गणमान्य जन उपस्थित थे । इस साधना शिविर में प्रतिपल प्रतिक्षण आनंद में रहने की कला और आत्म शुद्धि की साधना सिखाई जा रही है । एक सामान्य व्यक्ति कैसे महानता का अनुभव कर सकता है अपने जीवन में शारीरिक, मानसिक, आधि, व्याधि, उपाधि से ऊपर उठकर स्वस्थ, शान्त और समाधिस्थ कैसे रह सकता है इसकी कला सिखाई गई । इस शिविर का संचालन मंत्री श्री शिरीष मुनि जी महाराज एवं उनके सहयोग के लिए प्रशिक्षिका सुश्री निशा जैन, श्रीमती ऊषा जैन एवं श्रीमती विपुल जैन अपनी सेवाएं दे रही हैं ।  इसी प्रकार शाम को 4.00 से 6.00 बजे से भी कोर्स शुरू हुआ है साथ में बालकों के लिए भी कोर्स चल रहा है । आगामी कोर्स 10 से 14 अगस्त, 2005 से शुरू होगा । उस हेतु सम्पर्क करें । विपुल जैन 9888201196, 9872294875

 

नाम स्मरण से व्यक्ति समाधि तक पहुंच सकता है: आचार्य शिवमुनि

जालंधर 28 जुलाई, 2005: विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने ‘शिवाचार्य सत्संग स्थल’, लक्ष्मी पैलेस, गाजी गुल्ला रोड़ में प्रवचन करते हुए फरमाया कि- वीर की महिमा, नाम जपना, हरि का मिलना, साधु की संगत होना भाग्य से ही मिलता है । बहुत से लोग इनका सान्निध्य पाना चाहते हैं लेकिन पारिवारिक, सामाजिक परिस्थितियों से प्राप्त नहीं कर पाते । नाम का सहारा, नाम का वर्तन, नाम की गंगा, नाम का उच्चारण पवित्र है । इसके माध्यम से जीव समाधि तक की प्राप्ति कर सकता है । नाम के सतत स्मरण से चित्त की शुद्धि हो जाती है और उसका जीवन सफल बन जाता है । जीवन की रेत हर समय खिसकती जा रही है । आयुष्य घट रहा है । भगवान ने गौतम से कहा, हे गौतम ! समय मात्र का प्रमाद मत करो । यह जीवन कुशा के अग्र भाग पर लगी बूंद के समान अस्थिर, चंचल है । किसी भी समय समाप्त हो सकता है । वह बूंद दिखती है मोती के जैसी लेकिन अस्थिर है । हमारा जीवन भी मोती के समान बन सकता है अगर हम नाम सिमरन से जुड़ जाएं । नानक, कबीर, सहजोबाई आदि भक्ति युग के संतों ने नाम स्मरण को बहुत महत्व दिया । वे कहते हैं कि किसी एक नाम को पकड़ लो उसके सहारे तुम ऊंचाईयों तक पहुंच सकते हो । नाम स्मरण भी उठते-बैठते, चलते-फिरते हर पल हर क्षण चलता रहे । 

अपने जीवन में संकल्प करो । संकल्प से ही जीवन बनता है । हम संसार के कामों के लिए तो संकल्प करते हैं और उसके लिए पूरी शक्ति लगा देते हैं किन्तु अपने आत्म विकास के लिए संकल्पबद्ध नहीं होते, पल-पल पर भूल जाते हैं । हम संकल्प करें कि हम प्रतिपल प्रतिक्षण अपने आपके प्रति जागरूक रहते हुए अपने मन को शुभ आलम्बन में लगाते हुए नाम स्मरण करते रहेंगे । पांच पदों मे ंसे कोई भी एक पद चाहे नमो अरिहंताणं या नमोसिद्धाणं ले तो बस उठते-बैठते काम करते हुए सेवा करते हुए इसका स्मरण चलता रहे तो निश्चित रूप से हमारे जीवन में जागरूकता बनी रहेगी, समता का भाव आएगा, इसी भाव को कबीर कहते हैं:-

कबीरा सोया क्या करे, जागकर जपो मुरार ।

एक दिन सोवणा, लम्बे पांव पसार ।।  

हम अपने समय व जीवन का उपयोग करें । आचार्यश्रीजी ने कहा कि जीवन के 20 वर्ष सोने में, 20 वर्ष काम काज में, 10 वर्ष खाने पीने मोज मस्ती में, 5 वर्ष टी0वी0. अखबार पेपर मित्रों व्यतीत हो जाते हैं ।  सिर्फ 5 वर्ष हमें मिलते हैं प्रभु भक्ति के लिए अगर इसको भी हम खो देते है तो हमारा यह जीवन ऐसे ही व्यर्थ चला जाएगा । इसलिए हर साधक प्रतिपल प्रतिक्षण जागरूकता में रहकर नाम स्मरण करे भक्ति करें । हम यहां प्रतिदिन अरिहंत की भक्ति, उनकी स्तुति और उनके जीवन का अवलोकन कर रहे  हैं । प्रभु के श्वासों श्वास से भी सुगंध आती है । इन्द्र के आदेश से अनेक देवियां उनकी सेवा में धात्री का काम करते उनकी बाल क्रीड़ा करवाती हैं और प्रभु की भक्ति करके वे सभी प्रसन्न होती हैं । हमें भी जब किसी की सेवा का मौका मिले तो प्रसन्न होकर करना चाहिए । जीवन के जो थोड़े से श्वांस मिले हैं हर श्वांस शान्ति और समाधि में बीते, वीतरागता के भावों में बीते तो हमारा जीवन सफल होगा । 

प्रतिदिन शिवाचार्य सत्संग स्थल में 8.00 से 9.15 बजे तक आचार्यश्रीजी के प्रवचन लक्ष्मी पैलेस, गाजी गुल्ला रोड़ पर हो रहे हैं जिसमें देश-विदेश के भाई बहिन भाग ले रहे हैं । आठ दिवसीय महामंत्र के आखण्ड पाठ का आज समापन कार्यक्रम हुआ जिसमें प्रभावना के द्वारा सभी को लाभान्वित किया गया । आचार्यश्रीजी के मंगल आशीर्वाद से आज से पूरे चार माह जालंधर शहर में बारह घण्टे का अखण्ड पाठ अलग-2 भक्तों के यहां पर चलता रहेगा जिससे पूरे जालंधर शहर में मंगल, सुख और शान्ति का वातावरण बना रहे इसी संकल्प से यह पाठ घर-2 में चल रहा है । 

 

जालंधर में शिवाचार्यश्रीजी के आशीर्वाद से आत्म: विकास कोर्स ‘बेसिक’ का सफल आयोजन

जालंधर कम्युनिटी सेन्टर, दीन दयाल उपाध्याय नगर के हाॅल में श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज के आशीर्वाद से आत्म विकास कोर्स ‘बेसिक’ प्रारंभ हुआ । इस कोर्स में 140 भाई बहिन बच्चे दो सत्रों के बीच में भाग ले रहे हैं । प्रातःकाल का सत्र सुबह 5.15 से 7.15 बजे तक एवं दोपहर का सत्र 4.00 से 6.00 बजे तक चल रहा है ।

गया साथ ही जीवन मैं आधि, व्याधि से मुक्त होने के लिए उन्हें विविध प्रकार के प्राणायाम सिखाये गए जिससे उनके शरीर में हल्कापन अनुभव हुआ, उनका प्राणिक लेवल बढ़ा । उन्हें यह बताया गया कि भोजन से भी ज्यादा शक्ति प्राण में है और किस प्रकार वैज्ञानिक रूप से प्राण ऊर्जा को विविध प्राणायामों से हम अपने शरीर में बढ़ा सके हैं और अपने जीवन में हल्कापन महसूस कर सकते हैं । जैसे एक मकान को बनाने के लिए ईंट रेत और सीमेंट की आवश्यकता होती है उसी प्रकार हमारे शरी को जीवित रखने के लिए आॅक्सीजन की आवश्यकता होती है और जब हम प्राणायाम करते हैं तो हमारे फेफड़े 4 हजार से 5 हजार सीसी आॅक्सीजन लेते हैं और वही आॅक्सीजन उनके द्वारा एक-एक सेल तक पहुंचती है और हमारे सभी सेल पुनर्जीवित हो जाते हैं । जीवन में उत्साह निर्मित होता है । बहुत कम खाकर बहुत अच्छा स्वस्थ रह सकते हैं । दिन भर उत्साह का वातावरण हमारे अन्दर बना रहता है । 

जन-साधारण का इन साधना शिविरों के प्रति बहुत ही अधिक उत्साह बना हुआ है । शिविर का आज दूसरा दिवस था यह शिविर पंचदिवसीय प्रतिदिन दो-दो घण्टे चलेगा । इस शिविर में श्वांस, प्राणायाम ध्यान और कुछ योग आसनों का भी प्रशिक्षण इसमें प्रदान किया जाता है ।इस शिविर का संचालन श्रमण संघीय मंत्री श्री शिरीष मुनि जी महाराज कर रहे हैं । शिविर में श्रीमती विपुला जैन, श्रीमती ऊषा जैन, सुश्री निशा जैन विशेष रूप से सेवा दे रहे हैं । स्थानीय चातुर्मास कमेटी के कार्यकर्ता इन शिविरों को सफल बनाने में अपना पूरा योगदान दे रहे हैं और अनेक पदाधिकारी इस साधना शिविर को भी कर रहे हैं जिसमें प्रमुख रूप से श्री विजय कुमार जैन, उपाध्यक्ष- श्री लक्की जैन आदि । आगामी आत्म: विकास कोर्स ‘बेसिक’ 10 से 14 अगस्त, 2005 से शुरू होगा । उस हेतु सम्पर्क करें । विपुल जैन 9888201196, 9872294875

 

जीवन जीने के दो मार्ग सन्यास और संसार - आचार्य शिवमुनि

जालंधर 29 जुलाई, 2005: विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने ‘शिवाचार्य सत्संग स्थल’, लक्ष्मी पैलेस, गाजी गुल्ला रोड़ में प्रवचन करते हुए फरमाया कि- हमें मानव का जीवन मिला । श्रेष्ठ जीवन मिला । यह जीवन सभी को मिला लेकिन सबको जीना नहीं आता । इस शरीर का उपयोग कैसे करना । श्वांस का उपयोग कैसे करना । वाणी का उपयोग कैसे करना । जिनको यह कला आती है वे अपने जीवन को सफल बनाते हैं । मनुष्य अकेला है वो दो तरीके से अपने जीवन को पास करता है । एक अकेला होने पर अन्य लोगों से संबंध बनाने पर संसार बनाता है और उन संबंधों को बनाये रखने के चक्रव्यूह में फसता चला जाता है और आधि, व्याधि, उपाधि से भर जाता है यह संसार का मार्ग है । दूसरा सन्यास का मार्ग है जहां व्यक्ति अकेला एकान्त में रहता है । भक्ति, ध्यान, नामस्मरण सामायिक इत्यादि के मार्ग का आलम्बन लेता है और जीवन को सफल बना लेता है । जीवन में आनंद का मार्ग भी है और दुःख का मार्ग भी है । चुनाव हमारा है कि हम कौनसा चयन करें । थोड़े से लोग हैं जो सही मार्ग का चयन कर पाते हैं ।

आचार्य शंकर ने कहा है- मनुष्य के अंग गल रहे हैं । दांत गिर रहे हैं । बुढ़ापा उसके नजदीक आ रहा है लकड़ी के सहारे चल रहा है । श्वांस अस्त व्यस्त हो गई है फिर भी उसकी आशाएं नहीं छूटी है, उसकी आशा और तृष्णा बढ़ती ही जा रही है । जैसे ही आपको संकेत मिले कि बाल सफेद होने लगे,  दांत टूटने लगे, घुटने जवाब देने लगे तो समझो कि परमात्मा का संदेश मिल गया है । अपने आत्म उत्थान के लिए हमें तैयारी में लग जाना चाहिए । इस संसार से तुम बचाना चाहो तो बच सकते हो । केवल धन कमाना ही हमारा लक्ष्य नहीं होना चाहिए ।  उतना कमाओ जितना तुम्हें आवश्यक है । अधिक धन उपाधि का कारण है । बच्चों को अच्छे संस्कार दो । धार्मिक बनाओ और उन्हें जिम्मेदार बनाओ । केवल उन्हें धन देकर मत बिगाड़ो । आज अधिक धन देने से सारा वातावरण विकृत होता जा रहा है । कुछ लोग हैं जो अपने शरीर से बहुत बड़े पाप-कर्म कमा रहे हैं आतंकवादी बनकर । आज की ही ताजा घटना ‘श्रमजीवी एक्सप्रेस’ में किस प्रकार धोखे, माया से बम्ब का विस्फोट किया । निर्दोष जीवों को मारा, इसका जब उनको फल भोगना पड़ेगा तब उनकी क्या स्थिति होगी यह सोचकर उन जीवों के प्रति करूणा आती है । 

पिछले वर्षों से हम देख रहे हैं कभी अमेरिका में, कभी लंदन में, कभी कश्मीर में एक के बाद एक हादसे होते जा रहे हैं । यह सब व्यक्ति की कुंठित चेतना का फल है । अगर हमें अपनी शक्ति लगानी है तो शान्ति और समाधि की ओर लगायें । यह देश हमारा प्रभु महावीर, राम, कृष्ण, नानक का देश है । हम किसी के लिए कांटे न बिछाये सबके लिए मार्ग को साफ सुथरा बनायें । आचार्यश्रीजी ने आगे अरिहंत की भक्ति करते हुए कहा कि अगर तुम सुखी रहना चाहते हो तो अपने हृदय को सीधा और सरल बना लो । ज्यादा बुद्धिमान बनने की आवश्यकता नहीं है, श्रद्धावान बनो । प्रभु की प्रार्थना, भक्ति करते हुए सब कुछ उनके चरणों में डाल दो । खाली हो जाओ । किसी के कुछ शब्द कहने से अगर हम दुःखी हो जाते हैं और किसी के दो शब्द अच्छे बोलने से हम सुखी हो जाते हैं इसका मतलब हमारा बटन किसी ओर के हाथ में है । हम किसी की बातों में न आयें, स्वयं पर विश्वास करें, स्वयं के मालिक बनें यही हमारी प्रभु भक्ति की साधना है ।  

प्रतिदिन शिवाचार्य सत्संग स्थल में 8.00 से 9.15 बजे तक आचार्यश्रीजी के प्रवचन लक्ष्मी पैलेस, गाजी गुल्ला रोड़ पर हो रहे हैं जिसमें देश-विदेश के भाई बहिन भाग ले रहे हैं । आचार्यश्रीजी के मंगल आशीर्वाद से पूरे चार माह तक जालंधर शहर में बारह घण्टे का महामंत्र नवकार का अखण्ड पाठ अलग-2 भक्तों के यहां पर चल रहा है जिससे पूरे जालंधर शहर में मंगल, सुख और शान्ति का वातावरण बना   रहेगा ।

व्यक्तित्व विकास की साधना है आत्म: विकास कोर्स

श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज के आशीर्वाद से विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के अन्तर्गत व्यक्तित्व विकास, शाकाहार का प्रचार, व्यसन मुक्ति आन्दोलन और आत्म चेतना के विकास हेतु ‘आत्म: विकास कोर्स’ का आयोजन कम्युनिटी सेन्टर हाॅल, दीन दयाल उपाध्याय नगर, जालंधर में श्रमण संघीय मंत्री श्री शिरीष मुनि जी महाराज के निर्देशन में चल रहा है । 

शिविर के तीसरे दिन में साधकों को सम्बोधित करते हुए उन्हें अपने व्यक्तित्व विकास के लिए लीडरशिप की क्वालिटी डवलप करने की कला सिखाई गई । हर कार्य कैसे हम आनंद से कर सकते हैं । कार्य करते हुए हम कैसे ऊर्जा को प्राप्त कर सके, तनाव मुक्त हो सकते हैं इसका ज्ञान देते हुए उन्हें सिखाया गया कि भोजन भी आप लीडर की तरह बना सकते हैं । ज्ञान भी आप लीडर की तरह पढ़ सकते हैं । 

विद्यार्थी तनाव मुक्त होकर कैसे पढ़ सकता है उसका अध्ययन खेल कैसे बन सकता है इस पर विशेष प्रकाश डालते हुए फैक्ट्री मालिक राष्ट्रीय भावना से कैसे कार्य  करें । टेक्स भी स्वेच्छा से भरकर देश और समाज की कैसे सेवा की जाती है इन सब बातों को बड़े ही सुन्दर ढंग से साधकों को समझाया गया जिसके परिणाम स्वरूप व्यक्ति हर कार्य रूचिपूर्वक करता है । आपस के संबंध अच्छे बनते हैं और जीवन टेन्शन फ्री बन जाता है । साथ ही उन्हें जीवन जीने की कला के रूप में जीवन-तत्व के आसन, प्राणायाम और ध्यान का अभ्यास करवाया गया ।

सभी साधक बड़े ही आनंद और उत्साहपूर्ण वातावरण में आत्म: विकास की साधना का लाभ ले रहे हैं । इस शिविर का आगामी आत्म: समाधि कोर्स दिनांक 1 से 3 अगस्त, 2005 को प्रातः 5.15 से 7.15 बजे तक एवं शाम 4.00 से 6.00 बजे तक लगने जा रहा है । यह कोर्स भी प्रतिदिन दो घण्टे का होगा । इस साधना के बारे में अधिक जानकारी हेतु सम्पर्क करें । फोन नम्बर विपुला जैन 9888201196, 9872294875

 

नम्रता धार्मिकता का लक्षण है, अहंकार अज्ञानी का लक्षण है: आचार्य शिवमुनि

जालंधर 30 जुलाई, 2005: विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने ‘शिवाचार्य सत्संग स्थल’, लक्ष्मी पैलेस, गाजी गुल्ला रोड़ में प्रवचन करते हुए फरमाया कि- भगवान महावीर से प्रश्न पूछा गया भगवन वंदन करने से जीव को क्या लाभ होता है । भगवान महावीर ने कहा- वंदन करने से जीव नीच कर्म के गोत्र को क्षय करता है, उच्च गोत्र का बंधन करता है और सौभाग्य की प्राप्ति करते हुए दाक्षण्य भाव को प्राप्त करता है । भारत की संस्कृति में हमें जन्म से ही ये संस्कार दिए जाते हैं कि नमस्कार करो, झुको । अगर हम झुकते हैं तो विनीत कहलाते हैं और विनीत को ही धर्म प्राप्ति होती है, सुख मिलता है, इसके विपरीत जो व्यक्ति अहंकार में अकड़ता है वह यहां भी दुःखी होता है और पल-पल पर उसके जीवन में संघर्ष होता   है । आचार्यश्रीजी ने कहा कि बच्चों को संस्कार दो नमन करने के । सुबह उठते ही पहला शब्द उनके मुख से नमो अरिहंताणं निकले । जब भी आप उठकर अपने बिस्तर से चलो, जो स्वर चल रहा है उस स्वर वाला पांव जमीन पर रखो । भोजन करते समय नमस्कार मंत्र पढ़ो इससे आपका भोजन शुद्ध हो जाता   है । आज सभी तरफ प्रदूषण है । अगर भोजन अशुद्ध है तो मंत्र पढ़ने से वह शुद्ध हो जाता है । माताएं बहिनें अपने स्वयं के लिए कम से कम 15 मिनिट निकालें और वे ध्यान करें तो उनके जीवन की सारे टेंशन, डिप्रेशन दूर हो सकती हैं । गर्भवती माताएं भी अगर 30 से 45 मिनिट का ध्यान करें या योगनिद्रा का अभ्यास करें तो उनकी क्षमता बढ़ती है । बच्चे बहुत शान्त समाधिस्त उत्पन्न होते हैं, उन्हें गर्भ के समय पीड़ा अधिक नहीं होती, उन्हें सर्जरी की आवश्यकता नहीं । नम्रता धार्मिक व्यक्ति का लक्षण है । अहंकार अज्ञानी का लक्षण है । नमन वही कर सकता है जिसकी अहंकार की ग्रन्थी टूट जाती है, विनय आ जाता है । हृदय हमारा बैरोमीटर है । हमें पता चल जाता है कि कहां मेरी गलती हुई । अगर स्वयं की गलती हुई तो झुक जाओ । क्षमा याचना कर लो । जो क्षमा करता है वो भगवान बन जाता है और जो नहीं करता है वह शैतान बन जाता है । जैसे ही वह क्षमा करता है तो उसका अहंकार पिघल जाता है । वंदन हमारा आधार, मूल है । अकड़ने से कोई फायदा नहीं । अगर हम अकड़ कर बैठेंगे तो हमारे भीतर कुछ भी नहीं जाएगा । जिस शरीर पर हम अकड़ रहे हैं वह शरीर व्याधियों से भरा हुआ है, पता नहीं किस समय कौनसा रोग हो जाए । शरीर को झुका दो, विनम्र हो जाओ । जो झुकते हैं, वे प्रियकारी होते हैं एवं से सबको प्यारे लगते हैं ।

 दादू ने कहा -  दादू दावा दूर कर बिन दावे दिन काट ।

 कहते सौदा कर गये, पंसारी की हाट ।।    

यह संसार तो पंसारी की दुकान के समान है । अनेकों आए और अनेकों चले गए यह संसार चलता रहा और चलता रहेगा । अहंकार करोगे तो नीचे अधोगति में गिरते चले जाओगे । क्षमा करोगे तो ऊपर उठते चले जाओगे । जैसे भगवान पाश्र्वनाथ ने क्षमा का आलम्बन लिया तो हर भव में वे ऊंचे उठत्ेा गये और अंततः उन्होंने मोक्ष प्राप्त किया इसके विपरीत कमठ तापस अहंकार करता रहा और संघर्ष में पड़ा, परिणाम स्वरूप नरक में गया, तिर्यंच में सर्प आदि अनेक प्रकार की योनियों में गया और आज भी वह संसार में घूम रहा है । इसी बात को नानक ने भी कहा - नानक नन्हें हो रहो जैसे नन्हीं दूब ।

जैसे दूब पर कितने आंधी तूफान आ जाए फिर भी कुछ नहीं बिगड़ता वह वैसी की वैसी सुरक्षित रहती है उसी प्रकार तुम भी नम्र मन जाओ । महावीर, बुध, नानक, राम, कृष्ण, सभी ने विनम्रता की बात कही । इस विश्व में जितना व्यक्ति विनम्र और शान्त होगा समाधिवान होगा वह समृद्धिशाली बनेगा । जितना तुम क्लेश करोगे उतने ही तुम रोगी बन जाओगे । अतः शान्ति और समाधि के मार्ग पर चलो, यही जीवन का सार है । 

आत्मः विकास कोर्स का आज चतुर्थ दिवस बड़े ही सुन्दर ढंग से चल रहा है और 31 जुलाई, 2005 केो उसका समापन कार्यक्रम होगा । उसके पश्चात् 1,2,3, को आत्म समाधि कोर्स प्रतिदिन दो-दो घण्टे का शुरू होगा । ध्यान साधना में आज साधकों को सिखाया गया कि हर पल हर क्षण को स्वीकार करते हुए कैसे आनंद में रहा जा सकता है । ज्ञानी बनकर कैसे जीया जा सकता है । ज्ञान और ध्यान का संगम बताते हुए उन्हें ज्ञानोदय का अनुभव करवाया गया । 

प्रतिदिन शिवाचार्य सत्संग स्थल में 8.00 से 9.15 बजे तक आचार्यश्रीजी के प्रवचन लक्ष्मी पैलेस, गाजी गुल्ला रोड़ पर हो रहे हैं जिसमें देश-विदेश के भाई बहिन भाग ले रहे हैं । आचार्यश्रीजी के मंगल आशीर्वाद से पूरे चार माह तक जालंधर शहर में बारह घण्टे का महामंत्र नवकार का अखण्ड पाठ अलग-2 भक्तों के यहां पर चल रहा है जिससे पूरे जालंधर शहर में मंगल, सुख और शान्ति का वातावरण बना   रहेगा ।

 

प्रभु महावीर के उपदेश में करूणा, सत्य और प्रेम का भाव है: आचार्य शिवमुनि

आत्म विकास कोर्स का समापन समारोह

जालंधर 31 जुलाई, 2005: विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने ‘शिवाचार्य सत्संग स्थल’, लक्ष्मी पैलेस, गाजी गुल्ला रोड़ में प्रवचन करते हुए फरमाया कि- श्रमण संस्कृति और वैदिक संस्कृति भारत की ये दो मुख्य संस्कृतियां हैं जिसके द्वारा मनुष्य मुक्ति तक कैसे पहुंच सकता है इसकी साधना विधियां और इसका ज्ञान विभिन्न प्रकार के आगमों और सूत्रों में उपलब्ध है और गुरू परम्परा से साधना की विधियां उपलब्ध  है । साधक साधना करके स्वयं कैसे मुक्ति को प्राप्त कर सकता है, यह ज्ञान हम विविध प्रवचनों एवं साधना शिविरों के माध्यम से यहां पर सीख रहे हैं और सिखा रहे हैं । भगवान महावीर से पूछा- भगवन् सामायिक किसे कहते हैं । सामायिक का क्या अर्थ है । भगवान ने कहा- सामायिक से सभी पापकर्म और आश्रव रूक जाते हैं । सामायिक का गहरा अर्थ बताते हुए कहा- सामायिक एक परम्परा मात्र नहीं है । सामायिक भारत की ही नहीं समग्र विश्व की चेतना का स्वरूप ले सकती   है । जब हम समभाव में स्थित होते हैं सबके प्रति समान दृष्टिकोण रखते हैं । हर समस्या को समता से समाधान कर देते हैं तो हम सामायिक में होते हैं । भगवान महावीर ने इसका गहरा अर्थ बताते हुए कहा कि आत्मा ही सामायिक है और आत्मा का अर्थ ही सामायिक है । सामायिक के भीतर हम मन, वचन, काया के योगों को स्थिर करके उसके बाद जो हमारी चेतना है, जो हमारा निज स्वरूप है उस आनंद, शान्ति, सुख का अनुभव करते हैं । विश्व का हर व्यक्ति आनंद, सुख और शान्ति चाहता है । भगवान महावीर की इस सामायिक को ध्यान के माध्यम से हम विश्व-व्यापी बना रहे हैं । भगवान महावीर ने सामायिक और ध्यान में कोई अन्तर नहीं बताया । 

भगवान महावीर ने न आदेश दिये न निर्देश दिये, उन्होंने उपदेश दिया और उपदेश के द्वारा क्या पाप का मार्ग है क्या पुण्य का मार्ग है यह हमें बताया और उसमें हमें जो श्रेयकारी लगे उसको हम स्वीकार करें । आदेश और निर्देश में अहंकार आ सकता है लेकिन उपदेश में आत्मीयता, कल्याण, सत्य, करूणा के भाव होते हैं । एक समय था कि लोग आपस में शास्त्रार्थ करते थे । एक दूसरे को ऊपर नीचे बताने की कोशिश करते थे । महावीर ने मुनि को मौन रहने के लिए कहा । तुम मौन हो जाओ । अन्र्तमुखी हो जाओ । जो मौन हो जाएगा वह भीतर के रहस्य को जानकर मोक्ष को प्राप्त कर लेगा । उसके ऊपर आने वाली कितनी भी बड़ी कठिनाई हो वह उसे आराम से पार कर लेगा । भगवान महावीर के सामने गौशालक खड़ा था, उसने अनेक चमत्कार दिखाये और चमत्कार के प्रभाव से अपने लाखों शिष्य बना लिए लेकिन प्रभु महावीर ने अपना प्रभाव दिखाने के लिए चमत्कार नहीं बताये । आचार्यश्रीजी ने कहा चमत्कार तो एक जादूगर भी दिखा सकता है । चमत्कार दिखाना साधु का लक्षण नहीं है । साधना करते-2 अपने आप घटनाएं घटती है वह साधना का प्रतिफल है लेकिन वह चमत्कार नहीं । अतः हमें अपने आत्म-बल बढ़ाने की साधना करनी चाहिए । प्रभु महावीर का मार्ग संकल्प का मार्ग है । जब कभी तुम क्रोध में आ जाओ तो शान्त होकर अपना आत्म-निरीक्षण करो उसी समय तुम्हें अपनी गलती का अहसास होगा और तुम अपने स्वभाव में स्थित हो जाओगे । संबंधित व्यक्ति से क्षमा याचना कर लोगे इसी को प्रभु महावीर ने प्रतिक्रमण कहा   है । जीवन में अनेक घटनाओं में व्यक्ति क्रोध के वशीभूत होकर व्यक्ति अपने जीवन में अतिक्रमण कर जाता है लेकिन ज्योंही उसे होश आए तो पुनः अपने घर में लौट जाए । एक जैन श्रावक की घटना बताते हुए आचार्यश्रीजी ने कहा कि- एक गरीब किसान पर एक सेठ बहुत गरम हो गया । चंद पैसों के लिए लेकिन ज्योही वह घर आकर महावीर की सामायिक करने लगा तो उसे अपनी गलती का अहसास हुआ कि मैं बहुत कुछ बोल गया जो मुझे नहीं बोलना चाहिए था । अगर उसके स्थान पर मैं होता तो मैंरे पर क्या बीतती । जैसे ही यह चिन्तन हुआ उसके भीतर से करूणा, मैत्री का झरना बहा । उसने भोजन नहीं किया और तुरन्त किसान के घर पहुंचा और उससे क्षमा याचना की । उसका सारा कर्ज माफ कर दिया और हमेशा के लिए उसे अपना भाई बना लिया । उससे प्रभावित होकर उस किसान ने भी महावीर की सामायिक और प्रतिक्रमण का ज्ञान प्राप्त किया और हमेशा के लिए वह धर्म की शरण में आ गया ।     

आत्मः विकास कोर्स ‘बेसिक’ का अन्तिम दिवस था । साधकों को धर्म का शुद्ध स्वरूप मैं कौन हूॅं कहां से आया हूं इसका बोध कराते हुए उन्हें ध्यान का विशेष प्रशिक्षण दिया गया । सभी लोग जीवन जीने की कला प्राप्त करके अति उल्लास से परिपूर्ण थे । सभी ने चातुर्मास समिति के कार्यकर्ताओं के प्रति, आचार्यश्रीजी के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित की कि यह साधना का मौका आपने हमें दिया । अनेक साधक समाधि कोर्स में भाग ले रहे हैं वह कोर्स 1 से 3 अगस्त, 2005 को प्रातः 5.15 से 7.15 बजे एवं सायं 4.00 से 6.00 बजे तक चलेगा । आगामी बेसिक कोर्स दिनांक 10 से 14 अगस्त, 2005 तक शुरू होगा । आज प्रवचन सभा में आचार्यश्रीजी के दर्शनार्थ स्थानीय जनता के साथ-2 मुकेरिया, पूना, दिल्ली, सूरत आदि क्षेत्रों के भाई बहिन विशेष रूप से दर्शनार्थ पहुंचे । आज की प्रवचन सभा में पंडाल खचाखच भरा हुआ था और जालंधर की जनता का आकर्षण ‘शिवाचार्य सत्संग स्थल’ की ओर बढ़ता ही जा रहा  है ।

जालंधर में शिवाचार्यश्रीजी के आशीर्वाद से आत्म: विकास कोर्स ‘बेसिक’ का सफल आयोजन

जालंधर कम्युनिटी सेन्टर, दीन दयाल उपाध्याय नगर के हाॅल में श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज के आशीर्वाद से आत्म विकास कोर्स ‘बेसिक’ सम्पन्न हुआ । इस कोर्स में 140 भाई बहिनों एवं बच्चों ने दो सत्रों में भाग लिया । प्रातःकाल का सत्र 5.15 से 7.15 बजे तक एवं दोपहर का सत्र 4.00 से 6.00 बजे तक चला ।

इस साधना शिविर का उद्देश्य है व्यक्ति हर परिस्थिति में आनंद, शान्ति, सुख और समृद्धि का अनुभव कैसे करे । अपने जीवन में वह शारीरिक स्तर पर कैसे स्वस्थ और मस्त रहे । शरीर में आई हुई पुरानी आधि, व्याधि, उपाधि को अपनी रोगप्रतिरोगाधत्मक शक्ति को बढ़ाकर उसे जड़ मूल से कैसे दूर करे और मानसिक रूप से जो आज का मनुष्य तनावग्रस्त है । टेंशन और डिप्रेशन में जी रहा है उसके मन को कैसे शान्त और शुद्ध किया जा सकता है इसका तरीका इस साधना शिविर में सिखाया जाता है । इस शिविर में व्यक्ति को परिवार, समाज और देश और विश्व के लिए जिम्मेदारी का अहसास कराया जाता है । आज के शिविर में उन्हें जिम्मेदारी में रहकर कैसे शक्तिशाली बना जा सकता है, कैसे सारे अधिकार अपने हाथ में लिए जा सकते हैं । 

हम शिकायत न करें किन्तु समाज, देश, विश्व के लिए क्या कर सकते हैं इसके बारे में उन्हें प्रशिक्षण दिया गया साथ ही जीवन मैं आधि, व्याधि से मुक्त होने के लिए उन्हें विविध प्रकार के प्राणायाम सिखाये गए जिससे उनके शरीर में हल्कापन अनुभव हुआ, उनका प्राणिक लेबल बढ़ा । उन्हें यह बताया गया कि भोजन से भी ज्यादा शक्ति प्राण में है और किस प्रकार वैज्ञानिक रूप से प्राण ऊर्जा को विविध प्राणायामों से हम अपने शरीर में बढ़ा सके  और अपने जीवन में हल्कापन महसूस कर सकते हैं । जैसे एक मकान को बनाने के लिए ईंट रेत और सीमेंट की आवश्यकता होती है उसी प्रकार हमारे शरीर को जीवित रखने के लिए आॅक्सीजन की आवश्यकता होती है और जब हम प्राणायाम करते हैं तो हमारे फेफड़े 4 हजार से 5 हजार सीसी आॅक्सीजन लेते हैं और वही आॅक्सीजन रक्त के द्वारा एक-एक सेल तक पहुंचती है और हमारे सभी सेल पुनर्जीवित हो जाते हैं । जीवन में उत्साह निर्मित होता है । बहुत कम खाकर बहुत अच्छा स्वस्थ रह सकते हैं । दिन भर उत्साह का वातावरण हमारे अन्दर बना रहता है । 

इस शिविर में साधकों को मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म0 ने सम्बोधित करते हुए उन्हें अपने व्यक्तित्व विकास के लिए लीडरशिप की क्वालिटी डवलप करने की कला सिखाई गई । हर कार्य कैसे हम आनंद से कर सकते हैं । कार्य करते हुए हम कैसे ऊर्जा को प्राप्त कर सकंे, तनाव मुक्त हो सकते हैं इसका ज्ञान देते हुए उन्हें सिखाया गया कि भोजन भी आप लीडर की तरह बना सकते हैं । ज्ञान भी आप लीडर की तरह ले सकते हैं । 

विद्यार्थी तनाव मुक्त होकर कैसे पढ़ सकता है उसका अध्ययन सुचारू रूप से कैसे चल सकता है इस पर विशेष प्रकाश डाला गया । फैक्ट्री मालिक राष्ट्रीय भावना से कैसे कार्य  करे, इस बारे में विस्तार से बताया गया । टेक्स भी स्वेच्छा से भरकर देश और समाज की कैसे सेवा की जाती है इन सब बातों को बड़े ही सुन्दर ढंग से साधकों को समझाया गया जिसके परिणाम स्वरूप व्यक्ति हर कार्य रूचिपूर्वक करता है । आपस के संबंध अच्छे बनते हैं और जीवन टेन्शन फ्री बन जाता है । साथ ही उन्हें जीवन जीने की कला के रूप में जीवन-तत्व के आसन, प्राणायाम और ध्यान का अभ्यास करवाया गया ।

इस आत्म: विकास कोर्स में साधकों को सिखाया गया कि हर पल हर क्षण को स्वीकार करते हुए कैसे आनंद में रहा जा सकता है । ज्ञानी बनकर कैसे जीया जा सकता   है । ज्ञान और ध्यान का संगम बताते हुए उन्हें ज्ञानोदय का अनुभव करवाया गया । साधकों को धर्म का शुद्ध स्वरूप मैं कौन हूॅं कहां से आया हूं इसका बोध कराते हुए उन्हें ध्यान का विशेष प्रशिक्षण दिया  गया । सभी लोग जीवन जीने की कला प्राप्त करके अति उल्लास से परिपूर्ण थे । 

सभी साधकों ने चातुर्मास समिति के कार्यकर्Ÿााओं के प्रति, आचार्यश्रीजी के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित की कि यह साधना का मौका आपने हमें दिया । दिनांक 1 से 3 अगस्त, 2005 तक ‘आत्म: समाधि कोर्स’ सम्पन्न हुआ । इस कोर्स में करीब 40 साधकों ने समाधि की साधना प्राप्त की । इस साधना शिविर में मंत्र द्वारा समाधि में कैसे प्रवेश करना इसका विशेष रूप से ज्ञान दिया गया, साधना विधि सिखाई गई । सभी लोगों ने आचार्यश्रीजी द्वारा प्रदŸा ज्ञान प्राप्त करके अपने आपको गौरवान्वित अनुभव किया ।

आगामी आत्म: विकास कोर्स ‘बेसिक’दिनांक 10 से 14 अगस्त, 2005 तक शुरू   होगा । इस कोर्स का समय प्रातः 5.15 से 7.15 बजे तक एवं शाम 4.00 से 6.00 बजे तक रहेगा । यह कोर्स भी प्रतिदिन दो घण्टे का होगा । इस साधना के बारे में अधिक जानकारी हेतु सम्पर्क करें । फोन नम्बर विपुला जैन 9888201196, 9872294875

 

अपनी कमाई का कुछ हिस्सा दान और मानव सेवा में लगाएं: आचार्य शिवमुनि

जालंधर 1 अगस्त,, 2005: विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने ‘शिवाचार्य सत्संग स्थल’, लक्ष्मी पैलेस, गाजी गुल्ला रोड़ में प्रवचन करते हुए फरमाया कि-  अरिहंत देव को वंदन करते हुए हमारे भीतर एक प्यास जागृत हो, एक अभीप्सा जागृत हो, एक पुकार जागृत हो कि मैं आपके चरणों में समर्पित होना चाहता हूॅं । मैं अपना सारा अहंकार छोड़कर, अपने को मिटाकर आपकी शरण में आना चाहता हूॅं । प्रभु आप मुझे अपने जैसे बना लो । वे लोग धन्य हैं जो आपकी शरण में बैठकर साधना कर रहे हैं । हमारे जीवन का लक्ष्य अरिहंत अवस्था को प्राप्त करना है । अरिहंत प्रभु दीक्षा लेने के पूर्व एक वर्ष तक वर्षीदान देते हैं । दान देने की बहुत ही सुन्दर परम्परा हमारे यहां पर है । दान देते समय हमारे भीतर में अनुग्रह, करूणा का भाव होना चाहिए । दान देना है तो शुद्ध हृदय से देना चाहिए । 

आचार्यश्रीजी ने गुजरात के झगड़ू शाह का उदाहरण देते हुए कहा कि एक आचार्य ने उन्हें प्रेरणा दी थी कि आने वाले समय में भयंकर अकाल पड़ेगा उस समय में तुम अन्न के भण्डार बनकर देश की सेवा करना तदनुसार समय आने पर उन्होंने देश की सेवा की । लोगो को मुफ्त में अन्न दिया और बहुत बड़ा पुण्य कमाया । आज जगड़ू शाह, भामाशाह को याद किया जाता है जिन्होंने देश, मानव सेवा के लिए कार्य किया । जो दीन दुःखियों की सेवा करता है वह अमर हो जाता है । बंगाल की एक घटना है कि एक बार बरसात नहीं होने पर वहां के लोगों ने एक बहुत बड़ा यज्ञ करने के लिए लाखों रूपये एकत्रित किए और यज्ञ का उद्घाटन करने के लिए स्वामी विवेकानंद को विनती की । स्वामी विवेकानंद ने सारी जानकारी पूछी और कहा कि लोग भूखे मर रहे हैं और तुम केवल देव को प्रसन्न करने के लिए लाखों रूपये यज्ञ में खर्च कर रहे हो यह उचित नहीं है । मानव सेवा करो । अगर मानव सभी प्रसन्न होंगे तो धरती पर अपने आप स्वर्ग बन जाएगा । लोगों ने उनसे प्रभावित होकर सारा धन उन्हें सौंप दिया और स्वामीजी ने सारा धन भूखे, गरीबों की सेवा में लगा दिया यह है मानव सेवा का उत्कृष्ट उदाहरण । 

एक पंजाबी कवि ने भी कहा है- इस पृथ्वी पर तीन रत्न है पहला पानी, दूसरा अन्न और तीसरा मीठे वचन । कोई प्यासा मिले तो उसे पानी पिलाये । भूखे को भोजन करावें और ये दोनों भी ना हो सके तो कम से कम मीठे वचन अवश्य बोले और भी आगे दान के बारे में बताते हुए आचार्यश्रीजी ने कहा दरिद्र के द्वारा दान देना बहुत कठिन है । शक्तिशाली के द्वारा क्षमा करना और जवानी की उम्र में संयम का पालन करना ये सभी दुर्लभ हैं । हमें अपनी प्रतिदिन की कमाई में से 10 प्रतिशत देश के लिए, गरीबों के सहयोग के लिए निकालना चाहिए । अपनी कमाई का सदुपयोग करें । जब तक जीवन, श्वांस, प्राण है तब तक अपनी शक्ति का प्रयोग कर लेना चाहिए । इस प्रकार दान, सेवा, साधना जीवन को ऊपर उठाती है ।

आज आत्म: समाधि कोर्स की शुरूआत हुई । इस कोर्स में करीब 40 साधकों ने समाधि की साधना प्राप्त की । इस साधना शिविर में मंत्र द्वारा समाधि में कैसे प्रवेश करना इसका विशेष रूप से ज्ञान दिया गया, साधना विधि सिखाई गई । सभी लोगों ने आचार्यश्रीजी द्वारा यह ज्ञान प्राप्त करके अपने आपको गौरवान्वित अनुभव किया ।

 

जो देना जानता है वह धर्मात्मा है: आचार्य शिवमुनि

जालंधर 2 अगस्त,, 2005: विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने ‘शिवाचार्य सत्संग स्थल’, लक्ष्मी पैलेस, गाजी गुल्ला रोड़ में प्रवचन करते हुए फरमाया कि-  अरिहंतों के जीवन का वर्णन चल रहा है । उसी कड़ी में दीक्षा के पहले अरिहंत सभी को 1 करोड़ 8 लाख सौनया का दान करते हैं । हम जब प्रकृति को निहारते हैं तब हमें फूलों से सुगन्ध, रस, कोमलता मिलती है परन्तु हम उन फूलों को कुछ ही क्षणों में तोड़ देते हैं उस समय उसको कितनी कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है इसके बावजूद वह हमें सुगंध देता है । 

प्रकृति से हमें सीख मिलती है कि हम अपने लिए नहीं सबके लिए जीयें । दो प्रकार के लोग होते हैं- एक प्रकार के स्वार्थी होते हैं। वे केवल अपने लिए ही जीते हैं । दूसरे प्रकार के लोग वह होते हैं जो अपनी परवाह किए बगैर दूसरों की खुशी में अपनी खुशी मानते हैं । प्रभु महावीर को स्वयं साधना के द्वारा जो सिद्धियां प्राप्त होती हैं उन्हें सबमें बांटते हैं । हम धन आदि में सुख देखते हैं । इसके प्रति आसक्ति रखते हैं । उस छोटे से सुख के लिए अपार अनन्त सुख को नकार देते हैं । 

इतिहास को टटोले तो हमें ज्ञात होता है कि प्रभु महावीर आदि तीर्थंकरों ने उस अनन्त सुख के लिए धन आदि, राज्य पाठ सभी को छोड़ दिया और परम सुख को प्राप्त किया। बुद्ध के जीवन को भी हम देखते हैं उनके सत्संग में आने वाले अनेक धनिक लोगों ने धर्म प्रचार के लिए ध्यान साधना केा फैलाने के लिए अपने प्राणों से भी प्यारा जो धन था उसको त्याग किया, यहां तक कि पूरी जमीन पर सेाने की अशरफियां बिछाकर राजा से उस जमीन को खरीदकर बहुत बड़ा ध्यान केन्द्र बनवाया । इस बात से यह सिद्ध होता है कि जब व्यक्ति में श्रद्धा जागती है तब वह भौतिक वस्तुओं की चिन्ता नहीं करता । वह अपने प्राणों से भी प्यारा धन जिसे उसने अपने पूरी जीवन की शक्ति लगाकर इकट्ठा किया उसे धर्म प्रचार के लिए, सेवा के लिए धर्माचार्यों के निर्देशन पर सब कुछ न्यौछावर करने को तैयार होता है । किसी ने कहा भी है - माली सींचे सो घड़ा, रितु आए फल होय ।

कोई भी फल को प्राप्त करना हो तो उसके लिए समय की इंतजार करनी होती है, श्रम करना होता है इसी प्रकार साधना के मार्ग में भी मनुष्य के जीवन में धीरज और धैर्य की आवश्यकता होती है । जितना हम धीरज और धैर्य रखते हैं उतनी ही हमें सफलता मिलती है । प्रकृति का कण-कण सबके लिए है । फल आने पर वह दूसरों के काम आता है इसी प्रकार हमें भी प्रकृति से शिक्षा लेनी चाहिए कि जो भी कुछ हमें जीवन का फल प्राप्त हुआ है वह हम दूसरों के काम आएं ।  अगर हमारे जीवन में आनंद, शान्ति, सुख आया है तो दूसरों को बांटे केवल अकेले ही उपभोग ना करें । यही धर्मात्म व्यक्ति का लक्षण है । प्रभु महावीर केा जो भी प्राप्त हुआ उन्होंने तीस वर्षो तक जन-जन में बांटा और मोक्ष प्राप्त होने पर भी उनके द्वारा दिया हुआ ज्ञान आज भी हम सबको मार्गदर्शन दे रहा है । देना ही धर्म है । जो देता है वह धार्मिक है । केवल लेता ही रहता है देने की भावना नही ंरखता है वह अधार्मिक है । अतः हम देने के भाव से आगे आएं जो भी हमें मिला है हम सबको  बांटे ।

आत्म: समाधि कोर्स चल रहा है । इस कोर्स में करीब 40 साधकों ने समाधि की साधना प्राप्त कर रहे हैं । आज सभी साधकों को आनंद का शुद्ध स्वरूप अनुभव करवाते हुए उन्हें समाधि की विधि और समाधि में होने वाली अवस्थाओं की चर्चा की गई और उन्हें मार्गदर्शन किया । सभी लोग समाधि ध्यान का अनुभव कर अपने आपको गौरवान्वित महसूस कर रहे थे और जो कुछ उन्होंने पुस्तकों में पढ़ा था उसे अनुभव करने का अवसर प्राप्त हुआ । इस साधना शिविर में मंत्र द्वारा समाधि में कैसे प्रवेश करना इसका विशेष रूप से ज्ञान दिया गया, साधना विधि सिखाई गई । सभी लोगों ने आचार्यश्रीजी द्वारा यह ज्ञान प्राप्त करके अपने आपको गौरवान्वित अनुभव किया ।

 

सद्गुरू हमें दृष्टि देता है: आचार्य शिवमुनि

जालंधर 3 अगस्त, 2005: विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने ‘शिवाचार्य सत्संग स्थल’, लक्ष्मी पैलेस, गाजी गुल्ला रोड़ में प्रवचन करते हुए फरमाया कि- सद्गुरू हमें दृष्टि देता है । हमारे अन्तःकरण की शुद्धि करता है । सद्गुरू का सान्निध्य जीवन को बदल देता है । सद्गुरू चाहे कुछ बोले या न बोले लेकिन उसके सान्निध्य मात्र से ही काया-कल्प हो जाता है । बुद्ध के समय की एक घटना एक व्यक्ति उनकी सेवा में पहुंचा, नमन किया और बैठ गया और उसने कहा प्रभु मुझे नहीं पता कि मेरे लिए क्या आवश्यक है मेरे लिए जो जरूरी है वो ज्ञान दीजिए, साधना दीजिए और वह शान्त होकर बैठ गया । थोड़ी देर मौन में बैठा रहा जब उठा तो वह तृप्त होकर उठा । रोमांचित हो उठा और नमस्कार करके वहां से चल पड़ा ।

पास बैठे हुए उनके शिष्य आनंद ने प्रश्न किया प्रभु यह व्यक्ति आपके पास पूछ रहा था कि मुझे ज्ञान दीजिए । आपने एक भी शब्द नहीं बोला और वो भी नहीं बोला लेकिन यहां से जाते समय वह पूर्ण शान्त और मस्ती में था । बुद्ध ने कहा यह व्यक्तिपूर्ण श्रद्धा निष्ठा से भरा हुआ था और इसे जो चाहिए था वह मैंने इसे दे दिया । आगे बुद्ध ने कहा कि चार प्रकार के घोड़े होते हैं और चार ही प्रकार के मनुष्य होते हैं । प्रथम प्रकार के अड़ियल घोड़े जिन्हें चाबुक मारने पर भी नहीं चलते । दूसरे वे हैं जो चाबुक मारने पर चलते हैं । तीसरे वे हैं जो चाबुक दिखाने पर चलते   हैं । चैथे वे हैं जो मात्र इशारे से चलते हैं, इसी प्रकार चार प्रकार के मनुष्य । पहले प्रकार के हटठी दूसरे प्रकार के जिज्ञासु, तीसरे प्रकार के मुमुक्षु और चैथे प्रकार के ज्ञानी । जो व्यक्ति जिस लेवल का होता है उससे उसी प्रकार से अनुशासन करना होता है । 

जो प्रथम प्रकार के मनुष्य हंै वे सद्गुरू में, ज्ञानियों में दोष देखते रहते हैं और वे स्वयं दुःखी होते हैं और आस पास के वातावरण को दुःखी बनाते हैं लेकिन जो मुमुक्षु पुरूष हैं जो ज्ञानी सद्गुरूओं से सत्संग पाकर स्वयं भगवान बन जाते हैं । जन्मो-2 की अपनी कर्म-बंधन की श्रृंखला को तोड़ देते हैं और स्वयं भगवान बन जाते हैं । आचार्यश्रीजी अरिहंत भगवान की भक्ति भाव और उनके जीवन चरित्र पर प्रकाश डालते हुए कहा कि अरिहंत की दीक्षा देवों के द्वारा उनकी शिविका तैयार की जाती है और वे सिद्ध भगवंतों को नमन करके पंच मुस्टी लोच करके दीक्षा ग्रहण करते  हैं । इस प्रकार दीक्षा पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए आचार्यश्रीजी ने कहा कि हम भी अपने जीवन की दृस्प्रवृतियों का त्याग करके शुभ प्रवृतियों का आनंद लें । अपने भीतर भाव रखें कि हम भी इस संसार सागर से गिरकर मोक्ष की ओर बढ़ सके यही अरिहंत भक्ति का सार है । ऐसे साधक परम सदगुरू का सान्निध्य पाकर जीवन को सफल बना लेते हैं ऐसे जीवन को सफल बनाने वाला सत्संग शिवाचार्य सत्संग गाजी गुल्ला रोड लक्ष्मी पैलेस में चल रहा है । प्रतिदिन भक्तजन श्रद्धा, विश्वास से वहां पहुंचकर अपने जीवन को सफल बना रहे हैं और साथ ही अनेक मुमुक्षु भाई बहिन समाधि का ज्ञान प्राप्त करके जीवन को आनंदमय बना रहे हैं । 

आज आत्म: समाधि कोर्स का समापन हुआ जिसमें करीब 36 साधकों ने समाधि ज्ञान की प्राप्ति की और जीवन को सफल बनाया । प्रतिदिन इन साधकों के अभ्यास के लिए प्रातः 5.15 से 6.30 बजे तक योगासन, प्राणायाम और समाधि का अभ्यास चलता रहेगा । आगामी आत्म: विकास कोर्स ‘बेसिक’ दि0 10 से 14 अगस्त, 2005 तक कम्यूनिटी सेन्टर, दीन दयाल उपाध्याय नगर, जालंधर में होगा । 

 

बच्चों को संस्कारित करने से पहले माता-पिता स्वयं संस्कारी बनें

जैनाचार्य पूज्य श्री षिवमुनि जी महाराज

जालंधर 08 अगस्त, 2005: विष्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता आचार्य सम्राट् पूज्य श्री षिवमुनि जी महाराज ने षिवाचार्य सत्संग स्थल लक्ष्मी पैलेस, गाजी गुल्ला रोड में धर्म के षुद्ध स्वरूप पर प्रकाष डालते हुए बतलाया कि किसी ने भगवान महावीर से पूछा कि- धर्म कहां ठहरता है ? तो उन्होंने उत्तर दिया कि- धर्म षुद्ध हृदय में ठळरता है । किसी कवि ने भी कहा है कि-

धरम धरम सब कोई कहे, धरम न जाने कोय ।

निर्मल मन का आचरण, सत्य धर्म है सोय ।।

धर्म निर्मल हृदय में ठहरता है । भगवान से पूछा- षुद्ध हृदय किसका है । तो वे कहते हैं- जो सरल है, उसका हृदय ष्षुद्ध है । जीसस ने एक छोटे बच्चे को स्वर्ग का अधिकारी बताया । आज छोटे बच्चों में जो सरलता होती है, वह बड़ों में नहीं होती । यहां तक कि सभी सन्यासी भी सरल नहीं होते । आज सभी साधु सनयासी सन्त भी अपने आपको सरल बनाने की साधना में लगे हुए हैं । बच्चों से हमने सरलता सीखनी है, पवित्रता सीखनी है । निर्दोषता सीखनी है । अगर हमें उनको संस्कारी बनाना है तो सर्वप्रथम स्वयं को संस्कारी बनना होगा । अगर एक पिता स्वयं गुटखा, पान पराग खाता है तो अपने बच्चों को मना नहीं कर सकता । बच्चे समझदार हेाते हैं वे तुम्हारी कमजोरियों को नोट करते हैं और समय आने पर बताते हैं । हम उन्हें चालाकियां सिखाने की कोषिष में असहज बना देते हैं । अतः आज आवष्यकता है माता-पिता सदाचारी- संस्कारी बनें । जैसा हम बच्चों से चाहते हैं, पहले हमें वैसा बनना होगा । उसका उत्तरदायित्व माता-पिता का है । माता-पिता चाहें तो बच्चों को महापुरूष बना सकते हैं । चाहें तो सामान्य बना सकते हैं । जैन आगमों की भाषा में कहा है- गर्भ में रहा हुआ जीव नरक का बन्धन कर सकता है और स्वर्ग का भी । अगर माता-पिता युद्ध का सीन देख रहे हैं तो बच्चा भावों से युद्ध करने लग जाय तो वह नरक का  बंधन भी कर सकता है और स्वर्ग का भी । अगर माता-पिता भगवान की भक्ति कर रहे है। या संतों का आषीर्वाद ले रहे हैं, तो वे स्वर्ग प्राप्त कर सकते हैं । बच्चों को संस्कारी माता बना सकती है । एक माता जन्म देने वालह ेाती है और एक माता जीवन देने वाली ।

कृष्ण भगवान की दो माताएं थीं । यषोदा जन्म देने वाली व देवकी जीवन देने वाली थी । माॅं और बटे का गहन संबंध है । मां जैसा चाहे बेटे को बना सकती है । आचार्यश्री ने विविध दृष्टान्तों के द्वारा संस्कार और माता-पिता का महत्व बतलाया । आत्म: विकास कोर्स ‘बेसिक’ दिनांकः 10 से 14 अगस्त, 2005 को प्रातः 5.15 से 7.15 बजे तक व षाम 4.00 से 6.00 बजे तक आचार्यश्रीजी के सान्निध्य में प्रारंभ होने जा रहा है । कोई भी धर्मावलम्बी साधक कम्युनिटी सेन्टर, दीन दयाल उपाध्याय नगर में भाग लेकर अपने जीवन को सफल बना सकता है ।

 

दुःख से बचने के लिए प्रभु नाम आधार है: आचार्य षिवमुनि

जालंधर 12 अगस्त, 2005: विष्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता आचार्य सम्राट् पूज्य श्री षिवमुनि जी महाराज ने षिवाचार्य सत्संग स्थल, लक्ष्मी पैलेस, गाजी गुल्ला रोड, जालंधर में धर्म सभा को सम्बोधित करते हुए फरमाया कि- हमारे भारत के ऋषि मुनियों ने दो समय प्रभु आराधना के लिए उत्त्म बताये हैं । प्रातःकाल और संध्याकाल । सुबह उठते ही हम प्रभु चरणों में अरदास करते हुए अपने सुख दुःख को उनके चरणों में रख दें तो हमारी पीड़ा बैचेनी कम होती है । दुःख से बचने के लिए प्रभु का नाम आधार है । प्रातःकाल जिसे अमृत बेला कहते हैं, उस समय में अमृत झरता है । सुबह उठत ेही योगासन प्राणायाम, ध्यान और समाधि का अभ्यास करें । उगते हुए सूरज को देखें । षाम के समय को गौ-धूलि बेला कहा है । गाये चरकर वापस आती थी, उनके पांव से धूल उड़ने के कारण उस समय को गौ-धूलि बेला कहा गया । इस समय हम प्रभु भक्ति करें । अपने जीवन का कोई नियम बनावें । खाना खाने से पूर्व तीन नवकार मंत्र का स्मरण करें । पन्द्रह मिनिट समाधि का अभ्यास   करें । समाधि से षान्ति और आनन्द प्राप्त होता है । कोई भी संकट हो प्रभु भक्ति अवश्य  करें । जैसे रोज स्नान करते है वैसे रोज ध्यान करें । 

प्रभु महावीर ने ऐसे पांच स्थान बताये हैं जिनके द्वारा हमें षिक्षा नहीं मिलती है जिसमें पहला स्थान है अहंकार । जीवन में लौकिक या अलौकिक सिद्धि के लिए अहंकार बड़ी बाधा है । सन्त लाल ने कहा है:-

अवल गरीबी अंगे बसै, षीतल सदा सुखाव ।  

पावस बूढ़ा प्रेम रा, जल सूं सीचो जाव ।।

गरीबी यानि भीतर से झुक जाना, मेरे पास कुछ नहीं यह भाव आना चाहिए । जहां धन है वहां अकड़ है । गरीबी में विनम्रता है । अहंकार दान और तप में भी बाधा बन जाता   है । जहां अहंकार आ गया वहां भक्ति प्रार्थना दान नहीं होगा जिसकी आत्मा विनम्र हो गई उसमें षीतलता का वास हो गया, उसे परमात्म मिल गया । जल सिंचता है भूमि को तृप्त करता है जितने संघर्ष आते हैं, उतनी कृपा बरसती है । आत्मा का परमात्म से मिलन होता  है । हम ज्ञान को समझें । स्वयं से परिचय करें । प्रार्थना भक्ति सेवा भाव से जुट जायें तो जीवन सार्थक हो जाएगा । आप जिसे मानते हो वहां पर श्रद्धा से झुक जाओ । जब-जब सामायिक करो तो भीतर षान्ति का अनुभव करो । 

 

भजन करते समय षब्द नहीं, भावों को प्रकट करो: आचार्य षिवमुनि

जालंधर 13 अगस्त, 2005:    : श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री षिवमुनि जी महाराज ने षिवाचार्य सत्संग स्थल, लक्ष्मी पैलेस, गाजी गुल्ला रोड, जालंधर में प्रवचन सभा को उद्बोधित करते हुए कहा कि- जिसने नाम का आधार लिया, वह सुख सुविधा में आ गया । सुख दुःख संयुक्त है, दोनों को जीतने वाला अध्यात्मिक है । विज्ञापन ने हमें सारी सुविधाएं दी,  उसने मानव को चन्द्रमा तक पहुंचा दिया, फिर भी मानव वहीं का वहीं है । मानव ने आगे बढ़ना है तो ध्यान की प्रणाली, भक्ति का उपयोग सुन्दर है । आचार्य मानतुंग ने भक्ति की तो वे बन्धन मुक्त हो गये । 48 ताले हर्ष लोक के साथ टूट गये । उनके भीतर भगवान ऋषभदेव के प्रति गहन निष्ठा और भक्ति थी । उसी के फलस्वरूप भक्तामर की रचना हुई । प्रथम ष्लोक में प्रभु की महिमा को बताते हुए कहा कि हे प्रभो ! तुम्हारे चरण कमल का अंगूठा इतना सुन्दर है कि इन्द्र के मुकुटों के मणि का प्रकाष भी उसके आगे फीका है । 

नमोत्थुणं का पाठ, भक्तामर का पाठ, भक्ति से भरा हुआ है । जितना आप गहरे जाएंगे उतना ओत-प्रोत हो जाएंगे । आचार्य श्री हस्तीमल जी महाराज प्रतिदिन दो हजार नमोत्थुणं का पाठ करते थे, फलस्वरूप उनके समक्ष आने वाला हर व्यक्ति षान्ति और समाधि प्राप्त करता था । हमारे जीवन में क्या दुःख है, थोड़ा सा बुखार हो गया, थोड़ा सा कहीं दर्द हो गया तो इसे हम धर्म के दांव पर लगाते हैं । जिस घर में भोजन और भजन इकट्ठे होते है उस घर में झगड़े नहीं होते । भजन करते समय षब्द को नहीं भावों को प्रकट करो । प्रभु ऋषभ देव का निर्वाण हुए लाखों साल बीत गये पर आज भी उनके द्वारा प्रदत्त पुरूषों की 72 कलाएं, स्त्रियों के लिए 64 कलाएं जीवन्त हैं । जिस दिन प्रभु ने अन्न ग्रहण किया, वो तृतीया भी हमेषा के लिए अक्षय हो गई । भक्ताम्बर स्तोत्र भी प्रसिद्ध हो गया । जीवन तास के पत्त्े की तरह है । खोल खेलते समय पता नहीं कौन पत्ते से मिलेंगे ? कौन सहयोग देगा ? फिर भी खेलने वाला सफल हो तो सारे कार्य सफल हो जाते हैं । उसी तरह जब हमें जीवन मिला तब पता नहीं कैसे माता पिता मिलेंगे ? पर जीने वाला अगर सफल हो तो ज्ञान प्राप्ति के द्वारा मुक्ति की ओर अग्रसर हो जाता है । यह जीवन क्षण भंगुर है । राम और रावण इस संसार से चले गये । रावण के पास बहुत बड़ा परिवार था । मेघनाथ जैसा बेटा था, कुम्भकरण जैसा भाई था, सोने की लंका थी । अन्तिम समय कुछ भी काम नहीं आया । बालू की तरह खिसतुए सब कुछ ढह गया । जीवन में अगर षान्ति और संतोष को प्राप्त करना है तो प्रभु की भक्ति करो, प्रार्थना करो ।

 

देष में भ्रष्टाचार आतंकवाद को खत्म करे: आचार्य षिवमुनि

15 अगस्त, 2005: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री षिवमुनि जी महाराज ने गाजी गुल्ला रोड स्थित, लक्ष्मी पैलेस में प्रवचन करते हुए फरमाया कि- आज का यह पावन दिवस 15 अगस्त ऐतिहासिक दृष्टि से आजादी का दिन है । इस आजादी को पाने के लिए लाखों कुर्बानियां हुई । प्रभु महावीर ने फरमाया है कि- जो दिन बीत गए वे वापस नहीं आते । जो समय धर्म में लगता है वही समय सफल है । आज तक बहुत समय बीत गया । हम समय का सदुपयोग करें ।

देष की आजादी के लिए अनेक वीरों ने बलिदान दिया जिसमें महात्मा गांधी, मंगल पाण्डे, भगतसिंह, सुभाषचन्द्र बोस आदि अनेक वीर हुए हैं । महात्मा गांधी ने देष को अहिंसा, सत्य और परिग्रह के बल पर आजाद कराना चाहा । वहीं सुभाष चन्द्र बोस ने नारा दिया- अंग्रेजों भारत छोड़ों, भारत देष हमारा है । उन्होंने कहा- तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हे ंआजादी दूूंगा । गांधीजी ने भी संकल्प लिया था जब तक भारत मां जंजीरों में जकड़ी रहेगी तब तक मैं षांती से नहीं रहूूॅंगा ।

आह जो दिल से निकाली जाएगी ।

ये मत समझो कि वह खाली जाएगी ।।

देष तो आजाद हो गया पर क्या हम आजाद हुए ? हम आज भी अपने मन के गुलाम बने हुए हैं । हम प्रभु की अहिंसा, सत्य को भीतर उतारें । देष में बढ़ रहे आतंकवाद, भ्रष्टाचार को खत्म करें । देष को सुन्दर और स्वच्छ बनाने का संकल्प लें । एक आदर्ष रखें कि हमने स्वयं को स्वतंत्र रखते हुए देष को विकसित बनाना है । हम संकल्प से आगे बढ़ें ।

 

सकारात्मक दृष्टि संसार सागर से पार करती है: आचार्य शिवमुनि

जालंधर 16 अगस्त, 2005: विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के प्रणेता श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने ‘शिवाचार्य सत्संग स्थल’, लक्ष्मी पैलेस, गाजी गुल्ला रोड़ में प्रवचन करते हुए फरमाया कि-  आज का यह पावन दिवस संक्रांति का दिवस है । संक्रांति हमारे जीवन में संक्रमण, बदलाव लाती है । जीवन में सुख दुःख दोनो ही है । हम दोनों को देखते हुए उनसे पार हो जाएं । संसारी लोग दुःख को नकारते हैं और सुख को स्वीकार कर लेते हैं । मुमुक्षु लोग सुख दुःख दोनों को स्वीकारते हैं । सुख दुःख हरेक के जीवन में है । चार गति चैरासी लाख जीवयोनी में हर जगह सुख और दुःख भरा हुआ है । केवल अरिहंत प्रभु ऐसे हैं जिन्हें कोई सुख दुःख नहीं है, वे सर्वज्ञ, सर्वदर्शी हैं । प्रभु के जीवन में भी अनेक उपसर्ग आए उन्होंने हर उपसर्ग को समभाव से सहन किया । दुःख को देखते-देखते दुःख से पार हो गए । 

प्रभु से पूछा कि हे प्रभु ! सुख कैसे मिले । प्रभु ने फरमाया- जो प्राणी सबको अपने समान समझता है, सम्यक् दृष्टि से देखता है वह सुखी है । सकारात्मक दृष्टि संसार से हमें पार करती   है । नकारात्मक दृष्टि में हमेशा कांटे ही नजर आते हैं । सुख दुःख आए तो उसे स्वीकार कर   लो । यह जीवन सभी अपने लिए जीते हैं कभी दूसरों के लिए भी हम जीयें । वृक्ष अपने फल स्वयं नहीं खाता । नदियां अपना जल स्वयं नहीं पीती । वृक्ष फल देकर भी हर व्यक्ति को ठण्डी छाया प्रदान करता है । नदी के जल से हर व्यक्ति अपनी प्यास को शान्त करता है तो क्या हमारा नैतिक कर्तव्य नहीं कि हम भी किसी ओर को कुछ दें किसी ओर के लिए जीयें । श्वांस आएगी और चली जाएगी परन्तु जो श्वांस मैत्री, करूणा, सहनशीलता में बीतेगी वह श्वांस सफल होगी । 

जब हम दोनों हाथों को मिलाकर नमन करते हैं तो वह नमन हमें मुक्ति तक पहुंचा देता   है । उस नमन में आत्मा और परमात्मा का मिलन है । एक बार शुद्ध भाव से किया हुआ नमस्कार हमारे अनेक कर्मों को क्षय कर देता है ।  प्रेम के तीन रूप हैं । बाप बेटा भी प्रेम करते हैं । भाई बहन का भी आपस में प्यार होता है तो गुरू शिष्य ही प्रेम से हर कार्य करते हैं । जब हमने जन्म लिया तो माता ने अनंत वेदनाएं सहन की । उसका कर्ज हम चुका नहीं सकते । बाप बेटे का प्रेम, मां या भाई बहिन का प्रेम सांसारिक है बल्कि गुरू और शिष्य का प्रेम एक अध्यात्म से जुड़ा हुआ   है । वे आपस में प्रेम भी करते हैं तो अध्यात्म की ओर ले जाने के लिए करते हैं । जब आत्मा का परमात्मा से प्रेम होता है तो वह परमात्मा की ओर अग्रसर हो जाती है । जीवन अमर होता है । अमरता की ओर जाने के लिए सर्वप्रथम भक्ति की आवश्यकता है । हम भगवान की तरह संसार में रहते हुए भी एकाकी भाव से विचरण करें । प्रभु के अप्रमत्त जीवन को देखें और अपने व्रतों का निर्वाह करते हुए मुक्ति की ओर अग्रसर हो । संक्रांति के पावन पर्व पर दान, शील, तप भावना की आराधना करें । प्रार्थना करें । सेवा कार्य करें । नवकार मंत्र की आराधना करें । आज भादों का महीना सिंह की संक्रांति । सूरज कर्क राशि से सिंह राशि में प्रवेश कर रहा है । 30 मुहूर्ती संक्रांति हैं सभी धर्म ध्यान करें । 

आज आचार्यश्रीजी के दर्शनार्थ दिल्ली शास्त्री नगर, त्रिनगर से श्रद्धालु पहुंचे । नकोदर, सूरत, जैतों, खन्ना, मकेरिया आदि स्थानों से भाई बहिनों ने संक्रांति का लाभ लिया । 

 

जीवन में हंसवृत्ति को अपनायें: आचार्य शिवमुनि

जालंधर 17 अगस्त, 2005: { दैनिक जागरण } प्रार्थना से सब कुछ सुलभ हो जाएगा । सारे दुःख दूर हो जाएंगे । बच्चे बन जाओ । सारे प्राणियों को अपने समान समझो । भोजन से पूर्व प्रार्थना करो कि हे प्रभु जो भोजन मुझे मिला है वो सबको मिले । इकट्ठे भोजन करो और कृतज्ञता का भाव रखो । ये विचार श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने ‘शिवाचार्य सत्संग स्थल’, लक्ष्मी पैलेस, गाजी गुल्ला रोड़ में प्रवचन करते हुए फरमाए । उन्होंने कहा कि- यह भोजन किसने बनाया । अनेकों लोगों का खून पसीना इसे बनाने में व्यय हुआ हम उन सबके लिए कृतज्ञता के भाव रखें । सबका सहयोग करें । हम ऐसा कार्य ना करें जिससे किसी को दुःख हो । संसार में सब कुछ है एक फूल खिलता है कभी आपने सोचा है कि फूल क्यों खिलता  है । क्या फूल बाजार में बिकने के लिए खिलता है या हमें सुगंधि देने के लिए खिलता   है । फूल का स्वभाव ही खिलना है । अगर वह खिलेगा नहीं तो फूल नहीं कहलाएगा, कली कहलाएगा । कली टूटेगी तो फूल खिलेगा, सुगंधि आएगी । फूल से हमें सब कुछ प्राप्त होता है, इत्र, माला, सुगंध, गुलकंद, खिलते फूल को देखकर तुम भी खिल  जाओ । हम वर्तमान समय में अनेकों चिन्ताएं लेकर बैठे हुए हैं । बड़े-2 चक्रवर्ती जैसे चले गए तो हमारा घर परिवार क्या शाश्वत रहने वाला है । 

प्रभु महावीर ने कहा संसार सागर से जो भी पार होना चाहता है वो आत्म-भाव में रमण  करें । सबके हित की कामना करें । संसार के जितने भी प्राणी है उनको अपने समान समझना । खुली आंखों से आकाश, सूरज, पृथ्वी, वृक्ष को कभी हमने देखा है । ऐसा लगता है जैसे वो हमारे भीतर समा रहे हो । हम पचास प्रतिशत पृथ्वी के साथ और पचास प्रतिशत आकाश के साथ रहते  हैं । हमारे पैर पृथ्वी पर और सिर आकाश में  है । किसी वृक्ष को देखकर कभी हमारे मन में अपनी मां की याद आई है । वृक्ष को पत्थर मारकर कभी हमे ंपीड़ा हुई है । उसके भीतर भी एक जीव   है । अगर उससे कुछ लेना है तो प्रार्थना करो । 

हम वर्तमान समय में आनंद में रहे । फूलों से खिलना सीखे । गुलाब के फूल में कितने कांटे हैं फिर भी वह खिलता है । उसे देखकर आनंद, शान्ति भीतर आती है । हम मधुरतापूर्वक जीवन जीएं । तन से, मन से और हमारी वाणी से अमृत के कण बरसे । हम दलित लोगों का सहारा बने । सागर की भांति शान्त बनें । आकाश का निश्चल ध्रुव तारा बने । यह जीवन सत्य के लिए, धर्म के लिए काम आए । जब-2 भीतर क्रोध या अहंकार आए तो पानी की तरह ठण्डे हो जाना । अरिहंत प्रभु को याद करना । सभी जीवों के प्रति सम्यक् दृष्टि रखना । सार को ग्रहण करना जीवन में हंस वृत्ति रखना । हंस जिस प्रकार दूध और पानी में से दूध को ग्रहण कर लेता है उसी प्रकार हम जीवन के सार को ग्रहण करें । हंस गहरे पानी में जाकर मोती प्राप्त कर लेता है उसी प्रकार हम जीवन के अनमोल मोतियों को ग्रहण करें । जिसकी दृष्टि सम्यक् है वही महावीर के तीर्थ का सच्चा अनुयायी है । हम आशावादी दृष्टिकोण  रखें । विषम परिस्थिति जीवन में आ सकती है । हम उस परिस्थिति में भी समता को ढूंढे । जीवन में जो उपयोगी है एवं जो हमें वीतराग भाव की ओर अग्रसर करने वाला है हम उसे ग्रहण करें । 

19 अगस्त, 2005 को आचार्यश्रीजी का रक्षा-बंधन के पावन अवसर पर विशेष प्रवचन होगा । 21 से 23 अगस्त, 2005 को आत्म: विकास कोर्स ‘एडवांस-ा’ का आयोजन होगा जो प्रतिदिन प्रातः 6.00 बजे से सायं 5.00 बजे तक चलेगा । आप सभी इस कोर्स में भाग लेकर जीवन जीने की कला सीखें ।

 

जो है उसमें सुखी रहो: आचार्य शिवमुनि

जालंधर 18 अगस्त, 2005: { दैनिक जागरण} सोते, जागते, खाते, पीते हमे ंपरम सत्य को प्राप्त करना है । संसार दुःखमय है, मन चंचल है । जीवन ताने बाने में उलझा हुआ है । प्रभु तुमने परम सत्य को प्राप्त किया । हे शासन नायक मैं परम सत्य को प्राप्त करने का इच्छुक हूॅं । आप मुझे परम् सत्य दो । परम सत्य कही ंदूसरी ओर नहीं हमारे भीतर ही  है । ज्ञानी पुरूष की सम्पूर्ण आज्ञा की आराधना करना ही परम सत्य है । ज्ञानी पुरूष कहते हैं प्रमाद मत करो । मोह छोड़ों, क्रोध छोड़ो सब चला जाए पर परम सत्य जब प्राप्त होगा तब ही हम तृप्त हो ऐसी भावना हमारे भीतर होनी चाहिए । 

आचार्यश्रीजी ने बताया कि प्रभु महावीर ने जन-जन के लिए वीतरागवाणी प्रदान की । चाहे वह कपिल केवली के माध्यम से आई या गणधर गौतम ने प्रभु से प्रश्न करने पर आई । प्रभु महावीर की वाणी जीवन के लिए उपयोगी है । केवल ज्ञान, केवल दर्शन से युक्त प्रभु जो कुछ कहते हैं वे सबके कल्याण के लिए कहते हैं । अगर हमारा जीवन उसमें जुड़ जाए तो हम मुक्ति की ओर आगे बढ़ते हैं । एक तीर चुभ जाए तो व्यक्ति होश में आता है । प्रभु ने फरमाया- यह संसार क्षणिक     है । अधु्रव है । दुःख से भरा हुआ है । नश्वर है । प्रतिपल प्रतिक्षण बदल रहा है ऐसा कौनसा कर्म है जिसे करते हुए व्यक्ति दुर्गति में ना जाए अथवा दुर्गति से बच जाए । नरक गति और तिर्यंच गति दुर्गतियां हैं । क्रोध करके गांठ बनाना बहुत बुरा है । अनर्थ का कारण है । कर्म बंधन के कारणों को हम दूर कर दे । सब प्रकार के परिग्रह कलह को हम दूर कर दें । काम भोग का त्याग कर दें । 

 हरेक चेहरा खुली किताब है यहां, 

                  दिल का हाल किताबों में क्यों ढंूढते हो ।

किताबों में सुख दुःख ढूंढा नहीं जाता, अगर तुम्हें पता है सुख है दुःख है तो उसे स्वीकार कर लो । जीवन में इतना सुख है हम उसे ना देखकर उस कांटे को देखते हैं । दुःख की चिन्ता करते हैं । ज्ञानी पुरूष दुःख की चिन्ता नहीं करते । वे प्रतिपल प्रतिक्षण आनंद में रहते हैं । तुम्हारे पास क्या है उसको महत्व दो । प्रभु ने दो आखें दी, दो कान दिये, दो पांव दिये, दो हाथ दिये, एक से भी काम चल सकता था पर प्रभु ने सब कुछ दो-दो दिए । हम उनका धर्म में उपयोग करें । आंखों से प्रभु के चित्र को देखें । कानो ंसे उनकी वाणी सुने । हाथ और पांव से सेवा करें । हम क्या लेकर आए थे और क्या लेकर जाएंगें । सब कुछ यही रह जाना है, जो है उसमें सुखी रहो । 

चार देव छ शास्त्र में, बात मिली है दो ।

दुःख देवे दुःख होत है, सुख देवे सुख होय ।

चार वेद और छः शास्त्र में सार की दो ही बात बतायी है । अगर आप किसी को दुःख दोगे तो दुःख मिलेगा और किसी को सुख दोगे तो सुख मिलेगा । यदि आज निरोगी काया मिली है तो तुमने किसी की सेवा की होगी । जैसा किया है वैसा प्राप्त होगा । 

 

भाई बहिन के निश्छल प्रेम का प्रतीक रक्षा बंधन: आचार्य शिवमुनि

19 अगस्त, 2005: राखी का पर्व रक्षा का पर्व है । बहिन भाई की कलाई पर रक्षा-सूत्र बांधकर रक्षा की कामना करती है । यह पर्व भाई बहिन के निश्छल प्रेम का प्रतीक है । इस पर्व के लिए किसी धर्म सम्प्रदाय की आवश्यकता नहीं है । चाहे कोई भी धर्म से जुड़ा हुआ भाई हो । कोई भी धर्म से जुड़ी हुई बहिन हो आवश्यकता है भीतर के निश्छल प्रेम की । भाई बहिन एक ही डाली के दो फूल है । दोनों ने एक ही माॅं के गर्भ से जन्म लिया । प्रस्तुत विचार आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने शिवाचार्य सत्संग स्थल में फरमाए । उन्होंने आगे कहा कि- आज का यह पावन दिवस रक्षा बंधन के रूप में बनाया जाता है । पर्वों से भारत देश की संस्कृति का अध्यात्मिक रूप स्पष्ट होता है । भारत ही एक ऐसा देश है जहां पर हर माह में दो पर्व मनाये जाते हैं । पर्व दो प्रकार के होते हैं । एक लौकिक पर्व एवं दूसरा लोकोत्तर पर्व । कुछ पर्व संसार के लिए मनाए जाते हैं । जैसे करवा चैथ, बसंत पंचमी, नागपंचमी आदि । ये पर्व लौकिक दृष्टि से मनाए जाते हैं । कुछ पर्व अलौकिक हैं जैसे महापर्व पर्युषण आदि । पर्व के और भी दो प्रकार बताए हैं । एक बाह्य पर्व और एक भीतर का पर्व । 

ऐतिहासिक दृष्टि से रक्षा बंधन का बहुत महत्व बतलाते हुए आचार्यश्रीजी ने कहा- जब पुरू राजा भारत में सिकन्दर पर आक्रमण करने आया तो सिकन्दर की पत्नी ने पुरू राजा को रक्षा-सूत्र देते हुए उससे एक वचन लिया था कि तुम मेरे पति को बंदी नहीं बनाओगे । इस प्रकार जब सिकन्दर हारा तो पुरू ने उसे क्षमा कर दिया और जब पुरू हारा तब सिकन्दर ने उसे क्षमा कर दिया । ऐसा ही एक और प्रसंग है गुजरात के राजा बहादुर सिंह ने जब राजस्थान पर आक्रमण किया तो रानी कर्मवती ने उपाय सोचा । उसने हुमायुॅं राजा को मखमल के कपड़े पर इक्कीस रत्न जड़कर राखी बनाकर साथ में पीपल के पत्ते पर पत्र लिखकर जीवन-दान की याचना की और कहा कि मैं आपको भाई मानती हूॅ आप मेरी रक्षा करें । हुमायुॅं ने पत्र पढ़ते ही रक्षा का वचन निभाया । राखी का रूप कैसे परिवर्तित होता चला गया । बहिनों ने अपना भाई बनाकर स्वयं की रक्षा की । 

पंडित मदन मोहन मालवीय गांधीजी के समकालीन हुए हैं । वे बहुत विद्वान थे । उनके मन में एक स्वप्न था कि हमारे भारत देश में हिन्दुओं के लिए एक हिन्दु युनिवर्सिटी हो । उस समय उन्होंने काशी नरेश को राखी भेंट करते हुए जमीन की याचना की । काशी नरेश ने पन्द्रह गांव की जमीन विश्वविद्यालय के लिए दे दी । आज भी वह युनिवर्सिटी हिन्दुओं के लिए कार्यरत है । पुराने समय में सुलताना डाकू का बहुत आतंक छाया हुआ था । वह जिस गांव में भी जाता वहां पर न कोई भाई बचता न कोई उनका रिश्तेदार । एक बार किसी गांव में सुलताना डाकू गया । जब लोगों को पता चला तो वे अपने घर छोड़कर भाग गए । पर एक किसान की पत्नी को जब यह पता चला तो उसने तिलक की थाली सजाई, उसमें रक्षा सूत्र रखकर द्वार पर आई और बिना कुछ सोचे समझे सुलताना की कलाई पर राखी बांध दी । इस प्रकार संकट की घड़ी में भी राखी का प्रयोग हुआ । राखी का धागा बहुत पवित्र धागा है । 

चन्द्रशेखर आजाद को अंग्रेजी हुकुमत ने पकड़ने की घोषण की थी । जो उसे पकड़ेगा उसे पांच हजार रूपये का इनाम दिया जाएगा । चन्द्रशेखर जंगलों में घुमते हुए एक बार एक मकान में शाम के समय प्रविष्ट हुए । वहां एक वृद्ध औरत और उसकी जवान बेटी रहती थी । चन्द्रशेखर आजाद ने उस बुढ़ी स्त्री को माॅं कहकर पुकारा । मां ने उसे खाना खिलाया ।  उस जवान बेटी के साथ भाई बहिन का संबंध हो गया । न इसमें कोई रक्षा-सूत्र था न तिलक था केवल एक पत्र लिखकर उसमें पांच हजार रूपये रखकर चन्द्रशेखर प्रातःकाल चला गया । आज के त्यौहार को सफल बनाने के लिए हम ऐसी कोई गरीब बहिन के पास जाएं जिसकी शादी नहीं हुई है जिसके पास पैसे नहीं है जो गरीबी के आतंक में छाई हुई है उस बहिन के आगे कलाई करते हुए उससे राखी   बंधवाएं । उसकी मदद करें तो आज का दिन हम सबके लिए सार्थक/ सफल हो जाएगा । 

आत्म: विकास कोर्स एडवांस-ा 21 से 23 अगस्त, 2005 तक प्रातः 6.00 से शाम 5.00 बजे तक प्रतिदिन दीन दयाल उपाध्याय नगर स्थिति कम्यूनिटी सेन्टर में होगा । आप सभी जीवन जीने की कला सीखने के लिए इस शिविर में भाग लेकर अपने जीवन को सफल बनायें ।  

 

शिक्षा वह है जो तनाव मुक्त कर दें: आचार्य शिवमुनि

20 अगस्त, 2005: जालंधर:अमर उजालाः जीवन में कभी सद्गुरू मिल जाए । उनका सहारा मिल जाये तो उनसे एक भाव रखना प्रभु मुझे अपने चरण दे देना । अपना जीवन उनके समक्ष खुली किताब की तरह रखना । प्रभु महावीर से पूछा कि शिक्षा का अधिकारी कौन है ? तो प्रभु ने फरमाया पांच प्रकार के लोगों को शिक्षा प्राप्त नहीं होती । पहला जो अहंकारी है । अहंकारी को शिक्षा प्राप्त नहीं होती । शिक्षा विनय से प्राप्त होती है । ‘विद्या विनयेन शोभते’ अगर हमारे भीतर विनय होगा तो विद्या स्वयं भीतर स्थापित हो जाएगी । विद्या प्राप्त करते हुए भोले भाव से प्राप्त करें । छोटा बनकर प्राप्त करें । लघुता से प्रभुता मिलती है । क्रोध से शिक्षा प्राप्त नहीं होती । पल भर का क्रोध जीवन को दुर्गति में ले जाता है । शिक्षा वही है जो क्रोध और अहंकार को गला दे । व्यक्ति जब परम् उत्कृष्ट मत वाला होता है तब भी वह शिक्षा प्राप्त नहीं कर सकता । जब व्यक्ति रोगी हो तब भी वह शिक्षा प्राप्त नहीं कर सकता और आलस से भी शिक्षा भीतर नहीं आती । उपरोक्त विचार आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने शिवाचार्य सत्संग स्थल में फरमाये ।

आचार्यश्रीजी ने आगे कहा कि- शिक्षा प्राप्त करने के लिए विद्यार्थी के पांच लक्षण बतलाये जिसकी कौवे की तरह चेष्ठा हो, उसकी तरह सजग हो । बगुले की तरह मंजिल की ओर ध्यान हो । कुत्ते की तरह निद्रा में भी सजगता हो । जो अल्पाहारी हो और जो ब्रह्मचारी, गृहत्यागी हो ऐसा व्यक्ति उत्तम शिक्षा प्राप्त कर सकता है । ऐसी शिक्षा पुराने समय में गुरूकुल में प्राप्त होती थी । गुरूकुल में आचार्य ब्रह्मोपदेश देते थे । हर शिष्य को जीवन की शुद्धता, सत्यता, पवित्रता का बोध देते थे । आजकल शिक्षा, शिक्षा न रहकर एक व्यवसाय हो गया है । आजकल माॅं को भी बेटे की शिक्षा का टेंशन है । शिक्षा वो है जो हमें टेंशन मुक्त बनाये परन्तु आज के समय में शिक्षा प्राप्त करके हर व्यक्ति टेंशन की ओर अग्रसर हो रहा है ।

ऐतिहासिक गुरूकुल की परम्परा को उजागर करते हुए आचार्यश्रीजी ने कहा कि- राम, कृष्ण को अनेक संस्कार गुरूकुल से ही प्राप्त हुए । गुरूकुल का आचार्य उन्हें राजकुमार ना मानकर एक शिष्य मानता था । अमीरी और गरीबी की शिक्षा देता था । अपने आचरण द्वारा शिक्षा देता था । आचार्यों ने इतनी शिक्षा दी कि सिंहासन पर बैठो तो अहंकार में मत आना और जंगल में वनवास मिलने पर दुःखी मत होना । अपनी शिक्षा में उन्होंने कठोरता और कोमलता का संगम   किया । दुःख में रहना सीखों । आप अपने बच्चों को अमीरी और गरीबी दोनों में रहना सिखाओ । कबीर ने भी कहा है कि जो सुख मैंने फकीरी में पाया वह अमीरी में नहीं और उसने कहा कि परमात्मा मुझे इतना ही देना जिसमें मेरे कुटुम्ब की आवश्यकता पूरी हो और आया हुआ अतिथि खाली हाथ न जाए । कबीर के पास धन नहीं  था । वे चादर बुनते थे । बाजार में बेचते थे फिर भी उनके भीतर इतने उच्च भाव थे । उन्होंने कहा कि यह शरीर लकड़ी की भांति जल जाएगा । केस घास फूस की तरह राख में मिल जाएंगे । पूरा शरीर जल जाएगा । मानव जागो और अपने लक्ष्य को प्राप्त करो । हर बात में संतोष रखना, सब्र करना । हर कार्य संतोष से सुन्दर होता है । 

आत्म: विकास कोर्स एडवांस-ा 21 से 23 अगस्त, 2005 तक प्रातः 6.00 से शाम   5.00 बजे तक प्रतिदिन दीन दयाल उपाध्याय नगर स्थिति कम्यूनिटी सेन्टर में होगा । आप सभी जीवन जीने की कला सीखने के लिए इस शिविर में भाग लेकर अपने जीवन को सफल बनायें ।  

 

वर्तमान क्षण के प्रति जागरूकता ही ध्यान है: आचार्य शिवमुनि

21 अगस्त, 2005: जालंधर: ‘दैनिक जागरण’   आज हम ध्यान के बारे में चर्चा करंेगे । ध्यान क्या है । विश्व की चर्चा का मूल विषय है, ध्यान । ध्यान की अनेक विधियां है कौनसी विधि हमें सरलतम मार्ग से मुक्ति की ओर पहुंचा सकती है । तुम्हें भूख लगी है तो जो मर्जी खा लो पेट भरना है । यह आत्मा प्यासी, भूखी हेै तड़फती है इसका भोजन है ध्यान ं । लोग शरीर को तो भोजन खिला रहे है ंपर आत्मा का भोजन कोई-2 कर रहा है । उन्हें निन्दा, चुगली, आलस और संसार के कार्य अच्छे लगते हैं । यह मानव जीवन बहुत अनमोल है । इस श्वांस का कोई भरोसा नहीं । पता नहीं यह मानव जीवन दुबारा मिले ना मिले । देवता भी तरसते हैं इसके लिए । हम उस जीवन को संजोकर रखें । ध्यान हमारी आत्मा की भूख है । ध्यान अन्तर की अनुभूति है । इसके लिए प्रवेश की आवश्यकता है । 

यह जीवन अनमोल है । श्वांसे धड़कन व्यर्थ चली जा रही है यदि इसमें भक्ति का भाव नहीं आया, समता नहीं आई तो सारे श्वांस निष्फल है । प्रत्येक श्वांस में नाम स्मरण करो । गुरू नानक की वाणी में तीन बातें मुख्य हैं कृत करना, अच्छा कार्य करना । नाम जपना और बांटकर खाना । साधु भिक्षा लाए और अकेला खाये तो पापी कहलाता है । भिक्षा लाने के बाद गुरूदेव, आचार्य, बाल, रोगी, तपस्वी को विनती करें । भोजन से पूर्व प्रार्थना करे जिससे भोजन शुद्ध हो जाता है । प्रार्थना से भोजन के अन्दर जो निषेधात्मक तत्व है वे भी निकल जाते हैं । आंसू बहाना कर्म बंधन का कारण है । अगर हम अपने लिए या संसार के लिए आंसू बहा रहे हैं तो अवश्य ही कर्म बंधन होगा । अगर यही आंसू अरिहंत की भक्ति में निकले तो वे मोती बन जाते हैं । हम स्वयं अपने दोषों की आलोचना करे और आंसू निकले तो वे आंसू भी मोती बन जाते हैं । चंदना के आंसू मोती बन गए । प्रभु महावीर का अभिग्रह भी चन्दना के आंसुओं से ही पूर्ण हुआ । प्रभु ने सत्य पथ   अपनाया । आज प्रभु महावीर को सारा विश्व याद करता है । कहा भी है- ‘तुम्हारे इश्क ने सिखलाई मुझे ये तीन बातें, कभी हंसना, कभी रोना, कभी गमगमीन हो जाना’ । 

प्रभु चंदना के द्वार आए तो वह हर्षित हो गए । प्रभु वापिस हो गए तो वह रोई । जिसके प्रति प्यार होता है जो वहां पर हंसना, रोना और मूच्र्छित होना स्वतः ही हो जाता है । अगर हम प्रभु भक्ति में एक-एक आंसू गिराएंगे तो हमारी आत्मा निर्मल और शुद्ध हो जाएगी । कहा भी है- रोई इस कदर दो आंखे मेरी कि पुतलियां नहा-धोकर ब्रहमन हो गई । भगवान की भक्ति में हर आंसू हमे मुक्ति की ओर ले जाता है । हमारी आंखे पवित्र हो जाती है । 

प्रभु महावीर ने फरमाया- जैसे पूरे शरीर में सिर का मूल्य है । सभी पेड़ों में जड़ का मूल्य है वेैसे ही साधु के धर्म का मूल है ध्यान । साधु धर्म का सार है ध्यान । शरीर के सारे अंग बदले जा सकते हैं पर सिर को नहीं बदला जा   सकता । अगर सिर कट जाए तो आदमी जिन्दा नहीं रह सकता । वृक्ष की जड़े काट दो तो वह हरा भरा नहीं हो सकता । सभी तीर्थंकरों ने ध्यान, मौन, जप को अपनाया । आत्म-शुद्धि के लिए तप, ध्यान, साधना कर लो । आज के श्रावक मोह-माया में फंसे है । योग-शास्त्र में भी कहा है कर्म के क्षय से मोक्ष होता है । आत्म-ंज्ञान से कर्म क्षय होता है और ध्यान से आत्म-ज्ञान प्राप्त होता है । इसलिए मोक्ष प्राप्ति का मूल आधार है ध्यान । ध्यान समग्र अतिचारों का प्रतिक्रमण है । ध्यान आत्म संवर है । एक आसन में बैठना, वाणी से मौन हो जाना, मन से मौन हो जाना यानि स्वयं में स्थित हो जाना । जिस प्रकार नदी के तट पर बैठा व्यक्ति पानी को केवल देखता रहता है उसी प्रकार हम सुख दुःख और कष्टों को केवल देखते रहें । उस पर प्रतिक्रिया नहीं करेंगे तो हम ध्यान में रहेंगे । 

ध्यान को शब्दों में बताया नहीं जा सकता । ध्यान वर्तमान क्षण के प्रति जागरूकता है । शरीर से हम स्थिर हो जाएंगे । वाणी से मौन हो जाएंगे पर मन का मौन मुश्किल है । मन का मौन साधने के लिए नाम स्मरण एक सुन्दर उपाय है । नाम स्मरण से स्थिरता आती है । मन अनेक स्वरूप धारण कर लेता है, अगर भीतर आसक्ति आ जाए तो आसक्ति का स्वरूप, अगर भीतर क्रोध आए तो क्रोध स्वरूप, माया आए तो माया स्वरूप और ब्रह्म का विचार आए तो वह ब्रह्म स्वरूप बन जाता है । जिसका पिता धर्माचारी हो, माता सदाचारिणी हो उनका बैठा वैसा ही होगा । रामायण के अन्दर स्त्री को ‘घृत कुम्भ’ और पुरूष को ‘अग्निज्वाला’ की उपमा दी है । जो पुरूष मन रूपी हाथी को ज्ञान रूपी अंकुश से वश कर लेता है वह इस जीवन में नहीं भटकता । हम जीवन को सुन्दर बनाये । प्रभु वाणी कहती है अगर अशान्त मन है तो शान्त हो जाओ । शान्त मन है तो सुखी हो जाओ । सुखी मन है तो मस्त हो जाओ और मस्त मन है तो मौन हो जाओ । मौन एक कुंजी है, प्रवेश द्वार है भीतर की गहराई को जानने का । भाग्यशाली हैं वे लोग जो इस मौन ध्यान की साधना अपना रहे हैं । 

अंत में आचार्यश्रीजी ने सभी श्रावक श्राविकाओं को दान, शील, तप भावना की प्रेरणा देते हुए महापर्व पर्युषण की निकटता को बतलाते हुए कहा कि हम अधिक से अधिक धर्म-ध्यान करें । नियम, उपनियम करें । इस पावन अवसर पर उप प्रवर्तिनी महासाध्वी श्री संतोष कुमारी जी म0 ने भगवान महावीर और चंदन बाला के विशेष प्रेरक प्रसंग पर अपना प्रवचन फरमाया । महासाध्वी श्री संचिता जी म0 एवं श्री प्रेम जैन ‘तृसित’ ने अपने भाव भजन के द्वारा अभिव्यक्त किए । प्रातः काल 8.00 से 8.45 बजे तक ‘नमोत्थुण’ का पाठ सम्पन्न हुआ । आज आचार्यश्रभ्जी के दर्शनार्थ जैंतो, राजपुरा, भटिण्डा, पंचकूला, जम्मू, लुधियाना, दिल्ली, फरीदकोट आदि स्थानों से दर्शनार्थी बन्धु पहुंचे और आचार्यश्रीजी के प्रवचन का लाभ लिया । आज से आत्म: विकास कोर्स ‘एडवांस-ा’ प्रारंभ हुआ जिसमें करीब 20 भाई बहिन भाग ले रहे हैं । आगामी आत्म: विकास कोर्स ‘एडवांस-ाा’ 25 से 28 अगस्त, 2005 से शुरू हो रहा है । 

 

हम कुषल धार्मिक बनें: आचार्य षिवमुनि

22 अगस्त, 2005 जालंधर ‘अमर उजाला’: अरिहंत प्रभु की परम कल्याणकारी वाणी के एक सूत्र की चर्चा हम कर रहे हैं । ध्यान प्रभु की वाणी का मूल है । भगवान ने मुनि की दिनचर्या में तीन घण्टे का ध्यान, 6 घण्टे का स्वाध्याय एवं 3 घण्टे में अन्य कार्य बताये हैं ।  जो तुम क्रिया करते हो वह ध्यान से घटित होती है । प्रभु महावीर ने कहा मुनि वह है जो सतत् अप्रमत्त अवस्था मे ंरहता है । जो जागरूक है । मन, वचन, काया से जागरूकता बनी हुई है वह मुनि है । जो सोया है वह संसारी है । मूर्छा तोड़ने की विधि है ध्यान । एक ही दुःख है इस संसार में परमात्मा से पहचान न होना । एक ही घाव है इस संसार में परमात्मा से टूट जाना । जिस दिन तुम्हारी प्यास बढ़ेगी उसी दिन प्यास ष्षान्त होगी । हम समय गंवा रहे हैं । धर्म काय्र्र करना यानि परम स्वरूप से मिलना है । मैं अमर आत्मा हूॅं । सत्चित्त आनंद स्वरूप हूॅं यह ज्ञान प्रभु महावीर ने गौतम को दिया । गीता में श्रीकृष्ण ने  कहा । उपनिषदों में ऋषियों ने फरमाया । यह काया मरणषील है । इस जन्म में हमारा एक ही लक्ष्य हो कि हमें षुद्ध ज्ञान, षुद्ध दर्षन की प्रतीती हो जाए, जिसे तुम खोजते हो वह दूर नहीं तुम्हारे पास ही है । कहा भी है-

 कस्तूरी कुण्डल बसे, मृग ढूंढे वन माही ।

 ऐसे घट-2 राम है, दुनियां देखत नाहीं ।।

मृग को पता नहीं कि उसके अन्दर कस्तूरी है । वह उसकी सुगंध को लेकर दूर-दूर तक घूमता रहता है और अपनी जान गंवा देता है । इसी प्रकार हमारे भीतर सब कुछ है । आंखे बंद करो, ष्षरीर को स्थिर करो । परमात्मा दिखाई देगा । पहले विचार आएंगेे फिर बैचेनी परेषानी होगी फिर षुन्यता का अनुभव होगा । कुआं खोदते हैं तो भीतर से सबसे पहले कूड़ा-करकट निकलता है फिर गंदा पानी निकलता है फिर अच्छा पानी आता है । विचार सारे निकलने दो, देखो केवल भीतर रहो । अपने को देखो, अपने को जानो और किसी को देखने की आवष्यकता नहीं । प्रभु महावीर ने स्वयं को देखा था । 24 तीर्थंकरों ने स्वयं को देखा । उलझो मत । दमन मत करो केवल देखो । क्रोध, मोह, लोभ, अहंकार, वासना सबको देखो । बुद्ध ने सुन्दर विधि दी है जब गुस्सा आए तब ष्षान्त होकर बैठ जाओ और ष्वांस को देखते जाओ । ष्वांस तेजी से चलेगी फिर षान्त हो जाएगी । हमारी गलती समझ में आ जाएगी । उॅंकार का ध्यान करो, नवकार मंत्र का ध्यान करो या प्रभु के चित्र को देखो । प्रभु कितने षान्त हैं उनके उपर कितने उपसर्ग आए फिर भी वे अपनी साधना से अविचल नहीं हुए । उन्होंने कभी अपना व्यक्तिमत्व नहीं बनाया । 

यह जीवन क्षण भंुगर है । कहा भी है- आई हयात आए, कजा ले चली चले ना अपनी खुषी से आए ना अपनी खुषी से गये, मौत आई तो हम चल बसे और जन्म हुआ तो हमने उसी स्वीकार कर   लिया । हमारी कोई चाहना नहीं थी कि मुझे ऐसा ही परिवार, धर्म मिले । प्रभु ने जो कुछ दिया वह हमने स्वीकार कर दिया । इस जन्म को पाने के लिए अनेकों प्रार्थनाएं की फिर भी हम इस जन्म में आकर भटक रहे हैं । मानव जन्म बहुत अनमोल है । जागरूकता की ओर आ जाओ । सामायिक करो और उसमें चिन्तन करो कि मैं षुद्ध आत्मा हूॅं । पत्थर पर पानी डालने से वह भी चीर जाता है तो हम तो मानव हैं । अगर प्रतिपल प्रतिक्षण षुद्धात्मा का भाव रहेगा तो हम एक दिन अवष्य षुद्धात्मा बन जाएंगे । अपनी आत्मा को अपनी आत्मा के द्वारा देखना और जानना ही ध्यान है । आत्मा ही परमात्मा है । मानव निरन्तर खोज कर रहा   है । उसने आज तक की सारी खोज धन, पद, यष, प्रतिष्ठा की अगर हमें खोज करनी है तो स्वयं की करे । दो घण्टे स्वयं के लिए निकालें । ष्वासों को देखें । प्रभु की याद में स्वयं का जीवन  बिताये । 

विष्वप्रसिद्ध वैज्ञानिक आईंसटाईन ने कहा कि- ‘अगला जन्म मेैं वैज्ञानिक का न लेकर एक सेवक का लेना चाहूंगा । बाहर की खोज करने के बजाय भीतर की खोज करूंगा । कुषल व्यापारी कम पूंजी में अधिक मुनाफा प्राप्त करता है हम भी कुषल धार्मिक बनें । कम समय में अधिक निर्जरा करें । सामायिक करें, तप करें । अपनी आत्मा को षुद्ध करें । आगामी आत्म: विकास कोर्स एडवांस-ाास चार दिवसीय आवासीय दिनः 25 से 28 अगस्त, 2005 तक प्रारंभ होने जा रहा है । इच्छुक साधक सम्पर्क करें- 9872294875

 

मन को षांत करने के लिए ष्वांस का ध्यान करें: आचार्य षिवमुनि

23 अगस्त, जालंधर:  यह मानव का जीवन निरन्तर खोज कर रहा है । आगे से आगे बढ़ रहा है, जब तक परमात्मा की प्रतीती नहीं होगी तब तक खोज चलती रहेगी । खोज दो प्रकारक  है एक विज्ञान की खोज और एक धर्मे की खोज । विज्ञान ने अणु, परमाणु, न्यूटोन, प्रोटोन आदि की खोज कर ली परन्तु हाथ कुछ भी नहीं लगा । स्वयं को कुछ प्राप्त नहीं हुआ । धर्म की खोज भीतर की खोज  है । धार्मिक व्यक्ति ष्षान्ति की खोज करता है । षाष्वत आनंद की खोज करता है और वह अपने सत्संग में रहने वाले सभी लोगों को षान्त करता है । विज्ञान खोज करते हुए स्वर्ग के सुख को पाना चाहता है । कोठी में रहने वाला व्यक्ति भी आज सुखी नहीं है परन्तु एक झोैपड़ी में रहने वाला व्यक्ति सुख का अनुभव कर सकता, अगर उसका चित्त षान्त है । धर्म अन्तर के ज्ञान को प्रकट करता है । उस ज्ञान को प्रकट करने की अनेक विधियां हैं । कोई भी विधि अपना लो । लक्ष्य हमारा ज्ञान का प्रकटीकरण हो । उपनिषद् के ऋषि, बौद्ध के भिक्षु, महावीर के मुनि सभी खोज कर रहे हैं । खोज बहुत आसान है पर बहुत कठिन लगती है । 

ध्यान साधक या ध्याता किसी भी आसन में बैठकर मंद-मंद ष्ष्वासों का ध्यान करें । मन, वचन से काया से जुड़े हुए व्यापारों का त्याग करें । मन, वचन, काया तीनों आपस में मिले हुए हैं । एक कार्य तीनों के सम्मिलिन से ही सम्पूर्ण होता है । षरीर और मन दोनो ंसंयुक्त है । उन दोनों का आपस में व्यवहार चलता रहता है । ध्यान की जब अग्नि जलती है तब षुभ अषुभ सब कार्य धुलते हैं । मन, वचन, काया के व्यापार नहीं बचते । सर्वप्रथम काया को साधो, फिर वचन को साधो, फिर मन को साधो । दो को साधो तो एक स्वयं सध जाएगा । काया को साधने के लिए एक आसन में स्थिरता को बढ़ाओ । वचन को साधने के लिए लम्बे समय तक मौन का अभ्यास करो और मन को साधने के लिए उसे ष्ष्वांस प्रष्वांस के आलम्बन पर लगा दो । एक कामी व्यक्ति एक मिनिट में साठ ष्ष्वांस लेता है क्रोध व्यक्ति 40 ष्वांस लेता है एक योगी एक मिनिट में 3 ष्वांस लेता है तो एक महायोगी एक ष्वांस में एक ष्वांस लेता है और एक ष्वांस छोड़ता है । ष्वांस आ रहा है और जा रहा है । ष्वासों को सही कार्य पर लगाये । मन हमेषा राग द्वेष में उलझा रहता है । उस उलझन को समाप्त करते हम मन को ष्वांस पर लगाएं । प्रभु महावीर ने कहा- आते जाते मंद-मंद ष्वांस को देखो । आप जितने आनंद में होंगे उतने ही ष्वांस मंद होंगे । 

आते जाते ष्वांस पर रहे निरन्तर ध्यान ।

मन सधे मंगल होए, होए परम कल्याण ।।

 केवल ष्ष्वांस को देखना है । देखने मात्र से ही ध्यान लग जाएगा और हम मंगल की ओर आगे बढ़ेगे । नासाग्रह के नीचे और होठों के उपर वाले स्थान पर अपने चित्त को स्थिर कर दो और देखते चले जाओ । कहा भी है- खूंटी बन गई नासिका, सांस बना दी डोर ।

 अब तो चंचल मन को, बांध बांध इस ठोर ।। 

जैसे आपने कुत्ते को बांधना है तो उसे सांकल लगाकर खूंटी के साथ बांध देते है। उसी प्रकार मन को सांस की डोर से नासिका रूपी खूंटी पर बांध दो । जैसे मन ष्षान्त होगा वैसे आप स्वयं को साधते चले जाओगे । ष्वासों का कोई भरोसा नहीं है । पता नहीं कब आयुष्य कर्म का धागा टूट जाए । हम उस धागे को टूटने से पहले षरीर को साध ले । 48 मिनिट एक आसन में स्थिरता को बढ़ा लें । भीतर के सुख को ढूढ़े । एक प्रतीमा की तरह स्थिर होकर बैठे और फिर भीतर देखें । जब हम भ्ज्ञीतर देखेंगे तो भीतर का कूड़ा-करकट विचारों के माध्यम से बाहर निकलेगा । मन, चित्त षान्त होगा और हम मुक्ति की ओर आगे बढ़ जाएंगे ।

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स्वस्थ निरोगी एवं साधना के लिए रात्रि भोजन का त्याग करे: आचार्य षिवमुनि

24 अगस्त, जालंधर: एक श्रावक सुबह षाम प्रभु का स्मरण करे, प्रार्थना, सामायिक भक्ति, ध्यान जप करे प्रभु तक पहुंचने के लिए अनेक मार्ग है । पहुंचना एक ही जगह है, हमारी यात्रा सोहम् की यात्रा है । हमे कोहम् को सोहम् तक पहुंचाना । पूछे अपने आपको कि मैं कौन हूॅ क्या मेरा अस्तित्व है । जब मैने जन्म लिया था तब क्या ये रिष्ते नाते लेकर आया था । हम निरन्तर प्रयास करते रहे । प्रभु के चरणो में प्रार्थना करे । अपने गुण-दोष उनके चरणों में समर्पित करे । देष के राष्टपिता प्रतिदिन प्रार्थना किया करते थे । सभी कामों से पहले वो प्रार्थना को महत्व देते थे । मानव एक बुद्धिमान प्राणी है । इस संसार में जितने भी प्राणी है उन सबमें मानव महान है क्योंकि उसके पास बुद्धि है वह अपनी बुद्धि के स्तर पर जो चाहे कर सकता है । बुद्धि द्वारा भाषा से वह अनेक संबंध स्थापित करता है । पषु पक्षियों के पास ऐसी षक्ति नहीं है । भाषा उनकी है परन्तु वे संबंध स्थापित नहीं कर सकते । मानव ने बुद्धि द्वारा भाषा का इतना अधिक प्रयोग किया कि भाषा ने मानव को पंगु बना दिया । 

भगवान ने हमें पांचों इन्द्रियां दी । हर इन्द्रिय का अपना काम है । आंख केवल देखती है । कान केवल सुनते ही है ं आज तक कभी ऐसा नहीं हुआ कि कानों ने देखा हो और आंखों ने सुना हो । एक रसनेन्द्रिय ही ऐसी है जिसके दो काम है । वह बोलने का काम भी करती है और स्वाद चखने का काम भी करती है । हम इस जिह्वा का सदुपयोग करें । इसके द्वारा सुन्दरष्षब्दों का प्रयोग करें । कटु सत्य ना बोले । जितना खाना है उतना ही खाएं ।  आज विष्व में भोजन पर अनेक चर्चाएं और सेमिनार आयोजित हो रहे हैं । अगर कोई बड़ा कार्यक्रम हो और भोजन ना हो तो वह कार्यक्रम पूरा नहीं होता । बिना भोजन के किसी कार्यक्रम की पूर्णता संभव नहीं है । खाना खाएं परन्तु सीमित मात्रा में खाएं ऐसा खाना ग्रहण करें जिससे हमें कोई बीमारी ना हो । भूख में सुखी रोटी भी स्वादिष्ट लगती है और भूख ना हो तो 56 प्रकार के भोग भी रूखे सुखे लगते हैं । हम खाने को भी एक तप बनायें । प्रभु ने ऐसी अनेक विविधयंा दी कि हम खाते-2 भी तप कर सकते हैं । 

प्रभु ने रात्रि भोजन का निषेध किया । सूर्य अस्त होने के बाद इस पृथ्वी पर अनेक सूक्ष्म जीवों की उत्पत्ति होती है जो आंखों से नहीं दिखाई देते और सूर्यास्त के बाद हमारा नाभी कमल मूर्झा जाता है जिससे वह भोजन जल्दी नहीं पचा सकता । आज हम दिन भर खाते ही रहते हैं कभी कुछ खा लिया । कभी कुछ खा लिया । नियमित रूप से भोजन ग्रहण करें  । जितना चाहे उतना ही ग्रहण करें । प्रभु ने फरमाया कि साधक को एक समय ही भोजन करना चाहिए । हम इस शरीर का सदुपयोग कर लें । किसी क्षण को गवाएं नहीं । चलते-2, लेटे-2 भी प्रभु का ध्यान करें और रोज सोचे कि मुझे एक आदमी का भला करना है ।

आज के इस युग में डाॅक्टर बहुत सेवा कर रहे हैं । मानव जाति का कल्याण कर रहे हैं । प्रभु से पूछा कि हे प्रभु मुक्ति का अधिकारी कौन है तो प्रभु ने फरमाया जो रोगियों की सेवा करता है वह मुक्ति का अधिकारी है । बहुत सूक्ष्म से सूक्ष्म बात को प्रभु ने समझाया है । हम प्रभु की वाणी को समझे । प्रभु की वाणी कभी गलत नहीं हो सकती । अभी हमारी बुद्धि इतनी विकसित नहीं है कि हम उसे पूरी तरह ग्रहण कर सके । इस जीवन को हम परोपकार में लगा दें । याद रखो साथ कुछ भी नहीं जाना है । इस जीवन में और कुछ याद रहे ना रहे मौत और परमात्मा को हमेषा याद रखना ।   

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श्रावक के व्रत सोने की तरह है: आचार्य षिवमुनि

25 अगस्त, 2005: { राकेष } हमारे जीवन की खोज दृष्टि पर आधारित है । दृष्टि सम्यक् होगी तो मंजिल भी करीब होगी । अगर दृष्टि मिथ्या है तो वह व्यक्ति कोहलू के बैल की भांति वहीं पर घूमता रहेगा । थोड़ी जिन्दगी जीओ पर सम्यक् दृष्टि से जीओ । मषाल की तरह जीओ । स्वामी विवेकानंद छोटी जिन्दगी जिये पर मस्ती में जीये । उनके भीतर परमात्मा को पाने की बहुत लगन थी । भीतर भूख हो तो भोजन ढूंढ लोगे । प्यास लगी है तो पानी की खोज करोगे । पानी बहुत अनमोल है उसे व्यर्थ न गंवाओ । जितनी आवष्यकता है उतना ही उपयोग करो । आज पानी भी दूध की तरह बाजार में बिक रहा है । कहते है। अगला युद्ध होगा तो वह पानी के लिए होगा, इसलिए हम पानी का सदुपयोग करें । आज हम आवष्यकता से ज्यादा वस्तुएं इकट्ठी कर रहे हैं । जितनी आवष्यकता है उतनी वस्तुएं ग्रहण करो । मर्यादा में जीवन चलाओ । 

श्रावक का कर्तव्य यही है कि वह प्रतिदिन 14 नियमों का चिन्तन करें । बारह व्रतों को भली भांति पालन करें । श्रावक के व्रत सोने की तरह है । सोना जितना चाहो उतने ग्राम ले सकते हो । साधु के महाव्रत हीरे की भांति है । हीरा तो कट नहीं सकता वह पूरा ही लेना होता है । बारह व्रत ना स्वीकार कर सको तो पांच अणुव्रत तो ग्रहण करने ही चाहिए । पांच अणुव्रतों में अहिसंा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह आते हैं । अहिंसा यानि सभी प्राणियों के प्रति मंगल मैत्री के भाव । जीवन में मैत्री का भाव परिवर्तन करता है । 9 प्रकार का पुण्य, 42 प्रकारों से भोगा जाता है । एक अच्छा कार्य करो जिससे जीवन बदल जाएगा । हर कार्य व्यवहार के अनुरूप करो । व्यवहार और अनुषासन में भी मैत्री की आवष्यकता  है । जब कोई गलत कार्य करता है तो उसे डांटना भी पड़ता है परन्तु उसमें भी मैत्री का भाव होना  चाहिए ।

जीवन में षुद्धि की आवष्यकता है । सामायिक करो तो षरीर षुद्धि, वस्त्र षुद्धि का ध्यान रखो । अपने घर में साधना, ध्यान के लिए एक कमरा अलग से रखो । वहां पर ध्यान करो, सामायिक करो । बच्चों को संस्कार दो । उनके साथ बैठकर प्रार्थना करो । सामायिक विधि से करनी चाहिए । सामायिक एक प्रधान कार्य है । उस प्रधान कार्य को करने के लिए षुरीर, वचन और मन की षुद्धि आवष्यक है । श्रावक को पन्द्रह कर्मादान नहीं करने चाहिए । नौकर से अधिक काम करवाकर उसे कम पैसे देना यह भी अनर्थ का कारण है । जीवन को मर्यादित करो । भारत में किसी चीज की कमी नहीं है जो चाहो सब मिल जाएगा परन्तु हमें उतना ही ग्रहण करना है जितनी हमारी आवष्यकता है । अमीर व्यक्ति अनेक चीजों से अपना घर सुन्दर बनाता है तो गरीब व्यक्ति थोड़े पैसों में काम चला लेता है । हम भी मर्यादा में आएं । जीवन को मर्यादित करें । प्रतिदिन सामायिक संवर करें । 14 नियम का चिन्तन करें ।

26 अगस्त, 2005 को जन्माष्टमी के अवसर पर आचार्यश्रीजी का विषेष प्रवचन लक्ष्मी पैलेस, गाजी गुल्ला रोड में होगा । आत्म: विकास कोर्स एडवांस-ाा प्रारंभ हो गया है जिसमें बड़ी संख्या में भाई बहिन भाग ले रहे   हैं । आगामी आत्म: विकास कोर्स ‘ब्ेसिक’ 13 से 17 सितम्बर, 2005 को होगा । इच्छुक व्यक्ति सम्पर्क करें- 9872294875 

 

स्नेह के प्रतीक थे श्रीकृष्ण: आचार्य शिवमुनि

26 अगस्त, 2005: जालंधर: अमर उजालाः आज का यह पावन दिवस कृष्ण जन्माष्टमी का दिवस है । भारतवासी आज का दिवस आने पर झूम उठते हैं । उल्लास से सराबोर हो जाते हैं । आज का दिवस आते ही हर बालक युवा और वृद्ध के मन में एक बचपन और उल्लास की झलक आती है । कृष्ण का जन्म एक गुलदस्ता है जिसमें सब कुछ समाया हुआ है । वृंदावन में वे कारागृह आज भी विद्यमान हैं वहां की मोटी-मोटी दीवारें और मोटे-मोटे ताले अंधेरी रात ऐसी परिस्थिति में कृष्ण का जन्म हुआ था । माता देवकी केद में थी । बाहर पहरेदार नंगी तलवारे लेकर जाग रहे थे । चारों और अंधकार   था । किस समय बालक का जन्म हो और कंस को उसकी खबर दी जाए इसीलिए सारे पहरेदार सतर्क  थे । माता सहमी हुई थी । वासुदेव डरे हुए थे । इतने में कृष्ण का जन्म हुआ । जन्म होते ही चारों ओर का अंधकार दूर हुआ और सूरज की भांति आभा फैल गई । कृष्ण का जन्म होते ही जेल के ताले टूट गए, पहरेदारों को नींद आ गई । वासुदेव ने टोकरी में बालक को लिया और वे यमुना की ओर चल पड़े । यमुना नदी में बाढ़ आई हुई थी । कृष्ण का अंगूठा यमुना नदी को स्पर्ष होते ही यमुना ने उन्हें जगह दे दी और वे सुरक्षित मथुरा पहुंच गए । उपरोक्त विचार आचार्य सम्राट् पूज्य श्री षिवमुनि जी महाराज ने फरमाए ।

उन्होंने आगे कहा कि- नंद के घर कृष्ण का बचपन बीता । लालन पालन हुआ । कृष्ण का जीवन हमारे सामने एक प्रेरणा है । कृष्ण को सब धर्म सम्प्रदाय मानते हैं । कर्मयोगी के नाम से कृष्ण विख्यात हैं । सोलह कला सम्पूर्ण है । उस समय में भारत का चित्र बहुत ही अजीब था । चारों ओर आतंक छाया हुआ था । अधर्म की छाया थी । तलवार की धार पर हर व्यक्ति की मौत नजर आ रही थी । कृष्ण के जन्म के समय तो कंस का अति-भयानक आतंक था । कृष्ण बड़े हुए । अब वे गायें चराते हैं । बासुंरी बजाते हैं । बांसुरी आनंद का प्रतीक है । हर परिस्थिति में किस प्रकार हम आनंद में रहे इसकी षिक्षा कृष्ण की बांसुरी से ली जा सकती है । कृष्ण की षिक्षा भी एक गुरूकुल में सम्पन्न हुई जहां पर हर प्रकार का व्यक्ति षिक्षा प्राप्त करता था । कृष्ण को पढ़ने के लिए वर्तमान समय की तरह कोई अंग्रेजी स्कूल नहीं थे । उन्होंने सुदामा के साथ गुरूकुल में अध्ययन किया । कलाचार्य और गुरू माता की सेवा की । जंगलों में जाकर लकड़ियों को काटा । कृष्ण का व्यक्तित्व धीरे-2 निखरता चला गया । कृष्ण के समय में बहुत अंधविष्वास छाया हुआ था । वर्षा नहीं होती थी तो मथुरावासी हजारों मन दूध नदी में बहाते थे । उन्होंने अंध-विष्वास का विरोध किया । कृष्ण धीरे-2 बड़े होते चले गये । कंस का अंत हुआ । 

कृष्ण स्नेह के प्रतीक हैं । जहां-2 आत्मीयता, करूणा का भाव आता है वहां-2 कृष्ण को याद किया जाता है । कृष्ण ने षांति के लिए युद्ध भी किया । महापुरूषों को भी कभी अपना तीसरा नेत्र दिखाना पड़ता है । महाभारत की घटना आप सबके समक्ष है । उस महाभारत में गीता का ज्ञान अर्जुन को कृष्ण द्वारा प्राप्त हुआ । गीता में सभी धर्मों का सार समाया हुआ है । जिस प्रकार प्रभु महावीर का उत्तराध्ययन सूत्र है, बौद्धो का धम्मपद है उसी तरह हिन्दुओं के लिए गीता एक अनमोल ग्रन्थ है । कृष्ण ने नारी का उद्धार किया । जिस समय बड़े राज दरबार में द्रोपदी का चीर हरण हो रहा था उस समय उसकी सहायता की । सब तरह के गुण उनमें विद्यमान थे । 

मित्रता के प्रतीक थे श्रीकृष्ण । गुरूकुल में कृष्ण और सुदामा का वर्णन हम सबने सुना । वे दोनों साथ-साथ पढ़े । सुदामा की पत्नी को जब यह ज्ञात हुआ की कृष्ण सुदामा के मित्र हैं तो सुदामा की पत्नी ने सुदामा से कहा कि आप जाइये और कृष्ण से कुछ लेकर आइए । यहां पर दो समय की रोटी भी नसीब नहीं है । उस समय सुदामा के साथ कच्चे चांवलों की पोटली बांधकर देते हुए सुदामा की पत्नी ने उन्हें कृष्ण के लिए   भेजा । सुदामा द्वारका आए । देखा कृष्ण तो राजा बन गया है । किस प्रकार मैं इसके पास जाउॅं । द्वारपालों को कहा कि मुझे कृष्ण से मिलना है । मैं उसका बचपन का मित्र हूॅं । द्वारपालों ने ठुकराया । कृष्ण की नजर सुदामा पर पड़ी और वह दौड़ते हुए वहां आ पहुंचे और सुदामा को गले लगाया उसे राजमहल में लाएं । यहां तक कहावत है कि श्रीकृष्ण ने अपने आसुओं से सुदामा के चरण धोएं और दोनों ने मिलकर उन कच्चे चांवलों को ग्रहण किया । 

हम कृष्ण के जन्म को कैसे बनायें । वे गुणों के भण्डार थे । सहज और सरल थे । आवष्यकतानुसार कठोरता भी उनके भीतर थी । कृष्ण ने कहा जहां अंधकार है वहां प्रकाष करो । कृष्ण ने गीता का ज्ञान दिया । कर्मयोगी, ज्ञानयोग, भक्ति योग को हम सबके समक्ष रखा । आज हम कृष्ण के स्नेह को मित्रता को और विकट परिस्थिति में भी किस प्रकार आनंद में रहे उसे जीवन में उतारें । आज के दिवस पर श्रीकृष्ण की षुद्धात्मा को स्मरण करें । 

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जहाॅं चाहत नहीं वहां ध्र्म है: आचार्य शिवमुनि

27 अगस्त, 2005: जालंध्र: दैनिक जागरण: सौभाग्यशाली होते हैं वे लोग जिनके भीतर परमात्मा का ध्यान होता है । प्रभु को पाने की लालसा होती है । परमात्मा पास न हो चलेगा पर प्यास का होना जरूरी है । प्यास पीड़ा अनुभूति से गुजरना होगा । ध्र्म चाहत को पूरी नहीं करता । अगर आप चाहत को पूरी करना चाहते तो आप ध्र्म नहीं कर रहे । ध्र्म वहां है जहां चाहत नहीं है फिर भी आपके भीतर कोई चाहत उठती है तो उसे प्रभु चरणों में समर्पित कर दो । बीज को ऐसे ही जमीन पर डाल दो तो वह वृक्ष का रूप धरण नहीं करेगा । आवश्यकता है जमीन उपजाऊ हो, पोली हो । खेती के लिए बाड़ जरूरी है वैसे ही प्रभु ने इस जीवन के लिए शील, सदाचार की बाड़ बतलाई है । जो हम चाहे वह पूरा होना ध्र्म नहीं है । शरीर, मन, वचन रहे ना रहे हमारा ध्यान ध्र्म में लगा रहे । ध्र्म के लिए अनेक वीरों ने कुर्बानी दी । शरीर, मन, इन्द्रियां कुछ भी नहीं है । जब कोई ऐसा सद्गुरू मिलता है तो इनका मिलन परमात्मा से हो जाता है । ये विचार श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टध्र आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने शिवाचार्य सत्संग स्थल, लक्ष्मी पैलेस, गाजी गुल्ला रोड में फरमाये । 

उन्होंने आगे फरमाया कि- ध्यान में लीन व्यक्ति सब दोषों का त्याग करता है । अतिचारों का प्रतिक्रमण करता है । ध्यान एक ऐसी अग्नि है जो विचारों के कूड़े करकट को बाहर निकाल फैंकती  हैं । जब व्यक्ति निज भाव में रमण करता है तब ध््यान स्वतः घटित होता है । हमारी आत्मा शाश्वत् है । शरीर इस भव में है क्या पता अगले भव में नहीं भी प्राप्त हो सकता परन्तु आत्मा हमेशा शाश्वत रहेगी । कृष्ण ने गीता में कहा है कि इस आत्मा को कोई काट नहीं सकता । पानी गला नहीं सकता, अग्नि जला नहीं सकती । आत्मा की शाश्वतता को रखने के लिए हम सत्गुरू की भक्ति करें । उनकी सेवा करें । उनकी चरणों की ध्ूलि को मस्तक पर लगाये । आज तक हमने बहुत लोगों की निन्दा की है । आज से हम स्वयं की निन्दा करें । अगर हमारे भीतर दोष ना होते तो हम भी परमात्मा के करीब होते । हम अवगुणों से भरे हुए हैं । अपने अवगुणों को कम करो । अपनी गलतियों को सुधरो । अपने सद्गुरू, इष्ट के समक्ष अपनी सारी गललियां व्यक्त कर दो । जो कुछ पाप किए हैं वे गुरू की साक्षी से बता दो । आत्मा को शान्ति और समाधन में ले आओ । जब भीतर का अहंकार पिघलेगा तो परमात्मा की प्राप्ति होगी । बीज टूटेगा ही नहीं तो वृक्ष कैसे आरोपित होगा । 

परमात्मा को सेवा से भी प्राप्त किया जा सकता है । दीन दुःखियों की सेवा करो । अपने भीतर भाव रखो कि हे प्रभु ! आज तूने मुझे सेवा का अवसर दे दिया । अपने कर्ताभाव को छोड़ों । हमारी चाहना हमारे कर्ताभाव को पोषण करती है । ध्र्म कर्ताभाव को पोषण नहीं करता । जो कुछ हो रहा है वह अपने आप हो रहा है, हम उसमें कोई करने वाले नहीं । हमारे दिन की शुरूआत प्रार्थना से हो और हमारे दिन का अंत कृतज्ञता से हो । भीतर कृतज्ञता का भाव रखो । आज प्रभु की कृपा से यह जो जीवन मिला है इसे ध्र्म में लगाओ । जो जीवन ध्र्म में लगेगा वही जीवन सार्थक होगा । 

 

अहंकार ध्र्म का शत्राु है: आचार्य शिवमुनि

28 अगस्त, 2005: जालंध्र:दैनिक जागरण: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टध्र आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- भगवान महावीर ने साध्क के लिए चार प्रकार की उपमाएं देकर कहा कि- साध्क को सिंह के समान पराक्रमी, हाथी के समान स्वाभिमानी, वृषभ;बैलद्ध के समान भद्र और पशु के समान निरीह होना चाहिए । जो इन चार उपमाओं से युक्त है वह साध्क मोक्षगामी है । आचार्यश्रीजी ने आगे कहा कि- अहंकार ध्र्म का शत्राु है तो विनम्रता ध्र्म की सखी है ।

साध्ु कभी भी संगठन बनाकर नहीं चलता । वह अपने पराक्रम पर जीता है । भगवान महावीर की सारी साध्ना अकेले पराक्रम करने की है चाहे सर्दी हो चाहे गर्मी हो, चाहे सम्मान मिले चाहे अपमान मिले । साध्क शूरवीर की तरह आगे बढ़ता चला जाता है । वह दुःख से कभी घबराता नहीं । हर परिस्थिति में समभाव की साध्ना करके स्वाभिमानपूर्ण जीवन जीता है । उसकी भिक्षा भी स्वाभिमानता से परिपूर्ण है । उसका जीवन स्वाभिमानता से पूर्ण है । वह कभी दीन हीन होकर नहीं जीता तथा वह भद्र और सरल होता है । सामने वाला चाहे कितनी भी माया करे लेकिन वह अपनी भद्रिकता, सरलता से अपने जीवन को जीता है । ऐसा साध्क मोक्ष की ओर आगे बढ़ता चला जाता है । ये सभी उपमाएं पशुओं से ली गई है । पशु में भी अनेक गुण है । जो व्यक्ति गुण ग्राहक होता है वह हमेशा गुण लेता है । 

आज मनुष्य पशुओं पर अनगिनत अत्याचार कर रहा है । गाय, बैल कत्लखाने पर जा रहे हैं । वन्य प्राणियेां के शिकार हो रहे हैं । मनुष्य को चाहिए कि अपने अल्प स्वार्थ के लिए निरीह पशुओं का वध् न करें उन पर अत्याचार न करें । हर कर्म का भुगतान हमें करना होता है । जो लोग अज्ञान में कर्म करके अहंकार करते हैं वे तीव्र कर्मों का उपार्जन कर लेते हैं । जो लोग विपरीत परिस्थिति के कारण पाप हो जाने पर पश्चाताप करते हैं, आलोचना करते हैं वे अपने जीवन को पुनः परित्रा बनाकर शुद्ध बना लेते हैं और मोक्ष की ओर आगे बढ़ते चले जाते हैं ।   

दैनिक अमर उजाला के संपादक श्री जोशी जी आज आचार्यश्रीजी के आशीर्वाद लेने हेतु शिवाचार्य सत्संग स्थल पहुंचे उनका हार्दिक अभिनंदन किया गया । आज रविवार के दिवस पर अनेक क्षेत्रांें से दर्शनार्थी बन्ध्ु आचार्यश्रीजी के दर्शनार्थ पहुंचे जिसमें मालेर कोटला, नवांशहर, लुध्यिाना, भटिण्डा, सूरत, खरड़ आदि अनेक क्षेत्रों के भाई बहिन पहुंचे । चार दिवसीय आत्म: विकास कोर्स एडवांस-ाा आज परिपूर्ण हुआ । इस साध्ना शिविर में साध्कों ने गंभीर मौन का पालन करते हुए वीतराग-ध्र्म का अनुभव ज्ञान प्राप्त किया । 

आत्म: विकास कोर्स ‘एडवांस-ा’ कल दिनांक 29 से 31 अगस्त, 2005 तक प्रातःकाल    6.00 बजे से शुरू होकर 1.30 बजे तक चलेगा । पर्वाध्रिाज पर्युषण पर्व 1 से 8 सितम्बर, 2005 तक चलेंगे । इस बीच विशेष साध्ना शिविर का भी आयोजन होगा । 

 

हमारे संबंध् मध्ुर कैसे बनें: आचार्य शिवमुनि

29 अगस्त, 2005: जालंध्र:राकेशः  श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टध्र आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- प्रभु से मांगो कि प्रभु तेरी शरण, तेरी आशीष मुझे चाहिए । प्रभु तेरी भक्ति, तेरे गुण हमेशा मैं गाता रहूँ । मैं जिस भी नजर से देखूं, जहां भी देखूं वहां मुझे तुम्हारी ही छवि नजर आए, ऐसी शक्ति मुझे चाहिए । प्रभु के साथ हमारा एक संबंध् बन जाता है जैसा माॅं का बालक के साथ, पिता का पुत्रा के साथ, बहिन का भाई के साथ, गुरू का शिष्य के साथ, भक्त का भगवान के साथ वैसा ही रिश्ता होता है । हर जगह एक बात आवश्यक है कि संबंध् जो है वो मध्ुर होने चाहिए । हमारे आसपास में हमारे रहने वालों से संबंध् कैसे हो यह एक प्रश्न है ? जो ज्ञानीजन उत्तर देते हैं कि चाहे आपका पड़ौसी है, चाहे बेटा है चाहे पति है चाहे कोई भी है उसके साथ मध्ुर संबंध् हो । मध्ुर संबंधें के लिए दो बातें आवश्यक है एक तो विश्वास दूसरा प्रामाणिकता । ये दोनों धरणाएं संबंधें को मध्ुर बनाने में अहम् भूमिका निभाती है ।

हर व्यक्ति में विश्वास होना चाहिए । इस संसार में विश्वास के बिना कोई काम नहीं चलता । यह जीवन भी विश्वास से बना है । माॅं ने बालक को जन्म दिया, एक विश्वास दिया कि मैं तुम्हारी माॅं हूॅं । प्रामाणिकता का अर्थ है जो तुम अपने लिए चाहते हो वही दूसरों के लिए भी चाहो । तुम किसी के दबाव में रहना पसन्द नहीं करते । पति, पत्नी के दबाव में नहीं रहता । पत्नी, पति के दबाव में नहीं रहना चाहती फिर हम दूसरों पर क्यों दबाव डालते हैं । हर काम को हम प्रेम से करवा सकते हैं । इसका अर्थ यह नहीं है कि गलत बात के ऊपर जोर से नहीं बोलेंगे । बच्चा गलती करता है तो उसे डांटना भी पड़ता है, परन्तु हमारी डांट एक बार प्रेमपूर्वक होनी चाहिए । बार-बार उस बात का स्मरण उस बालक को नहीं करवाना चाहिए । अगर हम बार-बार उस बात का स्मरण कराते हैं तो बच्चा बागी हो जाता है । फिर वह तुम्हारी बात को सुनता  नहीं । उसके ऊपर तुम्हारी बात का कोई भी असर नहीं होता । बच्चे की लाख गलती हो पर माॅं बाहर नहीं उजागर करती । घर में बच्चे को समझाएगी, डांटेगी, फटकारेगी परन्तु बाहर नहीं बताती क्यों नहीं बताती क्योंकि वो तुम्हारा अंग है । बच्चे को समझाने के लिए उसकी गलत आदलों पर रोक लगाने के लिए आवश्यक है कि तुम्हारे भीतर सत्य को पचाने की क्षमता हो । बच्चे ने तुम्हें सारी घटना बतायी । उस घटना को सबके सामने मत रखो । एकान्त में ले जाकर बच्चे को प्यार से समझा दो और बच्चे से पूछो कि बच्चे यह गलती तुम दुबारा करना चाहोगे तो उसे ढंग से समझाने के बाद भूल जाओ और उसे भी कहो तुम भी भूल जाओ । 

उसे कहो कि बच्चे तुम्हारे में इतने गुण है यह एक छोटी सी गलती ने तुम्हारे गुणों को ढ़क लिया  है । तुम इस गलती को दूर हटाकर अपने गुणों को उजागर करो तो वह बच्चा आपकी बात को जल्दी ग्रहण करेगा । आमतौर पर एक शिकायत हमारे पास आती है कि बच्चे घर को घर नहीं समझते । इसमें भी हमारा ही कसूर है । एक छोटी बच्ची से पूछा गया कि यह घर किसका है उसने कहा- यह मेरा नहीं यह मेरे दादाजी का है । ऐसा क्यों कहा उसने ? कभी उसके दादा ने ऐसा व्यवहार किया होगा जिससे बच्ची के मन में ऐसी धरणा बन गई । हम उन्हें अहसास कराये कि घर का कोई भी नुकसान फायदा है वह बच्चे तुम्हारा है, तुम इस चीज को तोड़ोगे तो नुकसान तुम्हारा ही होगा । उन्हें ऐसा अहसास करा दो कि यह घर मेरा ही  है । तुम अपनी बात उनके ऊपर थोपो मत । उनसे सलाह लो । अगर उनकी सलाह तुम्हें पसन्द नहीं है तो उन्हें प्यार से समझा दो तो वो तुम्हारी बात को जल्दी मान जाएंगे क्योंकि बच्चे में सरलता होती है । प्रभु महावीर ने बालक की सरलता से साध्ु को उपमित किया है कि साध्ु बच्चे जैसा सरल होना चाहिए । बच्चे सरल होते हैं, स्वच्छ होते हैं । साध्ु को भी वैसा ही होना चाहिए ।

 

हर व्यक्ति से मैत्राी करो यही साध्ना का मूल मंत्रा है: आचार्य शिवमुनि

30 अगस्त, 2005: जालंध्र:दैनिक जागरणः  श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टध्र आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- साध्ु की उपमाओं पर चर्चा चल रही थी । साध्ु का वायु सा निसंग की उपमा दी है । साध्ु को किसी संगी साथी की आवश्यकता नहीं होती । जिस प्रकार आंध्ी, तूफान में तेजी से और बाकी समय मंद-म्ंाद बहती है वह राजमहलों में भी बहती है तो गरीब खानों में भी बहती है । वायु को कोई टिका नहीं सकता । उसी प्रकार साध्ु भी सब जगह विचरण करता है । केवल वर्षावास के लिए ही उसे एक स्थान पर रहने का नियम है अन्य समय में साध्ु 29 दिन में ज्यादा एक स्थान पर नहीं रह सकता । सच्चा साध्ु वायु के समान किसी का संग ना करे ं। साध्ु अपना घर ना बनाये । किसी का संग न करें यह भगवान महावीर की वाणी है । 

प्रभु महावीर ने कहा कि साध्ु मैत्राी करें पर मित्रा न बनायें । मित्रा और मैत्राी में बहुत अन्तर है । जहां मित्रा होगा वहां शत्राु भी होगा परन्तु मैत्राी में कोई शत्राु नहीं होता । प्रभु का मुनि मैत्राी की भावना रखें । सबके लिए मंगल की कामना करें । प्रभु की साध्ना का यही मूल मंत्रा है । हमारे भीतर क्षमा का भाव आएं । किसी के प्रति द्वेष भावना है तो वह बाहर निकल जाएगी । मित्रा में गलती हो सकती है परन्तु मैत्राी में गलती नहीं होगी । साध्ु सूर्य सा तेजस्वी हो । सूर्य सा तेज साध्ना के द्वारा स्वतः ही उसके शरीर में आता है । शरीर कृश हो परन्तु आत्मिक बल सूर्य की भांति तेजस्वी हो । जब तीर्थंकर की माता पुत्रा को जन्म देती है तो वह अपने चैदह स्वप्नों में सूर्य को भी भीतर प्रवेश करता देखती है । अरिहंत प्रभु चन्द्र की भांति निर्मल, सूर्य से तेजस्वी और सागर सम गंभीर है । 

हमारे जीवन की शुरूआत हम नमन से करें । अरिहंत प्रभु, चैबीस तीर्थंंकर, 64 इन्द्र इन सबको नमन करें । इन्द्रों को नमन इसलिए कि उन्होंने तीर्थंकर प्रभु के पंच कल्याणक मनाये हैं । भीतर कोई शंका ना रखो । भीतर कोई प्रश्न हो तो उसे पूछकर समाधन प्राप्त कर लो । एक ही प्रश्न से हजारो ंसमाधन हो जाते हैं । गौतम ने प्रभु से प्रश्न किए तो हम सबका समाधन हो गया । आप भी प्रश्न करे समाधन प्राप्त होगा । जहां समस्याएं हैं वही समाधन हैं । जहां उलझन है वहीं सुलझन है । हम अपने विश्वास केा बढ़ायें । प्रतिदिन हर घर में सबके साथ बैठकर पन्द्रह मिनिट प्रार्थना, ध्यान हो । एक श्रावक का कर्तव्य है कि वह सुबह और शाम एक सामायिक करे । आपस में मिलने पर ‘जय जिनेन्द्र’ कहें । जब हम जय जिनेन्द्र कहते हैं तो भीतर में प्रसन्नता बढ़ती है । पुराने समय में श्रीकृष्ण माता देवकी को वंदन करने जाते थे । तुलसीदासजी ने भी कहा है- कि राम प्रातःकाल उठकर माता पिता और गुरू को नमस्कार करते थे । हम प्रातःकाल उठे । जिस नासिका से श्वांस आ रहा है उसी साइड के पांव को सर्वप्रथम जमीन पर रखें फिर माता पिता गुरू को नमन करें । योगा, प्राणायाम, ध्यान करें । प्रभु को पुकारें । 

जब हम प्रभु को पुकारते हैं तो हमारा हृदय चक्र फैलता है । हमारे शरीर में सात चक्र हैं और सातों ही महत्वपूर्ण है परन्तु दो चक्र ऐसे हैं जो अति महत्वपूर्ण है । एक हृदय चक्र जिसमें सारी भावनाएं भरी हुई  है । हम जब नमन करते हैं तो हृदय चक्र बढ़ता चला जाता है । नाभिचक्र हमारे शरीर का केन्द्र है । हमारा नाभि केन्द्र सिकुड़ गया है उसे हम ध्यान द्वारा खिला सकते हैं । नाभि चक्र द्वारा जीवन का निर्माण होता है । हम ध्र्म की कमाई करें । ध्र्म नहीं किया जो सब यहीं रह जाएगा । ध्र्म आराध्ना के अनेक मार्ग हैं । सत्संग करें । निष्कपटता से दान, शील, तप भावना की आराध्ना करें । श्रावक के व्रतों को ग्रहण करें । 

1 सितम्बर, 2005 से पर्वाधिराज पर्युषण प्रारंभ हो रहे हैं । अनेक भाई बहिन तप की लड़ी में आगे बढ़ रहे हैं । पर्युषणों के दिनों में प्रतिदिन प्रातः 8.00 से 8.45 तक अन्तकृतदशांग सूत्रा का वांचन होगा । दोपहर में 3.00 से 4.00 बजे तक कल्पसूत्रा का वांचन होगा । एवं जो भाई बहिन पर्वाध्रिाज पर्युषण की सम्पूर्ण आराध्ना करना चाहे उनके लिए 1 से 8 सितम्बर, 2005 तक प्रातः 6.00 बजे से शाम 5.00 बजे तक होगा । इच्छुक व्यक्ति शीघ्र सम्पर्क करें । 9872294875

 

धर्म से जुड़ने पर व्यक्ति मुक्ति की ओर अग्रसर होता है: आचार्य शिवमुनि

31 अगस्त, 2005: जालंधर {  दैनिक जागरण }  श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टध्र आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- साधु मृग सा सरल होना चाहिए । जिस प्रकार मृग सरलता से कस्तूरी ढूंढने के लिए अनेक प्रयास करता है वैसे ही साधु मुक्ति मार्ग पर अग्रसर होने के लिए प्रयास करें । साधु सबके साथ रहते हुए अकेला रहे । कमल पत्र कीचड़ में रहता हुआ भी कीचड़ से अलग रहता है । सागर सम गंभीर और सूर्य सम तेजस्वी हो । चांद की शीतलता साधु के भीतर होनी चाहिए । साधु मेरू सा निश्छल होना चाहिए । आगमों में वर्णन है कि मेरू पर्वत स्थिर है और उसके आस पास सूर्य और चन्द्र घूमते हैं । मेरू पर्वत केन्द्रीयभूत कील है । जिस प्रकार चक्की के केन्द्र में कील होती है और उसके साथ जो दाना लग जाता है वह कभी पीसा नहीं जाता उसी प्रकार जन्म और मौत दो पाट है वो निरन्तर चल रहे हैं । धर्म रूपी कील के साथ जो व्यक्ति लग जाता है तो जन्म मरण को पार कर लेता है । हम धर्म से जुड़ जायें । एक पांव गलात पड़ गया तो सारी जिन्दगी बेकार हो जाएगी और एक पांव सही पड़ गया तो हम मुक्ति की ओर अग्रसर हो जाएंगे । 

प्रभु महावीर ने जिसे अप्रमाद कहा, बुद्ध ने सम्यक् स्मृति कहा, नानक ने सिमरन और कबीर ने सुरति की बात कही, बात एक ही है । हम अप्रमत्त हो जाए । ध्यान का दीया भीतर जलायें । जीवन शुद्ध और निर्मल हो जाएगा । हम प्रभु का शरणा स्वीकार करें । पर्वाधिराज पुर्यषण कल से प्रारंभ हो रहे हैं । पौषण करें । आत्मा का पोषण करें । नवकार मंत्र का पाठ करें । पंच परमेष्ठी को नमन करें । पंच परमेष्ठी में दो ही पद सार युक्त है । अरिहंत और साधु । साधु साधना करते-2 एक दिन अरिहंत बन जाता है । श्रद्धा से स्मरण करें । जब नमन आए तो झुक जायें । झुकना अर्थात् हृदय के पात्र को खाली करना । संस्कार, धारणा भीतर ना हो । जब हम झुकेंगे तो हमारी ग्रहणशीलता बढ़ जाएगी । 

हम अपने भीतर मुमुक्षा का भाव रखें । प्रभु से प्रार्थना करें कि हे प्रभु मुझे भी अपने साथ एकाकार कर लो । कोई व्यक्ति आपको गाली दे, कुछ कहे तो आप अपनी मस्ती में  रहें । लाख उपाय करने पर भी हम किसी को खुश नहीं कर सकते । संसार की समस्या में स्वयं की समस्या को मत डालना । कोई किसी को दुःखी और सुखी नहीं कर सकता । हम अपने कर्मों से ही सुख और दुःख का अनुभव कर रहे हैं । अपने जीवन को सुधारो । 

हम स्वयं की निन्दा करें । अपनी गर्हा करे और अपनी आत्मा को शुद्ध कर लें । पर्वाधिराज पर्युषण में अन्तकृत सूत्र. और कल्पसूत्र का वांचन करें । जिस प्रकार 90 आत्माओं ने स्वयं को देखते-2 केवलज्ञान को प्राप्त किया इसका रोैचक वर्णन आप सभी कल से श्रवण कर पाएंगे । 1 सितम्बर, 2005 से पर्वाधिराज पर्युषण प्रारंभ हो रहे हैं । अनेक भाई बहिन तप की लड़ी में आगे बढ़ रहे हैं । पर्युषणों के दिनों में प्रतिदिन प्रातः 8.00 से 8.45 तक अन्तकृतदशांग सूत्रा का वांचन होगा । दोपहर में 3.00 से 4.00 बजे तक कल्पसूत्रा का वांचन होगा । एवं जो भाई बहिन पर्वाध्रिाज पर्युषण की सम्पूर्ण आराध्ना करना चाहे उनके लिए 1 से 8 सितम्बर, 2005 तक प्रातः 6.00 बजे से शाम 5.00 बजे तक होगा । इच्छुक व्यक्ति शीघ्र सम्पर्क करें । 9872294875

 

पर्वाधिराज पर्युषण में धर्म की आराधना करें: आचार्य शिवमुनि

1 सितम्बर, 2005: जालंधर {  अमर उजाला }  श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टध्र आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- महापर्व पर्युषण का प्रथम दिवस आप सभी के लिए मंगलकारी हो । आपके भीतर चैतन्य जागे । अरिहंत प्रभु के प्रति भक्ति जागे यही हार्दिक मंगल कामना । महापर्व पर्युषण प्रतिवर्ष एक नई ज्योति लेकर आता है । मानव तुम जागो । तुम स्वतंत्र हो । तुम जो चाहते हो वह तुम कर सकते हो । दुःखी होना है या सुखी होना है यह तुम पर निर्भर करता है । जागो और जगाओ, मुक्ति की ओर आगे बढ़ो । भगवान महावीर ने यही उपदेश दिया है । 

अन्तकृतदशांग सूत्र में ऐसी भव्य आत्माओं का वर्णन है जिन्होंने इसी भव में मुक्ति को प्राप्त किया । अपने भीतर धर्म की दृष्टि लायी और वे तर गये । महापर्व पर्युषण यानि चारों ओर से अपने आपको देखना, समझना । किसी ओर को देखने की जरूरत नहीं है । पर्युषणों के अन्दर हम मन के मैल को दूर हटायें । पापों से डरें । कषायों से दूर रहें । दान, शील, तप भावना रूपी गुण की खान की आराधना करें । धन, दौलत यही रह जाएगी, धर्म ही साथ जाएगा । हम अपने प्राणों को धर्म पर न्यौछावर करें । इसका मतलब यह नहीं कि हम मृत्यु को प्राप्त करें । इसका मतलब यह है कि हम धर्म की आराधना करें । हमारे रग-रग में धर्म का सिंचन हो । 

आज का दिन गुरूवार का दिन है । गुरू भाग्य का प्रतीक है । ग्रहों में भी बृहस्पति ग्रह को सम्मान मिलता है । गुरू वह है जो भीतर दीया जलायें । जीवन में सत्गुरू मिल जाए तो सब कुछ मिल गया । इस जीवन में सारी चीजें मिल जाएगी परन्तु कठिन है चित्त का निरोध होना । मन पर संयम लाना और आत्मा का निग्रह करना । जो चित्त भ्रमण से मुक्ति दिलाये वह सद्गुरू है । चित्त को शान्त करना, आत्मा को शुद्ध करना कठिन है । ध्यान द्वारा भाव शुद्धि होती है । इन पर्वाधिराज के आठ दिनों में जो भी आप आप अपने लिए उपयोगी समझें उसे स्वीकार करके हृदय पटल पर अंकित कर लें ।

भगवान महावीर ने फरमाया कि यह जीवन असंस्कृत है । जीवन की डोर टूट गई तो जुड़ती नहीं । प्रमादीजन अपने जीवन को न गवायें । शरीर का सौन्दर्य यही रह जाएगा । साथ जाएगा जो धर्म जाएगा । हम धर्म की सुन्दरता को बढ़ायें । शारीरिक सुन्दरता को ध्यान, तप, स्वाध्याय में लगायें । इन आठ दिवसों में अधिक से अधिक सामायिक करें । रात्रि भोजन का त्याग करें । अपने प्रतिष्ठान बंद रखें । सुबह शाम प्रतिक्रमण करें । अपने जीवन को देखें, परखं । आलोचना करें । अपने जीवन को बदलें । संसार के समस्त प्राणियों के प्रति मैत्री की भावना रखें । गुणीजनों के प्रति प्रमोद की भावना रखें और दीन दुःखियो के प्रति दया की भावना  रखें, यही हार्दिक मंगल कामना । आज से प्रतिदिन प्रातः 8.00 से 8.45 तक अन्तकृतदशांग सूत्र का वांचन होगा । दोपहर में 3.00 से 4.00 बजे तक कल्पसूत्र का वांचन होगा । 

 

महापर्व पर्युषण में हम जीवन जीने की कला सीखें: आचार्य शिवमुनि

2 सितम्बर, 2005: जालंधर श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टध्र आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- महापर्व पर्युषण का द्वितीय दिवस आपके भीतर समता प्रवाहित करें । आज शुक्रवार का दिन है । शुक्र ग्रह का ज्योतिष मण्डल में विशेष स्थान है । शुक्र ग्रह कलाओं का राजा है । जिस व्यक्ति के पास कला है वह यश प्राप्त कर लेता है । जैन दर्शन में आदि तीर्थंकर प्रभु ऋषभदेव भगवान ने पुरूष के लिए 72 कलाएं एवं स्त्री के लिए 64 कलाएं बतलाई । इनमें सब कुछ समा जाता  है । बिना कला के जीवन अधूरा है । धन हो पर कला ना हो तो धन कुछ काम नहीं आता । रावण के पास सब कुछ था पर जीवन जीने की कला नहीं थी । कुणिक के पास अपार धन सम्पत्ति थी फिर भी उसे जीवन जीने की कला का ज्ञान नहंीं   था । 

महापर्व पर्युषण में हम जीवन जीने की कला सीखें । प्रभु महावीर के पास जीवन जीने की कला थी । जब प्रभु महावीर आठ वर्ष के हुए तो वे कलाचार्य के पास शिक्षा ग्रहण करने पहुंचे तब इन्द्र ने ब्राह्मण का रूप धारण कर प्रभु महावीर से अनेक प्रश्न पूछे तब उनका उत्तर मिल गया तब उस ब्राह्मण रूप इन्द्र ने कहा- जिसको सब कुछ आता है उसे मैं क्या पढ़ाऊंगा । प्रभु महावीर ने फरमाया सम्पूर्ण ज्ञान के प्रकाश से जीव मोक्ष को प्राप्त कर सकता है । अज्ञान और मोह छूटने पर ज्ञान का प्रकाश प्राप्त होता है । राग द्वेष छूटने पर राग का प्रकाश प्राप्त होता है । हम अज्ञान, अंधकार, राग, द्वेष को क्षीण करें तो मुक्ति निकट होगी । हम नवकार मंत्र का स्मरण करें क्योकि नवकार मंत्र के एक-एक शब्द में चैदह पूर्वों का सार समाया है । 

अरिहंतों को स्मरण करते ही हम पूरी तरह उनके चरणों में समर्पित हो जाएं । अपने भीतर अरिहंत को समाविष्ट कर लें । यह संसार एक पंसारी की दुकान है । सब कुछ यही रह जाना है साथ जाएगा केवल धर्म साथ जाएगा । मानव पैसे को ही सब कुछ समझ लेता है परन्तु पैसे से सब कुछ प्राप्त नहीं हो सकता । पैसे से राग द्वेष अज्ञान अंधकार नहीं छूट पाता । हम प्रभु महावीर के तीर्थ बनें । प्रभु ने हमें ऊंचे स्थान पर बिठाया है हम उस स्थान का उपयोग करें । मोक्ष, निर्वाण कहीं ओर नहीं हमारे पास ही है । जब हम संसार के कार्यों को करते हैं और उनमे ंआलिप्त होते हैं तब हम नरक की ओर अग्रसर होते हैं । जब हम धर्म के कार्य करते हैं और धर्म की ओर अग्रसर होते हैं तब हम निर्वाण की ओर आगे बढ़ते हैं । जब क्षमा, करूणा, मैत्री भीतर आएगी तब धर्म का निर्माण होगा, स्वर्ग का निर्माण होगा । राग द्वेष दो कर्म बीज है इनको जब तक समाप्त नहीं करेंगे तब तक जन्म-मरण चलता ही   रहेगा । हमें मोक्ष को प्राप्त करना है तो इन कर्म बीजो को समाप्त करना होगा । धर्म के पथ पर अग्रसर होना होगा । श्रावक और साधु केवल वेश परिवर्तन से ही नहीं मन परिवर्तन से बनते हैं । 

हमें यह छोटा सा जीवन मिला है हम इस जीवन का उपयोग करे । यह शरीर सोने का है और इसके भीतर धर्म रूपी हीरे मोती जड़े हुए हैं । यदि मन मंें शुभ आलम्बन होगा, वाणी में धर्म का प्रवाह होगा तो मुख से मोती झरते हैं । जो प्रभु की वाणी का सहारा लेता है उसका जीवन निश्चय ही सोने की तरह है । पर्वाधिराज के इन पावन दिवसों में हम क्षण मात्र का भी प्रमाद न करें । अपने लिए समय निकाले । सामायिक, स्वाध्याय, ध्यान करें । 15 मिनिट हम अपनी गलती को टटोले । मोह, अज्ञान को दूर करें । गुरू समक्ष आलोचना कर शुद्ध,बुद्ध निर्मल हो जांएं ।

 

अपने कर्ताभाव को छोड़कर सम्यक् दर्शन में आएं: आचार्य शिवमुनि

3 सितम्बर, 2005: जालंधर श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टध्र आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- महापर्व पर्युषण का तृतीय दिवस आपके भीतर सत्यदृष्टि, सम्यक् दर्शन लेकर आए । शान्ति, आनंद से आपका जीवन सराबोर हो यही हार्दिक मंगल कामना । प्रभु महावीर ने मोक्ष के तीन मार्ग बतलाये हैं, सम्यक् ज्ञान, सम्यक् दर्शन और सम्यक् चारित्र । प्रभु महावीर की दृष्टि में सम्यक् दर्शन अमूल्य खजाना है । सम्यक् दर्शन में व्यक्ति साक्षी-भाव में होता है । कर्ताभाव में नहीं   होता । सम्यक् दर्शन यानि सत्य का दर्शन । जो जैसा है उसको उसी रूप में स्वीकार करना सम्यक् दर्शन है । सम्पूर्ण ज्ञान का प्रकाश अज्ञान मोह से छुटकारा राग द्वेष का क्षय जब होगा तब ही यह प्राणी सिद्ध बुद्ध मुक्त होगा ।

प्रभु महावीर की वाणी का हम अनुसरण करें । पारस लोहे को सोना बना देता है पर कोई ऐसा पारस नहीं जो पारस बनायें । फूल खिलता है, सुगंध देता है । कोई फूल किसी ओर फूल को खिला नहीं सकता । मानव एक ऐसा पुष्प है जो अन्य मानवों को खिला सकता है, उन्हें धर्म में जोड़ सकता है । मानव, मानव को अरिहंत बना सकता है । अरिहंत प्रभु संसार सागर से पार करते हैं, मोक्ष दे देते हैं कोई पार होना चाहे तो उसकी इच्छा अवश्य पूरी होती है । सारी बातों में हमारा पूर्णतः समर्पण आवश्यक है । हम दुविधा में जी रहे हैं । दुविधा में माया और राम दोनों नहीं मिल सकते । हमारे ऊपर कर्म की जो छोटी सी परत है उसे दूर कर दो तो परमात्मा मिल जाएगा । एक लोहे की डिब्बी में पारस पत्थर पर पतले कागज का आवरण चढ़ाकर रख दिया जाए तो वह पारस पत्थर भी लोहे को सोना नहीं बना सकता क्योंकि पारस पत्थर पर आवरण है इसी प्रकार हमारे उपर मोह, अज्ञान का आवरण   है । उस आवरण को जब हम दूर करेंगे तभी हम निर्मल हो सकेंगे ।

जब-2 राग द्वेष का भाव आए तो उससे अलग होकर आत्मिक आनंद का अनुभव करना । भीतर के आनंद की खोज करना । राग एक अग्नि सवरूप है वह मानव को जलाता है । द्वैष भूत पिशाच के समान है । मोह जाल के समान है । तृष्णा नदी के समान है । हर व्यक्ति अपने-2 स्वार्थ के पीछे लगा हुआ है कोई व्यक्ति किसी की खातिर नहीं रोता वह अपने स्वार्थ से ही रोता है । राग-द्वेष मूल है उससे मोह और तृष्णा उत्पन्न होती है । भरत चक्रवर्ति 6 खण्ड के अधिपति थे । सारे सुख साधन उनके पास उपलब्ध थे फिर भी उनका मन धर्म में रमा हुआ था । उन्हें एक साथ तीन बधाईयां प्राप्त होती है । पुत्र रत्न की प्राप्ति । आयुधशाला में चक्र रत्न की प्राप्ति और भगवान ऋषभदेव को केवलज्ञान ं । इन तीनों बधाईयों में से उन्हें भगवान के केवलज्ञान महोत्सव मनाने को प्राथमिकता दी । उन्होंने कहा कि पुत्ररत्न और चक्ररत्न मुझे धर्म के प्रभाव से ही प्राप्त हुए हैं । वे राज कार्य करते हुए भी धर्म को प्रमुखता देते थे । यह उनका सम्यक् दर्शन था । हम सम्यक् दर्शन में आए । अपने कर्ताभाव को छोड़े । भीतर हर घटना को स्वीकार करें । चाहे मृत्यु भी आ जाए तो वह भी हमारे लिए स्वीकार्य हो जाए यही हमारा सम्यक् दर्शन है । 

 

सम्यक् दर्शन मोक्ष की टिकिट है: आचार्य शिवमुनि

4 सितम्बर, 2005: जालंधर श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टध्र आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- महापर्व पर्युषण का चतुर्थ दिवस आपके अन्तःकरण में सम्यक् दर्शन की ज्योति जगायें । आपके भीतर वीतरागता की प्यास आए । आपके हृदय में सच्ची श्रद्धा स्थापित हो यही हार्दिक मंगल कामना । प्रभु महावीर से गणधर गौतम ने अनेकों प्रश्न पूछे और उनका समाधान उन्हें प्राप्त हुआ । गणधर गौतम के हम पर अनंत उपकार हैं जो उन्होंने प्रभु से इस वाणी को उद्धृत किया । गौतम ने प्रश्न पूछा, प्रभु ! हम कौनसा धर्म स्वीकार करें । हम कौनसे गुरू के पास जाएं । हम कौनसा धर्म शास्त्र पढ़ें । अनेक धर्म गुरू इस भारतवर्ष में हैं । सभी स्वयं को श्रेष्ठ बतलाते हैं । प्रभु ने अपने ज्ञान के द्वारा बताया कि हे गौतम ! किसी भी धर्म गुरू, धर्म स्थान, धर्म शास्त्र के पास जाने से पूर्व अपने हृदय को शुद्ध कर लेना । मन को टटोल लेना । प्रभु का ज्ञान हमें मुक्त करता है बांधता नहीं । धर्म के नाम पर आज अनेको ंसम्प्रदाय खड़े हैं । अनेकों धर्म स्थान हैं । मन्दिर, मस्जिद, गुरूद्वारा स्थानक । धर्म शास्त्र भी अनेकों हैं । प्रत्येक को पढ़ने से पूर्व या उस स्थान पर जाने से पूर्व स्वयं को शुद्ध करना । हृदय को निर्मल करना तो धर्म मिल जाएगा ।

प्रभु महावीर की वाणी प्रांजल वाणी है । उनकी वाणी में ना किसी से राग है, ना किसी से द्वेष हैं । वे पक्षपात नहीं करते । उन्होंने कमी गौतम को यह नहीं कहा कि मेरी बात   मानों । प्रभु ने कहा- कहीं पर भी जाओ । स्वयं को शुद्ध कर लो । सत्य से गुजर जाओ । स्वयं की जांच पड़ताल करो । सम्यक् दर्शन जैन धर्म का आधार है । कितनी तपस्याएं कर लो, कितने शास्त्र पढ़ लो पर भीतर सम्यक् दर्शन नहीं आया तो कुछ भी नहीं हुआ । धर्म का मूल है दर्शन । दर्शन यानि देखना । आंख देखती है और सब कुछ भीतर स्थापित कर लेती है । अगर दर्शन नहीं हुआ तो सारा ज्ञान थोथा है । ज्ञान से जाना जाता है । दर्शन से श्रद्धा की जाती है । श्रद्धा केा हमने समझा नहीं । प्रभु ने श्रद्धा का गहरा अर्थ किया है । श्रद्धा हमारी आधारशिला है । श्रद्धा का मूल्य है । प्राण रहे या न रहे श्रद्धा रहना आवश्यक है । श्रद्धा वह है जिसे हमने कभी देखा नहीं, जाना नहीं, सुना नहीं, उस पर विश्वास करना श्रद्धा   करना । श्रद्धा और विश्वास अलग-2 है । किसान के भीतर श्रद्धा है कि बीज पनपेगा, फसल आएगी । अगर भीतर श्रद्धा ही नहीं होगी तो कैसे कार्य हो पाएगा । भीतर प्यास होगी तो पानी मिलेगा । परमात्मा के प्रति गहरी प्यास और गहन श्रद्धा रखो । परमात्मा हमारे भीतर ही है । 

जीवन में कभी किसी पर भरोसा मत रखना । स्वयं पर भरोसा रखना । तुम 33 करोड़ देवी देवताओं पर विश्वास कर लो पर स्वयं पर विश्वास नहीं हुआ तो कुछ भी नहीं है । जीवन, धन, प्राण चले जाए पर हमारी श्रद्धा अटल रहे । जिन-वचन पर जो श्रद्धा करता है उसमें अनुरक्त रहता है वह अपना संसार छोटा कर लेता है । विश्वास काम चलाउ है । श्रद्धा खून के कतरे-2 से जुड़ी हुई है । एक बार सम्यक् दर्शन मिल जाए तो मोक्ष की टिकिट कट जाएगी । तुमने अपने घर में फूल सजाए हैं । प्लास्टिक के भी फूल हैं और पौधे के भी फूल हैं । दोनों में से जिस फूल के लिए आपने बीज बोया है, उसे खाद, पानी दिया है वह श्रद्धा की भांति है और प्लास्टिक का फूल विश्वास की भांति है । प्लास्टिक दिखने में सुन्दर है । रंग भी सुन्दर है । सुगन्धि भी छिड़की जा सकती है पर उसमें तृप्ति, आनंद नहीं आता । स्वयं मेहनत करके आया हुआ फूल देखते ही हृदय कमल विकसित होता है । भीतर आनंद आता है । स्वयं माता ने जन्म दिया, बच्चा श्रद्धा की भांति है और गोद लिया बच्चा विश्वास की भांति है । हम अपने भीतर श्रद्धा पैदा करें, श्रद्धा आ गई तो सब कुछ हो   जाएगा । भीतर सम्यक् दर्शन का दीया जलायें और अपने जीवन को सार्थक कर लें । 

 

महापर्व पर्युषण के पावन दिनों में आत्म-ज्ञान की ओर अग्रसर हों: आचार्य शिवमुनि

5 सितम्बर, 2005: जालंधर श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टध्र आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- महापर्व पर्युषण का पंचम दिवस आप सबके लिए शुभ हो मंगल हो । आपके भीतर ज्ञान की ज्योति जगे । चिŸा शान्त और समाधि में आए यही हमारी हार्दिक मंगल कामना । प्रभु महावीर ने एक ही प्रकार का ज्ञान बतलाया है । आत्मा ही ज्ञान है और ज्ञान ही आत्मा है । ज्ञान हमारा स्वभाव है । प्रभु की दृष्टि में कौनसा ज्ञान है जो हमें अपना स्वभाव प्रदान करता है इसकी चर्चा हम आज करेंगे । सम्यक् दृष्टि होगी तो सम्यक् ज्ञान और आचरण होगा । पहले ज्ञान और फिर आचरण आएगा । दृष्टि गलत होगी तो ज्ञान अज्ञान हो जाएगा । प्रभु महावीर ने फरमाया कि मासखमण करने वाला भी ज्ञानी नहीं है तो उसकी निर्जरा नहीं होगी । ज्ञान होगा तभी भीतर दया के भाव जागृत होंगे ं। जिस व्यक्ति को ज्ञान नहीं है वह व्यक्ति तीर्यंच पशु के समान है । ज्ञान और दर्शन युगपत् है । दर्शन से आचरण आता है और ज्ञान से समझ बढ़ती है । कहा भी है- पढ़ने की हद समझ है, समझन की हद ज्ञान ।

 ज्ञान की हद हरिनाम है, यह सिद्धान्त उर आन ।।

व्यक्ति पढ़ता है तो समझ होती है । ज्ञान से विवेक जागृत होता है । ज्ञान है तो समझ बढ़ेगी, भक्ति होगी । प्रभु महावीर ने फरमाया कि मुनि वही है जो ज्ञानी है । ज्ञान आत्मा का गुण है इस संसार में जितनी भी आत्माएं हैं सबके भीतर ज्ञान है । आवश्यकता है उस ज्ञान के ऊपर का आवरण हटाने की । गीता में श्रीकृष्ण ने कहा ज्ञान से बढ़कर कोई सुख नहीं । जिसने एक आत्म-रूपी ज्ञान को जान लिया उसने सबको जान लिया । मानव सारे संसार का खजाना प्राप्त कर ले पर ज्ञान को नहीं पाया तो कुछ भी नहीं पाया । ज्ञान वह है जो हमें मुक्ति दिलाता है । शास्त्रों में ज्ञानियों के दस लक्षण बतलाये हैं जिसमें अक्रोध प्रथम लक्षण है । जो ज्ञानी होगा उसका क्रोध कम होगा, उसके भीतर मैत्री होगी । ज्ञानी के जीवन में वैराग्य होगा, आसक्ति नहीं होगी । 

संसार में दो तरह से ज्ञानी और अज्ञानी व्यक्ति हैं । एक व्यक्ति जो दुकान को ही सबकुछ मानता है । जरा सा लाभ हानि हो जाए तो सुख दुःख प्रकट करता है । कर्ताभाव की पुष्टि करता है वह अज्ञानी है । ज्ञानी व्यक्ति भी दुकान करता है वह अपने कर्Ÿाव्य का पालन करता है और इस दुकान को एक खेल समझता है । कबीर ने भी कहा कि भीतर ज्ञान होगा तो किसी से दोस्ती और किसी से वैर नहीं होगा । वह व्यक्ति समभाव में जीवन यापन करेगा । आज हर जगह कबीर के ज्ञान की चर्चा है । ज्ञान जब भीतर से होता है तो भाषा, छंद स्वयं बन जाते हैं । पूरी जिन्दगी हम भौतिक वस्तुओं पर लगे रहे । जीवन यापन करने के लिए मकान बना लिया । जवाहरात एकत्रित कर लिए परन्तु इस आत्मा को हम नही बचा पाये । चेतना ज्ञान से सुन्दर बनेगी । जहां ज्ञान है वहां सब कुछ है । जिस मानव के पास अज्ञान, मोह है वहां आपत्ति है । ज्ञानी होने का यही सार है कि हम सब संसार के सभी  प्राणियों पर करूणा भाव रखें । अंग-2 में मैत्री प्रभावित करें । भीतर सद्भावना धारण करें । 

जो ज्ञानी होता है वह शरीर की परवाह नहीं करता । आत्म-ज्ञान हमें मोक्ष की ओर ले जाता है और अज्ञान नरक की ओर ले जाता है । प्रभु ने आत्म-ज्ञानी बनने के लिए कहा । स्वयं को दृष्टि बनने के लिए कहा । शरीर में भेद-ज्ञान का साबुन लगाना और समता के पानी से आत्मा को धोबी बनाबर अपने गुण और दोषों को धोकर स्वयं शुद्ध हो जाना । महापर्व पर्युषण के पावन दिवसों में उन 90 आत्माओं ने जिस प्रकार एक भव में मुक्ति को प्राप्त किया उसी प्रकार हम भी आत्म-’ज्ञान की ओर अग्रसर हो जाएं । इन दिनों में अधिक से अधिक तप,जप और ज्ञान अर्जित करें, आलोचना प्रतिक्रमण करके स्वयं को भार-विहिन बनायें । किसी को कष्ट न दें । भीतर ज्ञाता द्रष्टा भाव रखें । 

 

आचरण से जीवन सुन्दर होता है: आचार्य शिवमुनि

6 सितम्बर, 2005: जालंधर श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टध्र आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- महापर्व पर्युषण का षष्ट्म दिवस आप सबके लिए शुभ हो मंगल हो । आपके भीतर सम्यक् दर्शन ज्ञान की आराधना करते हुए सम्यक् आचरण आए । आचरण महत्वपूर्ण है । सारे ग्रन्थों, शास्त्रों का सार आचरण है । भीतर आचरण नहीं आया तो कुछ भी नहीं आया । कोई भी ज्ञान तब तक तृप्त नहीं होता जब तक भीतर आचरण नहीं आता । महात्मा बुद्ध से किसी ने पूछा कि बुढ़ापे में काम आने वाली वस्तु क्या है ? नरो में रत्न क्या है ? मन को वश में कैसे करें ? और ऐसी कौनसी वस्तु है जो कोई चुरा नहीं सकता ? तब महात्मा बुद्ध ने फरमाया - बुढ़ापे में काम आने वाली वस्तु शील, सदाचार है । धन, कोठी, पद, प्रतिष्ठा ना हो तो चलेगा पर आचरण चाहिए । 

आचरण से जीवन सुन्दर होता है । बुढ़ापा पके हुए आम की भांति है । जीवन के अमूल्य अनुभव उसमें भरे हुए हैं । उनमें से हम सार को ग्रहण करें । श्रद्धा से मन को लगाएं । धर्म के प्रति श्रद्धा रखें । मन को संकल्प में ले आएं । जब आप सामायिक करें तो सादे कपड़े पहनें जिससे आपका मन शान्त और समता मे स्थित होगा । जो तुमने किसी को दिया है वह तुम्हें फिर मिलेगा । जिसे जैसा दोगे वैसा ही प्राप्त होगा । प्रज्ञा मानव का अनमोल रत्न है । मानव की बुद्धि से सारे कार्य संभव है । मानव और पशु में यही अन्तर है कि मानव के पास बुद्धि है और वह उसके द्वारा धार्मिक, औद्योगिक क्षेत्र में उन्नति प्राप्त कर रहा है । हमारे किए हुए सत्कर्म कोई चुरा नहीं   सकता । 

पर्वाधिराज पर्युषण के पावन दिवस चल रहे हैं । हम सत् कर्म करें । दान, शील, तप भावना की आराधना करें । प्रभु की वाणी का चिन्तन करें । प्रभु की वाणी का एक-एक सूत्र हमें दर्शन ज्ञान और चारित्र से भर देता है । ज्ञान से जाना जाता है । दर्शन से श्रद्धा की जाती है और चारित्र से आचरण आता है । श्रद्धा होगी तो आचरण स्वतः ही होगा । बीज में सारी शक्ति विद्यमान है पर हमें उसे देखना नहीं आता । उसी प्रकार हमारे भीतर अनंत ज्ञान, अनंत दर्शन, अनंत चारित्र भरा हुआ है आवश्यकता है उसके ऊपर के आवरण को हटाने की । संसार में दुःख है । दुःख का कारण है, कारण का उपाय है और उपाय से मुक्ति है, ये चारों सिद्धान्त महात्मा बुद्ध ने दिए । 

जीवन में कोई दुःख है तो उसका कारण अवश्य होगा । हम कारण को महत्व देते हैं । सोचो स्वयं के ही कर्म हैं । किसी ओर निमित्त को दोष देने की आवश्यकता नहीं है । जो निमित्त को दोष देता है वह अज्ञानी है । यदि हम ज्ञानी है तो घटने वाली हर घटना को हम कर्म-संस्कार समझेंगे । हर जीवन में कष्ट आते हैं, हम कष्टों से ऊपर उठें । राम, बुद्ध, महावीर सभी को कष्ट आए । सभी ने कष्टों को स्वयं के कर्म समझते हुए उसे कर्म निर्जरा की ओर ले गए ं 

आगामी आत्म: विकास बेसिक कोर्स 10 से 14 सितम्बर, 2005 तक प्रातः 5.30 से 7.30 बजे एवं रात्रि 7.00 से 9.00 बजे तक कम्यूनिटी हाॅल, दीन दयाल उपाध्याय नगर, जालंधर में होगा । आप सभी जीवन जीने की कला सीखने के लिए सादर आमंत्रित हैं । रजिस्ट्रेशन हेतु सम्पर्क करें- 09872294875

 

अपने मन को आलोचना से शुद्ध बनाए: आचार्य शिवमुनि

7 सितम्बर, 2005: जालंधर श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टध्र आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- महापर्व पर्युषण का सातवां दिवस आप सबके लिए शुभ हो मंगल हो । आपका हृदय, निर्मल, पवित्र, शुद्ध हो । महापर्व सम्वत्सरी है । महापर्व पर्युषण का सिरमोर है संवत्सरी । कल के दिवस सभी अपना कारोबार छोड़कर धर्माराधना करें । पिछले एक वर्ष का लेखा जोखा करे । प्रभु महावीर ने आलोचना को बहुत महत्व दिया । आलोचना यानि चारों ओर से स्वयं को देखना ं । जैसे कांटा चुभने पर सारे शरीर में वेदना होती है और कांटा निकलने पर शरीर शान्त हो जाता है । प्रभु ने कहा कि मानव अपने दोषों को सरलचित्त से प्रकट कर दे । हमारे मन में जो भी विचार, संकल्प, धारणाएं हैं उन्हें खाली कर दें । हम भीतर से बहुत समृद्ध हैं फिर भी कुछ न कुछ पाने की इच्छा हमारे भीतर होती है, उस इच्छा को समाप्त कर दें । अपने मन को आलोचना से शुद्ध बनाएं । छोटे से कांटे की चुभन पूरे शरीर में 24 घण्टे तक बनी रहती है इसी प्रकार आज तक हमने कितने दोष किए हैं उन सबका कर्मावरण हम पर है । जब हम उसे किसी गुरू के समक्ष कहते हैं तो शुद्ध बन जाते हैं । 

जो आलोचना सुनता है उसका हृदय माॅं की तरह होना चाहिए । उसे आत्मा की शुद्धता का ज्ञान होना चाहिए । सामने वाले की सारी बात सुनकर उसे केवल शुद्धता और निर्मलता का ज्ञान दे और कहें कि तुम निर्भार हो गए हो । गुरू के समक्ष जब आलोचना करते हैं तो उस आलोचना का जो कुछ प्रायश्चित आता है वह गुरू हमें प्रदान करते हैं । प्रायश्चित भाव पर मरहम पट्टी लगाने की भांति है । गुरू किसी की आलोचना सुनकर किसी को मत बतायें । उसका हृदय विशाल होना चाहिए और सामने वाले बच्चे को शुद्ध हृदय रखकर सब कुछ बता देना चाहिए । क्रिश्चयन धर्म में आलोचना को कन्फेशन से सम्बोधित किया है । कहते हैं जब ईसा भारत आए तो उन्होंने यह कन्फेसन की विधि प्रभु महावीर से ली । जब तक दोषों को हम प्रकट नहीं करते तब तक हम भीतर से शुद्ध नहीं हो पाते । महात्मा गांधी ने आलोचना को बहुत महत्व दिया । उन्होंने अपनी आत्म-कथा के अन्दर अपनी आत्म आलोचना की है ं । आलोचना गहरा शब्द है । आलोचना उसके साथ ही करना जो तुम्हारी बात पचा सके । ज्ञानियों ने कहा है कि आलोचना सद्गुरू के समक्ष या भगवान के समक्ष करनी चाहिए । अगर सद्गुरू नहीं है तो भगवान के चित्र के समक्ष बैठकर उनकी साक्षी मानकर सब कुछ सच-सच बता देना चाहिए । आलोचना नहीं की और आयुष्य पूर्ण हो गई तो वह व्यक्ति मरकर अधोगति को प्राप्त होता है । बड़े से बड़ा पाप हो गया हो तो आलोचना में उस पाप की शुद्धि हो जाती है । 

हमें ये शरीर मिला, इन्द्रियां मिली । हमें इनका उपयोग परमात्म भक्ति में ना करके स्वार्थ भक्ति में किया । हम इसे परमात्म भक्ति में लगाये । कल महापर्व सत्वत्सरी है । सभी अपने प्रतिष्ठान बंद रखें । पौषध स्वाध्याय करें । मौन करें । भीतर जो-2 भी गांठे बांधी है उन्हें खोल   दें । अगर गांठे खुल गई तो संसार छोटा हो जाएगा । कल के दिन क्षमा करना । क्षमा प्रभु महावीर का सर्वोच्च सिद्धान्त है । उन्होंने प्रत्येक प्राणी को मंगल की उपमा दी । चाहे वह कोई पशु पक्षी है या कोई मानव है सबके प्रति मंगल की भावना रखें । निन्दा करनी है तो अपनी निन्दा करना । सब प्राणियों को अपने समान समझना । हमारा किसी से विरोध नहीं है । हम सभी प्राणियों को अपना मित्र बनायें । जो क्षमा करता है वो वीर होता है । सभी धर्मों के सभी महापुरूषों ने क्षमा को महत्व दिया है । हम अपने भीतर करे ंअपने भीतर सभी के लिए मंगल कामना करें । दुःखीजनों के प्रति दया भावना । संसार के जीवों के प्रति माध्यस्थ भावना । गुणियों के प्रति प्रमोद भावना रखें और इन महापर्व पर्युषण को सफल बनायें । 

आगामी आत्म: विकास बेसिक कोर्स 10 से 14 सितम्बर, 2005 तक प्रातः 5.30 से 7.30 बजे एवं रात्रि 7.00 से 9.00 बजे तक कम्यूनिटी हाॅल, दीन दयाल उपाध्याय नगर, जालंधर में होगा । आप सभी जीवन जीने की कला सीखने के लिए सादर आमंत्रित हैं । रजिस्ट्रेशन हेतु सम्पर्क करें- 09872294875

 

विश्व मैत्री का पर्व है: सम्वत्सरी: आचार्य शिवमुनि

8 सितम्बर, 2005: जालंधर श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टध्र आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- आज का यह पावन पर्व महापर्व सम्वत्सरी आज के इस पावन अवसर पर मैं आप सबके लिए हार्दिक मंगल कामना करता हूॅं । यह पर्व आपके अन्तःकरण में तप की ज्योति एवं मैत्री का सागर भरे । जैन इतिहास में आज का पर्व सर्वोत्तम है । करूणा और मैत्री के मसीहा रूप में इस पर्व को माना जाता है । पर्वाधिराज पर्युषण की आराधना आप सबने बहुत सुन्दर ढंग से की । आज का दिन आप सबके लिए बहुत महत्वपूर्ण है । अपनी आलोचना, निन्दा करें । स्वयं शुद्ध हो जाए । आज का दिवस क्यों महत्वपूर्ण है क्योंकि यह दिवस वर्ष में एक बार ही आता है । आज के दिन की हुई आलोचना और शुद्धिकरण से व्यक्ति पवित्र और निर्मल हो जाता है । इस महापर्व का एक क्षण भी व्यर्थ न गवाएं । आज का दिन आत्मा की वर्षगांठ का दिन है । क्षमा का महापर्व है । जो व्यक्ति क्षमा करता है, क्षमा देता है तो वह शुद्ध हो जाता है । अन्तःकरण से क्षमा याचना करो । मन, वचन, काया, तीन करण, तीन योग से क्षमा याचना करो । भगवान महावीर की क्षमा बेजोड़ है । बड़े व्यक्ति सर्वप्रथम क्षमा करें । कहा भी है- क्षमा बड़न को होत है, छोटन को उत्पात । छोटे तो उत्पात मचाते रहते हैं बड़े हमेशा विशाल हृदय रखकर क्षमा धारण करें । 

अन्तकृतदशांग सूत्र के अनेक उदाहरण आपके समक्ष है । हमारी दृष्टि क्षमा की हो । मानव एक शक्ति है उसका प्रयोग निर्माण में लग जाए तो मोक्ष की ओर वह अग्रसर हो जाता है और विध्वंस में लग जाए तो वह संसार की ओर अग्रसर होता है । यदि आप जप, तप, मौन, ध्यान कर रहे हो तो आप मोक्ष के करीब जा रहे हो और आप दूसरांे को यातनाएं दे रहे हो । इन्द्रियों के भोग-भोग रहे हो तो संसार की ओर बढ़ रहे हो । भाग्यशाली होते हैं वे लोग जो आज के दिन दान, शील, तप, भावना की आराधना करते हैं । पौषध उपवास करते हैं । अध्यात्म प्रकरण में कहा है- 66 करोड़ उपवास का फल और एक कटु-वचन को समता से सहन करने का फल बराबर है । समता का फल अत्यधिक है । प्रभु महावीर के समक्ष गौतम और गौशालक दोनो ही खड़े थे । प्रभु ने दोनों पर ही समभाव रखा । हर परिस्थिति को शान्त-भाव से सहन करना यही प्रभु महावीर की सामायिक है । आज के दिन हम एकान्त में बैठकर आत्म-निन्दा करें, आत्म-आलोचना करें । सर्वप्रथम क्षमा याचना करें फिर सारे काम करें । सच्चे मन से अगर प्रभु की क्षमा हमारे भीतर आ गई तो हमारा यह जैन समाज स्वर्ग के समान हो जाएगा । 

क्षमा हमारा धर्म है, प्राण है, आत्मा है । हृदय से क्षमा याचना होती है । क्षमा याचना पथ दर्शन है जिसके हृदय में कोमलता, निर्मलता, क्षमा-भाव है वहां पर टूटा मन भी जुड़ जाता है । आज के दिन सरलता, ऋजुता लाइये । सबके लिए मैत्री की भावना भावित कीजिए । वीतरागता की ओर अग्रसर हो जाएं । आज के दिन हम प्रभु के धर्म का आरोहण करें । उन्मुक्त हृदय से दान दे । प्रतिक्रमण करें । जीवन का लेखा, जोखा देखें । साल भर में कितने दुराचार किए हैं, कितनी बार मन में राग भाव और द्वैष भाव आया उसका प्रतिक्रमण करें । प्रतिक्रमण यानि जो हमने अपने स्वभाव के विरूद्ध काम किए हैं उससे पीछे हटना । अगर प्रतिक्रमण के पाठ नहीं आते तो शुद्ध हृदय से अपनी की हुई गलतियों का पश्चाताप करें । आलोचना प्रतिक्रमण से जन्मों-2 के पाप सुधर जाते हैं । अरिहंत प्रभु की साक्षी से 18 पाप स्थानों में से जो कोई पाप किया है तो उसकी गुरू, भगवान के समक्ष आलोचना करें । 

श्रमण संघ के सभी संतवृंद एवं महासतीवृंद के प्रति मेरा वही मैत्री भाव है । आज मैं सबसे क्षमा याचना करता हूॅं । अनुशासन के लिए आवश्यक कदम उठाने पड़े उस समय किसी संत वृंद को कोई कष्ट पहुंचा हो तो मैं हार्दिक हृदय से क्षमा याचना करता हूॅं । मेरे बोलने से या कोई भी कार्य से पूरे श्रमण संघ के संत सतीवृंद से कोई किसी को तकलीफ हुई हो तो अन्तःकरण की साक्षी से क्षमा-याचना करता हूॅं । जो लोग तपस्या कर रहे हैं उनके प्रति मंगल कामना करता हूॅं ।

पर्वाधिराज पर्युषण के पावन दिवसों में श्रद्धेय श्रमण संघीय मंत्री श्री शिरीष मुनि जी महाराज ने अन्तृतदशांग सूत्र का सफल वांचन किया । उप प्रवर्तिनी महासाध्वी श्री संतोष कुमारी जी महाराज ने कल्पसूत्र का वांचन किया । आचार्य भगवंत के शुभ सान्निध्य में उपवास, आयम्बिल, एकासनों की लगभग 100 अटाईयां सम्पूर्ण हुई एवं अठाई से आगे की कई भाई बहिन तपस्या में संलग्न हैं । महामंत्र नवकार का अखण्ड जाप आठ दिन निरन्तर चलता रहा, उसमें भी सभी भाई बहिनों ने सहयोग दिया । 

आज के इस पावन दिवस पर श्रमण संघीय मंत्री श्री शिरीष मुनि जी महाराज ने सत्वम्सरी पर प्रकाश डालते हुए 90 महान् आत्माओं ने जिस प्रकार मुक्ति को प्रकार किया उसी प्रकार हम भी मुक्ति की ओर अग्रसर हों । वीतरागता में आएं ये भावनाएं अभिव्यक्त की । उप प्रवर्तिनी महासाध्वी श्री सावित्री जी महाराज ने सम्वत्सरी का इतिहास बतलाया । उप प्रवर्तिनी महासाध्वी श्री संतोष कुमारी जी महाराज ने कल्पसूत्र की वांचना पूर्ण करते हुए महापर्व सत्वम्सरी पर प्रकाश डाला । महासाध्वी श्री संचिता जी महाराज ने भजन के द्वारा अपनी भावनाएं अभिव्यक्त की । श्री एस0 एस0 जैन बहु मण्डल, शिवाचार्य संगीत मण्डल, श्वेताम्बर जैन युवा कान्फ्रेन्स, एवं शिवाचार्य चातुर्मास समिति के मंत्री महोदय ने अपनी भावनाएं संगीत के द्वारा अभिव्यक्त की । 

दोपहर में 3.00 से 4.00 बजे सामूहिक आलोचना का कार्यक्रम हुआ जिसके अन्तर्गत अनेकों भाई बहिनों ने अपने व्रतों में लग हुए दोषों का शुद्धिकरण करते हुए अपनी आत्म-आलोचना की । सायंकाल को अनेकों भाई बहिनों ने प्रतिक्रमण की आराधना करते हुए स्वयं को शुद्ध और निर्मल बनाया । 

आगामी आत्म: विकास बेसिक कोर्स 10 से 14 सितम्बर, 2005 तक प्रातः 5.30 से 7.30 बजे एवं रात्रि 7.00 से 9.00 बजे तक कम्यूनिटी हाॅल, दीन दयाल उपाध्याय नगर, जालंधर में होगा । आप सभी जीवन जीने की कला सीखने के लिए सादर आमंत्रित हैं । रजिस्ट्रेशन हेतु सम्पर्क करें- 09872294875

 

मानव का स्वभाव समता: आचार्य शिवमुनि

10 सितम्बर, 2005: जालंधर {  दैनिक जागरण  }  श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टध्र आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- प्रभु की याद, प्रार्थना, चिन्तन, मनन जो भी व्यक्ति किसी भी स्थान पर करता है तो वह उसका फल अवश्य प्राप्त करता है । जिस व्यक्ति का लक्ष्य केवल प्रभु भक्ति हो वह व्यक्ति अपने जीवन को सफल कर लेता है । यह प्रेम और भक्ति का प्याला वही पीता है जो मानव की सार्थकता को जानता है । सत्संग में आने से व्यक्ति सत्य की ओर आगे बढ़ता है । सत्गुरू हमें सत्संग की ओर लेे जाते हैं । बुद्धिमान पुरूष वही है जो मन की शुद्धि करके इन्द्रियों पर विजय प्राप्त करता है । सर्वोच्च है मन की शुद्धि प्राप्त करना । मन इन्द्रियों का संचालक है । मन जो कहता है वही इन्द्रियां करती है । अगर शरीर के किसी हिस्से में खुजली हो रही हो तो मन तुरन्त हाथ को आदेश देता है और हाथ वह कार्य कर लेता है । यह कार्य पलक झपते ही सम्पूर्ण हो जाता है । मन पर वही काबू प्राप्त कर सकता है जिसकी इन्द्रियां अपने वश में हो । जैसे एक पंगु पुरूष इच्छा करे कि मैं एक गांव से दूसरे गांव पैदल जाऊं तो यह एक हसी जैसी बात हो जाएगी । पंगु पुरूष ऐसा कार्य कर नहीं सकता इसी प्रकार कोई व्यक्ति कहे कि मैं मन को वश में ना करूं और सारे काम करूं यह संभव नहीं हो सकता है । एक श्रावक मन को गोपन करने का प्रत्याख्यान नहीं करता । वचन और काया का प्रत्याख्यान करता है तो वह ऐसा प्रतीत होता है जैसे बिना नींव का मकान हो । मकान बिना नींव के नहीं टिक सकता । अनेकों महापुरूष कहते हैं मन को मारो, मन को साधो । कोई कहता है मन की इच्छाएं पूरी करते चले जाओ । पर प्रभु ने फरमाया ना मन को मारो, ना उसकी इच्छा पूरी करो । मन के भीतर उठने वाले हर विचार को देखकर उसे छोड़ दो । जिसने मन को साध लिया उसने सब कुछ साध लिया । साधक जो भी कार्य करे सर्वप्रथम मन पर ध्यान दें । यदि मन समताभाव में आ गया तो सामायिक हो जाएगी । समता-भाव की साधना ही सामायिक है । आपकी 48 मिनिट की सामायिक है और हमारी जीवन भर की सामायिक है । 48 मिनिट में पांच मिनिट भी समभाव आ गया तो आपकी साधना सही दिशा में अग्रसर होगी । सब कार्य करते हुए सुबह शाम सामायिक अवश्य करो । सामायिक करने से चित्त और मन नहीं बदला तो आपकी सामायिक सही नहीं है । समताभाव का उल्लंघन करने से साधक सिद्ध अवस्था तक नहीं पहुंच पाता । समताभाव यानि मन में राग और द्वैष का भाव ना होना । जो जैसा है उसके साथ सहमत रहना, स्थिर चित्त में रहना । ध्यान साधना से समभाव जल्दी आता है । आसन, प्राणायाम से भी मन को साधा जा सकता है । एक ताला है उसे पत्थर से तोड़ो या चाबी से खोलो, पत्थर से तोड़ना यानि धीरे-2 कार्य करना और चाबी से खोलना यानि समभाव, समता से कार्य करना । किसी बिल्डिंग के ऊपर जाना हो तो लिफ्ट से जाओगे तो जल्दी पहुंच जाओगे और सीढ़ी से जाओगे तो धीरे-2 पहुंचोगे । लिफ्ट समभाव की भांति है जो आपको अपनी सिद्धि तक जल्दी पहुंचाती है । मन शुद्धि के लिए शरीर शुद्धि आवश्यक है । शरीर शुद्धि में आहार का बहुत महत्व है । हम कामोत्तेजक, गरिष्ठ भोजन का त्याग करें । भूख से कम खाएं । भोजन पर नियंत्रण रखें । आजकल व्यक्ति डिब्बा बंद भोजन करते हैं जिससे हमारा शरीर बीमारियों का घर बनता चला जा रहा है । हम ऐसा भोजन करें जो हमारे समभाव में सहायक हो । वचन शुद्धि के लिए मीठे वचन बोलना, थोड़ा बोलना, गलत नहीं बोलना । हो सके तो मौन रहना । फिर मन को ध्यान के द्वारा साधना । पन्द्रह मिनिट की समता आ गई तो आप समाधि की ओर आगे बढ़ जाओगे । करोड़ों भवों की तपस्या से जो कर्म क्षय नहीं होते वे अन्तर मुहूर्त के समताभाव से हो जाते हैं । तीव्र आनंद को उत्पन्न करने वाला समता का जल छिड़कते ही राग रूपी राक्षस शान्त हो जाते हैं । समता हमारा धर्म है, आनंद है, हमारे जीवन का लक्ष्य और हमारे जीवन की साधना है । अरिहंत प्रभु, सिद्ध प्रभु आनंद में मग्न हैं । वे हर समय वीतरागता के भाव में रहते हैं जिस प्रकार फूल 24 घण्टे सुगंध में रहता है और सुगंध देता है । फूल एक क्षण भी बिना सुगंध के नहीं रहता । फूल का स्वभाव सुगंध देना । चाहे फूल कही ंपर भी खिले । फूल कांटे की परवाह नहीं करता । उसी प्रकार मानव का स्वभाव आनंद में रहना है । क्रोध, राग, द्वैष हमारा स्वभाव नहीं है । हमारा स्वभाव तो परम तत्व आनंद रूप, अनंत ज्ञान, अनंत दर्शन और समता का है । मानव ही एक ऐसा प्राणी है जो समता में रह सकता है । पशु पक्षी समता को धारण नहीं कर सकते । चण्डकौशिक को प्रभु ने जगाया था तब उसके भीतर समभाव आया । प्रभु का एक वचन चण्डकौशिक को शान्ति और समता की ओर ले गया । प्रभु की वाणी से अनेक कर्मों का क्षय होता  है । समताभाव में अगर मृत्यु होती है तो वह व्यक्ति देवलोक जाता है । चुनाव हमारा है कि हम समता मे रहे या राग द्वैष में उलझे । समता में रहना है तो प्रभु की भक्ति, उनके गुणों का चिन्तन करो । लोगों के कष्ट देने पर भी आप समभाव में रहते हो तो वही आपकी समता है । हम सब समता भाव की आराधना करें जिससे हम सिद्ध गति की ओर अग्रसर हो सकते हैं ।

 

मन शुद्धि के लिए प्राणायाम अपनाएं: आचार्य शिवमुनि

11 सितम्बर, 2005: जालंधर {  दैनिक जागरण  }  श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टध्र आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- मन शुद्धि के लिए योगा, प्राणायाम  अपनाएं । प्राणायाम से हमारा नाड़ी संस्थान ठीक होता है । हमारे भीतर पांच प्रकार की वायु है जब हम प्राणायाम करते हैं तो वह वायु शुद्ध होती है । जब हम प्राणायाम करते हैं तो पांच हजार सीसी श्वांस भीतर लेते हैं और जब हम सामान्य अवस्था में होते हैं तब हम चार सौ से पांच सौ सीसी श्वांस लेते हैं । हम मन के मालिक बनें । अगर हम मन के मालिक बन गए तो हमारा यह जीवन सुधर जाएगा और रोग भी ठीक हो जाएंगे और हम मोक्ष के किनारे चले जाएंगे । 

आचार्यश्रीजी ने आगे कहा कि- गुरू से प्यार का अर्थ क्या है ? प्यार का मतलब यह नहीं कि उसके पास हम बैठे । उसे देखते  रहें । हर समय उसके साथ रहे । जब भीतर उनके प्रति इतना प्रेम और भक्ति आती है तो उसका स्वरूप याद करने की आवश्यकता नहीं । उसे देखने की आवश्यकता नहीं । उसका नाम जपने की जरूरत नहीं । वह अजपा जप है । सत्गुरू से प्यार किया नहीं जाता, हो जाता   है । खलिल जिब्रान ने कहा है जब मुझे प्रेम का अनुभव हुआ तो मैं प्रेम की व्याख्या ही भूल गया । जब खलिल जिब्रान को प्रेम का अनुभव नहीं हुआ था तो वे प्रेम की बहुत बड़ी-2 व्याख्याएं करते थे । 

वर्तमान समय में प्रेम का अर्थ गलत हो गया है । प्रेम में गिरना नहीं है उठना है । अगर प्रेम में गिर गए तो संसार की ओर आगे बढ़ जाओगे और उठ गए तो निर्वाण की ओर आगे बढ़ जाओगे । मन को साधो । मन को साधना कठिन है । मन को वायु के समान चंचल कहा गया है । जिस प्रकार वायु एक जगह टिक नहीं सकती उसी तरह मन हर समय घूमता रहता है । मन एक दुष्ट घोड़े की तरह है जिसे अंकुश करना बहुत मुश्किल है । मन को ध्यान के द्वारा शुभ, विचारों से साधा जा सकता है । मानव का मन बंधन बांधता है और मोक्ष की ओर भी आगे बढ़ता है । वह बंधन से टूटना भी जानता है । अगर मन चंचल है तो वह मोक्ष को प्राप्त नहीं कर सकता चाहे उसके पास सत्गुरू ही क्यों न हो । जिस प्रकार शीशे पर धूल लगी हुई है । धूल को जब तक नहीं हटायेंगे तब तक अपना प्रतिबिम्ब दिखाई नहीं देगा । उसी प्रकार आत्मा के ऊपर जब तक कर्म मैल लगी है तब तक परमात्मा के दर्शन नहीं होंगे ।

परमात्म प्राप्ति के लिए हृदय की प्रांजलता आवश्यक है । हमारा लक्ष्य मन शुद्धि का हो । आज कई श्रावक श्राविकाएं ऐसे हैं जो सामायिक जो करते हैं पर उनका मन स्थिर, शुद्ध नहीं है । वे ध्यान का सहारा लेकर जिस प्रकार पुराने मकान में जाले लगे हुए हैं । भीतर प्रकाश नहीं है । जहरीले जानवर है जब तक उस मकान को साफ नहीं किया जाएगा तब तक वह साफ नहीं होगा । इसी प्रकार हम अपने मन को भी शुद्ध करें । हमेशा स्वयं के बारे में सोचे । सारी जिन्दगी दूसरों के बारे में सोचते रहे कि दूसरे क्या कहेंगे, वह क्या करता है, केसे रहता है । हम स्वयं को देखें । स्वयं के बारे में सोचे । 

आज आचार्यश्रीजी के दर्शनार्थ श्रद्धालुओं का सागर उमड़ पड़ा जिसमें महाराष्ट्र श्री सुरेशदादा जैन के माताजी श्रीमती प्रेमबाई जी जैन, लुधियाना, फरीदकोट, जगराओं, रोपड़, पंचकूला, परवाणु, मुकेरियां आदि कई स्थानों से भाई बहिन उपस्थित थे । आचार्यश्रीजी के सान्निध्य में 17-18 सितम्बर, 2005 को अखिल भारतीय स्तर पर श्रावक सम्मेलन होने जा रहा है जिसमें भारत भर से अनेक श्रद्धालुजन सम्मेलन में भाग लेने हेतु पहुंच रहे हैं । 18 सितम्बर, 2005 को आचार्यश्रीजी का जन्म दिवस गुणगान सभा के रूप में मनाया जाएगा । आज आचार्यश्रीजी के जन्म दिवस के उपलक्ष्य में ‘प्रश्न मंच’ का आयोजन हुआ जिसमें अनेकों श्रद्धालुओं ने भाग लेकर अपने ज्ञान में अभिवृद्धि की । 

 

श्रावक अणुव्रतों को ग्रहण करें: आचार्य शिवमुनि

12 सितम्बर, 2005: जालंधर  श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टध्र आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि-हम सबको यह अनमोल मानव जीवन  मिला । यह जीवन हीरे के समान है । हीरा हमारे पास हो और उसकी कीमत हमें पता ना हो तो समझ सकते है कि वह व्यक्ति अज्ञानी है । प्रभु महावीर ने दो धर्म बतलाये । अणगार धर्म और आगार धर्म । जितनी हम इन दोनो धर्मों की आराधना करते हैं उतने हम ऊंचे चले जाते हैं । साधु पंच महाव्रतधारी होता है, तो श्रावक बारह अणुव्रतों को ग्रहण करता है । कम से कम श्रावक को पांच अणुव्रत तो ग्रहण करने ही  चाहिए । 

श्रावकों के पांच अणुव्रतों में प्रथम अणुव्रत है अहिंसा । सभी प्राणियों के प्रति मैत्री का भाव ही अहिंसा है । किसी को गाली देना भी हिंसा है । हिंसा को अहिंसा से जीत लो । एक खम्भा है और आप सामने से जा रहे हो । आप खम्भे से टकराओगे या अलग हो  जाओगे । एक संकड़ी गली से आप जा रहे हो । सामने से एक जंगली भैंसा आ रहा है । आप उससे टकराओगे या अलग हो जाओगे और सामने से एक क्रोधी व्यक्ति आपके समक्ष आ रहा है । आप उससे टकराओगे या अलग हो जाओगे । प्रथम के दोनों प्रश्नो का उत्तर शायद आप अलग ही दोगे । परन्तु अन्तिम प्रश्न के उत्तर में हम हमेशा टकराते हैं । अगर कोई हमें गाली देता है और हम वह स्वीकार नहीं करते तो वह हमारी नहीं हो पाती । क्रोध को क्षमा से जीत लो । जिसने क्रोध को जीत लिया वह धर्म में स्थापित हो  गया । कमठ और भगवान पाश्र्वनाथ का जीवन आप सबके समक्ष है । कमठ ने हर भव में प्रभु पाश्र्वनाथ की निन्दा की और प्रभु उसे हर भव में क्षमा करते चले गए । परिणाम यह आया कि प्रभु तीर्थंकर अरिहंत पद को प्राप्त हुए और कमठ नीचे से नीचे गिरता चला गया । 

गलती सबसे होती है पर क्षमा करना हमारा धर्म है । अगर किसी से कुछ गलती होती है तो हम उसे प्रेमपूर्वक समझाये और उसे आगे से ऐसी गलती ना करने का निर्दश दें । जान-बूझकर हिंसा नहीं करना, शान्ती, समता और प्रेममय जीवन यापन करना । सोने को काटो, पीटो, उसे अग्नि में डालो, उसकी कीमत घटती नहीं है । वृक्ष पर पत्थर मारो तो वह फल देना बंद नहीं  करता । मानव की श्रेष्ठता इसी बात पर आधारित है कि वह उत्तेजित न हो, शान्ती से जीवन यापन करें । अरिहंत प्रभु परमात्म तत्व में विराजमान हैं । वे अनंतज्ञान, अनंत दर्शन, अनंत चारित्र रूप है । हमारी दृष्टि भी सम्यक् हो गई तो हमें भी अनंत-ज्ञान प्राप्त हो सकता है । दृष्टि हो तो समता और ममता दोनों दिखाई देती है । अरिहंत की वाणी निर्मल है । प्रेम, धर्म और कर्म तीनों बातें प्रभु की वाणी में आती है । अगर हम प्रेेम को भक्ति में लगा देते हैंे तो धर्म की ओर अग्रसर हो जाते हैं और प्रेम को संसार में लगा दें तो हम कर्म की ओर अग्रसर होते हैं । मानव कर्म करते हुए सोचता नहीं है । छोटी-2 बातों पर कर्म बंधन करता है । 

तीर्थ की निन्दा नहीं करना । श्रावक-श्राविका, साधु-साध्वी चतुर्विध तीर्थ रूप है । तीर्थ वह है जो तीरने वाला है । तिराने वाले तीर्थंकर हैं । तुम प्रभु को याद करो । उनकी भक्ति करो तो तुम तिर  जाओगे । श्रावक दूसरे अणुव्रत में सत्य का पालन करे । मोटे झूंठ का त्याग और छोटे झूंठ का विवेक  करें । तीसरे अणुव्रत में बिना दी हुई वस्तु ग्रहण नहीं करे । कुछ वस्तु चुराने से व्यक्ति करोड़पति नहीं हो जाता । चैथे अणुव्रत में श्रावक पराई स्त्री का त्याग करें । आवश्यकता से अधिक वस्तुओ को ग्रहण न  करें । साधु अपने जीवन में साधना के पथ पर अग्रसर हो जाएं । सामायिक की शुद्ध-विधि सीखें । 

 

मन की शान्ति से चित्त समाधिस्थ होता है: आचार्य शिवमुनि

13 सितम्बर, 2005: जालंधर {  अमर उजाला  }  श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- एक मन्दिर के ऊपर पताका लहरा रही थी । दो भिक्षु वहां पर आए । उन दोनो मंे विवाद छिड़ गया कि पताका कौन हिला रहा है । एक ने कहा- यह अपने आप हिल रही है और दूसरे ने कहा इसे हवा हिला रही है । दोनों के विवाद का कोई अंत नहीं हो रहा था तब वे दोनो मन्दिर के पुजारी के पास समाधान हेतु पहुंचे । पुजारी ने समाधान देते हुए कहा कि यह पताका तुम्हारे मन के कारण हिल रही है । तुम्हारा मन डावांडोल, अस्थिर है इसलिए यह पताका हिल रही है । यह स्थिति उन दोनो भिक्षुओं की ही नहीं हमारी भी है । जब तक हमारा मन शान्त, समता और स्थिर चित्त में नहीं होगा तब तक हमारे प्रश्नों का सुन्दर समाधान हमें प्राप्त नहीं होगा । 

मन चलायमान है तो लगता है कुछ भी स्थिर नहीं है । मन शान्त, समाधिस्थ है तो शोरगुल नजर नहीं आता । मन को शान्त करो । जब-2 क्रोध, मोह, राग आए तब तुम्हें कुछ नहीं करना । जब मन चंचल होता है तो कुछ न कुछ करता रहता है । जिनका मन अशान्त है वे इधर उधर देखते रहते हैं । जब भीतर गुस्सा आए तो उस नेगेटिव एनर्जी को बाहर निकाल दो । मन को शान्त रखने का सरल उपाय है ब्रह्म मुहूर्त में उठकर प्रभु की भक्ति करो, उगते हुए सूरज को शान्त भाव से देखो । अनुभव होगा कि सूरज हमारे भीतर प्रवेश कर रहा है । आवश्यकता है हमारा मन शान्त होना चाहिए । सूरज लाखों प्रकाश वर्ष दूर है पर जब मन शान्त होता है तो लगता है कि सूरज हमारे भीतर प्रवेश कर रहा है । जब सूरज चन्द्रमा फूल की सुगंध हमारे भीतर प्रवेश कर सकते है, हमें आनंदित कर सकते है तो क्या परमात्मा अरिहंत हमारे भीतर नहीं आ सकते ? आ सकते हैं । जिसको पुकारो वह आ सकता है । तुम्हारा चित्त, शान्त, सरल हो, मैत्री से भरा हो तो परमात्मा भी भीतर प्रवेश करेंगे ।

रात्रि के समय जब आप सोने के लिए जाओ तो शान्तभाव से बैठकर दिन के सारे उतार चढ़ाओ को देखो । यह मन कहां-कहां भागा । मन भागता है एक बात सोचो तो दो बातें और सोच लेता है । मन एक अतीत का संग्रह है । उसके भीतर कामनाएं, वासनाएं भरी हुई है । भूत, भविष्य उसके भीतर विद्यमान है । हमें इसे महत्व नहीं देना । मन को काबू में करो । लोभ, मोह के जो संस्कार भीतर भरे हैं उन्हें बाहर निकालो । हमारा जिस चीज पर ध्यान ज्यादा जाता है वह चीज बिखर जाती है । तुम मन की मत सुनो, अपनी आत्मा की सुनो । मन एक बंदर की भांति है वह उछलता, कूदता है । मन को किसी आलम्बन में बांध दो । मन को टिकाने का एक साधन है  श्वांस । श्वांस पर देखते रहो तो मन शान्त और चित्त समाधिस्त हो जाएगा । केवल श्वांस को देखो । श्वांस देखने से मन की बैचेनी हट जाती है। हमारा संकल्प और प्रतिज्ञा होनी चाहिए । अगर फिर भी मन बैचेन हो रहा है तो लम्ब, गहरा श्वांस लो । ऊॅंकार का आलम्बन लो । धर्म का मार्ग सरल है । जिसने मन को साधा उसने परमात्मा को प्राप्त कर लिया है । 

एक कसौटी है शुद्ध आत्मा है तो भीतर आनंद होगा । तुम दूसरों को आनंद दोगे और तुम्हारे हाथ स्वयं जुड़ जाएंगे । सब इच्छाएं, परम्पराएं, संकल्प, विकल्प जब तिरोहित होते हैं तो आनंद आता है । संकल्प, विकल्प दुःखों की जड़ है । मन प्रतिपल प्रतिक्षण संकल्प विकल्प करता है पर जो धर्म की राह पर आगे आता है उसके संकल्प विकल्प धीमे पड़ जाते हैं और तुम अपने स्वभाव में लीन रहते हो । जब तुम अपने स्वभाव में लीन हो जाओगे तो एक योगी की भांति अपने तत्व के द्वारा अपनी आत्मा से स्वयं को जानते हो । 

 

ध्यान द्वारा विश्व शक्ति की प्राप्ति होती है: आचार्य शिवमुनि

14 सितम्बर, 2005: जालंधर श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने मन की चंचलता के विषय में उसे साधने के लिए क्या उपाय करने चाहिए यह बतलाते हुए कहा कि- मन शान्त है तो सारी पृथ्वी शान्त नजर आती है । मन को साधने के लिए ध्यान एक उत्तम उपाय है । जब व्यक्ति मानसिक रोगों से गिर जाता है तब वह दवाईयों का आलम्बन लेता है उस समय वही व्यक्ति किसी गुरू के निर्देशन में अगर ध्यान का प्रयोग करे तो वह कुछ ही क्षणों में ठीक हो सकता है । यह जगत और कुछ नहीं हमारे मन का प्रतिबिम्ब है । पर्वत, नदियां, चांद, सूरज, पौधे तभी अच्छे लगते हैं जब हमारा मन शान्त होता है और इनके अनुकूल होता है । जब हम थोड़ा सा प्रतिकूल चलते हैं तो यह सब अशान्त सा नजर आता है । यहां पर हमने जन्म धारण किया । यह शरीर, धर्म मिला ।

हम सिर्फ जीने के लिए जी रहे हैं । अगर हम इस जीवन द्वारा कुछ प्राप्त करना चाहे तो हम कभी भी दुःखी या पीड़ित नहीं होंगे । एक गुरू ने शिष्यों से पूछा कि किसका प्रकाश अधिक  है । एक शिष्य ने उत्तर दिया, सूरज का, दूसरे ने दिया चांद का, तीसरे ने दिया दीपक का । सबकी अलग-2 धारणाएं थी । सच मानो तो प्रभु वीर की वाणी में भीतर का प्रकाश अधिक है । अगर हमें भीतर का ज्ञान हो जाए । तीसरा नैत्र खुल जाए तो उससे हम अध्यात्म जगत की यात्रा कर सकते हैं । अध्यात्म जगत की यात्रा के लिए ध्यान एक सुन्दर आलम्बन है । ध्यान में बैठने पर हमें बहुत ज्यादा विश्व शक्ति मिलती है । जो काम दवाई से नहीं होता वह ध्यान से हो जाता है । हमारे मन के उपर अनेक ऐसी छोटी-2 बातें लगी हुई है जो धीरे-2 रोग का रूप धारण करती है, उनका निवारण केवल ध्यान के द्वारा हो सकता है । जब हमें गुस्सा आए । आंखे लाल हो जाए तब हम अपने श्वांस को देखें । बुद्ध की आनापान पद्धति श्वांस पर आधारित है । 

प्रभु महावीर ने भी फरमाया कि श्वांस को देखने से भीतर के सब विकार निकल जाते हैं । एक योगी एक आसन में स्थिर बैठकर श्वांस, आज्ञा चक्र, नाभि चक्र पर ध्यान करें तो उसका मन शीघ्र ही शान्त हो जाएगा । हम मन को साधे । एक छोटे से हथियार से व्यक्ति स्वस्थता और मृत्यु को प्राप्त कर सकता है । डाॅक्टर हथियार के द्वारा हमें जीवन दान देता है । स्वस्थ बनाता है और एक अज्ञानी उसी हथियार के द्वारा मौत के घाट तक ले जाता है । आवश्यकता है हम उसे किस प्रकार उपयोग करें । जब कोई चीज हमारे हाथ में आती है तो मन उस पर प्रतिक्रियाएं करना शुरू कर देता है । हम उस प्रतिक्रियाओं में न उलझते हुए स्वयं को समता में ले आएं । मन जो नहीं करना चाहिए उसे करना चाहता है और जो करना चाहिए उसे नहीं करता । महर्षियों मुनियों ने मन को साधने के लिए अनेक उपाय बतलाये हैं । हम मन को साधे । मानव की चेतना और आत्मा के द्वारा सब कुछ हो सकता है । इस जग में असंभव जैसी कोई बात नहीं है । अहंकार को विलीन कर दें । मन की तारों को उलझाये नहीं उन्हें सुलझाएं और श्वांस के द्वारा समाधि को प्राप्त करें । 

आचार्यश्रीजी के सान्निध्य में 17-18 सितम्बर, 2005 को अखिल भारतीय स्तर पर श्रावक सम्मेलन होने जा रहा है जिसमें भारत भर से अनेक श्रद्धालुजन सम्मेलन में भाग लेने हेतु पहुंच रहे हैं । 18 सितम्बर, 2005 को आचार्यश्रीजी का जन्म दिवस गुणगान सभा के रूप में मनाया जाएगा । आज आचार्यश्रीजी के जन्म दिवस के उपलक्ष्य में ‘प्रश्न मंच’ का आयोजन हुआ जिसमें अनेकों श्रद्धालुओं ने भाग लेकर अपने ज्ञान में अभिवृद्धि की ।  आज आचार्यश्रीजी के दर्शनार्थ श्रद्धालुओं का सागर उमड़ पड़ा जिसमें पूना, मण्डीगोविन्दगढ, फरीदकोट, जगराओं, रोपड़, पंचकूला, परवाणु, मुकेरियां आदि कई स्थानों से भाई बहिन उपस्थित थे ।

 

शील, सदाचार से एड्स से बचा जा सकता है: आचार्य शिवमुनि

15 सितम्बर, 2005: जालंधर श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज के जीवनोपयोगी एवं सारगर्भित प्रवचन प्रतिदिन शिवाचार्य सत्संग स्थल, लक्ष्मी पैलेस, गाजी गुल्ला रोड़ पर चल रहे हैं । आज के अपनेे मंगलमय प्रवचन में उन्होंने फरमाया कि- भारतवर्ष अध्यात्म देश रहा   है । भगवान महावीर, राम, कृष्ण, गुरूनानक जैसी महान् आत्माओं ने यहां पर जन्म  लिया । अपने धर्म और दर्शन से उन्होंने भारत को समृद्ध बनाया । भगवान महावीर की अहिंसा, अनेकान्त, जीवन जीने की शैली को प्रभावित करती है । भगवान बुद्ध की करूणा और मैत्री, गुरूनानक का नाम सिमरन, हिन्दू संस्कृति में कृष्ण का कर्म योग, ज्ञान योग और भक्ति योग हमें धर्म की ओर ले जाता है । हिन्दू संस्कृति में जीवन को चार हिस्सों में बांटा गया   है । ब्रह्मचर्य आश्रम, गृहस्थ आश्रम, वानप्रस्थ आश्रम और सन्यास आश्रम । व्यक्ति 25 वर्ष तक ब्रह्मचर्य का पालन    करें । 50 वर्ष तक गृहस्थ धर्म का पालन करें । 75 वर्ष तक वानप्रस्थ आश्रम का पालन करें और उसके पश्चात् बची हुई उम्र में सन्यास आश्रम में रहे । जीवन जीने की पद्धति भारतीय संस्कृति ने सबको दी । 

भारत सर्वोच्च देश है जहां पर अध्यात्मिकता का संदेश सबको मिल रहा है । स्वामी विवेकानंद जैसी महान् आत्माओं ने अमेरिका में जाकर अपनी संस्कृति को नहीं भुलाया और वही वेशभूषा वहां पर अपनाई । भारत के धर्मों को सर्वोच्च स्थान प्राप्त हुआ है परन्तु आज समय का परिवर्तन हो रहा है । युवा पश्चिमी सभ्यता की ओर अग्रसर हो रहे हैं । खानपान, रहन-सहन पश्चिमी अपना रहे हैं इसीलिए हमारे शरीर के भीतर बीमारियां उत्पन्न हो रही   है । सभी बीमारियों मे ंसबसे भयंकर बीमारी है एडस । एच0आई0वी0 पाॅजेटिव खून अगर हमारे शरीर में चला जाए तो हमें यह बीमारी होती है । इस खून के कारण हमारी श्वेत कोशिकाएं कमजोर होती है और रोगी एड्स से संक्रमित हो जाते हैं । एड्स का मुख्य कारण सेक्स है और वह सेक्स प्रभावित हुआ है पश्चिमी सभ्यता से । हमारे ऋषियों, मुनियों ने मर्यादित जीवन जीने के लिए कहा । हमारे जीवन में संयम नहीं है । 

अगर कोई व्यक्ति प्रभु महावीर के श्रावक धर्म को अंगीकार करें तो उसे एड्स नहीं हो सकता । अगर यह बीमारी किसी व्यक्ति को है तो वह वफादारी बरतते हुए अपने साथीजनों को अपनी बीमारी के बारे में बतलाये । पति पत्नी दोनों के प्रति वफादार रहे । रक्त की आवश्यकता पड़ने पर अपने परिवार से रक्त ले । अस्पताल में डिस्पोजेबल इंजेशन का प्रयोग करें । हाथों में रबर के दस्ताने पहनने के अनन्तर ही इंजेक्शन का प्रयोग करें । कोई लेडीज अगर ब्यूटी पार्लर जाती है तो वहां पर सभी प्रकार के औजरों की सफाई देखते हुए कार्य करें । कुछ लोग ब्लेड को वैसे ही प्रयोग कर लेते हैं यह बीमारी इन्हीं कारणों से फैलती है । एड्स इतना खतरनाक नहीं है कि हम उस व्यक्ति से नफरत करे । हमें उस बीमारी और उससे संक्रमित व्यक्ति के प्रति सहानुभूति अपनानी चाहिए । हम ऐसे व्यक्तियों की मदद करें । उन्हें सही स्थान पर ले जाएं । दवाई और धन की आवश्यकता हो तो उसकी सहायता करें । एड्स नशे से होता है । आजकल गुटखा, पान, पराग आदि जो खाते है वह नहीं खाना चाहिए । नशा नहीं करना चाहिए । यह शरीर नशा करने से व्याधियों का मन्दिर बन जाता है । डाॅक्टरों को इस बीमारी के बारे में सारी बातें पता होनी चाहिए । वे स्वयं अपना सादा जीवन और सात्विक आहार अपनाएं और लोगों को भी ऐसी प्रेरणा दे । आज पूरे विश्व में मानव बीमारियों का घर बन चुका है । 

फिल्मों में गलत और गंदे सीन दिखाने के कारण व्यक्ति उस राह पर चल रहा है । हम भारत की संस्कृति को अपनायें, गांधीजी के आदर्शों को अपनाएं । एड्स की रोकथाम के लिए ध्यान एक सुन्दर साधन है । मैत्री और प्रेम, करूणा से यह बीमारी दूर हो सकती है । प्रभु ने कहा सभी प्राणियों के प्रति मंगल कामना करो । संसार के सभी प्राणियों को अपना मित्र बनाओ । बुद्ध की करूणा और मोहम्मद का भाईचारा भी यही कहता है । मैं आपसे सबसे अनुरोध करूंगा कि हम सादा भोजन करें । प्रेम से भोजन ग्रहण करें । उत्त्ेजित पदार्थों का सेवन न करे । ऐसे पेय पदार्थों का उपयोग ना करें जो हमारे शरीर में कमजोरी उत्पन्न करते हो । एड्स की रोकथाम के लिए ध्यान के साथ-2 आसन और प्राणायाम भी बहुत उपयोगी है । प्रभु ने गौ-दुहासन के द्वारा केवलज्ञान को प्राप्त किया । आसन करते वक्त हमारे शरीर में अमृत प्रवेश करता है । प्राणायाम करने से हमारा रक्त शुद्ध होता है । दस मिनिट के प्राणायाम से भीतर एक नई चेतना आती है । डाॅक्टर लोग सेवा का कार्य कर रहे हैं वे हर बीमार व्यक्ति से बातचीत करें । बातचीत से ही आधी बीमारियां ठीक हो जाती है और डाॅक्टर बीमार व्यक्ति को ध्यान, प्राणायाम, योगासन, सात्विक आहार करने की प्रेरणा दें । आजकल बीमार व्यक्ति डाॅक्टर की बात अवश्य मानते   हैं । जीवन का आधार शील, सदाचार और संचमित जीवन है । विश्व शक्ति द्वारा आज हर बात संभव है, इसलिए हम ध्यान साधना को अपनाएं । 

 

भक्ति रूपी रसायन से आपत्तियां दूर होती है: आचार्य शिवमुनि

16 सितम्बर, 2005: जालंधर  श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज के जीवनोपयोगी एवं सारगर्भित प्रवचन प्रतिदिन शिवाचार्य सत्संग स्थल, लक्ष्मी पैलेस, गाजी गुल्ला रोड़ पर चल रहे हैं । आज के अपनेे मंगलमय प्रवचन में उन्होंने फरमाया कि- आज संक्रांति का दिवस है । संक्रांति जीवन में संक्रमण लेकर आती है । सूर्य आज एक राशि से दूसरी राशि में संक्रिमित हुआ है । हम भी अपने जीवन को आगे बढ़ायें । संक्रांति हमें आगें बढ़ने की प्रेरणा देती है । आज सूरज सिंह राशि से कन्या राशि में प्रवेश हुआ है । आसोज का महीना है शुक्रवार का दिन, 16 सितम्बर, 2005 है, खूब धर्म ध्यान करें । अगली संक्रांति तक सिद्धों का स्मरण करें । 

प्रभु भक्ति का रस जब हृदय के भीतर आहल्लादित होता है तब भीतर का अंग भीग जाता है । अंग-2 प्रभु के गुणों से सराबोर हो जाता है । भक्ति एक ऐसा रसायन है कि व्यक्ति आपत्तियों में उसका लेकर पार हो सकता   है । जीवन में कितने ही कष्ट आ जाए घबराना मत । प्रभु नाम का सहारा लेना । आनंद की प्राप्ति होगी, जो कष्ट आ रहे हैं उसे सहजता से स्वीकार करने से हमारा जीवन सहज हो जाता है । जितने भी संकट आए वे सब प्रभु के नाम के आगे छोटे हैं । अगर कोई आपकी निन्दा कर रहा है तो समझो आपकी कर्म-निर्जरा हो रही है और कोई प्रशंसा कर रहा है तो आप डूब रहे हो । दो शब्द होटों से निकलते हैं वे निन्दा का रूप भी धारण कर सकते हैं और प्रशंसा का भी । 

महापुरूषों को कितने कष्ट आए । उन्होंने कभी किसी को गलत नहीं कहा । आचार्य मानतुंग जैसे आचार्यों को 48 तालों के अन्दर बंद कर दिया गया और राजा का फरमान था अगर आपकी सच्ची भक्ति है तो आप बाहर बिना ताले खुलवाये आएंगे । आचार्यश्रीजी ने केवल भीतरी भावों से भक्ति की थी । भगवान आदिनाथ को श्रद्धा से नमन किया । उनके शरीर की सुन्दरता को भक्ति में ले आएं और स्वयं को अज्ञ बना दिया । स्वयं को बलहीन, बुद्धिहीन बना दिया और वे महापुरूष बन गए । हमें तो बोलना भी नहीं आता । उन्होने प्रभु के अष्ट महाप्रतिहार्यों का वर्णन भक्ति के द्वारा किया था । हम सुबह उठे । आलस को त्यागे । भक्ताम्बर स्तोत्र को भक्ति से पढ़े । प्रभु के समक्ष प्रार्थना करें प्रभु मैं कुछ भी नहीं । मैं बिन्दू हूं आप सागर हो । मैं लघुतम हूूं । आप महान् हो । भक्ति की प्रथम शर्त है कि हम स्वयं के अहंकार को विहीन कर दें । बीज खत्म होने पर ही वृक्ष का रूप धारण करता है । तुम अहंकार को गला दो । अपना कुछ नहीं मेरा अस्तित्व है ऐसी धारणा मत रखना । जब ऐसा जीवन बन जाएगा तो प्रेमरस झरित होगा । प्रभु भक्ति में कठिन है अहंकार को त्यागना और सरल है विनम्रता में आना । 

अरिहंत की भक्ति, सिद्ध का स्मरण, साधु का संग मिल गया तो जीवन रूपान्तरित हो जाएगा । जीवन की अमूल्य संपदा है हमें चेतना का शुद्ध स्वरूप प्राप्त हो । सद्गुरू मिल जाए । उत्तराध्ययन सूत्र में प्रभु ने फरमाया कि आज ऐसे भी महान श्रावक हैं जो संतों से ऊपर है और ऐसे भी महान् संत हैं जो श्रावको ंसे उपर है । हम किसी की निन्दा न करें । सबको तीर्थ का एक अंग समझे । प्रभु ने आंगे दी है परमात्मा के दर्शन के लिए । हम प्रातःकाल परमात्मा के दर्शन करें । हम प्रातःकाल उठकर मेरी भावना, भक्तम्बर, कल्याण मंदिर का पाठ करें । हमारी सुबह भक्ति के साथ शुरूआत हो और हमारी शाम कृतज्ञता से भर जाए । हम सब सुश्रावक बनें । प्रभु की भक्ति करें ।

आचार्यश्रीजी के सान्निध्य में 17-18 सितम्बर, 2005 को अखिल भारतीय स्तर पर श्रावक सम्मेलन होने जा रहा है जिसमें भारत भर से अनेक श्रद्धालुजन सम्मेलन में भाग लेने हेतु पहुंच रहे हैं । 18 सितम्बर, 2005 को आचार्यश्रीजी का जन्म दिवस गुणगान सभा के रूप में मनाया जाएगा ।

 

शिवाचार्यजी के सान्निध्य में अखिल भारतीय श्रावक सम्मेलन सम्पन्न

17 सितम्बर, 2005: जालंधर श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज के जीवनोपयोगी एवं सारगर्भित प्रवचन प्रतिदिन शिवाचार्य सत्संग स्थल, लक्ष्मी पैलेस, गाजी गुल्ला रोड़ पर चल रहे हैं । आज के अपनेे मंगलमय प्रवचन में उन्होंने फरमाया कि- श्रावकों का वर्णन करते हुए प्रभु महावीर ने उपासकदशांग सूत्र में दस श्रावकों का वर्णन बतलाया है । उनके पास अपार संपत्ति सुख वैभव था फिर भी उनका पुण्य जागृत था तो उन्होंने श्रावक धर्म को ग्रहण किया । अपनी पत्नी को भी सूचना दी तो पत्नी ने भी श्रावक-धर्म की आराधना की । प्रभु महावीर ने स्थानांग सूत्र में चार प्रकार के श्रावक बतलाये हैं । प्रथम जो माता पिता के समान हो । ऐसे श्रावक जो साधु को इज्जत दे । माता पिता की तरह साधु पर वात्सल्य भावना रखें । ऐसे श्रावक साधु के जीवन को उॅंचा उठाते हैं । आप ऐसे श्रावक बनो । प्रत्येक साधु को उतना ही प्यार दो जितना आप अपने बेटे को देते हो । साधु छदमस्थ है । गलती हो सकती है इसीलिए प्रभु महावीर ने आलोचना और प्रायश्चित की बात कही है । दूसरे प्रकार के श्रावक भाई की तरह होते हैं जो कभी उग्रता धारण करते हैं तो कभी वात्सल्य धारण करते हैं । बेटा कुपुत्र होगा फिर भी माता के भीतर वात्सल्य और प्रीति का भाव उत्पन्न होता है । तीसरे प्रकार के श्रावक मित्र के समान होते हैं जो साधु को अपना मित्र समझते हुए उससे सारी बात प्यार से करते हैं और चैथे प्रकार के श्रावक सौत के समान होते हैं जो छिद्रान्वेषी होते हैं । छोटी-2 का प्रचार प्रसार करके धर्म की हानि करते हैं । इन चारों श्रावकों में से आप जो श्रावक बनना चाहो बन सकते हो, बस धर्म की प्रभावना करो । धर्म में जीवन व्यतीत करो । 

प्रभु महावीर ने और भी चार प्रकार के श्रावक बतलाये हैं । पहले दर्पण के समान जो जैसा है वैसे बतलाते हैं । दूसरे ध्वजा की पताका के समान, जिनका चित्त अस्थिर है । तीसरे सूखे वृक्ष के समान और चैथे कदाग्रही होते हैं । हम प्रभु महावीर की वाणी को भीतर उतारें । इस सम्मेलन के द्वारा सबको संस्कार मिले । छोटे बच्चों में संस्कारों का वर्णन हो । हम सेवा को अपनायें और धर्मों में सेवा को जितना महत्व है उतना महत्व हम भी सेवा को दें और साधना के क्षेत्र में आगे बढ़ें । आज के इस श्रावक सम्मेलन पर हम संस्कार, सेवा और साधना त्रिसूत्रीय कार्यक्रम को लेकर आगे बढ़ें ।

अरिहंत प्रभु की वीतरागवाणी संसार सागर को पार उतारने वाली, जन-कल्याणीवाणी है  । यह वाणी हमें विष से अमृत की ओर ले जाती है । अमृत तुल्य संजीवनी वाणी है प्रभु महावीर की । प्रभु महावीर की वाणी का श्रवण करके जन्मों-2 के वैर-भाव दूर होते हैं । आपने एक सूत्र देखा, सुना होगा ‘परस्परोपग्रहो जीवानाम्’ यह निरपेक्ष सूत्र है । जिस प्रकार श्रावक का परिवार होता है उसी प्रकार साधु का गण होता है । गृहस्थ धन सम्पत्ति में परस्पर सहयोग करते हैं वही पर साधु धर्म सम्पत्ति को आपस में बांटते हैं । इस सूत्र का मतलब है सभी जीव आपस में मिले हुए हैं । माता पुत्र का, पिता पुत्री का आपस में बहुत बड़ा सहयोग   है । 

प्रभु के तीर्थ में सभी आपस में सहयोग करते हैं । श्रावक साधु को सहयोग करता है । साधु श्रावक को सहयोग करता है । दोनों धर्म की ओर सहयोग करे तो कर्म-निर्जरा होकर संसार छोटा होता है और कर्म-मेल धुल जाते हैं । चार स्तंभ हैं एक टूट जाए तो तीनों टिकते नहीं । हाथ की पांच ऊगुलियां है सबका अपना-अपना सहयोग है । अगर एक अंगुली नां हो तो हमें कार्य करना मुश्किल हो जाता है । इस संसार में परस्पर सहयोग के बिना कुछ भी कार्य संभव नहीं है । परस्पर कार्य करने के लिए प्रभु महावीर ने दो प्रकार के धर्म बतलाये । अणगार धर्म साधु का और आगार धर्म श्रावक का । जितनी श्रावक की भूमिका प्रभु ने अपनी वाणी में फरमाई है उतनी किसी धर्म-ग्रन्थों या धर्म-शास्त्रों में उपलब्ध नहीं होती । श्रावक-धर्म बहुत सुन्दर है । अगर इस धर्म का पालन अच्छी तरह हो तो श्रावक तीन भव में मोक्ष प्राप्त कर सकता है । श्रावक सच में श्रावक बनें । 

संगठन के बिना जीवन अधूरा है । स्थानीय श्रीसंघ एक संगठन बनाता है तो धर्म संघ की सेवा और प्रभावना होती है । इस निमित्त से वह व्यक्ति या वह संघ कर्म-निर्जरा का कारण बन जाता है । बाहर से आए हुए सभी श्रीसंघों के प्रति आज के दिन मैं अनुग्रह व्यक्त करता हूं । सभी श्रीसंघ सभी का सहयोग आगे लेकर बढ़ें । आज हमें धर्म के मार्ग को आगे बढ़ाना है । प्रभु महावीर की वाणी को घर-घर 

पहुंचाना है । श्रावकांे को अपनी मर्यादा में रहना चाहिए । साधु पर टीका टिप्पणी करने की आवश्यकता नहीं । श्रावक बारह व्रतों को ग्रहण करें । अणुव्रत बहुत महत्वपूर्ण है । प्रभु ने साधु के लिए आत्म-साधना की सर्वोच्च महत्ता  बतलाई । पांच महाव्रत, पांच समिति और तीन गुप्ति की सुन्दर साधना फरमाई वहीं श्रावक के लिए बारह व्रत सूक्ष्म रूप से ग्रहण करें तो पांच व्रत, तीन मनोरथ, चैदह नियम अवश्य ग्रहण करने चाहिए । श्रावक धर्म सहजता से स्वीकार किया जा सकता है । तीन मनोरथों में प्रार्थना समाई हुई  है । प्रभु ! वह दिन धन्य होगा जब मैं सभी प्रकार के आरंभ समारंभ से मुक्त होउंगा । प्रभु ! वह दिन धन्य होगा जब मैं श्रमण धर्म को स्वीकार करूंगा । प्रभु ! वह दिन धन्य होगा जब में संलेखना युक्त पंडित मरण को प्राप्त होगा । प्रतिदिन मनोरथों का चिन्तन करो तो हमारी भावना एक दिन अवश्य पूरी होगी । 

श्रावक सम्मेलन में पूरे भारतवर्ष के विभिन्न अंचलोें से अनेक श्रावक संघ पहुंचे जिसमें सिकन्द्राबाद, महाराष्ट्र- पूना, जलगांव, अहमदनगर, औरंगाबाद, नासिक, एदलाबाद, मीरजगांव । राजस्थान - उदयपुर, नाथद्वारा, जयपुर, जोधपुर, ब्यावर, कोटा, हनुमानगढ़, श्रीगंगानगर, केसरीसिंहपुर । मध्य प्रदेश- इन्दौर, रतलाम, नीमच । दिल्ली, उत्तर प्रदेश- बड़ौत, मुज्जफनगर । हरियाणा - अम्बाला कैंट, राणियां, हिसार, सिरसा, चण्डीगढ़, । पंजाब - रोपड़, फरीदकोट, राजपुरा, पटियाला, होशियारपुर, लुधियाना, फगवाड़ा, भटिण्डा । आचार्यश्रीजी के 2006 के वर्षावास हेतु आज बाहरगांव से  आए कई श्रीसंघों ने विनतियां प्रस्तुत की जिसमें- भटिण्डा, अम्बालाकैंट, पटियाला, रोपड़ आदि सम्मिलित हैं । 

श्रावक सम्मेलन की अध्यक्षता मुम्बई से पहुंचे श्री सुमतिलाल जी कर्नावट ने की । इस अवसर पर सार रूप में जो चर्चाएं हुई उन्हें लुधियाना से पहुंचे समाजरत्न श्री हीरालाल जी जैन ने आचार्यश्रीजी के समक्ष रखा जो इस प्रकार है:- समाज के सभी संघों, प्रमुख सुश्रावकों ने अपने-अपने विचार रखें । ढ़ाई वर्ष मंें जो भी हुआ उस घटना के लिए सभी ने खेद जताया । तीन बातों की प्रमुखता से चर्चा हुई उसमें प्रथम बात यह थी कि आचार्य सम्राट् पूज्य श्री आत्माराम जी महाराज जो श्रमण संघ के प्राण थे उनकी गद्दी पर विराजित चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज के प्रति सभी संघ अपनी पूर्ण निष्ठा व्यक्त करते हैं । कान्फ्रेन्स मातृ संस्था है और रहेगी । तीसरी बात सभी श्रीसंघ, साधु साध्वी श्रावक श्राविका रूप चतुर्विध संघ आपके चरणों में समर्पित हैं । सभी को श्रमण संघ की एवं श्रावक वर्ग की जानकारी प्राप्त हो इसके लिए एक मासिक पत्रिका तैयार हो और श्रावक संघ का राष्ट्रीय संगठन बनें ।

इस अवसर पर आचार्य भगवंत ने कहा कि श्रावक पिता तुल्य होते हैं । वे अपने लक्ष्य को समझे । हम एक लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रहे हैं । आपने मेरे प्रति जो निष्ठा भावना व्यक्त की वह सुन्दर है । देश भर से आए प्रमुख श्रावकों के प्रति मेरी हार्दिक संवेदना और कृतज्ञता है । आज के दिवस पर आपने मंथन, चिन्तन किया । विश्वास रखा । मैं कोई अनुशास्ता नहीं बनना चाहता । केवल एक भाव है कि आचार्य भगवंत पूज्य श्री आत्माराम जी ने जिस प्रकार श्रमण संघ को सींचा है । आचार्य सम्राट् पूज्य श्री आनंद ऋषि जी महाराज ने उसमें आनंद का रस बहाया है और साहित्य कला के द्वारा जिसे सृजित किया है आचार्य सम्राट् पूज्य श्री देवेन्द्र मुनि जी महाराज ने मैं उनकी बातों को लेकर आगे बढूं । हमारे जीवन में सत्य होना चाहिए । घर बार छोड़कर केवल हम साधना पथ के लिए आगे आए हैं । हम सत्य को स्वीकार करें । इस अवसर पर सभी श्रावकों का संगठन जो साधना, सेवा और संस्कार त्रिस्तरीय कार्यक्रम करेगा उसकी घोषणा कल आचार्य भगवंत के पावन मुखारबिन्द से जन्म दिवस के शुभ अवसर पर कराई जाएगी ।

इस अवसर पर जैन रत्न लाला श्री नेमनाथ जी जैन, श्री हस्तीमल जी मुणोत, श्री सुमति लाल जी कर्नावट, समाजरत्न श्री हीरालाल जी जैन, श्री नृपराज जी जैन, श्री हुकमचंद जी जैन, श्री कचरदास जी पोरवाल, श्री गजराजसिंह जी झामड़, श्री मांगीलाल जी जैन, श्री औकारसिंह जी सिरोया, डाॅ0 कैलाश जैन, श्री बहादुरचंद जी जैन, श्री मोहनलाल जी जैन, श्री निर्मल पोखरणा, श्री अमितराय जैन,  श्री कीमतीलाल जी जैन, श्री सतीश कुमार जैन, श्री विमल जी जैन ‘अंशु’, आदि ने अपनी भावनाएं अभिव्यक्त करते हुए संगठन के लिए एक आवाज उठाई ।

 

शिवाचार्यजी जन्म जयंती हर्षोल्लास  के साथ सम्पन्न 

18 सितम्बर, 2005: जालंधर { दैनिक जागरण }  श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज के जीवनोपयोगी एवं सारगर्भित प्रवचन प्रतिदिन शिवाचार्य सत्संग स्थल, लक्ष्मी पैलेस, गाजी गुल्ला रोड़ पर चल रहे हैं । आज के अपनेे मंगलमय प्रवचन में उन्होंने फरमाया कि- अरिहंत प्रभु को अनंत-अनंत नमन । शासनपति प्रभु महावीर को नमन । शासनदेव, शासन माता को नमन । यह धर्म सभा, धर्म तीर्थ शासनपति प्रभु महावीर का है । हमारा परम सौभाग्य है कि हमें प्रभु के तीर्थ का अंग बनने को मिला । तीर्थ में साधु साध्वी श्रावक श्राविका चारों ही आते हैं और आज चारों तीर्थ यहां पर उपस्थित  है । जालंधर से ही नहीं पूरे भारत भर से सभी संघ यहां पर आए । अब तक आपने बहुत कुछ सुना । चर्चाएं हुई । मैं उन चर्चाओं को दोहराना नहीं चाहूंगा । 

आज का दिवस अध्यात्म युग पुरूष आचार्य सम्राट् श्री आत्माराम जी महाराज जिनका खून का हर कतरा धर्म संघ के लिए अर्पित था । उनके ऋण मुक्त नहीं हो सकते । उन्होंने समाज को सारा जीवन अर्पित किया । जीवन ही नहीं अपनी दोनों आंखे ही दे दी । पूरे शासनकाल में स्वाध्याय, शास्त्र लेखन द्वारा उन्होंने एक ज्ञान का सागर बहाया । आज मैं अन्तःकरण से स्मरण करता हूॅं । वंदन करता हूॅं । कृतज्ञता ज्ञापित करता हूं वे जहां पर भी उपस्थित हो हमें अपना आशीष देते रहें । धर्मशासन को आगे बढ़ाने में बल दंे । ऐसी महान विभूति पूरे भारत में ही नहीं समस्त विश्व में भी दृष्टिगोचर नहीं होगी । जिनके स्मृति पटल पर प्रभु महावीर का हर वचन अंकित था । उन्हें चलता फिरता शास्त्र पुस्तकालय कहा गया है । आज हम उनके शास्त्रों का स्वाध्याय करें यही उनके प्रति कृतज्ञता होगी । मैं आज आप सबसे अनुरोध करूंगा । आप अपने घर में लाईब्रेरी बनायें । आचार्यश्रीजी के सभी शास्त्र रखें और कम से कम 15 मिनिट प्रतिदिन स्वाध्याय करें । हमारे समादरणीय साधु साध्वीवृंद एक घण्टा स्वाध्याय करें । उनके एक सूत्र ने मेरा जीवन बदल दिया । उस शास्त्र के एक शब्द से कृपा निर्झरित हुई । यह हमारा नेैतिक कतव्य है कि हम स्वाध्याय अवश्य करें । आचार्यश्रीजी के समस्त शास्त्र 20 के करीब छप चुके हैं । आपको अगर आवश्यकता है तो आप वहां से मंगवा सकते हैं । कोई विद्वान बच्चा हो या जवान हो हर कोई पढ़कर सब बात समझ सकता है । आज के इस पावन दिवस पर मैं पूज्य गुरूदेव श्री ज्ञानमुनि जी महाराज को स्मरण करता हूँ । उनकी कृपा से ही शास्त्र स्वाध्याय जाप पाठ एवं प्रभु की साधना प्राप्ति मिली, सहयेाग मिला ।

आज के इस पावन दिवस पर पंजाब प्रवर्तक पूज्य श्री शुक्लचंद जी महाराज का भी स्मरण हो आता है । यथानाम तथागुण सम्पन्न थें प्रवर्तकश्री । उनके जीवन की अनेकों घटनाएं हैं जिनका उल्लेख यहां पर किया जा सकता है । उन्होंने हलाहल पीकर सब समाज को शान्ति और समता का दान दिया । पंजाब परम्परा में उनका भी प्रमुख स्थान रहा है । जालंधर क्षेत्र पूज्य प्रवर्तकश्रीजी से अछूता नहीं रहा यहां पर उन्होंने अनेक वर्षावास बिताएं । प्रत्येक व्यक्ति उनसे अभिभूत है । महासाध्वी उपप्रवर्तिनी श्री संतोष कुमारी जी म0 का भी जन्म दिवस आज मनाया जा रहा है । मैं उनको भी हार्दिक बधाई प्रेषित करता हूूं कि वे निर्भीकवक्ता से आगे बढ़ें । संघ की गौरवमयी परम्परा को आगे बढ़ायें । ’अखिल भारतीय वर्धमान स्थानकवासी श्रमण संघीय श्रावका समिति’ का गठन भी हुआ है । मैं सभी श्रावकों को कहूंगा कि वे सभी प्रभु महावीर के श्रावक बनें । कम से कम 5 अणुव्रत ग्रहण करें । श्रमण संघ के प्रति निष्ठावान हों और धर्म के प्रचार प्रसार को आगे बढ़ायें इससे समस्त श्रीसंघ को लाभ होगा । 

श्रमण संघ में अनेक तपस्वी, ज्ञानी, ध्यानी, स्वाध्यायी संत और श्रावक हैं । हमने घर छोड़ा है तो प्रभु महावीर की साधना के प्रलोभन से छोड़ा है । हम प्रभु महावीर की साधना को भीतर उतारें । हृदय में सबके प्रति प्यार बनाये रखें । सभी प्राणियों के मंगल की भावना भीतर रखें । प्रभु ने फरमाया - ‘समय मात्र का भी प्रमाद मत करो और जो तुम्हें श्रेयस्कर लगे उस कार्य को करने में विलम्ब मत करो । हम प्रभु महावीर की वाणी को भीतर उतारें यही हमारे लिए सबसे बड़ी बात होगी ।

आज आचार्यश्रीजी का 64 वां जन्म दिवस गुणगान सभा के रूप में मनाया गया । इस अवसर पर ‘अखिल भारतीय वर्धमान स्थानकवासी श्रमण संघीय श्रावक समिति’ का गठन हुआ जिसके चैयरमेन श्री सुमतिलाल जी कर्नावट बने । इस अवसर पर बाहर से पहुंचे अनेक श्रद्धालुओं ने अपनी भावनाएं व्यक्त की जिसमें जैनरत्न लाला श्री नेमनाथ जी जैन, श्री हस्तीमल जी मुणोत, श्री सुमति लाल जी कर्नावट, समाजरत्न श्री हीरालाल जी जैन, श्री नृपराज जी जैन, श्री कचरदास जी पोरवाल, श्री गजराजसिंह जी झामड़, श्री मांगीलाल जी जैन, श्री औकारसिंह जी सिरोया, डाॅ0 कैलाश जैन, श्री बहादुरचंद जी जैन, श्री मोहनलाल जी जैन, श्री निर्मल पोखरणा, श्री अमितराय जैन,  श्री कीमतीलाल जी जैन, श्री सतीश कुमार जैन, श्री विमल जी जैन ‘अंशु’, आदि ने अपनी भावनाएं अभिव्यक्त करते हुए आचार्यश्रीजी को जन्म दिवस की हार्दिक बधाई प्रेषित की ।  

श्रावक सम्मेलन में पूरे भारतवर्ष के विभिन्न अंचलोें से अनेक श्रावक संघ पहुंचे जिसमें सिकन्द्राबाद, महाराष्ट्र- पूना, जलगांव, अहमदनगर, औरंगाबाद, नासिक, एदलाबाद,   मीरजगांव । राजस्थान - उदयपुर, नाथद्वारा, जयपुर, जोधपुर, ब्यावर, कोटा, हनुमानगढ़, श्रीगंगानगर, केसरीसिंहपुर । मध्य प्रदेश- इन्दौर, रतलाम, नीमच । दिल्ली, उत्तर प्रदेश- बड़ौत, मुज्जफनगर । हरियाणा - अम्बाला कैंट, राणियां, हिसार, सिरसा, चण्डीगढ़, । पंजाब -रोपड़, फरीदकोट, राजपुरा, पटियाला, होशियारपुर, लुधियाना, फगवाड़ा, भटिण्डा । आचार्यश्रीजी के 2006 के वर्षावास हेतु आज बाहरगांव से  आए कई श्रीसंघों ने विनतियां प्रस्तुत की जिसमें- उदयपुर, इंदौर, भटिण्डा, अम्बालाकैंट, पटियाला, रोपड़ आदि सम्मिलित   हैं । 

समिति के मार्गदर्शक श्री आर0सी0 जैन द्वारा चैसठ लक्की ड्रा निकाले गए । इस अवसर पर राम सेवक मण्डल द्वारा विधवाओं को राशन वितरण प्रोगाम भी शाम को सम्पन्न हुआ जिसमें अनेक विधवाओं ने एक माह का राशन प्राप्त किया । इस अवसर पर कई भाई बहिनों ने महिला संघ, युवती संघ, तरूणी मण्डल आदि ने अपनी भावनाएं गद्य एवं पद्य के द्वारा अभिव्यक्त की ।

 

सत्य और आनंद की अनुभूति शब्दातीत: आचार्य शिवमुनि

19 सितम्बर, 2005: जालंधर श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज के जीवनोपयोगी एवं सारगर्भित प्रवचन प्रतिदिन शिवाचार्य सत्संग स्थल, लक्ष्मी पैलेस, गाजी गुल्ला रोड़ पर चल रहे हैं । आज के अपनेे मंगलमय प्रवचन में आचार्यश्रीजी ने फरमाया कि- जब हम प्रभु की भक्ति करते हुए अन्र्तहृदय से जुड़ जाते हैं, लयबद्ध हो जाते हैं, भीतर से जब हम कोमल होते जाते हैं और मन-वचन-काया तन्मय हो जाती है तो हम जुड़ जाते हैं उस शुद्ध ज्योति, परम ज्योति से करूणा के मसीहा से और जो सत्य, आनंद की अनुभूति होती है वह शब्दातीत है । शुद्ध प्रेम, भक्ति और अन्र्तहृदय की पुकार को शब्दों में बांधा नहीं जा सकता । फूल की सुगंध, हवा को कैसे बांध सकते हैं । भीतर में अगर भाव हो तो कितना भी कठिन कार्य हो वह सरल हो जाता है । पहाड़ के ऊपर चढ़ते हुए एक सन्यासी थक गया, पसीना-2 हो गया किन्तु एक पहाड़ी बालिका अपने भाई को पीठ पर उठाकर बड़ी तेजी से चली जा रही । सन्यासी ने कहा इतना भार क्यों ले जा रहे हो, तब बालिका कहती है कि महात्मन् यह भार नहीं यह मेरा भाई है, बस इतनी सी बात ने सन्यासी को जगा दिया ।

साधना में अगर भाव जुड़े हुए हो तो कितनी भी कठिन साधना सहज हो जाती है । भार लोहे का भी है और सोने का भी है । भार भाई का भी है और दूसरी वस्तु का भी है । वजन में कोई अन्तर नहीं है किन्तु उसके पीछे भावों में अन्तर है । हम हर बात के ऊपर शिकायत करते हैं, बैचेन हो जाते हैं लेकिन भीतर अगर भाव हो तो जो भी जैसी भी परिस्थति है उसे हम स्वीकार करे आनंद मनाते हैं । कल के यहां कार्यक्रम मे ंदेश भर के श्रावक श्राविकाएं यहां पहुंचे । चातुर्मास समिति के कार्यकर्ताओं, युवा कान्फ्रेन्स, बहु मण्डल आदि सभी कार्यकर्ताओं ने जिस उत्साह और भक्ति-भाव से सेवा की उसकी प्रशंसा सारे भारत के लोग कर रहे हैं । इससे पूरे जालंधर का गौरव बढ़ा है । यह आपके द्वारा जिनशासन की सेवा हुई । जो व्यक्ति पत्थर की तरह भारी है, अहंकार से फूले हुए हैं वे नीचे-2 गिरते चले जाते हैं और जो फूल की तरह कोमल है, हल्के हैं वे ऊपर-2 उठते चले जाते हैं । जो भी जीवन में हो रहा है वह सब कुछ ठीक है इस प्रकृति, नियति को अगर हम स्वीकार कर लेते हैं तो आनंद और अहोभाव से भर जाते हैं । कहा भी है:- 

          चमन उजड़ जाएगा, यदि तमाम कांटो को निकाल दोगे ।

अगर गुलिस्तां की खेर चाहो तो, चंद कांटे कबूल कर लो ।।

भक्ति करते हुए जो भी तुम मांगोगे वो मिलेगा लेकिन हमने क्या मांगना है यह विवेक हमें होना चाहिए । द्रोपदी ने पिछले भवांें में पांच पति की मांग की लेकिन भावों की शुद्धि रही तो वह सति कहलाई । लक्ष्मण की पत्नी होते हुए भी वे यति कहलाए । महात्मां गांधी के भी परिवार बच्चों वाले होते हुए भी वे महात्मा कहलाए । यह भावों का खेल है । सामान्य व्यक्ति बाहर के वातावरण को देखता है लेकिन अध्यात्म तो भाव को देखता है । हम जो भी कार्य करें पूरे 100 प्रतिशत उसी में डूब जाएं । भोजन करें तो भोजन ही करें । प्रार्थना करंें प्रार्थना ही करें । दुकान पर बैठें तो पूरे दुकानदार बन जाएं । सत्संग में बैठे हैं तो सत्संगी बन जाएं, यही हमारी साधना है । अक्सर हमारा जीवन आधा अधूरा रहता है । कठिन मेहनत के बाद अगर परिणाम अच्छा आता है तो हमें इसका सुखद अनुभव होता है । हम अपने जीवन को आनंद और अहोभाव से भरपूर रखते हुए धर्म, संघ, शासन की सेवा के लिए सदैव समर्पित रहें ।

इस अवसर पर श्री विनयदेव बंदी गाजियाबाद ने एक सुन्दर कविता भजन के द्वारा अपनी भावांजलि अर्पित की । राष्ट्र के अनेक भागों से आए हुए दर्शनार्थियों ने सत्संग, प्रवचन और सेवा का लाभ लिया । आगामी आत्म: विकास कोर्स एडवांस-ाा {आवास निवास के साथ} दि0ः 22 से 25 सितम्बर, 2005 तक कम्यूनिटी सेन्टर, दीन दयाल उपाध्याय नगर में शुरू हो रहा है । इच्छुक साधक सम्पर्क कर लाभ लेवें - 9872294875

 

प्रत्येक व्यक्ति को सुख पहुंचाना धर्म है: आचार्य शिवमुनि

20 सितम्बर, 2005: जालंधर श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज के जीवनोपयोगी एवं सारगर्भित प्रवचन प्रतिदिन शिवाचार्य सत्संग स्थल, लक्ष्मी पैलेस, गाजी गुल्ला रोड़ पर चल रहे हैं । आज के अपनेे मंगलमय प्रवचन में आचार्यश्रीजी ने फरमाया कि- अपने गुरू, ईष्ट से कुछ मांगना है तो उनकी कृपा, आशीष, करूणा मांगो । प्रभु से प्रार्थना करो हे प्रभु मेरे हृदय में प्रेम रूपी अमृत भर दो । जहां प्रेम है वहां अहंकार, ईष्र्या टिक नहीं सकती । प्राणी मात्र से यदि हम प्रेम करते हैं तो जीवन शान्ति से भर जाता है और प्रेम विस्तीर्ण होता चला जाता है । एक व्यक्ति का एक परिवार ही संसार है । एक व्यक्ति का नगर, देश संसार है तो एक व्यक्ति का विश्व और ब्रह्माण्ड संसार है । तीनों लोकों का संसार अरिहंत प्रभु का है । वे वीतरागी हैं । हमारे जैसा संसार उनका नहीं है । हमारे यहां जितनी उलझने हैं उतनी उलझनें वहां पर नहीं     हैं । वहां जाने पर सारे टेंशन, डिप्रेशन दूर होंगे । हमारा संसार सारी कामनाओं, वासनाओ ंसे भरा हुआ है, कूड़े करकट से आच्छादित है । जाति, कुल, धर्म से संबंधित को ही हम आश्रय देते हैं । हर व्यक्ति का अपना-अपना संसार   है । दो बच्चे हम उम्र के हों तो उनका भी अपना संसार है । वे नहीं देखते कि कौन शत्रु है, कौन मित्र है । उन्हें आपस में अपने परिवार का भी पता नहीं । वे सिर्फ आनंद में रहना जानते हैं । खेलना, कूदना जानते  हैं । दो वृद्ध आपस में मिलेंगे तो वे अपने जमाने की बात करेंगे । पुरानी यादों को स्मृति पटल पर ले आएंगे । यह मानव जीवन ऐसे ही चलता जा रहा है । बचपन, जवानी और बुढ़ापा इस झूले में झूलता हुआ यह जीवन आगे बढ़ता चला जा रहा है । बच्चों को कोई चिन्ता नहीं है। चिन्ता है तो केवल हमें । हम अपने संसार की चिन्ता करते हैं, अपने परिवार की चिन्ता करते हैं । जब प्रभु का बुलावा आता है तो हम दुःखी हो जाते हैं, तब हमें अपना घर, बेटे, धन सब कुछ याद आ जाता है परन्तु डाॅक्टर का परामर्श है कि अधिक गरिष्ठ भोजन नहीं करना है । लेटकर रहना   है । हम खा नहीं सकते । अपने अनुसार जी नहीं सकतंे । उस समय वो धन, बेटे, परिवार कुछ काम नहीं आता । हमने इतना धन कमा लिया है कि हमारी सात पीढ़ियंा आराम से बैठकर उस धन की रक्षा कर सकती है और उस धन पर आश्रित रह सकती है । धन की व्यक्ति रक्षा करता है पर व्यक्ति की रक्षा धन नहीं कर सकता । धन से दीन दुःखियों की संेवा हो सकती है परन्तु जब आयु समाप्त हो जाएगी तो एक श्वांस भी धन देकर हम नहीं रोक सकते । यह जीवन की गाथा बहुत अजीब है । 9 महीने तक मां के गर्भ में रहे जब जन्म हुआ तो माता पिता का लाड प्यार पाया । जवानी नशे में बीत गई । बुढ़ापा यादों में बीत गया । अन्तिम समय में दौलत वहीं रह गई । जितना घर का डैकोरेशन था वह वैसे ही रह गया । सुन्दर शरीर, काले केश, मोती जैसी आंखें वैसी ही रह गई । अन्तिम समय काम आया केवल भक्ति, भजन और सत्संग । सारे परिवारवाले रोते हैं, बिलखते हैं, वो आपके लिए नहीं, केवल अपने स्वार्थ के लिए । कहा भी है - 

कौन रोता है किसी और के खातिर, ए मेरे दोस्त । 

सबको अपने ही स्वार्थ पर रोना आता है ।।

महर्षि वेदव्यास ने 18 पुराणों की रचना की । सार रूप में दो ही वचन कहे:- ‘हम किसी का परोपकार करते हैं तो हमें पुण्य प्राप्ति होती है और परपीड़ा देते हैं तो पाप होता है । इसी को प्रभु ने अपनी भाषा में कहा कि प्रत्येक जीव मंगल स्वरूप है । सबको मंगल रूप से देखो । संत तुलसीदास ने भी कहा कि- दूसरों का हित करना ही धर्म है । दूसरों को सुख पहुंचाना धर्म रूपी कार्य है और दूसरों को पीड़ा देना अधर्म है । सीधे सादे वचन हृदय को स्पर्श कर जाते हैं । प्रभु ने कहा- अगर हमें इस जन्म-मरण के चक्कर से छुटकारा प्राप्त करना है । अपने आत्म-तत्व को पाना है तो हम दानों में श्रेष्ठ अभय दान को अपनायें । कोई गरीब है तो उसे पैसे दें । किसी की आंखे नहीं है तो उसे आंखे दें । मकान, कपड़ा, पानी, भोजन यह सब कुछ दे सकते हैं । अगर नहीं दे सकते तो दूसरों का दुःख सुने । उनकी पीड़ा को अपनी पीड़ा समझे । सामने वाला व्यक्ति हल्का हो जाएगा । परमात्मा ने सबको धन दिया है परन्तु दिल किसी-2 को दिया है । हम दिल के द्वारा सामने वाले व्यक्ति की भावनाओं को जानकर उसके दुःख दर्द को दूर कर सकते हैं । हर मानव का अपना अपना संसार है । गांव की दूरियां बहुत है परन्तु दिल की दुरियां कभी नहीं होती । पशु, पक्षी, पहाड़ सब दान, सत्संग नहीं कर सकते । मानव जो चाहे कर सकता है । दान कर सकता है, कानों से संगीत सुन सकता है, आंखों से प्रभु दर्शन कर सकता है । हम अपनी कमाई का कुछ हिस्सा धर्म के लिए लगायें, जीवन सफल हो जाएगा । संसार का नियम है कि कोई व्यक्ति किसी के कर्म नहीं भोग सकता । इसलिए हम कर्मों से डरें । हंसते-2 हम अनेकों कर्म बांध लेते हैं । किसी की निन्दा ना करें और इस संसार को छोटा करें । 

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परमात्मा हमारे भीतर है: आचार्य शिवमुनि

21 सितम्बर, 2005: जालंधर श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज के जीवनोपयोगी एवं सारगर्भित प्रवचन प्रतिदिन शिवाचार्य सत्संग स्थल, लक्ष्मी पैलेस, गाजी गुल्ला रोड़ पर चल रहे हैं । आज के अपनेे मंगलमय प्रवचन में आचार्यश्रीजी ने फरमाया कि- जीसस के वचन हैं दरवाजा खटखटाओ द्वार खुलेंगे । खोजो प्रभु मिलेंगे । जो मांगोगे वह मिलेगा । हम खोज कहां करते हैं और ढंूढते कहीं और है । परमात्मा कहीं और नहीं हमारे भीतर है । हमने हृदय को बंद कर रखा है, उसके पट खोलो । भीतर जब तक ‘मैं’ है तब तक परमात्मा नहीं आ सकते । यह मैं ही हमें संसार में भटका रहा है । सारी अशान्ति, बैचेनी, पीड़ा, दुःख इसी के कारण है । सारे झगड़ों की शुरूआत मैं से होती है । कड़वा वचन ना बोलो । यह जीवन मिला है । हम बहुत कुछ कार्य कर रहे हैं, सब कुछ करते हुए उस परमात्मा को भी याद करो । परमात्मा का साक्षात्कार किए बिना जीवन निरर्थक  है । अहंकार नहीं गया तो परमात्मा प्राप्त नहीं होगा । राम कृष्ण परमहंस परमात्मा की भीतरी भावों से भक्ति करते थे । जब उनका मन होता सारा दिन भजन कीर्तन करते रहते । पहले भोजन को चखते और फिर परमात्मा को खिलाते । पहले फूल को सुंघते फिर परमात्मा को चढ़ाते । वे कहते थे- अगर भोजन कड़वा होगा, फूल में सुगंधी नहीं होगी तो परमात्मा को चढ़ाने में क्या फायदा । कहने का तात्पर्य केवल इतना है कि रामकृष्ण परमहंस भीतरी भावों में रहकर परमात्मा को याद करते थे, उनकी भक्ति करते थे । 

जब सामायिक की समता का भाव भीतर आ गया फिर किसी की परवाह मत करना । केवल अपने भीतर डूब जाना । जिसने खोजा है उसी को परमात्मा प्राप्त हुए हैं । एक पश्चिमी दार्शनिक ने कहा है- सुमद्र में बहुत कुछ है, मोती पाने वाले को गहराई प्राप्त करनी होती है । सागर के ऊपर कंकर, पत्थर बहुत है, मोती गहराई में ही प्राप्त होते हैं, उसी प्रकार संसार एक सागर है, इसमें सब कुछ समाया हुआ है, झगड़े हैं, कांटे हैं तो फूल भी हैं । एक घर में सब कुछ है । हमारे शरीर में भी बहुत कुछ है, जिस भोजन को हम स्वाद से ग्रहण करते हैं वह भोजन भीतर जाकर मलमूत्र रक्त बल वीर्य का रूप धारण कर लेता  है । इस शरीर से पसीना, दुर्गंध, आंखों से आंसू और कानों से मैल निकलता रहता है । हम जीवन के सार को ग्रहण करें । अपने गुणों को देखें । 

हमें धर्म की खोज करनी है । प्रभु ने फरमाया कि- वस्तु का स्वभाव ही धर्म है । हमारा स्वभाव क्या है, कुछ भी नहीं करना । जैसे हो वैसे बन जाओ । जहां है वहां ठहर जाओ । सामायिक में आप बैठे हो और कोई लाख बुराईयां करें फिर भी समभाव में रहना है तभी सच में सामायिक हो सकती है । कहने में आसान है करना बड़ा मुश्किल है । मन वचन, काया को देखते जाओ, यही सबसे बड़ा धर्म है । अगर आपसे देखा नहीं जाता तो आप प्रार्थना करो, मेरी भावना पढ़ो, गहराई में जाकर मौन हो जाओ । परमात्मा से संसार मत मांगना । अगर मांगना है तो परम् शान्ति, परम आनंद को मांगना । प्रभु मैं भी आपके समान बन जाउॅं । परमात्मा की भक्ति में आंसू बहाना । कोमल बन जाना । जितनी मांग संसार की करोगे, संसार बढ़ता चला जाएगा । जिसस ने कहा है- पहले प्रभु का राज्य प्राप्त कर लो फिर बाकी सब प्राप्त करते रहना । 

अरिहंत प्रभु, सीमंधर स्वामी हमारे सबसे नजदीक हैं । भरत क्षेत्र के प्रति उनका विशेष भाव है । हम उनके चरणों में प्रार्थना करें । उनका दर्शन हमें प्राप्त हो, एसा संकल्प हमारे भीतर रहे । तुम प्यासे हो और नदी के किनारे पहुंच जाओ । पानी ना भी पीओं फिर भी तुम्हारे भीतर ठण्डक का अहसास हो जाता है । उसी प्रकार अरिहंत के गुणों का समरण करो तो भक्तिभाव भीतर आएगा । जितना गहरा संकल्प होगा उतने ही शुद्ध और निर्मल हो जाओगे । हम वर्तमान को देखें । भूत और भविष्य को छोड़ दें । मुस्कुराये । प्रभु वीर संगम देव के अनेक कष्ट देने पर भी मुस्कुराते थे । कोई तुम्हारे पास आए तो मुस्कुराओ, दो मीठे वचन बोलो । अपने धर्म में आ जाओ । 

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अपने स्वभाव में जीना ही धर्म का रहस्य है: आचार्य शिवमुनि

22 सितम्बर, 2005: जालंधर श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज के जीवनोपयोगी एवं सारगर्भित प्रवचन प्रतिदिन शिवाचार्य सत्संग स्थल, लक्ष्मी पैलेस, गाजी गुल्ला रोड़ पर चल रहे हैं । आज के अपनेे मंगलमय प्रवचन में आचार्यश्रीजी ने फरमाया कि- अरिहत प्रभु को नमन । अरिहंत प्रभु प्रतिपल प्रतिक्षण अपने स्वभाव में लीन रहते हैं । धर्म का मूल, रहस्य, आधार द्वार क्या है ? प्रभु ने वस्तु का स्वभाव ही धर्म बतलाया है । प्रभु की वाणी अनंत श्रृंखलाओं को तोड़कर हमें मोक्ष मार्ग की ओर ले जाने वाली है फिर भी हम इस संसार सागर में उलझे हुए हैं । सारे शिकवे, शिकायत दूर कर हम अपने स्वभाव में स्थित हो जाएं । इस जगत की प्रत्येक वस्तु का निजगुण है अपना-2 स्वभाव है । पानी का स्वभाव शीतलता है, उसे चाहे आप 100 डिग्री सैलिसियस पर गर्म कर दें फिर भी वह कुछ समय के अनन्तर शीतलता की ओर अग्रसर होगा । आग के ऊपर कितना भी पानी छिड़को वह ठण्डक नहीं दे सकती । उसका स्वभाव ऊष्णता है । कांटा है उसका स्वभाव चुभन है । कांटा कभी फूल नहीं बन सकता । इस शरीर में पांचों इन्द्रियां हैं सबका अपना-2 स्वभाव है । कभी आंख कान का काम नहीं करती, कभी नाक कान का काम नहीं करता । सभी अपना-2 कार्य करते । पांव हाथ नहीं बन सकते । हाथ पांव नहीं बन सकते । शरीर का स्वभाव जैसा है वैसा ही रहेगा ।

परमात्मा ने हम पर अनंत अनुकम्पा की है । हमें हरेक अंग दो-दो दिए हैं । जैसे हाथ दो दिए । पांव, टांगे, घुटने, किडनी, आंखे, कान । एक से कार्य चल सकता था पर परमात्मा ने दो दिए । एक खराब हो जाए तो दूसरा काम आ सकता है । एक व्यक्ति मासखमण करता है वह कुछ खाता नहीं परन्तु उसके शरीर का स्वभाव है भोजन करना । उसे प्रतिदिन कुछ न कुछ चाहिए । आपने देखा होगा जो व्यक्ति तपस्या करते हैं वे दुबले पतले हो जाते हैं । उनके शरीर के भीतर बढ़ी हुई चर्बी को अपना भोजन बनाता   है । शरीर का धर्म है भोजन करना । सब अपना धर्म निभाते हैं पर हम अपना धर्म क्यों नहीं निभाते । हम क्यों नहीं अपने स्वभाव में रहते । यह एक जीवन्त प्रश्न है । स्वभाव यानि अपने आप में जीना । स्वभाव है धर्म और स्वभाव में जीना है धर्म का रहस्य । आज आप घर में अकेले हो । पत्नी मायके चली गई है । बच्चे स्कूल चले गए हैं । माता पिता संगी साथी कोई भी नहीं हैं । आप क्या करोगे ? सुन्दर बनोगे । सुन्दरता किसके लिए । किसी को दिखाने के लिए परन्तु किसी ने आना ही नहीं है । सोचिए कितने घण्टे केवल आठ घण्टे । टी0वी0 देखोगे दो-तीन घण्टे, फिर क्या करोगे । जब आप अकेले हो तो श्वांस लोगे और श्वांस छोड़ोंगे । चाहे कोई भी कार्य करो श्वांस आपके साथ रहेगा । कभी ऐसा हुआ है कि कोई कार्य करते वक्त श्वांस ने साथ ना दिया हो । खाओ, उठो, बैठो सब करते हुए श्वांस साथ में रहता है ।

हमे अपने स्वभाव में आने के लिए कुछ ना करते हुए अपने आप में जीना है, इसलिए हम सर्वप्रथम श्वांस का आलम्बन लें । समस्त ध्यान पद्धति श्वांस पर आधारित है । जब तुम श्वांस को देखते चले जाओगे तो अपने स्वभाव में जीने की कोशिश करोगे । हम अपने आपको देखें । अपने आपको जाने । दुनियां को देखते हुए अनेकों वर्ष बीत गए परन्तु हमारे हाथ कुछ नहीं आया । हमारा भवचक्र बढ़ता चला जा रहा है । अगर हम स्वयं को देखेंगे तो हमारा संसार कम होगा । स्वयं को देखो, जानो । जब हम स्वयं को देखते हैं तो गहरे-गहरे चले जाते हैं । मन के पार हो जाते हैं । यह केवल बोलने की बात नहीं है, यह अनुभव है । जब तक आप अभ्यास नहीं करोगे तब तक कुछ नहीं हो सकता । श्वांस को ना देखते हुए और कोई कार्य करते हो तो प्रतिपल प्रतिक्षण आश्रव हो रहा है, कर्मोंं का बंधन हो रहा है । अगर हम श्वांस को देखते हैं तो हमारा ध्यान हो रहा है और ध्यान में कर्म-निर्जरा होती है । गुस्सा आए तो भीतर देखो । प्यास पैदा करो । ध्यान एक परम् औषधि है । इसके द्वारा सब कुछ प्राप्त होता है, आवश्यकता है इसे प्रयोगात्मक स्तर पर लाने की । हम ध्यान करें । अपने स्वभाव में आयें । 

आत्म: विकास कोस्र ‘एडवांस-ाा’ आज प्रातःकाल प्रारभ हुआ जिसके अनन्तर अनेक भाई बहिनों ने भाग लिया जिसमें औरंगाबाद, चण्डीगढ़, कनाडा आदि स्थानों से भाई बहिन पहुंचे हैं । 

 

मन की गति को प्रभु की ओर लगायें: आचार्य शिवमुनि

23 सितम्बर, 2005: जालंधर { राकेश }  श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज के जीवनोपयोगी एवं सारगर्भित प्रवचन प्रतिदिन शिवाचार्य सत्संग स्थल, लक्ष्मी पैलेस, गाजी गुल्ला रोड़ पर चल रहे हैं । आज के अपनेे मंगलमय प्रवचन में आचार्यश्रीजी ने फरमाया कि- मानव जीवन का सार प्रभु भक्ति है । प्रभु का चिन्तन करना है । हम उनका स्मरण कैसे करें । स्मरण करने के हजारों उपाय है । एक उपाय, एक संकल्प, एक भाव चुन लो । परमात्मा तक पहुंचने के लिए जो मार्ग अच्छा लगता हो वह धारण कर लो । हमें कुछ करने की जरूरत नहीं । ऊ ही जग का सार है । जीवन ही जीवन का आधार है । हम उससे प्रीति करें । ये तीन लाईने हमें सब कुछ बता देती है । नानक की वाणी में ऊॅंकार ही सब कुछ है । वही परमात्मा है, वही वाहे गुरू है । प्रभु वीर ने एक ही आत्मा और एक ही ज्ञान बतलाया । निजगुण में अन्तर नहीं है । धर्म सम्प्रदाय में अन्तर हो सकते हैं । 

ऊंॅंकार पंच परमेष्ठी का वाचक है । पांच पदों का सार है ऊॅंकार । अरिहंत से साधु तक सब कुछ ऊॅं में समाया हुआ है । ध्यान में श्वांस को देखने के लिए कहा । अपने को देखते-2 शान्त हो जाओ । चक्र पर ध्यान करो । आज्ञा चक्र, नाभि चक्र । ये दोनो चक्र ध्यान के लिए सुन्दर है । हर व्यक्ति का अपना-अपना चक्र होता है । वह चक्र उसे प्रभावित करता है । जो व्यक्ति जिसका ध्यान करता है वह वैसा ही बन जाता है । धोना है जो चेतना को धोवो । शरीर को प्रतिदिन धोते हैं और वह पसीने से सिक्त हो जाता है । मेल गन्दगी शरीर पर जम जाती है । भीतर के अहंकार, वासना, मोह, मिथ्यात्व को धोओ । मैली चादर है साबुन लगाओगे तो साफ हो जाएगी । अगर कुछ दाग पड़े है तो सर्फ लगाकर साफ कर सकते हो । हम अपने जीवन को देखें । मन की गति को प्रभु की ओर लगायें । मन को हर समय कुछ न कुछ काम चाहिए । मन को आते जाते श्वांस पर लगा दो । चिŸा स्वतः ही शान्त, निर्मल हो जाएगा । अगर श्वंास पर ध्यान नहीं लग रहा तो ऊॅंकार का उच्चारण करो ग्यारह बार, इक्कीस बार । अधिक से अधिक 108 बार तक उच्चारण कर सकते हो । मन शान्त हो जाएगा । यदि आप शान्ती चाहते हो तो अनेक उपाय है । 

स्वभाव में रहने के लिए चेतना के साथ श्रुति लगा दो । सुरति लगाने के लिए किसी प्रतिमा या लक्ष्य की आवश्यकता नहीं है, निर्वाण को प्राप्त करना है तो सभी गांठों को समाप्त कर दो । सारे कर्मों का क्षय सारे और संस्कारों का क्षय होने पर ही मोक्ष होगा । जिस प्रकार पिंजड़े में बंद पंछी पिंजड़े के टूटने पर आजाद हो जाता है उसी तरह यह शरीर एक पिंजड़ा है उसके भीतर चेतना रूपी एक पंछी है । जब चेतना चली जाएगी तो यह शरीर रूपी पिंजड़ा भी टूट जाएगा । संसार अपने लिए समाप्त हो जाएगा । यह संसार तो अनादिकाल से चल रहा है और चलता रहेगा । तुमने मोक्ष जाना है तो तैयारी कर लो । 

 

अरिहंतों ने मोक्ष का मार्ग बताया है । जो बच्चा जन्म लेता है वह क्रम से युवा होता है और वृद्ध अवस्था को भी प्राप्त करता है । एक दिन उसकी मृत्यु भी निश्चित है । यह शरीर तो मिटेगा । हम चेतना की ओर ध्यान दें । भीतर की आसक्ति को छोड़े । शरीर की आसक्ति तोड़नी हो तो भोजन को छोड़ना होगा । मूच्र्छा से किया हुआ भोजन पाप का कारण है । कोई भी कार्य जागरूकता से करोगे तो पुण्य प्राप्ति होगी । तुम जागरूकता, अप्रमत्ता के साथ रहो । भीतर के भाव को जाने । अपने स्वभाव में आयें । 

 

प्रभु नाम स्मरण कल्याणकारी है: आचार्य शिवमुनि

24 सितम्बर, 2005: जालंधर  श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज के जीवनोपयोगी एवं सारगर्भित प्रवचन प्रतिदिन शिवाचार्य सत्संग स्थल, लक्ष्मी पैलेस, गाजी गुल्ला रोड़ पर चल रहे हैं । आज के अपनेे मंगलमय प्रवचन में आचार्यश्रीजी ने फरमाया कि- मेरे मालिक तेरी नौकरी सबसे ऊँची है सबसे बड़ी । नौकरी हम सभी करते हैं । कोई दुकान में करता है । कोई पिता की करता है । कोई भाई की, पति की, पत्नी की करता है । नौकरी का अर्थ है गुलामी । जो मालिक कहता है वह करना, वह नौकरी है । आपने जिसको मालिक मान लिया उसके आप नौकर हो जाते हो । 

पुराने जमाने में पुरूषों की और स्त्रियों की बोली लगाई जाती थी । एक बार किसी व्यक्ति ने किसी को बोली में खरीद लिया । जिसको खरीदा वह नैेकर जिसने लिया वह मालिक हो गया । उसने उस व्यक्ति से पूछा कि तुम्हारा क्या नाम है । उसने कहा- आप मालिक हो आप जो नाम दोगे वही मेरा नाम होगा । फिर पूछा तुम कहां जाओगे तो उस व्यक्ति ने कहा तुम जहां ले जाओगे वहां जाऊंगा । इस सारी घटना में एक व्यक्तिं उनके साथ था उसने सोचा कि इतना समर्पण प्रभु के प्रति आ जाए तो इस व्यक्ति का कल्याण हो जाएगा । 

आज के युग में जिसके पास पैसा है वह अपने आपको मालिक समझता है । जिसके पास धन नहीं है वह गरीब हो जाता है, नौकर हो जाता है । जिसके पास धन है वह मालिक नहीं बल्कि जिसने अपने आपको पहचान लिया है वह मालिक है और उसकी नौकरी ही वास्तव में नौकरी है । जिसके पास धन है वह तो परेशान, दुःखी है । जो संसार की चीजों में शामिल होता है वह दुःखी होता है । नानक ने भी कहा है- ‘नानक दुःखियां सब संसार’ -जो परमात्मा है वह सुखी है और दूसरों को भी सुखी करता है । ऐसे मालिक की नौकरी करना । मालिक यानि प्रभु कहीं बाहर नहीं है । वह भीतर विराजमान हैं । आपको कहीं बाहर खोजने की आवश्यकता नहीं है । जो उस मालिक की नौकरी करता है वह भी मालिक बन जाता है । वह नौकर भी सौभाग्यशाली है । नौकरी का अर्थ है अपने अहंकार को प्रभु के चरणों में समर्पित कर देना । उस मालिक को याद करने का बहुत ही सुन्दर और सरल साधन है प्रभु के गुणों को याद करना । प्रभु का नाम स्मरण करना । प्रभु की प्रार्थना करना । किसी भी भगवान का नाम लो कोई फर्क नहीं पड़ता । स्तुति और नाम के साथ आपकी भीतर की भावना जुड़नी बहुत आवश्यक है ।  

चंदनबाला ने प्रभु महावीर की नौकरी की थी । मीरा ने कृष्ण की गुलामी की थी । उन्होंने अपने जीवन को धन्य किया । गांधीजी भी हररोज नाम स्मरण किया करते थे । उनसे कहा गया कि आप यह नाम स्मरण छोड़कर समाज की सेवा करो तो समाज का और भी कल्याण होगा । गांधीजी ने उस व्यक्ति को जवाब दिया कि मैं भोजन तो छोड़ सकता हूॅं परन्तु प्रभु का नाम स्मरण नहीं छोड़ सकता । ऐसी लगन और श्रद्धा के साथ प्रभु से जुड़ जाना । प्रभु नाम स्मरण उनके गुणों को भीतर लाता है । जो व्यक्ति जीवन भर नाम स्मरण करता है उसका सम्पूर्ण जीवन तो शान्ति से व्यतीत होता ही है परन्तु अन्तिम समय में भी उसे समाधि मरण आता है । 

 

वस्तु का निजगुण ही धर्म है: आचार्य शिवमुनि

25 सितम्बर, 2005: जालंधर श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज के जीवनोपयोगी एवं सारगर्भित प्रवचन प्रतिदिन शिवाचार्य सत्संग स्थल, लक्ष्मी पैलेस, गाजी गुल्ला रोड़ पर चल रहे हैं । आज के अपनेे मंगलमय प्रवचन में आचार्यश्रीजी ने फरमाया कि- वस्तु का निज-गुण ही धर्म है । जो वस्तु जैसी है वह वैसी ही  रहेगी । हमारा जीवन आनंद और श्रेष्ठता से भर जाता है । प्रभु महावीर की मैत्री कहती है:-

हमने कांटो को भी नरमी से छुआ है ।

बेदर्द है वे लोग जो फूलों को मसल देते हैं ।

यह है प्रभु की दृष्टि, दर्शन । जिससे सिद्धि मोक्ष की प्राप्ति हो वह धर्म है । हम कोई भी कार्य करते है तो वह कार्य तीन ढंग से सम्पन्न होता है, मन, वचन और काया । जब तीनों एक कार्य में लग नहीं जाते तब तक कार्य सम्पूर्ण नहीं होता । पाप का नाश और पुण्य कर्म के उपार्जन से धर्म की प्राप्ति होती  है । मन के कुछ ऐसे विचार हैं जिससे कर्म का नाश होता है, पुण्य का बंध होता है । वह विचार मन धर्म के अनुकूल है । बोलने से पुण्य बंध होता है और पाप क्षय होता है तो हम धर्म में है । वाणी व्यवहार से भी कर्म-क्षय होता है । शरीर की अलग-2 प्रवृत्तियां है । कुछ प्रवृतियां पुण्य बांधती है । कुछ प्रवृतियां पाप बांधती है । कुछ ऐसी प्रवृत्तियां है जो ना पुण्य बांधती है, ना पाप बांधती है । वहां केवल कर्मों का नाश होता है, वहीं पर धर्म है । मन, वचन, काया को संभालना बड़ा कठिन है । 

मानव की देह हमें बहुत पुण्य कर्म से मिली । मानव जन्म बड़ी प्रार्थना, साधना और तपस्या के बाद प्राप्त हुआ । इस जन्म में आकर मोक्ष प्राप्ति तक ना पहुंचे । धर्म का मर्म प्राप्त नहीं हुआ तो कुछ भी नहीं पाया । मोक्ष वही है जहां सारे कर्मों का क्षय हो जाता है । ना पुण्य बचता है ना पाप बचता है । समता, वीतरागता से हम मोक्ष की ओर अग्रसर हो सकते हैं । हर कार्य को समता और वीतरागता से करो । स्वयं का चिन्तन, अध्ययन, ध्यान करो । अपना अपनी आत्मा का अपने द्वारा ध्यान करो ंऔर कुछ हो जाए तो प्रायश्चित कर लो ं। जब तुम्हारा चिŸा प्रभु से मिल जाता है तब भीतर अनंत करूणा प्रस्फुटित होती है । दूसरे के दर्द का अनुभव आपको सर्वप्रथम हो जाता   है ।

हमारी इतनी ग्राहकता बने कि संसार के सभी प्राणियों के प्रति हमारे भीतर मैत्री का भाव आए । शुद्धात्मा का चिन्तन सतत् चलता रहे । घर स्वर्गमय बन जाए । विनम्रता में आ जाए । स्वर्ग की चार निशानियां व्यवहारिक दृष्टि से बतलाई गई है । जिस घर में कनक पुरानी हो और घी नया हो । घर में कुलवान स्त्री हो और आंगन में बच्चा खेलता हो वह घर स्वर्ग समान है । जिस घर की स्त्री कलह करती हो । जिस घर में मेले कपड़े हो उस घर का कर्जा बढ़ा हुआ हो । भाई-2 आपस में लड़ते हो यह नरक की निशाइयां हैं । हमारे भीतर ही सब कुछ है । हम अपने स्वभाव में आए । अपने घर को स्वर्ग बनायें । 

आज आचार्यश्रीजी के दर्शनार्थ बरनाला, पट्टी, घोड़नदी, पूना, लुधियाना, चण्डीगढ़ आदि स्थानों से भाई बहिन पहुंचे ं। आत्म: विकास कोर्स एडवांस-ाा आज बड़े ही सुन्दर ढंग से सम्पूर्ण हुआ । आगामी आत्म: विकास कोर्स एडवांस-ााा 1 से 7 अक्टूबर, 2005 तक  होगा । जो भी भाई बहिन भाग लेना चाहें शीघ्र ही रजिस्ट्रेशन करवायें । सम्पर्क सूत्र 9872294875

 

नाम स्मरण जिन्दगी का सबसे बड़ा सहारा है: आचार्य शिवमुनि

26 सितम्बर, 2005: जालंधर { अमर उजाला }  श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज के जीवनोपयोगी एवं सारगर्भित प्रवचन प्रतिदिन शिवाचार्य सत्संग स्थल, लक्ष्मी पैलेस, गाजी गुल्ला रोड़ पर चल रहे हैं । आज के अपनेे मंगलमय प्रवचन में आचार्यश्रीजी ने फरमाया कि- इस मानव जीवन को सुन्दर बनाने के लिए प्रभु नाम का ही आधार है । हमारे जीवन में अनुकूल प्रतिकूल घटनाएं घटती रहती है । दीया जलता है तो प्रकाश देता है । जब हम प्रभु का नाम स्मरण करते हैं तो हमारे भीतर दीया जलता   है । नाम स्मरण जिन्दगी का सबसे बड़ा सहारा है । नानक की वाणी तीन शब्दों में समायी है- कृत करना, नाम जपना और बांटकर खाना । नानक ने कहा- अकेले खाना पाप है, बांटकर खाना पुण्य है । कोई भी कार्य करो बांटकर करो । सब मिलकर करो । भक्ति, ध्यान, सत्संग जब हम मिलकर करते हैं तो उसका लाभ हमें बहुत मिलता है । जिस प्रकार एक दीया जलता है तो उसकी रोशनी थोड़ी होती है और पचास दीये जलते हैं तो उनका प्रकाश ज्यादा होता है । कोई भी शुभ कार्य करो उसे बांट लो । 

प्रातःकाल आपकी आंख खुलती है तो आप किसको याद करते हो । रात को सोते हो तो जो अन्तिम विचार आपका होता है वही प्रातःकाल का प्रथम विचार आपका होता है । यदि रात को सोते समय आप दुःख, उलझन, पीड़ा में हो तो उठते समय वही याद रहेगी । सोते समय शान्ति भीतर रहेग तो उठते समय शान्त भाव आएगा । सुबह उठते ही आप जिस नासिका से श्वांस आता हो उस पांव को नीचे रखकर अरिहंत को स्मरण करो । प्रार्थना करो, हृदय और आंखे नम हो जाएं । अरिहंत प्रभु को याद करो । वे सर्वोपरि, सर्वज्ञ हैं । धर्म, ज्ञान, देशना देने वाले हैं । तीर्थ की स्थापना करने वाले हैं । मैत्री और करूणा को देने वाले अरिहंत हैं । हमने धर्म किया तभी तो हमें यह उत्तम मानव जन्म मिला । इस दुनिया में मानव जन्म सबने पाया परन्तु सबको इन्द्रियां नहीं मिली । इस संसार में लाखों लोग ऐसे हैं जिनका धर्म से कोई वास्ता नहीं है । प्रभु महावीर ने चार पुरूषार्थ बतलाये हैं, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष । धर्म करोगे तो मोक्ष की प्रप्ति होगी । अर्थ करोगे तो काम की ओर जाओगे । धर्म करने के हजारों ढंग हैं । धर्म किया तो सब कुछ मिला । परिपूर्ण इन्द्रियां, उत्तम स्वास्थ्य, सुन्दर परिवार और सद्गुरू मिले । हमारे पास जो है हमें उसकी कद्र नहीं है । जो नहीं है उसके लिए हम अनेको ंप्रार्थनाएं करते हैं ।

मुंह के अन्दर 32 दांत है । एक दांत टूट जाए तो जिह्वा बार-बार उस स्थान पर जाती है । दांत के टूटने पर ही दांत का मूल्य ज्ञात होता है । हमें जो मिला है हम उसकी परवाह नहीं करते और जो नहीं है उसके लिए शिकायत करते हैं । अरिहंत प्रभु ने हमें सब कुछ दिया है । वे धर्म की आदि करने वाले हैं । प्रभु ऋषभदेव से प्रभु महावीर तक 24 तीर्थंकर हुए हैं । ऐसी अनंत चैबिसियां बीत गई । अरिहंत प्रभु ही शाश्वत हैं । उनकी आत्मा ज्ञान दर्शन से युक्त हैं । बाकी सब बाहर के संयोग है । अरिहंत के स्मरण से बुद्धि निर्मल होती है । चित्त शुद्ध होता है । नमोत्थुणं का पाठ पढ़ो । अरिहंतों की स्तुति नमोत्थुण में समाई हुई है । लोगस्स का पाठ पढ़ो जिसके अन्तर 24 तीर्थंकर भगवंतों की स्तुति है । सब कुछ हमारे पास है हम उसे अपनाएं । धर्म इस लोक, परलोक, तीनों लोग में सुखकारी है । उठते, बैठते, सोते, जागते धर्म की शरण ग्रहण करें । अरिहंतों का स्मरण करें । 

आगामी आत्म: विकास कोर्स एडवांस-ााा 1 से 7 अक्टूबर, 2005 तक एवं बेसिक कोर्स 8 से 12 अक्टूबर, 2005 तक प्रातः 5.30 से 7.30 बजे तक होगा। रजिष्ट्रेशन हेतु सम्पर्क सूत्र:- 9872294875

 

प्रभु चरणें में बैठने पर की शुद्धि होती है: आचार्य शिवमुनि

27 सितम्बर, 2005: जालंधर { दैनिक जागरण }  श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज के जीवनोपयोगी एवं सारगर्भित प्रवचन प्रतिदिन शिवाचार्य सत्संग स्थल, लक्ष्मी पैलेस, गाजी गुल्ला रोड़ पर चल रहे हैं । आज के अपनेे मंगलमय प्रवचन में आचार्यश्रीजी ने फरमाया कि- संसार के सभी धर्मोपदेशकों, उपनिषद् के ऋषियों, बुद्ध के भिक्षुओं, प्रभु महावीर के मुनियों ने एक ही बात कही धर्म का अर्क बतलाया । मैत्री का संयोग बतलाया । कोई भी मानव कार्य करें उसके पीछे मधुर मुस्कान होना आवश्यक है । उसका अन्तःकरण उदार हो । चाहे वह उपवास, स्वाध्याय, प्रार्थना, सेवा कोई भी कार्य करें उसके भीतर सतत् प्रेम, अनुकम्पा की धारा बहे । अगर ऐसा होता है तो मानव धर्म की ओर अग्रसर हो रहा है और भीतर क्रोध बढ़ रहा है तो धर्म नहीं हो रहा है । धर्म की सीधी और सरल पहचान भीतर बाहर की मुस्कान है । बच्चा दिल का साफ होता है उसका अन्तःकरण और बाह्य व्यक्तित्व एक-सा होता है । इसीलिए कहा है कि- बच्चों जैसे सरल बनो । अपने जीवन को मधुर बनाओ । तन से मन से और वाणी से अमृत के कण बरसाओ । अमृत और विष दूर नहीं ।

हिन्दुओं की मान्यता है कि जब समुद्र मंथन हुआ था तब चैदह वस्तुएं प्राप्त हुई थी उस समय अमृत और विष दोनों ही प्राप्त हुए थे । अमृत पीने के लिए सभी तैयार थे पर विष पीने के लिए कोई   नहीं । हम विष पीकर भी अमृत देने वाले बने । मिश्री खाई और जबान से गालियां निकली तो यह अच्छा कार्य नहीं हुआ । मिर्च या करेला खाया हो और जबान से किसी के लिए कल्याण की बात निकलती है तो यह सुन्दर कार्य है । प्रभु महावीर को छः माह भोजन नहीं मिला, कानों में कीले ठोके गए । राम, बुद्ध, नानक, ईसा सबको कष्टों का सामना करना पड़ा फिर भी उन्होंने अपने मुंह से एक शब्द भी नहीं   निकाला । जीवन में कड़े, खट्टे, मीठे अनुभव आते रहते हैं । फल कच्चा है तो कड़वा और खट्टा लगता है परन्तु वही फल पकने पर मीठा हो जाता है । जीवन की ग्रहण शक्ति पर कड़वाहट और मीठापन निर्भर है । मानव और पशु में यही अन्तर है कि मानव को बुद्धि मिली है । मानव के पास भाषा है । मानव भाषा द्वारा समाज, देश, राष्ट्र, परिवार में अपना स्थान स्थापित कर सकता है । वर्णमाला के शब्दों द्वारा भक्ति, प्रार्थना कर सकता है और उन्हीं शब्दों द्वारा गाली गलौच भी कर सकता है । चुनाव हमारा है कि हम धर्म की ओर आगे बढ़ें या संसार की ओर । 

धर्म जीवन जीने की कला है । धर्म हमें जीवन जीना सिखाता है । जब तक हमारे भीतर जीवन जीने की कला नहीं आई तब तक स्वर्ग और मानवता की बातें करना व्यर्थ है । जब संकट जीवन में आए तो एक विश्वास धारण करना कि संकट आया है तो टलेगा भी । जिस प्रकार सूरज उदय होता है और अस्त होता है । एक पौधे में फूल भी हैं कांटे भी उसी प्रकार जीवन में सुख दुःख भी है । आचार्य मानतुंग ने जीवन में आए हुए संकटों को ध्यान न देते हुए प्रभु ऋषभदेव की महान् भक्ति की और उस भक्ति से ही भक्ताम्बर स्तोत्र की रचना हुई । एक-एक श्लोक महान् प्रभावशाली है । प्रत्येक शब्द में प्रभु के जीवन, शरीर और समवसरण की कल्पना है । हम भक्ति करें । अनुभव करें कि हम प्रभु के चरणों में बैठे हैं और उनकी वाणी श्रवण कर रहे हैं । प्रभु चरणों में बैठने पर चिŸा की शुद्धि होती है । भोजन से पूर्व चिŸा को टटोलना । समता से चित्त को भरना है । अगर भीतर समता आ गई तो सब कुछ साध्य हो जाएगा । क्रोध से की गई क्रिया हमें अधोगति की ओर ले जाती है । भीतर अहंकार क्रोध ईष्र्या हो तो प्रार्थना और भक्ति नही ंहो सकती । अपने आपको देखों । अपनी श्वांस को देखो भीतर सुख दुःख भरा है । हम उनमे ंसे शान्ति को प्राप्त कर लें । जिस प्रकार पौधे के ऊपर फूल और कांटे में फूल का चुनाव सर्वप्रथम होता है, उसी तरह हम शान्ति को प्राप्त करें । समुद्र में कंकर-पत्थर और मोती हैं । हम मोती को चुने । अपने लिए समय निकाले । तन, मन और वचन से सत्कार्य करें । 

आगामी आत्म: विकास कोर्स एडवांस-ााा 1 से 7 अक्टूबर, 2005 तक एवं बेसिक कोर्स 8 से 12 अक्टूबर, 2005 तक प्रातः 5.30 से 7.30 बजे तक होगा। बच्चों के लिए भी संस्कार शिविर 8 से 12 अक्टूबर, 2005 को दोपहर 3.00 से 5.00 बजे तक होगा । रजिष्ट्रेशन हेतु सम्पर्क सूत्र:- 9872294875

-ः शिवाचार्यश्रीजी का कन्या महाविद्यालय में ध्यान साधना पर विशेष लेक्चर सम्पन्न:-

श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज का कन्या महाविद्यालय {के0एम0बी0 कालेज} पदार्पण पर प्रिंसीपल श्रीमती ऋता बावा, स्टाॅफ मेम्बर्स एवं वहां अध्ययन कर रही छात्राओं ने हार्दिक स्वागत एवं अभिनन्दन किया । इस अवसर पर आचार्यश्रीजी ने अपने भाव अभिव्यक्त करते हुए कहा कि- कन्या महाविद्यालय के प्रिंसीपल, स्टाॅफ मेम्बर आप सभी से मिलकर हार्दिक प्रसन्नता का अनुभव हुआ । यह काॅलेज प्राकृतिक सौन्दर्य से भरा हुआ है । ऐसा लगता है जैसे हम किसी महाविद्यालय में नहीं मन्दिर में प्रवेश कर रहे हैं । इस काॅलेज का अनुशासन, सभ्यता, संस्कृति बहुत सुन्दर है । भारत की शक्ति मां के रूप में सदैव श्रद्धेय और वंदनीय रही है । हमारे समक्ष महात्मा गांधी के पीछे भी उनकी मां का हाथ था । मां का व्यक्तित्व उच्चता और गौरवता को लिए हुए है । भारत की संस्कृति में मां का स्थान प्रथम है । एक बच्चा पांच वर्ष की उम्र तक मां से 60 प्रतिशत शिक्षा प्राप्त करता है । ऋषियों मुनियों ने भी मां को आद्य शक्ति मानकर नमन किया है । मां की शक्ति, भक्ति और प्रेम सर्वोच्च है । चाहे आज पश्चिमी सभ्यता अपना रूप भारतीय संस्कृति पर दिखा रही है पर वहीं पर भारतीय संस्कृति भी उज्ज्वलता से आगे बढ़ रही है । सीता ने राम को चैदह वर्ष वनवास में साथ दिया । कस्तूरबा ने गांधी का साथ दिया । 

उपनिषद् में वर्णन आता है कि जब पति-पत्नी 60 वर्ष के पार हो जाए तो उनका संबंध एक भाई बहिन का, मां- पुत्र का बन जाए । रामकृष्ण की बारह साल की उम्र में शादी हुई । जिस दिन उनकी शादी हुई उसी दिन उन्होंने शारदा के चरणों में ग्यारह रूपये रखकर उसे अपनी मां स्वीकार कर लिया । भारत की मां नारी का उज्ज्वल प्रतीक है । वर्तमान समय में वह रूप बिखरा हुआ नजर आ रहा है । भारत की नारी-शक्ति के समक्ष पुरूष झुकता जा रहा है । सीता के सामने रावण को भी झुकना पड़ा । हमारी धर्म-संस्कृति का नाता सहृदयता, करूणा का नाता है । आज प्रभु महावीर, मोहम्मद नहीं है पर उनको गौरव से याद किया जाता है । विवेकानंद जैसे व्यक्तित्व ने भारत का नाम विश्व में चमका दिया । बचपन में मां के द्वारा उन्हें उज्ज्वल संस्कार प्राप्त हुए थे । उनके भीतर यह चाहना थी कि मैं एक घोड़ा चालक बनूं तो मां ने कहा अगर सारथी बनना है तो कृष्ण के समान बनना । उन्होंने धर्म को विश्व में फैलाया । हम सबकुछ बन सकते हैं आवश्यकता है एक संकल्प की । 

यह काॅलेज उत्तरी भारत की सर्वश्रेष्ठ संस्था है । यहां पर भारतीय संस्कृति कें गुणों की पूजा होती है । मानव के भीतर करूणा, मैत्री, पूजा जैसे भीतरी गुण भरे हुए हैं । हमारा नैतिक कर्तव्य है कि हम उन्हें उजागर करें । यह जीवन परम शान्त, सागर के समान गंभीर और आनंदमयी बने, इसके लिए आवश्यक है हम जीवन में ज्ञान-रूपी हीरे मोती को उजागर करें । अन्तिम श्वांस तक ज्ञान प्राप्ति की चाहना हमारे भीतर हो । आज की शिक्षा अधूरी है । हर बच्चे को टेंशन, डिप्रेशन, निराशा, दुःख, बैचेनी प्राप्त हो रही   है । हम भौतिक शिक्षा तो प्राप्त कर लेते हैं पर जीवन जीने की कला नहीं सीख पाते । जीवन केा कुछ वर्ष बाद बोझ समझने लग जाते हैं । बच्चों को पढ़ाई का बोझ ना लगे और उनके भीतर आनंद, पे्रम, करूणा के भाव उजागर हों इसलिए आवश्यक है हम सकारात्मक सोच अपनाएं । हर परिस्थिति को स्वीकार करें । सुन्दरता स्वतः प्राप्त होगी । जिस व्यक्ति की जो योग्यता है उसे उसी योग्यता में आगे बढ़ाएं । हजार कांटों के बीच गुलाब खिलता है हम गुलाब को ग्रहण करें । चुभन को भुल जाएं । अगर एक गुलाब की सुगंध प्राप्त करनी है तो कांटों को भी ग्रहण करना पड़ेगा । वर्तमान की शिक्षा को सुन्दर बनाने के लिए ध्यान सबसे शक्तिशाली है । विश्व के सभी महापुरूषों ने ध्यान को महत्व दिया । ध्यान यानि कुछ भी नहीं करना । ध्यान स्वतः घटित होता है । ध्यान से विश्व शक्ति की प्राप्ति होती है । ध्यान हमारा स्वभाव है । हम ऊँकार का ध्यान करें । ऊँ को सभी धर्मों ने माना है । यह एक ध्वनि है इसके द्वारा हमारा सिर से लेकर पांव तक सारा शरीर प्राण ऊर्जा से भर जाता है । 

इस अवसर पर आचार्यश्रीजी ने सभी को ऊंकार का ध्यान करवाया । श्रमण संधीय मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म0 ने ध्यान साधना का परिचय दिया और जीवन में ध्यान के महत्व को बतलाया । इस अवसर पर शिवाचार्य चातुर्मास समिति की ओर से मार्गदर्शक श्री आर0सी0 जैन द्वारा प्रिंसीपल डाॅ0 ऋता बावा को सम्मानित किया गया । 

इस अवसर पर प्रिंसीपल ऋता बावा ने अपने विचार रखते हुए कहा कि- ऐसा क्षण मेरी जिन्दगी में कभी नहीं आया । आपके चरणों में अजीब पवित्रता महसूस होती है । ऐसा लग रहा है कि इस महान् धरती पर और पवित्र प्राण तत्व सृजित हुए हैं । आपके श्रीचरणों से यह महाविद्यालय सुगंधित हुआ है । एक अपूर्व सुगंधि से भर गया है इसका अनुभव मैंने ही नहीं मेरे सभी डेढ़ सौ टीचर्स लोगों ने किया । आपके भीतर जो महाशक्ति है वह देखते ही बनती है । आपके विचार शिक्षा को मुक्ैित की ओर ले जाने वाले हैं । व्यक्तित्व को गरिमापूर्ण करने की बात आपने कही है । जीवन में सुख दुःख तो आते ही रहते हैं । हमें बहुत कुछ मिला है । हम ईश्वर के प्रति कृतज्ञ   बनें । किसी ने हमें चोट दी है तो उसने हमे ंनिखरने का आधार दिया है । किसी ने हमें गलती का अहसास कराया है तो वह वापस ना दोहराने के लिए बतलाया है । एक दुविधा आती है तो सौ सुविधाएं बन जाती हैं । एक चोट से दस बार सुधरने का समय मिलता है । ईश्वर हमें हाथ पकड़कर आगे चलाता है । हम उसकी शरण ग्रहण करें । हम कमियों के कारण रोये ना । शान्ति का कारण ढूंढें । आपने हमारे यहां आकर अनंत कृपा की है जिसे हम जिन्दगी भर नहीं भूल  सकते । आपने हमें जो संदेश दिया है वह अनमोल है । ध्यान लगाने से आन्तरिक प्रकाश और पवित्रता की अनुभूति हुई । मेरी ऐसी भावना है कि भारत की पवित्र और महान् धरा पर आप जैसे महापुरूष संस्कारों का सिंचन करें । चिन्ता मिटाकर चिन्तन की ओर ले जाएं । मैं तो अकिंचन हूंूं । कहना नहीं आता । केवल एक कृतज्ञता और आपकी कृपाकांक्षी हूॅं । 

 

मन से की गई माला अनेकों कष्ट दूर करती है: आचार्य शिवमुनि

28 सितम्बर, 2005: जालंधर { अमर उजाला }  श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज के जीवनोपयोगी एवं सारगर्भित प्रवचन प्रतिदिन शिवाचार्य सत्संग स्थल, लक्ष्मी पैलेस, गाजी गुल्ला रोड़ पर चल रहे हैं । आज के अपनेे मंगलमय प्रवचन में आचार्यश्रीजी ने फरमाया कि- प्रभु का सतत् सिमरण प्रभु को याद करना । जो प्रभु नाम का सिमरन करता है, माला फेरता है उसका जीवन अमर हो जाता है । वह प्रभु भक्ति की ओर अग्रसर हो जाता है । माला मन से फेरो । माला फेरने से हमारे अनेकों कष्ट और जन्म-मरण भी दूर हो जाते हैं । चाहे वह कोई भी हो परमात्मा, ईश्वर, राम, कृष्ण, महावीर, अल्ला, रहवर, साईबाबा तुम्हें जो नाम आता है उसे निरन्तर पकारों । उठते- बैठत्ेा, सोते जागते सतत् उसकी याद बनी रहे । कबीर ने कहा- माला फेरत जुग गया, मिटा न मन का फेर ।

  कर का मनका छोड़ के, मन का मनका फेर ।।

युग बीत गया लोग माला जप रहे हैं । हजारों मालाएं टूट गई । आसन घिस गए । मुख वस्त्रिकाएं बदल गई फिर भी व्यक्ति माला कर रहा है । माला अनेकों की पर मन में शान्ति नहीं हुई । करेला खाया कड़वाहट नहीं आई या मिश्री खाई मीठापन नहीं लगा यह बात असंभव सी लगती है परन्तु माला फेरने पर भी शान्ति नहीं मिली यह बात भी असंभव सी है । वस्तु का जो गुण है वह वस्तु में दिखता है, जिस प्रकार हमारे जीवन जीने का एक ढंग है उसी प्रकार माला करने का भी एक ढंग है । माला करने से मन, हृदय पवित्र नहीं हुआ तो माला करने का कोई लाभ नहीं । नानक के पास हिन्दू और मुसलमान दोनों ही जाते थे और नानक को वे दोनों ही अपना मानते थे । एक बार नानक एक गांव में सत्संग कर रहे थे । गांव का मालिक नवाब था । नानक प्रार्थना की बात कर रहे थे पर उन्होंने नमाज की बात नहीं की । नवाब को यह बात अच्छी नहीं लगी । नवाब ने कहा हिन्दू मुसलमान एक हैं । पर कभी हमने आपको नमाज पढ़ते नहीं देखा । नानक ने कहा- हम नमाज भी पढे़गें, समय तय हो गया । शुक्रवार को नवाब के साथ नमाज पढ़ना शर्त थी । नवाब भी साथ में नमाज पढेगा । नमाज शुरू हुई । नवाब विधि करता चला गया परन्तु नानक ने कोई विधि नहीं की । नमाज पूरी होने पर नवाब गुस्से में आकर बोला कि आपने नमाज नहीं पढ़ी । तब नानक ने कहा कि हमारी यह शर्त थी कि तुम नमाज पढ़ोगे तो हम भी नमाज पढ़ेंगे । तुम नमाज के समय घोड़े खरीद रहे थे । तुमने नमाज नहीं पढ़ी इसलिए मैंने भी नमाज नहीं पढ़ी और यह मौलवी जो नमाज करवा रहा था यह स्वयं फसल काट रहा था । इस प्रकार नानक ने इस दृष्टान्त के द्वारा यह मतला दिया कि मन से किया हुआ कार्य ही सचमुच कार्य है । 

दिल में खुशी हो तो सब बातें अच्छी लगती है । दिल में दर्द हो तो हर बात बुरी लगती है । हम ऊपर से माला, प्रार्थना करते रहें परन्तु मन को साधे ही नहीं । मन को भीतर लगाएं ही नहीं तो उसका कोई फल नहीं । प्रार्थना मन को भिगोने का साधन है । तुम बोलो ना बोलो भीतर से हाथ जुड़ जाए तो प्रार्थना हो जाएगी । हम मन को बदलें । मन को जाने और देखें । प्रार्थना और मालाएं तो अनेकों फेर ली पर मन वहीं का वहीं है । भीतर क्रोध चंचलता है तो माला फेरने का कोई लाभ नहीं । व्यक्ति के अन्दर नम्रता हो । ग्रहण करने की अनुकम्पा हो । हम अपने जीवन जीने की पद्धति को ठीक करें । इस ब्रह्माण्ड में सब कुछ है देव, दानव, मानव जिसको जो अच्छा लगे वही कार्य करते हैं । मधुमक्खी फूल का रस लेकर आनंद से समय व्यतीत करती है । हमें जो अच्छा लगे उसे ग्रहण करें । हमारी बुद्धि, विवेक, चिन्तनशील हो । प्रभु के नाम की माला भीतर हर समय चलती रहे । अपनी दृष्टि को हम सम्यक्    बनाये । प्रभु सिमरन में भक्ति में डूबें ।

आगामी आत्म: विकास कोर्स एडवांस-ााा 1 से 7 अक्टूबर, 2005 तक एवं बेसिक कोर्स 8 से 12 अक्टूबर, 2005 तक प्रातः 5.30 से 7.30 बजे तक होगा। बच्चों के लिए भी संस्कार शिविर 8 से 12 अक्टूबर, 2005 को दोपहर 3.00 से 5.00 बजे तक होगा । रजिष्ट्रेशन हेतु सम्पर्क सूत्र:- 9872294875

 

आत्म-दृष्टि से मोक्ष की प्राप्ति होती है: आचार्य शिवमुनि

29 सितम्बर, 2005: जालंधर { अमर उजाला }  श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज के जीवनोपयोगी एवं सारगर्भित प्रवचन प्रतिदिन शिवाचार्य सत्संग स्थल, लक्ष्मी पैलेस, गाजी गुल्ला रोड़ पर चल रहे हैं । आज के अपनेे मंगलमय प्रवचन में आचार्यश्रीजी ने फरमाया कि- प्रभु महावीर ने हमें एक दृष्टि, दर्शन, ज्ञान, आचरण, तप दिया है । वह परम उपकारी है । इस संसार में दो दृष्टियां हैं, आत्म-दृष्टि और कर्म-दृष्टि । आत्म-दृष्टि हमे मोक्ष, सुख और आनंद की ओर ले जाती   है । कर्म दृष्टि संसार की ओर ले जाती है । दृष्टि यानि दर्शन । जैसा देखोगे वैसा दिखाई देगा । जैसा चश्मा लगाओगे वैसा ही दिखाई देगा । इस संसार में बहुत थोड़ें लोग हैं जो आत्म-दृष्टि पर चलते हैं । आत्म-दृष्टि समझ गई तो सारे शास्त्रों का निचोड़ आ गया । प्रभु महावीर ने पहले ज्ञान पीछे दया बतलाया है । ज्ञान है तो दृष्टि सम्यक् होगी । ज्ञान नहीं तो दृष्टि सम्यक् नहीं हो सकती । हमारा परम् सौभाग्य है कि हमें परम् प्रभु महावीर के तीर्थ में स्थान मिला । तीर्थ में साधु साध्वी श्रावक श्राविका आते हैं । साधु सच्चा साधु बनें । श्रावक सच्चा श्रावक बनें । अगर श्रावक सत्यता से श्रावक-व्रतों की आराधना करता है तो वह तीन भव में मोक्ष को प्राप्त कर सकता है । श्रावक को आत्म-दृष्टि की आवश्यकता है । संसार की दृष्टि और आत्मा की दृष्टि अलग-2 है । प्रभु महावीर ने अनेकान्त दर्शन दिया । उन्होंनें कभी किसी को गलत नहीं कहा । चारवाक को भी गलत नहीं कहा । चारवाक शरीर को महत्व देते थे । प्रभु महावीर का ज्ञान विद्यापीठ, काॅलेज, स्कूल में प्राप्त नहीं हो सकता । प्रभु महावीर का ज्ञान आत्म-पीठ से मिलता है । भीतर के अवलोकन से मिलता है । कम्प्यूटर ज्ञान दे सकता है पर ज्ञानी नहीं हो सकता । हम ज्ञान से बुद्धि को अलग और चेतना को अलग मानें ।

प्रभु ने ज्ञान के लिए कसौटी दी है परख हमारी है, हम क्या स्वीकार करें । ज्ञानी वह है जिसे तत्व का बोध हो गया । जिसने चिŸा का निरोध कर लिया । जिसे आत्मा की विशुद्ध स्थिति प्राप्त हो गई । जिसके भीतर मैत्री बढ़ रही है । राग-द्वेष कम हो रहा है और श्रेय की प्राप्ति हो रही है तो वह जिनशासन की दृष्टि से ज्ञान   है । जीव और अजीव दो ही तत्व है । जीव और अजीव को देखने मात्र से पता लग जाता है । सेठ सुदर्शन को तत्व का बोध । वे शरीर और चेतना को अलग-2 समझते थे । प्रभु के सामने सेठ सुदर्शन और अर्जुनमाली दोनो ही आए । प्रभु ने दोनों को सम्यक् दृष्टि से देखा । अर्जुनमाली हत्यारा था फिर भी प्रभु ने उसे दीक्षित किया क्योंकि वह मोक्षगामी जीव था । सम्यक् दृष्टि से शरीर और आत्मा के भीतर भेद-ज्ञान होता है । भेदज्ञान की तैयारी के लिए साक्षी भाव में रहो । खाना खाओ तो भीतर सोचो कि मेरा शरीर खाना खा रहा है । मैं ज्ञाता-दृष्टा हूँ । इस प्रकार प्रत्येक कार्य करो तो शुद्ध आत्म-भाव में स्थित रहो । जिस दिन तत्व का बोध हो जाएगा उस दिन सबओर परमात्मा ही नजर आएगा, मैत्री से भर जाओगे । सामायिक का शुद्ध आचरण होगा । हम कोई भी क्रिया करें उसके पीछे हमारा दिखावा ना हो । बाहर कुछ और भीतर कुछ ऐसा ना हो । कहते हैं एक तपस्वी मास खमण करता है और पारणे में कुसा के अग्र भाग जितना भोजन ग्रहण करता है और माया करता है तो वह संसार बढ़ाता है और एक मुनि सम्वत्सरी के दिन भी भूखा नहीं रह सकता । भोजन ग्रहण करता है पर भीतर आत्म-ग्लानि, पश्चाताप के भाव लाता है तो वह शीघ्र ही मोक्ष को प्राप्त होता है । गांव के लोग सरल होते हैं । उनके भीतर भक्ति होती है । भक्ति तब होती है जब भीतर चिŸा की सहजता, सरलता हो । भक्ति के लिए भी आत्म-दृष्टि जरूरी है । तŸव का बोध भीतर से होता है । ऐसे समय में कर्म की क्षय-धारा प्रारंभ होती है और व्यक्ति मोक्ष की ओर अग्रसर होता   है । 

प्रभु महावीर के दस श्रावकों का वर्णन शास्त्र के अन्तर्गत आता है । उन्हें तत्व का बोध था । शरीर और आत्मा के भीतर भेद-ज्ञान था । उनके पास विपुल धन सम्पत्ति थी फिर भी वे एक भव करके मोक्ष जाएंगे । वे सच्चे श्रावक बनें । उन्होंने ‘अम्मा पियरो’ की भूमिका निभाई । तीर्थ में किसी की निन्दा नहीं हो सकती । तीर्थ का हर प्राणी आज नहीं तो कल मोक्षगामी है । इसलिए हम तीर्थ की निन्दा न करें । चित्त का निरोध योग के बिना नहीं हो सकता, उसके लिए भोजन का नियंत्रण, स्वाध्याय, तप, प्राणायाम, सामायिक आवश्यक है । आत्म दृष्टि यानि इस संसार में जो हो रहा है वह सब मेरे अपने किए कर्म है । अपमान, सम्मान सब अपने कर्मों का खेल है । जो कुछ हो रहा है उसके लिए मैं जिम्मेदार हूं यह मेरे ही कर्म हैं ऐसी दृष्टि ही आत्म-दृष्टि है । आत्म दृष्टि से सुख समाधि बढ़ती है । कर्म दृष्टि में सुख मिला तो मेरे कारण और दुःख मिला तो किसी ओर के कारण । हम आत्म-दृष्टि को अपनाएं । आत्म-दृष्टि द्वारा हम शीघ्र ही कर्म-क्षय करते हुए मुक्ति की आर अग्रसर हों । प्रभु महावीर का धर्म संघ आत्म-दृष्टि की ओर आगे बढ़ें । हमारी भीतर मैत्री, करूणा का भाव हो । 

आज आचार्यश्रीजी के दर्शनार्थ दिल्ली महासंघ, चैन्नई, सवाई माधोपुर आदि स्थानों से भाई बहिन उपस्थत हुए । आगामी आत्म: विकास कोर्स एडवांस-ााा 1 से 7 अक्टूबर, 2005 तक एवं बेसिक कोर्स 8 से 12 अक्टूबर, 2005 तक प्रातः 5.30 से 7.30 बजे तक होगा। बच्चों के लिए भी संस्कार शिविर 8 से 12 अक्टूबर, 2005 को दोपहर 3.00 से 5.00 बजे तक होगा । रजिष्ट्रेशन हेतु सम्पर्क सूत्र:- 9872294875 

 

एकाग्रता से लक्ष्य की सिद्धि: आचार्य शिवमुनि

30 सितम्बर, 2005: जालंधर श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज के जीवनोपयोगी एवं सारगर्भित प्रवचन प्रतिदिन शिवाचार्य सत्संग स्थल, लक्ष्मी पैलेस, गाजी गुल्ला रोड़ पर चल रहे हैं । आज के अपनेे मंगलमय प्रवचन में आचार्यश्रीजी ने फरमाया कि- जीवन में समय कैसे परिवर्तत होता है, जो घटना नहीं होनी चाहिए वह हो जाती है । वह घटना आपके लिए कुछ अलग तरह की होती है।  दूसरों के लिए कुछ अलग ही होती है । ऐसी कई घटनाएं सुनने को मिलती हैं और देखने को मिलती है जिसको हम परम्परा मान रहे हैं उसका आधार क्या है हमें कईयों को पता ही नहीं रहता है और हम उस परम्परा को ही निभाते हैं जिसे कि हम अन्धश्रद्धा के नाम से जानते हैं । परन्तु उस अन्ध-श्रद्धा के जीवित रहने की वजह उस परम्परा में रहने वाले व्यक्तियों की मान्यता पूर्ण होती है । इस प्रकार कई धारणाएं और मान्यताएं क्यों उत्पन्न होती है उसका कारण प्रभु महावीर ने फरमाया- 

 ‘अणेगचिŸो खलु अयं पुरिसे से केयणं अरिहई पुरइŸाए ।’ 

अर्थात् मनुष्य का मन अनेक चिŸा वाला है । अनेक चिŸाता का सीधा अर्थ है । एक चिŸा का अनेक टुकड़ों में बंट जाना । किसी वस्तु को अगर दो या अनेक हिस्सों में बांट दिया जाए तो उसकी दुर्दशा क्या होती है । वैसे ही चित्त का अनेक हिस्सों में बंटने से उसकी दुर्दशा होती है । यह सूत्र प्रभु महावीर ने 2600 वर्ष पूर्व ही बता दिया था । 

ऐसा मनुष्य खोजना मुश्किल है जिसके चित्त में स्थिरता हो या जिसका चित्त अनेक भागों में बंटा हुआ न हो । मन क्षण-क्षण में बदलता है । मन प्रातःकाल जो सोचता है मध्यान्ह में कुछ दूसरी बात सोचता है और सायंकाल तीसरी ही बात सोचता है । इस तरह मनुष्य का मन गिरगिट की भांति रंग बदलता है । जो एक घण्टे में कितने ही मनोभावों को बदलता है । 

मनुष्य जिस व्यक्ति के पास पहुंचता है वैसा तुरन्त अपना रंग, भाषा, चेहरा, वाणी, व्यवहार बदल देता है । उसका व्यवहार हर व्यक्ति के साथ अलग-अलग है । पत्नी के साथ अलग व्यवहार होता है । दूसरे सदस्यों के साथ अलग तरह का व्यवहार होता है । इसका कारण है हमारा चित्त अनेक खण्डों में बंटा हुआ है । अगर हमें किसी लक्ष्य पर पहुंचना है तो उसके लिए हमें अपने चित्त स्थिर करना चाहिए । इसके लिए साधक को आत्म-शुद्धि की साधना के लिए सतत् प्रयत्नशील रहना चाहिए । जैसे ही मन एकाग्र होगा, मनुष्य की छिपी अनन्त शक्तियां प्रकट होने लगती है वह अपने आपमें परिपूर्ण तत्व की ओर बढ़ता है ।

आगामी आत्म: विकास कोर्स एडवांस-ााा 1 से 7 अक्टूबर, 2005 तक एवं बेसिक कोर्स 8 से 12 अक्टूबर, 2005 तक प्रातः 5.30 से 7.30 बजे तक होगा। बच्चों के लिए भी संस्कार शिविर 8 से 12 अक्टूबर, 2005 को दोपहर 3.00 से 5.00 बजे तक होगा । रजिष्ट्रेशन हेतु सम्पर्क सूत्र:- 9872294875 

 

आत्म-दृष्टि कठिनाईयों को सहन करने की क्षमता प्रदान करती है: आचार्य शिवमुनि

1 अक्टूबर, 2005: जालंधर {  राकेश  }  श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज के जीवनोपयोगी एवं सारगर्भित प्रवचन प्रतिदिन शिवाचार्य सत्संग स्थल, लक्ष्मी पैलेस, गाजी गुल्ला रोड़ पर चल रहे हैं । आज के अपनेे मंगलमय प्रवचन में आचार्यश्रीजी ने फरमाया कि- आपके भीतर क्रोध, मान, माया, लोभ की गन्दगी भरी है । उस गन्दगी को शुद्ध कर दो । शुद्धि के अपने आपके भीतर के दोषों को सबके सामने प्रकट करने का साहस करो और जो सद्गुण है उनको प्रकट मत करना क्योंकि अच्छाई प्रकट करने से उससे जो फल प्राप्त होना है वह नष्ट हो जाता है । 

कुछ समय से चर्चा चल रही है ज्ञान और ज्ञान के लक्षणों की । जैन दर्शन में दो दृष्टियां बताई है । एक है मिथ्या-दृष्टि यानि बुरी दृष्टि और दूसरी है सम्यक्-दृष्टि । सम्यक् दृष्टि यानि अच्छी दृष्टि है । सम्यक् दृष्टि आपको सम्यक्-ज्ञान की ओर ले जाती है । जिसका कि दूसरा नाम आत्म-दृष्टि है । ज्ञान का अर्थ है तत्व का बोध यानि आत्मा और शरीर अलग-2 है, यह बोध हो जाना जिसको यह बोध हो जाता है उसको कितनी भी कठिनाईयां आए, शरीर में कोई रेाग आ जाये उन्हें कोई दुःख महसूस नहीं होता । अगर आता भी है तो वह उसे शान्ति से सहन करते हैं । 

इस दृष्टि को प्राप्त करना कोई आसन नहीं है । इसके लिए पहले तो आपको आत्मा के प्रति रूचि होना आवश्यक है । जिसको आत्मा के प्रति रूचि प्राप्त होती है वह बहुत ही सौभाग्यशाली है । परन्तु इस दृष्टि को प्राप्त करने के लिए कठिन परिश्रम और साधना करता है वह परम् सौभाग्यशाली है । 

आत्म-दृष्टि या सम्यक्-दृष्टि में प्रवेश करने का बहुत ही सरल रास्ता है जिन्होंने आत्म-दृष्टि प्राप्त कर ली है उनके जीवन को देखना उनके जीवन से संबंधित पुस्तकें आदि पढ़ना । शास्त्रों का स्वाध्याय करना । महापुरूषों के पास रहना चाहिए । जिन्होंने इस आत्म-दृष्टि का अनुभव किया है उनका ही एक जीवंत उदाहरण है- आचार्य सम्राट् पूज्य श्री आत्माराम जी महाराज, जिनके जीवन में बहुत सारी विपत्तियां आईं परन्तु उनको उन्होंने बड़ी ही शान्ति से सहन किया । उनके जीवन में कैंसर जैसा भयानक रोग भी आया । यही नहीं उन्होंने खुद भी आत्म-दृष्टि का अनुभव करने के लिए किसी रोग के आॅप्रेशन में बेहोशी की दवा नहीं ली बल्कि उस आॅप्रेशन को होश में रहकर करवाया । यह उनकी आत्म-दृष्टि की ओर इंगित करता है ।

आत्म: विकास कोर्स ‘एडवांस-ााा’ आज से कम्युनिटी सेन्टर, दीन दयाल उपाध्याय नगर में शुरू हुआ जो 7 अक्टूबर, 2005 तक चलेगा । आगामी आत्म: विकास कोर्स ‘बेसिक’ दि0ः 8 से 12 अक्टूबर, 2005 तक प्रातः 5.30 से 7.30 बजे तक होगा। बच्चों के लिए भी संस्कार शिविर 8 से 12 अक्टूबर, 2005 को दोपहर 3.00 से 5.00 बजे तक होगा । रजिष्ट्रेशन हेतु सम्पर्क सूत्र:- 9872294875 

 

गांधीजी और शास्त्रीजी संयम और सरलता की प्रतिमूर्ति थे: आचार्य शिवमुनि

2 अक्टूबर, 2005: जालंधर श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज के जीवनोपयोगी एवं सारगर्भित प्रवचन प्रतिदिन शिवाचार्य सत्संग स्थल, लक्ष्मी पैलेस, गाजी गुल्ला रोड़ पर चल रहे हैं । आज के अपनेे मंगलमय प्रवचन में आचार्यश्रीजी ने फरमाया कि- दो अक्टूबर का दिन दो महापुरूषों के नाम से जाना जाता है । एक है राष्ट्रपिता महात्मा गांधीजी और दूसरे हैं पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्.त्री जी । इन दो महापुरूषों का आज जन्म दिन है । इन दोनों का जीवन सरलता, परिश्रम से ओतप्रोत था । 

गांधीजी बहुत पढ़े लिखे थे । उन्होंने जब भारत के लोगों पर हुए अत्याचार । भारतीय लोगों का शोषण और गरीबों को देखा तो उनकी भीतर की दया भावना ने उनको प्रेरित किया कि यह नहीं होना चाहिए और इसके लिए उन्होंने अहिंसा, प्रेम और सत्य का मार्ग अपनाया । महात्मा गांधी ऐसे नेता थे जो जनता के मध्य में रहकर जनता की बात को समझते थे । उनके परेशानियों को दूर करने का साहसिक कदम उठाते थे । उनका जीवन दीये की भांति था जो स्वयं भी आनंद और प्रकाश से भरे हुए थे और दूसरों को भी प्रकाशित करते थे । महात्मा गांधीजी के जीवन की घटनाओं से यह बात पता चलती है कि उनके जीवन में प्रभु महावीर के सिद्धान्त कण-कण में विद्यमान थे और इसका उल्लेख उन्होंने अपनी आत्म-कथा में भी किया है । महात्मा गांधीजी के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण गुण यह था कि उनके जीवन में संयम था । भोजन में वे नियमित चीजें लेते थे और वस्त्र भी शरीर पर थोड़े ही पहनते   थे । उठने, बैठने, चलने में और जीवन के आवश्यक कार्यों, विचारों में संयम दिखाई देता   था । उनके इन्हीं गुणों के कारण उनको महात्मा कहा गया । 

दूसरे महापुूरूष हैं लाल बहादुर शास्त्री, जिन्होंने समाज को बहुत कुछ दिया है परन्तु लिया कुछ भी नहीं । आजकल के नेताओं को अगर देख लो तो उनके समक्ष खड़े नहीं हो सकते । आजकल के नेताओं ने जनता से बहुत कुछ लिया है और ले रहे हैं । उनके पास अपनी सुख सुविधा के सभी साधन मौजूद है परन्तु लाल बहादुर शास्त्री जी ऐसे नहीं थे । 

जब भारत की जनता को पूर्ण भोजन नहीं मिलता था तब उन्होंने जनता भूख से न तिलमिलाए इसके लिए हर मंगलवार के दिन केवल एक समय ही भोजन किया करते थे । उन्हीं का अनुसरण लोगों ने भी किया और बहुतों ने मंगलवार के दिन एक समय का भोजन छोड़ने का संकल्प किया । गांधीजी और शास्त्रीजी दोनों की जन्म जयंती मनाना तभी सार्थक होगा जब हम उनकें गुणों को ग्रहण करेंगे । 

आज आचार्यश्रीजी के दर्शनार्थ जम्मू, भटिण्डा, राणिया, सवाई माधोपुर, फगवाड़ा, लुधियाना, चण्डीगढ, सूरत, पंचकूला, पद्मपुर आदि स्थानों से उपस्थित हुए । जम्मू एवं भटिण्डा श्रीसंघों ने आचार्यश्रीजी के आगामी चातुर्मास हेतु भाव-भरी विनती की । 

 

संकल्प से व्यक्ति के जीवन में धर्म आता है: आचार्य शिवमुनि

6 अक्टूबर, 2005: जालंधर  श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज के जीवनोपयोगी एवं सारगर्भित प्रवचन प्रतिदिन शिवाचार्य सत्संग स्थल, लक्ष्मी पैलेस, गाजी गुल्ला रोड़ पर चल रहे हैं । आज के अपनेे मंगलमय प्रवचन में आचार्यश्रीजी ने फरमाया कि- जो व्यक्ति जिस चीज को चाहता है वह उसे मिल जाती है । इस जीवात्मा का अपना बनाया हुआ संसार है । मकड़ी जाला बुनती है दूसरों को फंसाने के लिए परन्तु वह स्वयं उस जाले में फंसकर रह जाती है । और उसी अपने बुने हुए जाले में वह मर जाती है । रेशम का कीड़ा मुंह से लार निकालता है जिससे रेशम बनता है उसी रेशम में वो फंस जाता है । लोग रेमश को प्राप्त करने के लिए उसे उबलते हुए पानी में डाल देते हैं जिससे रेशम के कीड़े की मौत हो जाती है । अपने ही मुख से बनाया हुआ रेशम उस कीड़े की मौत का कारण बन जाता है । 

गाय, भैंस, बकरी, कुत्ते इत्यादि की अपनी ही दुनियां है । इन सबका भोजन अपना  है । एक मानव है जो अपना भोजन छोड़कर दूसरे भोजन में रूचि रखता है और वहीं पर गड़बड़ हो जाती है । व्यक्ति को चाहिए कि जो उसके लिए आवश्यक है वही भोजन करे । आज हमारे खाने-पीने की व्यवस्थाएं बिगड़ गई  हैं । मनुष्य को समझ है, ज्ञान है परन्तु पशु को तो समझ नहीं है, वह फिर भी अपने नियमों में रहकर खाता है परन्तु मनुष्य अपने नियमों से कई बार आगे बढ़ जाता है । इस संसार में चार वस्तुएं हैं । धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष । धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष व्यक्ति समझता है पशु नहीं समझता । खाना, पीना, सोना, काम-वासना में रत रहना यह तो पशु भी करता है और मनुष्य भी करता है परन्तु मोक्ष के लिए प्रयत्नशील मनुष्य ही रहता है । व्यक्ति अगर संकल्प करता है तो उसके जीवन में धर्म आता है । संकल्प भी हमारा शुभ होना चाहिए । संकल्प एक बहुत बड़ा हथियार हैं । 

एक बार नेपोलियन बोनापार्ट ने अपने सेनापति को आदेश दिया कि सेना को तैयार करो, युद्ध की तैयारी करो । सेनापति ने तैयारी करके नेपोलियन से कहा कि महाराज मुझे मन में कुछ भय है कि हम दूसरे प्रदेश में जा रहे हैं वहां कहीं हार न जाए । नेपोलियन ने कहा- अपने अस्त्र, शस्त्र सबको देखो क्या वे पूर्ण हैं । सेनापति ने कहा हां बिल्कुल पूर्ण है । नेपोलियन ने कहा नहीं तुम्हारे अन्दर संकल्प का शस्त्र नहीं है, जो तुम्हें वहां जाने से घबराहट हो रही है । व्यक्ति के अन्दर सकल्प होना चाहिए । बड़े-2 लेखक, विद्वान संकल्प के बल से ही पूरी दुनियां में पहचाने जाते हैं । 

लाला लाजपतराय के जीवन की एक घटना है कि उनके एक मित्र गौरीप्रसाद जो कि गरीब घर से थे । लालाजी और गौरीप्रसाद दोनों साथ-2 पढ़ते थे । एक दिन गौरीप्रसाद की मां बीमार पड़ गई । काफी इलाज करने के बाद भी वह ठीक नहीं हो सकी और मर गई । दो महीने गौरीप्रसाद स्कूल ना जा सका । पढ़ाई में पीछे रह गया । जब परीक्षा का समय आया तो सभी विद्यार्थियों को उम्मीद थी कि अबकि बार लाला लाजपतराय जी प्रथम आएंगे । जब परीक्षा हुई उसके परिणाम घोषित हुए तो सभी यह सुनकर चकित रह गए कि गौरीशंकर ही प्रथम आया है और लालाजी द्वितीय आए हैं । अध्यापकों ने पता लगाया कि लालाजी किस प्रकार पीछे रह गए । सभी ने लालाजी को अलग ले जाकर पूछा तो लालाजी ने कहा कि गौरी को मत बताना । मैंने उसे प्रथम लाने के लिए अपनी परीक्षा पत्र के उत्तर अधूरे छोड़ दिए जिससे उसे स्काॅलरशिप प्राप्त हो सके । यह थी लालाजी की संकल्पपूर्वक मित्रता । हमें भी ऐसी ही मित्रता का व्यवहार करना  चाहिए । यह मित्रता धर्म की मित्रता है । अपने साथी को आगे बढ़ाना धर्म है । 

शिवाचार्य को आगामी चातुर्मास के लिए आई देश भर से विनतियां

जालंधर: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज के जन्म-दिवस पर जहां हजारों श्रद्धालुओं भक्तजनों ने आकर अपनी शुभ-कमनाएं दीं वहीं जालंधर के शिवाचार्य सत्संग स्थल पर आचार्यदेव के आगामी वर्षावास सन् 2006 के लिए विनतियों की झड़ी लग गई । आचाय्रदेव को हर कोई अपने ही बीच अपने क्षेत्र में पाना चाहता है । 

 

ऋषभ विहार, दिल्ली श्रीसंघ ने अपनी विनती आचार्यश्री के चरणों में अर्पित की और कहा कि भगवन् ! हम पिछले दो वर्षों से आपके चातुर्मास की विनती कर रहे हैं । ऋषभ विहार श्रीसंघ की भक्ति भावना, सेवा आपने देखी है । अतः हमें चातुर्मास देकर कृतार्थ करें ।

दूसरी विनती अम्बाला कैंट के श्रीसंघ ने की । वहां के मंत्री ने कहा कि भगव0न् ! बेशक हमारा संघ छोटा है परन्तु दिल हमारा बहुत बड़ा है । हम पिछले तीन वर्षों से आपसे विनती करते आ रहे हैं । आशा है, अबकी बार आप हमें निराश नहीं करेंगे ।

पटियाला श्रीसंघ ने भी अपनी जोरदार विनती वर्ष 2006 के चातुर्मास के लिए आचार्य भगवन् के चरणों में रखी । इसी कड़ी में रोपड़ श्रीसंघ ने भी अपनी जोरदार विनती बड़े ही भक्ति भाव से रखी । जब रोपड़ श्रीसंघ के मंत्री श्री विनोद जैन बोल रहे थे तो उनका उत्साह देखने लायक था । 

मंगलदेश की राजधानी भटिण्डा ने भी अपनी विनती आचार्यश्री के चरणों में रखी । उन्होंने मंगल देश की 52 सभाओं में सर्व-सम्मति से पारित विनती को पूरे मंगलदेश की ओर से आचार्यदेव को लिखित में दिया और कहा कि आचार्य भगवन् आपकी जन्म-भूमि, दीक्ष-भूमि मंगल-देश है, इस नाते से आप पर हमारा अधिकार ज्यादा है । अतः हम वर्ष 2006 के चातुर्मास की फरियाद आपश्री के चरणों में लेकर आए हैं । 

इसके साथ इन्दौर श्रीसंघ ने भी अपनी विनती आचार्यश्री के चरणों में रखी । वहां के श्री गजराज सिंह झामड़ ने कहा कि भगवन् हम पिछले कई वर्षों से चातुर्मास की विनती करते आ रहे हैं । हमने चादर महोत्सव की विनती भी आपश्री से की है । चातुर्मास की विनती आपकी झोली में पड़े कई वर्ष हो चुके हैं । कृपया अब तो हमारी विनती की ओर ध्यान दीजिए । 

उदयपुर से श्री ओंकार सिंह सिरोया ने अपने संघ में पारित विनती पत्र को पढ़कर सुनाया और बड़े ही जोरदार शब्दों में अपने भाव प्रकट किए । मंत्री श्री शिरीष मुनि जी महाराज को सम्बोधित करते हुए उन्होंने कहा कि महाराज आप उदयपुर के हो । अतः आप भ्ज्ञी हमारा समर्थन करें । अपनी भावनाओं को प्रकट करते हुए कहा कि प्रभो ! अबकी बार आपका राजस्थान की धरती को फरसना बहुत ही आवश्यक है । वहां की जनता आपके लिए पलक पांवड़े बिछाकर बैठी है ।

विनतियों की कड़ी में 2 अक्टूबर, 2005 को जम्मू श्रीसंघ बहुत ही भक्ति भाव और उत्साह के साथ आचार्यश्री के चरणों में पहुंचा । वहां के मंत्री श्री रमन जैन ने कहा कि प्रभो आप श्रीजी श्रमण संघ के सिरमौर हो, मुकुट की मणि हो । हम भारत के सिरमौर जम्मू में आपश्री का चातुर्मास चाहते हैं । आपने जो शान्ति और प्रेम अन्य क्षेत्रों में बरसाया है जम्म्ूा श्रीसंघ उससे अछूता है । उन्होंने कहा कि हमने वीर नगर, दिल्ली में भी आपसे विनती की थी । अतः उस विनती को ध्यान में रखें । वहां के महिला मण्डल ने भी भजन के माध्यम से अपनी विनती रखी । कला बहिन ने बहुत ही जोरदार शब्दों में अधिकारपूर्ण चातुर्मास की मांग की । दयाचंद जी ने भी अपनी विनती रखी । वहां के युवक संघ के मंत्री श्री सन्नी जैन ने अपनी विनती रखी । उन्होंने कहा कि भगवन् ! आपके चातुर्मास के लिए युवकों में जो उत्साह बना है, वह हमने कभी नहीं देखा । जम्मू श्रीसंघ को आपके चातुर्मास की बहुत आवश्यकता  है । उन्होंने कहा कि भगवन् किसी डिनर पार्टी के अन्दर भ्ज्ञी इतने युवक एकत्रित नहीं होते, जितने कि आपके चरणों मं चातुर्मास की विनती को लेकर आए हैं । जम्मू से 6 बसें, 12 कारें आचार्यश्रीजी की विनती के लिए आई थीं ।

भटिण्डा श्रीसंघ भी तीन बसें लेकर उपस्थित हुआ था । 2 अक्टूबर, 2005 को ऐसा लग रहा था कि पाण्डाल में बच्चा-बच्चा आचार्यश्री की विनती करने के लिए आया है । य पाण्डाल छोटा-सा प्रतीत हुआ । श्रद्धालुओं का उपस्थिति के सामने । आचार्यश्री ने कहा कि मुझे तो चातुर्मास एक ही जगह पर करना है । आप लोगों की भावना सुन्दर है । मन तो होता है कि मैं सब जगह चातुर्मास करूं परन्तु चातुर्मास किसी एक ही जगह पर होगा । मैं आप सबकी विनती की कद्र करता हूँ । मैं आप सबकी विनती की कद्र करता हूँ । विधि और मर्यादा के अनुसार समय पर हम चातुर्मास की घोषणा करेंगे ।

 

दर्पण की भांति जीवन जीओ: आचार्य शिवमुनि

7 अक्टूबर, 2005: जालंधर  श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज के जीवनोपयोगी एवं सारगर्भित प्रवचन प्रतिदिन शिवाचार्य सत्संग स्थल, लक्ष्मी पैलेस, गाजी गुल्ला रोड़ पर चल रहे हैं । आज के अपनेे मंगलमय प्रवचन में आचार्यश्रीजी ने फरमाया कि- जन्म और मृत्यु के बीच का जो समय है उस समय को हम जीवन कहते हैं । जीवन में सुख भी है और दुःख भी है इसलिए घबराने की कोई आवश्यकता नहीं है । जब हमें सुख आता है तब हम फूल कर कुप्पा हो जाते हैं । जब हमारे जीवन में दुःख आता है तब हम तनाव से ग्रसित हो जाते हैं । जीवन में सुख दुःख तो है ही जैसे अनार होता है । अनार जब हम खाते हैं तो उसका स्वाद केवल खट्टा और केवल मीठा नहीं होता है बल्कि खट्टा मीठा दोनों प्रकार का होता है । वैसे ही स्वीकार करना कि जीवन के कुछ क्षण खट्टे भी है और कुछ क्षण मीठे भी हैं । 

आपने अनुभव किया होगा जब आप सुख के क्षणों में होते हैं तब परमात्मा को भूल जाते हैं । परन्तु जब दुःखी होते हैं तब हम केवल परमात्मा को ही याद करते हैं, इसलिए जब दुःख आए तो दुःखी मत होना बल्कि प्रभु के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करना कि अच्छा हुआ, दुःख आया नहीं तो मैं आपको भूल जाता । 

जीवन दो तरह से जीया जाता है । एक फोटोग्राफर केमरे की तरह जिसमें एक बार फोटो खींच लिया गया उसके पश्चात् आप उस फोटो पर किसी दूसरे व्यक्ति का फोटो नहीं खीच   सकते । फोटो खींचने के लिए उस फोटो को आपको आगे बढ़ाना होगा परन्तु दूसरे प्रकार का जो जीवन है वह दर्पण की तरह है । केमरे की तरह किसी भी व्यक्ति की वृत्ति को अपनी दिमाग में फिक्स मत करना ।  दर्पण जिसको कि हम हर रोज निहारते हैं जब भी हमें कहीं बाहर जाना होता है तो हम दर्पण में अपनी साज सज्जा करके ही जाते हैं, परन्तु हम उससे कुछ सीख नहीं लेते । जो भी दर्पण के सामने आता है वैसा ही दिखाई देता है । जैसे आप उसके सामने हाव-भाव प्रदर्शित करते हैं वैसे ही हाव-भाव वह दर्पण भी करता है । वह किसी व्यक्ति के चित्र को या रंग-रूप को स्टोर करके नहीं रखता वैसे ही आप भी दर्पण की भांति जीना । जैसे दर्पण सबका स्वागत करता है वैसे ही आपके पास जो भी आए या आप जिसके पास जाए उसका स्वागत होना चाहिए ।

रामकृष्ण परमहंस जो कि स्वामी विवेकानंद के गुरू थे उन्होंने बहुत सुन्दर घटना अपने जीवन से संबंधित लिखी है । उन्होंने लिखा है कि मैं रास्ते से गुजर रहा था, उस समय सहसा मेरी दृष्टि एक वृक्ष पर पड़ी । उस वृक्ष पर दो पक्षी बैठे थे । उन दोनों के रंग और जाति में कोई अन्तर नहीं था परन्तु एक पक्षी बहुत ही उछल-कूद कर रहा था । एक डाल से दूसरी डाल पर कभी किसी फल को खाता, कभी किसी फल को खाता । कभी नीचे जाता कभी ऊपर आता और उसके विपरीत एक पक्षी शान्ति से एक डाली पर बैठा रहा । वह सब कुछ वृक्ष, फल, फूल, पत्ते देख रहा था । उस पक्षी को भी देख रहा था और जब भी भूख लगती तब जो फल आदि नीचे गिरे होते थे उनको चख लेता था और पुनः डाली पर जाकर बैठ जाता था । रामकृष्णजी ने इस घटना के विषय में लिखा कि इस घटना से मुझे बहुत प्रेरणा मिली । आप भी इस घटना से प्रेरणा ले और शान्त पक्षी की तरह अपने जीवन के सभी कार्य शान्ति और साक्षी भाव से करें ।

 

जो आपके लिए जरूरी है वह प्रभु देता है: आचार्य शिवमुनि

8 अक्टूबर, 2005: जालंधर  श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज के जीवनोपयोगी एवं सारगर्भित प्रवचन प्रतिदिन शिवाचार्य सत्संग स्थल, लक्ष्मी पैलेस, गाजी गुल्ला रोड़ पर चल रहे हैं । आज के अपनेे मंगलमय प्रवचन में आचार्यश्रीजी ने फरमाया कि-  प्रार्थना के भाव से जब-जब आप भर जाते हैं तब आपको सुख समृद्धि मिलती है । कुछ भी नाम लेते हो वह आपका कल्याण ही करता है । अरिहंतों की भक्ति, सिद्धों का स्मरण आपके दोषों भरे जीवन का अन्त कर देता है । आपके जीवन को सुख शांति और आनंद से भर देता है । उसके लिए आपको पूरा जीवन लगाने की आवश्यकता नहीं है । जैसे दीये का थोड़ा सा प्रकाश अंधकार को भगा देता है वैसे ही अरिहंतों की पल भर की भक्ति जीवन का कल्याण कर देती है । 

प्रार्थना में आप जो चाहते हैं वह आपको नहीं मिलता है बल्कि आपको जो जरूरी है वह मिलता है । आप भगवान से शक्ति मांगते हैं परन्तु आपको शक्ति नहीं मिलती है बल्कि आपके जीवन में और कठिनाईयां आती है जिससे कि आप अपनी हिम्मत बढ़ायें और शक्ति प्राप्त करें । आप प्रभु से बुद्धि मांगते हैं परन्तु आपको उलझने मिलती हैं । जब आपकेा उलझने मिलेगी तभी आप जीवन में बुद्धि का उपयोग उलझने सुलझाने में कर सकेंगे । आप समृद्धि मांगते हैं परन्तु आपको सीधे ही समृद्धि नहीं मिलती है । थोड़ी सी मेहनत, पराक्रम से आपको समृद्धि मिलती है । प्रभु भी आपकी परीक्षा लेता है कि यह व्यक्ति योग्य है या नहीं क्योंकि जो पात्र को दीया जाता है वही उपयोगी सिद्ध होता है । आप प्यार मांगते हैं परन्तु आपको दुःख मिलता है । उसे अपने दुःख की प्रेरणा से आप लोगों की सहायता करें और उन लोगों से प्यार पा सकते हैं जिनका आपने सहयोग किया है । आप मांगते हैं वरदान परन्तु आपको अवसर मिलते हैं जिससे कि आप प्रभु को पाने की आकांक्षा इच्छा रखते हैं । आपको सैकड़ों अवसर मिलते हैं परन्तु उन अवसरों को आप यों ही व्यर्थ खो देते हैं । जो इन अवसरों का उपयोग कर लेता है वही भगवान से वरदान पा सकता  है । 

किसी व्यक्ति ने किसी गुरू से पूछा कि जीवन में गुरू बनाना चाहिए या नहीं ? गुरू ने उसका बहुत ही सुन्दर जवाब दिया कि बनाना चाहिए और नहीं भी बनाना चाहिए । जो हर समय सीखने के लिए तैयार रहता है । सहज और सरल है उसको गुरू बनाने की जरूरत नहीं है । परन्तु जो मायावी है सीखने की आकांक्षा जिसमें नहीं है उसको गुरू बनाने की जरूरत है । मनुष्य का उत्थान, पतन, सुख, दुःख, बुद्धिमŸाा और मूर्खता उसकी सीखने की क्षमता पर है । जिसने बहुत किताबें पढ़ी, लिखी है परन्तु सीखने की ललक नहीं है तो उसके जीवन में दुःख, पतन है, परन्तु जो जीवन के हर समय में सीखने को तैयार रहता है वह सुखी है और उसका उत्थान होता है । 

अभी जालंधर सेन्ट्रल में कैदियों हेतु आत्म: विकास कोर्स ‘बेसिक’ चल रहा है जिसमें लगभग 100 के लगभग कैदी एवं स्टाॅफ के सदस्य भाग ले रहे हैं । जिन्होंने ध्यान साधना शिविर किए हैं उनके लिए फोलोअप क्लाॅस हर हफ्ते शनिवार एवं रविवार को प्रातः 6.00 से 7.00 बजे तक कम्यूनिटी सेन्टर, दीन दयाल उपाध्याय नगर, जालंधर में रखा गया है ।  

 

आत्मा अमर है: आचार्य शिवमुनि

9 अक्टूबर, 2005: जालंधर  श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज के जीवनोपयोगी एवं सारगर्भित प्रवचन प्रतिदिन शिवाचार्य सत्संग स्थल, लक्ष्मी पैलेस, गाजी गुल्ला रोड़ पर चल रहे हैं । आज के अपनेे मंगलमय प्रवचन में आचार्यश्रीजी ने फरमाया कि- आत्मा का अनुभव करने के लिए जीवन के सभी कार्यों में यह ध्यान रहना जरूरी है कि आत्मा अलग है और शरीर अलग है । आत्मा शुद्ध   है । खाते समय यह चिन्तन करना कि कौन खाता है । बैठते समय यह चिन्तन करना कि कौन बैठ रहा है । चलते समय यह चिन्तन करना कि कौन बैठ रहा है । इस प्रकार धीरे-2 निरन्तर चिन्तन, ध्यान, जप से वह चरम् स्थिति भी आ जाएगी जब आपको आत्मा की अनुभूति होगी । 

भारतीय संस्कृति का ज्वलंत उद्घोष रहा है आत्मा अमर, अजर, अविनाशी है । भारत के प्रभु महावीर, बुद्ध, कृष्ण, राम आदि सभी ऋषि मुनियों ने यह बात शास्त्रों के माध्यम से पूरे विश्व में फैलाई । पश्चिम के दार्शनिकों ने भी आत्मा के अस्तित्व को स्वीकार किया, परन्तु वे इसका अनुभव नहीं कर पाए । आत्मा के अनुभव से ही अनंत आनंद, अनंत ज्ञान, अनंत चारित्र की प्राप्ति होती है । कभी-कभी आप बिना किसी कार्य को किए आनंदित और प्रफुल्लित होते हैं । यह आनंद कहीं बाहर से नहीं आया वह आपके भीतर से बाहर प्रकट हुआ । प्रभु महावीर ने कहा है परमात्मा कहीं बाहर नहीं है बल्कि आपकी आत्मा ही परमात्मा है । बुद्ध, महावीर आदि ने इसको अलग-2 ढंग से प्रसारित किया है । किसी ने आत्मा को सब जगह व्याप्त बताया है । किसी ने छोटी बताया, किसी ने बड़ी  बताया । प्रभु महावीर ने किसी की बात को काटा नहीं है । उन्होंने कहा कि आत्मा सभी जीवों में विद्यमान है और शरीर प्रमाण है । गीता में श्रीकृष्ण ने आत्मा का स्वरूप बताते हुए कहा है कि शस्त्र आत्मा को काट नहीं सकते । अग्नि आत्मा को जला नहीं सकती । पानी आत्मा को गला नहीं सकती । वायु आत्मा को हिला नहीं सकती । 

किसी संत को श्रद्धालुओं ने प्रवचन के लिए आमंत्रित किया । उसके लिए उन्होंने एक सात मंजिला होटल का चुनाव किया और सबसे ऊपर वाली मंजिल पर प्रवचन शुरू हुआ । प्रवचन शुरू हुआ ही था कि थोड़े ही समय में पृथ्वी हिलने लगी और उसके साथ ही वह मंजिल भी हिलने लगी । जो प्रवचन सुन रहे थे वे सभी अपनी जान बचाने के लिए भागे परन्तु वह संत वहां पर ही ध्यान में मग्न हो गया । थोड़े समय पश्चात् भूकम्प शान्त हो   गया । सभी श्रद्धालु फिर से प्रवचन सुनने के लिए संत के समक्ष उपस्थित हुए । जब उस संत को अनुभव हुआ कि सभी सुनने के लिए आ गए हैं उन्होंने धीरे से आंखे खोली और जहां पर बात छोड़ी थी वहीं से प्रारंभ की । परन्तु श्रोताओं ने कहा कि जब भूकम्प आया था तब आपको कैसे महसूस हुआ ? आपका मन भागने को तो नहीं किया । संत ने जवाब दिया कि 30 वर्ष पहले मेरा भी मन आपकी तरह ही मौत से भागने का होता था परन्तु अभी मुझे ध्यान में रस आ गया है । इसलिए मेरा मन भागने को नहीं हुआ क्योंकि मुझे अनुभव हुआ है कि आत्मा अलग है और शरीर अलग है । जब आपको भी इसका अनुभव हो जाएगा तो आपके ऊपर कोई भी विपत्ति आए उस समय भागोगे नहीं । 

 

समय का सदुपयोग करें: आचार्य शिवमुनि

10 अक्टूबर, 2005: जालंधर श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज के जीवनोपयोगी एवं सारगर्भित प्रवचन प्रतिदिन शिवाचार्य सत्संग स्थल, लक्ष्मी पैलेस, गाजी गुल्ला रोड़ पर चल रहे हैं । आज के अपनेे मंगलमय प्रवचन में आचार्यश्रीजी ने फरमाया कि- किसी लक्ष्य को पाने के लिए आपको बाकी लक्ष्यों को छोड़ना जरूरी है । लक्ष्य केवल एक होना चाहिए । डाॅक्टर, इंजीनियर बनना आदि लक्ष्य नहीं है बल्कि मानव जीवन का एक मात्र उद्देश्य आत्मा को जानना है, उसी लक्ष्य के प्रति आपकी निष्ठा और लगन होनी चाहिए । जिसने यह अनमोल हीरा पा लिया है उसके लिए भौतिक हीरों का महत्व कौड़ी मात्र का है । 

कषाय जब आए तब भोजन छोड़ देना । सभी कार्यों को छोड़कर बैठ जाओ और अपनी श्वांस प्रश्वांस को देखो । आपका स्वभाव क्रोध, मान, माया, लोभ नहीं है । आपका स्वभाव शान्ति, आनंद और सुख है । अभी समय प्रतिकूल है इसीलिए जाग जाओ । प्राकृतिक आपदाओं का प्रकोप निरन्तर जारी है । वर्ष के शुरूआत में सुनामी लहर की भयंकर घटना घटी, उसमें लाखों व्यक्तियों के प्राण निकल गए । वर्षा ऋतु में भी बहुत लोग मारे गए और जान-माल की क्षति हुई और अभी भूकम्प आया है चाहे वह भूकम्प पड़ौस के देश पर आया हो परन्तु आपकी ही तरह उनको भी संवेदना है । समय का पता नहीं है कब प्रकृति भयंकर रूप धारण कर ले । प्रकृति के सामने सभी नतमस्तक हैं । आप ज्यादा से ज्यादा समय का सदुपयोग करें । जो समय आपने धर्म-ध्यान में व्यतीत किया है वही समय का सदुपयोग है । 

धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इनका शास्त्रों में बहुत ही सुन्दर विश्लेषण है । मोक्ष चाहिए तो उसके लिए आपको धर्म करना पड़ेगा । संसार से जन्म-मरण से स्वतंत्र हो जाना ही मोक्ष है । धर्म और मोक्ष आपके जीवन के मित्र हैं और काम और अर्थ आपके जीवन के शत्रु हैं । सबसे बड़े शत्रु हंै काम और क्रोध । अगर इनको जीत लिया तो सम्पूर्ण विश्व को जीत   लिया । काम और क्रोध के वशीभूत होकर ही बड़े-2 ऋषि मुनि संयम मार्ग से फिसल गए । जैन धर्म के 23 वे तीर्थंकर भगवान पाश्र्वनाथ के जन्म में उन्होंने कमठ के प्रति क्षमा रखी परन्तु कमठ ने बदला लेने के लिए क्रोध किया तो उसकी दुर्गति हुई । कहते हैं कि जब प्रभु महावीर ने बोधि प्राप्त की उस समय 64 इन्द्र उनके समवसरण में आए और उन्होंने प्रभु महावीर की पूजा अर्चना की क्योंकि वे जानते थे कि जो प्रभु महावीर ने त्याग और संयम का पालन किया है यह कार्य बहुत दुष्कर है । इसको कर पाना हर व्यक्ति के वश की बात नहीं है । मैं मन को साध नहीं पाया । कषायों को छोड़ नहीं पाया परन्तु इन्होंने कषाय आदि को जीत लिया है जो कषायों पर विजय पा लेता है उसको इन्द्र, देवता सभी नमस्कार करते हैं ।

 

अपने अन्दर के रावण को जलाओ: आचार्य शिवमुनि

12 अक्टूबर, 2005: जालंधर श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज के जीवनोपयोगी एवं सारगर्भित प्रवचन प्रतिदिन शिवाचार्य सत्संग स्थल, लक्ष्मी पैलेस, गाजी गुल्ला रोड़ पर चल रहे हैं । आज के अपनेे मंगलमय प्रवचन में आचार्यश्रीजी ने फरमाया कि- आज विजयदशमी का पावन पर्व है । विजयादशमी के दिन राम की रावण पर विजय हुई थी इसलिए इसको विजयादशमी और दशहरा पर्व के नाम से जाना जाता है । इस पर्व को पूरे भारतवर्ष में बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है । इस पर्व को मनाने के रीति-रिवाज लगभग पूरे भारतवर्ष में एक समान है । इस दिन रावण का बूत बनाकर उसको जलाया जाता है जो कि कृत्रिम चीजों से बना हुआ है और नकली होता है, परन्तु जो आपके भीतर असली रावण बैठा हुआ है उसको नष्ट करें और उसी को जलायें । 

रावण को क्यों जलाया जाता है । रावण में क्या कमी थी । वह क्यों हारा यह जानना बहुत जरूरी है ? रावण सोने की लंका का राजा था । उसके पास बहुत सिद्धियां थी । रावण भगवान शिव का भक्त था और उनकी पूजा अर्चना करता था । उसकी संगीत में रूचि थी । रावण वेदों का ज्ञानी और उस समय का महान् विद्वान् था और इसके विपरीत राम के पास बहुत लम्बी चैड़ी सेना नहीं थी और न वह राजा थे फिर भी जीत राम की हुई क्योंकि राम के जीवन में धर्म था ।  राम अपने लिए नहीं बल्कि समाज के लिए लड़ रहे थे । रावण की लड़ाई स्वार्थी लड़ाई थी । केवल उसके एक छोटे से दुष्कृत्य ने उसको हराया ।

रामायण पर संक्षेप में विचार करेंगे कि राम ने केवल अपने पिता के वचन को पालने के लिए चैदह वर्ष तक वनवास किया । वनवास केवल राम को मिला था परन्तु उनके प्रेम से लक्ष्मण, सीता आदि ने भी उनके साथ चलने का निर्णय लिया । उन 14 वर्षों में उन्होंने शास्त्रों का गहन अध्ययन किया और कराया और ऋषियों, मुनियों का सत्संग किया । तेरह वर्ष तो मुश्किल से भरे हुए थे परन्तु उन्होंने सभी मुश्किलों को स्वीकार किया । उन मुश्किलों से राम भागे नहीं । चैदहवा वर्ष शुरू हुआ तो मुश्किलें और भी बढ़ी उनको भी उन्होंने स्वीकार किया परन्तु समाज और धर्म की रक्षा के लिए उनको युद्ध करना पड़ा । राम आज के युग के लिए उतने ही प्रासंगिक हैं जितने उस समय में थे । 

रावण के पास इतनी शक्तियां और सिद्धियां होने के बावजूद वे हारे क्योंकि रावण ने उन शक्तियों और सिद्धियों का गलत उपयोग किया और सबसे बड़ी गलती उन्होंने यह की कि जो शक्तियां उनको मिली हुई थी उससे उनको अहंकार हो गया कि मुझे कोई हरा नहीं सकता इसलिए उनका पतन हुआ और राम ने उनको हराया । अहंकार कभी नहीं करना चाहिए क्योंकि अहंकार जो शक्तियां और सिद्धियां आपको प्राप्त हुई है उनको नष्ट करता है और जितने आप उपर उठे हैं उतना ही आपको नीचे गिराता है।

 

विचारों से आभामण्डल बनता है: आचार्य शिवमुनि

13 अक्टूबर, 2005: जालंधर श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज के जीवनोपयोगी एवं सारगर्भित प्रवचन प्रतिदिन शिवाचार्य सत्संग स्थल, लक्ष्मी पैलेस, गाजी गुल्ला रोड़ पर चल रहे हैं । आज के अपनेे मंगलमय प्रवचन में आचार्यश्रीजी ने फरमाया कि- सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में तरंगें फैली हुई है । कुछ तरंगें स्थूल होती है जो हमें आंखों से दृष्टिगोचर होती है । कुछ सूक्ष्म होती है जो हम देख नहीं सकते, केवल अनुभव कर सकते हैं । हर व्यक्ति के आसपास भी सूक्ष्म तरंगे होती है जिसको अंग्रेजी मे ओरा और हिन्दी में आभा-मण्डल कहा जाता है । किसी का आभा-मण्डल अगर शुद्ध होता है तो वह व्यक्ति शान्त होता है । जैसे आप किसी संत के पास बैठते हैं तो आपको शान्ति महसूस होती है । अगर आपका आभामण्डल अशुद्ध है तो आपको तनाव महसूस होता है । आभा-मण्डल शुद्ध है या अशुद्ध यह आपके विचारों पर निर्भर करता है । 

प्रभु महावीर ने इन विचारों को जानने के लिए लेश्या यह जैन पारिभाषिक शब्द बतलाया है । लेश्या का अर्थ है लेश यानि चिपकाना । यह गोंद का कार्य करती है । जो आपकी कर्म-वर्गणाओं को आत्मा से चिपकाती है उसे लेश्या कहते हैं । वैसे तो लेश्या के कई प्रकार हो सकते हैं परन्तु प्रभु महावीर ने लेश्या के 6 प्रकार बतलाये हैं । कृष्ण लेश्या, नील लेश्या, कापोत लेश्या, तेलो लेश्या, पद्म लेश्या और शुक्ल लेश्या । इनमें से प्रथम तीन लेश्याएं अशुभ हैं और अधोगति में ले जाने वाली है बल्कि उसके बाद की तीन लेश्याओं को शुभ बताया है । 

लेश्याओं को समझने के लिए शास्त्रों में उदाहरण मिला है । छः व्यक्ति जंगल में   गए । वहां उन सबको भूख लग गई । खाने के लिए साधक ढंूढ़ने लगे तब उनको एक सुन्दर हरा भरा आम का वृक्ष दिखा । सब आम को निकालने के लिए अलग-2 तरीके ढंूढ़ने लगे । पहले व्यक्ति ने तरीका बतलाया सम्पूर्ण वृक्ष को जड़ सहित तोड़ लिया जाए जिससे कि हम सभी को भरपूर आम खाने को मिल जाएंगे । ऐसे व्यक्ति को भगवान महावीर ने कृष्ण लेश्या वाला व्यक्ति कहा है जो अपने स्वार्थ को पूर्ण करने के लिए सम्पूर्ण वृक्ष को छोड़ने के लिए तैयार हो जाता है । ऐसे व्यक्ति में हिंसा बहुत ज्यादा होती है । वह छोटी-2 बातों पर तुरन्त क्रोधित हो जाता है और हिंसा कर बैठता है । 

कृष्ण लेश्या को भगवान महावीर ने काला रंग बताया है । आजकल कलर थैरेपी का प्रचलन है । इस थेरेपी से आपका स्वभाव और बीमारियों का पता करके इलाज किया जाता  है । मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि अगर आपको एक लाल कमरे में रखा जाए और आपके वस्त्र घर के सभी साधन अगर लाल कर दिए जाए तो थोड़े ही समय में आप उत्त्ेाजित हो जाते हैं दूसरी लेश्या वाला व्यक्ति बताता है कि तने को काट देना चाहिए । नील लेश्या वाले व्यक्ति का कलर नीला होता है । तीसरा व्यक्ति कहता है कि तने को नहीं डालियों को काट देना चाहिए । ऐसे व्यक्ति की लेश्या कापात लेश्या है । 

 

कृतज्ञता ज्ञापत करने से अहंकार टूटता है: आचार्य शिवमुनि

14 अक्टूबर, 2005: जालंधर  श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज के जीवनोपयोगी एवं सारगर्भित प्रवचन प्रतिदिन शिवाचार्य सत्संग स्थल, लक्ष्मी पैलेस, गाजी गुल्ला रोड़ पर चल रहे हैं । आज के अपनेे मंगलमय प्रवचन में आचार्यश्रीजी ने फरमाया कि- आप जहां पर भी रहते हो अकेले नहीं रहते हो । बहुत से परिवार के सदस्य रहते हैं । आप उनसे जो प्राप्त करते हो तो उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करो कृतज्ञता ज्ञापित करने में कुछ नहीं होता है बल्कि आप खाली हो जाते हो और जिसके प्रति आप कृतज्ञता ज्ञापित करने में आपका कुछ नष्ट नहीं होता है । कहना आसान है परन्तु उसके लिए आपको अपना अहंकार छोड़ना पड़ता है । हम तो यह मान बैठते हैं कि मैं जहां पर भी हंूं, जो भी हंूं, वह मेरी अपनी मेहनत से हूूं । यह आपकी भ्रांति है । आप नहीं थे तब भी दुनियां, परिवार चल रहा था और जब आप नहीं थे तब भी चलेगा । दुनियां रूकने वाली नहीं है । सबका अपना भाग्य है । आपको भी किसी का सहयोग है और आप भी दूसरे के सहयोगी है । प्रभु महावीर ने भी इस विषय में कहा है- परस्परोपग्रहो जीवानाम् ।

आपको जो कर्Ÿाव्य मिला है उसका पालन करो । कर्Ÿाव्य से भागो मत, कर्Ÿाव्य से भागने से दुर्गति होती है । आपको अधिकार मिला है उसका सदुपयोग करो । दीन दुःखियों की सेवा करो यही धर्म है । आप धर्म स्थान में जा रहे हो, प्रभु की पूजा कर रहे हैं परन्तु अगर आपके घर में कोई बीमार है, दुःखी है और आप उनकी सेवा नहीं कर रहे हैं तो आप धर्म से कोसों दूर हो । उनकी सेवा से आप ग्लानि मत करो दीन दुःखियों की सेवा करना ही आपका परम कर्Ÿाव्य है, यही शास्त्रों का सार और महापुरूषों का संदेश है ।

हम पाप करते हैं या पुण्य करते हैं तो उसके जिम्मेदार हम स्वयं हैं । सब कुछ मिला है जो नहीं मिला तो वह भी तेरी मेहरबानी है । शायद आपको कुछ नहीं मिला तो वह आपके भाग्य में नहीं है । हर समस्या का समाधान आपके पास है । हर समस्या को निपटाने के लिए कई तरीके केवल आपकी दृष्टि उस समस्या को समाप्त करने की होनी चाहिए कहावत भी है जहां चाह है वहां राह है । हम प्रवचन सुनते है कई वर्षों से सुन रहे हैं परन्तु सुनना तभी सार्थक होता है जब आप उसको गुणते हैं । उस बात को समझने पर आचरण पर लाने का प्रयास करना ही सुनने की सार्थकता है । 

 

श्रद्धा जहर को अमृत बना देती है: आचार्य शिवमुनि

15 अक्टूबर, 2005: जालंधर श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने प्रवचन में फरमाया कि- जब जीवन कुछ शेष रह जाता है तब व्यक्ति हाथ मलता रह जाता है । आयु के ये महत्वपूर्ण क्षण व्यक्ति धीरे-2 समाप्त कर रहा है । जब कुछ ही क्षण रह जाते हैं तब उसे पता चलता है कि इस जीवन को जीना कैसे है । जब समय था तब हमारे पास समय नहीं होता और जब समय थोड़ा रह जाता है तब हम समय मांगते हैं फिर हमें उन जीवन के अमूल्य क्षणों का मूल्य पता चलता  है । उससे पूर्व हम सारा जीवन दुःख, संशय, बेचैनी और अश्रद्धा में बीता देते हैं । 

हमारे यहां भारतीय संस्कृति में श्रद्धा को बहुत महत्व दिया गया है । यदि भीतर अटूट श्रद्धा है तो पत्थर के भीतर भी भगवान के दर्शन किए जा सकते हैं । यह एक श्रद्धा ही है । पत्थर भगवान है या नहीं यह बात अलग है परन्तु भारतीय ऋषियों ने हमें हर वस्तु में परमात्मा देखने की जो कला सिखाई है हम उसे भूलते जा रहे हैं । श्रद्धा वह चीज है जो जहर को भी अमृत बना देती है । प्रश्न होता है श्रद्धा किस पर हो ? ज्ञानी कहते हैं कि व्यक्ति स्वयं पर ही सबसे प्रथम श्रद्धा करे । जिसे स्वयं पर श्रद्धा है उसे भगवान पर अपने आप श्रद्धा हो जाएगी । 

तुम ध्यान करते हो । ध्यान करते समय कई व्यक्ति कहते हैं कि मन में बहुत विचार आते हैं । मन में शान्ति नहीं है । तनाव बढ़ रहा है इसका एक ही उत्तर है कि हमे ंपता तो चल रहा है कि हमारे भीतर ये सब है । हमारे भीतर तनाव, टेंशन, झगड़े, वासनाएं, दुःख, पीड़ा हैं । इन सबका जब तक पता ही नहीं चलता तब तक ये निकलेगी कैसे ? ये वस्तुएं ऐसी हैं जो हमें स्वयं से दूर रखती हैं । अपने ऊपर श्रद्धा रखने वाला व्यक्ति इन चीजों को धीरे-2 दूर हटाता है और स्वयं परमात्मा तक पहुंच जाता  है ।

प्रभु महावीर ने 6 लेश्याएं बताई है । अगर तुम्हारे भीतर भाव आया कि मुझे भोजन मिला है दूसरे को नहीं मिले या उसको हल्का भोजन मिले तो ये तीन अशुभ लेश्याओं वाले व्यक्ति की मानसिकता है और दूसरी तरफ अगर आपको भोजन मिला है और आपके मन में आता है कि ऐसा भोजन सबको मिले । सभी की भूख मिट जाए ये तीन शुभ लेश्याओं वाले व्यक्ति के लक्षण हैं । ऐसे ही भाव करते हुए हम अपनी भाव दशा लेश्या को शुद्ध से शुद्धतर एवं शुद्धतम की ओर ले जाएं, जो हमें कर्मों से मुक्त कर मुक्ति तक ले जाएगी । 

 

कालेजों में रेगिंग बंद हो: आचार्य शिवमुनि

16 अक्टूबर, 2005: जालंधर श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज के जीवनोपयोगी एवं सारगर्भित प्रवचन प्रतिदिन शिवाचार्य सत्संग स्थल, लक्ष्मी पैलेस, गाजी गुल्ला रोड़ पर चल रहे हैं । आज के अपनेे मंगलमय प्रवचन में आचार्यश्रीजी ने फरमाया कि- गलतियां मनुष्य से होती है क्योंकि मनुष्य अज्ञानी है परन्तु जो गलतियां होती है उनको स्वीकार करना और उनको दूर करने का प्रयास करना सफलता का मूलमंत्र है । गलतियों को सुधारने से मानवीय मूल्यों का विकास होता   है । जेल में जो कैदी है उनके ऊपर ध्यान और सत्संग का अच्छा प्रभाव पड़ता है । कैदियों को गलतियां करते समय होश नहीं होता है परन्तु जब वे ध्यान और योगा का अभ्यास करते हैं तो वह अपराध को अपने अन्र्तमन से स्वीकार करते हैं और उनको दूर करने के लिए संकल्प लेते हैं । 

आचार्यश्रीजी ने आजकल कालेज में चल रहे रेगिंग के विषय में कहा कि रेगिंग एक गलत कार्य है । पुराने विद्यार्थी नये विद्यार्थियों के साथ इतना भद्दा मजाक करते हैं जो अशोभनीय है । नये विद्यार्थियों को सताना नहीं चाहिए बल्कि उनका स्वागत करना चाहिए जिससे आजकल के बच्चे सुशिक्षित और आचारवान हो । उन्होंने प्रवचन सभा में आए हुए दोआबा कालेज के प्रिंसिपल आर0पी0 भारद्वाज और प्रो0 गोयल को विशेष रूप से कहा कि आप इस विषय में विचार विमर्श करके इसको बंद करवाइए जिससे कालेज और बच्चों की उन्नति होगी । 

जिस व्यक्ति के हृदय में सरलता, निर्मलता, स्वीकार करने की भावना है उस व्यक्ति का सर अपने आप हृदय से झुक जाता है । सत्संग में अनमोल हीरे, मोती झड़ते हैं कौन कितने ग्रहण कर पाता है यह उसकी पात्रता पर निर्भर करता है । महान् और सज्जन व्यक्ति की यही निशानी है कि वह बड़ा होकर भी अहंकार नहीं करता है । गुणवान व्यक्ति के समक्ष वह झुक जाता है । इस ब्रह्माण्ड में अपार खजाना भरा पड़ा है । परमात्मा भी कहीं बाहर आकाश या स्वर्ग में विद्यमान नहीं है बल्कि परमात्मा आपके भीतर मौजूद है । 

 

मनुष्य जीवन अनमोल है: आचार्य शिवमुनि

17 अक्टूबर, 2005: जालंधर श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज के जीवनोपयोगी एवं सारगर्भित प्रवचन प्रतिदिन शिवाचार्य सत्संग स्थल, लक्ष्मी पैलेस, गाजी गुल्ला रोड़ पर चल रहे हैं । आज के अपनेे मंगलमय प्रवचन में आचार्यश्रीजी ने फरमाया कि- मनुष्य जन्म एक अनमोल हीरा है । इस हीरे को हमें यूंही प्रमाद में नहीं खोना चाहिए । जीवन में हमें मिले हुए हर समय, श्वांस, शरीर और शरीर के हर अंग, खून का बहुत महत्व है । इसका महत्व वही जान सकता है जिसने इस हीरे का मूल्य समझकर सुन्दरता से उपयोग किया है । जिन्होंने इनको खोया है उनको अगर बताया जाए कि आपने जीवन के अमूल्य क्षण यों ही व्यर्थ में खोए हैं तो यह सुनकर वे नाराज हो जाएंगे । जो मनुष्य जन्म का अपने लिए ही नहीं बल्कि मानवता की सेवा, परोपकार में लगाता है उसका इस पृथ्वी पर जन्म लेना सार्थक है । 

प्रकृति हमसे लेती कुछ भी नहीं है बल्कि देती है । चाहे जैसे भी उसका उपयोग   करो । गुलाब का फूल बहुत ही मन-मोहक सुगंध देता है । आपने कभी देखा गुलाब का फूल कीचड़, पानी हो कहीं भी हो उसकी सुगंध में कोई फर्क नहीं पड़ता । इसकी क्या वजह ह,ै हमें तो जहां पर भी रखो हम तो वैसे ही हो जाते हैं । कीचड़ में डाले तो हम भी उसी रंग में मिल जाते हैं, परन्तु गुलाब का रंग सुगंध नहीं बदलता है क्योंकि उसकी सुगंध आरोपित नहीं है, उसकी सुगंध भीतर से आती है इसलिए वह कहीं भी रहे उसमें कोई परिवर्तन नहीं होता है। प्रेम भी भीतर से आता है । आजकल कहा जाता है कि मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूूं परन्तु यह भाषा बिल्कुल गलत है । प्रेम तो अपने आप होता है करना नहीं पड़ता । सामायिक, ध्यान, जप आदि भी भीतर से होता है, अपने आप होता है और उनकी सुगंध निरन्तर और न मिटने वाली होती है । 

आप हर क्षण, हर पल आनंद से जीवन व्यतीत कर सकते हैं, उसके लिए आयु या जाति बंधन नहीं है, उसके लिए जो पीछे हो गया है उसको छोड़ना पड़ता है ं। कभी-2 जब बुजुर्गों से चर्चा होती है तो वे कहते हैं कि मैंने यह किया, मैंने वो किया, मेरी पहले बहुत बात मानी जाती थी । मेरा सारे समाज में परिवार में प्रभाव था, परन्तु अब मेरी कोई बात सुनता नहीं है, उनके भीतर शिकायत भरी है । वे अपनी जवानी को देखकर रोते हैं परन्तु जो समय बीत गया है उसके ऊपर चिन्तन न करके जो समय आपके हाथ में रह गया है उसका महत्व समझकर शुभ कार्यों में प्रवर्तन होना चाहिए । 

आज संक्रांति का दिवस है । संक्रांति आपके जीवन में भी आनंद आए यही मंगल भावना है । चन्द्र ग्रहण के समय ज्यादा से ज्यादा धर्म ध्यान करें । 

 

अनुभव जन्य ज्ञान महŸवपूर्ण: आचार्य शिवमुनि

18 अक्टूबर, 2005: जालंधर  श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज के जीवनोपयोगी एवं सारगर्भित प्रवचन प्रतिदिन शिवाचार्य सत्संग स्थल, लक्ष्मी पैलेस, गाजी गुल्ला रोड़ पर चल रहे हैं । आज के अपनेे मंगलमय प्रवचन में आचार्यश्रीजी ने फरमाया कि- जीवन में धर्म ध्यान अपने लिए करना चाहिए । कुछ व्यक्ति धर्म-ध्यान करके प्रतिष्ठा प्राप्त करना चाहते हैं । प्रतिष्ठा प्राप्त करने के लिए वह अपने किए हुए धर्म-ध्यान का प्रचार प्रसार करते हैं । परन्तु वे महानुभाव यह नहीं जानते कि धर्म-ध्यान का प्रचार करने से धर्म-ध्यान निष्फल हो जाता है । धर्म-ध्यान, दान-पुण्य आपके जीवन को सुन्दर बनाने के लिए है । आप दान-पुण्य करते हैं और यह समझते हैं कि मैं दान करके दूसरे का उपकार कर रहा हूँ तो यह आपकी भूल है । जौहरी की दुकान पर बहुत से हीरे मोती होते हैं परन्तु वे सब हीरे मोती आपके नहीं हो जाते । जिन हीरों का मूल्य आप चुकाते हैं उसी को आप अपना कह सकते हैं । हीरों को खरीदकर आप उनको अपने खजाने में बंद कर लेते हैं । उसका प्रचार नहीं करते क्योंकि आपको पता है कि अगर प्रचार कर दिया तो इन हीरों का रहना मुश्किल है । वैसे ही जो दान-पुण्य आप करते हैं उसको अपने गुप्त खजाने में रखो, उसका प्रचार प्रसार मत करो क्योंकि प्रचार प्रसार करने से उस दान-पुण्य का लाभ आपको नहीं मिलता है । 

दो शब्द जो हमारे बोलने और पढ़ने में ज्यादा प्रचलित होते हैं एक है समझना और दूसरा है जानना । किसी कवि ने इस विषय में कहा है- 

पढ़ने की हद समझ है, समझन की हद ज्ञान ।

ज्ञान की हद हरिनाम है, यह सिद्धान्त उर आन ।।

जब व्यक्ति अध्ययन करता है, पढ़ता, लिखता है तो उसे समझ आ जाती है । उसे हर विषय को समझाने के लिए हर विषय का विश्लेषण नहीं करना पड़ता है । वह केवल इशारे मात्र से उस विषय को समझ जाता है । कुछ बातें समझने की होती है और कुछ नहीं भी होती है । मिर्जा गालिब के जीवन में एक सुन्दर घटना है- मिर्जा गालिब जो कि कविता और शेर-शायरी के अपने समय के प्रसिद्ध शायर थे । एक बार उनके पास एक व्यक्ति ने आकर कहा कि आपकी कविताओं की लोग बहुत प्रशंसा करते हैं, परन्तु जो लोग प्रशंसा करते हैं क्या उनको न कविताओं का अर्थ पता है ? तो मिर्जा गालिब ने इसका सुन्दर जवाब दिया- उन्होंने कहा, खुदा बड़ा है । क्या तुम खुदा को समझते हो । उसने कहा, नहीं । तो मिर्जा गालिब ने कहा कि खुदा को समझा नहीं जाता है उसको तो अनुभव किया जाता है । वैसे ही जो मेरी कविताओं की प्रशंसा करते हैं वे इसका अर्थ नहीं जानते परन्तु इन कविताओं के अर्थ को समझते हैं । समझने की हद ज्ञान है । ज्ञान का अर्थ है जानना । ज्ञान की हद हरिनाम है । ज्ञान आ जाएगा तो उसके मुख से हरिनाम अपने आप प्रस्फुटित होगा । 

 

श्रद्धा जहर को अमृत बना देती है: आचार्य शिवमुनि

19 अक्टूबर, 2005: जालंधर श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने प्रवचन में फरमाया कि- जब जीवन कुछ शेष रह जाता है तब व्यक्ति हाथ मलता रह जाता है । आयु के ये महत्वपूर्ण क्षण व्यक्ति धीरे-2 समाप्त कर रहा है । जब कुछ ही क्षण रह जाते हैं तब उसे पता चलता है कि इस जीवन को जीना कैसे है । जब समय था तब हमारे पास समय नहीं होता और जब समय थोड़ा रह जाता है तब हम समय मांगते हैं फिर हमें उन जीवन के अमूल्य क्षणों का मूल्य पता चलता  है । उससे पूर्व हम सारा जीवन दुःख, संशय, बेचैनी और अश्रद्धा में बीता देते हैं । 

हमारे यहां भारतीय संस्कृति में श्रद्धा को बहुत महत्व दिया गया है । यदि भीतर अटूट श्रद्धा है तो पत्थर के भीतर भी भगवान के दर्शन किए जा सकते हैं । यह एक श्रद्धा ही है । पत्थर भगवान है या नहीं यह बात अलग है परन्तु भारतीय ऋषियों ने हमें हर वस्तु में परमात्मा देखने की जो कला सिखाई है हम उसे भूलते जा रहे हैं । श्रद्धा वह चीज है जो जहर को भी अमृत बना देती है । प्रश्न होता है श्रद्धा किस पर हो ? ज्ञानी कहते हैं कि व्यक्ति स्वयं पर ही सबसे प्रथम श्रद्धा करे । जिसे स्वयं पर श्रद्धा है उसे भगवान पर अपने आप श्रद्धा हो जाएगी । 

तुम ध्यान करते हो । ध्यान करते समय कई व्यक्ति कहते हैं कि मन में बहुत विचार आते हैं । मन में शान्ति नहीं है । तनाव बढ़ रहा है इसका एक ही उत्तर है कि हमे ंपता तो चल रहा है कि हमारे भीतर ये सब है । हमारे भीतर तनाव, टेंशन, झगड़े, वासनाएं, दुःख, पीड़ा हैं । इन सबका जब तक पता ही नहीं चलता तब तक ये निकलेगी कैसे ? ये वस्तुएं ऐसी हैं जो हमें स्वयं से दूर रखती हैं । अपने ऊपर श्रद्धा रखने वाला व्यक्ति इन चीजों को धीरे-2 दूर हटाता है और स्वयं परमात्मा तक पहुंच जाता  है ।

प्रभु महावीर ने 6 लेश्याएं बताई है । अगर तुम्हारे भीतर भाव आया कि मुझे भोजन मिला है दूसरे को नहीं मिले या उसको हल्का भोजन मिले तो ये तीन अशुभ लेश्याओं वाले व्यक्ति की मानसिकता है और दूसरी तरफ अगर आपको भोजन मिला है और आपके मन में आता है कि ऐसा भोजन सबको मिले । सभी की भूख मिट जाए ये तीन शुभ लेश्याओं वाले व्यक्ति के लक्षण हैं । ऐसे ही भाव करते हुए हम अपनी भाव दशा लेश्या को शुद्ध से शुद्धतर एवं शुद्धतम की ओर ले जाएं, जो हमें कर्मों से मुक्त कर मुक्ति तक ले जाएगी । 

 

ध्यान से तनाव, रोगमुक्त एवं चित्तशुिद्ध: आचार्य शिवमुनि

20 अक्टूबर, 2005:  {दैनिक जागरण} श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- संसार के सभी धर्मों ने आत्मा के अजर-अमर अस्तित्व को स्वीकार किया है । प्रभु महावीर की वाणी कहती है ‘अप्पा सो परमप्पा’ । हमारी साधारण जीव आत्मा ही शुभ संयोग पाकर सिद्ध बुद्ध और परमात्मा बनती  है । आत्मा तो शुद्ध स्वभाव वाली है । अनंत ज्ञान, अनंत दर्शन से परिपूर्ण है । ज्ञान हम स्वयं हैं- शान्ति हमारे भीतर है, फिर भी हम दुःखी और परेशान क्यों हैं ? अशान्त क्यों  हैं ? क्योंकि हम स्वभाव से हटकर विभाव में चले गए हैं । इसीलिए हम दुःखी है, परेशान   हैं । भगवान बुद्ध ने भी कहा है- ‘अप्पा दीपो भवः’ । बाईबल में भी कहा है- ‘मनुष्य संसार की दौलत को प्राप्त कर ले, अगर आत्मा को नहीं जाना तो कुछ भी नहीं पाया’ । जिसने आत्मा को जान लिया, उसने सब कुछ पा लिया । 

अरिहंत की भक्ति, सिद्ध का स्मरण करते हुए हम भी अरिहंत बन सकते हैं । अरिहंत बनने के लिए ध्यान साधना मैत्री करूणा आधारशीला है । अरिहंत की साधना का मूलाधार जैन शास्त्रों में ध्यान को कहा है- जैसे शरीर में सिर का मूल्य है, इसी प्रकार साधुओं का मूल धर्म ध्यान है । संसार में ऋषि मुनि खुश रहते थे क्या कारण था, इसका कारण है अपने भीतर में उतरने का आत्मा में अवगाहन करने का जब साधक भीतर में उतरता है तो वह आनंद की गंगा में अवगाहन करता है । उस अन्तर की अनुभूति को वह शब्द से प्रकट नहीं कर सकता । ध्यान केवल एकाग्रता नहीं है बल्कि अनतर की जागृति और विवेक है । ध्यान क्या है ? न अतीत का स्मरण, न भविष्य की कल्पना, न ही वर्तमान के साथ लगाव । स्वयं को जानना अन्तर के सभी रहस्य को प्रकट कर लेना ही ध्यान का लक्ष्य है । ध्यान साधना करने से व्यक्ति तनाव व बीमारियों से मुक्ति पाता है । आचार्य भगवन् ने आगे फरमाया कि- ध्यान करने से गूंगे बोल पड़े । बीमार व्यक्ति ठीक हो गए । साथ ही साधना शिविर में बैठे लोगों ने अपने सुन्दर अनुभव भी सभी के समक्ष रखे किस प्रकार शारीरिक और मानसिक लाभ ध्यान साधना शिविर से हो रहे हैं ।  

विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के अन्तर्गत अभियान के अन्तर्गत धर्मपाल दादा सनातन स्कूल में आत्म: चेतना कोर्स चल रहा है । बच्चों को इस शिविर में हर कार्य सौ प्रतिशत कैसे करना, यादास्त कैसे बढ़े । तनावमुक्त जीवन कैसे जीया जाये । जिम्मेदारी एवं आहार शुद्धि को समझाया गया । 

 

जो सेवा न कर सके वह सबसे बड़ा निर्धन है: आचार्य शिवमुनि

जालंधर, 21 अक्टूबर { दैनिक जागरण} श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- संसार में ऐसे अनगिनत लोग हैं जो केवल अपनी स्वार्थपूर्ति के लिए ही जीते हैं । ऐसे लोगों की प्रभु में कोई आस्था नहीं होती तथा ये लोग संसार में व्याप्त दलदल से कभी भी उबर नहीं पाते हैं । 

यहां गाजीगुल्ला रोड स्थित लक्ष्मी पैलेस में अपने चातुर्मासीय दैनिक प्रवचन के दौरान आचार्यश्री ने कहा कि- संसार का जो भी व्यक्ति स्वयं को प्रतिष्ठित समझता है वह उसका भ्रम है । वास्तव में वह व्यक्ति सबसे बड़ा निर्धन है क्योंकि प्रतिष्ठित होने के भ्रम में वह किसी की सेवा नहीं करता, उसमें सेवाभाव जागृत ही नहीं हो पाता है । परमात्मा द्वारा ऐसे व्यक्ति को सम्पूर्ण सुरक्षित शरीर दिए जाने के बावजूद वह किसी भी जरूरतमंद की सेवा न करके उसका सदुपयोग करने से वंचित रह जाता है । ऐसे व्यक्ति अपनी इच्छापूर्ति के लालच में आजीवन दुष्कर्म करते हैं लेकिन प्रभु का सिमरन नहीं करते हैं । मायाजाल में फंसा व्यक्ति पैसा कमाने के लिए कुछ भी कर सकता है यहां तक कि सुपारी लेकर हत्या करने तक पर उतारू हो जाता है । 

आचार्यश्रीजी के अनुसार यदि व्यक्ति प्रभु में ध्यान लगाये तो उसके मन में बुरा विचार आयेगा ही नहीं । व्यक्ति को उठते बैठते हर समय प्रभु का स्मरण करना चाहिए । आपने कहा कि मनुष्य की मानसिकता सेवा भाव की होनी चाहिए उसे यह ध्यान रखना होगा कि अगर आज वह किसी जरूरतमंद, दुर्बल या निर्धन की मदद करता है तो बदले में भविष्य में उसे भी मदद मिलेगी यह प्रकृति का अटूट नियम  है । आज आप किसी की मदद करेंगे तो कल आपकी भी कोई मदद करेगा । 

इससे पूर्व श्रमण संघीय मंत्री श्री शिरीष मुनि जी महाराज ने कहा- मनुष्य को ध्यान के अभाव में यह भ्रम रहता है कि वह बहुत कुछ है । वह समझता है कि उसके बिना कोई भी कार्य होने वाला नहीं है । यह उसका मिथ्या भ्रम ही साबित होता है क्योंकि उसे आत्मबोध नहीं होता कि वह वास्तव में क्या है ? अगर वह ध्यान लगाये तो उसे स्वयं ज्ञात हो जाएगा कि वह कुछ भी नहीं है । अगर वह संसार में कल को न भी होगा तो भी संसार चलेगा । यह आत्मबोध केवल ध्यान से ही हो सकता है । 

 

बच्चों के व्यक्तित्व विकास के लिए ध्यान अति आवश्यक: मंत्री शिरीष मुनि

डी0पी0डी0एस0डी0 स्कूल में आत्म: चेतना कोर्स

जालंधर 21 अक्टूबर । विश्व मंगल मैत्री अभियान के अन्तर्गत आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज के आशीर्वाद से श्रमण संघीय मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म0 के दिशा निर्देशन में साधिका निशा जैन द्वारा मांई हीरा गेट स्थित डी0पी0डी0एस0डी0 स्कूल स्कूल में त्रिदिवसीय आत्म: चेतना कोर्स सम्पन्न हुआ । प्रतिदिन सुबह 9.00 से 10.30 बजे तक बच्चों को महानता का ज्ञान, जीवन में हर कार्य में सफलता प्राप्त करने की कुंजी, सबके प्रति जिम्मेदारी का अहसास, लीडरशिप की क्वालिटी विकसित करने हेतु व्यक्तित्व विकास के सूत्र, शाकाहार का प्रशिक्षण, आहार की शुद्धि, आत्म-योग साधना, प्राणायाम और ध्यान का प्रशिक्षण दिया गया । इस शिविर में करीब 150 विद्यार्थियों ने भाग लिया । इस कोर्स में स्कूल के प्रिंसिपल और मेनेजमेन्ट के सभी सदस्यों ने पूर्ण सक्रिय रूप से सहयोग दिया । अन्तिम दिवस शिवाचार्य चतुर्मास समिति की ओर से स्कूल के प्रिंसिपल को स्मृति चित्र देकर श्री आर0सी0 जैन मार्गदर्शक एवं महामंत्री श्री सुनील जैन द्वारा । इस कोर्स के आयोजन र्में  श्री भगवानदास जैन एवं श्रीमती इन्दु अग्रवाल ने सेवाएं देकर बच्चों को ज्ञान देने में सहयोग दिया । दूसरा आत्म: चेतना कोर्स इसी स्कूल में 22 से 25 अक्टूबर तक प्रातः 10.30 से   12.00 बजे तक चलेगा ।  

 

मनुष्य को परहित में कार्य करना चाहिए: आचार्य शिवमुनि

जालंधर 22 अक्टूबर: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने प्रवचन में फरमाया कि- जीवन जीने का मजा तभी है जब वह दूसरों के लिए जीया जाये, स्वयं के लिए जीना कोई जीवन नहीं है । गाजीगुल्ला रोड़ स्थित लक्ष्मी पैलेस में अपने चातुर्मासिक प्रवचन के दौरान आचार्यश्रीजी ने कहा कि संसार में अधिकांश लोग ऐसे हैं जो हड़पने की संस्कृति में विश्वास रखते हैं । वे चाहते हैं कि संसार में जितनी भी धन सम्पदा है उसे वे स्वयं ही हड़प जाये । इकट्ठी की गई बेशुमार दौलत का थोड़ा सा भी अंश वे परहित में नहीं लगाना चाहते ऐसे स्वार्थी लोगों को परहित लाभ के आनंद का ज्ञान नहीं है । 

आचार्यश्री ने कहा कि- स्वार्थी लोगांे को चन्द्रमा, सूर्य व आकाश से प्रेरणा लेनी चाहिए जो अपनी रोशनी, प्रकाश और पानी संजोकर रखने की बजाय उसे बांटने का काम करते हैं । जितना ज्यादा बांटते है उतनी ही कीर्ति पाते हैं । अगर सूर्य प्रतिदिन फैलाने वाली अपनी रोशनी को समेटे रखे, चन्द्रमा अपना प्रकाश समेटे रखे और आकाश वर्षा रूपी धन को अपने में समेटे रखे तो क्या होगा । वे समेटने की बजाय बांटने में आनंद पाते हैं । मनुष्य को यह जान लेना चाहिए कि खाने में वो आनंद नहीं है, जो खिलाने में है । धन, दौलत का आनंद भी तभी है जब वह गरीबों, बेसहारा व जरूरतमंदों के काम आ सके । 

परहित बारे प्रसिद्ध रसायनविज्ञ नागार्जन का उदाहरण देते हुए आचार्य श्री ने कहा- एक बार नागार्जन ने एक मिश्रण निर्माण के लिए नौकरी पर रखने के लिए दो व्यक्तियों को बुलाया । उन्हें 24 घण्टे का समय देकर कहा गया कि जो भी 24 घण्टे में सबसे पहले मिश्रण तैयार करके लायेगा मैं उसे नौकरी पर रखूंगा । इनमें से एक को वृद्ध बीमार व्यक्त् िमिल गया जिसे दवा और सेवा की तत्काल जरूरत थी वह मिश्रण तैयार करने की बजाय नौकरी न मिलने की चिन्ता त्याग उस बीमार वृद्ध की सेवा में जुट गया जबकि दूसरा मिश्रण तैयार करने में लग गया । 24 घण्टे बीत जाने के बाद जब दोनों नागार्जन के पास पहुंचे तो बीमार की सेवा करने वाले ने बताया कि वह मिश्रण तैयार नहीं कर सका । वह बीमार की सेवा मंें जुटा, जिससे वह वृद्ध अब स्वस्थ है और उसकी जान बच गई है । नागार्जुन ने उसे नौकरी पर रखने की घोषणा कर दी जबकि दूसरे ने विरोध किया कि मैंने मिश्रण तैयार किया है मुझे नौकरी पर क्यों नहीं रखा गया । नागार्जुन ने जवाब दिया कि रसायन तो बाद में भी तैयार हो सकता था लेकिन जीवन बाद में नहीं बचाया जा सकता था। रसायन निर्माण से ज्यादा महत्व जीवन का है । 

आचार्यश्री ने कहा कि जिस कार्य को करने से अभिमान पैदा हो, क्रोध पैदा हो वह महत्वपूर्ण नहीं है । उसके पीछे तुम्हारी चेतना, दृष्टि क्या है वह ज्यादा महत्वपूर्ण है । किसी भी व्यक्ति के जीवन का सही महत्व तभी है जब वह दूसरे के काम आ सके ।

 

अमरत्व पाने की लालसा भी दुःखों का कारण बनती है: आचार्य शिवमुनि

जालंधर 23 अक्टूबर: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने कहा कि- संसार में आया हर व्यक्ति अमरत्व प्राप्ति की लालसा पाले हुए है । वह चाहता है कि वह सदैव जीवित रहे कोई उसे मार न सके लेकिन अमरत्व पाने की यह लालसा आजीवन दुःखों का कारण भी बन सकती है । यहां गाजी गुल्ला रोड स्थित लक्ष्मी पैलेस में देश भर के विभिन्न स्थानों से पहुंचे श्रावक श्राविकाओं के सम्मुख अपने चातुर्मासिक प्रवचन के दौरान आचार्यश्रीजी ने सिकन्दर का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए बताया कि- जब सिकन्दर भारत की ओर कूच करने की तैयारी कर रहा था तो उसे उपदेश मिला कि भारत में एक रेगिस्तान है जिसके नीचे एक झरना बहता है, वह अमृत कुण्ड है अगर तुम उसका पानी पी लोगे तो अमर हो जाओगे । सिकन्दर के मन में अमरत्व पाने की लालसा बढ़ी और भारत आकर उसने उस झरने को ढूंढ़ निकाला । सिकन्दर ज्योंही उस कुण्ड से पानी पीने लगा तो उसे अचानक वहां पहले से बैठे उस कौअे की आवाज आयी जो उस कुण्ड का पानी पीकर अमर हो चुका था । उस कौअे ने सिकन्दर को कहा कि देखो सिकन्दर तुम अपनी सेना के सरदार हो तो मैं भी कौओं की सेना का सरदार हूं । मैं तुम्हें बता देना चाहता हूूं कि मैंने इस कुण्ड का पानी पीया है और मैं अमर हो गया हूं लेकिन अब न तो मेरे भीतर जीने की लालसा रही है और न ही मुझे मौत आती है । मैं अब अमरत्व पाकर ज्यादा दुःखी हो गया हूं । कौअे की सीख पाकर सिकन्दर ने वह जल पीने का इरादा तुरन्त त्याग दिया । 

आचार्यश्रीजी के अनुसार संसार में आए हर व्यक्ति को धर्म की आराधना करनी   चाहिए । सत्संग की सेवा करनी चाहिए । दीन दुःखियों अपंगों और बेसहारा लोगों की मदद करनी चाहिए । सेवा को सेवाभाव से ही करना चाहिए, करने के बाद उसे गिनाना नहीं  चाहिए । अगर व्यक्ति यह चाहे कि सेवा करने के बाद उसका नाम रहे तो सेवा शुद्ध नहीं मानी जाती । 

श्रमण संघीय मंत्री श्री शिरीष मुनि जी महाराज ने ध्यान व साधना के महत्व पर बल देते हुए कहा कि शुद्ध मन से साधना करके व्यक्ति को अपनी आध्यात्मिक शक्ति बढ़ानी चाहिए । जब स्वयं की आध्यात्मिक शक्ति प्रबल होगी तो वह दूसरों को भी इसके लिए प्रेरित कर सकता है । 

शिवाचार्य चातुर्मास समिति के महासचिव श्री सुनील जैन ने बाहर से पधारे तमाम श्रावक श्राविकाओं का अभिनन्दन करते हुए आचार्यश्रीजी के सम्मान में अपनी कविता पेश   की । बाहर से पधारे अनेक वक्ताओं ने भी अपने-अपने विचार रखें । आज आचार्यश्रीजी के दर्शनार्थ दिल्ली, डबवाली मण्डी, लुधियाना, रोपड़, पंचकूला, चण्डीगढ़ आदि अनेक स्थानों से दर्शनार्थी बन्धु पहुंचे । 

 

मोक्ष को पाना है तो विनय भाव अपनाना होगा: आचार्य शिवमुनि

जालंधर 24 अक्टूबर: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने कहा कि- विनय {समर्पण} वह पहली सीढ़ी है जिसके बिना व्यक्ति मोक्ष की प्राप्ति नहीं कर सकता । विनय के अभाव में व्यक्ति चाहे धर्म का कितना भी अनुष्ठान चाहे गुरू के घर में, स्वयं के परिवार में हो या फिर कहीं अन्य किसी भी जगह कर ले वह सफल हो ही नहीं सकता । आचार्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने गाजी गुल्ला रोड़ पर स्थित लक्ष्मी पैलेस में अपनी चातुर्मासिक प्रवचन में यह बात कही ।

विनय के महत्व पर प्रकाश डालते हुए आचार्यश्रीजी ने कहा कि यह संसार एक वृक्ष के समान है । जिस प्रकार वृक्ष का मूल उसकी टहनियां, पत्ते और जड़ है, उसी प्रकार मोक्ष का मूल विनय है । अगर व्यक्ति वृक्ष के मूल को नहीं सींचेगा तो वृक्ष कैसे बड़ा होगा । इसी प्रकार विनय मनुष्य के भीतर नहीं होगा तो वह चाहे कितना भी जतन कर ले वह मोक्ष को प्राप्त नहीं कर सकता । आचार्यश्री के अनुसार विनय के अभाव में अहंकारी व्यक्ति आगे बढ़ ही नहीं सकता । विनय के स्थान पर अहंकार है तो धर्म अधर्म में परिवर्तित हो जाएगा । व्यक्ति संसार को जानता चाहता है तो आंखों की बजाय भीतरी दृष्टि से देखे । भगवान शिव जिस प्रकार तीसरे नेत्र से संसार को देखते थे उसी प्रकार व्यक्ति संसार को जानने के लिए मन की दृष्टि से देखे । दृष्टि गलत हो गई तो सृष्टि स्वयं ही गलत दिखेगी । व्यक्ति जितना झुकेगा उतना ही ज्यादा पायेगा, जितना अकड़ेगा उतना ही गंवायेगा ।

श्रमण संघीय मंत्री श्री शिरीष मुनि जी महाराज ने कहा कि अगर व्यक्ति आगे बढ़ना चाहता है तो उसे अपने गुरूओं तथा माता-पिता का सम्मान करना चाहिए । गुरूओं को सम्मान न देने वाला कभी आगे नहीं बढ़ सकता उसका पतन शुरू हो जाता है । 

 

प्रभु को पाना है तो मीरा की तरह तप करना होगा: आचार्य शिवमुनि

जालंधर 25 अक्टूबर: {दैनिक जागरण} श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने कहा कि- ईश्वर को पाने के लिए बड़ा तप करना पड़ता है । बिना कठोर तप किये व्यक्ति द्वारा प्रभु को पाने की कामना ही व्यर्थ है । आचार्यश्रीजी यहां गाजी गुल्ला रोड़ स्थित लक्ष्मी पैलेस में अपने चातुर्मासिक प्रवचनों की अमृतवर्षा कर रहे थे । 

आचार्यश्रीजी ने फरमाया कि दही से मक्खन ऐसे ही नहीं निकलता उसे बहुत देर तक मथना पड़ता है । मीरा का उदाहरण देते हुए आचार्यश्री ने कहा कि आज वह भगवान कृष्ण की महान् भक्त के रूप में बड़ी प्रतिष्ठित है । दुनियां में उसकी भक्ति का उदाहरण प्रमुखता से दिया जाता है लेकिन इस प्रतिष्ठा को पाने के लिए मीरा को कितना दुःख, कितना कष्ट झेलना पड़ा उसे भी ध्यान रखना पड़ेगा । मीरा को अनेकों बार अपमानित होना पड़ा । जहर का प्याला तक पीना पड़ा, अनेक यातनाअेां से गुजरना पड़ा मगर वह कभी हारी नहीं उसका प्रभु प्रेम निस्वार्थ था । वह प्रभु को पाने के लिए ही सब सहती रही । उसमें समर्पण और श्रद्धा का सच्चा भाव था उसे भगवान कृष्ण के सिवाय कुछ भी नहीं सूझता था । 

आचार्यश्री के अनुसार संसार में जिसने भी सच्चे भाव से प्रभु या व्यक्ति से प्रेम किया है उसे संसार की कोई भी ताकत हरा नहीं सकी । निस्वार्थ-भाव से भक्तिभाव करने वाले को कोई झुका नहीं सकता । मीरा की प्रतिष्ठा को आज हम देखते है। तो हमंें उसकी उस समय की स्थिति को भी ध्यान रखना होगा कि तप और समर्पण के समय उसकी क्या स्थिति थी । संसार का कोई भी व्यक्ति अगर प्रभु को पाने का इच्छुक है तो उसे मीरा की तरह तप करना होगा । व्यक्ति जितना को भी समय मिले उसे प्रभु स्मरण में अवश्य लगाना चाहिए । 

श्रमण संघीय मंत्री श्री शिरीष मुनि जी महाराज ने कहा कि अगर व्यक्ति आगे बढ़ना चाहता है तो उसे अपने गुरूओं तथा माता-पिता का सम्मान करना चाहिए । गुरूओं को सम्मान न देने वाला कभी आगे नहीं बढ़ सकता उसका पतन शुरू हो जाता है । 

 

प्रेम ज्ञान से बढ़कर है: आचार्य शिवमुनि

जालंधर 26 अक्टूबर: { दैनिक जागरण} श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने ज्ञान और प्रेम की तुलना करते हुए प्रेम को ज्ञान से श्रेष्ठ बतलाया । उन्होंने कहा कि- एक महाराजा के दो जवान बेटे थे । एक का नाम ज्ञान और दूसरे का नाम प्रेम था । दोनों युवा थे । एक दिन राजा के मन में आया कि किसको उत्तराधिकारी बनाये ? दोनों एक समान रूप, रंग, कांति, आयु से युक्त थे । राजा ने मंत्री से चर्चा की । मंत्री राजा को एक युक्ति बतलाई । युक्ति के अनुसार राजा ने दोनों बेटों को अपने पास बुलाया और विपुल धन राशि देते हुए कहा कि- दोनों देश भ्रमण करते हुए हर गांव नगर में अपना घर बनायें । दोनों निकल पड़े । ज्ञान ने बुद्धि से कार्य करते हुए जगह-2 अपना धन लगाते हुए ठेकेदारों से घर बनावायें । प्रेम भी हर गांव और प्रत्येक घर गया पर उसने धन ना लगाते हुए अपने मित्र बनायें । हर व्यक्ति की बात सुनते हुए उनकी परेशानी दूर की, सबसे प्यार से बात की । दोनों वापस पहुंचे तो ज्ञान बहुत थका हुआ था और प्रेम के मुख पर मुस्कान थी । राजा ने अपना उत्तराधिकारी प्रेम को बताया क्योंकि उसने लोगों के दिल में जगह बनाई थी । ज्ञान से प्रेम अधिक अच्छा है क्योंकि ज्ञान बुद्धि से कार्य करता है और प्रेम हृदय से कार्य करता है । 

पश्चिमी वैज्ञानिकों ने ज्ञान से टेक्नालाॅजी विकसित की । कम्प्यूटर, रोबोट, चन्द्रमा तक पहुंच गये । एटम बम्ब बनाकर व्यक्ति को खत्म करने का साधन बनाया । परन्तु वे स्वयं के लिए कुछ प्राप्त नहीं कर पाए । प्रसिद्ध वैज्ञानिक अल्बर्ट आइनस्टाइन ने कहा कि धर्म और विज्ञान एक दूसरे के पूरक है । उन्होंने कहा कि मैं अगले जन्म में वैज्ञानिक बनना पसन्द नहीं करूंगा । 

प्रभु ने कहा कि सबसे प्रेम करो । सबको अपना मानो । गंगा ने भी ज्ञान और प्रेम को अपने भीतर डुबकी लगाने को कहा ज्ञान तो अहंकार से भर गया । प्रेम ने डुबकी लगाई तो वह अंहकार और वासना से रहित हो गया । ज्ञान अगर झुक जाए तो वह ध्यान, साधना, समाधि से युक्त होकर शुद्ध हो जाएगा । जहाँ झुकोगे वहां सब कार्य सफल होते चले   जाएंगे । अपना अधिकार मत जमाओ, जीवन परिवर्तनशील है । व्यक्ति के संस्कार बदलते रहते हैं । अपना किसको मानें सब कुछ अशाश्वत् है । सत्य है शाश्वत् है तो सिद्धस्थिति । अरिहंत प्रभु ने हमें इतनी करूणा दी उन पर श्रद्धा करो । जीवन में कुछ पाना चाहते हो तो खाली हो जाओ । समर्पण में आ जाओ, सबके साथ प्रेममय व्यवहार करो । 

मंगलमैत्री अभियान के अन्तर्गत धर्मपाल दादा सनातन धर्म स्कूल, टैगोर स्कूल, डे बोर्डिग स्कूल, के0एम0वी काॅलेज आदि शिक्षण संस्थाओं में आत्म: विकास कोर्स चल रहे हैं । प्रातःकाल 7.45 से 8.15 बजे तक प्रतिदिन ध्यान और 8.15 से 9.00 बजे तक उत्तराध्ययन सूत्र की वांचना चल रही है । 

 

बच्चों के भीतर मानवीय मूल्यों का आरोहण करें: आचार्य शिवमुनि

जालंधर 27 अक्टूबर: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने बच्चों के लिए संस्कार की बातें बताते हुए कहा कि बच्चे भारतीय संस्कृति की अमूल्य देन हैं । उनके भीतर हम मानवीय मूल्यों का आरोहण करेंगे तो बच्चे सुसंस्कृत हो जाएंगे । प्रभु ने कहा आत्मा ही परमात्मा है । जब हमारी आत्मा परमात्मा है तो हमें चिन्ता किस बात की । इन्सान का शरीर ही ऐसा है उसे जिस परिस्थिति से गुजारो वह वैसा बन जाता है । एक व्यक्ति बचपन में ही गरीब हो तो चाहे उसकी कितनी भी उम्र हो जाए गरीबी में रहना वह सीख लेता है । 

आज के इस भौतिकवादी युग में टी0वी0, कम्प्यूटर, खेल के साधनों से हम तनावमुक्त नहीं हो  सकते । तनावमुक्ति के लिए ध्यान करना आवश्यक है । ध्यान से भीतर शान्ति आएगी । ध्यान के साथ योगिक क्रियाएं करने से बहुत लाभ होता है । आचार्यश्रीजी ने फरमाया कि- जलनेति, सूत्रनेति करने से आंखों के नम्बर कम होते हैं, इससे सिर प्रभावित होता है और उसका हर सैल तरोताजा होता है । भारत की संस्कृति में सात्विक भोजन को अधिक महत्व दिया है । भारत के ऋषियों मुनियों ने सात्विक जीवन के साथ सात्विक भोजन को ग्रहण किया । हम अपने बच्चों को गुड़ खाना सिखाएं । गुड़ सात्विक है उसके अन्दर कोई विनाशी-तत्व नहीं है । गुड़ खाने से व्यक्ति शान्ति की ओर अग्रसर होता है । चीनी खाने से हिंसक विचार पैदा होते हैं । प्रस्तुत विचार वैज्ञानिकों ने परीक्षण करने के बाद बतलाये हैं, सरकार इन बातों पर ध्यान दे । वर्तमान में हम देख रहे हैं कि बहुत नशा बढ़ गया है । एक तरफ सरकार नशा मत करो कहती है तो एक तरफ नशे के ठेके दे रही है । हम नशे से बचें और अपने बच्चों को संस्कारित   करें । 

मानव के जीवन से आलस्य निकल जाए तो उसका जीवन बहुत सुन्दर बन जाएगा । आलस्य के कारण मानव की सारी जिन्दगी बेकार हो जाती है । बुढ़ापे में कोई काम नहीं आएगा । हम धर्म-ध्यान में संलग्न हो जाएं । मानव का पहला सुख है निरोगी काया । हम अपने शरीर को निरोग रखें । प्रतिदिन ध्यान, योग का अभ्यास करें । घर के भीतर दस व्यक्ति हैं तो उनमें से प्रत्येक व्यक्ति के भीतर से कुछ गुण ग्रहण करें और संकल्प करें कि प्रतिदिन दो व्यक्तियों को सात्विक जीवन-यापन करने की प्रेरणा   दूंगा । आपके पास जो थोड़ा समय बचा है उसका सदुपयोग कर लो । बहुत बड़ा दान नहीं कर सकते तो थोड़ा-2 दान करें । ऐसे कई स्थान है जहां पर प्रतिदिन एक-एक रूपया अलग निकालकर दान में लगाया जाता है । एक मुट्ठी अन्न दान में लगाया जाता है । हमारे पास अनेक वस्त्र  हैं, हम उनमे ंसे कुछ वस्त्र उनको दें जिनके पास वस्त्र नहीं है । संकल्प करें कार्य स्वतः ही हो जाएगा । कुछ दिन सात्विक जीवन जीकर देखो एक माह बाद सुन्दर निर्णय आएंगे । सात्विक जीवन ही हमारे लिए उपयोगी है और उसे यापन करने के लिए सहयोगी है सात्विक भोजन । इनके साथ रहते हुए हम अरिहंत की भक्ति और सिद्ध का स्मरण सुलभता से कर सकते हैं । 

 

जालंधर के काॅलेज और स्कूलों में आत्म चेतना कोर्स

विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान के अन्तर्गत श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज के आशीर्वाद से के0एम0वी0 काॅलेज में पंचदिवसीय आत्म: विकास कोर्स ‘बेसिक’ का आयोजन हुआ जिसमें कुमारी निशा जैन ने सभी बालिकाओं को प्रशिक्षण दिया । इस शिविर में करीब 80 बालिकाओं ने भाग लिया । काॅलेज की प्रींसिपल रीटा बावा ने इस कोर्स का आयोजन करवाया और श्रीमती तृप्ता गोयल ने इसके आयोजन को सफल बनाने में पूरा सहयोग दिया । कुमारी नेहा जैन, श्रीमती विपुला जैन, श्री रवीश जैन, श्रीमती पूनम जैन आदि ने भी काॅलेज में पहुंचकर अपनी सेवाएं दी । सभी बालिकाएं अपने सुन्दर अनुभव बताते हुए इस अमूल्य ज्ञान को जीवन में आचरण करने के लिए संकल्पबद्ध  हुई । बालिकाओं को योग, प्राणायाम, ध्यान का प्रशिक्षण दिया गया । उन्हें व्यक्तित्व विकास के सूत्र दिए गए । सभी बालिकाओं से गंभीरता से यह ज्ञान प्राप्त किया । उन्हें आंनंद, सुख, शान्ति से जीवन जीने की कला सिखाई गई । 

इसके साथ ही आचार्यश्रीजी देवराज गल्र्स सीनियर सेकेण्डरी स्कूल में पधारे वहां पर बच्चों को जीवन का अमूल्य ज्ञान दिया । साथ ही कस्तूरी कुण्डल बसे मृग ढूंढे वन माहीं’ इसके आधार पर उन बच्चों में उनके भीतर बैठे हुए परमात्मा का, उनके भीतर रही हुई शान्ति और आनंद का ध्यान के माध्यम से अनुभव ज्ञान प्राप्त करवाया । काॅमर्स डिपार्टमेन्ट की करीब 300 बालिकाओं ने यह ज्ञान प्राप्त किया । इसका आयोजन ग्रोवर जी ने करवाया । प्रींसिपल वालियाजी ने आचार्यश्रीजी का स्वागत किया एवं इस अमूल्य ज्ञान को प्रदान करने के लिए कृतज्ञता ज्ञापित की एवं समस्त बालिकाओं को यह ज्ञान देने हेतु आचार्यश्रीजी से प्रार्थना की और उनकी प्रार्थना पर ध्यान देकर आचार्यश्रीजी ने पूरी स्कूल की बालिकाओं के लिए 27 से 29 अक्टूबर, 2005 तक एक विशाल आत्म: चेतना कोर्स करने की स्वीकृति प्रदान की जिसका प्रारंभ आज से प्रातः 9.30 से 10.30 बजे तक स्कूल में हो चुका है । 

इसके साथ ही टैगोर डे बोर्डिंग स्कूल में दो आत्म: चेतना कोर्स का आयोजन हुआ जिसमें सुश्री निशा जैन, नेहा जैन ने एक क्लाॅस का संचालन किया और श्रीमती विपुला जैन, रवीश जैन ने क्लाॅस करवाई । बच्चों ने महानता का ज्ञान सीखा और साथ में जीवन जीने के लिए प्राणायाम, योग का ज्ञान प्राप्त किया । इस प्रकार जालंधर के अनेक स्कूलों में मंगल मैत्री अभियान के अन्तर्गत कार्यक्रम चल रहे  हैं । आगे भी अनेक सकूल और काॅलेजों में कार्यक्रम संभावित हंै । 

 

जालंधर में देवेन्द्र जयंती एवं देवराज स्कूल में आत्म: चेतना कोर्स सम्पन्न

जालंधर: 30 अक्टूबर, 2005: आचार्य सम्राट् पूज्य श्री देवेन्द्र मुनि जी महाराज की जन्म जयंती का कार्यक्रम लक्ष्मी पैलेस, गाजी गुल्ला रोड पर मनाया गया । आचार्यश्रीजी के जन्म-दिवस के उपलक्ष्य में सामूहिक तेलों का आयोजन किया गया । श्रमण संघीय मंत्री श्री शिरीष मुनि जी महाराज ने आचार्य श्री देवेन्द्र मुनि जी महाराज के जीवन पर प्रकाश डालते हुए कहा कि आचार्यश्रीजी का जन्म उदयपुर में हुआ । बाल्यावस्था में उन्होंने दीक्षा ग्रहण     की । अपने गुरूदेव उपाध्याय श्री पुष्कर मुनि जी महाराज के दिशा निर्देशन में ज्ञान, ध्यान, साधना करते हुए एक सामान्य साधु से आचार्य पद तक पहुंचे । आपका जीवन स्वाध्याय    से परिपूर्ण था । आपने अपना अधिकांश समय लेखन, पठन और आत्म-चिन्तन में व्यतीत किया । आपने करीब 350 से अधिक पुस्तकें लिखकर जैन धर्म में साहित्य के क्षेत्र में अभूतपूर्व कार्य किया । आप मृदृभाषी और व्यवहार कुशल थे । जो भी व्यक्ति आपके सम्पर्क में आता वह जीवन भर के लिए आपका बन जाता । आपने अपने संयम जीवन को बड़े ही सहज, सुन्दर ढंग से जीया । आपके ही पद्चिन्हों पर समस्त संतवृंद आगे बढ़ रहे हैं । आचार्य श्री शिवमुनि जी महाराज और आपका बड़े ही आत्मीयतापूर्ण मिलन नासिक में हुआ, वह दृश्य आज भी आंखों के सामने साकार हो जाता है । चार दिनों के प्रवास में दोनों ने हृदय के स्तर पर अपने भावों को अभिव्यक्त किए और जब दोनों महापुरूषों का विहार हुआ तो दोनों की आंखों में अश्रु की धारा बह रही थी । यह दोनों के हृदय के स्तर पर मिलन का भाव था लेकिन संयोग की बात पुनः अहमदनगर मिलने वाले थे लेकिन मुम्बई में ही वे देवलोकगामी हो गए । उनकी आत्मा जहां पर भी विराजमान हो पूरे सकल संघ पर उनका आशीर्वाद बना रहे और हम सभी उनके आशीर्वाद से श्रमण संघ को पुनः सुसंगठित करते हुए आध्यात्मिकता के शिखर तक पहुंचाये यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी । 

देवराज सीनियर सैकेण्डरी कन्या विद्यालय में पूरे स्कूल की कन्याओं के लिए ‘त्रिदिवसीय आत्म: चेतना कोर्स’ का आयोजन हुआ जिसमें करीब 1200 बालिकाओं ने भाग लिया । यह कोर्स प्रतिदिन प्रातः 9.30 से 10.30 बजे तक चलता रहा । इस कोर्स का आयोजन श्री ग्रोवर सा0 की प्रेरणा से स्कूल के प्रींसिपल ने आचार्यश्रीजी को विनती की और आचार्यश्रीजी की आज्ञा से मंत्री श्री शिरीष मुनि जी महाराज, श्री निरंजन मुनि जी महाराज, श्री निशान्त मुनि जी महाराज ने यह कोर्स करवाया । कोर्स में सेवा के रूप में सुश्री निशा जैन, नेहा जैन, श्रीमती पूनम जैन, श्री राजेश जैन, श्री भगवानदास जैन उपस्थित रहे । कोर्स में स्कूल के सभी अध्यापकगण उपस्थित थे । सभी को महानता का ज्ञान देते हुए घर, स्कूल, शहर, देश और विश्व की जिम्मेदारी का अहसास कराया गया । उनके भीतर रहे हुए भगवान का साक्षात्कार करवाते हुए आहार की शुद्धि के बारे में ज्ञान दिया और हर कार्य रूचिपूर्वक करने की प्रेरणा दी । विद्या को ज्ञान के रूप में ग्रहण करने की कला सिखाई । सभी बालिकाओं को आनंद, शान्ति और सुख से जीने के लिए ध्यान, प्राणायाम सिखाए गए और श्वांस के माध्यम से अपने क्रोध को कैसे जीतना, याद-दास्त को कैसे बढ़ाना आदि साधना के रहस्य बताये गये । सभी बालिकाएं एवं अध्यापिकागण इस कोर्स को करके अति-प्रसन्न थे और पुनः पुनः हमारे स्कूल में आकर इस प्रकार का ज्ञान देने के लिए विनती की । प्रिंसिपल ने अपना अनुभव सुनाते हुए कहा कि संतों के दर्शन मात्र से ही हम उनकी तपस्या के वाईब्रेशन ग्रहण करते हैं और ध्यान के द्वारा अपने को इतने गहरे मौन का अनुभव कराया जिससे हमारे तनाव, सिरदर्द आदि दूर हो गए । अन्तिम दिवस शिवाचार्य चातुर्मास समिति के मार्गदर्शक श्री आर0सी0 जैन एवं श्री स्वतंत्र जैन ने आचार्यश्रीजी के फोटो एवं घड़ी से स्कूल के प्रिंसिपल को सम्मानित किया । 

 

जैन धर्म की गीता है उत्तराध्ययन सूत्र: मंत्री श्री शिरीष मुनि जी महाराज

जालंधर 31 अक्टूबर: श्रमण संघीय मंत्री श्री शिरीष मुनि जी महाराज ने आज के प्रवचन में फरमाया कि- उत्तराध्ययन सूत्र भगवान महावीर की अन्तिम वाणी है । इसके अन्तर्गत ज्ञान योग, ध्यान योग, आचरण शुद्धि और समस्त अध्यात्म का सार भरा हुआ है । मुनिश्री ने कहा कि- हरिकेसी अध्ययन में उग्र तपस्वी की तेजस्विता का चमत्कारी ढंग से वर्णन हुआ था । इस अध्ययन में काम भोगों के निदान से मुनि का पतन संसार भ्रमण का चित्रण किया गया है । साथ ही इच्छा काम रहित मुनि की मुक्ति का प्रतिपादन हुआ है । इस प्रकार इस अध्ययन में भोग और योग का द्वंद तथा उनका दुष्परिणाम एवं सुपरिणाम लक्षित होता है । योग और वियोग पर यह अध्ययन आधारित है । इस अध्ययन में चित्त और संभूत नामक दो भाईयों का पिछले पांच जन्मों का वर्णन है और अन्तिम भव में काम भोगो की तीव्र इच्छा की विवशता, काम भोग ही आत्मा के लिए सबसे बड़े बंधन है इनकी आसक्ति के कारण ही जीव दुर्गति में जाकर दुःख भोगता है । इसके विपरीत भोगेच्छाओं से उपरत रहने वाला व्यक्ति चाहे वह सांसारिक दृष्टि से अभावग्रस्त ही क्यों न हो सुखी रहता है और अंिकंचन श्रमण तो सर्वश्रेष्ठ आत्मिक सुख की उपलब्धि कर लेते हैं । उन्हें शाश्वत् अव्याबाद्य मुक्ति सुख प्राप्त हो जाता है । इस अध्ययन में इच्छाओं की दासता से दुःख, इच्छाओं के स्वामी बनने से सुख प्राप्ति का स्वर प्रभावशाली ढंग से प्रतिस्थापित हुआ है । 

अगले अध्ययन में भृगु पुरोहित, उसकी पत्नी यशा प्रतिबोध पाते हैं । रानी कमलावती से प्रेरणा पाकर राजा इषुकार श्रमण बनकर सर्वधर्म का आचरण करते हैं । राजा की प्रमुखता के कारण यह अध्ययन इषुकारी कहलाता है । प्रस्तुत अध्ययन वैराग्य परक है । वैदिक तथा अन्य तत्कालीन धार्मिक जगत में प्रचलित परम्पराओं को बड़े ही तार्किक ढंग से निरसन करके श्रमण धर्म की मान्यताओं की स्थापना की गई । इस रूप में यह अध्ययन तर्क प्रधान है । रानी कमलावती ने भी उस समय की प्रचलित राजकीय परम्परा की अपुत्री के धन का स्वामी राजा होता है वो बड़े ही तर्कपूर्ण ढंग से निन्द्य सिद्धकर अपने पति राजा इषुकार को भृगु पुरोहित का धन लेने से विरत करके संयम की ओर मोड़ा । इस अध्ययन के सभी पात्र एक-एक विचारधारा के प्रतिनिधित्व करते हैं । राजा इषुकार राजनीतिक विचारधारा का प्रतिनिधि है । रानी कमलावती भोग के कीचड़ में भी निर्लिप्त कमलीनी के समान है । भृगु पुराहित तत्कालीन ब्राह्मण तथा अन्य धार्मिक विचारधाराओं का प्रतिनिधि है तो उसकी पत्नी यशा काम भोगो का सुख लेना चाहती है । भृगु पुराहित के दोनों पुत्र श्रमण विचारधारा के प्रतिनिधि कर रहे हैं । और अंत में ये सभी श्रमण धर्म का पालन करके मुक्ति को प्राप्त करते हैं । दीपावली के दिवस पर भगवान महावीर इस वीतराग वाणी का उपदेश देते हुए निर्वाण को प्राप्त किए अतः दीपावली का पर्व निर्वाण दिवस के रूप में मनाया जाता है । 

आचार्यश्रीजी का मौन साधना के पश्चात् 2 नवम्बर, 2005 को प्रातः 8.00 बजे लक्ष्मी पैलेस, गाजी गुल्ला रोड में मंगलपाठ होगा जिसमें आप सभी सादर आमंत्रित है । 

  शिवाचार्यश्रीजी ने दिया दीपावली का संदेश

                        दीपावली पर आत्म पूजा करे: आचार्य शिवमुनि

जालंधर 1 नवम्बर: { दैनिक जागरण } श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने संदेश में कहा कि- भारतीय संस्कृति महान् संस्कृति है जहां पर हर माह में कोई न कोई पर्व त्यौहार मनाया जाता है । पर्व आध्यात्मिक और सांसारिक दो तरह के होते हैं । सांसारिक पर्व जैसे करवा चैथ, होली, गणेश चतुर्थी आदि और आध्यात्मिक पर्वो में सम्वत्सरी, पर्व पर्युषण, अक्षय तृतीया साथ ही प्रभु महावीर का निर्वाण दिवस जो आज हम मना रहे हैं यह आध्यात्मिक पर्व है । आज प्रभु को निर्वाण प्राप्ति हुई और प्रभु के प्रथम शिष्य इन्द्रभूति गौतम को केवलज्ञान प्राप्त हुआ । जैन धर्म में दीपावली का आध्यात्मिक दृष्टि से बहुत महŸव है । भगवान महावीर ने अपना निर्वाण समय नजदीक जानकर कार्तिक वदी 14 को तेले की तपस्या के साथ 9 लिच्छवी, 9 मल्लवी राजाओं एवं हजारों लोगों तथा देवी देवताओं को अपनी देशना से पूरित कर रहे थे । प्रभु की यह वाणी उत्तराध्ययन सूत्र में संकलित है ।

दीपावली प्रकाश का प्रतीक है । आज घर-घर में घी के दीये जलाये जाते हैं । एक दीया जलता है तो करोड़ों वर्षों का अंधकार दूर होता है । हम भी अपने भीतर ज्ञान का दीया जलायें जिससे हमारे भीतर का मोह, मिथ्यात्व, अज्ञान, अंधकार दूर हो । ऐसी भी मान्यता है कि आज भगवान् राम रावण पर विजय प्राप्त करके अयोध्या आए थे । अयोध्या आने पर उनकी खुशी में लोगों ने दीप जलाकर उनका स्वागत किया इसलिए इस पर्व का नाम दीपावली रखा गया । हम सभी इन दिनों में एकान्त में बैठकर जीवन को निहारे । प्रभु के धर्म-ध्यान को भीतर प्रकट करें । शुद्ध भाव में रमण करें । आज के दिवस पर बुद्धि के अधिष्ठाता का श्रीगणेश को भी पूजा जाता है । गणेश को सभी कार्यों में सर्वप्रथम याद किया जाता है । आज लक्ष्मी की पूजा तो सभी करेंगे ही साथ ही साथ आत्म पूजा भी करें । आत्म पूजा, आत्म चिन्तन, आत्म मंथन है । आज के दिन श्रावक पौषध उपवास की आराधना करते हुए जप, पाठ, ध्यान आदि करें । 

आज के दिवस पर स्वामी दयानंद सरस्वती ने भी प्रकाश फैलाया था । स्वामी रामतीर्थ ने आज के दिवस पर पानी में समाधि लगाकर इस दिन को सार्थक किया । उनका जन्म भी दीपावली का है । प्रभु महावीर के समवसरण में प्रथम दीक्षित इन्द्रभूति गौतम ने भी आज के ही दिवस पर केवलज्ञान को प्राप्त किया था । उन्होंने भगवान महावीर के प्रति जो रागभाव था उसको दूर करते हुए केवलज्ञान की स्थिति पाई । हम भी अपने भीतर का राग-भाव दूर करें, समता में आए और भीतर सत्य के दीपक जलाएं । दीपावली के इस पावन अवसर पर सबके लिए हार्दिक मंगल कामना । 

कल प्रातः 8.00 बजे आचार्य भगवंत सबके लिए मंगलमैत्री अभियान के अन्तर्गत प्राणी मात्र की मंगल कामना करते हुए तीन दिन की मौन साधना के पश्चात् मंगलपाठ प्रदान   करेंगे । आप सभी लाभ लेकर अपने जीवन को उज्ज्वल बनावें । 

 

विश्व शान्ति हेतु आचार्यश्रीजी का मंगलपाठ

जालंधर 2 नवम्बर: { राकेश } श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने मंगलमैत्री अभियान के अन्तर्गत त्रिदिवसीय मौन साधना के पश्चात् विश्व मंगल के लिए मंगलपाठ फरमाया जिसमें इन्होंने नव वर्ष के लिए सबके लिएम ंगल कामना की । सबके जीवन में सुख शान्ति की अभिवृद्धि हो इस हेतु मुक्त हृदय से आशीर्वाद प्रदान किया । विश्व के हर कोने में शान्ति का वातावरण निर्मित हो । सभी लोग आपस में मैत्री, प्रेम और सहयोग की भावना से जीवन जीयें इस संकल्प को लेकर सभी पर मंगलमैत्री की वर्षा की । संघ विकास के लिए मैत्री और प्रेम का संचार किया । 

आज प्रातःकाल करीब 8.00 बजे लक्ष्मी पैलेस, गाजी गुल्ला रोड जन-मानस से खचाखच भरा हुआ था । पहले उत्तराध्ययन सूत्र की मूल वाणी का वांचन हुआ । फिर मंगलपाठ और उसके पश्चात् दो तपस्वी बहिनों का स्वागत किया गया जिसमें श्रीमती कृष्णा जैन डेराबसी से यहां आई थी उन्होंने 31 उपवास की पूर्णाहुति की जिसका सत्कार श्रीमती कान्ता जैन, श्रीमती सुरेन्द्रा जैन, जैनीलाल जैन ने विभिन्न तपस्याओं के द्वारा किया । वहीं श्रीमती कान्ता जैन जो निरन्तर 21 वर्षों से तपस्या कर रही है उन्होंने पिछले 27 दिन से आयम्बिल उपवास करते हुए लगातार 10 उपवास किए उनका भी तप के द्वारा उनके तीन पुत्रों श्री किरण जैन, संजीव जैन आदि ने 11 उपवास, 9 उपवास और 9 उपवास लेकर स्वागत किया साथ ही शिवाचार्य चातुर्मास समिति की ओर से प्रधान महेन्द्रपाल जी जैन, उप प्रधान विजय कुमार जी जैन, स्वागताध्यक्ष राजेन्द्र कुमार जी जैन, श्री जोगेन्द्रपाल जैन आदि ने सभी तपस्वियों का स्वागत किया । आचार्यश्रीजी की ओर से सभी को स्वाध्याय हेतु आगम प्रदान किए गए । श्री आर0सी0 जैन द्वारा निरन्तर चातुर्मास के प्रारंभ से ही धर्म प्रभावना के विविध प्रयोग किए जा रहे हैं । आज उन्होंने नव वर्ष के अवसर पर लक्की ड्रा के अन्तर्गत एक सोने की रिंग निकाली एवं प्रतिदिन चार घड़ियां धर्म सभा में आने वाले वाले धर्मप्रेमी बन्धुओं को लक्की ड्रा के रूप में निकाली जा रही है । 

आगामी कार्यक्रम के अन्तर्गत दिनांक 5 से 12 नवम्बर, 2005 को आत्म: टीचर ट्रेनिंग कोर्स एवं 5 नवम्बर को प्रातः 9.00 से शाम 5.00 बजे तक पुराने साधकों हेतु एक विशेष शिविर का आयोजन किया गया है । सभी पुराने साधक सादर आमंत्रित है । 6 से 10 नवम्बर, 2005 तक आत्म: विकास कोर्स ‘बेसिक’ प्रारंभ हो रहा है जिसे प्रातः 6.30 से 8.30 बजे तक एक बेच एवं शाम 7.00 से 9.00 बजे तक दूसरा बेच शुरू हो रहा है । जिज्ञासु साधक निम्न नम्बर पर फोन करके अपना रजिस्ट्रेशन करवा सकते हैं । फोनः 9872294875, 0181:5099997

 

संसार में गहण करने योग्य केवल मोक्ष है: आचार्य शिवमुनि

जालंधर 3 नवम्बर: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने आत्मिक सुख पर प्रकाश डालते हुए कहा कि- सद्गुरू ही हमें आत्मिक सुख तक पहुंचा सकते हैं । सत्गुरू आपको जीव से शिव, आत्मा से परमात्मा, संसार से मोक्ष की ओर ले जाता है । आप सभी ने दीपावली के पावन पर्व पर प्रभु की आराधना  की । प्रभु का निर्वाण उत्सव एवं गौतम को केवलज्ञान की प्राप्ति एक ही दिन हुई । एक दिया बुझने को आता है और एक दीया जल जाता है । वह दीया जो सूरज और चन्द्रमा से भी बढ़कर है । सूरज के आगे बादल आ जाते हैं । चन्द्रमा के आगे राहू आ जाता है परन्तु ज्ञान के दीये के आगे कोई नहीं आ सकता । सब कुछ उस दीये में दिखाई देता है । अरिहंत प्रभु सब कुछ जानते हैं पर प्रतिक्रिया नहीं करते । किसी को वर और किसी को अभिशाप नहीं देते । इस संसार में अरिहंत ही सार है । अंधकार में भटक रहे प्राणियों के लिए वो ही आधार है । 

संसार में तीन बातें होती रहती है - जन्म, जरा और मरण । इन तीन बातों पर ही जीव संसार परिभ्रमण करता है । जन्म है तो मौत है । आधि है तो व्याधि है । गृहस्थ में जीव को कोई सुख नहीं है । सांसारिक सुख भले ही मिल सकता है परन्तु आत्मिक सुख की प्राप्ति संसार में रहकर मुश्किल है इसलिए मोक्ष ही उपादेय है । तीन बातें हैं हेय, ज्ञेय और  उपादेय । हेय छोड़ने योग्य । ज्ञेय जानने योग्य और उपादेय है ग्रहण करने योग्य । संसार में परिभ्रमण कर रहे व्यक्ति के लिए मोक्ष ही उपादेय है । अपने भीतर निवास करना मोक्ष है । मोक्ष ऐसा स्थान है जहां पर कोई तर्क-वितर्क नहीं है, वहां पर सुख शान्ति और आनंद की सरिता बहती है । जो हमें चाहिए वह मिलता है, आवश्यकता है चाव पैदा करने की । एक व्यक्ति भगवान बुद्ध के पास आया और उसने कहा कि आप 30 वर्ष से अपनी वाणी से आनंद, सत्य और शान्ति का मार्ग बता रहे हो । कितने व्यक्ति ऐसे हैं जिन्होंने आत्मसात् कर लिया है प्रभु नें उसे कहा कि तुम एक कार्य करो । एक कागज और पैन लेकर इस गांव में भ्रमण करो और पता लगाओ कितने लोग आनंद सुख शान्ति पाना चाहते हैं । वह गया हर घर, हर गली में घूमा परन्तु उसे कोई भी व्यक्ति ऐसा नजर नहीं आया जिसे आनंद या शान्ति   चाहिए । किसी ने धन की मांग की तो किसी ने बेटा, धन, पद, यश की मांग की । वह हैरान हो गया । अंत में उसने अपनी सारी बात भगवान के समक्ष रखी तब भगवान ने कहा जब तक कोई चाहता ही नहीं तब तक मैं उस वस्तु को कैसे दे दूं । 

हमारे हाथ में अंगारे हों और हम चाहें कि शीतलता भीतर आए तो कैसे आ सकती   है । बेटा, बेटी, धन मिलने के बाद क्या आपके भीतर शान्ति आई । हम सब सुख चाहते हैं । जब सुख चाहोगे तब दुःख भी चला आएगा क्योंकि सुख और दुःख एक ही सिक्के के दो पहलू है । मोक्ष का मार्ग और संसार का मार्ग बिल्कुल अलग है । संसार में मोह, काम और राग है । मोक्ष में केवल सुख, आनंद है । क्या हम उस सत्य को आनंद को प्राप्त करना चाहते हैं । सच्चे मन से चिन्तन करना उत्तर आपके भीतर से आएगा । सच में हम पाना चाहते हैं तो चिन्तन करें मेरी अभिलाषा है कि आप सत्य और आनंद को चाहोगे । 

आगामी कार्यक्रम के अन्तर्गत दिनांक 5 से 12 नवम्बर, 2005 को आत्म: टीचर ट्रेनिंग कोर्स एवं 5 नवम्बर को प्रातः 9.00 से शाम 5.00 बजे तक पुराने साधकों हेतु एक विशेष शिविर का आयोजन किया गया है । सभी पुराने साधक सादर आमंत्रित है । 6 से 10 नवम्बर, 2005 तक आत्म: विकास कोर्स ‘बेसिक’ प्रारंभ हो रहा है जिसे प्रातः 6.30 से 8.30 बजे तक एक बेच एवं शाम 7.00 से 9.00 बजे तक दूसरा बेच शुरू हो रहा है । जिज्ञासु साधक निम्न नम्बर पर फोन करके अपना रजिस्ट्रेशन करवा सकते हैं । फोनः 9872294875, 0181:5099997

 

दृष्टि बदलो सृष्टि बदल जाएगी: आचार्य शिवमुनि

जालंधर 4 नवम्बर: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने आत्मिक सुख पर प्रकाश डालते हुए कहा कि- अरिहंत प्रभु की वीतरागवाणी हमें अनंत शान्ति और मोक्ष की ओर ले जाती है । सुख, शान्ति, आनंद अलग-2 है । प्रभु महावीर के भीतर गहरी प्यास भी अनंत शान्ति को पाने की इसलिए उन्हें अनंत सुखों को छोड़ना पड़ा । राजकुमार के पास पूरे राज्य की सम्पत्ति थी फिर भी वे उस सम्पत्ति में ना रहकर आत्म सम्पत्ति पाने के लिए उद्धत हुए । जिसके भीतर चाह होंती है उसे वह प्राप्त कर लेता है । जिसको हम आज सुख मान रहे है वह सुख नहीं केवल सुखाभास है या दुःख की कमी है । वह इन्द्रियों का सुख है । हरेक की अपनी-2 समस्या है और अपना-2 समाधान है । जहां प्रश्न है वहीं उसका समाधान है । 

हम सत्य को क्यों नहीं चाहते यह एक बहुत अजीब प्रश्न है । सुख पाने के लिए हमने हर कार्य किया, शादी की, बच्चों को बड़ा किया, पढ़ाया, लिखाया क्या हमें सुख प्राप्त हो गया । शादी से और बच्चों के जनम से क्या हम सुखी हो गये । मोक्ष इसी क्षण हमें मिल सकता है, आवश्यकता है अपने चित्त को शान्त करने की । जब चित्त शान्त हो जाएगा तो मोक्ष भीतर ही है । जब भीतर समाधि आएगी तब मोक्ष की शुरूआत होगी । सुख, दुःख मोक्ष की ओर नहीं ले जा सकते यह केवल एक उत्तेजना है । सुख के पीछे दुःख खड़ा हुआ है । एक व्यक्ति उपवास से सुखी हो सकता है और एक व्यक्ति भोजन करके भी दुःखी है । सुख दुःख की तुम्हारी अपनी परिभाषा है । उससे बाहर निकलो । अगर आज भोजन नहीं मिला तो किसी को डांटने की आवश्यकता नहीं है, ऐसा समझो कि आज भगवान ने अवसर दे दिया उपवास करने का । सुख दुःख के घेरे में फंसने की आवश्यकता नहीं है । 

हम कहीं भी रहे हमारे भीतर की चेतना हमेशा जागृत हो । सर्दी में पंखा लगता है तो दुःख का अनुभव होता है और गर्मी में पंखा लगता है तो सुख का अनुभव होता है । सुख दुःख सापेक्ष है, आनंद शान्ति, सत्य और सुख सब अलग-2 है । आनंद और सुख में अन्तर है । सुख के पीछे दुःख खड़ा हुआ है । आनंद के पीछे दुःख नहीं है । मोक्ष केवल संतों के लिए ही नहीं श्रावकों के लिए भी है । साधारण व्यक्ति भी मोक्ष को प्राप्त कर सकता है । हर कार्य से मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है । आवश्यकता है उस कार्य में हमारी आसक्ति ना हो । दृष्टि बदलो, सृष्टि बदल जाएगी । सुख दुःख को छोड़कर हम समता में आएं । आनंद में जीवन व्यतीत करें । मोक्ष की ओर अग्रसर हों । 

आगामी कार्यक्रम के अन्तर्गत दिनांक 5 से 12 नवम्बर, 2005 को आत्म: टीचर ट्रेनिंग कोर्स एवं 5 नवम्बर को प्रातः 9.00 से शाम 5.00 बजे तक पुराने साधकों हेतु एक विशेष शिविर का आयोजन किया गया है । सभी पुराने साधक सादर आमंत्रित है । 6 से 10 नवम्बर, 2005 तक आत्म: विकास कोर्स ‘बेसिक’ प्रारंभ हो रहा है जिसे प्रातः 6.30 से 8.30 बजे तक एक बेच एवं शाम 7.00 से 9.00 बजे तक दूसरा बेच शुरू हो रहा है । जिज्ञासु साधक निम्न नम्बर पर फोन करके अपना रजिस्ट्रेशन करवा सकते हैं । फोनः 9872294875, 0181:5099997

 

निर्विचार स्थिति ही वर्तमान में मोक्ष है: आचार्य शिवमुनि

जालंधर 5 नवम्बर: {अमर उजाला} श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने सुख शान्ति आनंद का वास्तविक स्वरूप सबके सामने रखते हुए सत्यमय जीवन जीने की प्रेरणा दी और कहा कि हर व्यक्ति मोक्ष को प्राप्त कर सकता है । मोक्ष को प्राप्त करने के लिए अरिहंत प्रभु की भक्ति सरल साधन है । उन्होंने कहा कि सत्संग का माध्यम भिन्न-2 प्रकार से होता है । सत्संग यानि सत् का संग करना । जीवन में जो भी सत्य ग्रहण करने योग्य है, श्रेयस्कर है उसे ग्रहण कर लिया जाए । कथा, कहानी, संवाद, प्रश्नोत्तर सत्संग के अलग-2 रूप  हैं । सत्संग की धारा वर्षावास के प्रारंभ से अनवरत चल रही है । इस वर्षावास में क्या आपने पाया, क्या आपकी ऐसी मूलभूत समस्या है जिसका समाधान आज तक नहीं हो पाया है । उस प्रश्न को समक्ष रखना आवश्यक है क्योंकि मैं चाहता हूं हर व्यक्ति अपनी समस्या का समाधान प्राप्त करे । जहा ंसमस्या है वहां समाधान है।  चित्त का समाधान होना आवश्यक है । हमारे भीतर छोटे-2 दोष हैं उन्हें हम दूर करते हैं तो चित्त का समाधान हो जाता है । अगर हम उन्हें दूर नहीं करते तो हमारी गति बिगड़ जाती है । 

हर प्रश्न के द्वारा हम कुछ सीख सकते हैं । छोटा सा प्रश्न सारे जीवन को रूपान्तरित कर देता  है । सुख और दुःख संसार की स्थिति है । जिस प्रकार चाय पीने पर एक सुख प्राप्त होता है परन्तु उसके साथ दुःख लगा हुआ है । उस आनंद को हम वास्तविक आनंद के रूप में नहीं स्वीकार कर सकते । भारत की संस्कृति कहती है कि आनंद हमारा स्वभाव है, शान्ति हमारे भीतर हैं, ज्ञान हम स्वयं है, ये तीन बातें समझ में आ गई तो मोक्ष निश्चित है । ध्यान करते समय हमारे भीतर से आनंद आता है । आनंद, शान्ति, मोक्ष हमारे पास है पर हम उसे भूल गए हैं । जिस प्रकार मृग की नाभि में कस्तूरी है परन्तु वह कस्तूरी को ढूढ़ने के लिए अपना सारा जीवन लगा देता है उसी तरह आनंद सांसारिक वस्तुओं में नहीं भीतर में है । नानक, कबीर, रैदास सब आनंद में रहते थे । जब आनंद हमारा स्वभाव बन जाएगा तब स्वतः ही शान्ति मिलेगी । आनंद और शान्ति में उत्तेजना नहीं होती है । सुख और दुःख में उत्तेजना होती है । एक पक्ष यह भी कहता है कि जन्म और मृत्यु का बंधन छूटने पर मोक्ष होता है यह एक दृष्टि है परन्तु इसी क्षण मोक्ष का मतलब है निर्विचार अवस्था में आना । ध्यान करते समय जब निर्विचार स्थिति आती है तब हम मोक्ष में होते  हैं ।

आचार्य भगवंत ने कहा कि तुम सत्य पर चलते रहो, जीत तुम्हारी होगी । सुकरात, राजा हरिशचन्द्र महात्मा गांधी की जीत हुई । वे अकेले थे । जीवन में सत्य को देखो । उसका साथ दो तुम्हें बहुत बल मिलेगा । भीतर की संतुष्टि बहुत महत्वपूर्ण है । दुःख बीतने के बाद जिसे हम सुख मानते हैं वह सुख नहीं सुखाभास है । जितनी निन्दा होगी उतने ही तुम निखरते चले जाओगे । प्रशंसा की आकांक्षा छोड़ दो । एक व्यक्ति व्यापार करता है तो नुकसान और लाभ होता रहता है उसी तरह इस जीवन में सुख और दुःख आते रहेंगे परन्तु हमें इन दोनों से पार जाते हुए हर समय आनंद में रहना है । हर व्यक्ति कहीं न कहीं झूंठ बोला है । उस झूंठ को छुपाने के लिए उसे सौ झूंठ बोलने पड़ते हैं । जब झूंठ, क्रोध, राग आए तो अपने को उससे अलग कर लो । हर आदमी भीतर से ईमानदार और बाहर से बेईमान हो गया   है । वह अपने झूंठ को छुपाने के लिए सच्चाई का मुल्म्मा चढ़ा रहा है । मैंने रिश्वत दी, चोरी की, क्रोध किया, राग मेरे भीतर आया तो उसे स्वीकार कर लो । जैसे बच्चा सब कुछ स्वीकार करता है । 

आज गांधी को लोग क्यों मानते हैं क्योंकि उन्होंने हमेशा सत्य बोला, अहिंसा का मार्ग अपनाया और हर बात को स्वीकार किया । संसार को छोड़े बिना भी मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है । साधु साधना करता है तो हो सकता है उसे शीघ्र मोक्ष की प्राप्ति हो जाए पर श्रावक भी मोक्ष लक्ष्मी को प्राप्त कर सकता है । साधु का जीवन हीरे के समान है और श्रावक का जीवन सोने के समान है । हीरा पूरा ही खरीदा जाता है । सोना तो थोड़ा-थोड़ा भी खरीद सकते हैं । हम अरिहंत प्रभु से प्रार्थना करें। श्रावक के व्रतों को ग्रहण करें । सत्यमय जीवन जीयें , ध्यान करें । जिससे मोक्ष नजदीक आता चला जाएगा । 

आज से आत्म: टीचर टेªेनिंग कोर्स का प्रारंभ हुआ जिसमें औरंगाबाद, दिल्ली, चण्डीगढ़, जम्मू, पंचकूला, जालंधर स्थानों के भाई बहिन भाग ले रहे हैं ।6 से 10 नवम्बर, 2005 तक आत्म: विकास कोर्स ‘बेसिक’ प्रारंभ हो रहा है जिसे प्रातः 6.30 से 8.30 बजे तक एक बेच एवं शाम 7.00 से 9.00 बजे तक दूसरा बेच शुरू हो रहा है । जिज्ञासु साधक निम्न नम्बर पर फोन करके अपना रजिस्ट्रेशन करवा सकते हैं । फोनः 9872294875, 0181:5099997

 

श्रद्धा से जीवन की शुरूआत करो: आचार्य शिवमुनि

जालंधर 6 नवम्बर: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने गुरू दर्शन का लाभ बतलाते हुए गुरू ही जीवन का तारणहार होता है ऐसा फरमाया है ं। गुरू की महिमा और उसके तीन रूपों की चर्चा करते हुए कहा कि जो खोज करता है उसे वस्तु अवश्य प्राप्त होती है । जो सागर में उतरता है और उसकी गहराई में जाता है उसे मोती अवश्य मिलता है । यह खोज प्यास, आकांक्षा तुम्हारे होने का ढंग और तुम्हारे वीजन पर सब कुछ निर्भर करता है । जौहरी की आंख हीरे को परखती है । हीरे और पत्थर का फर्क सझती है । हम अपनी दृष्टि को देखे । एक भाई ने प्रश्न किया है कि गुरूदर्शन से प्राणियों को क्या लाभ होता है ? तीन शब्द है सत्संग, गुरू और दर्शन । 

गुरू के तीन रूप हैं गुरू, सत्गुरू और परम् गुरू । सबको गुरू नहीं कहा जा   सकता । जौहरी की आंख में हर चमकने वाली चीज हीरा नही होती उसी प्रकार गुरू की आंख भी शिष्य को ढूंढ़ती है और शिष्य की चाह गुरू तक पहुंचाती है । गुरू हीरे की भांति शाश्वत् है उसका मूल्य नहीं किया जा सकता । वह टूटता नहीं है, खण्डित नहीं होता । अपना जीवन श्रद्धा से शुरू करना । श्रद्धा प्राणों का प्राण है । जीवन में श्रद्धा नहीं है तो यह जीवन मन्दिर नहीं बन सकेगा । प्राण महाप्राण में नहीं मिल सकेंगे । गुरू वह है जो अंधकार को दूर कर दे । सूरज निकलता है सारे ब्रह्माण्ड का अंधकार दूर होता है इसी तरह गुरू के दर्शन से जीवन की आधि, व्याधि दूर हो जाती है । दर्शन के अनेकों अर्थ है । देखना, साक्षात्कार करना, श्रद्धा भी दर्शन का अर्थ है । प्रभु महावीर की दृष्टि में अगर हमें सचमुच दर्शन हो गया तो हमारी मुक्ति निश्चित है । सत्गुरू की और तुम्हारी आंख मिल जाए तो तुम इस धरती पर नहीं रहोगे, आकाश की अनंत ऊंचाईयों को प्राप्त कर लोगे । इस दौरान आचार्यश्रीजी ने दादू और रज्ज्ब की घटना सुनाते हुए कहा कि दादू की दो पंक्तियों से रज्ज्ब का जीवन सुधर गया । 

गुरू सर्जन करता है । एक जन्म मां से होता है और दूसरा जन्म गुरू से होता है । मां संसार में जन्म देने वाली है तो गुरू जीवन देने वाला है । अपने शिष्य के लिए गुरू सब कुछ करता है । गुरू की महिमा अपरम्पार है, वे हम पर अनंत उपकार करते हैं । गुरू आंखे देते हैं और अनंत का मार्ग दिखाता   है । गुरू कोई भी हो सकता है । वह बहुत बड़ा हो यह आवश्यक नहीं । राजा जनक ने आठ अंगों से टेढ़े मेढ़े कुरूप शरीर वाले अष्टावक्र को गुरू बनाया था । गुरू के शरीर को नहीं उसके अन्तर को   देखना । उसकी निर्मलता को देखाना । गुरू दीया का काम करता है । मोमबत्ती में मोम है, बत्ती है पर प्रकाश तभी हो सकता है जब दीयासलाई की रगड़ उस पर लग जाए । गुरू वह दीयासलाई है जो जीवन के प्रकाश को प्रकाशित करती है । गुरू भीतर की रोशनी जगाता है । गुरू निजि होता है । माता पिता और गुरू एक ही होता है । चाचा हजार हो सकते हैं । अरिहंत परम गुरू हैं उनके सिवाय इस जीवन में कुछ भी नहीं है । गुरू कभी किसी को नहीं बांधता, वह स्वतंत्रता देता है । सारा कुछ गुरू दर्शन से ही प्राप्त होता है । जब गुरू दर्शन को जाना तब अपनी बुद्धि को अलग रखना और झुक जाना गुरू चरणों   में । कबीर, रामकृष्ण पढ़े लिखे नहीं थे । 

एक दीया जलाओ हजारों दीये स्वतः ही जल जाएंगे । मक्का, मदीना, काबा, कैलाश, हरिद्वार जाने की जरूरत नहीं, सब कुछ भीतर में ही प्राप्त हो जाएगा । गुरू के ख्याल में इस तरह से अपने को मिला दो कि उनकी याद में यह जीवन लग जाए । कहा भी है- आया ही था ख्याल कि आंखे छलक पड़ी, आंसू उनकी याद में कितने करीब थे । इसी तरह सत्गुरू को याद करना । गुरू दर्शन को जब जाना तब खाली होकर जाना । सामायिक, प्रार्थना, प्रतिक्रमण करना, अपने जीवन को उज्ज्वल बनाना । 

आज आचार्यश्रीजी के दर्शनार्थ लुधियाना, गौहाटी, सूरत, बीकानेर, भटिण्डा, दिल्ली, पटियाला, जम्मू, औरंगाबाद, चण्डीगढ़, जण्डियाला गुरू, माउण्ट आबू आदि स्थानों से भाई बहिन उपस्थित हुए । सूरत से श्री संजय लोढ़ा ने अपनी भावनाएं अभिव्यक्त करते हुए शिवाचार्यश्रीजी के चरणों में अपना समर्पण व्यक्त किया । जण्डियाला गुरू से आए कोमल जैन ने क्षेत्र स्पर्शना की विनती की । 

 

समर्पण का मार्ग वीतरागता का मार्ग है: आचार्य शिवमुनि

जालंधर 7 नवम्बर: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने आर्त ध्यान और रौद्र ध्यान की परिभाषा करते हुए वीतरागता की ओर अग्रसर होने की बात  कही । उन्होंने कहा कि एक है संघर्ष का मार्ग और एक है समर्पण का मार्ग । समर्पण का मार्ग वीतरागता का है जो हमें मोक्ष की ओर ले जाता है । हम कौनसे मार्ग पर जाएं, कैसे आराधना करें यह हम पर निर्भर है । आज का प्रश्न है कि हमारा रौद्र ध्यान की किस स्थिति से कैसे छुटकारा होगा । श्रमण संस्कृति में ध्यान शब्द की महत्ता है । मुनि को ध्यान और मौन करना बतलाया है । भगवान ने कहा- मुनि वह है जो मौन रखता है । मौन तीन प्रकार का है । शरीर का मौन, वाणी का मौन और मन का मौन । हम वाणी के मौन को ही मौन समझ लेते हैं और उस मौन को करने के पश्चात् भी इशारे करना, लिखकर बातें करना यह मौन नहीं कहलाता । मौन को गहराई से लो । समाधि चाहते हो तो मौन धारण करो । भगवान् महावीर साढ़े बारह वर्ष की साधना में बहुत कम बोले । बोले तो सिर्फ इतना कि मैं भिक्षु हूं । जीवन में साधना को अपनाना है तो मौन का पालन कीजिए । श्रावक का उत्तरदायित्व है कि वह स्वयं मौन रहे और मुनि को भी मौन की ओर अग्रसर करें । जब आप सामायिक प्रार्थना, भोजन करते हो उस समय मौन   रहो । बहिनें भोजन बनाती है, परोसती है और खाती है उस समय मौन रहें । 

मौन वही कहलाता है जो एक स्थान पर शरीर को स्थिर कर मन को अपने भीतर लगाये और वाणी से मौन हो जाएं । मन का संकल्प विकल्प शान्त हो जाए यह मन का मौन है । एक मौन आप करो, दो मौन स्वतः ही हो जाएंगे । मन का मौन करो तो काया और वाणी का मौन स्वतः हो जाएगा । मौन का बहुत लाभ है । सामायिक के 32 दोषों से बचते हो तो तुम्हारा आर्य मौन हो जाएगा । मौन की साधना कर लो सब साधनाएं हो जाएगीं । मौन में आंखें बंद करो । आंखें बंद करने से ऊर्जा भीतर आती है । जब हम गहरे भावों में होते हैं तब आंखें बंद हो जाती हैं । काया को इतना साधो कि हम एक सामायिक, एक आसन में बैठकर कर सकें । साढ़े तीन घण्टे एक आसन में बैठने से आसन सिद्धि प्राप्त होती है । 

प्रभु महावीर ने चार प्रकार का ध्यान बतलाया- आर्त ध्यान, रौद्र ध्यान, धर्म ध्यान और शुक्ल   ध्यान । इनमें से आर्द और रौद्र को छोड़ना है । धर्म और श्ुाक्ल ध्यान को ग्रहण करना है । आंखें बंद करके बैठना भी ध्यान हैं । संसारी लोग आर्त और रौद्र ध्यान अधिक तरे हैं । जैसे हमारे विचार होंगे वैसे ही भाव, लेश्या और कर्म-बंधन होंगे । आत्मा भारी होगी । इसलिए अपने भावों को शुद्ध करो । आर्त ध्यान यानि अपनी वस्तु का अपने द्वारा वियोग होना । रौद्र ध्यान यानि अपनी वस्तु का दूसरे के द्वारा वियोग होना । रौद्र ध्यान में रोना, चिल्लाना, उग्र हो जाना आदि क्रियाएं होती है । रौद्र ध्यान में व्यक्ति रोता भी है, अगर आंसू किसी की याद में गिरे तो कर्म-ब्ंाधन का कारण बनते हैं और परमात्मा की याद में गिरे तो कर्म-निर्जरा का कारण बनते हैं । आकाश से गिरी बूंद मिट्टी में गिरे तो मिट्टी हो जाती है और केले पर गिरे तो कपूर का रूप धारण कर लेती है । वही बूंद स्वाति नक्षत्र में सीप में गिरे तो मोती का रूप धारण कर लेती है । आंसू गिरते हैं तो उनका बहुत महत्व है । रोना चाहिए पर अपने लिए नहीं परमात्मा के  लिए । साधु अगर रौद्र ध्यान करता है तो उसका साधुत्व खतरे में पड़ता है । 

रौद्र ध्यान से छुटकारा पाने के लिए हम अपने भीतर को देंखे । श्वांस को देखें । जब-जब रौद्र ध्यान आएं तब मौन धारण कर लेना । अपनी गलती को स्वीकार करना । आर्त और रौद्र ध्यान नहीं करना, इनसे बचने के लिए सत्संग करना और अपने भीतर उठ रहे विचारों का आदान प्रदान करना जिससे हम रौद्र ध्यान से छुटकारा पा सकते हैं । उत्तम और सरल विधि यही है कि हम अपने श्वांस को दखें और शान्त हो जाएं । अगर हम ऐसा करते हैं तो अनंत कर्मो ंका बंधन रूक जाता है । और अगर हम ऐसा नहीं करते तो कर्म बंधन चलता ही रहता है । हम आर्त ध्यान, रौद्र ध्यान को छोड़कर धर्म ध्यान में स्थित हो । प्रभु की भक्ति करें और उनके चरणों मे ंप्रार्थना करें । 

 

अगर तुम्हें कोई गाली दे तो तुम मुस्कुराओ: आचार्य शिवमुनि

जालंधर 8 नवम्बर: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने दुर्भावना से होने वाले कर्म बंधन पर अपनी भावना अभिव्यक्त करते हुए कहा कि हमें अपनी दुर्भावनाओं को दूर करते हुए अरिहंत प्रभु के चरणों में समर्पित करना चाहिए । अरिहंत की स्तुति करनी चाहिए क्योंकि  उनकी स्तुति जीवन में मंगल लाती है । अरिहंत से उत्तम कोई नहीं । हम सब चीजें शुद्ध चाहते हैं तो स्वयं को भी शुद्ध बना लो । अपनी श्वांस को भी शुद्ध कर लो । भगवान् बुद्ध की ध्यान साधना, विपश्यना श्वांस पर ही आधारित है । हमें तो श्वांस को लेना और छोड़ना नहीं आता और हम बड़ा बनना चाहते हैं । दुर्भावना को छोड़ने के लिए श्वांस एक उत्तम उपाय है । जब भी किसी के प्रति दुर्भावना आए तो अपने भीतर श्वांस को देखना शुरू करो । 

दुर्भावना का लक्षण है कि हमें उसके प्रति बदला लेने की भावना भीतर जागृत होगी । अगर तुम्हें कोई गाली दे तो तुम मुस्कुराओं, पत्थर दे तो तुम फूल दो । अगर हमारे भीतर किसी के प्रति दुर्भावना होगी तो कर्म बंधन होगा । दुर्भावना को दूर करने के अनेक तरीके हैं । जिसके प्रति दुर्भावना आए उसके लिए मंगल कामना करना । प्रभु महावीर की मंगलमैत्री बहुत उपयोगी है । प्रभु का सिद्धान्त अटल है और तुम पक्का विश्वास कर लेना कि कोई आपको दुःख या सुख नहीं देता यह सब हमारा ही कर्म संस्कार है । हमें अपनी जिम्मेदारी का अहसास करवाने के लिए दुःख और सुख आते हैं । जिम्मेदारी ले लो कार्य स्वतः ही हो जाएगा । प्रभु महावीर का शासन चल रहा है पर क्या प्रभु महावीर वर्तमान समय में यहां पर उपस्थित हैं, नहीं ना । उसी तरह हम जिम्मेदारी ले कार्य स्वतः हो जाएगा । अपने कर्म संस्कारों से हम सुख दुःख का अनुभव कर रहे हैं । अगर कोई व्यक्ति दुव्र्यवहार कर रहा है तो हमारे अपने ही कर्म संस्कार हैं । तुमने बीज बोए हैं उसके फल तुम्हें मिल रहे हैं । कहा भी है - दुर रहे दुर्भावना, द्वेष रहे सब दूर, निर्मल- निर्मल चित्त में प्यार भरे भरपूर । भीतर आने वाले दुर्भावना और द्वेष को दूर करो और अपने हृदय में चित्त की चेतना में मंगलमैत्री का संचार करो । प्रभु को धन्यवाद दो कि हे प्रभु तुम्हारी कृपा है जो कर्म मैंने बांधे थे उनकी निर्जरा हो रही है । वह दुःख दे रहा है । मेरा कर्म संस्कार है और मुझे समता दो । मैं कर्म निर्जरा की ओर आगे बढ सकूं । 

आज हमारे पास तो सब कुछ है । प्रभु महावीर ने जब संयम ग्रहण किया तो उनके पास कुछ भी नहीं था, वस्त्र भी नहीं थे, भोजन भी नहीं था, अनेकों कष्ट आए फिर भी उन्होंने सहजता से स्वीकार  किया । हमारे जीवन में तो उतने दुःख भी नहीं हैं जितने दुःख प्रभु के जीवन में थे फिर भी हम घबरा जाते हैं । पहला सुख है निरोगी काया । हमें जो मिला है हम उसका मूल्य समझें । भगवान ने आंख दी है देखने के लिए कान दिए हैं उनकी वाणी सुनने के लिए मुख दिया है भक्ति करने के लिए । हम भक्ति करें, मन को साधना में लगाएं । गुलाब का फूल पैदा करते हैं तो कांटे आएंगे । जहां सुख है वहां दुःख आएगा । आत्मा की शक्ति को मजबूत करो और प्रकट होने वाली दुर्भावना को स्वीकार करो । आत्मा की निन्दा आलोचना नहीं होती, आलोचना तो शरीर की होती है । 

 

राग और द्वेष कर्म बंधन के दो बीज हैं: आचार्य शिवमुनि

जालंधर 9 नवम्बर: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने कर्म संस्कार के ऊपर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि जो कुछ आज हमारे साथ हो रहा है वह हमारे पूर्व कृत कर्म संस्कार हैं, इन्हें भोगे बिना हमारा मानव गति से छुटकारा नहीं होगा । आज जो हम जीवन जी रहे हैं वह सब कुछ पूर्वकृत है । इस कर्म चक्र से मुक्त होने कें लिए हम क्या करें । हमारा जीवन अतीत और वर्तमान का जोड़ है । यहां जो भी कर्म हम करेंगे, जैसी स्थिति होगी वैसी ही हमारी गति होगी । भगवान महावीर का कर्म सिद्धान्त बड़ा मनोवैज्ञानिक है । इस संसार में मानव भटक रहा है । दुःख पीड़ा से गुजर रहा है इसका मूल कारण क्या है ? संसार का मूल है कर्म । कर्म का मूल है कषाय और यही संसार में भटकने का मूल कारण है । जब हम कषाय करते हैं तब हमारे कर्म बंधते चले जाते   हैं । कर्म पुद्गल है । आत्मा अमूर्त है । आत्मा पर कर्मों का मैल जम जाता है । लोहे को अग्नि में डालो तो उसके कण-कण में अग्नि समावेश हो जाती है और ऐसे लगता है वह आग का ही गोला हो । कर्म लोहे अग्नि की भांति हमसे जुड़ रहे हैं । कर्म आठ हैं और लेश्या 6 है । कुछ कर्म व्यक्ति गाढ़ रूप से बांधता है तो कुछ हल्के रूप से । मोह वासना और राग भाव में बांधे हुए कर्म हल्के भी हो सकते हैं और गाढ़ भी हो सकते हैं । गाढ़ कर्म वे होते हैं जिसके कारण हमारे भीतर बदले की भावना जागृत होती है । गाढ़ कर्मों को तो भोगना ही पड़ता  है । हल्के कर्म तप, जप, ध्यान और त्याग से निर्जरा की ओर अग्रसर होते हैं । कर्म एक क्रिया है । 6 दिशाओं से कर्म आते हैं । भगवती सूत्र में भगवान ने कहा कि कर्म पूर्व पश्चिम, उत्तर दक्षिण और नीचे छहों दिशाओं से आते हैं और व्यक्ति को आबद्ध करते हैं । जिस प्रकार एक हाॅल में चारों तरफ से वायु प्रवेश करती है उसी प्रकार कर्म से व्यक्ति जुड़ जाता है और बंधन का रूप धारण कर लेता है । ज्ञानावरणीय आदि आठ कर्म हैं । जब केवलज्ञान होता है तब व्यक्ति चार कर्मों को नष्ट करता है और शेष चार कर्म जब नष्ट होते हैं तब वह मुक्ति को प्राप्त करता है । सारे कर्मों से मुक्त होना आवश्यक है । जब हम सब कर्मों से मुक्त होते हैं तो शुद्ध स्फटिक मणि की तरह हम निर्मल हो जाते हैं । एरण्ड का बीज पककर जब बाहर आता है, उछल कर जमीन पर गिरता है उसी तरह मानव सब कर्मों का अंत करने के पश्चात् एक समय में मोक्ष में जाता है । कर्म टूटते हैं तब आत्मा हल्की होती है । हम कर्म के बंधन को तोड़ें । 

ज्ञानावरणीय कर्म में हमने किसी को ज्ञान का अन्तराय दिया । दर्शनावरणीय कर्म में सम्यक्त्व पर आवरण आ गया या श्रद्धा के विरूद्ध आचरण किया । वेदनीय कर्म में सुख और दुःख, साता और असाता दोनो ंसमाविष्ट होते हैं । किसी को दुःख मत देना । भूखे को भोजन खिलाना, परोपकार करना । अगर आपको सुख मिल रहा है तब भी कर्म बंधन हो रहे हैं और दुःख मिल रहा है तब भी कर्म-बधन हो रहे    हैं । मोहनीय कर्म कर्मों का राजा है । यह सबसे बलवान है । ममता, आसक्ति, राग भाव इसके लक्षण हैं ।  जब-2 हमारे भीतर राग भाव आए तो उससे स्वयं को अलग करना । कर्म-बंधन के राग औरा द्वेष दो बीज हैं । अरिहंत प्रभु को कोई कर्म नहीं लगता क्योंकि उन्होंने स्वयं को राग और द्वेष से अलग किया है, उनके लिए गौतम और गौशालक एक ही हैं । कर्म से मोह पैदा होता है । मोह से राग और राग से संसार । हम जर, जोरू, जमीन में आसक्ति न रखते हुए उससे ऊपर उठें । जो आसक्ति रखता है वह निश्चित ही कर्म-बंधन करता है । राजा जनक, राजा भरत इनके पास करोड़ों की सम्पत्ति थी । अनेकों महल थे । सब कुछ होते हुए भी ये संसार में निर्लिप्त जीवन जी रहे थे । शीश महल में केवलज्ञान होने पर देवताओं ने भी अचिŸा फूलों की वर्षा की थी । आयु कर्म में आपने देखा होगा कोई बच्चा गर्भ में ही काल के ग्रास में समा जाता है या कोई बचपन, जवानी में ही चला जाता है यह सब हमारे आयुष्य कर्म के कारण हैं । नाम कर्म में यह जो हमें नाम और रूप मिला वह समाविष्ट होता है । गौत्र कर्म में उच्च और नीच दो प्रकार के होते हैं । व्यक्ति का खानदान इस कर्म के उपर ही निर्भर करता है और अन्तराय कर्म जिस प्रकार व्यक्ति बहुत मेहनत करता है परन्तु प्राप्त कुछ नहीं कर पाता यह अन्तराय कर्म का फल है । आज ऐसे अनेकों व्यक्ति हैं जिनके पास आमोद प्रमोद के अनेकों साधन है परन्तु वे उसका उपयोग नहीं कर पा रहे हैं । यह अन्तराय कर्म का ही फल हैं ।

यह संसार एक खेती है इसमें जो जैसे बीज बोता है उसे वैसा फल प्राप्त होता है, इसलिए शुभ कर्म करो । इस जन्म में आप जैसा कर्म करोगे उसका फल इस जन्म में भी मिल सकता है और अगले जन्म में भी । जन्म-मरण के चक्रव्यूह से मुक्त होने के लिए सारे दिन का लेखा जोखा रात को सोने से पूर्व प्रभु चरणों में समर्पित करो । प्रभु से प्रार्थना करो । आलोचना करो । दान, शील, तप भावना की आराधना करो इससे हम अपने कर्मो से अलग हो सकते हैं । 

 

नमन करने से जीवन आनंदित होता है: आचार्य शिवमुनि

जालंधर 14 नवम्बर: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने फरमाया कि- भारत की संस्कृति नमन की संस्कृति है । नमन में सब कुछ समाया हुआ है । जैसे दूध में मक्खन, फूल में इत्र, दीपक में ज्योति, आत्मा में परमात्मा । भारत ने हमेशा नमन किया है तीर्थंकरों को, राम कृष्ण महावीर जैसे महापुरूषों को और पैगम्बरों को जिन्होंने धन को महत्व नहीं दिया । हीरे जवाहरात को महत्व नहीं दिया जिन्होंने अपने शरीर का उपयोग करके भगवत्ता को प्राप्त कर लिया उन्हें हमारी भारत की संस्कृति नमन करती है । भारत ने किसी सिकन्दर, मुसोलिनी जैसे राजाओं को याद नहीं किया जिन्होंने यश के लिए किले बनाये । उनकी कब्र पर आज कोई जाने वाला नहीं लेकिन इन महापुरूषों को आराध्य के रूप में स्थान दिया और उन्हें अपने मन मन्दिर में बसाया । गांधी का जीवन ही ले लीजिए वह एक धर्म का चमतकार रूप में है । अहिंसा, सत्य का जीवन और अपरिग्रह-युक्त जीवन होने से आज विश्व का हर नेता गांधीजी की समाधि को जाकर नमन करता है । जिसको आप त्याग कहते हैं उससे आप महान् और समृद्ध बन जाते हैं । जैसे किसान एक बीज का त्याग करता है, अनेकों बीज मिलते हैं, उन अनेकों बीज को पुनः वपन करने पर लाखों बीज बनते हैं और लाखों से करोड़ों, अरबो बीज बन जाते हैं यह त्याग का फल है । अविनाश जी ग्रोवर जिन्होंने यहां पर धर्म प्रभावना का बहुत सुन्दर कार्य किया, स्कूलों, काॅलेजों में ध्यान के शिविर लगवाकर हजारों बच्चों को व्यक्तित्व विकास, शाकाहार और आनंद और शान्तिपूर्वक जीवन जीने की कला सिखाने में सहयोग दिया । जो आपके पास शक्ति है उसे सृजन में लगाओ । वह शक्ति महाशक्ति बन जाएगी । इकट्ठे करने में आनंद नहीं है, बांटने में आनंद   है । मधुमक्खी शहद को इकट्ठा करती है लेकिन वह खा भी नहीं सकती है वही उसकी मौत का कारण बनता है इसी प्रकार मनुष्य भविष्य की रक्षा के लिए एकत्रित करता है, सुरक्षा की आकांक्षा का जो भाव, जीवेषणा है वही उसके दुःख का कारण है । 

हर श्वांस का उपयेाग हम वीतरागता में करें । अपने पास जो मिला है उसे बांटने में करें । एक साधक द्वारा प्रश्न पूछा किया कि चरणों को हम नमन क्यों करते हैं, चरणों में ऐसा क्या है ? आचार्यश्री ने कहा कि चरण सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण हैं इसलिए हम उन्हें चरण कमल कहते हैं । वे ही सबसे ज्यादा पुरूषार्थ करते हैं । जो भी माता, पिता गुरूजन हैं उनके प्रति कृतज्ञता का भाव चरणों में नमन करके किया जाता है और जो सेवा करता है उसी की पूजा होती है । नमन करने से जीवन आनंदित होता है । झुकने से समर्पण का भाव आता है, आपकी अकड़ झुकती है । प्रार्थना के भावों में डूबने से समर्पण आता है । अपने व्यक्तित्व को चार भागों में बांटा जाता है । कर्म जगत, विचार जगत, भाव जगत और साक्षी या ज्ञातादृष्टा भाव का जगत । जब हम नमन करते हैं तो हम साक्षी और ज्ञाता द्रष्टा भाव तक पहुंच जाते   हैं । धर्म ध्यान और शुक्ल ध्यान की ओर बढ़ जाते हैं । धर्म वही है जो भेदभाव नहीं सिखाता । एक-एक श्वांस अनमोल है, हीरे मोती के समान है । धर्म कहीं पर भी किया जा सकता है । चार माह तक हम सभी ने जो धर्म का स्मरण किया । जो आपको सार लगा है उसे अपने जीवन में संजोकर रखना, उसका संवर्धन करना, यही हमारी हार्दिक मंगल भावना है । 

कल चातुर्मास समापन दिवस पर कृतज्ञता दिवस के रूप में जिन-जिन ने भी चातुर्मास में सेवाएं प्रकट की है उनका सत्कार किया जाएगा । 

 

सुखी बनने के लिए दृष्टि को विशाल बनाओ

आचार्य सम्राट् श्री शिवमुनि जी महाराज

अरिहंत प्रभु को नमन । हमारे भीतर एक भाव एक संकल्प प्रभु के प्रति उत्पन्न हो । हम कैसे उन तक पहुंच पाये इस जीव को जीव का बोध कैसे हो ? अनादिकाल से यह जीव, यह आत्मा संसार सागर में भ्रमण कर रही है । यह भ्रमण कैसे छूटे । द्रव्य निद्रा तो टूटती है पर भाव निद्रा कैसे टूटे । भाव निद्रा यानि स्वयं को जानना, पहचानना, कषाय की मन्दता को ग्रहण करना । भीतर के प्रकाश में स्थापित होना ही भावनिदं्रा है । जीवन में हम सुखी कैसे रहे औरों को हंसते देखो । किसी के भीतर शांति संतोष है तो तुम भी शान्त हो जाओ और यह प्रश्न अपने समक्ष रखो कि ज्ञान की रोशनी मेरे भीतर क्यों नहीं आती । क्यों नहीं मुझे सच्चा ज्ञान, आनंद मिलता उसकी खोज करो । स्वयं हंसों और आत्मिक सुख को विस्तृत करो । छोटे से शरीर को बड़ा परिवार बनाओ जैसे गांधी कृष्ण महावीर ने कहा था ‘वसुधेव कुटुम्बकम’ जितना परिवार छोटा उतने अधिक दुःख है । जितना परिवार बड़ा है उतना अधिक सुख है । 

शांति, समृद्धि संतुष्टि हमारे भीतर हैै प्रभु महावीर ने तो विश्व को ही परिवार बनाया था । उन्होंने कहा था एक घर छोड़ दिया तो हजारों घर मेरे हो गये । मनुष्य जाति को एक बताया । ना कोई पाकिस्तानी, ना भारतीय । आज सब एक है । हर मानव के अन्दर वही खून है । उसके भीतर भी वही करूणा और दया का भाव है । चाहे वह हिन्दू, मुस्लमान या फिर सिक्ख । आज सुखी वो है जिन्होंने अपना सब कुछ लुटाया । अपनी दृष्टि को विशाल किया । तुम भी अपने पास जो कुछ है उसे लुटा   देना । अपनी दृष्टि को विशाल बना लेना सुखी बन जाओगे । एक दीया जलाओ भीतर का दीया जलाओ, चिन्ता मुक्त रहो । धर्म के बल पर चलोगे तो धर्म तुम्हारी रक्षा करेगा । प्रभु महावीर ने भी कहा दृष्टि बदलो संसार बदल जाएगा । हम अपने जीवन को बदले । आज प्रभु हमारे भीतर नहीं है पर उनकी वाणी हमें पत-पल जागरूक करती है, विवेक सिखाती है । हम विवेक में आये । जागरूकता को अपनायें हमारा जीवन सफल होगा । 

 

नमन में सब कुछ समाया हुआ है

आचार्य सम्राट् श्री शिवमुनि जी महाराज

भारत की संस्कृति नमन की संस्कृति है । भारत ने हमेशा नमन किया है बुद्ध पुरूषों, तीर्थंकरों, पैगम्बरों को । नमन में सब कुछ समाया हुआ है जैसे दूध में मक्खन, फूल में इत्र और दीये में ज्योति । जिन्होंने शरीर को महत्व नहीं दिया । धन इकट्ठा नहीं किया । अपने किले नहीं बनाये, हीरे जवाहरातों पर अधिकार नहीं लगाया आज उन्हें नमन किया जाता है । आज जो पद, प्रतिष्ठा, मान, सम्मान चाहते हैं उनको नमन नहीं किया जाता । अभी भी प्रभु महावीर, बुद्ध, राम, कृष्ण, नानक, ईसा मसीह को नमन किया जाता है क्योंकि वे जगत के आराध्य बनें । गांधी को भी नमन किया जाता है क्योंकि उनका जीवन अहिंसा और सत्य से परिपूर्ण था । धर्म से चमत्कृत था । जिसको आप त्याग देते हो वह वस्तु आपको अपनी ओर आकर्षित करती है । किसान एक बीज बोता है उससे करोड़ा अरबो बीज बन जाते हैं और उसी के आधार पर मानव अपना पेट भरता है । किसान बहुत पुण्य का कार्य करता है । फल लदने पर भी वृक्ष को झुकना ही पड़ता है । जो शक्ति बांटने में लग जाएगी वह शक्ति महान् बन जाएगी । जो आनंद बांटने में है वह इकट्ठा करने में नहीं है । मधुमक्खी सारा जीवन शहद इकट्ठा करने में लगा देती है परन्तु कुछ भी नहीं प्राप्त कर सकती । एक फूल खिलकर सबको सब कुछ प्रदान कर देता है । अपनी महक, सुगंध और ताजगी भी प्रदान करता है । 

वृद्धावस्था की चिन्ता मत करना । वृद्धावस्था आएगी यह निश्चित हैै और उस समय में हर व्यक्ति अपनी सुरक्षा चाहता है । सुरक्षा आकांक्षा का भाव है । हम अनेकों बार जन्में हैं और अनेकों बार बुढ़ापा आया है । जो श्वांस वर्तमान में आ रही है उसे प्रभु भक्ति में लगा दो । अपने पास जो कुछ है उसे बांटो, स्वयं को विस्तीर्ण करो । नमन में ले आओ तो जीवन से अमृत बहने लग जाएगा । 

हम सिर क्यों झुकाते हैं क्योंकि इससे हमारा अहंकार समाप्त होता है । जब भीतर अमृत आ गया, नमन का भाव आ गया तो आनंद स्वतः ही उत्पन्न हो जाएगा और सिर स्वतः ही चरण कमलों में समर्पित हो जाएगा । चरण को कमल की उपमा क्यों दी ? क्योंकि वह सबसे ज्यादा पुरूषार्थ करता है कहीं पर भी जाना हो तो ये दोनों पांव ही हमारे काम आते हैं । हर शुभ कार्य की शुरूआत चरण से होती है । अगर एक पांव ही नहीं उठा तो कार्य सफल नहीं हो सकता । आज माता पिता को नमन करो । उनके अनंत उपकार हैं । उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करो । जो उनकी सेवा करता है उसकी पूजा स्वयं ही हो जाती है । राम ने माता पिता की आज्ञा को माना, श्रवण कुमार ने मां बाप की अथाह सेवा की तो आज वे स्वतः ही स्मरणीय हो गये । अरिहंत प्रभु के अनंत उपकार हैं । उन्होंने ज्ञान, ध्यान दिया, धर्म दिया । जब हम भगवान को नमन करें तो भीतर से झुक जाएं, स्वयं के पास जो कुछ है सब कुछ अर्पित कर दें । अपने हृदय को खाली कर दें । बेटा अगर ख्याति प्राप्त करता है तो पिता को बहुत खुशी होती है और उस समय में बेटा पिता के चरणों में झुक जाता है तो बहुत कुछ प्राप्त कर लेता है । झुकने से हमारा अकड़ापन कम होता है । समर्पण की भावना भीतर जागृत होती है । 

समर्पण झुकने का ही एक अंग है । प्रार्थना करते-2 जब हम उसमें डूब जाते हैं तो स्वतः ही नमन, समर्पण हो जाता है । प्रभु महावीर ने नमन को अत्यधिक महत्व दिया । हर कार्य करते समय आज्ञा लेने से पूर्व प्रत्येक साधु नमन, वंदन करता है ऐसा उल्लेख शास्त्रों में आता है । राजा जनक को भी ज्ञान प्राप्त करने के लिए अष्टावक्र के समक्ष झुकना पडा था यह एक ऐतिहासिक घटना है । हम नमन को जाने, समझे, नमन से भारतीय संस्कृति में स्थित हो जाए यही हार्दिक मंगल कामना । 

 

हर श्वांस में अरिहंत प्रभु के शरण को स्वीकारें

आचार्य सम्राट् श्री शिवमुनि जी महाराज

16 नवम्बर, 2005: जालंधर: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- अरिहंत प्रभु को नमन, उनके अनंत ज्ञान को नमन । उन्होंने ब्रह्माण में ज्ञान की ज्योति दी, ज्ञान की धारा दी । ज्ञान, दर्शन, आचरण की त्रिवेणी बहायी । भरत क्षेत्र में अरिहंत प्रभु ने चारों तीर्थों की स्थापना की और सबको धर्म के मार्ग पर आगे बढ़ाया । अगर पूर्ण में से पूर्ण निकाला जाए तो क्या बचेगा पूर्ण ही बचेगा । जब व्यक्ति आता है तो चित्त प्रसन्न होता है और जब जाता है तो दुःखी होता है । यह शरीर और मन का स्तर है । भावों में ऐसा नहीं होता हम आत्म भावों में आएं । हर श्वांस में अरिहंत प्रभु के शरण को स्वीकारें । चाहे कोई कार्य करो अरिहंत का शरणा ग्रहण करो । संसार के सारे बंधन झूंठे हैं । समुद्र मे ंसब कुछ है अमृत है और विष भी है । हम अमृत को ग्रहण करना चाहते हैं विष को नहीं । स्वर्ग में कल्पवृक्ष है हम उसकी कामना करते हैं परन्तु धर्म पथ पर चलने की भावना नहीं रखते । प्रभु की कृपा से हमें जीवन का हर क्षण मिला उसे हम पूर्ण रूप से ग्रहण करें । 

आज वर्षावास का विहार है । स्थान बदल जाएगा । आप और हम तो वहीं है । चार मास में सभी कार्य मंगल और शुभ हुए आप सबका सहयोग स्मरणीय रहे । यह विदाई दिवस नहीं कृतज्ञता दिवस है । उप प्रवर्तिनी महासाध्वी श्री सावित्री जी म0, महासाध्वी श्री उमेश जी म0 ‘शिमला’, महासाध्वी श्री सुलक्षणा जी म0, महासाध्वी श्री संतोष जी म0 सभी ने वर्षावास में खूब सहयोग प्रदान किया । कभी किसी का मन दुखाया हो तो अन्तःकरण से क्षमायाचना करता हूं । साध्वियां शासन की श्रंृगार है साथ ही श्रावक श्राविकावृंद ने भी खूब लाभ लिया । युवा कान्फ्रेन्स, तरूणी मण्डल, श्राविका मण्डल, बहु मण्डल, शिवाचार्य संगीत मण्डल आदि सभी ने बहुत साथ दिया सबका धन्यवाद । 

आज संक्रांति का दिवस है । संक्रांति हमें संक्रमण की ओर ले जाती है । धर्म के कार्य में दान, शल, तप भावना में संक्रमण करना यानि आगे बढ़ाना । आज 16 नवम्बर ह, कृतिका नक्षत्र है, मगशील की संक्रांति है । गरीबों का भला करना, मूक प्राणियों की सेवा करना । अंत में दो बातें कहना चाहूंगा-

रूत बीत चुकी है बरखा की, अब पीत के मारे सहते हैं ।

रोते हैं रोने वालों के, आंखों में सावन बहता है ।।

एक आह निशानी जीने की, रहती थी मगर अब वो भी नहीं

              क्यों तिनके सा तन रहता है । 

 

 

दिल तोड़ के जाने वाले सुन, दो ओर भी रिश्ते बाकी हैं

एक सांस में डोरी अटकी है, एक प्रेम का बंधन रहता है । 

जिनशासन की एक परम्परा है जब चार मास पूर्ण होते हैं तो साधु एक स्थान से दूसरे स्थान पर विहार करता है परन्तु विहार करने से सबकुछ समाप्त नहीं हो जाएगा । श्वासोंश्वांस चलती रहेगी और आप सबका स्मरण होता रहेगा । आप सब खूब धर्म में आगे बढ़ें यही हार्दिक मंगल कामना ।

 

डी0ए0वी0 काॅलेज के प्रिंसिपल

श्री एम0एल0 ऐरी के आचार्यश्रीजी के प्रति विचार

एक आनंद का अहसास पहली बार हुआ । मैं भूल ही गया कि मैं किसी काॅलेज का प्रिंसिपल हूं । इस कालेज में अध्यन करना एक बहुत बड़ी बात है । हम जिस समय कोई कार्य करते हैं उस समय उस कार्य का हमें अहसास नहीं होता । कार्य पूर्ण हो जाने पर उसका अहसास हमें होता है । उत्तरी भारत की यह ज्ञान गंगा है । बहुत से ऐसे लोग हैं जो डी0ए0वी0 काॅलेज में पढ़कर मुख्य न्यायाधीश, डाॅक्टर, इंजिनियर, आर्किटेक्ट आदि उच्च पदाधियों को प्राप्त हुए हैं और यहां के ही लोग आप जैसे स्वामी बने हैं । आपके बारे में कुछ कहना सूर्य को दीपक दिखाना है । यहां की धरती आपको प्रणाम करती है । अपने आपको जानने के लिए और आपकी याद सदा-सदा के लिए डी0ए0वी0 कालेज में बनी रहे इसलिए मैं यहां पर ‘शिवाचार्य मेडीटेशन’ के रूप में एक यादगार स्थापित करने जा रहा हूं । आप की पवित्रता और सरलता से वह भवन कामयाबी की ओर अग्रसर होगा । जहां हम इस काॅलेज के प्रिंसिपल है वहीं एक गर्व की बात है कि आपने इस काॅलेज में अध्ययन किया है । आपने अध्ययन के पश्चात् पूरा भारत भ्रमण किया और उसका सार आप जन-जन को दे रहे हैं जो एक बेमिशाल है । एक अशान्त को शान्ति देना बहुत बड़ी बात है । शान्ति इसलिए नहीं आती कि हम रसना और वासना में पड़ें हुए हैं । आहार अच्छा है, विचार अच्छे हैं । हररोज हम प्रभु स्मरण करते हैं परन्तु आज तक हमने अन्दर की ज्योति नहीं जगाई । आज आचार्यश्रीजी के चरणों में बैठकर ऐसा लगा जैसे सब कुछ प्राप्त हो गया है । आपने जो हमें उपदेश दिया वह बिल्कुल सत्य है । हम अपने अन्दर झांके, अपने मन का मंथन करें । सारी जिन्दगी श्वासों पर चल रही है । हम श्वांस को ठीक कर लें तो सारी जिन्दगी ठीक हो जाएगी । आपका आना मेरी जिन्दगी में एक बहुत बड़ा परिवर्तन है । मेरी ही नहीं काॅलेज के हर छात्र के लिए एक सुन्दर अवसर है । आपके आने से यह स्थान तीर्थ स्थान बन गया है । आज आपने जो पांच मिनिट का ध्यान सबको करवाया उससे ऐसा महसूस हो रहा है कि मैं चार्ज हो गया हूं । शान्ति और आनंद का अनुभव मेरे भीतर हुआ । आज तक कहते ही थे कि शान्ति क्या होती है ? परन्तु आज उसका अनुभव भी हुआ है । आपने पांच मिनिट में ही मुझे दुनियां से अलग कर दिया यह मेरे जीवन के लिए बहुत बड़ी बात है । ध्यान साधना से बहुत अच्छा अनुभव आया । आज मैं उस परम् पिता परमात्मा से प्रार्थना करता हूं कि आपका जीवन स्वस्थता से गुजरे । आप हर व्यक्ति को इस साधना के मार्ग से जोड़े । हर व्यक्ति उस परम आनंद और शांति को प्राप्त करे, यही हार्दिक मंगल भावना । 

डी0ए0वी0 काॅलेज में षिवाचार्य मेडीटेषन सेन्टर की स्थापना

21 नवम्बर, 2005: जालंधर: विष्व मानव मंगल मैत्री अभियान के अन्तर्गत डी0ए0वी0 काॅलेज में षिवाचार्यश्रीजी ने सम्बोधन दिया । स्मरण रहे 1959 में षिवाचार्यजी जब गृहस्थावस्था में थे तो उन्होंने इसी काॅलेज से थ्ण्।ण्ब्ण् छव्छ डमकपबंस किया था । पुरानी स्मृतियों को स्मरण पटल पर उद्धरित करते हुए उन्होंने कहा कि- आज का ष्षुभ दिवस मेरे लिए मंगलकारी है । 45 वर्ष पष्चात् डी0ए0वी0 काॅलेज में आने का निमंत्रण ंिप्रंसीपल श्री एम0एल0 ऐरी जी ने दिया । मैं अपने आपको सौभाग्यषाली मानता हूं । इस संस्था में अध्ययन करना एक गौरव की बात है । जब मैं यहां अध्ययनरत था उस समय यह काॅलेज प्रींसिपल सूरजभान जी के कुषल नेतृत्व में प्रगति कर रहा था । यहां पर मैं होस्टल में भी रहा । जिस संस्थान में व्यक्ति षिक्षा प्राप्त करता है वह संस्थान उसका अपना बन जाता हैं उस समय में डी0ए0वी0 काॅलेज में पढ़ना यह एक इच्छी थी । प्यारे षिक्षार्थियों तुम्हारा बहुत सौभाग्य है जो तुम्हें ऐसा अनुषासित षिक्षा संस्थान मिला । 

आज हम चर्चा करेंगे अपने जीवन के संबंध में, ध्यान येाग के संबंध में । बहुत बड़े विचारक जयकृष्ण मूर्ति ने हमारे जीवन को ताष के पत्तों के खेल की उपमा दी है । जो ताष खेलते हैं उन्हें नहीं पता कि उनके साथी कैसे होंगे । कौनसे पत्ते मिलेंगे । ताष के पत्ते नाकाम होते हुए भी कुषल खिलाड़ी बाजी जीत लेता है । ताष के खेल की तरह हमारा जीवन है यहां आने से पूर्व हमें नहीं पता था कि हमें कैसा ष्षरीर मिलेगा, परिवार मिलेगा, साथी मिलेंगे या धर्म मिलेगा पर व्यक्ति कुषल हो तो उस जीवन का फायदा उठाता है । मुझे आज भी याद है इस काॅलेज में डाॅ0 राजेन्द्र प्रसाद, जाकिर हुसैन, महात्मा गांधी जैसी महान् हस्तियां आईं और उन्होंने यहां उद्बोधन दिया । मेरे जीवन पर उनके उद्बोधन की छाप अभी भी है, ये भूमि तपोभूमि है । 

          उम्रे दराज मांगकर के लाए थे चार दिन । 

दो आरजु में कट गए दो इंतजार में ।

हम अपने जीवन को व्यर्थ ना गवाएं । आरजु और इंतजार में अनमोल ष्वासों को व्यर्थ ना जाने दें । तुम कैसे जीवन जीना चाहते हो यह तुम पर निर्भर करता है । जो मिल गया उसके साथ आनंद से जीओगे तो जीवन आनंदित हो जाएगा । अगर दुःखी हो गए तो जीवन दुःख से भर जाएगा । षिक्षा वह है जो हमें आनंद से भर दे । आज की षिक्षा पंगु हो गई  है । आज की षिक्षा रोटी, कपड़ा, मकान के लिए है । मैं चाहता हूं आप आनंद से भर   जाएं । तुम जब यहां से जाओ तो भीतर आनंद, प्रेम हो और प्रष्न है कि भीतर आनंद, प्रेम कैसे  आए । प्रकृति ने हमें हृदय दिया, बुद्धि दी हम उसका उपयोग कैसे करें । अन्दर घृणा मत पैदा करो । अपने माता, पिता और गुरू के समक्ष सत्य वचन कहें । कोई भी बड़ी से बड़ी बात हो तो अपने घरवालों से छुपाओ मत । 

जीवन में सात्विक भोजन ग्रहण करो । भोजन ष्षुद्ध, प्रेमपूर्वक कृतज्ञता और नमस्कार के भाव से करें । अन्न ब्रह्म है । भोजन से पूर्व ध्यान करें । हमारे ऋषि मुनि सात्विक भोजन ग्रहण करते थे । फास्ट फूड को छोड़ दो ऐसा भोजन ना करो जिससे क्रोध, ईष्र्या, द्वेष ना आए । सात्विक भोजन ष्षरीर, मन, बुद्धि को सात्विकता प्रदान करता है । ध्यान के लिए भी सात्विक भोजन आवष्यक है । ध्यान आपके भीतर को नवीनता प्रदान करता है । ध्यान से राईट ब्रेन का विकास होता है । भीतर से जब चित्त व्यथित हो जाए तब ध्यान करो अपने भीतर आनंद, षान्ति, प्रेम, ध्यान से स्वतः घटित होता है ।  अंत में आचार्यश्रीजी ने सभी को ध्यान करवाया । 

इस अवसर पर आचार्यश्रीजी का स्वागत करते हुए प्रींसिपल श्री एम0एल0 ऐरी ने अपने भाव व्यक्त करते हुए कहा कि- आज का दिन बहुत ष्षुभ दिन है । आज साक्षात् रूप में आचार्य डाॅ0 षिवमुनि जी महाराज यहां पर विराजमान हैं । इस 88 साल पुरानी संस्था में आपने थ्ण्।ण्ब्ण् छव्छ डमकपबंस सन् 1959-60 में किया । यह हमारे लिए गौरव की बात है । समाज कल्याण के लिए आपने बहुत बड़ा कार्य किया है । आज आपके आने से यह धरती पवित्र हो गई है । मेरा सर आपके चरणों में झुकता है । मैं आपको प्रणाम करता हूं । इस संस्था को चलाने वाले पीर पैगम्बर फक्कड़ फकीर हैं । मुझे आषा है कि बहुत कम समय में आप हमें बहुत कुछ बना जाएंगे । ध्यान योग जिसके पास आ गया उसके पास सबसे ज्यादा षक्ति   है । मेरी आपसे प्रार्थना है कि आप यहां ध्यान योग सेन्टर खोलें जिससे हर विद्यार्थी आप द्वारा प्रदत्त साधना से लाभान्वित हो सके । वैसे ही मेरी एक भावना है आपके नाम से लाईब्रेरी में एक सेक्षन हो जहां पर जैन ग्रन्थ एवं आप द्वारा लिखित साहित्य हो जिसे पढ़कर हर षिक्षार्थी लाभान्वित हो सके । आपका एक-एक वचन अनमोल रत्न है जिसे हम स्वीकार करेंगे । 

प्रींसिपल साहब के कथनानुसार आचार्यश्रीजी ने ध्यान योग सेन्टर खोलने की अनुमति देते हुए स्थानीय जैन श्रावकों को ध्यान साधना की प्रेरणा प्रदान की । प्रींसिपल साहब ने ध्यान योग सेन्टर का नामकरण ‘षिवाचार्य मेडीटेषन सेन्टर’ किया । 

 इस अवसर पर हिन्दी विभाग के प्रोफेसर उपाध्यायजी ने षिवाचार्यश्री का स्वागत किया । श्री षुभम् मुनि जी महाराज एवं महासाध्वी श्री संचिता जी महाराज ने अपनी भावनाएं भजन द्वारा प्रस्तुत की । कार्यक्रम में मिनिस्टर श्री राकेष पाण्डे ने भी षिवाचार्यश्रीजी का आषीर्वाद लिया । कार्यक्रम के पष्चात् इंष्योरेंस सेमिनार पर षिवाचार्यश्रीजी ने आषीर्वाद प्रदान करते हुए सेमिनार के लिए मंगल कामना प्रदान की । सेमिनार में भी प्रींसिपल एम0एल0 ऐरी ने षिवाचार्यश्री का अभिनन्दन किया । 

 

प्रभु की अहिंसा से पूर्व प्रेम को अवश्य समझें

आचार्य सम्राट् श्री शिवमुनि जी महाराज

19 नवम्बर, 2005: जालंधर: श्रमण संघीयचतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- अरिहंत प्रभु को नमन, उनके अनंत ज्ञान को नमन । शासनपति प्रभु महावीर हमें जीवन जीने की कला सिखाते हैं । धर्म और दर्शन का अनुभव देते हैं । ज्ञानी कौन है ? सुखी कौन है ? ज्ञानी वही है जो किसी को किंचित मात्र भी दुःख ना दे यह ज्ञानी का लक्षण  है । हम अपने आपसे पूछे जो भी हम कार्य करते हैं उससे किसी को दुःख पहुंचता है क्या ? अगर दुःख पहुंचता है तो हम ऐसी क्रिया ना करे । हम क्या करें जिससे हम ज्ञानी बन सके । हम पहाड़, पौधे, पत्थर किसी की भी हिंसा ना करे । प्राणभूत जीव सत्व को अपने समान समझे । हम प्रभु जैसे बन जायें । प्रभु किसी की हिंसा नहीं करते । हर एक के प्रति सद्भावना रखें । जहां दो व्यक्ति होते हैं वहां टकराव अवश्य होता है परन्तु टकराव से बचने की कोशिश करें । प्रभु के शासन में शेर और बकरी एक ही घाट पर पानी पिया करते थे । सभी तीर्यंच मानव, देव अपना वैर भाव भूलकर प्रभु की वाणी को श्रवण करने की लिए समवसरण में उपस्थित होते थे । कितना प्रेम था उस समय में, उस प्रेम को ही भी अपने भीतर उतारे । प्रेम बाजार में नहीं बिकता ना उसकी खेती होती है और ना वह खरीदा जाता है । प्रेम तो हृदय में रहता है । 

जब हमें कोई विरोधी नजर ना आए हर पल सकारात्मक विचार भीतर रहे, करूणा, दया का भाव भीतर रहे तो समझना हम प्रेम में है । जिस प्रकार माता के मन में अपने पुत्र के प्रति वात्सल्य की भावना होती है । उसके भीतर अपेन पुत्र के प्रति प्रेम होता है उसी तरह हम सभी प्राणियों के प्रति अपनेपन की भावना रखें । जिस प्रकार हम स्वयं का अच्छा चाहते हैं उसी तरह हम सबका अच्छा चाहें । सब कुछ देने के लिए तैयार हो जाएगा । तुम जब अपने बेटे से प्रेम करते हो तो उसे सब कुछ दे देते हो । प्रेम वह है जिसमें देना ही देना   है । प्रेम के लिए अहंकार गलाना पड़ता है । उसे तराजू से तोला नहीं जा सकता । प्रभु की अहिंसा को समझने से पूर्व प्रेम को अवश्य समझ लेना । प्रेम की कुछ सीढ़ियां है जिस प्रकार हमें सर्वप्रथम मां से प्रेम होता है फिर पत्नी पर और फिर बच्चे पर । मां से बच्चे पर प्रेम नीचे तक चला जाता है । मां अपने बच्चे के साथ अंग संग हो जाती है । बच्चा प्रेम लेकर ही पैदा होता है । जिस प्रकार बच्चा बड़ा होता जाता है उस समय हम बच्चे को प्रेम नहीं घृणा, राजनीति आदि सिखाते हैं क्योंकि हम स्वयं भी उसमें ही जीते हैं । हमें अपने बच्चे को सत्मार्ग पर लगाना चाहिए । प्रेम में स्वयं जीना चाहिए औरों को भी जीने की प्रेरणा देनी चाहिए । 

 

जीवन की क्षण भंगुरता को पहचानो: जैनाचार्य पूज्य श्री षिवमुनि जी महाराज

22 नवम्बर, 2005: जालंधर: जैन धर्म दिवाकर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री षिवमुनि जी महाराज ने महावीर भवन, कपूरथला रोड में जीवन की क्षण भंगुरता ंपर अपने विचार प्रकट करते हुए कहा कि यह मानव जीवन बहती हुई नदी की भांति है । हमारी ष्वांस प्रतिपल प्रतिक्षण व्यतित हो रही हैं ऐसे समय में हम जीवन को कैसे जीएं ? प्रभु महावीर ने एक सहारा दिया है उन्होंने कहा कि जिस प्रकार हमारी आयु व्यतीत हो रही है उसी प्रकार ष्वासें भी बह रही हैं । हम उस ष्ष्वांस रूपी डोर को स्मरण रूप धागे के साथ जोड़ दें तो जीवन सुमधुर होगा । यह मार्ग बड़ा सहज और सुन्दर है । आप बैठे हैं ष्वांस आ रही है जा रही है उस पर ध्यान दो और साथ में प्रभु नाम का, सिद्ध प्रभु का स्मरण करो । ष्वांस को देखते हुए अपने को देखो अपने मन को ष्वांस पर जोड़ दो । हम इतने बड़े हो गए कि हमें ष्वांस लेना और छोड़ना भी नहीं आता ये जीवन यूं ही मत गंवा देना । 

हमारा जीवन सुख दुःख के झुले में झुलता है । हमेषा एक सी स्थिति नहीं रहती । सुख के बाद दुःख, दिन के बाद रात हो जाएगी ही । हम सुख दुःख को स्वीकार         करें । षाष्वत सुख को प्राप्त करना है तो षरण स्वीकार करो । नानक की वाणी कहती है- सुख चाहते हो तो षरण ले लो । षरण किसी का भी हो सकता है- अरिहंत, सिद्ध, ऊँ, राम की षरण ग्रहण करो और कुछ नहीं तो अपनी षरण ग्रहण करेा ं किसी के सहारे की आवष्यकता नहीं है । तुम ही सागर और किनारे हो । 

यह जीवन मोह माया में उलझा हुआ है । मोह माया से दूर होकर हम स्वयं के साथ सम्पर्क स्थापित करें । सोचो, विचारो जो अच्छा लगता है उसे ग्रहण करो । एक घण्टा सुबह और ष्षाम अपने लिए निकालो । जीवन सुमधुर बन जाएगा । एक व्यक्ति प्रातःकाल निद्रा त्यागता है, ध्यान प्रणायाम करता है, नाम स्मरण करता है । संतोषी जीवन जीता है । दान षील तप भावना की आराधना करता है तो उसका जीवन धन्य है । हम अपने जीवन की क्षण भंगुरता को समझते हुए धर्ममय जीवन जीएं । 

 

प्रेम में श्रद्धा आ जाए तो वह वीतरागता बन जाती है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

27 नवम्बर, 2005: जालंधर: जैन धर्म दिवाकर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री षिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- अरिहंत प्रभु को नमन । अनंत करूणा को नमन । नमन इसलिए कि आपके भीतर की वीतरागता भी मेरे भीतर आए । मैं भी संसार सागर से पार होने का लक्ष्य रख सकूं । पढ़ना लिखना अच्छा है पर जरूरी नहीं कि इससे मुक्ति मिले ही । एक अनपढ़ कुछ ना करता हुआ भी मुक्ति को प्राप्त हो जाता है । महात्मा कबीरजी ने कहा है- पोथी पढ़ पढ़ जग मुआ, पंडित भया न कोय । 

ढ़ाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय ।।

जग में विद्वान, पंडित ज्ञानी वो ही है जो प्रेम के ढ़ाई अक्षर जानता, समझता है । प्रभु की बन्दगी से उनकी भक्ति से प्रेम स्वतः ही भीतर हो जाता है । प्रेम किया नहीं जाता वह हो जाता है । खलित जिब्रान ने कहा है- मैं जब प्रेम की बड़ी-2 परिभाषा करता था पर जब अनुभव हुआ तो उसके आगे सब परिभाषाएं फीकी रही । केवल ढ़ाई अक्षर से मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है । आवश्यकता है प्रभु से प्रेम करने की । उनकी भक्ति करने की । संसार के समस्त प्राणियों से प्रेमभाव रखो प्रभु ने यही संदेश सभी जीवों के लिए दिया था और वह संदेश अर्थपूर्ण तब होगा जब भीतर का भाव जगेगा । प्रेम आधार-रूप बनेगा । प्रेम में श्रद्धा पैदा ना हो तो वह मोह, राग है और प्रेम में श्रद्धा पैदा हो गई तो वह वीतरागता है । श्रद्धा को भी प्रभु महावीर ने परम् दुर्लभ बताया । प्रभु महावीर ने कहा है- जहां प्रेम, श्रद्धा, भक्ति होती है वहां शक्ति स्वतः ही आ जाती है । निस्वार्थ भाव से जुड़ना ही प्रेम है । मां की ममता एक बेटे के प्रति प्रेम है पर मोह रूप में है । ममता को समता से बदलो तो वह मोह प्रेम बन जाएगा । सुजाता ने अत्यन्त प्रेमभाव से बुद्ध को खीर खिलाई थी तो उन्हें बोधि प्राप्त हो   गई । कितने शुद्ध भाव थे सुजाता के । विशुद्ध प्रेम के भाव उसके भीतर थे । हम हर घटना को देखें । कहां मेरा स्वार्थ जुड़ रहा है और कहां निस्वार्थ भाव आ रहा है । एक क्षण की समता भी हजारों कर्मों को क्षय कर देती है । हम कहीं न कहीं राग भाव से जुड़े रहते हैं । हम इससे उपर उठें । प्रेम को शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता वह अखण्ड है । वह कभी टूटता नहीं । दो व्यक्तियों को जोड़ता है प्रेम । प्रेम में दो गुण हैं कामना रहित और गुण रहित । ैमस िसमेे ूवता पे स्व्अम प्रभु के गुणों से प्रेम करो । उनके गुण अपने भीतर उतारो । किसी की कामना से प्रेम ना करो । हो सके तो वीतरागता से प्रेम करो । वहां न कामना है ना गुण है । केवल शांति ही शांति है । 

आज रजनीश जी के घर आना हुआ । इन्होंने वर्षावास में बहुत श्रद्धा भक्ति दिखाई है, इन्होंने साधना शिविरों में भाग लेकर अपने भीतर जीवन जीने की कला को उतारा है । इनके माताजी संतोष जी और राजकुमार जी जगाधरी से आए इन्होंने भी साधना में बहुत रूचि रखी है एतदर्थ हार्दिक साधुवाद । 

 

शिवाचार्यश्रीजी से बच्चों ने सत्संस्कार प्राप्त किए

28 नवम्बर, 2005: जालंधर: रवीन्द्रा डे बोर्डिंग स्कूल जैन धर्म दिवाकर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री षिवमुनि जी महाराज ने अपनी मंगलमयवाणी में फरमाया कि- प्यारे बच्चों ! तुम्हारा जीवन बहुत सहल और सरल है । तुम ईश्वर के बहुत नजदीक हो । स्कूल की शिक्षा तो आप प्राप्त कर ही रहे हो इसके साथ हर परिस्थिति, आनंद में कैसे रहे इसे आज हम  समझेंगें । आपका जीवन खिले हुए फूल की तरह होना चाहिए । आपका जीवन और सुन्दर कैसे बने । जीवन को सुन्दर बनाने के लिए बाहरी आभूषणों की आवश्यकता नहीं । भीतर की शुद्धता और परित्रता की आवश्यकता है । हमारे ऋषियों ने कहा कि हमारा शरीर भोजन से बनता है- भोजन तीन प्रकार के हैं- सात्विक, राजसिक और तामसिक । हम सात्विक आहार अपनाएं । जीवन के भीतर अहिंसा और सत्य को अपनाएं । महात्मा गांधी ने सत्य के बल पर राष्ट्र को आजाद करवाया । उन्होंने अपने पिता से सब कुछ सत्य कह दिया था । उन्होंने अपने जीवन में मांस भी खाया, चोरी भी की, अनैतिक कार्य भी किए परन्तु वे सब अपने पिता के समक्ष रखकर आगे से न करने का संकल्प लिया । हम भी आज अपने दुर्गुणों को छोड़ें और सद्गुण अपनायें । आज तक जो किया उसे भूल जाओ । आज से नये जीवन की शुरूआत करो । ज्ञानी बनो । ज्ञानी वही है जो मन, वचन, काया से किसी को दुःख नहीं देता, जो मांसाहार नहीं करता । जो स्वयं आनंद में रहता है और ओरों को आनंद में रहने की कला सिखाता है । 

आनंद में रहने के लिए प्रतिदिन प्रार्थना और ध्यान का प्रयोग बपनाएं । उससे हमारा मन शुद्ध और पवित्र होता है । हमारा राईट ब्रेन डवलप होता है । इस अवसर पर 250 बच्चों ने शपथ ग्रहण करते हुए मांसाहार का त्याग, सप्त कुव्यसन का त्याग, प्रतिदिन प्रार्थना और ध्यान का नियम ग्रहण किया । यहां के प्रिंसिपल ने आचार्यश्रीजी का स्वागत करते हुए कहा कि मैं आज ईश्वर का धन्यवाद करता हूं कि उन्होंने आपके समक्ष उपस्ति किया । आपने अपने जीवन में बहुत तपस्या की है । आज जो बातें आपने बच्चों को बताई वो बहुत सुन्दर थी, हमें इन बातों पर अमल करने की कोशिश करेंगे । आप सबका तहेदिल सु शुक्रिया करती हूं । 

 

सत्गुरू हमें आकर्षण से दूर ले जाता है

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

30 नवम्बर, 2005: जालंधर: जैन धर्म दिवाकर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री षिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि- इस मानव जीवन में सबसे अधिक श्रेष्ठ मूल्यवान वस्तु है सतगुरू का संग । सत्संग वह है जिससे सत्य की प्राप्ति होती है । कोई आपके सामने विकल्प दे एक तरफ संसार का सारा धन, पद, प्रतिष्ठा और दूसरी ओर सत्गुरू तो आप क्या ग्रहण करना चाहोगे । सत्गुरू कोई धन, पद, प्रतिष्ठा नहीं देते । सम्मान भी नहीं देते । वे तो जीवन जीने की सामग्री देते हैं । सत्गुरू आपके सारे आकर्षण छीनता है । अगर आप सत्गुरू चुनोगे तो भीतर श्रद्धा और सत्य होगा । आप सबको पता है कि अन्तिम समय अपने साथ कुछ भी नहीं जाना पर इस जन्म में किया हुआ धर्म और सत्कार्य अवश्य साथ जाएंगे । सत्गुरू तुम्हें उन सत्कार्यों की ओर प्रेरित करते हुए परम पद से जोड़ता है । मीरां का नाम आपने सुना होगा । वह कृष्ण भक्त थी । राजघराने में पली थी, उसने संत रैदास को गुरू बनाया था । मीरा ने कहा- रैदास जैसे गुरू मिले जिन्होंने ज्ञान की गुटकी दी है । ज्ञान की गुटकी प्राप्त करने के बाद मीरा अत्यन्त खुश हुई थी । रैदास जूते गांठते थे । जाति से चमार थे । कहने का तात्पर्य यह है कि संत कोई सम्प्रदाय या जाति का नहीं होता, वह तो सबका होता है । जो तुम्हें भा जाए वह सत्गुरू है । सत्गुरू तुम्हें धर्म और सत्य के साथ जोड़कर आगे बढ़ जाता है, उसके जीवन में ऋजुता, प्रांजलता होती है । अगर आपके भीतर क्रोध, मोह, राग है तो उसे दूर करो, आत्मधन साथ जाएगा । बाहर का धन तो यही रह जाएगा । अपनी चेतना के प्रति जागरूक हो जाओ । भीतर की समृद्धि को प्राप्त कर   लो । आत्मिक शुद्धता के साथ परमात्मा प्राप्ति की ओर आगे बढ़ो । सत्य का चुनाव करो । भीड़ के साथ मन अवश्य भागेगा परन्तु तुमने भीड़ के साथ नहीं भागना है । कबीरजी ने कहा है- 

 

कबीरा संगत साधु की, जो गंधी के वास ।

जो कुछ गंधी दे नहीं, तो भी वास सुवास ।। 

साधु की संगत कैसी है जिस तरह फूलों की संगत होती है फूलों के पास जाते ही सुवास वह प्रदान करता है । वह अर्थ को ग्रहण करता है । कहीं आपने सत्संग किया हो तो उसे एकान्त में फिर से सोचो और उस सत्संग के प्रति गहराई में उतरते चले जाओ । सत्संग से अपने जीवन को निर्मल कर लो । अन्तर की चेतना का ध्यान करो, यही जीवन का सार  है । अरिहंत प्रभु से प्रार्थना करो कि जीवन के समस्त आकर्षण दूर हो जाएं । 

1 दिसम्बर, 2005 टैगोर डे बोर्डिंग स्कूल, जालंधर: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री षिवमुनि जी महाराज ने अपनी अमृतमयवाणी का पान कराते हुए कहा कि- मानव का संकल्प उसे अपनी राह तक ले जाता है । श्रद्धा चाहे तो संसार में ले जाती है चाहे तो भगवान तक ले जाती है । मोक्ष भी श्रद्धा से प्राप्त हो सकता है । हम आपस में भाई भाई की तरह रहे और एक संकल्प करे जिस तरह राम ने बुराई पर अच्छाई की जीत का संकल्प किया था उस तरह हम भी एक सुन्दर संकल्प ग्रहण करें । स्वयं को प्राप्त करने का संकल्प करे । राम लक्षण की तरह भाई-2 का प्यार बनाकर रखे । मानव जाति एक है, सारा परिवार एक है । कहा भी है - धरती तो हम बांट लेंगे पर नील गगन का क्या होगा ? आज मानव धरती को बांटने में लगा हुआ है पर उसे पता नहीं कि उस पर जो छत बनाकर सहारा दे रहा है वह नील गगन सबका एक ही है । सूर्य, चन्द्र सबके एक ही है, वहीं से रोशनी और शीतलता हमें प्राप्त होती है । संसार के सभी धर्मों ने इस बात को स्वीकार किया है कि हम आपस में मिल जुलकर रहे । नानक ने कहा कि सतकार्य करो । प्रभु का नाम स्मरण करेा और जो कुछ आजीविका प्राप्त होती है उसे बांटकर खाओ । 

ऊँ एक ध्वनि है जिसे सिक्ख, हिन्दु, मुस्लिम, जैन, ईसाई आदि विश्व के सभी धर्मो ने स्वीकार किया है । हम ऊँकार का स्मरण करें । आज हम सम्प्रदायवाद पर लड़ते हैं पर हमें पता नहीं कि सबकी भावनाएं एक है । सबका खून लाल है । सब सुख चाहते हैं । अगर आपने किसी को दुःख दिया है तो आपको दुःख मिलता है इसलिए आपको सुखी होना है तो दूसरों को भी सुख दो । इस अवसर पर आचार्यश्रीजी ने बच्चों को आहार, शरीर एवं मन तीनों की विस्तृत जानकारी देते हुए सदाचार का जीवन व्यतीत करने की शिक्षा प्रदान की । 

 

जीवन एक अन्तर सृजन है: आचार्य सम्राट् श्री षिवमुनि जी महाराज

3 दिसम्बर, 2005 जालंधर न्यू जवाहर नगर: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री षिवमुनि जी महाराज ने अपनी अमृतमयवाणी का पान कराते हुए कहा कि- अरिहंत प्रभु की वीतरागता, षुद्ध दर्षन, ज्ञान करूणा मैत्री को नमन । प्रभु महावीर का पवित्र धर्म संघ श्रमण संघ में अनेकानेक धर्म ध्यान के अनुष्ठान हुए हैं । यह अनुष्ठान का क्षेत्र है । षौर्य प्रदर्षन का क्षेत्र नहीं । हम ध्यान साधना की पवित्रता को भीतर उतारते हुए अपने आपको साध लें । यदि सच में हम प्रभु महावीर के श्रावक हैं तो  साधना के अनुष्ठान से गुजरें । प्रभु ने हमें दर्षन दिया । दर्षन यानि देखना । भीतर से और बाहर से । बाहर से सारी सृष्टि नजर आ रही है । भीतर अपनी आत्मा को देखना । आंखें हैं तो परमात्मा प्रतिपल प्रतिक्षण तुम्हारे भीतर है । उसे ढूढने की आवष्यकता नही ं। प्रभु को ज्ञान से देखो । 

जीवन एक अन्तर सृजन है । इस जीवन में प्रतिपल कुछ न कुछ निर्माण हो रहा है ं इस जीवन को हम कहां तक ले जाते हैं यह हम पर निर्भर करता है अवसर आने पर उसे खो देते हैं । प्रभु महावीर का ज्ञान दर्षन तुम्हारे भीतर है तो महावीर भी तुम्हारे भीतर हैं । जब हमें कोई गाली देता है तो हमारा ध्यान गाली देने पर अटक जाता है । हम अपने को तो छोड़ देते हैं दूसरे पर अटक जाते हैं । गाली गलत है, असत्य है तो फिर महत्व देने की बात ही नहीं । किसी ने निन्दा की तो आप उससे प्रभावित ना हांे, उसकी उपेक्षा कर दो वह स्वतः ही कमजोर पड़ जाएगा । प्रभु की मैत्री भीतर लाओ । जहां सत्य करूणा होती है वहां झूठ नहीं टिकता । प्रभु की साधना अकम्प की साधना है । 24 तीर्थंकर कम्पायमान नहीं हुए । जिस बात को तुम महत्व देते हो वह बात आगे बढ़ती है । गुलाब का फूल प्राप्त करना है तो चन्द कांटे कबूल करने पड़ते हैं । कांटों के बिना फूल की ष्षोभा भी नहीं है । प्रभु महावीर के जीवन में अनेक विरोध हुए उनको साधना के लिए भी स्थान नहीं मिला । हमें तो कोई भी दुःख नहीं है, अकम्प बनने के लिए हम चित्त की चेतना से जुड़ें । 

आज आप एक उद्देष्य को लेकर एकत्रित हुए हैं । सभी उत्तर भारत के श्रीसंघांें का एक उद्देष्य

है संगठन का । यह संगठन किसी के विरोध में नहीं बना, यह तो साधु साध्वीवृंद की सेवा, साधना और आपस के संगठन के लिए बना है । जब कोई नया विचार भीतर आता है तो समाज को पीड़ा होती है । सुकरात ने लोगों को ज्ञान दिया तो लोगों ने उसे विष दिया । आज इस संगठन को लेकर अनेक चर्चाएं पूरे भारत में हो रही हैं । यह कोई राजनीति का क्षेत्र नहीं है । यहां केवल धर्म ही धर्म है । इस संघ के तीन उद्देष्य हैं साधना, सेवा और संगठन । प्रभु महावीर का चतुर्विध श्रीसंघ इन तीनों सूत्रों को लेकर आगे  बढ़े । संत साध्वीवृंद के अध्ययन के लिए उनकी सेवा करें । उनके विहार चर्या का ध्यान रखें । हम आपस में  जुड़ें । आचार्य श्री आत्माराम जी म0, आचार्य श्री आनंद ऋषि जी म0, आचार्य श्री देवेन्द्र मुनि जी म0 की परम्परा को कायम करें । सेवा के बारे में कहा है कि एक अनपढ़ षिष्य केवल सेवा करता है उसे कुछ भी नहीं आता है अगर वह लगन से सेवा करे तो मुक्ति को प्राप्त कर लेता है । इस संगठन में साधना की आवष्यकता है । श्रावक श्राविका खुद साधना करें । एक सामायिक प्रतिदिन करें । 15 मिनिट का स्वाध्याय, ध्यान अवष्य करें । जैनागम रत्नाकर श्रद्धेय आचार्य श्री आत्माराम जी म0 के टीकाकृत आगम सभी संपादित हो चुके हैं । मैं चाहूंगा कि आप अपने घर में उन आगमों को रखें और बच्चों को स्वाध्याय की प्रेरणा दें । सुसंस्कारों का रोपण करें । हम सब हृदय से जुड़ें । जब एक व्यक्ति आगे चलता है तो दस व्यक्ति अवष्य उसे पीछे खींचते हैं । अगर वह व्यक्ति आगे बढ़ जाए तो कुछ क्षणों के बाद अनेक व्यक्ति भी उसके पीछे चलने लग जाते हैं ।

इस अवसर पर श्री राजेन्द्र कुमार जी जैन के परिवार को हार्दिक साधुवाद देता हूं जिन्होंने वर्षावास में आतिथ्य सत्कार तो किया ही साथ ही आज के दिन आतिथ्य सत्कार का लाभ लिया । एक संयोग की बात है कि जालंधर में प्रवेष इनकी फैक्ट्री से हुआ था और विदाई इनके घर से हो रही है । इस अवसर पर जम्मू श्रीसंघ ने आगामी वर्षावास की विनती प्रस्तुत की । श्रद्धेय आचार्य भगवंत ने उन्हें संकेत करते हुए उत्तरी भारत में विचरण के भाव दर्षाये । इस अवसर पर आत्म दीप पत्रिका का चातुर्मास विषेषंक एवं षिवाचार्य दैनिक कलेण्डर का विमोचन हुआ । 

 

श्स्व पर कल्याण का संकल्प करो: जैनाचार्य पूज्य श्री षिव मुनि जी महाराज

7 दिसम्बर, 2005: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री षिवमुनि जी महाराज ने विष्व मानव मंगल मैत्री अभियान के अन्तर्गत अपने पावन प्रवचन में फरमाया कि- हम अरिहंत प्रभु कों क्यों नमन करते हैं । हमें क्या मिलेगा । क्या आदर्ष है हमारा । जीवन का आधार क्या है । हम संकल्पवान बनें । संकल्प में ऊर्जा एकत्रित होती है और वह जीवन निर्माण में लग जाती है । संकल्प नहीं तो कुछ भी नहीं । एक पानी को ही देख लो अगर पानी को वाष्प बना दिया जाए तो वह इंजन चलाता है । पानी को तेज रफ्तार से गिराया जाए तो बिजली बना देती है ऐसी ही ऊर्जा हमारे भीतर है उसका हम प्रयोग किस प्रकार करते हैं हमारे भीतर दो प्रकार की ऊर्जा है । अगर वह ऊर्जा अधोगामी बनती है तो संसार का रूप धार कर लेती है और उध्र्वगामी बनती है तो मोक्ष की ओर ले जाती है । हम अपनी षक्ति योग में लगायें तो मोक्ष की ओर चलन पड़ेगे और समभोग में लगायें तो संसार बढ़ेगा । रावण के पास बहुत कुछ था उसकी सोने की लंका थी, लम्बा चैड़ा परिवार था पर भीतर कुछ भी नही ंथा । इस भूतल पर ऐसे अनेकों संत महान हुए हैं जिनके पास कोई भी सम्पत्ति नहीं थी । दो समय की रोटी भी मुष्किल से मिलती थी । उन्होंने संकल्प किया और आगे बढ़ते चल गये । 

मेरा और आपका क्या संकल्प होना चाहिए यह एक विचारणीय प्रष्न है । गुलाब पैदा करना चाहते हो तो कांटों को सहन करना पड़ेगा । संकल्प और संघर्ष में अन्तर है । संघर्ष से तनाव, पीड़ा, बेचैनी भीतर आती है । संकल्प से सुख आनंद मैत्री की प्राप्ति होती है । संकल्प स्व पर कल्याण के लिए होना चाहिए । एक ही संकल्प करो मैं अरिहंत कैसे बनूं, मेरे भीतर वीतराग दषा कैसे प्राप्त हो । सभी संकल्पों को छोड़ दो । एक ष्ष्वांस में वीतरागता, मैत्री बहे । सुबह उठो प्रभु का धन्यवाद करो और आज की दिनचर्या वीतरागता में बिताने का संकल्प करो । ष्ष्वांस तो बह रही है, बहती चली जाएगी आप उसके साथ क्या करोगे यह तुम्हारी स्वतंत्रता है । प्रभु महावीर ने संकल्प किया तो वे मुक्ति को प्राप्त हो गए । भगवान बुद्ध ने संकल्प किया बोधि प्राप्त हो गई । अपने जीवन को देखो । इस उम्र तक हम क्या प्राप्त कर पाए हैं । संकल्प करोगे तो अवष्य सिद्धि मिलेगी । 

संकल्प से ही साध्वी हिमानी जी म0 ने आयम्बिल व्रत किए हैं, रसनेन्द्रिय को जीता   है । साधना के लिए आयम्बिल तप उपयोगी है । इनका संकल्प ना होता तो आज हम यहां नहीं होते । इससे पूर्व उपाध्याय श्री रवीन्द्र मुनि जी म0 ने मार्गानुसारी के 35 गुणों के भीतर षिष्टाचार की व्याख्या की । मंत्री श्री षिरीष मुनि जी म0 ने ध्यान साधना का परिचय देते हुए अपने भीतर में झांकने के लिए कहा । आचार्य भगवंत के स्वागत में महासतीजी ने भजनों के द्वारा अपनी भावनाएं प्रस्तुत की । 

आत्म: विकास कोर्स बेसिक दोपहर में 12.00 से 2.00 एवं रात्रि 7.30 से 9.30 बजे तक होगा । यह कोर्स पांच दिन तक चलेगा । जो भी भाई बहिन सुख ष्षांति आनंद प्राप्त करना चाहते हैं वे कोर्स में अवष्य भाग लें । उसी तरह आज श्री महावीर जैन सीनियर सैकेण्डरी स्कूल में बच्चों के लिए आत्म चेतना कोर्स का आयोजन हुआ है । 

 

मन परिवर्तनषील है: जैनाचार्य पूज्य श्री षिवमुनि जी महाराज

8 दिसम्बर, 2005: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री षिवमुनि जी महाराज ने मन की परिवर्तनषीलता पर अपने भाव अभिव्यक्त करते हुए फरमाया कि- मन परिवर्तनषील है । वह बहुत जल्दी बदल जाता है । प्रत्येक क्षण में नये भावों को लेकर तैयार होता है मन । पष्चिम के बहुत बड़े विचारक चर्च में भाषण सुनने के लिए गए । भाषण सुनते हुए उनके भीतर दान की भावना प्रकट हुई उन्होंने विचार किया कि 100 डाॅलर इस चर्च में दान दे दूं । भाषण सुनते चले गए और मन बदलता चला गया । 100 से 50 डाॅलर और 50 से 10 डाॅलर भाषण के अन्तिम समय में उनकी दान देने की भावना भी नहीं रही । जब अंत में भाषण करने वाले की आरती करके सब लोगों की ओर लाई जा रही थी तो लोग उसमें पैसे डाल रहे थे उस विचारक के मन में आया कि क्यों न मैं इस थाली में से कुछ पैसे चुराकर अपनी जेब में रख लूं । देखिए मन कितना परिवर्तनषील है । भाषण के ष्षुरूआत में दान देने की उत्कृष्ट भावना थी अन्तिम समय में वह भावना नहीं रही । मन बड़ा बेईमान और धोखेबाज है, सुन्दर नाम के कवि ने कहा है- 

जो मन नारी की ओर निहारत, वह मन होत है नारी स्वरूपा,

जो मन काहूं को क्रोध करत है वो मन होत है वो मन क्रोध स्वरूपा-

जो मन ब्रह्म में ब्रह्म रटत है वो मन होत है ब्रह्म स्वरूपा । 

यह मन जिस ओर लग जाता है वैसा ही हो जाता है । अगर मन संसार की ओर आकर्षित हो जाए तो वह विषय वासना में फंसकर अपने जीवन को अधोदिषा प्रदान करता   है । चण्डकौषिक ने पूर्व भव में क्रोध किया था इसी कारण उसे इस भव में सर्प बनना पड़ा । प्रभु के उपदेष से क्षमा भाव धारण करने पर अगले भव में वह देवलोक में चला गया । मन में षुद्ध-भाव हो तो वह ऊध्र्व की ओर गमन करता है । मन में कपट, माया हो तो अधोदिषा में जाता है । आगमों में उल्लेख है अगर पुरूष कपट करता है तो अगले भव में स्त्री गोत्र की प्राप्ति होती है । अगर स्त्री माया करती है तो नपुंसक बनती है । अगर नपुंसक माया करता है तो तिर्यंच गति में जाता है । जो मन प्रातःकाल में ब्रह्म का ध्यान करता है वह ब्रह्मस्वरूप हो जाता है । सुन्दर कवि की ये पंक्तियां हमें जीवन की ओर निहारने की प्रेरणा देती है । 

कल हम संकल्प की चर्चा कर रहे थे । हम एक संकल्प रखें कि मैं किस प्रकार अरिहंत बनूं । अंग-2 में कण-कण में रोम-रोम में अरिहंत की मैत्री किस प्रकार प्रवाहित हो, जब अरिहंत भीतर आ गए तो क्रोध वासना नहीं आएगी । एक षेर सामने हो तो गीदड़ और हाथी क्या कर सकते हैं । अरिहंत की षक्ति के समक्ष सभी नत्मष्तक हैं । हमारे भीतर प्रतिपल प्रतिक्षण अरिहंत का आदर्ष बना रहे और हम मन को संकल्पयुक्त करके सिद्ध स्थिति की ओर बढ़ते चले जाएं । 

सलाहकार श्री रमणीक मुनि जी म0 ने इससे पूर्व सत्य की प्रवृत्तियों पर चर्चा करते हुए पारमार्थिक सत्य को जानने की प्रेरणा दी ।  आचार्य भगवंत के फगवाड़ा पधारने पर फगवाड़ा का जन-जन ध्यान साधना षिविरों से लाभान्वित हो रहा है । श्री महावीर जैन सीनियर सेकेण्डरी स्कूल में विद्यार्थियों के लिए प्रतिदिन 10.00 से 11.30 बजे तक आत्म: चेतना षिविर का आयोजन । दोपहर में 12.00 से 2.00 बजे तक श्रावक श्राविकाओं के लिए आत्म: ध्याना साधना कोर्स बेसिक का आयोजन एवं रात्रि में 7.30 से 9.30 बजे तक बेसिक कोर्स का आयोजन हो रहा है जिसमें आनंद ष्षांति प्राप्त करने हेतु अनेकों व्यक्ति प्रयास कर रहे हैं । 

 

हर जीव मंगल स्वरूप है: जैनाचार्य पूज्य श्री षिवमुनि जी महाराज

9 दिसम्बर {फगवाड़ा}: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री षिवमुनि जी महाराज ने अपने प्रवचन में फरमाया कि- एक छोटी सी प्रार्थना, उसका भाव और उसके साथ भीतर प्रवेष करने पर गहराई प्राप्त होती है । अरिहंत प्रभु ने हमें इतना कुछ दिया है हमने उन्हें क्या दिया है । यह एक यक्ष प्रष्न है । हमारे हृदय का पात्र छोटा होते हुए भी उन्होंने उसे लबालब भर दिया, सब कुछ दे दिया । कभी उनकी याद में हमारे आंसू बहे । अपने भीतर की गहराई में जाओ । हमारी पात्रता, हमारा दृष्टिकोण नहीं था जितना हमें मिल गया । जिन्दगी भर हम इस संसार के कार्यों में उलझते रहते हैं । सब कुछ सोचते रहते हैं । प्रभु ने हमें इतना कुछ दिया हमने उन्हें कुछ भी नहीं दिया । यह अनुभव की बात है कि उन्होंने हमें क्या दिया । अनुभव के लिए गहराई आवष्यक है । प्रभु ने हमें समाधि, षान्ति दी प्रभु ने सुनने के लिए कहा, हमने कुछ सुना नहीं । प्रभु ने समाधि में आने के लिए कहा- समाधि नहीं आ रही तो कोई बात नहीं अभ्यास करो । समाधि यानि बुद्धि समता में आ जाए, हर परिस्थिति में समता आ जाए । अनंत उपकार है उस प्रभु, माता पिता एवं गुरूदेव के जिन्होंने हमें आज यहां तक पहुंचाया । इतना सुन्दर ष्षरीर प्राप्त हुआ, ज्ञान प्राप्त हुआ, प्रभु की वाणी प्राप्त हुई हम उनके उपकारों को भुला नहीं सकते । माता पिता गुरू कड़वे वचन भी कहते हैं तो उसे सहन करो, कर्म-निर्जरा हो जाएगी । 

प्रभु ने कहा पर निन्दा नहीं आत्म-निन्दा करो । हम क्यों निन्दा करते हैं । किसी की पीठ पीछे बात क्यों करते हैं सज्जन बनो । ऐसे ही निन्दा करते-2 अनंत कर्मो का बंधन हो जाता है । मौन कर लो जितना कम बोलोगे उतना अच्छा है । हम निन्दा इसलिए करते हैं सबके सामने हम अपने को बड़ा दिखाना चाहते हैं । अपनी प्रषंसा अपने ही मुख से करते हैं और हम निन्दा उसकी करते हैं जिसे हम नीचा दिखाना चाहते हैं । जब निन्दा के भाव भीतर आए तब नमन करना । अपना कुछ भी नहीं है सबकुछ प्रभु का है और उस प्रभु को सबकुछ अर्पण कर देना । प्रभु ने कहा हर जीव मंगल सवरूप है । हर जीव अपने बराबर है । किसी को छोटा या बड़ा मत समझो, सबके मंगल की कामना करेा जितने बीज हमने पहले बोए हैं उतने वृक्ष तो आएंगे ही और जैसा बीज बोया है वैसा ही वृक्ष आएगा इसलिए सत्कर्म करो । आत्म-निन्दा करेा । प्रभु की प्रार्थना और उसकी प्राप्ति के उपायों पर चिन्तन मनन करते हुए उसकी ओर अग्रसर हो जाओ । 

आचार्य भगवंत के फगवाड़ा पधारने पर फगवाड़ा का जन-जन ध्यान साधना षिविरों से लाभान्वित हो रहा है । श्री महावीर जैन सीनियर सेकेण्डरी स्कूल में विद्यार्थियों के लिए प्रतिदिन 10.00 से 11.30 बजे तक आत्म: चेतना षिविर का आयोजन । दोपहर में 12.00 से 2.00 बजे तक श्रावक श्राविकाओं के लिए आत्म: ध्याना साधना कोर्स बेसिक का आयोजन एवं रात्रि में 7.30 से 9.30 बजे तक बेसिक कोर्स का आयोजन हो रहा है जिसमें आनंद ष्षांति प्राप्त करने हेतु अनेकों व्यक्ति प्रयास कर रहे हैं ।

 

श्री महावीर जैन सीनीयर सेकेण्डरी स्कूल में षिवाचार्यश्री का उद्बोधन

बच्चे षाकाहारी बने व जंक फूड छोड़ा

श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री षिवमुनि जी महाराज ने विष्व मानव मंगल मैत्री अभियान के अन्तर्गत व्यक्तित्व विकास एवं ष्षाकाहार प्रचार प्रसार के लिए श्री महावीर जैन सीनीयर सेकेण्डरी स्कूल के एक हजार बच्चों को उद्बोधन दिया । व्यक्तित्व विकास के अनमोल सूत्र दिए । उन्होंने ॅफरमाया- अरिहंत प्रभु को नमन । नमन इसलिए क्योंकि वे सहज, सरल, वीतरागता से परिपूर्ण हैं । प्यारे बच्चों आपका जीवन बहुत सहज, सरल है । आपके स्कूल का नाम भी महावीर है । मैं आपका, आपके स्कूल के प्रींसिपल, स्टॅाफ एवं मैनेजमेंट कमेटी का धन्यवाद करता हूं उन्होंने हमें यहां आमंत्रित किया और आपसे मिलने का मौका दिया । 

बच्चों हमारे जीवन का मुख्य अंग है प्राण योग और ध्यान । आत्म: चेतना षिविर के अन्तर्गत आपमें से कुछ बच्चों ने इसकी विधिवत षिक्षा प्राप्त की है । कहा है जैसा खाओगे अन्न वैसा होगा मन । जैसा पीओ पानी वैसी होगी वाणी । हम मानव हैं । मानव का भोजन षकाहारी है, हम जन्म से षाकाहारी हैं । आपने मांसाहारी प्राणियों को देखा होगा, दांत, नाखुन तीखे होते हैं । जीभ लम्बी होती है । उनकी आंतड़िंया छोटी होती है जिससे वे मांसाहार पचा लेते हैं । महात्मा गांधी राष्ट्रपिता कैसे बनें । वे हमेषा सत्य बोलते थे । वे बचपन में स्कूल में पढ़ते थे । प्रतिदिन माता पिता को प्रणाम करते थे । एक दिन ष्षाम को पिताजी के पांव दबा रहे थे तो उनकी आंखों में से आंसू गिर गए । पिताजी ने पूछा बेटे क्या हो गया तो गांधीजी ने बताया कि पिताजी मैने आज तक के जीवन में बहुत गलतियां की है, मैंने चोरी की, मांस खाया, मैंने बीड़ी भी पी है । पिताजी ने इतना सुनने पर पुत्र से प्रष्न किया कि क्या तुम आगे करना चाहते हो । पुत्र ने कहा आगे से मैं ऐसा नहीं करूंगा तो पिताजी ने कहा कल तुम्हारा जन्म दिन है तुम जिन्दगी की नई षुरूआत करो । जिन हाथों से चोरी की है उन हाथों से दान देना । जिस मुख से मांस खाया है उस मुख से सबको मिठाई खिलाना । जिन होठों से बीड़ी पी है उन होठों से मधुर वचन बोलना । प्रतिज्ञा करो कि आगे से कभी अनैतिक कार्य नहीं करोगे । गांधीजी ने अपनी आत्म कथा में लिखा है अगर मेरे पिताजी सही षिक्षा न देते और मेरी माता विदेष जाने से पूर्व जैन मुनियों से मुझे नियम ना करती तो षायद मैं आज राष्ट्रपिता न बनता । गांधीजी के जीवन में सत्य और प्रामाणिकता थी इसी के बल पर वे राष्ट्रपिता बने । बच्चों हमेषा सत्य बोलना ।

रामकृष्ण और प्रभु महावीर अपने माता को प्रतिदिन नमस्कार करते थे तुम भी नमस्कार करना । रात को सोते समय, पढ़ते समय, खाना खाते समय टी0वी0 नहीं देखना । अगर तुम पेय पदार्थ लेते हो तो वह भी तुम्हारे लिए हानिकारक है क्योंकि उसके अन्दर कार्बनडाईआक्साइड होती है, जिसे हम बाहर फेंकते हैं उसे हम पेयपदार्थ के द्वारा भीतर ले रहे हैं । टूटा हुआ दांत अगर पेय पदार्थ में डाल दिया जाए तो वह गल जाता है । तीन प्रकार का आहार है- सात्विक, राजसिक और तामसिक । सात्विक आहार में आपके घर में जो भोजन बनता है, चावल, चपाती, दाल, सब्जियां । राजसिक भोजन यानि तला हुआ भोजन, षाही खाना अधिक मिर्च मसाले युक्त खाना और जंक फूड्स । तामसिक भोजन में प्याज, लहसून और सारा मांसाहारी भोजन । वैज्ञानिकों ने प्रयोग किया तीन समान प्यालों में पानी लिया और उनमें इन तीनों आहारों को डाल दिया गया । सात्विक आहार बारह घण्टे में पानी के साथ घुल गया, राजसिक आहार 36 घण्टे में घुल गया और तामसिक एवं मांसाहारी आहार को घुलने में 72 घण्टे लगे और उसमें दुर्गन्ध आने लग गई । 

नानक ने भी कहा है कि जिसके कपड़े पर खून लगने से कपड़़ा गन्दा हो जाता है । जो व्यक्ति खून पी जाते हैं उनका चित्त निर्मल कैसे होगा । सभी धर्मों ने मांसाहार का निषेध किया है । जैन धर्म में अहिंसा सर्वोपरि है । किसी भी जीव को दुःख ना हो ऐसा प्रयास इस धर्म में किया जाता है । सबके प्रति मंगल की कामना की जाती है तो हम आज से मांसाहार को त्यागकर ष्षाकाहार की ओर आगे बढ़ें । मांसाहार करने से अनेकों बीमारियां भी पैदा होती हैं । आचार्यश्रीजी ने सभी बच्चों को नियम करवाया । महात्मा गांधी ने नियम किया तो वे राष्ट्रपिता बन गए । गुरू चरणों में जो नियम ग्रहण किया है जीवन रहे या ना रहे हम नियम को  पूरा निभायेंगे । ध्यान पर प्रकाष डालते हुए आचार्यश्री ने कहा कि आपकी जितनी उम्र है उतना ध्यान करो । अधिक थकने पर नींद आती है । थकान महसूस होने पर जब हम ध्यान करते हैं तो 10 मिनिट के ध्यान से ब्रेन एक्टिवेट हो जाता है । अखरोट को देखा होगा वह दिमाग जैसा है, ब्रेन को डवलप करता है । हमारे दिमाग के तीन हिस्से हैं, राईट, लेफ्ट और बे्रक । लेफ्ट ब्रेन स्कूल के अध्ययन से डवलप होता है तो राईट ब्रेन ध्यान योग से विकसित होता है । ध्यान से याददास्त अच्छी होती है । एकाग्रता बढ़ती है । हम अधिक षक्तिषाली बन जाते हैं । अच्छे नम्बर हमें ध्यान से प्राप्त होते हैं । आते जाते ष्वांस को देखना और हर परिस्थिति को देखना ही ध्यान है । आचार्यश्रीजी ने अंत में सभी बच्चों को ध्यान करवाया । 

इस अवसर पर श्रमण संघीय मंत्री श्री षिरीष मुनि जी महाराज ने बच्चों को व्यक्तित्व विकास के सूत्र बतलाते हुए ज्ञान के लिए पढ़ने की प्रेरणा की और छोटे-2 योगासन   सिखाये । विद्यालय के प्रिसिपल और सभी मैनेजमेनट कमेटी ने आचार्यश्रीजी का हार्दिक धन्यवाद किया और विनती की कि वे समय-समय पर ऐसे प्रोग्राम हमारे स्कूल में करते रहें । इससे पूर्व आत्म: चेतना कोर्स स्कूल के बच्चों के लिए आयोजित किया गया जिसमें श्रमण संघीय मंत्री श्री षिरीष मुनि जी महाराज एवं साधिका कुमारी निषा जैन ने अपना अमूल्य सहयोग प्रदान किया । 

                                                                          

फगवाड़ा में तपस्विनी महासती श्री हिमानी जी म0 का तप अभिनन्दन समारोह सानंद सम्पन्न:-

आचार्यश्रीजी ने महासती श्री हिमानी जी म0 को ‘तप ज्योत्सना’ के पद से अलंकृत किया:-

11 दिसम्बर, 2005: जालंधर: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री षिवमुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय प्रवचन में फरमाया कि प्रभु महावीर का धर्म संघ जिसमें चार तीर्थ साधु साध्वी श्रावक श्राविका यहां पर उपस्थित है । श्री महावीर जैन सीनियर सेकेण्डरी स्कूल के प्रांगण में हम सब एकत्रित हुए हैं अभिनन्दन करने के लिए । अभिनन्दन तप त्याग कर्म निर्जरा का है । विदुषी महासाध्वी श्री रिद्धिमा जी म0 ने फगवाड़ा चातुर्मास कर श्रमण संघ की षोभा में अभिवृद्धि की है । साथ ही साथ तपस्विनी महासाध्वी श्री हिमानी जी म0 ने आयम्बिल तप की आराधना करके षोभा की अभिवृद्धि में कलष की स्थापना की है । फगवाड़ा का जन-जन इनके चातुर्मास से प्रेम की डोरी में बंध गया है । भक्ति और प्रेम सर्वोपरि है । जहां भक्ति है वहां ष्षक्ति होती है, वहां पर तप साधना की आवष्यकता नहीं रहती । 

साधना की षुरूआत ही भक्ति से होती है । विनम्रता, सहजता और सरलता रूपी गुण उसके पष्चात् झलकते हैं । सूरज के समक्ष अनेकों बादल आ जाएं । राहु केतु आ जाए फिर भी वे सूरज का कुछ नहीं कर सकते, उनके ढल जाने के बाद सूरज और अधिक तेजस्वी बन जाता है । ऐसी ही परीक्षा प्रभु महावीर, राम, नानक, दादू के समय में हुई । नानक के माता पिता को पता नहीं था कि उनका पुत्र इतना भाग्यषाली है जिसने तराजू तोलते हुए परमात्मा को पा लिया । आप भी उस परमात्मा को प्राप्त कर सकते हो आवष्यकता है भीतर भक्ति की, प्रार्थना की । तप का अभिन्दन धर्म का अभिनन्दन है । महासाध्वीजी ने आयम्बिल का तप किया है जो एक विषेष तप है, उपवास करना सरल है । आयम्बिल करना कठिन है । रूखा सूखा भोजन करना रसनेन्द्रिय को जीतना है । आयम्बिल में अधिक परीक्षा होती है । परीषह, उपसर्गों के उपस्थित होने पर जैन ष्षास्त्रों में आयम्बिल करने का विधान बताया गया है । महासाध्वीजी ने आयम्बिल तप करके अपनी रसनेन्द्रिय को जीता है, मैं महासतीजी का हार्दिक अभिनन्दन करता हूं । इन्होंने श्रमण संघ के गौरव को बढ़ाया है साथ ही अपनी गुरू गुरूणी और माता पिता का गौरव को भी बढ़ाया है । 

श्रावक श्राविका हीरे मोती के समान हैं । उन बिखरे हुए मोतियों की एक माला उत्तर भारतीय श्रमण संघीय श्रावक समिति के माध्यम से बनेगी । आप सबने उसमें जुड़ना है । अपनी श्रद्धा भक्ति का परिचय देना है । श्रावक को अपनी सीमाएं नहीं लांघनी चाहिए । मैत्री और प्रेम का संबंध बनाये रखना चाहिए । एक श्रद्धा निष्ठा आदर्ष स्थापित करो हम आगम पुरूष प्रथमाचार्य श्री आत्माराम जी म0, आचार्य श्री आनंद ऋषि जी म0, आचार्य श्री देवेन्द्र मुनि जी म0 की परम्परा को आगे बढ़ाते हुए उसी राह पर चलें । आपके प्यार और सहयोग की आवष्यकता है । जहां हम जुड़ते हैं वहां पर अवष्यमेव एक माला बन जाती है । संतो की सेवा से पुण्य प्राप्ति और मोक्ष के संयोग प्राप्त होते हैं, उस संयोग की प्राप्ति के लिए जीवन के सत्य को प्राप्त करो । धर्म ध्यान की ओर अग्रसर हो जाओ । स्वाध्याय, ध्यान, तप साधना करो । इस अवसर पर आचार्यश्रीजी ने श्रमण संघ की ओर से तपस्विनी महासाध्वी श्री हिमानी जी म0 को आदर की चादर भेंट करते हुए ‘तप ज्योत्सना’ पद से अलंकृत किया । 

श्रमण संघीय मंत्री श्री षिरीष मुनि जी म0 ने तप की अनुमोदना करते हुए कहा कि हम तप निर्जरा के लिए करें । केवल भूखा रहना ही तप नहीं है प्रभु महावीर ने बारह प्रकार के तप बतलाए हैं । तप निर्जरा के लिए हो । आयम्बिल तप पर विषेष ध्यान आकर्षित करते हुए यह उन्होंने कहा कि आयम्बिल तप से अनेक परीषह, उपसर्गों पर विजय प्राप्त की जा सकती है । इन महासतिवृंद ने अल्प दीक्षा पर्याय में महान् कीर्तिमान स्थापित किया है इसलिए हार्दिक साधुवाद ।

सलाहकार श्री रमणीक मुनि जी म0 ने तप की अनुमोदनार्थ आए हुए श्रीसंघों को श्रद्धेय आचार्यश्रीजी के प्रति समर्पित रहते हुए श्रावक समिति से जुड़ने की प्रेरणा दी एवं तपस्विनी महासाध्वीजी को आषीर्वाद देते हुए कहा कि वे जिस भाव से तप की ओर अग्रसर हुए हैं उन भावों से वो संयम मार्ग पर आगे बढ़ते रहें । उपाध्याय श्री रवीन्द्र मुनि जी म0 ने तप से करोड़ों भावों के संचित कर्म निर्जरित हो जाते हैं इस पर व्याख्या करते हुए लघुवय में महान तपस्या करने वाली महान् साध्वी श्री हिमानी जी म0 का तप अभिनन्दन किया । 

 तप की अनुमोदना में महासाध्वी श्री मधुरता जी म0, महासाध्वी श्री उपासना जी म0, महासाध्वी श्री रिद्धिमा जी म0 ने अपनी भावना अभिव्यक्त करते हुए तप से निर्जरा की प्राप्ति एवं आत्म-षुद्धि बतलाया । 

इस अवसर पर ‘पवन पावन धुन’ नामक पुस्तिका जो कि तपस्विनी महासाध्वी श्री हिमानी जी म0 द्वारा रचित है उसका विमोचन हुआ । श्री महावीर जैन सीनियर सेकेण्डरी स्कूल के बच्चों ने सांस्कृतिक कार्यक्रम पेष करते हुए आए हुए अतिथियों का मन मुग्ध   किया । इस अवसर पर लुधियाना, रोपड़, होषियारपुर, नवांषहर, मालेर कोटला, चण्डीगढ़, पंचकूला, दिल्ली, उज्जैन, गाजियाबाद, जालंधर, राजपुरा, गोराया, फिल्लौर, अम्बाला, देहरादून आदि अनेक क्षेत्रों से भाई बहिन तप अभिनन्दन हेतु उपस्थित हुए । 

ष्प्रस्तुत कार्यक्रम को सफल बनाने में प्रधान श्री यषपाल जैन, मंत्री श्री अजीत जैन, कोषियर श्री रजनीष जैन के साथ श्री महावीर जैन माॅडल स्कूल, माडल टाउन स्कूल व जैन वीर मण्डल के सदस्यों आदि सभी का पूर्ण सहयोग रहा । 

 

संक्रांति में सिद्धगति की ओर संक्रमण करें

जैनाचार्य पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

15 दिसम्बर, 2005 शिवपुरी, लुधियाना: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री षिवमुनि जी महाराज ने अपनी अमृतमयवाणी का पान कराते हुए कहा कि- अरिहंत प्रभु की अनंत करूणा, शुद्धता को नमन । नमन इसलिए कि हम अपने को भीतर से शुद्ध करना चाहते हैं । अरिहंत सर्वोपरि, सर्वश्रेष्ठ है उन्होंने हमें धर्म, ज्ञान दिया । जीवन जीने की कला सिखाई ं। आज का यह समागम विदुषी महासाध्वी श्री सुनीता जी महाराज एवं तपरत्नेश्वरी महासाध्वी श्री शुभ जी महाराज के पारणे के अवसर पर यहां पर आना हुआ । इन्होंने जहां-2 भी वर्षावास किए हैं वहां पर तप की रश्मियां बिखेरी है । धर्म जागरणा की  है । इस वर्ष यह अवसर शिवपुरी श्रीसंघ को प्राप्त हुआ । शिवपुरी श्रीसंघ का परम सौभाग्य है कि उसने हमें यहां आने का अवसर दिया । महासाध्वीजी का श्रद्धातिरेक यहां हमें खींच लाया । भोले बाबा यहां पर विराजमान हैं । वे प्राणी मात्र के मसीहा हैं । उनका आशीर्वाद भी हमें ग्रहण करना था । यह आत्म नगरी आराध्यदेव आचार्य श्री आत्माराम जी महाराज की कर्मभूमि है, उनकी वाणी में हमेशा आगम बरसते थे । उनका नाम सुनते ही हृदय झुक जाता है । प्रभु महावीर का प्रेम और मैत्री कहती है हमने कांटों को भी नरमी से छुआ है लेकिन बेदर्द है वे लोग जो फूलों को मसल देते हैं । श्रमण संघ में ऐसी बहुत महान् आत्माएं हैं जो तपस्वी, ज्ञानी हैं । महासाध्वीजी ने गर्म जल के आधार पर 166 उपवास की लम्बी श्रृंखला की है । उस श्रृंखला के अभिनन्दन की शुरूआत आज के इस परम् पावन दिवस संक्रांति के दिवस से होने जा रही है । 

संक्रांति जीवन में संक्रमण लाती है । आज धन की संक्रांति है । धन हमें लौकिक से लोकोत्तर और लोकोत्तर से पारलौकिकता की ओर ले जाता है । सच्चा धन वह है जो कभी किसी से कम होता है न उसे किसी से छीना जाता है । ऐसे धन को पारलौथ्कक धन कहते हैं । सक्रांति श्रवण का मतलब यही है कि पारलोकिकता भीतर आए । शांति, समता बढ़ती रहे । आज संक्रमण को भीतर लाने के लिए शांति, समता की आवश्कता है उस शांति समता को बनाये रखने के लिए मौन, ध्यान की आवश्यकता है । आज हमि मौन और ध्यान को भूल गये हैं । कहीं न कहीं कोई किसी की निन्दा कर रहा है । हम किसी की निन्दा ना करे । जो करता है उसकी उपेक्षा कर दें । सबसे ऊपर है समता । समता का धन भीतर आ गया तो पारलौकिक धन बढ़ता चला जाएगा । एक व्यक्ति गाली देता है, निन्दा करता है और तुम भीतर से मुस्कुराओं तो अनंत कर्मों की निर्जरा होती है । तप ना कर सको तो कोई बात नहीं, समता अपनाओ । एक क्षण की समता हजारों वर्षों के कर्म मेल को धो देती है । जीवन में समता होगी तो परिवार, संघ, समाज सुखी होगा । आनंद, प्रेम, मैत्री बढ़ेगी । समता अरिहंत प्रभु से सीखो । समता तीर्थंकर भगवंतों से सीखो जिन्होंने अनंत कष्टों को समता से सहन किया । अहंकार नहीं किया । नम्रता और सरलता में आ गए । अहंकार धर्म का शत्रु है तो निवम्रता धर्म का मित्र है । अनुशासन की दृष्टि से कठोरता भी जरूरी है पर व्यक्ति उपर से कठोर रहे भीतर से कोमल रहे । मोक्ष चाहते हो तो समता अपनाओ । उठो, बैठो कुछ भी कार्य करो तो नमो सिद्धाणं का जाप करते रहो । हमने सिद्धगति को प्राप्त करना है । हमारा लक्ष्य वही है हम लक्ष्य की ओर आगे बढ़ें । बाकी सब लक्ष्य छोटे हैं । घर, परिवार कार्य इनसे भी सवोत्त्म लक्ष्य है सिद्धगति को प्राप्त करना । संक्रांति के दिन दान, शील, तप भावना की आराधना करना । आज सक्रांति है । सूर्य वृश्चिक राशि से धनु राशि में प्रवेश कर रहा  है । आज तीस मुहूर्त की संक्रांति है । हम खूब धर्म ध्यान करें । इस अवसर पर श्रद्धेय उपाध्यायश्री जितेन्द्र मुनि जी म0, उपाध्याय श्री रवीन्द्र मुनि जी म0 ने अपनी भावनाएं अभिव्यक्त की । महासाध्वीजी ने आचार्यश्रीजी के पदार्पण पर हार्दिक स्वागत अभिनंदन किया । 

 

मोक्ष प्राप्ति का सरल उपाय गुरू समर्पण 

जैनाचार्य पूज्य श्री षिवमुनि जी महाराज

लुधियाना 16 दिसम्बर, 2004: श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट् पूज्य श्री षिवमुनि जी महाराज ने अपनी पावन कल्याणकारी वाणी का पान कराते हुए कहा कि- जीव कैसे कर्म-बंधन से मुक्त होकर गुरू-वचन का पालन करते हुए प्रभु के विनय धर्म को स्वीकार करते हुए मोक्ष को प्राप्त करता है । हमारे भीतर मोक्ष की प्यास होनी आवष्यक है । परम्तत्व को प्राप्त करना हमारा मूल स्वभाव है । जिस तरह पानी का मूल स्वभाव षीतलता है उसी तरह आत्मा का स्वभाव परमात्मा तत्व को प्राप्त करना है । तीर्थंकर प्रभु से प्रष्न किया गया कि हे प्रभो ! मुक्ति जाने का सरल उपाय कौनसा है ? प्रभु ने फरमाया- मुक्ति जाने के दो उपाय है, पहला गुरू समर्पण और दूसरा आत्म स्वरूप में प्रवेष या आत्म-समर्पण  {रमण} । गुरू के प्रति समर्पण करोगे तो सीधा मोक्ष प्राप्त होगा । ग