Acharya Dr. Shiv Muniji Profile

Acharya Dr. Shiv Muni Ji Maharaj

श्रमण संस्कृति में जैन धर्म का प्रमुख एवं प्राचीन स्थान है। जैन धर्म की प्राचीन परम्परा में जहां तीर्थंकर भगवान हुए हैं वहां उनकी परम्परा को अगे बढ़ाने वाले युग प्रधन प्रभावक आचार्यों की एक लम्बी शृंखला श्वेताम्बर व दिगम्बर परम्परा में मिलती है। श्रमण संघ के चतुर्थ पट्टधर, आचार्य सम्राट पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज एक उच्चकोटि के ध्यान साध्क एवं आत्मार्थी संत हैं। आपका जीवन असंख्य गुणरत्नों का अक्षय-कोष है।
आचार्य सम्राट पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज

श्रमण संस्कृति में जैन धर्म का प्रमुख एवं प्राचीन स्थान है। जैन धर्म की प्राचीन परम्परा में जहां तीर्थंकर भगवान हुए हैं वहां उनकी परम्परा को अगे बढ़ाने वाले युग प्रधन प्रभावक आचार्यों की एक लम्बी शृंखला श्वेताम्बर व दिगम्बर परम्परा में मिलती है। इन आचार्यों ने अपनी प्रज्ञा से भारत के इतिहास, परम्परा, धर्म, संस्कृति व साहित्य में अपना अभूतपूर्व योगदान दिया है। जैन परम्परा में श्वेताम्बर स्थानकवासी परम्परा का अपना प्रमुख स्थान है। इस परम्परा में श्री वर्धमान श्वेताम्बर स्थानकवासी जैन श्रमण संघ का प्रमुख योगदान रहा है। इस संघ के प्रथमाचार्य जैन धर्म दिवाकर आचार्य सम्राट पूज्य श्री आत्माराम जी महाराज थे। जिन्होंने सर्वप्रथम बीस आगमों पर हिन्दी टीका लिखी और हिन्दी के प्रथम टीकाकार बनें। आपने जैन धर्म पर 65 से ज्यादा ग्रंथ हिन्दी में लिखकर हिन्दी साहित्य में अभूतपूर्व योगदान दिया है। द्वितीय पट्टधर आचार्य सम्राट पूज्य श्री आनंद ऋषि जी महाराज एवं तृतीय पट्टधर आचार्य सम्राट पूज्य श्री देवेन्द्र मुनि जी महाराज हुए हैं।

वर्तमान में श्रमण संघ के चतुर्थ पट्टधर, आचार्य सम्राट पूज्य श्री शिवमुनि जी महाराज एक उच्चकोटि के ध्यान साध्क एवं आत्मार्थी संत हैं। आपका जीवन असंख्य गुणरत्नों का अक्षय-कोष है। जो भी आपके सान्निध्य में पहुंच जाता है वह श्रद्धा और भावना से अभिभूत होकर सदैव के लिए धर्म की शरण में आ जाता है। आपका जीवन कांटों के बीच खिले हुए पुष्प के समान है। वर्तमान युग में मनुष्य शारीरकि एवं मानसिक स्तर पर तनावग्रस्त एवं रोगों की ओर बढ़ता जा रहा है। उसका मन व शरीर चिन्ता और दुःख के वातावरण से परिपूर्ण है। आज मानव ने सुख और सुविध के अत्याधिक साधन जुटाए परन्तु उसके जीवन में सुख के बजाय दुःख का वातावरण निर्मित हुआ। ऐसे समय में समाज के समक्ष आत्मा के स्वरूप का बोध्, शांति, सुख और आनंदमय जीवन जीने की कला का संदेश लेकर जन-जन तक सुगन्ध् के रूप में प्रभावित कर रहा है आचार्य श्री जी का जीवन दर्शन।

व्यक्तित्व

गुलाब सा पुलकित चेहरा जिसके दर्शन कर निराश व्यक्ति में उत्साह एवं उमंग संचरित हो उठे, भास्कर सा दैदीप्यमान ललाट, ध्रुवसम तारों सी निश्छल आंखें, पुष्प सम मृदुल करुणा और वात्सल्य से भीगे हुए वचन, मूल आर्य जाति का प्रतिनिधित्व करती हुई गौर देह। इस बाह्य व्यक्तित्व के धनी हैं आचार्य श्री शिवमुनि जी महाराज।

स्वर्णिम आध्यात्मिक बचपन

बचपन से ही आप श्री जी धर्म में गहरी रुचि रखते थे। माता-पिता के संस्कार आपको सहज रूप से ही मिले थे। स्थानक में नित्य-प्रतिदिन आना-जाना, वहां पधरे हुए साधु-साध्वियों के प्रवचनों को श्रवण करना, उन्हें आहार-पानी के लिए घर ले जाना, धार्मिक चर्चाओं में भाग लेना यह रुचि बचपन से ही आप में थी। आप स्वयं तो साधु-साध्वियों के सान्निध्य में जाते ही थे, साथ-साथ अपनी मित्र मंडली एवं भाई-बहनों को भी ले जाते थे।

आप श्री अपने ननिहाल रानियां में भी जाते तो उस समय भी आपके मन में गुरुजनों के प्रति आकर्षण रहता। प्रतिक्रमण, सामायिक इत्यादि आप स्थानक जाकर करते थे। ये बचपन के संस्कार बढ़ती हुई आयु के साथ-साथ और दृढ़ होते चले गये। आठवीं कक्षा में आपने अपने दो अन्य साथियों के साथ प्रतिज्ञा की हम शादी नहीं करेंगे। अपना जीवन स्व-पर कल्याण के लिए समर्पित कर देंगे। लगभग 14 वर्ष की आयु में उठे वो विचार युवावस्था आते-आते और गहरे होते चले गये। घर वालों ने आपकी अनेकों परीक्षायें लीं परन्तु आपके दृढ़ निश्चय के आगे पूरा परिवार नतमस्तक हो गया।

धरा पर पदार्पण

धन्य हो उठी रानियां मण्डी ( हरियाणा ) ननिहाल पक्ष जिसे आपका जन्म स्थान कहलाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ एवं मलौटमण्डी (पंजाब) की भूमि जिसे पैतृक स्थल कहलाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। 18 सितम्बर, 1942 का दिन पवित्र एवं शुभ हो गया, क्योंकि उस दिन आपका इस धर्म पर पदार्पण हुआ। आपके जन्म से श्री चिरंजीलाल जी का पितृत्व संतुष्ट हुआ एवं माता श्री विद्यादेवी जी की कोख गौरवान्वित हुई।

‘होनहार बिरवान के होत चीकने पात’ इस उक्ति के अनुसार यथा नाम तथा गुण को दृष्टि में रखते हुए आपके बाह्य व्यक्तित्व को आपके भीतर अन्तरंग भावों की अभिव्यक्ति स्वरूप मंगल के अर्थ को लिए हुए शिव कुमार इस नाम से नामांकित किया गया।

साधना पथ पर

‘ज्ञानस्य फलम् विरति’ ज्ञान का फल विरति है, यही बात आपके जीवन में भी घटित हुई, आपके मन में विचार उत्पन्न हुआ कि भगवान महावीर की साधना क्या है ? और मैं उसे अनुभव करना चाहता हूं। आपने अपने उस विचार को मूर्त रूप देने के लिए उस साधना के अनुभव को आत्मसात करने के लिए साधना पथ पर गतिमान होने का निश्चय किया। ये वैराग्य ज्ञान-गर्भित वैराग्य था। आचार्य सम्राट श्री शिवमुनि जी महाराज की दीक्षा 17 मई, 1972 को हुई। आप श्री ने जीवन के 30 वर्ष परिवार और समाज के बीच रहकर व्यतीत किए।
 
इस काल में संसार की असारता को नजदीक से देखा। इस प्रकार विकसित यौवनकाल के अन्तप्रज्ञा की जागृति के आधर पर तीन भगिनियों के साथ भगवान महावीर के दर्शाए हुए सम्यक् ज्ञान, दर्शन, चारित्रा के मार्ग का अनुगमन करते हुए वीतरागता की ओर प्रयाण किया। आप श्री जी के दीक्षा गुरु परम पूज्य, बहुश्रुत, जैनागम रत्नाकर, राष्ट्र संत, श्रमण संघीय सलाहकार पूज्य श्री ज्ञान मुनि जी महाराज एक प्रखर मेध के एक तेजस्वी ज्ञानी संत रत्न थे। उनका सम्पूर्ण जीवन हर दृष्टि से उज्ज्वल रहा है।

समीचीन अध्ययन

आप श्री संयम ग्रहण करने से पूर्व ही अंग्रेजी एवं दर्शन-शास्त्रा में M.A. कर चुके थे। दीक्षा लेने के पश्चात् ‘भारतीय धर्मों में मुक्ति की अवधरणा, जैन धर्म का विशिष्ट संदर्भ’ इस विषय में Ph.D की उपाधि प्राप्त की। आप समस्त स्थानकवासी जैन समाज में Ph.D. की उपाध् प्राप्त करने वाले प्रथम संत हैं। इसके पश्चात् ‘विक्रम शिला विश्वविद्यालय, भागलपुर’ ने ‘ध्यान एक दिव्य साध्ना’ पर DLit. की मानद् उपाध् देकर आपको सम्मानित किया। अभी तक के समय में श्रमण संघ के Ph.D. पदवीधरी आप एकमात्रा आचार्य हैं। जैन धर्म के आप गहन अध्येता एवं व्याख्याता हैं।

आपने शोध् ग्रंथ लेखन के दौरान साहित्य को सामने रखकर जो अन्तर्दृष्टि विकसित की उसी के चलते आप श्री जी आगमों का तलस्पर्शी अध्ययन कर पाये। आप श्री ने वैराग्य काल में विविध् देशों की संस्कृति, उनके आचार-विचार एवं आदर्शों के समीचीन अध्ययन हेतु जैनेवा, टोरन्टो, कुवैत, कनाडा, अमेरिका आदि स्थानों की विदेश यात्रा की। व्यावहारिक ज्ञान के साथ-साथ आगम ज्ञान की गहरी प्यास आप श्री जी में सदा जागृत होती रही। आपके मन में एक अटूट अभिप्सा है सत्य को साक्षात् करने की जो किसी भव्य एवं आत्मार्थी संत में ही होती है।

कृतित्व

आप श्री का कृतित्व अति सौम्य, सरल एवं स्नेहमयी है जैसे सुरभित विकसित कमल का फल। विचारों से आप प्रगतिशील एवं सर्व-धर्म-समभावी हैं। आप एक ओजस्वीवक्ता एवं कुशल लेखक हैं। आपके प्रवचन सूत्रावत् सीधे और हृदयस्पर्शी होते हैं। आपकी प्रवचन शैली में महावीर की अहिंसा, कृष्ण का कर्मयोग, जीसस का प्रेम, बुद्ध की करुणा, मोहम्मद का भाईचारा, आत्मसात होता है। जो भी आप बोलते है। वे वचन जीवन की आत्यन्तिक गहराई एवं अनुभूति से उद्बुध्द होते हैं। जीवन को उसकी समग्रता में जानने, जीने और प्रयोग करने में आप एक जीवन्त प्रतीक हैं।

एक पौरुषीय व्यक्तित्व

पुरिसा ! परम चक्खु विपरिक्कमा।‘हे निर्मल ज्योति वाले पुरुष ! तू पुरुषार्थ कर, पराक्रम कर, अपने पांवों से जीवन पथ को नापता हुआ आगे बढ़।’ आप श्री का जीवन भगवान के इस उद्घोष का एक साकार स्वरूप है। आपका पराक्रम एवं आपकी अप्रमत्तता विरल है। एक तरफ तो उग्र विहार साथ ही अविरत लगभग 25 वर्षों से एकान्तर तप का अनुष्ठान, दूसरी ओर उन्नत शिखरों को स्पर्श करती हुई आपकी यह प्रखर आत्म-ध्यान साधना । बाह्य एवं आभ्यन्तर तप का यह अद्भुत संगम शायद ही कहीं और देखने को मिले। यह इनका पुरुषार्थमय जीवन वास्तव में आज के युवा वर्ग के लिए एवं समस्त साध्कगण के लिए एक उच्चतम एवं जीवन्त आदर्श स्थापित करता है।

युवाचार्य पद

सद्गुरु वही होता है जो सत्य प्राप्ति का मार्ग बतलाये जो केवल सत्य की परिभाषा करके रह जाये वह सद्गुरु नहीं होता। सत्य के स्वरूप की परिभाषा के साथ-साथ उस स्वरूप को कैसे उपलब्ध् किया जाये, यह जो दर्शाये वही होता है सद्गुरु। ऐसे ही एक सद्गुरु हैं आचार्य श्री जी जो धर्म के सैध्दांतिक पक्ष के साथ-साथ उसके व्यावहारिक पक्ष को भी हमारे समक्ष रखते हैं। ऐसे अनेकानेक विशिष्ट गुणों से अलंकृत है आपका जीवन आपके व्यक्तित्व से प्रमुदित होकर मात्रा पन्द्रह वर्ष की दीक्षा पूना के विशाल साधु-सम्मेलन में परम पूज्य महामहिम आचार्य सम्राट श्री आनंद ट्टषि जी महाराज ने आपको 13 मई, 1987 को युवाचार्य पदवी से सुशोभित किया।

ध्यान-साधना एवं मंगल मैत्री अभियान

आपने ध्यान पद्धति के साथ-साथ जनमानस को अध्यात्म एवं मंगल मैत्री से जोड़ने के लिए एक विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान प्रारंभ किया जिसके अन्तर्गत आत्म-ध्यान साधना कोर्स, सामाजिक कुरीतियों का उन्मूलन, बाल संस्कार, व्यसन मुक्ति अभियान, अहिंसा शाकाहार प्रचार-प्रसार, व्यक्तित्व विकास, धार्मिक समभाव एवं समन्वयात्मक दृष्टिकोण, पर्यावरण सुरक्षा, राष्ट्रीय एकता एवं सुरक्षा, आध्यात्मिक संस्कृति का संरक्षण एवं सवर्धन, शास्त्रा संपादन एवं साहित्य लेखन, पुरातन साहित्य के विषय में शोध् संशोधन एवं पुनःमुद्रण तथा स्वाध्याय, धर्म एवं साधना के प्रशिक्षण कार्यक्रम। हर व्यक्ति इस अभियान से जुड़कर अपने जीवन को सफल बना सकता है।
 
इस अभियान में ‘आत्म-ध्यान साधना कोर्स’ के अनेकों शिविर भारत के विभिन्न क्षेत्रों में लग रहे हैं जिसमें लोगों की शारीरिक एवं मानसिक व्याध्यिां दूर होने लगी है। मानव मात्रा में मैत्री एवं प्रेम का वातावरण निर्माण हो रहा है एवं बड़ी संख्या में साधना वर्ग अपने मूल स्वभाव की ओर अभिमुख हो रहा है। साधना के गहरे अनुभव को लेकर वह अपने लक्ष्य सिद्धालय की ओर बढ़ रहा है। आप साधक वर्ग को समत्व मेें जीने की कला प्रदान कर रहे हैं ताकि व्यक्ति अपने सभी व्यावहारिक संबंधें एवं कार्यों को करते हुए बंधन से मुक्त हो सके। आचार्य श्री ने तीर्थंकरों की साधना को किस प्रकार अनुभव कर सकता है यह कार्य आपने उनके लिए सहज कर दिया है। इस देह में रहते हुए किस प्रकार देहातीत रहा जा सकता है। किस प्रकार हर क्षण समत्व की साधना में, परमात्मा की आराधना में एवं जागृति में बीते यह कला आप दवारा साधना शिविरों में सहज ही प्रदान की जाती है। साधना शिविरों में आप सिखाते हैं कि किस प्रकार हम छोटे-बड़े, ऊँच-नीच का भेद मिटाकर सबको एक समान आदर दें। प्रत्येक जीव के लिए आपके हृदय में कोमलता है, आँखों मं वात्सल्यता एवं करुणा है, शब्दों में ऐसी ऊर्जा है कि मृतप्राय व्यक्तित्व भी नई ऊर्जा की चेतना से गतिमान हो उठता है। कभी-कभी किसी साधक को जगाने के लिए आप मातृवत कठोर भी हो जाते हैं जिसमें कि उस साधक का कल्याण ही निहित होता है।
 
ध्यान-साधना के प्रचार हेतु भगवान महावीर मेडीटेशन एण्ड रिसर्च सेंटर ट्रस्ट, श्री सरस्वती विद्या केन्द्र, आत्म-आनंद ध्यान केन्द्र आदीश्वर धम कुप्पकलां आदि अनेकानेक संस्थाओं की आपने प्रेरणा प्रदान की। आपने अपने पितामह आचार्य सम्राट पूज्य श्री आत्माराम जी महाराज के अनुपलब्ध् आगमों को पुनः संपादित कर प्रकाशित करवाया है और ध्यान व अन्य विषयों पर आपने लगभग 22 पुस्तकें हिन्दी भाषां में और लगभग 10 पुस्तकें अंग्रेजी भाषा में लिखी हैं। आप बहुभाषाविद् बहुश्रुत आचार्य हैं। ध्यान-साधना से सबाधित आॅडियो, वीडियो कैसेट भी आप श्री की मधुर आवाज में उपलब्ध् है।

राष्ट्रीय एवं आंतरराष्ट्रीय स्तर के संबंध्

देश व विदेश की अनेकों हस्तियां आपके जीवन से प्रभावित हुई हैं जिनमें मदर टेरेसा, आर्ट आॅफ लिविंग के प्रणेता श्री श्री रविशंकर जी,सिद्ध समाधी योग के प्रणेता श्री ऋषि प्रभाकर जी, विपश्यना के संस्थापक कल्याण मित्रा श्री सत्यनारायण जी गोयन्का, प्रकट ज्ञानी श्री कन्नू दादा जी आदि आध्यात्मिक पुरुषों का साधना के दृष्टिकोण से मिलन होता रहा है।

जैन एकता के कार्यक्रमों में समन्वय की दृष्टि से चारों सम्प्रदायों के प्रमुख आचार्यों जिसमें आचार्य श्री तुलसी जी, आचार्य श्री महाप्रज्ञ जी, आचार्य श्री महाश्रमण जी, आचार्य श्री विद्यानंद जी, आचार्य श्री रत्नसुन्दर सूरीश्वर जी, आचार्य श्री विजय इन्द्रदिन्न सूरीश्वर जी महाराज, गच्छादी पती आचार्य श्री नित्यानंद जी महाराज, आचार्य श्री धर्मधुरधर जी महाराज, गच्छादी पती श्री कुन्थुसागर जी, जम्बूद्वीप संस्थापिका गणिनी माता ज्ञानवती जी एवं स्थानकवासी परम्परा के प्रमुख आचार्य श्री आनंद ट्टषि जी महाराज, आचार्य श्री हस्तीमल जी महाराज, उपाध्याय श्री अमर मुनि जी महाराज, आचार्य श्री देवेन्द्र मुनि जी महाराज एवं प्रगतिवादी आचार्य श्री सुशील मुनि जी, आचार्य श्री विमल मुनि जी, आचार्य श्री चंदना जी आदि से जैन एकता के क्षेत्रा में समय-समय पर मिलन होता रहा है।

उपरोक्त सभी महान व्यक्तित्व आपकी निर्मलता, सरलता, गुणग्राहकता, विनयशीलता एवं स्पष्टता से प्रभावित रहे हैं, विशेषकर ध्यान-साध्ना से। समय-समय पर अनेकों जैन, अजैन विद्वान आप श्री जी से जैन दर्शन संबंध्ति एवं आत्म-ध्यान-साधना संबंध्ति मार्गदर्शन प्राप्त करते रहते हैं। विशेष स्कूलों का अध्यापक वर्ग, काॅलेज एवं विश्वविद्यालयों के प्रोपेफसर, लेखक, प्रबुद्धि विचारक, बुद्धिजीवी आपके जीवन एवं व्यक्तित्व से प्रभावित हैं।

आचार्य पद

9 जून, 1999 अहमदनगर महाराष्ट्र में श्रमण संघीय विधनानुसार आप श्रमण संघ के चतुर्थ पट्टध्र आचार्य के रूप में अभिसिक्त हुए। विशाल चतुर्विर्थ श्री संघ के नेतृत्व की जिम्मेदारी आपने संभाली। इस जिम्मेदारी के पश्चात् आप श्री जी ने चतुर्विर्थ संघ के विकास हेतु विशिष्ट कार्यक्रम अपने हाथ में लेते हुए समग्र भारत भ्रमण की विहार-यात्रा का कार्यक्रम शुरू किया। करीब बीस हजार किलोमीटर की यात्रा आप तय कर चुके हैं। आपने पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान, मध्य प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश, उत्तरांचल, उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश आदि क्षेत्रों में विचरण किया।

ध्यान-साधना एवं मंगल मैत्री अभियान

आपने ध्यान पद्धति के साथ-साथ जनमानस को अध्यात्म एवं मंगल मैत्री से जोड़ने के लिए एक विश्व मानव मंगल मैत्री अभियान प्रारंभ किया जिसके अन्तर्गत आत्म-ध्यान साधना कोर्स, सामाजिक कुरीतियों का उन्मूलन, बाल संस्कार, व्यसन मुक्ति अभियान, अहिंसा शाकाहार प्रचार-प्रसार, व्यक्तित्व विकास, धार्मिक समभाव एवं समन्वयात्मक दृष्टिकोण, पर्यावरण सुरक्षा, राष्ट्रीय एकता एवं सुरक्षा, आध्यात्मिक संस्कृति का संरक्षण एवं सवर्धन, शास्त्रा संपादन एवं साहित्य लेखन, पुरातन साहित्य के विषय में शोध् संशोधन एवं पुनःमुद्रण तथा स्वाध्याय, धर्म एवं साधना के प्रशिक्षण कार्यक्रम। हर व्यक्ति इस अभियान से जुड़कर अपने जीवन को सफल बना सकता है। इस अभियान में ‘आत्म-ध्यान साधना कोर्स’ के अनेकों शिविर भारत के विभिन्न क्षेत्रों में लग रहे हैं जिसमें लोगों की शारीरिक एवं मानसिक व्याध्यिां दूर होने लगी है। मानव मात्रा में मैत्री एवं प्रेम का वातावरण निर्माण हो रहा है एवं बड़ी संख्या में साधना वर्ग अपने मूल स्वभाव की ओर अभिमुख हो रहा है। साधना के गहरे अनुभव को लेकर वह अपने लक्ष्य सिद्धालय की ओर बढ़ रहा है। आप साधक वर्ग को समत्व मेें जीने की कला प्रदान कर रहे हैं ताकि व्यक्ति अपने सभी व्यावहारिक संबंधें एवं कार्यों को करते हुए बंधन से मुक्त हो सके। आचार्य श्री ने तीर्थंकरों की साधना को किस प्रकार अनुभव कर सकता है यह कार्य आपने उनके लिए सहज कर दिया है। इस देह में रहते हुए किस प्रकार देहातीत रहा जा सकता है। किस प्रकार हर क्षण समत्व की साधना में, परमात्मा की आराधना में एवं जागृति में बीते यह कला आप दवारा साधना शिविरों में सहज ही प्रदान की जाती है। साधना शिविरों में आप सिखाते हैं कि किस प्रकार हम छोटे-बड़े, ऊँच-नीच का भेद मिटाकर सबको एक समान आदर दें। प्रत्येक जीव के लिए आपके हृदय में कोमलता है, आँखों मं वात्सल्यता एवं करुणा है, शब्दों में ऐसी ऊर्जा है कि मृतप्राय व्यक्तित्व भी नई ऊर्जा की चेतना से गतिमान हो उठता है। कभी-कभी किसी साधक को जगाने के लिए आप मातृवत कठोर भी हो जाते हैं जिसमें कि उस साधक का कल्याण ही निहित होता है। ध्यान-साधना के प्रचार हेतु भगवान महावीर मेडीटेशन एण्ड रिसर्च सेंटर ट्रस्ट, श्री सरस्वती विद्या केन्द्र, आत्म-आनंद ध्यान केन्द्र आदीश्वर धम कुप्पकलां आदि अनेकानेक संस्थाओं की आपने प्रेरणा प्रदान की। आपने अपने पितामह आचार्य सम्राट पूज्य श्री आत्माराम जी महाराज के अनुपलब्ध् आगमों को पुनः संपादित कर प्रकाशित करवाया है और ध्यान व अन्य विषयों पर आपने लगभग 22 पुस्तकें हिन्दी भाषां में और लगभग 10 पुस्तकें अंग्रेजी भाषा में लिखी हैं। आप बहुभाषाविद् बहुश्रुत आचार्य हैं। ध्यान-साधना से सबाधित आॅडियो, वीडियो कैसेट भी आप श्री की मधुर आवाज में उपलब्ध् है।

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आत्मज्ञानी, सदगुरुदेव, युगप्रधान, ध्यान गुरु, आचार्य सम्राट पूज्य डॉ. श्री शिवमुनि जी म.सा., युवाचार्य श्री महेंद्रऋषि जी म.सा., प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा., सहमंत्री श्री शुभममुनि जी म.सा. आदि ठाणा 10 शिवाचार्य समवसरण, प्रज्ञा शिखर, महाप्रज्ञ विहार, भुवाणा, उदयपुर, राजस्थान मे चातुर्मास हेतु विराजमान है।

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उदयपुर चातुर्मास आत्म ध्यान साधना शिविर

एक दिवसीय आत्म ध्यान साधना शिविर

दिनांक – 10 अक्टूम्बर 2018, बुधवार
समय प्रात: 09:30 से सायं 05:00 बजे तक


दो दिवसीय आत्म ध्यान साधना शिविर

दिनांक – 01 से 02 अक्टूम्बर 2018, सोमवार से मंगलवार
समय प्रथम दिवस प्रात: 06:00 से द्वितीय दिवस सायं 05:00 बजे तक


चार दिवसीय आत्म ध्यान साधना शिविर

दिनांक – 11 से 14 अक्टूम्बर 2018, गुरुवार से रविवार
समय प्रथम दिवस प्रात: 10:00 से चतुर्थ दिवस सायं 05:00 बजे तक


ग्यारह दिवसीय आत्म ध्यान साधना शिविर

दिनांक – 10 से 20 नवम्बर 2018, शनिवार से मंगलवार
समय प्रथम दिवस प्रात: 10:00 से ग्यारहवे दिवस सायं 05:00 बजे तक


स्थान – शिवाचार्य समवसरण, श्री वर्द्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ, प्रज्ञा शिखर, महाप्रज्ञ विहार, भुवाणा, उदयपुर, राजस्थान


-: सम्पर्क :-

श्री नरेन्द्र सेठिया
9828058578
श्री महेश नाहर
9414317057
सुश्री हिम्मी सिरोया
9166641909
श्री रमेश भण्डारी
9302103817
श्री राजकुमार जैन
9425319691
श्री गौरव जैन
9179979322
श्री अरिहन्त सिसोदिया
9413358248
श्री सुशील जैन
9416034463


आगामी आत्म ध्यान साधना शिविर

एक दिवसीय आत्म ध्यान साधना शिविर

दिनांक – 10 सितम्बर 2018

दो दिवसीय आत्म ध्यान साधना शिविर

दिनांक – 11-12 सितम्बर 2018

स्थान – अदीश्वर धाम, कुप्प कलां, जिला - संगरुर, पंजाब

-: सम्पर्क :-
9417875056, 9316858566, 9417264571, 9517633791


पत्राचार हेतु सम्पर्क सूत्र

श्री नानालाल जी कोठारी,
शिरीष सदन, 1 च 17, गायत्री नगर,
हिरण मगरी, सेक्टर 5
उदयपुर - 313002, राजस्थान


आत्मज्ञानी, सदगुरुदेव, युगप्रधान, ध्यान गुरु, आचार्य सम्राट पूज्य डॉ. श्री शिवमुनि जी म.सा., युवाचार्य श्री महेंद्रऋषि जी म.सा., प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा., सहमंत्री श्री शुभममुनि जी म.सा. आदि ठाणा 10 शिवाचार्य समवसरण, प्रज्ञा शिखर, महाप्रज्ञ विहार, भुवाणा, उदयपुर, राजस्थान मे चातुर्मास हेतु विराजमान है।

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दिनांक – 01 से 02 अक्टूम्बर 2018, सोमवार से मंगलवार
समय प्रथम दिवस प्रात: 06:00 से द्वितीय दिवस सायं 05:00 बजे तक


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दिनांक – 10 से 20 नवम्बर 2018, शनिवार से मंगलवार
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स्थान – शिवाचार्य समवसरण, श्री वर्द्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ, प्रज्ञा शिखर, महाप्रज्ञ विहार, भुवाणा, उदयपुर, राजस्थान


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श्री नरेन्द्र सेठिया
9828058578
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9166641909
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पत्राचार हेतु सम्पर्क सूत्र

श्री नानालाल जी कोठारी,
शिरीष सदन, 1 च 17, गायत्री नगर,
हिरण मगरी, सेक्टर 5
उदयपुर - 313002, राजस्थान


आत्मज्ञानी, सदगुरुदेव, युगप्रधान, ध्यान गुरु, आचार्य सम्राट पूज्य डॉ. श्री शिवमुनि जी म.सा., युवाचार्य श्री महेंद्रऋषि जी म.सा., प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा., सहमंत्री श्री शुभममुनि जी म.सा. आदि ठाणा 10 शिवाचार्य समवसरण, प्रज्ञा शिखर, महाप्रज्ञ विहार, भुवाणा, उदयपुर, राजस्थान मे चातुर्मास हेतु विराजमान है।

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9828058578
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9417875056, 9316858566, 9417264571, 9517633791


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ग्यारह दिवसीय आत्म ध्यान साधना शिविर

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स्थान – शिवाचार्य समवसरण, श्री वर्द्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ, प्रज्ञा शिखर, महाप्रज्ञ विहार, भुवाणा, उदयपुर, राजस्थान


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